अध्याय 2राजा, किसान और नगर

प्रस्तुति29 मिनट

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कक्षा XII • इतिहास भाग-1 • अध्याय 2 — राजा, किसान और नगर

कक्षा — 12 · विषय — इतिहास (भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग-1)

पिछले अध्याय में लिपि पढ़ी नहीं जा सकी थी। इस अध्याय में लिपि पढ़ी जा चुकी है — तो क्या अब इतिहास आसान हो गया?

इस प्रश्न का उत्तर हम अंतिम कालांश में लौटकर देंगे। संकेत: उत्तर ‘§8 — अभिलेख साक्ष्य की सीमा’ में छिपा है।

हड़प्पा के बाद डेढ़ हज़ार वर्ष

पृष्ठभूमि

  • हड़प्पा सभ्यता के बाद डेढ़ हज़ार वर्षों का लंबा अंतराल — अनेक प्रकार के विकास
  • सिंधु व उपनदियों के किनारे रहने वालों द्वारा ऋग्वेद का लेखन
  • कृषक बस्तियाँ — उत्तर भारत, दक्कन पठार, कर्नाटक; चरवाहा बस्तियाँ — दक्कन व दक्षिण भारत
  • महापाषाण (Megalith) शवाधान — पहली सहस्राब्दि ई.पू.; पत्थरों के बड़े ढाँचे
    • कई स्थानों पर शवों के साथ लोहे के उपकरण व हथियार भी दफ़नाए गए

यह अध्याय वहीं से शुरू होता है जहाँ अध्याय 1 समाप्त हुआ था — पर स्रोत बदल चुके हैं

छठी शताब्दी ई.पू. — परिवर्तन का बिंदु

  • सबसे मुखर परिवर्तन: आरंभिक राज्यों, साम्राज्यों और रजवाड़ों का विकास
  • इनके पीछे: कृषि उपज को संगठित करने के तरीकों में परिवर्तन
  • साथ-साथ: लगभग पूरे उपमहाद्वीप में नए नगरों का उदय
  • इतिहासकारों के स्रोत: अभिलेख • ग्रंथ • सिक्के • चित्र

NCERT की चेतावनी: “यह एक जटिल प्रक्रिया है, और इन स्रोतों से विकास की पूरी कहानी नहीं मिल पाती”

1 | प्रिंसेप और पियदस्सी | लिपियों का अर्थ ; पियदस्सी की पहचान ; अभिलेखशास्त्र का जन्म

1830 का दशक: एक अधिकारी और दो लिपियाँ

  • जेम्स प्रिंसेप — ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारी — ने ब्राह्मी और खरोष्ठी लिपियों का अर्थ निकाला
  • इन्हीं लिपियों का प्रयोग सबसे आरंभिक अभिलेखों और सिक्कों में हुआ है
  • खोज: अधिकांश अभिलेखों-सिक्कों पर पियदस्सी — अर्थात् ‘मनोहर मुखाकृति वाला’ राजा
  • कुछ अभिलेखों पर नाम असोक — बौद्ध ग्रंथों के अनुसार सर्वाधिक प्रसिद्ध शासकों में से एक
  • परिणाम: राजनीतिक इतिहास के अध्ययन को नयी दिशा; बीसवीं सदी के आरंभिक दशकों तक राजनीतिक इतिहास का सामान्य चित्र तैयार

अगला चरण: विद्वानों ने ‘संदर्भ’ की ओर ध्यान दिया — पर पाया कि “संबंध तो थे, सीधे संबंध हमेशा नहीं थे”

अभिलेख (Inscriptions) — बुनियादी बातें

बॉक्स, पृ. 29

अभिलेखशास्त्र (Epigraphy) = अभिलेखों का अध्ययन • उदाहरण: 250 ई.पू. का ‘अ’ और 500 ई. का ‘अ’ अलग लिखे जाते थे

2 | प्रारंभिक राज्य | सोलह महाजनपद ; राजतंत्र बनाम गण ; मगध का उत्थान

सोलह महाजनपद

छठी शताब्दी ई.पू. — परिवर्तनकारी काल

  • इस काल से जुड़े परिवर्तन: आरंभिक राज्य • नगर • लोहे का बढ़ता प्रयोग • सिक्कों का विकास
  • इसी काल में बौद्ध तथा जैन सहित विभिन्न दार्शनिक विचारधाराओं का विकास
  • बौद्ध-जैन ग्रंथों में सोलह राज्यों का उल्लेख — परंतु सूची एकसमान नहीं
  • बार-बार आने वाले नाम: वज्जि, मगध, कोशल, कुरु, पांचाल, गांधार, अवन्ति
    • अर्थ: ये सबसे महत्त्वपूर्ण महाजनपदों में गिने जाते होंगे
  • जनपद = वह भूखंड जहाँ कोई जन (लोग, कुल, जनजाति) बस जाता है

सूची का एकसमान न होना स्वयं एक ऐतिहासिक सूचना है — इसे ध्यान से पढ़ाइए

शासन के दो प्रकार

महाजनपदों की राजनीतिक विविधता

राजतंत्र

  • अधिकांश महाजनपदों पर राजा का शासन
  • धर्मशास्त्रों की अपेक्षा — शासक क्षत्रिय वर्ण से हों
  • काम: किसानों, व्यापारियों, शिल्पकारों से कर तथा भेंट वसूलना
  • कुछ ने स्थायी सेना व नौकरशाही तैयार की

गण और संघ

  • कई लोगों का समूह शासन करता था
  • इस समूह का प्रत्येक व्यक्ति राजा कहलाता था
  • महावीर और बुद्ध इन्हीं गणों से संबंधित थे
  • वज्जि संघ: भूमि सहित आर्थिक स्रोतों पर सामूहिक नियंत्रण

ओलीगार्की/समूहशासन = सत्ता पुरुषों के एक समूह के हाथ में • स्रोतों के अभाव में इतिहास अधूरा, फिर भी ऐसे राज्य लगभग एक हज़ार साल तक बने रहे

मगध का उत्थान: दो अलग व्याख्याएँ

एक ही घटना, दो दृष्टियाँ

आधुनिक इतिहासकार (भौतिक कारण)

  • खेती की उपज खास तौर पर अच्छी
  • लोहे की खदानें (आधुनिक झारखंड) — उपकरण व हथियार
  • जंगली क्षेत्रों में हाथी — सेना का महत्त्वपूर्ण अंग
  • गंगा व उपनदियाँ — आवागमन सस्ता व सुलभ

आरंभिक जैन-बौद्ध लेखक (नीति-कारण)

  • मगध की महत्ता का कारण = शासकों की नीतियाँ
  • बिंबिसार, अजातसत्तु, महापद्मनंद — अत्यंत महत्त्वाकांक्षी
  • इनके मंत्री उनकी नीतियाँ लागू करते थे
  • अर्थात् व्यक्ति-केंद्रित व्याख्या

राजधानी: राजगाह (‘राजाओं का घर’, किलेबंद) → चौथी श. ई.पू. में पाटलिपुत्र (गंगा-मार्ग पर)

3 | एक आरंभिक साम्राज्य | मौर्य के स्रोत ; प्रशासन ; कितना महत्त्वपूर्ण था?

मौर्यवंश के बारे में जानकारी के स्रोत

§3.1 — स्रोत-विश्लेषण

संस्थापक चंद्रगुप्त मौर्य (लगभग 321 ई.पू.) — शासन अफ़ग़ानिस्तान-बलूचिस्तान तक; पौत्र असोक — कलिंग विजय

असोक और धम्म

  • असोक — पहला सम्राट जिसने अधिकारियों व प्रजा के लिए संदेश प्राकृतिक पत्थरों और पॉलिश किए स्तंभों पर लिखवाए
  • अभिलेखों के माध्यम से धम्म का प्रचार
  • धम्म के तत्व:
    • बड़ों के प्रति आदर
    • संन्यासियों और ब्राह्मणों के प्रति उदारता
    • सेवकों और दासों के साथ उदार व्यवहार
    • दूसरे के धर्मों और परंपराओं का आदर
  • भाषाएँ व लिपियाँ: अधिकांश अभिलेख प्राकृत/ब्राह्मी; पश्चिमोत्तर में अरामेइक व यूनानी; कुछ खरोष्ठी में

धम्म के सिद्धांत बहुत साधारण और सार्वभौमिक थे — यही उनकी शक्ति भी थी और सीमा भी

साम्राज्य का प्रशासन

§3.2

  • पाँच प्रमुख राजनीतिक केंद्र: राजधानी पाटलिपुत्र + चार प्रांतीय — तक्षशिला, उज्जयिनी, तोसलि, सुवर्णगिरि
  • केंद्रों का चयन बड़े ध्यान से:
    • तक्षशिला व उज्जयिनी — लंबी दूरी वाले महत्त्वपूर्ण व्यापार मार्ग पर
    • सुवर्णगिरि (= ‘सोने के पहाड़’) — कर्नाटक में सोने की खदान हेतु
  • पश्चिमोत्तर सीमांत से आंध्र-उड़ीसा-उत्तराखंड तक एक जैसे संदेश उत्कीर्ण
  • परंतु इतिहासकारों का निष्कर्ष: इतने विशाल साम्राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था समान रही होगी — यह संभव नहीं था
    • क्षेत्र बहुत विविध: कहीं अफ़ग़ान पहाड़, कहीं उड़ीसा के तट
    • सबसे प्रबल नियंत्रण संभवतः राजधानी व प्रांतीय केंद्रों पर

संचार में कई सप्ताह या महीने लगते — यात्रियों हेतु खान-पान व सुरक्षा आवश्यक; सेना सुरक्षा का प्रमुख माध्यम

मेगस्थनीज़: सैन्य-संगठन — एक समिति, छह उपसमितियाँ

स्रोत-आधारित

दूसरी उपसमिति का विस्तृत दायित्व: बैलगाड़ियाँ, सैनिकों का भोजन, जानवरों का चारा, सेवकों व शिल्पकारों की नियुक्ति

यूनानी स्रोतों के अनुसार मौर्य सेना

स्रोत 2 — अर्थशास्त्र व यूनानी विवरण

6,00,000 + 30,000 + 9,000

छह लाख पैदल सैनिक • तीस हज़ार घुड़सवार • नौ हज़ार हाथी। प्रश्न यह है — इतनी बड़ी सेना के भरण-पोषण के लिए किस तरह के संसाधन चाहिए होंगे?

कुछ इतिहासकार इस विवरण को अतिशयोक्तिपूर्ण मानते हैं — स्रोत पर प्रश्न उठाना भी इतिहास-विधि है

मौर्य साम्राज्य कितना महत्त्वपूर्ण था?

§3.3 — एक संतुलित मूल्यांकन

महिमामंडन के कारण (19वीं सदी)

  • भारत तब ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन औपनिवेशिक देश था
  • प्राचीन भारत में ऐसे साम्राज्य की संभावना उत्साहवर्धक लगी
  • मौर्यकालीन प्रस्तर मूर्तियाँ — अद्भुत कला के प्रमाण
  • असोक शक्तिशाली, परिश्रमी और बाद के राजाओं से विनीत भी
  • बीसवीं सदी के राष्ट्रवादी नेताओं ने प्रेरणा-स्रोत माना

आलोचनात्मक पुनर्मूल्यांकन

  • साम्राज्य मात्र डेढ़ सौ साल चला — बहुत बड़ा काल नहीं
  • सभी क्षेत्रों में नहीं फैल पाया (मानचित्र 2 देखिए)
  • सीमा के भीतर भी नियंत्रण एकसमान नहीं था
  • दूसरी शताब्दी ई.पू. से नए शासक व रजवाड़े स्थापित होने लगे

इतिहास-लेखन अपने युग से प्रभावित होता है — यह अध्याय स्वयं इसका उदाहरण देता है

4 | राजधर्म के नवीन सिद्धांत | दक्षिण के सरदार ; दैविक राजा ; प्रशस्ति

सरदार और राजा — भेद कैसे करें?

बॉक्स, पृ. 35 — परीक्षा का प्रिय प्रश्न

सरदार (Chief)

  • शक्तिशाली व्यक्ति; पद वंशानुगत हो भी सकता है, नहीं भी
  • समर्थक = उसके खानदान के लोग
  • कार्य: विशेष अनुष्ठान, युद्ध में नेतृत्व, विवादों में मध्यस्थता
  • अधीन लोगों से भेंट लेता है और समर्थकों में वितरण करता है
  • सामान्यतः कोई स्थायी सेना या अधिकारी नहीं

राजा (King)

  • संस्थागत, प्रायः वंशानुगत पद
  • कर वसूलते हैं (भेंट नहीं)
  • स्थायी सेना व नौकरशाही तंत्र
  • धर्मशास्त्रों द्वारा नियम-निर्धारण
  • राजधानी प्रायः किलेबंद

दो कसौटियाँ याद रखिए: भेंट बनाम कर • स्थायी सेना का होना या न होना

दक्षिण के राजा और सरदार

  • तमिलकम = तमिलनाडु + आंध्र प्रदेश व केरल के कुछ हिस्से
  • यहाँ चोल, चेर और पाण्ड्य जैसी सरदारियों का उदय — ये राज्य बहुत समृद्ध और स्थायी सिद्ध हुए
  • स्रोत: प्राचीन तमिल संगम ग्रंथ — सरदारों ने स्रोतों का संकलन और वितरण कैसे किया
  • लंबी दूरी के व्यापार से राजस्व जुटाने वाले:
    • सातवाहन — मध्य व पश्चिम भारत (लगभग द्वितीय श. ई.पू. – द्वितीय श. ई.)
    • शक शासक — पश्चिमोत्तर व पश्चिम; मध्य एशियाई मूल के
  • इनके सामाजिक उद्गम की अधिक जानकारी नहीं; सत्ता में आने के बाद ऊँचे सामाजिक अस्तित्व का दावा किया

स्रोत 3 — पाण्ड्य सरदार सेनगुत्तुवन की वनयात्रा (सिलप्पादिकारम्): उपहारों की लंबी सूची

दैविक राजा — कुषाण से गुप्त तक

§4.2

  • उच्च स्थिति पाने का साधन — देवी-देवताओं के साथ जुड़ना
  • कुषाण शासक (लगभग प्रथम श. ई.पू. – प्रथम श. ई.) ने इसका सर्वोत्तम उदाहरण दिया
    • माट (मथुरा के पास) व अफ़ग़ानिस्तान के देवस्थानों पर विशालकाय मूर्तियाँ
    • कुछ इतिहासकार: इनके ज़रिए स्वयं को देवतुल्य प्रस्तुत करना चाहते थे
    • उपाधि ‘देवपुत्र’ — संभवतः चीनी शासकों से प्रेरित, जो स्वयं को स्वर्गपुत्र कहते थे
  • गुप्त काल (चौथी श. ई.): कई साम्राज्य सामंतों पर निर्भर
    • सामंत स्थानीय संसाधनों से निर्वाह; शासकों का आदर व सैनिक सहायता
    • शक्तिशाली सामंत राजा बन जाते थे; दुर्बल राजा बड़े शासकों के अधीन

प्रमाण कहाँ से? कुषाण — सिक्के व मूर्तियाँ; गुप्त — साहित्य, सिक्के, अभिलेख व प्रशस्तियाँ

स्रोत 4 — समुद्रगुप्त की प्रशस्ति

वे परमात्मा पुरुष हैं… वे अजेय हैं… वे देवताओं में कुबेर (धन-देव), वरुण (समुद्र-देव), इंद्र (वर्षा के देवता) और यम (मृत्यु-देव) के तुल्य हैं।

प्रयाग प्रशस्ति (इलाहाबाद स्तंभ अभिलेख) — रचयिता हरिषेण, समुद्रगुप्त के राजकवि, संस्कृत में

इतिहासकार की सावधानी: प्रशस्तियों के रचयिता इन्हें तथ्यात्मक नहीं, काव्यात्मक ग्रंथ मानते थे

5 | बदलता हुआ देहात | राजा की छवि ; उपज ; विभिन्नताएँ ; भूमिदान

राजाओं के बारे में साधारण प्रजा क्या सोचती थी?

अभिलेखों से यह जवाब नहीं मिलता — क्योंकि साधारण जनता ने अपने विचारों के विवरण कम ही छोड़े। इतिहासकारों का रास्ता: जातक और पंचतंत्र की कथाएँ।

गंदतिन्दु जातक — कथा से इतिहास

§5.1 — जनता में राजा की छवि

  • जातक कथाएँ — पहली सहस्राब्दि ई. के मध्य में पालि भाषा में लिखी गईं; स्रोत मौखिक किस्से-कहानियाँ
  • कथा: एक कुटिल राजा की प्रजा किस प्रकार दुखी रहती है
    • दुखी: वृद्ध महिलाएँ, पुरुष, किसान, पशुपालक, ग्रामीण बालक — और जानवर भी
  • राजा पहचान बदलकर प्रजा के बीच गया → एक-एक कर सबने उसे भला-बुरा कहा
  • शिकायत: रात में डकैत हमला करते हैं, दिन में कर इकट्ठा करने वाले अधिकारी
  • बचने का उपाय: लोग गाँव छोड़कर जंगल में बस गए

निष्कर्ष: राजा और ग्रामीण प्रजा के बीच संबंध तनावपूर्ण; करों की माँग ने किसानों को उपज बढ़ाने के उपाय खोजने पर विवश किया

उपज बढ़ाने के तरीके — और उनकी सीमाएँ

§5.2

नयी तकनीकें

  • हल का प्रचलन — गंगा व कावेरी की उर्वर घाटियों में (छठी श. ई.पू. से)
  • भारी वर्षा वाले क्षेत्रों में लोहे के फाल वाले हल
  • धान की रोपाई — गंगा घाटी में उपज में भारी वृद्धि
  • सिंचाई — कुएँ, तालाब, कहीं-कहीं नहरें

सीमाएँ (जो प्रायः छूट जाती हैं)

  • धान की रोपाई में कमरतोड़ मेहनत
  • लोहे का हल कुछ ही हिस्सों तक सीमित
  • पंजाब-राजस्थान में इसका प्रयोग बीसवीं सदी में शुरू हुआ
  • पूर्वोत्तर व पर्वतीय क्षेत्रों में कुदाल अधिक उपयोगी

सिंचाई-साधन बनाने वाले प्रायः राजा या प्रभावशाली लोग थे — जिन्होंने इसका उल्लेख अभिलेखों में करवाया

स्रोत 5 — सुदर्शन झील की कहानी

एक झील, तीन काल-खंड

  1. मौर्य कालएकस्थानीय राज्यपाल द्वारा जलद्वारों व तटबंधों सहित निर्माण
  2. —भीषण तूफ़ान से तटबंध टूटे, सारा पानी बह गया
  3. लगभग 2री श. ई.शक शासकरुद्रदमन ने अपने खर्चे से मरम्मत करवाई; प्रजा से कर नहीं लिया
  4. लगभग 5वीं सदीउसी पाषाण-खंड पर दूसरा अभिलेख:गुप्त वंश के शासक ने पुनः मरम्मत करवाई

एक ही पत्थर पर तीन शताब्दियाँ दर्ज — यही अभिलेख की शक्ति है (मानचित्र 2 में गिरनार ढूँढ़िए)

ग्रामीण समाज में बढ़ती विभिन्नताएँ

§5.3 — उपज बढ़ी, पर लाभ समान नहीं

संभावित आधार: भूमि का स्वामित्व, श्रम और नयी प्रौद्योगिकी का उपयोग → भूमि-स्वामित्व महत्त्वपूर्ण हो गया

भूमिदान और नए संभ्रांत ग्रामीण

§5.4

  • ईसवी की आरंभिक शताब्दियों से भूमिदान के प्रमाण
  • माध्यम: कुछ पत्थरों पर, अधिकांश ताम्र पत्रों पर — संभवतः प्रमाण रूप में दान लेने वालों को दिए जाते थे
  • प्राप्तकर्ता: धार्मिक संस्थाएँ या ब्राह्मण; भाषा प्रायः संस्कृत (सातवीं श. के बाद तमिल-तेलुगु भी)
  • अग्रहार: ब्राह्मणों को दान किया भूभाग — भूमिकर या अन्य कर नहीं; ब्राह्मणों को स्वयं स्थानीय लोगों से कर वसूलने का अधिकार
  • नियंत्रण से बाहर के लोग: पशुपालक, संग्राहक, शिकारी, मछुआरे, शिल्पकार, घुमक्कड़, जगह-जगह घूमकर खेती करने वाले
    • ये लोग अपने जीवन और आदान-प्रदान के विवरण नहीं रखते थे

अंतिम बिंदु सीधे §8 से जुड़ता है — जिनका रिकॉर्ड नहीं, उनका इतिहास कैसे लिखें?

प्रभावती गुप्त — एक अपवाद जो नियम पर प्रश्न उठाता है

स्रोत 8 — अत्यंत महत्त्वपूर्ण

परिचय व विरोधाभास

  • चंद्रगुप्त द्वितीय (लगभग 375-415 ई.) की पुत्री
  • विवाह दक्कन के वाकाटक परिवार में
  • संस्कृत धर्मशास्त्रों के अनुसार महिलाओं को भूमि पर स्वतंत्र अधिकार नहीं था
  • परंतु अभिलेख बताता है — प्रभावती भूमि की स्वामी थी और उसने दान भी किया

NCERT की दो व्याख्याएँ

  • (1) वह एक रानी थी (ज्ञात कुछ रानियों में से एक) — इसलिए यह उदाहरण एक विरला ही रहा हो
  • (2) यह भी संभव है कि धर्मशास्त्रों को हर स्थान पर समान रूप से लागू नहीं किया जाता था
  • अर्थात्: ग्रंथ का नियम ≠ ज़मीनी व्यवहार

दंगुन गाँव की रियायतें: पुलिस/सैनिक प्रवेश नहीं; घास, खाल, कोयला, मदिरा, नमक, खनिज, फूल, दूध — सब पर छूट

भूमिदान का प्रभाव — एक गर्म वाद-विवाद

इतिहासकारों में मतभेद

मत 2 के समर्थक जोड़ते हैं: राजा स्वयं को उत्कृष्ट मानव दिखाना चाहते थे क्योंकि नियंत्रण ढीला होता जा रहा था — इसीलिए शक्ति का आडंबर

6 | नगर एवं व्यापार | नए नगर ; श्रेणी ; व्यापार-मार्ग ; सिक्के

नए नगर और उनकी अवस्थिति

§6.1

  • नगरों का विकास लगभग छठी शताब्दी ई.पू. से; अधिकांश नगर महाजनपदों की राजधानियाँ
  • प्रायः सभी नगर संचार मार्गों के किनारे बसे थे —
    • नदीमार्ग के किनारे: पाटलिपुत्र
    • भूतल मार्गों के किनारे: उज्जयिनी
    • समुद्रतट पर: पुहार (जहाँ से समुद्री मार्ग प्रारंभ)
    • व्यावसायिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक केंद्र: मथुरा
  • पाटलिपुत्र की कहानी: पाटलिग्राम गाँव → 5वीं श. ई.पू. में मगध की राजधानी → 4थी श. ई.पू. में एशिया के सबसे बड़े नगरों में से एक → श्वैन त्सांग (7वीं सदी ई.) के समय खंडहर, जनसंख्या भी कम

हर नगर का अपना इतिहास था — उत्थान और पतन दोनों

नगरीय जनसंख्या: संभ्रांत वर्ग और शिल्पकार

§6.2

  • उत्खनन की सीमा: अधिकांश स्थलों पर व्यापक खुदाई संभव नहीं — आज भी वहाँ लोग रहते हैं (हड़प्पा शहरों से भिन्न)
  • उत्तरी कृष्ण मार्जित पात्र (NBPW): चमकदार कलई चढ़े उत्कृष्ट कटोरे-थालियाँ — संभवतः अमीर लोग प्रयोग करते होंगे
  • सोने, चाँदी, कांस्य, ताँबे, हाथी दाँत, शीशे के गहने-उपकरण-हथियार-बर्तन
  • ★दानात्मक अभिलेख (द्वितीय श. ई.पू. से): दाता के नाम के साथ प्रायः उसका व्यवसाय भी
    • धोबी, बुनकर, लिपिक, बढ़ई, कुम्हार, स्वर्णकार, लौहकार, अधिकारी, धार्मिक गुरु, व्यापारी, राजा
  • ★श्रेणी (Guild): उत्पादकों व व्यापारियों का संघ — संभवतः पहले कच्चा माल खरीदती; फिर सामान तैयार कर बाज़ार में बेचती

चित्र 2.6 — मथुरा की मूर्ति पर प्राकृत अभिलेख: स्वर्णकार धर्मक की पत्नी नागपिया ने इसे स्थापित किया

उपमहाद्वीप और उसके बाहर का व्यापार

§6.3

  • छठी श. ई.पू. से नदी मार्गों व भूमार्गों का मानो जाल बिछ गया
  • भू-मार्ग: मध्य एशिया और उससे भी आगे
  • जलमार्ग: अरब सागर → उत्तरी अफ़्रीका, पश्चिम एशिया | बंगाल की खाड़ी → चीन, दक्षिणपूर्व एशिया
  • शासकों ने मार्गों पर नियंत्रण की कोशिश की; संभवतः व्यापारियों की सुरक्षा के बदले धन लेते थे
  • सफल व्यापारी: तमिल में मसत्तुवन; प्राकृत में सत्थवाह तथा सेट्ठी — ये बड़े धनी हो जाते थे
  • रोमन साम्राज्य में भारी माँग: काली मिर्च जैसे मसाले, कपड़े व जड़ी-बूटियाँ

स्रोत 9 — पेरिप्लस ऑफ़ एरीथ्रियन सी (यूनानी समुद्र यात्री, लगभग प्रथम श. ई.): पेरिप्लस = समुद्री यात्रा, एरीथ्रियन = लाल सागर

सिक्के और राजा — एक क्रमिक कथा

§6.4

मुद्राशास्त्र (Numismatics) = सिक्कों, उन पर के चित्र-लिपि, धातु-विश्लेषण तथा प्राप्ति-संदर्भ का अध्ययन

छठी श. ई. से सोने के सिक्के कम — आर्थिक संकट?

इतिहासकारों में मतभेद

मत 1 — हाँ, संकट था

  • रोमन साम्राज्य के पतन के बाद दूरवर्ती व्यापार में कमी
  • इससे उन राज्यों, समुदायों व क्षेत्रों की संपन्नता पर असर पड़ा
  • जिन्हें दूरवर्ती व्यापार से लाभ मिलता था

मत 2 — नहीं, तंत्र बदला

  • इस काल में नए नगरों और व्यापार के नवीन तंत्रों का उदय
  • सोने के सिक्के कम मिले, पर अभिलेखों-ग्रंथों में सिक्कों का उल्लेख होता रहा
  • संभवतः सिक्के प्रचलन में थे और किसी ने संग्रह करके नहीं रखा

“कम मिलना” और “कम होना” — दो अलग बातें हैं। यह भेद पूरे पुरातत्त्व पर लागू होता है

7 | मूल बातें | ब्राह्मी ; खरोष्ठी ; अभिलेखों का परीक्षण

ब्राह्मी और खरोष्ठी कैसे पढ़ी गईं?

§7.1–7.2

  • ब्राह्मी — आधुनिक भारतीय भाषाओं की लगभग सभी लिपियों का मूल; असोक के अभिलेखों में प्रयुक्त
  • 18वीं सदी से: यूरोपीय विद्वानों ने भारतीय पंडितों की सहायता से बंगाली-देवनागरी पांडुलिपियों के अक्षरों की प्राचीन नमूनों से तुलना शुरू की
  • एक बड़ी भूल: विद्वानों ने अनुमान लगाया कि अभिलेख संस्कृत में हैं — जबकि प्राचीनतम अभिलेख प्राकृत में थे
  • 1838 ई. — जेम्स प्रिंसेप ने असोककालीन ब्राह्मी का अर्थ निकाल लिया
  • खरोष्ठी की कहानी अलग: हिंद-यूनानी राजाओं के सिक्कों पर नाम यूनानी और खरोष्ठी दोनों में
    • यूरोपीय विद्वानों ने अक्षरों का मेल किया — जैसे अपोलोडोटस नाम में एक ही प्रतीक ‘अ’
    • प्रिंसेप द्वारा भाषा की पहचान प्राकृत के रूप में → लंबे अभिलेख पढ़ना सरल

★अध्याय 1 से तुलना: हड़प्पाई लिपि आज तक क्यों नहीं पढ़ी जा सकी? — क्योंकि कोई द्विभाषिक अभिलेख नहीं मिला

अभिलेखों का आलोचनात्मक परीक्षण

§7.3

  • असोक का नाम स्रोत 10 में नहीं लिखा — केवल उपाधियाँ:
    • देवानांपिय = ‘देवताओं का प्रिय’ • पियदस्सी = ‘देखने में सुन्दर’
  • अभिलेखशास्त्रियों का निष्कर्ष: विषय, शैली, भाषा और पुरालिपिविज्ञान सबमें समानता → एक ही शासक ने बनवाया
  • ! परीक्षण के तीन प्रश्न:
    • असोक का दावा कि पहले के शासकों ने रिपोर्ट-व्यवस्था नहीं की — क्या यह सही है? (कथन सत्य है, संभव है, या अतिशयोक्तिपूर्ण?)
    • कोष्ठकों में शब्द: अभिलेखशास्त्री अर्थ स्पष्ट करने हेतु जोड़ते हैं — ध्यान से, ताकि मूल अर्थ न बदले
    • क्या लोग उन्हें पढ़ते थे? अधिकांश लोग पढ़े-लिखे नहीं थे; क्या पाटलिपुत्र की प्राकृत सब जगह समझी जाती थी?

स्रोत 10 — पतिवेदक (संवाददाता): “चाहे मैं कहीं भी हूँ… मैं लोगों के विषयों का निराकरण हर स्थल पर करूँगा”

स्रोत 11 — कलिंग की कीमत

राजा की वेदना

1,50,000 निष्कासित • 1,00,000 मारे गए

”…और इससे भी ज्यादा की मृत्यु हुई।” इसके बाद देवानांपिय धम्म के गहन अध्ययन, धम्म के स्नेह और धम्म के उपदेश में डूब गए। यही उनके लिए कलिंग विजय का पश्चाताप है।

★सूक्ष्म अवलोकन: असोक के अभिलेख उड़ीसा से मिले हैं — पर वेदना वाला यह अभिलेख वहाँ नहीं मिला। इसका क्या अर्थ लगाएँ?

8 | अभिलेख साक्ष्य की सीमा | तकनीकी ; अर्थ-संबंधी ; मात्रात्मक ; विषय-वस्तु

अभिलेख साक्ष्य की सात सीमाएँ

अध्याय का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण खंड

  • तकनीकी: अक्षर हलके ढंग से उत्कीर्ण — पढ़ना मुश्किल; अभिलेख नष्ट भी हो सकते हैं
  • अर्थ-संबंधी: शब्दों के वास्तविक अर्थ का पूर्ण ज्ञान कठिन — कुछ अर्थ विशेष स्थान या समय से संबंधित
    • विद्वान आज भी पढ़ने की वैकल्पिक विधियों पर चर्चा करते रहते हैं
  • मात्रात्मक: हज़ारों अभिलेख मिले, पर सभी के अर्थ नहीं निकले, सभी प्रकाशित/अनूदित नहीं
    • अनेक अभिलेख कालांतर में सुरक्षित नहीं बचे → उपलब्ध अभिलेख कुल का अंश मात्र
  • ★विषय-वस्तु का चयन: ज़रूरी नहीं कि जिसे हम आज महत्त्वपूर्ण मानते हैं वह अंकित किया ही गया हो
    • खेती की दैनिक प्रक्रियाएँ और रोज़मर्रा के सुख-दुख अभिलेखों में नहीं मिलते — वे बड़े व विशेष अवसरों का वर्णन करते हैं
  • ★सबसे महत्त्वपूर्ण: अभिलेख हमेशा उन्हीं व्यक्तियों के विचार व्यक्त करते हैं जो उन्हें बनवाते थे

इसलिए इनमें व्यक्त विचारों की समीक्षा अन्य विचारों के परिप्रेक्ष्य में करनी होगी

अध्याय का निष्कर्ष

राजनीतिक और आर्थिक इतिहास का पूर्ण ज्ञान मात्र अभिलेख शास्त्र से ही नहीं मिलता है। साथ ही इतिहासकार प्रायः प्राचीन और अर्वाचीन दोनों प्रकार के प्रमाणों पर आशंका व्यक्त करते हैं।

NCERT, पृ. 49 — अध्याय का समापन अनुच्छेद

उन्नीसवीं सदी: राजाओं का इतिहास → बीसवीं सदी का मध्य: आर्थिक परिवर्तन व सामाजिक समुदाय → हाल के दशक: सामाजिक हाशिए के समुदाय

काल रेखा 1 — प्रमुख राजनीतिक व आर्थिक विकास

वस्तुनिष्ठ प्रश्नों की खान

  1. 600-500 ई.पू.धान की रोपाई; गंगा घाटी में नगरीकरण; महाजनपद; आहत सिक्के
  2. 500-400 ई.पू.मगध के शासकों की सत्ता पर पकड़
  3. 327-325 ई.पू.सिकंदर का आक्रमण
  4. 321 ई.पू.चंद्रगुप्त मौर्य का राज्यारोहण
  5. 272/268-231 ई.पू.असोक का शासन
  6. 185 ई.पू.मौर्य साम्राज्य का अंत
  7. 200-100 ई.पू.पश्चिमोत्तर में शक; दक्षिण में चोल-चेर-पांड्य; दक्कन में सातवाहन
  8. 100 ई.पू.-200 ई.शक शासक;रोमन व्यापार; सोने के सिक्के
  9. 78 ई.कनिष्क का राज्यारोहण(तिथि निश्चित नहीं)
  10. 100-200 ई.सातवाहन व शक शासकों द्वाराभूमिदान के अभिलेखीय प्रमाण
  11. 320 ई.गुप्त शासन का आरंभ
  12. 335-375 ई.समुद्रगुप्त
  13. 375-415 ई.चंद्रगुप्त द्वितीय; दक्कन में वाकाटक
  14. 500-600 ई.कर्नाटक में चालुक्य; तमिलनाडु में पल्लव
  15. 606-647 ई.हर्षवर्धन; चीनी यात्री श्वैन त्सांग की यात्रा
  16. 712 ई.अरबों की सिंध पर विजय

काल रेखा 2 — अभिलेखशास्त्र की प्रगति

व्यक्ति-वर्ष का मिलान

  1. 1784बंगाल एशियाटिक सोसाइटी का गठन
  2. 1810 का दशककोलिन मैकेंज़ी — संस्कृत व तमिल के 8,000 अभिलेख एकत्र
  3. 1838जेम्स प्रिंसेप — असोक के ब्राह्मी अभिलेखों का अर्थ
  4. 1877अलेक्ज़ैंडर कनिंघम — असोक के अभिलेखों का एक अंश प्रकाशित
  5. 1886एपिग्राफ़िआ कर्नाटिका का प्रथम अंक (दक्षिण भारत)
  6. 1888एपिग्राफ़िआ इंडिका का प्रथम अंक
  7. 1965-66डी.सी. सरकार — इंडियन एपिग्राफ़ी एंड इंडियन एपिग्राफ़िकल ग्लोसरी

+ | NCERT से आगे | ज्ञान-विस्तार (वेब-सत्यापित) ; ताज़ा घटनाक्रम — ये तथ्य पाठ्यपुस्तक से अतिरिक्त हैं

🔍 ज्ञान-विस्तार: नाम और तथ्य जो उत्तर चमकाते हैं

[अतिरिक्त — NCERT से बाहर] प्रतियोगी परीक्षाओं हेतु

  • असोक के अभिलेखों की संख्या: प्रचलित गणना के अनुसार लगभग 33 अभिलेख — महाशिलालेख, लघुशिलालेख तथा स्तंभ-अभिलेखों में विभाजित
  • कंदहार द्विभाषिक शिलालेख: असोक का वह अभिलेख जो यूनानी और अरामेइक दोनों में — प्राचीन भारत का उल्लेखनीय द्विभाषिक साक्ष्य
  • असोक का शासनकाल: प्रायः लगभग 268–232 ई.पू. माना जाता है (NCERT: 272/268–231 ई.पू.)
  • तक्षशिला — केवल प्रांतीय केंद्र ही नहीं, प्राचीन विश्व का प्रसिद्ध शिक्षा-केंद्र भी
  • NBPW का पूरा नाम — Northern Black Polished Ware; यह आरंभिक ऐतिहासिक नगरीकरण का प्रमुख पुरातात्त्विक सूचक माना जाता है

बोर्ड-उत्तर में NCERT-तथ्य मुख्य रखें; ये विस्तार-तथ्य पूरक रूप में जोड़ें

🗞 ताज़ा घटनाक्रम (31 जुलाई 2026 तक)ध्यान

[अतिरिक्त — समसामयिकी]

  • नया असोक अभिलेख — ‘बसाहा लघु शिलालेख’: ज्ञान-प्रवाह केंद्र (वाराणसी) द्वारा रतनपुरवा (कैमूर पहाड़ी शृंखला, उ.प्र.–बिहार सीमा) में एक गुफ़ा की बाहरी सतह पर असोक का अभिलेख खोजा गया
    • ASI ने इसे पिछले पचास वर्षों की उत्कृष्ट उपलब्धियों में से एक बताया
  • UNESCO नामांकन (फ़रवरी 2025): ‘मौर्य मार्गों पर असोक अभिलेख स्थल’ की एक शृंखला-नामांकन (Serial Nomination) UNESCO को प्रस्तुत
    • महत्त्व: अभिलेख-स्थलों को एक जुड़ी हुई सांस्कृतिक धरोहर के रूप में देखने की दृष्टि
  • कालरेखा 2 का विस्तार: NCERT की कालरेखा 1965-66 पर समाप्त होती है — नयी खोजें बताती हैं कि अभिलेखशास्त्र की कहानी अब भी चालू है

कक्षा-प्रयोग: “आपकी किताब कहती है कि हज़ारों अभिलेख मिले हैं — और 2020 के दशक में एक और मिला!”

सारांश: एक नज़र में

पुनरावृत्ति

  • राजनीति: महाजनपद (राजतंत्र + गण) → मगध → मौर्य → उत्तर-मौर्य (सरदार, कुषाण, गुप्त)
  • अर्थव्यवस्था: हल-लोहा-रोपाई-सिंचाई → उपज वृद्धि पर लाभ असमान → भूमिदान → नगर, श्रेणी, व्यापार, सिक्के
  • राजत्व: कर व स्थायी सेना (राजा) बनाम भेंट (सरदार) → दैविक राजा → प्रशस्ति व देवपुत्र
  • पद्धति: प्रिंसेप (1838) → ब्राह्मी व खरोष्ठी → अभिलेखों का आलोचनात्मक परीक्षण
  • सीमाएँ: तकनीकी • अर्थ-संबंधी • मात्रात्मक • विषय-वस्तु का चयन • बनवाने वाले का दृष्टिकोण
उत्तर देखिए

उत्तर वही था: लिपि पढ़ी जा चुकी है — फिर भी इतिहास आसान नहीं हुआ, केवल प्रश्न बदल गए