अध्याय 6भक्ति-सूफ़ी परंपराएँ

प्रस्तुति45 मिनट

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अध्याय 6 — भक्ति-सूफ़ी परंपराएँ | कक्षा XII इतिहास | भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग-2

कक्षा — 12 · विषय — इतिहास (भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग-2)

एक ही अध्याय में दो उल्टे शीर्षक — ऐसा क्यों?

  • §1 — “धार्मिक विश्वासों और आचरणों की गंगा-जमुनी बनावट”
  • §1.2 — “भेद और संघर्ष”
  • यही अध्याय की दो धुरियाँ हैं

अध्याय की सबसे बड़ी चेतावनी

NCERT, प्रस्तावना, पृष्ठ 140

यह रचनाएँ… संतों के अनुयायियों द्वारा उनकी मृत्यु के उपरांत संकलित की गईं। ये परंपराएँ प्रवाहमान थीं — अनुयायियों की कई पीढ़ियों ने मूल संदेश का न केवल विस्तार किया अपितु उन विचारों को… या तो परिवर्तित कर दिया अथवा त्याग दिया।

इन स्रोतों का मूल्यांकन इतिहासकारों के लिए एक चुनौती है।

अध्याय का अंतिम निष्कर्ष — पहले दिन ही जान लीजिए

परंपराएँ बदलती हैं

“इतिहासकारों के लिए चुनौती यह है कि वे इस तथ्य की ओर जागरूक हों कि धार्मिक परंपराएँ भी अन्य परंपराओं की तरह परिवर्तनशील हैं।”

1 | समन्वय और संघर्ष | दो प्रक्रियाएँ; जगन्नाथ; “महान” और “लघु”; भेद और संघर्ष

अध्याय की संरचना

नौ खंड, एक तर्क

  • §1 समन्वय व संघर्ष — पूरा उपमहाद्वीप
  • §2 अलवार-नयनार — तमिलनाडु, छठी सदी से
  • §3 वीरशैव/लिंगायत — कर्नाटक, बारहवीं सदी
  • §4 उत्तरी भारत में उफ़ान — संक्रमण
  • §5 इस्लामी परंपराएँ — सातवीं सदी से
  • §6 सूफ़ीमत — ग्यारहवीं सदी से
  • §7 चिश्ती सिलसिला
  • §8 कबीर, नानक, मीराबाई
  • §9 पुनर्निर्माण — हमें यह सब कैसे पता?

ध्यान दीजिए — अध्याय पद्धति के प्रश्न पर समाप्त होता है

समन्वय की दो प्रक्रियाएँ

§1.1 — दो दिशाएँ

ऊपर से नीचे

  • ब्राह्मणीय विचारधारा का प्रचार
  • पौराणिक ग्रंथों की रचना, संकलन व परिरक्षण
  • सरल संस्कृत छंदों में
  • वैदिक विद्या से विहीन स्त्रियों और शूद्रों द्वारा भी ग्राह्य

नीचे से ऊपर

  • स्त्री, शूद्रों व अन्य वर्गों की आस्थाओं की स्वीकृति
  • ब्राह्मणों द्वारा स्वीकृत किया जाना
  • और उसे एक नया रूप प्रदान करना

“अनेक धार्मिक विचारधाराएँ… “महान” संस्कृत-पौराणिक परिपाटी तथा “लघु” परंपरा के बीच हुए अविरल संवाद का परिणाम हैं”

“महान” और “लघु” परंपराएँ

पहलूविवरण
किसने गढ़ेरॉबर्ट रेडफील्ड — बीसवीं सदी के समाजशास्त्री
“महान”पुरोहित व राजा द्वारा पालन किए जाने वाले कर्मकांड
“लघु”कृषक समुदाय के अन्य लोकाचार
परिवर्तनपारस्परिक आदान-प्रदान के कारण दोनों बदले

पर एक बात और है — जो सबसे अधिक छूटती है

इसीलिए ये शब्द उद्धरण-चिह्नों में हैं

साइड-बॉक्स, पृष्ठ 141

हालाँकि विद्वान इन प्रक्रियाओं और वर्गीकरण के महत्व से इनकार नहीं करते तथापि वे इन शब्दों में जो पदसोपानात्मक स्वर उभर कर आता है उसकी अवमानना करते हैं।

इसे लक्षित करने का एक तरीका है इन शब्दों को उद्धरण चिह्न के साथ प्रस्तुत करना — “लघु” और “महान”

समन्वय का सबसे विशिष्ट उदाहरण — पुरी का जगन्नाथ

§1.1

  • बारहवीं शताब्दी तक मुख्य देवता जगन्नाथ, विष्णु के एक स्वरूप के रूप में प्रस्तुत
  • जगन्नाथ = संपूर्ण विश्व का स्वामी
  • पर मूल स्थानीय है:
    • “एक स्थानीय देवता जिसकी प्रतिमा को पहले और आज भी लकड़ी से स्थानीय जनजाति के विशेषज्ञों द्वारा गढ़ा जाता है”
    • “विष्णु का यह रूप देश के अन्य भागों से सर्वथा भिन्न था”

समन्वय का अर्थ यह नहीं कि स्थानीय मिट गया — स्थानीय बना रहा, और उसे एक नया नाम मिल गया

देवी-संप्रदायों में वही प्रक्रिया

§1.1

  • “देवी की उपासना अधिकतर सिंदूर से पोते गए पत्थर के रूप में ही की जाती थी”
  • इन स्थानीय देवियों को पौराणिक परंपरा में मुख्य देवताओं की पत्नी के रूप में मान्यता
    • कभी लक्ष्मी के रूप में — विष्णु की पत्नी
    • कभी पार्वती के रूप में — शिव की पत्नी

जगन्नाथ में स्थानीय देवता ‘बड़े देवता का रूप’ बने; देवी में स्थानीय देवी ‘बड़े देवता की पत्नी’

भेद और संघर्ष

§1.2

  • तांत्रिक परंपरा — देवी की आराधना पद्धति
    • “इसके अंतर्गत स्त्री और पुरुष दोनों ही शामिल हो सकते थे”
    • “वर्ग और वर्ण के भेद की अवहेलना की जाती थी”
    • इसने शैव और बौद्ध दर्शन को भी प्रभावित किया
  • “आगामी सहस्राब्दी में इन समस्त विश्वासों का वर्गीकरण “हिंदू” के रूप में हुआ”
  • तीन स्तर के संघर्ष:
    • वैदिक बनाम तांत्रिक
    • भक्तों की परस्पर होड़ — अपने इष्टदेव को सर्वोच्च बताना
    • बौद्ध व जैन से तनाव — “यद्यपि स्पष्ट द्वंद्व कम दिखाई पड़ते थे”

जिन देवताओं की पूजा बंद हो गई, उनके ग्रंथ सबसे प्रामाणिक क्यों बने रहे?

  • वैदिक देवकुल के अग्नि, इंद्र और सोम “पूरी तरह गौण हो गए”
  • “साहित्य व मूर्तिकला दोनों में ही उनका निरूपण नहीं दिखता”
  • “किंतु इन असंगतियों के बावजूद वेदों को प्रामाणिक माना जाता रहा”

2 | उपासना की कविताएँ | सगुण और निर्गुण; अलवार और नयनार; जाति; स्त्री भक्त; राज्य

भक्ति परंपरा को समझने की कुंजी

सगुण बनाम निर्गुण

सगुण = विशेषण सहित, मूर्त ईश्वर (शिव, विष्णु, अवतार, देवियाँ) • निर्गुण = विशेषण विहीन, अमूर्त व निराकार ईश्वर

भक्ति परंपरा की चार विशेषताएँ

§2

  • संत कवि नेता के रूप में उभरे — उनके आस-पास भक्तजनों का समुदाय
  • पर ध्यान दीजिए — “ब्राह्मण, देवताओं और भक्तजन के बीच महत्त्वपूर्ण बिचौलिए बने रहे”
  • “इन परंपराओं ने स्त्रियों और “निम्न वर्णों” को भी स्वीकृति व स्थान दिया”
  • “भक्ति परंपरा की एक और विशेषता इसकी विविधता है”

दूसरी और चौथी बात सबसे अधिक छूटती है — और वही NCERT की संतुलित दृष्टि दिखाती है

अलवार और नयनार

§2.1 — लगभग छठी शताब्दी से

अलवार

  • इष्ट — विष्णु
  • “विष्णु भक्ति में तन्मय”
  • संकलन — नलयिरादिव्यप्रबंधम्
  • बारह अलवार, चार हज़ार पावन रचनाएँ
  • इसे तमिल वेद कहा गया

नयनार

  • इष्ट — शिव
  • संकलन — तेवरम
  • अप्पार, संबंदर, सुंदरार
  • संगीत के आधार पर वर्गीकरण

दोनों भाषा — तमिल; दोनों भ्रमण करते हुए भजन गाते थे

पावन स्थल से तीर्थ तक — चार चरण

§2.1

  • संत यात्रा करते हुए कुछ स्थलों को अपने इष्ट का निवासस्थल घोषित करते हैं
  • “इन्हीं स्थलों पर बाद में विशाल मंदिरों का निर्माण हुआ”
  • “और वे तीर्थस्थल माने गए”
  • “संत-कवियों के भजनों को इन मंदिरों में अनुष्ठानों के समय गाया जाता था”
    • “और साथ ही इन संतों की प्रतिमा की भी पूजा की जाती थी”

संत ने स्थान को पवित्र बनाया — और फिर स्वयं पूजनीय बन गया

जाति के प्रति दृष्टिकोण

§2.2 — NCERT की सावधान भाषा पर ध्यान दीजिए

  • “कुछ इतिहासकारों का यह मानना है कि… जाति प्रथा व ब्राह्मणों की प्रभुता के विरोध में आवाज़ उठाई”
  • “कुछ हद तक यह बात सत्य प्रतीत होती है”
  • कारण — विविध सामाजिक आधार:
    • “भक्ति संत विविध समुदायों से थे जैसे ब्राह्मण, शिल्पकार, किसान”
    • “और कुछ तो उन जातियों से आए थे जिन्हें “अस्पृश्य” माना जाता था”

‘तमिल वेद’ — चुनौती या स्वीकृति?

§2.2

अलवार संतों के एक मुख्य काव्य संकलन नलयिरादिव्यप्रबंधम् का वर्णन तमिल वेद के रूप में किया जाता था। इस तरह इस ग्रंथ का महत्व संस्कृत के चारों वेदों जितना बताया गया जो ब्राह्मणों द्वारा पोषित थे।

चुनौती देने के लिए भी उन्हें उसी सम्मान-शब्द का सहारा लेना पड़ा जिसे वे चुनौती दे रहे थे

दो स्रोत, एक दिशा

स्रोत 1 और स्रोत 2

तोंदराडिप्पोडी — ब्राह्मण अलवार

  • “चतुर्वेदी जो अजनबी हैं और तुम्हारी सेवा के प्रति निष्ठा नहीं रखते…”
  • “उनसे भी ज़्यादा आप उन “दासों” को पसंद करते हैं”
  • “चाहे वे वर्ण-व्यवस्था के परे हों”

अप्पार — नयनार संत

  • “हे धूर्तजन, जो तुम शास्त्र को उद्धृत करते हो”
  • “तुम्हारा गोत्र और कुल भला किस काम का?”
  • केवल शिव को एकमात्र आश्रयदाता मानो

समानता — दोनों भक्ति को वेद-ज्ञान व कुल से ऊपर रखते हैं; अंतर — स्वर की तीव्रता

इस परंपरा की सबसे बड़ी विशिष्टता

स्त्रियों की उपस्थिति

“संभवत: इस परंपरा की सबसे बड़ी विशिष्टता इसमें स्त्रियों की उपस्थिति थी” — §2.3

दो स्त्री भक्त

§2.3

  • अंडाल — अलवार परंपरा
    • “स्वयं को विष्णु की प्रेयसी मानकर अपनी प्रेमभावना को छंदों में व्यक्त करती थीं”
    • भक्ति गीत “व्यापक स्तर पर गाए जाते थे — और आज भी गाए जाते हैं”
  • कराइक्काल अम्मइयार — नयनार परंपरा
    • “अपने उद्देश्य प्राप्ति हेतु घोर तपस्या का मार्ग अपनाया”
    • “नयनार परंपरा में उसकी रचनाओं को सुरक्षित किया गया”

एक राक्षसी?

स्रोत 3 — कराइक्काल अम्मइयार अपना वर्णन करती हैं

राक्षसी, फूली हुई नाड़ियों वाली / बाहर निकली आँखें, सफेद दाँत और भीतर धँसा उदर / लाल केश और आगे निकले दाँत… वन में विचरते समय चीखना और क्रंदन — यह अलंकटु का वन है, जो हमारे पिता (शिव) का घर है। वह नृत्य करते हैं… उनके अंग शांत हैं।

बाहर घोर तांडव, भीतर पूर्ण शांति — यह आत्म-निंदा नहीं, सचेत अस्वीकार है

और NCERT का निर्णायक मूल्यांकन

§2.3

हालाँकि इन स्त्रियों ने अपने सामाजिक कर्तव्यों का परित्याग किया। वह किसी वैकल्पिक व्यवस्था अथवा भिक्षुणी समुदाय की सदस्या नहीं बनीं। इन स्त्रियों की जीवन पद्धति और इनकी रचनाओं ने पितृसत्तात्मक आदर्शों को चुनौती दी।

भाग-1 अध्याय 4 की भिक्खुनियों के पास संघ था — इनके पास कोई संस्था नहीं थी

राज्य के साथ संबंध

§2.4

  • पल्लव व पांड्य राज्य — छठी से नवीं शताब्दी
  • बौद्ध व जैन को “राजकीय संरक्षण और अनुदान यदा-कदा ही” मिलता था
  • एक रोचक तथ्य — तमिल भक्ति रचनाओं में बौद्ध-जैन का विरोध
    • विशेषत: नयनार रचनाओं में
  • इतिहासकारों की व्याख्या:
    • “परस्पर विरोधी धार्मिक समुदायों में राजकीय अनुदान को लेकर प्रतिस्पर्धा थी”

धार्मिक विरोध के पीछे केवल दर्शन नहीं, संसाधनों की प्रतिस्पर्धा भी हो सकती है

चोल समर्थन के चार रूप

#रूप
1विशाल शिव मंदिर — चिदम्बरम, तंजावुर, गंगैकोंडचोलपुरम
2कांस्य में ढाली शिव प्रतिमाएँ
3मंदिरों में तमिल शैव भजनों का गायन प्रचलित किया
4तेवरम के संकलन का ज़िम्मा उठाया

“नयनार संतों का दर्शन शिल्पकारों के लिए प्रेरणा बना”

और एक अभिलेख जो सब सिद्ध कर देता है

945 ईसवी

चोल सम्राट परांतक प्रथम ने अप्पार, संबंदर और सुंदरार की धातु प्रतिमाएँ एक शिव मंदिर में स्थापित करवाईं — जो उत्सव में जुलूस में निकाली जाती थीं

शासकों को संत क्यों चाहिए थे?

§2.4 — तर्क-शृंखला

  • संत वेल्लाल कृषकों द्वारा सम्मानित होते थे
  • “इसलिए आश्चर्य नहीं कि शासकों ने भी उनका समर्थन पाने का प्रयास किया”
  • “चोल सम्राटों ने दैवीय समर्थन पाने का दावा किया”
  • “और अपनी सत्ता के प्रदर्शन के लिए सुंदर मंदिरों का निर्माण कराया”
  • “इस तरह इन लोकप्रिय संत-कवियों की परिकल्पना को… मूर्त रूप प्रदान किया गया”

राजा को केवल भूमि नहीं, लोगों की श्रद्धा भी चाहिए थी

3 | कर्नाटक की वीरशैव परंपरा | बासवन्ना; लिंगायत; वचन

बासवन्ना और लिंगायत

§3 — बारहवीं शताब्दी, कर्नाटक

  • बासवन्ना (1106-68) — एक ब्राह्मण; कलाचुरी राजा के दरबार में मंत्री
  • अनुयायी कहलाए — वीरशैव (शिव के वीर) व लिंगायत (लिंग धारण करने वाले)
  • “आज भी लिंगायत समुदाय का इस क्षेत्र में महत्त्व है”
  • पुरुष वाम स्कंध पर चाँदी के पिटारे में एक लघु लिंग धारण करते हैं
  • जंगम — यायावर भिक्षु, जो श्रद्धा की दृष्टि से देखे जाते हैं

ध्यान दीजिए — नेता स्वयं ब्राह्मण थे और दरबार में मंत्री; आलोचना भीतर से आई

एक विश्वास, दो आचार

§3 — विश्वास और व्यवहार की सीधी कड़ी

  • विश्वास: “मृत्योपरांत भक्त शिव में लीन हो जाएँगे तथा इस संसार में पुन: नहीं लौटेंगे”
  • इसलिए आचार 1: “धर्मशास्त्र में बताए गए श्राद्ध संस्कार का वे पालन नहीं करते”
  • इसलिए आचार 2: “अपने मृतकों को विधिपूर्वक दफनाते हैं”

जो मानते हैं कि आत्मा लौटेगी नहीं, उन्हें लौटाने के अनुष्ठान की आवश्यकता भी नहीं

लिंगायतों का सामाजिक कार्यक्रम

#विरोध / स्वीकृति
1जाति की अवधारणा का विरोध
2कुछ समुदायों के “दूषित” होने की अवधारणा का विरोध
3पुनर्जन्म के सिद्धांत पर प्रश्नवाचक चिह्न
4वयस्क विवाह व विधवा पुनर्विवाह को मान्यता

परिणाम — “जिन समुदायों को गौण स्थान मिला था वे लिंगायतों के अनुयायी हो गए”

अनुष्ठान और यथार्थ संसार

स्रोत 4 — बासवन्ना का वचन

जब वे एक पत्थर से बने सर्प को देखते हैं तो उस पर दूध चढ़ाते हैं / यदि असली साँप आ जाए तो कहते हैं “मारो-मारो”। / देवता के उस सेवक को, जो भोजन परसने पर खा सकता है वे कहते हैं “चले जाओ! चले जाओ।” / किन्तु ईश्वर की प्रतिमा को जो खा नहीं सकती, वे व्यंजन परोसते हैं।

उन्होंने तर्क नहीं दिया — उन्होंने आईना दिखाया

बसवन्ना समझाते कैसे हैं?

स्रोत 4 का विश्लेषण

  • समानांतर विरोधाभास — दो जोड़े आमने-सामने
  • रोज़मर्रा की परिचित छवियाँ — साँप, दूध, भोजन
    • कोई शास्त्रीय शब्दावली नहीं
  • उपदेश नहीं, दृश्य — वे ‘यह ग़लत है’ नहीं कहते
    • श्रोता को स्वयं निष्कर्ष निकालने देते हैं
  • सरल कन्नड़ — वचन विधा में

वे अनुष्ठान का विरोध नहीं करते — उस पाखंड का करते हैं जिसमें प्रतीक पूजा जाता है और जीवित प्राणी उपेक्षित

4 | उत्तरी भारत में धार्मिक उफ़ान | एक प्रश्न; एक आर्थिक तर्क; एक संक्रमण

चौदहवीं सदी तक उत्तरी भारत से अलवार-नयनार जैसा कोई ग्रंथ क्यों नहीं मिला?

  • मंदिर वहाँ भी थे, शासकों की सहायता से बने
  • पर संत-काव्य का कोई संकलन नहीं
  • NCERT स्वयं यह प्रश्न पूछती है

NCERT का सुझाया उत्तर

§4

  • “कुछ इतिहासकारों का मत है कि उत्तरी भारत में यह वह काल था जब अनेक राजपूत राज्यों का उद्भव हुआ”
  • “इन सभी राज्यों में ब्राह्मणों का महत्त्वपूर्ण स्थान था”
    • “और वे ऐहिक तथा आनुष्ठानिक दोनों ही कार्य करते थे”
  • “उनकी इस प्रभुसत्ता को सीधे चुनौती देने का प्रयास शायद ही किसी ने किया”

ध्यान दीजिए — यह “मत” है, सिद्ध तथ्य नहीं

पर एक और चीज़ हो रही थी

§4 — एक आर्थिक तर्क

  • नाथ, जोगी और सिद्ध — “रूढ़िवादी ब्राह्मणीय साँचे के बाहर”
  • “उनमें से बहुत से लोग शिल्पी समुदाय के थे जिनमें जुलाहे शामिल थे”
  • और उनका महत्त्व क्यों बढ़ा:
    • नगरीय केंद्रों का विस्तार
    • मध्य व पश्चिमी एशिया के साथ व्यापार का प्रसार
    • इससे “इन दस्तकारी की वस्तुओं की माँग बढ़ी”

जब किसी समूह का आर्थिक महत्त्व बढ़ता है, तो उसकी आवाज़ भी सुनाई देने लगती है

भाषा और सीमा

§4

  • “अनेक नवीन धार्मिक नेताओं ने वेदों की सत्ता को चुनौती दी”
  • “और अपने विचार आम लोगों की भाषा में सामने रखे”
  • “समय के साथ यह भाषाएँ उस रूप में विकसित हुईं जिस तरह आज भी प्रयोग में लाई जाती हैं”
  • पर एक सीमा भी:
    • “अपनी लोकप्रियता के बावजूद नवीन धार्मिक नेता विशिष्ट शासक वर्ग का प्रश्रय हासिल करने की स्थिति में नहीं थे”

यह चोल-समर्थित नयनार-अलवार के बिल्कुल विपरीत है

5 | दुशाले के नए ताने-बाने | इस्लामी परंपराएँ; शरिया; लोक-प्रचलन; समुदायों के नाम

संपर्क की लंबी पृष्ठभूमि

§5

  • “प्रथम सहस्राब्दी ईसवी में अरब व्यापारी समुद्र के रास्ते पश्चिमी भारत के बंदरगाहों तक आए”
  • “इसी समय मध्य एशिया से लोग देश के उत्तर-पश्चिम प्रांतों में आकर बस गए”
  • “सातवीं शताब्दी में इस्लाम के उद्भव के बाद ये क्षेत्र उस संसार का हिस्सा बन गए जिसे अकसर इस्लामी विश्व कहा जाता है”

संपर्क पहले से था — इस्लाम का उद्भव उसके बाद हुआ

राजनीतिक कालक्रम

  1. 711 ईसवीमुहम्मद बिन कासिम ने सिंध विजित किया; ख़लीफ़ा के क्षेत्र में शामिल
  2. लगभग 13वीं सदीतुर्क और अफ़गानों ने दिल्ली सल्तनत की नींव रखी
  3. आगेदक्कन और अन्य भागों में सल्तनत की सीमा का प्रसार
  4. 16वीं सदीमुगल सल्तनत की स्थापना
  5. 18वीं सदीक्षेत्रीय राज्य — कई शासक इस्लाम धर्म मानने वाले

शरिया — एक कानून जो बदला

साइड-बॉक्स, पृष्ठ 149

मूल दो स्रोत

  • कुरान शरीफ़
  • हदीस — पैग़म्बर साहब से जुड़ी परंपराएँ
  • उनके स्मृत शब्द और क्रियाकलाप

बाद में जुड़े दो

  • क़ियास — सदृशता के आधार पर तर्क
  • इजमा — समुदाय की सहमति
  • कारण — अरब क्षेत्र से बाहर प्रसार

“जहाँ के आचार-व्यवहार भिन्न थे” — जब परंपरा नए क्षेत्र में जाती है, उसे नए उपकरण गढ़ने पड़ते हैं

ज़िम्मी और जज़िया

§5.1

  • “उपमहाद्वीप में स्थिति जटिल थी क्योंकि बड़ी जनसंख्या इस्लाम धर्म को मानने वाली नहीं थी”
  • ज़िम्मी — अरबी शब्द ज़िम्मा से; अर्थ संरक्षित श्रेणी
    • “जो उद्घटित धर्मग्रंथ को मानने वाले थे” जैसे यहूदी और ईसाई
    • जज़िया नामक कर चुकाकर संरक्षण के अधिकारी
  • “भारत में इसके अंतर्गत हिंदुओं को भी शामिल कर लिया गया”
  • “मुगल शासक अपने आपको न केवल मुसलमानों का अपितु सारे समुदायों का बादशाह मानते थे”

और व्यवहार में नीति लचीली थी

§5.1

वास्तव में शासक शासितों की तरफ़ काफ़ी लचीली नीति अपनाते थे। बहुत से शासकों ने भूमि अनुदान व कर की छूट हिंदू, जैन, पारसी, ईसाई और यहूदी धर्मसंस्थाओं को दी तथा साथ ही ग़ैर-मुसलमान धार्मिक नेताओं के प्रति श्रद्धाभाव व्यक्त किया।

ऐसे अनुदान, अनेक मुगल बादशाहों जिनमें अकबर और औरंगज़ेब शामिल थे, द्वारा दिए गए

दो दस्तावेज़, एक ही बात

स्रोत 5 और स्रोत 6

अकबर का फ़रमान, 1598

  • ख़म्भात (गुजरात) में गिरजाघर के निर्माण की अनुमति
  • “उन्हें गिरजाघर की तामीर करने दें”
  • चेतावनी किसे? — “ख़म्बायत के महानुभाव”

औरंगज़ेब का पत्र, 1661-62

  • एक जोगी को संबोधित
  • “बुलंद मकाम शिवमूरत गुरु आनंद नाथ जियो!”
  • वस्त्र व पच्चीस रुपए की भेंट
  • “आप हमें लिख सकते हैं जब भी हमारी मदद की ज़रूरत हो”

बादशाह का आदेश और ज़मीन पर उसका पालन — दो अलग चीज़ें थीं

लोक प्रचलन में इस्लाम

§5.2

  • परिवर्तन “शासक वर्ग तक ही सीमित नहीं थे” — किसान, शिल्पी, योद्धा, व्यापारी तक फैले
  • पाँच ‘बातें’ — अल्लाह एकमात्र ईश्वर; पैगम्बर उनके दूत; पाँच बार नमाज़; ज़कात; रोज़ा व हज
  • पर व्यवहार में भिन्नता:
    • सांप्रदायिक (शिया, सुन्नी) वजहों से
    • और स्थानीय लोकाचारों के प्रभाव से

लोक-इस्लाम के तीन उदाहरण

#कौनक्या अपनाया
1खोजा इस्माइली (शिया)जीनन — संस्कृत ‘ज्ञान’ से; राग में निबद्ध भक्ति गीत; छह भाषाओं में
2मालाबार के अरब व्यापारीमलयालम भाषा + मातृकुलीयता व मातृगृहता
3मस्जिद-स्थापत्यसार्वभौमिक ढाँचा + स्थानीय छत व सामग्री

मातृगृहता — “स्त्रियाँ विवाह के बाद अपने मायके में ही अपनी संतान के साथ रहती हैं”

मस्जिद — क्या समान, क्या भिन्न

§5.2 — तीन चित्र साथ देखिए

सार्वभौमिक

  • मक्का की तरफ़ अनुस्थापन
  • मेहराब — प्रार्थना का आला
  • मिम्बर — व्यासपीठ

स्थानीय

  • छत का आकार
  • निर्माण का सामान
  • केरल — शिखर जैसी छत
  • बांग्लादेश — ईंटों की अतिया मस्जिद, 1609
  • श्रीनगर — लकड़ी की शाह हमदान मस्जिद, 1395

“एक सार्वभौमिक धर्म के स्थानीय आचारों के संग जटिल मिश्रण का सर्वोत्तम उदाहरण”

समुदायों के नाम — जन्मस्थान के आधार पर

नामकिसके लिए
तुरुष्कतुर्की मुसलमान
ताजिकतजाकिस्तान से आए लोग
पारसीकफारस के लोग
शकतुर्क व अफ़ग़ान
यवनग्रीक लोगों के लिए प्रयुक्त
म्लेच्छजो वर्ण नियमों का पालन नहीं करते और संस्कृत से न उपजी भाषाएँ बोलते

आठवीं से चौदहवीं सदी के संस्कृत ग्रंथों में “‘मुसलमान’ शब्द का शायद ही कहीं प्रयोग हुआ हो”

और NCERT का संतुलन

§5.3

हालाँकि ऐसे शब्दों में हीनभावना निहित थी किंतु उन्हें एक ऐसे विशिष्ट मुसलमान धार्मिक समुदाय के लिए शायद ही प्रयुक्त किया जाता था जो हिंदू समुदाय के विपक्ष में हों।

और जैसा हमने अध्याय 5 में देखा — ‘हिंदू’ शब्द को भी धार्मिक समुदाय के एकमात्र अर्थ में सीमित नहीं किया जा सकता

6 | सूफ़ीमत का विकास | तसव्वुफ़; ख़ानक़ाह; सिलसिला; उर्स; बा और बे-शरिया

सूफ़ीमत का उद्भव

§6

  • “इस्लाम की आरंभिक शताब्दियों में… खिलाफ़त की बढ़ती विषयशक्ति के विरुद्ध कुछ आध्यात्मिक लोगों का रहस्यवाद और वैराग्य की ओर झुकाव बढ़ा”
  • चार मूल स्थापनाएँ:
    • रूढ़िवादी बौद्धिक व्याख्या की आलोचना
    • मुक्ति के लिए ईश्वर की भक्ति और आदेशों का पालन
    • पैगम्बर मोहम्मद — इंसान-ए-कामिल; उनका अनुसरण
    • “सूफ़ियों ने कुरान की व्याख्या अपने निजी अनुभवों के आधार पर की”

भक्ति परंपरा भी “प्रेमभाव में तल्लीन” होने पर बल देती थी — यही ‘भक्ति-सूफ़ी’ शीर्षक का आधार है

परंपरा का अपना नाम अलग है

तसव्वुफ़

“सूफ़ीवाद उन्नीसवीं शताब्दी में मुद्रित एक अंग्रेज़ी शब्द है। इस सूफ़ीवाद के लिए इस्लामी ग्रंथों में जिस शब्द का इस्तेमाल होता है वह है तसव्वुफ़।”

शब्द की व्युत्पत्ति — तीन मत

साइड-बॉक्स, पृष्ठ 152

  • सूफ़ — जिसका अर्थ ऊन है
    • “उस खुरदुरे ऊनी कपड़े की ओर इशारा जिसे सूफ़ी पहनते थे”
  • सफ़ा — जिसका अर्थ है साफ़
  • सुफ़्फ़ा — “पैगम्बर की मस्जिद के बाहर एक चबूतरा था जहाँ निकट अनुयायियों की मंडली धर्म के बारे में जानने के लिए इकट्ठी होती थी”

यह छठा ‘नामकरण-जाल’ है — जैसे ‘हीनयान’ बनाम ‘थेरवाद’

ख़ानक़ाह की व्यवस्था

§6.1

  • ग्यारहवीं शताब्दी तक सूफ़ीवाद “एक पूर्ण विकसित आंदोलन” था
  • ख़ानक़ाह (फ़ारसी) — संगठित सूफ़ी समुदाय का केंद्र
  • नियंत्रण — शेख़ (अरबी), पीर अथवा मुर्शीद (फ़ारसी) के हाथ में
  • शेख़ के चार कार्य:
    • मुरीदों (अनुयायियों) की भर्ती
    • खलीफ़ा (वारिस) की नियुक्ति
    • आध्यात्मिक व्यवहार के नियम निर्धारित करना
    • ख़ानक़ाह के भीतर व शेख़ तथा जनसामान्य के रिश्तों की सीमा नियत करना

सिलसिला का शाब्दिक अर्थ

ज़ंजीर

“जो शेख़ और मुरीद के बीच एक निरंतर रिश्ते का द्योतक है, जिसकी पहली अटूट कड़ी पैगम्बर मोहम्मद से जुड़ी है”

दीक्षा, दरगाह और उर्स

§6.1

  • दीक्षा के अनुष्ठान — निष्ठा का वचन; सिर मुँड़ाना; थेगड़ी लगे वस्त्र
  • पीर की मृत्यु के बाद उनकी दरगाह (फ़ारसी — दरबार) भक्ति का स्थल बन जाती थी
  • ज़ियारत — दरगाह की तीर्थयात्रा, विशेषत: बरसी के अवसर पर
  • उर्स — शाब्दिक अर्थ विवाह
    • “मायने पीर की आत्मा का ईश्वर से मिलन”
    • “क्योंकि लोगों का मानना था कि मृत्यु के बाद पीर ईश्वर से एकीभूत हो जाते हैं और पहले के बजाय उनके अधिक करीब हो जाते हैं”

भाग-1 अध्याय 4 से तुलना — बुद्ध के अवशेष, स्तूप और तीर्थ; वही प्रक्रिया, नया संदर्भ

बा-शरिया और बे-शरिया

§6.2 — एकरूपता भी, अंतर भी

बा-शरिया

  • शरिया का पालन
  • ख़ानक़ाह के इर्द-गिर्द संगठित
  • सिलसिला व दीक्षा
  • चिश्ती, सुहरावर्दी, कादरी, नक्शबंदी

बे-शरिया

  • शरिया की अवहेलना
  • ख़ानक़ाह का तिरस्कार
  • फकीर की ज़िंदगी
  • “निर्धनता और ब्रह्मचर्य को गौरव”
  • कलंदर, मदारी, मलंग, हैदरी

समानता — दोनों रहस्यवादी हैं, दोनों सूफ़ी हैं, दोनों ईश्वर से निकटता चाहते हैं

7 | उपमहाद्वीप में चिश्ती सिलसिला | ख़ानक़ाह का जीवन; ज़ियारत; भाषा; राज्य

चिश्ती सबसे प्रभावशाली क्यों रहे?

§7 की पहली पंक्तियाँ

बारहवीं शताब्दी के अंत में भारत आने वाले सूफ़ी समुदायों में चिश्ती सबसे अधिक प्रभावशाली रहे। इसका कारण यह था कि उन्होंने न केवल अपने आपको स्थानीय परिवेश में अच्छी तरह ढाला अपितु भारतीय भक्ति परंपरा की कई विशिष्टताओं को भी अपनाया।

जो सबसे अधिक घुल-मिल गया, वही सबसे अधिक फैला

चिश्ती सिलसिला के मुख्य उपदेशक

सूफ़ीमृत्यु का वर्षदरगाह का स्थान
शेख़ मुइनुद्दीन चिश्ती1235अजमेर (राजस्थान)
ख़्वाजा कुतुबुद्दीन बख़्तियार काकी1235दिल्ली
शेख़ फरीदुद्दीन गंज-ए-शकर1265अजोधन (पाकिस्तान)
शेख़ निज़ामुद्दीन औलिया1325दिल्ली
शेख़ नसीरुद्दीन चिराग-ए-देहली1356दिल्ली

पाँच में तीन दिल्ली में — और पहला नाम आपके अपने राज्य में

ख़ानक़ाह में जीवन

§7.1 — शेख़ निज़ामुद्दीन औलिया की ख़ानक़ाह

  • स्थान — दिल्ली की बाहरी सीमा पर यमुना नदी के किनारे ग़ियासपुर
  • कई छोटे कमरे और एक बड़ा हाल (जमातख़ाना)
  • शेख़ छत पर एक छोटे कमरे में रहते; सुबह-शाम मेहमानों से मिलते
  • “एक बार मंगोल आक्रमण के समय पड़ोसी क्षेत्र के लोगों ने ख़ानक़ाह में शरण ली”
  • लंगर — फ़ुतूह (बिना माँगी खैर) पर चलता था

कौन आता था ख़ानक़ाह में?

§7.1

सुबह से देर रात तक सब तबके के लोग — सिपाही, गुलाम, गायक, व्यापारी, कवि, राहगीर, धनी और निर्धन, हिंदू जोगी और कलंदर यहाँ अनुयायी बनने, इबादत करने, ताबीज़ लेने अथवा विभिन्न मसलों पर शेख़ की मध्यस्थता के लिए आते थे।

इसी सूची में ‘गुलाम’ और ‘धनी’ साथ हैं; ‘हिंदू जोगी’ और ‘कलंदर’ भी

स्थानीय परंपराओं का आत्मसातीकरण

#व्यवहार
1शेख़ के सामने झुकना
2मिलने वालों को पानी पिलाना
3दीक्षितों का सर मुंडन
4यौगिक व्यायाम

“इस तथ्य के घोतक हैं कि स्थानीय परंपराओं को आत्मसात करने का प्रयत्न किया गया”

अजमेर की दरगाह

§7.2

  • ख़्वाजा मुइनुद्दीन — “ग़रीब नवाज़”; “सबसे अधिक पूजनीय दरगाह”
  • “पिछले सात सौ सालों से अलग-अलग संप्रदायों, वर्गों और समुदायों के लोग… आस्था प्रकट करते रहे हैं”
  • लोकप्रियता का एक व्यावहारिक कारण भी:
    • “चूँकि यह दरगाह दिल्ली और गुजरात को जोड़ने वाले व्यापारिक मार्ग पर थी”
    • “अत: अनेक यात्री यहाँ आते थे”
  • मुहम्मद बिन तुगलक (1324-51) — पहला सुल्तान जो यहाँ आया
  • गियासुद्दीन खलजी ने मज़ार पर पहली इमारत बनवाई

और फिर अकबर आया

चौदह बार

कभी साल में दो-तीन बार; नयी जीत के लिए आशीर्वाद लेने, संकल्प की पूर्ति पर, या पुत्रों के जन्म पर — यह परंपरा 1580 तक बनाए रखी

जहाँआरा की तीर्थयात्रा, 1643

स्रोत 7 — मुनिस-अल-अरवाह से

यह फकीरा जहाँआरा… मैंने अपने जर्द चेहरे को उसकी चौखट की धूल से रगड़ा। दरवाज़े से मुकद्दस दरगाह तक मैं नंगे पाँव वहाँ की ज़मीन को चूमती हुई गई… मैंने मज़ार के चारों ओर सात फेरे लिए… चूँकि गुलाबी दुपट्टा जो मेरे सिर पर था, मैं उतार चुकी थी इसलिए उसे मैंने मुकद्दस मज़ार के ऊपर रखा।

मुगल शहज़ादी — और स्वयं को ‘फकीरा’ कहती हैं

समा, ज़िक्र और कव्वाली

§7.2

  • “नाच और संगीत भी ज़ियारत का हिस्सा थे, खासतौर से कव्वालों द्वारा प्रस्तुत रहस्यवादी गुणगान”
  • ज़िक्र — ईश्वर का नाम-जाप
  • समा — श्रवण करना; आध्यात्मिक संगीत की महफिल
  • कौल — अमीर खुसरो (1253-1325) ने प्रचलित किया
    • कव्वाली के शुरू और आखिर में गाया जाता था
    • उसके बाद सूफ़ी कविता फारसी, हिंदवी अथवा उर्दू में
    • “कभी-कभी इन तीनों ही भाषाओं के शब्द इसमें मौजूद होते थे”

“चिश्ती उपासना पद्धति में सभा का महत्त्व इस तथ्य की पुष्टि करता है कि चिश्ती स्थानीय भक्ति परंपरा से जुड़े”

मुल्क का चिराग

साइड-बॉक्स — दरगाह कुली खान, अठारहवीं शताब्दी

शेख़ सिर्फ़ देहली के ही चिराग नहीं अपितु सारे मुल्क के चिराग हैं। लोगों का हुजूम यहाँ आता है खासतौर से इतवार के रोज़। दीवाली के महीने में दिल्ली की सारी आबादी दरगाह पर उमड़ आती है… हिंदू और मुसलमान एक ही भावना से आते हैं।

शेख़ नसीरुद्दीन चिराग-ए-देहली की दरगाह के बारे में — अठारहवीं सदी का प्रत्यक्षदर्शी विवरण

भाषा और संपर्क

§7.3

  • हिंदवी — “दिल्ली में चिश्ती सिलसिले के लोग हिंदवी में बातचीत करते थे”
  • बाबा फरीद — “क्षेत्रीय भाषा में काव्य रचना… जो गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित है”
  • मसनवी — लंबी कविताएँ; “ईश्वर के प्रति प्रेम को मानवीय प्रेम के रूपक द्वारा अभिव्यक्त”
  • पद्मावत — मलिक मोहम्मद जायसी
    • पद्मिनी और चित्तौड़ के राजा रतनसेन की प्रेम कथा
    • “उनकी आज़माइश प्रतीक है आत्मा की परमात्मा तक पहुँचने की यात्रा का”
    • “अकसर ख़ानक़ाहों में समा के दौरान ऐसे काव्यों का वाचन होता था”

दक्खनी — और स्त्रियों का श्रम

§7.3

  • बीजापुर, कर्नाटक के आसपास रची गई छोटी कविताएँ
  • भाषा — दक्खनी (उर्दू का रूप)
  • रचयिता — सत्रहवीं-अठारहवीं शताब्दियों के चिश्ती संत
  • “ये रचनाएँ संभवत: औरतों द्वारा घर का काम जैसे चक्की पीसते और चरखा कातते हुए गाई जाती थीं”
  • अन्य विधाएँ — लोरीनामा और शादीनामा

अध्याय 5 में यात्री स्त्री-श्रम दर्ज नहीं कर पाए थे; यहाँ वही श्रम एक साहित्यिक विधा की लय बन जाता है

चरखानामा

स्रोत 8 — चरखे के चलने की धुन पर

जैसे आप रुई लेते हैं, आप ज़िक्र-ए-जाली करें। / जैसे आप रुई को धुनते हैं, आप ज़िक्र-ए-कल्बी करें। / जैसे आप धागे को फिरकी पर लपेटते हैं, आप ज़िक्र-ए-आइनी करें… / स्वास के धागे एक-एक गिनें, बहन / चौबीस हज़ार तक गिनें / सुबह-शाम ऐसा करें और इसे तोहफ़े में अपने पीर को पेश करें।

शहज़ादी दरगाह गई, कातने वाली ने घर को ही दरगाह बना लिया

और इसका परिणाम

§7.3 का समापन

  • “लिंगायतों द्वारा लिखे गए कन्नड़ के वचन और पंढरपुर के संतों द्वारा लिखे मराठी के अभंगों ने भी उन पर अपना प्रभाव छोड़ा”
  • “इस माध्यम से इस्लाम दक्कन के गाँवों में जगह पाने में सफल हुआ”

भक्ति की भाषा ने सूफ़ी को गाँव तक पहुँचाया

सूफ़ी और राज्य — एक सूक्ष्म भेद

§7.4

  • चिश्ती की विशेषता — “संयम और सादगी का जीवन जिसमें सत्ता से दूर रहने पर बल”
  • “किंतु इसका मतलब यह नहीं था कि राजनीतिक सत्ता से अलगाव का भाव रखा जाए”
  • “सत्ताधारी विशिष्ट वर्ग अगर बिना माँगे अनुदान या भेंट देता था तो सूफ़ी संत उसे स्वीकार करते थे”
  • सुल्तानों ने कर मुक्त (इनाम) भूमि अनुदान व दान संबंधी न्यास दिए

और दान का क्या होता था?

§7.4

चिश्ती धन और सामान के रूप में दान स्वीकार करते थे किंतु इनको सँजोने के बजाय खाने, कपड़े, रहने की व्यवस्था और अनुष्ठानों जैसे समा की महफिलों पर पूरी तरह खर्च कर देते थे।

इस तरह शेख़ के नैतिक अधिकार की पुष्टि होती थी और आम लोगों का उनकी ओर झुकाव बढ़ता था

शासकों को सूफ़ी क्यों चाहिए थे?

§7.4 — तर्क-शृंखला

  • “जब तुर्कों ने दिल्ली सल्तनत की स्थापना की तो उलमा द्वारा शरिया लागू किए जाने की माँग को ठुकरा दिया”
  • “सुल्तान जानते थे कि उनकी अधिकांश प्रजा इस्लाम धर्म मानने वाली नहीं है”
  • “ऐसे समय सुल्तानों ने सूफ़ी संतों का सहारा लिया”
    • “जो अपनी आध्यात्मिक सत्ता को अल्लाह से उद्भूत मानते थे”
    • “और उलमा द्वारा शरिया की व्याख्या पर निर्भर नहीं थे”
  • “औलिया मध्यस्थ के रूप में”; इसलिए शासक क़ब्रें दरगाहों के नज़दीक बनवाना चाहते थे

सुल्तान को कानून नहीं, आशीर्वाद चाहिए था

पर तनाव भी था

§7.4 — संतुलन के लिए यह अनिवार्य है

  • “सुल्तानों और सूफ़ियों के बीच तनाव के उदाहरण भी मौजूद हैं”
  • “अपनी सत्ता का दावा करने के लिए दोनों ही कुछ आचारों पर बल देते थे”
    • जैसे झुक कर प्रणाम और कदम चूमना
  • “कभी-कभी सूफ़ी शेखों को आडंबरपूर्ण पदवी से संबोधित किया जाता था”
    • शेख़ निज़ामुद्दीन औलिया के अनुयायी उन्हें सुल्तान-उल-मशेख कहते थे
  • सब सूफ़ी एक जैसे नहीं थे:
    • सुहरावर्दी (सल्तनत-युग) व नक्शबंदी (मुग़ल-युग) राज्य से जुड़े रहे

शाही भेंट अस्वीकार, 1313

स्रोत 9 — अमीर हसन सिजज़ी

“इस ज़मीन, खेत और बगीचे का मुझे क्या करना है?… हमारे कोई भी आध्यात्मिक गुरु ने इस तरह का काम नहीं किया।” … मुस्कुराते हुए शेख-अल-इस्लाम ने कहा: मुझे धन दे दो मैं इसे दरवेशों में बाँट दूँगा, पर जहाँ तक ज़मीन के पट्टे का सवाल है उसे उन लोगों को दे दो जिन्हें उनकी कामना है।

धन स्वीकार्य, भूमि अस्वीकार्य — और बात कहानी सुनाकर समझाई गई

8 | नवीन भक्ति पंथ | कबीर; बाबा गुरु नानक; मीराबाई

कबीर — तीन संकलन, एक चुनौती

§8.1

  • काल — लगभग चौदहवीं-पंद्रहवीं शताब्दी
  • कबीर बीजक — कबीर पंथियों द्वारा, वाराणसी व उत्तर प्रदेश में संरक्षित
  • कबीर ग्रंथावली — राजस्थान के दादू पंथियों से संबंध
  • आदि ग्रंथ साहिब — कई पद इसमें संकलित
  • पर एक चेतावनी:
    • “लगभग सभी पांडुलिपि संकलन कबीर की मृत्यु के बहुत बाद में किए गए”
    • उन्नीसवीं शताब्दी में बंगाल, गुजरात व महाराष्ट्र में मुद्रांकित

कबीर की तीन शब्दावलियाँ

परंपराप्रयुक्त शब्द
इस्लामी दर्शनअल्लाह, खुदा, हजरत, पीर
वेदांत दर्शनअलख (अदृश्य), निराकार, ब्रह्मन्, आत्मन्
योगी परंपराशब्द, शून्य

कबीर ने एक ही सत्य को तीन परंपराओं की भाषा में कहा

उलटबाँसी और विरोधाभास

§8.1

  • उलटबाँसी — “उलटी कही उक्तियाँ”
    • “इस प्रकार से लिखी गईं कि उनके रोज़मर्रा के अर्थ को उलट दिया गया”
    • उद्देश्य — “परम सत्य के स्वरूप को समझने की मुश्किल दर्शाता है”
  • “विविध और कभी तो विरोधात्मक विचार इन पदों में व्यंजित होते हैं”
  • कुछ पद ज़िक्र और इश्क के सूफ़ी सिद्धांतों से ‘नाम सिमरन’ की हिंदू परंपरा व्यक्त करते हैं
  • और NCERT स्वयं पूछती है — “क्या ये सभी कविताएँ कबीर द्वारा रची गईं? यह कहना मुश्किल है।”

एक ईश्वर

स्रोत 10 — कबीर

हे भाई यह बताओ, किस तरह हो सकता है कि संसार के एक नहीं दो स्वामी हों? … ईश्वर को अनेक नामों से पुकारा जाता है: जैसे अल्लाह, राम, करीम, केशव, हरि तथा हज़रत। विभिन्नताएँ तो केवल शब्दों में हैं जिनका आविष्कार हम स्वयं करते हैं। … वे पूरा जीवन विवादों में ही गँवा देते हैं।

वे किसी एक पक्ष का समर्थन नहीं करते — दोनों को समान रूप से आलोचित करते हैं

एक स्रोत-आलोचना का पाठ

§8.1 — कबीर और रामानंद

  • जीवनियाँ सत्रहवीं शताब्दी से लिखी गईं — “यानी उनकी मृत्यु के 200 वर्ष बाद से”
  • कुछ परंपराएँ कहती हैं कि कबीर के गुरु रामानंद थे
  • पर इतिहासकार जाँचते हैं:
    • “कबीर के पद, गुरु और सतगुरु संबोधन का इस्तेमाल किसी विशेष व्यक्ति के संदर्भ में नहीं करते”
    • “कबीर और रामानंद का समकालीन होना मुश्किल प्रतीत होता है”
    • “अत: वे परंपराएँ जो दोनों को जोड़ती हैं, स्वीकार नहीं की जा सकतीं”
  • पर फिर उनका मूल्य क्या?
    • “किंतु उनसे यह अवश्य पता चलता है कि कबीर की विरासत बाद की पीढ़ी के लिए कितनी महत्त्वपूर्ण थी।”

जो कथन तथ्यात्मक रूप से ग़लत है, वह भी एक सच्चाई बताता है — कि लोग उसे सच मानना चाहते थे

बाबा गुरु नानक

§8.2

  • 1469-1539; जन्म एक हिंदू व्यापारी परिवार में
  • जन्मस्थल — ननकाना, मुख्यत: इस्लाम धर्मावलंबी पंजाब में, रावी नदी के पास
  • फारसी पढ़ी और लेखाकार के कार्य का प्रशिक्षण प्राप्त किया
  • “वह अपना अधिक समय सूफ़ी और भक्त संतों के बीच गुज़ारते थे”
  • “उन्होंने दूर-दराज़ की यात्राएँ भी कीं”
  • प्रचार — निर्गुण भक्ति

उन्होंने क्या अस्वीकार किया

§8.2

  • यज्ञ
  • आनुष्ठानिक स्नान
  • मूर्ति पूजा
  • कठोर तप
  • और — “हिन्दू और मुसलमानों के धर्मग्रंथों को भी उन्होंने नकारा”
  • “परम पूर्ण रब का कोई लिंग या आकार नहीं था”
  • उपाय — “निरंतर स्मरण व नाम का जाप”

शबद, संगत और गुरबानी

§8.2

  • विचार पंजाबी भाषा में शबद के माध्यम से
  • “यह शबद अलग-अलग रागों में गाते थे और उनका सेवक मरदाना रबाब बजाकर उनका साथ देता था”
  • संगत — सामुदायिक उपासना; “जहाँ सामूहिक रूप से पाठ होता था”
  • अनुयायी अंगद को गुरुपद पर आसीन किया; “इस परिपाटी का पालन 200 वर्षों तक होता रहा”
  • आदि ग्रंथ साहिब — गुरु अर्जन देव जी द्वारा संकलित
    • बाबा गुरु नानक + चार उत्तराधिकारी + बाबा फरीद, रविदास और कबीर
    • इन्हें “गुरबानी” कहा जाता है; “ये अनेक भाषाओं में रचे गए”

एक ही ग्रंथ में — एक सूफ़ी, एक जुलाहा, एक चर्मकार; यही ‘भक्ति-सूफ़ी’ शीर्षक का ग्रंथगत प्रमाण है

और एक निर्णायक ऐतिहासिक आकलन

§8.2

ऐसा प्रतीत होता है कि बाबा गुरु नानक किसी नवीन धर्म की संस्थापना नहीं करना चाहते थे, किंतु उनकी मृत्यु के बाद उनके अनुयायियों ने अपने आचार-व्यवहार को सुगठित कर अपने को हिंदू और मुसलमान दोनों से पृथक चिह्नित किया।

यही प्रस्तावना की बात है — “अनुयायियों की कई पीढ़ियों ने… परिवर्तित कर दिया अथवा त्याग दिया”

आगे का क्रम

§8.2

  • सत्रहवीं शताब्दी का उत्तरार्ध — दसवें गुरु गोबिन्द सिंह जी
  • नवें गुरु तेग बहादुर की रचनाओं को भी इसमें शामिल किया
  • और इस ग्रंथ को गुरु ग्रंथ साहिब कहा गया
  • खालसा पंथ — “पवित्रों की सेना” — की नींव डाली
  • पाँच प्रतीक — बिना कटे केश, कृपाण, कच्छ, कंघा और लोहे का कड़ा
  • “समुदाय एक सामाजिक, धार्मिक और सैन्य बल के रूप में संगठित होकर सामने आया”

मीराबाई

§8.3

  • लगभग पंद्रहवीं-सोलहवीं शताब्दी; “संभवत: भक्ति परंपरा की सबसे सुप्रसिद्ध कवयित्री”
  • जीवनी “उनके लिखे भजनों के आधार पर संकलित… जो शताब्दियों तक मौखिक रूप से संप्रेषित होते रहे”
  • मारवाड़ के मेड़ता जिले की राजपूत राजकुमारी
  • विवाह “उनकी इच्छा के विरुद्ध मेवाड़ के सिसोदिया कुल में”
  • तीन प्रतिरोध:
    • पति की आज्ञा की अवहेलना
    • पत्नी और माँ के परंपरागत दायित्वों को निभाने से इनकार
    • राजभवन से निकलकर एक परिब्राजिका संत बन गईं

कृष्ण के प्रति प्रेम

स्रोत 11 — मीराबाई, राजस्थानी में

राणों जी मेवाड़ो म्हारो काँई करसी, / म्हे तो गोबिंद रा गुण गास्याँ। / राणों जी रूससी गाँव रखासी, हरी रूस्याँ कुमलास्याँ॥

राजा की शक्ति सीमित है; भक्ति की हानि अपूरणीय

मीराबाई की सबसे बड़ी विशिष्टता

कोई पंथ नहीं, फिर भी सबसे दूर तक

“मीराबाई के आसपास अनुयायियों का जमघट नहीं लगा और उन्होंने किसी निजी मंडली की नींव नहीं डाली किंतु फिर भी वह शताब्दियों से प्रेरणा का स्रोत रही हैं”

और आज भी

§8.3

  • “उनके रचित पद आज भी स्त्रियों और पुरुषों द्वारा गाए जाते हैं”
  • “खासतौर से गुजरात व राजस्थान के गरीब लोगों द्वारा जिन्हें “नीच जाति” का समझा जाता है”
  • कुछ परंपराओं के अनुसार उनके गुरु रैदास थे — “जो एक चर्मकार थे”
  • “इससे पता चलता है कि मीरा ने जातिवादी समाज की रूढ़ियों का उल्लंघन किया”
  • उन्होंने विधवा के सफ़ेद वस्त्र अथवा संन्यासिनी के जोगिया वस्त्र धारण किए

9 | पुनर्निर्माण | हमें यह सब कैसे पता चला?

नौ खंड पढ़ लिए — अब एक प्रश्न बाकी है

  • यह सब हमें पता कैसे चला?
  • और हम कितना भरोसा करें?

स्रोत और उनकी शर्तें

§9

  • स्रोत — मूर्तिकला, स्थापत्य, धर्मगुरुओं से जुड़ी कहानियाँ, काव्य रचनाएँ
  • मूर्तिकला की शर्त:
    • “इसका इस्तेमाल तभी कर सकते हैं जब हम उसके संदर्भ को अच्छी तरह समझें”
    • “अर्थात इन आकृतियों और इमारतों को बनाने और उनका इस्तेमाल करने वालों के विचारों, आस्थाओं और आचारों की हमें समझ हो”
  • साहित्यिक स्रोतों की चुनौती:
    • “प्रत्येक किस्म के मूल-पाठ को समझने के लिए तरह-तरह का कौशल चाहिए”
    • “कई भाषाओं की जानकारी… और शैली व शैलियों में सूक्ष्म अंतरों को भी पहचानना”

एक अध्याय, नौ प्रकार की भाषाएँ

स्रोतभाषा / शैली
4 — बसवन्नासरल, स्पष्ट कन्नड़ — वचन
1, 2, 3तमिल भक्ति काव्य, संगीतबद्ध
5 — अकबर का फ़रमानअलंकृत फ़ारसी
7 — जहाँआराफ़ारसी गद्य, सूफ़ी जीवनी
8 — चरखानामादक्खनी लोकगीत
10 — कबीरसंत भाषा, निर्गुण पद
11 — मीराबाईराजस्थानी भक्ति पद

हर स्रोत के लिए एक अलग चाबी चाहिए — एक ही चाबी से सब ताले नहीं खुलते

सूफ़ी इतिहास के चार प्रकार के स्रोत

प्रकारअर्थप्रमुख उदाहरण
प्रबंध पुस्तिकाविचारों व आचारों पर ग्रंथकश्फ-उल-महजूब — अली बिन उस्मान हुजविरी (मृ. 1071)
मलफ़ुज़ातसूफ़ी संतों की बातचीतफवाइद-अल-फुआद — अमीर हसन सिजज़ी
मक्तूबातलिखे हुए पत्रों का संकलनशेख़ अहमद सरहिंदी (मृ. 1624)
तज़्किराजीवनियों का स्मरणसियार-उल-औलिया; अख़्बार-उल-अख़्यार

तज़्किरा लेखकों का उद्देश्य — “अपने सिलसिले की प्रधानता स्थापित करना”

और हर परंपरा के संदेशों की तीन नियति

सुरक्षित • संशोधित • विस्मृत

“इनमें से कुछ को सुरक्षित किया गया। बहुत सी सूचनाएँ ऐसी थीं जिनमें संप्रेषण के दौरान संशोधन हो गया, व कुछ संदेश ऐसे भी थे जो हमेशा के लिए विस्मृत हो गए।”

10 | संश्लेषण | काल-रेखा; दस सूत्र; और एक अंतिम प्रश्न

काल-रेखा को पढ़ने के चार तरीके

पृष्ठ 167

  • भौगोलिक गति — तमिलनाडु → कर्नाटक व पंजाब → पूरा उपमहाद्वीप
  • भक्ति और सूफ़ी एक ही सूची में
    • 1200-1300 — ज्ञानदेव व मुक्ताबाई (भक्ति) और मुइनुद्दीन चिश्ती, फरीदुद्दीन, कुतुबुद्दीन (सूफ़ी) — एक ही पंक्ति में
  • चार स्त्री-शिक्षक — अंडाल • मुक्ताबाई • लाल देद • मीराबाई
  • एक क्षेत्र, विविध धाराएँ — 1400-1500 उ.प्र. में कबीर, रैदास (निर्गुण) और सूरदास (सगुण)

ध्यान दीजिए — तिथियाँ “इन शिक्षकों के अनुमानित काल को इंगित करती हैं”

NCERT ने भक्ति और सूफ़ी संतों को अलग-अलग काल-रेखा में क्यों नहीं रखा?

  • 1200-1300 की पंक्ति फिर देखिए
  • और अध्याय का शीर्षक भी

अध्याय के दस सूत्र-वाक्य

#सूत्र
1धर्म का इतिहास केवल मेल का नहीं — मेल और मतभेद, दोनों का इतिहास है
2संत की वाणी हम तक सीधे नहीं पहुँची — वह अनुयायियों की पीढ़ियों से छनकर आई है
3समन्वय का अर्थ यह नहीं कि स्थानीय मिट गया — उसे एक नया नाम मिल गया
4चुनौती देने के लिए भी उसी सम्मान-शब्द का सहारा लेना पड़ा
5उन्होंने तर्क नहीं दिया — उन्होंने आईना दिखाया
6जब किसी समूह का आर्थिक महत्त्व बढ़ता है, उसकी आवाज़ भी सुनाई देने लगती है
7जो सबसे अधिक घुल-मिल गया, वही सबसे अधिक फैला
8शहज़ादी दरगाह गई, कातने वाली ने घर को ही दरगाह बना लिया
9जो कथन तथ्यात्मक रूप से ग़लत है, वह भी बताता है कि लोग उसे सच मानना चाहते थे
10जो परंपरा आज भी जीवित है, उसका इतिहास लिखना सबसे कठिन है

अध्याय का अंतिम अनुच्छेद

पृष्ठ 166

लगभग सभी धार्मिक परिपाटियाँ आज भी पनप रही हैं… किंतु चूँकि ये परंपराएँ आज भी लोगों के जीवन का हिस्सा हैं, लोगों के लिए यह मानना आसान नहीं होता कि समय के साथ संभवत: इन परिपाटियों में बदलाव आया होगा।

इतिहासकारों के लिए चुनौती यह है कि वे इस तथ्य की ओर जागरूक हों कि धार्मिक परंपराएँ भी अन्य परंपराओं की तरह परिवर्तनशील हैं।

और अंत में — आपका अपना काम

अपने दादा-दादी से पूछिए

अपने गाँव या शहर का कोई एक त्योहार चुनिए और पता कीजिए कि पचास साल पहले वह कैसा होता था — यही इतिहासकार का काम है