अध्याय 3 — जल संसाधन · समकालीन भारत-2 (भूगोल) · कक्षा 10
कक्षा — 10 · विषय — भूगोल (समकालीन भारत–2) · पृष्ठ — 19 से 29
अध्याय की शुरुआत दो बच्चों की बातचीत से होती है
चिंटू — “पिंकी, क्या तुमने टी.वी. पर असम में आई बाढ़ पर दिल दहलाने वाली रिपोर्ट देखी?”
पिंकी — “हाँ चिंटू। क्या यह आश्चर्यजनक नहीं है कि जल जीवन दे भी सकता है और ले भी सकता है।”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 19
यही पूरे अध्याय का सूत्र-वाक्य है — इसीलिए इसमें एक तरफ़ बाढ़ है और दूसरी तरफ़ सूखा; एक तरफ़ बड़े बाँध हैं और दूसरी तरफ़ छोटे टाँके
पृथ्वी का तीन-चौथाई भाग जल से ढका है — फिर पानी की कमी कैसे?
पहला तथ्य — पानी बहुत है, फिर भी कम है
पृष्ठ 19
- “तीन-चौथाई धरातल जल से ढका हुआ है, परंतु इसमें प्रयोग में लाने योग्य अलवणीय जल का अनुपात बहुत कम है”
- यह अलवणीय जल हमें सतही अपवाह और भौमजल स्रोत से प्राप्त होता है
- “जिनका लगातार नवीकरण और पुनर्भरण जलीय चक्र द्वारा होता रहता है”
- “सारा जल जलीय चक्र में गतिशील रहता है जिससे जल नवीकरण सुनिश्चित होता है”
यही अभ्यास प्रश्न 2(i) का पूरा उत्तर है — जल नवीकरण योग्य संसाधन क्यों है
और फिर वह भविष्यवाणी
“ऐसी भविष्यवाणी क्यों की जा रही है कि 2025 में 20 करोड़ लोग जल की नितांत कमी झेलेंगे?”
यह प्रश्न ही पूरे अध्याय का ढाँचा है। बाक़ी सब इसी का उत्तर है
1 | जल दुर्लभता | कमी असल में होती क्यों है
पहले वह ग़लतफ़हमी जिसे पाठ्यपुस्तक तोड़ती है
पृष्ठ 19
- “जैसे ही हम जल की कमी की बात करते हैं तो हमें तत्काल ही कम वर्षा वाले क्षेत्रों या सूखाग्रस्त इलाकों का ध्यान आता है”
- “हमारे मानस पटल पर तुरंत राजस्थान के मरुस्थल और जल से भरे मटके संतुलित करती हुई पनिहारिनों के चित्र चित्रित हो जाते हैं”
- “यह सच है कि वार्षिक और मौसमी परिवर्तन के कारण जल संसाधनों की उपलब्धता में समय और स्थान के अनुसार विभिन्नता है”
पर पाठ्यपुस्तक कहती है — यह असली कारण नहीं है
असली कारण यह हैं
“परंतु अधिकतया जल की कमी इसके अतिशोषण, अत्यधिक प्रयोग और समाज के विभिन्न वर्गों में जल के असमान वितरण के कारण होती है।”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 19–20
तीन शब्दों में — अतिशोषण · अत्यधिक प्रयोग · असमान वितरण
क्या प्रचुर पानी होने पर भी कमी हो सकती है?
हाँ — और हमारे कई शहर इसके उदाहरण हैं
पृष्ठ 20 · चित्र 3.1
- “क्या यह संभव है कि किसी क्षेत्र में प्रचुर मात्रा में जल संसाधन होने के बावजूद भी वहाँ जल की दुर्लभता हो? हमारे कई शहर इसके उदाहरण हैं”
- चित्र 3.1 में कोलकाता की तस्वीर है — रातभर की बारिश ने 180 मिलीमीटर का रिकॉर्ड बनाया और शहर ठप हो गया
- और उसी तस्वीर में एक लड़का सड़क पर खड़े पानी से पीने का पानी भर रहा है
- दूसरी तस्वीर — भूकंप से बची एक कश्मीरी महिला बर्फ़ में पानी ले जाते हुए
यही गुणात्मक दुर्लभता है — पानी है, पर पीने लायक़ नहीं
दो तरह की दुर्लभता — यह फ़र्क़ परीक्षा में पूछा जाता है
मात्रात्मक दुर्लभता
- पानी की मात्रा ही कम है
- जैसे कम वर्षा वाले या सूखाग्रस्त क्षेत्रों में
- हल — जल संग्रहण और सिंचाई
गुणात्मक दुर्लभता
- पानी है, पर उपयोग लायक़ नहीं
- प्रदूषण का कारण — घरेलू और औद्योगिक अपशिष्ट, रसायन, कीटनाशक और उर्वरक
- “मानव उपयोग के लिए ख़तरनाक है”
एक वाक्य में — कितना और कैसा — दोनों देखिए
और अब सबसे चौंकाने वाली तुलना
चित्र 3.1 का बॉक्स, पृष्ठ 20
| देश | औसत वार्षिक वर्षा | जल की स्थिति |
|---|---|---|
| इज़राइल | 25 सेंटीमीटर | जल का कोई अभाव नहीं |
| भारत | 114 सेंटीमीटर | हर वर्ष किसी भाग में सूखा अवश्य |
इसमें कुछ अजीब नहीं लग रहा? यह उल्टा है!
ऐसा क्यों है — यह पूरा उत्तर लिखिए
“देश में जल की उपलब्धता और उसके स्वरूप के अनुसार समुचित जलप्रबंधन न होने के कारण ही वर्षा का जल नदी-नालों में तेज़ी से बहकर समुद्र में चला जाता है, जिससे वर्षा के बाद के लगभग नौ महीने देश के लिए पानी की कमी के होते हैं। यही ही मूल कारण है देश में जलीय अभाव के, जिसे हम वांछित प्रबंधन के द्वारा ही नियंत्रित कर सकते हैं।”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 20
★यही पूरे अध्याय का निष्कर्ष है — समस्या पानी की नहीं, प्रबंधन की है
और दबाव कहाँ-कहाँ से आ रहा है
पृष्ठ 21
- निजी कुएँ और नलकूप — इनसे भौम जलस्तर नीचे गिर सकता है और भोजन सुरक्षा ख़तरे में पड़ सकती है
- औद्योगीकरण — उद्योगों को अत्यधिक जल के अलावा ऊर्जा भी चाहिए, जिसकी पूर्ति काफ़ी हद तक जल विद्युत से होती है
- शहरीकरण — शहरी आवास समितियों और कालोनियों ने जल पूर्ति के लिए अपने नलकूप लगा लिए हैं
- “इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि शहरों में जल संसाधनों का अति शोषण हो रहा है”
और जल केवल पीने के लिए नहीं — “अधिक अनाज उगाने के लिए भी चाहिए”, क्योंकि सिंचित कृषि में जल का सबसे ज़्यादा उपयोग होता है
तीन सरकारी योजनाएँ — ये आँकड़े अनिवार्य हैं
पृष्ठ 21 और 23
| योजना | मुख्य बात |
|---|---|
| जल जीवन मिशन | हर ग्रामीण परिवार को प्रति व्यक्ति 55 लीटर के सेवा स्तर पर पीने योग्य पाइप का पानी |
| अटल भूजल योजना | 7 राज्य (राजस्थान भी) · 80 ज़िले · 229 ब्लॉक · 8220 ग्राम पंचायत · कुल का लगभग 37 प्रतिशत |
| प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना | ‘हर खेत को पानी’ और ‘प्रति बूंद अधिक फसल’ |
अटल जल का प्रमुख पहलू ध्यान दीजिए — “जनता के व्यवहार में परिवर्तन लाना”। यानी सरकार कुआँ खोदने से पहले सोच बदलना चाहती है
2 | बहु-उद्देशीय परियोजनाएँ | ‘आधुनिक भारत के मंदिर’
पर बाँध बनाना हमारे लिए नयी बात नहीं है
प्राचीन भारत में जलीय कृतियाँ · पृष्ठ 22
| समय | कहाँ | क्या बना |
|---|---|---|
| ईसा से एक शताब्दी पहले | श्रिंगवेरा (इलाहाबाद के पास) | गंगा की बाढ़ के जल के लिए उत्कृष्ट जल संग्रहण तंत्र |
| चन्द्रगुप्त मौर्य का समय | — | बृहत् स्तर पर बाँध, झील और सिंचाई तंत्र |
| — | कलिंग · नागार्जुनकोंडा · बेन्नूर · कोल्हापुर | उत्कृष्ट सिंचाई तंत्र के सबूत |
| 11वीं शताब्दी | भोपाल झील | अपने समय की सबसे बड़ी कृत्रिम झीलों में से एक |
| 14वीं शताब्दी | दिल्ली, सिरी फोर्ट | इल्तुतमिश ने हौज़ खास बनवाया |
स्रोत — डाईंग विज़डम, सी एस ई, 1997
बाँध की परिभाषा — यह शब्दश: याद कीजिए
“बाँध बहते जल को रोकने, दिशा देने या बहाव कम करने के लिए खड़ी की गई बाधा है जो आमतौर पर जलाशय, झील अथवा जलभरण बनाती हैं। बाँध का अर्थ जलाशय से लिया जाता है न कि इसके ढाँचे से।”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 22
इस आख़िरी पंक्ति का मतलब समझिए — दीवार तो साधन है; जलाशय ही उद्देश्य है। इसीलिए जब जलाशय तलछट से भर जाता है, तो दीवार खड़ी रहने पर भी बाँध बेकार हो जाता है
आठ उद्देश्य — इसीलिए इन्हें ‘बहुउद्देशीय’ कहते हैं
पृष्ठ 22
- सिंचाई · विद्युत उत्पादन · घरेलू और औद्योगिक उपयोग · जल आपूर्ति
- बाढ़ नियंत्रण · मनोरंजन · आंतरिक नौचालन · मछली पालन
- “इसलिए बाँधों को बहुउद्देशीय परियोजनाएँ भी कहा जाता है जहाँ एकत्रित जल के अनेकों उपयोग समन्वित होते हैं”
- उदाहरण — सतलुज-ब्यास बेसिन में भाखड़ा-नांगल परियोजना जल विद्युत उत्पादन और सिंचाई दोनों के काम आती है
- और महानदी बेसिन में हीराकुड परियोजना में जलसंरक्षण और बाढ़ नियंत्रण का समन्वय है
दो जोड़ियाँ पक्की कीजिए — भाखड़ा-नांगल = सतलुज-ब्यास · हीराकुड = महानदी
और नेहरू का वह प्रसिद्ध वाक्य
“जवाहरलाल नेहरू गर्व से बाँधों को ‘आधुनिक भारत के मंदिर’ कहा करते थे। उनका मानना था कि इन परियोजनाओं के चलते कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था, औद्योगीकरण और नगरीय अर्थव्यवस्था समन्वित रूप से विकास करेगी।”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 22
इन परियोजनाओं को “उपनिवेशन काल में बनी बाधाओं को पार करते हुए देश को विकास और समृद्धि के रास्ते पर ले जाने वाले वाहन” के रूप में देखा गया
दामोदर घाटी का भादु लोकगीत
“हमने अषाढ़ में फसलें बोई हैं / हम भद्रा में भादु लाएँगे / बाढ़ से दामोदर फैल गई है / नाव इसमें नहीं चलेगी / ओह! दामोदर, हम आपके पैर पड़ते हैं / बाढ़ का कहर कुछ कम करो / भादु एक साल बाद आएगा / अपनी सतह पर नाव चलने दो”
दामोदर घाटी का लोकगीत · पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 22
दामोदर को ‘शोक की नदी’ कहा जाता है। और ध्यान दीजिए — गीत में लोग नदी से लड़ नहीं रहे, विनती कर रहे हैं
3 | और अब दूसरा पक्ष | बाँधों की आलोचना
चार पारिस्थितिक आलोचनाएँ
पृष्ठ 23
- बाँध बनाने से नदी का प्राकृतिक बहाव अवरुद्ध होता है, जिससे तलछट बहाव कम हो जाता है
- अत्यधिक तलछट जलाशय की तली पर जमा होता रहता है → नदी का तल अधिक चट्टानी → जलीय जीव-आवासों में भोजन की कमी
- “बाँध नदियों को टुकड़ों में बाँट देते हैं जिससे विशेषकर अंडे देने की ऋतु में जलीय जीवों का स्थानांतरण अवरुद्ध हो जाता है”
- बाढ़ के मैदान के जलाशयों में वनस्पति और मिट्टियाँ जल में डूब जाती हैं जो कालांतर में अपघटित हो जाती हैं
- सिंचाई ने फसल प्रारूप परिवर्तित कर दिया — किसान जलगहन और वाणिज्य फसलों की ओर आकर्षित हुए, जिससे मृदाओं का लवणीकरण होता है
और यह भी माना जाता है कि इनसे भूकंप की संभावना बढ़ती है तथा जल-जनित बीमारियाँ और प्रदूषण फैलते हैं
पर सबसे बड़ी आलोचना यह है
“नदी परियोजनाओं पर उठी अधिकतर आपत्तियाँ उनके उद्देश्यों में विफल हो जाने पर हैं। यह एक विडंबना ही है कि जो बाँध बाढ़ नियंत्रण के लिए बनाए जाते हैं उनके जलाशयों में तलछट जमा होने से वे बाढ़ आने के कारण बन जाते हैं। अत्यधिक वर्षा होने की दशा में तो बड़े बाँध भी कई बार बाढ़ नियंत्रण में असफल रहते हैं।”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 23
और तलछट, जो एक प्राकृतिक उर्वरक है, बाढ़ के मैदानों तक नहीं पहुँच पाती — जिससे भूमि निम्नीकरण बढ़ता है
सरदार सरोवर — राजस्थान के लिए यह अनिवार्य है
पृष्ठ 23
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| कहाँ | गुजरात में नर्मदा नदी पर |
| कितने राज्य | चार — महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात तथा राजस्थान |
| उद्देश्य | सूखा ग्रस्त तथा मरुस्थलीय भागों की जल आवश्यकता पूरी करना |
| गुजरात | 15 ज़िलों के 3112 गाँवों की 18.45 लाख हेक्टेयर |
| राजस्थान | बाड़मेर और जालौर के 2,46,000 हेक्टेयर |
| महाराष्ट्र | लिफ्ट के माध्यम से 37,500 हेक्टेयर |
★और यह पंक्ति ज़रूर याद रखिए — “राजस्थान में संपूर्ण कमांड क्षेत्र सूखा प्रवण है”
कृष्णा-गोदावरी विवाद
पृष्ठ 23
- विवाद की शुरुआत महाराष्ट्र सरकार द्वारा कोयना पर जल विद्युत परियोजना के लिए बाँध बनाकर जल की दिशा परिवर्तन करने से हुई
- इस पर कर्नाटक और आंध्र प्रदेश सरकारों ने आपत्ति जताई
- उनका तर्क — इससे इन राज्यों में पड़ने वाले नदी के निचले हिस्सों में जल प्रवाह कम हो जाएगा
- और कृषि तथा उद्योग पर विपरीत असर पड़ेगा
इसीलिए पाठ्यपुस्तक क्रियाकलाप देती है — “अंतर्राज्यीय जल विवादों की एक सूची तैयार करें”
4 | वर्षा जल संग्रहण | छोटे तरीक़े, बड़ा असर
यह विकल्प क्यों?
“बहुत से लोगों का मानना है कि बहुउद्देशीय परियोजनाओं के अलाभप्रद असर और उन पर उठे विवादों के चलते वर्षाजल संग्रहण तंत्र इनके सामाजिक-आर्थिक और पारिस्थितिक तौर पर व्यावहारिक विकल्प हो सकते हैं।”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 25
और प्राचीन भारत में “लोगों को वर्षा पद्धति और मृदा के गुणों के बारे में गहरा ज्ञान था”
पाँच पारंपरिक तरीक़े — यह तालिका सबसे ज़्यादा पूछी जाती है
पृष्ठ 25–26
| तरीक़ा | कहाँ | क्या करता था |
|---|---|---|
| गुल / कुल | पश्चिमी हिमालय | नदी की धारा का रास्ता बदलकर खेतों में सिंचाई |
| छत वर्षा जल संग्रहण | पश्चिमी भारत, विशेषकर राजस्थान | पीने का जल एकत्रित करना |
| बाढ़ जल वाहिकाएँ | पश्चिम बंगाल | बाढ़ के मैदान में खेतों की सिंचाई |
| खादीन | राजस्थान का जैसलमेर ज़िला | वर्षा जल एकत्रित करने के गड्ढे |
| जोहड़ | अन्य शुष्क क्षेत्र | वर्षा जल एकत्रित करने के गड्ढे |
आसान तरीक़ा — टाँका घर में होता है और पीने के लिए; खादीन-जोहड़ खेत में होते हैं और खेती के लिए
और अब राजस्थान का टाँका
राजस्थान के बीकानेर, फलोदी और बाड़मेर में लगभग हर घर में पीने का पानी संग्रहित करने के लिए भूमिगत टैंक अथवा ‘टाँका’ हुआ करते थे। फलोदी में एक घर में 6.1 मीटर गहरा, 4.27 मीटर लंबा और 2.44 मीटर चौड़ा टाँका था
इसका आकार एक बड़े कमरे जितना हो सकता है
टाँका काम कैसे करता था
पृष्ठ 26 — यह प्रक्रिया क्रम से याद कीजिए
- टाँका सुविकसित छत वर्षाजल संग्रहण तंत्र का अभिन्न हिस्सा होता था, जिसे मुख्य घर या आँगन में बनाया जाता था
- वे घरों की ढलवाँ छतों से पाइप द्वारा जुड़े हुए थे; छत से वर्षा का पानी इन नलों से होकर भूमिगत टाँके तक पहुँचता था
- ★“वर्षा का पहला जल छत और नलों को साफ़ करने में प्रयोग होता था और उसे संग्रहित नहीं किया जाता था। इसके बाद होने वाली वर्षा का जल संग्रह किया जाता था”
- टाँके में वर्षा जल अगली वर्षा ऋतु तक संग्रहित किया जा सकता था — यानी ग्रीष्म ऋतु तक पीने का जल
इस चौथे बिंदु पर रुकिए — पहली बारिश का पानी जान-बूझकर फेंका जाता था। आज यही काम एक उपकरण करता है जिसे ‘फ़र्स्ट फ़्लश डिवाइस’ कहते हैं
और वर्षाजल का नाम — ‘पालर पानी’
“वर्षाजल अथवा ‘पालर पानी’ जैसा कि इसे इन क्षेत्रों में पुकारा जाता है, प्राकृतिक जल का शुद्धतम रूप समझा जाता है।”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 27
और एक अनोखी बात — “कुछ घरों में तो टाँकों के साथ भूमिगत कमरे भी बनाए जाते हैं क्योंकि जल का यह स्रोत इन कमरों को भी ठंडा रखता था” — यानी एक ही ढाँचे से दो काम: पानी भी और ठंडक भी
पर आज एक दुख की बात
“यह दुख की बात है कि आज पश्चिमी राजस्थान में छत वर्षाजल संग्रहण की रीति इंदिरा गांधी नहर से उपलब्ध बारहमासी पेयजल के कारण कम होती जा रही है। हालाँकि कुछ घरों में टाँकों की सुविधा अभी भी है क्योंकि उन्हें नल के पानी का स्वाद पसंद नहीं है।”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 27
सोचिए — अगर किसी साल नहर का पानी रुक जाए, तो लौटने के लिए क्या बचेगा?
छत वर्षाजल संग्रहण की छह-चरणीय प्रक्रिया
चित्र 3.4, पृष्ठ 26
- पी.वी.सी. पाइप का इस्तेमाल करके छत का वर्षाजल एकत्रित किया जाता है
- रेत और ईंट प्रयोग करके जल का छनन (filter) किया जाता है
- भूमिगत पाइप के द्वारा जल हौज़ तक ले जाया जाता है, जहाँ से इसे तुरंत प्रयोग किया जा सकता है
- हौज़ से अतिरिक्त जल कुएँ तक ले जाया जाता है
- कुएँ का जल भूमिगत जल का पुनर्भरण करता है — और बाद में इस जल का उपयोग किया जा सकता है
दो तरीक़े दिखाए गए हैं — (अ) हैंडपंप के माध्यम से पुनर्भरण और (ब) बेकार पड़े कुएँ के माध्यम से पुनर्भरण
5 | आज के उदाहरण | पुराना ज्ञान, नया काम
शिलांग — जहाँ बारिश सबसे ज़्यादा है, और पानी की कमी भी
मेघालय की राजधानी शिलांग में छत वर्षाजल संग्रहण प्रचलित है। यह इसलिए रोचक है क्योंकि चेरापूँजी और मॉसिनराम — जहाँ विश्व की सबसे अधिक वर्षा होती है — शिलांग से केवल 55 किलोमीटर की दूरी पर ही स्थित हैं, और फिर भी यह शहर पीने के जल की गंभीर समस्या का सामना करता है
शहर के लगभग हर घर में छत वर्षा जल संग्रहण है, जिससे घरेलू माँग के लगभग 15–25 प्रतिशत हिस्से की पूर्ति होती है
गंडाथूर — ‘वर्षा जल संपन्न गाँव’
कर्नाटक, मैसूर ज़िला · पृष्ठ 27–28
| बिंदु | आँकड़ा |
|---|---|
| कितने घरों में व्यवस्था | लगभग 200 घर |
| वार्षिक वर्षा | लगभग 1,000 मिलीमीटर |
| संग्रहण दक्षता | 10 भराई के साथ 80 प्रतिशत |
| प्रति घर संग्रह | लगभग 50,000 लीटर प्रति वर्ष |
| कुल संग्रह | 200 घरों द्वारा हर वर्ष लगभग 10,00,000 लीटर |
हिसाब लगाइए — जल जीवन मिशन के 55 लीटर प्रति दिन के हिसाब से एक व्यक्ति को साल भर में लगभग 20,000 लीटर चाहिए। यानी 50,000 लीटर एक छोटे परिवार की पूरे साल की ज़रूरत पूरी कर सकता है
और मेघालय की बाँस ड्रिप सिंचाई
मेघालय में नदियों व झरनों के जल को बाँस द्वारा बने पाइप द्वारा एकत्रित करके ले जाने की 200 वर्ष पुरानी विधि प्रचलित है। लगभग 18 से 20 लीटर सिंचाई पानी बाँस पाइप में आता है और उसे सैकड़ों मीटर की दूरी तक ले जाया जाता है
अंत में पानी का बहाव 20 से 80 बूँद प्रति मिनट तक घटाकर पौधे की जड़ों के निकट छोड़ दिया जाता है — और यह पूरा काम गुरुत्वाकर्षण से होता है
इस पर एक पल रुकिए
200 साल पहले, बिना बिजली के, बिना प्लास्टिक के, बिना पंप के — सिर्फ़ बाँस और गुरुत्वाकर्षण से ड्रिप सिंचाई। और आज सरकार की प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना का नारा है — ‘प्रति बूंद अधिक फसल’।
पाठ्यपुस्तक के दो अलग पन्ने — 23 और 28 — असल में एक ही बात कह रहे हैं
यानी विचार नया नहीं है; सिर्फ़ उसका नाम नया है
और तमिलनाडु का उदाहरण
“तमिलनाडु एक ऐसा राज्य है जहाँ पूरे राज्य में हर घर में छत वर्षाजल संग्रहण ढाँचों का बनाना आवश्यक कर दिया गया है। इस संदर्भ में दोषी व्यक्तियों पर क़ानूनी कार्यवाही हो सकती है।”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 28
यानी तमिलनाडु ने वर्षाजल संग्रहण को सलाह नहीं, क़ानून बना दिया
6 | समापन | पूरे अध्याय की एक तालिका
एक नज़र में पूरा अध्याय
आख़िरी दिन के लिए
| भाग | मुख्य बात एक वाक्य में |
|---|---|
| जल दुर्लभता | कमी सिर्फ़ कम वर्षा से नहीं — अतिशोषण, अत्यधिक प्रयोग और असमान वितरण से होती है |
| इज़राइल बनाम भारत | 25 सेमी. वाला देश सुखी, 114 सेमी. वाला प्यासा — समस्या प्रबंधन की है |
| तीन योजनाएँ | जल जीवन मिशन (55 लीटर) · अटल भूजल योजना (7 राज्य, 37%) · PMKSY (प्रति बूंद अधिक फसल) |
| बहुउद्देशीय परियोजनाएँ | आठ उद्देश्य; भाखड़ा-नांगल और हीराकुड; नेहरू — ‘आधुनिक भारत के मंदिर’ |
| आलोचना | बहाव रुका · तलछट जमा · नदी टुकड़ों में बँटी · लवणीकरण · और बाढ़ रोकने वाले बाँध ही बाढ़ का कारण |
| वर्षाजल संग्रहण | गुल/कुल · खादीन · जोहड़ · टाँका · पालर पानी · बाँस ड्रिप |
| आज | राजस्थान में टाँके घट रहे हैं; तमिलनाडु में यह क़ानून बन गया है |
और राजस्थान इस अध्याय में दस बार आता है
RBSE की परीक्षा के लिए अनिवार्य
| कहाँ | क्या |
|---|---|
| जल दुर्लभता की भूमिका | मरुस्थल और पनिहारिनों का चित्र |
| अटल भूजल योजना | सात राज्यों में राजस्थान भी |
| सरदार सरोवर | बाड़मेर और जालौर — 2,46,000 हेक्टेयर; संपूर्ण कमांड क्षेत्र सूखा प्रवण |
| मानचित्र (पृष्ठ 24) | राणा प्रताप सागर · गांधी सागर · कोटा बैराज — तीनों चंबल पर |
| छत वर्षा जल संग्रहण | “पश्चिमी भारत, विशेषकर राजस्थान” |
| खादीन | जैसलमेर ज़िला |
| टाँका | बीकानेर, फलोदी, बाड़मेर |
| पालर पानी | राजस्थान में वर्षाजल का नाम |
| इंदिरा गांधी नहर | जिससे टाँकों की रीति कम हो रही है |
| अभ्यास प्रश्न 3(i) | पूरा प्रश्न ही राजस्थान पर है |
और सिर्फ़ छह आँकड़े अनिवार्य हैं
- 25 और 114 सेमी.इज़राइल और भारत की औसत वार्षिक वर्षा
- 55 लीटरजल जीवन मिशन का प्रति व्यक्ति सेवा स्तर
- 6.1 × 4.27 × 2.44 मी.फलोदी के एक घर का टाँका
- 55 किलोमीटरशिलांग से चेरापूँजी-मॉसिनराम की दूरी
- 200 वर्षमेघालय की बाँस ड्रिप सिंचाई
- 2,46,000 हेक्टेयरसरदार सरोवर से बाड़मेर-जालौर की सिंचाई
ये छह पक्के कर लीजिए — बाक़ी अपने आप जुड़ जाएँगे
और अध्याय की सबसे बड़ी बहस
बड़े बाँध बनाएँ या छोटे टाँके?
पाठ्यपुस्तक ने किसी एक का पक्ष नहीं लिया — उसने नेहरू का ‘आधुनिक भारत के मंदिर’ भी लिखा और बाँधों की हर आलोचना भी।
इसलिए आपके हर बड़े उत्तर में दोनों पक्ष होने चाहिए
यही ईमानदारी है — और परीक्षा में भी यही चाहिए, क्योंकि प्रश्न ‘लाभ और हानियों की तुलना’ पूछता है