पुस्तक: भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग-3 | पृष्ठ: 227–257 | कालावधि: लगभग 1765–1878
भाग 0 — अध्याय को समझने की कुंजी
0.1 शीर्षक को दो हिस्सों में पढ़िए
“उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन”
| हिस्सा | संकेत |
|---|---|
| “उपनिवेशवाद और देहात” | विषय — औपनिवेशिक शासन का अर्थ गाँव में रहने वालों के लिए क्या था |
| “सरकारी अभिलेखों का अध्ययन” | ★विधि — पूरा अध्याय सरकारी स्रोतों (राजस्व अभिलेख, सर्वेक्षण, पाँचवीं रिपोर्ट, बुकानन की डायरियाँ, दक्कन दंगा आयोग) से लिखा गया है — और उन्हीं की आलोचना भी सिखाता है |
★★शिक्षण-सूत्र: यह अध्याय तीन क्षेत्रों की तीन कहानियाँ है — (1) बंगाल के ज़मींदार-जोतदार, (2) राजमहल की पहाड़ियों के पहाड़िया-संथाल, (3) बम्बई दक्कन के रैयत-ऋणदाता। तीनों में एक ही पैटर्न — कंपनी की राजस्व-नीति → ग्रामीण समाज में उथल-पुथल → प्रतिरोध — और तीनों कहानियाँ सरकारी अभिलेखों की दरारों से पढ़ी गई हैं।
0.2 प्रस्तावना का केंद्रीय तर्क (पृ. 227)★★
- इस अध्याय में — औपनिवेशिक शासन का अर्थ देहात में रहने वालों के लिए; बंगाल के ज़मींदारों से भेंट; राजमहल की पहाड़ियों (पहाड़िया व संथाल) की यात्रा; फिर दक्कन की ओर।
- ईस्ट इंडिया कंपनी ने देहात में अपना राज कैसे स्थापित किया, राजस्व नीतियाँ कैसे कार्यान्वित कीं, भिन्न-भिन्न वर्गों के लिए इनका क्या मतलब था, और उन्होंने रोज़मर्रा की ज़िंदगी को कैसे बदल दिया।
- ★क़ानूनों के परिणाम: राज्य के क़ानून कुछ हद तक तय करते हैं कि कौन धनवान बनेगा, कौन ग़रीब; किसे नयी ज़मीन मिलेगी, कौन अपनी ज़मीन खोएगा; किसान पैसे की ज़रूरत में कहाँ, किसके पास जाएँगे।
- ★★लोग क़ानूनों का पालन करने को मजबूर होते हुए भी उन क़ानूनों का विरोध करने से नहीं हिचकते थे जिन्हें वे अन्यायपूर्ण समझते थे — और इस प्रकार वे क़ानूनों के परिणामों में कुछ फेर-बदल कर देते थे।
- स्रोत: राजस्व अभिलेख व सर्वेक्षण, पत्र-पत्रिकाएँ, सर्वेक्षकों-यात्रियों के विवरण, जाँच आयोगों की रिपोर्टें — साथ ही इनकी समस्याएँ भी।
0.3 अध्याय की संरचना
| खंड | क्षेत्र | विषय |
|---|---|---|
| §1 | बंगाल | इस्तमरारी बंदोबस्त; नीलामी; ज़मींदारों की चूक व प्रतिरोध; जोतदारों का उदय; पाँचवीं रिपोर्ट |
| §2 | राजमहल की पहाड़ियाँ | पहाड़िया (कुदाल) बनाम संथाल (हल); दामिन-इ-कोह; संथाल विद्रोह; बुकानन का विवरण |
| §3 | बम्बई दक्कन | रैयतवाड़ी; कर्ज़; कपास-तेज़ी (अमेरिकी गृहयुद्ध); 1875 का विद्रोह |
| §4 | (विधि) | दक्कन दंगा आयोग — सरकारी स्रोत कैसे पढ़ें |
★तीन प्रतीक-जोड़े याद रखिए: बंगाल — ज़मींदार बनाम जोतदार; राजमहल — कुदाल बनाम हल; दक्कन — रैयत बनाम ऋणदाता।
भाग 1 — खंड-दर-खंड विस्तृत नोट्स
§1. बंगाल और वहाँ के ज़मींदार (पृ. 228–235)
- औपनिवेशिक शासन सर्वप्रथम बंगाल में स्थापित हुआ; यहीं सबसे पहले ग्रामीण समाज को पुनर्व्यवस्थित करने, भूमि-अधिकारों की नयी व्यवस्था और नयी राजस्व प्रणाली के प्रयत्न हुए।
§1.1 बर्दवान में की गई नीलामी की एक घटना (पृ. 228)
- सन् 1797 में बर्दवान (आज का बर्द्धमान) में एक नीलामी — बड़ी सार्वजनिक घटना।
- बर्दवान के राजा द्वारा धारित अनेक महाल (भूसंपदाएँ) बेचे जा रहे थे — क्योंकि राजा पर राजस्व की भारी रकम बाकाया थी। (📦 बॉक्स: ‘राजा’ शब्द का प्रयोग अक्सर शक्तिशाली ज़मींदारों के लिए किया जाता था।)
- पृष्ठभूमि — 1793 में इस्तमरारी बंदोबस्त लागू; कंपनी ने राजस्व राशि निश्चित कर दी थी; जो ज़मींदार निश्चित राशि नहीं चुका पाते, उनकी संपदाएँ नीलाम।
- ★★अजीब पेंच: कलेक्टर को पता चला कि नीलामी के अनेक ख़रीददार राजा के अपने ही नौकर या एजेंट थे, जिन्होंने राजा की ओर से ही ज़मीनें ख़रीदी थीं; नीलामी में 95 प्रतिशत से अधिक बिक्री फ़र्ज़ी थी। राजा की ज़मीनें खुलेतौर पर बिकीं, पर ज़मींदारी का नियंत्रण उसी के हाथों में रहा।
- तीन प्रश्न (जो पूरा §1 चलाते हैं): राजा राजस्व क्यों नहीं अदा कर पाया? ख़रीददार कौन थे? यह कहानी पूर्वी भारत के ग्रामीण क्षेत्रों के बारे में क्या बताती है?
§1.2 अदा न किए गए राजस्व की समस्या (पृ. 228–229)
- अकेले बर्दवान ही नहीं — इस्तमरारी बंदोबस्त के बाद 75 प्रतिशत से अधिक ज़मींदारियाँ हस्तांतरित कर दी गईं।
इस्तमरारी बंदोबस्त क्यों लागू किया गया?★★
| # | कारण/अपेक्षा |
|---|---|
| 1 | 1770 के दशक तक बंगाल की ग्रामीण अर्थव्यवस्था संकट में — बार-बार अकाल, घटती पैदावार |
| 2 | अधिकारियों की सोच — खेती, व्यापार, राजस्व-संसाधन तभी विकसित होंगे जब कृषि में निवेश को प्रोत्साहन मिले; इसके लिए संपत्ति के अधिकार सुनिश्चित हों व राजस्व दरें स्थायी रूप से तय हों |
| 3 | यदि राजस्व माँग स्थायी → कंपनी को नियमित प्राप्ति की आशा; उद्यमकर्ता को निश्चित लाभ की उम्मीद — राज्य अपनी माँग बढ़ाकर लाभ नहीं छीनेगा |
| 4 | ★आशा — इस प्रक्रिया से छोटे किसानों (योमॅन) और धनी भूस्वामियों का ऐसा वर्ग उभरेगा जिसके पास पूँजी और उद्यम दोनों होंगे; ब्रिटिश शासन से पोषित होकर यह वर्ग कंपनी के प्रति वफ़ादार रहेगा |
बंदोबस्त की शक्ल
- समस्या — यह पता लगाना कि कौन व्यक्ति कृषि-सुधार के साथ-साथ राजस्व अदा करने का ठेका ले सकेंगे। लंबे वाद-विवाद के बाद — बंगाल के राजाओं और ताल्लुक़दारों के साथ इस्तमरारी बंदोबस्त; अब वे ज़मींदारों के रूप में वर्गीकृत; उन्हें सदा के लिए एक निर्धारित राजस्व माँग अदा करनी थी।
- ★★“इस परिभाषा के अनुसार, ज़मींदार गाँव में भू-स्वामी नहीं था, बल्कि वह राज्य का राजस्व समाहर्ता (यानी संग्राहक) मात्र था।”
- (📦 बॉक्स: ताल्लुक़दार — शाब्दिक अर्थ: वह व्यक्ति जिसके साथ ताल्लुक़ यानी संबंध हो; आगे चलकर ताल्लुक़ का अर्थ क्षेत्रीय इकाई हो गया।)
- ज़मींदारों के नीचे अनेक — कभी-कभी 400 तक — गाँव होते थे; कंपनी के हिसाब से एक ज़मींदारी के गाँव मिलाकर एक राजस्व संपदा; कंपनी समस्त संपदा पर कुल माँग निर्धारित करती; फिर ज़मींदार तय करता कि किस गाँव से कितनी माँग पूरी होगी, और वसूली करता; चूक पर संपदा नीलाम।
§1.3 राजस्व राशि के भुगतान में ज़मींदार क्यों चूक करते थे? (पृ. 229–231)
चार कारण (अक्षरश: क्रम से)★★
| # | कारण |
|---|---|
| 1 | प्रारंभिक माँगें बहुत ऊँची — क्योंकि माँग सदा के लिए तय हो रही थी; आगे कीमतें बढ़ने व खेती के विस्तार से आय बढ़ने पर भी कंपनी उस वृद्धि में हिस्से का दावा कभी नहीं कर सकेगी; इस प्रत्याशित हानि को कम करने के लिए माँग ऊँची रखी गई — दलील: ज्यों-ज्यों उत्पादन बढ़ेगा और कीमतें बढ़ेंगी, बोझ शनै: शनै: कम होता जाएगा |
| 2 | यह ऊँची माँग 1790 के दशक में लागू की गई जब कृषि-उपज की कीमतें नीची थीं → रैयत के लिए ज़मींदार को देय राशियाँ चुकाना मुश्किल; जब ज़मींदार किसानों से इकट्ठा ही नहीं कर पाता, तो कंपनी को कैसे दे? |
| 3 | राजस्व असमान (अपरिवर्तनीय) — फ़सल अच्छी हो या ख़राब, ठीक समय पर भुगतान ज़रूरी; ★सूर्यास्त विधि (Sunset Law) — निश्चित तारीख़ को सूर्य अस्त होने तक भुगतान न आए तो ज़मींदारी नीलाम |
| 4 | इस्तमरारी बंदोबस्त ने प्रारंभ में ज़मींदार की शक्ति को रैयत से राजस्व इकट्ठा करने और अपनी ज़मींदारी का प्रबंध करने तक सीमित कर दिया |
कंपनी द्वारा ज़मींदारों पर नियंत्रण (पाँच कदम)★★
- कंपनी ज़मींदारों को महत्त्व तो देती थी, पर उन्हें नियंत्रित-विनियमित करना, उनकी सत्ता को वश में रखना, स्वायत्तता सीमित करना चाहती थी:
- सैन्य-टुकड़ियाँ भंग कर दी गईं
- सीमा शुल्क समाप्त
- उनकी कचहरियाँ कंपनी-नियुक्त कलेक्टर की देखरेख में
- स्थानीय न्याय और पुलिस की व्यवस्था करने की शक्ति छीनी गई
- समय के साथ कलेक्टर का कार्यालय सत्ता के विकल्पी केंद्र के रूप में उभरा; ज़मींदार का अधिकार पूरी तरह सीमित एवं प्रतिबंधित
- ★चरम उदाहरण — एक राजा के भुगतान न कर पाने पर एक कंपनी अधिकारी को तुरंत उसकी ज़मींदारी में इस स्पष्ट अनुदेश के साथ भेजा गया: “ज़िले का पूरा कार्यभार अपने हाथ में ले लो और राजा तथा उसके अधिकारियों के संपूर्ण प्रभाव और प्राधिकार को ख़त्म कर देने के लिए सर्वाधिक प्रभावशाली क़दम उठाओ।”
वसूली की व्यावहारिक बाधाएँ
- राजस्व इकट्ठा करते समय ज़मींदार का अधिकारी — अमला — गाँव आता था।
- पर वसूली एक परिवार्षिक समस्या: कभी ख़राब फ़सल और नीची कीमतों से किसान के लिए भुगतान कठिन; कभी-कभी रैयत जान-बूझकर भुगतान में देरी करते थे।
- ★धनवान रैयत और गाँव के मुखिया — जोतदार और मंडल — ज़मींदार को परेशानी में देखकर ख़ुश होते थे, क्योंकि ज़मींदार आसानी से उन पर अपनी ताक़त का इस्तेमाल नहीं कर सकता था।
- ज़मींदार बाक़ीदारों पर मुक़दमा चला सकता था, पर न्यायिक प्रक्रिया लंबी — ★1798 में अकेले बर्दवान ज़िले में राजस्व-बकाया संबंधी 30,000 से अधिक वाद लंबित थे।
§1.4 जोतदारों का उदय (पृ. 231–232)
- अठारहवीं शताब्दी के अंत में जहाँ ज़मींदार संकट में थे, वहीं धनी किसानों के समूह गाँवों में अपनी स्थिति मज़बूत कर रहे थे।
- ★फ्रांसिस बुकानन के उत्तरी बंगाल के दिनाजपुर ज़िले के सर्वेक्षण में इस वर्ग — ‘जोतदार’ — का विशद विवरण।
- उन्नीसवीं सदी के प्रारंभिक वर्षों तक जोतदारों ने ज़मीन के बड़े-बड़े रकबे — कभी-कभी कई हज़ार एकड़ — अर्जित कर लिए थे।
- स्थानीय व्यापार व साहूकारी के कारोबार पर भी नियंत्रण; क्षेत्र के ग़रीब काश्तकारों पर व्यापक शक्ति।
- ★ज़मीन का काफ़ी बड़ा भाग बटाईदारों (अधियारों या बरगादारों) के माध्यम से जोता जाता था — जो खुद अपने हल लाते, खेत में मेहनत करते और फ़सल के बाद उपज का आधा हिस्सा जोतदारों को दे देते थे।
जोतदार बनाम ज़मींदार — जोतदार की शक्ति अधिक प्रभावशाली क्यों?★★
| # | कारण |
|---|---|
| 1 | ज़मींदार शहरों में; जोतदार गाँवों में ही रहते थे — ग़रीब ग्रामवासियों के बड़े वर्ग पर सीधा नियंत्रण |
| 2 | ज़मींदार द्वारा गाँव की जमा (लगान) बढ़ाने के प्रयत्नों का घोर प्रतिरोध करते |
| 3 | ज़मींदारी अधिकारियों को कर्तव्य-पालन से रोकते |
| 4 | अपने पर निर्भर रैयत को अपने पक्ष में एकजुट रखते |
| 5 | ज़मींदार को राजस्व-भुगतान में जान-बूझकर देरी कराते |
| 6 | ★राजस्व न चुकाने पर जब ज़मींदारी नीलाम होती, तो अक्सर जोतदार ही ज़मीनें ख़रीद लेते |
- उत्तरी बंगाल में जोतदार सबसे शक्तिशाली; अन्य भागों में धनी किसान व मुखिया भी प्रभावशाली — कहीं ‘हवलदार’, कहीं ‘गाँटीदार’ या ‘मंडल’। इनके उदय से ज़मींदारों के अधिकार का कमज़ोर पड़ना अवश्यंभावी था।
स्रोत 1 (पृ. 232): “दिनाजपुर के जोतदार” — बुकानन★
“भूस्वामी इस वर्ग के लोगों को पसंद नहीं करते थे, लेकिन यह स्पष्ट है कि इन लोगों का होना बहुत ज़रूरी था क्योंकि इनके बिना, ज़रूरतमंद काश्तकारों को पैसा उधार कौन देता… जोतदार, जो बड़ी-बड़ी ज़मीनें जोतते हैं, बहुत ही हठीले और ज़िद्दी हैं और यह जानते हैं कि ज़मींदारों का उन पर कोई वश नहीं चलता। वे अपने राजस्व के रूप में कुछ थोड़े से रुपये ही दे देते हैं और लगभग हर किस्त में कुछ-न-कुछ बकाया रक़म रह जाती है। उनके पास उनके पट्टे की हकदारी से ज़्यादा ज़मीनें हैं… अगर अधिकारी उन्हें कचहरी में बुलाते थे और डराने-धमकाने के लिए घंटे-दो-घंटे कचहरी में रोक लेते हैं तो वे तुरंत उनकी शिकायत करने के लिए फ़ौजदारी थाना (पुलिस थाना) या मुन्सिफ़ की कचहरी में पहुँच जाते हैं… और जोतदार छोटे-छोटे रैयत को राजस्व न देने के लिए भड़काते रहते हैं।”
🔎 इन-टेक्स्ट प्रश्न: “यह बताइए कि जोतदार ज़मींदारों की सत्ता का किस प्रकार प्रतिरोध किया करते थे।” ★सूक्ष्म पाठ: बुकानन (कंपनी-कर्मचारी) की झुंझलाहट में ही जोतदार की ताक़त दर्ज है — वह नयी क़ानूनी संस्थाओं (थाना, मुन्सिफ़-कचहरी) का इस्तेमाल ज़मींदार के विरुद्ध करना सीख चुका था।
चित्र 9.5 (पृ. 232): ग्रामीण बंगाल में शक्ति के धारक
- प्रवाह-संरचना: कंपनी राज ← ज़मींदार (अनेक गाँवों पर नियंत्रण) ← रैयत ← शिकमी रैयत; समानांतर — जोतदार (धनवान रैयत, व्यापारी और महाजन यानी साहूकार भी)।
- साथ के बिंदु: ज़मींदार (क) कंपनी को राजस्व अदा करने, (ख) गाँवों पर राजस्व-माँग (जमा) निर्धारित करने के लिए ज़िम्मेदार • हर छोटा-बड़ा रैयत ज़मींदार को लगान अदा करता • जोतदार अन्य रैयतों को उधार देते और अपनी उपज बेचते • रैयत कुछ ज़मीन खुद जोतते, बाकी शिकमी रैयत को लगान पर देते • शिकमी रैयत, रैयतों को लगान देते।
- 🔎 इन-टेक्स्ट प्रश्न: चित्र के साथ पाठ पढ़कर तीरों पर शब्द भरिए — लगान, राजस्व, ब्याज, उधार (ऋण), उपज।
§1.5 ज़मींदारों की ओर से प्रतिरोध (पृ. 232–233)
- ज़मींदारों की सत्ता समाप्त नहीं हुई — नए संदर्भों में नयी रणनीतियाँ:
(क) फ़र्जी बिक्री (हथकंडे क्रम से)★★
- बर्दवान के राजा ने पहले अपनी ज़मींदारी का कुछ हिस्सा अपनी माता को दे दिया — क्योंकि कंपनी ने निर्णय ले रखा था कि स्त्रियों की संपत्ति को नहीं छीना जाएगा।
- फिर उसके एजेंटों ने नीलामी में जोड़-तोड़ किया — कंपनी की राजस्व माँग जान-बूझकर रोक ली गई; बकाया बढ़ती गई।
- नीलामी में ज़मींदार के आदमियों ने ही ऊँची-ऊँची बोलियाँ लगाकर संपत्ति ख़रीद ली — फिर ख़रीद की राशि अदा करने से इनकार → संपदा फिर से बेचनी पड़ी → फिर ज़मींदार के एजेंटों ने ख़रीदा → फिर रकम नहीं दी → फिर नीलामी…
- यह प्रक्रिया बार-बार दोहराई गई; अंतत: राज और नीलामी में बोली लगाने वाले थक गए; जब किसी ने बोली नहीं लगाई तो संपदा नीची क़ीमत पर फिर ज़मींदार को ही बेचनी पड़ी।
- ज़मींदार कभी भी राजस्व की पूरी माँग अदा नहीं करता था; कंपनी कभी-कभार ही बकाया वसूल पाती थी।
- ★आँकड़े: 1793 से 1801 के बीच बंगाल की चार बड़ी ज़मींदारियों (बर्दवान समेत) ने अनेक बेनामी ख़रीददारियाँ कीं — कुल 30 लाख रुपये; नीलामियों की कुल बिक्रियों में 15 प्रतिशत सौदे नक़ली थे। (📦 बॉक्स: बेनामी — शाब्दिक अर्थ ‘गुमनाम’; ऐसे सौदे जो फ़र्ज़ी या अपेक्षाकृत महत्त्वहीन व्यक्ति के नाम किए जाते हैं, असली फ़ायदा पाने वाले का नाम नहीं दिया जाता।)
(ख) बाहरी ख़रीददारों को खदेड़ना★
- बाहरी व्यक्ति की ख़रीद पर क़ब्ज़ा नहीं मिलता था; कभी पुराने ज़मींदार के लठियाल नए ख़रीददार के लोगों को मारपीट कर भगा देते; ★कभी पुराने रैयत ही बाहरी लोगों को ज़मीन में घुसने ही नहीं देते थे — वे अपने को पुराने ज़मींदार से जुड़ा महसूस करते थे, उसके प्रति वफ़ादार थे, उसे अपना अन्नदाता और खुद को उसकी प्रजा मानते थे। (📦 बॉक्स: लठियाल — ‘जिसके पास लाठी या डंडा हो’; ज़मींदार के लठैत यानी डंडेबाज पक्षधर।)
- ज़मींदारी की बिक्री से ज़मींदार के तादात्म्य (पहचान) और गौरव को धक्का पहुँचता था — इसलिए ज़मींदार आसानी से विस्थापित नहीं किए जा सकते थे।
(ग) आगे की कहानी
- उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में मंदी समाप्त, कीमतें बढ़ीं; जो ज़मींदार 1790 के दशक की तकलीफ़ें झेल गए, उन्होंने सत्ता सुदृढ़ कर ली; राजस्व-भुगतान के नियम भी कुछ लचीले बना दिए गए → गाँवों पर ज़मींदार की सत्ता और मज़बूत।
- ★पर 1930 के दशक की घोर मंदी (Depression) में अंतत: ज़मींदारों का भट्ठा बैठ गया और जोतदारों ने देहात में अपने पाँव मज़बूत कर लिए।
चित्र 9.3 व 9.6
- चित्र 9.3 — चार्ल्स कार्नवालिस (1738–1805), 1785 में थॉमस गेन्सबोरो द्वारा चित्रित; अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम में ब्रिटिश सेना का कमांडर; ★1793 में जब बंगाल में इस्तमरारी बंदोबस्त लागू हुआ, तब कार्नवालिस बंगाल का गवर्नर जनरल था।
- चित्र 9.6 — महाराजा मेहताब चंद (1820–79): इस्तमरारी बंदोबस्त के समय बर्दवान का राजा तेजचंद; बाद में मेहताबचंद के शासन में ज़मींदारी फली-फूली; उसने संथालों के विद्रोह और 1857 के विद्रोह के दौरान अंग्रेज़ी हुकूमत का साथ दिया।
- चित्र 9.7 — अंडुल राजमहल: ज़मींदारों की पतनोन्मुख वैभवशाली जीवन-शैली पर बनी सत्यजित राय की प्रसिद्ध फ़िल्म ‘जलसाघर’ की शूटिंग यहीं हुई।
§1.6 पाँचवीं रिपोर्ट (पृ. 233–235)
रिपोर्ट क्या थी?
- इन परिवर्तनों का विस्तृत विवरण देने वाली एक रिपोर्ट — सन् 1813 में ब्रिटिश संसद में पेश; भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रशासन तथा क्रियाकलापों पर तैयार रिपोर्टों की शृंखला की पाँचवीं → ‘पाँचवीं रिपोर्ट’।
- ★1,002 पृष्ठ; 800 से अधिक पृष्ठ परिशिष्ट — ज़मींदारों और रैयतों की अर्ज़ियाँ, भिन्न-भिन्न ज़िलों के कलेक्टरों की रिपोर्टें, राजस्व विवरणियों की सांख्यिकीय तालिकाएँ, और बंगाल व मद्रास के राजस्व तथा न्यायिक प्रशासन पर अधिकारियों की टिप्पणियाँ।
पृष्ठभूमि — कंपनी की जाँच क्यों?
- कंपनी के बंगाल में स्थापित (1760 के दशक के मध्य) होने के समय से ही इंग्लैंड में उसके क्रियाकलापों पर नज़र रखी जा रही थी:
- ब्रिटेन में ऐसे समूह जो भारत व चीन के साथ व्यापार पर कंपनी के एकाधिकार का विरोध करते थे — वे उस शाही फरमान (Royal Charter) को रद्द करवाना चाहते थे जिससे कंपनी को यह एकाधिकार मिला था
- निजी व्यापारियों की बढ़ती संख्या व्यापार में हिस्सा चाहती थी; ब्रिटेन के उद्योगपति ब्रिटिश विनिर्माताओं के लिए भारत का बाज़ार खुलवाने के लिए उत्सुक थे
- राजनीतिक समूहों का कहना — बंगाल की विजय का लाभ केवल कंपनी को मिल रहा है, संपूर्ण ब्रिटिश राष्ट्र को नहीं
- कंपनी के कुशासन और अव्यवस्थित प्रशासन पर ब्रिटेन में गरमागरम बहस; अधिकारियों के लोभ-लालच और भ्रष्टाचार की घटनाएँ समाचारपत्रों में उछाली गईं
- ब्रिटिश संसद ने कंपनी-शासन को विनियमित और नियंत्रित करने के लिए अठारहवीं सदी के अंतिम दशकों में अनेक अधिनियम पारित किए; कंपनी को नियमित रिपोर्टें भेजने के लिए बाध्य किया; जाँच समितियाँ नियुक्त कीं। पाँचवीं रिपोर्ट एक प्रवर समिति (Select Committee) ने तैयार की थी — यह कंपनी-शासन के स्वरूप पर ब्रिटिश संसद में गंभीर वाद-विवाद का आधार बनी।
रिपोर्ट की सीमाएँ (आधुनिक शोध)★★
- अठारहवीं सदी के अंतिम दशकों के ग्रामीण बंगाल के बारे में हमारी अवधारणा लगभग डेढ़ शताब्दी तक इसी रिपोर्ट से बनती-सुधरती रही; साक्ष्य बहुमूल्य हैं — लेकिन ऐसी सरकारी रिपोर्टों को सावधानी से पढ़ना चाहिए: किसने, किस उद्देश्य से लिखी?
- शोधकर्ताओं ने बंगाल के अनेक ज़मींदारों के अभिलेखागारों और ज़िलों के स्थानीय अभिलेखों की जाँच की — पता चला:
- रिपोर्ट लिखने वाले कंपनी के कुप्रशासन की आलोचना पर तुले हुए थे
- इसलिए रिपोर्ट में परंपरागत ज़मींदारी सत्ता के पतन का वर्णन अतिरंजित है
- ज़मींदारों के ज़मीनें खोने के पैमाने के बारे में भी बढ़ा-चढ़ाकर कहा गया है
- जैसा हमने देखा — ज़मींदार नए-नए हथकंडों से ज़मींदारी बचा लेते थे; बहुत कम मामलों में विस्थापित होते थे
स्रोत 2 (पृ. 235): “पाँचवीं रिपोर्ट से उद्धृत”★
ज़मींदारों की हालत और ज़मीनों की नीलामी के आँकड़े: “स्थानीय वर्ष 1203, तदनुसार सन् 1796-97 में बिक्री के लिए विज्ञापित ज़मीन की निर्धारित राशि (जुम्मा) 28,70,061 सिक्का रु. थी और वह वास्तव में 17,90,416 रु. में बेची गई और 14,18,756 रु. की राशि जुम्मा के रूप में प्राप्त हुई। स्थानीय संवत 1204, तदनुसार सन् 1797-98 में 26,66,191 सिक्का रु. के लिए ज़मीन विज्ञापित की गई, 22,74,076 सिक्का रु. की ज़मीन बेची गई और क्रय राशि 21,47,580 सिक्का रु. थी। बाकीदारों में कुछ लोग देश के बहुत पुराने परिवारों में से थे। ये थे: नदिया, राजशाही, विशनपुर (सभी बंगाल के ज़िले) आदि के राजा…। साल दर साल उनकी जागीरों के टूटते जाने से उनकी हालत बिगड़ गई। उन्हें ग़रीबी और बरबादी का सामना करना पड़ा और कुछ मामलों में तो सार्वजनिक निर्धारण की राशि को यथावत बनाए रखने के लिए राजस्व अधिकारियों को भी काफ़ी कठिनाइयाँ उठानी पड़ीं।”
🔎 इन-टेक्स्ट प्रश्न: “जिस लहज़े में साक्ष्य अभिलिखित किया गया है, उससे आप रिपोर्ट में वर्णित तथ्यों के प्रति रिपोर्ट लिखने वाले के रुख़ के बारे में क्या सोचते हैं? आंकड़ों के ज़रिये रिपोर्ट में क्या दर्शाने की कोशिश की गई है? क्या इन दो वर्षों के आंकड़ों से, किसी भी समस्या के बारे में दीर्घकालीन निष्कर्ष निकालना संभव होगा?” शिक्षक-संकेत: लहज़ा सहानुभूति-भरा नाटकीय है (“पुराने परिवार”, “ग़रीबी और बरबादी”) — लेखक ज़मींदारी-पतन दिखाना चाहता है; केवल दो वर्षों के आँकड़ों से दीर्घकालीन निष्कर्ष नहीं निकल सकता — यही रिपोर्ट की ‘अतिरंजना’ वाली आलोचना का व्यावहारिक पाठ है।
- 🗣️ चर्चा कीजिए (पृ. 235): “आपने ज़मींदारों के हाल के बारे में अभी जो कुछ पढ़ा है उसकी तुलना अध्याय-8 में दिए गए विवरण से कीजिए।”
§2. कुदाल और हल (पृ. 236–245)
- अब ध्यान — बंगाल की गीली ज़मीनों से सूखे अंचलों पर; स्थायी कृषि से झूम कृषि के क्षेत्र पर: राजमहल की पहाड़ियाँ — जहाँ कृषक अर्थव्यवस्था की सीमाओं के बाहर की ओर विस्तार से जंगल और चरागाह उसमें समा गए, और भीतर तरह-तरह के झगड़े-झंझट उत्पन्न हुए।
§2.1 राजमहल की पहाड़ियों में (पृ. 236–240)
बुकानन की पहली झलक
- उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों में बुकानन ने राजमहल की पहाड़ियों का दौरा किया — उसके वर्णन के अनुसार ये पहाड़ियाँ अभेद्य लगती थीं; ख़तरनाक इलाक़ा जहाँ बहुत कम यात्री जाने की हिम्मत करते थे; निवासियों का व्यवहार शत्रुतापूर्ण; वे कंपनी के अधिकारियों से आशंकित थे, बातचीत को तैयार नहीं; कई उदाहरणों में घर-बार छोड़कर भाग गए।
- ★बुकानन की डायरी की सीमा (NCERT स्वयं): पत्रिका मस्तिष्क में प्रश्न खड़े करती है पर हमेशा उत्तर नहीं देती; डायरी समय के केवल एक क्षण-विशेष के बारे में बताती है — लंबे इतिहास के लिए इतिहासकारों को अन्य रिकॉर्डों की ओर मुड़ना होगा।
पहाड़िया लोग — जीवन-पद्धति★★
- अठारहवीं सदी के परवर्ती दशकों के राजस्व अभिलेखों से — इन्हें पहाड़िया कहा जाता था क्योंकि वे राजमहल की पहाड़ियों के इर्द-गिर्द रहते थे।
- जीविका: जंगल की उपज से गुज़र-बसर; झूम खेती — जंगल के छोटे-से हिस्से में झाड़ियों को काटकर और घास-फूँस को जलाकर ज़मीन साफ़; राख की पोटाश से उपजाऊ बनी ज़मीन पर अपने खाने के लिए तरह-तरह की दालें और ज्वार-बाजरा।
- ★कुदाल की तकनीक: वे अपने कुदाल से ज़मीन को थोड़ा खुरच लेते थे; कुछ वर्षों तक उस साफ़ की गई ज़मीन पर खेती करते; फिर उसे कुछ वर्षों के लिए परती छोड़कर नए इलाक़े चले जाते जिससे खोई हुई उर्वरता फिर से उत्पन्न हो जाती।
- जंगल से: खाने के लिए महुआ के फूल; बेचने के लिए रेशम के कोया और राल; काठकोयला बनाने के लिए लकड़ियाँ; पेड़ों के नीचे के छोटे पौधे व परती की घास-फूँस — पशुओं के लिए चरागाह।
- जीवन-जगत: शिकारी, झूम-खेतिहर, खाद्य-बटोरने वाले, काठकोयला बनाने वाले, रेशम के कीड़े पालने वाले — ज़िंदगी जंगल से घनिष्ठ रूप से जुड़ी; इमली के पेड़ों के बीच झोपड़ियाँ, आम की छाँह में आराम; पूरे प्रदेश को अपनी निजी भूमि मानते थे — यह भूमि उनकी पहचान और जीवन का आधार; बाहरी लोगों के प्रवेश का प्रतिरोध।
- मुखिया: समूह में एकता बनाए रखते; आपसी लड़ाई-झगड़े निपटाते; अन्य जनजातियों व मैदानी लोगों से लड़ाई छिड़ने पर जनजाति का नेतृत्व करते।
मैदानों पर आक्रमण — और शांति-सौदे★
- पहाड़ियों को अपना मूलाधार बनाकर पहाड़िया लोग मैदानों पर आक्रमण करते रहते थे जहाँ स्थायी किसान बसे थे। आक्रमण के तीन पहलू:
- ज़्यादातर अभाव या अकाल के वर्षों में जीवित रहने के लिए
- बसे हुए समुदायों पर अपनी ताक़त दिखाने का तरीक़ा
- बाहरी लोगों से राजनीतिक संबंध बनाने के लिए
- ★मैदानी ज़मींदारों को अक्सर इन पहाड़ी मुखियाओं को नियमित रूप से ख़िराज देकर शांति ख़रीदनी पड़ती थी; व्यापारी भी इनके नियंत्रित रास्तों के इस्तेमाल की अनुमति हेतु पथकर देते थे — बदले में मुखिया उनकी रक्षा करते और आश्वासन देते कि माल नहीं लूटा जाएगा।
शांति भंग — औपनिवेशिक दृष्टि और नीति★★
- यह ले-देकर की शांति-संधि अठारहवीं सदी के अंतिम दशकों में भंग हो गई — जब स्थायी खेती की सीमाएँ आक्रामक रीति से पूर्वी भारत में बढ़ाई जाने लगीं; अंग्रेज़ों ने जंगलों की कटाई-सफ़ाई को प्रोत्साहित किया; ज़मींदारों और जोतदारों ने परती भूमि को धान के खेतों में बदल दिया।
- अंग्रेज़ों के लिए स्थायी कृषि का विस्तार क्यों आवश्यक: (1) राजस्व के स्रोतों में वृद्धि, (2) निर्यात के लिए फ़सलें, (3) एक स्थायी, सुव्यवस्थित समाज की स्थापना।
- ★★औपनिवेशिक दृष्टि: वे जंगलों को उजाड़ मानते थे और वनवासियों को असभ्य, बर्बर, उपद्रवी और क्रूर — जिन पर शासन करना कठिन था; इसलिए उन्हें लगा कि जंगलों का सफ़ाया करके स्थायी कृषि स्थापित करनी होगी, जंगली लोगों को पालतू व सभ्य बनाना होगा, शिकार छुड़वाकर खेती के लिए राज़ी करना होगा।
- परिणाम — जंगल-चरागाह संकुचित; पहाड़ी लोगों और स्थायी खेतिहरों का झगड़ा तेज़; पहाड़िया लोग बसे गाँवों पर अधिक नियमित हमले करने लगे, अनाज और पशु छीन ले जाते।
1770 का दशक बनाम 1780 का दशक — दो नीतियाँ★★
| दशक | नीति |
|---|---|
| 1770 का दशक | ब्रिटिश अधिकारियों ने पहाड़ियों को निर्मूल कर देने की क्रूर नीति — पहाड़िया लोगों का शिकार और संहार |
| 1780 का दशक | भागलपुर के कलेक्टर ऑगस्टस क्लीवलैंड ने शांति स्थापना की नीति (Pacification) प्रस्तावित — पहाड़िया मुखियाओं को वार्षिक भत्ता; बदले में अपने आदमियों का चाल-चलन ठीक रखने की ज़िम्मेदारी; बस्तियों में व्यवस्था व लोगों में अनुशासन की अपेक्षा |
- ★परिणाम: बहुत से पहाड़िया मुखियाओं ने भत्ता लेने से मना कर दिया; जिन्होंने स्वीकार किया, उनमें से अधिकांश अपने समुदाय में अपनी सत्ता खो बैठे — औपनिवेशिक सरकार के वेतनभोगी बन जाने से उन्हें अधीनस्थ कर्मचारी या वैतनिक मुखिया माना जाने लगा।
- शांति-अभियानों के दौर में पहाड़िया लोग पहाड़ों के भीतरी भागों में चले गए — शत्रुतापूर्ण सैन्यबलों से बचने और बाहरी लोगों से लड़ाई जारी रखने के लिए।
- ★इसीलिए जब 1810-11 की सर्दियों में बुकानन इस क्षेत्र में गया तो पहाड़िया लोगों ने उसे संदेह और अविश्वास से देखा; उनके अनुभवों से बनी धारणा — “प्रत्येक गोरा आदमी एक ऐसी शक्ति का प्रतिनिधित्व कर रहा है जो उनसे उनके जंगल और ज़मीन छीनकर उनकी जीवन-शैली और जीवित रहने के साधनों को नष्ट करने पर उतारू है।”
नया ख़तरा — संथालों का आगमन; कुदाल बनाम हल★★
- इन्हीं दिनों संथाल लोग उस इलाके में बड़ी संख्या में आ रहे थे — जंगलों का सफ़ाया करते, इमारती लकड़ी काटते, ज़मीन जोतते, चावल और कपास उगाते।
- संथालों ने निचली पहाड़ियों पर क़ब्ज़ा किया → पहाड़िया लोगों को राजमहल की पहाड़ियों में और भीतर की ओर पीछे हटना पड़ा।
- ★★प्रतीक-सूत्र (NCERT का): “पहाड़िया लोग अपनी झूम खेती के लिए कुदाल का प्रयोग करते थे; इसलिए यदि कुदाल को पहाड़िया जीवन का प्रतीक माना जाए तो हल को नए बाशिंदों (संथालों) की शक्ति का प्रतिनिधि मानना होगा। हल और कुदाल के बीच की यह लड़ाई बहुत लंबी चली।”
चित्र 9.8–9.9 और ‘रमणीय’ दृष्टि★
- विलियम होजेज (ब्रिटिश कलाकार; कैप्टेन कुक की प्रशांत महासागर की दूसरी समुद्र यात्रा, 1772-75 में शामिल; वहीं से भारत आया) — 1781 में भागलपुर के कलेक्टर ऑगस्टस क्लीवलैंड का मित्र; उसके निमंत्रण पर 1782 में जंगल महालों के भ्रमण पर गया; वहाँ कई एक्वाटिंट बनाए। (📦 बॉक्स: एक्वाटिंट (ताम्रपट्टोत्कीर्णन) — ऐसी तसवीर जो ताम्रपट्टी में अम्ल की सहायता से चित्र के रूप में कटाई करके छापी जाती है।)
- होजेज स्वच्छंदतावाद (Romanticism) से प्रेरित — प्रकृति की पूजा, उसके सौंदर्य एवं शक्ति की प्रशंसा; रूमानी कलाकार मानते थे कि कलाकार प्रकृति के निकट संपर्क में आए, अज्ञात भूदृश्यों को खोजे।
- ★विरोधाभास (NCERT का): “औपनिवेशिक अधिकारी जिन भूदृश्यों को भयंकर तथा उजाड़, उपद्रवी जंगली लोगों का निवास स्थल मानते थे, वे दृश्य होजेज की चित्रकारी में मनमोहक और रमणीय दिखाई देते हैं।”
- 🔎 इन-टेक्स्ट प्रश्न (पृ. 237): होजेज ने राजमहल की पहाड़ियों को किसलिए रमणीय माना था? (पृ. 238): चित्र 9.8-9.9 में जनजातीय मनुष्य और प्रकृति के संबंधों को किस प्रकार दर्शाया गया है? (चित्र 9.9 की टिप्पणी: पहाड़ियाँ वास्तव में कहीं भी 2000 फुट से ऊँची नहीं; होजेज दुर्गमता पर बल देना चाहता है।)
§2.2 संथाल : अगुआ बाशिंदे (पृ. 240–243)
बुकानन का ‘रूपांतरित’ गंजुरिया
- सन् 1810 के अंत में बुकानन ने गंजुरिया पहाड़ (राजमहल शृंखला का भाग) पार किया; चट्टानी प्रदेश से निकलकर एक गाँव पहुँचा — पुराना गाँव, पर खेती की ज़मीन अभी-अभी साफ़ की गई थी; भूदृश्य देखकर उसे लगा कि ‘मानव श्रम के समुचित प्रयोग से’ क्षेत्र की काया पलट गई है। उसने लिखा: “गंजुरिया में अभी-अभी काफ़ी जुताई की गई है जिससे यह पता चलता है कि इसे कितने शानदार इलाक़े में बदला जा सकता है। मैं सोचता हूँ, इसकी सुंदरता और समृद्धि विश्व के किसी भी क्षेत्र जैसी विकसित की जा सकती है।” — ज़मीन चट्टानी पर बहुत बढ़िया; तंबाकू और सरसों ऐसी कि बुकानन ने कहीं नहीं देखी।
- पूछने पर पता चला — यह संथालों का काम था: वे 1800 के आस-पास इस इलाके में आए, पहाड़ी लोगों को नीचे के ढालों से भगा दिया, जंगलों का सफ़ाया किया और वहाँ बस गए।
संथाल राजमहल कैसे पहुँचे?
- संथाल 1780 के दशक के आस-पास बंगाल में आने लगे थे।
- ज़मींदार खेती के लिए नयी भूमि तैयार करने और खेती के विस्तार के लिए उन्हें भाड़े पर रखते थे; ब्रिटिश अधिकारियों ने उन्हें जंगल महालों में बसने का निमंत्रण दिया।
- ★★कारण: जब ब्रिटिश पहाड़ियों को वश में करके स्थायी कृषि के लिए बसाने में असफल रहे तो उनका ध्यान संथालों की ओर गया — पहाड़िया लोग जंगल काटने के लिए हल को हाथ लगाने को तैयार नहीं थे और “अब भी उपद्रवी” व्यवहार करते थे; इसके विपरीत संथाल आदर्श बाशिंदे प्रतीत हुए — उन्हें जंगलों का सफ़ाया करने में कोई हिचक नहीं थी और वे भूमि को पूरी ताक़त लगाकर जोतते थे।
दामिन-इ-कोह (1832)★★
- संथालों को ज़मीनें देकर राजमहल की तलहटी में बसाया गया; 1832 तक ज़मीन के एक काफ़ी बड़े इलाके को दामिन-इ-कोह के रूप में सीमांकित कर दिया गया — इसे संथालों की भूमि घोषित किया गया।
- शर्तें: उन्हें इसी इलाके के भीतर रहना था, हल चलाकर खेती करनी थी और स्थायी किसान बनना था; अनुदान-पत्र की शर्त — दी गई भूमि का कम-से-कम दसवाँ भाग साफ़ करके पहले दस वर्षों के भीतर जोतना था।
- पूरे क्षेत्र का सर्वेक्षण हुआ, नक्शा बना; चारों ओर खंबे गाड़कर परिसीमा निर्धारित — दामिन-इ-कोह को मैदानी स्थायी कृषकों की दुनिया से और पहाड़िया लोगों की पहाड़ियों से अलग कर दिया गया।
विस्तार के आँकड़े★
| सूचक | 1838 | 1851 |
|---|---|---|
| संथालों के गाँव | 40 | 1,473 |
| संथाल जनसंख्या | 3,000 | 82,000 से अधिक |
- खेती के विस्तार के साथ कंपनी की तिजोरियों में राजस्व-वृद्धि।
- उन्नीसवीं शताब्दी के संथाल गीतों और मिथकों में उनकी यात्रा के लंबे इतिहास का बार-बार उल्लेख — वे बसने योग्य स्थान की खोज में बिना थके चलते ही रहते थे; दामिन-इ-कोह में आकर मानो उनकी इस यात्रा को पूर्ण विराम लग गया।
पहाड़िया लोगों पर प्रभाव★★
- संथालों के बसने पर पहाड़िया लोगों ने प्रतिरोध किया पर अंततोगत्वा पहाड़ियों के और भीतर चले जाने को मजबूर हुए; निचली पहाड़ियों व घाटियों में नीचे की ओर आने से रोक दिया गया; चट्टानी, अधिक बंजर ऊपरी पहाड़ियों व भीतरी शुष्क भागों तक सीमित।
- परिणाम: रहन-सहन पर बुरा प्रभाव; आगे चलकर गरीब हो गए। ★कारण-तर्क: झूम खेती नयी-से-नयी ज़मीनें खोजने और भूमि की प्राकृतिक उर्वरता के उपयोग की क्षमता पर निर्भर रहती है; सर्वाधिक उर्वर ज़मीनें अब उनके लिए दुर्लभ — वे दामिन का हिस्सा बन चुकी थीं; अत: पहाड़िया खेती के अपने तरीक़े को आगे सफलतापूर्वक नहीं चला सके; जंगल साफ़ हो जाने पर पहाड़िया शिकारियों को भी समस्याएँ।
- इसके विपरीत संथालों ने खानाबदोश ज़िंदगी छोड़ दी; एक जगह बस गए; बाज़ार के लिए वाणिज्यिक फ़सलों की खेती और व्यापारियों-साहूकारों से लेन-देन करने लगे।
संथालों का मोहभंग — विद्रोह के कारण★★
- संथालों को जल्दी समझ आया — जिस ज़मीन पर उन्होंने खेती शुरू की थी, वह उनके हाथों से निकलती जा रही है:
- राज्य — संथालों की साफ़ की गई ज़मीन पर भारी कर
- साहूकार (दिकू) — बहुत ऊँची दर पर ब्याज; कर्ज़ अदा न होने पर ज़मीन पर क़ब्ज़ा
- ज़मींदार — दामिन क्षेत्र पर अपने नियंत्रण का दावा
- ★★1850 के दशक तक संथाल यह महसूस करने लगे कि अपने लिए एक आदर्श संसार — जहाँ उनका अपना शासन हो — के निर्माण के लिए ज़मींदारों, साहूकारों और औपनिवेशिक राज के विरुद्ध विद्रोह करने का समय अब आ गया है।
- ★संथाल विद्रोह (1855-56) के बाद संथाल परगना का निर्माण — भागलपुर और बीरभूम ज़िलों में से 5,500 वर्ग मील क्षेत्र लेकर; औपनिवेशिक राज को आशा — नया परगना बनाने और कुछ विशेष क़ानून लागू करने से संथाल संतुष्ट हो जाएँगे।
- चित्र 9.11 — सिधू मांझी, संथाल विद्रोह का नेता।
चित्रों की राजनीति (चित्र 9.10, 9.12–9.14 — इलस्ट्रेटेड लंदन न्यूज़, 1856)★
- 9.10 — शांत-नीरव पहाड़ी ग्राम (वाल्टर शेरविल, 1850 के दशक का प्रारंभ)। 9.12 — संथाल, ब्रिटिश सिपाहियों से युद्ध करते हुए (23 फ़रवरी 1856) — “इस विद्रोह ने संथालों के प्रति ब्रिटिश धारणा को बदल दिया। जो गाँव पहले नीरव एवं शांत दिखाई देते थे अब नृशंस एवं बर्बरतापूर्ण कृत्यों के स्थान बन गए।”
- 9.13 — संथालों के गाँव जल रहे हैं — विद्रोह कुचले जाने के बाद छानबीन, संदिग्ध पकड़े गए, गाँवों में आग लगा दी गई; जलते गाँवों के चित्र ब्रिटेन में गर्वपूर्वक दिखाए गए — यह दर्शाने के लिए कि ब्रिटिश कितने शक्तिशाली हैं और विद्रोह कुचलने में कितने सक्षम।
- 9.14 — संथाल कैदियों को ले जाया जा रहा है — बीचों-बीच ब्रिटिश अधिकारी हाथी पर विजयगर्वित; घोड़े पर बैठा अधिकारी हुक्का गुड़गुड़ा रहा है — संदेश: परेशानी का समय ख़त्म, विद्रोह कुचल दिया गया; विद्रोही जंज़ीरों से बँधे; ऐसी तसवीरें ब्रिटिश हुकूमत को अजेय दर्शाती थीं।
- 🔎 इन-टेक्स्ट प्रश्न (पृ. 243): “कल्पना कीजिए कि आप ‘इलस्ट्रेटेड लंडन न्यूज़’ के पाठक हैं। चित्र 9.12, 9.13 और 9.14 में चित्रित दृश्यों के प्रति आपकी प्रतिक्रिया क्या होगी? इन चित्रों से आपके मन में संथालों की क्या-क्या छवि बनती है?”
§2.3 बुकानन का विवरण (पृ. 243–245)
बुकानन कौन था?(📦 बॉक्स, पृ. 236)★★
- फ्रांसिस बुकानन — एक चिकित्सक; भारत आकर बंगाल चिकित्सा सेवा में कार्य (1794–1815)।
- कुछ वर्षों तक भारत के गवर्नर जनरल लॉर्ड वेलेज़्ली का शल्य-चिकित्सक।
- कलकत्ता प्रवास के दौरान कलकत्ता में एक चिड़ियाघर की स्थापना की जो कलकत्ता अलीपुर चिड़ियाघर कहलाया; थोड़े समय वानस्पतिक उद्यान (Botanical Gardens) के प्रभारी।
- बंगाल सरकार के अनुरोध पर उसने कंपनी के अधिकार-क्षेत्र में आने वाली भूमि का विस्तृत सर्वेक्षण किया।
- 1815 में बीमार होकर इंग्लैंड लौटे; माता की मृत्यु के बाद जायदाद के वारिस बने और उनके वंश-नाम ‘हैमिल्टन’ को अपनाया — इसीलिए अक्सर बुकानन-हैमिल्टन कहा जाता है।
बुकानन की यात्राओं की असलियत★★
- हम बुकानन के विवरण को जानकारी का आधार मान रहे हैं — लेकिन यह न भूलें कि वह ईस्ट इंडिया कंपनी का एक कर्मचारी था:
- उसकी यात्राएँ केवल भूदृश्यों के प्यार और अज्ञात की खोज से प्रेरित नहीं थीं
- वह नक्शा नवीसों, सर्वेक्षकों, पालकी उठाने वालों, कुलियों आदि के बड़े दल के साथ चलता था
- यात्रा-ख़र्च कंपनी उठाती थी — क्योंकि उसे उन सूचनाओं की आवश्यकता थी
- उसे साफ़-साफ़ हिदायत दी जाती थी कि क्या देखना, खोजना और लिखना है
- जब भी वह फ़ौज के साथ किसी गाँव में आता, तत्काल सरकार के एक एजेंट के रूप में देखा जाता
- ★कंपनी की प्राकृतिक-संसाधन खोज: शक्ति सुदृढ़ करने के बाद कंपनी उन प्राकृतिक साधनों की खोज में जुट गई जिन पर क़ब्ज़ा कर मनचाहा उपयोग कर सके; परिदृश्यों व राजस्व-स्रोतों का सर्वेक्षण, खोज यात्राएँ, सूचना के लिए भूविज्ञानियों, भूगोलवेत्ताओं, वनस्पति विज्ञानियों, चिकित्सकों को भेजा।
- बुकानन के प्रेक्षण: असाधारण प्रेक्षण-शक्ति; जहाँ भी गया — पत्थर, चट्टानें, मिट्टी की परतें; वाणिज्यिक दृष्टि से मूल्यवान पत्थरों-खनिजों की खोज; लौह खनिज, अबरक, ग्रेनाइट, साल्टपीटर के सभी स्थानों का पता; नमक बनाने और कच्चा लोहा निकालने की स्थानीय पद्धतियों का निरीक्षण।
- ★★विकास-दृष्टि: भूदृश्य के बारे में लिखते समय वह प्राय: यह भी लिखता था कि उसमें फेरबदल करके उसे अधिक उत्पादक कैसे बनाया जा सकता है — कौन-सी फ़सलें बोई जा सकती हैं, कौन-से पेड़ काटे और कौन-से उगाए जा सकते हैं। उसकी प्राथमिकताएँ स्थानीय निवासियों से भिन्न थीं — उसका आकलन कंपनी के वाणिज्यिक सरोकारों और प्रगति की आधुनिक पाश्चात्य विचारधारा से निर्धारित होता था। वह अनिवार्य रूप से वनवासियों की जीवन-शैली का आलोचक था और महसूस करता था कि वनों को कृषि भूमि में बदलना ही होगा।
स्रोत 3 (पृ. 244): “संथालों के बारे में बुकानन के विचार”
“नयी ज़मीनें साफ़ करने में वे बहुत होशियार होते हैं लेकिन नीचता से रहते हैं। उनकी झोपड़ियों में कोई बाड़ नहीं होती और दीवारें सीधी खड़ी की गई छोटी-छोटी सटी हुई लकड़ियों की बनी होती हैं जिन पर भीतर की ओर लेप (पलस्तर) लगा होता है। झोपड़ियाँ छोटी और मैली-कुचैली होती हैं; उनकी छत सपाट होती है, उनमें उभार बहुत कम होता है।” ★सूक्ष्म पाठ: एक ही वाक्य में प्रशंसा (“बहुत होशियार” — श्रम-उपयोगिता) और घृणा (“नीचता से रहते”) — उपयोगिता की दृष्टि से देखा गया मनुष्य।
स्रोत 4 (पृ. 244): “कडुआ के पास की चट्टानें”
बुकानन की पत्रिका ऐसे प्रेक्षणों से भरी पड़ी है: “आगे लगभग एक मील चलने के बाद मैं चट्टानों के एक शिलाफलक पर आ गया, जिसका कोई यह एक छोटा दानेदार ग्रेनाइट है जिसमें लाल-लाल फेल्डस्पार, क्वार्ट्ज़ और काला अबरक लगा है… वहाँ से आधा मील से अधिक की दूरी पर मैं एक अन्य चट्टान पर आया वह भी स्तरहीन थी और उसमें बारीक कणों वाला ग्रेनाइट था जिसमें पीला-सा फेल्डस्पार, सफ़ेद-सा क्वार्ट्ज़ और काला अबरक था।” ★सूक्ष्म पाठ: डायरी का यह ‘नीरस’ भूविज्ञान ही कंपनी की असली रुचि है — खनिज-सर्वेक्षण।
स्रोत 5 (पृ. 245): “वनों की बटाई और स्थायी कृषि के बारे में”★
निचली राजमहल पहाड़ियों के एक गाँव से गुज़रते हुए: “इस प्रदेश का दृश्य बहुत ही बढ़िया है; यहाँ की खेती विशेष रूप से — घुमावदार संकरी घाटियों में धान की फ़सल, बिखरे हुए पेड़ों के साथ साफ़ की गई जमीन, और चट्टानी पहाड़ियाँ सभी अपने आप में पूर्ण हैं; कमी है तो बस इस क्षेत्र में कुछ प्रगति की और विस्तृत तथा उन्नत खेती की, जिनके लिए यह प्रदेश अत्यंत संवेदनशील है। यहाँ लकड़ी की जगह टसर और लाख के लिए आवश्यकतानुसार बड़े-बड़े बागान लगाए जा सकते हैं; बाक़ी जंगल को भी साफ़ किया जा सकता है, और जो भाग इस प्रयोजन के लिए उपयुक्त न हो वहाँ पनई ताड़ और महुआ के पेड़ लगाए जा सकते हैं।”
🗣️ चर्चा कीजिए (पृ. 245): “बुकानन का वर्णन विकास के संबंध में उसके विचारों के बारे में क्या बतलाता है? उद्धरणों से उदाहरण देते हुए अपनी दलील पेश कीजिए। यदि आप एक पहाड़िया वनवासी होते तो उसके इन विचारों के प्रति आपकी प्रतिक्रिया क्या होती?” शिक्षक-संकेत: बुकानन के लिए ‘सुंदर’ वही है जो उत्पादक हो; जंगल = ‘कमी’, सफ़ाया = ‘प्रगति’; पहाड़िया के लिए वही जंगल पहचान, भोजन, जीवन — दृष्टि-भेद ही उपनिवेशवाद का सांस्कृतिक चेहरा है।
§3. देहात में विद्रोह : बम्बई दक्कन (पृ. 245–254)
- परिवर्तनों को जानने का एक तरीक़ा — किसान विद्रोहों पर ध्यान केंद्रित करना: विद्रोही जिसे अन्याय समझते हैं, उसके ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करते हैं; नाराज़गी के आधारभूत कारणों और गुस्से की परतों को उधेड़ने से उनके जीवन और अनुभव की झलक मिलती है जो अन्यथा छिपी रहती।
- विद्रोहों के बारे में अभिलेख भी उपलब्ध होते हैं — राज्य के प्राधिकारी विद्रोह को दबाने के साथ-साथ जानने-बूझने और कारणों की जाँच की कोशिश करते हैं ताकि नीतियाँ बन सकें — ऐसी जाँच-पड़ताल से साक्ष्य उत्पन्न होता है।
§3.1 लेखा बहियाँ जला दी गईं (पृ. 246)
- उन्नीसवीं शताब्दी में भारत के विभिन्न प्रांतों के किसानों ने साहूकारों और अनाज के व्यापारियों के विरुद्ध अनेक विद्रोह किए — ऐसा ही एक दक्कन में 1875 में।
- आंदोलन का आरंभ — पूना (आधुनिक पुणे) ज़िले के एक बड़े गाँव सूपा में; सूपा एक विपणन केंद्र (मंडी) — अनेक व्यापारी और साहूकार वहाँ रहते थे।
- ★12 मई 1875: आस-पास के ग्रामीण इलाकों के रैयत (किसान) इकट्ठे हुए; साहूकारों से उनके बही-खातों और ऋणबंधों की माँग करते हुए हमला बोला; बही-खाते जला दिए, अनाज की दुकानें लूट लीं, कुछ मामलों में साहूकारों के घरों में आग लगा दी।
- फैलाव: पूना से अहमदनगर; फिर अगले दो महीनों में और फैलती गई — 6,500 वर्ग किलोमीटर का इलाका चपेट में; तीस से अधिक गाँव कुप्रभावित। ★सब जगह विद्रोह का स्वरूप एक-समान: साहूकारों पर हमला, बही-खाते जलाए गए, ऋणबंध नष्ट; घबराए साहूकार गाँव छोड़कर भागे — अधिकतर मामलों में संपत्ति और धन-दौलत पीछे छोड़कर।
- ब्रिटिश प्रतिक्रिया: अधिकारियों की आँखों के सामने 1857 का गदर का दृश्य (अध्याय 10 देखिए); विद्रोही किसानों के गाँवों में पुलिस थाने; सेनाएँ बुलाई गईं; 95 व्यक्ति गिरफ़्तार, बहुतों को दंडित; पर देहात को काबू करने में कई महीने लगे।
स्रोत 6 (पृ. 246): “उस दिन सूपा में”★
16 मई 1875 को पूना के ज़िला मजिस्ट्रेट ने पुलिस आयुक्त को लिखा: “शनिवार दिनांक 15 मई को सूपा में आने पर मुझे इस उपद्रव का पता चला। एक साहूकार का घर पूरी तरह जला दिया गया; लगभग एक दर्जन मकानों को तोड़ दिया गया… खाते पत्र, बांड, अनाज, देहाती कपड़ा सड़कों पर लाकर जला दिया गया, जहाँ राख के ढेर अब भी देखे जा सकते हैं… मुख्य कांस्टेबल ने 50 लोगों को गिरफ़्तार किया। लगभग 2000 रु. का चोरी का माल छुड़ा लिया गया। अनुमानत: 25,000 रु. से अधिक की हानि हुई। साहूकारों का दावा है कि 1 लाख रु. से ज़्यादा का नुक़सान हुआ है।” — दक्कन दंगा आयोग
- (📦 बॉक्स: साहूकार — ऐसा व्यक्ति जो पैसा उधार भी देता था और साथ ही व्यापार भी करता था।)
स्रोत 7 (पृ. 246): “समाचारपत्र में छपी रिपोर्ट”
‘रैयत और साहूकार’ शीर्षक रिपोर्ट — 6 जून 1876 के ‘नेटिव ओपिनियन’ समाचार पत्र में छपी, मुंबई के नेटिव न्यूज़पेपर्स की रिपोर्ट में उद्धृत: “वे (रैयत) सर्वप्रथम अपने गाँवों की सीमाओं पर यह देखने के लिए जासूसी करते हैं कि क्या कोई सरकारी अधिकारी आ रहा है… फिर वे झुंड बनाकर अपने ऋणदाताओं के घर जाते हैं और उनसे उनके ऋणपत्र और अन्य दस्तावेज़ माँगते हैं और इनकार करने पर ऋणदाताओं पर हमला करके छीन लेते हैं। यदि कोई सरकारी अधिकारी उन गाँवों की ओर आता दिखाई दे जाता है तो गुप्तचर अपराधियों को इसकी ख़बर पहुँचा देते हैं और अपराधी समय रहते ही तितर-बितर हो जाते हैं।” 🔎 इन-टेक्स्ट प्रश्न: “लेखक द्वारा प्रयुक्त भाषा या शब्दावली से अकसर उसके पूर्वाग्रहों का पता चल जाता है; स्रोत 7 को सावधानीपूर्वक पढ़िए और उन शब्दों को छाँटिए जिनसे लेखक के पूर्वाग्रह का पता चलता है। चर्चा कीजिए कि उस इलाके का रैयत उसी स्थिति का किन शब्दों में वर्णन करता होगा।” संकेत: “जासूसी”, “अपराधी”, “गुप्तचर” — रैयत पहले से दोषी मान लिए गए हैं; रैयत इसे शायद “अपने दस्तावेज़ वापस लेना”, “न्याय” कहता।
§3.2 एक नयी राजस्व प्रणाली (पृ. 247–248)
इस्तमरारी बंदोबस्त बंगाल से बाहर क्यों नहीं?
- ★1810 के बाद कृषि-कीमतें बढ़ीं → उपज के मूल्य में वृद्धि → बंगाल के ज़मींदारों की आमदनी में इज़ाफ़ा — पर राजस्व माँग स्थायी होने से औपनिवेशिक सरकार इस बढ़ी आय में हिस्से का दावा नहीं कर सकती थी; वित्तीय संसाधन बढ़ाने की उत्कट इच्छा में सरकार को भू-राजस्व अधिकतम करने के तरीक़े सोचने पड़े → 19वीं शताब्दी में नए विजित प्रदेशों में अस्थायी (Temporary) राजस्व बंदोबस्त।
- ★★वैचारिक कारण — रिकार्डो के सिद्धांत: अधिकारी नीतियाँ बनाते समय उन आर्थिक सिद्धांतों से प्रभावित रहते हैं जिनसे परिचित होते हैं; 1820 के दशक तक इंग्लैंड में डेविड रिकार्डो जाने-माने अर्थशास्त्री; औपनिवेशिक अधिकारियों ने महाविद्यालयी जीवन में रिकार्डो पढ़ा था; महाराष्ट्र में 1820 के दशक में प्रारंभिक बंदोबस्त करते समय वे इन्हीं विचारों के अनुसार चले।
- रिकार्डो का विचार: भूस्वामी को उस समय लागू ‘औसत लगान’ प्राप्त करने का ही हक़; भूमि से ‘औसत लगान’ से अधिक प्राप्ति होने पर भूस्वामी को अधिशेष आय होगी जिस पर सरकार को कर लगाना होगा; यदि कर नहीं लगाया गया तो किसान किरायाजीवी (Rentier) में बदल जाएँगे और उनकी अधिशेष आय भूमि-सुधार में उत्पादक रीति से निवेश नहीं होगी। (📦 बॉक्स: किरायाजीवी — जो अपनी संपत्ति के किराए की आय पर जीवनयापन करते हैं।)
- भारत में अनेक ब्रिटिश अधिकारियों को लगा — बंगाल के इतिहास ने रिकार्डो की पुष्टि कर दी है: वहाँ ज़मींदार किरायाजीवी बन गए प्रतीत हुए — ज़मीनें पट्टे पर दे दीं और किराये की आमदनी पर निर्भर रहने लगे → अत: भिन्न राजस्व प्रणाली आवश्यक।
रैयतवाड़ी प्रणाली★★
- बम्बई दक्कन में लागू प्रणाली — रैयतवाड़ी:
- राजस्व की राशि सीधे रैयत के साथ तय
- भिन्न-भिन्न प्रकार की भूमि से होने वाली औसत आय का अनुमान
- रैयत की राजस्व अदा करने की क्षमता का आकलन
- सरकार के हिस्से के रूप में उसका एक अनुपात निर्धारित
- ★हर 30 साल के बाद ज़मीनों का फिर से सर्वेक्षण; राजस्व-दर तदनुसार बढ़ा दी जाती → राजस्व माँग अब चिरस्थायी नहीं रही
§3.3 राजस्व की माँग और किसान का कर्ज़ (पृ. 248–249)
- बम्बई दक्कन में पहला राजस्व बंदोबस्त 1820 के दशक में; माँगा गया राजस्व इतना अधिक कि बहुत से स्थानों पर किसान गाँव छोड़कर नए क्षेत्रों में चले गए; घटिया ज़मीन व अनिश्चित वर्षा वाले इलाकों में समस्या विकट; वर्षा न होने और फ़सल ख़राब होने पर राजस्व अदा करना असंभव।
- ★फिर भी कलेक्टर कार्यकुशलता दिखाने और बड़े अधिकारियों को प्रसन्न करने के लिए कठोरतापूर्वक वसूली करते; भुगतान न कर पाने पर फ़सलें ज़ब्त, समूचे गाँव पर जुर्माना।
- 1830 का दशक — संकट गहराया: 1832 के बाद कृषि-उत्पादों की क़ीमतों में तेज़ गिरावट — लगभग डेढ़ दशक सुधार नहीं → किसानों की आय में और गिरावट; ★1832-34 के अकाल में देहात बरबाद — दक्कन का एक-तिहाई पशुधन मौत के मुँह में; आधी मानव जनसंख्या काल का ग्रास; बचे लोगों के पास खाद्यान्न नहीं; राजस्व की बकाया राशियाँ आसमान छूने लगीं।
- कर्ज़-चक्र: जीवित रहने, राजस्व अदा करने, हल-बैल ख़रीदने, बच्चों की शादियाँ — सबके लिए पैसा उधार लेने के सिवा चारा नहीं; एक बार ऋण लेने पर वापस करना कठिन; कर्ज़ बढ़ता गया, बकाया रहा, ऋणदाताओं पर निर्भरता बढ़ती गई; रोज़मर्रा की ज़रूरतों और उत्पादन-ख़र्च तक के लिए कर्ज़; ★1840 के दशक तक अधिकारियों को सब जगह किसानों के कर्ज़ के बोझ तले दबे होने के साक्ष्य मिलने लगे।
- 1840 के दशक के मध्य से पुनरुत्थान: अधिकारियों ने महसूस किया कि 1820 के दशक के बंदोबस्त कठोरतापूर्ण थे — माँग बहुत ज़्यादा, व्यवस्था कठोर एवं लचकहीन; खेती के विस्तार को प्रोत्साहन देने के लिए माँग कुछ हलकी; ★1845 के बाद कृषि-कीमतें शनै: शनै: बढ़ीं; किसान कृषि-क्षेत्र बढ़ाने लगे — नए-नए इलाकों में जाकर गोचर भूमियों को कृषि भूमि में बदलने लगे; पर विस्तार के लिए चाहिए थे अधिक हल-बैल, बीज और ज़मीन के लिए पैसे → फिर ऋणदाताओं के पास।
§3.4 फिर कपास में तेज़ी आई (पृ. 249–251)
- पृष्ठभूमि: 1860 के दशक से पहले ब्रिटेन में आयातित समस्त कपास का तीन-चौथाई भाग अमेरिका से; ब्रिटिश सूती-वस्त्र निर्माता इस निर्भरता से परेशान — “अगर यह स्रोत बंद हो गया तो हमारा क्या होगा?”
- 1857 — ब्रिटेन में कपास आपूर्ति संघ (Cotton Supply Association); 1859 — मैनचेस्टर कॉटन कंपनी; उद्देश्य — “दुनिया के हर भाग में कपास के उत्पादन को प्रोत्साहित करना।” भारत ऐसा देश समझा गया जो अमेरिकी आपूर्ति बंद होने पर लंकाशायर को कपास भेज सकेगा — भूमि, जलवायु उपयुक्त; सस्ता श्रम उपलब्ध।
- ★★1861 — अमेरिकी गृहयुद्ध: ब्रिटेन के कपास-क्षेत्र में तहलका; अमेरिका से आयात सामान्य मात्रा के 3 प्रतिशत से भी कम: 1861 में 20 लाख गाँठें (हर गाँठ 400 पाउंड) → 1862 में केवल 55 हज़ार गाँठें।
- भारत आदि देशों को व्यग्रता-भरे संदेश — ब्रिटेन को अधिक कपास निर्यात करो; बम्बई में कपास के सौदागरों ने कपास-ज़िलों के दौरे किए; कीमतों में उछाल (चित्र 9.15) → बम्बई के निर्यातक अधिक-से-अधिक कपास ख़रीदने की कोशिश में — उन्होंने शहरी साहूकारों को अग्रिम राशियाँ दीं, जो आगे ग्रामीण ऋणदाताओं को देते, जिन्होंने उपज उपलब्ध कराने का वचन दिया था।
- ★दक्कन के गाँवों पर असर: रैयतों को अचानक असीमित ऋण उपलब्ध; कपास उगाई जाने वाली प्रत्येक एकड़ के लिए 100 रु. अग्रिम; साहूकार दीर्घावधिक ऋण देने को तैयार।
- विस्तार: 1860-64 के दौरान कपास उगाने वाले एकड़ों की संख्या दोगुनी; ★1862 तक ब्रिटेन के कुल कपास-आयात का 90 प्रतिशत भाग अकेले भारत से।
- ★पर लाभ सबको नहीं: “कुछ धनी किसानों को तो लाभ अवश्य हुआ, लेकिन अधिकांश किसान कर्ज़ के बोझ से और अधिक दब गए।”
§3.5 ऋण का स्रोत सूख गया (पृ. 252)
- तेज़ी के दिनों में भारतीय कपास-व्यापारी अमेरिका को स्थायी रूप से विस्थापित कर विश्व-बाज़ार पर क़ब्ज़े के सपने देखने लगे; 1861 में बॉम्बे गजट के संपादक ने पूछा — “दास राज्यों (संयुक्त राज्य अमेरिका) को विस्थापित करके, लंकाशायर को कपास का एकमात्र आपूर्तिकर्ता बनने से भारत को कौन रोक सकता है?”
- ★1865 तक सपने समाप्त: गृहयुद्ध ख़त्म → अमेरिका में उत्पादन फिर चालू → ब्रिटेन के भारतीय कपास-निर्यात में गिरावट।
- महाराष्ट्र में: निर्यात-व्यापारी और साहूकार अब दीर्घावधिक ऋण देने के इच्छुक नहीं; भारतीय कपास की माँग घटती और कीमतें गिरती देख उन्होंने कार्य-व्यवहार बंद करने, किसानों को अग्रिम राशियाँ प्रतिबंधित करने और बकाया ऋणों की वापसी माँगने का निर्णय लिया।
- ★★दोहरी मार: एक ओर ऋण का स्रोत सूख गया, दूसरी ओर राजस्व की माँग बढ़ा दी गई — पहला बंदोबस्त 1820-30 के दशकों में हुआ था; अब अगला बंदोबस्त — नयी माँग नाटकीय ढंग से 50 से 100 प्रतिशत तक बढ़ा दी गई। “भला, बेचारे रैयत उस हालत में, जबकि क़ीमतें गिर रही थीं और कपास के खेत गायब हो रहे थे, इस बढ़ी हुई माँग को कैसे पूरा कर सकते थे?” → फिर ऋणदाता की शरण — पर ऋणदाता ने अबकी बार ऋण देने से इनकार कर दिया; उसे रैयत की ऋण-वापसी की क्षमता में विश्वास नहीं रहा।
§3.6 अन्याय का अनुभव (पृ. 252–254)
- ऋण देने से इनकार पर रैयत समुदाय क्रुद्ध — इसलिए नहीं कि वे कर्ज़ में डूबे थे या ऋणदाता पर निर्भर थे, ★★बल्कि इस बात से ज़्यादा नाराज़ थे कि ऋणदाता वर्ग इतना संवेदनहीन हो गया कि उनकी हालत पर कोई तरस नहीं खा रहा था; ऋणदाता देहात के प्रथागत मानकों यानी रूढ़ि रिवाजों का उल्लंघन कर रहे थे।
- ★प्रथागत मानक: पैसा उधार देने का कारोबार औपनिवेशिक शासन से पहले भी फैला था; ऋणदाता ताकतवर होते थे; पर प्रथागत मानक ऋणदाता-रैयत संबंधों को विनियमित करते थे — एक सामान्य मानक: ब्याज मूलधन से अधिक नहीं लिया जा सकता था — इसका प्रयोजन जबरन वसूली को सीमित करना और ‘उचित ब्याज’ परिभाषित करना था।
- ★औपनिवेशिक शासन में इस नियम की धज्जियाँ: दक्कन दंगा आयोग द्वारा जाँचे एक मामले में ऋणदाता ने 100 रु. के मूलधन पर 2,000 रु. से भी अधिक ब्याज लगा रखा था; असंख्य याचिकाओं में रैयतों ने ऐसी जबरन वसूलियों और प्रथाओं के उल्लंघन की शिकायत की।
1859 का परिसीमन क़ानून (Limitation Law) और उसका उलटा असर★★
- 1859 में अंग्रेज़ों ने एक परिसीमन क़ानून पारित किया: ऋणदाता और रैयत के बीच हस्ताक्षरित ऋणपत्र केवल तीन वर्षों के लिए ही मान्य होंगे — उद्देश्य: बहुत समय तक ब्याज को संचित होने से रोकना।
- ★ऋणदाता ने क़ानून को घुमाकर अपने पक्ष में कर लिया: रैयत से हर तीसरे साल एक नया बंधपत्र भरवाने लगा — नए बांड में न चुकाई गई शेष राशि (मूलधन + संपूर्ण संचित ब्याज) को मूलधन के रूप में दर्ज किया जाता और उस पर नए सिरे से ब्याज।
- ऋणदाताओं के हथकंडे (याचिकाओं से): ऋण चुकाने पर रसीद देने से इनकार; बंधपत्रों में जाली आंकड़े; किसानों की फ़सल नीची क़ीमतों पर ले लेना; आख़िरकार किसानों की धन-संपत्ति पर ही क़ब्ज़ा।
दस्तावेज़ों का आतंक★★
- तरह-तरह के दस्तावेज़ और बंधपत्र नयी अत्याचारपूर्ण प्रणाली के प्रतीक बन गए; पहले ऐसे दस्तावेज़ बहुत कम होते थे।
- ब्रिटिश अधिकारी अनौपचारिक समझौतों को संदेह की दृष्टि से देखते थे — उनके विचार से लेन-देन की शर्तें, संविदाएँ, दस्तावेज़ साफ़, सुस्पष्ट और सुनिश्चित शब्दों में हों और विधिसम्मत हों; जब तक संविदा क़ानून की दृष्टि से प्रवर्तनीय न हो, उसका कोई मूल्य नहीं।
- ★किसान समझने लगे कि उनके जीवन के सारे दु:ख-तकलीफ़ बंधपत्रों और दस्तावेज़ों की इस नयी व्यवस्था के कारण ही हैं: उनसे हस्ताक्षर/अँगूठे के निशान करा लिए जाते पर उन्हें पता नहीं चलता कि किस पर हस्ताक्षर कर रहे हैं; ऋणदाता जो खंड लिख देते, उनका कुछ पता नहीं; वे हर लिखे शब्द से डरने लगे — मगर लाचार थे: जीवित रहने के लिए ऋण चाहिए था, और ऋणदाता क़ानूनी दस्तावेज़ों के बिना ऋण देने को तैयार नहीं थे।
स्रोत 8 (पृ. 252): “रैयत अर्जी”★
करजत तालुके के मीरगाँव के एक रैयत द्वारा कलेक्टर, अहमदनगर (दक्कन दंगा आयोग) को दी गई याचिका: “साहूकार लोग काफी दिनों से हम पर अत्याचार कर रहे हैं… हम उनसे पैसा, कपड़ा और अनाज माँगने के लिए मजबूर हो गए हैं… वे हमें कड़ी शर्तों पर बंधपत्र लिखने के लिए मजबूर करते हैं… हमसे जो कीमतें माँगी जाती हैं वह नकदी कीमत चुकाने वाले ग्राहकों की अपेक्षा आमतौर पर 25 से 50 प्रतिशत (अधिक) होती हैं… हमारे खेतों की उपज भी साहूकार ले जाते हैं; उपज ले जाते समय तो वे हमें यह आश्वासन देते हैं कि इसकी कीमत हमारे खाते में जमा कर दी जाएगी लेकिन वे हमारे खातों में ऐसा कोई उल्लेख नहीं करते। वे जब हमारी उपज ले जाते हैं तो बदले में कोई रसीद भी नहीं देते।” 🔎 इन-टेक्स्ट प्रश्न: “रैयत अपनी अर्जी में क्या शिकायत कर रहा है? ऋणदाता द्वारा किसान से ले जाई जाने वाली फसल उसके खाते में क्यों नहीं चढ़ाई जाती? किसानों को कोई रसीद क्यों नहीं दी जाती? यदि आप ऋणदाता होते तो इन व्यवहारों के लिए आप क्या-क्या कारण देते?”
स्रोत 9 (पृ. 253): “भाड़ा-पत्र”★
कर्ज़-भार से दबे किसान के पास ज़मीन, गाड़ियाँ, पशुधन देने के सिवा चारा नहीं; पर पशुओं के बिना खेती कैसे? → उसने ज़मीन और पशु भाड़े पर ले लिए — अब उसे उन्हीं पशुओं के लिए, जो मूल रूप से उसके अपने ही थे, भाड़ा चुकाना पड़ता था; उसे एक भाड़ा-पत्र (किरायानामा) लिखना पड़ता था जिसमें साफ़ कहा जाता कि ये पशु और गाड़ियाँ उसकी अपनी नहीं हैं; विवाद छिड़ने पर ये दस्तावेज़ न्यायालयों में मान्य होते थे। नवंबर 1873 में एक किसान द्वारा हस्ताक्षरित नमूना (दक्कन दंगा आयोग के अभिलेखों से): “मैंने आपको देय ऋण के खाते में, आपको अपनी लोहे की धुरों वाली दो गाड़ियाँ, साज-समान और चार बैलों के साथ बेची हैं… मैंने इस दस्तावेज़ के तहत उन्हीं दो गाड़ियों और चार बैलों को आपसे भाड़े पर लिया है। मैं हर माह आपको चार रुपए प्रतिमाह की दर से उनका किराया (भाड़ा) दूँगा…” 🔎 इन-टेक्स्ट प्रश्न: “उन सभी वचनबद्धताओं की सूची बनाइए जो किसान इस दस्तावेज़ में दे रहा है। ऐसा कोई दस्तावेज़ हमें किसान और ऋणदाता के बीच के संबंधों के बारे में क्या बताता है? इससे किसान और बैलों (जो पहले उसी के थे) के बीच के संबंधों में क्या अंतर आएगा?”
स्रोत 10 (पृ. 254): “कर्ज़ कैसे बढ़ते गए”★
एक रैयत की याचिका — ऋणों की प्रणाली कैसे काम करती थी: “एक साहूकार अपने कर्ज़दार को एक बंधपत्र के आधार पर 100 रु. की रकम 3-2 आने प्रतिशत की मासिक दर पर उधार देता है… तीन साल बाद साहूकार मूलधन तथा ब्याज दोनों को मिलाकर बनी राशि (मिश्रधन) के लिए एक अन्य बांड उसी ब्याज दर से लिखवा लेता है… (यह प्रक्रिया बार-बार दोहराई जाती है)… 12 वर्ष के अंत में… 1000 रु. की राशि पर उसका कुल ब्याज 2,028 रु. 10 आना 3 पैसे हो जाता है।” 🔎 इन-टेक्स्ट प्रश्न: “ब्याज की उस मद का हिसाब लगाइए जो रैयत इन वर्षों में दे रहा था।” — चक्रवृद्धि की मार: 12 वर्षों में ब्याज मूलधन के दुगुने से अधिक।
§4. दक्कन दंगा आयोग (पृ. 255)
- विद्रोह फैलने पर प्रारंभ में बम्बई की सरकार उसे गंभीरता से लेने को तैयार नहीं थी; लेकिन भारत सरकार ने — जो 1857 की याद से चिंतित थी — बम्बई सरकार पर दबाव डाला कि वह दंगों के कारणों की छानबीन के लिए एक जाँच आयोग बैठाए; आयोग ने रिपोर्ट तैयार की जो 1878 में ब्रिटिश पार्लियामेंट में पेश की गई।
- दक्कन दंगा रिपोर्ट इतिहासकारों को दंगों के अध्ययन की आधार सामग्री देती है: आयोग ने दंगा-पीड़ित ज़िलों में जाँच; रैयत वर्गों, साहूकारों और चश्मदीद गवाहों के बयान; भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में राजस्व की दरों, कीमतों और ब्याज के आँकड़े; ज़िला कलेक्टरों की रिपोर्टों का संकलन।
- ★★★विधि-पाठ (नीला अनुच्छेद): ऐसे स्रोतों पर दृष्टिपात करते समय फिर याद रखना होगा कि वे सरकारी स्रोत हैं और घटनाओं के बारे में सरकारी सरोकार और अर्थ प्रतिबिंबित करते हैं। उदाहरण — आयोग से विशिष्ट रूप से यह जाँचने के लिए कहा गया था कि क्या सरकारी राजस्व की माँग विद्रोह का कारण थी; और संपूर्ण साक्ष्य प्रस्तुत करने के बाद आयोग ने सूचित किया कि सरकारी माँग किसानों के गुस्से की वजह नहीं थी; सारा दोष ऋणदाताओं या साहूकारों का ही था। “इससे यह बात स्पष्ट होती है कि औपनिवेशिक सरकार यह मानने को कदापि तैयार नहीं थी कि जनता में असंतोष या रोष कभी सरकारी कार्रवाई के कारण उत्पन्न हुआ था।”
- ★★निष्कर्ष-सूत्र: “सरकारी रिपोर्टें इतिहास के पुनर्निर्माण के लिए बहुमूल्य स्रोत होती हैं। लेकिन उन्हें हमेशा सावधानीपूर्वक पढ़ा जाना चाहिए और समाचारपत्रों, गैर-सरकारी वृत्तांतों, वैधिक अभिलेखों और यथासंभव मौखिक स्रोतों से संकलित साक्ष्य के साथ उनका मिलान करके उनकी विश्वसनीयता की जाँच की जानी चाहिए।”
- 🗣️ चर्चा कीजिए (पृ. 255): “आजकल आप जिस क्षेत्र में रहते हैं वहाँ पर ली जाने वाली ब्याज दरों का पता लगाइए… क्या ये दरें पिछले 50 वर्षों में बदली हैं? क्या भिन्न-भिन्न वर्गों के लोगों द्वारा अदा की जाने वाली दरों में कोई अंतर है?”
भाग 2 — काल-रेखा (पृ. 256)
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1765 | इंग्लिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने बंगाल की दीवानी प्राप्त की |
| 1773 | कंपनी के क्रियाकलापों को विनियमित करने के लिए ब्रिटिश पार्लियामेंट द्वारा रेग्यूलेटिंग एक्ट पारित |
| 1793 | बंगाल में इस्तमरारी बंदोबस्त |
| 1800 का दशक | संथाल लोग राजमहल की पहाड़ियों में आने और बसने लगे |
| 1818 | बम्बई दक्कन में पहला राजस्व बंदोबस्त |
| 1820 का दशक | कृषि कीमतें गिरने लगीं |
| 1840 व 1850 का दशक | बम्बई दक्कन में कृषि विस्तार की धीमी प्रक्रिया |
| 1855-56 | संथालों की बगावत |
| 1861 | कपास में तेज़ी का समारंभ |
| 1875 | दक्कन के गाँवों में रैयतों ने बग़ावत की |
भाग 3 — NCERT अभ्यास प्रश्न (पृ. 256–257)
उत्तर दीजिए (लगभग 100 से 150 शब्दों में)
- ग्रामीण बंगाल के बहुत से इलाकों में जोतदार एक ताकतवर हस्ती क्यों था?
- ज़मींदार लोग अपनी ज़मींदारियों पर किस प्रकार नियंत्रण बनाए रखते थे?
- पहाड़िया लोगों ने बाहरी लोगों के आगमन पर कैसी प्रतिक्रिया दर्शाई?
- संथालों ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध विद्रोह क्यों किया?
- दक्कन के रैयत ऋणदाताओं के प्रति क्रुद्ध क्यों थे?
निबंध (लगभग 250 से 300 शब्दों में)
- इस्तमरारी बंदोबस्त के बाद बहुत-सी ज़मींदारियाँ क्यों नीलाम कर दी गईं?
- पहाड़िया लोगों की आजीविका संथालों की आजीविका से किस रूप में भिन्न थी?
- अमेरिकी गृहयुद्ध ने भारत में रैयत समुदाय के जीवन को कैसे प्रभावित किया?
- किसानों का इतिहास लिखने में सरकारी स्रोतों के उपयोग के बारे में क्या समस्याएँ आती हैं?
मानचित्र कार्य
- उपमहाद्वीप के बाह्यरेखा मानचित्र (खाके) में इस अध्याय में वर्णित क्षेत्रों को अंकित कीजिए। यह भी पता लगाइए कि क्या ऐसे भी कोई इलाके थे जहाँ इस्तमरारी बंदोबस्त और रैयतवाड़ी व्यवस्था लागू थी। ऐसे इलाकों को मानचित्र में भी अंकित कीजिए।
संकेत: बंगाल (बर्दवान, दिनाजपुर, नदिया, राजशाही, विशनपुर, बीरभूम, भागलपुर), राजमहल की पहाड़ियाँ, दामिन-इ-कोह/संथाल परगना; बम्बई दक्कन (पूना, सूपा, अहमदनगर, करजत); इस्तमरारी — बंगाल-बिहार-उड़ीसा (+ बनारस, उत्तरी कर्नाटक के भाग); रैयतवाड़ी — बम्बई दक्कन व मद्रास प्रेसीडेंसी के बड़े भाग।
परियोजना कार्य (कोई एक)
- फ्रांसिस बुकानन की किसी एक रिपोर्ट को पढ़कर ग्रामीण समाज की जानकारी संकलित कीजिए; बताइए कि इतिहासकार ऐसी रिपोर्टों का किस प्रकार उपयोग कर सकते हैं।
- अपने क्षेत्र के ग्रामीण समुदाय के वृद्धजनों से चर्चा करके खेतों-फ़सलों-रोज़ी-रोटी और पिछले 75 सालों के परिवर्तनों पर रिपोर्ट तैयार कीजिए।
भाग 4 — शिक्षक-संदर्भ : सभी इन-टेक्स्ट प्रश्न व “चर्चा कीजिए”
| पृष्ठ | प्रश्न/प्रॉम्प्ट |
|---|---|
| 232 | जोतदार ज़मींदारों की सत्ता का किस प्रकार प्रतिरोध करते थे? (स्रोत 1) |
| 232 | चित्र 9.5 के तीरों पर शब्द भरिए — लगान, राजस्व, ब्याज, उधार (ऋण), उपज |
| 235 | स्रोत 2 — लेखक का लहज़ा/रुख़; आँकड़ों से क्या दर्शाया गया; दो वर्षों से दीर्घकालीन निष्कर्ष संभव? |
| 235 | 🗣️ ज़मींदारों के हाल की अध्याय-8 से तुलना |
| 237 | होजेज ने पहाड़ियों को रमणीय क्यों माना? |
| 238 | चित्र 9.8-9.9 — जनजातीय मनुष्य व प्रकृति के संबंध |
| 240 | चित्र 9.12 से संथाल गाँव के चित्र (9.10) की तुलना |
| 243 | ILN के पाठक के रूप में चित्र 9.12-9.14 पर प्रतिक्रिया; संथालों की छवि |
| 245 | 🗣️ बुकानन के विकास-विचार; पहाड़िया वनवासी के रूप में प्रतिक्रिया |
| 246 | स्रोत 7 — पूर्वाग्रह-सूचक शब्द; रैयत का अपना वर्णन |
| 252 | स्रोत 8 — रैयत की शिकायतें; खाते-रसीद क्यों नहीं; ऋणदाता के तर्क |
| 253 | स्रोत 9 — किसान की वचनबद्धताएँ; संबंधों पर प्रभाव; बैलों से रिश्ता |
| 254 | स्रोत 10 — ब्याज की मद का हिसाब |
| 255 | 🗣️ अपने क्षेत्र की ब्याज दरें — 50 वर्षों में बदलाव; वर्ग-भेद |
भाग 5 — अध्याय की समग्र दृष्टि (शिक्षक हेतु)
5.1 अध्याय के पाँच स्तंभ★★
| # | केंद्रीय विचार | मुख्य प्रमाण |
|---|---|---|
| 1 | औपनिवेशिक क़ानून ने ग्रामीण समाज की किस्मत तय की — पर एकतरफ़ा नहीं | इस्तमरारी बंदोबस्त बनाम फ़र्जी बिक्री; परिसीमन क़ानून बनाम नए बंधपत्र; लोग “परिणामों में फेर-बदल कर देते थे” |
| 2 | हर क्षेत्र में पुराने संतुलन टूटे, नए शक्ति-धारक उभरे | ज़मींदार ↓ जोतदार ↑; पहाड़िया ↓ संथाल ↑ (फिर संथाल भी ↓ दिकू-राज्य के सामने); रैयत ↓ ऋणदाता ↑ |
| 3 | राजस्व-अधिकतमकरण औपनिवेशिक नीति की धुरी | ऊँची माँग (बंगाल); अस्थायी बंदोबस्त; रैयतवाड़ी की 30-वर्षीय वृद्धि; 50-100% वृद्धि |
| 4 | विश्व-अर्थव्यवस्था गाँव तक | लंकाशायर-अमेरिका-दक्कन का त्रिकोण; गृहयुद्ध से 100 रु. प्रति एकड़ अग्रिम तक |
| 5 | सरकारी स्रोत बहुमूल्य पर पक्षपाती | पाँचवीं रिपोर्ट की अतिरंजना; बुकानन की कंपनी-दृष्टि; दंगा आयोग का सरकार-बचाव |
5.2 एक-पंक्ति तीर-शृंखलाएँ★
बंगाल: 1765 दीवानी → 1793 इस्तमरारी (कार्नवालिस) → ऊँची माँग + सूर्यास्त विधि → नीलामियाँ (बर्दवान 1797; 95% फ़र्जी) → जोतदारों का उदय → 1813 पाँचवीं रिपोर्ट → (1930 के दशक में ज़मींदारों का भट्ठा) राजमहल: पहाड़िया झूम-जीवन → 1770s संहार-नीति → 1780s क्लीवलैंड की शांति-नीति → संथाल-आगमन (1780s) → 1832 दामिन-इ-कोह → 40→1,473 गाँव → कर-दिकू-ज़मींदार की मार → 1855-56 विद्रोह → संथाल परगना दक्कन: 1818/1820s रैयतवाड़ी-बंदोबस्त → 1832-34 अकाल → कर्ज़-चक्र → 1861-65 कपास-तेज़ी (गृहयुद्ध) → 1865 ऋण-स्रोत सूखा + माँग 50-100% ↑ → 12 मई 1875 सूपा → आयोग-रिपोर्ट 1878
5.3 पाँच सामान्य भ्रांतियाँध्यान
| भ्रांति | वास्तविकता |
|---|---|
| “इस्तमरारी बंदोबस्त ने ज़मींदारों को भू-स्वामी बना दिया” | NCERT: ज़मींदार “भू-स्वामी नहीं… राज्य का राजस्व समाहर्ता मात्र” |
| “नीलामी में ज़मींदार सचमुच बरबाद हो गए” | 95% ख़रीद फ़र्जी; ज़मींदार “आसानी से विस्थापित नहीं”; पाँचवीं रिपोर्ट की अतिरंजना |
| “पहाड़िया आलसी/असभ्य थे इसलिए पिछड़े” | झूम-प्रणाली को दामिन-सीमांकन ने असंभव बनाया — उर्वर ज़मीनें छिन गईं |
| “संथाल विद्रोह अंग्रेज़ों के विरुद्ध ही था” | तीन निशाने — ज़मींदार, साहूकार (दिकू), औपनिवेशिक राज |
| “1875 का विद्रोह ग़रीबी/कर्ज़ के कारण भड़का” | NCERT का सूक्ष्म बिंदु — गुस्सा रूढ़ि-रिवाजों के उल्लंघन (संवेदनहीनता, ब्याज>मूलधन, रसीद-इनकार) पर था |
5.4 अध्याय का सूत्र-वाक्य★
“उपनिवेशवाद गाँव में क़ानून, दस्तावेज़ और नीलामी लेकर घुसा — पर गाँव ने उसे चुपचाप नहीं सहा: ज़मींदार ने हथकंडे गढ़े, जोतदार ने क़ानून को ही हथियार बनाया, पहाड़िया पहाड़ों में हटा, संथाल ने तीर उठाया और रैयत ने बही-खाते जला दिए — इसीलिए सरकारी अभिलेख सच का एक हिस्सा ही बताते हैं।”
भाग 6 — अतिरिक्त पठन (NCERT द्वारा सुझाया, पृ. 257)
| लेखक | वर्ष | कृति |
|---|---|---|
| सुगत बोस | 1986 | अग्रेरियन बंगाल (कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस) |
| फ्रांसिस बुकानन | 1930 | जरनल ऑफ फ्रांसिस बुकानन केप्ट ड्यूरिंग दि सर्वे ऑफ दि डिस्ट्रिक्ट ऑफ भागलपुर (पटना) |
| रामचन्द्र गुहा | 1989 | दि अनक्वाइट वुड्स: इकोलॉजिकल चेंज एंड पीज़ेंट रेज़िस्टेंस इन दि हिमालयाज़ (ऑक्सफ़ोर्ड) |
| सुमित गुहा | 1985 | दि अग्रेरियन इकोनॉमी ऑफ दि बॉम्बे डेक्कन, 1818–1941 (ऑक्सफ़ोर्ड) |
| रविंद्र कुमार | 1968 | वेस्टर्न इंडिया इन दि नाइनटिंथ सेंचुरी (रूटलेज) |
| रत्नलेखा राय | 1979 | चेंज इन बंगाल अग्रेरियन सोसाइटी, ई. 1760–1850 (मनोहर) |
| कुमार सुरेश सिंह | 1966 | डस्ट-स्टॉर्म एंड दि हैंगिंग मिस्ट: ए स्टडी ऑफ बिरसा मुंडा एंड हिज़ मूवमेंट इन छोटानागपुर (1874–1901) (कलकत्ता) |
यह मास्टर फ़ाइल इस अध्याय की सभी अन्य सामग्रियों का एकमात्र आधार है।