कक्षा XII • इतिहास भाग-1 • अध्याय 4 — विचारक, विश्वास और इमारतें
कक्षा — 12 · विषय — इतिहास (भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग-1)
एक पत्थर की मूर्ति को देखकर हम कैसे जानें कि उसे बनाने वाले क्या कहना चाहते थे?
यही इस पूरे अध्याय का केंद्रीय प्रश्न है। संकेत: उत्तर §11 ‘क्या हम सब कुछ देख-समझ सकते हैं?’ में मिलेगा।
एक हज़ार साल लंबी यात्रा
अध्याय का परिचय
- हम दार्शनिकों के बारे में पढ़ेंगे और जानेंगे कि उन्होंने समाज में अपनी स्थिति को समझने के क्या प्रयास किए
- देखेंगे कि उनके विचार मौखिक और लिखित परंपराओं में कैसे संग्रहित हुए
- तथा उन्हें स्थापत्य और मूर्तिकला के माध्यम से कैसी अभिव्यक्ति मिली
- ये सब जनता पर इन विचारकों के स्थायी प्रभाव को दर्शाते हैं
- ★महत्त्वपूर्ण सावधानी: हम बौद्ध धर्म का विशेष अध्ययन करेंगे — किंतु यह परंपरा अकेली विकसित नहीं हुई
“दूसरी कई परंपराएँ थीं जो एक-दूसरे के साथ लगातार वाद-विवाद और संवाद चला रही थीं।”
इतिहासकारों के स्रोत — अब दृश्य साक्ष्य भी
साक्ष्य का चौथा प्रकार
- बौद्ध, जैन और ब्राह्मण ग्रंथ
- इमारतों और अभिलेखों जैसे प्रभूत मात्रा में उपलब्ध भौतिक साक्ष्य
- ★उस युग की बची हुई इमारतों में सबसे सुरक्षित है साँची का स्तूप — यही अध्याय का प्रमुख केंद्र-बिंदु है
साक्ष्य का क्रम: अध्याय 1 = भौतिक • अध्याय 2 = अभिलेखीय • अध्याय 3 = साहित्यिक • अध्याय 4 = दृश्य (स्थापत्य, मूर्तिकला, चित्रकला)
1 | साँची की एक झलक | यूरोप ले जाने के प्रयास ; बेगमों की भूमिका
साँची उन्नीसवीं सदी में
शाहजहाँ बेगम का विवरण
- भोपाल से बीस मील उत्तर-पूर्व की तरफ़ एक पहाड़ी की तलहटी में बसा गाँव
- “हमने पत्थर की वस्तुओं, बुद्ध की मूर्तियों और एक प्राचीन तोरणद्वार का निरीक्षण किया…”
- मेजर अलेक्ज़ैंडर कनिंघम ने कई हफ़्तों तक रुककर निरीक्षण किया — चित्र बनाए, अभिलेख पढ़े, गुंबदनुमा ढाँचे के बीचोंबीच खुदाई की
- स्रोत: भोपाल की नवाब शाहजहाँ बेगम (शासनकाल 1868-1901) की आत्मकथा ताज-उल-इक़बाल तारीख़ भोपाल
- 1876 में एच.डी. बार्स्टो ने इसका अनुवाद किया
🧭 अध्याय 1 से जोड़: यही कनिंघम ASI के पहले डायरेक्टर जनरल थे — तीनों अध्यायों में आते हैं
साँची को यूरोप ले जाने के प्रयास★
- उन्नीसवीं सदी के यूरोपियों में साँची के स्तूप को लेकर काफ़ी दिलचस्पी थी
- फ़्रांसीसियों ने सबसे अच्छी हालत में बचे पूर्वी तोरणद्वार को फ़्रांस के संग्रहालय में प्रदर्शित करने के लिए शाहजहाँ बेगम से इजाज़त माँगी
- कुछ समय के लिए अंग्रेज़ों ने भी ऐसी ही कोशिश की
- ★सौभाग्यवश फ़्रांसिसी और अंग्रेज़ दोनों ही बड़ी सावधानी से बनाई प्लास्टर प्रतिकृतियों से संतुष्ट हो गए
- इस प्रकार मूल कृति भोपाल राज्य में अपनी जगह पर ही रही
एक निर्णय ने पूरे स्मारक को बचा लिया — यह बात कक्षा में रेखांकित कीजिए
भोपाल की बेगमों की भूमिका★
NCERT प्रश्न 3 का सीधा उत्तर
- शाहजहाँ बेगम और उनकी उत्तराधिकारी सुल्तानजहाँ बेगम ने इस प्राचीन स्थल के रख-रखाव के लिए धन का अनुदान दिया
- ★जॉन मार्शल ने साँची पर लिखे अपने महत्त्वपूर्ण ग्रंथों को सुल्तानजहाँ को समर्पित किया
- सुल्तानजहाँ बेगम ने वहाँ संग्रहालय और अतिथिशाला बनाने के लिए अनुदान दिया
- वहाँ रहते हुए ही जॉन मार्शल ने वे पुस्तकें लिखीं
- पुस्तक के विभिन्न खंडों के प्रकाशन में भी सुल्तानजहाँ बेगम ने अनुदान दिया
“इसलिए यदि यह स्तूप समूह बना रहा है तो इसके पीछे कुछ विवेकपूर्ण निर्णयों की बड़ी भूमिका है।”
साँची क्यों बचा रहा?
- शायद हम भाग्यशाली रहे कि इस स्तूप पर किसी रेल ठेकेदार या निर्माता की नज़र नहीं पड़ी
- यह उन लोगों से भी बचा रहा जो ऐसी चीज़ों को यूरोप के संग्रहालयों में ले जाना चाहते थे
- बौद्ध धर्म के इस महत्त्वपूर्ण केंद्र की खोज से आरंभिक बौद्ध धर्म के बारे में हमारी समझ में महत्त्वपूर्ण बदलाव आए
- आज यह जगह भारतीय पुरातात्त्विक सर्वेक्षण के सफल मरम्मत और संरक्षण का जीता जागता उदाहरण है
अध्याय के केंद्रीय प्रश्न: यह टीला क्यों बनाया गया? इसके अंदर क्या था? रेलिंग क्यों बनी? किसने बनवाया या धन दिया? इसकी “खोज” कब हुई?
2 | पृष्ठभूमि | यज्ञ और विवाद ; नए प्रश्न ; वाद-विवाद
ईसा पूर्व प्रथम सहस्राब्दि — विश्व इतिहास का मोड़★
§2 — एक ही युग, अनेक देश
उन्होंने जीवन के रहस्यों तथा इनसानों और विश्व व्यवस्था के बीच रिश्ते को समझने का प्रयास किया — और यही वह समय था जब गंगा घाटी में नए राज्य और शहर उभर रहे थे (अध्याय 2 व 3)
यज्ञों की परंपरा और उसमें परिवर्तन
§2.1
- ऋग्वेद (1500 से 1000 ईसा पूर्व में संकलित) — अग्नि, इंद्र, सोम आदि देवताओं की स्तुति का संग्रह
- यज्ञों के समय इन स्रोतों का उच्चारण किया जाता था
- प्रार्थनाएँ: मवेशी, बेटे, स्वास्थ्य, लंबी आयु के लिए
- ★यज्ञों में क्रमिक परिवर्तन:
- शुरू-शुरू में यज्ञ सामूहिक रूप से किए जाते थे
- बाद में (लगभग 1000 ई.पू. – 500 ई.पू.) कुछ यज्ञ घरों के मालिकों द्वारा
- राजसूय और अश्वमेध जैसे जटिल यज्ञ सरदार और राजा करते थे — ब्राह्मण पुरोहितों पर निर्भरता
स्रोत 1 के छंद वैदिक संस्कृत में रचे गए थे और पुरोहित परिवारों को मौखिक रूप में सिखाए जाते थे
स्रोत 2 — छांदोग्य उपनिषद
मेरी यह आत्मा धान या यव या सरसों या बाजरे के बीज की गिरी से भी छोटी है… यह आत्मा पृथ्वी से भी विशाल, क्षितिज से भी विस्तृत, स्वर्ग से भी बड़ी है और इन सभी लोकों से भी बड़ी है।
छांदोग्य उपनिषद, संस्कृत, लगभग छठी सदी ईसा पूर्व — ‘आत्मा की प्रकृति’
दूसरा श्लोक ‘सच्चा यज्ञ’ कहता है: “यह (पवन) जो बह रहा है, निश्चय ही एक यज्ञ है… बहते-बहते यह सबको पवित्र करता है” — यह यज्ञ की पुनर्परिभाषा है
नए प्रश्न — उपनिषदों की विचारधाराएँ
§2.2
- उपनिषदों (छठी सदी ई.पू. से) से पता चलता है कि लोग जानने को उत्सुक थे —
- जीवन का अर्थ
- मृत्यु के बाद जीवन की संभावना
- और पुनर्जन्म
- क्या पुनर्जन्म अतीत के कर्मों के कारण होता था? ऐसे मुद्दों पर पुरज़ोर बहस होती थी
- मनीषी परम यथार्थ की प्रकृति को समझने और अभिव्यक्त करने में लगे थे
- ★वैदिक परंपरा से बाहर के कुछ दार्शनिक यह सवाल उठा रहे थे कि सत्य एक होता है या अनेक
- लोग यज्ञों के महत्त्व के बारे में भी चिंतन करने लगे
प्रश्न बदल गए — और प्रश्न बदलने से ही नयी परंपराएँ जन्म लेती हैं
वाद-विवाद और चर्चाएँ
§2.3
- समकालीन बौद्ध ग्रंथों में 64 संप्रदायों या चिंतन परंपराओं का उल्लेख
- शिक्षक एक जगह से दूसरी जगह घूम-घूम कर एक-दूसरे से तथा सामान्य लोगों से तर्क-वितर्क करते थे
- ये चर्चाएँ कुटागारशालाओं (शब्दार्थ — नुकीली छत वाली झोपड़ी) या ऐसे उपवनों में होती थीं जहाँ घुमक्कड़ मनीषी ठहरते थे
- ★यदि एक शिक्षक अपने प्रतिद्वंद्वी को अपने तर्कों से समझा लेता था तो वह अपने अनुयायियों के साथ उसका शिष्य बन जाता था
- इसलिए किसी भी संप्रदाय के लिए समर्थन समय-समय पर बढ़ता-घटता रहता था
- ★महावीर और बुद्ध सहित कई शिक्षक वेदों के प्रभुत्व पर प्रश्न उठाते थे
- उन्होंने माना कि जीवन के दुःखों से मुक्ति का प्रयास हर व्यक्ति स्वयं कर सकता था
यह समझ ब्राह्मणवाद से बिलकुल भिन्न थी — जो मानता था कि किसी व्यक्ति का अस्तित्व उसकी जाति और लिंग से निर्धारित होता था
स्रोत 3 — दो कट्टर विरोधी दर्शन
सुत्त पिटक — राजा अजातसत्तु और बुद्ध की बातचीत
मक्खलि गोसाल — नियतिवाद (आजीविक)
- “दोनों में से कोई कुछ नहीं कर सकता”
- “सुख और दुख मानो पूर्व निर्धारित मात्रा में माप कर दिए गए हैं”
- “इसे संसार में बदला नहीं जा सकता”
- उपमा: जैसे धागे का गोला फेंकने पर अपनी पूरी लंबाई तक खुलता जाता है
- “मूर्ख और विद्वान दोनों ही पूर्व निर्धारित रास्ते से होते हुए दुःखों का निदान करेंगे”
अजित केसकंबलिन् — भौतिकवाद (लोकायत)
- “दान, यज्ञ या चढ़ावा जैसी कोई चीज़ नहीं होती”
- “इस दुनिया या दूसरी दुनिया जैसी कोई चीज़ नहीं होती”
- मनुष्य चार तत्वों से बना है — मृत्यु पर मिट्टी→पृथ्वी, जल→जल, गर्मी→आग, साँस→वायु
- “दान देने की बात मूर्खों का सिद्धांत है, खोखला झूठ है”
- “मृत्यु के बाद कोई नहीं बचता”
! अत्यंत महत्त्वपूर्ण: “इन दार्शनिक परंपराओं के ग्रंथ नष्ट हो गए हैं। इसलिए हमें अन्य परंपराओं से ही उनके बारे में जानकारी मिलती है।”
त्रिपिटक — ‘तीन टोकरियाँ’★
बॉक्स — बौद्ध ग्रंथ कैसे तैयार व संरक्षित हुए
★बुद्ध के किसी भी संभाषण को उनके जीवन काल में लिखा नहीं गया। मृत्यु के बाद (पाँचवीं-चौथी सदी ई.पू.) शिष्यों ने वेसली (वैशाली) में सभा बुलाई और शिक्षाओं का संकलन किया
बौद्ध ग्रंथों का प्रसार और संरक्षण
- पहले मौखिक रूप से संप्रेषित; बाद में लिखकर विषय और लंबाई के अनुसार वर्गीकरण
- हर पिटक के अंदर कई ग्रंथ; बाद के युगों में विद्वानों ने टीकाएँ लिखीं
- क्षेत्र-विशेष के इतिहास: श्रीलंका में दीपवंश (द्वीप का इतिहास) व महावंश (महान इतिहास)
- ज़्यादातर पुराने ग्रंथ पालि में; बाद के युगों में संस्कृत में
- ★चीनी यात्री: फ़ा-शिएन और श्वैन त्सांग बौद्ध ग्रंथों की खोज में चीन से भारत आए; पुस्तकें अपने देश ले गए जहाँ विद्वानों ने अनुवाद किया
- भारतीय बौद्ध शिक्षक भी दूर-दराज़ के देशों में गए और पुस्तकें साथ ले गए
कई सदियों तक पांडुलिपियाँ एशिया के बौद्ध विहारों में संरक्षित रहीं — पालि, संस्कृत, चीनी और तिब्बती भाषाओं से आधुनिक अनुवाद तैयार हुए
3 | लौकिक सुखों से आगे | महावीर का संदेश ; जैन धर्म का विस्तार
जैन दर्शन की केंद्रीय अवधारणाएँ
§3
- जैनों के मूल सिद्धांत महावीर के जन्म से पहले ही उत्तर भारत में प्रचलित थे
- जैन परंपरा के अनुसार महावीर से पहले 23 तीर्थंकर हो चुके थे
- तीर्थंकर = “वे महापुरुष जो पुरुषों और महिलाओं को जीवन की नदी के पार पहुँचाते हैं”
- ★सबसे महत्त्वपूर्ण अवधारणा: संपूर्ण विश्व प्राणवान है — “पत्थर, चट्टान और जल में भी जीवन होता है”
- ★अहिंसा — इनसानों, जानवरों, पेड़-पौधों और कीड़े-मकोड़ों को न मारना = जैन दर्शन का केंद्र बिंदु
- “वस्तुतः जैन अहिंसा के सिद्धांत ने संपूर्ण भारतीय चिंतन परंपरा को प्रभावित किया है”
- कर्म से जन्म-पुनर्जन्म का चक्र निर्धारित; मुक्ति हेतु त्याग और तपस्या; संसार के त्याग से ही संभव
इसीलिए मुक्ति के लिए विहारों में निवास करना एक अनिवार्य नियम बन गया
जैन साधु-साध्वी के पाँच व्रत
§3 — परीक्षा का निश्चित प्रश्न
हत्या न करना • चोरी नहीं करना • झूठ न बोलना • ब्रह्मचर्य (अमृषा) • धन संग्रह न करना
जैन धर्म प्राकृत, संस्कृत, तमिल जैसी अनेक भाषाओं में फैला; पांडुलिपियाँ मंदिरों से जुड़े पुस्तकालयों में संरक्षित; जैन तीर्थंकरों की मूर्तियाँ धार्मिक परंपराओं से जुड़ी सबसे प्राचीन मूर्तियों में हैं
स्रोत 4 — महल के बाहर की दुनिया
अगर संपूर्ण विश्व और वहाँ के सभी ख़ज़ाने तुम्हारे हो जाएँ तब भी तुम्हें संतोष नहीं होगा, न ही यह सारा कुछ तुम्हें बचा पाएगा। हे राजन्! जब तुम्हारी मृत्यु होगी और जब सारा धन पीछे छूट जाएगा तब सिर्फ़ धर्म ही, और कुछ भी नहीं, तुम्हारी रक्षा करेगा।
उत्तराध्ययन सूत्र — महारानी कमलावती अपने पति को संन्यास लेने के लिए समझा रही हैं
महावीर के उपदेश भी कहानियों के रूप में प्रस्तुत किए जाते थे जो आम लोगों को आकर्षित करते थे
4 | बुद्ध और ज्ञान की खोज | जीवन-कथा ; शिक्षाएँ ; संघ
बुद्ध — स्रोत और उनकी सीमा
§4
- बुद्ध उस युग के सबसे प्रभावशाली शिक्षकों में से एक थे
- विस्तार: पूरे उपमहाद्वीप में; मध्य एशिया होते हुए चीन, कोरिया और जापान; श्रीलंका से समुद्र पार कर म्याँमार, थाइलैंड और इंडोनेशिया तक
- हम कैसे जानते हैं? बौद्ध ग्रंथों का संपादन, अनुवाद और विश्लेषण; चरित लेखन से जानकारी
- ! स्रोत की सीमा: “इनमें से कई ग्रंथ बुद्ध के जीवन काल से लगभग सौ वर्षों के बाद लिखे गए”
- ★संतचरित: किसी संत की जीवनी; “संत की उपलब्धियों का गुणगान करते हैं, जो तथ्यात्मक रूप से पूरी तरह सही नहीं होते”
पर वे इसलिए महत्त्वपूर्ण हैं कि “ये हमें उस परंपरा के अनुयायियों के विश्वासों के बारे में बताते हैं”
सिद्धार्थ से बुद्ध तक
- सिद्धार्थ (बचपन का नाम) — शाक्य कबीले के सरदार के बेटे; महल की चारदीवारी के अंदर सब सुखों के बीच पले
- ★पहली यात्रा — चार दृश्य:
- एक वृद्ध व्यक्ति
- एक बीमार
- एक लाश — इन्हें देखकर गहरा सदमा
- एक गृहत्याग किया संन्यासी — जिसे “बुढ़ापे, बीमारी और मृत्यु से कोई परेशानी नहीं थी और उसने शांति प्राप्त कर ली थी”
- “उसी क्षण उन्हें यह अनुभूति हुई कि मनुष्य के शरीर का क्षय और अंत निश्चित है”
- साधना के मार्ग: एक था शरीर को अधिक से अधिक कष्ट देना — जिससे वे मरते-मरते बचे
- ★इन अतिवादी तरीकों को त्यागकर, कई दिन ध्यान करते हुए अंततः ज्ञान प्राप्त किया
इसके बाद से बुद्ध अर्थात् ज्ञानी व्यक्ति; बाकी जीवन धर्म या सम्यक जीवनयापन की शिक्षा दी
बुद्ध की शिक्षाएँ — मूल सिद्धांत
§5
- ★अलौकिक शक्तियों की बजाय विवेक और तर्क: मरे हुए बच्चे की शोकमग्न माँ को उन्होंने बच्चे को जीवित करने के बजाय मृत्यु के अवश्यभावी होने की बात समझायी
- कथाएँ आम जनता की भाषा में रची गईं जिससे आसानी से समझी जा सकें
- विश्व अनित्य है और लगातार बदल रहा है
- यह आत्माविहीन (अनात्मा) है क्योंकि यहाँ कुछ भी स्थायी या शाश्वत नहीं है
- इस क्षणभंगुर दुनिया में दुख मनुष्य के जीवन का अंतर्निहित तत्व है
- ★घोर तपस्या और विषयासक्ति के बीच मध्यम मार्ग अपनाकर मनुष्य दुखों से मुक्ति पा सकता है
★“बौद्ध धर्म की प्रारंभिक परंपराओं में भगवान का होना या न होना अप्रासंगिक था।”
बुद्ध का सामाजिक दृष्टिकोण★
§5 — अध्याय 2 व 3 से जोड़
- बुद्ध मानते थे कि समाज का निर्माण इनसानों ने किया था न कि ईश्वर ने
- इसीलिए उन्होंने राजाओं और गृहपतियों को दयावान और आचारवान होने की सलाह दी
- ★“ऐसा माना जाता था कि व्यक्तिगत प्रयास से सामाजिक परिवेश को बदला जा सकता था।”
- निर्वाण = अहं और इच्छा का ख़त्म हो जाना जिससे गृहत्याग करने वालों के दुख का चक्र समाप्त हो सके
- ★अंतिम निर्देश: “तुम सब अपने लिए ख़ुद ही ज्योति बनो क्योंकि तुम्हें ख़ुद ही अपनी मुक्ति का रास्ता ढूँढ़ना है।”
🧭 अध्याय 3 से जोड़: यह सुत्तपिटक के ‘महासम्मत’ मिथक (समाज मानव-निर्मित है) से सीधे मेल खाता है
संघ — संरचना और सामाजिक विस्तार
§6
- भिक्खु = चूँकि वे दान पर निर्भर थे; सादा जीवन; दिन में एक बार भोजन दान पाने के लिए एक कटोरा
- ★महिलाओं का प्रवेश: शुरू में सिर्फ़ पुरुष → बुद्ध के प्रिय शिष्य आनंद ने समझाकर अनुमति दिलाई
- ★बुद्ध की उपमाता महाप्रजापति गोतमी संघ में आने वाली पहली भिक्खुनी बनीं
- कई स्त्रियाँ धम्म की उपदेशिकाएँ बनीं; आगे चलकर थेरी — “ऐसी महिलाएँ जिन्होंने निर्वाण प्राप्त कर लिया हो”
- सामाजिक विस्तार: राजा, धनवान, गृहपति और सामान्य जन कर्मकार, दास, शिल्पी — सभी
- ★“एक बार संघ में आ जाने पर सभी को बराबर माना जाता था क्योंकि भिक्खु और भिक्खुनी बनने पर उन्हें अपनी पुरानी पहचान को त्याग देना पड़ता था।”
- ★संचालन पद्धति गणों और संघों की परंपरा पर आधारित — बातचीत से एकमत; अन्यथा मतदान द्वारा निर्णय
🧭 अध्याय 2 से जोड़: वही ‘गण और संघ’ जिनसे महावीर व बुद्ध संबंधित थे
स्रोत 6 — थेरीगाथा : दासी पुन्ना का तर्क
यह किसने कहा है कि पानी में नहाने से बुराई से मुक्ति मिलती है?… वैसा हो तो सारे मेंढक और कछुए स्वर्ग जाएँगे, साथ में पानी के साँप और मगरमच्छ भी!
थेरीगाथा (सुत्त पिटक का हिस्सा) — भिक्खुनियों द्वारा रचित छंदों का संकलन; रचयिता — दासी पुन्ना
★यह ग्रंथ अनूठा है — “इससे महिलाओं के सामाजिक और आध्यात्मिक अनुभवों के बारे में अंतर्दृष्टि मिलती है”; पुन्ना जल में उतरती थी सज़ा के डर से या ऊँचे घरानों की स्त्रियों के कटु वाक्यों के डर से
बौद्ध धर्म तेज़ी से क्यों फैला?
§6 का निष्कर्ष
- लोग समकालीन धार्मिक प्रथाओं से असंतुष्ट थे
- उस युग में तेज़ी से हो रहे सामाजिक बदलावों ने उन्हें उलझनों में बाँध रखा था
- ★बौद्ध शिक्षाओं में जन्म के आधार पर श्रेष्ठता की बजाय अच्छे आचरण और मूल्यों को महत्त्व दिया गया — उससे महिलाएँ और पुरुष इस धर्म की तरफ़ आकर्षित हुए
- ख़ुद से छोटे और कमज़ोर लोगों की तरफ़ मित्रता और करुणा के भाव को महत्त्व देने के आदर्श काफ़ी लोगों को भाए
चर्चा-प्रश्न: पुन्ना जैसी दासी संघ में क्यों जाना चाहती थी?
5 | स्तूप | क्यों बनाए गए ; कैसे बने ; संरचना
पवित्र स्थल और चैत्य
§7
- बहुत प्राचीन काल से ही लोग कुछ जगहों को पवित्र मानते थे
- अक्सर जहाँ ख़ास वनस्पति होती थी, अनूठी चट्टानें थीं या विस्मयकारी प्राकृतिक सौंदर्य था
- ऐसे स्थलों पर एक छोटी-सी वेदी भी बनी रहती थी जिसे कभी-कभी चैत्य कहा जाता था
- चैत्य: “शवदाह के बाद शरीर के कुछ अवशेष टीलों पर सुरक्षित रख दिए जाते थे। अंतिम संस्कार से जुड़े ये टीले चैत्य के रूप में जाने गए।”
- ★बुद्ध के जीवन से जुड़े चार स्थल: लुम्बिनी (जन्म) • बोधगया (ज्ञान) • सारनाथ (प्रथम उपदेश) • कुशीनगर (निब्बान)
असोक ने बुद्ध के समय से लगभग दो सौ वर्षों बाद लुम्बिनी की अपनी यात्रा की याद में एक स्तंभ बनवाया (अध्याय 2 — रुम्मिनदेई)
स्तूपों का निर्माण क्यों?
§7.1
- ऐसी जगहों पर बुद्ध से जुड़े कुछ अवशेष — उनकी अस्थियाँ या उनके द्वारा प्रयुक्त सामान — गाड़ दिए गए थे; इन टीलों को स्तूप कहते थे
- ★स्तूप बनाने की परंपरा बुद्ध से पहले की रही होगी, लेकिन वह बौद्ध धर्म से जुड़ गई
- चूँकि उनमें पवित्र अवशेष रहते थे, इसलिए समूचे स्तूप को ही बुद्ध और बौद्ध धर्म के प्रतीक के रूप में प्रतिष्ठा मिली
- ★असोकावदान के अनुसार असोक ने बुद्ध के अवशेषों के हिस्से हर महत्त्वपूर्ण शहर में बाँट कर उनके ऊपर स्तूप बनाने का आदेश दिया
- ईसा पूर्व दूसरी सदी तक भरहुत, साँची और सारनाथ जैसी जगहों पर स्तूप बन चुके थे
स्रोत 8 (महापरिनिब्बान सुत्त): बुद्ध ने पहले कहा “धर्मोत्साही बनो, अपनी भलाई के लिए प्रयास करो” — विशेष आग्रह पर ही थूप बनाने को कहा
स्तूपों का निर्माण कैसे हुआ? — दान के अभिलेख★
§7.2 — अध्याय 2 से सीधा जोड़
- स्तूपों की वेदिकाओं और स्तंभों पर मिले अभिलेखों से इन्हें बनाने और सजाने के लिए दिए गए दान का पता चलता है
- दान देने वाले:
- कुछ दान राजाओं द्वारा (जैसे सातवाहन वंश के राजा)
- कुछ दान शिल्पकारों और व्यापारियों की श्रेणियों द्वारा
- उदाहरण: साँची के एक तोरणद्वार का हिस्सा हाथी दाँत का काम करने वाले शिल्पकारों के दान से बना
- ★सैकड़ों महिलाओं और पुरुषों ने दान के अभिलेखों में अपना नाम बताया — कभी गाँव/शहर का नाम, कभी पेशा और रिश्तेदारों के नाम
- ★इन इमारतों को बनाने में भिक्खुओं और भिक्खुनियों ने भी दान दिया
🧭 अध्याय 2 की ‘श्रेणी’ और ‘दानात्मक अभिलेख’ यहाँ पत्थर में दिखाई देते हैं
स्तूप की संरचना★
§7.3 — निश्चित परीक्षा-प्रश्न
★प्रदक्षिणा: उपासक पूर्वी तोरणद्वार से प्रवेश करके टीले को दाईं तरफ़ रखते हुए दक्षिणावर्त परिक्रमा करते थे — मानो वे आकाश में सूर्य के पथ का अनुकरण कर रहे हों
6 | स्तूपों की ‘खोज’ | अमरावती और साँची की नियति
अमरावती की दुर्भाग्यपूर्ण कहानी
§8
- 1796एकस्थानीय राजा को मंदिर बनाते समय स्तूप के अवशेष मिले — पत्थरों के इस्तेमाल का निश्चय; लगा कि ख़ज़ाना छुपा हो
- कुछ वर्ष बादकॉलिन मेकेंज़ी ने कई मूर्तियाँ पाईं व विस्तृत चित्रांकन किया — किंतु उनकी रिपोर्ट कभी छपी नहीं
- 1854गुंटूर के कमिश्नर ने मूर्तियाँ व उत्कीर्ण पत्थर जमा कर मद्रास भेजे (एलियट संगमरमर); पश्चिमी तोरणद्वार खोजा
- 1850 का दशकपत्थर बिखरे —कलकत्ता (एशियाटिक सोसायटी), मद्रास (इंडिया ऑफिस), लंदन तक
- —“हर नया अधिकारी यह कहकर कुछ मूर्तियाँ उठा ले जाता था कि उसके पहले के अधिकारियों ने भी ऐसा किया”
निष्कर्ष: कमिश्नर ने माना कि अमरावती का स्तूप बौद्धों का सबसे विशाल और शानदार स्तूप था — और वही नष्ट हो गया
एच.एच. कोल का विरोध
इस देश की प्राचीन कलाकृतियों की लूट होने देना मुझे आत्मघाती और असमर्थनीय नीति लगती है।
पुरातत्त्ववेत्ता एच.एच. कोल — जो ‘मुट्ठी भर लोगों’ में एक थे जो अलग सोचते थे
उनका मत: संग्रहालयों में मूर्तियों की प्लास्टर प्रतिकृतियाँ रखी जानी चाहिए जबकि असली कृतियाँ खोज की जगह पर ही रखी जानी चाहिए
साँची क्यों बचा, अमरावती क्यों नष्ट हुआ?★
§8 का केंद्रीय प्रश्न
अमरावती — नष्ट हुआ
- खोज थोड़ी पहले हो गई थी
- तब तक विद्वान यह महत्त्व नहीं समझ पाए थे कि अवशेष को उठाकर ले जाने की बजाय खोज की जगह पर ही संरक्षित करना कितना महत्त्वपूर्ण है
- मूर्तियाँ मद्रास, कलकत्ता, लंदन तक बिखर गईं
- कोल अधिकारियों को राज़ी नहीं कर पाए
- आज यह “सिर्फ़ एक छोटा सा टीला है जिसका सारा गौरव नष्ट हो चुका है”
साँची — बच गया
- 1818 में खोज — तब तीन तोरणद्वार खड़े थे, चौथा वहीं गिरा था, टीला अच्छी हालत में
- तब भी सुझाव आया कि तोरणद्वार पेरिस या लंदन भेजे जाएँ
- खोज की जगह पर ही संरक्षण की बात साँची के लिए मान ली गई
- बेगमों का अनुदान व प्लास्टर प्रतिकृतियों का समाधान
- आज ASI के सफल संरक्षण का जीता जागता उदाहरण
समय का अंतर, और एक विचार का बदलना — इसी से एक स्मारक बचा और दूसरा गया
7 | मूर्तिकला | पत्थर में कथाएँ ; उपासना के प्रतीक ; लोक परंपराएँ
पत्थर में गढ़ी कथाएँ
§9.1
- आपने घुमक्कड़ कथावाचकों को देखा होगा जो कपड़ों या काग़ज़ पर बने चित्रों (चारणचित्र) को लेकर घूमते हैं
- चित्र 4.13: पहली बार देखने पर फूस की झोंपड़ी और पेड़ों वाले ग्रामीण दृश्य का चित्रण दिखता है
- ★परंतु कला इतिहासकार इसे वेसान्तर जातक से लिया गया दृश्य बताते हैं
- कथा: एक ऐसे दानी राजकुमार के बारे में जिसने अपना सब कुछ एक ब्राह्मण को सौंप दिया और स्वयं अपनी पत्नी और बच्चों के साथ जंगल में रहने चला गया
★“अक्सर इतिहासकार किसी मूर्तिकला की व्याख्या लिखित साक्ष्यों के साथ तुलना के द्वारा करते हैं।”
उपासना के प्रतीक — बुद्ध मानव रूप में नहीं★
§9.2
★“ऐसी मूर्तिकला को अक्षरशः नहीं समझा जा सकता। पेड़ का तात्पर्य केवल एक पेड़ नहीं था वरन् वह बुद्ध के जीवन की एक घटना का प्रतीक था।” — इसलिए इतिहासकार को कलाकृतियों के निर्माताओं की परंपराओं को जानना ज़रूरी है
लोक परंपराएँ — शालभंजिका★
§9.3
- साँची में उत्कीर्णित बहुत सी मूर्तियाँ शायद बौद्ध मत से सीधी जुड़ी नहीं थीं
- तोरणद्वार के किनारे एक पेड़ पकड़ कर झूलती हुई सुंदर स्त्री (चित्र 4.17)
- शुरू में विद्वान असमंजस में थे — “इस मूर्ति का त्याग और तपस्या से कोई रिश्ता नज़र नहीं आता था”
- ★साहित्यिक परंपराओं के अध्ययन से वे समझ पाए कि यह संस्कृत में वर्णित शालभंजिका की मूर्ति है
- लोक परंपरा: “इस स्त्री द्वारा छुए जाने से वृक्षों में फूल खिल उठते थे और फल होने लगते थे” → शुभ प्रतीक
- ★निष्कर्ष: “शालभंजिका की मूर्ति से पता चलता है कि जो लोग बौद्ध धर्म में आए उन्होंने बुद्ध-पूर्व और बौद्ध धर्म से इतर दूसरे विश्वासों, प्रथाओं और धारणाओं से बौद्ध धर्म को समृद्ध किया”
यही अध्याय की केंद्रीय बात है — परंपराएँ अकेले नहीं, संवाद में विकसित होती हैं
अन्य लोक-प्रतीक : जानवर, गजलक्ष्मी, सर्प
- जानवर: हाथी, घोड़े, बंदर और गाय-बैल के ख़ूबसूरत उत्कीर्णन
- जातकों से ली गई कहानियाँ भी हैं, पर लगता है लोगों को आकर्षित करने के लिए भी उत्कीर्णन हुआ
- ★जानवरों को मनुष्यों के गुणों के प्रतीक के रूप में — हाथी = शक्ति और ज्ञान
- ★गजलक्ष्मी (चित्र 4.19): कमल दल और हाथियों के बीच एक महिला; हाथी जल छिड़क रहे हैं जैसे अभिषेक कर रहे हों
- कुछ इतिहासकार उन्हें बुद्ध की माँ माया से जोड़ते हैं; दूसरे उन्हें लोकप्रिय देवी गजलक्ष्मी मानते हैं
- “यह भी संभव है कि उपासक इसे माया और गजलक्ष्मी दोनों से जोड़ते थे”
- सर्प (चित्र 4.21): “यह प्रतीक भी ऐसी लोक परंपराओं से लिया गया प्रतीत होता है जिनका ग्रंथों में हमेशा ज़िक्र नहीं होता था”
- ! जेम्स फ़र्गुसन ने साँची को वृक्ष और सर्प पूजा का केंद्र माना — क्योंकि वे बौद्ध साहित्य से अनभिज्ञ थे; तब तक ज़्यादातर बौद्ध ग्रंथों का अनुवाद नहीं हुआ था
बॉक्स: अजंता (महाराष्ट्र) की चित्रकारी — जातकों की कथाएँ, राजदरबार, शोभा यात्राएँ; आभाभेद तकनीक से त्रिविम रूप
8 | नयी धार्मिक परंपराएँ | महायान ; पौराणिक हिंदू धर्म ; मंदिर
महायान बौद्ध मत का विकास
§10.1
- ईसा की प्रथम सदी के बाद बौद्ध अवधारणाओं और व्यवहार में बदलाव
- प्रारंभिक बौद्ध मत: निब्बान के लिए व्यक्तिगत प्रयास; बुद्ध को भी एक मनुष्य समझा जाता था
- ★परंतु धीरे-धीरे एक मुक्तिदाता की कल्पना उभरने लगी — यह विश्वास कि वे मुक्ति दिलवा सकते थे
- ★बोधिसत्त की अवधारणा: परम करुणामय जीव जो अपने सत्कार्यों से पुण्य कमाते थे
- किंतु वे इस पुण्य का प्रयोग दुनिया को छोड़ने और निब्बान प्राप्ति के लिए नहीं करते थे — बल्कि इससे दूसरों की सहायता करते थे
- बुद्ध और बोधिसत्तों की मूर्तियों की पूजा इस परंपरा का महत्त्वपूर्ण अंग बनी
इस नयी परंपरा को महायान कहा गया; इन्होंने पुरानी परंपरा को हीनयान नाम से संबोधित किया
हीनयान या थेरवाद? — नामकरण की राजनीति★
बॉक्स, पृ. 103
- महायान के अनुयायी दूसरी बौद्ध परंपराओं के समर्थकों को हीनयान के अनुयायी कहते थे
- ★लेकिन, पुरातन परंपरा के अनुयायी ख़ुद को थेरवादी कहते थे
- थेरवाद का अर्थ: “वे लोग जिन्होंने पुराने, प्रतिष्ठित शिक्षकों (जिन्हें थेर कहते थे) के बताए रास्ते पर चलने वाले”
- ★अर्थात्:
- ‘हीनयान’ = बाहर से दिया गया नाम (जिसमें ‘छोटा/निम्न’ का अर्थ निहित है)
- ‘थेरवाद’ = वह नाम जो उस परंपरा ने स्वयं को दिया
🧭 अध्याय 1 व 3 से जोड़: ‘पुरोहित-राजा’, ‘राक्षस’, ‘म्लेच्छ’ — नाम स्वयं एक व्याख्या होता है
पौराणिक हिंदू धर्म का उदय
§10.2
- “मुक्तिदाता की कल्पना सिर्फ़ बौद्ध धर्म तक सीमित नहीं थी” — इसी तरह के विश्वास उन परंपराओं में भी विकसित हो रहे थे जिन्हें आज हिंदू धर्म के नाम से जाना जाता है
- वैष्णव — विष्णु सबसे महत्त्वपूर्ण देवता | शैव — शिव परमेश्वर
- ★भक्ति: “उपासना और ईश्वर के बीच का रिश्ता प्रेम और समर्पण का रिश्ता माना जाता था”
- दस अवतारों की कल्पना: “पापियों के बढ़ते प्रभाव के चलते जब दुनिया में अव्यवस्था और नाश की स्थिति आ जाती थी तब विश्व की रक्षा के लिए भगवान अलग-अलग रूपों में अवतार लेते थे”
- ★“संभवतः अलग-अलग अवतार देश के भिन्न-भिन्न हिस्सों में लोकप्रिय थे। इन सब स्थानीय देवताओं को विष्णु का रूप मान लेना एकीकृत धार्मिक परंपरा के निर्माण का एक महत्त्वपूर्ण तरीका था।”
शिव को उनके प्रतीक लिंग के रूप में; कभी मनुष्य रूप में भी; पहचान — शिरोवस्त्र, आभूषण, आयुध और बैठने की शैली से
पुराण — किसने रचे, किसने सुने★
§10.2
- कई कहानियाँ प्रथम सहस्राब्दि के मध्य से ब्राह्मणों द्वारा रचित पुराणों में मिलती हैं
- बहुत से किस्से सैकड़ों वर्ष पहले रचने के बाद सुने-सुनाए जाते रहे; इनमें देवी-देवताओं की कहानियाँ हैं
- सामान्यतः संस्कृत श्लोकों में लिखे गए
- ★“इन्हें ऊँची आवाज़ में पढ़ा जाता था जिसे कोई भी सुन सकता था। महिलाएँ और शूद्र जिन्हें वैदिक साहित्य पढ़ने-सुनने की अनुमति नहीं थी, पुराणों को सुन सकते थे।”
- ★“पुराणों की ज़्यादातर कहानियाँ लोगों के आपसी मेल-मिलाप से विकसित हुईं।” पुजारी, व्यापारी और सामान्य स्त्री-पुरुष आते-जाते हुए विश्वासों का आदान-प्रदान करते थे
- उदाहरण: वासुदेव-कृष्ण मथुरा इलाके के महत्त्वपूर्ण देवता थे; कई शताब्दियों में उनकी पूजा देश के दूसरे इलाकों में भी फैल गई
🧭 अध्याय 3 से जोड़: वहाँ वैदिक साहित्य से वंचित समूहों की चर्चा थी — यहाँ पुराण उन्हीं तक पहुँचते हैं
मंदिरों का बनाया जाना
§10.3
- जिस समय साँची जैसी जगहों में स्तूप अपने विकसित रूप में आ गए थे, उसी समय देवी-देवताओं की मूर्तियों को रखने के लिए सबसे पहले मंदिर भी बनाए गए
- आरंभिक मंदिर: एक चौकोर कमरा — गर्भगृह; एक दरवाज़ा जिससे उपासक भीतर प्रविष्ट हो सकता था
- धीरे-धीरे गर्भगृह के ऊपर ऊँचा ढाँचा — शिखर
- दीवारों पर भित्ति चित्र; बाद के युगों में विशाल सभास्थल, ऊँची दीवारें, तोरण; जल आपूर्ति का इंतज़ाम
- ★कृत्रिम गुफाएँ: कुछ मंदिर पहाड़ियों को काट कर खोखला करके बनाए गए
- सबसे प्राचीन कृत्रिम गुफाएँ ईसा पूर्व तीसरी सदी में असोक के आदेश से आजीविक संप्रदाय के संतों के लिए बनाई गई थीं
- विकसित रूप — आठवीं सदी का कैलाशनाथ मंदिर (एलोरा), जिसमें पूरी पहाड़ी काटकर उसे मंदिर का रूप दे दिया गया
★ताम्रपत्र अभिलेख एलोरा के प्रमुख तक्षक का आश्चर्य दर्ज करता है: “हे भगवान यह मैंने कैसे बनाया!”
9 | क्या हम सब कुछ देख-समझ सकते हैं? | व्याख्या की सीमाएँ
क्या हम इन कलाकृतियों के संदेश को बिना दुविधा के अपने-आप समझ सकते हैं?
“क्या हम कभी यह पूरी तरह से समझ पाएँगे कि जो लोग इन प्रतिकृतियों को देखते और पूजते थे उनके लिए इनका क्या महत्त्व था?”
अनजाने को समझने की कोशिश
§11.1
- यूरोप के विद्वानों ने उन्नीसवीं सदी में जब देवी-देवताओं की मूर्तियाँ देखीं तो वे उनकी पृष्ठभूमि और महत्त्व को नहीं समझ पाए
- ! “कई सिरों, हाथों वाली या मनुष्य और जानवर के रूपों को मिलाकर बनाई गई मूर्तियाँ उन्हें विकृत लगती थीं और कई बार वे घृणा से भर जाते थे”
- ★उन्होंने इन्हें समझने के लिए उनकी तुलना एक ऐसी परंपरा से की जिससे वे परिचित थे — प्राचीन यूनान की कला परंपरा
- गांधार की मूर्तियाँ: तक्षशिला और पेशावर जैसे उत्तर-पश्चिम के नगरों में मिलीं जहाँ भारतीय-यूनानी शासकों ने राज्य बनाए थे
- ये यूनानी मूर्तियों से काफ़ी मिलती-जुलती थीं → विद्वानों ने इन्हें भारतीय मूर्ति कला का सर्वश्रेष्ठ नमूना माना
- ★परिणाम: “इन विद्वानों ने इस कला को समझने के लिए एक तरीका अपनाया जो हम सब अक्सर अपनाते हैं — परिचित चीज़ों के आधार पर अपरिचित चीज़ों को समझने का पैमाना तैयार करना”
यह वाक्य आलोचना नहीं, आत्म-समीक्षा है — हम भी यही करते हैं
§11.2 जब लिखित और दृश्य का मेल न हो — महाबलीपुरम्
चित्र 4.30 — एक चट्टान, दो व्याख्याएँ
व्याख्या 1 — गंगावतरण
- इसमें गंगा नदी के स्वर्ग से अवतरण का चित्रण है
- चट्टान की सतह के मध्य प्राकृतिक दरार शायद नदी को दिखा रही है
- यह कथा महाकाव्यों और पुराणों में वर्णित है
व्याख्या 2 — अर्जुन की तपस्या
- यहाँ महाभारत में दी गई अर्जुन की तपस्या दिखाई गई है
- उद्देश्य — दिव्यास्त्र प्राप्त करना
- वे मूर्तियों के बीच एक साधु को केंद्र में रखे जाने की बात को महत्त्व देते हैं
! “कला इतिहासकारों ने पुराणों के साहित्य में इस कथा को पहचानने के लिए काफ़ी खोजबीन की है। लेकिन उनमें काफ़ी मतभेद हैं।”
अध्याय का निष्कर्ष
बहुत से रीति-रिवाज, धार्मिक विश्वास और व्यवहार इमारतों, मूर्तियों या चित्रकला के द्वारा स्थायी दृश्य माध्यमों के रूप में दर्ज नहीं किए गए… कई लोगों और समुदायों को चिरस्थायी विवरण रखने की ज़रूरत महसूस नहीं हुई हो।
NCERT, पृ. 109 — अध्याय का समापन अनुच्छेद
★“वस्तुतः हमने इस अध्याय में जिन शानदार उदाहरणों को चुना है वे एक विशाल ज्ञान राशि की मात्र ऊपरी परत हैं।”
कालरेखा 1 — महत्त्वपूर्ण धार्मिक बदलाव
वस्तुनिष्ठ प्रश्नों की खान
कालरेखा 2 — खोज और संरक्षण के चरण
व्यक्ति-वर्ष-कृति का मिलान
- 1814इंडियन म्यूज़ियम, कलकत्ता की स्थापना
- 1834रामराजा — एसेज़ ऑन द आर्किटेक्चर ऑफ़ द हिंदूज़; कनिंघम ने सारनाथ के स्तूप की छानबीन की
- 1835-1842जेम्स फ़र्गुसन ने महत्त्वपूर्ण पुरातात्त्विक स्थलों का सर्वेक्षण किया
- 1851गवर्नमेंट म्यूज़ियम, मद्रास की स्थापना
- 1854अलेक्ज़ैंडर कनिंघम — भिलसा टोप्स (साँची पर सबसे प्रारंभिक पुस्तकों में से एक)
- 1878राजेंद्र लाल मित्र — बुद्ध गया : द हेरिटेज ऑफ़ शाक्य मुनि
- 1880एच.एच. कोल प्राचीन इमारतों का संग्रहाध्यक्ष बनाए गए
- 1888ट्रेज़र-ट्रोव एक्ट — सरकार पुरातात्त्विक महत्त्व की किसी भी चीज़ को हस्तगत कर सकती थी
- 1914जॉन मार्शल व अल्फ़्रेड फूसे — द मॉन्युमेंट्स ऑफ़ साँची
- 1923जॉन मार्शल — कंज़र्वेशन मैनुअल
- 1955प्रधानमंत्रीजवाहरलाल नेहरू ने राष्ट्रीय संग्रहालय, नयी दिल्ली की नींव रखी
- 1989साँची को एक विश्व कला दाय स्थान घोषित किया गया
+ | NCERT से आगे | ज्ञान-विस्तार (वेब-सत्यापित) — ये तथ्य पाठ्यपुस्तक से अतिरिक्त हैं
🔍 ज्ञान-विस्तार: माप, संख्याएँ और नाम
[अतिरिक्त — NCERT से बाहर]
- साँची के महास्तूप के माप: ऊँचाई लगभग 16.46 मीटर; गुंबद का व्यास लगभग 36.6 मीटर
- UNESCO (1989): नामांकित समूह में लगभग तीन स्तूप, कई मंदिर तथा लगभग 50 स्मारक सम्मिलित हैं
- निर्माण के चरण: असोक-काल में ईंट का स्तूप व अशोक स्तंभ → शुंग काल (लगभग 184-72 ई.पू.) में पत्थर का आवरण, परिक्रमा-पथ व सीढ़ियाँ जोड़कर आकार बढ़ाया गया
- जॉन मार्शल का संरक्षण-कार्य: ASI के महानिदेशक के रूप में लगभग 1912–1919 के वर्षों में व्यवस्थित उत्खनन व पुनर्स्थापन
- अमरावती के संगमरमर आज कहाँ? लगभग एक-तिहाई लंदन (ब्रिटिश म्यूज़ियम) में; अधिकांश चेन्नई के गवर्नमेंट म्यूज़ियम में
- ‘एलियट संगमरमर’ नाम सर वाल्टर एलियट से जुड़ा है, जिन्होंने 1840 के दशक में इन्हें मद्रास भिजवाया
यही NCERT के कथन का ठोस प्रमाण है — “कुछ पत्थर लंदन तक पहुँच गए”
सारांश: एक नज़र में
पुनरावृत्ति
- विचारक: यज्ञ-परंपरा → उपनिषद के नए प्रश्न → 64 संप्रदाय → महावीर व बुद्ध; नियतिवाद व भौतिकवाद
- विश्वास: जैन (अहिंसा, 5 व्रत) • बौद्ध (अनित्य, अनात्मा, मध्यम मार्ग, संघ) • महायान व बोधिसत्त • वैष्णव-शैव व भक्ति
- इमारतें: स्तूप (अंड-हर्मिका-यष्टि-वेदिका-तोरणद्वार) • मंदिर (गर्भगृह-शिखर) • कृत्रिम गुफाएँ (एलोरा)
- खोज: अमरावती (नष्ट) बनाम साँची (सुरक्षित); बेगमों की भूमिका; एच.एच. कोल का सिद्धांत
- व्याख्या: प्रतीक • लोक परंपराएँ • यूनानी तुलना का पूर्वाग्रह • महाबलीपुरम् का मतभेद
उत्तर देखिए
उत्तर वही था: मूर्ति समझने के लिए चाहिए — निर्माताओं की परंपरा का ज्ञान + लिखित साक्ष्य से तुलना + यह स्वीकार कि कुछ प्रश्न अनुत्तरित रहेंगे