पढ़िए, क्रम लगाइए, नक्शे पर जोड़िए, सवाल पूछिए
शुरुआत
10 मई 1857 की दोपहर बाद मेरठ छावनी में सिपाहियों ने विद्रोह कर दिया, और 11 मई को तड़के उनका एक जत्था दिल्ली में लाल क़िले के फाटक पर पहुँचा (पृ. 258)। अध्याय का नाम ही दो सवाल रखता है: "1857 का आंदोलन" कैसा था, और "उसके व्याख्यान", यानी किसने उसे किस नज़र से बयान किया (पृ. 258)। यह पेज किताब के हिस्सों के क्रम में चलता है: हर हिस्सा एक पड़ाव है, और हर पड़ाव के आख़िर में किताब के अंत वाले प्रश्नों में से वे हैं जो उसी पड़ाव से जुड़े हैं।

ब्रिटिश शासन "ताश के क़िले की तरह बिखर गया।"
अध्याय का रास्ता
- पहला सवाल, नाम के पहले हिस्से से: 1857 का आंदोलन कैसे फैला, कहाँ सबसे गहरा था, विद्रोही क्या चाहते थे, और उसे कैसे कुचला गया? (पड़ाव 1 से 4)
- दूसरा सवाल, नाम के दूसरे हिस्से से: उसके "व्याख्यान", यानी उस समय और बाद में उसे किसने, किस नज़र से दिखाया? (पड़ाव 3 की शुरुआत और पड़ाव 5)
- 1विद्रोह का ढर्राविद्रोह एक छावनी से दूसरी छावनी तक कैसे फैला, और उसके नेता कौन बने?पृ. 259–266
- 2अवध में विद्रोहअवध में विद्रोह इतना व्यापक क्यों था?पृ. 266–270
- 3विद्रोही क्या चाहते थे?विद्रोहियों की अपनी आवाज़ कम क्यों बची, और जो बची, वह क्या कहती है?पृ. 270–275
- 4दमनअंग्रेज़ों ने विद्रोह को कैसे कुचला?पृ. 275–277
- 5विद्रोह की छवियाँहम 1857 के बारे में कैसे जानते हैं, और तसवीरें किसकी नज़र दिखाती हैं?पृ. 277–283
और जानिए टेलीग्राफ़ क्या था, और कैसे चलता था?
टेलीग्राफ़ यानी तार: तार में विद्युत धारा भेजकर दूर के शहर तक ख़बर पहुँचाने का तरीक़ा। 10 मई को मेरठ को दिल्ली से जोड़ने वाली टेलीग्राफ़ लाइन काट दी गई (पृ. 258), और विद्रोहियों ने टेलीग्राफ़ दफ़्तरों पर भी हमला किया (पृ. 259)।
तीन बातों में समझिए
- धारा सुई को मोड़ती हैजिस तार में धारा बहती है, वह पास रखी चुंबकीय सुई को मोड़ देता है। तार को कुंडली में लपेटने से यह असर बढ़ जाता है।
- धारा उलटी, तो सुई उलटीभेजने वाला हत्था एक या दूसरी ओर घुमाता। इससे धारा की दिशा बदलती, और दूसरे शहर में सुई बाएँ या दाएँ मुड़ती।
- बाएँ-दाएँ से अक्षरहर अक्षर के लिए इशारों का एक तय क्रम था, जैसे W: बायाँ, दायाँ, बायाँ, दायाँ।
दोहराइए: कक्षा 10 विज्ञान (NCERT), अध्याय "विद्युत धारा के चुंबकीय प्रभाव"
अब ख़ुद चलाकर देखिए: दिल्ली से अंबाला तक तार
अंबाला की सुई के इशारे:
हत्था सीधा है: परिपथ अधूरा है, इसलिए धारा नहीं बहती और अंबाला की सुई बीच में रहती है।
अब आप भेजिए: W के लिए बायाँ, दायाँ, बायाँ, दायाँ।
असली मशीन
बाईं ओर मशीन सामने से, दाईं ओर पीछे से। हर नंबर नीचे की सूची से मिलाइए।

- हत्था (H) घुमाने पर ख़बर जाती है; सीधा रहे, तो मशीन ख़बर पाने के लिए तैयार रहती है।
- बैटरी के पेंच (N −, P +) बैटरी के दोनों सिरे यहाँ जुड़ते हैं।
- लाइन का पेंच (L) दूसरे शहर से आया तार यहाँ जुड़ता है।
- कुंडली (C) धारा इसमें चुंबकीय क्षेत्र बनाती है, जिससे सुई मुड़ती है।
- सुई बाएँ-दाएँ मुड़कर अक्षर बताती है।
- धरती का पेंच (E) यहाँ से एक तार ज़मीन में जाता है। धारा धरती के रास्ते लौटती है, और परिपथ पूरा होता है।
यह इंग्लैंड की मशीन है; कलकत्ता की लाइनों पर इससे भी सीधी-सादी सुई वाली मशीन चलती थी।
Engraving: Popular Science Monthly, vol. 3 (1873), public domain, via Wikimedia Commons.
भारत में तार
- 1851कलकत्ता से डायमंड हार्बर तक लाइन खुली
- 1854कलकत्ता से आगरा तक, लगभग 800 मील (लगभग 1,300 किलोमीटर), लाइन चालू
- 1856लाइनें लगभग 4,000 मील (लगभग 6,400 किलोमीटर) तक फैल चुकी थीं
- 1857विद्रोह में तार की लाइनें और टेलीग्राफ़ दफ़्तर निशाने पर आए (पृ. 258–259)
सोचिए: विद्रोहियों ने तार क्यों काटा, और टेलीग्राफ़ दफ़्तरों पर हमला क्यों किया?
जवाब देखिए
तार से अंग्रेज़ अफ़सर दूर के शहरों तक जल्दी ख़बर भेज पाते थे। लाइन कट जाने पर मेरठ की ख़बर तार से दिल्ली नहीं पहुँच सकती थी। साथ ही, उन दिनों गोरों से जुड़ी हर चीज़ और हर आदमी विद्रोहियों के निशाने पर था, और टेलीग्राफ़ दफ़्तर अंग्रेज़ी सरकार की इमारत था (पृ. 259)।
वीडियो देखिए
ऊपर की मशीन में सुई मुड़ती थी; इस वीडियो में सुई की जगह "क्लिक" है। विज्ञान दोनों का एक ही है: धारा का चुंबकीय प्रभाव।
पुराने स्रोत (अंग्रेज़ी में)
- ओ’शॉनेसी की नियम-पुस्तिका, भारत में बिजली का टेलीग्राफ़ (1853): सुई वाली मशीन, हत्था, W अक्षर
- डिक्शनरी ऑफ़ नेशनल बायोग्राफ़ी: ओ’शॉनेसी पर लेख, लाइनों की तारीख़ें
- एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका (1911), "टेलीग्राफ़": धरती से लौटती धारा
- पॉपुलर साइंस मंथली, खंड 3 (1873), "इलेक्ट्रिक टेलीग्राफ़्स": ऊपर के चित्र के हिस्से
1विद्रोह का ढर्रा
इस पड़ाव का सवाल
मेरठ के बाद विद्रोह इतनी तेज़ी से कैसे फैला, और हर जगह एक जैसे ढर्रे पर क्यों चला?
पिछली बात से कड़ी मेरठ के सिपाही सीधे दिल्ली गए और बादशाह से आशीर्वाद माँगा (पृ. 258)। पुस्तक कहती है: "इस विद्रोह ने एक वैधता हासिल कर ली क्योंकि अब उसे मुग़ल बादशाह के नाम पर चलाया जा सकता था" (पृ. 258)।
1.1सैन्य विद्रोह कैसे शुरू हुएपृ. 259–260
अगर इन विद्रोहों को तारीख़ के हिसाब से सिलसिलेवार रखें, तो लगता है कि जैसे-जैसे ख़बर एक शहर से दूसरे शहर पहुँची, वैसे-वैसे सिपाही हथियार उठाते गए। और हर छावनी में घटनाओं का क्रम कमोबेश एक जैसा था (पृ. 259)।
पहले पढ़िए: एक छावनी में विद्रोह कैसे चलता था (पृ. 259)
विद्रोह एक संकेत से शुरू होता था: कई जगह शाम के समय तोप का गोला दाग़ा गया, तो कहीं बिगुल बजा। सिपाहियों ने सबसे पहले शस्त्रागार पर क़ब्ज़ा किया और सरकारी ख़ज़ाना लूटा। इसके बाद जेल, ख़ज़ाने, टेलीग्राफ़ दफ़्तर, रिकॉर्ड रूम और बंगलों पर हमले हुए, और सारे रिकॉर्ड जला दिए गए। शहरों में हिंदी, उर्दू और फ़ारसी में अपीलें लगाई गईं कि हिंदू-मुसलमान सब एकजुट हों। जब आम लोग भी साथ आने लगे, तो हमलों का दायरा बढ़ा: लखनऊ, कानपुर और बरेली जैसे शहरों में साहूकार और अमीर भी निशाने पर आए (पृ. 259)।
सोचिए: पहले शस्त्रागार और ख़ज़ाना ही क्यों?
जवाब देखिए
लड़ने के लिए सबसे पहले हथियार और गोला-बारूद चाहिए, और वे शस्त्रागार में बंद रहते थे। ख़ज़ाने पर क़ब्ज़े से पैसा विद्रोहियों के हाथ आता और अंग्रेज़ों के हाथ से निकल जाता। हथियार और पैसा पास हो, तभी आगे की लड़ाई चल सकती थी।
सोचिए: रिकॉर्ड क्यों जलाए गए?
जवाब देखिए
रिकॉर्ड रूम में अंग्रेज़ी सरकार के काग़ज़ रहते थे, और उन दिनों गोरों से जुड़ी हर चीज़ और हर आदमी विद्रोहियों के निशाने पर था (पृ. 259)। गाँवों में विद्रोहियों ने साहूकारों के बहीखाते भी जलाए। किताब इसे ऊँच-नीच के पुराने ढाँचे को उलटने की कोशिश मानती है (पृ. 274)।
सैनिक विद्रोह से जन विद्रोह (पृ. 259)
सिपाहियों की क़तारों के छिटपुट विद्रोहों ने जल्दी ही एक चौतरफ़ा विद्रोह का रूप ले लिया। शासन की सत्ता और सोपानों की सरेआम अवहेलना होने लगी।
1.2संचार के माध्यमपृ. 260–261
अलग-अलग जगहों पर विद्रोह का ढर्रा एक जैसा क्यों था? पुस्तक कहती है: कुछ हद तक इसलिए कि उसकी योजना और समन्वय था। साथ ही, विभिन्न छावनियों के सिपाहियों के बीच अच्छा संचार बना हुआ था (पृ. 260)।
किताब पूछती है (पृ. 261): "विद्रोही अपनी योजनाओं को किस तरह एक-दूसरे तक पहुँचाते थे, इस बारे में इस बातचीत से क्या पता चलता है?"
जवाब देखिए
पृ. 261 पर दोनों की बातें फिर पढ़िए। तहसीलदार पूछता है "क्या ख़बर है अवध की? काम कैसा चल रहा है?", सिस्टन कहता है "अगर हमें अवध में काम मिलता है तो जनाब-ए-आली को भी पता चल जाएगा।", और तहसीलदार भरोसा दिलाता है "मामला क़ाबिल हाथों में है।" (पृ. 261)। इस बातचीत में विद्रोह को "काम" और "मामला" कहा गया है: बात खुलकर नहीं, इशारों में होती थी, और योजना आदमी से आदमी तक ज़बानी पहुँचती थी। किताब यह भी बताती है कि सिपाही या उनके संदेशवाहक एक जगह से दूसरी जगह जा रहे थे (पृ. 260), और यही तहसीलदार बिजनौर के विद्रोहियों का सबसे बड़ा नेता निकला (पृ. 261)।
रात की पंचायतें (पृ. 261)
अवध मिलिट्री पुलिस के कैप्टेन हियर्से की सुरक्षा भारतीय सिपाहियों के ज़िम्मे थी। वहीं तैनात 41वीं नेटिव इन्फेंट्री चाहती थी कि मिलिट्री पुलिस हियर्से को मार दे, या उसे गिरफ़्तार करके 41वीं नेटिव इन्फेंट्री के हवाले कर दे। मिलिट्री पुलिस ने दोनों बातें ठुकरा दीं, और तय हुआ कि हर रेजीमेंट के देशी अफ़सरों की पंचायत यह मामला सुलझाएगी। विद्रोह के शुरुआती इतिहासकारों में से एक, चार्ल्स बॉल ने लिखा है कि ये पंचायतें रात को कानपुर की सिपाही लाइनों में जुटती थीं।
सिपाही लाइनों में साथ रहते थे, उनकी जीवनशैली एक जैसी थी और बहुत से एक ही जाति के थे — इसलिए वे इकट्ठा बैठकर फ़ैसले ले रहे होंगे। पुस्तक का निष्कर्ष: "ये सिपाही अपने विद्रोह के कर्ताधर्ता ख़ुद ही थे।"
1.3नेता और अनुयायीपृ. 262–263
दिल्ली: बादशाह और उनका शहर

बहादुर शाह, मई 1858: जिन बादशाह के नाम पर 1857 में सिपाहियों ने विद्रोह चलाया (पृ. 258), दिल्ली पर अंग्रेज़ों का फिर से क़ब्ज़ा होने के बाद वे उनकी क़ैद में थे। तभी यह फ़ोटो खींची गई: चारपाई पर लेटे बादशाह, सामने हुक़्क़ा। पृ. 258 पर चित्र 10.1 में बादशाह की तसवीर से इसे मिलाइए: दोनों में वे कैसे दिखते हैं? बाद में अंग्रेज़ों ने उन्हें रंगून भेज दिया, जहाँ 1862 में उनकी मृत्यु हुई।
Photograph by Tytler and Shepherd, Delhi, May 1858; British Library. Wikimedia Commons, public domain.

चाँदनी चौक, लगभग 1858: पुरानी दिल्ली का बड़ा बाज़ार: नक़्क़ाशीदार हवेली, ऊपर जालीदार छज्जे, नीचे दुकानें। 1857 की गर्मियों में यही शहर बादशाह और विद्रोही सिपाहियों का केंद्र था।
Photograph by Felice Beato, Delhi, about 1858; Victoria and Albert Museum. Wikimedia Commons, public domain.
और जानिए लगता नहीं है दिल मिरा: ज़फ़र के नाम से मशहूर ग़ज़ल
बहादुर शाह शायर भी थे। वे ‘ज़फ़र’ नाम से लिखते थे, जिसका मतलब है जीत। नीचे की ग़ज़ल उन्हीं के नाम से पूरे उपमहाद्वीप में मशहूर है। एक-एक शेर पढ़िए, कठिन शब्द देखिए, फिर मतलब खोलिए। पर पहले जानिए कि ग़ज़ल बनती कैसे है।
ग़ज़ल कैसे बनती है
- शेर
- दो पंक्तियों में कही गई एक पूरी बात। ग़ज़ल का हर शेर अपने-आप में पूरा होता है।
- मतला
- ग़ज़ल का पहला शेर। इसकी दोनों पंक्तियाँ एक ही तुक पर ख़त्म होती हैं।
- मक़ता
- आख़िरी शेर, जिसमें शायर अपना क़लमी नाम रखता है। यहाँ वह नाम है ‘ज़फ़र’।
- रदीफ़
- आख़िर में बार-बार लौटने वाला शब्द: मतले की दोनों पंक्तियों के अंत में, फिर हर शेर की दूसरी पंक्ति के अंत में। यहाँ ‘में’, जो रंगीन मोटे अक्षरों में है।
- क़ाफ़िया
- रदीफ़ से ठीक पहले आने वाली तुक: दयार, ना-पाएदार, दाग़-दार, बहार, यार। इनके नीचे रेखा खींची गई है।
- मतला
लगता नहीं है दिल मिरा उजड़े दयार मेंकिस की बनी है आलम-ए-ना-पाएदार में
- दयार देश, इलाक़ा, बस्ती
- आलम दुनिया
- ना-पाएदार जो टिके नहीं
- किस की बनी है कौन फला-फूला है?
मतलब देखिए
उजड़ी हुई बस्ती में मेरा मन नहीं लगता। और इस दुनिया में, जहाँ कुछ भी टिकता नहीं, कौन सदा फला-फूला है? पहली पंक्ति में अपना दुख है, दूसरी में पूरी दुनिया का सच। शायर अपने दुख को सबके दुख से जोड़ देता है।
इन हसरतों से कह दो कहीं और जा बसेंइतनी जगह कहाँ है दिल-ए-दाग़-दार में
- हसरत अधूरी रह गई इच्छा
- दाग़ घाव का निशान
- दिल-ए-दाग़-दार घावों से भरा दिल
मतलब देखिए
मेरी अधूरी इच्छाओं से कह दो कि कहीं और जाकर बस जाएँ। मेरे दिल में पहले ही इतने घाव हैं कि उनके लिए जगह नहीं बची। देखिए, इच्छाओं को यहाँ ऐसे लोगों की तरह बताया गया है जो रहने के लिए घर ढूँढ़ रहे हों।
काँटों को मत निकाल चमन से ओ बाग़बाँये भी गुलों के साथ पले हैं बहार में
- चमन बाग़
- बाग़बाँ माली
- गुल फूल
- बहार वसंत
मतलब देखिए
ऐ माली, बाग़ से काँटों को मत उखाड़ो। ये भी फूलों के साथ उसी वसंत में पले-बढ़े हैं। जिन्हें दुनिया बेकार समझकर निकाल फेंकना चाहती है, उनका भी इस बाग़ पर हक़ है।
बुलबुल को बाग़बाँ से न सय्याद से गिलाक़िस्मत में क़ैद लिक्खी थी फ़स्ल-ए-बहार में
- सय्याद चिड़िया पकड़ने वाला, बहेलिया
- गिला शिकायत
- क़ैद पिंजरे में बंद होना
- फ़स्ल-ए-बहार वसंत का मौसम
मतलब देखिए
बुलबुल को न माली से शिकायत है, न बहेलिए से। उसकी क़िस्मत में ही लिखा था कि ठीक वसंत में, जब उसे गाना था, वह पिंजरे में बंद होगी। शायर किसी पर दोष नहीं डालता; सारा दुख क़िस्मत पर छोड़ देता है।
- मक़ता
कितना है बद-नसीब ‘ज़फ़र’ दफ़्न के लिएदो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में
- बद-नसीब अभागा
- दफ़्न क़ब्र में दफ़नाना
- गज़ लंबाई का एक पुराना नाप
- कू-ए-यार प्यारे की गली
मतलब देखिए
ज़फ़र कितना अभागा है: दफ़न होने के लिए उसे अपने प्यारे की गली में दो गज़ ज़मीन भी न मिली। यह शेर पढ़कर अपने वतन से दूर हुए आख़िरी मुग़ल बादशाह की याद आती है: उनकी मृत्यु 7 नवंबर 1862 को दिल्ली से बहुत दूर रंगून में हुई और उन्हें वहीं उसी दिन दफ़नाया गया। क़ब्र के ऊपर घास बिछाकर ज़मीन बराबर कर दी गई। धीरे-धीरे लोग उसकी ठीक जगह भूल गए; 1991 में नाली खोदते मज़दूरों को वह क़ब्र फिर मिली।
यह शेर भी ज़फ़र के नाम से जोड़ा जाता है, पर उनका नहीं है
उम्र-ए-दराज़ माँग के लाई थी चार दिनदो आरज़ू में कट गए दो इंतिज़ार में
- उम्र-ए-दराज़ लंबी उम्र
- आरज़ू चाह, इच्छा
मतलब देखिए
माँगी थी लंबी उम्र, पर वह कुल चार दिन लेकर आई। दो दिन चाहतों में बीत गए, दो इंतज़ार में। यह शेर शायर सीमाब अकबराबादी की एक ग़ज़ल का है। उस ग़ज़ल की तुक भी (…ार में) वैसी ही है; शायद इसी से लोग इसे ज़फ़र की ग़ज़ल का हिस्सा समझ लेते हैं।
किसकी लिखी है यह ग़ज़ल?
यह ग़ज़ल ज़फ़र के नाम से ही मशहूर है। 1960 की फ़िल्म ‘लाल क़िला’ में मोहम्मद रफ़ी ने इसे गाया, और उससे पहले रेडियो सीलोन पर हबीब वली मोहम्मद की आवाज़ में यह लोकप्रिय हो चुकी थी। पर लाहौर के उर्दू-शोधकर्ता इमरान ख़ान और कई बड़े उर्दू विद्वानों ने इस पर शक जताया है: ज़फ़र के चारों छपे दीवानों (कविता-संग्रहों) में यह ग़ज़ल नहीं मिलती। रंगून में उन्हें क़लम-काग़ज़ तक नहीं दिया गया था। दिल्ली की क़ैद के दिनों के बारे में अंग्रेज़ पत्रकार रसेल ने इतना लिखा कि कुछ लोगों के मुताबिक़ बादशाह अपने शेर गुनगुनाते थे और जली हुई लकड़ी से दीवार पर शायरी लिखते थे। कौन-से शेर, यह कोई नहीं बताता। इसलिए पक्का कुछ नहीं कहा जा सकता।
सोचिए: अगर यह ग़ज़ल ज़फ़र ने न भी लिखी हो, तो भी लोगों ने इसे उन्हीं से क्यों जोड़ा होगा? पृ. 258–259 पर पढ़िए कि विद्रोहियों ने बादशाह से क्या चाहा था, और ऊपर की फ़ोटो में देखिए कि मई 1858 में वे कहाँ थे।
जवाब देखिए
1857 में सिपाहियों ने बहादुर शाह से विद्रोह का नेतृत्व स्वीकार करने की दरख़्वास्त की, और बादशाह का नाम जुड़ने से विद्रोह को वैधता मिली (पृ. 258, 262)। उनका समर्थन मिलने की ख़बर फैलते ही गंगा घाटी की छावनियाँ भी उठ खड़ी हुईं (पृ. 259)। पर ऊपर की फ़ोटो में, मई 1858 में, वही बादशाह अंग्रेज़ों की क़ैद में हैं। जिसके नाम पर इतनी बड़ी लड़ाई लड़ी गई और जो आख़िर में क़ैदी बना, उससे क़ैद में पड़ी बुलबुल और दो गज़ ज़मीन को तरसते शायर वाली ग़ज़ल लोगों को अपने आप जुड़ती लगी होगी। ग़ज़ल किसने लिखी, यह सवाल फिर भी खुला रहता है।

नाना साहिब, लंदन के एक अख़बार में, 1857: लंदन के एक सचित्र अख़बार ने 26 सितंबर 1857 को नाना साहिब की यह तसवीर एक भेजे गए रेखाचित्र के आधार पर छापी। किताब (पृ. 262, चित्र 10.4) बताती है कि 1858 के अंत में विद्रोह विफल होने पर नाना साहिब भागकर नेपाल चले गए, और उनके भागने की कहानी उनके साहस और बहादुरी के क़िस्सों का हिस्सा बन गई।
The Illustrated London News, 26 September 1857 (from a sketch received by Major Gandini). Image: Wikimedia Commons, public domain.
शाह मल ने पुल और सड़कें क्यों तोड़ीं? (पृ. 263)
पुस्तक दो कारण देती है: एक, वे सरकारी फ़ौजों का रास्ता रोकना चाहते थे; दो, पुल और सड़कें ब्रिटिश शासन का प्रतीक मानी जाती थीं।
1.4अफ़वाहें और भविष्यवाणियाँपृ. 264
मेरठ से आए सिपाहियों ने बहादुर शाह को उन कारतूसों के बारे में बताया था जिन पर गाय और सुअर की चर्बी का लेप लगा था, और यह बात उत्तर भारत की छावनियों में "जंगल की आग की तरह" फैलती चली गई (पृ. 264)। इस टॉपिक में देखिए कि और कौन-सी अफ़वाहें और भविष्यवाणियाँ चल रही थीं।
सिपाहियों का इशारा एन्फ़ील्ड राइफ़ल के उन कारतूसों की तरफ़ था जो हाल ही में उन्हें दिए गए थे (पृ. 264)। चित्र 10.5 का कैप्शन बताता है कि गवर्नर जनरल हार्डिंग ने सैनिक साज़ो-सामान के आधुनिकीकरण में ये राइफ़लें शुरू कीं।

हेनरी हार्डिंग, फ़्रांसेस ग्रांट का बनाया चित्र: इन्हीं हार्डिंग के चित्र 10.5 (पृ. 264) का कैप्शन एन्फ़ील्ड राइफ़लों की बात करता है। पीछे मैदान में तोप और तंबू देखिए: चित्रकार उन्हें एक फ़ौजी अफ़सर के रूप में दिखा रहा है।
Francis Grant, Henry Hardinge, 1st Viscount Hardinge; National Portrait Gallery, London. Image: Wikimedia Commons, public domain.
और जानिए राइफ़ल और कारतूस, चित्र में हिस्से पहचानिए
एन्फ़ील्ड राइफ़ल

- नाल का मुँह राइफ़ल यहीं से भरी जाती थी: पहले बारूद, फिर गोली।
- गज़ नाल के नीचे लगी धातु की लंबी छड़। इसे निकालकर गोली को नाल में नीचे तक ठेला जाता था।
- घोड़ा इसके ठीक नीचे की धातु की प्लेट पर इस राइफ़ल के बनने का साल "1863" खुदा है।
- लिबलिबी (ट्रिगर) इसे दबाने पर राइफ़ल चलती थी।
- शिस्त निशाना लगाने के लिए; इसे मोड़कर नीचे किया जा सकता था।
- कुंदा लकड़ी का पिछला हिस्सा, जिसे कंधे से टिकाया जाता था।
यह राइफ़ल 1863 में बनी, पर इसका नमूना वही "पैटर्न 1853" एन्फ़ील्ड है जिसके कारतूसों पर 1857 में झगड़ा हुआ। भरते समय सिपाही कारतूस का सिरा फाड़ता, बारूद नाल में डालता, फिर गोली रखता और गज़ से उसे नीचे तक ठेल देता।
Enfield Pattern 1853 rifle-musket, made 1863. Collection of the Smithsonian National Museum of African American History and Culture, CC0.
उसका कारतूस

- मुड़ा हुआ सिरा भरते समय सबसे पहले यही सिरा खोला जाता था। सिपाहियों से कहा गया था कि इसे दाँतों से खींचें (पृ. 258, 264)।
- बारूद काग़ज़ की नली में भरा बारूद, गोली से अलग।
- गोली पीछे से खोखली गोली।
- लकड़ी की डाट गोली के खोखले हिस्से में लगी छोटी-सी डाट।
- चिकनाई वाला हिस्सा गोली वाला सिरा चिकनाई में डुबोया जाता था, इसलिए उसका रंग गहरा है। 1850 के दशक के एक अंग्रेज़ी फ़ौजी निर्देश में चिकनाई का नुस्ख़ा है: छह हिस्से चर्बी (टैलो) और एक हिस्सा मधुमक्खी का मोम। अफ़वाह यह थी कि इसमें गाय और सुअर की चर्बी है (पृ. 264)।
यह रेखाचित्र 1859 की एक अंग्रेज़ी किताब का है। दाईं ओर वही कारतूस बीच से काटकर दिखाया गया है।
Drawing by Arthur Briscoe Hawes, Rifle Ammunition (1859). Wikimedia Commons, public domain.
चर्बी: सच क्या था?
अफ़वाह कहती थी कि कारतूस की चिकनाई में गाय और सुअर की चर्बी है। उस समय के सरकारी काग़ज़ों और गवाहियों से जो पता चलता है, वह एक-एक करके पढ़िए।
- नुस्ख़ा
चिकनाई थी: छह हिस्से टैलो (जानवरों की चर्बी) और एक हिस्सा मधुमक्खी का मोम। मार्च 1857 में कलकत्ता के एक कोर्ट-मार्शल में गोला-बारूद महकमे के अफ़सर ने यही बताया, और यह भी कि "चर्बी किस जानवर की है, यह पूछा ही नहीं जाता।"
- ठेकेदार
सरकार की अपनी रिपोर्ट ने माना कि चर्बी एक ठेकेदार से ली गई थी और यह पक्का करने की पूरी सावधानी नहीं बरती गई कि उसमें कोई आपत्ति वाली चीज़ न हो। महकमे के सबसे बड़े अफ़सर ने गवाही दी कि उसमें गाय या दूसरे जानवरों की चर्बी "हो भी सकती थी, नहीं भी।"
- 27 जनवरी 1857
दमदम की रिपोर्ट (पृ. 264) के बाद सरकार ने तय किया कि चिकनाई का सामान बाज़ार से ख़रीदा जाए और सिपाही अपने कारतूस ख़ुद चिकने करें। चिकने कारतूस वापस लिए गए, सादे दिए गए। दमदम के सिपाहियों ने ख़ुद यही माँगा था: सामान बाज़ार से लाने दीजिए, चिकनाई हम बना लेंगे।
- क्या बँटे?
मार्च 1857 तक शस्त्रागार से ये नए कारतूस किसी भी पलटन को नहीं दिए गए थे; वे सिर्फ़ ट्रेनिंग के डिपो और एक अंग्रेज़ पलटन के लिए दिल्ली के गोदाम भेजे गए थे। डिपो की ट्रेनिंग में भी 10 मई तक किसी सिपाही ने चिकना कारतूस हाथ में नहीं लिया।
- मेरठ, 24 अप्रैल
परेड में दिखाना था कि कारतूस दाँत से काटे बिना भी भरा जा सकता है। फिर भी तीसरी घुड़सवार पलटन के 85 सिपाहियों ने कारतूस लेने से मना कर दिया। बाद की जाँच ने पाया कि उन कारतूसों पर कोई चिकनाई नहीं थी; वे वैसे ही थे जैसे तीस-चालीस साल से चलते आ रहे थे।
- फ़ैसला
आज भी पक्का पता नहीं। इतिहासकार जॉन केय (1864) ने लिखा कि सुअर की चर्बी तो नहीं दी गई, पर कुछ गाय-बैल की चर्बी ज़रूर इस्तेमाल हुई, और यह "एक चूक" थी। किम वैगनर (2010) लिखते हैं कि फ़ौज को ख़ुद नहीं पता था कि चर्बी किस जानवर की है, और "सच यही है कि हम पक्का नहीं जानते।" पुस्तक भी कहती है कि रिपोर्ट कितनी सच थी, हम नहीं जानते (पृ. 264)।
तो असली बात यह थी: चिकनाई में किस जानवर की चर्बी है, यह अंग्रेज़ अफ़सर ख़ुद पक्के तौर पर नहीं जानते थे। और एक बार अफ़वाह फैली, तो आश्वासनों से नहीं मिटी (पृ. 264): मेरठ में पुराने, बिना चिकनाई वाले कारतूस भी शक से नहीं बचे।
पुराने स्रोत (अंग्रेज़ी में)
- G. W. Forrest (ed.), Selections from the State Papers, Military Department, vol. 1 (1893)
- J. W. Kaye, A History of the Sepoy War in India, vol. 1, p. 519
- Kim A. Wagner, The Great Fear of 1857 (Peter Lang, 2010), chapter "The Greased Cartridges"
अगले टॉपिक में किताब ख़ुद पूछती है: लोग इन अफ़वाहों पर विश्वास क्यों कर रहे थे (पृ. 265)?
1.5लोग अफ़वाहों में विश्वास क्यों कर रहे थे?पृ. 265–266
लोगों को लगता था कि जिन चीज़ों की वे क़द्र करते थे — राजे-रजवाड़े, सामाजिक-धार्मिक रीति-रिवाज, भूस्वामित्व, लगान की प्रणाली — उन सबको ख़त्म करके एक ज़्यादा हृदयहीन, परायी और दमनकारी व्यवस्था लाई जा रही है (पृ. 265)।
किताब के अपने प्रश्न
1बहुत सारे स्थानों पर विद्रोही सिपाहियों ने नेतृत्व सँभालने के लिए पुराने शासकों से क्या आग्रह किया?
उत्तर दीजिए (लगभग 100 से 150 शब्दों में)
जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
- विद्रोही उन लोगों की ओर मुड़े जो अंग्रेज़ों से पहले नेताओं की भूमिका निभाते थे (पृ. 262)।
- दिल्ली पहुँचकर सिपाहियों की माँग थी कि बादशाह उन्हें अपना आशीर्वाद दें (पृ. 258), और उन्होंने बूढ़े हो चुके मुग़ल बादशाह से विद्रोह का नेतृत्व स्वीकार करने की दरख़्वास्त की (पृ. 262)।
- बहादुर शाह पहले भयभीत और बेचैन दिखे; उन्होंने नाममात्र का नेता बनना तब स्वीकार किया जब कुछ सिपाही शाही शिष्टाचार तोड़कर लाल क़िले के मुग़ल दरबार में जा घुसे (पृ. 262)।
- कानपुर में पेशवा बाजीराव द्वितीय के उत्तराधिकारी नाना साहिब को नेता बनना पड़ा, और झाँसी में रानी को आम जनता के दबाव में बग़ावत का नेतृत्व सँभालना पड़ा (पृ. 262)।
- बिहार में आरा के स्थानीय ज़मींदार कुँवर सिंह के साथ भी यही हुआ, और लखनऊ में लोगों ने नवाब वाजिद अली शाह के युवा बेटे बिरजिस क़द्र को अपना नेता घोषित कर दिया (पृ. 262)।
- बादशाह के नाम से विद्रोह को वैधता मिली, क्योंकि अब उसे मुग़ल बादशाह के नाम पर चलाया जा सकता था (पृ. 258)।
2उन साक्ष्यों के बारे में चर्चा कीजिए जिनसे पता चलता है कि विद्रोही योजनाबद्ध और समन्वित ढंग से काम कर रहे थे?
उत्तर दीजिए (लगभग 100 से 150 शब्दों में)
जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
- जैसे-जैसे विद्रोह की ख़बर एक शहर से दूसरे शहर पहुँची, सिपाही हथियार उठाते गए, और हर छावनी में विद्रोह का घटनाक्रम कमोबेश एक जैसा था (पृ. 259)।
- सातवीं अवध इर्रेग्युलर कैवेलरी ने मई की शुरुआत में नए कारतूसों का इस्तेमाल करने से इनकार किया और 48 नेटिव इन्फेंट्री को लिखा: "हमने अपने धर्म की रक्षा के लिए यह फ़ैसला लिया है और 48 नेटिव इन्फेंट्री के हुक्म का इंतज़ार कर रहे हैं।" (पृ. 260)
- सिपाही या उनके संदेशवाहक एक जगह से दूसरी जगह जा रहे थे, और विभिन्न छावनियों के सिपाहियों के बीच अच्छा संचार बना हुआ था (पृ. 260)।
- कैप्टेन हियर्से का मामला सुलझाने के लिए तय हुआ कि हर रेजीमेंट के देशी अफ़सरों की एक पंचायत बुलाई जाए, और चार्ल्स बॉल ने लिखा है कि ये पंचायतें रात को कानपुर सिपाही लाइनों में जुटती थीं (पृ. 261)।
- सिपाही लाइनों में साथ रहते थे और उनमें से बहुत सारे एक ही जाति के थे, इसलिए यह मानना मुश्किल नहीं कि कुछ फ़ैसले मिलकर लिए जाते थे; किताब कहती है: "ये सिपाही अपने विद्रोह के कर्ताधर्ता ख़ुद ही थे।" (पृ. 261)
- सिस्टन से बिजनौर का तहसीलदार पूछता है "काम कैसा चल रहा है?" और भरोसा देता है "मामला क़ाबिल हाथों में है।"; यही तहसीलदार बिजनौर के विद्रोहियों का सबसे बड़ा नेता था (पृ. 261)।
31857 के घटनाक्रम को निर्धारित करने में धार्मिक विश्वासों की किस हद तक भूमिका थी?
उत्तर दीजिए (लगभग 100 से 150 शब्दों में)
जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
- मेरठ के सिपाहियों ने बहादुर शाह से कहा कि गाय और सुअर की चर्बी में लिपटे कारतूसों से हिंदू और मुसलमान, सबका धर्म भ्रष्ट हो जाएगा (पृ. 258)।
- चर्बी वाले कारतूसों की बात "जंगल की आग की तरह" फैली, और आटे में गाय और सुअर की हड्डियों के चूरे की अफ़वाह के बाद सिपाहियों और आम लोगों ने आटा छूने से इनकार कर दिया (पृ. 264)।
- लोगों को डर था कि अंग्रेज़ हिंदुस्तानियों को ईसाई बनाना चाहते हैं (पृ. 264), और ईसाई प्रचारकों की गतिविधियों से इस सोच को बल मिल रहा था (पृ. 266)।
- सिपाहियों की एक बची हुई अर्ज़ी पूछती है: "अगर एक हिंदू या मुसलमान का धर्म ही नष्ट हो गया तो दुनिया में बचेगा क्या?" (पृ. 273)
- घोषणाओं में डर जताया गया कि अंग्रेज़ जाति और धर्म नष्ट करके लोगों को ईसाई बना देंगे, और लोगों से रोज़गार, धर्म, इज़्ज़त और अस्मिता, चारों के लिए लड़ने को कहा गया (पृ. 274)।
- किताब के अनुसार अफ़वाह तभी फैलती है जब उसमें लोगों के गहरे डर की गूँज हो, और यह डर 1820 के दशक से चल रही नीतियों से जुड़ा था: अंग्रेज़ी शिक्षा, सती प्रथा ख़त्म करने और हिंदू विधवा विवाह को वैधता देने के क़ानून, और रियासतों पर क़ब्ज़ा (पृ. 265)।
जाँच पड़ाव✓ पड़ाव पूरा
1छावनियों में विद्रोह करते ही सिपाहियों ने सबसे पहले क्या किया?
पृ. 259: "सबसे पहले उन्होंने शस्त्रागार पर क़ब्ज़ा किया और सरकारी ख़ज़ाने को लूटा।"
2मेरठ से दिल्ली पहुँचकर सिपाही किसके पास गए?
पृ. 258: 11 मई तड़के लाल क़िले में बादशाह बहादुर शाह के पास।
3चार्ल्स बॉल के अनुसार सिपाहियों की पंचायतें कहाँ जुटती थीं?
पृ. 261: रात को कानपुर सिपाही लाइनों में।
4मौलवी अहमदुल्ला शाह को लोग किस नाम से बुलाने लगे?
पृ. 263: पालकी के आगे ढोल बजता था, इसलिए "डंका शाह"।
5किस भविष्यवाणी के अनुसार 23 जून 1857 को अंग्रेज़ी राज ख़त्म होना था?
पृ. 264: प्लासी की जंग के 100 साल पूरे होने पर।
6सती प्रथा ख़त्म करने का क़ानून किस वर्ष बना?
पृ. 265: 1829।
2अवध में विद्रोह
इस पड़ाव का सवाल
अवध में विद्रोह इतना व्यापक क्यों था, और वहाँ कौन-कौन लड़ा?
पिछली बात से कड़ी पड़ाव 1 के आख़िर में हमने पढ़ा कि अवध, झाँसी और सतारा जैसे राज्य बहानों से छीने गए, और लोगों को नई व्यवस्था पराई और दमनकारी लगने लगी (पृ. 265)। अब किताब एक इलाक़े, अवध, को पास से देखती है, जहाँ यह असंतोष सबसे गहरा था (पृ. 266)।
2.1“ये गिलास फल एक दिन हमारे ही मुँह में आकर गिरेगा।”पृ. 266
विद्रोह की जड़ें समझने के लिए पुस्तक अवध को नज़दीक से देखती है: "अवध 1857 के इस भव्य नाटक का बड़ा केंद्र था" (पृ. 266)।
"ये गिलास फल (Cherry) एक दिन हमारे ही मुँह में आकर गिरेगा।"
अंग्रेज़ों की नज़र अवध पर क्यों? (पृ. 266)
उन्हें लगता था कि वहाँ की ज़मीन नील और कपास की खेती के लिए मुफ़ीद है, और इस इलाक़े को उत्तरी भारत के एक बड़े बाज़ार के रूप में बढ़ाया जा सकता है।

लखनऊ, अवध की राजधानी: 1856 में अंग्रेज़ों ने अवध को अपने राज में मिला लिया था (पृ. 266)। यह चित्र लंदन के एक सचित्र अख़बार ने 2 जनवरी 1858 के अंक में छापा। उसके नीचे लिखा है कि यह वेधशाला (ऑब्ज़र्वेटरी) की छत से खींची गई एक फ़ोटो पर बना है।
The Illustrated London News, 2 January 1858. Wikimedia Commons, public domain.
रेज़ीडेंट (पृ. 266)
गवर्नर जनरल का प्रतिनिधि, जिसे ऐसे राज्य में तैनात किया जाता था जो अंग्रेज़ों के प्रत्यक्ष शासन में नहीं था।
2.2“देह से जान जा चुकी थी।”पृ. 266–267
2.3फ़िरंगी राज का आना और एक दुनिया का ख़ात्मापृ. 268–270

राजा लाल माधो सिंह, अमेठी, 1880: यह फ़ोटो अवध के राजाओं और ताल्लुक़दारों की तसवीरों के एक एल्बम की है, जो 1880 में छपा। किताब के पृ. 268 पर चित्र 10.6 भी उसी साल की, अवध के एक ज़मींदार की फ़ोटो है। पहनावा और ठाठ देखिए: ताल्लुक़दार अपने इलाक़े के राजा जैसे थे।
Darogah Haji Abbas Ali, An Illustrated Historical Album of the Rajas and Taaluqdars of Oudh (Allahabad, 1880). Image: Wikimedia Commons, public domain.
राजस्व की माँग कितनी बढ़ी? (पृ. 269)
कुछ जगहों पर 30 से 70 प्रतिशत तक। यानी न ताल्लुक़दारों के पास इस अधिग्रहण पर ख़ुश होने का कोई कारण था, न काश्तकारों के पास।
जैसे, जहाँ माँग 100 रुपये थी, वहाँ अब 130 से 170 रुपये। (यह हिसाब हमारा है; पुस्तक सिर्फ़ प्रतिशत देती है।)
"बंगाल आर्मी की पौधशाला" (पृ. 270)
बंगाल आर्मी के बहुत से सिपाही अवध और पूर्वी उत्तर प्रदेश के गाँवों से भर्ती होकर आए थे। अवध को तो "बंगाल आर्मी की पौधशाला" कहा जाता था। गाँव में परिवार जो बदलाव और ख़तरे देख रहे थे, वे जल्दी ही सिपाही लाइनों में दिखने लगे; और कारतूसों का भय, छुट्टियों की शिकायतें, बढ़ता दुर्व्यवहार और नस्ली गाली-गलौज गाँवों तक। इसीलिए जब सिपाही अफ़सरों की अवज्ञा करके हथियार उठाते, तो फ़ौरन गाँवों के भाई-बिरादर भी साथ आ जुटते।
मज़ाक भी एक नज़र है
किताब में: पृ. 270, चित्र 10.7
यूरोपीय क़िस्म की वर्दी पहने बंगाल के सिपाही। पुस्तक कहती है, यहाँ कलाकार सिपाहियों की वर्दी का मज़ाक उड़ा रहा है।
ऐसी तसवीर से कलाकार क्या जताना चाहता होगा?
किताब का जवाब देखिए
पुस्तक का अनुमान (पृ. 270): शायद यह कि "पश्चिमी पोशाक पहन कर भी हिंदुस्तानी सुंदर नहीं दिख सकते।"
विद्रोह भड़का क्यों? पड़ाव 1 और 2 के कारण, एक जगह
पृ. 259 से 270 तक किताब ने जो कारण बताए हैं, उन्हें यहाँ तबक़ों के हिसाब से एक जगह रखा है। हर बात के साथ उसका पृष्ठ है, ताकि आप किताब में मिला सकें।
- सिपाही
- चर्बी लगे कारतूसों और आटे में हड्डियों के चूरे की अफ़वाहों से उन्हें अपनी जाति और धर्म भ्रष्ट होने का डर था (पृ. 264); कम वेतन और वक़्त पर छुट्टी न मिलने की शिकायत पुरानी थी (पृ. 269); और 1840 के दशक से अफ़सर उन्हें "कमतर नस्ल" का मानकर गाली-गलौज और मारपीट करने लगे थे (पृ. 270)।
- राजा, रानियाँ और नवाब
- शासकीय दुर्बलता और दत्तकता को अवैध बताने जैसे बहानों से अवध, झाँसी और सतारा जैसे राज्य छीन लिए गए (पृ. 265)। अवध के नवाब वाजिद अली शाह को गद्दी से हटाकर कलकत्ता भेज दिया गया (पृ. 266)।
- दरबार के सहारे जीने वाले
- नवाब के जाते ही दरबार उजड़ गया, और संगीतकारों, नर्तकों, कवियों, कारीगरों, बावर्चियों, नौकरों और सरकारी कर्मचारियों की रोज़ी-रोटी जाती रही (पृ. 267)।
- ताल्लुक़दार
- अधिग्रहण के बाद उनकी सेनाएँ भंग कर दी गईं और दुर्ग ढहा दिए गए; 1856 के एकमुश्त बंदोबस्त के बाद अवध के गाँवों में उनका हिस्सा 67 से घटकर 38 प्रतिशत रह गया (पृ. 268)।
- किसान
- कुछ जगह राजस्व माँग 30 से 70 प्रतिशत तक बढ़ गई, और मुसीबत या फ़सल ख़राब होने पर छूट का, या त्योहारों पर मदद का सहारा नहीं रहा (पृ. 269)। शहरों के साहूकारों और अमीरों को वे अपना उत्पीड़क और अंग्रेज़ों का पिट्ठू मानते थे (पृ. 259)।
- हिंदू और मुसलमान, दोनों
- लोगों को डर था कि अंग्रेज़ हिंदुस्तानियों को ईसाई बनाना चाहते हैं (पृ. 264), और ईसाई प्रचारकों की गतिविधियों से इस सोच को बल मिल रहा था (पृ. 266)।
- समाज और रीति-रिवाज
- 1820 के दशक से अंग्रेज़ी शिक्षा, सती प्रथा ख़त्म करने (1829) और हिंदू विधवा विवाह के क़ानून, और अंग्रेज़ों का अपना प्रशासन, क़ानून और भूराजस्व: लोगों को लगा कि जिन चीज़ों की वे क़द्र करते थे, उनकी जगह एक "ज़्यादा हृदयहीन, परायी और दमनकारी" व्यवस्था आ रही है (पृ. 265)।
- सबको जोड़ने वाली कड़ी
- अवध में शिकायतों की यह कड़ी राजकुमारों, ताल्लुक़दारों, किसानों और सिपाहियों को एक-दूसरे से जोड़ रही थी (पृ. 268), और सिपाही अपने डर और शिकायतें अपने गाँवों तक ले गए, जहाँ से गाँव वाले भी साथ आ गए (पृ. 270)।
किताब के अपने प्रश्न
6अवध में विद्रोह इतना व्यापक क्यों था? किसान, ताल्लुक़दार और ज़मींदार उसमें क्यों शामिल हुए?
निम्नलिखित पर एक लघु निबंध लिखिए (लगभग 250 से 300 शब्दों में)
जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
- अवध 1857 का बड़ा केंद्र था: नवाब वाजिद अली शाह को यह कहकर हटाया गया कि वे अच्छी तरह शासन नहीं चला रहे थे, जबकि लोग उन्हें दिल से चाहते थे, और बहुत सारे लोग विलाप करते हुए कानपुर तक उनके पीछे गए (पृ. 266–267)।
- दरबार उजड़ने से संगीतकारों, नर्तकों, कवियों, कारीगरों, बावर्चियों, नौकरों और सरकारी कर्मचारियों की रोज़ी-रोटी जाती रही (पृ. 267)।
- अधिग्रहण के फ़ौरन बाद ताल्लुक़दारों की सेनाएँ भंग कर दी गईं और दुर्ग ध्वस्त कर दिए गए; 1856 के एकमुश्त बंदोबस्त के बाद अवध के गाँवों में उनका हिस्सा 67 से घटकर 38 प्रतिशत रह गया (पृ. 268)।
- ज़मीन छिनने का दर्द कालाकंकर के राजा हनवन्त सिंह के शब्दों में है: "एक ही झटके में आपने मेरे पुरखों की ज़मीन मुझसे छीन ली। मैं चुप रहा।" (पृ. 269)
- किसानों का बोझ भी कम नहीं हुआ: कुछ जगह राजस्व माँग 30 से 70 प्रतिशत तक बढ़ गई, और मुसीबत या फ़सल ख़राब होने पर छूट का, या त्योहारों पर मदद का कोई भरोसा नहीं रहा (पृ. 268–269)।
- अवध में लड़ाई ताल्लुक़दारों और उनके किसानों ने मिलकर लड़ी (पृ. 269), और बंगाल आर्मी के बहुत सारे सिपाही इन्हीं गाँवों से आते थे: अवध को "बंगाल आर्मी की पौधशाला" कहा जाता था (पृ. 270)।
जाँच पड़ाव✓ पड़ाव पूरा
1अवध के बारे में "गिलास फल" वाली बात किसने कही थी?
पृ. 266: 1851 में गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौज़ी ने।
2अंग्रेज़ों के आने से पहले अवध के कितने प्रतिशत गाँव ताल्लुक़दारों के पास थे?
पृ. 268: 67 प्रतिशत; एकमुश्त बंदोबस्त के बाद 38 प्रतिशत।
3पृ. 270 पर अवध को "बंगाल आर्मी की पौधशाला" कहा गया है। उसी पन्ने पर बंगाल आर्मी के सिपाहियों के बारे में क्या लिखा है?
पृ. 270: बहुत से सिपाही अवध और पूर्वी उत्तर प्रदेश के गाँवों से भर्ती होकर आए थे।
3विद्रोही क्या चाहते थे?
इस पड़ाव का सवाल
विद्रोही क्या चाहते थे, और यह जानना इतना मुश्किल क्यों है?
पिछली बात से कड़ी अवध में शिकायतों की एक कड़ी ने राजकुमारों, ताल्लुक़दारों, किसानों और सिपाहियों को एक-दूसरे से जोड़ दिया था (पृ. 268)। अब सवाल यह है कि ये सब लड़ किस चीज़ के लिए रहे थे।
विद्रोहियों की आवाज़ कम क्यों बची?पृ. 270–271
इस पड़ाव का सवाल किताब के शीर्षक में ही है। पर जवाब ढूँढने से पहले एक मुश्किल समझिए: विद्रोहियों के अपने काग़ज़ बहुत कम बचे हैं (पृ. 270)।
अंग्रेज़ विद्रोहियों को "अहसानफ़रामोश और बर्बर लोगों का झुंड" मानते थे, और विद्रोह को कुचलने का मतलब उनकी आवाज़ दबाना भी था। बहुत कम विद्रोहियों को अपनी बात दर्ज करने का मौक़ा मिला; ज़्यादातर सिपाही और आम लोग "पढ़े-लिखे नहीं थे"। इसलिए विद्रोही नेताओं की "कुछ घोषणाओं व इश्तहारों" के सिवा उनका नज़रिया बताने वाला ज़्यादा कुछ नहीं बचा (पृ. 270)।
नतीजा (पृ. 271): इतिहासकारों को ज़्यादातर अंग्रेज़ों के दस्तावेज़ों पर निर्भर रहना पड़ता है, और पुस्तक कहती है: "विडंबना यह है कि इन स्रोतों से अंग्रेज़ अफ़सरों की सोच का तो पता चलता है लेकिन इस बारे में ज़्यादा सुराग़ नहीं मिल पाता कि विद्रोही क्या चाहते थे"।
3.1एकता की कल्पनापृ. 271–273
बरेली, दिसंबर 1857 (पृ. 273)
अंग्रेज़ शासन ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बरेली में हिंदुओं को मुसलमानों के ख़िलाफ़ भड़काने के लिए 50,000 रुपये ख़र्च किए। नतीजा क्या रहा?
देखिए
"उनकी यह कोशिश नाकामयाब रही।" पुस्तक कहती है कि हिंदुओं और मुसलमानों के बीच खाई पैदा करने की अंग्रेज़ों की कोशिशों के बावजूद आंदोलन में ऐसा कोई फ़र्क़ नहीं दिखाई दिया।
3.2उत्पीड़न के प्रतीकों के ख़िलाफ़पृ. 273–274
लोगों को किसलिए लड़ने को कहा गया? (पृ. 274)
"अपने रोज़गार, धर्म, इज़्ज़त और अस्मिता के लिए।" घोषणाओं के शब्दों में यह "व्यापक सार्वजनिक भलाई" की लड़ाई थी।
3.3वैकल्पिक सत्ता की तलाशपृ. 274–275
किताब के अपने प्रश्न
4विद्रोहियों के बीच एकता स्थापित करने के लिए क्या तरीके अपनाए गए?
उत्तर दीजिए (लगभग 100 से 150 शब्दों में)
जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
- हिंदी, उर्दू और फ़ारसी में अपीलें जारी हुईं कि हिंदू और मुसलमान, तमाम लोग एकजुट होकर फ़िरंगियों का सफाया करें (पृ. 259)।
- घोषणाओं में जाति और धर्म का भेद किए बिना समाज के सभी तबकों का आह्वान किया जाता था (पृ. 271)।
- बहुत-सी घोषणाएँ मुस्लिम राजकुमारों या नवाबों की तरफ़ से या उनके नाम पर थीं, पर उनमें हिंदुओं की भावनाओं का ख़याल रखा गया, और विद्रोह को ऐसा युद्ध बताया गया जिसमें हिंदुओं और मुसलमानों, दोनों का नफ़ा-नुक़सान बराबर था (पृ. 271)।
- इश्तहारों में मुग़ल साम्राज्य के तहत विभिन्न समुदायों के सहअस्तित्व का गौरवगान किया गया, और बहादुर शाह के नाम से जारी घोषणा में मुहम्मद और महावीर, दोनों की दुहाई दी गई (पृ. 271)।
- आज़मगढ़ घोषणा ज़मींदारों, व्यापारियों, सरकारी कर्मचारियों, कारीगरों और पंडितों-फ़कीरों, हर तबके की शिकायतें अलग-अलग गिनाकर सबको इस जंग में साथ आने को कहती है (पृ. 271–272)।
- अंग्रेज़ शासन ने दिसंबर 1857 में बरेली के हिंदुओं को मुसलमानों के ख़िलाफ़ भड़काने के लिए 50,000 रुपये ख़र्च किए, पर उनकी यह कोशिश नाकामयाब रही (पृ. 273)।
7विद्रोही क्या चाहते थे? विभिन्न सामाजिक समूहों की दृष्टि में कितना फ़र्क़ था?
निम्नलिखित पर एक लघु निबंध लिखिए (लगभग 250 से 300 शब्दों में)
जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
- विद्रोहियों की अपनी आवाज़ कम बची है: कुछ घोषणाओं और इश्तहारों के सिवा ज़्यादा कुछ नहीं, इसलिए उनकी चाहतें इन्हीं से पढ़नी पड़ती हैं (पृ. 270–271)।
- घोषणाएँ अंग्रेज़ी राज से जुड़ी हर चीज़ को ठुकराती थीं, और विद्रोही अपनी उस दुनिया को दोबारा बहाल करना चाहते थे जो छिन गई थी (पृ. 273–274)।
- आज़मगढ़ घोषणा हर तबके से अलग बात करती है: ज़मींदारों से हलके जमा का वादा, देसी व्यापारियों के लिए व्यापार खोलने का वादा, सरकारी कर्मचारियों से 200 और 300 रुपये महीना तनख़्वाह का वादा, कारीगरों से राजाओं और अमीरों के यहाँ रोज़गार का वादा, और पंडितों-फ़कीरों को पवित्र युद्ध में शामिल होने का बुलावा (पृ. 272)।
- दिल्ली, लखनऊ और कानपुर में विद्रोही नेता अठारहवीं सदी की पूर्व-ब्रिटिश दुनिया जैसी सत्ता खड़ी करना चाहते थे: पदों पर नियुक्तियाँ, लगान वसूली, सैनिकों की तनख़्वाह और लूटपाट पर रोक के हुक्म (पृ. 274)।
- गाँवों में विद्रोहियों ने साहूकारों के बहीखाते जलाए; किताब कहती है कि इसमें शायद एक ज़्यादा समतापरक समाज की कल्पना झलकती है, जो घोषणाओं में लिखी नहीं गई (पृ. 274)।
- दोनों को साथ रखकर देखिए: आज़मगढ़ घोषणा धनवानों से कहती है कि वे अपना जीवन और संपत्ति जनता की कुशलक्षेम के लिए होम कर दें (पृ. 271), जबकि किसान साहूकारों और अमीरों को अपना उत्पीड़क और अंग्रेज़ों का पिट्ठू मानते थे (पृ. 259)।
जाँच पड़ाव✓ पड़ाव पूरा
1पुस्तक के अनुसार 1857 को समझने के लिए इतिहासकारों को मजबूरन किस पर निर्भर रहना पड़ता है?
पृ. 271: "बहुत हद तक, और मजबूरन, अंग्रेज़ों के दस्तावेज़ों पर"।
2विद्रोहियों की तरफ़ से कौन-से दस्तावेज़ हमारे पास हैं?
पृ. 277: "हमारे पास विद्रोहियों की कुछ घोषणाएँ, अधिसूचनाएँ तथा नेताओं के पत्र हैं।"
3विद्रोहियों के अपने लिखे ब्योरे इतने कम क्यों हैं? पुस्तक की एक वजह चुनिए।
पृ. 270: ज़्यादातर विद्रोही सिपाही और आम लोग थे जो "पढ़े-लिखे नहीं थे"; विद्रोह को कुचलने का मतलब उनकी आवाज़ दबाना भी था।
4आज़मगढ़ घोषणा किस तारीख़ की है?
पृ. 271: आज़मगढ़ घोषणा, 25 अगस्त 1857।
5बहादुर शाह के नाम से जारी घोषणा में किन दोनों की दुहाई दी गई?
पृ. 271: मुहम्मद और महावीर, दोनों की दुहाई।
6आज़मगढ़ घोषणा ने सरकारी कर्मचारियों से क्या वादा किया?
पृ. 272: और भविष्य में ऊँचे ओहदों की उम्मीद।
4दमन
इस पड़ाव का सवाल
अंग्रेज़ों ने विद्रोह को कैसे कुचला, और इसमें इतना समय क्यों लगा?
पिछली बात से कड़ी पड़ाव 3 के आख़िर में विद्रोही दिल्ली, लखनऊ और कानपुर में अपनी सत्ता खड़ी करते दिखे (पृ. 274)। अब देखिए कि अंग्रेज़ों ने उसे गिराने के लिए क़ानून, फ़ौज और बड़े ज़मींदारों को जागीरें लौटाने का भरोसा, तीनों का सहारा कैसे लिया (पृ. 275–277)।
ज़्यादातर जगहों पर विद्रोहियों की बनाई व्यवस्था अंग्रेज़ों की मार बरदाश्त नहीं कर पाई। अवध में प्रतिरोध सबसे लंबा चला: वहाँ 1857 के आख़िर और 1858 के शुरुआती महीनों तक विद्रोहियों की हुकुम की श्रेणियाँ बनी रहीं (पृ. 275)। पुस्तक कहती है, इस विद्रोह को कुचलना अंग्रेज़ों के लिए "बहुत आसान साबित नहीं हुआ" (पृ. 275)।
और जानिए तब और अब: आज का क़ानून क्या कहता है?
ख़बरों में आपने "धारा 144" सुनी होगी। वह पुरानी दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा थी। 1 जुलाई 2024 से उसकी जगह भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 लागू है, और इसी नई संहिता की धारा 531 ने पुरानी संहिता रद्द कर दी। एक सरकारी वेबसाइट पर छपी तुलना-तालिका में नई धारा 163 के सामने पुरानी धारा 144 लिखी है। अब 1857 के मार्शल लॉ (पृ. 275) और आज की धारा 163 को आमने-सामने रखकर देखिए।
1857 में
फ़ौजी अफ़सर, और यहाँ तक कि आम अंग्रेज़ भी, शक वाले हिंदुस्तानियों पर मुक़दमा चलाकर सज़ा दे सकते थे (पृ. 275)।
आज का क़ानून
जब फ़ौरन रोकथाम ज़रूरी हो, तब ज़िला मजिस्ट्रेट, उपखंड मजिस्ट्रेट, या राज्य सरकार से इसके लिए ख़ास अधिकार पाया कोई कार्यपालक मजिस्ट्रेट किसी को कोई ख़ास काम न करने, या अपने क़ब्ज़े की किसी संपत्ति की कोई ख़ास व्यवस्था करने, का आदेश दे सकता है, ताकि क़ानूनी काम पर लगे किसी व्यक्ति को रुकावट, परेशानी या चोट, जान-सेहत-सुरक्षा को ख़तरा, शांति भंग, बलवा या दंगा रोका जा सके। आदेश लिखित होगा, और उसमें मामले के ज़रूरी तथ्य लिखे होंगे (धारा 163(1))।
1857 में
मई और जून 1857 के क़ानूनों से समूचे उत्तर भारत में मार्शल लॉ लागू कर दिया गया (पृ. 275)।
आज का क़ानून
आदेश किसी एक व्यक्ति पर, किसी जगह या इलाक़े में रहने वालों पर, या किसी जगह आने-जाने वाले आम लोगों पर लागू हो सकता है (धारा 163(3))। यह दो महीने से ज़्यादा नहीं चल सकता। जान, सेहत या सुरक्षा को ख़तरे से, या बलवे या दंगे से बचाने के लिए राज्य सरकार ज़रूरी समझे, तो अधिसूचना निकालकर इसे छह महीने तक और बढ़ा सकती है (धारा 163(4))।
1857 में
क़ानून और मुक़दमे की सामान्य प्रक्रिया रद्द कर दी गई (पृ. 275)।
आज का क़ानून
आपात हालत में, या जब समय पर सूचना देना संभव न हो, आदेश पहले सूचना दिए बिना भी दिया जा सकता है (धारा 163(2))। पर जिस किसी को आदेश से शिकायत हो, वह उसे हटवाने या बदलवाने की अर्ज़ी दे सकता है: मजिस्ट्रेट के आदेश पर मजिस्ट्रेट को, और राज्य सरकार की बढ़ाई अवधि पर राज्य सरकार को। उसे जल्दी, ख़ुद या वकील के ज़रिए, अपनी बात रखने का मौक़ा मिलेगा; अर्ज़ी नामंज़ूर हो तो उसके कारण लिखित में दर्ज करने होंगे (धारा 163(5)–(7))।
1857 में
विद्रोह की केवल एक ही सज़ा थी: सज़ा-ए-मौत (पृ. 275)।
आज का क़ानून
ऐसा आदेश जानते हुए न मानना भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 223 में अपराध है। अगर इससे क़ानूनी काम पर लगे किसी व्यक्ति को रुकावट, परेशानी या चोट पहुँचे, या इसका जोखिम हो, तो छह महीने तक की सादी क़ैद, या 2,500 रुपये तक जुर्माना, या दोनों। अगर जान, सेहत या सुरक्षा को ख़तरा हो, या बलवा या दंगा हो, या इनकी आशंका हो, तो एक साल तक की क़ैद, या 5,000 रुपये तक जुर्माना, या दोनों। नुक़सान पहुँचाने का इरादा होना ज़रूरी नहीं: आदेश की जानकारी होना काफ़ी है, अगर उसे न मानने से नुक़सान हो या होने की आशंका हो (धारा 223 की व्याख्या)।
ध्यान दीजिए: धारा 163 का आदेश मार्शल लॉ नहीं है। यह एक मजिस्ट्रेट का लिखित, कुछ समय का आदेश है, जिसके ख़िलाफ़ अर्ज़ी दी जा सकती है। हमारे संविधान में मार्शल लॉ को "सेना विधि" कहा गया है, और इसका ज़िक्र अनुच्छेद 34 में आता है: जिस इलाक़े में सेना विधि लागू रही हो, वहाँ व्यवस्था बनाए रखने या बहाल करने के लिए किए गए कामों के लिए संसद क़ानून बनाकर लोगों को क़ानूनी बचाव दे सकती है (संविधान का शब्द है "क्षतिपूर्ति"), और वहाँ दी गई सज़ाओं वग़ैरह को वैध ठहरा सकती है। यह अनुच्छेद सेना विधि लागू करने का तरीक़ा नहीं बताता।
सरकारी पाठ:भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (हिंदी), धारा 163 और 5311 जुलाई 2024 से लागू होने की अधिसूचनाभारतीय न्याय संहिता, 2023 (हिंदी), धारा 223भारत का संविधान, अनुच्छेद 34 (अंग्रेज़ी, 1 मई 2026 तक का पाठ)भारत का संविधान (हिंदी, 26 नवंबर 2021 तक का पाठ)नई धारा 163 और पुरानी धारा 144: तुलना-तालिका
दिल्ली: जून से सितंबर के आख़िर तक (पृ. 276)
विद्रोहियों की तरह अंग्रेज़ भी दिल्ली के सांकेतिक महत्त्व को समझते थे, इसलिए दोतरफ़ा हमला बोला गया। दिल्ली पर क़ब्ज़े की कोशिश जून 1857 में बड़े पैमाने पर शुरू हुई, पर यह मुहिम सितंबर के आख़िर में जाकर पूरी हो पाई। दोनों पक्षों को भारी नुक़सान हुआ। इसकी एक वजह यह थी कि पूरे उत्तर भारत के विद्रोही राजधानी बचाने के लिए दिल्ली में आ जमे थे।
- जून
- जुलाई
- अगस्त
- सितंबर
अवध में कितने लोग विद्रोह के साथ थे? (पृ. 276)
अंग्रेज़ों को अहसास हो गया कि उनका सामना सिर्फ़ सिपाहियों की बग़ावत से नहीं, एक ऐसे विद्रोह से है जिसके पीछे "बेहिसाब जन-समर्थन" था। अवध में फॉरसिथ नाम के एक अंग्रेज़ अफ़सर का अनुमान था:
कम से कम तीन-चौथाई वयस्क पुरुष आबादी विद्रोह में शामिल थी।
ध्यान दीजिए: यह एक अफ़सर का अनुमान है, गिनती नहीं। अवध को अंग्रेज़ लंबी लड़ाई के बाद मार्च 1858 में जाकर ही फिर क़ब्ज़े में ले पाए।
लड़ाई के बाद: तीन फ़ोटो
किताब के पृ. 276 पर चित्र 10.8 के नीचे लिखा है कि 1857 के बाद अंग्रेज़ फ़ोटोग्राफ़रों ने तबाही और खंडहरों की अनगिनत तसवीरें खींचीं। ये तीनों फ़ोटो उन्हीं में से हैं।

दिल्ली रिज की एक मस्जिद, 1857–58: किताब का चित्र 10.8 (पृ. 276) यही फ़ोटो है। दीवारों के छेद और ढहे हुए कोने देखिए।
Felice Beato, Mosque piquet on Delhi Ridge after the siege, 1858; Google Art Project. Image: Wikimedia Commons, public domain.

हिंदू राव का घर, दिल्ली: दिल्ली के बाहर रिज पर बना यह घर 1857 में दिल्ली की घेरेबंदी के दिनों में अंग्रेज़ी फ़ौज की मुख्य चौकी था। उखड़ी दीवारें और टूटी छत देखिए: यह घर लड़ाई के बीच खड़ा था।
Photograph by Robert and Harriet Tytler, Delhi, 1858; British Library. Wikimedia Commons, public domain.

लखनऊ रेज़ीडेंसी, घेरेबंदी के बाद: 1857 में विद्रोही सेनाओं ने लखनऊ को घेरा, तो अंग्रेज़ों ने इसी रेज़ीडेंसी में शरण ली और घेरे में रहे (पृ. 277–278)। घेरा उठने के बाद की यह फ़ोटो दिखाती है कि इमारत का क्या हाल हुआ।
Photograph by Felice A. Beato, Lucknow, 1858. The Cleveland Museum of Art, 2019.170.8, CC0.
सोचिए: इन तसवीरों में लड़ाई के बाद का सन्नाटा है, लड़ने वाले लोग नहीं। फ़ोटो खींचने वाले ने क्या दिखाना चुना, और ये तसवीरें किसके लिए बनी होंगी?
जवाब देखिए
फ़ोटो खींचने वालों ने लड़ने वाले लोग नहीं, लड़ाई के बाद की तबाही चुनी: छलनी दीवारें, टूटी छतें, खंडहर। पुस्तक कहती है कि 1857 के बाद ब्रिटिश फ़ोटोग्राफ़रों ने "तबाही और ध्वंस की असंख्य तसवीरें" उतारी थीं (पृ. 276)। ऐसी फ़ोटो ज़्यादातर अंग्रेज़ों के देखने के लिए बनी होंगी: उनसे लगता था कि अंग्रेज़ों ने कितना झेला और फिर भी जीते। इसी पन्ने पर पुस्तक लखनऊ की एक और फ़ोटो (सिकंदरा बाग) के बारे में लिखती है कि उसका मंज़र "विद्रोह की निरर्थकता की एक ठंडी चेतावनी" देता है (पृ. 276)। यानी ऐसी तसवीरें यह भी कहती थीं कि बग़ावत का अंजाम बर्बादी है।
किताब के अपने प्रश्न
5अंग्रेज़ों ने विद्रोह को कुचलने के लिए क्या कदम उठाए?
उत्तर दीजिए (लगभग 100 से 150 शब्दों में)
जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
- मई और जून 1857 में पारित कई क़ानूनों से समूचे उत्तर भारत में मार्शल लॉ लागू किया गया; फ़ौजी अफ़सरों और आम अंग्रेज़ों को भी विद्रोह के संदेह में हिंदुस्तानियों पर मुक़दमा चलाने और सज़ा देने का अधिकार मिला, और विद्रोह की केवल एक सज़ा रखी गई: सज़ा-ए-मौत (पृ. 275)।
- एक तरफ़ कलकत्ते से और दूसरी तरफ़ पंजाब से दिल्ली की तरफ़ कूच हुआ; दिल्ली पर क़ब्ज़े की कोशिश जून 1857 में बड़े पैमाने पर शुरू हुई और सितंबर के आख़िर में जाकर पूरी हो पाई (पृ. 276)।
- गंगा के मैदान में अंग्रेज़ों को गाँव-दर-गाँव आगे बढ़ना पड़ा, क्योंकि वे ऐसे आंदोलन से जूझ रहे थे "जिसके पीछे बेहिसाब जन-समर्थन मौजूद है" (पृ. 276)।
- अवध में फॉरसिथ नाम के एक अंग्रेज़ अफ़सर का अनुमान था कि कम से कम तीन-चौथाई वयस्क पुरुष आबादी विद्रोह में शामिल थी, और यह इलाक़ा मार्च 1858 में जाकर ही दोबारा अंग्रेज़ों के नियंत्रण में आया (पृ. 276)।
- बड़े भूस्वामियों और किसानों की एकता तोड़ने के लिए अंग्रेज़ों ने बड़े ज़मींदारों को भरोसा दिया कि उनकी जागीरें लौटा दी जाएँगी; विद्रोह करने वालों की ज़मीनें छीनी गईं और वफ़ादारों को इनाम दिया गया (पृ. 276–277)।
जाँच पड़ाव✓ पड़ाव पूरा
1मई और जून 1857 के क़ानूनों के अनुसार विद्रोह की सज़ा क्या थी?
पृ. 275: विद्रोह की केवल एक ही सज़ा हो सकती थी, सज़ा-ए-मौत।
2दिल्ली की ओर अंग्रेज़ों का दोतरफ़ा कूच किन दो दिशाओं से हुआ?
पृ. 276: एक तरफ़ कलकत्ते से, दूसरी तरफ़ पंजाब से।
3लंबी लड़ाई के बाद अंग्रेज़ अवध को फिर से अपने नियंत्रण में कब ले पाए?
पृ. 276: मार्च 1858 में जाकर ही।
5विद्रोह की छवियाँ
इस पड़ाव का सवाल
विद्रोह के जो ब्योरे और तसवीरें हम तक पहुँचे, वे किसकी नज़र से बने, और लोगों को क्या महसूस कराना चाहते थे?
पिछली बात से कड़ी दमन के आख़िर में आपने देखा कि 1857 के बाद ब्रिटिश फ़ोटोग्राफ़रों ने "तबाही और ध्वंस की असंख्य तसवीरें" उतारीं (पृ. 276)। अब किताब लड़ाई से हटकर यह देखती है कि विद्रोह को काग़ज़ों और तसवीरों में कैसे दर्ज किया गया (पृ. 277)।
हम कैसे जानते हैं?पृ. 277
किताब यह हिस्सा एक सवाल से शुरू करती है (पृ. 277): हम इस विद्रोह, विद्रोहियों की गतिविधियों और उन पर हुए दमन के बारे में जानते कैसे हैं? पहले देखिए कि किसके काग़ज़ बचे, फिर तसवीरों की ओर चलिए।
अख़बारों ने आग में घी डाला (पृ. 277)
अंग्रेज़ों की तरफ़ के ब्योरे सिर्फ़ फ़ाइलों में बंद नहीं रहे। ब्रिटिश अख़बारों और पत्रिकाओं में सैनिक विद्रोहियों की हिंसा "बड़े लोमहर्षक शब्दों में" (रोंगटे खड़े कर देने वाले ढंग से) छापी जाती थी। ये कहानियाँ जनता की भावनाएँ भड़काती थीं और "प्रतिशोध और सबक सिखाने की माँगों को हवा देती थीं" (पृ. 277)। आगे के चित्रों में देखिए कि कलाकारों ने इसी "सदमे और पीड़ा" को कैसे आकार दिया (पृ. 279)।
अंग्रेज़ों और हिंदुस्तानियों ने विद्रोह की बहुत-सी तसवीरें बनाईं: पेंटिंग, पेंसिल रेखांकन, उत्कीर्ण चित्र, पोस्टर, कार्टून और बाज़ार-प्रिंट (पृ. 277)। हर तसवीर कुछ कहना चाहती है। इस पड़ाव में हम तसवीर पढ़ना सीखेंगे।
इस पड़ाव के चित्र आपकी किताब में हैं। हर चित्र के साथ उसका पृष्ठ लिखा है: किताब में चित्र खोलिए, फिर यहाँ हर पत्ता खोलकर वह चीज़ चित्र में ढूँढिए।
लंदन के अख़बार में 1857
लंदन का साप्ताहिक "द इलस्ट्रेटेड लंदन न्यूज़" 1857 में भारत की ख़बरें चित्रों के साथ छापता था। ये चित्र भारत से भेजे गए रेखाचित्रों और फ़ोटो पर बनते थे। नीचे के दोनों रेखाचित्र अंग्रेज़ों के ठिकानों से भेजे गए थे: एक दिल्ली के बाहर अंग्रेज़ी डेरे से, दूसरा इलाहाबाद के क़िले से।

26 सितंबर 1857 का अंक: फ़्लैगस्टाफ़ टावर से दिल्ली की ओर देखते अंग्रेज़ अफ़सर। तब दिल्ली विद्रोहियों के हाथ में थी, और अंग्रेज़ी फ़ौज शहर के बाहर रिज पर डेरा डाले थी।
The Illustrated London News, 26 September 1857. Wikimedia Commons, public domain.

5 सितंबर 1857 का अंक: इलाहाबाद के क़िले में कूच के लिए तैयार हेवलॉक की फ़ौज, जुलाई 1857। चित्र के नीचे छपा शीर्षक कहता है कि यह फ़ौज कानपुर को "फिर से जीतने" निकल रही है।
The Illustrated London News, 5 September 1857. Wikimedia Commons, public domain.
किसकी नज़र से? ये चित्र अंग्रेज़ी डेरों से बने और लंदन के पाठकों के लिए छपे। देखिए: चित्र के बीच में कौन है, और कौन किनारे पर है या दिखता ही नहीं? पृ. 278 पर चित्र 10.10, बार्कर की पेंटिंग, से मिलाइए।
5.1रक्षकों का अभिनंदनपृ. 277–279
5.2अंग्रेज़ औरतें तथा ब्रिटेन की प्रतिष्ठापृ. 279–280
5.3प्रतिशोध और सबक़पृ. 280–281
5.4दहशत का प्रदर्शनपृ. 282
प्रतिशोध और सबक़ सिखाने की चाह इस बात में भी दिखती है कि विद्रोहियों को कितने निर्मम ढंग से मौत के घाट उतारा गया: उन्हें तोपों के मुहाने पर बाँधकर उड़ा दिया गया या फाँसी पर लटका दिया गया। इन सज़ाओं की तसवीरें आम पत्र-पत्रिकाओं के ज़रिए दूर-दूर तक पहुँच रही थीं। ऐसी एक तसवीर के बारे में पुस्तक कहती है: "यह सामान्य दंड का दृश्य नहीं है, यह दहशत का प्रदर्शन है।" लोगों को अहसास कराया जा रहा था कि सज़ा किसी बंद जगह पर नहीं, लोगों के बीच भी दी जा सकती है।
5.5दया के लिए कोई जगह नहींपृ. 282–283
5.6राष्ट्रवादी दृश्य कल्पनापृ. 283
अब आप ख़ुद एक तसवीर पढ़िएपृ. 283
एक तसवीर, बिना पते के
किताब में: पृ. 284, चित्र 10.19
अभ्यास के सवालों के साथ एक तसवीर छपी है, जिसका शीर्षक है "विद्रोहियों के चेहरे"। कैप्शन में न चित्र बनाने वाले का नाम है, न तारीख़।
सोचिए: ऊपर के चार सवालों में से किनका जवाब इस कैप्शन से नहीं मिलता? और तब इस तसवीर को विद्रोहियों के बारे में सबूत की तरह इस्तेमाल करने से पहले आप क्या पता करना चाहेंगे?
जवाब देखिए
कैप्शन में न चित्र बनाने वाले का नाम है, न तारीख़ (पृ. 284), इसलिए किसने बनाया और कब बनाया, इन दोनों सवालों के जवाब नहीं मिलते; किसके लिए बना और क्या छूट गया, यह भी पता नहीं चलता। इसे सबूत मानने से पहले पता कीजिए कि चित्र किसने बनाया (अंग्रेज़ ने या हिंदुस्तानी ने), कब बनाया (विद्रोह के दौरान या बरसों बाद), और किसके कहने पर इन चेहरों को विद्रोहियों का बताया गया। यह इसलिए ज़रूरी है कि पुस्तक के मुताबिक़ तसवीरों से यह पता चलता है कि उन्हें बनाने वाले चित्रकार घटनाओं को कैसे देखते थे (पृ. 283)।
चर्चा कीजिए (पृ. 283)
इस भाग में दिए गए प्रत्येक चित्र के विभिन्न तत्वों की जाँच कीजिए और चर्चा कीजिए कि उनके ज़रिए आपको कलाकार की सोच को पहचानने में कैसे मदद मिलती है।
जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
- बार्कर, "द रिलीफ़ ऑफ़ लखनऊ" (चित्र 10.10): बीच में कैम्पबेल, ऑट्रम और हेवलॉक उजाले में हैं; आसपास खड़े लोगों के हाथ निगाह को बीच की ओर ले जाते हैं; पीछे टूटा-फूटा रेज़ीडेंसी और बीच में विजयी घोड़े। सोच: संकट ख़त्म हो गया, अंग्रेज़ जीत चुके हैं (पृ. 278–279)।
- पेटन, "इन मेमोरियम" (चित्र 10.11): औरतें और बच्चे घेरे में एक-दूसरे से लिपटे, लाचार और मासूम; हिंसा दिखती नहीं, सिर्फ़ उसका इशारा है; विद्रोही चित्र में हैं ही नहीं; पीछे ब्रिटिश टुकड़ियाँ रक्षक बनकर आ रही हैं। सोच: दर्शक की कल्पना और गुस्सा भड़के, और अंग्रेज़ रक्षक दिखें (पृ. 279–280)।
- मिस व्हीलर (चित्र 10.12): बीच में अकेली डटी औरत, उस पर चार कद्दावर हमलावर, फ़र्श पर बाइबल। सोच: औरत वीरता की मूर्ति, विद्रोही दानव, और लड़ाई ईसाइयत की रक्षा की (पृ. 280)।
- "जस्टिस", पन्च (चित्र 10.13): तलवार और ढाल लिए न्याय की स्त्री-छवि, चेहरे पर गुस्सा और बदले की चाह, पैरों तले सिपाही, डरी हुई भारतीय औरतें और बच्चे। सोच: बदला लेना ही न्याय है (पृ. 280–281)।
- शेर और बाघ, पन्च (चित्र 10.14): नीचे की पट्टी कहती है, "बंगाल टाइगर से ब्रिटिश शेर का प्रतिशोध"; बाघ एक औरत और बच्चे के ऊपर खड़ा है। इससे यह पढ़ा जा सकता है कि सिपाही को हिंसक जानवर और अंग्रेज़ी सत्ता को बदला लेने वाला शेर दिखाया गया (पृ. 281)।
- "द क्लिमेंसी ऑफ़ केनिंग", पन्च (चित्र 10.17): कैनिंग एक नेक बुज़ुर्ग की तरह उस सिपाही के सिर पर हाथ रखे हैं जिसकी तलवार और कटार से ख़ून टपक रहा है। सोच: नर्मी का मज़ाक; दया के लिए कोई जगह नहीं (पृ. 282–283)।
- रानी लक्ष्मीबाई की लोक छवियाँ: फ़ौजी पोशाक, घोड़े पर सवार, हाथ में तलवार; अन्याय और विदेशी शासन के दृढ़ प्रतिरोध का प्रतीक। ये चित्र राष्ट्रवादी सोच को गढ़ने में मदद करते थे (पृ. 283)।
- हर चित्र में चार बातें देखिए: बीच में कौन है, उजाले में कौन है, कौन दिखता ही नहीं, और किसके हाथ में हथियार है। इन्हीं से पता चलता है कि चित्रकार घटनाओं को कैसे देखते थे (पृ. 283)।
किताब के अपने प्रश्न
81857 के विद्रोह के बारे में चित्रों से क्या पता चलता है? इतिहासकार इन चित्रों का किस तरह विश्लेषण करते हैं?
निम्नलिखित पर एक लघु निबंध लिखिए (लगभग 250 से 300 शब्दों में)
जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
- विद्रोह की छवियाँ अंग्रेज़ों और हिंदुस्तानियों, दोनों ने बनाईं: पेंटिंग, पेंसिल रेखांकन, उत्कीर्ण चित्र, पोस्टर, कार्टून और बाज़ार-प्रिंट (पृ. 277)।
- टॉमस जोन्स बार्कर के चित्र ‘रिलीफ़ ऑफ़ लखनऊ’ (1859) में कैम्पबेल, ऑट्रम और हेवलॉक बीच में, रोशनी में हैं (पृ. 277–278); ऐसे चित्रों से अंग्रेज़ जनता को भरोसा मिला कि संकट ख़त्म हो चुका है और अंग्रेज़ जीत चुके हैं (पृ. 279)।
- जोज़ेफ़ नोएल पेटन की “इन मेमोरियम” में भीषण हिंसा नहीं दिखती, सिर्फ़ उसका इशारा है: अंग्रेज़ औरतें और बच्चे लाचार दिखते हैं और पृष्ठभूमि में ब्रिटिश टुकड़ियाँ रक्षक बनकर आगे बढ़ रही हैं (पृ. 279–280)।
- पन्च के चित्र "जस्टिस" में न्याय की स्त्री छवि सिपाहियों को पैरों तले कुचल रही है (पृ. 280–281); ब्रिटिश प्रेस की अनगिनत तसवीरों और कार्टूनों ने "निर्मम दमन और हिंसक प्रतिशोध की ज़रूरत पर ज़ोर" दिया, और जब कैनिंग ने नर्मी और दया की बात कही तो ब्रिटिश प्रेस में उसका मज़ाक उड़ाया गया (पृ. 281–282)।
- राष्ट्रवादी आंदोलन ने 1857 को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के रूप में याद किया, और लोक छवियों में रानी लक्ष्मीबाई को अक्सर फ़ौजी पोशाक में, घोड़े पर सवार और एक हाथ में तलवार लिए दिखाया जाता है: "अन्याय और विदेशी शासन के दृढ़ प्रतिरोध का प्रतीक" (पृ. 283)।
- चित्र को पढ़ने का तरीक़ा किताब ख़ुद दिखाती है: बीच में कौन है, रोशनी किस पर है, कौन लाचार दिखाया गया है (पृ. 278–279)। किताब कहती है कि ये तसवीरें बताती हैं कि बनाने वाले घटनाओं को कैसे देखते थे, और इन्होंने लोगों की भावनाएँ भी गढ़ीं (पृ. 283)।
जाँच पड़ाव✓ पड़ाव पूरा
1टॉमस जोन्स बार्कर की पेंटिंग “द रिलीफ़ ऑफ़ लखनऊ” किस क्षण का जश्न मनाती है?
पृ. 278: बार्कर की पेंटिंग कैम्पबेल के आगमन के क्षण का जश्न मनाती है।
2“इन मेमोरियम” में भीषण हिंसा कैसे दिखाई गई है?
पृ. 280: "भीषण हिंसा नहीं दिखती : उसकी तरफ़ सिर्फ़ एक इशारा है।"
3नरमी और दया की बात कहने वाले गवर्नर-जनरल कैनिंग के साथ ब्रिटिश प्रेस ने क्या किया?
पृ. 282: ब्रिटिश प्रेस में उनका मज़ाक उड़ाया गया; पन्च ने 24 अक्टूबर 1857 को “द क्लिमेंसी ऑफ़ केनिंग” कार्टून छापा।
सार और काल-रेखा
अब पूरे अध्याय को एक साथ देखिए। पहले घटनाओं को क्रम से जमाइए, फिर हर पड़ाव के सवाल का एक वाक्य वाला जवाब पलटकर देखिए। उसके बाद किताब का नक्शे वाला प्रश्न 10, निबंध वाला प्रश्न 9 और परियोजना कार्य।
इस अध्याय की तीन बड़ी बातें
- छिटपुट सैनिक विद्रोह जल्दी ही एक "चौतरफ़ा विद्रोह" बन गया, और आम लोग भी इसमें शामिल हो गए (पृ. 259)।
- अफ़वाहें इसलिए फैलीं क्योंकि उनमें लोगों के गहरे डर की गूँज थी: 1820 के दशक से चल रही अंग्रेज़ी नीतियों का डर (पृ. 265)।
- विद्रोह को जानने के लिए इतिहासकारों को ज़्यादातर अंग्रेज़ों के दस्तावेज़ों पर निर्भर रहना पड़ता है (पृ. 271), और तसवीरें बताती हैं कि उन्हें बनाने वाले घटनाओं को कैसे देखते थे (पृ. 283)। इसलिए हर स्रोत से पूछिए: यह किसने, किसके लिए कहा?
परियोजना कार्य (कोई एक)
- 1857 के विद्रोह के नेताओं में से किसी एक की जीवनी पढ़िए। देखिए कि उसे लिखने के लिए जीवनीकार ने किन स्रोतों का उपयोग किया है? क्या उनमें सरकारी रिपोर्टों, अख़बारी ख़बरों, क्षेत्रीय भाषाओं की कहानियों, चित्रों और किसी अन्य चीज़ का इस्तेमाल किया गया है? क्या सभी स्रोत एक ही बात कहते हैं या उनके बीच फ़र्क़ दिखाई देते हैं? अपने निष्कर्षों पर एक रिपोर्ट तैयार कीजिए।
- 1857 पर बनी कोई फ़िल्म देखिए और लिखिए कि उसमें विद्रोह को किस तरह दर्शाया गया है। उसमें अंग्रेज़ों, विद्रोहियों और अंग्रेज़ों के भारतीय वफ़ादारों को किस तरह दिखाया गया है? फ़िल्म किसानों, नगरवासियों, आदिवासियों, ज़मींदारों और ताल्लुक़दारों के बारे में क्या कहती है? फ़िल्म किस तरह की प्रतिक्रिया को जन्म देना चाहती है?
इन परियोजनाओं का कोई एक तय जवाब नहीं है। जो जीवनी या फ़िल्म आप चुनें, उसके स्रोत और नज़रिया ख़ुद जाँचिए।
आख़िरी जाँच✓ पड़ाव पूरा
1मेरठ में सैनिक विद्रोह किस तारीख़ को हुआ?
पृ. 258 और पृ. 284 की काल-रेखा: 10 मई 1857।
2अवध को औपचारिक रूप से ब्रिटिश साम्राज्य का अंग किस साल घोषित किया गया?
पृ. 266: 1851 में डलहौज़ी की टिप्पणी के पाँच साल बाद, 1856 में।
3पुस्तक के अनुसार 1857 में ब्रिटिश सत्ता के तीन मुख्य केंद्र कौन-से थे?
पृ. 285, प्रश्न 10।
4शाह मल युद्ध में कब मारे गए?
पृ. 263: "जुलाई 1857 में शाह मल को युद्ध में मार दिया गया"।
पाँचों पड़ाव और सार, सब पूरे! अब किताब के पृ. 284–285 के प्रश्न एक बार बिना देखे ख़ुद लिखकर देखिए।
आगे पढ़िए
पुस्तक की सूची (पृ. 285)
- 1987 · गौतम भद्रा, फ़ोर रेबल्स ऑफ़ एटीन फ़िफ़्टी सेवन, सबॉल्टर्न स्टडीज़, खंड 4, ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, दिल्ली
- 2006 · विलियम डेलरिम्पल, दि लास्ट मुग़ल : दि फ़ॉल ऑफ़ ए डायनेस्टी, दिल्ली 1857, पेंग्विन, वाइकिंग, नयी दिल्ली
- 1984 · रूद्रांग्शू मुखर्जी, अवध इन रिवोल्ट 1857–58, ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, दिल्ली
- 2006 · तापती रॉय, राज ऑफ़ दि रानी, पेंग्विन, नयी दिल्ली
- 1980 · ऐरिक स्टॉक्स, पैज़ेन्ट्स एंड दि राज, ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, दिल्ली
एक ऐतिहासिक एटलस (अंग्रेज़ी में)
जोसेफ़ श्वार्ट्ज़बर्ग के दक्षिण एशिया के ऐतिहासिक एटलस में 1857–1859 के विद्रोह का नक्शा। इसे वहीं ऑनलाइन देखिए; नक्शे पर अधिकार उसके लेखक का है। (Digital South Asia Library (DSAL), University of Chicago)







