अध्याय 3जाति, धर्म और लैंगिक मसले

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सेट 1 — परिभाषाएँ (कार्ड 1–12)

#प्रश्नउत्तर
1श्रम का लैंगिक विभाजन?वह तरीक़ा जिसमें घर के अंदर के सारे काम परिवार की औरतें करती हैं
★2लैंगिक असमानता का आधार क्या है?जैविक बनावट नहीं — बल्कि रूढ़ छवियाँ और तयशुदा सामाजिक भूमिकाएँ
3नारीवादी?“औरत और मर्द के समान अधिकारों और अवसरों में विश्वास करने वाली महिला या पुरुष”
4पितृ-प्रधान?पुरुषों को ज़्यादा महत्व और शक्ति देने वाली व्यवस्था
5लिंग अनुपात?प्रति हज़ार लड़कों पर लड़कियों की संख्या
★6सांप्रदायिकता?“राजनीति में धर्म को इस तरह जोड़ना” कि एक धर्म श्रेष्ठ माना जाए और राज्य उसके पक्ष में सत्ता का इस्तेमाल करे
7पारिवारिक कानून?विवाह, तलाक, गोद लेना और उत्तराधिकार से संबंधित कानून
8वर्ण-व्यवस्था?जाति समूहों का पदानुक्रम — एक जाति हर हाल में सबसे ऊपर
9जातिवाद?यह मान्यता कि जाति ही समुदाय के गठन का एकमात्र आधार है
10शहरीकरण?“ग्रामीण इलाकों से निकलकर लोगों का शहरों में बसना”
11वोट बैंक?वह जाति जिसके ज़्यादातर लोग एक ही पार्टी को वोट देते हैं (सभी नहीं)
12धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति?जो धार्मिक आस्था के आधार पर भेदभाव न करे

सेट 2 — लैंगिक मसले (कार्ड 13–26)

#प्रश्नउत्तर
13क्या सामाजिक विविधता लोकतंत्र के लिए खतरा है?“सामाजिक विविधता लोकतंत्र के लिए कोई खतरा नहीं होती”
★14“घर में रसोइया औरत, होटल में पुरुष” — क्यों?क्योंकि बाहर उसी काम के पैसे मिलते हैं — “अधिकांश दर्जी या होटल के रसोइए पुरुष होते हैं”
15महिलाओं के काम को मूल्य क्यों नहीं मिलता?“इसके लिए उन्हें पैसे नहीं मिलते इसलिए औरतों का काम दिखाई नहीं देता”
16समय का उपयोग — कुल काम?औरत 7:30 से ज़्यादा · मर्द 6:30
★17घर के कामों में अंतर?महिला 5:00 · पुरुष 0:30
18साक्षरता दर?महिलाएँ 54% · पुरुष 76%
19लिंग अनुपात कितना?919; कहीं 850, कहीं-कहीं 800 से भी नीचे
20समान मज़दूरी अधिनियम क्या कहता है?“समान काम के लिए समान मज़दूरी दी जाएगी” — पर व्यवहार में नहीं होता
21महिला आंदोलनों ने क्या माँगा?वोट का अधिकार · राजनीतिक-वैधानिक दर्जा · शिक्षा और रोज़गार · पारिवारिक जीवन में बराबरी
22कहाँ महिलाओं की भागीदारी सबसे ऊँची?स्वीडन, नॉर्वे और फिनलैंड — स्कैंडिनेवियाई देश
★23लोकसभा में महिलाएँ?14.36% — “पहली बार 2019 में ही”
24विधान सभाओं में महिलाओं की भागीदारी?5 फ़ीसदी से भी कम
25राष्ट्रीय संसदों में महिलाओं का प्रतिशत (अक्टूबर 2018) — भारत / विश्व औसत / नॉर्डिक देश?11.8 / 24 / 42.3 (पृ. 34 का ग्राफ़ — 2019 के चुनाव से पहले के आँकड़े)
★26स्थानीय निकायों में महिलाओं की भागीदारी?एक तिहाई पद आरक्षित; 10 लाख से ज़्यादा निर्वाचित महिलाएँ

सेट 3 — धर्म और सांप्रदायिकता (कार्ड 27–42)

#प्रश्नउत्तर
★27नारी शक्ति वंदन अधिनियम?2023 — लोकसभा, विधानसभा और दिल्ली विधानसभा में 33% आरक्षण
28लैंगिक भाग का निष्कर्ष?“जब सामाजिक विभाजन एक राजनीतिक मुद्दा बन जाता है तो वंचित समूहों को लाभ होता है”
★29गांधी जी और धर्म?“धर्म को कभी भी राजनीति से अलग नहीं किया जा सकता” — पर “धर्म से उनका मतलब… नैतिक मूल्यों से था”
30मानवाधिकार समूहों की माँग?सांप्रदायिक दंगे रोकना और धार्मिक अल्पसंख्यकों की रक्षा
31महिला-आंदोलन की माँग?पारिवारिक कानूनों को समतामूलक बनाना
★32धर्म-राजनीति की कसौटी?“अगर शासन सभी धर्मों के साथ समान बरताव करता है तो… कोई बुराई नहीं है”
33धर्म और राजनीति के मेल में समस्या कब शुरू होती है?“जब धर्म को राष्ट्र का आधार मान लिया जाता है”
34सांप्रदायिक सोच की मान्यता?“धर्म ही सामाजिक समुदाय का निर्माण करता है”
★★35सांप्रदायिक सोच की मान्यता का खंडन?“हर व्यक्ति कई तरह की भूमिका निभाता है। उसकी हैसियत और पहचान अलग-अलग होती है।”
36चार रूपों का सूत्र?“रोज़ · प्रभुत्व · गोलबंदी · हिंसा”
★37सांप्रदायिकता का सबसे आम रूप?दैनंदिन जीवन — “ये हमारे अंदर ही बैठी होती हैं”
38धर्मनिरपेक्षता का पहला प्रावधान?“किसी भी धर्म को राजकीय धर्म के रूप में अंगीकार नहीं किया”
39किन देशों में राजकीय धर्म है, और कौन-सा?श्रीलंका (बौद्ध) · पाकिस्तान (इस्लाम) · इंग्लैंड (ईसाई)
★40धर्मनिरपेक्षता का चौथा प्रावधान?शासन को धार्मिक मामलों में दखल का अधिकार — “यह छुआछूत की इजाज़त नहीं देता”
★★41धर्मनिरपेक्षता क्या है?“कुछ पार्टियों की विचारधारा भर नहीं — यह विचार हमारे संविधान की बुनियाद है”
42धार्मिक आबादी (2011)?हिंदू 79.8 · मुसलमान 14.2 · ईसाई 2.3 · सिख 1.7

सेट 4 — जाति (कार्ड 43–56)

#प्रश्नउत्तर
★43सच्चर समिति का आकलन?मुस्लिम आबादी का अनुपात “अगले पचास सालों में भी… 3–4 प्रतिशत तक ही” बढ़ेगा
★44जाति विभाजन कहाँ मिलता है?“सिर्फ़ भारतीय समाज में ही”
45जाति व्यवस्था दूसरे समाजों से अलग कैसे?वहाँ भी पेशा पीढ़ी-दर-पीढ़ी जाता है, “लेकिन जाति व्यवस्था इसका एक अतिवादी और स्थायी रूप है”
46जाति-व्यवस्था के ख़िलाफ़ काम करने वाले चार समाज सुधारक?ज्योतिबा फुले · महात्मा गांधी · डॉ. आंबेडकर · पेरियार रामास्वामी नायकर
47जाति-व्यवस्था में बदलाव के पाँच कारण?आर्थिक विकास · शहरीकरण · साक्षरता-शिक्षा · पेशे की आज़ादी · ज़मींदारी का कमज़ोर पड़ना
! 48जाति-व्यवस्था में क्या नहीं बदला?अपनी जाति में शादी · छुआछूत पूरी तरह समाप्त नहीं · शिक्षा और आर्थिक हैसियत में पुराना असर
★49जाति और आर्थिक हैसियत?“जाति और आर्थिक हैसियत में काफ़ी निकट का संबंध है”
50अ.जा. / अ.ज.जा. / अन्य पिछड़ी?16.6% · 8.6% · करीब 41%
51जातिवाद का खंडन?“जाति हमारे जीवन का एक पहलू ज़रूर है लेकिन यही एकमात्र या सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण पहलू नहीं है”
★52राजनीति का सकारात्मक असर?सार्वभौम वयस्क मताधिकार से “उन जातियों में नयी चेतना पैदा हुई जिन्हें… छोटा और नीच माना जाता था”
★★53“चुनाव जाति का खेल” — सबसे बड़ा खंडन?“सत्तारूढ़ दल, वर्तमान सांसदों और विधायकों को अक्सर हार का सामना करना पड़ता है”
54किसी क्षेत्र में एक जाति का बहुमत?नहीं — इसलिए एक से ज़्यादा जातियों का भरोसा चाहिए
55“जाति भी राजनीतिग्रस्त” का अर्थ?हर जाति ख़ुद को बड़ा बनाना चाहती है; दूसरी जातियों से मोल-तोल; ‘अगड़ा-पिछड़ा’ जैसी नई गोलबंदी
★56जाति-राजनीति का लाभ?“दलित और पिछड़ी जातियों के लिए सत्ता तक पहुँचने… की स्थिति भी पैदा की”

सेट 5 — निष्कर्ष (कार्ड 57–60)

#प्रश्नउत्तर
! 57जाति-राजनीति की हानि?“गरीबी, विकास, भ्रष्टाचार जैसे ज़्यादा बड़े मुद्दों से ध्यान भटकता है”; और तनाव, टकराव और हिंसा
58तीनों विभाजनों का फ़ैसला?लिंग = ज़रूरी · धर्म = ख़तरा · जाति = दोनों
★59धर्मनिरपेक्ष संविधान काफ़ी है?नहीं — “अकेले इसी के बूते सांप्रदायिकता का मुकाबला नहीं किया जा सकता”
★★60अध्याय का सार एक वाक्य में?“पहचान एक नहीं होती। और जो किसी को सिर्फ़ एक पहचान में क़ैद कर दे — वही सांप्रदायिकता है, वही जातिवाद है।”

अंतिम पाँच मिनट — यही दोहराइए

तीन विभाजन — लिंग (ज़रूरी) · धर्म (ख़तरा) · जाति (दोनों) छह आँकड़े — 54/76 · 919 · 14.36% · 11.8 · 16.6/8.6 · 79.8/14.2 तीन सूत्र — सांप्रदायिकता के चार रूप “रोज़ · प्रभुत्व · गोलबंदी · हिंसा” · धर्मनिरपेक्षता के चार प्रावधान · चार सुधारक “फुले · गांधी · आंबेडकर · पेरियार” दो परिभाषाएँ शब्दश: — “लैंगिक असमानता का आधार… रूढ़ छवियाँ और तयशुदा सामाजिक भूमिकाएँ हैं” और “राजनीति में धर्म को इस तरह जोड़ना ही सांप्रदायिकता है” ★★और एक वाक्य — “हर व्यक्ति कई तरह की भूमिका निभाता है। उसकी हैसियत और पहचान अलग-अलग होती है।”