Chapter 2राजा, किसान और नगर

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NCERT — भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग-1 (Reprint 2026-27)

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0. प्रस्तावना — हड़प्पा के बाद डेढ़ हज़ार वर्ष

  • हड़प्पा सभ्यता के बाद डेढ़ हज़ार वर्षों के लंबे अंतराल में उपमहाद्वीप के विभिन्न भागों में कई प्रकार के विकास हुए।
  • ऋग्वेद का लेखन — इसी काल में सिंधु नदी और उसकी उपनदियों के किनारे रहने वाले लोगों द्वारा।
  • कृषक बस्तियाँ — उत्तर भारत, दक्कन पठार क्षेत्र तथा कर्नाटक जैसे कई क्षेत्रों में।
  • चरवाहा बस्तियाँ — दक्कन और दक्षिण भारत के क्षेत्रों में।
  • महापाषाण (Megalith) शवाधान: ईसा पूर्व पहली सहस्राब्दि में मध्य व दक्षिण भारत में शवों के अंतिम संस्कार के नए तरीके — पत्थरों के बड़े-बड़े ढाँचे; कई स्थानों पर शवों के साथ लोहे के उपकरण और हथियार भी दफ़नाए गए।
  • छठी शताब्दी ई.पू. से नए परिवर्तन:
    • सबसे मुखर — आरंभिक राज्यों, साम्राज्यों और रजवाड़ों का विकास
    • इनके पीछे — कृषि उपज को संगठित करने के तरीके में परिवर्तन
    • साथ-साथ — लगभग पूरे उपमहाद्वीप में नए नगरों का उदय
  • इतिहासकारों के स्रोत: अभिलेख, ग्रंथ, सिक्के तथा चित्र।
  • महत्त्वपूर्ण चेतावनी (अध्याय का सूत्र): यह एक जटिल प्रक्रिया है, और इन स्रोतों से विकास की पूरी कहानी नहीं मिल पाती।

शिक्षण-सूत्र: अध्याय 1 में साक्ष्य भौतिक थे (लिपि अपठित); यहाँ साक्ष्य लिखित भी हैं (लिपि पढ़ी जा चुकी) — पर समस्याएँ फिर भी बनी रहती हैं। यही इस अध्याय की केंद्रीय शिक्षा है।

1. प्रिंसेप और पियदस्सी

  • 1830 के दशक — भारतीय अभिलेख विज्ञान में उल्लेखनीय प्रगति।
  • जेम्स प्रिंसेप — ईस्ट इंडिया कंपनी का अधिकारी — ने ब्राह्मी और खरोष्ठी लिपियों का अर्थ निकाला।
  • इन लिपियों का उपयोग सबसे आरंभिक अभिलेखों और सिक्कों में हुआ है।
  • प्रिंसेप की खोज: अधिकांश अभिलेखों व सिक्कों पर पियदस्सी — अर्थात् ‘मनोहर मुखाकृति वाला’ राजा — का नाम लिखा है।
  • कुछ अभिलेखों पर राजा का नाम असोक भी लिखा है। बौद्ध ग्रंथों के अनुसार असोक सर्वाधिक प्रसिद्ध शासकों में से एक था।
  • परिणाम: आरंभिक भारत के राजनीतिक इतिहास के अध्ययन को नयी दिशा मिली।
    • भारतीय व यूरोपीय विद्वानों ने प्रमुख राजवंशों की वंशावलियों की पुनर्रचना के लिए विभिन्न भाषाओं के अभिलेखों व ग्रंथों का उपयोग किया।
    • बीसवीं सदी के आरंभिक दशकों तक उपमहाद्वीप के राजनीतिक इतिहास का एक सामान्य चित्र तैयार हो गया।
  • अगला चरण: विद्वानों ने राजनीतिक इतिहास के संदर्भ (Context) की ओर ध्यान लगाया — क्या राजनीतिक परिवर्तनों तथा आर्थिक-सामाजिक विकासों में कोई संबंध था?
    • निष्कर्ष: संबंध तो थे, लेकिन संभवतः सीधे संबंध हमेशा नहीं थे।

📦 बॉक्स (पृ. 29): अभिलेख (Inscriptions)

  • परिभाषा: अभिलेख वे हैं जो पत्थर, धातु या मिट्टी के बर्तन जैसी कठोर सतह पर खुदे होते हैं।
  • इनमें उन लोगों की उपलब्धियाँ, क्रियाकलाप या विचार लिखे जाते हैं जो उन्हें बनवाते हैं।
  • विषय-वस्तु: राजाओं के क्रियाकलाप; महिलाओं और पुरुषों द्वारा धार्मिक संस्थाओं को दिए गए दान का ब्योरा।
  • अभिलेख एक प्रकार से स्थायी प्रमाण होते हैं।
  • तिथि-निर्धारण: कई अभिलेखों में निर्माण की तिथि खुदी होती है; जिन पर तिथि नहीं, उनका काल-निर्धारण पुरालिपि (Palaeography) अथवा लेखन शैली से किया जाता है।
    • उदाहरण: लगभग 250 ई.पू. में अक्षर ‘अ’ एक प्रकार से लिखा जाता था और 500 ई. में दूसरे प्रकार से।
  • भाषा: प्राचीनतम अभिलेख प्राकृत भाषाओं में। प्राकृत = जनसामान्य की भाषाएँ।
    • अजातसत्तु और असोक जैसे शासकों के नाम प्राकृत भाषा में लिखे गए हैं (क्योंकि ये नाम प्राकृत अभिलेखों से प्राप्त हुए)।
    • तमिल, पालि और संस्कृत के शब्द भी मिलेंगे — इन भाषाओं में भी अभिलेख मिलते हैं।
    • संभव है लोग अन्य भाषाएँ भी बोलते थे पर उनका उपयोग लेखन कार्य में नहीं होता था।
  • अभिलेखशास्त्र (Epigraphy): अभिलेखों के अध्ययन को कहते हैं।

2. प्रारंभिक राज्य

2.1 सोलह महाजनपद

  • छठी शताब्दी ई.पू. — आरंभिक भारतीय इतिहास का एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तनकारी काल।
  • इस काल को जोड़ा जाता है — आरंभिक राज्यों, नगरों, लोहे के बढ़ते प्रयोग तथा सिक्कों के विकास के साथ।
  • इसी काल में बौद्ध तथा जैन सहित विभिन्न दार्शनिक विचारधाराओं का विकास हुआ।
  • महाजनपद: बौद्ध और जैन धर्म के आरंभिक ग्रंथों में सोलह राज्यों का उल्लेख।
    • महत्त्वपूर्ण बिंदु: महाजनपदों के नाम की सूची इन ग्रंथों में एकसमान नहीं है।
    • परंतु वज्जि, मगध, कोशल, कुरु, पांचाल, गांधार और अवन्ति जैसे नाम प्रायः मिलते हैं → ये सबसे महत्त्वपूर्ण महाजनपदों में गिने जाते होंगे।
  • शासन-व्यवस्था के दो प्रकार:
    1. राजतंत्र: अधिकांश महाजनपदों पर राजा का शासन।
    2. गण और संघ: कई लोगों का समूह शासन करता था; इस समूह का प्रत्येक व्यक्ति राजा कहलाता था।
      • भगवान महावीर और भगवान बुद्ध (अध्याय 4) इन्हीं गणों से संबंधित थे।
      • वज्जि संघ की भाँति कुछ राज्यों में भूमि सहित अनेक आर्थिक स्रोतों पर राजा गण सामूहिक नियंत्रण रखते थे।
      • सीमा: स्रोतों के अभाव में इन राज्यों के इतिहास पूरी तरह लिखे नहीं जा सकते — लेकिन ऐसे कई राज्य लगभग एक हज़ार साल तक बने रहे।
  • राजधानी: प्रत्येक महाजनपद की एक राजधानी होती थी जिसे प्रायः किले से घेरा जाता था।
    • किलेबंद राजधानियों के रख-रखाव तथा प्रारंभी सेनाओं और नौकरशाही के लिए भारी आर्थिक स्रोत की आवश्यकता होती थी।
  • धर्मशास्त्र: लगभग छठी शताब्दी ई.पू. से संस्कृत में ब्राह्मणों ने धर्मशास्त्र नामक ग्रंथों की रचना शुरू की।
    • इनमें शासक सहित अन्य के लिए नियमों का निर्धारण।
    • अपेक्षा: शासक क्षत्रिय वर्ण से ही होंगे (अध्याय 3 भी देखिए)।
    • शासकों का काम: किसानों, व्यापारियों और शिल्पकारों से कर तथा भेंट वसूलना।
    • खुला प्रश्न: क्या वनवासियों और चरवाहों से भी कर रूप में कुछ लिया जाता था? — अनिश्चित।
  • संपत्ति जुटाने का एक ‘वैध’ उपाय: पड़ोसी राज्यों पर आक्रमण करके धन इकट्ठा करना भी माना जाता था।
  • सैन्य-व्यवस्था: धीरे-धीरे कुछ राज्यों ने अपनी स्थायी सेनाएँ और नौकरशाही तंत्र तैयार कर लिए। बाकी राज्य अब भी सहायक-सेना पर निर्भर थे जिन्हें प्रायः कृषक वर्ग से नियुक्त किया जाता था।

📦 बॉक्स (पृ. 29): जनपद

जनपद का अर्थ — एक ऐसा भूखंड जहाँ कोई जन (लोग, कुल या जनजाति) अपना पाँव रखता है अथवा बस जाता है। इस शब्द का प्रयोग प्राकृत व संस्कृत दोनों में मिलता है।

📦 बॉक्स (पृ. 30): ओलीगार्की (Oligarchy) / समूहशासन

ओलीगार्की या समूहशासन उसे कहते हैं जहाँ सत्ता पुरुषों के एक समूह के हाथ में होती है। (तुलना: रोमन गणराज्य भी एक समूह शासन ही था, यद्यपि नाम अलग है।)

🗺 मानचित्र 1 (पृ. 30): आरंभिक राज्य व उनकी राजधानियाँध्यान

प्रमुख अंकन — गांधार (पुष्कलावती, तक्षशिला), कंबोज, कुरु (इन्द्रप्रस्थ), पांचाल (अहिच्छत्र), शूरसेन (मथुरा), मत्स्य, कोशल (श्रावस्ती), काशी (वाराणसी), मल्ल (कुशीनगर), वज्जि/वृजि (वैशाली), मगध (राजगीर), अंग (चंपा), वंग, वत्स (कौशाम्बी), चेदि, अवन्ति (उज्जयिनी), अश्मक।

चर्चा प्रॉम्प्ट: ऐसे कौन से क्षेत्र हैं जहाँ राज्य और नगर सर्वाधिक सघन रूप से बसे थे?

2.2 सोलह महाजनपदों में प्रथम : मगध

  • छठी से चौथी शताब्दी ई.पू. में मगध (आधुनिक बिहार) सबसे शक्तिशाली महाजनपद बन गया।

आधुनिक इतिहासकारों द्वारा बताए कारण:

  1. मगध क्षेत्र में खेती की उपज खास तौर पर अच्छी होती थी।
  2. लोहे की खदानें (आधुनिक झारखंड में) आसानी से उपलब्ध → उपकरण और हथियार बनाना सरल।
  3. जंगली क्षेत्रों में हाथी उपलब्ध — जो सेना के एक महत्त्वपूर्ण अंग थे।
  4. गंगा और उसकी उपनदियों से आवागमन सस्ता व सुलभ।

आरंभिक जैन और बौद्ध लेखकों की व्याख्या (भिन्न दृष्टि):

  • मगध की महत्ता का कारण — विभिन्न शासकों की नीतियाँ।
  • बिंबिसार, अजातसत्तु और महापद्मनंद जैसे प्रसिद्ध राजा अत्यंत महत्त्वाकांक्षी शासक थे, और इनके मंत्री उनकी नीतियाँ लागू करते थे।

राजधानियाँ:

  • प्रारंभ में राजगाह (आधुनिक बिहार के राजगीर का प्राकृत नाम) मगध की राजधानी थी।
    • शब्द का अर्थ — ‘राजाओं का घर’।
    • पहाड़ियों के बीच बसा किलेबंद शहर।
  • बाद में चौथी शताब्दी ई.पू. में पाटलिपुत्र को राजधानी बनाया गया (अब पटना) — जिसकी गंगा के रास्ते आवागमन के मार्ग पर महत्त्वपूर्ण अवस्थिति थी।

चर्चा प्रॉम्प्ट (पृ. 31): मगध की सत्ता के विकास के लिए आरंभिक और आधुनिक लेखकों ने क्या-क्या व्याख्याएँ प्रस्तुत की हैं? ये एक-दूसरे से कैसे भिन्न हैं? चित्र 2.2: राजगीर के किले की दीवार — इन दीवारों का निर्माण क्यों किया गया?

3. एक आरंभिक साम्राज्य — मौर्य

  • मगध के विकास के साथ-साथ मौर्य साम्राज्य का उदय हुआ।
  • संस्थापक — चंद्रगुप्त मौर्य (लगभग 321 ई.पू.) — शासन पश्चिमोत्तर में अफ़ग़ानिस्तान और बलूचिस्तान तक फैला था।
  • उनके पौत्र असोक — आरंभिक भारत का सर्वप्रसिद्ध शासक — ने कलिंग (आधुनिक उड़ीसा) पर विजय प्राप्त की।

3.1 मौर्यवंश के बारे में जानकारी प्राप्त करना (स्रोत)

स्रोतविवरण
पुरातात्त्विक प्रमाणविशेषतया मूर्तिकला
मेगस्थनीज़ का विवरणचंद्रगुप्त मौर्य के दरबार में आए यूनानी राजदूत द्वारा लिखित; आज इसके कुछ अंश ही उपलब्ध हैं
अर्थशास्त्रसंभवतः इसके कुछ भागों की रचना कौटिल्य या चाणक्य ने की थी, जो चंद्रगुप्त के मंत्री थे
परवर्ती ग्रंथजैन, बौद्ध और पौराणिक ग्रंथ तथा संस्कृत वाङ्मय
असोक के अभिलेख ★पत्थरों और स्तंभों पर — प्रायः सबसे मूल्यवान स्रोत माने जाते हैं
  • असोक — पहला सम्राट जिसने अपने अधिकारियों और प्रजा के लिए संदेश प्राकृतिक पत्थरों और पॉलिश किए हुए स्तंभों पर लिखवाए।
  • असोक ने अभिलेखों के माध्यम से धम्म का प्रचार किया। धम्म में सम्मिलित:
    • बड़ों के प्रति आदर
    • संन्यासियों और ब्राह्मणों के प्रति उदारता
    • सेवकों और दासों के साथ उदार व्यवहार
    • दूसरे के धर्मों और परंपराओं का आदर

📦 बॉक्स (पृ. 32): भाषाएँ और लिपियाँ

  • असोक के अधिकांश अभिलेख प्राकृत में; पश्चिमोत्तर से मिले अभिलेख अरामेइक और यूनानी भाषा में।
  • प्राकृत के अधिकांश अभिलेख ब्राह्मी लिपि में; पश्चिमोत्तर के कुछ अभिलेख खरोष्ठी में।
  • अरामेइक और यूनानी लिपियों का प्रयोग अफ़ग़ानिस्तान में मिले अभिलेखों में हुआ था।

चित्र 2.3: सिंह शीर्ष — सिंह शीर्ष को आज महत्त्वपूर्ण क्यों माना जाता है?

3.2 साम्राज्य का प्रशासन

  • पाँच प्रमुख राजनीतिक केंद्र:
    • राजधानी — पाटलिपुत्र
    • चार प्रांतीय केंद्र — तक्षशिला, उज्जयिनी, तोसलि और सुवर्णगिरि
    • इन सबका उल्लेख असोक के अभिलेखों में है।
  • एकरूपता का साक्ष्य: पाकिस्तान के पश्चिमोत्तर सीमांत प्रांत से लेकर आंध्र प्रदेश, उड़ीसा और उत्तराखंड तक हर स्थान पर एक जैसे संदेश उत्कीर्ण किए गए थे।
  • इतिहासकारों का निष्कर्ष: इतने विशाल साम्राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था समान रही होगी — ऐसा संभव नहीं था।
    • साम्राज्य में सम्मिलित क्षेत्र बड़े विविध थे — कहीं अफ़ग़ानिस्तान के पहाड़ी क्षेत्र, कहीं उड़ीसा के तटवर्ती क्षेत्र।
    • संभव है सबसे प्रबल प्रशासनिक नियंत्रण राजधानी तथा उसके आसपास के प्रांतीय केंद्रों पर रहा हो।
  • प्रांतीय केंद्रों का चयन बड़े ध्यान से:
    • तक्षशिला और उज्जयिनी — दोनों लंबी दूरी वाले महत्त्वपूर्ण व्यापार मार्ग पर स्थित।
    • सुवर्णगिरि (अर्थात् ‘सोने के पहाड़’) — कर्नाटक में सोने की खदान के लिए उपयोगी।
  • संचार व सुरक्षा: साम्राज्य के संचालन के लिए भूमि और नदियों दोनों मार्गों से आवागमन आवश्यक। राजधानी से प्रांतों तक जाने में कई सप्ताह या महीनों का समय; अतः यात्रियों के लिए खान-पान की व्यवस्था और सुरक्षा भी करनी पड़ती होगी। सेना सुरक्षा का एक प्रमुख माध्यम रही होगी।

मेगस्थनीज़ द्वारा वर्णित सैन्य-संगठन — एक समिति और छह उपसमितियाँ:

उपसमितिकार्य
पहलीनौसेना का संचालन
दूसरीयातायात और खान-पान का संचालन
तीसरीपैदल सैनिकों का संचालन
चौथीअश्वारोहियों का संचालन
पाँचवींरथारोहियों का संचालन
छठीहाथियों का संचालन
  • दूसरी उपसमिति का विस्तृत दायित्व: उपकरणों के ढोने के लिए बैलगाड़ियों की व्यवस्था; सैनिकों के लिए भोजन और जानवरों के लिए चारे की व्यवस्था; सैनिकों की देखभाल के लिए सेवकों और शिल्पकारों की नियुक्ति।
  • धम्म द्वारा एकता: असोक ने साम्राज्य को अखंड बनाए रखने का प्रयास धम्म के प्रचार द्वारा भी किया।
    • धम्म के सिद्धांत बहुत साधारण और सार्वभौमिक थे।
    • असोक के अनुसार धम्म से लोगों का जीवन इस संसार में और उसके बाद के संसार में अच्छा रहेगा।
    • प्रचार के लिए धम्म महामात्त नाम से विशेष अधिकारियों की नियुक्ति की गई।

📜 स्रोत 1 (पृ. 34): “सम्राट के अधिकारी क्या-क्या कार्य करते थे?” — मेगस्थनीज़

साम्राज्य के महान अधिकारियों में से कुछ के कार्य:

  • नदियों की देख-रेख और भूमि मापन का काम (जैसा मिस्र में होता है)
  • कुछ प्रमुख नहरों से उपनहरों के लिए छोड़े जाने वाले पानी के मुखद्वार का निरीक्षण — ताकि हर स्थान पर पानी की समान पूर्ति हो सके
  • शिकारियों का संचालन; शिकारियों के कृत्यों के आधार पर उन्हें इनाम या दंड
  • कर वसूली तथा भूमि से जुड़े सभी व्यवसायों का निरीक्षण
  • लकड़हारों, बढ़ई, लोहारों और खननकर्ताओं का निरीक्षण

चर्चा प्रॉम्प्ट: विभिन्न व्यावसायिक समूहों के निरीक्षण के लिए इन अधिकारियों को क्यों नियुक्त किया जाता था?

📜 स्रोत 2 (पृ. 35): “सेना के लिए हाथी पकड़ना” — अर्थशास्त्र

  • अर्थशास्त्र में सैनिक और प्रशासनिक संगठन का विस्तृत विवरण।
  • हाथी पकड़ने की विधि: वनों के संरक्षक, हाथियों को पालने वाले, हाथी के पैरों में ज़ंजीर बाँधने वाले, सीमारक्षक, वनवासी और महावतों के साथ मिलकर पाँच से सात हथिनियों की मदद से, जंगली हाथियों द्वारा गिराए गए मलमूत्र को पहचानते हुए उन्हें पकड़ने का काम करते थे।
  • यूनानी स्रोतों के अनुसार मौर्य सम्राट के पास:
    • छह लाख पैदल सैनिक
    • तीस हज़ार घुड़सवार
    • नौ हज़ार हाथी
    • कुछ इतिहासकार इस विवरण को अतिशयोक्तिपूर्ण मानते हैं।

चर्चा प्रॉम्प्ट: यदि यूनानी विवरण सही है, तो इतनी बड़ी सेना के भरण-पोषण के लिए मौर्य शासकों को किस तरह के संसाधनों की ज़रूरत पड़ती होगी?

3.3 मौर्य साम्राज्य कितना महत्त्वपूर्ण था?

उन्नीसवीं सदी में इतिहास-लेखन का संदर्भ:

  • जब इतिहासकारों ने भारत के आरंभिक इतिहास की रचना शुरू की तो मौर्य साम्राज्य को इतिहास का एक प्रमुख काल माना गया।
  • कारण: उस समय भारत ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन एक औपनिवेशिक देश था।
  • उन्नीसवीं और आरंभिक बीसवीं सदी के भारतीय इतिहासकारों को प्राचीन भारत में ऐसे साम्राज्य की संभावना चुनौतीपूर्ण तथा उत्साहवर्धक लगी।
  • प्रस्तर मूर्तियाँ सहित मौर्यकालीन सभी पुरातत्त्व एक अद्भुत कला के प्रमाण थे — जो साम्राज्य की पहचान माने जाते हैं।
  • इतिहासकारों को लगा कि असोक के अभिलेखों के संदेश अन्य शासकों के अभिलेखों से भिन्न हैं:
    • असोक अन्य राजाओं की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली और परिश्रमी शासक थे
    • साथ ही वे बाद के उन राजाओं की अपेक्षा विनीत भी थे जो अपने नाम के साथ बड़ी-बड़ी उपाधियाँ जोड़ते थे
  • इसीलिए बीसवीं सदी के राष्ट्रवादी नेताओं ने भी असोक को प्रेरणा का स्रोत माना।

संतुलित पुनर्मूल्यांकन (NCERT की आलोचनात्मक दृष्टि):

  1. यह साम्राज्य मात्र डेढ़ सौ साल तक ही चल पाया — उपमहाद्वीप के इस लंबे इतिहास में बहुत बड़ा काल नहीं।
  2. मानचित्र 2 से स्पष्ट — मौर्य साम्राज्य उपमहाद्वीप के सभी क्षेत्रों में नहीं फैल पाया था।
  3. साम्राज्य की सीमा के अंतर्गत भी नियंत्रण एकसमान नहीं था।
  4. दूसरी शताब्दी ई.पू. आते-आते उपमहाद्वीप के कई भागों में नए-नए शासक और रजवाड़े स्थापित होने लगे।

🗺 मानचित्र 2 (पृ. 33): असोक के अभिलेखों का वितरणध्यान

तीन प्रकार के चिह्न — महाशिलालेख (लाल त्रिभुज), लघुशिलालेख (बैंगनी वर्ग), स्तंभ अभिलेख (नीला वृत्त)। प्रमुख स्थल: मानसेहरा, शहबाज़गढ़ी, तक्षशिला, कंदहार, कलसी, टोपरा, मेरठ, बहपुर, बैराट, भाबू, गुजर, कौशाम्बी, अहरौरा, सारनाथ, निगालीसागर, रुम्मिनदेई, रामपुरवा, लौरिया-नंदनगढ़, लौरिया-अरराज, पाटलिपुत्र, सहसराम, उज्जयिनी, साँची, गिरनार, सोपारा, शिशुपालगढ़, जौगड़ (कलिंग), सन्नति, मास्की, गावीमठ, पाल्कीगुंडु, जतिंग-रामेश्वर, उदेगोलाम, राजुलमंडगिरि, सिद्दपुर, ब्रह्मगिरि, नित्तूर।

चर्चा प्रॉम्प्ट: क्या यह भी संभव है कि जो क्षेत्र शासकों के अधीन नहीं थे, वहाँ भी उन्होंने अभिलेख उत्कीर्ण करवाए होंगे?

4. राजधर्म के नवीन सिद्धांत

4.1 दक्षिण के राजा और सरदार

  • उपमहाद्वीप के दक्कन और उससे दक्षिण के क्षेत्र में स्थित तमिलकम (अर्थात् तमिलनाडु एवं आंध्र प्रदेश और केरल के कुछ हिस्से) में चोल, चेर और पाण्ड्य जैसी सरदारियों का उदय हुआ।
  • ये राज्य बहुत ही समृद्ध और स्थायी सिद्ध हुए।
  • स्रोत: प्राचीन तमिल संगम ग्रंथों में ऐसी कविताएँ हैं जो सरदारों का विवरण देती हैं कि उन्होंने अपने स्रोतों का संकलन और वितरण किस प्रकार से किया।
  • लंबी दूरी के व्यापार से राजस्व:
    • सातवाहन — मध्य और पश्चिम भारत के क्षेत्रों पर शासन (लगभग द्वितीय शताब्दी ई.पू. से द्वितीय शताब्दी ई. तक)
    • शक शासक — उपमहाद्वीप के पश्चिमोत्तर और पश्चिम में; मध्य एशियाई मूल के
    • इनके सामाजिक उद्गम के बारे में अधिक जानकारी नहीं; पर सत्ता में आने के बाद उन्होंने ऊँचे सामाजिक अस्तित्व का दावा कई प्रकार से किया (अध्याय 3)।

📦 बॉक्स (पृ. 35): सरदार और सरदारी (Chief and Chiefdom)

  • सरदार एक शक्तिशाली व्यक्ति होता है जिसका पद वंशानुगत भी हो सकता है और नहीं भी।
  • उसके समर्थक उसके खानदान के लोग होते हैं।
  • सरदार के कार्य: विशेष अनुष्ठान का संचालन; युद्ध के समय नेतृत्व करना; विवादों को सुलझाने में मध्यस्थता की भूमिका।
  • वह अपने अधीन लोगों से भेंट लेता है (जबकि राजा कर वसूलते हैं), और अपने समर्थकों में उस भेंट का वितरण करता है।
  • सरदारी में सामान्यतया कोई स्थायी सेना या अधिकारी नहीं होते हैं।

शिक्षण-बिंदु: ‘भेंट बनाम कर’ तथा ‘स्थायी सेना का अभाव’ — ये दो कसौटियाँ सरदारी और राज्य का भेद करती हैं। यह भेद परीक्षा में अत्यंत उपयोगी है।

📜 स्रोत 3 (पृ. 36): “पाण्ड्य सरदार सेनगुत्तुवन की वनयात्रा” —सिलप्पादिकारम् (तमिल महाकाव्य)

जब वह वन की यात्रा पर थे तो लोग नाचते-गाते हुए पहाड़ों से उतरे ठीक उसी तरह जैसे पराजित लोग विजयी का आदर करते हैं। वे अपने साथ उपहार लाए — उपहारों की सूची: हाथी दाँत, सुगंधित लकड़ी, हिरणों के बाल से बने चँवर, मधु, चंदन, गेरू, सुरमा, हल्दी, इलायची, मिर्च; नारियल, आम, जड़ी-बूटी, फल, प्याज, गन्ना, फूल, सुपारी, केला; बाघों के बच्चे, शेर, हाथी, बंदर, भालू, हिरण, कस्तूरी मृग, लोमड़ी, मोर, जंगली मुर्गे, बोलने वाले तोते आदि। चर्चा प्रॉम्प्ट: लोग यह उपहार क्यों लाए? सरदार इन उपहारों का उपयोग किसलिए करते होंगे? NCERT अभ्यास प्रश्न 4 इसी स्रोत की तुलना स्रोत 8 (दंगुन गाँव) से करवाता है।

4.2 दैविक राजा

  • राजाओं के लिए उच्च स्थिति प्राप्त करने का एक साधन — विभिन्न देवी-देवताओं के साथ जुड़ना।
  • कुषाण शासक (लगभग प्रथम शताब्दी ई.पू. से प्रथम शताब्दी ई. तक) — मध्य एशिया से लेकर पश्चिमोत्तर भारत तक शासन — ने इस उपाय का सर्वोत्तम उदाहरण प्रस्तुत किया।
  • स्रोत: कुषाण इतिहास की रचना अभिलेखों और साहित्य परंपरा के माध्यम से; उनके राजधर्म का सर्वोत्तम प्रमाण उनके सिक्कों और मूर्तियों से।
  • देवस्थान व विशालकाय मूर्तियाँ:
    • मथुरा के पास माट (उत्तर प्रदेश) के एक देवस्थान पर कुषाण शासकों की विशालकाय मूर्तियाँ।
    • अफ़ग़ानिस्तान के एक देवस्थान पर भी इसी प्रकार की मूर्तियाँ।
    • कुछ इतिहासकारों का मानना — इन मूर्तियों के ज़रिए कुषाण स्वयं को देवतुल्य प्रस्तुत करना चाहते थे।
  • उपाधि: कई कुषाण शासकों ने अपने नाम के आगे ‘देवपुत्र’ की उपाधि लगाई।
    • संभवतः वे चीनी शासकों से प्रेरित हुए होंगे, जो स्वयं को स्वर्गपुत्र कहते थे।
  • गुप्त साम्राज्य (चौथी शताब्दी ई.):
    • कई बड़े साम्राज्यों के साक्ष्य; इनमें से कई साम्राज्य सामंतों पर निर्भर थे।
    • सामंत अपना निर्वाह स्थानीय संसाधनों द्वारा करते थे जिसमें भूमि पर नियंत्रण भी शामिल था।
    • वे शासकों का आदर करते थे और उनकी सैनिक सहायता भी करते थे।
    • शक्तिशाली सामंत राजा भी बन जाते थे; और दुर्बल राजा बड़े शासकों के अधीन हो जाते थे।
  • गुप्त इतिहास के स्रोत: साहित्य, सिक्के और अभिलेख; साथ ही कवियों द्वारा अपने राजा या स्वामी की प्रशंसा में लिखी प्रशस्तियाँ।
    • इतिहासकारों की सावधानी: वे इन रचनाओं के आधार पर ऐतिहासिक तथ्य निकालने का प्रयास तो करते हैं, लेकिन उनके रचयिता तथ्यात्मक विवरण की अपेक्षा उन्हें काव्यात्मक ग्रंथ मानते थे।
  • प्रयाग प्रशस्ति (इलाहाबाद स्तंभ अभिलेख) — रचना हरिषेण ने संस्कृत में की, जो स्वयं गुप्त सम्राटों के संभवतः सबसे शक्तिशाली सम्राट समुद्रगुप्त के राजकवि थे।

📜 स्रोत 4 (पृ. 37): “समुद्रगुप्त की प्रशस्ति” —प्रयाग प्रशस्ति का अंश

धरती पर उनका कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं था। अनेक गुणों और शुभकार्यों से संपन्न उन्होंने अपने पैर के तलवे से अन्य राजाओं के यश को मिटा दिया है। वे परमात्मा पुरुष हैं, साधु (भले) की समृद्धि और असाधु (बुरे) के विनाश के कारण हैं। वे अजेय हैं। उनके कोमल हृदय को भक्ति और विनय से ही वश में किया जा सकता है। वे करुणा से भरे हुए हैं। वे अनेक सहस्र गायों के दाता हैं… वे मानवता के लिए दिव्यमान उदारता की प्रतिमूर्ति हैं। वे देवताओं में कुबेर (धन-देव), वरुण (समुद्र-देव), इंद्र (वर्षा के देवता) और यम (मृत्यु-देव) के तुल्य हैं। चर्चा प्रॉम्प्ट: राजाओं ने दिव्य स्थिति का दावा क्यों किया? चित्र 2.4: एक कुषाण सिक्का — अग्र भाग: कनिष्क; पृष्ठ भाग: देवता। राजा को किस प्रकार दर्शाया गया है? चित्र 2.5: बलुआ पत्थर से बनी कुषाण राजा की मूर्ति। इस मूर्ति में ऐसी क्या विशेषताएँ हैं जिनसे यह प्रतीत होता है कि यह एक राजा की मूर्ति है?

5. बदलता हुआ देहात

5.1 जनता में राजा की छवि

  • मूल समस्या: राजाओं के बारे में प्रजा क्या सोचती थी? — अभिलेखों से सभी जवाब नहीं मिलते।
  • कारण: साधारण जनता द्वारा राजाओं के बारे में अपने विचारों और अनुभव के विवरण कम ही छोड़े गए हैं।
  • इतिहासकारों का समाधान: जातक और पंचतंत्र जैसे ग्रंथों में वर्णित कथाओं की समीक्षा।
    • इनमें से अनेक कथाओं के स्रोत मौखिक किस्से-कहानियाँ हैं जिन्हें बाद में लिपिबद्ध किया गया होगा।
    • जातक कथाएँ पहली सहस्राब्दि ई. के मध्य में पालि भाषा में लिखी गईं।

📖 गंदतिन्दु जातक — एक उदाहरण-कथा:

  • एक कुटिल राजा की प्रजा किस प्रकार से दुखी रहती है।
  • दुखी लोगों में — वृद्ध महिलाएँ, पुरुष, किसान, पशुपालक, ग्रामीण बालक और यहाँ तक कि जानवर भी शामिल हैं।
  • जब राजा अपनी पहचान बदल कर प्रजा के बीच में यह पता लगाने गया कि लोग उसके बारे में क्या सोचते हैं, तो एक-एक कर सबने अपने दुखों के लिए राजा को भला-बुरा कहा।
  • शिकायत: रात में डकैत उन पर हमला करते हैं तो दिन में कर इकट्ठा करने वाले अधिकारी।
  • ऐसी परिस्थिति से बचने के लिए लोग अपने-अपने गाँव छोड़कर जंगल में बस गए।

निष्कर्ष (कथा से):

  • राजा और प्रजा, विशेषकर ग्रामीण प्रजा, के बीच संबंध तनावपूर्ण रहते थे।
  • कारण: शासक अपने राजकोष को भरने के लिए बड़े-बड़े कर की माँग करते थे जिससे किसान ख़ासतौर पर त्रस्त रहते थे।
  • संकट से बचने का एक उपाय — जंगल की ओर भाग जाना।
  • इसी बीच करों की बढ़ती माँग को पूरा करने के लिए किसानों ने उपज बढ़ाने के और उपाय ढूँढ़ने शुरू किए।

5.2 उपज बढ़ाने के तरीके

(क) हल का प्रचलन

  • छठी शताब्दी ई.पू. से ही गंगा और कावेरी की घाटियों के उर्वर कछारी क्षेत्र में फैल गया था।
  • जिन क्षेत्रों में भारी वर्षा होती थी वहाँ लोहे के फाल वाले हलों के माध्यम से उर्वर भूमि की जुताई की जाने लगी।

(ख) धान की रोपाई (Transplantation)

  • गंगा की घाटी में धान की रोपाई की वजह से उपज में भारी वृद्धि।
  • किंतु: किसानों को इसके लिए कमरतोड़ मेहनत करनी पड़ती थी।

(ग) सीमाएँ — प्रौद्योगिकी सबके लिए नहीं थी:

  • लोहे के फाल वाले हल का उपयोग उपमहाद्वीप के कुछ ही हिस्से में सीमित था।
  • पंजाब और राजस्थान जैसी अर्धशुष्क ज़मीन वाले क्षेत्रों में लोहे के फाल वाले हल का प्रयोग बीसवीं सदी में शुरू हुआ।
  • पूर्वोत्तर और मध्य पर्वतीय क्षेत्रों के किसानों ने खेती के लिए कुदाल का उपयोग किया, जो ऐसे इलाके के लिए कहीं अधिक उपयोगी था।

(घ) सिंचाई

  • कुओं, तालाबों और कहीं-कहीं नहरों के माध्यम से।
  • व्यक्तिगत लोगों और कृषक समुदायों ने मिलकर सिंचाई के साधन निर्मित किए।
  • व्यक्तिगत तौर पर ऐसे साधन निर्मित करने वाले लोग प्रायः राजा या प्रभावशाली लोग थे जिन्होंने अपने इन कामों का उल्लेख अभिलेखों में भी करवाया।

📦 बॉक्स (पृ. 38): धान की रोपाई

धान की रोपाई उन क्षेत्रों में की जाती है जहाँ पानी बहुतायत मात्रा में होता है। इसमें पहले धान के बीज अंकुरित करके पानी से भरे खेतों में पौधों की रोपाई की जाती है। चूँकि ज्यादा मात्रा में पौध बच जाती है, अतः इससे धान की उपज बढ़ जाती है।

📜 स्रोत 5 (पृ. 38): “गुजरात की सुदर्शन झील”

  • सुदर्शन झील एक कृत्रिम जलाशय था। ज्ञान का स्रोत — लगभग दूसरी शताब्दी ई. का संस्कृत का एक पाषाण अभिलेख।
  • यह अभिलेख शक शासक रुद्रदमन की उपलब्धियों के उल्लेख के लिए बनवाया गया था। (मानचित्र 2 में गिरनार ढूँढ़िए।)
  • अभिलेख का कथन: जलद्वारों और तटबंधों वाली इस झील का निर्माण मौर्य काल में एक स्थानीय राज्यपाल द्वारा किया गया था।
  • भीषण तूफ़ान के कारण तटबंध टूट गए और सारा पानी बह गया।
  • तत्कालीन शासक रुद्रदमन ने इस झील की मरम्मत अपने खर्चे से करवाई, और इसके लिए अपनी प्रजा से कर भी नहीं लिया।
  • इसी पाषाण-खंड पर एक और अभिलेख (लगभग पाँचवीं सदी) — जिसमें कहा गया है कि गुप्त वंश के एक शासक ने एक बार फिर इस झील की मरम्मत करवाई थी।

चर्चा प्रॉम्प्ट: शासकों ने सिंचाई के प्रबंध क्यों किए?

5.3 ग्रामीण समाज में विभिन्नताएँ

  • मूल विरोधाभास: खेती की नयी तकनीकों से उपज तो बढ़ी लेकिन इसके लाभ समान नहीं थे।
  • प्रमाण मिलते हैं कि खेती से जुड़े लोगों में उत्तरोत्तर भेद बढ़ता जा रहा था।
  • बौद्ध कथाओं में उल्लेख — भूमिहीन खेतिहर श्रमिकों, छोटे किसानों और बड़े-बड़े ज़मींदारों का।
  • पालि भाषा में गहपति का प्रयोग छोटे किसानों और ज़मींदारों के लिए।
  • बड़े-बड़े ज़मींदार और ग्राम प्रधान शक्तिशाली माने जाते थे, जो प्रायः किसानों पर नियंत्रण रखते थे।
  • ग्राम प्रधान का पद प्रायः वंशानुगत होता था।
  • आरंभिक तमिल संगम साहित्य में भी गाँवों में रहने वाले विभिन्न वर्गों का उल्लेख:
    तमिल शब्दअर्थ
    वेल्लालरबड़े ज़मींदार
    उणवरहलवाहा
    अणिमईदास
  • संभावित आधार: यह संभव है कि वर्गों की यह विभिन्नता भूमि के स्वामित्व, श्रम और नयी प्रौद्योगिकी के उपयोग पर आधारित हो।
  • ऐसी परिस्थिति में भूमि का स्वामित्व महत्त्वपूर्ण हो गया जिसकी चर्चा प्रायः विधि ग्रंथों में की जाती थी।

📦 बॉक्स (पृ. 39): गहपति (Gahapati)

गहपति घर का मुखिया होता था और घर में रहने वाली महिलाओं, बच्चों, नौकरों और दासों पर नियंत्रण करता था। घर से जुड़ी भूमि, जानवर या अन्य सभी वस्तुओं का वह मालिक होता था। कभी-कभी इस शब्द का प्रयोग नगरों में रहने वाले संभ्रांत व्यक्तियों और व्यापारियों के लिए भी होता था।

📜 स्रोत 6 (पृ. 39): “सीमाओं का महत्त्व” —मनुस्मृति

  • मनुस्मृति आरंभिक भारत का सबसे प्रसिद्ध विधिग्रंथ; संस्कृत में दूसरी शताब्दी ई.पू. और दूसरी शताब्दी ई. के बीच लिखा गया।
  • राजा को सलाह:

चूँकि सीमाओं की अनभिज्ञता के कारण विश्व में बार-बार विवाद पैदा होते हैं, इसलिए उसे सीमाओं की पहचान के लिए गुप्त निशान ज़मीन में गाड़ कर रखने चाहिए — जैसे कि पत्थर, हड्डियाँ, गाय के बाल, भूसी, राख, खपटे, गाय के सूखे गोबर, ईंट, कोयला, कंकड़ और रेत। उसे सीमाओं पर इसी प्रकार के और तत्व भूमि में छुपा कर गाड़ने चाहिए जो समय के साथ नष्ट न हों। चर्चा प्रॉम्प्ट: क्या ये सीमा चिह्न विवाद के हल के लिए पर्याप्त रहे होंगे?

📜 स्रोत 7 (पृ. 40): “एक छोटे गाँव का जीवन” —हर्षचरित (बाणभट्ट)

  • हर्षचरित — संस्कृत में लिखी गई कन्नौज के शासक हर्षवर्धन की जीवनी; लेखक बाणभट्ट (लगभग सातवीं शताब्दी ई.), हर्षवर्धन के राजकवि।
  • विंध्य क्षेत्र के जंगल के किनारे की एक बस्ती का अतिविरल चित्रण:

बस्ती के किनारे का अधिकांश क्षेत्र जंगल है और यहाँ धान की उपज वाली, खलिहान और उपजाऊ भूमि के हिस्सों को छोटे किसानों ने आपस में बाँट लिया है… यहाँ के अधिकांश लोग कुदाल का प्रयोग करते हैं… क्योंकि घास से भरी भूमि में हल चलाना मुश्किल है। बहुत कम हिस्से साफ़ हैं, जो हैं भी उसकी काली मिट्टी काले लोहे जैसी सख्त है। यहाँ लोग पेड़ की छाल के गट्ठर लेकर चलते हैं। फूलों से भरे अनगिनत बोरे, अलसी और सन, भारी मात्रा में शहद, मोरपंख, मोम, लकड़ी और घास के बोझ लेकर आते-जाते रहते हैं। ग्रामीण महिलाएँ रास्ते में बसे गाँवों में जाकर बेचने को तत्पर रहती हैं। उनके सिरों पर जंगल से एकत्र किए गए फलों की टोकरियाँ थीं। चर्चा प्रॉम्प्ट: इस अंश में वर्णित लोगों को व्यवसाय के आधार पर आप कैसे वर्गीकृत करेंगे?

5.4 भूमिदान और नए संभ्रांत ग्रामीण

  • ईसवी की आरंभिक शताब्दियों से ही भूमिदान के प्रमाण मिलते हैं।
  • माध्यम: कई का उल्लेख अभिलेखों में; कुछ अभिलेख पत्थरों पर, अधिकांश ताम्र पत्रों पर खुदे होते थे — जिन्हें संभवतः प्रमाण रूप में उन लोगों को दिया जाता था जो भूमिदान लेते थे।
  • प्राप्तकर्ता: साधारण तौर पर धार्मिक संस्थाओं या ब्राह्मणों को दिए गए थे।
  • भाषा: अधिकांश अभिलेख संस्कृत में; विशेषकर सातवीं शताब्दी के बाद के अभिलेखों के कुछ अंश संस्कृत में और कुछ तमिल और तेलुगु जैसी स्थानीय भाषाओं में।

★प्रभावती गुप्त का उदाहरण (अत्यंत महत्त्वपूर्ण):

  • प्रभावती गुप्त — आरंभिक भारत के एक सबसे महत्त्वपूर्ण शासक चंद्रगुप्त द्वितीय (लगभग 375-415 ई.) की पुत्री।
  • उसका विवाह दक्कन पठार के वाकाटक परिवार में हुआ था, जो एक महत्त्वपूर्ण शासक वंश था।
  • विरोधाभास: संस्कृत धर्मशास्त्रों के अनुसार महिलाओं को भूमि जैसी संपत्ति पर स्वतंत्र अधिकार नहीं था — लेकिन एक अभिलेख से पता चलता है कि प्रभावती भूमि की स्वामी थी और उसने दान भी किया था।
  • दो संभावित व्याख्याएँ (NCERT):
    1. वह एक रानी थी (आरंभिक भारतीय इतिहास की ज्ञात कुछ रानियों में से एक) — इसीलिए यह उदाहरण एक विरला ही रहा हो।
    2. यह भी संभव है कि धर्मशास्त्रों को हर स्थान पर समान रूप से लागू नहीं किया जाता था।
  • ग्रामीण प्रजा का ज्ञान: अभिलेख से पता चलता है कि इनमें ब्राह्मण, किसान तथा अन्य प्रकार के वर्ग शामिल थे जो शासकों या उनके प्रतिनिधियों को कई प्रकार की वस्तुएँ प्रदान करते थे।
    • अभिलेख के अनुसार इन लोगों को गाँव के नए प्रधान की आज्ञाओं का पालन करना पड़ता था और संभवतः अपने भुगतान उसे ही देने पड़ते थे।

भूमिदान की विविधता:

  • क्षेत्रों में दान में दी गई भूमि की माप में अंतर — कहीं छोटे-छोटे टुकड़े, कहीं बड़े-बड़े क्षेत्र।
  • दान प्राप्त करने वालों के अधिकारों में भी क्षेत्रीय परिवर्तन।

⚖️ भूमिदान का प्रभाव — एक गर्म वाद-विवाद (दो मत):

मततर्क
मत 1भूमिदान शासक वंश द्वारा कृषि को नए क्षेत्रों में प्रोत्साहित करने की एक रणनीति थी
मत 2भूमिदान से दुर्बल होते राजनीतिक प्रभुत्व का संकेत मिलता है — अर्थात् राजा का शासन सामंतों पर दुर्बल होने लगा तो उन्होंने भूमिदान के माध्यम से अपने समर्थक जुटाने प्रारंभ कर दिए
  • मत 2 के समर्थक यह भी मानते हैं कि राजा स्वयं को उत्कृष्ट स्तर के मानव के रूप में प्रदर्शित करना चाहते थे (जैसा प्रशस्ति वाले अंश में देखा) — उनका नियंत्रण ढीला होता जा रहा था इसलिए वे अपनी शक्ति का आडंबर प्रस्तुत करना चाहते थे।

📜 स्रोत 8 (पृ. 41): “प्रभावती गुप्त और दंगुन गाँव”

प्रभावती गुप्त ने अपने अभिलेख में यह कहा है — प्रभावती ग्राम कुटुंबिनों (गाँव के गृहस्थ और कृषक), ब्राह्मणों, और दंगुन गाँव के अन्य वासियों को आदेश देती है:

“आपको ज्ञात है कि कार्तिक शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को धार्मिक पुण्य प्राप्ति के लिए इस ग्राम को जल अर्पण के साथ आचार्य चनालस्वामी को दान किया गया है। आपको इनके सभी आदेशों का पालन करना चाहिए। एक अग्रहार के लिए उपयुक्त निम्नलिखित रियायतों का निर्देश भी देती हूँ। इस गाँव में —

  • पुलिस या सैनिक प्रवेश नहीं करेंगे
  • दौरे पर आने वाले शासकीय अधिकारियों को यह गाँव घास देने और आसन में प्रयुक्त होने वाली जानवरों की खाल और कोयला देने के दायित्व से मुक्त है
  • मदिरा खरीदने और नमक हेतु खुदाई करने के राजसी अधिकार को कार्यान्वित किए जाने से मुक्त है
  • खनिज-पदार्थ और खदिर वृक्ष के उत्पाद देने से भी छूट
  • फूल और दूध देने से भी छूट
  • इस गाँव का दान इसके भीतर की संपत्ति और बड़े-छोटे सभी करों सहित किया गया है।” यह राज्यादेश 13वें राज्य वर्ष में लिखा गया और इसे चक्रदास ने उत्कीर्ण किया है। चर्चा प्रॉम्प्ट: इस गाँव में कौन-कौन सी वस्तुएँ पैदा की जाती थीं?

📦 बॉक्स (पृ. 41): अग्रहार (Agrahara)

अग्रहार उस भूभाग को कहते थे जो ब्राह्मणों को दान किया जाता था। ब्राह्मणों से भूमिकर या अन्य प्रकार के कर नहीं वसूले जाते थे। ब्राह्मणों को स्वयं स्थानीय लोगों से कर वसूलने का अधिकार था।

! नियंत्रण से बाहर के लोग: भूमिदान के प्रचलन से राज्य तथा किसानों के बीच संबंध की झाँकी मिलती है। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी थे जिन पर अधिकारियों या सामंतों का नियंत्रण नहीं था: पशुपालक, संग्राहक, शिकारी, मछुआरे, शिल्पकार, घुमक्कड़ (लगभग एक ही स्थान पर रहने वाले), और जगह-जगह घूम कर खेती करने वाले लोग।

  • सामान्यतः ऐसे लोग अपने जीवन और आदान-प्रदान के विवरण नहीं रखते थे।

शिक्षण-बिंदु: यह वाक्य ‘हाशिए के समुदाय’ और ‘साक्ष्य का अभाव’ की समस्या को सीधे जोड़ता है — §8 से इसका संबंध बनाइए।

चर्चा प्रॉम्प्ट (पृ. 41): यह पता कीजिए कि क्या आपके राज्य में हल से खेती, सिंचाई, तथा धान की रोपाई की जाती है? और अगर नहीं तो क्या कोई वैकल्पिक व्यवस्थाएँ हैं?

6. नगर एवं व्यापार

6.1 नए नगर

  • नगरों का विकास लगभग छठी शताब्दी ई.पू. में उपमहाद्वीप के विभिन्न क्षेत्रों में हुआ।
  • अधिकांश नगर महाजनपदों की राजधानियाँ थे।
  • अवस्थिति के प्रकार:
    प्रकारउदाहरण
    संचार मार्गों के किनारेप्रायः सभी नगर
    नदीमार्ग के किनारेपाटलिपुत्र
    भूतल मार्गों के किनारेउज्जयिनी
    समुद्रतट पर (जहाँ से समुद्री मार्ग प्रारंभ)पुहार
    व्यावसायिक, सांस्कृतिक व राजनीतिक गतिविधियों के जीवंत केंद्रमथुरा जैसे अनेक शहर

📦 बॉक्स (पृ. 42): पाटलिपुत्र का इतिहास

  • प्रत्येक नगर का अपना इतिहास था।
  • पाटलिपुत्र का विकास पाटलिग्राम नाम के एक गाँव से हुआ।
  • पाँचवीं सदी ई.पू. में मगध शासकों ने अपनी राजधानी राजगाह से हटाकर इसे बस्ती में लाने का निर्णय लिया और इसका नाम बदल दिया।
  • चौथी शताब्दी ई.पू. तक आते-आते यह मौर्य साम्राज्य की राजधानी और एशिया के सबसे बड़े नगरों में से एक बन गया।
  • बाद में इसका महत्त्व कम हो गया — जब चीनी यात्री श्वैन त्सांग सातवीं सदी ई. में यहाँ आया तो उसे यह नगर खंडहर में बदला मिला और उस समय यहाँ की जनसंख्या भी कम थी।

6.2 नगरीय जनसंख्या : संभ्रांत वर्ग और शिल्पकार

  • शासक वर्ग और राजा किलेबंद नगरों में रहते थे।
  • उत्खनन की सीमा: अधिकांश स्थलों पर व्यापक रूप से खुदाई करना संभव नहीं है, क्योंकि आज भी इन क्षेत्रों में लोग रहते हैं (हड़प्पा शहरों से भिन्न)।
  • फिर भी प्राप्त पुरावशेष:
    • उत्तरी कृष्ण मार्जित पात्र (Northern Black Polished Ware — NBPW): उत्कृष्ट श्रेणी के मिट्टी के कटोरे और थालियाँ जिन पर चमकदार कलई चढ़ी है। संभवतः इनका उपयोग अमीर लोग किया करते होंगे।
    • सोने, चाँदी, कांस्य, ताँबे, हाथी दाँत, शीशे जैसे तरह-तरह के पदार्थों के बने गहने, उपकरण, हथियार, बर्तन, सीप और पक्की मिट्टी की वस्तुएँ।
  • ★दानात्मक अभिलेख (द्वितीय शताब्दी ई.पू. से): कई नगरों में छोटे दानात्मक अभिलेख प्राप्त होते हैं। इनमें दाता के नाम के साथ-साथ प्रायः उसके व्यवसाय का भी उल्लेख होता है।
    • नगरों में रहने वाले व्यवसायी: धोबी, बुनकर, लिपिक, बढ़ई, कुम्हार, स्वर्णकार, लौहकार, अधिकारी, धार्मिक गुरु, व्यापारी और राजा।
  • ★श्रेणी (Shreni / Guild): कभी-कभी उत्पादकों और व्यापारियों के संघ का उल्लेख मिलता है जिन्हें श्रेणी कहा गया है।
    • कार्यविधि: ये श्रेणियाँ संभवतः पहले कच्चे माल को खरीदती थीं; फिर उनसे सामान तैयार कर बाज़ार में बेच देती थीं।
  • लोहे के उपकरण: यह संभव है कि शिल्पकारों ने नगर में रहने वाले संभ्रांत लोगों की बढ़ती माँग को पूरा करने के लिए कई प्रकार के लोह उपकरणों का प्रयोग किया हो।

📦 बॉक्स (पृ. 43): दानात्मक अभिलेख

दानात्मक अभिलेखों में धार्मिक संस्थाओं को दिए दान का विवरण होता है।

चित्र 2.6: एक प्रतिमा की भेंट — मथुरा से मिली मूर्ति का भाग; प्राकृत में अभिलेख कि एक स्वर्णकार धर्मक की पत्नी नागपिया ने इसे एक धार्मिक स्थल में स्थापित किया था। चर्चा प्रॉम्प्ट (पृ. 43): तीसरी सहस्राब्दि ई.पू. में हड़प्पा सभ्यता जिस क्षेत्र में फैली थी, क्या वहाँ कोई नगर थे?

6.3 उपमहाद्वीप और उसके बाहर का व्यापार

  • छठी शताब्दी ई.पू. से ही उपमहाद्वीप में नदी मार्गों और भूमार्गों का मानो जाल बिछ गया था और कई दिशाओं में फैल गया था।
  • भू-मार्ग: मध्य एशिया और उससे भी आगे तक।
  • जलमार्ग:
    • समुद्रतट पर बने कई बंदरगाहों से जलमार्ग अरब सागर से होते हुए उत्तरी अफ़्रीका, पश्चिम एशिया तक फैल गया
    • बंगाल की खाड़ी से यह मार्ग चीन और दक्षिणपूर्व एशिया तक फैल गया
  • शासकों की भूमिका: शासकों ने प्रायः इन मार्गों पर नियंत्रण करने की कोशिश की और संभवतः वे इन मार्गों पर व्यापारियों की सुरक्षा के बदले उनसे धन लेते थे।
  • व्यापारियों के प्रकार:
    • पैदल फेरी लगाने वाले व्यापारी
    • बैलगाड़ी और घोड़े-खच्चरों जैसे जानवरों के दल के साथ चलने वाले व्यापारी
    • समुद्री मार्ग से यात्रा करने वाले — खतरनाक तो थी, लेकिन बहुत लाभदायक भी
  • ★सफल व्यापारियों के नाम:
    भाषाशब्द
    तमिलमसत्तुवन
    प्राकृतसत्थवाह तथा सेट्ठी
    • ये बड़े धनी हो जाते थे।
  • व्यापारिक वस्तुएँ: नमक, अनाज, कपड़ा, धातु और उससे निर्मित उत्पाद, पत्थर, लकड़ी, जड़ी-बूटी — एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाए जाते थे।
  • रोमन साम्राज्य में भारी माँग: काली मिर्च जैसे मसालों तथा कपड़ों व जड़ी-बूटियों की। इन सभी वस्तुओं को अरब सागर के रास्ते भूमध्य क्षेत्र तक पहुँचाया जाता था।

📜 स्रोत 9 (पृ. 44): “मालाबार तट (आधुनिक केरल)” —पेरिप्लस ऑफ़ एरीथ्रियन सी

  • यह एक यूनानी समुद्र यात्री द्वारा रचित ग्रंथ का अंश (लगभग प्रथम शताब्दी ई.)।

भारी मात्रा में काली मिर्च और दाल चीनी खरीदने के लिए बाज़ार वाले नगरों में वे (विदेशी व्यापारी) जहाज़ भेजते हैं। एक तो यहाँ भारी मात्रा में सिक्कों, पुखराज, सुरमा, मूँगे, कच्चे शीशे, ताँबे, टिन और सीसे का आयात किया जाता है… इन बाज़ारों के आसपास भारी मात्रा में उत्पन्न काली मिर्च का निर्यात किया जाता है… इसके अलावा, उच्च कोटि के मोतियों, हाथी दाँत, रेशमी वस्त्र, विभिन्न प्रकार के पारदर्शी पत्थरों, हीरों और काले नग और कछुए की खोपड़ी का भारी मात्रा में आयात होता है।

  • तमिलनाडु के कोडुमनाल में बहुमूल्य और कम मूल्यवान पत्थरों से बनाए जाने वाले मूँगों के उद्योग के पुरातात्त्विक साक्ष्य मिले हैं। यह संभव है कि पेरिप्लस में वर्णित पत्थरों को इन्हीं तटवर्ती बंदरगाहों तक स्थानीय व्यापारी लाए होंगे।

चर्चा प्रॉम्प्ट: लेखक ने यह सूची क्यों तैयार की थी?

📦 बॉक्स (पृ. 44): पेरिप्लस व एरीथ्रियन

पेरिप्लस यूनानी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ समुद्री यात्रा है और एरीथ्रियन यूनानी भाषा में लाल सागर को कहते हैं।

6.4 सिक्के और राजा

  • व्यापार के लिए सिक्के के प्रचलन से विनिमय कुछ हद तक आसान हो गया था।
  • ★आहत सिक्के (Punch-marked coins):
    • चाँदी और ताँबे के; छठी शताब्दी ई.पू. में सबसे पहले ढाले गए और प्रयोग में आए।
    • पूरे उपमहाद्वीप में खुदाई के दौरान इस प्रकार के सिक्के मिले हैं।
    • मुद्राशास्त्रियों ने इनका और अन्य सिक्कों का अध्ययन करके उनके वाणिज्यिक प्रयोग के संभावित क्षेत्रों का पता लगाया।
    • नाम का कारण: ‘आहत’ शब्द से ही स्पष्ट है कि इन सिक्कों पर प्रतीकों को आहत कर (ठप्पा मारकर) उन्हें बनाया जाता था।
    • जारीकर्ता: आहत सिक्कों पर बने प्रतीकों को मौर्य वंश जैसे राजवंशों के प्रतीकों से मिलाकर पहचान करने की कोशिश की गई तो पता चला कि इन सिक्कों को राजाओं ने जारी किया था। यह भी संभव है कि व्यापारियों, धनपतियों और नागरिकों ने भी कुछ सिक्के जारी किए हों।
  • ★शासकों की प्रतिमा वाले पहले सिक्के: हिंद-यूनानी शासकों ने जारी किए, जिन्होंने द्वितीय शताब्दी ई.पू. में उपमहाद्वीप के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र पर नियंत्रण स्थापित किया था।
  • ★कुषाण के सोने के सिक्के: प्रथम शताब्दी ईसवी में बड़े पैमाने पर जारी।
    • इनके आकार और वजन तत्कालीन रोमन सम्राटों तथा ईरान के पार्थियन शासकों द्वारा जारी सिक्कों के बिलकुल समान थे।
    • उत्तर और मध्य भारत के कई पुरास्थलों पर मिले।
    • निष्कर्ष: सोने के सिक्कों के व्यापक प्रयोग से संकेत — बहुमूल्य वस्तुओं और भारी मात्रा में वस्तुओं का विनिमय किया जाता था।
  • ★रोमन सिक्के: दक्षिण भारत के अनेक पुरास्थलों से बड़ी संख्या में मिले हैं।
    • स्पष्ट निष्कर्ष: व्यापारिक तंत्र राजनीतिक सीमाओं से बँधा नहीं था; क्योंकि दक्षिण भारत रोमन साम्राज्य के अंतर्गत न होते हुए भी व्यापारिक दृष्टि से रोमन साम्राज्य से संबंधित था।
  • ★यौधेय: पंजाब और हरियाणा जैसे क्षेत्रों के यौधेय (प्रथम शताब्दी ई.) कबायली गणराज्यों ने भी सिक्के जारी किए।
    • पुराविदों को यौधेय शासकों द्वारा जारी ताँबे के सिक्के हज़ारों की संख्या में मिले हैं — जिससे यौधेयों की व्यापार में रुचि और सहभागिता परिलक्षित होती है।
  • ★गुप्त शासकों के सोने के सिक्के: सबसे भव्य सिक्कों में से कुछ गुप्त शासकों ने जारी किए। इनके आरंभिक सिक्कों में प्रयुक्त सोना अति उत्तम था। इनके माध्यम से दूर देशों से व्यापार-विनिमय करने में आसानी होती थी जिससे शासकों को भी लाभ होता था।

⚖️ छठी शताब्दी ई. से सोने के सिक्के कम मिलने लगे — क्या यह आर्थिक संकट था? (मतभेद):

मततर्क
मत 1रोमन साम्राज्य के पतन के बाद दूरवर्ती व्यापार में कमी आई, जिससे उन राज्यों, समुदायों और क्षेत्रों की संपन्नता पर असर पड़ा जिन्हें दूरवर्ती व्यापार से लाभ मिलता था
मत 2इस काल में नए नगरों और व्यापार के नवीन तंत्रों का उदय होने लगा था। यद्यपि सोने के सिक्कों का मिलना कम हो गया, लेकिन अभिलेखों और ग्रंथों में सिक्के का उल्लेख होता रहा — क्या इसका अर्थ यह हो सकता है कि सिक्के इसलिए कम मिलते हैं क्योंकि वे प्रचलन में थे और उनका किसी ने संग्रह करके नहीं रखा था?

📦 बॉक्स (पृ. 45): मुद्राशास्त्र (Numismatics)

मुद्राशास्त्र सिक्कों का अध्ययन है। इसके साथ ही उन पर पाए जाने वाले चित्र, लिपि आदि तथा उनकी धातुओं का विश्लेषण और जिन संदर्भों में इन सिक्कों को पाया गया है, उनका अध्ययन भी मुद्राशास्त्र के अंतर्गत आता है।

चित्र 2.7: आहत सिक्का • चित्र 2.8: एक यौधेय सिक्का • चित्र 2.9: एक गुप्त सिक्का • चित्र 2.12: हिंद-यूनानी शासक मेनाण्डर का सिक्का चर्चा प्रॉम्प्ट (पृ. 45): व्यापार में विनिमय के लिए क्या-क्या प्रयोग होता था? उल्लिखित स्रोतों से किस प्रकार के विनिमय का पता चलता है? क्या कुछ विनिमय ऐसे भी हैं जिनका ज्ञान स्रोतों से नहीं हो पाता है?

🗺 मानचित्र 3 (पृ. 43): कुछ महत्त्वपूर्ण राज्य और नगरध्यान

राज्य — कुषाण, शक, गुप्त, वाकाटक, सातवाहन, चोल, चेर, पांड्य। नगर — तक्षशिला, कन्नौज, मथुरा, श्रावस्ती, वैशाली, पाटलिपुत्र, राजगीर, वाराणसी, कौशाम्बी, महास्थान, चंद्रकेतुगढ़, विदिशा, उज्जयिनी, भरूकच्छ, सोपारा, पैठन, शिशुपालगढ़, धान्यकटक, कोडुमनाल, पुहार।

7. मूल बातें : अभिलेखों का अर्थ कैसे निकाला जाता है?

महत्त्वपूर्ण: अब तक हम अभिलेखों के अंशों का अध्ययन कर रहे थे। लेकिन इतिहासकारों को यह कैसे ज्ञात होता है कि अभिलेखों पर क्या लिखा है?

7.1 ब्राह्मी लिपि का अध्ययन

  • आधुनिक भारतीय भाषाओं में प्रयुक्त लगभग सभी लिपियों का मूल ब्राह्मी लिपि है।
  • ब्राह्मी लिपि का प्रयोग असोक के अभिलेखों में किया गया है।
  • अठारहवीं सदी से यूरोपीय विद्वानों ने भारतीय पंडितों की सहायता से आधुनिक बंगाली और देवनागरी लिपि में कई पांडुलिपियों का अध्ययन शुरू किया और उनके अक्षरों की प्राचीन अक्षरों के नमूनों से तुलना शुरू की।
  • एक बड़ी भूल: आरंभिक अभिलेखों का अध्ययन करने वाले विद्वानों ने कई बार यह अनुमान लगाया कि ये संस्कृत में लिखे हैं — जबकि प्राचीनतम अभिलेख वस्तुतः प्राकृत में थे।
  • कई दशकों बाद, अभिलेख वैज्ञानिकों के अथक परिश्रम के बाद जेम्स प्रिंसेप ने 1838 ई. में असोककालीन ब्राह्मी लिपि का अर्थ निकाल लिया।

चित्र 2.11: असोक के समय की ब्राह्मी व उसके समानार्थी देवनागरी अक्षर। चर्चा प्रॉम्प्ट: क्या कुछ देवनागरी अक्षर ब्राह्मी से मिलते-जुलते हैं? क्या कुछ भिन्न भी हैं?

7.2 खरोष्ठी लिपि को कैसे पढ़ा गया?

  • खरोष्ठी लिपि — पश्चिमोत्तर के अभिलेखों में प्रयुक्त। इसके पढ़े जाने की कहानी अलग है।
  • इस क्षेत्र में शासन करने वाले हिंद-यूनानी राजाओं (लगभग द्वितीय-प्रथम शताब्दी ई.पू.) द्वारा बनवाए गए सिक्कों से जानकारी हासिल करने में आसानी हुई।
  • इन सिक्कों में राजाओं के नाम यूनानी और खरोष्ठी दोनों में लिखे गए हैं।
  • यूनानी भाषा पढ़ने वाले यूरोपीय विद्वानों ने अक्षरों का मेल किया।
    • उदाहरण: दोनों लिपियों में अपोलोडोटस का नाम लिखने में एक ही प्रतीक, मान लीजिए ‘अ’ प्रयुक्त किया गया।
  • चूँकि प्रिंसेप ने खरोष्ठी में लिखे अभिलेखों की भाषा की पहचान प्राकृत के रूप में की थी, इसलिए लंबे अभिलेखों को पढ़ना सरल हो गया।

शिक्षण-अंतर्दृष्टि: यह द्विभाषिक सिक्के की सहायता से लिपि पढ़ने का उदाहरण है — ठीक वही सिद्धांत जिसकी कमी हड़प्पाई लिपि में है (अध्याय 1)। यह तुलना अवश्य कराइए।

7.3 अभिलेखों से प्राप्त ऐतिहासिक साक्ष्य

असोक के अभिलेखों का उदाहरण (स्रोत 10 व 11):

  • ध्यान देने योग्य बात: अभिलेख (स्रोत 10) में शासक असोक का नाम नहीं लिखा है। उसमें असोक द्वारा अपनाई गई उपाधियों का प्रयोग किया गया है:
    • देवानांपिय — अर्थात् ‘देवताओं का प्रिय’
    • पियदस्सी — यानी ‘देखने में सुन्दर’
  • असोक नाम अन्य अभिलेखों में मिलता है जिसमें उनकी उपाधियाँ भी लिखी हैं।
  • अभिलेखशास्त्रियों का निष्कर्ष: इन अभिलेखों का परीक्षण करने के बाद पता लगाया कि उनके विषय, शैली, भाषा और पुरालिपिविज्ञान सबमें समानता है, अतः वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि इन अभिलेखों को एक ही शासक ने बनवाया था।

! आलोचनात्मक परीक्षण की आवश्यकता:

  1. असोक ने अपने अभिलेखों में कहा है कि उनसे पहले के शासकों ने रिपोर्ट एकत्र करने की व्यवस्था नहीं की थी। यदि असोक से पहले के उपमहाद्वीपीय इतिहास पर विचार करें तो क्या असोक का यह वक्तव्य सही है?
    • इतिहासकारों को बार-बार अभिलेखों में लिखे कथनों का परीक्षण करना पड़ता है ताकि पता चल सके कि जो उनमें लिखा है, वह सत्य है, संभव है या फिर अतिशयोक्तिपूर्ण है।
  2. कोष्ठकों का प्रश्न: क्या आपने ध्यान दिया कि कुछ शब्द ब्रैकेट में लिखे हैं? अभिलेखशास्त्री प्रायः वाक्यों के अर्थ स्पष्ट करने के लिए ऐसा करते हैं। यह बड़े ध्यान से करना पड़ता है जिससे कि लेखक का मूल अर्थ न बदल जाए।
  3. पठनीयता का प्रश्न: यदि राजा के आदेश यातायात मार्गों के किनारे और नगरों के पास प्राकृतिक पत्थरों पर उत्कीर्ण थे, तो —
    • क्या वहाँ से आने-जाने वाले लोग उन्हें पढ़ने के लिए उस स्थान पर रुकते थे?
    • अधिकांश लोग प्रायः पढ़े-लिखे नहीं थे।
    • क्या पाटलिपुत्र में प्रयुक्त प्राकृत उपमहाद्वीप में सभी स्थानों पर लोग समझते थे?
    • क्या राजा के आदेशों का पालन किया जाता था?
    • इन प्रश्नों के उत्तर पाना सदैव आसान नहीं है।

📜 स्रोत 10 (पृ. 47): “राजा के आदेश”

राजन् देवानांपिय पियदस्सी यह कहते हैं: अतीत में मसलों को निपटाने और नियमित रूप से सूचना एकत्र करने की व्यवस्थाएँ नहीं थीं। लेकिन मैंने निम्नलिखित (व्यवस्था) की है। लोगों के समाचार हम तक पतिवेदक सदैव पहुँचाएँ। चाहे मैं कहीं भी हूँ, खाना खा रहा हूँ, अन्तःपुर में हूँ, विश्राम कक्ष में हूँ, गोशाले में हूँ, या फिर पालकी में मुझे ले जाया जा रहा हो अथवा वाटिका में हूँ। मैं लोगों के विषयों का निराकरण हर स्थल पर करूँगा। चर्चा प्रॉम्प्ट: अभिलेखशास्त्रियों ने पतिवेदक शब्द का अर्थ संवाददाता बताया है। आधुनिक संवाददाता की तुलना में पतिवेदक के दायित्व कितने भिन्न रहे होंगे?

📜 स्रोत 11 (पृ. 48): “राजा की वेदना” — कलिंग युद्ध

जब देवानांपिय पियदस्सी ने अपने शासन के आठ वर्ष पूरे किए तो उन्होंने कलिंग (आधुनिक तटवर्ती उड़ीसा) पर विजय प्राप्त की। डेढ़ लाख पुरुषों को निष्कासित किया गया; एक लाख मारे गए और इससे भी ज्यादा की मृत्यु हुई। कलिंग पर शासन स्थापित करने के बाद देवानांपिय धम्म के गहन अध्ययन, धम्म के स्नेह और धम्म के उपदेश में डूब गए हैं। यही देवानांपिय के लिए कलिंग की विजय का पश्चाताप है। देवानांपिय के लिए यह बहुत वेदनादायी और निंदनीय है कि जब कोई किसी राज्य पर विजय प्राप्त करता है तो पराजित राज्य का हनन होता है, वहाँ लोग मारे जाते हैं, निष्कासित किए जाते हैं।

★एक सूक्ष्म व अत्यंत महत्त्वपूर्ण विरोधाभास (NCERT का विशेष अवलोकन):

  • यद्यपि असोक के अभिलेख आधुनिक उड़ीसा से प्राप्त हुए हैं — लेकिन उनकी वेदना को परिलक्षित करने वाला अभिलेख वहाँ नहीं मिला है।
  • अर्थात् यह अभिलेख उस क्षेत्र में नहीं उपलब्ध है जिस पर विजय प्राप्त की गई थी।
  • इसका हम क्या अर्थ लगाएँ? क्या राजा की नव विजय की वेदना उस क्षेत्र के लिए इतनी दर्दनाक थी कि राजा इस मुद्दे पर कुछ कह न सका?

चर्चा प्रॉम्प्ट (पृ. 48): मानचित्र 2 देखिए और असोक के अभिलेख के प्राप्ति स्थान की चर्चा कीजिए। क्या उनमें कोई एक-सा प्रारूप दिखता है?

8. अभिलेख साक्ष्य की सीमा

★यह खंड अध्याय की आत्मा है — प्रत्येक सीमा को अलग-अलग समझाइए।

(क) तकनीकी सीमाएँ

  1. अक्षरों को हलके ढंग से उत्कीर्ण किया जाता है जिन्हें पढ़ पाना मुश्किल होता है।
  2. अभिलेख नष्ट भी हो सकते हैं जिनसे अक्षर लुप्त हो जाते हैं।

(ख) अर्थ-संबंधी सीमाएँ 3. अभिलेखों के शब्दों के वास्तविक अर्थ के बारे में पूर्ण रूप से ज्ञान हो पाना सदैव सरल नहीं होता — क्योंकि कुछ अर्थ किसी विशेष स्थान या समय से संबंधित होते हैं।

  • यदि आप अभिलेख के शोधपत्रों को पढ़ें (कुछ का उल्लेख काल रेखा 2 में है) तो पाएँगे कि विद्वान इनके पढ़ने की वैकल्पिक विधियों पर चर्चा करते रहते हैं।

(ग) मात्रात्मक सीमाएँ 4. यद्यपि कई हज़ार अभिलेख प्राप्त हुए हैं लेकिन —

  • सभी के अर्थ नहीं निकाले जा सके हैं
  • सभी प्रकाशित नहीं किए गए हैं
  • सभी के अनुवाद नहीं किए गए हैं
  1. और अनेक अभिलेख रहे होंगे जो कालांतर में सुरक्षित नहीं बचे हैं।
    • इसलिए जो अभिलेख अभी उपलब्ध हैं, वह संभवतः कुल अभिलेखों के अंश मात्र हैं।

(घ) ★एक और मौलिक समस्या — विषय-वस्तु का चयन 6. यह ज़रूरी नहीं है कि जिसे हम आज राजनीतिक और आर्थिक रूप से महत्त्वपूर्ण मानते हैं उन्हें अभिलेखों में अंकित किया ही गया हो।

  • उदाहरण: खेती की दैनिक प्रक्रियाएँ और रोज़मर्रा की ज़िंदगी के सुख-दुख का उल्लेख अभिलेखों में नहीं मिलता — क्योंकि प्रायः अभिलेख बड़े और विशेष अवसरों का वर्णन करते हैं।
  1. ★सबसे महत्त्वपूर्ण: इसके अलावा अभिलेख हमेशा उन्हीं व्यक्तियों के विचार व्यक्त करते हैं जो उन्हें बनवाते थे।
    • इसलिए इन अभिलेखों में व्यक्त विचारों की समीक्षा अन्य विचारों के परिप्रेक्ष्य में करनी होगी ताकि अपने अतीत का बेहतर ज्ञान हो सके।

★अध्याय का निष्कर्ष (पृ. 49 — नीले रंग में मुद्रित, अत्यंत महत्त्वपूर्ण):

अर्थात् राजनीतिक और आर्थिक इतिहास का पूर्ण ज्ञान मात्र अभिलेख शास्त्र से ही नहीं मिलता है। साथ ही इतिहासकार प्रायः प्राचीन और अर्वाचीन दोनों प्रकार के प्रमाणों पर आशंका व्यक्त करते हैं। उन्नीसवीं सदी के आखिरी दशकों में और बीसवीं सदी के प्रारंभ में इतिहासकार प्रमुख रूप से राजाओं के इतिहास में रुचि रखते थे। बीसवीं सदी के मध्य से आर्थिक परिवर्तन, विभिन्न सामाजिक समुदायों के उदय के विषय में महत्त्वपूर्ण बन गए। हाल के दशकों में ऐसे समुदायों के प्रति इतिहासकारों की रुचि बढ़ी है जो सामाजिक हाशिए पर रहे हैं। इससे संभवतः प्राचीन स्रोतों पर पुनर्विचार किया जाएगा और विश्लेषण की नयी विधियाँ विकसित होंगी।

चित्र 2.13: कर्नाटक से प्राप्त एक ताम्रपत्र लेख; लगभग छठी शताब्दी ई.

काल रेखा 1 : प्रमुख राजनीतिक और आर्थिक विकास

कालविकास
लगभग 600-500 ई.पू.धान की रोपाई; गंगा घाटी में नगरीकरण; महाजनपद; आहत सिक्के
लगभग 500-400 ई.पू.मगध के शासकों की सत्ता पर पकड़
लगभग 327-325 ई.पू.सिकंदर का आक्रमण
लगभग 321 ई.पू.चंद्रगुप्त मौर्य का राज्यारोहण
लगभग 272/268-231 ई.पू.असोक का शासन
लगभग 185 ई.पू.मौर्य साम्राज्य का अंत
लगभग 200-100 ई.पू.पश्चिमोत्तर में शक शासन; दक्षिण भारत में चोल, चेर व पांड्य; दक्कन में सातवाहन
लगभग 100 ई.पू.-200 ई.पश्चिमोत्तर के शक (मध्य एशिया के लोग) शासक; रोमन व्यापार; सोने के सिक्के
लगभग 78 ई.कनिष्क का राज्यारोहण (तिथि निश्चित नहीं)
लगभग 100-200 ई.सातवाहन और शक शासकों द्वारा भूमिदान के अभिलेखीय प्रमाण
लगभग 320 ई.गुप्त शासन का आरंभ
लगभग 335-375 ई.समुद्रगुप्त
लगभग 375-415 ई.चंद्रगुप्त द्वितीय; दक्कन में वाकाटक
लगभग 500-600 ई.कर्नाटक में चालुक्यों का उदय और तमिलनाडु में पल्लवों का उदय
लगभग 606-647 ई.कन्नौज के राजा हर्षवर्धन; चीनी यात्री श्वैन त्सांग की यात्रा
लगभग 712 ई.अरबों की सिंध पर विजय

NCERT का नोट: आर्थिक विकास का शुद्ध कालनिर्धारण आसान नहीं है। साथ ही उपमहाद्वीप में अनेक भिन्नताएँ हैं जिन्हें काल रेखा में इंगित नहीं किया गया है। कनिष्क के राज्यारोहण की तिथि निश्चित नहीं है, अतः राज्यारोहण की तिथि के साथ प्रश्नवाचक चिह्न लगाया गया है।

काल रेखा 2 : अभिलेखशास्त्र के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण प्रगति

वर्षघटना
1784बंगाल एशियाटिक सोसाइटी का गठन
1810 का दशककोलिन मैकेंज़ी ने संस्कृत और तमिल भाषा के 8,000 अभिलेख एकत्र किए
1838जेम्स प्रिंसेप द्वारा असोक के ब्राह्मी अभिलेखों का अर्थ लगाना
1877अलेक्ज़ैंडर कनिंघम ने असोक के अभिलेखों के एक अंश को प्रकाशित किया
1886दक्षिण भारत के अभिलेखों के शोधपत्र एपिग्राफ़िआ कर्नाटिका का प्रथम अंक
1888एपिग्राफ़िआ इंडिका का प्रथम अंक
1965-66डी.सी. सरकार ने इंडियन एपिग्राफ़ी एंड इंडियन एपिग्राफ़िकल ग्लोसरी प्रकाशित की

NCERT अभ्यास प्रश्न (पृ. 51–52)

उत्तर दीजिए (लगभग 100 से 150 शब्दों में):

  1. आरंभिक ऐतिहासिक नगरों में शिल्पकला के उत्पादन के प्रमाणों की चर्चा कीजिए। हड़प्पा के नगरों के प्रमाण से ये प्रमाण कितने भिन्न हैं?
  2. महाजनपदों के विशिष्ट अभिलक्षणों का वर्णन कीजिए।
  3. सामान्य लोगों के जीवन का पुनर्निर्माण इतिहासकार कैसे करते हैं?
  4. पांड्य सरदार (स्रोत 3) को दी जाने वाली वस्तुओं की तुलना दंगुन गाँव (स्रोत 8) की वस्तुओं से कीजिए। आपको क्या समानताएँ और असमानताएँ दिखाई देती हैं?
  5. अभिलेखशास्त्रियों की कुछ समस्याओं की सूची बनाइए।

निम्नलिखित पर एक लघु निबंध लिखिए (लगभग 500 शब्दों में): 6. मौर्य प्रशासन के प्रमुख अभिलक्षणों की चर्चा कीजिए। असोक के अभिलेखों में इनमें से कौन-कौन से तत्वों के प्रमाण मिलते हैं? 7. यह बीसवीं शताब्दी के एक सुविख्यात अभिलेखशास्त्री, डी.सी. सरकार का वक्तव्य है: “भारतीयों के जीवन, संस्कृति, और गतिविधियों का ऐसा कोई पक्ष नहीं है जिसका प्रतिबिंब अभिलेखों में नहीं है।” चर्चा कीजिए। 8. उत्तर-मौर्य काल में विकसित राजत्व के विचारों की चर्चा कीजिए। 9. वर्णित काल में कृषि के तौर-तरीकों में किस हद तक परिवर्तन हुए?

मानचित्र कार्य: 10. मानचित्र 1 और 2 की तुलना कीजिए और उन महाजनपदों की सूची बनाइए जो मौर्य साम्राज्य में शामिल रहे होंगे। क्या इस क्षेत्र में असोक के कोई अभिलेख मिले हैं?

परियोजना कार्य (कोई एक): 11. एक महीने के अख़बार एकत्रित कीजिए — सरकारी अधिकारियों द्वारा सार्वजनिक कार्यों के बारे में दिए गए वक्तव्यों को काटकर एकत्रित कीजिए। समीक्षा कीजिए कि इन परियोजनाओं के लिए आवश्यक संसाधनों के बारे में खबरों में क्या लिखा है। संसाधनों को किस प्रकार से एकत्र किया जाता है और परियोजनाओं का उद्देश्य क्या है। इन वक्तव्यों को कौन जारी करता है और उन्हें क्यों और कैसे प्रसारित किया जाता है? इस अध्याय में चर्चित अभिलेखों के साक्ष्यों से इनकी तुलना कीजिए। 12. आज प्रचलित पाँच विभिन्न नोटों और सिक्कों को इकट्ठा कीजिए। इनके दोनों ओर आप जो देखते हैं उनका वर्णन कीजिए। इन पर बने चित्रों, लिपियों और भाषाओं, माप, आकार या अन्य समानताओं और असमानताओं के बारे में एक रिपोर्ट तैयार कीजिए। इस अध्याय में दर्शित सिक्कों में प्रयुक्त सामग्रियों, तकनीकों, प्रतीकों, उनके महत्त्व और सिक्कों के संभावित कार्य की चर्चा करते हुए इनकी तुलना कीजिए।

शिक्षक-संदर्भ: ‘चर्चा कीजिए’ के सभी प्रॉम्प्ट (In-text Discussion Prompts)

  1. (पृ. 30) ऐसे कौन से क्षेत्र हैं जहाँ राज्य और नगर सर्वाधिक सघन रूप से बसे थे? (मानचित्र 1)
  2. (पृ. 31) मगध की सत्ता के विकास के लिए आरंभिक और आधुनिक लेखकों ने क्या-क्या व्याख्याएँ प्रस्तुत की हैं? ये एक-दूसरे से कैसे भिन्न हैं?
  3. (पृ. 31) इन दीवारों का निर्माण क्यों किया गया? (चित्र 2.2 — राजगीर)
  4. (पृ. 32) सिंह शीर्ष को आज महत्त्वपूर्ण क्यों माना जाता है? (चित्र 2.3)
  5. (पृ. 33) क्या यह भी संभव है कि जो क्षेत्र शासकों के अधीन नहीं थे वहाँ भी उन्होंने अभिलेख उत्कीर्ण करवाए होंगे? (मानचित्र 2)
  6. (पृ. 34) विभिन्न व्यावसायिक समूहों के निरीक्षण के लिए इन अधिकारियों को क्यों नियुक्त किया जाता था? (स्रोत 1)
  7. (पृ. 34) मेगस्थनीज़ और अर्थशास्त्र से उद्धृत अंशों को पुनः पढ़िए। मौर्य शासन के इतिहास लेखन में ये ग्रंथ कितने उपयोगी हैं?
  8. (पृ. 35) यदि यूनानी विवरण सही है, तो इतनी बड़ी सेना के भरण-पोषण के लिए मौर्य शासकों को किस तरह के संसाधनों की ज़रूरत पड़ती होगी? (स्रोत 2)
  9. (पृ. 36) लोग यह उपहार क्यों लाए? सरदार इन उपहारों का उपयोग किसलिए करते होंगे? (स्रोत 3)
  10. (पृ. 36) राजा को किस प्रकार दर्शाया गया है? (चित्र 2.4 — कुषाण सिक्का)
  11. (पृ. 37) राजाओं ने दिव्य स्थिति का दावा क्यों किया?
  12. (पृ. 37) इस मूर्ति में ऐसी क्या विशेषताएँ हैं जिनसे यह प्रतीत होता है कि यह एक राजा की मूर्ति है? (चित्र 2.5)
  13. (पृ. 38) शासकों ने सिंचाई के प्रबंध क्यों किए? (स्रोत 5)
  14. (पृ. 39) क्या ये सीमा चिह्न विवाद के हल के लिए पर्याप्त रहे होंगे? (स्रोत 6)
  15. (पृ. 40) इस अंश में वर्णित लोगों को व्यवसाय के आधार पर आप कैसे वर्गीकृत करेंगे? (स्रोत 7)
  16. (पृ. 41) इस गाँव में कौन-कौन सी वस्तुएँ पैदा की जाती थीं? (स्रोत 8)
  17. (पृ. 41) यह पता कीजिए कि क्या आपके राज्य में हल से खेती, सिंचाई, तथा धान की रोपाई की जाती है? और अगर नहीं तो क्या कोई वैकल्पिक व्यवस्थाएँ हैं?
  18. (पृ. 43) तीसरी सहस्राब्दि ई.पू. में हड़प्पा सभ्यता जिस क्षेत्र में फैली थी क्या वहाँ कोई नगर थे?
  19. (पृ. 44) लेखक ने यह सूची क्यों तैयार की थी? (स्रोत 9)
  20. (पृ. 45) व्यापार में विनिमय के लिए क्या-क्या प्रयोग होता था? उल्लिखित स्रोतों से किस प्रकार के विनिमय का पता चलता है? क्या कुछ विनिमय ऐसे भी हैं जिनका ज्ञान स्रोतों से नहीं हो पाता है?
  21. (पृ. 46) क्या कुछ देवनागरी अक्षर ब्राह्मी से मिलते-जुलते हैं? क्या कुछ भिन्न भी हैं? (चित्र 2.11)
  22. (पृ. 47) आधुनिक संवाददाता की तुलना में पतिवेदक के दायित्व कितने भिन्न रहे होंगे? (स्रोत 10)
  23. (पृ. 48) मानचित्र 2 देखिए और असोक के अभिलेख के प्राप्ति स्थान की चर्चा कीजिए। क्या उनमें कोई एक-सा प्रारूप दिखता है?

अतिरिक्त पठन (पुस्तक-सूची, पृ. 52)

  • डी.एन. झा (2004), अर्ली इंडिया: ए कॉनसाइज़ हिस्ट्री, मनोहर, नयी दिल्ली
  • आर. सालोमन (1998), इंडियन एपिग्राफ़ी, मुंशीराम मनोहरलाल, नयी दिल्ली
  • आर.एस. शर्मा (1983), मैटीरियल कल्चर एंड सोशल फ़ॉर्मेशन इन अर्ली इंडिया, मैकमिलन, नयी दिल्ली
  • डी.सी. सरकार (1975), इंस्क्रिप्शंस ऑफ़ असोक, पब्लिकेशन डिवीज़न, नयी दिल्ली
  • रोमिला थापर (1997), असोक एंड द डेक्लाइन ऑफ़ दि मौर्याज़, ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, नयी दिल्ली
  • वेबसाइट: http://projectsouthasia.sdstate.edu/Docs/index.html