कक्षा 10 · समकालीन भारत–2 (भूगोल) · पृष्ठ 42–57 (परीक्षा से पहले पढ़ने के लिए — केवल काम की बातें, पूरे वाक्यों में)
पहले पूरी कहानी एक पैराग्राफ़ में
खनिज एक प्राकृतिक रूप से विद्यमान समरूप तत्त्व है जिसकी एक निश्चित आंतरिक संरचना है, और अब तक 2000 से अधिक खनिजों की पहचान हो चुकी है। इन्हें तीन वर्गों में बाँटा जाता है — धात्विक (लौह, अलौह, बहुमूल्य), अधात्विक और ऊर्जा खनिज। खनिज पाँच तरीक़ों से मिलते हैं — आग्नेय-कायांतरित चट्टानों की दरारों में, अवसादी चट्टानों की परतों में, चट्टानों के अपघटन से, प्लेसर निक्षेपों में और महासागरीय जल में। लौह खनिज धात्विक खनिजों के कुल उत्पादन मूल्य के तीन-चौथाई भाग का योगदान करते हैं; मैग्नेटाइट सर्वोत्तम (70% लोहांश) और हेमेटाइट सर्वाधिक इस्तेमाल होने वाला (50–60%) है। भारत में लौह अयस्क की चार पेटियाँ हैं। चूना पत्थर उत्पादन में राजस्थान पूरे भारत में पहले स्थान पर है (22%)। खनन एक ‘घातक उद्योग’ बन सकता है, इसलिए सुरक्षा विनियम और खनिज संरक्षण दोनों ज़रूरी हैं। ऊर्जा संसाधन दो प्रकार के हैं — परंपरागत (कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस, विद्युत) और गैर-परंपरागत (परमाणु, सौर, पवन, बायोगैस, ज्वारीय, भू-तापीय)। और अध्याय का अंतिम संदेश यही है कि ‘ऊर्जा की बचत ही ऊर्जा उत्पादन है।’
यही पूरा अध्याय है। अब इसे भागों में देखिए।
इस अध्याय को पढ़ने का तरीक़ाध्यान
यह दो अध्यायों को जोड़कर बना है। इसलिए इसे एक साथ मत पढ़िए — पहले खनिज (पृष्ठ 42–50) पूरा कीजिए, फिर ऊर्जा (पृष्ठ 50–56) शुरू कीजिए।
और हर खनिज के लिए बस तीन बातें याद कीजिए — वर्ग · उपयोग · प्रमुख राज्य।
पहला आधा — खनिज
भाग 1 — खनिज क्या है
परिभाषा (अभ्यास प्रश्न 2-ii)★★
“भू-वैज्ञानिकों के अनुसार खनिज एक प्राकृतिक रूप से विद्यमान समरूप तत्त्व है जिसकी एक निश्चित आंतरिक संरचना है।”
- खनिज प्रकृति में अनेक रूपों में — कठोर हीरा से नरम चूना तक।
- 2000 से अधिक खनिजों की पहचान हो चुकी है, पर अधिकतर चट्टानों में केवल कुछ ही खनिजों की बहुतायत है।
- खनिजों में विविध रंग, कठोरता, चमक, घनत्व तथा विविध क्रिस्टल पाए जाते हैं — और भू-वैज्ञानिक इन्हीं विशेषताओं के आधार पर वर्गीकरण करते हैं।
दो रोचक आँकड़े (बॉक्स, पृष्ठ 42)★
“हमारे कुल पौष्टिक उपभोग का केवल 0.3 प्रतिशत भाग ही खनिज है; तथापि ये इतने महत्त्वपूर्ण हैं कि इनके बिना हम 99.7 प्रतिशत भोज्य पदार्थों का उपयोग करने में असमर्थ होंगे।”
चित्र 5.1 — खनिजों का वर्गीकरण★★
| मुख्य वर्ग | उपवर्ग | उदाहरण |
|---|---|---|
| धात्विक | लौह धातु (लोहे का अंश) | लौह अयस्क, मैंगनीज़, निकल, कोबाल्ट |
| धात्विक | अलौह | ताँबा, सीसा, जस्ता, बॉक्साइट |
| धात्विक | बहुमूल्य | सोना, चाँदी, प्लेटिनम |
| अधात्विक | — | अभ्रक, नमक, पोटाश, सल्फर, चूना पत्थर, संगमरमर, बलुआ पत्थर |
| ऊर्जा खनिज | — | कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस |
भाग 2 — खनिज कहाँ मिलते हैं
अयस्क (Ore)★
- “सामान्यत: खनिज ‘अयस्कों’ में पाए जाते हैं।”
- “किसी भी खनिज में अन्य अवयवों या तत्त्वों के मिश्रण या संचयन हेतु ‘अयस्क’ शब्द का प्रयोग किया जाता है।”
- ★“खनन का आर्थिक महत्त्व तभी है जब अयस्क में खनिजों का संचयन पर्याप्त मात्रा में हो।”
पाँच शैल समूह (अभ्यास प्रश्न 2-iii)★★
| क्रम | कहाँ | कैसे | कौन-से खनिज |
|---|---|---|---|
| (क) | आग्नेय तथा कायांतरित चट्टानें | दरारों, जोड़ों, भ्रंशों व विदरों में; छोटे जमाव शिराओं और बृहत् जमाव परत के रूप में। तरल/गैसीय अवस्था में दरारों से ऊपर आकर ठंडे होकर जम जाते हैं | जस्ता, ताँबा, जिंक, सीसा |
| (ख) | अवसादी चट्टानें | संस्तरों/परतों में; क्षैतिज परतों में निक्षेपण, संचयन व जमाव; लंबी अवधि की ऊष्मा व दबाव | कोयला, कुछ लौह अयस्क; और जिप्सम, पोटाश, नमक, सोडियम (वाष्पीकरण से) |
| (ग) | धरातलीय चट्टानों का अपघटन | घुलनशील तत्त्वों के अपरदन के बाद अयस्क वाली अवशिष्ट चट्टानें बचती हैं | बॉक्साइट |
| (घ) | प्लेसर निक्षेप | पहाड़ियों के आधार और घाटी तल की रेत में जलोढ़ जमाव; ऐसे खनिज जो जल द्वारा घर्षित नहीं होते | सोना, चाँदी, टिन, प्लेटिनम |
| (ङ) | महासागरीय जल | विशाल मात्रा, पर व्यापक रूप से विसरित होने से आर्थिक सार्थकता कम | नमक, मैगनीशियम, ब्रोमाइन; तली मैंगनीज़ ग्रंथिकाओं में धनी |
★याद रखने का सूत्र — आग्नेय = दरारें · अवसादी = परतें · अपघटन = बॉक्साइट · प्लेसर = सोना-चाँदी · महासागर = नमक।
रैट होल खनन
- भारत में अधिकांश खनिज राष्ट्रीयकृत हैं, पर उत्तर-पूर्वी भारत के जनजातीय क्षेत्रों में स्वामित्व व्यक्तिगत व समुदायों को है।
- मेघालय के जोवाई व चेरापूँजी में कोयले का खनन परिवार के सदस्य द्वारा एक लंबी संकीर्ण सुरंग के रूप में — इसे रैट होल खनन कहते हैं।
- नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने इसे अवैध घोषित किया है।
भाग 3 — भारत में खनिजों का वितरण
| क्षेत्र | खनिज |
|---|---|
| प्रायद्वीपीय चट्टानें | कोयला, धात्विक खनिज, अभ्रक और अन्य अधात्विक खनिज |
| गुजरात और असम की तलछटी चट्टानें (पश्चिमी-पूर्वी पार्श्व) | अधिकांश खनिज तेल निक्षेप |
| ★राजस्थान (प्रायद्वीपीय शैल क्रम के साथ) | अनेक अलौह खनिज |
| उत्तरी भारत के जलोढ़ मैदान | आर्थिक महत्त्व के खनिजों से लगभग विहीन |
भाग 4 — लौह खनिज
- ★“लौह खनिज धात्विक खनिजों के कुल उत्पादन मूल्य के तीन-चौथाई भाग का योगदान करते हैं।”
मैग्नेटाइट बनाम हेमेटाइट★★
| मैग्नेटाइट | हेमेटाइट | |
|---|---|---|
| लोहांश | 70 प्रतिशत | 50 से 60 प्रतिशत |
| पहचान | सर्वोत्तम प्रकार का लौह अयस्क | सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण औद्योगिक लौह अयस्क |
| ख़ास गुण | सर्वश्रेष्ठ चुंबकीय गुण — विद्युत उद्योगों में उपयोगी | अधिकतम मात्रा में उपभोग हुआ है |
एक वाक्य में — मैग्नेटाइट = सबसे अच्छा · हेमेटाइट = सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होने वाला।
- वर्ष 2018-19 में लौह अयस्क का 97 प्रतिशत उत्पादन ओडिशा, छत्तीसगढ़, कर्नाटक और झारखंड से; शेष 3 प्रतिशत अन्य राज्यों में।
चार लौह अयस्क पेटियाँ★★
| पेटी | मुख्य स्थान | ख़ास बात |
|---|---|---|
| 1. ओडिशा-झारखंड | ओडिशा — मयूरभंज व केंदुझर ज़िलों में बादाम पहाड़; झारखंड — सिंहभूम में गुआ और नोआमुंडी | उच्च कोटि का हेमेटाइट |
| 2. दुर्ग-बस्तर-चंद्रपुर | महाराष्ट्र व छत्तीसगढ़; बस्तर ज़िले में बेलाडिला पहाड़ी श्रृंखलाएँ | अति उत्तम कोटि का हेमेटाइट; 14 जमाव; विशाखापट्टनम् से जापान व दक्षिण कोरिया को निर्यात |
| 3. बल्लारि-चित्रदुर्ग, चिक्कमंगलूरु-तुमकूरु | कर्नाटक; पश्चिमी घाट में कुद्रेमुख | शत् प्रतिशत निर्यात इकाई; संसार के सबसे बड़े निक्षेपों में से एक; कर्दम (Slurry) रूप में पाइपलाइन से मंगलूरु |
| 4. महाराष्ट्र-गोआ | गोआ और महाराष्ट्र का रत्नागिरि ज़िला | लोहा उत्तम प्रकार का नहीं, पर दक्षता से दोहन; मरमागाओ पत्तन से निर्यात |
★तीन पत्तन — विशाखापट्टनम् · मंगलूरु · मरमागाओ। और नामों की कहानी — ‘कुद्रे’ = घोड़ा (कन्नड़); बेलाडिला = बैल का डील (hump)।
मैंगनीज़★
- मुख्य उपयोग — इस्पात के विनिर्माण में; एक टन इस्पात बनाने में लगभग 10 किग्रा. मैंगनीज़।
- अन्य उपयोग — ब्लीचिंग पाउडर, कीटनाशक दवाएँ व पेंट।
चित्र 5.3 — मैंगनीज़ उत्पादन में राज्यों का अंश (2018–19) —
| राज्य | % |
|---|---|
| मध्य प्रदेश | 33 |
| महाराष्ट्र | 27 |
| ओडिशा | 16 |
| कर्नाटक | 12 |
| आंध्र प्रदेश | 10 |
| अन्य | 2 |
भाग 5 — अलौह खनिज
- “भारत में अलौह खनिजों की संचित राशि व उत्पादन अधिक संतोषजनक नहीं है।”
- ये धातु शोधन, इंजीनियरिंग व विद्युत उद्योगों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
ताँबा★
- भारत में भंडार व उत्पादन क्रांतिक रूप से न्यून।
- गुण — घातवर्ध्य (malleable), तन्य और ताप सुचालक।
- उपयोग — बिजली के तार, इलैक्ट्रोनिक्स और रसायन उद्योग।
- क्षेत्र — मध्य प्रदेश की बालाघाट खदानें (52%); झारखंड का सिंहभूम; और ★राजस्थान की खेतड़ी खदानें।
बॉक्साइट★
- एल्यूमिनियम सबसे अधिक एल्यूमिना क्ले जैसे दिखने वाले पदार्थ बॉक्साइट से ही प्राप्त किया जाता है।
- बॉक्साइट एल्यूमिनियम सीलिकेटों से समृद्ध चट्टानों के विघटन से बनता है।
- एल्यूमिनियम के गुण — लोहे जैसी शक्ति + अत्यधिक हल्का + सुचालक + अत्यधिक घातवर्ध्यता।
- मुख्य निक्षेप — अमरकंटक पठार, मैकाल पहाड़ियाँ, बिलासपुर-कटनी; ओडिशा में कोरापुट ज़िले का पंचपतमाली।
चित्र 5.5 — बॉक्साइट उत्पादन में राज्यों का अंश (2018–19) —
| राज्य | % |
|---|---|
| ओडिशा | 65 |
| झारखंड | 10 |
| गुजरात | 9 |
| छत्तीसगढ़ | 6 |
| महाराष्ट्र | 6 |
| मध्य प्रदेश | 3 |
| अन्य | 1 |
भाग 6 — अधात्विक और चट्टानी खनिज
अभ्रक★
- “अभ्रक एक ऐसा खनिज है जो प्लेटों अथवा पत्रण क्रम में पाया जाता है।”
- “इसका चादरों में विपाटन (split) आसानी से हो सकता है; इसकी एक हज़ार परतें कुछ सेंटीमीटर ऊँचाई में समाहित हो सकती हैं।”
- रंग — पारदर्शी, काले, हरे, लाल, पीले अथवा भूरे।
- ★“इसकी सर्वोच्च परावैद्युत शक्ति, ऊर्जा ह्रास का निम्न गुणांक, विंसवाहन के गुण और उच्च वोल्टेज की प्रतिरोधिता के कारण अभ्रक विद्युत व इलेक्ट्रॉनिक उद्योगों में अपरिहार्य खनिजों में से एक है।”
तीन पेटियाँ —
| पेटी | कहाँ |
|---|---|
| कोडरमा-गया-हजारीबाग | बिहार-झारखंड — अग्रणी उत्पादक |
| ★अजमेर के आस पास | राजस्थान |
| नेल्लोर अभ्रक पेटी | आंध्र प्रदेश |
चूना पत्थर — राजस्थान की सबसे बड़ी उपलब्धि★★
- यह कैल्शियम या कैल्शियम कार्बोनेट तथा मैगनीशियम कार्बोनेट से बनी चट्टानों में पाया जाता है; अधिकांशत: अवसादी चट्टानों में।
- ★उपयोग — सीमेंट उद्योग का आधारभूत कच्चा माल; और लौह-प्रगलन की भट्टियों के लिए अनिवार्य।
चित्र 5.7 — चूना पत्थर उत्पादन में राज्यों का अंश (2018–19) —
| राज्य | % |
|---|---|
| ★राजस्थान | 22 — पहला स्थान |
| आंध्र प्रदेश | 13 |
| मध्य प्रदेश | 13 |
| छत्तीसगढ़ | 11 |
| कर्नाटक | 10 |
| तेलंगाना | 7 |
| गुजरात | 6 |
| तमिलनाडु | 5 |
| महाराष्ट्र | 4 |
| अन्य | 9 |
★★यह इस पूरी पुस्तक की सबसे बड़ी राजस्थान-उपलब्धि है — चूना पत्थर में राजस्थान पूरे भारत में पहले नंबर पर है। और इसीलिए राजस्थान में इतने सीमेंट कारख़ाने हैं।
भाग 7 — खनन के जोखिम और खनिजों का संरक्षण
खनन के चार जोखिम★
| # | जोखिम |
|---|---|
| 1 | श्रमिक लगातार धूल व हानिकारक धुएँ में साँस लेते हुए फेफड़ों संबंधी बीमारियों के शिकार हो जाते हैं |
| 2 | खदानों की छतों का गिरना, जलप्लावित होना, कोयले की खदानों में आग लगना |
| 3 | खनन के कारण जल स्रोत संदूषित हो जाते हैं |
| 4 | अवशिष्ट पदार्थों के खत्ता लगाने से भूमि व मिट्टी का अवक्षय और नदियों का प्रदूषण |
“खनन को घातक उद्योग (Killer Industry) बनने से रोकने के लिए दृढ़ सुरक्षा विनियम और पर्यावरणीय क़ानूनों का क्रियांवयन अनिवार्य है।”
खनिजों का संरक्षण क्यों (अभ्यास प्रश्न 2-iv)★★
| # | कारण |
|---|---|
| 1 | खनन योग्य निक्षेप की कुल राशि असार्थक अंश है — भू-पर्पटी का एक प्रतिशत |
| 2 | जिन खनिजों के निर्माण में लाखों वर्ष लगे, हम उनका शीघ्रता से उपभोग कर रहे हैं |
| 3 | पुनर्भरण की दर उपभोग की तुलना में अपरिमित रूप से थोड़ी है |
| 4 | इसीलिए खनिज संसाधन सीमित तथा अनवीकरण योग्य हैं; ये अत्यधिक मूल्यवान पर अल्पजीवी हैं |
| 5 | गहराई बढ़ने के साथ गुणवत्ता घटती है और लागत बढ़ती है |
★तीन उपाय —
धातुओं का पुन: चक्रण · रद्दी धातुओं का प्रयोग · अन्य प्रतिस्थापनों का उपयोग। और निम्न कोटि के अयस्कों का कम लागत पर प्रयोग करने के लिए उन्नत प्रौद्योगिकियों का सतत् विकास।
दूसरा आधा — ऊर्जा संसाधन
भाग 8 — ऊर्जा के दो वर्ग (अभ्यास प्रश्न 2-i-ख)
| वर्ग | इसमें क्या |
|---|---|
| परंपरागत | लकड़ी, उपले, कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस, विद्युत (जल व ताप दोनों) |
| गैर-परंपरागत | सौर, पवन, ज्वारीय, भू-तापीय, बायोगैस, परमाणु |
- ★“ग्रामीण घरों में आवश्यक ऊर्जा का 70 प्रतिशत से अधिक लकड़ी व उपलों से प्राप्त होता है।”
- पर घटते वन क्षेत्र के कारण यह कठिन होता जा रहा है; और उपलों का उपभोग हतोत्साहित किया जा रहा है क्योंकि इससे सर्वाधिक मूल्यवान खाद्य का उपभोग होता है जो कृषि में काम आ सकता था।
भाग 9 — कोयला (अभ्यास प्रश्न 3-i)
- “भारत में कोयला बहुतायात में पाया जाने वाला जीवाश्म ईंधन है” और भारत अपनी वाणिज्यिक ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु मुख्यत: कोयले पर निर्भर है।
- इसका निर्माण पादप पदार्थों के लाखों वर्षों तक संपीडन से हुआ है।
चार प्रकार (क्रम से याद कीजिए)★★
| प्रकार | विशेषता |
|---|---|
| पीट | दलदलों में क्षय होते पादपों से; कम कार्बन, उच्च नमी, निम्न ताप क्षमता |
| लिग्नाइट | निम्न कोटि का भूरा कोयला; मुलायम और अधिक नमीयुक्त; तमिलनाडु के नैवेली में; विद्युत उत्पादन में |
| बिटुमिनस | गहराई में दबा, अधिक तापमान से प्रभावित; वाणिज्यिक प्रयोग में सर्वाधिक लोकप्रिय; उच्च श्रेणी का धातुशोधन और लोहे के प्रगलन में |
| एंथ्रेसाइट | सर्वोत्तम गुण वाला कठोर कोयला |
क्रम — पीट (सबसे घटिया) → लिग्नाइट → बिटुमिनस → एंथ्रेसाइट (सबसे बढ़िया)।
दो भूगर्भिक युग★★
| युग | आयु | कहाँ |
|---|---|---|
| गोंडवाना | 200 लाख वर्ष से कुछ अधिक | धातुशोधन कोयला; दामोदर घाटी (प. बंगाल व झारखंड) — झरिया, रानीगंज, बोकारो; तथा गोदावरी, महानदी, सोन व वर्धा नदी घाटियाँ |
| टरशियरी | लगभग 55 लाख वर्ष | मेघालय, असम, अरुणाचल प्रदेश व नागालैंड |
- ★“कोयला स्थूल पदार्थ है। जिसका प्रयोग करने पर भार घटता है क्योंकि यह राख में परिवर्तित हो जाता है। इसी कारण भारी उद्योग तथा ताप विद्युत गृह कोयला क्षेत्रों अथवा उनके निकट ही स्थापित किये जाते हैं।”
भाग 10 — पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस
पेट्रोलियम★
- भारत में कोयले के पश्चात् ऊर्जा का दूसरा प्रमुख साधन।
- उपयोग — ताप व प्रकाश के लिए ईंधन, मशीनों को स्नेहक, विनिर्माण उद्योगों को कच्चा माल।
- तेल शोधन शालाएँ संश्लेषित वस्त्र, उर्वरक तथा असंख्य रासायन उद्योगों में नोडीय बिंदु का काम करती हैं।
★कहाँ पाया जाता है — यह भूगर्भिक तर्क —
- टरशियरी युग की शैल संरचनाओं के अपनति व भ्रंश ट्रैप में।
- तेल धारक परत संरंध्र चूना पत्थर या बालुपत्थर होता है जिसमें से तेल प्रवाहित हो सकता है।
- मध्यवर्ती असरंध्र परतें तेल को ऊपर उठने व नीचे रिसने से रोकती हैं।
- प्राकृतिक गैस हल्की होने के कारण खनिज तेल के ऊपर पाई जाती है।
★प्रमुख क्षेत्र —
| क्षेत्र | ख़ास बात |
|---|---|
| मुम्बई हाई | प्रमुख पेट्रोलियम उत्पादक क्षेत्र |
| अंकलेश्वर | गुजरात का सबसे महत्त्वपूर्ण तेल क्षेत्र |
| असम | भारत का सबसे पुराना तेल उत्पादक राज्य; डिगबोई, नहरकटिया और मोरन-हुगरीजन |
प्राकृतिक गैस★
- पेट्रोलियम के भंडार के साथ; कच्चे तेल को सतह पर लाने पर मुक्त हो जाती है।
- नए रूप — सी.एन.जी. (परिवहन ईंधन) और पी.एन.जी. (घरों में खाना पकाने का ईंधन)।
- प्रमुख भंडार — मुंबई हाई, खंभात बेसिन; और पूर्वी तट पर कृष्णा-गोदावरी बेसिन में नए भंडार।
★★एच.वी.जे. पाइपलाइन का आँकड़ा —
| बिंदु | आँकड़ा |
|---|---|
| पहली पाइपलाइन (गेल) | 1,700 किमी. — हजीरा-विजयपुर-जगदीशपुर |
| किसे जोड़ा | मुंबई हाई और बसीन को पश्चिमी और उत्तरी भारत से |
| आज | 18500 किमी. — दस गुना से अधिक |
| लक्ष्य | 34000 किमी. से अधिक |
विद्युत★
- “इसके प्रति व्यक्ति उपभोग को विकास का सूचकांक माना जाता है।”
| प्रकार | कैसे | नवीकरण योग्य? |
|---|---|---|
| जल विद्युत | प्रवाही जल से हाइड्रो-टरबाइन चलाकर | हाँ |
| ताप विद्युत | कोयला, पेट्रोलियम व प्राकृतिक गैस जलाकर टरबाइन चलाकर | नहीं — अनवीकरण जीवाश्मी ईंधन |
- उदाहरण — भाखड़ा नांगल, दामोदर घाटी कारपोरेशन, कोपिली हाइडल परियोजना।
- “एक बार उत्पन्न हो जाने के बाद विद्युत एक जैसी ही होती है।”
भाग 11 — गैर-परंपरागत ऊर्जा
क्यों ज़रूरी
- बढ़ते उपभोग ने देश को जीवाश्मी ईंधनों पर अत्यधिक निर्भर कर दिया।
- गैस व तेल की बढ़ती क़ीमतें और संभाव्य कमी — ऊर्जा सुरक्षा पर अनिश्चितता।
- इसका राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि पर गंभीर प्रभाव।
- जीवाश्मी ईंधनों से गंभीर पर्यावरणीय समस्याएँ।
- “भारत धूप, जल तथा जीवभार साधनों में समृद्ध है।”
छह साधन — एक तालिका में★★
| साधन | कैसे / क्या | कहाँ |
|---|---|---|
| परमाणु (आणविक) | अणुओं की संरचना बदलने से; ऊष्मा के रूप में ऊर्जा विमुक्त | यूरेनियम और थोरियम — झारखंड और राजस्थान की अरावली; थोरियम केरल की मोनाजाइट रेत में |
| सौर | फोटोवोल्टाइक प्रौद्योगिकी से धूप को सीधे विद्युत में | भारत उष्ण-कटिबंधीय देश — असीम संभावनाएँ; ग्रामीण व सुदूर क्षेत्रों में तेज़ी से लोकप्रिय |
| पवन | पवन ऊर्जा फार्म | विशालतम पेटी तमिलनाडु में नागरकोइल से मदुरै; तथा आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, गुजरात, केरल, महाराष्ट्र, लक्षद्वीप। ★नागरकोइल और जैसलमेर प्रभावी प्रयोग के लिए |
| बायोगैस | जैविक पदार्थों के अपघटन से; तापीय सक्षमता तेल, उपलों व चारकोल से अधिक | ‘गोबर गैस प्लांट’; किसानों को दो लाभ — ऊर्जा और उन्नत उर्वरक |
| ज्वारीय | सँकरी खाड़ी में बाढ़ द्वार वाला बाँध; ज्वार उतरने पर पानी टरबाइन की ओर | खम्भात की खाड़ी, कच्छ की खाड़ी (गुजरात) और सुंदर वन (प. बंगाल) |
| भू-तापीय | पृथ्वी के आंतरिक भागों से ताप; भूमिगत जल तप्त होकर भाप बनता है | दो परियोजनाएँ — पार्वती घाटी (हिमाचल, मणिकरण के निकट) और पूगा घाटी (लद्दाख) |
★सौर ऊर्जा का सबसे ज़रूरी वाक्य (अभ्यास प्रश्न 3-ii) —
“ऐसी अपेक्षा है कि सौर ऊर्जा के प्रयोग से ग्रामीण घरों में उपलों तथा लकड़ी पर निर्भरता को न्यूनतम किया जा सकेगा। फलस्वरूप यह पर्यावरण संरक्षण में योगदान देगा और कृषि में भी खाद्य की पर्याप्त आपूर्ति होगी।”
भाग 12 — ऊर्जा संसाधनों का संरक्षण
- ऊर्जा आर्थिक विकास के लिए आधारभूत आवश्यकता है — कृषि, उद्योग, परिवहन, वाणिज्य और घरेलू, सबके लिए।
- ★“सतत् पोषणीय ऊर्जा के दो आधार हैं — ऊर्जा संरक्षण की प्रोन्नति और नवीकरणीय ऊर्जा संसाधनों का बढ़ता प्रयोग।”
- ★“वर्तमान में भारत विश्व के अल्पतम ऊर्जादक्ष देशों में गिना जाता है।”
हम क्या कर सकते हैं —
सार्वजनिक वाहन का उपयोग · जब प्रयोग न हो तो बिजली बंद करना · विद्युत बचत करने वाले उपकरण · ग़ैर-पारंपरिक ऊर्जा साधनों का प्रयोग।
★★और अध्याय का अंतिम वाक्य — “आख़िरकार ‘ऊर्जा की बचत ही ऊर्जा उत्पादन है।’”
अंत में — याद रखने के आसान तरीक़े
1. सिर्फ़ आठ आँकड़े अनिवार्य
| आँकड़ा | किससे |
|---|---|
| तीन-चौथाई | धात्विक उत्पादन मूल्य में लौह खनिजों का हिस्सा |
| 70% / 50–60% | मैग्नेटाइट / हेमेटाइट में लोहांश |
| 97% | चार राज्यों से लौह अयस्क उत्पादन |
| 10 किग्रा. | एक टन इस्पात में मैंगनीज़ |
| 52% / 65% / 22% | बालाघाट (ताँबा) / ओडिशा (बॉक्साइट) / राजस्थान (चूना पत्थर) |
| एक प्रतिशत | भू-पर्पटी का खनन योग्य भाग |
| 200 लाख / 55 लाख वर्ष | गोंडवाना / टरशियरी कोयला |
| 1,700 → 18500 किमी. | गैस पाइपलाइन का विस्तार |
2. तीन शब्द — खनिजों का वर्गीकरण
धात्विक · अधात्विक · ऊर्जा खनिज (और धात्विक के तीन उपवर्ग — लौह, अलौह, बहुमूल्य)
3. कोयले का क्रम
पीट → लिग्नाइट → बिटुमिनस → एंथ्रेसाइट
4. तीन पत्तन
विशाखापट्टनम् (बेलाडिला) · मंगलूरु (कुद्रेमुख) · मरमागाओ (गोआ)
5. राजस्थान इस अध्याय में आठ बार आता है★
| # | कहाँ | क्या |
|---|---|---|
| 1 | खनिजों का वितरण | प्रायद्वीपीय शैल क्रम के साथ अनेक अलौह खनिज |
| 2 | ताँबा | खेतड़ी खदानें |
| 3 | अभ्रक | अजमेर के आस पास |
| 4 | ★★चूना पत्थर | 22% — पूरे भारत में पहला स्थान |
| 5 | परमाणु ऊर्जा | यूरेनियम-थोरियम अरावली पर्वत श्रृंखला में |
| 6 | मानचित्र (पृ. 46) | अभ्रक — अजमेर और बेवर |
| 7 | मानचित्र (पृ. 53) | परमाणु संयंत्र — रावतभाटा |
| 8 | पवन ऊर्जा | जैसलमेर प्रभावी प्रयोग के लिए |
और अभ्यास की वर्ग पहेली में भी — क्षैतिज 6 का संकेत ही ‘खेतड़ी खदानें’ है!
6. और अगर सब भूल जाएँ, तो यह याद रखिए
खनिज लाखों वर्षों में बनते हैं और सौ वर्षों में ख़त्म हो जाते हैं — इसीलिए वे सीमित और अनवीकरण योग्य हैं। और ऊर्जा के बारे में — “ऊर्जा की बचत ही ऊर्जा उत्पादन है।”