मास्टर शिक्षण नोट्स — कक्षा 6, सामाजिक विज्ञान
स्रोत: NCERT, समाज का अध्ययन : भारत और उसके आगे — भाग 1, कक्षा 6। अध्याय 6, पृष्ठ 85–104 (विषय-सूत्र: अतीत के चित्रपट)। PDF:
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0. यह अध्याय किस बारे में है
अध्याय 4 ने बताया था कि मनुष्य एक जगह टिककर रहने लगा और खेती करने लगा। अध्याय 5 ने बताया कि इस देश के नाम कहाँ से आए। अध्याय 6 वह पहली बड़ी चीज़ बताता है जो इस ज़मीन पर बनी — भारत की पहली सभ्यता।
अध्याय की बनावट बहुत साफ़ है और यही उसे पढ़ाने में आसान बनाता है:
| क्रम | प्रश्न | उत्तर कहाँ |
|---|---|---|
| 1 | सभ्यता क्या है? | पृ. 86 — सात विशेषताओं की सूची |
| 2 | वह कब और कहाँ शुरू हुई? | पृ. 87–88 — समय-रेखा और सिंधु के मैदान |
| 3 | उसकी उपलब्धियाँ क्या थीं? | पृ. 90–101 — नगर-योजना, जल, भोजन, व्यापार, वस्तुएँ |
| 4 | वह ख़त्म कैसे हुई? | पृ. 102–103 — जलवायु और सरस्वती |
★अध्याय की सबसे बड़ी बात: पुस्तक पहले सभ्यता की परिभाषा देती है, फिर हड़प्पा को उस परिभाषा पर तौलती है। यह क्रम आकस्मिक नहीं है। सात विशेषताएँ पृ. 86 पर गिनाई जाती हैं, और उसके बाद का पूरा अध्याय एक-एक करके दिखाता है कि हड़प्पा में वे सातों मौजूद थीं। पढ़ाते समय यह ढाँचा तोड़िए मत — यही अध्याय की रीढ़ है, और यही सबसे अच्छे प्रश्न देता है।
अध्याय का दूसरा, गहरा विचार
पुस्तक बार-बार एक ही बात दोहराती है, और वह इतिहास पढ़ने का तरीक़ा सिखाती है —
इस सभ्यता के बारे में हमारे पास कोई लिखित स्रोत नहीं है जिसे हम पढ़ सकें। कोई शिलालेख नहीं, कोई ग्रंथ नहीं, किसी यात्री का कोई विवरण नहीं (पृ. 93)। मुहरों पर जो लेखन है, उसे अभी तक पढ़ा नहीं जा सका (पृ. 99)।
इसलिए अध्याय में बार-बार ‘संभवत:’, ‘रहा होगा’, ‘प्रतीत होता है’ आते हैं। यह लेखक की कमज़ोरी नहीं — यही ईमानदार इतिहास है। महास्नानागार किसलिए बना, यह आज भी तय नहीं (पृ. 93); मज़दूरों को भुगतान कैसे हुआ, यह भी नहीं (पृ. 96); बदले में क्या आयात हुआ, वह भी नहीं (पृ. 97)। पुस्तक स्वयं लिखती है — “पुरातत्ववेत्ता भी इन प्रश्नों के बारे में चर्चा करते हैं और उनके उत्तर सदैव निर्णायक नहीं होते!” (पृ. 96)।
1. अध्याय का आरंभ (पृ. 85)
उद्धरण — बी.बी. लाल (पृ. 85)
भारत की सबसे प्राचीन सभ्यता, जो हड़प्पा, सिंधु अथवा सिंधु-सरस्वती सभ्यता के नाम से जानी जाती है, वास्तव में कई मायनों में एक अनूठी सभ्यता थी… (इसने दिखाया कि कैसे) एक सम्यक रूप से संतुलित समुदाय रहता है — जहाँ धनवान और निर्धन के बीच बहुत अधिक अंतर नहीं है… संक्षेप में, हड़प्पा के सामाजिक परिदृश्य में शोषण नहीं, बल्कि आपसी सामंजस्य दिखाई देता है। — बी.बी. लाल
★यह उद्धरण अध्याय की एक कड़ी से जुड़ता है। पृ. 91 पर लिखा है कि बड़े और छोटे घरों के निर्माण की गुणवत्ता एक समान मिलती है — वही ‘बहुत अधिक अंतर नहीं’ जिसकी बात लाल कर रहे हैं। पढ़ाते समय ये दोनों जगह एक साथ दिखाइए; अकेले-अकेले दोनों साधारण लगती हैं।
महत्वपूर्ण प्रश्न (पृ. 85)
पुस्तक स्वयं तीन प्रश्न रखती है, और यही अध्याय का ढाँचा हैं —
- सभ्यता क्या है?
- भारतीय उपमहाद्वीप की आरंभिक सभ्यता कौन-सी थी?
- उसकी मुख्य उपलब्धियाँ क्या थीं?
चित्र 6.1 (पृ. 85)
धौलावीरा ‘किला’ क्षेत्र का उत्तरी प्रवेश द्वार। पत्थर की ऊँची दीवारें, बीच में सीढ़ियाँ। अध्याय का पहला चित्र ही धौलावीरा का है — और धौलावीरा आगे चलकर अध्याय का सबसे अधिक बार लौटने वाला नगर बनता है (जलाशय, तीन क्षेत्र, दर्पण, छैनी, खेल-बोर्ड)।
2. सभ्यता क्या है? (पृ. 86)★
पुस्तक पहले अध्याय 4 से जोड़ती है: मनुष्य का पहला समूह एक स्थान पर रहने लगा, कृषि करने लगा, कुछ तकनीकों (भवन निर्माण, धातु विज्ञान, यातायात साधन) का विकास किया — और सभ्यता की ओर उन्मुख हुआ।
फिर परिभाषा: “सामान्यत: इस शब्द का प्रयोग मानव समाज के उन्नत चरण के लिए किया जाता है।”
सभ्यता की सात विशेषताएँ (पृ. 86) — अध्याय की रीढ़★
पुस्तक के शब्द: “एक ‘सभ्यता’ में कम से कम निम्नलिखित विशेषताएँ होनी चाहिए —”
| # | विशेषता | पुस्तक की व्याख्या |
|---|---|---|
| 1 | शासन और प्रशासन का कोई रूप | जटिल समाज और उसके अनेक कार्यकलापों के प्रबंधन हेतु |
| 2 | नगरीकरण | नगर योजना, नगरों का विकास और उनका प्रबंधन, जिसमें सामान्यत: जल प्रबंधन और जल निकास व्यवस्था आती है |
| 3 | विभिन्न प्रकार के शिल्प | कच्चे माल (पत्थर, धातु) का प्रबंधन और तैयार माल (आभूषण, उपकरण) का उत्पादन |
| 4 | व्यापार | सभी प्रकार की वस्तुओं के आदान-प्रदान के लिए — आंतरिक (एक नगर या एक क्षेत्र के अंदर) और बाहरी (दूरस्थ या विश्व के अन्य भागों के साथ) |
| 5 | लेखन का कोई रूप | अभिलेखों को रखने और संवाद बनाने के लिए आवश्यक |
| 6 | जीवन और विश्व के बारे में सांस्कृतिक विचार | कला, स्थापत्य, साहित्य, श्रुति परंपराओं और सामाजिक रीति-रिवाजों के माध्यम से जीवन और विश्व की अभिव्यक्ति |
| 7 | कृषि उत्पादकता | जो गाँव ही नहीं, बल्कि नगरों को भी भोजन उपलब्ध करा सके |
! शिक्षण चेतावनी — यह सूची रटाने की चीज़ नहीं, लगाने की चीज़ है। पूरा अध्याय इन्हीं सात पर टिका है। कक्षा में सबसे अच्छा काम यह है कि सात कॉलम बोर्ड पर बनाइए और अध्याय पढ़ते-पढ़ते हड़प्पा के प्रमाण उनमें भरवाइए। अंत में एक कॉलम अधूरा रह जाएगा — ‘लेखन’ — क्योंकि लिपि पढ़ी नहीं जा सकी। वह अधूरापन ही सबसे बड़ा पाठ है।
शब्द-बॉक्स — धातु विज्ञान (हाशिया, पृ. 86)
धातु विज्ञान के अंतर्गत प्रकृति से धातु निष्कर्षण, उन्हें शुद्ध करने, आपस में मिलाने की तकनीकों और साथ-साथ धातु और उसके गुणों का वैज्ञानिक अध्ययन शामिल है।
आइए विचार करें (बॉक्स, पृ. 86)
ऊपर बताई गई विशेषताओं में से आप किसे मूलभूत विशेषता मानते हैं — अर्थात ऐसी विशेषता, जो अन्य सभी के विकास के लिए अनिवार्य है?
चर्चा के लिए, कोई एक ‘सही’ उत्तर नहीं। सबसे मज़बूत तर्क सामान्यत: कृषि उत्पादकता (7) के पक्ष में बनता है — अतिरिक्त अन्न के बिना कोई नगर, कोई शिल्पी, कोई प्रशासक टिक ही नहीं सकता, क्योंकि तब हर व्यक्ति को अपना भोजन स्वयं उगाना पड़ेगा। शासन (1) के पक्ष में भी अच्छा तर्क बनता है। दोनों स्वीकार्य हैं — कारण देखिए, उत्तर नहीं।
3. सभ्यता का आरंभ कब हुआ (पृ. 87)
आइए पता लगाएँ (बॉक्स, पृ. 87)
ऊपर दी गई सूची में प्रत्येक विशेषता के लिए क्या आप उस समय के समाज में विद्यमान व्यवसाय और रोजगार की सूची तैयार कर सकते हैं?
(अर्थात: नगरीकरण → राजमिस्त्री, नगर-योजनाकार; शिल्प → कुम्हार, मनका बनाने वाला, धातुकर्मी; व्यापार → व्यापारी, नाविक, गाड़ीवान; लेखन → मुहर बनाने वाला, लिपिक; कृषि → किसान, हलवाहा।)
पुस्तक का उत्तर (पृ. 87)
- विश्व के विभिन्न भागों में अलग-अलग समय पर सभ्यताओं का आरंभ हुआ।
- मेसोपोटामिया (आधुनिक इराक और सीरिया) — वहाँ लगभग 6,000 वर्ष पहले सभ्यता का आरंभ हुआ।
- उसके कुछ शताब्दियों के बाद प्राचीन मिस्र की सभ्यता का आरंभ हुआ।
- “सही अर्थों में उन प्राचीन सभ्यताओं के बहुत बड़े योगदान और प्रगति के कारण ही मानवता आज वर्तमान स्थिति में पहुँच सकी है।”
- “अभी, हम केवल भारतीय उपमहाद्वीप और उसके उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र पर दृष्टि डालेंगे, जहाँ से हमारी कहानी आरंभ होती है।”
चित्र 6.2 (पृ. 87) — समय-रेखा★
कैप्शन: “2600 से 1900 सा.सं.पू. तक सिंधु-सरस्वती सभ्यता का समय दर्शाती समय-रेखा।”
| समय-रेखा पर अंकित | उस पर क्या दिखाया गया |
|---|---|
| 4000 सा.सं.पू. | (केवल अंकन) |
| 3500 सा.सं.पू. | तीर — मेसोपोटामिया की सभ्यता का आरंभ |
| 3100 सा.सं.पू. | तीर — मिस्र की सभ्यता का आरंभ |
| 2000 सा.सं.पू. | कोष्ठक (ब्रेस) — सिंधु-सरस्वती सभ्यता |
चित्रों के गोले: मेसोपोटामिया की एक प्रतिमा, मिस्र का पिरामिड, हड़प्पा की एक मुहर।
! इस चित्र में दो बातें ध्यान से देखिए — दोनों प्रश्न बन सकती हैं:
- मूल पाठ कहता है मेसोपोटामिया ‘लगभग 6,000 वर्ष पहले’ (≈ 4000 सा.सं.पू.), पर तीर 3500 सा.सं.पू. पर पड़ता है। दोनों एक ही पृष्ठ पर हैं। (विवरण
10-Verification-Log.mdमें।)- कैप्शन 2600–1900 सा.सं.पू. कहता है, पर समय-रेखा पर न 2600 अंकित है, न 1900।
विद्यार्थियों को क्या पढ़ाएँ: मुख्य पाठ की संख्याएँ — मेसोपोटामिया लगभग 6,000 वर्ष पहले, और सिंधु-सरस्वती सभ्यता का चरम 2600 से 1900 सा.सं.पू.। यही परीक्षा में पूछा जाएगा। समय-रेखा के तीरों की स्थिति पर प्रश्न मत बनाइए।
4. गाँव से नगर (पृ. 88)★
भूगोल पहले
- पंजाब (आज भारत और पाकिस्तान में विभाजित) और सिंध (अब पाकिस्तान में) के विशाल मैदानों को सिंधु नदी और उसकी सहायक नदियाँ सिंचित करती हैं।
- सिंधु ने इन मैदानों को उपजाऊ और कृषि के अनुकूल बनाया।
- इन मैदानों की पूर्व दिशा में कुछ सहस्राब्दियों पहले एक अन्य नदी — सरस्वती — बहती थी: हिमालय की तलहटी से हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और गुजरात के कुछ क्षेत्रों से होकर।
शब्द-बॉक्स — सहायक नदी (हाशिया, पृ. 88)
सहायक नदी — वह नदी जो किसी बड़ी नदी (या झील) में मिलती है। उदाहरणार्थ, यमुना नदी गंगा नदी की सहायक नदी है।
दो तिथियाँ — अध्याय की सबसे परीक्षा-योग्य जोड़ी★
| तिथि | क्या हुआ |
|---|---|
| 3500 सा.सं.पू. से | इस पूरे क्षेत्र में गाँव, नगरों में परिवर्तित हो गए |
| लगभग 2600 सा.सं.पू. में | बढ़ते व्यापार और अन्य विनिमयों के कारण नगर, महानगरों में परिवर्तित हो गए |
यही अध्याय का शीर्षक है — ‘गाँव से नगर’। दो चरण, दो तिथियाँ, और दूसरे चरण का कारण पुस्तक स्वयं देती है: बढ़ता व्यापार। विद्यार्थी प्राय: कारण छोड़ देते हैं।
सभ्यता के तीन नाम (पृ. 88)
पुरातत्ववेत्ताओं ने इसे तीन नाम दिए, और पुस्तक कहती है कि वह तीनों नामों का प्रयोग करेगी —
- सिंधु सभ्यता
- हड़प्पा सभ्यता
- सिंधु-सरस्वती सभ्यता
- इस सभ्यता के निवासियों को हड़प्पाई या हड़प्पावासी कहते हैं।
- “यह विश्व की सबसे पुरानी सभ्यताओं में से एक है।”
- इस विकास प्रक्रिया को ‘भारत का पहला नगरीकरण’ भी कहा जाता है।
ध्यान रखें (बॉक्स, पृ. 88) — नाम ‘हड़प्पाई’ क्यों★
वर्तमान में इस सभ्यता के निवासियों को ‘हड़प्पाई या हड़प्पावासी’ क्यों कहते हैं? इसका सीधा-सा उत्तर है कि लगभग एक शताब्दी पहले 1920–21 में हड़प्पा (आज के पाकिस्तान का पंजाब) इस सभ्यता से संबंधित पहला उत्खनित नगर था।
! यहाँ एक और तिथि पृ. 90 पर आती है — 1924, जब हड़प्पा और मोहनजो-दड़ो ‘की खोज’ हुई। दोनों तिथियाँ पुस्तक में हैं और अलग-अलग बातों पर लगी हैं (उत्खनन बनाम खोज की घोषणा)। दोनों याद रखवाइए, गड्डमड्ड मत होने दीजिए। यह इस अध्याय का सबसे आम भ्रम है।
5. चित्र 6.3 (पृ. 89) — सिंधु-सरस्वती सभ्यता का मानचित्र★
कैप्शन: “सिंधु-सरस्वती सभ्यता की कुछ प्रमुख बस्तियों का मानचित्र। पर्वत शृंखलाओं द्वारा बनी प्राकृतिक सीमाओं को देखिए (भूरे रंग में)।”
मानचित्र पर लाल बिंदुओं से अंकित पाँच बड़े नगर
| नगर | कहाँ |
|---|---|
| हड़प्पा | रावी नदी पर, पंजाब (पाकिस्तान) |
| मोहनजो-दड़ो | सिंधु नदी पर, सिंध (पाकिस्तान) |
| गँवेरीवाला | सरस्वती/घग्गर-हाकरा पट्टी पर (पाकिस्तान का चोलिस्तान मरुस्थल) |
| राखीगढ़ी | हरियाणा |
| धौलावीरा | गुजरात (कच्छ) |
मानचित्र पर अंकित अन्य बस्तियाँ
शोर्तुगई (सबसे उत्तर), मुसा खेल, मांडा, डाबरकोट, रूपनगर, बनावली, कालीबंगा, करनपुरा, भिर्राना, फरमाना, लखनजो-दड़ो, चन्हुदड़ो, बालाकोट, खिरसरा, नागवाड़ा, बगासरा, नागेश्वर, लोथल।
मानचित्र पर अंकित नदियाँ और पर्वत
| प्रकार | नाम |
|---|---|
| नदियाँ | सिंधु, झेलम, चिनाब, रावी, सतलुज, ब्यास, सरस्वती, बनास, यमुना, गंगा |
| पर्वत (भूरे रंग में — प्राकृतिक सीमाएँ) | हिंदुकुश, हिमालय, सुलैमान श्रेणी, अरावली श्रेणी |
★पुस्तक स्वयं कहती है कि पर्वत शृंखलाओं द्वारा बनी प्राकृतिक सीमाओं को देखिए। यह अध्याय 5 (पृ. 76–80) की उपमहाद्वीप की प्राकृतिक सीमाओं से सीधा जुड़ता है और अध्याय 3 के स्थलरूपों से भी। कक्षा में यह जोड़ बनाइए — तीन अध्याय एक ही मानचित्र पर मिल जाते हैं।
आइए पता लगाएँ (बॉक्स, पृ. 89)
इस सभ्यता के कुछ प्रमुख नगरों को मानचित्र (चित्र 6.3) में दर्शाया गया है। क्या आप (कक्षा में गतिविधि के माध्यम से) इन दर्शाए गए नगरों का अगले पृष्ठ पर दी गई तालिका में दिए गए आधुनिक राज्यों अथवा प्रदेशों के साथ मिलान कर सकते हैं?
6. तालिका (पृ. 90) — यह एक मिलान-अभ्यास है, तथ्य-सूची नहींध्यान
पृष्ठ 90 पर छपी तालिका इस प्रकार है —
| हड़प्पाई नगर/हड़प्पा के नगर | आधुनिक राज्य या प्रदेश |
|---|---|
| धौलावीरा | पंजाब |
| हड़प्पा | गुजरात |
| कालीबंगा | सिंध |
| मोहनजो-दड़ो | हरियाणा |
| राखीगढ़ी | राजस्थान |
!! सबसे बड़ी शिक्षण चेतावनी — इस तालिका की पंक्तियाँ जान-बूझकर आपस में बदली हुई हैं। यह पृ. 89 के ‘आइए पता लगाएँ’ का मिलान-अभ्यास है। दोनों स्तंभ अपनी-अपनी जगह सही हैं, पर आमने-सामने की जोड़ी ग़लत है — विद्यार्थी को स्वयं सही जोड़ी बनानी है।
यदि इसे तथ्य-तालिका मानकर उतार लिया गया, तो पूरी कक्षा ग़लत उत्तर याद कर लेगी। यह वास्तविक ख़तरा है: तालिका देखने में एक साधारण सूचना-तालिका जैसी लगती है।
✓ सही मिलान — यही नोटबुक में जाना चाहिए
| हड़प्पाई नगर | आधुनिक राज्य या प्रदेश |
|---|---|
| धौलावीरा | गुजरात |
| हड़प्पा | पंजाब (आज पाकिस्तान में) |
| कालीबंगा | राजस्थान |
| मोहनजो-दड़ो | सिंध (आज पाकिस्तान में) |
| राखीगढ़ी | हरियाणा |
यह पाँचों जोड़ियाँ अध्याय के भीतर से ही सिद्ध होती हैं — किसी बाहरी स्रोत की आवश्यकता नहीं:
- धौलावीरा (गुजरात में) — पृ. 90 में स्पष्ट लिखा है; पृ. 95 दोहराता है “गुजरात में कच्छ के रन में”।
- राखीगढ़ी (हरियाणा में) — पृ. 90 में स्पष्ट लिखा है।
- कालीबंगा (राजस्थान में) — पृ. 91 में “राजस्थान में कालीबंगा”; चित्र 6.4 का कैप्शन भी “कालीबंगा (राजस्थान)”।
- हड़प्पा (पंजाब में) — पृ. 88 के ‘ध्यान रखें’ में “हड़प्पा (आज के पाकिस्तान का पंजाब)”।
- मोहनजो-दड़ो (सिंध में) — शेष बची एकमात्र जोड़ी; पृ. 88 में सिंध का परिचय दिया जा चुका है और चित्र 6.3 में मोहनजो-दड़ो सिंधु के निचले प्रवाह पर अंकित है।
यही इस अध्याय का सबसे अच्छा कक्षा-कार्य है। विद्यार्थी को पाँचों जोड़ियाँ अध्याय के भीतर से ढूँढ़कर सिद्ध करनी हैं। यह याद करना नहीं, प्रमाण खोजना है — और अध्याय 4 की स्रोत-वाली सीख यहीं काम आती है।
सरस्वती नदी (बॉक्स, पृ. 90)
- मानचित्र (चित्र 6.3) में सिंधु और उसकी पाँच सहायक नदियों को दर्शाया गया है।
- मोहनजो-दड़ो और हड़प्पा जैसे नगर इन नदियों के किनारे विकसित हुए।
- सरस्वती नदी, जिसे आज भारत में घग्गर और पाकिस्तान में हाकरा के नाम से जाना जाता है (अत: इसे घग्गर-हाकरा भी कहा जाता है), के किनारे भी अनेक पुरास्थल मिले हैं।
- आज यह एक मौसमी नदी है जो मात्र वर्षा ऋतु के दौरान बहती है।
- सरस्वती नदी का वर्णन सबसे पहले प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद में मिलता है। (इसके बारे में हम अध्याय 7 में पढ़ेंगे।)
- ऋग्वेद में सरस्वती को दोनों रूपों में पूजा गया है — एक देवी, और पर्वत से निकलकर समुद्र तक बहने वाली एक नदी।
- बाद के ग्रंथों में इस नदी के सूखने और अंतत: लुप्त हो जाने का वर्णन मिलता है।
★यह बॉक्स अध्याय के अंत से जुड़ता है। पृ. 103 पर सभ्यता के पतन का दूसरा कारण यही नदी है — “सरस्वती नदी का मध्य बेसिन सूख गया”। आरंभ में नदी, अंत में उसका सूखना — यह अध्याय की सबसे सुंदर आंतरिक कड़ी है, और पढ़ाते समय इसे जोड़ना चाहिए।
7. नगर-योजना (पृ. 90–91)★
खोज का क्रम
- हड़प्पा और मोहनजो-दड़ो (जो अब पाकिस्तान में हैं) इस सभ्यता के सबसे पहले दो नगर हैं, जिनकी खोज लगभग एक शताब्दी पूर्व, 1924 में की गई।
- सिंधु नदी के मैदानों में बहुत से पुरास्थल मिले, जिसके कारण इस सभ्यता को आरंभ में ‘सिंधु घाटी की सभ्यता’ कहा गया।
- बाद में अन्य प्रमुख नगर मिले — धौलावीरा (गुजरात में), राखीगढ़ी (हरियाणा में), गँवेरीवाला (पाकिस्तान के चोलिस्तान मरुस्थल में) — और सैकड़ों छोटे स्थल (जैसे गुजरात में लोथल) की खोज की गई एवं कुछ की खुदाई भी की गई।
- “इस प्रकार की खोजें आज भी जारी हैं।”
आइए विचार करें (बॉक्स, पृ. 91) — ‘घाटी’ शब्द क्यों छोड़ा गया★
आपने सिंधु घाटी सभ्यता के बारे में सुना होगा और आपने इस बात पर ध्यान दिया होगा कि हमने इसका प्रयोग नहीं किया है। मानचित्र पर दृष्टि डालें (पृ. 89 पर चित्र 6.3) तो हम पाएँगे कि ‘घाटी’ शब्द का अब इस्तेमाल नहीं करते हैं क्योंकि अब हम जानते हैं कि यह सभ्यता सिंधु क्षेत्र से बहुत आगे तक फैली हुई थी।
★यह अध्याय का एक बहुत महत्वपूर्ण बिंदु है और परीक्षा में आने योग्य है। पुस्तक एक प्रचलित नाम को सप्रमाण अस्वीकार कर रही है — और प्रमाण मानचित्र है। यह अध्याय 5 की उसी आदत का दोहराव है, जहाँ ‘सप्त सैंधव’ को पूरे भारत का नाम मानने से इनकार किया गया था।
सरस्वती की द्रोणी (बेसिन) में क्या है (पृ. 90–91)
पुस्तक इसे ‘रोचक’ कहकर प्रस्तुत करती है — सरस्वती नदी की द्रोणी में मिलते हैं:
- दो महानगर — राखीगढ़ी और गँवेरीवाला
- छोटे-छोटे अनेक नगर — फरमाना (हरियाणा में), कालीबंगा (राजस्थान में)
- कुछ अन्य नगर — भिर्राना और बनावली (हरियाणा के दो नगर)
- “निस्संदेह मानचित्र में दिए गए क्षेत्र में पुरास्थलों की सघनता स्पष्ट दिखती है।”
नगरों की योजना★
- अधिकांश हड़प्पा सभ्यता के नगर सुनियोजित योजना के अंतर्गत निर्मित किए गए थे।
- उन नगरों में चौड़ी सड़कें थीं (चित्र 6.4 और 6.5) जो सामान्यत: चारों दिशाओं की ओर उन्मुख होती थीं।
- अधिकांश नगरों के चारों ओर किलेबंदी की गई मिलती है।
- नगर के दो विशिष्ट भाग मिलते हैं —
- ‘ऊपरी नगर’ — जहाँ संभवत: अभिजात वर्ग के लोग रहते थे
- ‘निचला नगर’ — जहाँ साधारण लोग रहते थे
शब्द-बॉक्स (हाशिया, पृ. 91)
किलेबंदी — आम तौर पर सुरक्षात्मक उद्देश्यों से किसी बस्ती या नगर के चारों ओर बनाई गई एक विशाल दीवार।
अभिजात वर्ग — यहाँ यह शब्द समाज के उच्च स्तर, जैसे — शासक, अधिकारी, प्रशासक और प्राय: पुरोहित या पुजारी को संदर्भित करता है।
भवन और घर (पृ. 91)
- कुछ बड़े भवनों का उपयोग सामूहिक उद्देश्यों के लिए किया जाता था — उदाहरणार्थ गोदाम, जहाँ परिवहन किए जाने वाली वस्तुओं को रखा जाता था।
- सड़कों और गलियों में विभिन्न आकारों के निजी घर मिलते हैं।
- ★“रोचक बात यह है कि बड़े और छोटे घरों के निर्माण की गुणवत्ता एक समान मिलती है।”
- सामान्यत: उन भवनों के निर्माण में ईंटों का प्रयोग किया गया है।
★यही बी.बी. लाल के उद्धरण (पृ. 85) का प्रमाण है — ‘धनवान और निर्धन के बीच बहुत अधिक अंतर नहीं’। दोनों को साथ पढ़ाइए।
महास्नानागार (पृ. 91, चित्र 6.6 पृ. 93)★
- मोहनजो-दड़ो का प्रसिद्ध ‘महास्नानागार’ — एक छोटा और विस्तृत स्नानागार।
- आकार: 12 × 7 मीटर।
- सबसे ऊपर जमायी गई ईंटों पर जल रोधक सामग्री — डामर के रूप में प्राकृतिक बिटुमेन — की परत चढ़ाई गई है।
- स्नानागार के चारों ओर छोटे-छोटे कमरे मिलते हैं; उनमें से एक कमरे के अंदर कुआँ मिला है।
- समय-समय पर स्नानागार के पानी को खाली करने के लिए कोने में एक नाली भी है।
- इस स्नानागार को स्वच्छ पानी से समय-समय पर भरा जाता था।
महास्नानागार किसलिए बना? (पृ. 93) — तीन व्याख्याएँ★
पुस्तक: “इसके निर्माण का उद्देश्य क्या रहा होगा? पुरातत्ववेत्ताओं ने अनेक संभावित व्याख्याएँ प्रस्तुत की हैं —”
| # | व्याख्या | स्थिति |
|---|---|---|
| 1 | सार्वजनिक स्नान के लिए स्नानागार | ! अब स्वीकार्य नहीं |
| 2 | केवल राजसी परिवार के लिए स्नानागार | अभी विचाराधीन |
| 3 | धार्मिक कार्यों के लिए प्रयोग होने वाला स्नानागार | अभी विचाराधीन |
पहली व्याख्या क्यों छोड़ी गई: “क्योंकि यह पाया गया है कि इस नगर के अधिकांश घरों में स्नानागार बने हुए थे।”
★यह अध्याय का सबसे अच्छा तर्क-उदाहरण है। एक व्याख्या को प्रमाण के आधार पर ख़ारिज किया गया — और वह प्रमाण अध्याय में आगे पृ. 94 पर फिर दोहराया जाता है (“उनके घरों में स्नान के लिए अलग स्नानागार हुआ करते थे”)। कारण अवश्य याद करवाइए — केवल ‘तीन व्याख्याएँ’ रटाना इस बिंदु को बेकार कर देता है।
आइए पता लगाएँ (बॉक्स, पृ. 93)
अंतिम दो व्याख्याओं के बारे में कक्षा में चर्चा कीजिए। क्या आप कोई अन्य व्याख्या सोच सकते हैं? ध्यान दीजिए कि इस विषय में हमारे पास इतिहास के अन्य स्रोत नहीं हैं, जैसे न कोई शिलालेख, न कोई ग्रंथ और न ही किसी यात्री का विवरण।
★★यह वाक्य पूरे अध्याय की कुंजी है। अध्याय 4 ने स्रोतों के प्रकार सिखाए थे; यहाँ पुस्तक कह रही है कि इस सभ्यता के लिए उनमें से लगभग कोई उपलब्ध नहीं है। इसीलिए हर बात ‘संभवत:’ है। यह वाक्य नोटबुक में जाना चाहिए।
8. चित्र 6.4–6.6 (पृ. 92–93)
| चित्र | विषय | ध्यान देने योग्य |
|---|---|---|
| 6.4 (पृ. 92, ऊपर) | कालीबंगा (राजस्थान) के निचले नगर में एक चौड़ी सड़क | पुरानी श्वेत-श्याम उत्खनन तस्वीर; ‘निचला नगर’ शब्द यहाँ प्रत्यक्ष दिखता है |
| 6.5 (पृ. 92, दाएँ) | धौलावीरा के मध्य नगर के आवासीय क्षेत्र की लंबवत गलियाँ या सड़कें | ★कैप्शन में: “धौलावीरा में तीन अलग-अलग क्षेत्र थे, न कि अन्य नगरों की तरह दो क्षेत्र।” इस नगर में अधिकांश भवनों की नींव पत्थरों से बनाई गई थी। |
| 6.6 (पृ. 93) | मोहनजो-दड़ो का महास्नानागार | दोनों ओर सीढ़ियाँ, ईंटों की परत |
★चित्र 6.5 का कैप्शन एक अपवाद बताता है और परीक्षा में आ सकता है: सामान्य नियम है दो क्षेत्र (ऊपरी और निचला नगर), पर धौलावीरा में तीन — और वहाँ नींव पत्थर की, ईंट की नहीं। धौलावीरा इस अध्याय का ‘अपवाद-नगर’ है — तीन क्षेत्र, पत्थर की नींव, चट्टान काटकर बनाए जलाशय। यह जोड़कर पढ़ाइए।
9. जल प्रबंधन (पृ. 94–95)★
हड़प्पावासी जल प्रबंधन और स्वच्छता को बहुत महत्व देते थे।
- उनके घरों में स्नान के लिए अलग स्नानागार हुआ करते थे।
- ये नगर जल-निकास प्रणाली से जुड़े हुए थे (चित्र 6.7), जो साधारणत: सड़कों के नीचे होती थीं, जिनमें अपशिष्ट जल बहता था।
- मोहनजो-दड़ो में लोग ईंटों से बनाए कुओं से पानी निकाला करते थे।
- किंतु अन्य क्षेत्रों में तालाब, पास के झरनों अथवा मानव निर्मित जलाशयों से पानी लेते होंगे।
- ★धौलावीरा में (गुजरात में कच्छ के रन में) 73 मीटर लंबा सबसे बड़ा जलाशय मिला है।
- धौलावीरा में पत्थरों और यहाँ तक कि चट्टान को काटकर कम से कम छह विशाल जलाशयों का निर्माण किया गया था। इनमें से अधिकांश को कुशल जल संचयन और वितरण के लिए भूमिगत नालियों से जोड़ा गया था।
शब्द-बॉक्स — जलाशय (हाशिया, पृ. 95)
जलाशय — विशाल प्राकृतिक या कृत्रिम स्थान, जहाँ जल का भंडारण किया जाता है।
चित्र 6.7 और 6.8
| चित्र | विषय |
|---|---|
| 6.7 (पृ. 94) | लोथल (गुजरात) में जल-निकास प्रणाली |
| 6.8 (पृ. 95) | धौलावीरा में चट्टान को काटकर बनाया गया 33 मीटर लंबा विशाल जलाशय |
! दो संख्याएँ, दो अलग जलाशय — यह इस अध्याय का सबसे नाज़ुक जाल है: 73 मीटर = धौलावीरा का सबसे बड़ा जलाशय (मुख्य पाठ, पृ. 95)। 33 मीटर = चित्र 6.8 में दिखाया गया चट्टान काटकर बनाया गया जलाशय (कैप्शन, पृ. 95)। ये एक ही जलाशय नहीं हैं। दोनों संख्याएँ एक ही पृष्ठ पर हैं और विद्यार्थी इन्हें आपस में बदल देते हैं। 73 = सबसे बड़ा; 33 = चित्र वाला।
आइए पता लगाएँ (बॉक्स, पृ. 95)
कक्षा की एक गतिविधि के रूप में किसी फीते (इंच टेप) से अपनी कक्षा, विद्यालय के गलियारे या खेल के मैदान की लंबाई मापें। इस लंबाई की तुलना धौलावीरा के सबसे विशाल जलाशय की लंबाई से कीजिए।
(अर्थात 73 मीटर से — एक साधारण कक्षा लगभग 7–8 मीटर लंबी होती है, तो जलाशय लगभग दस कक्षाओं जितना लंबा था। यह तुलना बच्चों पर सबसे अच्छा असर करती है।)
आइए विचार करें (बॉक्स, पृ. 96) — प्रशासन का प्रमाण★
जलाशयों के इस प्रकार के निर्माण के लिए आवश्यक श्रमिकों की बड़ी संख्या के बारे में सोचिए। आपके विचार से उनके कार्य को सुनियोजित करने के लिए निश्चित निर्देश किसने दिए होंगे? आपके विचार में उन्हें उनकी मजदूरी के लिए भुगतान कैसे किया गया होगा? (संकेत — उस समय आज की तरह मुद्रा का प्रचलन नहीं था।) चूँकि समय-समय पर जलाशयों की सफाई करना आवश्यक था, इसलिए क्या उनके रख-रखाव के लिए कोई स्थानीय प्राधिकारी थे? इस नगर के शासक और नगर प्रशासन के बारे में इससे हमें क्या संकेत मिलते हैं?
कल्पना कीजिए और अपने शिक्षक के साथ चर्चा कीजिए। पुरातत्ववेत्ता भी इन प्रश्नों के बारे में चर्चा करते हैं और उनके उत्तर सदैव निर्णायक नहीं होते!
★★यह बॉक्स सभ्यता की विशेषता #1 — ‘शासन और प्रशासन का कोई रूप’ — का प्रमाण है, और पुस्तक उसे सीधे नहीं कहती। हड़प्पा का कोई राजा, कोई शिलालेख, कोई राजसूची हमें नहीं मिली। तो प्रशासन का प्रमाण क्या है? इतना बड़ा निर्माण, जिसके लिए हज़ारों मज़दूरों को निर्देश, भुगतान और रख-रखाव चाहिए था। (संकेत में दिया गया ‘मुद्रा नहीं थी’ अपने-आप में परीक्षा-योग्य तथ्य है — भुगतान संभवत: अन्न या वस्तुओं में हुआ होगा।)
10. हड़प्पावासी क्या खाते थे? (पृ. 96–97)
बस्तियाँ नदियों के किनारे क्यों
हड़प्पावासियों ने अपनी अनेक बस्तियाँ बड़ी और छोटी नदियों के किनारे बसाई थीं — यह सिर्फ़ जल स्रोतों तक आसानी से पहुँचने के लिए ही नहीं, बल्कि कृषि की दृष्टि से भी एक औचित्यपूर्ण विकल्प रहा होगा, क्योंकि नदियाँ अपने आस-पास की भूमि को उपजाऊ बनाती हैं।
फ़सलें★
पुरातात्विक खोजें दर्शाती हैं कि हड़प्पावासी इनकी खेती करते थे —
- दलहन और अनेक किस्म की सब्जियाँ
- जौ, गेहूँ
- कुछ मोटे अनाज, बाजरा
- कभी-कभी धान
★कपास: “यूरेशिया में कपास उगाने में भी वे सर्वप्रथम थे, जिसका उपयोग वे कपड़ा बुनने में किया करते थे।”
★उपकरण: उन्होंने हल सहित खेती के कई उपकरण बनाए (चित्र 6.9), जिनमें से कुछ का उपयोग आधुनिक समय में भी किसानों द्वारा किया जाता है।
शब्द-बॉक्स — दलहन (हाशिया, पृ. 96)
दलहन — फसलों की श्रेणी, जिसमें सेम, मटर के दाने और दालें सम्मिलित हैं।
चित्र 6.9 (पृ. 96)
मिट्टी से निर्मित हल का लघु प्रतिरूप (हरियाणा में बनावली से प्राप्त)।
यह अध्याय की सबसे किफ़ायती वस्तु है — एक खिलौना-सा प्रतिरूप, जो सिद्ध करता है कि हल था। पुरातत्व कैसे काम करता है, यह समझाने के लिए इससे अच्छा उदाहरण नहीं मिलेगा।
गाँव और नगर का संबंध (पृ. 97)
- यह गहन कृषि गतिविधि सैकड़ों छोटे ग्रामीण स्थलों अथवा गाँवों द्वारा संचालित की जाती थी।
- ★“अभी की तरह तब भी ग्रामीण क्षेत्रों से पर्याप्त कृषि उपज प्रतिदिन उपलब्ध होने पर ही नगर जीवित रह सकते थे।”
यह वाक्य सभ्यता की विशेषता #7 (कृषि उत्पादकता) का सीधा प्रमाण है, और अध्याय के अंत (पृ. 102 का बॉक्स) से भी जुड़ता है, जहाँ यही निर्भरता आज तक बनी हुई बताई गई है।
माँस और मछली
- हड़प्पावासियों ने माँस के सेवन के लिए अनेक पशुओं को पाला और मछलियों के लिए वे नदियों एवं समुद्रों पर निर्भर रहते थे।
- प्रमाण: खुदाई में बड़ी संख्या में पाई गई पशुओं की हड्डियाँ और मत्स्य जीवाश्म।
मिट्टी के पात्रों की वैज्ञानिक जाँच★
“हड़प्पावासियों के खाना पकाने के पात्रों में क्या होता था?”
मिट्टी के पात्रों की वैज्ञानिक जाँच से कुछ प्रश्नों के उत्तर मिलते हैं, जिसमें दोनों प्रकार के अवशेष हैं —
| प्रकार | अवशेष |
|---|---|
| प्रत्याशित (अपेक्षित) | दुग्ध उत्पाद |
| अप्रत्याशित (अनपेक्षित) | हल्दी, अदरक और केले |
“स्पष्ट है कि उनके भोजन में बहुत विविधता थी।”
★यह अध्याय का सबसे आधुनिक-विज्ञान वाला अंश है — बर्तन के भीतर बचे सूक्ष्म अवशेषों की रासायनिक जाँच। बच्चों को यह बात बहुत पसंद आती है: हल्दी और अदरक चार हज़ार साल से हमारी रसोई में हैं। यह पृ. 104 के प्रश्न 4 से भी सीधा जुड़ता है।
आइए पता लगाएँ (बॉक्स, पृ. 97)
मान लीजिए कि आप हड़प्पा के एक घर में खाना पकाते हैं। आप ऊपर दी गई जानकारी के आधार पर कौन-से व्यंजन बनाएँगे?
11. सक्रिय व्यापार (पृ. 97–99)★
व्यापार किसके साथ
हड़प्पावासी न केवल अपनी सभ्यता (आस-पास या बहुत दूर के अन्य नगरों) में, बल्कि भारत के भीतर और बाहर की अन्य सभ्यताओं और संस्कृतियों के साथ भी सक्रिय रूप से व्यापार किया करते थे।
निर्यात (जो उन्होंने बाहर भेजा)
- आभूषण
- लकड़ी
- दैनिक उपयोग की कुछ वस्तुएँ (चित्र 6.11)
- संभवत: सोना एवं कपास
- कुछ खाद्य वस्तुएँ
आयात — एक खुला प्रश्न★
“यह स्पष्ट नहीं है कि हड़प्पावासियों ने निर्यातित वस्तुओं के बदले में किस वस्तु का आयात किया। संभवत: यह तांबा हो सकता है, क्योंकि यह धातु सामान्यत: उनके पास बहुतायत में उपलब्ध नहीं थी।”
! यहाँ पुस्तक की भाषा पर ध्यान दीजिए — ‘स्पष्ट नहीं है’ और ‘संभवत:’। निर्यात की सूची निश्चित है, आयात अनिश्चित। प्रश्न बनाते समय यह अंतर बनाए रखिए।
कार्नेलियन के मोती — सबसे प्रिय आभूषण★
- उनके सर्वाधिक प्रिय आभूषण कार्नेलियन के मोती थे (चित्र 6.10)।
- ये अधिकतर गुजरात में पाए जाने वाले लाल रंग के अल्प मूल्यवान पत्थर होते थे।
- हड़प्पा के कारीगरों ने उनमें छेद करने की तकनीक भी विकसित की थी, ताकि धागे को डालकर उन्हें तरह-तरह से सजाया जा सके।
शंख की चूड़ियाँ
- उन्होंने शंखों से बहुत सुंदर चूड़ियाँ भी बनाईं।
- ★“चूँकि शंख का खोल सख़्त होता है, अत: उन चूड़ियों को बनाने के लिए परिष्कृत तकनीक की आवश्यकता भी होती होगी।”
यह वाक्य सभ्यता की विशेषता #3 (विभिन्न प्रकार के शिल्प) का प्रमाण है, और साथ ही एक अच्छा तर्क-नमूना: कठोर सामग्री ⇒ उन्नत तकनीक।
मार्ग — भारत की प्रथम गहन समुद्री गतिविधि★
- उन्होंने इस प्रकार के व्यापार को संचालित करने के लिए स्थल मार्ग एवं नदियों, तथा अधिक दूरवर्ती गंतव्यों के लिए समुद्री रास्तों का उपयोग किया।
- ★★“यह भारत की प्रथम गहन समुद्री गतिविधि थी।”
- गुजरात और सिंध के तटवर्ती क्षेत्रों में कई हड़प्पाई बस्तियाँ स्थित हैं।
लोथल का बेसिन (बंदरगाह)★
- गुजरात में स्थित एक लघु बस्ती लोथल में आश्चर्यजनक रूप से 217 मीटर लंबाई और 36 मीटर चौड़ाई का एक विशाल बेसिन पाया गया है।
- “इसकी लंबाई फुटबॉल के दो मैदानों से थोड़ी अधिक है।”
- इस बेसिन में बंदरगाह जैसी संरचना अवश्य रही होगी, जिसका इस्तेमाल नावों के माध्यम से वस्तुओं के आयात और निर्यात के लिए किया जाता होगा।
! लोथल को ‘लघु बस्ती’ कहा गया है, फिर भी वहाँ यह विशाल बेसिन है — यही ‘आश्चर्यजनक’ वाली बात है। विद्यार्थी प्राय: लोथल को बड़ा नगर मान लेते हैं। मानचित्र पर लोथल लाल बिंदु नहीं है — पाँच बड़े नगरों में वह नहीं आता।
मुहरें (पृ. 98–99)★
- इस प्रकार के व्यापक स्तर के व्यापार में यह आवश्यक था कि व्यापारी अपने सामान को और एक-दूसरे को पहचानें!
- अनेक बस्तियों की खुदाई में हज़ारों की संख्या में छोटी मुहरें मिलीं — मुख्य उपयोग यही रहा होगा।
- ये मुहरें एक मुलायम पत्थर स्टीऐटाइट की बनी थीं, जिन्हें गरम कर कठोर बनाया जाता था।
- इनका माप केवल कुछ सेंटीमीटर है।
- सामान्यत: इनके ऊपर जानवरों के चित्र बनाए गए हैं, किंतु इन पर लेखन प्रणाली के कुछ संकेत भी मिलते हैं।
- ★★“इस लेखन प्रणाली और पशुओं के चित्रों के प्रतीकों के अर्थ को अभी समझा जाना बाकी है, पर यह निश्चित है कि ये किसी प्रकार की व्यापार की गतिविधियों से संबंधित हैं।”
★यह अध्याय का सबसे बड़ा ‘अनुत्तरित प्रश्न’ है। सभ्यता की सात विशेषताओं में #5 लेखन था — हड़प्पा में लेखन है, पर पढ़ा नहीं जा सका। इसीलिए पृ. 93 पर कहा गया कि हमारे पास कोई ग्रंथ या शिलालेख नहीं। यह कड़ी अवश्य जोड़िए — यह कक्षा में सबसे रोमांचक क्षण होता है।
चित्र 6.10 – 6.13
| चित्र | विषय | ★ध्यान देने योग्य |
|---|---|---|
| 6.10 (पृ. 98) | सूसा (वर्तमान ईरान) में खुदाई में प्राप्त कार्नेलियन मनके | ★ये गुजरात के पत्थर से बने मनके ईरान में मिले — यही ‘बाहरी व्यापार’ का ठोस प्रमाण है |
| 6.11 (पृ. 98) | हड़प्पा का हाथी दाँत का कंघा जो ओमान के तट पर पाया गया (लगभग 7 सेमी. लंबा) | ★दूसरा प्रमाण — हड़प्पा की वस्तु ओमान तक पहुँची |
| 6.12 (पृ. 99) | लोथल में विशाल बंदरगाह | आज भी जल भरा हुआ दिखता है |
| 6.13.1, 6.13.2, 6.13.3 (पृ. 99) | (बाएँ से दाएँ) एकशृंगी पशु, बैल, सींग वाले बाघ को दर्शाती हड़प्पा की कुछ मुहरें | तीनों पर लेखन-संकेत भी दिखते हैं |
★★चित्र 6.10 और 6.11 को साथ पढ़ाइए। ये दोनों केवल तस्वीरें नहीं — ये व्यापार का भौतिक प्रमाण हैं। गुजरात का पत्थर ईरान में, हड़प्पा का कंघा ओमान में। पुस्तक ने ये दो चित्र संयोग से नहीं चुने। प्रश्न बनाने के लिए यह जोड़ी अध्याय की सबसे अच्छी सामग्री है।
आइए पता लगाएँ (बॉक्स, पृ. 98) — कांस्य
हड़प्पावासी मुलायम धातु तांबे की कलाकारी में कुशल थे। तांबे में टिन मिलाने पर कांस्य धातु बन जाती है, जो तांबे की तुलना में कठोर होती है। हड़प्पावासियों ने उपकरण तथा बर्तन बनाने में कांसे का उपयोग किया। बाद में हम इसकी बनी कुछ छोटी प्रतिमाएँ देखेंगे।
यह बॉक्स पृ. 86 के ‘धातु विज्ञान’ और पृ. 100–101 की कांस्य वस्तुओं (दर्पण, छैनी, ‘नर्तकी’) को जोड़ता है। सूत्र सरल है और याद रखने योग्य: तांबा + टिन = कांस्य, और कांस्य अधिक कठोर होता है।
आइए पता लगाएँ (बॉक्स, पृ. 99) — मुहरें
कुछ लेखन संकेतों के साथ हड़प्पा की इन तीन मुहरों को देखते हुए आपके मन में क्या विचार आता है? क्या आप इनकी कोई व्याख्या देना चाहेंगे? अपनी कल्पनाशक्ति का उपयोग कीजिए।
12. प्राचीन जीवन (पृ. 100–101) — दो पृष्ठों की चित्र-गैलरी
शीर्षक-पट्टी: “पुरातत्ववेत्ता हड़प्पावासियों द्वारा निर्मित और उपयोग की गई अनेक वस्तुओं को सामने लेकर आए हैं।”
(क) दैनिक उपयोग की वस्तुएँ (पृ. 100)
| चित्र | वस्तु | कहाँ से |
|---|---|---|
| 6.14.1 | कांस्य दर्पण | धौलावीरा |
| 6.14.2 | पकी मिट्टी (टेराकोटा) का पात्र | धौलावीरा |
| 6.14.3 | भार तौलने के कुछ पत्थर | धौलावीरा |
| 6.14.4 | कांस्य छैनी | धौलावीरा |
| 6.14.5 | 25 सेमी. की लंबाई वाले एक पत्थर पर उकेरा गया खेल-बोर्ड | धौलावीरा |
| 6.14.6 | लगभग 4 सेमी. लंबी मिट्टी की सीटी | करनपुरा, राजस्थान |
कैप्शन का अंतिम वाक्य: “हड़प्पावासियों ने वयस्कों और बच्चों, दोनों के मनोरंजन के लिए अनेक खेल तैयार किए!”
★‘भार तौलने के पत्थर’ सबसे कम ध्यान पाने वाली, पर सबसे अर्थपूर्ण वस्तु हैं — वे व्यापार में मानकीकृत माप का प्रमाण हैं। और खेल-बोर्ड तथा सीटी बच्चों को यह अनुभव कराते हैं कि ये जीते-जागते लोग थे। कक्षा में यही दो वस्तुएँ सबसे अच्छा काम करती हैं।
(ख) सांस्कृतिक और प्रतीकात्मक वस्तुएँ (पृ. 101)
| चित्र | वस्तु | ★ |
|---|---|---|
| 6.15.1 | एक छोटी मूर्ति जिसे प्राय: ‘पुरोहित राजा’ कहा जाता है | ! पुस्तक जोड़ती है: “यद्यपि यह मालूम नहीं है कि यह प्रतिमा किसकी है।” |
| 6.15.2 | स्वास्तिक दर्शाती हुई मुहर | |
| 6.15.3 | शक्तिशाली पशुओं से घिरे ऊँचे स्थान पर बैठे त्रिमुखी देवता को दर्शाती मुहर | |
| 6.15.4 | मोहनजो-दड़ो से प्राप्त ‘नर्तकी’ की एक लघु कांस्य प्रतिमा — यह 10.8 सेमी. ऊँची है | ऊँचाई परीक्षा-योग्य |
| 6.15.5 | नमस्ते की मुद्रा में बैठी एक पकी मिट्टी (टेराकोटा) की मूर्ति | |
| 6.15.6 | एक पात्र पर प्यासे कौए की कहानी को दर्शाता चित्रण, जिसमें वह पात्र के निचले हिस्से से जल को पीने के लिए एक चतुर तरीका निकालता है (लोथल से प्राप्त) | ★चार हज़ार साल पुरानी वह कहानी, जो आज भी सुनाई जाती है |
★★‘पुरोहित राजा’ पर पुस्तक की सावधानी सोने जैसी है। नाम प्रचलित है, पर पुस्तक तुरंत कहती है कि यह मालूम नहीं कि प्रतिमा किसकी है। यह वही अनुशासन है जो पृ. 91 पर ‘घाटी’ शब्द छोड़ने में और पृ. 93 पर पहली व्याख्या ख़ारिज करने में दिखा। तीनों को एक साथ दिखाइए — यह अध्याय की सबसे गहरी सीख है: नाम प्रमाण नहीं होता।
आइए विचार करें (बॉक्स, पृ. 102)
पृष्ठ 100 और 101 पर दर्शाई गई वस्तुओं या इस अध्याय में चित्रित अन्य वस्तुओं को देखते हुए क्या आप उन गतिविधियों और जीवन के पक्षों का पता लगा सकते हैं, जो हड़प्पावासियों के लिए महत्वपूर्ण थे?
आइए पता लगाएँ (बॉक्स, पृ. 102) — दो प्रश्न
(1) लोथल के पात्र पर दर्शाई गई कहानी को पूरा कीजिए। आपके विचार से इस कहानी को 4,000 से अधिक वर्षों से क्यों याद किया जाता रहा?
(2) ‘नर्तकी’ की लघु प्रतिमा पर विचार कीजिए। इस लघु प्रतिमा की भाव-भंगिमा से आप क्या समझते हैं? पूरी बाँह को ढँकने वाली उसकी चूड़ियों को ध्यान से देखिए, जो गुजरात और राजस्थान के क्षेत्रों में अभी भी महिलाएँ पहनती हैं। इस अध्याय में आपने और कहाँ पर इस तरह से चूड़ियाँ पहनने को चिह्नित किया है? इससे हमें क्या निष्कर्ष निकालना चाहिए?
★★दूसरे प्रश्न का उत्तर अध्याय के भीतर छिपा है और यही उसे इतना अच्छा प्रश्न बनाता है। उत्तर: शंख की चूड़ियाँ (पृ. 97) — हड़प्पावासी शंख से सुंदर चूड़ियाँ बनाते थे। निष्कर्ष: यह परंपरा चार हज़ार वर्षों से आज तक चली आ रही है — सभ्यता समाप्त हुई, संस्कृति नहीं। और यही निष्कर्ष पृ. 103 पर पुस्तक स्वयं दोहराती है: “हड़प्पा की संस्कृति एवं प्रौद्योगिकी अधिकांशत: बची रही।” यह प्रश्न पूरे अध्याय को एक सूत्र में बाँध देता है।
13. अंत अथवा नई शुरुआत? (पृ. 102–103)★
पतन का विवरण
- 1900 सा.सं.पू. के आस-पास इस सिंधु-सरस्वती सभ्यता की सभी उपलब्धियों के बावजूद उसका ह्रास हो गया।
- इसके नगर एक के बाद एक खाली होते गए।
- यदि कोई निवासी वहाँ रहे भी, तो उन्होंने परिवर्तित वातावरण में ग्रामीण जीवन-शैली को अपनाया।
- “ऐसा प्रतीत होता है कि पूर्ववर्ती सरकार या प्रशासन अब विद्यमान नहीं रहा।”
- धीरे-धीरे हड़प्पावासी हज़ारों नहीं तो सैकड़ों की संख्या में छोटी-छोटी बस्तियों के रूप में बिखर गए।
आइए विचार करें (बॉक्स, पृ. 102)
हड़प्पावासी ग्रामीण बस्तियों में लौट गए क्योंकि किसी नगरीय जीवन-शैली की तुलना में ग्रामीण जीवन-शैली भोजन और जल तक सहज पहुँच प्रदान करती है। तब से लेकर अब तक नगर भोजन और कभी-कभी जल आपूर्ति के लिए गाँवों पर निर्भर रहते हैं।
पतन के कारण — पुस्तक का सबसे संरचित अंश★★
पहले, जो कारण ख़ारिज किया गया:
“बहुत समय पहले यह सोचा गया कि युद्ध या आक्रमण ने इन नगरों का विध्वंस किया होगा, लेकिन युद्ध या आक्रमण के कोई निशान नहीं मिलते। जहाँ तक प्रमाणों की बात है, हड़प्पावासियों ने वास्तव में कभी भी कोई सेना या युद्ध के हथियार नहीं रखे। यह अपेक्षाकृत एक शांतिपूर्ण सभ्यता प्रतीत होती है।”
फिर, दो कारण जिन पर आज सहमति है:
“वर्तमान में दो कारणों पर सहमति है।”
| # | कारण | विवरण |
|---|---|---|
| 1 | जलवायु परिवर्तन | 2200 सा.सं.पू. से विश्व को अत्यधिक प्रभावित करने वाले जलवायु संबंधी परिवर्तनों से वर्षा में कमी और शुष्कता की स्थिति उत्पन्न हुई। इसने कृषि कार्य को अधिक कठिन बनाया होगा और नगरों की ओर खाद्य आपूर्ति में कमी आई होगी। |
| 2 | सरस्वती का सूखना | सरस्वती नदी का मध्य बेसिन सूख गया; वहाँ कालीबंगा और बनावली जैसे नगर अचानक छोड़ दिए गए। |
- “इसमें अन्य कारण भी रहे होंगे, लेकिन ये दो कारण हमें याद दिलाते हैं कि हम अपने कल्याण के लिए अपनी जलवायु और पर्यावरण पर कितने निर्भर हैं।”
★★यह अंश तर्क का पूरा नमूना है और परीक्षा में सबसे अधिक आने योग्य है: एक कारण ख़ारिज (युद्ध — क्योंकि निशान नहीं, हथियार नहीं) + दो कारण स्वीकृत (जलवायु 2200 सा.सं.पू., सरस्वती का मध्य बेसिन) + स्वीकारोक्ति कि और भी कारण रहे होंगे। तीनों हिस्से पूरे उत्तर के लिए आवश्यक हैं। केवल दो कारण लिख देना अधूरा उत्तर है।
अंत नहीं — नई शुरुआत (पृ. 103)★
“यद्यपि नगर लुप्त हो गए, लेकिन हड़प्पा की संस्कृति एवं प्रौद्योगिकी अधिकांशत: बची रही और यह भारतीय सभ्यता के अगले चरण में पहुँच गई, जिसके बारे में हम अगले अध्याय में पता करेंगे।”
★यही अध्याय के शीर्षक ‘अंत अथवा नई शुरुआत?’ का उत्तर है — और यह अध्याय 7 की ओर आगे इशारा करता है। इसे कक्षा के अंत में अवश्य कहिए: सभ्यता का ह्रास हुआ, संस्कृति नहीं मरी।
14. आगे बढ़ने से पहले… — पुस्तक का अपना सार (पृ. 103)
पुस्तक तीन बिंदुओं में स्वयं सार देती है — यही सबसे विश्वसनीय पुनरावृत्ति सामग्री है:
- सिंधु, हड़प्पा या सिंधु-सरस्वती सभ्यता विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक है। हड़प्पावासियों ने कुशल जल प्रबंधन, विविध शिल्पों और सक्रिय व्यापार के साथ सुनियोजित नगरों का निर्माण किया।
- उपजाऊ कृषि से नगरों को विभिन्न प्रकार की फसलें प्राप्त हुईं।
- इस सभ्यता का जलवायु संबंधी और पर्यावरणीय परिवर्तनों के कारण अंतत: ह्रास हो गया; लोग ग्रामीण जीवन-शैली की ओर लौट गए।
अभ्यास — प्रश्न, क्रियाकलाप और परियोजनाएँ (पृ. 103–104)
पुस्तक में आठ प्रश्न हैं:
- इस अध्याय में अध्ययन की गई सभ्यता के अनेक नाम क्यों हैं? इनके महत्व पर चर्चा कीजिए।
- सिंधु-सरस्वती सभ्यता की उपलब्धियों का सार देते हुए संक्षिप्त रिपोर्ट (150 से 200 शब्द) लिखिए।
- कल्पना कीजिए कि आपको हड़प्पा से कालीबंगा तक यात्रा करनी है। आपके पास विभिन्न विकल्प क्या हैं? क्या आप प्रत्येक विकल्प में लगने वाले समय का अनुमान लगा सकते हैं?
- कल्पना कीजिए कि यदि हड़प्पा के किसी पुरुष या महिला को हम आज के भारत के सामान्य रसोईघर में ले आते हैं, तो उन्हें सबसे बड़े चार या पाँच आश्चर्य क्या लगेंगे?
- इस अध्याय के सभी चित्रों पर दृष्टि डालते हुए उन आभूषणों/हाव-भावों/वस्तुओं की सूची बनाइए, जो अभी भी 21वीं शताब्दी में परिचित प्रतीत होती हैं।
- धौलावीरा के जलाशयों की प्रणाली क्या सोच प्रतिबिंबित करती है?
- मोहनजो-दड़ो में ईंटों से निर्मित 700 कुओं की गणना की गई है। ऐसा लगता है कि उनका नियमित रूप से रख-रखाव किया जाता रहा और अनेक शताब्दियों तक उनका उपयोग किया जाता रहा। निहितार्थों पर चर्चा कीजिए।
- सामान्यत: यह कहा जाता है कि हड़प्पावासियों में नागरिकता का उच्च भाव था। इस कथन के महत्व पर चर्चा कीजिए। क्या आप इससे सहमत हैं? वर्तमान भारत के महानगरों के नागरिकों के साथ इसकी तुलना कीजिए।
★प्रश्न 7 पर ध्यान दीजिए — ‘700 कुएँ’ की संख्या केवल यहाँ, अभ्यास में आती है, मुख्य पाठ में नहीं। विद्यार्थी अभ्यास नहीं पढ़ते, इसलिए यह संख्या छूट जाती है। यह परीक्षा में आ सकती है — नोटबुक में लिखवाइए।
उत्तर-कुंजी — पुस्तक मेंनहीं छपी हैध्यान
(नीचे के उत्तर अध्याय के भीतर से बने हैं। ये शिक्षक के लिए हैं।)
1. अनेक नाम क्यों — तीन नाम हैं: सिंधु सभ्यता (सबसे पहले पुरास्थल सिंधु के मैदानों में मिले), हड़प्पा सभ्यता (1920–21 में हड़प्पा पहला उत्खनित नगर था), सिंधु-सरस्वती सभ्यता (सरस्वती/घग्गर-हाकरा की द्रोणी में भी अनेक पुरास्थल मिले, जिनमें दो महानगर राखीगढ़ी और गँवेरीवाला भी हैं)। महत्व: हर नाम खोज के एक चरण को दर्ज करता है — नाम बदलते गए क्योंकि प्रमाण बढ़ते गए। और इसीलिए ‘घाटी’ शब्द छोड़ दिया गया (पृ. 91), क्योंकि सभ्यता सिंधु क्षेत्र से बहुत आगे तक फैली थी।
2. उपलब्धियों की रिपोर्ट (150–200 शब्द) — सम्मिलित होने चाहिए: सुनियोजित नगर, चौड़ी और दिशाओं की ओर उन्मुख सड़कें, किलेबंदी, ऊपरी और निचला नगर, बड़े-छोटे घरों की एक समान निर्माण गुणवत्ता, महास्नानागार (12×7 मी.), जल-निकास प्रणाली सड़कों के नीचे, घरों में स्नानागार, मोहनजो-दड़ो के कुएँ, धौलावीरा के छह जलाशय और 73 मी. वाला सबसे बड़ा, कृषि (जौ, गेहूँ, दलहन, बाजरा, मोटे अनाज, कभी-कभी धान), यूरेशिया में कपास उगाने में सर्वप्रथम, हल, कार्नेलियन मनके, शंख की चूड़ियाँ, कांस्य, स्टीऐटाइट की मुहरें, भारत की प्रथम गहन समुद्री गतिविधि, लोथल का बेसिन (217×36 मी.)।
3. हड़प्पा से कालीबंगा — विकल्प: हड़प्पा रावी नदी पर पंजाब (पाकिस्तान) में, कालीबंगा सरस्वती/घग्गर के किनारे राजस्थान में। विकल्प: पैदल, बैलगाड़ी, नदी मार्ग से नाव। (यह कल्पना-प्रश्न है; समय का अनुमान तर्कसंगत होना चाहिए, सटीक नहीं। मानचित्र चित्र 6.3 के पैमाने का उपयोग करवाइए — यही इस प्रश्न का असली उद्देश्य है।)
4. रसोईघर के आश्चर्य — अध्याय के आधार पर: वे जो पहचान लेंगे — हल्दी, अदरक, केला, दूध के उत्पाद, गेहूँ, जौ, दालें, मिट्टी के बर्तन। जो उन्हें चौंकाएगा — गैस/बिजली का चूल्हा, नल से आता पानी, धातु के बर्तन (स्टील), फ्रिज, प्लास्टिक, मुद्रा से ख़रीदा गया सामान (उनके समय मुद्रा नहीं थी)। (अच्छा उत्तर दोनों सूचियाँ देता है।)
5. आज भी परिचित — पूरी बाँह ढँकने वाली चूड़ियाँ (‘नर्तकी’, चित्र 6.15.4 — आज भी गुजरात और राजस्थान में), नमस्ते की मुद्रा (चित्र 6.15.5), स्वास्तिक (चित्र 6.15.2), कंघा (चित्र 6.11), दर्पण (चित्र 6.14.1), खेल-बोर्ड और सीटी (चित्र 6.14.5, 6.14.6), भार तौलने के पत्थर, प्यासे कौए की कहानी (चित्र 6.15.6), हल (चित्र 6.9)।
6. धौलावीरा के जलाशय क्या सोच दर्शाते हैं — एक शुष्क क्षेत्र (कच्छ का रन) में जीवन बसाने की दूरदर्शी योजना: छह विशाल जलाशय, चट्टान काटकर बनाए गए, भूमिगत नालियों से जुड़े — अर्थात जल संचयन और वितरण दोनों की योजना पहले से बनी थी। यह दर्शाता है — सामूहिक श्रम का संगठन, दीर्घकालिक सोच, और जल को सार्वजनिक संपत्ति मानना। (आज की वर्षा-जल संचयन से तुलना करवाइए।)
7. 700 कुओं के निहितार्थ — (क) जल तक पहुँच व्यापक थी, कुछ लोगों तक सीमित नहीं; (ख) नियमित रख-रखाव का अर्थ है एक स्थायी स्थानीय प्राधिकरण — यानी प्रशासन (सभ्यता की विशेषता #1); (ग) अनेक शताब्दियों तक उपयोग का अर्थ है निरंतरता और स्थिरता; (घ) यह पृ. 96 के ‘आइए विचार करें’ से जुड़ता है — निर्माण के लिए श्रम-संगठन और भुगतान की व्यवस्था रही होगी।
8. नागरिकता का उच्च भाव — सहमति के पक्ष में प्रमाण: जल-निकास प्रणाली सड़कों के नीचे (साझा व्यवस्था), बड़े-छोटे घरों की एक समान गुणवत्ता, सामूहिक गोदाम, सार्वजनिक जलाशय, युद्ध के हथियारों और सेना का अभाव, बी.बी. लाल का ‘शोषण नहीं, आपसी सामंजस्य’। ! संतुलन के लिए यह भी कहिए: नगर के दो भाग (ऊपरी/निचला) और अभिजात वर्ग का उल्लेख बताता है कि समाज पूरी तरह समान नहीं था। (दोनों पक्ष रखने वाला उत्तर सर्वोत्तम है। यह मुक्त-उत्तर प्रश्न है — कोई एक ‘सही’ उत्तर नहीं।)
चित्र और तालिकाएँ — पूरी सूची
| क्रमांक | पृष्ठ | विषय |
|---|---|---|
| चित्र 6.1 | 85 | धौलावीरा ‘किला’ क्षेत्र का उत्तरी प्रवेश द्वार |
| चित्र 6.2 | 87 | समय-रेखा — 2600 से 1900 सा.सं.पू. तक सिंधु-सरस्वती सभ्यता का समय |
| चित्र 6.3 | 89 | सिंधु-सरस्वती सभ्यता की कुछ प्रमुख बस्तियों का मानचित्र |
| तालिका | 90 | नगर ↔ आधुनिक राज्य — ! मिलान-अभ्यास, पंक्तियाँ बदली हुई |
| चित्र 6.4 | 92 | कालीबंगा (राजस्थान) के निचले नगर में एक चौड़ी सड़क |
| चित्र 6.5 | 92 | धौलावीरा के मध्य नगर की लंबवत गलियाँ — तीन क्षेत्र, पत्थर की नींव |
| चित्र 6.6 | 93 | मोहनजो-दड़ो का महास्नानागार |
| चित्र 6.7 | 94 | लोथल (गुजरात) में जल-निकास प्रणाली |
| चित्र 6.8 | 95 | धौलावीरा में चट्टान काटकर बनाया गया 33 मीटर लंबा विशाल जलाशय |
| चित्र 6.9 | 96 | मिट्टी से निर्मित हल का लघु प्रतिरूप (बनावली, हरियाणा) |
| चित्र 6.10 | 98 | सूसा (वर्तमान ईरान) में खुदाई में प्राप्त कार्नेलियन मनके |
| चित्र 6.11 | 98 | हड़प्पा का हाथी दाँत का कंघा, ओमान के तट पर पाया गया (लगभग 7 सेमी.) |
| चित्र 6.12 | 99 | लोथल में विशाल बंदरगाह |
| चित्र 6.13.1–3 | 99 | एकशृंगी पशु, बैल, सींग वाले बाघ की मुहरें |
| चित्र 6.14.1–6 | 100 | दैनिक उपयोग की वस्तुएँ — दर्पण, पात्र, भार-पत्थर, छैनी, खेल-बोर्ड, सीटी |
| चित्र 6.15.1–6 | 101 | सांस्कृतिक वस्तुएँ — ‘पुरोहित राजा’, स्वास्तिक मुहर, त्रिमुखी देवता, ‘नर्तकी’, नमस्ते मुद्रा, प्यासा कौआ |
| पद | पुस्तक की परिभाषा / अर्थ | पृष्ठ |
|---|---|---|
| सभ्यता | मानव समाज का उन्नत चरण | 86 |
| धातु विज्ञान | प्रकृति से धातु निष्कर्षण, शुद्धिकरण, मिश्रण की तकनीकें और धातु व उसके गुणों का वैज्ञानिक अध्ययन | 86 |
| नगरीकरण | नगर योजना, नगरों का विकास और उनका प्रबंधन | 86 |
| सहायक नदी | वह नदी जो किसी बड़ी नदी (या झील) में मिलती है | 88 |
| हड़प्पाई / हड़प्पावासी | इस सभ्यता के निवासी | 88 |
| किलेबंदी | सुरक्षात्मक उद्देश्यों से बस्ती या नगर के चारों ओर बनाई गई विशाल दीवार | 91 |
| अभिजात वर्ग | समाज का उच्च स्तर — शासक, अधिकारी, प्रशासक, प्राय: पुरोहित या पुजारी | 91 |
| ऊपरी नगर | नगर का वह भाग जहाँ संभवत: अभिजात वर्ग रहता था | 91 |
| निचला नगर | नगर का वह भाग जहाँ साधारण लोग रहते थे | 91 |
| महास्नानागार | मोहनजो-दड़ो का 12×7 मी. का प्रसिद्ध स्नानागार | 91 |
| बिटुमेन | डामर के रूप में प्राकृतिक जल रोधक सामग्री | 91 |
| जल-निकास प्रणाली | सड़कों के नीचे बनी नालियाँ, जिनमें अपशिष्ट जल बहता था | 94 |
| जलाशय | विशाल प्राकृतिक या कृत्रिम स्थान, जहाँ जल का भंडारण किया जाता है | 95 |
| दलहन | फसलों की श्रेणी — सेम, मटर के दाने और दालें | 96 |
| कार्नेलियन | गुजरात में पाया जाने वाला लाल रंग का अल्प मूल्यवान पत्थर | 97 |
| कांस्य | तांबा + टिन; तांबे से अधिक कठोर | 98 |
| स्टीऐटाइट | मुलायम पत्थर, जिससे मुहरें बनीं; गरम कर कठोर किया जाता था | 99 |
| बेसिन (लोथल) | 217×36 मी. की संरचना, संभवत: बंदरगाह | 98 |
| द्रोणी / बेसिन (नदी) | किसी नदी का जल-ग्रहण क्षेत्र | 90 |
| घग्गर-हाकरा | सरस्वती नदी का वर्तमान नाम — भारत में घग्गर, पाकिस्तान में हाकरा | 90 |
| पुरास्थल | वह स्थान जहाँ पुरातात्विक अवशेष मिलते हैं | 90 |
मुख्य संख्याएँ — एक ही जगह
| संख्या | किसकी |
|---|---|
| लगभग 6,000 वर्ष पहले | मेसोपोटामिया में सभ्यता का आरंभ |
| 4000 / 3500 / 3100 / 2000 सा.सं.पू. | चित्र 6.2 की समय-रेखा पर अंकित बिंदु |
| 3500 सा.सं.पू. से | गाँव नगरों में परिवर्तित होने लगे |
| लगभग 2600 सा.सं.पू. | नगर महानगरों में परिवर्तित हुए (कारण: बढ़ता व्यापार) |
| 2600–1900 सा.सं.पू. | सिंधु-सरस्वती सभ्यता का काल (चित्र 6.2 का कैप्शन) |
| 2200 सा.सं.पू. से | जलवायु परिवर्तन — वर्षा में कमी, शुष्कता |
| 1900 सा.सं.पू. के आस-पास | सभ्यता का ह्रास |
| 1920–21 | हड़प्पा — पहला उत्खनित नगर |
| 1924 | हड़प्पा और मोहनजो-दड़ो की खोज |
| 12 × 7 मीटर | महास्नानागार, मोहनजो-दड़ो |
| 73 मीटर | धौलावीरा का सबसे बड़ा जलाशय |
| 33 मीटर | धौलावीरा का चट्टान काटकर बनाया गया जलाशय (चित्र 6.8) |
| कम से कम छह | धौलावीरा के विशाल जलाशयों की संख्या |
| 217 × 36 मीटर | लोथल का बेसिन (फुटबॉल के दो मैदानों से थोड़ा अधिक लंबा) |
| लगभग 7 सेमी. | हड़प्पा का हाथी दाँत का कंघा (ओमान में मिला) |
| 10.8 सेमी. | ‘नर्तकी’ की कांस्य प्रतिमा की ऊँचाई |
| 25 सेमी. | धौलावीरा का पत्थर पर उकेरा गया खेल-बोर्ड |
| लगभग 4 सेमी. | करनपुरा (राजस्थान) की मिट्टी की सीटी |
| 700 | मोहनजो-दड़ो में ईंटों से निर्मित कुएँ (केवल अभ्यास प्रश्न 7 में) |
| 4,000 से अधिक वर्ष | लोथल के पात्र की कहानी की आयु (पृ. 102 का बॉक्स) |
| तीन | धौलावीरा के क्षेत्र (अन्य नगरों में दो) |
| दो | पतन के वे कारण जिन पर सहमति है |
भ्रमित करने वाले युग्म — प्रश्न-पत्र के जाल यहीं से बनते हैंध्यान
| भ्रम | सही बात |
|---|---|
| 73 मी. बनाम 33 मी. | 73 = धौलावीरा का सबसे बड़ा जलाशय। 33 = चित्र 6.8 वाला चट्टान-कटा जलाशय। अलग-अलग जलाशय। |
| 1920–21 बनाम 1924 | 1920–21 = हड़प्पा पहला उत्खनित नगर। 1924 = हड़प्पा और मोहनजो-दड़ो की खोज। |
| 3500 बनाम 2600 सा.सं.पू. | 3500 = गाँव → नगर। 2600 = नगर → महानगर। |
| 2200 बनाम 1900 सा.सं.पू. | 2200 = जलवायु परिवर्तन आरंभ। 1900 = सभ्यता का ह्रास। |
| पृ. 90 की तालिका | ! मिलान-अभ्यास है — पंक्तियाँ जान-बूझकर बदली हुई हैं। सही जोड़ियाँ ऊपर खंड 6 में। |
| महास्नानागार का उद्देश्य | तीन व्याख्याएँ थीं; ‘सार्वजनिक स्नान’ वाली अब स्वीकार्य नहीं — क्योंकि अधिकांश घरों में अपने स्नानागार थे। |
| ‘पुरोहित राजा’ | नाम प्रचलित है, पर पुस्तक कहती है कि यह मालूम नहीं कि प्रतिमा किसकी है। |
| ‘सिंधु घाटी’ शब्द | पुस्तक ‘घाटी’ का प्रयोग नहीं करती — सभ्यता सिंधु क्षेत्र से बहुत आगे फैली थी। |
| लोथल | ‘लघु बस्ती’ है, बड़ा नगर नहीं — पर वहाँ 217×36 मी. का विशाल बेसिन है। |
| धौलावीरा | अपवाद-नगर — तीन क्षेत्र (अन्य में दो), पत्थर की नींव (अन्य में ईंट)। |
| कपास | हड़प्पावासी यूरेशिया में कपास उगाने वाले सर्वप्रथम थे — ‘विश्व में’ नहीं। |
| निर्यात बनाम आयात | निर्यात की सूची निश्चित है; आयात ‘स्पष्ट नहीं है’ — संभवत: तांबा। |
| पाँच बड़े नगर | हड़प्पा, मोहनजो-दड़ो, गँवेरीवाला, राखीगढ़ी, धौलावीरा (मानचित्र पर लाल बिंदु)। लोथल, कालीबंगा इनमें नहीं। |
| सरस्वती की द्रोणी के दो महानगर | राखीगढ़ी और गँवेरीवाला (हड़प्पा और मोहनजो-दड़ो नहीं — वे सिंधु/रावी पर हैं)। |
शिक्षक के लिए — तीन बातें जो इस अध्याय को खोल देती हैं★
1. सात विशेषताओं की सूची को बोर्ड पर पूरे अध्याय के लिए छोड़ दीजिए। पृ. 86 पर बनी सूची अध्याय के अंत तक भरती जाएगी — नगरीकरण को नगर-योजना से, शिल्प को मनकों और चूड़ियों से, व्यापार को सूसा और ओमान से, कृषि को जौ-गेहूँ-कपास से, प्रशासन को जलाशयों और कुओं से, सांस्कृतिक विचार को ‘नर्तकी’ और प्यासे कौए से। और लेखन का ख़ाना अंत तक अधूरा रहेगा, क्योंकि लिपि पढ़ी नहीं जा सकी। वह अधूरा ख़ाना ही अध्याय का सबसे बड़ा पाठ है।
2. पृष्ठ 90 की तालिका को तथ्य मत मानिए — यह इस अध्याय का सबसे बड़ा जोखिम है। वह मिलान-अभ्यास है और उसकी जोड़ियाँ ग़लत हैं। यदि कक्षा ने उसे उतार लिया, तो पाँच ग़लत उत्तर याद हो जाएँगे। इसे कक्षा-कार्य बनाइए: विद्यार्थी हर जोड़ी का प्रमाण अध्याय के भीतर से ढूँढ़ें — पाँचों प्रमाण मौजूद हैं (पृ. 88, 90, 91, 95)।
3. पुस्तक तीन बार दिखाती है कि ‘नाम प्रमाण नहीं होता’ — तीनों को जोड़िए। (क) ‘सिंधु घाटी’ कहना छोड़ दिया गया, क्योंकि सभ्यता घाटी से बहुत आगे फैली थी (पृ. 91)। (ख) महास्नानागार की ‘सार्वजनिक स्नान’ वाली व्याख्या छोड़ दी गई, क्योंकि अधिकांश घरों में स्नानागार थे (पृ. 93)। (ग) ‘पुरोहित राजा’ नाम चलता है, पर यह मालूम नहीं कि प्रतिमा किसकी है (पृ. 101)। तीनों एक ही आदत हैं — प्रमाण नाम से बड़ा होता है। यह अध्याय 4 की स्रोत-वाली सीख का सीधा विस्तार है, और यही इस पूरी पुस्तक का स्वभाव है।
और एक अंतिम बात, जो कक्षा के अंत में कहने लायक है: नगर उजड़ गए, पर चूड़ियाँ, नमस्ते, हल, हल्दी और प्यासे कौए की कहानी — सब बचे रहे। पुस्तक इसी को कहती है: “हड़प्पा की संस्कृति एवं प्रौद्योगिकी अधिकांशत: बची रही।” इसीलिए अध्याय का शीर्षक ‘अंत अथवा नई शुरुआत?’ है — और उत्तर ‘नई शुरुआत’ है।