यह पन्ना उनके लिए है जो घर पर दसवीं के बच्चे के साथ बैठते हैं। विषय आपको आता हो, यह ज़रूरी नहीं: हर सवाल के आगे लिखा है कि जवाब में क्या आना चाहिए, और किताब के किस पृष्ठ पर है।
दसवीं का बच्चा पंद्रह-सोलह साल का होता है। इस उम्र में उससे सवाल-जवाब करके परखने से ज़्यादा काम आता है उससे समझवाना। उससे कहिए, “मुझे यह अध्याय समझाओ, मैंने नहीं पढ़ा।” समझाते समय बच्चे को ख़ुद पता चल जाता है कि कौन-सी बात पक्की है और कौन-सी कच्ची।
किताब की अपनी पंक्तियाँ उद्धरण-चिह्नों में, पृष्ठ संख्या के साथ दी हैं। पृष्ठ संख्याएँ NCERT आर्थिक विकास की समझ (कक्षा 10) के 2026-27 में छपे संस्करण की हैं।
1. इस अध्याय में क्या है
हम रोज़ पैसे से चीज़ें ख़रीदते हैं, बचा पैसा बैंक में रखते हैं, और ज़रूरत पड़ने पर उधार लेते हैं। यह अध्याय इन्हीं तीन बातों को जोड़ता है: मुद्रा क्या है, बैंक हमारे पैसे का क्या करते हैं, और ऋण (किताब इसे साख भी कहती है) किसके लिए फ़ायदेमंद है और किसके लिए भारी पड़ता है। अध्याय पूरा होने तक बच्चे को यह बताना आना चाहिए कि सस्ता ऋण किसे मिलता है, किसे नहीं, और क्यों।
किताब यह बात आठ क़दमों में समझाती है:
| किताब का सवाल | किताब क्या बताती है | पृष्ठ |
|---|---|---|
| मुद्रा की ज़रूरत क्यों पड़ी? | मुद्रा के बिना वस्तु के बदले वस्तु का लेन-देन होता है, जिसमें दोनों को एक-दूसरे की चीज़ चाहिए। मुद्रा बीच की कड़ी बनकर यह मुश्किल ख़त्म करती है, इसलिए उसे विनिमय का माध्यम कहते हैं। | 39–40 |
| आज मुद्रा किस रूप में है? | करेंसी, यानी नोट और सिक्के; और बैंक खाते में रखी माँग जमा, जिससे चैक लिखकर भुगतान होता है। नोट का अपना कोई इस्तेमाल नहीं; वह इसलिए चलता है कि सरकार उसे प्राधिकृत करती है। | 40–41 |
| बैंक जमा का क्या करते हैं? | जमा का केवल 5 प्रतिशत नकद रखते हैं और बड़े भाग से ऋण देते हैं। ऋण पर लिया ब्याज जमा पर दिए ब्याज से ज़्यादा होता है; यही अंतर बैंक की आय का प्रमुख स्रोत है। | 42 |
| ऋण मदद करता है या फँसाता है? | दोनों हो सकता है। जूते बनाने वाले सलीम की कमाई ऋण से बढ़ी; फसल बर्बाद होने पर किसान स्वप्ना कर्ज़ में फँस गई और उसे ज़मीन का हिस्सा बेचना पड़ा। | 43–44 |
| हर ऋण में क्या तय होता है? | चार शर्तें: ब्याज दर, समर्थक ऋणाधार (गारंटी के रूप में रखी संपत्ति), आवश्यक कागज़ात और भुगतान के तरीके। किताब का उदाहरण मेघा का आवास ऋण है। | 44–45 |
| एक गाँव में किसे किस दर पर ऋण मिलता है? | सोनपुर में 7 एकड़ वाले अरुण को बैंक से 8.5 प्रतिशत वार्षिक पर ऋण मिला; छोटा किसान श्यामल व्यापारी से 3 प्रतिशत मासिक पर लेता है, और भूमिहीन मज़दूर रमा अपने मालिक से 5 प्रतिशत मासिक पर। | 46–47 |
| सस्ता ऋण किसे मिलता है? | बैंक और सहकारी समितियाँ औपचारिक स्रोत हैं: सस्ते, और भारतीय रिज़र्व बैंक की नज़र में। साहूकार, व्यापारी, मालिक, रिश्तेदार और दोस्त अनौपचारिक हैं, और कहीं महँगे। शहरों के गरीब परिवारों का 54 प्रतिशत ऋण अनौपचारिक स्रोतों से है, अमीर परिवारों का केवल 17 प्रतिशत। | 48–50 |
| गरीबों तक बैंक का ऋण कैसे पहुँचे? | स्वयं सहायता समूह से: 15–20 पड़ोसी, ख़ासकर गरीब महिलाएँ, नियमित बचत करते हैं, और एक या दो वर्ष बाद समूह के नाम पर बिना ऋणाधार बैंक ऋण पाते हैं। बांग्लादेश का ग्रामीण बैंक इसका बड़ा उदाहरण है। | 50–52 |
2. बच्चे से समझिए: दस सवाल
बच्चे से एक-एक सवाल पूछिए और उसे अपने शब्दों में समझाने दीजिए। आप दाईं ओर देखते जाइए कि ज़रूरी बातें आईं या नहीं। शब्द हूबहू न हों तो कोई बात नहीं; बात सही होनी चाहिए। जहाँ बच्चा अटके, किताब का वह पृष्ठ खोलिए, बच्चा उसे पढ़े और फिर से समझाए। अगले दिन वही सवाल एक बार और पूछ लीजिए।
| सवाल | जवाब में यह आना चाहिए | पृष्ठ |
|---|---|---|
| 1. वस्तु के बदले वस्तु के लेन-देन में क्या मुश्किल है, और मुद्रा उसे कैसे हल करती है? | दोनों को एक-दूसरे की चीज़ चाहिए; इसे आवश्यकताओं का दोहरा संयोग कहते हैं। किताब का उदाहरण: जूते बनाने वाले को ऐसा किसान खोजना पड़ेगा जो गेहूँ बेचना भी चाहे और जूते ख़रीदना भी। मुद्रा हो, तो वह जूते किसी को भी बेचकर उस मुद्रा से गेहूँ ख़रीद लेता है। | 39–40 |
| 2. नोट का अपना कोई इस्तेमाल नहीं, फिर सब उसे क्यों लेते हैं? | सरकार उसे प्राधिकृत करती है। भारतीय रिज़र्व बैंक केंद्रीय सरकार की तरफ़ से नोट जारी करता है, और भारत में कोई व्यक्ति कानूनी तौर पर रुपयों में अदायगी को अस्वीकार नहीं कर सकता। | 40 |
| 3. माँग जमा क्या है, और उसे मुद्रा क्यों मानते हैं? | बैंक खाते का वह पैसा, जो माँगने पर निकाला जा सकता है। उसके बदले चैक लिखकर बिना नकद भुगतान हो जाता है, जैसे एम. सलीम ने चमड़ा आपूर्तिकर्ता को चैक दिया। लोग इसे करेंसी की तरह भुगतान का माध्यम मानते हैं। | 40–41 |
| 4. बैंक हमारी जमा का क्या करते हैं? | केवल 5 प्रतिशत नकद रखते हैं, क्योंकि किसी एक दिन कुछ ही जमाकर्ता पैसा निकालने आते हैं। बाकी के बड़े भाग से ऋण देते हैं। ऋण पर ज़्यादा ब्याज लेते हैं, जमा पर कम देते हैं; यही अंतर बैंक की आय का प्रमुख स्रोत है। | 42 |
| 5. सलीम के लिए ऋण अच्छा रहा, स्वप्ना के लिए बुरा। क्यों? | सलीम ने ऋण से त्यौहार के मौसम का ऑर्डर समय पर पूरा किया, लाभ कमाया और उधार चुका दिया। स्वप्ना की मूँगफली की फसल कीटनाशकों के हमले से बर्बाद हुई, कर्ज़ बढ़ता गया और ज़मीन बेचनी पड़ी। ऋण उपयोगी होगा या नहीं, यह परिस्थिति के जोखिम पर निर्भर है। | 43–44 |
| 6. ऋण की चार शर्तें क्या हैं? | ब्याज दर, समर्थक ऋणाधार, आवश्यक कागज़ात और भुगतान के तरीके। मेघा के आवास ऋण में ये हैं: 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज, नए घर के सभी कागज़, नौकरी और वेतन संबंधी रिकार्ड, और 10 साल की मासिक किश्तें। | 44–45 |
| 7. सोनपुर में अरुण को सस्ता ऋण क्यों मिला, और रमा को महँगा क्यों? | अरुण के पास 7 एकड़ ज़मीन है; उसे बैंक से 8.5 प्रतिशत वार्षिक पर ऋण मिला। बैंक समर्थक ऋणाधार माँगते हैं, जो हर किसी के पास नहीं होता। रमा भूमिहीन है; उसके लिए ऋण का एकमात्र स्रोत उसका मालिक है, जो 5 प्रतिशत मासिक लेता है, और रमा कर्ज़ उसके यहाँ काम करके चुकाती है। | 46–47 |
| 8. औपचारिक और अनौपचारिक ऋण में क्या फ़र्क़ है? | औपचारिक: बैंक और सहकारी समितियाँ; कम ब्याज, और भारतीय रिज़र्व बैंक की नज़र। अनौपचारिक: साहूकार, व्यापारी, मालिक, रिश्तेदार, दोस्त; ब्याज कहीं अधिक, और देखरेख करने वाली कोई संस्था नहीं। | 48–49 |
| 9. सस्ता ऋण ज़्यादातर किसे मिलता है? | अमीर परिवारों को। शहरों में अमीर परिवारों के 83 प्रतिशत ऋण औपचारिक स्रोतों से हैं, जबकि गरीब परिवारों के 54 प्रतिशत ऋण अनौपचारिक स्रोतों से। कारण: बैंक ऋणाधार और कागज़ात माँगते हैं, जो गरीबों के पास नहीं होते। | 49–50 |
| 10. स्वयं सहायता समूह कैसे काम करता है? | 15–20 पड़ोसी, ख़ासकर गरीब महिलाएँ, नियमित बचत करते हैं और समूह से ही साहूकार से कम ब्याज पर छोटे कर्ज़ लेते हैं। एक या दो वर्ष बाद समूह के नाम पर बैंक ऋण मिलता है, बिना ऋणाधार; लौटाने की ज़िम्मेदारी पूरे समूह की होती है। | 51 |
3. छह बातें जिनमें बच्चे अक्सर उलझते हैं
कॉपी जाँचते समय इन पर नज़र रखिए। बाएँ वाली बात लिखी हो तो वह ग़लत है।
| बच्चा लिख देता है | सही बात | पृष्ठ |
|---|---|---|
| बैंक जमा का ज़्यादातर पैसा तिजोरी में नकद रखते हैं। | केवल 5 प्रतिशत नकद रखते हैं; बड़े भाग से ऋण देते हैं। | 42 |
| चैक या ए.टी.एम. कार्ड ख़ुद मुद्रा है। | चैक बैंक को भुगतान का आदेश है, और कार्ड लेन-देन में काम आता है; दोनों अपने आप में मुद्रा नहीं। करेंसी के साथ बैंक खाते की माँग जमा को भी मुद्रा समझा जाता है। | 38, 41 |
| ऋण हमेशा फ़ायदा देता है, या हमेशा नुक़सान। | सलीम को फ़ायदा हुआ, स्वप्ना को नुक़सान; यह परिस्थिति के जोखिम पर निर्भर है। | 43–44 |
| सहकारी समितियाँ अनौपचारिक स्रोत हैं। | बैंक और सहकारी समितियाँ, दोनों औपचारिक हैं; साहूकार, व्यापारी, मालिक, रिश्तेदार और दोस्त अनौपचारिक। | 48 |
| भारतीय रिज़र्व बैंक साहूकारों पर भी नज़र रखता है। | वह औपचारिक स्रोतों पर नज़र रखता है; अनौपचारिक ऋणदाताओं की देखरेख करने वाली कोई संस्था नहीं। | 48 |
| बैंक का सस्ता ऋण सबसे ज़्यादा गरीबों को मिलता है। | उल्टा: शहरों में अमीर परिवारों के 83 प्रतिशत ऋण औपचारिक हैं, जबकि गरीब परिवारों के 54 प्रतिशत ऋण अनौपचारिक। | 49 |
4. किताब के शब्द, आसान भाषा में
ये शब्द जवाबों में आने चाहिए। बच्चा इनका मतलब अपने शब्दों में बता दे, तो समझिए शब्द पक्का है।
| किताब का शब्द | आसान मतलब | पृष्ठ |
|---|---|---|
| वस्तु विनिमय प्रणाली | मुद्रा के बिना, एक वस्तु के बदले सीधे दूसरी वस्तु का लेन-देन। | 39 |
| आवश्यकताओं का दोहरा संयोग | जो वस्तु एक व्यक्ति बेचना चाहे, वही दूसरा ख़रीदना चाहे, और दूसरा जो बेचना चाहे, वह पहला ख़रीदना चाहे। वस्तु विनिमय इसके बिना नहीं चलता। | 39 |
| विनिमय का माध्यम | लेन-देन के बीच की कड़ी। मुद्रा यही काम करती है। | 40 |
| करेंसी | कागज़ के नोट और सिक्के। | 40 |
| निक्षेप (जमा) | वह पैसा जो लोग बैंक में अपने नाम का खाता खोलकर रखते हैं। बैंक इस पर ब्याज देता है। | 40 |
| माँग जमा | बैंक खाते का वह पैसा, जो माँगने पर निकाला जा सकता है। इसे भी मुद्रा माना जाता है। | 40–41 |
| चैक | बैंक के लिए एक कागज़ी आदेश कि खाताधारक के खाते से, चैक पर लिखे नाम वाले व्यक्ति को इतनी रकम दी जाए। | 41 |
| ऋण, साख | उधार: अभी धन, वस्तु या सेवा मिलती है, और बदले में भविष्य में भुगतान का वादा होता है। | 43 |
| कार्यशील पूँजी | उत्पादन के रोज़ के खर्च, जैसे कच्चा माल और मज़दूरी, चलाने का पैसा। | 43 |
| कर्ज–ज़ाल (ऋण–जाल) | ऐसी हालत जिसमें ऋण कमाई बढ़ाने के बजाय हालत बिगाड़ दे, और कर्ज़दार उससे आसानी से बाहर न निकल सके। | 44, 49 |
| समर्थक ऋणाधार | कर्ज़दार की अपनी संपत्ति, जैसे भूमि, इमारत, गाड़ी, पशु या बैंक में जमा पूँजी, जो ऋण चुकने तक गारंटी के रूप में उधारदाता के पास रहती है। | 44 |
| ऋण की शर्तें | ब्याज दर, समर्थक ऋणाधार, आवश्यक कागज़ात और भुगतान के तरीके, सब मिलाकर। | 45 |
| सहकारी समिति | सदस्य अपने संसाधन मिलाकर एक-दूसरे की मदद करते हैं; कृषक सहकारी समिति अपने सदस्यों को सस्ता ऋण देती है। | 47 |
| औपचारिक और अनौपचारिक ऋण | औपचारिक: बैंकों और सहकारी समितियों से, जिन पर भारतीय रिज़र्व बैंक नज़र रखता है। अनौपचारिक: साहूकार, व्यापारी, मालिक, रिश्तेदार, दोस्त से, जिनकी देखरेख करने वाली कोई संस्था नहीं। | 48 |
| स्वयं सहायता समूह | 15–20 पड़ोसियों, ख़ासकर गरीब महिलाओं, का समूह, जो नियमित बचत करता है और अपने सदस्यों को कर्ज़ देता है। | 51 |
| विमुद्रीकरण | पुराने नोटों को अमान्य घोषित करके नए नोटों से बदलना। भारत में नवंबर 2016 में 500 और 1000 रुपये के नोटों के साथ ऐसा हुआ। | 38 |
5. लिखे हुए जवाब कैसे जाँचें
किताब के 13 प्रश्न पृष्ठ 52–53 पर हैं। प्रश्न 12 में खाली जगह भरनी है और प्रश्न 13 में सही विकल्प चुनना है; बाकी में बच्चे को लिखकर जवाब देना है। आपको पूरा जवाब नहीं जाँचना; बस देखिए कि ये हिस्से हैं या नहीं।
प्रश्न 1: जोखिम वाली परिस्थिति में ऋण
- मुख्य बात: ऋण उपयोगी होगा या नहीं, यह परिस्थिति के खतरों पर, और हानि होने पर मिलने वाले सहारे पर निर्भर है।
- किताब का उदाहरण हो: स्वप्ना की मूँगफली की फसल कीटनाशकों के हमले से बर्बाद हुई, कर्ज़ साल भर में बड़ी रकम बन गया, और उसे ज़मीन का कुछ हिस्सा बेचना पड़ा।
- यह शब्द आए: कर्ज–ज़ाल। अच्छा हो कि यह भी लिखा हो कि खेती में ऋण की अदायगी फसल की कमाई पर टिकी होती है।
प्रश्न 2: मुद्रा दोहरे संयोग की समस्या कैसे सुलझाती है
- दोहरे संयोग का मतलब सही हो: दोनों पक्षों को एक-दूसरे की वस्तु चाहिए।
- प्रश्न अपनी ओर से उदाहरण माँगता है, इसलिए किताब के जूते और गेहूँ की जगह बच्चे का अपना उदाहरण हो, जैसे घड़े बनाने वाला कुम्हार, जिसे चावल चाहिए।
- अंत में यह बात हो: मुद्रा बीच की कड़ी है, इसलिए उसे विनिमय का माध्यम कहते हैं।
प्रश्न 3: बैंक मध्यस्थता कैसे करते हैं
- जिनके पास अतिरिक्त धन है, वे जमाकर्ता बनकर उसे बैंक में रखते हैं और ब्याज पाते हैं।
- बैंक केवल 5 प्रतिशत नकद रखकर, बड़े भाग से उन कर्ज़दारों को ऋण देते हैं जिन्हें धन चाहिए।
- ऋण पर लिए और जमा पर दिए ब्याज का अंतर बैंक की आय है।
प्रश्न 4: 10 रुपये का नोट
बच्चे के साथ नोट हाथ में लेकर देखिए। उस पर भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर के हस्ताक्षर के साथ यह वचन छपा होता है: “मैं धारक को दस रुपये अदा करने का वचन देता हूँ” (रिज़र्व बैंक: भारतीय मुद्रा, अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)। व्याख्या में ये बातें हों (पृष्ठ 40):
- नोट भारतीय रिज़र्व बैंक केंद्रीय सरकार की तरफ़ से जारी करता है; कानून किसी और को मुद्रा जारी करने की इजाज़त नहीं देता।
- नोट का अपना कोई इस्तेमाल नहीं; वह इसलिए चलता है कि सरकार उसे प्राधिकृत करती है।
- भारत में कोई व्यक्ति कानूनी तौर पर रुपयों में अदायगी को अस्वीकार नहीं कर सकता।
प्रश्न 5: औपचारिक स्रोत बढ़ाने की ज़रूरत
- कम से कम तीन कारण हों: अनौपचारिक ऋणदाता कहीं अधिक ब्याज लेते हैं, इसलिए आय का बड़ा हिस्सा ऋण चुकाने में चला जाता है; ऋण–जाल का ख़तरा; और उनकी देखरेख करने वाली कोई संस्था नहीं।
- आँकड़ा हो तो और अच्छा: आलेख 1 के टुकड़े जोड़ें, तो 2019 में ग्रामीण ऋण का 34 प्रतिशत, यानी एक-तिहाई से ज़्यादा, अब भी अनौपचारिक स्रोतों से था (पृष्ठ 48)। (किताब के पाठ में पृष्ठ 49 पर “केवल 50 प्रतिशत” छपा है, जो आलेख 1 के आँकड़ों से मेल नहीं खाता।)
- किताब की यह पंक्ति आए तो बहुत अच्छा: “सस्ता और सामर्थ्य के अनुकूल कर्ज़ देश के विकास के लिए अति आवश्यक है।” (पृष्ठ 49)
प्रश्न 6: स्वयं सहायता समूह का मूल विचार
- शुरुआत समस्या से हो: गरीबों के पास ऋणाधार नहीं, इसलिए बैंक उन्हें ऋण नहीं देते और वे महँगे साहूकारों पर निर्भर रहते हैं।
- समूह का तरीका: 15–20 पड़ोसी, ख़ासकर महिलाएँ, नियमित बचत करते हैं; सदस्यों को साहूकार से कम ब्याज पर छोटे कर्ज़ मिलते हैं; एक या दो वर्ष बाद समूह के नाम पर बिना ऋणाधार बैंक ऋण।
- एक-दो फ़ायदे: फ़ैसले सदस्य ख़ुद लेते हैं; महिलाएँ आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनती हैं; स्वास्थ्य, पोषण, घरेलू हिंसा जैसे विषयों पर चर्चा का मंच मिलता है।
- प्रश्न अपने शब्दों में व्याख्या माँगता है; किताब की पंक्तियाँ उतार देना काफ़ी नहीं।
प्रश्न 7: बैंक कुछ लोगों को ऋण क्यों नहीं देते
दो कारण होने चाहिए: ऋणाधार नहीं; और ज़रूरी कागज़ात नहीं, जैसे मेघा से माँगा गया नौकरी और वेतन का रिकार्ड।
प्रश्न 8: भारतीय रिज़र्व बैंक की नज़र
- कैसे, तीन बातें: बैंक अपनी जमा का न्यूनतम नकद हिस्सा सचमुच रखें; छोटे किसानों, छोटे उद्योगों और छोटे कर्ज़दारों को भी ऋण दें; और समय-समय पर बताएँ कि कितना ऋण, किनको और किस ब्याज दर पर दिया।
- क्यों ज़रूरी: जमाकर्ता ज़रूरत पर अपना पैसा निकाल सकें, और सस्ता ऋण सिर्फ़ बड़े कर्ज़दारों तक सीमित न रहे।
प्रश्न 9: विकास में ऋण की भूमिका
- दोनों पहलू हों: सस्ता ऋण उत्पादन और कमाई बढ़ाता है, जैसे सलीम की; महँगा ऋण आय खा जाता है और ऋण–जाल में फँसाता है, जैसे रमा को।
- निष्कर्ष: औपचारिक ऋण बढ़े और गरीबों तक पहुँचे।
- प्रो. मोहम्मद युनूस की बात आए तो और अच्छा: गरीबों को सही और उचित शर्तों पर ऋण मिले, तो लाखों छोटी गतिविधियों से विकास हो सकता है (पृष्ठ 52)।
प्रश्न 10: मानव बैंक से ऋण ले या साहूकार से
- कसौटी हो: दोनों की ऋण की शर्तें मिलाना, यानी ब्याज दर, ऋणाधार, कागज़ात और भुगतान का तरीका।
- तुलना हो: बैंक सस्ता है, पर ऋणाधार और कागज़ माँगता है; साहूकार अक्सर बिना ऋणाधार भी दे देता है, पर ब्याज बहुत ऊँचा है, लिखा-पढ़ी अधूरी है, और उस पर किसी संस्था की नज़र नहीं।
- एक साफ़ निष्कर्ष हो: ऋणाधार और कागज़ हों, तो बैंक का ऋण बेहतर है। तालिका बनाकर लिखा हो, तो जाँचना आसान है।
प्रश्न 11: छोटे किसान और ऋण
प्रश्न कहता है कि भारत में 80 प्रतिशत किसान छोटे किसान हैं। इसके चार हिस्से हैं:
- (क) बैंक क्यों हिचकते हैं: ऋणाधार के लिए थोड़ी ज़मीन, कागज़ात कम, और अदायगी फसल पर टिकी, जो बर्बाद हो सकती है।
- (ख) दूसरे स्रोत: साहूकार या महाजन, व्यापारी, भूस्वामी, रिश्तेदार, दोस्त; और कृषक सहकारी समितियाँ और स्वयं सहायता समूह।
- (ग) उदाहरण: सोनपुर का श्यामल पहले महाजन से 5 प्रतिशत मासिक, यानी 60 प्रतिशत वार्षिक, पर ऋण लेता था; अब व्यापारी से 3 प्रतिशत मासिक पर लेता है, पर फसल उसी को बेचने का वादा करना पड़ता है।
- (घ) सुझाव: बैंक और सहकारी समितियाँ गाँवों में अपना काम बढ़ाएँ; किसान कृषक सहकारी समितियों से जुड़ें; स्वयं सहायता समूह बनें।
प्रश्न 12: खाली जगह भरिए
| हिस्सा | सही शब्द |
|---|---|
| (क) अनौपचारिक स्रोतों पर निर्भर परिवार | गरीब |
| (ख) ऋण का बोझ बढ़ाने वाली लागत | ऊँची |
| (ग) करेंसी नोट जारी करने वाला | भारतीय रिज़र्व बैंक |
| (घ) जिस पर बैंक कम ब्याज देते हैं | जमा |
| (ङ) गारंटी के रूप में रखी कर्ज़दार की संपत्ति | समर्थक ऋणाधार |
प्रश्न 13: सही विकल्प चुनिए
| हिस्सा | सही विकल्प |
|---|---|
| (क) स्वयं सहायता समूह में बचत और ऋण के ज़्यादातर फ़ैसले | सदस्यों द्वारा |
| (ख) ऋण के औपचारिक स्रोतों में शामिल नहीं | नियोक्ता |
सभी 13 प्रश्नों के पूरे उत्तर रिवीजन नोट्स के “अपने को जाँचिए” वाले हिस्से में हैं। बच्चे का जवाब उनसे शब्द-शब्द न मिले, तो भी ठीक है, अगर ज़रूरी बातें आ गई हों।
6. घर पर दस मिनट की बातचीत
दसवीं के बच्चे से पूछताछ कम, बातचीत ज़्यादा कीजिए। खाने के समय या कहीं आते-जाते इनमें से कोई एक बात छेड़िए।
घर का कोई नोट उठाइए। पृष्ठ 40 पर किताब बताती है कि नोट का अपना कोई इस्तेमाल नहीं, फिर भी सब उसे लेते हैं। बच्चे से पूछिए कि कागज़ के इस टुकड़े पर लोग भरोसा क्यों करते हैं, और नोट पर रिज़र्व बैंक के गवर्नर का वचन ढूँढवाइए। फिर पूछिए: जब मुद्रा नहीं थी, तब किसी को अनाज देकर बदले में कोई दूसरी चीज़ लेनी हो, तो क्या मुश्किल आती?
या बैंक की बात कीजिए। पृष्ठ 42 पर किताब बताती है कि बैंक जमा का केवल 5 प्रतिशत नकद रखते हैं। बच्चे से पूछिए कि बाकी पैसा कहाँ जाता है, और अगर सारे जमाकर्ता एक ही दिन पैसा माँगने पहुँच जाएँ, तो क्या होगा। यह सवाल किताब ख़ुद पूछती है। बच्चा समझा दे कि बैंक का काम इसी भरोसे पर चलता है कि एक दिन में कुछ ही लोग पैसा निकालते हैं, तो बात समझ में आ गई।
या आसपास के ऋण की बात कीजिए। पृष्ठ 46 पर सोनपुर गाँव के तीन लोग हैं: अरुण बैंक से सस्ता ऋण लेता है, जबकि श्यामल व्यापारी से और रमा अपने मालिक से महँगा ऋण लेते हैं। पृष्ठ 47 पर किताब बच्चे से अपने क्षेत्र के लोगों से ऐसी ही बातचीत करने को कहती है। पूछिए कि हमारे क्षेत्र में लोग ज़रूरत पड़ने पर किससे उधार लेते हैं: बैंक, सहकारी समिति, स्वयं सहायता समूह, साहूकार या रिश्तेदार, और किसकी शर्तें आसान हैं। किसी का नाम लेने की ज़रूरत नहीं; बात स्रोत और शर्तों की है।
7. अगर आप रिज़र्व बैंक की जगह हों: एक सवाल जिसका एक जवाब नहीं
पृष्ठ 50 पर किताब बच्चे से पूछती है कि क्या भारतीय रिज़र्व बैंक के जैसा कोई निरीक्षक होना चाहिए, जो साहूकार जैसे अनौपचारिक ऋणदाताओं की गतिविधियों पर नज़र रखे, और उसका काम मुश्किल क्यों होगा। किताब इतना बताती है कि अभी “अनौपचारिक क्षेत्रक में ऋणदाताओं की गतिविधियों की देखरेख करने वाली कोई संस्था नहीं है।” (पृष्ठ 48)
इस सवाल का कोई एक सही जवाब नहीं है, और आपको भी नहीं देना है। बच्चा हाँ कहे या ना, उससे दो बातें पूछिए: “निरीक्षक किस बात की जाँच करेगा?” और “जहाँ ऋण जान-पहचान पर, बिना पूरी लिखा-पढ़ी के दिया जाता है, वहाँ वह जाँच कैसे करेगा?” दोनों का जवाब सोचकर दे, तो बातचीत सफल है।
इस बातचीत से अध्याय की एक बड़ी बात अपने-आप निकलती है: किताब सुझाती है कि बैंक और सहकारी समितियाँ, ख़ासकर गाँवों में, अपनी गतिविधियाँ बढ़ाएँ, और सस्ता औपचारिक ऋण गरीब परिवारों तक भी पहुँचे (पृष्ठ 49–50)।
अगर सिर्फ़ पाँच मिनट हों
ये चार सवाल पूछ लीजिए। चारों ठीक हों, तो अध्याय की मुख्य बातें आ गई हैं।
| सवाल | जवाब |
|---|---|
| मुद्रा को विनिमय का माध्यम क्यों कहते हैं? | वह लेन-देन के बीच की कड़ी है, और वस्तु के बदले वस्तु वाली दोहरे संयोग की मुश्किल ख़त्म करती है। |
| बैंक हमारी जमा का क्या करते हैं? | केवल 5 प्रतिशत नकद रखते हैं; बड़े भाग से ऋण देते हैं। |
| ऋण की चार शर्तें कौन-सी हैं? | ब्याज दर, समर्थक ऋणाधार, आवश्यक कागज़ात और भुगतान के तरीके। |
| औपचारिक और अनौपचारिक ऋण में मुख्य फ़र्क़ क्या है? | औपचारिक (बैंक, सहकारी समिति) सस्ता है और उस पर भारतीय रिज़र्व बैंक की नज़र है; अनौपचारिक (साहूकार, व्यापारी, मालिक, रिश्तेदार) महँगा है और उस पर किसी संस्था की नज़र नहीं। |
बच्चे के लिए इसी अध्याय के और पन्ने
- रिवीजन नोट्स: पूरा अध्याय छोटे में, किताब के सभी प्रश्नों के उत्तर के साथ।
- प्रश्न बैंक: परीक्षा जैसे प्रश्न, उत्तर के साथ। बच्चा पहले ख़ुद लिखे, फिर मिलाए।
- फ़्लैशकार्ड: बाईं ओर सवाल, दाईं ओर जवाब। जवाब ढककर बोलिए, फिर मिलाइए; रोज़ पाँच मिनट दोहराने के लिए।
- परख प्रश्न: सोचकर जवाब देने वाले प्रश्न, किताब के उदाहरणों और आँकड़ों पर, हर प्रश्न का उत्तर साथ में।
- इंटरैक्टिव अध्याय: पूरा अध्याय स्क्रीन पर, हिस्सा-दर-हिस्सा; आख़िर में अभ्यास और परियोजना।