Chapter 5समकालीन विश्व में सुरक्षा

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समकालीन विश्व में सुरक्षा : एक स्वयंपूर्ण, अद्यतन और परीक्षा-योग्य विवेचन

यह अध्याय NCERT के अध्याय 5 का पूरक है, प्रतिस्थापन नहीं। इसका उद्देश्य: पाठ्यपुस्तक के ढाँचे को लेकर उसे 2026 के तथ्यों, संस्थाओं, संधियों और विवादों से भर देना — ताकि विद्यार्थी बोर्ड परीक्षा के साथ-साथ UPSC, राज्य PCS, CUET, SSC और NDA/CDS के लिए भी तैयार हो सके।

★प्रत्येक गैर-स्पष्ट तथ्य वेब-सत्यापित है और स्रोत-चिह्नित: ◆ = प्राथमिक स्रोत (संधि-पाठ, UN/OPCW/UNHCR/SIPRI आधिकारिक दस्तावेज़) ◇ = द्वितीयक स्रोत (शोध-संस्थान, प्रामाणिक समाचार) 【पाठ】 = NCERT पाठ्यपुस्तक स्वयं पूरी स्रोत-सूची अंत में। अद्यतन: अगस्त 2026।

विषय-सूची

भागशीर्षक
Iप्रश्न जो सब कुछ तय करता है — “सुरक्षा किसकी?”
IIपारंपरिक सुरक्षा : पूरा तर्क, उसकी ताकत और उसकी दरारें
IIIअपरोध की भौतिकी और मनोविज्ञान
IVअस्त्र-नियंत्रण की इमारत — और उसका ढहना (1963–2026)
V2026 की परमाणु दुनिया — SIPRI के आँकड़े
VIभारत : परमाणु सिद्धांत, संस्थाएँ और अपवाद की स्थिति
VIIअपारंपरिक मोड़ : मानवीय सुरक्षा का जन्म और उसकी सीमा
VIIIपाँच नये खतरे — 2026 के आँकड़ों में
IXहस्तक्षेप का प्रश्न : R2P, और उसका ठहराव
Xसहयोगमूलक सुरक्षा : क्या यह सचमुच काम करती है?
XIभारत की सुरक्षा-वास्तुकला — चार घटक, आज
XIIदस विवाद जिन पर परीक्षा में राय माँगी जाती है
XIIIत्वरित तथ्य-पट्टिका
XIVस्रोत-सूची

भाग I — प्रश्न जो सब कुछ तय करता है

1.1 एक शब्द, जो बहस बंद कर देता है

पाठ्यपुस्तक अपनी शुरुआत एक असामान्य ईमानदारी से करती है 【पाठ】—

“बहस या चर्चा को रोकना हो तो अक्सर इस जुमले का इस्तेमाल होता है। कहा जाता है कि यह सुरक्षा का मसला है और देश की भलाई के लिए बड़ा जरूरी है… लेकिन लोकतंत्र में कोई भी बात इतनी ढँकी-छुपी नहीं रखी जा सकती।”

यह वाक्य केवल भूमिका नहीं है — यह एक पूरे शोध-सम्प्रदाय का सार है। कोपेनहेगन सम्प्रदाय (बैरी बुज़ान, ओले वेवर) ने इसी परिघटना को नाम दिया — ★‘सुरक्षाकरण’ (securitization)।

इसका तर्क सरल है: कोई मुद्दा अपने-आप ‘सुरक्षा का मुद्दा’ नहीं होता। कोई उसे बनाता है। जब कोई सत्ताधारी कर्ता किसी विषय को “अस्तित्व का खतरा” घोषित करता है और जनता उसे स्वीकार कर लेती है, तब वह विषय सामान्य लोकतांत्रिक बहस से बाहर निकलकर आपात-क्षेत्र में चला जाता है — जहाँ गोपनीयता, आपातकालीन शक्तियाँ और असीमित बजट जायज़ मान लिए जाते हैं।

★★और इसीलिए कोपेनहेगन सम्प्रदाय कहता है कि सुरक्षाकरण कोई उपलब्धि नहीं, विफलता है। आदर्श है ‘असुरक्षाकरण’ (desecuritization) — मुद्दे को वापस सामान्य राजनीति में ले आना। यही पाठ्यपुस्तक भी कहती है।

1.2 परिभाषा और उसकी दो शर्तें

पाठ्यपुस्तक की परिभाषा 【पाठ】— “सुरक्षा का बुनियादी अर्थ है — खतरे से आजादी।”

पर तुरंत दो शर्तें लगती हैं:

  1. खतरा जीवन के ‘केंद्रीय मूल्यों’ को छूता हो;
  2. खतरा इतना गंभीर हो कि क्षति “अपूरणीय” हो।

और फिर पाठ्यपुस्तक स्वयं अपनी परिभाषा पर सवाल उठाती है — “किसके केंद्रीय मूल्य? पूरे देश के? आम स्त्री-पुरुषों के? क्या नागरिकों की नुमाइंदगी करने वाली सरकार हमेशा ‘केंद्रीय मूल्यों’ का वही अर्थ ग्रहण करती है जो कोई साधारण नागरिक?”

★★यह सवाल पूरे अध्याय की धुरी है। इसका जवाब भाग VII में मिलता है — जब संदर्भी बदल जाता है।

भाग II — पारंपरिक सुरक्षा : पूरा तर्क, उसकी ताकत और उसकी दरारें

2.1 तर्क की श्रृंखला

पारंपरिक सुरक्षा का पूरा भवन एक ही आधार-वाक्य पर खड़ा है 【पाठ】—

“विश्व-राजनीति में ऐसी कोई केंद्रीय सत्ता नहीं जो सबके ऊपर हो… अत: हर देश को अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी खुद उठानी होती है।”

इसी से पूरी श्रृंखला निकलती है:

अराजकता (कोई विश्व-सरकार नहीं) → आत्म-सहायता → सैन्य क्षमता → अपरोध और रक्षा → शक्ति-संतुलन → गठबंधन

यह यथार्थवाद (Realism) की शास्त्रीय श्रृंखला है — हैंस मॉर्गेन्थाऊ से केनेथ वॉल्ट्ज़ तक।

2.2 ‘सुरक्षा की दुविधा’ (Security Dilemma) — वह पद जो पाठ्यपुस्तक नहीं देती, पर सिखाती है★★

पाठ्यपुस्तक शक्ति-संतुलन समझाते हुए लिखती है 【पाठ】—

“संभव है कोई पड़ोसी देश यह न कहे कि वह हमले की तैयारी में जुटा है। हमले का कोई प्रकट कारण भी नहीं जान पड़ता। फिर भी यह देखकर कि कोई देश बहुत ताकतवर है यह भांपा जा सकता है कि भविष्य में वह हमलावर हो सकता है।”

★★यह ‘सुरक्षा की दुविधा’ की सटीक परिभाषा है — बिना नाम लिए। इसका तर्क यह है:

चरणक्या होता है
1A अपनी सुरक्षा बढ़ाने के लिए सेना मज़बूत करता है — विशुद्ध रक्षात्मक इरादे से
2B इसे खतरे के रूप में देखता है — क्योंकि उसे A का इरादा नहीं, केवल क्षमता दिखती है
3B भी सेना बढ़ाता है
4A को लगता है कि उसका डर सही था — और वह और बढ़ाता है
★परिणामदोनों ने खर्च किया, दोनों पहले से कम सुरक्षित हैं — यही ‘हथियारों की होड़’ (arms race) है

★★यही वह विरोधाभास है जो पूरे अस्त्र-नियंत्रण आंदोलन की जड़ है — और यही CBMs का औचित्य भी। इरादा दिखाई नहीं देता, इसलिए उसे ‘बताना’ पड़ता है — यही विश्वास बहाली है।

2.3 गठबंधन : ताकत और अस्थिरता

पाठ्यपुस्तक का सबसे तीखा वाक्य 【पाठ】— “गठबंधन राष्ट्रीय हितों पर आधारित होते हैं और राष्ट्रीय हितों के बदलने पर गठबंधन भी बदल जाते हैं।”

उदाहरण जो वह देती है: अमरीका ने 1980 के दशक में सोवियत संघ के खिलाफ इस्लामी उग्रवादियों को समर्थन दिया; 11 सितंबर 2001 के बाद उन्हीं के खिलाफ मोर्चा खोल दिया।

★इस सिद्धांत को 2026 तक बढ़ाइए — ABM संधि (अमरीका 2002 में बाहर), INF संधि (अमरीका 2019 में बाहर), और New START (5 फरवरी 2026 को समाप्त) — तीनों वही बात सिद्ध करती हैं: अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबद्धताएँ भी राष्ट्रीय हितों की छाया में रहती हैं। ◇

2.4 पहली दरार — 95 प्रतिशत

पारंपरिक धारणा कहती है कि खतरा बाहर से आता है। पाठ्यपुस्तक स्वयं इसे तोड़ती है 【पाठ】—

★★“विश्व के सशस्त्र संघर्षों में 95 प्रतिशत अब आंतरिक युद्ध के अंतर्गत हैं। सन् 1946 से 1991 के बीच गृह युद्धों की संख्या में बारहगुनी वृद्धि हुई है जो पिछले 200 वर्षों में सबसे लंबी छलांग है।”

इसका अर्थ यह है कि पारंपरिक धारणा का ‘खतरा बाहर से’ वाला मूल आधार आज के अधिकांश संघर्षों पर लागू ही नहीं होता। यही अपारंपरिक धारणा की ओर पहला दरवाज़ा है।

भाग III — अपरोध की भौतिकी और मनोविज्ञान

3.1 दो प्रकार

प्रकारतर्कउदाहरण
★दंड द्वारा अपरोध“हमला करोगे तो असहनीय नुकसान झेलोगे”परमाणु अपरोध
★वंचन द्वारा अपरोध“हमला करोगे तो सफल नहीं हो पाओगे”वायु-रक्षा प्रणाली, किलेबंदी

3.2 चार आवश्यक शर्तें★★

  1. क्षमता — नुकसान पहुँचाने की वास्तविक शक्ति
  2. विश्वसनीयता — शत्रु को यकीन हो कि आप सचमुच प्रयोग करेंगे
  3. संप्रेषण — धमकी शत्रु तक स्पष्ट पहुँचे
  4. ★तर्कसंगतता — दोनों पक्ष लागत-लाभ का हिसाब लगाने वाले हों

★★चौथी शर्त सबसे महत्वपूर्ण है — और यही बताती है कि अपरोध आतंकवादियों पर क्यों नहीं चलता। आत्मघाती हमलावर के पास खोने के लिए भूक्षेत्र नहीं है, और वह इसी तर्क-पद्धति पर नहीं चलता। (NCERT प्रश्न 10 का यही सबसे मज़बूत उत्तर है।)

3.3 MAD और ABM का विरोधाभास

पारस्परिक सुनिश्चित विनाश (MAD) तभी काम करता है जब दोनों पक्षों के पास ‘द्वितीय-प्रहार क्षमता’ हो — यानी पहला हमला झेलने के बाद भी जवाब देने की क्षमता।

★★अब विरोधाभास देखिए: यदि कोई पक्ष कारगर मिसाइल-रक्षा कवच बना ले, तो वह पहला हमला करके भी सुरक्षित रह सकता है — और MAD टूट जाता है।

इसीलिए ABM संधि (1972) ने ‘रक्षा’ पर रोक लगाई। 【पाठ】 पाठ्यपुस्तक इसे इस तरह कहती है — “अमरीका और सोवियत संघ को बैलेस्टिक मिसाइलों को रक्षा-कवच के रूप में इस्तेमाल करने से रोका… दोनों को सीमित संख्या में ऐसी रक्षा-प्रणाली तैनात करने की अनुमति थी, परंतु व्यापक उत्पादन से रोक दिया।”

★★परीक्षा के लिए वाक्य: “ABM संधि इस अर्थ में अनूठी है कि उसने रक्षा को सीमित करके शांति बढ़ाई — क्योंकि अपराजेय रक्षा-कवच पहले हमले को आकर्षक बना देता।”

3.4 परमाणु त्रिकोण★

माध्यमविशेषताभारत
थल — भूमि-आधारित मिसाइलसटीक, पर स्थिर लक्ष्यअग्नि शृंखला
वायु — बमवर्षक विमानलचीला, वापस बुलाया जा सकता हैमिराज-2000, राफेल, सुखोई-30MKI
★जल — पनडुब्बी-प्रक्षेपित मिसाइलसबसे बचने योग्य — असली द्वितीय-प्रहार गारंटीINS अरिहंत

★भारत का त्रिकोण नवंबर 2018 में पूर्ण घोषित हुआ, जब INS अरिहंत ने पहली अपरोध गश्त पूरी की। ◇

भाग IV — अस्त्र-नियंत्रण की इमारत और उसका ढहना (1963–2026)

4.1 पूरी वंशावली

वर्षसंधिक्या किया2026 में स्थिति
1963PTBTवायुमंडल, अंतरिक्ष और जल के भीतर परीक्षण पर रोक✓ प्रभावी; भारत पक्षकार
1968★★NPT1967 की रेखा; पाँच को मान्यता, बाकी को वंचित✓ 191 राज्य-पक्ष ◆; ! भारत, पाकिस्तान, इज़राइल कभी नहीं; उत्तर कोरिया 2003 में बाहर
1972★ABMमिसाइल-रक्षा कवच पर रोक❌ अमरीका 2002 में बाहर
1972★BWCजैविक हथियारों का पूर्ण निषेध✓ 189 राज्य-पक्ष ◆
1972 / 1979SALT I / SALT IIसंख्या पर परिसीमन! SALT II का कभी अनुसमर्थन नहीं हुआ
1987★INF★हथियारों की एक पूरी श्रेणी समाप्त की (500–5,500 किमी)❌ अमरीका 2019 में बाहर
1991 / 1993START I / IIवास्तविक कटौतीSTART I समाप्त; START II कभी प्रभावी नहीं
1993/1997★CWCरासायनिक हथियारों का पूर्ण निषेध✓ 193 सदस्य राज्य ◆ — लगभग सार्वभौम
1996★CTBTहर तरह के परीक्षण पर रोक! अब तक लागू नहीं; भारत ने हस्ताक्षर नहीं किए
2002SORTतैनात हथियार 1,700–2,200New START ने प्रतिस्थापित किया
2010★★New START1,550 तैनात हथियार; 700 प्रक्षेपण-यान; निरीक्षण❌❌ 5 फरवरी 2026 को समाप्त ◇
2017/2021★TPNWपरमाणु हथियारों को पूर्णत: अवैध घोषित! कोई परमाणु-शक्ति पक्षकार नहीं

4.2 5 फरवरी 2026 — वह तारीख जो अब हर परीक्षा में आएगी★★

बिंदुविवरण
क्या हुआNew START समाप्त हो गई, कोई प्रतिस्थापन नहीं ◇
क्योंसंधि की शर्त के अनुसार इसे केवल एक बार बढ़ाया जा सकता था (2021 में बढ़ाया जा चुका था)
★★परिणामआधी सदी से अधिक में पहली बार अमरीका और रूस के सामरिक परमाणु शस्त्रागारों पर कोई बाध्यकारी सीमा नहीं — और निरीक्षण-पारदर्शिता की व्यवस्था भी समाप्त
रूसविदेश मंत्री लावरोव (11 फरवरी 2026): रूस “फ़िलहाल केंद्रीय मात्रात्मक सीमाओं का पालन” करेगा — पर केवल तब तक जब तक अमरीका उन सीमाओं से आगे न जाए ◇
अमरीकाएक “नयी, उन्नत और आधुनिक संधि” की तलाश की घोषणा
संयुक्त राष्ट्रमहासचिव ने इसे “गंभीर क्षण” (grave moment) कहा ◆

★★इसका सैद्धांतिक अर्थ: अस्त्र-नियंत्रण अब संधि पर नहीं, स्वैच्छिक संयम पर टिका है। पाठ्यपुस्तक का यह वाक्य — “NPT ने परमाण्विक आयुधों को समाप्त तो नहीं किया” — 2026 में और भी सच हो गया है।

और तुरंत बाद: NPT की 11वीं समीक्षा सम्मेलन 27 अप्रैल – 22 मई 2026 को न्यूयॉर्क में हुआ। ◆

भाग V — 2026 की परमाणु दुनिया : SIPRI के आँकड़े 【प्रा/द्वि】

5.1 वैश्विक चित्र (जनवरी 2026)

मानआँकड़ा
नौ परमाणु-सम्पन्न राज्यों के पास कुल आयुध★लगभग 12,187
सैन्य भंडार में (प्रयोग-योग्य)लगभग 9,745
मिसाइलों और विमानों पर तैनातलगभग 4,012

नौ परमाणु-सम्पन्न राज्य: ★अमरीका, रूस, चीन, फ्रांस, ब्रिटेन (NPT-मान्य पाँच) + भारत, पाकिस्तान, इज़राइल, उत्तर कोरिया (NPT से बाहर)

5.2 भारत, पाकिस्तान और चीन★★

देशअनुमानित आयुध (जनवरी 2026)प्रवृत्ति
★भारतलगभग 190बढ़ रहा है; 2025 में 12 आयुध तैनात किए गए; कार्यक्रम अब लंबी दूरी पर केंद्रित
पाकिस्तानलगभग 170नये प्रक्षेपण-यान और विखंडनीय सामग्री का संचय जारी
★चीनलगभग 620★सबसे तेज़ी से बढ़ने वाला शस्त्रागार; तैनात आयुध 24 से बढ़कर 34

★★पाठ्यपुस्तक से जोड़िए 【पाठ】— “दक्षिण एशियाई इलाके में भारत के चारों तरफ परमाणु हथियारों से लैस देश हैं।” आज यह वाक्य पहले से भी अधिक सटीक है — और भारत का शस्त्रागार अब पाकिस्तान से बड़ा बताया जाता है।

5.3 सैन्य-व्यय

मान2025
★वैश्विक सैन्य-व्यय2.89 ट्रिलियन डॉलर — अब तक का सर्वोच्च ◇
★भारत92.1 अरब डॉलर — विश्व में पाँचवाँ स्थान (अमरीका, चीन, रूस, जर्मनी के बाद); वैश्विक व्यय का ~3.2%
चीनलगभग 336 अरब डॉलर — दूसरा स्थान

★कक्षा-चर्चा: पाठ्यपुस्तक का कार्टून (पृ. 70) — 425 अरब रक्षा बजट बनाम शांति विभाग के लिए ‘कुछ लाख डॉलर’ — आज उससे कहीं बड़े पैमाने पर सच है।

भाग VI — भारत : परमाणु सिद्धांत, संस्थाएँ और ‘अपवाद की स्थिति’

6.1 समयरेखा

वर्षघटना
1974पोखरण-I — ‘शांतिपूर्ण परमाणु विस्फोट’
1974! इसी की प्रतिक्रिया में परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (NSG) बना
1998पोखरण-II — भारत ने स्वयं को परमाणु-शक्ति घोषित किया
अगस्त 1999NSAB द्वारा परमाणु सिद्धांत का प्रारूप
★4 जनवरी 2003मंत्रिमंडल की सुरक्षा समिति (CCS) द्वारा आधिकारिक सिद्धांत; परमाणु कमान प्राधिकरण (NCA) की स्थापना
2008★★NSG की एकबारगी छूट (waiver) — भारत NPT का सदस्य हुए बिना नागरिक परमाणु व्यापार कर सकता है
2016–2018★MTCR (2016), वासेनार (2017), ऑस्ट्रेलिया समूह (2018) में प्रवेश
नवंबर 2018परमाणु त्रिकोण पूर्ण — INS अरिहंत की पहली अपरोध गश्त

6.2 2003 के सिद्धांत के सात तत्व★★

  1. विश्वसनीय न्यूनतम अपरोध — होड़ नहीं, पर्याप्तता
  2. ★★पहले प्रयोग नहीं (NFU) — प्रयोग केवल जवाब में
  3. भारी जवाबी कार्रवाई — “असहनीय क्षति” पहुँचाने वाली
  4. ! एक अपवाद — जैविक या रासायनिक हथियारों से बड़े हमले पर परमाणु जवाब का विकल्प खुला
  5. गैर-परमाणु राज्यों के विरुद्ध प्रयोग नहीं
  6. नागरिक नियंत्रण — NCA की राजनीतिक परिषद् की अध्यक्षता प्रधानमंत्री
  7. परीक्षण पर स्वैच्छिक रोक जारी; FMCT वार्ता का समर्थन

6.3 भारत की ‘अपवाद की स्थिति’ — एक अनूठी कूटनीतिक उपलब्धि★★

भारत आज विश्व का एकमात्र देश है जो —

  • NPT का सदस्य नहीं है, और फिर भी
  • NSG की छूट (2008) के कारण नागरिक परमाणु व्यापार कर सकता है, और
  • तीन में से तीन प्रमुख निर्यात-नियंत्रण व्यवस्थाओं (MTCR, वासेनार, ऑस्ट्रेलिया समूह) का सदस्य है।
व्यवस्थाभारत
MTCR (मिसाइल)✓ 27 जून 2016
वासेनार (पारंपरिक हथियार, दोहरे-उपयोग)✓ 7 दिसंबर 2017
ऑस्ट्रेलिया समूह (रासायनिक-जैविक)✓ 19 जनवरी 2018
! NSG (परमाणु)❌ अभी नहीं — चीन का विरोध

★★यह पाठ्यपुस्तक के इस वाक्य का व्यावहारिक अर्थ है 【पाठ】— “भारत ने हथियारों के अप्रसार के संबंध में एक सार्वभौम और बिना भेदभाव वाली नीति चलाने की पहलकदमी की जिसमें हर देश को… बराबर के अधिकार और दायित्व हों।” भारत अप्रसार का विरोधी नहीं है — वह NPT की उस संरचना का विरोधी है जो देशों को दो श्रेणियों में बाँटती है। NFU इसी नैतिक स्थिति का तार्किक विस्तार है।

6.4 सुरक्षा-संस्थाओं का ढाँचा

संस्थावर्षभूमिका
मंत्रिमंडल की सुरक्षा समिति (CCS)—शीर्ष निर्णय-निकाय; प्रधानमंत्री की अध्यक्षता
राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद् (NSC)1998राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) के नेतृत्व में; NSAB इसी का अंग
परमाणु कमान प्राधिकरण (NCA)2003राजनीतिक परिषद् (PM) + कार्यकारी परिषद् (NSA)
★प्रमुख रक्षा अध्यक्ष (CDS)2019तीनों सेनाओं का एकीकरण; सैन्य मामलों का विभाग
राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA)200826/11 के बाद गठित संघीय आतंकवाद-रोधी एजेंसी
CERT-In2004साइबर सुरक्षा — आपात प्रतिक्रिया

भाग VII — अपारंपरिक मोड़ : मानवीय सुरक्षा का जन्म और उसकी सीमा

7.1 शब्द कहाँ से आया

पाठ्यपुस्तक ‘मानवता की सुरक्षा’ शब्द देती है, पर स्रोत नहीं। ★★यह शब्द UNDP की ‘मानव विकास रिपोर्ट 1994’ से प्रचलित हुआ, जिसके पीछे मुख्य बुद्धि पाकिस्तानी अर्थशास्त्री महबूब उल हक़ की थी — वही जिन्होंने अमर्त्य सेन के साथ मानव विकास सूचकांक (HDI) विकसित किया।

7.2 सात आयाम (HDR 1994)★★

आर्थिक · खाद्य · स्वास्थ्य · पर्यावरणीय · व्यक्तिगत · सामुदायिक · राजनीतिक सुरक्षा

7.3 तीन ‘मुक्तियाँ’

मुक्तिअर्थ
★‘अभाव से मुक्ति’आर्थिक-सामाजिक सुरक्षा
★‘भय से मुक्ति’हिंसा से सुरक्षा
★‘गरिमा के साथ जीने की स्वतंत्रता’बाद में जोड़ी गई; UN महासभा संकल्प A/RES/66/290 (2012) में मान्य

★★एक महत्वपूर्ण बारीकी: संकल्प 66/290 स्पष्ट करता है कि मानवीय सुरक्षा ‘रक्षा का उत्तरदायित्व’ (R2P) नहीं है और उसमें बल-प्रयोग की धमकी शामिल नहीं — वह राज्य की संप्रभुता का सम्मान करती है। (यह भेद UPSC मुख्य परीक्षा में बार-बार काम आता है।)

7.4 और उसकी सीमा — ‘न्यूनतम मानक’★★

पाठ्यपुस्तक अपनी ही विस्तारित धारणा पर लगाम भी लगाती है 【पाठ】—

“अगर हम हर तरह के कष्ट या बीमारी को शामिल कर लें तो सुरक्षा की धारणा में संगति नहीं रह जाती। ऐसे में हर चीज सुरक्षा का मसला हो सकती है।”

कसौटी: “अगर किसी मसले से संदर्भी (राज्य अथवा जनसमूह) के अस्तित्व को खतरा हो रहा हो तो उसे सुरक्षा का मसला कहा जा सकता है — चाहे इस खतरे की प्रकृति कुछ भी हो।”

★यह खंड सबसे अधिक छूटता है, और यही अध्याय का सबसे परिपक्व हिस्सा है। यह विद्यार्थी को सिखाता है कि किसी धारणा का विस्तार करते समय उसे बेमानी होने से भी बचाना पड़ता है।

भाग VIII — पाँच नये खतरे : 2026 के आँकड़ों में

8.1 आतंकवाद★★

पहले परिभाषा की समस्या। संयुक्त राष्ट्र में आतंकवाद की कोई सर्वमान्य परिभाषा आज तक नहीं — दो प्रश्नों पर सहमति नहीं बनती:

  1. क्या आत्म-निर्णय के लिए संघर्ष को इसमें शामिल किया जाए?
  2. क्या ‘राज्य-आतंकवाद’ को शामिल किया जाए?

★भारत ने 1996 में ‘अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद पर व्यापक अभिसमय’ (CCIT) का प्रस्ताव रखा था। तीस साल बाद भी वह इन्हीं दो प्रश्नों पर अटका है। यह भारत की एक स्थायी कूटनीतिक माँग है।

वैश्विक आतंकवाद सूचकांक (GTI) 2026 — ◇

निष्कर्षआँकड़ा
2025 में मौतें★5,582 — 2007 के बाद न्यूनतम (−28%)
हमले~2,944 (−22%)
★★प्रथम स्थानपाकिस्तान — 1,139 मौतें, 1,045 घटनाएँ; 2013 के बाद सर्वाधिक; लगातार छठा वर्ष जब वृद्धि हुई
अन्य प्रभावितबुर्किना फ़ासो, नाइजर, नाइजीरिया, माली
★साहेलविश्व की आधी से अधिक आतंकवाद-मौतें — 2007 में 1% से भी कम थीं
★★भारत13वाँ स्थान (6.428) — दो स्थान का सुधार; घटनाओं में ~43% कमी

★विश्लेषण के लिए: पाठ्यपुस्तक का चित्र 2000 के दशक का है — केंद्र पश्चिम और दक्षिण एशिया। 2026 का केंद्र साहेल है। यह पाठ्यपुस्तक की ही थीसिस सिद्ध करता है — “सबसे ज्यादा सशस्त्र संघर्ष सहारा मरुस्थल के दक्षिणवर्ती देशों में होते हैं; यह इलाका दुनिया का सबसे गरीब इलाका है।”

भारत — हालिया घटनाक्रम ◇: 22 अप्रैल 2025 का पहलगाम हमला (26 मृतक) और 7 मई 2025 का ‘ऑपरेशन सिंदूर’; विदेश मंत्री द्वारा घोषित पाँच-सूत्रीय ‘नया सामान्य’, जिसमें प्रमुख बिंदु — आतंकवादियों को ‘छद्म’ नहीं माना जाएगा और “आतंक और बातचीत साथ-साथ नहीं चल सकते।”

8.2 मानवाधिकार और हस्तक्षेप★

(विस्तार भाग IX में)

8.3 वैश्विक निर्धनता★

तथ्यपाठ्यपुस्तकआज
विश्व जनसंख्या760 करोड़ → 1000 करोड़लगभग 820 करोड़; UN अनुमान — 2080 के दशक में ~1030 करोड़ का शिखर
वृद्धि का 50%भारत, चीन, पाकिस्तान, नाइजीरिया, बांग्लादेश, इंडोनेशियाप्रवृत्ति यथावत् — पर चीन की जनसंख्या अब घट रही है

पाठ्यपुस्तक का तंत्र-विश्लेषण आज भी सही है 【पाठ】— उच्च आय + कम वृद्धि → और धनी; निम्न आय + तीव्र वृद्धि → और गरीब।

8.4 प्रवासन और शरणार्थी★★

कानूनी ढाँचा:

दस्तावेज़वर्षक्या
शरणार्थी अभिसमय1951परिभाषा और अधिकार; मूलत: यूरोप और 1951 से पहले की घटनाओं तक सीमित
★प्रोटोकॉल1967समय और भूगोल की सीमा हटा दी
★★अनुच्छेद 33 — गैर-प्रत्यावर्तन1951किसी शरणार्थी को वहाँ वापस नहीं भेजा जा सकता जहाँ उसके जीवन या स्वतंत्रता को खतरा हो — यह प्रथागत अंतर्राष्ट्रीय कानून माना जाता है
आंतरिक विस्थापन पर मार्गदर्शक सिद्धांत1998IDPs के लिए; ! संधि नहीं, ‘सॉफ्ट लॉ’

!! भारत की स्थिति: भारत न 1951 अभिसमय का पक्षकार है, न 1967 प्रोटोकॉल का; और उसके पास कोई राष्ट्रीय शरणार्थी कानून भी नहीं — मामले विदेशी अधिनियम, 1946 और कार्यपालिका के विवेक से चलते हैं। और फिर भी भारत ने तिब्बती (1959 से), बांग्लादेशी (1971), श्रीलंकाई तमिल, अफ़ग़ान, चकमा और रोहिंग्या — सभी को शरण दी है।

★★यही पाठ्यपुस्तक के उस सावधान शब्द-चयन की व्याख्या है 【पाठ】— “सामान्यतया उम्मीद की जाती है कि कोई राज्य शरणार्थियों को स्वीकार करेगा।” — ‘उम्मीद’, ‘बाध्यता’ नहीं। क्योंकि हर देश उस संधि का पक्षकार नहीं है।

आज के आँकड़े (UNHCR, जून 2026) ◆—

श्रेणी2025 के अंत में
★★कुल जबरन विस्थापित11.78 करोड़
शरणार्थी4.16 करोड़ (2.85 करोड़ UNHCR अधिदेश + 60 लाख UNRWA अधिदेश के फ़िलिस्तीनी)
शरण-प्रार्थी90 लाख
★★आंतरिक विस्थापित (IDPs)6.87 करोड़ — शरणार्थियों से कहीं अधिक
बच्चे~4.5 करोड़ (38%)
★2025 की नयी बातएक दशक में पहली बार शरणार्थी-संख्या घटी (−3%); 1.47 करोड़ लोग लौटे — विशेषकर अफ़ग़ानिस्तान, सूडान, सीरिया

★★सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष: आंतरिक विस्थापित (6.87 करोड़) शरणार्थियों (4.16 करोड़) से बहुत अधिक हैं — यानी पाठ्यपुस्तक जिस श्रेणी को एक उदाहरण (कश्मीरी पंडित) में निपटा देती है, वह आज विश्व की सबसे बड़ी विस्थापन-श्रेणी है — और उसके लिए कोई बाध्यकारी संधि नहीं, क्योंकि वहाँ संप्रभुता आड़े आती है।

8.5 स्वास्थ्य-सुरक्षा★

UNAIDS 2025 ◆—

मानआँकड़ा
HIV के साथ जी रहे लोग4.10 करोड़
नये संक्रमण (वार्षिक)12 लाख — 1994 के शिखर से 65% कम
★★मौतें (वार्षिक)5.70 लाख — 2004 के शिखर से 73% कम
उपचार पर3.21 करोड़ लोग

★★यही वह चीज़ है जिसे पाठ्यपुस्तक ‘आकाश-कुसुम’ कहती थी। 【पाठ】 उस समय अफ्रीका में उपचार कीमत के कारण असंभव था। आज 3.21 करोड़ लोग उपचार पर हैं — वैश्विक कोष, सस्ती जेनेरिक दवाइयों (जिनमें भारतीय दवा-उद्योग की निर्णायक भूमिका रही) और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के कारण। यह ‘सहयोगमूलक सुरक्षा’ का सबसे ठोस सफल उदाहरण है।

संस्थागत ढाँचा: अंतर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य विनियम (IHR) 2005 — 196 देशों पर बाध्यकारी, इसी के अंतर्गत PHEIC घोषित होता है; COVID-19 को 30 जनवरी 2020 को PHEIC घोषित किया गया; और ★WHO महामारी समझौता मई 2025 में विश्व स्वास्थ्य सभा द्वारा अपनाया गया।

8.6 जलवायु-सुरक्षा★

पड़ाववर्षभारत
UNFCCC1992पक्षकार; ★CBDR का सिद्धांत
★क्योटो प्रोटोकॉलअपनाया 11 दिसंबर 1997; लागू 16 फरवरी 2005★भारत ने अगस्त 2002 में अनुसमर्थन किया; विकासशील देश होने के नाते कोई बाध्यकारी लक्ष्य नहीं
★★पेरिस समझौता12 दिसंबर 2015; लागू 4 नवंबर 2016पक्षकार; 2070 तक शुद्ध-शून्य का लक्ष्य

! अमरीका 2017 और पुन: जनवरी 2025 में पेरिस समझौते से बाहर निकलने की घोषणा कर चुका है।

★★नैतिक तर्क: पाठ्यपुस्तक कहती है कि तापवृद्धि से बांग्लादेश, मालदीव और थाईलैंड को खतरा है — वे देश जिन्होंने समस्या पैदा करने में सबसे कम योगदान दिया। यही CBDR का आधार है और यही भारत की जलवायु-कूटनीति की रीढ़।

भाग IX — हस्तक्षेप का प्रश्न : R2P और उसका ठहराव

9.1 पाठ्यपुस्तक की बहस, औपचारिक रूप में

पाठ्यपुस्तक पूछती है 【पाठ】— “संयुक्त राष्ट्रसंघ को मानवाधिकारों के हनन की स्थिति में हस्तक्षेप करना चाहिए या नहीं।” यह बहस 2005 में एक औपचारिक सिद्धांत बन गई।

पड़ाववर्ष
ICISS की रिपोर्ट — शब्द गढ़ा गया2001
★★विश्व शिखर सम्मेलन परिणाम-दस्तावेज़, अनुच्छेद 138–139 — सर्वसम्मति से स्वीकार2005 ◆
महासचिव की रिपोर्ट — तीन स्तंभ स्पष्ट किए2009

9.2 तीन स्तंभ★★

स्तंभउत्तरदायीक्या
पहलास्वयं राज्यअपनी जनता को जनसंहार, युद्ध-अपराध, जातीय सफ़ाया और मानवता के विरुद्ध अपराध से बचाना
दूसराअंतर्राष्ट्रीय समुदायराज्य की सहायता और क्षमता-निर्माण
तीसराअंतर्राष्ट्रीय समुदायजब शांतिपूर्ण उपाय अपर्याप्त हों और राष्ट्रीय अधिकारी “स्पष्ट रूप से विफल” हों — सुरक्षा परिषद् के माध्यम से सामूहिक कार्रवाई

! ध्यान दीजिए — केवल चार अपराध। R2P हर मानवाधिकार-उल्लंघन पर लागू नहीं होता।

9.3 आलोचना — और वह ठीक वही है जो पाठ्यपुस्तक करती हैध्यान

  • लीबिया 2011 — सुरक्षा परिषद् संकल्प 1973 ने नागरिकों की रक्षा के लिए बल-प्रयोग की अनुमति दी; पर अभियान शासन-परिवर्तन तक पहुँच गया। रूस, चीन, भारत और ब्राज़ील ने इसे ‘जनादेश से आगे जाना’ बताया — और उसके बाद सुरक्षा परिषद् में R2P पर सहमति लगभग असंभव हो गई।
  • सीरिया, म्यांमार, यमन, सूडान — R2P लागू नहीं हो सका।

★★पाठ्यपुस्तक की पंक्ति यहीं सिद्ध होती है 【पाठ】— “संभव है, ताकतवर देशों के हितों से यह निर्धारित होता हो कि संयुक्त राष्ट्रसंघ मानवाधिकार-उल्लंघन के किस मामले में कार्रवाई करेगा और किसमें नहीं।”

9.4 रवांडा 1994 — वह विफलता जिससे R2P जन्मा★

पहलूविवरण
क्या हुआअप्रैल–जुलाई 1994, लगभग 100 दिनों में लाखों लोगों की हत्या। ! पाठ्यपुस्तक “लगभग 5 लाख तुत्सी” कहती है; अंतर्राष्ट्रीय अनुमान 5 लाख से 10 लाख तक हैं
! UN क्यों नहीं रोक पायाUNAMIR मिशन वहाँ मौजूद था, पर जनादेश केवल शांति-निगरानी का था; और सैनिक-संख्या बढ़ाने के बजाय घटा दी गई
★★निष्कर्षयह UN की विफलता से अधिक, उसके सदस्यों की इच्छाशक्ति की विफलता थी — ठीक वैसे जैसे पाठ्यपुस्तक कहती है कि “संयुक्त राष्ट्रसंघ अपने सदस्य देशों का दास है।”

भाग X — सहयोगमूलक सुरक्षा : क्या यह सचमुच काम करती है?

10.1 पाठ्यपुस्तक का तर्क

【पाठ】 “गरीबी मिटाने, तेल तथा बहुमूल्य धातुओं की आपूर्ति बढ़ाने, आप्रवासियों और शरणार्थियों की आवाजाही के प्रबंधन तथा महामारी के नियंत्रण में सैन्य-बल से क्या मदद मिलेगी यह कहना मुश्किल है। वस्तुत: ऐसे अधिकांश मसलों में सैन्य-बल के प्रयोग से मामला और बिगड़ेगा।”

10.2 तीन जगह जहाँ सहयोग सचमुच काम आया★★

क्षेत्रप्रमाण
★चेचक का उन्मूलन8 मई 1980 — विश्व स्वास्थ्य सभा ने चेचक को समाप्त घोषित किया; मानव इतिहास में यह पहला और अब तक का एकमात्र मानव-रोग है जिसे पूर्णत: मिटाया गया — पूरी तरह अंतर्राष्ट्रीय सहयोग का परिणाम
★★HIV-एड्स की मृत्यु-दर2004 के शिखर से 73% कम; 3.21 करोड़ लोग उपचार पर ◆ — जो पाठ्यपुस्तक के समय ‘आकाश-कुसुम’ था
★रासायनिक हथियारCWC — 193 सदस्य राज्य; लगभग सार्वभौम; घोषित भंडारों का विनाश OPCW की निगरानी में — ◆ OPCW को 2013 का नोबेल शांति पुरस्कार

10.3 और तीन जगह जहाँ यह विफल रहाध्यान

क्षेत्रविफलता
परमाणु अस्त्र-नियंत्रणABM (2002), INF (2019), New START (2026) — तीनों समाप्त
R2Pलीबिया के बाद व्यावहारिक ठहराव
आतंकवाद की परिभाषाCCIT तीस साल से अटका हुआ

★★संतुलित निष्कर्ष — परीक्षा के लिए: “सहयोगमूलक सुरक्षा वहाँ सफल होती है जहाँ लाभ सबका साझा हो और कोई राज्य दूसरे की क़ीमत पर लाभ में न हो — जैसे रोग-उन्मूलन। वह वहाँ विफल होती है जहाँ मामला सापेक्ष शक्ति का हो — जैसे परमाणु हथियार। यही पाठ्यपुस्तक के इस वाक्य की गहराई है कि ‘सहयोग की ज़रूरत को पहचानना और सचमुच में सहयोग करना दो अलग-अलग बातें हैं।’”

भाग XI — भारत की सुरक्षा-वास्तुकला : चार घटक, आज

घटक 1 — सैन्य-क्षमता

आयाम2026 की स्थिति
परमाणु शस्त्रागार~190 आयुध; त्रिकोण पूर्ण (2018); NFU सहित ◇
सैन्य-व्यय92.1 अरब डॉलर — विश्व में 5वाँ ◇
संरचनात्मक सुधारCDS (2019), सैन्य मामलों का विभाग, थिएटर कमान की दिशा में काम
हालिया अभियान‘ऑपरेशन सिंदूर’ (7 मई 2025) ◇

घटक 2 — अंतर्राष्ट्रीय कायदे और संस्थाएँ

पहलस्थिति
UN शांतिबहाली★भारत योगदान देने वाले सबसे बड़े देशों में; अब तक 179 भारतीय शांतिरक्षक शहीद — किसी भी सदस्य राज्य से अधिक
निर्यात-नियंत्रणMTCR, वासेनार, ऑस्ट्रेलिया समूह में; NSG में नहीं
जलवायुक्योटो (2002 अनुसमर्थन), पेरिस; 2070 तक शुद्ध-शून्य
आतंकवादCCIT का प्रस्तावक (1996 से)
गुटनिरपेक्षताआज ‘बहु-संरेखण’ (multi-alignment) — QUAD, BRICS, SCO, I2U2 — सब में एक साथ

घटक 3 — आंतरिक सुरक्षा

उपकरण! विवाद-बिंदु
AFSPA (1958)मानवाधिकार-आलोचना; हाल के वर्षों में पूर्वोत्तर के कई ज़िलों से क्रमश: हटाया गया
UAPA (1967; 2019 संशोधन)व्यक्तियों को भी ‘आतंकवादी’ घोषित किया जा सकता है; जमानत की कठोर शर्तों पर बहस
NIA (2008), MAC, CAPF—

★★और यहाँ भारत की सबसे बड़ी सफलता का उदाहरण दीजिए — मिज़ोरम। 1986 का मिज़ो समझौता — दो दशक के सशस्त्र विद्रोह का अंत बातचीत और चुनाव से; और विद्रोही नेता लालडेंगा राज्य के मुख्यमंत्री बने। यह पाठ्यपुस्तक के तीसरे घटक का जीवंत प्रमाण है।

घटक 4 — आर्थिक विकास और लोकतंत्र

पाठ्यपुस्तक स्वयं स्वीकार करती है 【पाठ】— “प्रयास आंशिक रूप से सफल हुए हैं।” यह ईमानदारी उत्तर में ज़रूर लिखिए — यह अंक बढ़ाती है।

पर उसका तर्क सुदृढ़ है — “लोकतांत्रिक रीति से निर्वाचित सरकार के ऊपर दबाव होता है कि वह आर्थिक संवृद्धि को मानवीय विकास का सहगामी बनाए।”

★★और इसी से अध्याय का अंतिम वाक्य निकलता है: “लोकतंत्र सिर्फ राजनीतिक आदर्श नहीं है; लोकतांत्रिक शासन जनता को ज्यादा सुरक्षा मुहैया कराने का साधन भी है।”

भाग XII — दस विवाद जिन पर परीक्षा में राय माँगी जाती है

#विवादपक्षविपक्ष
1क्या ‘सुरक्षा’ का विस्तार करना उचित है?खतरे बदल गए, धारणा भी बदलनी चाहिए! “हर चीज सुरक्षा का मसला हो सकती है” — धारणा बेमानी हो जाएगी
2क्या परमाणु अपरोध ने शांति दी?1945 के बाद कोई महाशक्ति-युद्ध नहीं! 12,187 आयुध; एक दुर्घटना ही काफी है; और अपरोध अप्रमाणनीय है
3क्या NPT न्यायसंगत है?अप्रसार ने संख्या कम की! 1967 की रेखा मनमानी है — भारत का स्थायी तर्क
4क्या NFU कायम रहना चाहिए?नैतिक ऊँचाई; तनाव कम करता है! पहले हमले में क्षमता नष्ट होने का जोखिम
5क्या R2P संप्रभुता का उल्लंघन है?संप्रभुता जिम्मेदारी है, विशेषाधिकार नहीं! लीबिया 2011 — शासन-परिवर्तन का बहाना बन सकता है
6क्या भारत को 1951 शरणार्थी अभिसमय में शामिल होना चाहिए?कानूनी स्पष्टता और संरक्षण मिलेगा! अभिसमय यूरोप-केंद्रित; विकासशील देशों पर असमान बोझ
7क्या AFSPA जारी रहना चाहिए?अशांत क्षेत्रों में सेना को कानूनी संरक्षण! मानवाधिकार-चिंताएँ; क्रमश: हटाने की प्रवृत्ति
8क्या जलवायु ‘सुरक्षा’ का मसला है?मालदीव/बांग्लादेश के अस्तित्व पर सीधा खतरा! इसका ‘सुरक्षाकरण’ समस्या को सैन्य ढाँचे में डाल देता है
9क्या आतंकवाद पर सैन्य कार्रवाई कारगर है?अपरोध और ढाँचे का विनाश! पाठ्यपुस्तक: “यहाँ भी सैन्य-बल एक सीमा तक ही कारगर”
10क्या ‘मानवीय सुरक्षा’ व्यवहार में लागू हो सकती है?HIV-एड्स, चेचक — प्रमाण मौजूद हैं! धन और इच्छाशक्ति दोनों की कमी; और राज्य ही सबसे बड़ा उल्लंघनकर्ता हो सकता है

भाग XIII — त्वरित तथ्य-पट्टिका

पाठ्यपुस्तक के आँकड़े(परीक्षा में यही लिखिए)

मानसंदर्भ
95% · बारहगुना (1946–91)आंतरिक युद्ध · गृहयुद्धों की वृद्धि
BWC 1972 / 155+ · CWC 1997 / 193निरस्त्रीकरण संधियाँ
ABM 1972 · NPT 1968 · रेखा 1967अस्त्र-नियंत्रण
760 करोड़ → 1000 करोड़विश्व जनसंख्या
छह देशभारत, चीन, पाकिस्तान, नाइजीरिया, बांग्लादेश, इंडोनेशिया
1990–95 · 70 देश · 93 युद्ध · 55.5 लाखसंघर्ष और मृतक
4 करोड़ (2003) · 6 में 1 · 3 में 1HIV-एड्स · दक्षिणी अफ्रीका · बोस्तवाना
1994 · ~5 लाखरवांडा
2 मीटर → बांग्लादेश 20% · थाईलैंड 50%समुद्रतल
1974 · 1998 · 1997/160पहला परीक्षण · परीक्षण के फ़ैसले · क्योटो

2026 के अद्यतन आँकड़े(प्रतियोगी परीक्षा और कक्षा-चर्चा के लिए)

मानसंदर्भ
★★5 फरवरी 2026New START समाप्त — कोई बाध्यकारी परमाणु सीमा नहीं
191 / 193 / 189NPT राज्य-पक्ष / CWC सदस्य / BWC राज्य-पक्ष
27 अप्रैल – 22 मई 2026NPT की 11वीं समीक्षा सम्मेलन, न्यूयॉर्क
★12,187 · 9,745 · 4,012विश्व के कुल आयुध · सैन्य भंडार · तैनात
★भारत ~190 · पाकिस्तान ~170 · चीन ~620परमाणु आयुध, जनवरी 2026
★2.89 ट्रिलियन डॉलर · भारत 92.1 अरब (5वाँ)वैश्विक सैन्य-व्यय, 2025
★★11.78 करोड़ · 4.16 करोड़ · 6.87 करोड़जबरन विस्थापित · शरणार्थी · IDPs
★5,582 · पाकिस्तान प्रथम · भारत 13वाँGTI 2026
★4.10 करोड़ · 5.70 लाख (−73%) · 3.21 करोड़HIV संक्रमित · वार्षिक मौतें · उपचार पर
2016 · 2017 · 2018MTCR · वासेनार · ऑस्ट्रेलिया समूह में भारत का प्रवेश
2005 (अनु. 138–139) · 2009 (तीन स्तंभ)R2P
1994 · सात आयामUNDP मानव विकास रिपोर्ट — मानवीय सुरक्षा

दस वाक्य जो उत्तर में सीधे लिखे जा सकते हैं

  1. “सुरक्षा का बुनियादी अर्थ है खतरे से आजादी” — पर केवल केंद्रीय मूल्यों पर पड़ने वाले गंभीर खतरों से।
  2. “हर देश को अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी खुद उठानी होती है” — क्योंकि कोई केंद्रीय विश्व-सत्ता नहीं।
  3. “राष्ट्रीय हितों के बदलने पर गठबंधन भी बदल जाते हैं” — और संधियाँ भी (ABM 2002, INF 2019, New START 2026)।
  4. “सैन्य बल से सुरक्षा को खतरा पहुँचता है और सैन्य बल से ही सुरक्षा को कायम रखा जा सकता है।”
  5. “सुरक्षित राज्य का मतलब हमेशा सुरक्षित जनता नहीं होता।”
  6. “पिछले 100 वर्षों में जितने लोग विदेशी सेना के हाथों मारे गए उससे कहीं ज्यादा लोग खुद अपनी ही सरकारों के हाथों खेत रहे।”
  7. “ऐसे अधिकांश मसलों में सैन्य-बल के प्रयोग से मामला और बिगड़ेगा।”
  8. “बल-प्रयोग सामूहिक स्वीकृति से और सामूहिक रूप में किया जाए।”
  9. “संयुक्त राष्ट्रसंघ अपने सदस्य देशों का दास है” — रवांडा 1994 इसका सबसे कड़वा प्रमाण।
  10. “लोकतंत्र सिर्फ राजनीतिक आदर्श नहीं है; लोकतांत्रिक शासन जनता को ज्यादा सुरक्षा मुहैया कराने का साधन भी है।”

भाग XIV — स्रोत-सूची

प्राथमिक स्रोत ◆

  1. NCERT — समकालीन विश्व राजनीति (पुस्तक 1), अध्याय 5, पृ. 63–80 — मूल पाठ्यपुस्तक 【पाठ】
  2. UNHCR — Global Trends: Forced Displacement in 2025 (जून 2026) — unhcr.org
  3. UNAIDS — Global HIV & AIDS Statistics Fact Sheet 2025 — unaids.org
  4. OPCW — Chemical Weapons Convention / Member States — opcw.org
  5. UNODA — Biological Weapons Convention — disarmament.unoda.org
  6. UN — NPT Eleventh Review Conference (2026) — meetings.unoda.org
  7. UN — About the Responsibility to Protect (2005 World Summit, paras 138–139) — un.org
  8. UN News — “UN chief warns of ‘grave moment’ as final US-Russia nuclear arms treaty expires” (फरवरी 2026) — news.un.org
  9. SIPRI Yearbook 2026 — Summary — sipri.org
  10. SIPRI — Military Expenditure Fact Sheet (अप्रैल 2026) — sipri.org

द्वितीयक स्रोत ◇ 11. Arms Control Association — “New START Expires As U.S. Urges ‘Modernized’ Treaty” (मार्च 2026) — armscontrol.org 12. Arms Control Association — BWC / CWC at a Glance — armscontrol.org 13. Council on Foreign Relations — “Nukes Without Limits? A New Era After the End of New START” — cfr.org 14. SIPRI Press Release — “Increasing focus on nuclear weapons amid heightened escalation risks” (जून 2026) — sipri.org 15. Institute for Economics & Peace — Global Terrorism Index 2026 — visionofhumanity.org 16. Global Centre for the Responsibility to Protect — What is R2P? — globalr2p.org 17. Carnegie Endowment for International Peace — “Military Lessons from Operation Sindoor” (अक्तूबर 2025) — carnegieendowment.org


! अंतिम नोट — विद्यार्थी के लिए: बोर्ड परीक्षा में पाठ्यपुस्तक का आँकड़ा और पाठ्यपुस्तक की भाषा ही लिखिए। यह स्वतंत्र अध्याय समझ गहरी करने, कक्षा-चर्चा और प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए है। जहाँ पाठ्यपुस्तक और 2026 के आँकड़े भिन्न हैं, वहाँ दोनों साथ-साथ दिए गए हैं — यही सही तरीका है, क्योंकि पाठ्यपुस्तक गलत नहीं है; वह अपने समय का सच्चा चित्र है।