कक्षा 12 • राजनीति विज्ञान • स्वतंत्र भारत में राजनीति • अध्याय 4 — भारत के विदेश संबंध
कक्षा — 12 · विषय — राजनीति विज्ञान (स्वतंत्र भारत में राजनीति) · पृष्ठ — 54 से 71
अब तक घरेलू चुनौतियाँ — अब बाहरी चुनौतियाँ
★★“आज़ादी किन चीजों से बनती है? आज़ादी बुनियादी तौर पर विदेश संबंधों से ही बनी होती है। यही आज़ादी की कसौटी भी है।” — जवाहरलाल नेहरू, संविधान सभा की बहस, मार्च 1949 ★और अध्याय का दूसरा दावा: “देश की राजनीति स्वयं भी इस क्रम में प्रभावित हुई।”
1 | अध्याय का परिचय | चार सवाल जिनके जवाब यह अध्याय देगा
पाठ स्वयं क्या कहता है
पृ. 54 — ‘इस अध्याय में…’
- “अब तक हमने देश में हुए बदलाव और घरेलू चुनौतियों पर नजर डाली है। इस अध्याय में हम बाहरी चुनौतियों के बारे में पढ़ेंगे।”
- ★“बाहरी चुनौतियों के मामले में गुटनिरपेक्षता की नीति का पालन किया।”
- ! “हमारे नेताओं को पड़ोसी देशों से हुए युद्धों से भी निपटना पड़ा — 1962, 1965 और 1971।”
- ★★“इन लड़ाइयों और हमारे विदेशी संबंधों को देश की राजनीति ने एक शक्ल प्रदान की। देश की राजनीति स्वयं भी इस क्रम में प्रभावित हुई।”
अध्याय के चार प्रश्न
| # | प्रश्न |
|---|---|
| 1 | भारत के विदेश संबंधों ने किन अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों में आकार लिया? |
| 2 | भारत की विदेश नीति किन सिद्धांतों से निर्देशित हुई? |
| 3 | चीन और पाकिस्तान के साथ रिश्ते कैसे रहे? |
| 4 | भारत की परमाणु नीति का उद्भव किन स्थितियों में हुआ? |
आवरण-चित्र — अक्तूबर 1960, न्यूयार्क
पृ. 54
- गुटनिरपेक्ष देशों की एक संगोष्ठी।
- जवाहरलाल नेहरू • एनक्रूमा (घाना) • नासिर (मिस्र) • सुकर्णो (इंडोनेशिया) • टीटो (युगोस्लाविया)
- ★यही पाँच चेहरे ‘गुटनिरपेक्ष आंदोलन’ का चेहरा हैं।
2 | अंतर्राष्ट्रीय संदर्भ | भारत किस दुनिया में आज़ाद हुआ
1947 की दुनिया
पृ. 55
- “भारत बड़ी विकट और चुनौतीपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों में आजाद हुआ था।”
- दुनिया महायुद्ध की तबाही से अभी बाहर निकली थी; सामने पुनर्निर्माण का सवाल था।
- एक अंतर्राष्ट्रीय संस्था बनाने के प्रयास हो रहे थे।
- उपनिवेशवाद की समाप्ति से नक्शे पर नए देश नमूदार हो रहे थे।
- ★नए देशों के सामने दोहरी चुनौती — लोकतंत्र कायम करना और जनता की भलाई करना।
और भारत की अपनी तीन चिंताएँ
| # | चिंता |
|---|---|
| 1 | “अंग्रेजी सरकार अपने पीछे अंतर्राष्ट्रीय विवादों की एक पूरी विरासत छोड़ गई थी” |
| 2 | “बँटवारे के कारण अलग से दबाव पैदा हुए थे” |
| 3 | “गरीबी मिटाने का काम सामने मुँह बाए खड़ा था” |
विदेश नीति किससे बनती है — पाठ की उपमा
पृ. 55
- “जिस तरह किसी व्यक्ति या परिवार के व्यवहारों को अंदरूनी और बाहरी कारक निर्देशित करते हैं, उसी तरह एक देश की विदेश नीति पर भी घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय वातावरण का असर पड़ता है।”
- ★★प्रश्न 4 ठीक इसी वाक्य पर आधारित है।
विकासशील देशों की तीन विवशताएँ
पृ. 55
- संसाधनों का अभाव — इसलिए “बड़े सीधे-सादे लक्ष्यों को लेकर विदेश नीति तय करते हैं”
- ज़ोर इस पर कि “पड़ोस में अमन-चैन कायम रहे और विकास होता रहे”
- ! “आर्थिक और सुरक्षा की दृष्टि से ज्यादा ताकतवर देशों पर निर्भर होते हैं”
दो खेमों में बँटती दुनिया
पृ. 55
- कई विकासशील देशों ने ताकतवर देशों की मर्जी देखकर विदेश नीति बनाई — “क्योंकि इन देशों से इन्हें अनुदान अथवा कर्ज मिल रहा था।”
- एक खेमा — संयुक्त राज्य अमरीका। दूसरा खेमा — सोवियत संघ।
- ★“जब भारत आज़ाद हुआ… तब शीतयुद्ध शुरू ही हुआ था और दुनिया बड़ी तेज़ी से दो खेमों में बँटती जा रही थी।”
आज़ादी की कसौटी
आज़ादी किन चीजों से बनती है? आज़ादी बुनियादी तौर पर विदेश संबंधों से ही बनी होती है। यही आज़ादी की कसौटी भी है। बाकी सारा कुछ तो स्थानीय स्वायत्तता है।
जवाहरलाल नेहरू — संविधान सभा की एक बहस में, मार्च 1949
संवैधानिक सिद्धांत — अनुच्छेद 51
| उपखंड | राज्य किसका प्रयास करेगा |
|---|---|
| (क) | अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की अभिवृद्धि |
| (ख) | राष्ट्रों के बीच न्यायसंगत और सम्मानपूर्ण संबंध |
| (ग) | अंतर्राष्ट्रीय विधि और संधि-बाध्यताओं के प्रति आदर |
| (घ) | विवादों के माध्यस्थम द्वारा निपटारे को प्रोत्साहन |
यह ध्यान रखिएध्यान
पृ. 56
- अनुच्छेद 51 ‘राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांतों’ का हिस्सा है।
- ! यानी यह मार्गदर्शक है — न्यायालय में बाध्यकारी नहीं।
- ★फिर भी यह दिखाता है कि शांति की नीति संविधान में ही दर्ज़ थी।
3 | गुटनिरपेक्षता | नीति, उसकी जड़ें और उसकी असंगति
जड़ें स्वतंत्रता आंदोलन में हैं
पृ. 56
- ★“भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन अपने आप में कोई स्वतंत्र घटना नहीं है।”
- वह उपनिवेशवाद के विरुद्ध विश्वव्यापी संघर्ष का हिस्सा था, और उसका असर एशिया-अफ्रीका के मुक्ति आंदोलनों पर पड़ा।
- आज़ादी से पहले ही भारत के नेता अन्य उपनिवेशों के नेताओं के संपर्क में थे।
- नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान ‘इंडियन नेशनल आर्मी’ का गठन किया था।
नेहरू की विदेश नीति के तीन उद्देश्य
| # | उद्देश्य |
|---|---|
| 1 | कठिन संघर्ष से प्राप्त संप्रभुता को बचाए रखना |
| 2 | क्षेत्रीय अखंडता को बनाए रखना |
| 3 | तेज़ रफ़्तार से आर्थिक विकास करना |
और साधन क्या था?
पृ. 57
- ★★“नेहरू इन उद्देश्यों को गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाकर हासिल करना चाहते थे।”
- नेहरू प्रधानमंत्री के साथ-साथ विदेश मंत्री भी थे — 1946 से 1964 तक।
- इसीलिए “विदेश नीति को तैयार करने के मामले में नेहरू को खासी बढ़त हासिल थी।”
पर यह नीति सर्वसम्मत नहीं थीध्यान
पृ. 57 — इसे उत्तर में ज़रूर लिखिए
- कुछ पार्टियों और समूहों का मानना था कि भारत को अमरीकी खेमे के साथ नजदीकी बढ़ानी चाहिए — “क्योंकि इस खेमे की प्रतिष्ठा लोकतंत्र के हिमायती के रूप में थी।”
- ★★“इस धारा पर सोचने वालों में डा. भीमराव अंबेडकर भी शामिल थे।”
- साम्यवाद-विरोधी दलों में भारतीय जनसंघ और स्वतंत्र पार्टी प्रमुख थे।
दो खेमों से दूरी
पृ. 57
- भारत ने “शीतयुद्ध से उपजे तनाव को कम करने की कोशिश की” और “संयुक्त राष्ट्र संघ के शांति-अभियानों में अपनी सेना भेजी।”
- अमरीका ने NATO बनाया; सोवियत संघ ने जवाब में ‘वारसा पैक्ट’।
- भारत दोनों सैन्य गठबंधनों से दूर रहना चाहता था।
- ! “संतुलन साधने की यह कठिन कोशिश थी और कभी-कभी संतुलन बहुत कुछ नहीं भी सध पाता था।”
1956 — अध्याय का सबसे ईमानदार क्षण
| घटना | भारत का रुख |
|---|---|
| ब्रिटेन का मिस्र पर हमला (स्वेज) | ✓ भारत ने विश्वव्यापी विरोध की अगुवाई की |
| सोवियत संघ का हंगरी पर हमला | ! भारत ने सार्वजनिक निंदा नहीं की |
फिर भी पाठ का निष्कर्ष संतुलित है
पृ. 57
- “ऐसी स्थिति के बावजूद, कमोबेश भारत ने अंतर्राष्ट्रीय मामलों पर स्वतंत्र रवैया अपनाया।”
- ★★“उसे दोनों खेमों के देशों ने सहायता और अनुदान दिए।”
- ✓ यही प्रश्न 1(क) का उत्तर है — कथन ‘सही’ है।
अमरीका से खटास क्योंध्यान
पृ. 57
- “पाकिस्तान अमरीकी नेतृत्व वाले सैन्य-गठबंधन में शामिल हो गया।”
- ! “इस वजह से 1950 के दशक में भारत-अमरीकी संबंधों में खटास पैदा हो गई।”
- “अमरीका, सोवियत संघ से भारत की बढ़ती हुई दोस्ती को लेकर भी नाराज था।”
- ✓ प्रश्न 1(ग) — “शीतयुद्ध का असर भारत-पाक संबंधों पर भी पड़ा” — ‘सही’।
गुटनिरपेक्षता का सूत्र — आज़ादी से सात महीने पहले
हमें दोनों के साथ दोस्ताना संबंध रखना है साथ ही उनके खेमे में शामिल भी नहीं होना है… इस कारण हमारा रास्ता कठिन है… इससे बचा नहीं जा सकता।
जवाहरलाल नेहरू — के.पी.एस. मेनन को पत्र, जनवरी 1947
4 | एफ्रो-एशियाई एकता | बांडुंग से बेलग्रेड तक
नेहरू का स्वप्न
पृ. 58
- “भारत के आकार, अवस्थिति और शक्ति-संभावना को भाँपकर” नेहरू ने एशियाई मामलों में भारत के लिए बड़ी भूमिका देखी।
- 1940 और 1950 के दशकों में वे “बड़े मुखर स्वर में एशियाई एकता की पैरोकारी करते रहे।”
- ★भारत अनौपनिवेशीकरण का प्रबल समर्थक था और उसने दक्षिण अफ्रीका के रंगभेद का दृढ़ विरोध किया।
एफ्रो-एशियाई एकता का कालक्रम
- 1947★मार्च — एशियाई संबंध सम्मेलन; “जबकि अभी भारत को आज़ादी मिलने में पाँच महीने शेष थे”
- 1949इंडोनेशिया के स्वतंत्रता-संग्राम के समर्थन में अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन
- 1955★★बांडुंग (इंडोनेशिया) में एफ्रो-एशियाई सम्मेलन — गुटनिरपेक्ष आंदोलन की नींव यहीं पड़ी
- 1961★★सितंबर — गुटनिरपेक्ष आंदोलन का पहला सम्मेलन, बेलग्रेड
यह अंतर परीक्षा में गिराता हैध्यान
याद रखने की तरकीब
- बांडुंग 1955 = नींव।
- बेलग्रेड 1961 = पहला सम्मेलन।
- ★“अफ्रीका और एशिया के नव-स्वतंत्र देशों के साथ भारत के बढ़ते संपर्क का यह चरम बिंदु था” — यह बांडुंग के बारे में कहा गया है।
नैतिक ताकत
ताकत के तीनों साधनों — संपदा, धन और जन — से हीन एक देश अब बड़ी तेजी से सभ्य जगत में एक नैतिक ताकत के रूप में पहचान हासिल कर रहा है।
सी. राजगोपालाचारी — एडविना माउंटबेटन को पत्र, 1950
5 | चीन | दोस्ती, तिब्बत और 1962
दोस्ती का दौर
पृ. 58
- “पाकिस्तान के साथ अपने संबंधों के विपरीत आज़ाद भारत ने चीन के साथ अपने रिश्तों की शुरुआत बड़े दोस्ताना ढंग से की।”
- चीनी क्रांति 1949 में हुई; भारत चीन की कम्युनिस्ट सरकार को मान्यता देने वाले पहले देशों में एक था।
- ★नेहरू ने “अंतर्राष्ट्रीय फ़लक पर इस सरकार की मदद की।”
- ★★29 अप्रैल 1954 — पंचशील: नेहरू और चाऊ एन लाई ने शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के पाँच सिद्धांतों की घोषणा की।
वह चेतावनी जो अनसुनी रह गईध्यान★
पृ. 58 — इसे रेखांकित कीजिए
- “नेहरू के कुछ सहयोगियों — मसलन सरदार वल्लभ भाई पटेल — को आशंका थी कि आगामी दिनों में चीन भारत पर चढ़ाई कर सकता है।”
- ! “लेकिन नेहरू सोच रहे थे कि भारत पर चीन के आक्रमण की संभावना दूर-दूर तक नहीं है।”
- !! “बहुत दिनों से भारत की चीन से लगती सीमा पर सेना के बजाय अर्द्ध-सैनिक बल रखवाली कर रहे थे।”
मध्यवर्ती राज्य
चीन ने तिब्बत पर कब्ज़ा किया — “भारत और चीन के बीच ऐतिहासिक रूप से जो एक मध्यवर्ती राज्य बना चला आ रहा था, वह खत्म हो गया।”
एक वाक्य में समझिए
कक्षा में यही कहिए
- 1950 तक भारत और चीन के बीच तिब्बत था।
- ★1950 के बाद दोनों आमने-सामने आ गए।
- ! और जहाँ दो देश आमने-सामने आते हैं, वहाँ सीमा तय करनी पड़ती है — सीमा तय नहीं थी।
तिब्बत — बॉक्स का कालक्रम
- 1950चीन ने तिब्बत पर नियंत्रण किया; ज्यादातर तिब्बतियों ने कब्जे का विरोध किया
- 1954! पंचशील समझौता — चीन ने अर्थ लगाया कि भारत तिब्बत पर उसकी दावेदारी स्वीकार कर रहा है
- 1956चाऊ एन लाई का दौरा; दलाई लामा ने नेहरू को बिगड़ती स्थिति बताई
- 1958! तिब्बत में सशस्त्र विद्रोह — चीनी सेनाओं ने दबा दिया
- 1959★★दलाई लामा भारत आए और शरण माँगी; भारत ने शरण दी — चीन ने कड़ा विरोध किया
तिब्बत — आज की स्थिति
पृ. 59
- भारत में तिब्बती शरणार्थियों की बड़ी बस्तियाँ हैं; ★धर्मशाला (हिमाचल प्रदेश) में संभवतः सबसे बड़ी।
- दलाई लामा ने भी धर्मशाला को अपना निवास-स्थान बनाया है।
- 1950-60 के दशक में सोशलिस्ट पार्टी और जनसंघ ने तिब्बत की आज़ादी का समर्थन जताया।
- ! चीन ने ‘स्वायत्त तिब्बत क्षेत्र’ बनाया और उसे अपना अभिन्न अंग मानता है; तिब्बती यह दावा नहीं मानते।
सीमा-विवाद — दो छोर
| छोर | क्षेत्र | तथ्य |
|---|---|---|
| पश्चिमी | अक्साई-चीन (लद्दाख) | ! 1957–59 में चीन ने कब्ज़ा किया और रणनीतिक सड़क बनाई |
| पूर्वी | अरुणाचल प्रदेश | तब इसे ‘नेफा’ या उत्तर-पूर्वी सीमांत कहा जाता था |
दोनों के तर्क
पृ. 62
- भारत — “चीन के साथ सीमा-रेखा का मामला अंग्रेजी-शासन के समय ही सुलझाया जा चुका है।”
- चीन — “अंग्रेजी शासन के समय का फ़ैसला नहीं माना जा सकता।”
- ! “लंबी-लंबी चर्चाएँ और बातचीत चली लेकिन मतभेद को सुलझाया नहीं जा सका।” सीमा पर कई बार झड़प हुई।
अक्तूबर 1962 — और समय देखिए★★
पृ. 62
- “जिस समय पूरे विश्व का ध्यान… क्यूबा मिसाइल संकट की तरफ लगा हुआ था, ठीक उसी समय चीन ने 1962 के अक्तूबर में दोनों विवादित क्षेत्रों पर बड़ी तेज़ी तथा व्यापक स्तर पर हमला किया।”
- ★पहला हमला एक हफ्ते चला — अरुणाचल के कुछ महत्त्वपूर्ण इलाकों पर कब्ज़ा।
- अगला दौर नवंबर में।
युद्ध का क्रम और अंत
पृ. 62
- ✓ “लद्दाख से लगे पश्चिमी मोर्चे पर भारतीय सेना ने चीन की बढ़त रोकी।”
- ! “पूर्व में चीनी सेना आगे बढ़ते हुए असम के मैदानी हिस्से के प्रवेशद्वार तक पहुँच गई।”
- ★“आखिरकार, चीन ने एकतरफा युद्धविराम घोषित किया और चीन की सेनाएँ उस मुकाम पर लौट गईं जहाँ वे हमले से पहले तैनात थीं।”
1962 के छह परिणाम
| # | परिणाम |
|---|---|
| 1 | ! “भारत की छवि को देश और विदेश दोनों ही जगह धक्का लगा” |
| 2 | ! अमरीका और ब्रिटेन से सैन्य मदद माँगनी पड़ी; सोवियत संघ तटस्थ रहा |
| 3 | ★“राष्ट्रीय स्वाभिमान को चोट पहुँची” — पर “राष्ट्र-भावना भी बलवती हुई” |
| 4 | कुछ सैन्य-कमांडरों ने इस्तीफा दिया; रक्षामंत्री कृष्णमेनन को मंत्रिमंडल छोड़ना पड़ा |
| 5 | ! नेहरू की छवि धूमिल — “चीन के इरादों को समय रहते न भाँप सकने” की आलोचना |
| 6 | ★★“पहली बार, उनकी सरकार के खिलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया”; उप-चुनावों में कांग्रेस हारी |
देश का राजनीतिक मानस
★★“देश का राजनीतिक मानस बदलने लगा था।” — यही वाक्य अगले अध्याय की भूमिका है।
वी.के. कृष्णमेनन (1897–1974)
पृ. 61
- राजनयिक एवं मंत्री; 1934–1947 इंग्लैंड की लेबर पार्टी में सक्रिय।
- इंग्लैंड में भारतीय उच्चायुक्त; बाद में संयुक्त राष्ट्र में भारतीय प्रतिनिधिमंडल के मुखिया।
- 1956 से केबिनेट सदस्य; ★1957 से रक्षा मंत्री।
- !★1962 में भारत-चीन युद्ध के बाद इस्तीफा।
कार्टून — आर.के. लक्ष्मण
पृ. 61
- ‘CHINESE INCURSION’ नाम का रोड-रोलर ‘HISTORICAL EVIDENCE UNDER CONSTRUCTION’ लिखी सड़क बना रहा है।
- ★★अर्थ: चीन ‘ऐतिहासिक प्रमाण’ का दावा करता है, पर वह प्रमाण ज़मीन पर सेना भेजकर स्वयं ‘बना’ रहा है।
- साथ में अमूल का कार्टून — “Hindi Chini Bye Bye?”
6 | 1962 के बाद | एक युद्ध ने घरेलू राजनीति कैसे बदली
भाकपा का विभाजन
पृ. 63
- युद्ध और चीन-सोवियत मतभेद से “भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के अंदर बड़ी उठा-पटक मची।”
- सोवियत-पक्षधर खेमा भाकपा में रहा और कांग्रेस से नजदीकी बढ़ाई।
- दूसरा खेमा कुछ समय चीन का पक्षधर रहा और कांग्रेस से किसी नजदीकी के खिलाफ़ था।
- ★★“भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी 1964 में टूट गई” — चीन-पक्षधर खेमे ने माकपा (CPI-M) बनाई।
- ! माकपा के कई नेताओं को “चीन का पक्ष लेने के आरोप में गिरफ्तार किया गया।”
पूर्वोत्तर पर असर
पृ. 63
- युद्ध ने नेताओं को “पूर्वोत्तर की डावाँडोल स्थिति के प्रति सचेत किया।”
- यह इलाका “अत्यंत पिछड़ी दशा में था और अलग-थलग पड़ गया था।”
- ★नगालैंड को प्रांत का दर्जा दिया गया।
- ★मणिपुर और त्रिपुरा केंद्र-शासित थे, पर उन्हें विधानसभा के निर्वाचन का अधिकार मिला।
1962 के बाद भारत-चीन संबंध
- 1972“संबंधों को सामान्य होने में करीब दस साल लग गए”
- 1976★दोनों देशों के बीच पूर्ण राजनयिक संबंध बहाल
- 1979अटल बिहारी वाजपेयी (तब विदेश मंत्री) चीन के दौरे पर — शीर्ष नेता के तौर पर पहली बार
- बादराजीव गाँधी बतौर प्रधानमंत्री चीन गए; इसके बाद ज़ोर व्यापारिक मसलों पर
फ़िल्म — ‘हकीकत’ (1964)
सिने-संसार, पृ. 63
- निर्देशक: चेतन आनंद। अभिनय: धर्मेंद्र, प्रिया राजवंश, बलराज साहनी, जयंत, सुधीर, संजय खान, विजय आनंद।
- 1962 के चीनी आक्रमण की पृष्ठभूमि; लद्दाख में घिरी एक टुकड़ी; कप्तान बहादुर सिंह और कम्मो शहीद।
- ★“चीनी विश्वासघात से उपजी राजनीतिक निराशा का भी मुआयना कराती है।”
7 | पाकिस्तान | 1947, 1965 और 1971
कश्मीर — शुरुआत
पृ. 64
- “जम्मू-कश्मीर मसले को लेकर पाकिस्तान के साथ बँटवारे के तुरंत बाद ही संघर्ष छिड़ गया था।”
- 1947 में ही “एक छाया-युद्ध छिड़ गया था”; यह “पूर्णव्यापी युद्ध का रूप न ले सका।”
- मसला संयुक्त राष्ट्र संघ के हवाले कर दिया गया।
- ★“अमरीका और चीन के साथ भारत के संबंधों के लिहाज़ से पाकिस्तान एक महत्त्वपूर्ण घटक रहा।”
पर सहयोग भी हुआ — यह अक्सर छूट जाता है★
पृ. 64
- दोनों सरकारों ने मिलकर प्रयास किया कि बँटवारे में अपहृत महिलाएँ अपने परिवारों को लौटाई जा सकें।
- ★★1960 — सिंधु नदी जल संधि, विश्व बैंक की मध्यस्थता से; हस्ताक्षर: नेहरू और जनरल अयूब खान।
- ★“भारत-पाक संबंधों में नरमी-गरमी के बावजूद इस संधि पर ठीक-ठाक अमल होता रहा।”
- ✓ प्रश्न 1(ख) का उत्तर ‘गलत’ — इसी का प्रमाण।
1965 का युद्ध
- अप्रैलपाकिस्तान ने गुजरात के कच्छ इलाके के रन में सैनिक हमला बोला
- अग-सितजम्मू-कश्मीर में बड़े पैमाने पर हमला; ★पर कश्मीर की जनता ने समर्थन नहीं दिया
- जवाब★★शास्त्री ने पंजाब की सीमा से जवाबी हमले का आदेश दिया; सेना लाहौर के नज़दीक तक पहुँची
- 1966★संयुक्त राष्ट्र के हस्तक्षेप से अंत; ताशकंद-समझौता — शास्त्री और अयूब खान, सोवियत मध्यस्थता
जीत की कीमतध्यान
पृ. 64
- “1965 की लड़ाई में भारत ने पाकिस्तान को बहुत ज्यादा सैन्य क्षति पहुँचाई…”
- ! ”…लेकिन इस युद्ध से भारत की कठिन आर्थिक स्थिति पर और ज्यादा बोझ पड़ा।”
- ★1965 के दो डाक टिकट: ‘जय जवान’ और ‘जय किसान’ — सीमा और खेत, दोनों मोर्चे।
1971 — पृष्ठभूमि
पृ. 64
- 1970 में पाकिस्तान के पहले आम चुनाव में खंडित जनादेश आया।
- भुट्टो की पार्टी पश्चिमी पाकिस्तान में; मुजीबुर्रहमान की अवामी लीग पूर्वी पाकिस्तान में विजयी।
- ★कारण: “पश्चिमी पाकिस्तान के नेताओं के हाथों अपने साथ हुए दोयम दर्जे के नागरिक के बरताव के विरोध में” बंगाली जनता ने वोट दिया।
- ! “पाकिस्तान के शासक इस जनादेश को स्वीकार नहीं कर पा रहे थे।”
दमन और शरणार्थी
पृ. 66
- 1971 में पाकिस्तानी सेना ने शेख मुजीब को गिरफ्तार किया और पूर्वी पाकिस्तान के लोगों पर जुल्म ढाने शुरू किए।
- ★★“1971 में पूरे साल भारत को 80 लाख शरणार्थियों का बोझ वहन करना पड़ा।”
- भारत ने ‘मुक्ति संग्राम’ को नैतिक समर्थन और भौतिक सहायता दी।
अंतर्राष्ट्रीय समीकरण — अध्याय का सबसे महत्वपूर्ण अनुच्छेद★★
पृ. 66
- “पाकिस्तान को अमरीका और चीन ने मदद की।”
- 1960 के दशक में अमरीका-चीन संबंध सामान्य हो रहे थे; एशिया का सत्ता-समीकरण नया रूप ले रहा था।
- ★जुलाई 1971 — निक्सन के सलाहकार हेनरी किसिंजर ने पाकिस्तान होते हुए गुपचुप चीन का दौरा किया।
- ★★“अमरीका-पाकिस्तान-चीन की धुरी बनती देख” भारत ने सोवियत संघ के साथ 20-वर्षीय शांति और मित्रता संधि की।
✓ इसलिए प्रश्न 1(घ) का उत्तर ‘गलत’ है
यह ध्यान से समझिए
- कथन: “1971 की शांति और मैत्री की संधि संयुक्त राज्य अमरीका से भारत की निकटता का परिणाम थी।”
- ! यह ठीक उल्टा है — वह संधि अमरीका-चीन-पाकिस्तान की धुरी के जवाब में हुई।
- ★“संधि से भारत को इस बात का आश्वासन मिला कि हमला होने की सूरत में सोवियत संघ भारत की मदद करेगा।”
दिसंबर 1971
- आरंभपाकिस्तानी विमानों ने पंजाब और राजस्थान पर हमले किए; सेना ने जम्मू-कश्मीर में मोर्चा खोला
- जवाबभारत ने वायुसेना, नौसेना और थलसेना के बूते पश्चिमी और पूर्वी दोनों मोर्चों पर कार्रवाई की
- 10 दिन★★भारतीय सेना ने ढाका को तीन तरफ से घेरा; 90,000 सैनिकों के साथ पाकिस्तानी सेना का आत्म-समर्पण
- 1972★★3 जुलाई — इंदिरा गाँधी और भुट्टो के बीच शिमला-समझौता; “इससे अमन की बहाली हुई”
आत्म-समर्पण का दस्तावेज़
पृ. 67
- ★“signed at Dacca on 16 Dec 1971 at 1631 hours (IST)”
- हस्ताक्षर: लेफ्टिनेंट-जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा और लेफ्टिनेंट-जनरल अमीर अब्दुल्ला खान नियाज़ी।
- दस्तावेज़ में आत्म-समर्पण करने वालों को जिनेवा कन्वेंशन के अनुसार सम्मान, और अल्पसंख्यकों तथा विदेशी नागरिकों की सुरक्षा की गारंटी।
- अख़बार का शीर्षक: “YAHYA YIELDS TO INDIRA, ENDS WAR”
करगिल संघर्ष, 1999
‘कुछ आगे की…’, पृ. 66
- द्रास, माश्कोह, काकसर और बतालिक पर “अपने को मुजाहिद्दीन बताने वालों” ने कब्जा किया।
- “पाकिस्तानी सेना की इसमें मिलीभगत भाँप कर भारतीय सेना हरकत में आयी।”
- ★“26 जुलाई 1999 तक भारत अपने अधिकतर ठिकानों पर पुनः अधिकार कर चुका था।”
- ★★विश्व का ध्यान इसलिए, क्योंकि “ठीक एक साल पहले दोनों देश परमाणु हथियार बनाने की क्षमता का प्रदर्शन कर चुके थे।”
- ! लड़ाई के तुरंत बाद जनरल परवेज मुशर्रफ की अगुवाई में पाकिस्तानी सेना ने हुकूमत पर नियंत्रण ले लिया।
8 | युद्धों का घरेलू असर | 1962 और 1971 का विरोधाभास
एक ही अध्याय, दो उलटे परिणाम
| पहलू | 1962 — हार | 1971 — जीत |
|---|---|---|
| नेतृत्व | नेहरू की छवि धूमिल | इंदिरा गाँधी की लोकप्रियता चरम पर |
| संसद | ! पहली बार अविश्वास प्रस्ताव | — |
| चुनाव | ! उप-चुनावों में कांग्रेस की हार | ✓ अनेक राज्यों में कांग्रेस की भारी जीत |
| दल | ! भाकपा का विभाजन (1964) | — |
अध्याय का दूसरा दावा सिद्ध
★★“देश की राजनीति स्वयं भी इस क्रम में प्रभावित हुई।” — 1962 और 1971, दोनों इसका प्रमाण हैं।
युद्धों की आर्थिक कीमत
पृ. 68 — अध्याय 3 से कड़ी
- “पड़ोसी देशों के साथ संघर्ष के कारण पंचवर्षीय योजना पटरी से उतर गई।”
- 1962 के बाद सीमित संसाधन “खासतौर से रक्षा क्षेत्र में लगाने पड़े।”
- ★1962 — रक्षा-उत्पाद विभाग; 1965 — रक्षा आपूर्ति विभाग की स्थापना।
- ! तीसरी योजना (1961–66) पर असर; तीन एक-वर्षीय योजनाएँ; चौथी योजना 1969 में ही शुरू हो सकी।
9 | भारत की परमाणु नीति | भेदभाव का विरोध
नेहरू और परमाणु कार्यक्रम
पृ. 68
- “नेहरू की औद्योगीकरण की नीति का एक महत्त्वपूर्ण घटक परमाणु कार्यक्रम था।”
- ★★“इसकी शुरुआत 1940 के दशक के अंतिम सालों में होमी जहाँगीर भाभा के निर्देशन में हो चुकी थी।”
- “भारत शांतिपूर्ण उद्देश्यों में इस्तेमाल के लिए अणु ऊर्जा बनाना चाहता था।”
- ★“नेहरू परमाणु हथियारों के खिलाफ़ थे” — उन्होंने महाशक्तियों पर व्यापक निशस्त्रीकरण के लिए ज़ोर दिया।
परमाणु नीति की तर्क-श्रृंखला
- 1964★अक्तूबर — चीन ने परमाणु परीक्षण किया
- 1968! परमाणु अप्रसार संधि (NPT) — भारत ने इसे “भेदभावपूर्ण” माना और दस्तखत से इनकार किया
- 1974★★मई — भारत का पहला परमाणु परीक्षण; भारत ने इसे “शांतिपूर्ण परीक्षण करार दिया”
- 1995! NPT का अनिश्चितकालीन विस्तार — भारत ने विरोध किया और CTBT से भी इनकार किया
- 1998★★मई — भारत के परीक्षण; तुरंत बाद पाकिस्तान के परीक्षण
भारत का तर्क क्या था
‘कुछ आगे की…’, पृ. 69
- “ये संधियाँ उन्हीं देशों पर लागू होने को थीं जो परमाणु शक्ति से हीन थे।”
- ★★“इन संधियों के द्वारा परमाणु हथियारों से लैस देशों की जमात के परमाणु शक्ति पर एकाधिकार को वैधता दी जा रही थी।”
- ध्यान दीजिए — वे पाँच देश सुरक्षा परिषद् के स्थायी सदस्य भी थे।
भारत की परमाणु नीति के दो स्तंभ
| # | स्तंभ |
|---|---|
| 1 | भारत रक्षा के लिए परमाणु हथियार रखेगा, पर इनका ★★“प्रयोग पहले नहीं” करेगा |
| 2 | भारत ★“वैश्विक स्तर पर लागू और भेदभाव-हीन परमाणु निशस्त्रीकरण” के प्रति वचनबद्ध है |
1974 का घरेलू संदर्भध्यान
पृ. 68
- 1973 में अरब-इजरायल युद्ध हुआ; उसके बाद “पूरे विश्व में तेल के लिए हाहाकार मचा हुआ था।”
- अरब राष्ट्रों ने तेल के दामों में भारी वृद्धि कर दी; भारत आर्थिक समस्याओं से घिर गया।
- ! “भारत में मुद्रास्फीति बहुत ज्यादा बढ़ गई।”
- “इस वक्त देश में कई आंदोलन चल रहे थे और इसी समय देशव्यापी रेल-हड़ताल भी हुई थी।”
10 | सर्व-सहमति और बदलते समीकरण | प्रश्न 6(ख) की तैयारी
विदेश नीति पर सर्व-सहमति
पृ. 69
- “राजनीतिक दलों के बीच विदेश नीति के बारे में छोटे-मोटे मतभेद जरूर हैं…”
- ★★”…लेकिन राष्ट्रीय अखंडता, अंतर्राष्ट्रीय सीमा रेखा की सुरक्षा तथा राष्ट्रीय हित के मसलों पर व्यापक सहमति है।”
- इसीलिए तीन युद्धों के दौरान और उसके बाद भी “विदेश नीति की भूमिका पार्टी की राजनीति में बड़ी सीमित रही।”
1977 के बाद क्या बदला
‘विश्व राजनीति के बदलते समीकरण’, पृ. 69
- ★1977 में जनता पार्टी की सरकार ने घोषणा की कि “सच्ची गुटनिरपेक्ष नीति का पालन किया जाएगा।”
- आशय: “विदेश नीति में सोवियत संघ के प्रति आए झुकाव को खत्म किया जाएगा।”
- इसके बाद की सभी सरकारों ने चीन के साथ बेहतर और अमरीका के साथ नजदीकी रिश्तों की पहल की।
क्यों बदला — दो कारण
पृ. 69
- ★“रूस लगातार भारत का एक महत्त्वपूर्ण मित्र बना हुआ है लेकिन 1990 के बाद से रूस का अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व कम हुआ है।”
- ★★“मौजूदा अंतर्राष्ट्रीय परिवेश में सैन्य-हितों के बजाय आर्थिक-हितों का जोर ज्यादा है।”
- और सूत्र-वाक्य: “विदेश नीति हमेशा राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर बनाई जाती है।”
- ! “1990 के बाद के दौर में अमरीका-समर्थक विदेश नीति अपनाने के लिए शासक दलों की आलोचना हुई है।”
भारत-पाक — प्रयास और झटका
पृ. 69
- “कश्मीर दोनों देशों के बीच मुख्य मसले के तौर पर कायम है।”
- पर सांस्कृतिक आदान-प्रदान, नागरिकों की आवाजाही और आर्थिक सहयोग को बढ़ावा दिया गया।
- ★रेल और बस सेवा की शुरुआत — “यह हाल के समय की सबसे बड़ी उपलब्धि है।”
- ! “इन सारे प्रयासों के बावजूद 1999 में… युद्ध की स्थिति पैदा हो गई थी।”
11 | प्रश्नावली की कुंजी | दस मिनट में पूरी तैयारी
प्रश्न 1 — सही या गलत
| कथन | उत्तर | कारण |
|---|---|---|
| (क) दोनों की सहायता मिली | ✓ सही | “दोनों खेमों के देशों ने सहायता और अनुदान दिए” |
| (ख) पड़ोसियों से संबंध शुरू से तनावपूर्ण | ❌ गलत | चीन से पंचशील; पाक से सिंधु जल संधि 1960 |
| (ग) शीतयुद्ध का असर भारत-पाक पर | ✓ सही | पाकिस्तान अमरीकी सैन्य-गठबंधन में शामिल हुआ |
| (घ) 1971 की संधि अमरीका से निकटता का परिणाम | ❌ गलत | वह अमरीका-चीन-पाक धुरी के जवाब में थी |
प्रश्न 2 — जोड़ा मिलाइए
| पद | मेल |
|---|---|
| (क) 1950-64 की विदेश नीति का लक्ष्य | (ii) क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता की रक्षा तथा आर्थिक विकास |
| (ख) पंचशील | (iii) शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के पाँच सिद्धांत |
| (ग) बांडुंग सम्मेलन | (iv) इसकी परिणति गुटनिरपेक्ष आंदोलन में हुई |
| (घ) दलाई लामा | (i) तिब्बत के धार्मिक नेता जो सीमा पार करके भारत चले आए |
दो कारण + उदाहरण
- कारण 1 — संप्रभुता की कसौटी: “एक बार विदेश संबंध आपके हाथ से निकलकर दूसरे के हाथ में चले जाएँ… वहाँ तक आप आज़ाद नहीं रहते।”
- उदाहरण: ★मार्च 1947 में एशियाई संबंध सम्मेलन — आज़ादी से पाँच महीने पहले ही स्वतंत्र विदेश-पहल।
- कारण 2 — राष्ट्रीय हित का स्वतंत्र निर्धारण: किसी सैन्य गुट में न जाना, ताकि निर्णय अपने हों।
- उदाहरण: ★1956 में स्वेज पर ब्रिटेन का विरोध — भारत ने अपने पूर्व शासक के विरुद्ध रुख लिया।
प्रश्न 4 — दोहरा दबाव, एक उदाहरण
1960 का दशक
- ★★1971 की भारत-सोवियत संधि सर्वोत्तम उदाहरण है।
- अंतर्राष्ट्रीय दबाव: किसिंजर का दौरा और अमरीका-चीन-पाकिस्तान की बनती धुरी।
- घरेलू ज़रूरत: 80 लाख शरणार्थियों का बोझ और पूर्वी पाकिस्तान का संकट।
- ★दूसरा उदाहरण: 1962 के बाद अमरीका-ब्रिटेन से सैन्य मदद माँगनी पड़ी — गुटनिरपेक्षता के बावजूद।
प्रश्न 7 — तीन युद्ध: असफलता या परिस्थिति?
दोनों पक्ष लिखिए, फिर संतुलित निष्कर्ष
- असफलता का पक्ष: ! 1962 में “चीन के इरादों को समय रहते न भाँप सकने और सैन्य तैयारी न कर पाने” की आलोचना; पटेल की चेतावनी अनसुनी रही।
- परिस्थिति का पक्ष: ★शीतयुद्ध; पाकिस्तान का अमरीकी गठबंधन में जाना; क्यूबा संकट के समय चीन का हमला; अमरीका-चीन की नई धुरी।
- ★★संतुलित निष्कर्ष: युद्ध विदेश नीति की पूरी विफलता नहीं थे — पर 1962 की तैयारी में चूक अवश्य थी।
प्रश्न 10 — अवतरण-आधारित
तीनों उपप्रश्नों की दिशा
- (क) क्यों दूरी: तीन उद्देश्य — संप्रभुता, अखंडता, विकास; और “चीजों को यथासंभव सैन्य दृष्टिकोण से न देखना।”
- (ख) क्या उल्लंघन हुआ: ★यह संधि सैन्य गठबंधन नहीं थी; वह अमरीका-चीन-पाक धुरी की प्रतिक्रिया थी; भारत NATO या वारसा में कभी शामिल नहीं हुआ।
- (ग) अगर गुट न होते: ★★गुटनिरपेक्षता केवल ‘गुट में न जाना’ नहीं है — वह “स्वतंत्र रूप से स्थिति पर विचार करना” है; इसलिए वह तब भी अर्थपूर्ण रहती।
12 | पुनरावृत्ति | बारह तिथियाँ, एक कहानी
पूरा अध्याय एक नज़र में
- 1954★29 अप्रैल — पंचशील (नेहरू और चाऊ एन लाई)
- 1955★★बांडुंग सम्मेलन — गुटनिरपेक्ष आंदोलन की नींव
- 1956स्वेज पर विरोध; हंगरी पर चुप्पी
- 1959★दलाई लामा को भारत में शरण
- 1960सिंधु नदी जल संधि (नेहरू–अयूब खान)
- 1961★★सितंबर — बेलग्रेड में NAM का पहला सम्मेलन
- 1962★★चीन का आक्रमण; कृष्णमेनन का इस्तीफा; पहला अविश्वास प्रस्ताव
- 1964चीन का परमाणु परीक्षण; भाकपा का विभाजन → माकपा
- 1965★भारत-पाक युद्ध; 1966 में ताशकंद-समझौता
- 1971★★भारत-सोवियत संधि; 16 दिसंबर — ढाका में आत्म-समर्पण; बांग्लादेश
- 1974★★मई — भारत का पहला परमाणु परीक्षण
- 1998★मई — परमाणु परीक्षण; 1999 — करगिल संघर्ष
अंतिम बात
★★विदेश नीति देश की राजनीति से बनती है — और देश की राजनीति को बदल भी देती है। 1962 और 1971 इसके दो प्रमाण हैं।