अध्याय 3जाति, धर्म और लैंगिक मसले

प्रश्न बैंक27 मिनट

RBSE परीक्षा पैटर्न के अनुसार · कुल 60 प्रश्न


खण्ड क — वस्तुनिष्ठ प्रश्न (1 अंक) — 20 प्रश्न

1लैंगिक विभाजन का आधार है

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सही उत्तर: (ब) समाज द्वारा दी गई असमान भूमिकाएँ

2महिलाओं में साक्षरता की दर है

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सही उत्तर: (ब) 54 फ़ीसदी

3पुरुषों में साक्षरता की दर है

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सही उत्तर: (स) 76 फ़ीसदी

4भारत का लिंग अनुपात है

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सही उत्तर: (स) 919

5समय के उपयोग सर्वेक्षण के अनुसार एक औरत रोज़ाना कितना काम करती है?

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सही उत्तर: (स) साढ़े सात घंटे से ज़्यादा

6लोकसभा में महिला सांसदों की संख्या पहली बार 14.36 फ़ीसदी कब पहुँची?

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सही उत्तर: (द) 2019

7राज्यों की विधान सभाओं में महिलाओं का प्रतिनिधित्व है

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सही उत्तर: (अ) 5 फ़ीसदी से भी कम

8राष्ट्रीय संसदों में महिलाओं का विश्व औसत है

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सही उत्तर: (स) 24

9भारत में स्थानीय निकायों में निर्वाचित महिलाओं की संख्या है

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सही उत्तर: (स) 10 लाख से ज़्यादा

10नारी शक्ति वंदन अधिनियम किस वर्ष पारित हुआ?

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सही उत्तर: (स) 2023

11इस अधिनियम से महिलाओं को कितना आरक्षण मिलेगा?

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सही उत्तर: (ब) 33 प्रतिशत

12“औरत और मर्द के समान अधिकारों और अवसरों में विश्वास करने वाली महिला या पुरुष” कहलाता है

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सही उत्तर: (ब) नारीवादी

13भारत में हिंदुओं की आबादी है (2011)

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सही उत्तर: (ब) 79.8

14भारत में मुसलमानों की आबादी है (2011)

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सही उत्तर: (स) 14.2

15अनुसूचित जातियों का हिस्सा है (2011)

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सही उत्तर: (स) 16.6 फ़ीसदी

16अनुसूचित जनजातियों का हिस्सा है (2011)

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सही उत्तर: (अ) 8.6 फ़ीसदी

17राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के अनुमान से अन्य पिछड़ी जातियों की आबादी है

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सही उत्तर: (स) करीब 41 फ़ीसदी

18निम्न में से कौन जातिगत भेदभाव के विरुद्ध काम करने वाले समाज सुधारक नहीं थे?

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सही उत्तर: (द) इनमें से कोई नहीं (तीनों ही थे)

19“ग्रामीण इलाकों से निकलकर लोगों का शहरों में बसना” कहलाता है

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सही उत्तर: (ब) शहरीकरण

20जाति पर आधारित सामाजिक विभाजन मुख्यत: कहाँ देखने को मिलता है?

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सही उत्तर: (ब) सिर्फ़ भारत में

खण्ड ख — रिक्त स्थान (1 अंक) — 10 प्रश्न

1______ लोकतंत्र के लिए कोई ख़तरा नहीं होती।

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सामाजिक विविधता लोकतंत्र के लिए कोई ख़तरा नहीं होती।

2लैंगिक असमानता का आधार जैविक बनावट नहीं बल्कि ______ हैं।

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लैंगिक असमानता का आधार जैविक बनावट नहीं बल्कि रूढ़ छवियाँ और तयशुदा सामाजिक भूमिकाएँ हैं।

3______ व्यवस्था महिलाओं की तुलना में पुरुषों को ज़्यादा महत्व और शक्ति देती है।

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पितृ-प्रधान व्यवस्था महिलाओं की तुलना में पुरुषों को ज़्यादा महत्व और शक्ति देती है।

4______ का अर्थ है प्रति हज़ार लड़कों पर लड़कियों की संख्या।

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लिंग अनुपात का अर्थ है प्रति हज़ार लड़कों पर लड़कियों की संख्या।

5राजनीति में धर्म को इस तरह जोड़ना ही ______ है।

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राजनीति में धर्म को इस तरह जोड़ना ही सांप्रदायिकता है।

6भारतीय राज्य ने किसी भी धर्म को ______ के रूप में अंगीकार नहीं किया है।

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भारतीय राज्य ने किसी भी धर्म को राजकीय धर्म के रूप में अंगीकार नहीं किया है।

7______ विवाह, तलाक, गोद लेना और उत्तराधिकार जैसे मसलों से संबंधित होते हैं।

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पारिवारिक कानून विवाह, तलाक, गोद लेना और उत्तराधिकार जैसे मसलों से संबंधित होते हैं।

8______ जाति समूहों का वह पदानुक्रम है जिसमें एक जाति हर हाल में सबसे ऊपर रहती है।

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वर्ण-व्यवस्था जाति समूहों का वह पदानुक्रम है जिसमें एक जाति हर हाल में सबसे ऊपर रहती है।

9______ इस मान्यता पर आधारित है कि जाति ही सामाजिक समुदाय के गठन का एकमात्र आधार है।

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जातिवाद इस मान्यता पर आधारित है कि जाति ही सामाजिक समुदाय के गठन का एकमात्र आधार है।

10सांप्रदायिकता की सबसे आम अभिव्यक्ति ______ में ही दिखती है।

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सांप्रदायिकता की सबसे आम अभिव्यक्ति दैनंदिन जीवन में ही दिखती है।

खण्ड ग — सही/ग़लत (1 अंक) — 5 प्रश्न

1सामाजिक विविधता लोकतंत्र के लिए हमेशा ख़तरा होती है।

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ग़लत

2गांधी जी के अनुसार धर्म को राजनीति से अलग नहीं किया जा सकता, पर उनका अर्थ नैतिक मूल्यों से था।

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सही

3भारत का संविधान हिंदू धर्म को राजकीय धर्म का दर्जा देता है।

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ग़लत

4जाति पर आधारित विभाजन दुनिया के सभी देशों में पाया जाता है।

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ग़लत

5भारत में चुनाव के नतीजे सिर्फ़ जाति के आधार पर तय होते हैं।

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ग़लत

खण्ड घ — अति लघूत्तरीय प्रश्न (2 अंक) — 10 प्रश्न

1श्रम का लैंगिक विभाजन क्या है?

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“काम के बँटवारे का वह तरीका जिसमें घर के अंदर के सारे काम परिवार की औरतें करती हैं या अपनी देखरेख में घरेलू नौकरों/नौकरानियों से कराती हैं।” इसी के चलते “औरत घर की चारदीवारी में सिमट के रह गई है और बाहर का सार्वजनिक जीवन पुरुषों के कब्ज़े में आ गया है।”

2नारीवादी किसे कहते हैं?

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“औरत और मर्द के समान अधिकारों और अवसरों में विश्वास करने वाली महिला या पुरुष।” ★ध्यान दीजिए — नारीवादी सिर्फ़ महिलाएँ नहीं होतीं, पुरुष भी हो सकते हैं।

3पितृ-प्रधान व्यवस्था से क्या आशय है?

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“इसका शाब्दिक अर्थ तो पिता का शासन है पर इस पद का प्रयोग महिलाओं की तुलना में पुरुषों को ज़्यादा महत्व, ज़्यादा शक्ति देने वाली व्यवस्था के लिए भी किया जाता है।”

4लिंग अनुपात क्या है? भारत में यह कितना है?

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प्रति हज़ार लड़कों पर लड़कियों की संख्या। भारत में यह गिरकर 919 रह गया है; और नक्शा बताता है कि कई जगहों पर यह 850 और कहीं-कहीं 800 से भी नीचे चला गया है।

5सांप्रदायिकता की परिभाषा दीजिए।

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समस्या तब शुरू होती है “जब धर्म को राष्ट्र का आधार मान लिया जाता है”; और जब “एक धर्म के विचारों को दूसरे से श्रेष्ठ माना जाने लगता है” तथा “राज्य अपनी सत्ता का इस्तेमाल किसी एक धर्म के पक्ष में करने लगता है।” ★“राजनीति में धर्म को इस तरह जोड़ना ही सांप्रदायिकता है।”

6पारिवारिक कानून क्या हैं?

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“विवाह, तलाक, गोद लेना और उत्तराधिकार जैसे परिवार से जुड़े मसलों से संबंधित कानून। हमारे देश में सभी धर्मों के लिए अलग-अलग पारिवारिक कानून हैं।” महिला-आंदोलन का कहना है कि ये महिलाओं से भेदभाव करते हैं और इन्हें समतामूलक बनाया जाना चाहिए।

7वर्ण-व्यवस्था क्या है?

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“जाति समूहों का पदानुक्रम जिसमें एक जाति के लोग हर हाल में सामाजिक पायदान में सबसे ऊपर रहेंगे तो किसी अन्य जाति समूह के लोग क्रमागत के रूप से उनके नीचे।” यह “अन्य जाति-समूहों से भेदभाव और उन्हें अपने से अलग मानने की धारणा पर आधारित” है।

8जातिवाद किसे कहते हैं?

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“सांप्रदायिकता की तरह जातिवाद भी इस मान्यता पर आधारित है कि जाति ही सामाजिक समुदाय के गठन का एकमात्र आधार है।” ★पर किताब कहती है — “जाति हमारे जीवन का एक पहलू ज़रूर है लेकिन यही एकमात्र या सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण पहलू नहीं है।”

9‘वोट बैंक’ से क्या आशय है?

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“जब लोग किसी जाति विशेष को किसी एक पार्टी का ‘वोट बैंक’ कहते हैं तो इसका मतलब यह होता है कि उस जाति के ज़्यादातर लोग उसी पार्टी को वोट देते हैं।” ★ध्यान दीजिए — सभी नहीं, ज़्यादातर।

10शहरीकरण क्या है और उसका जाति व्यवस्था पर क्या असर पड़ा?

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शहरीकरण = “ग्रामीण इलाकों से निकलकर लोगों का शहरों में बसना।” इसका असर यह हुआ कि “शहरी इलाकों में तो अब ज़्यादातर इस बात का कोई हिसाब नहीं रखा जाता कि ट्रेन या बस में आपके साथ कौन बैठा है या रेस्तराँ में आपकी मेज़ पर बैठकर खाना खा रहे आदमी की जाति क्या है।”

खण्ड ङ — लघूत्तरीय प्रश्न (3 अंक) — 8 प्रश्न

1“निजी और सार्वजनिक का विभाजन” क्या है? इसका महिलाओं पर क्या असर पड़ा?

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बचपन से यह मान्यता बैठा दी जाती है कि “औरतों की मुख्य ज़िम्मेवारी गृहस्थी चलाने और बच्चों का पालन-पोषण करने की है”, और यह श्रम के लैंगिक विभाजन से झलकता है — औरतें घर के अंदर का काम करती हैं, मर्द बाहर का।

★पर यह स्वाभाविक नहीं है — “ऐसा नहीं है कि मर्द ये सारे काम नहीं कर सकते”; और सच यह है कि “जब… इन्हीं सारे कामों के लिए पैसे मिलते हैं तो मर्द ख़ुशी-ख़ुशी यही काम घर के बाहर करते हैं। अधिकांश दर्जी या होटल के रसोइए पुरुष होते हैं।”

असर “औरत तो घर की चारदीवारी में सिमट के रह गई है और बाहर का सार्वजनिक जीवन पुरुषों के कब्ज़े में आ गया है। मनुष्य जाति की आबादी में औरतों का हिस्सा आधा है पर… राजनीति में उनकी भूमिका नगण्य ही है।”

2‘समय का उपयोग’ सर्वेक्षण से क्या पता चलता है?

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देश के छह राज्यों में हुए इस सर्वेक्षण से पता चलता है कि “एक औरत रोज़ाना साढ़े सात घंटे से ज़्यादा काम करती है जबकि एक मर्द औसतन रोज़ साढ़े छह घंटे ही काम करता है।”

सबसे बड़ा अंतर घर के कामों में है — पुरुष 0:30 घंटे और महिला 5:00 घंटे; जबकि आमदनी वाले कामों में पुरुष 6:00 और महिला 2:40।

निष्कर्ष ★ “फिर भी पुरुषों द्वारा किया गया काम ही ज़्यादा दीख पड़ता है क्योंकि उससे आमदनी होती है… इसके लिए उन्हें पैसे नहीं मिलते इसलिए औरतों का काम दिखाई नहीं देता।”

3नारीवादी आंदोलनों ने क्या माँगा और उससे क्या बदला?

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माँगें पहले “सिर्फ़ पुरुषों को ही सार्वजनिक मामलों में भागीदारी, वोट देने या… चुनाव लड़ने की अनुमति थी”, इसलिए आंदोलनों ने माँगा — वोट का अधिकार, “राजनीतिक और वैधानिक दर्जे को ऊँचा उठाने” तथा “शिक्षा तथा रोज़गार के अवसर बढ़ाने” की बात; और मूलगामी आंदोलनों ने “औरतों के व्यक्तिगत और पारिवारिक जीवन में भी बराबरी की माँग” उठाई।

बदलाव “आज हम वैज्ञानिक, डॉक्टर, इंजीनियर, प्रबंधक, कॉलेज और विश्वविद्यालयी शिक्षक जैसे पेशों में बहुत-सी औरतों को पाते हैं जबकि पहले इन कामों को महिलाओं के लायक नहीं माना जाता था।”

★और स्वीडन, नॉर्वे तथा फिनलैंड जैसे स्कैंडिनेवियाई देशों में तो “सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की भागीदारी का स्तर काफ़ी ऊँचा है।”

4धर्म और राजनीति के वे कौन-से रिश्ते हैं जो किताब के अनुसार ग़लत नहीं हैं?

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किताब तीन बातें गिनाती है जो “बहुत गलत या खतरनाक भी नहीं लगतीं” —

1

★गांधी जी कहा करते थे कि “धर्म को कभी भी राजनीति से अलग नहीं किया जा सकता” — पर ! “धर्म से उनका मतलब हिंदू या इस्लाम जैसे धर्म से न होकर नैतिक मूल्यों से था जो सभी धर्मों से जुड़े हैं।”

2

मानवाधिकार समूहों की माँग कि “सरकार को सांप्रदायिक दंगों को रोकने और धार्मिक अल्पसंख्यकों की रक्षा के लिए विशेष कदम उठाने चाहिए।”

3

महिला-आंदोलन का कहना कि “सभी धर्मों में वर्णित पारिवारिक कानून महिलाओं से भेदभाव करते हैं” और उन्हें समतामूलक बनाया जाए।

कसौटी ★ “अगर शासन सभी धर्मों के साथ समान बरताव करता है तो उसके ऐसे कामों में कोई बुराई नहीं है।”

5सांप्रदायिक सोच किन मान्यताओं पर टिकी है, और वह ग़लत क्यों है?

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मान्यताएँ “धर्म ही सामाजिक समुदाय का निर्माण करता है”; एक धर्म के लोग “एक ही समुदाय” के हैं और उनके “मौलिक हित एक जैसे” हैं; “समुदाय के लोगों के आपसी मतभेद… कोई अहमियत नहीं रखते”; दूसरे धर्म के लोग “दूसरे सामाजिक समुदाय का हिस्सा नहीं हो सकते”; और आगे बढ़कर — वे “एक ही राष्ट्र में समान नागरिक के तौर पर नहीं रह सकते।”

खंडन ★★ “यह मान्यता बुनियादी रूप से गलत है। एक धर्म के लोगों के हित और उनकी आकांक्षाएँ हर मामले में एक जैसी हों — यह संभव नहीं है। हर व्यक्ति कई तरह की भूमिका निभाता है। उसकी हैसियत और पहचान अलग-अलग होती है। हर समुदाय में तरह-तरह के विचार के लोग होते हैं।… इसलिए एक धर्म से जुड़े सभी लोगों को… एक करके देखना उस समुदाय की विभिन्न आवाज़ों को दबाना है।”

6जाति व्यवस्था में क्या बदलाव आए हैं?

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कारण — “आर्थिक विकास, शहरीकरण, साक्षरता और शिक्षा के विकास, पेशा चुनने की आज़ादी और गाँवों में ज़मींदारी व्यवस्था के कमजोर पड़ने से जाति व्यवस्था के पुराने स्वरूप और वर्ण व्यवस्था पर टिकी मानसिकता में बदलाव आ रहा है।”

साथ ही — ज्योतिबा फुले, महात्मा गांधी, डॉ. आंबेडकर और पेरियार रामास्वामी नायकर जैसे समाज सुधारकों ने “जातिगत भेदभाव से मुक्त समाज व्यवस्था बनाने की बात की और उसके लिए काम किया।”

उदाहरण ★ “शहरी इलाकों में तो अब ज़्यादातर इस बात का कोई हिसाब नहीं रखा जाता कि ट्रेन या बस में आपके साथ कौन बैठा है या रेस्तराँ में आपकी मेज़ पर बैठकर खाना खा रहे आदमी की जाति क्या है।” और “संविधान में किसी भी तरह के जातिगत भेदभाव का निषेध किया गया है।”

7राजनीति में जाति की भूमिका किन रूपों में दिखती है?

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1

“जब पार्टियाँ चुनाव के लिए उम्मीदवारों के नाम तय करती हैं तो चुनाव क्षेत्र के मतदाताओं की जातियों का हिसाब ध्यान में रखती हैं”; और सरकार बनाते समय ध्यान रखा जाता है कि “विभिन्न जातियों और कबीलों के लोगों को उचित जगह दी जाए।”

2

“राजनीतिक पार्टियाँ और उम्मीदवार समर्थन हासिल करने के लिए जातिगत भावनाओं को उकसाते हैं। कुछ दलों को कुछ जातियों के मददगार और प्रतिनिधि के रूप में देखा जाता है।”

3

★“सार्वभौम वयस्क मताधिकार और एक व्यक्ति-एक वोट की व्यवस्था ने राजनीतिक दलों को विवश किया कि वे… सक्रिय हों। इससे उन जातियों के लोगों में नयी चेतना पैदा हुई जिन्हें अभी तक छोटा और नीच माना जाता था।”

8“जाति भी राजनीतिग्रस्त हो जाती है” — समझाइए।

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किताब कहती है कि “राजनीति भी जातियों को राजनीति के अखाड़े में लाकर जाति व्यवस्था और जातिगत पहचान को प्रभावित करती है”, यानी ★“सिर्फ़ राजनीति ही जातिग्रस्त नहीं होती जाति भी राजनीतिग्रस्त हो जाती है।” यह तीन रूपों में दिखता है —

1

“हर जाति खुद को बड़ा बनाना चाहती है। सो, पहले वह अपने समूह की जिन उप जातियों को छोटा या नीचा बताकर अपने से बाहर रखना चाहती थी अब उन्हें अपने साथ लाने की कोशिश करती है।”

2

“चूँकि एक जाति अपने दम पर सत्ता पर कब्ज़ा नहीं कर सकती इसलिए वह… दूसरी जातियों या समुदायों को साथ लेने की कोशिश करती है और इस तरह उनके बीच संवाद और मोल-तोल होता है।”

3

“राजनीति में नए किस्म की जातिगत गोलबंदी भी हुई हैं, जैसे ‘अगड़ा’ और ‘पिछड़ा’।”

खण्ड च — दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (5 अंक) — 7 प्रश्न

1★★जीवन के उन विभिन्न पहलुओं का ज़िक्र करें जिनमें भारत में स्त्रियों के साथ भेदभाव होता है।

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किताब कहती है — “हमारे देश में आज़ादी के बाद से महिलाओं की स्थिति में कुछ सुधार हुआ है पर वे अभी भी पुरुषों से काफ़ी पीछे हैं। हमारा समाज अभी भी पितृ-प्रधान है।”

1

★साक्षरता और शिक्षा — “महिलाओं में साक्षरता की दर अब भी मात्र 54 फ़ीसदी है जबकि पुरुषों में 76 फ़ीसदी।” और उच्च शिक्षा में तो “कई जगह लड़कियों ने बाजी मार ली है… लेकिन आगे की पढ़ाई के दरवाज़े उनके लिए बंद हो जाते हैं क्योंकि माँ बाप अपने संसाधनों को… लड़कों पर ज़्यादा खर्च करना पसंद करते हैं।”

2

काम का श्रेय — “भारत में औसतन एक स्त्री एक पुरुष की तुलना में रोजाना एक घंटा ज़्यादा काम करती है पर उसको ज़्यादातर काम के लिए पैसे नहीं मिलते इसलिए अक्सर उसके काम को मूल्यवान नहीं माना जाता।”

3

मज़दूरी — समान मज़दूरी अधिनियम के बावजूद “खेल-कूद की दुनिया से लेकर सिनेमा के संसार तक और कल-कारखानों से लेकर खेत-खलिहान तक महिलाओं को पुरुषों की तुलना में कम मज़दूरी मिलती है, भले ही दोनों ने समान काम किया हो।”

4

! लिंग अनुपात — “भारत के अनेक हिस्सों में माँ-बाप को सिर्फ़ लड़के की चाह होती है… इससे देश का लिंग अनुपात गिरकर 919 रह गया है”, और कई जगह 850 तथा कहीं-कहीं 800 से भी नीचे।

5

! हिंसा — “शहरी इलाके तो महिलाओं के लिए खास तौर से असुरक्षित हैं। वे अपने घरों में भी सुरक्षित नहीं हैं क्योंकि वहाँ भी उन्हें मारपीट तथा अनेक तरह की घरेलू हिंसा झेलनी पड़ती है।”

6

राजनीतिक प्रतिनिधित्व — लोकसभा में 2019 में पहली बार 14.36 फ़ीसदी; विधान सभाओं में 5 फ़ीसदी से भी कम; और “मंत्रिमंडलों में पुरुषों का ही वर्चस्व रहा है।”

2★★विभिन्न तरह की सांप्रदायिक राजनीति का ब्यौरा दें और हर एक का उदाहरण भी दें।

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पहले परिभाषा — “राजनीति में धर्म को इस तरह जोड़ना ही सांप्रदायिकता है”, यानी जब “धर्म को राष्ट्र का आधार मान लिया जाता है”, “एक धर्म के विचारों को दूसरे से श्रेष्ठ माना जाने लगता है” और “राज्य अपनी सत्ता का इस्तेमाल किसी एक धर्म के पक्ष में करने लगता है।”

1

दैनंदिन जीवन में —

“सांप्रदायिकता की सबसे आम अभिव्यक्ति दैनंदिन जीवन में ही दिखती है। इनमें धार्मिक पूर्वाग्रह, धार्मिक समुदायों के बारे में बनी बनाई धारणाएँ और एक धर्म को दूसरे धर्म से श्रेष्ठ मानने की मान्यताएँ शामिल हैं।” ★उदाहरण — दूसरे धर्म के लोगों के बारे में चुटकुले सुनाना या “वे सब ऐसे ही होते हैं” जैसी बात कहना। किताब चेताती है — “ये चीज़ें इतनी आम हैं कि अक्सर हम उन पर ध्यान तक नहीं देते जबकि ये हमारे अंदर ही बैठी होती हैं।”

2

राजनीतिक प्रभुत्व की कोशिश —

“जो लोग बहुसंख्यक समुदाय के होते हैं उनकी यह कोशिश बहुसंख्यकवाद का रूप ले लेती है। जो अल्पसंख्यक समुदाय के होते हैं उनमें यह विश्वास अलग राजनीतिक इकाई बनाने की इच्छा का रूप ले लेता है।” उदाहरण — (पिछले अध्यायों से) श्रीलंका का सिंहली बहुसंख्यकवाद और उसके जवाब में उठी अलग राज्य की माँग।

3

सांप्रदायिक गोलबंदी —

“इसमें धर्म के पवित्र प्रतीकों, धर्मगुरुओं, भावनात्मक अपील और अपने ही लोगों के मन में डर बैठाने जैसे तरीकों का उपयोग बहुत आम है।” उदाहरण — चुनाव प्रचार में “एक धर्म के मतदाताओं की भावनाओं या हितों की बात उठाने” वाले भाषण।

4

! हिंसा, दंगा और नरसंहार —

“कई बार सांप्रदायिकता सबसे गंदा रूप लेकर… हिंसा कराती है।” उदाहरण — “विभाजन के समय भारत और पाकिस्तान में भयावह सांप्रदायिक दंगे हुए थे। आज़ादी के बाद भी बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक हिंसा हुई है।”

3★धर्मनिरपेक्ष शासन का मॉडल क्या है? भारतीय संविधान के प्रावधानों सहित समझाइए।

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“सांप्रदायिकता हमारे देश के लोकतंत्र के लिए एक बड़ी चुनौती रही है। हमारे संविधान निर्माता इस चुनौती के प्रति सचेत थे। इसी कारण उन्होंने धर्मनिरपेक्ष शासन का मॉडल चुना।”

चार प्रावधान

1

★“भारतीय राज्य ने किसी भी धर्म को राजकीय धर्म के रूप में अंगीकार नहीं किया है। श्रीलंका में बौद्ध धर्म, पाकिस्तान में इस्लाम और इंग्लैंड में ईसाई धर्म का जो दर्जा रहा है उसके विपरीत भारत का संविधान किसी धर्म को विशेष दर्जा नहीं देता।”

2

“संविधान सभी नागरिकों और समुदायों को किसी भी धर्म का पालन करने और प्रचार करने की आज़ादी देता है।”

3

“संविधान धर्म के आधार पर किए जाने वाले किसी तरह के भेदभाव को अवैधानिक घोषित करता है।”

4

★“संविधान धार्मिक समुदायों में समानता सुनिश्चित करने के लिए शासन को धार्मिक मामलों में दखल देने का अधिकार देता है। जैसे, यह छुआछूत की इजाज़त नहीं देता।”

और सबसे ज़रूरी बात ★★ “धर्मनिरपेक्षता कुछ पार्टियों या व्यक्तियों की एक विचारधारा भर नहीं है। यह विचार हमारे संविधान की बुनियाद है।” तथा “हमारी तरह का धर्मनिरपेक्ष संविधान ज़रूरी चीज़ है पर अकेले इसी के बूते सांप्रदायिकता का मुकाबला नहीं किया जा सकता। हमें अपने दैनंदिन जीवन में सांप्रदायिक पूर्वाग्रहों और दुष्प्रचारों का मुकाबला करना होगा।”

4★बताइए कि भारत में किस तरह अभी भी जातिगत असमानताएँ जारी हैं।

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किताब मानती है कि जाति व्यवस्था में भारी बदलाव आया है — “अगर सौ साल पहले का कोई व्यक्ति एक बार फिर भारत लौटकर आए तो यहाँ हुए बदलावों को देखकर हैरान रह जाएगा” — पर “समकालीन भारत से जाति प्रथा विदा नहीं हुई है।”

1

विवाह — “अभी भी ज़्यादातर लोग अपनी जाति या कबीले में ही शादी करते हैं।”

2

! छुआछूत — “स्पष्ट संवैधानिक प्रावधान के बावजूद छुआछूत की प्रथा अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है।”

3

★शिक्षा — “जिन जातियों में पहले से ही पढ़ाई-लिखाई का चलन मौजूद था और जिनकी शिक्षा पर पकड़ थी, आधुनिक शिक्षा व्यवस्था में भी उन्हीं का बोलबाला है। जिन जातियों को पहले शिक्षा से वंचित रखा जाता था उनके सदस्य अभी भी स्वाभाविक तौर पर पिछड़े हुए हैं।”

4

आर्थिक हैसियत — “शहरी मध्यम वर्ग में अगड़ी जाति के लोगों का अनुपात असामान्य रूप से काफ़ी ज़्यादा है। जाति और आर्थिक हैसियत में काफ़ी निकट का संबंध है।”

5

आँकड़े — राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के अनुसार औसत आर्थिक हैसियत “अभी भी वर्णव्यवस्था के साथ गहरा संबंध दर्शाती है” — “‘ऊँची’ जाति के लोगों की आर्थिक स्थिति सबसे अच्छी है। दलित तथा आदिवासियों की आर्थिक स्थिति सबसे खराब है, जबकि पिछड़ी जातियाँ बीच की स्थिति में हैं।”

6

“जाति व्यवस्था के अंतर्गत सदियों से कुछ समूहों को लाभ की स्थिति में तो कुछ समूहों को दबाकर रखा गया है। इसका प्रभाव सदियों बाद आज तक नज़र आता है।”

5★★स्पष्ट कीजिए कि भारत में चुनावी नतीजे सिर्फ़ जाति के आधार पर तय नहीं होते।

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“राजनीति में जाति पर जोर देने के कारण कई बार यह धारणा बन सकती है कि चुनाव जातियों का खेल है, कुछ और नहीं। यह बात सच नहीं है।”

1

★“देश के किसी भी एक संसदीय चुनाव क्षेत्र में किसी एक जाति के लोगों का बहुमत नहीं है इसलिए हर पार्टी और उम्मीदवार को चुनाव जीतने के लिए एक जाति और एक समुदाय से ज़्यादा लोगों का भरोसा हासिल करना पड़ता है।”

2

“कोई भी पार्टी किसी एक जाति या समुदाय के सभी लोगों का वोट हासिल नहीं कर सकती।” ‘वोट बैंक’ का मतलब भी यही होता है कि उस जाति के “ज़्यादातर लोग” — सभी नहीं — उसी पार्टी को वोट देते हैं।

3

“अगर किसी चुनाव क्षेत्र में एक जाति का प्रभुत्व माना जा रहा हो तो अनेक पार्टियों को उसी जाति का उम्मीदवार खड़ा करने से कोई रोक नहीं सकता”, और तब कुछ मतदाताओं के सामने उनकी जाति के कई उम्मीदवार होते हैं तो कुछ के सामने एक भी नहीं।

4

★★“हमारे देश में सत्तारूढ़ दल, वर्तमान सांसदों और विधायकों को अक्सर हार का सामना करना पड़ता है। अगर जातियों और समुदायों की राजनीतिक पसंद एक ही होती तो ऐसा संभव नहीं हो पाता।”

5

और — “मतदाता अपनी जातियों से जितना जुड़ाव रखते हैं अक्सर उससे ज़्यादा गहरा जुड़ाव राजनीतिक दलों से रखते हैं”; “एक जाति या समुदाय के भीतर भी अमीर और गरीब लोगों के हित अलग-अलग होते हैं”; और “सरकार के कामकाज के बारे में लोगों की राय और नेताओं की लोकप्रियता का चुनावों पर अक्सर निर्णायक असर होता है।”

निष्कर्ष ★ “स्पष्ट है कि चुनाव में जाति की भूमिका महत्वपूर्ण होती है किंतु दूसरे कारक भी इतने ही असरदार होते हैं।”

6★★जाति और राजनीति के रिश्ते के लाभ और हानि दोनों बताइए।

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लाभ

1

★“जातिगत राजनीति ने दलित और पिछड़ी जातियों के लोगों के लिए सत्ता तक पहुँचने तथा निर्णय प्रक्रिया को बेहतर ढंग से प्रभावित करने की स्थिति भी पैदा की है।”

2

“अनेक पार्टियाँ और गैर-राजनीतिक संगठन खास जातियों के खिलाफ़ भेदभाव समाप्त करने, उनके साथ ज़्यादा सम्मानजनक व्यवहार करने, उनके लिए ज़मीन-जायदाद और अवसर उपलब्ध कराने की माँग को लेकर आंदोलन करते रहे हैं।”

3

सार्वभौम वयस्क मताधिकार ने “उन जातियों के लोगों में नयी चेतना पैदा” की “जिन्हें अभी तक छोटा और नीच माना जाता था।”

4

“कुछ खास स्थितियों में राजनीति में जातिगत विभिन्नताएँ और असमानताएँ वंचित और कमज़ोर समुदायों के लिए अपनी बातें आगे बढ़ाने और सत्ता में अपनी हिस्सेदारी माँगने की गुंजाइश भी पैदा करती हैं।”

! हानि —

5

“सिर्फ़ जातिगत पहचान पर आधारित राजनीति लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं होती।”

6

★“इससे अक्सर गरीबी, विकास, भ्रष्टाचार जैसे ज़्यादा बड़े मुद्दों से लोगों का ध्यान भी भटकता है।”

7

“कई बार जातिवाद तनाव, टकराव और हिंसा को भी बढ़ावा देता है।”

निष्कर्ष ★ जैसा धर्म के मसले से स्पष्ट होता है, वैसा ही यहाँ भी — समस्या जाति की चर्चा में नहीं, जाति को “एकमात्र आधार” मान लेने में है।

7★“सामाजिक विविधता लोकतंत्र के लिए ख़तरा नहीं होती” — इस कथन की व्याख्या कीजिए।

उत्तर देखिए

यह किताब का पहला ही वाक्य है, और पूरा अध्याय इसी को सिद्ध करता है — “राजनीति में सामाजिक असमानताओं की अभिव्यक्ति कोई असंभव बात नहीं है। कई बार तो यह अभिव्यक्ति लोकतंत्र के लिए लाभकर भी होती है।”

(क) कब लाभकर है — लैंगिक विभाजन का उदाहरण। जब तक महिलाओं का सवाल राजनीतिक मुद्दा नहीं बना, तब तक न आरक्षण मिला, न प्रतिनिधित्व। पर जब बना, तो पंचायतों में एक तिहाई आरक्षण मिला, 10 लाख से ज़्यादा महिलाएँ निर्वाचित हुईं, और 2023 में नारी शक्ति वंदन अधिनियम पारित हुआ। ★किताब का वाक्य — “लैंगिक विभाजन इस बात की एक मिसाल है कि कुछ खास किस्म के सामाजिक विभाजनों को राजनीतिक रूप देने की ज़रूरत है। इससे यह भी पता चलता है कि जब सामाजिक विभाजन एक राजनीतिक मुद्दा बन जाता है तो वंचित समूहों को किस तरह लाभ होता है।”

(ख) कब नुकसानदेह है — सांप्रदायिकता। जब “धर्म को राष्ट्र का आधार मान लिया जाता है” और “राज्य अपनी सत्ता का इस्तेमाल किसी एक धर्म के पक्ष में करने लगता है” — तब यह “भारत की बुनियादी अवधारणा के लिए एक चुनौती है, एक खतरा है।”

(ग) और जाति — दोनों। इसने वंचितों को सत्ता तक पहुँच दी, पर “सिर्फ़ जातिगत पहचान पर आधारित राजनीति लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं होती।”

निष्कर्ष ★★ विविधता ख़तरा नहीं है; ख़तरा तब है जब किसी एक पहचान को अकेली और अंतिम पहचान बना दिया जाए। किताब के अपने शब्दों में — “हर व्यक्ति कई तरह की भूमिका निभाता है। उसकी हैसियत और पहचान अलग-अलग होती है।”