अध्याय 10 — विद्रोही और राज | कक्षा XII इतिहास | भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग-3
कक्षा — 12 · विषय — इतिहास (भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग-3)
रमज़ान की एक भोर — 11 मई 1857
- बूढ़े बादशाह ने अभी सहरी खाई है
- लाल क़िले के फाटक पर हो-हल्ला है
- नीचे मेरठ से आए घुड़सवार सिपाही चिल्ला रहे हैं —
- “हम मेरठ के सभी अंग्रेज़ पुरुषों को मारकर आए हैं… गाय और सुअर की चर्बी में लिपटे कारतूस… हिंदू और मुसलमान, सबका धर्म भ्रष्ट हो जाएगा”
बहादुर शाह के पास मानने के अलावा कोई चारा न था — और विद्रोह को मिल गई वैधता: अब वह मुग़ल बादशाह के नाम पर चल सकता था
10 मई 1857 — मेरठ
प्रस्तावना — विद्रोह के पहले घंटे
- दोपहर बाद मेरठ छावनी — शुरुआत पैदल सेना से → घुड़सवार → शहर
- शहर और देहात के लोग सिपाहियों के साथ
- शस्त्रागार पर क़ब्ज़ा; गोरों के बंगले तहस-नहस
- रिकॉर्ड दफ़्तर, जेल, अदालत, डाकखाना, खजाना — लूटकर तबाह
- दिल्ली से जोड़ने वाली टेलीग्राफ़ लाइन काट दी गई
- अँधेरा पसरते ही जत्था घोड़ों पर दिल्ली रवाना
12-13 मई शांति — फिर दिल्ली-क़ब्ज़े और बादशाह-समर्थन की ख़बर फैली, और छावनियाँ धधक उठीं
1 | विद्रोह का ढर्रा | क्रम; संचार; नेता; अफ़वाहें
हर छावनी में एक-जैसा क्रम
§1.1
- कार्रवाई का संकेत — शाम की तोप का गोला या बिगुल
- पहले शस्त्रागार + सरकारी ख़ज़ाना
- फिर — जेल, टेलीग्राफ़ दफ़्तर, रिकॉर्ड रूम, बंगले; ★“सारे रिकॉर्ड जलाते चले गए”
- गोरों से संबंधित हर चीज़ और हर शख़्स निशाना
- हिंदी, उर्दू, फ़ारसी में अपीलें — एकजुट होकर फ़िरंगियों का सफाया
- शहरों में साहूकार-अमीर भी निशाना — “उत्पीड़क + अंग्रेज़ों का पिट्ठू”
मई-जून में अंग्रेज़ों के पास कोई जवाब नहीं — ब्रिटिश शासन “ताश के क़िले की तरह बिखर गया”
संचार के माध्यम — योजना के सुराग़
§1.2
- 7वीं अवध इर्रेग्युलर कैवेलरी ने कारतूस ठुकराकर 48वीं नेटिव इन्फेंट्री को लिखा — “हमने अपने धर्म की रक्षा के लिए यह फ़ैसला लिया है…”
- सिस्टन-प्रकरण — बिजनौर का तहसीलदार: “भरोसा रखो, इस बार हम कामयाब होंगे। मामला काबिल हाथों में है।” — वही निकला बिजनौर का सबसे बड़ा विद्रोही-नेता
- हियर्से-प्रकरण → हर रेजीमेंट के देशी अफ़सरों की पंचायत
- चार्ल्स बॉल — पंचायतें रात को कानपुर सिपाही लाइनों में जुटती थीं
★“ये सिपाही अपने विद्रोह के कर्ताधर्ता खुद ही थे”
नेता — वैधता पुरानी, पहल नयी
| स्थान | नेता | कैसे |
|---|---|---|
| दिल्ली | बहादुर शाह | दरख़्वास्त + दबाव; “नाममात्र का नेता” |
| कानपुर | नाना साहिब (पेशवा-उत्तराधिकारी) | “विकल्प ही नहीं छोड़ा” |
| झाँसी | रानी लक्ष्मीबाई | आम जनता के दबाव में |
| आरा | कुँवर सिंह (ज़मींदार) | स्थानीय नेतृत्व |
| लखनऊ | बिरजिस क़द्र (नवाब का बेटा) | नेता घोषित |
दरबार के बाहर भी — हाथी पर फ़क़ीर (मेरठ), धार्मिक प्रचारक (लखनऊ), शाह मल (बड़ौत), गोनू (सिंहभूम के कोल)
दो ‘साधारण’ विद्रोही
स्रोत 3 — ज़मीनी नेतृत्व
- शाह मल (जाट, चौरासी देस): रात के साए में गाँव-गाँव संगठन; महाजनों के घर लूटे, बेदख़ल भूस्वामियों का पुनर्कब्ज़ा; ★पुल ध्वस्त, सड़कें खोदीं — फ़ौज-रोक + “ब्रिटिश शासन का प्रतीक”; अंग्रेज़ बंगला बना “न्याय भवन”; गुप्तचर-नेटवर्क; जुलाई 1857 में युद्ध में मारे गए
- मौलवी अहमदुल्ला शाह: हैदराबाद-शिक्षित; 1856 से गाँव-गाँव जिहाद-प्रचार; ढोल आगे-आगे → “डंका शाह”; फ़ैज़ाबाद जेल; 22वीं नेटिव इन्फेंट्री के नेता; ★चिनहाट में हेनरी लॉरेंस की टुकड़ियों को मुँह की खानी पड़ी
मौलवी की ताक़त? — लोक-विश्वास: “उन्हें कोई हरा नहीं सकता… जादुई शक्तियाँ” — अफ़वाह और नेतृत्व का रिश्ता
अफ़वाहें — कारतूस से चपाती तक
§1.4
- एन्फ़ील्ड कारतूस — गाय-सुअर की चर्बी; स्रोत: कैप्टेन राइट की रिपोर्ट — दम दम का खलासी बनाम ब्राह्मण सिपाही (जनवरी 1857): “जल्दी ही तुम्हारी जाति भ्रष्ट होने वाली है…”
- बाज़ार के आटे में हड्डियों का चूरा; डर — सबको ईसाई बनाना है
- भविष्यवाणी — प्लासी के 100 साल: 23 जून 1857 को अंग्रेज़ी राज ख़त्म
- चपातियाँ — चौकीदार को एक + पाँच और अगले गाँवों को; “मतलब-मक़सद न तब स्पष्ट था, न आज”
रिपोर्ट सच थी या नहीं — “कहना मुश्किल”; पर अफ़वाह आश्वासनों से नहीं मरती
अफ़वाह क्यों फैलती है?
§1.5 — अध्याय का विधि-सूत्र
अफ़वाहों और भविष्यवाणियों की ताक़त को सिर्फ़ इस आधार पर नहीं समझा जा सकता कि वे वाकई में सच थीं या नहीं… अफ़वाह तभी फैलती है जब उसमें लोगों के ज़हन में गहरे दबे डर और संदेह की अनुगूँज सुनाई देती है।
संदर्भ — 1820s से बेंटिक-युग के ‘सुधार’ (पश्चिमी शिक्षा; सती-अंत 1829; विधवा-विवाह क़ानून) + “दुर्बलता-दत्तकता” के बहाने अवध-झाँसी-सतारा की हड़प + अपने क़ानून-वसूली — लोगों को व्यवस्था “ज़्यादा हृदयहीन, परायी और दमनकारी” लगी।
2 | अवध में विद्रोह | गिलास फल; बेजान देह; एक दुनिया का ख़ात्मा
“ये गिलास फल एक दिन हमारे ही मुँह में आकर गिरेगा”
§2.1 — डलहौज़ी, 1851
- 1801 — अवध पर सहायक संधि (वेलेज़्ली-प्रणाली, 1798): सेना ख़त्म; अंग्रेज़ टुकड़ियाँ; रेज़ीडेंट की सलाह पर शासन
- नतीजा — नवाब क़ानून-व्यवस्था तक के लिए अंग्रेज़ों पर निर्भर
- अंग्रेज़ों की नज़र — नील-कपास की मुफ़ीद ज़मीन; उत्तर भारत का बड़ा बाज़ार
- 1850s की शुरुआत तक — मराठा भूमि, दोआब, कर्नाटक, पंजाब, बंगाल सब झोली में
- 1856 — अवध औपचारिक रूप से ब्रिटिश साम्राज्य का अंग
“एक सदी पहले बंगाल से शुरू हुई क्षेत्रीय विस्तार की प्रक्रिया 1856 में अवध के अधिग्रहण के साथ मुकम्मल हो जाने वाली थी”
“देह से जान जा चुकी थी”
§2.2 — नवाब की विदाई, 1856
देह से जान जा चुकी थी। शहर की काया बेजान थी… कोई सड़क, कोई बाज़ार और घर ऐसा न था जहाँ से जान-ए-आलम से बिछड़ने पर विलाप का शोर न गूँज रहा हो।
वाजिद अली शाह ‘कुशासन’ के आरोप में कलकत्ता निष्कासित; ‘अलोकप्रिय’ होने का ब्रिटिश निष्कर्ष “निराधार” — विलाप करती जनता कानपुर तक साथ गई; लोकगीत — “अंगरेज बहादुर आइन, मुल्क लई लीन्हों।” दरबार-अंत से संगीतकारों-कवियों-कारीगरों-बावर्चियों की रोज़ी भी गई।
एक दुनिया का ख़ात्मा
§2.3 — ताल्लुक़दार, किसान, सिपाही
- अवध में विद्रोह = ★“विदेशी शासन के ख़िलाफ़ लोक-प्रतिरोध की अभिव्यक्ति”
- ताल्लुक़दार — पीढ़ियों से ज़मीन-सत्ता; बड़े के पास 12,000 पैदल तक; अधिग्रहण के फ़ौरन बाद सेनाएँ भंग, दुर्ग ध्वस्त
- ★एकमुश्त बंदोबस्त (1856): ‘ताल्लुक़दार = बिचौलिए’; गाँव 67% → 38%; माँग में 30-70% इज़ाफ़ा
- निष्ठा-संरक्षण के बंधन टूटे — “दयालु अभिभावक” की जगह गैर-लचीली वसूली; तीज-त्यौहार के क़र्ज़े ख़त्म
- लड़ाई की बागडोर — ताल्लुक़दार + किसान; लखनऊ में बेगम हज़रत महल का खेमा
हनवंत सिंह (कालाकंकर) — अंग्रेज़ को बचाया, फिर कहा: “अब मैं अपने सिपाहियों को लेकर लखनऊ जा रहा हूँ ताकि आपको देश से खदेड़ सकूँ”
सिपाही — वर्दी में किसान
§2.3
- बंगाल आर्मी के बहुत सारे सिपाही अवध व पूर्वी उ.प्र. के गाँवों से; बहुत सारे ब्राह्मण/“ऊँची जाति”
- ★अवध — “बंगाल आर्मी की पौधशाला”
- 1820s — अफ़सरों से दोस्ताना रिश्ते (मल्ल-युद्ध, शिकार, हिंदुस्तानी-ज्ञान)
- 1840s — “श्रेष्ठता का भाव”; सिपाही “कमतर नस्ल”; गाली-गलौज व शारीरिक हिंसा सामान्य; भरोसे की जगह संदेह
- गाँव-बैरक का दोतरफ़ा रिश्ता — सिपाही उठे तो “भाई-बिरादर भी साथ आ जुटते थे”
दशकों की शिकायतें — कम वेतन, छुट्टी नहीं — और ऊपर से कारतूस
3 | विद्रोही क्या चाहते थे | एकता; घोषणाएँ; वैकल्पिक सत्ता
आवाज़ किसकी दर्ज हुई?
§3 — स्रोतों की समस्या
- अंग्रेज़ों की नज़र — विद्रोही “अहसानफ़रामोश और बर्बर लोगों का झुंड”
- ज़्यादातर सिपाही-आम लोग पढ़े-लिखे नहीं — कुछ घोषणाओं-इश्तहारों के सिवा अपनी बात दर्ज करने का मौक़ा नहीं
- इतिहासकार मजबूरन अंग्रेज़ों के दस्तावेज़ों पर निर्भर
★“विडंबना यह है कि इन स्रोतों से अंग्रेज़ अफ़सरों की सोच का तो पता चलता है लेकिन… विद्रोही क्या चाहते थे — ज़्यादा सुराग़ नहीं”
एकता की कल्पना
§3.1
- घोषणाएँ — जाति-धर्म का भेद किए बिना समाज के सभी तबकों का आह्वान
- मुस्लिम राजकुमारों-नवाबों के नाम से जारी — पर हिंदुओं की भावनाओं का ख़याल
- युद्ध ऐसा जिसमें दोनों का नफ़ा-नुकसान बराबर; पूर्व-ब्रिटिश सहअस्तित्व का गौरवगान
- बहादुर शाह की घोषणा — ★“मुहम्मद और महावीर, दोनों की दुहाई”
- ★★परीक्षा — दिसंबर 1857, बरेली: हिंदुओं को भड़काने के 50,000 रुपये — “कोशिश नाकामयाब रही”
आज़मगढ़ घोषणा — 25 अगस्त 1857
| तबका | ब्रिटिश राज में | बादशाही सरकार में |
|---|---|---|
| ज़मींदार | बेहिसाब जमा; नीलामी; अदालत-बेइज़्ज़ती | जमा हलका; अपने ढंग से शासन |
| व्यापारी | नील-कपड़े-जहाज पर एकाधिकार | हर चीज़ का व्यापार देसी व्यापारियों को |
| कर्मचारी | इज़्ज़त नहीं; ऊँचे पद सिर्फ़ अंग्रेज़ों को | 200-300 रु. + ऊँचे ओहदे |
| कारीगर | “इंग्लैंड में बनी चीज़ों” से भिखमंगे | राजाओं-अमीरों की सेवा में उन्नति |
| पंडित-फ़कीर | यूरोपीय दोनों धर्मों के शत्रु | “पवित्र युद्ध” में अगुवाई |
“विद्रोही क्या चाहते थे, इसके बारे में हमारी जानकारी का यह एक मुख्य स्रोत है”
सिपाही की अपनी आवाज़
स्रोत 6 — विद्रोही सिपाहियों की बची हुई अर्ज़ी
हम दो साल तक इसलिए लड़े ताकि हमारा अक़ायद (आस्था) और मज़हब दूषित न हों। अगर एक हिंदू या मुसलमान का धर्म ही नष्ट हो गया तो दुनिया में बचेगा क्या?
अर्ज़ी पहले सेवा का इतिहास गिनाती है (“हमारी सहायता से अंग्रेज़ों ने जो चाहा जीता”), फिर 1857 के हुक्म — और परेड-प्रकरण: 1400 अंग्रेज़ सिपाहियों-तोपों से घेराव, 84 गिरफ़्तार। विद्रोह = विश्वासघात का जवाब।
प्रतीकों के ख़िलाफ़, सत्ता की तलाश
§3.2–3.3
- फ़िरंगी राज से जुड़ी हर चीज़ खारिज; “अंग्रेज़ों पर भरोसा नहीं किया जा सकता”
- लड़ाई — “रोज़गार, धर्म, इज़्ज़त और अस्मिता” के लिए; ‘व्यापक सार्वजनिक भलाई’
- ★व्यवहार में समता-झलक — संभ्रांतों की बेइज़्ज़ती, सूदखोरों के बहीखाते जलाना — “संभवत: ज़्यादा समतापरक समाज की कल्पना”; पर घोषणाओं में यह सोच नहीं
- वैकल्पिक सत्ता — दिल्ली, लखनऊ, कानपुर: नियुक्तियाँ, वसूली-वेतन, लूट-रोक, कमान-शृंखला
- प्रेरणा — ★18वीं सदी का मुग़ल जगत — “छिन चुकी चीज़ों का प्रतीक”
अवध में प्रतिरोध सबसे लंबा — 1858 के शुरुआती महीनों तक हुकुम जारी होते रहे
4-5 | दमन और छवियाँ | मार्शल लॉ; चित्रों की लड़ाई
दमन — क़ानून, तोप, फूट
§4
- मई-जून 1857 के क़ानून — समूचे उत्तर भारत में मार्शल लॉ; आम अंग्रेज़ों तक को सज़ा देने का अधिकार; ★“एक ही सज़ा — सज़ा-ए-मौत”
- दिल्ली पर दोतरफ़ा हमला — कलकत्ता + पंजाब से; जून → सितंबर-अंत
- गंगा के मैदान में गाँव-दर-गाँव; ★फॉरसिथ — अवध के 3/4 वयस्क पुरुष विद्रोह में; मार्च 1858 अवध-पुनर्नियंत्रण
- फूट — बड़े ज़मींदारों को जागीर-वापसी का आश्वासन; वफ़ादारों को ईनाम; कई नेपाल में बीमारी-भूख से मरे
“पल में बिखर जाते हैं, पल में फिर जुट जाते हैं” — अवध के गाँव वालों पर अंग्रेज़ अफ़सर
एक ही घेरा — दो कैनवस
§5.1-5.2 — 1859 के दो चित्र
‘द रिलीफ़ ऑफ़ लखनऊ’ (बार्कर)
- केंद्र में तीन नायक — कैम्पबेल, ऑट्रम, हेवलॉक
- नायक उजाले में; निगाह उन्हीं पर
- अगले भाग में शव-घायल — ‘क़ीमत’
- घोड़ों की विजयी मुद्रा — सत्ता बहाल
‘इन मेमोरियम’ (पेटन)
- घेरे में लिपटी लाचार औरतें-बच्चे
- ★हिंसा नहीं दिखती — “सिर्फ़ एक इशारा”
- विद्रोही ‘बर्बर’ — पर चित्र में अदृश्य
- पृष्ठभूमि में ब्रिटिश टुकड़ियाँ — रक्षक
मिस व्हीलर वाले चित्र में धरती पर पड़ी किताब बाइबल है — “यह ईसाइयत की रक्षा का संघर्ष है”
प्रतिशोध, दहशत और दया का मज़ाक
§5.3-5.5 — पन्च और ILN
- ‘जस्टिस’ (पन्च, 12 सितंबर 1857) — तलवार-ढाल वाली न्याय-स्त्री सिपाहियों को कुचलती; भारतीय औरतें-बच्चे भय से काँपते; कानपुर-समाचारों की प्रतिक्रिया
- ‘बंगाल टाइगर से ब्रिटिश शेर का प्रतिशोध’ (पन्च, 1857)
- तोप से उड़ाना (पेशावर, ILN, 3 अक्टूबर 1857) — ★“निर्मम सत्ता का नाट्य मंचन”; 12 फाँसियाँ — “दहशत का प्रदर्शन” — खुले में, नाटकीय ढंग से
- ‘क्लिमेंसी ऑफ़ केनिंग’ (पन्च, 24 अक्टूबर 1857) — नर्मी की बात करने वाले गवर्नर जनरल का मज़ाक
चित्रों-ख़बरों ने हिंसक दमन को “लाज़िमी और वाजिब” बना दिया
राष्ट्रवादी दृश्य कल्पना
बीसवीं सदी में 1857 बना “प्रथम स्वतंत्रता संग्राम”। रानी झाँसी — एक हाथ में घोड़े की रास, दूसरे में तलवार; सुभद्रा कुमारी चौहान की पंक्ति बच्चे-बच्चे की ज़ुबान पर — “खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी।” फ़िल्मों-पोस्टरों ने योद्धा-छवि स्थापित की।
छवियों का दोहरा काम
§5.6 — अध्याय का समापन-सूत्र
ये तस्वीरें केवल अपने समय की भावनाओं और अहसासों को ही प्रतिबिंबित नहीं कर रही थीं। उन्होंने संवेदनाओं को भी शक्ल दी।
ब्रिटेन के चित्रों से उत्तेजित जनता विद्रोहियों को बर्बरता से कुचलने की आवाज़ें उठाती थी; भारतीय राष्ट्रवादी चित्र हमारी राष्ट्रवादी कल्पना को निर्धारित करने में मदद करते रहे।
1857-58 — मुख्य पड़ाव
- 1801अवध पर सहायक संधि (वेलेज़्ली-प्रणाली)
- 1856वाजिद अली शाह गद्दी से; अवध-अधिग्रहण; एकमुश्त बंदोबस्त
- 10 मई 1857मेरठ में “सैनिक विद्रोह”
- 11-12 मईदिल्ली — बहादुर शाह का सांकेतिक नेतृत्व
- 30 मईलखनऊ में विद्रोह
- 30 जूनचिनहाट में अंग्रेज़ों की हार
- 25 सितंबरऑट्रम-हेवलॉक लखनऊ रेज़ीडेंसी में
- मार्च 1858अवध पर दोबारा नियंत्रण
- जून 1858युद्ध में रानी झाँसी की मृत्यु
परीक्षा-दृष्टि — याद रखने योग्य
अंतिम पुनरावृत्ति
- 10-11 मई • वैधता-वाक्य • ढर्रा • “ताश के क़िले” • “कर्ताधर्ता खुद”
- नेता — दबाव में; डंका शाह-चिनहाट; शाह मल — पुल-सड़क-”न्याय भवन”
- अफ़वाह-चौकड़ी + 23 जून + सूत्र — “दबे डर की अनुगूँज”
- अवध — 1801/1851/1856; 67→38%; 30-70%; ‘पौधशाला’; बेगम हज़रत महल
- आज़मगढ़ 25 अगस्त — पाँच तबके; मुहम्मद-महावीर; बरेली-50,000 नाकाम
- दमन — मार्शल लॉ; दोतरफ़ा; 3/4; मार्च 1858; जागीर-आश्वासन
- छवियाँ — बार्कर-पेटन-जस्टिस-ILN बनाम मर्दानी रानी; “संवेदनाओं को शक्ल”
तीन परतें अलग रखिए — घटना, मानसिकता, छवि — यही अध्याय की कुंजी है