Chapter 12संविधान का निर्माण

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मास्टर शिक्षण नोट्स (एकल सत्य-स्रोत)

(भारतीय इतिहास के कुछ विषय — भाग 3; NCERT पृ. 316-342, Reprint 2026-27)

उपयोग-निर्देश: यह फ़ाइल PDF का सम्पूर्ण, सूक्ष्म-स्तरीय विकल्प है — बाक़ी सभी दस्तावेज़ इसी से बने हैं। स्रोत-बॉक्स यथावत् उद्धृत हैं।

भाग 0 — अध्याय की कुंजी

0.1 शीर्षक-विश्लेषण

  • “संविधान का निर्माण” — बल निर्माण-प्रक्रिया पर है, तैयार दस्तावेज़ पर नहीं: अध्याय संविधान की धाराएँ नहीं, संविधान सभा की बहसें पढ़ाता है — कौन बोला, क्या तर्क थे, टकराव कैसे सुलझे।
  • “एक नए युग की शुरुआत” — औपनिवेशिक अधीनता व ऊँच-नीच की पुरानी संस्कृति से लोकतांत्रिक नागरिकता के युग में प्रवेश।
  • स्रोत-आधार: संविधान सभा बहसें (Constituent Assembly Debates) — 11 भारी-भरकम मुद्रित खंड; इतिहास की स्रोत-शृंखला (अभिलेख → रिपोर्ट → गवाही) का अंतिम पड़ाव — लोकतंत्र का सार्वजनिक अभिलेख।

0.2 केंद्रीय तर्क (एक अनुच्छेद में)

भारतीय संविधान (लागू: 26 जनवरी 1950; दुनिया का सबसे लंबा) किसी शांत अध्ययन-कक्ष की रचना नहीं — विभाजन की आग, रियासतों की अनिश्चितता और जन-आंदोलनों की गूँज के बीच, दिसंबर 1946 से नवंबर 1949 तक चली गहन परिचर्चाओं की उपज है। सभा में हर बड़े प्रश्न — अल्पसंख्यक कौन? अधिकार कैसे? केंद्र कितना बलवान? भाषा कौन-सी? — पर परस्पर विरोधी आवाज़ें थीं; समाधान लेन-देन और बीच की ज़मीन से निकले। पर दो बातों पर व्यापक सहमति थी — प्रत्येक वयस्क को मताधिकार (विश्व-इतिहास में अभूतपूर्व भरोसा) और धर्मनिरपेक्षता (राज्य-धर्म के बीच ‘विवेकपूर्ण फासला’)।

0.3 अध्याय-संरचना

क्रमखंडविषय
भूमिकापृ. 316-317सबसे लंबा संविधान क्यों; 11 सत्र-165 दिन
1उथल-पुथल का दौर1942-47 की पृष्ठभूमि; सभा का गठन; मुख्य आवाज़ें
2संविधान की दृष्टिउद्देश्य प्रस्ताव; नेहरू बनाम लाहिड़ी; ‘जनता की इच्छा’
3अधिकारों का निर्धारणपृथक निर्वाचिका-बहस; रंगा-जयपाल सिंह; दमित जातियाँ; स्त्री-स्वर
4राज्य की शक्तियाँकेंद्र बनाम प्रांत; तीन सूचियाँ; सन्तनम बनाम अम्बेडकर
5राष्ट्र की भाषाहिंदुस्तानी-हिंदी विवाद; भाषा समिति का फार्मूला
निष्कर्षपृ. 339-340सार्वभौमिक मताधिकार; धर्मनिरपेक्षता; बदलते विचार

भाग 1 — खंड-दर-खंड सम्पूर्ण सामग्री

भूमिका (पृ. 316-317)

  • भारतीय संविधान 26 जनवरी 1950 को अस्तित्व में आया; यह दुनिया का सबसे लंबा संविधान है।
  • लंबाई-पेचीदगी का कारण — देश का आकार और विविधता; स्वतंत्रता के समय भारत विशाल, विविधतापूर्ण और गहरे तौर पर बिखरा हुआ देश था → एकजुटता व प्रगति के लिए विस्तृत, गहन विचार-विमर्श पर आधारित, सावधानीपूर्वक सूत्रबद्ध संविधान लाज़िमी था।
  • संविधान के दो बड़े काम: (1) अतीत और वर्तमान के घावों पर मरहम — वर्गों, जातियों व समुदायों में बँटे भारतीयों को एक साझा राजनीतिक प्रयोग में शामिल करना; (2) लंबे समय से चली आ रही ऊँच-नीच और अधीनता की संस्कृति में लोकतांत्रिक संस्थाओं को विकसित करने का प्रयास।
  • निर्माण-अवधि: दिसंबर 1946 से नवंबर 1949; मसविदे के एक-एक भाग पर लंबी चर्चाएँ।
  • संविधान सभा के कुल 11 सत्र; बैठकों में 165 दिन; सत्रों के बीच विभिन्न समितियाँ-उपसमितियाँ मसविदे को सुधारने-सँवारने का काम करती थीं।
  • अध्याय का उद्देश्य: संविधान के इतिहास और निर्माण के दौरान हुई गहन परिचर्चा को जानना; सभा में उठी आवाज़ों से उन प्रक्रियाओं का अंदाज़ा जिनसे संविधान सूत्रबद्ध हुआ और एक नए राष्ट्र की कल्पना साकार हुई।
  • चित्र 12.1: दिसंबर 1949 — तीन साल की बहस के बाद संविधान पर हस्ताक्षर।

खंड 1 — उथल-पुथल का दौर (पृ. 317-318)

1-क. पृष्ठभूमि: आशा और मोहभंग

  • संविधान-निर्माण से पहले के साल काफी उथल-पुथल वाले: “महान आशाओं का क्षण भी और भीषण मोहभंग का भी।”
  • 15 अगस्त 1947 — भारत आज़ाद, किंतु साथ ही विभाजित।
  • जनता की स्मृति में जीवित: 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन — ब्रिटिश राज के विरुद्ध “संभवत: सबसे व्यापक जनांदोलन”; सुभाष चंद्र बोस के विदेशी सहायता से सशस्त्र संघर्ष द्वारा स्वतंत्रता के प्रयास भी लोगों को बखूबी याद।
  • 1946 के वसंत में बम्बई तथा अन्य शहरों में रॉयल इंडियन नेवी (शाही भारतीय नौसेना) के सिपाहियों का विद्रोह — लोगों को बार-बार आंदोलित करता रहा; जन-सहानुभूति सिपाहियों के साथ।
  • चालीस के दशक के आख़िरी सालों में देश के विभिन्न भागों में मज़दूरों और किसानों के आंदोलन।
  • इन जनांदोलनों का अहम पहलू — व्यापक हिंदू-मुस्लिम एकता।
  • इसके विपरीत — कांग्रेस और मुस्लिम लीग (दोनों प्रमुख राजनीतिक दल) धार्मिक सौहार्द व सामाजिक सामंजस्य की सुलह-सफाई की कोशिशों में नाकामयाब होते जा रहे थे।
  • अगस्त 1946 — कलकत्ता में शुरू हुई हिंसा के साथ उत्तरी और पूर्वी भारत में लगभग साल भर चलने वाला दंगे-फ़साद और हत्याओं का लंबा सिलसिला (अध्याय 11 का हवाला); “बर्बर हिंसा का यह वीभत्स नाच भीषण जनसंहारों के साथ हुआ।” इसी के साथ देश-विभाजन की घोषणा; असंख्य लोग एक जगह से दूसरी जगह जाने लगे।
  • 15 अगस्त 1947 का आनंद-उम्मीद का माहौल अविस्मरणीय — लेकिन भारत के बहुत सारे मुसलमानों और पाकिस्तान में रहने वाले हिंदुओं व सिखों के लिए यह निर्मम चुनाव का क्षण था — “तत्क्षण मृत्यु तथा पीढ़ियों पुरानी जड़ों से उखड़ जाने के बीच चुनाव”।
  • करोड़ों शरणार्थी — मुसलमान पूर्वी-पश्चिमी पाकिस्तान की ओर; हिंदू-सिख पश्चिमी बंगाल व पूर्वी पंजाब की ओर; “उनमें से बहुत सारे कभी मंज़िल तक नहीं पहुँचे, बीच रास्ते में ही मर गए।”
  • चित्र 12.2: विनाश और उथल-पुथल की छवियाँ सभा-सदस्यों को लंबे समय तक परेशान करती रहीं।
  • चित्र 12.3: 14 अगस्त 1947 की मध्यरात्रि — संविधान सभा में नेहरू का प्रसिद्ध भाषण (नियति से साक्षात्कार): “बहुत समय पहले हमने नियति से साक्षात्कार किया था और अब समय आ चुका है कि हम अपने उस संकल्प को न केवल पूर्ण रूप से या समग्रता में, बल्कि उल्लेखनीय रूप से साकार करें। अर्धरात्रि के इस क्षण में जब दुनिया सो रही है, भारत जीवन और स्वतंत्रता की ओर जाग रहा है।”

1-ख. देशी रियासतों की समस्या

  • नवजात राष्ट्र के सामने उतनी ही गंभीर समस्या — देशी रियासतें: ब्रिटिश राज के दौरान उपमहाद्वीप का लगभग एक-तिहाई भू-भाग ऐसे नवाबों-रजवाड़ों के नियंत्रण में था जिन्होंने ब्रिटिश ताज की अधीनता स्वीकार कर ली थी; अपने राज्यों को चलाने की सीमित ही सही लेकिन काफी आज़ादी उनके पास थी।
  • अंग्रेज़ों के जाते ही इन नवाबों-राजाओं की संवैधानिक स्थिति बहुत अजीब हो गई। एक समकालीन प्रेक्षक: कुछ महाराजा तो “बहुत सारे टुकड़ों में बँटे भारत में स्वतंत्र सत्ता का सपना देख रहे थे।”
  • संविधान सभा की बैठकें इसी पृष्ठभूमि में; बाहर की घटनाओं से सभा की बहसें “भला अछूता कैसे रह सकती थीं?”

1.1 संविधान सभा का गठन (पृ. 318-319)

  • सदस्यों का चुनाव सार्वभौमिक मताधिकार के आधार पर नहीं हुआ।
  • 1945-46 की सर्दियों में प्रांतीय चुनाव हुए; इसके पश्चात् प्रांतीय संसदों (विधानसभाओं) ने संविधान सभा के सदस्यों को चुना।
  • प्रांतीय चुनावों में कांग्रेस ने सामान्य क्षेत्रों में भारी जीत पाई; मुस्लिम लीग को अधिकांश आरक्षित मुस्लिम सीटें मिलीं।
  • लेकिन लीग ने सभा का बहिष्कार उचित समझा; एक अन्य संविधान बनाकर पाकिस्तान की माँग जारी रखी।
  • शुरुआत में समाजवादी भी सभा से परे रहे — वे उसे अंग्रेज़ों की बनाई हुई संस्था मानते थे; उनका मानना — सभा का वाक़ई स्वायत्त होना असंभव।
  • परिणाम: सभा के 82 प्रतिशत सदस्य कांग्रेस पार्टी के।
  • पर कांग्रेसी एकमत नहीं थे: कई समाजवाद से प्रेरित, कई ज़मींदारी के हिमायती; कुछ साम्प्रदायिक दलों के क़रीब, कई पक्के धर्मनिरपेक्ष। राष्ट्रीय आंदोलन की बदौलत वे वाद-विवाद करना और मत-भेदों पर बात-चीत कर समझौतों की खोज करना सीख चुके थे — सभा में भी यही रुख़।
  • जनमत का प्रभाव: सभा की बहसें अख़बारों में छपती थीं; प्रस्तावों पर सार्वजनिक बहस चलती थी; प्रेस की आलोचना-जवाबी आलोचना से सहमति-असहमति पर गहरा असर। सामूहिक सहभागिता के लिए जनता से सुझाव आमंत्रित किए जाते थे।
  • अपेक्षाएँ: कई भाषाई अल्पसंख्यक — मातृभाषा की रक्षा; धार्मिक अल्पसंख्यक — विशेष हित सुरक्षित करवाना; दलित — जाति-शोषण के अंत की माँग व सरकारी संस्थाओं में आरक्षण। सभा में सांस्कृतिक अधिकारों व सामाजिक न्याय के महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर बहस हुई।
  • चित्र 12.4: सभा का अधिवेशन — सरदार पटेल दाएँ से दूसरे स्थान पर।

संविधान सभा की प्रमुख समितियाँ एवं अध्यक्ष (पृ. 320 — तालिका, यथावत्)

समितिअध्यक्ष
1. नियम समितिराजेंद्र प्रसाद
2. संघ शक्ति समितिपंडित जवाहरलाल नेहरू
3. संघ संविधान समितिपंडित जवाहरलाल नेहरू
4. प्रांतीय संविधान समितिवल्लभभाई पटेल
5. संचालन समितिराजेंद्र प्रसाद
6. प्रारूप समितिडॉ भीमराव अम्बेडकर
7. झंडा समितिजे. बी. कृपलानी
8. राज्य समितिपंडित जवाहरलाल नेहरू
9. परामर्श समितिसरदार वल्लभभाई पटेल
10. सर्वोच्च न्यायालय समितिएस. वरदाचार्य
11. मूल अधिकार उपसमितिजे.बी. कृपलानी
12. अल्पसंख्यक उप समितिएच. सी. मुखर्जी
13. संविधान समीक्षा आयोगएम. एन. वेंकटाचलैया

! शिक्षक-नोट: क्रम 13 (संविधान समीक्षा आयोग — वेंकटाचलैया) वस्तुत: वर्ष 2000 में गठित राष्ट्रीय संविधान कार्यकरण समीक्षा आयोग है — NCERT-तालिका में सभा-समितियों के साथ ही सूचीबद्ध है; विद्यार्थियों को स्पष्ट कर दें कि यह संविधान सभा (1946-49) की समिति नहीं।

1.2 मुख्य आवाज़ें (पृ. 320-321)

  • सभा में तीन सौ सदस्य; इनमें छह की भूमिका विशेष महत्त्वपूर्ण।
  • कांग्रेस-त्रिगुट:
    • जवाहरलाल नेहरू — निर्णायक “उद्देश्य प्रस्ताव” पेश किया; राष्ट्रीय ध्वज का प्रस्ताव भी: “केसरिया, सफ़ेद और गहरे हरे रंग की तीन बराबर चौड़ाई वाली पट्टियों का तिरंगा” — बीच में गहरे नीले रंग का चक्र।
    • वल्लभ भाई पटेल — मुख्यत: परदे के पीछे: कई रिपोर्टों के प्रारूप-लेखन में ख़ास मदद; परस्पर विरोधी विचारों के बीच सहमति पैदा करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका।
    • राजेंद्र प्रसाद — सभा के अध्यक्ष: चर्चा रचनात्मक दिशा में ले जाना; सभी सदस्यों को बोलने का मौक़ा देना।
  • डॉ. बी.आर. अम्बेडकर — प्रख्यात विधिवेत्ता और अर्थशास्त्री; ब्रिटिश शासन के दौरान कांग्रेस के राजनीतिक विरोधी; परंतु स्वतंत्रता के समय महात्मा गाँधी की सलाह पर उन्हें केंद्रीय विधि मंत्री का पद सँभालने का न्यौता; प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में कार्य।
    • उनके साथ दो अन्य वकील — के.एम. मुंशी (गुजरात) और अल्लादि कृष्णास्वामी अय्यर (मद्रास) — दोनों ने संविधान के प्रारूप पर महत्त्वपूर्ण सुझाव दिए।
  • दो प्रशासनिक अधिकारी:
    • बी.एन. राव — भारत सरकार के संवैधानिक सलाहकार; अन्य देशों की राजनीतिक व्यवस्थाओं का गहन अध्ययन कर कई चर्चा पत्र तैयार किए।
    • एस.एन. मुखर्जी — मुख्य योजनाकार (चीफ़ ड्राफ़्ट्समैन); जटिल प्रस्तावों को स्पष्ट वैधिक भाषा में व्यक्त करने की क्षमता।
  • अम्बेडकर की ज़िम्मेदारी — संविधान के प्रारूप को सभा में पारित करवाना; इस काम में कुल 3 वर्ष; चर्चाओं के मुद्रित रिकॉर्ड 11 भारी-भरकम खंडों में प्रकाशित।
  • सदस्यों ने विविध दृष्टिकोण “बड़ी सफ़ाई से” पेश किए — परस्पर विरोधी विचार: देश का भावी स्वरूप, भारतीय भाषाएँ, राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्थाएँ, नागरिकों के नैतिक मूल्य।
  • चित्र 12.5: अम्बेडकर हिंदू कोड बिल पर चर्चा का संचालन करते हुए।
  • 🗣️ चर्चा कीजिए (पृ. 321): अध्याय 11 को फिर देखिए — उस समय के राजनीतिक हालात से सभा की बहस-मुबाहिसे पर किस तरह असर पड़ा?

खंड 2 — संविधान की दृष्टि (पृ. 322-327)

2-क. उद्देश्य प्रस्ताव

  • 13 दिसंबर 1946 — नेहरू ने सभा के सामने “उद्देश्य प्रस्ताव” पेश किया — ऐतिहासिक प्रस्ताव: स्वतंत्र भारत के संविधान के मूल आदर्शों की रूपरेखा + वह फ्रेमवर्क जिसके तहत संविधान-कार्य आगे बढ़ना था।
  • मुख्य बातें: भारत “स्वतंत्र सम्प्रभु गणराज्य” घोषित; नागरिकों को न्याय, समानता व स्वतंत्रता का आश्वासन; वचन — “अल्पसंख्यकों, पिछड़े व जनजातीय क्षेत्रों एवं दमित व अन्य पिछड़े वर्गों के लिए पर्याप्त रक्षात्मक प्रावधान किए जाएँगे…”
  • नेहरू ने भारतीय प्रयोग को व्यापक ऐतिहासिक संदर्भ में रखा — अतीत के वे ऐतिहासिक प्रयोग जिनमें अधिकारों के दस्तावेज़ तैयार हुए।

स्रोत 1 — “हम सिर्फ नकल करने वाले नहीं हैं” (पृ. 322-323; यथावत् सार)

13 दिसंबर 1946 के प्रसिद्ध भाषण में जवाहरलाल नेहरू:

  • “मेरे ज़हन में बार-बार वे सारी संविधान सभाएँ आ रही हैं जो पहले यह काम कर चुकी हैं।”
  • अमेरिकी प्रयोग: उस महान राष्ट्र के निर्माण की प्रक्रिया — राष्ट्र-निर्माताओं ने ऐसा संविधान रचा जो “डेढ़ सदी से भी ज़्यादा समय तक काल की कसौटी पर खरा उतरा”; उसी संविधान पर आधारित महान राष्ट्र गढ़ा।
  • फ्रांसीसी क्रांति (150 साल पहले): स्वतंत्रता के लिए संघर्षरत पेरिस की संविधान सभा; राजा व अधिकारी रास्ते का रोड़ा; कमरा तक नहीं दिया गया तो टेनिस के खुले मैदान में सभा — ‘टेनिस कोर्ट की शपथ’: राजाओं-ताक़तों की रुकावटों के बावजूद बैठकें जारी रखीं और “तब तक वहाँ से नहीं हिले जब तक उन्होंने अपना काम पूरा नहीं कर लिया।”
  • “मुझे विश्वास है कि हम भी उसी शुद्ध भावना से यहाँ इकट्ठा हुए हैं… चाहे हमारी बैठक इस कक्ष में हो या कहीं और, चाहे खेतों में हो या बाज़ार में, हमारी बैठकें तब तक जारी रहेंगी जब तक हम अपना काम पूरा नहीं कर लेंगे।”
  • रूसी क्रांति: एक नए क़िस्म के राज्य का जन्म — सोवियत समाजवादी गणराज्य; दुनिया का ताक़तवर देश और हमारा पड़ोसी भी।
  • “ये सारे महान प्रयोग हमारे सामने हैं। हमें उनकी सफलताओं से सीखना है और उनकी विफलताओं से बचने का प्रयास करना है” — हालाँकि “किसी भी इनसानी कोशिश में थोड़ी-बहुत नाकामी की गुंजाइश तो रहती ही है।”
  • ‘लोकतांत्रिक’ शब्द क्यों नहीं? — कुछ मित्रों का सवाल। उत्तर: निस्संदेह कोई गणराज्य लोकतांत्रिक न भी हो सकता है, “परंतु हमारा पूरा इतिहास इस तथ्य का साक्षी है कि हम लोकतांत्रिक संस्थाओं के ही पक्षधर हैं… हमारा लक्ष्य लोकतंत्र है। लोकतंत्र से कम कुछ भी नहीं।” यह लोकतंत्र कैसा होगा, शक्ल-सूरत कैसी होगी — अलग मसला। आज के लोकतंत्रों (यूरोप आदि) को भी शायद अपनी शक्ल बदलनी पड़े।
  • “हम सिर्फ नकल करने वाले नहीं हैं” — किसी कथित लोकतांत्रिक देश की ख़ास प्रणाली या संस्था-विशेष की नकल नहीं; “हो सकता है कि हम उससे बेहतर कुछ रच दें”; जैसी चाहे सरकार बनाएँ — पर वह “हमारे लोगों के स्वभाव के अनुरूप और उनको स्वीकार्य” होनी चाहिए।
  • ‘गणराज्य’ शब्द में ‘लोकतांत्रिक’ पहले ही निहित — अनावश्यक-अनुपयोगी शब्दों का प्रयोग नहीं; शब्दों के बजाय अंतर्वस्तु पर ध्यान; प्रस्ताव में लोकतंत्र की अंतर्वस्तु — “बल्कि लोकतंत्र की ही नहीं, आर्थिक लोकतंत्र की अंतर्वस्तु” — प्रस्तुत।
  • समाजवादी राज्य का उल्लेख क्यों नहीं? — “मेरा केवल इतना ही कहना है कि मैं समाजवाद का समर्थक हूँ और मुझे आशा है कि एक दिन भारत भी समाजवाद के पक्ष में होगा… और मुझे पूरा विश्वास है कि एक दिन पूरी दुनिया को इसी मार्ग पर चलना होगा।” — संविधान सभा बहस, खंड 1 (साथ में ‘टेनिस कोर्ट की शपथ’ का चित्र)

2-ख. नेहरू-भाषण की पाठ-मीमांसा (पृ. 324)

  • भाषण की सावधानी से पड़ताल ज़रूरी: उसमें क्या कहा जा रहा है? नेहरू के अतीत-प्रेम से क्या पता चलता है? संविधान-दृष्टि तय करने वाले विचारों के उद्गम के बारे में वे क्या कहते हैं?
  • अमेरिकी-फ्रांसीसी क्रांतियों का हवाला = भारत में संविधान-निर्माण के इतिहास को “मुक्ति व स्वतंत्रता के एक लंबे ऐतिहासिक संघर्ष का हिस्सा” सिद्ध करना; भारतीय संघर्ष के ऐतिहासिक महत्त्व को अतीत के क्रांतिकारिक क्षणों के समकक्ष रखना।
  • किंतु आशय यह नहीं कि वे घटनाएँ आज के लिए ब्लूप्रिंट मान ली जाएँ; या उन क्रांतियों के विचार बिना सोचे-विचारे भारत पर लागू हों।
  • नेहरू किसी ख़ास तरह के लोकतंत्र को अपनाने का विरोध करते हैं: “हमारे लोकतंत्र की रूपरेखा हमारे बीच होने वाली चर्चा से ही उभरेगी”; संविधान के आदर्श-प्रावधान “कहीं और से उठाए गए नहीं हो सकते”।
  • पश्चिम से — वहाँ की उपलब्धियों और विफलताओं से सबक़ लेना ठीक; पर याद रहे — पश्चिमी समाजों को भी अन्य स्थानों के प्रयोगों से बहुत कुछ सीखना पड़ा था और लोकतंत्र की अपनी अवधारणा बदलनी पड़ी थी।
  • भारतीय संविधान का उद्देश्य: लोकतंत्र के उदारवादी विचारों और आर्थिक न्याय के समाजवादी विचारों का एक-दूसरे में समावेश — और भारतीय संदर्भ में इन विचारों की रचनात्मक व्याख्या। नेहरू का ज़ोर: भारत के लिए क्या उचित है — इस बारे में रचनात्मक ढंग से सोचना चाहिए।
  • 💡 बूझिए (पृ. 324): उद्देश्य प्रस्ताव में “लोकतांत्रिक” शब्द का इस्तेमाल न करने के लिए नेहरू ने क्या कारण बताया था?

2.1 लोगों की इच्छा (पृ. 324-326)

  • सोमनाथ लाहिड़ी — संविधान सभा के कम्युनिस्ट सदस्य — सभा की चर्चाओं पर “ब्रिटिश साम्राज्यवाद का स्याह साया” देखते थे; सदस्यों व आम भारतीयों से आग्रह — साम्राज्यवादी शासन के प्रभाव से खुद को पूरी तरह आज़ाद करें।
  • संदर्भ: 1946-47 के जाड़ों में जब सभा में चर्चा चल रही थी — अंग्रेज़ अभी भारत में ही थे; नेहरू के नेतृत्व में अंतरिम सरकार थी, पर उसे सारा काम वायसराय तथा लंदन की ब्रिटिश सरकार की देखरेख में करना पड़ता था।
  • लाहिड़ी: सभा अंग्रेज़ों की बनाई हुई है और “अंग्रेज़ों की योजना को साकार करने का काम कर रही है।”

स्रोत 2 — “बहुत अच्छा महोदय — साहसिक शब्द, उदात्त शब्द” (पृ. 325; यथावत् सार)

सोमनाथ लाहिड़ी ने कहा था:

  • नेहरू को मुबारकबाद — उन्होंने भारतीय जनता की भावना सटीक शब्दों में कही कि भारत के लोग अंग्रेज़ों द्वारा थोपी गई कोई चीज़ स्वीकार नहीं करेंगे; ज़बरदस्ती पर असंतोष-आपत्ति होगी और ज़रूरत पड़ी तो “हम संघर्ष की घाटी में उतरेंगे।” — “बहुत अच्छा महोदय — साहसिक शब्द, उदात्त शब्द।”
  • परंतु — “यह ज़बरदस्ती इसी समय की जा रही है” — ब्रिटिश योजना ही भावी संविधान बना दी गई है: छोटे-से-छोटे मतभेद के लिए संघीय न्यायालय दौड़ना होगा या इंग्लैंड जाकर ‘नाचना’ पड़ेगा; ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली या किसी और के दरवाज़े पर दस्तक देनी होगी।
  • हम चाहे जो योजना बनाएँ — “यह संविधान सभा ब्रिटिश बंदूकों, ब्रिटिश सेना, उनके आर्थिक व वित्तीय शिकंजे के साये में है” → मूल रूप से सत्ता अभी भी अंग्रेज़ों के हाथ में है; सत्ता का प्रश्न बुनियादी तौर पर अभी तय नहीं हुआ; “हमारा भविष्य अभी भी पूरी तरह हमारे हाथों में नहीं है।”
  • एटली आदि के वक्तव्यों से साफ़ — “अगर ज़रूरत पड़ी तो विभाजन से भी वे पीछे नहीं हटेंगे।”
  • “इस देश में कोई स्वतंत्रता नहीं है” — जैसा कुछ दिन पहले सरदार पटेल ने कहा था: “हमारे पास केवल आपस में लड़ने की स्वतंत्रता है। हमें बस इतनी ही स्वतंत्रता मिली है…।”
  • विनम्र सुझाव: इस योजना की रूपरेखा से कुछ पाने की बजाय “यहाँ और अभी स्वतंत्रता की घोषणा” करना; अंतरिम सरकार व जनता से आह्वान — आपस में लड़ने की बजाय अपने शत्रु (जिसके हाथ में अभी भी कोड़ा है — ब्रिटिश साम्राज्यवाद) को देखें, मिलकर लड़ें; “जब हम स्वतंत्र हो जाएँगे, तब हम अपने दावों का हल ढूँढ़ सकते हैं।” — संविधान सभा बहस, खंड 1
  • 💡 बूझिए (पृ. 326): स्रोत 2 के वक्ता को ऐसा क्यों लगता है कि सभा ब्रिटिश बंदूकों के साये में काम कर रही है?
  • चित्र 12.6: अंतरिम सरकार के सदस्य — प्रथम पंक्ति: बलदेव सिंह, जॉन मथाई, सी. राजगोपालाचारी, जवाहरलाल नेहरू, लियाक़त अली ख़ान, वल्लभ भाई पटेल, आई.आई. चुंद्रीगर, आसफ अली, सी.एच. भाभा; द्वितीय पंक्ति: जगजीवन राम, गज़नफर अली ख़ान, राजेन्द्र प्रसाद, अब्दुर निश्तर।

2-ग. नेहरू का उत्तर — शक्ति का स्रोत जनता (पृ. 326)

  • नेहरू ने स्वीकार किया: ज़्यादातर राष्ट्रवादी नेता भिन्न प्रकार की सभा चाहते थे; यह भी सही कि ब्रिटिश सरकार का सभा के “गठन में काफी हाथ था” और उसने कामकाज पर कुछ शर्तें भी लगाई थीं।
  • ‘परंतु’ — “आपको उस स्रोत को नज़रअंदाज नहीं करना चाहिए जहाँ से इस सभा को शक्ति मिल रही है”:

“सरकारें सरकारी कागजों से नहीं बनतीं। सरकार जनता की इच्छा की अभिव्यक्ति होती है। हम यहाँ इसलिए जुटे हैं क्योंकि हमारे पास जनता की ताकत है और हम उतनी दूर तक ही जाएँगे जितनी दूर तक लोग हमें ले जाना चाहेंगे — फिर चाहे वे किसी भी समूह या पार्टी से संबंधित क्यों न हों। इसलिए हमें भारतीय जनता के दिलों में समायी आकांक्षाओं और भावनाओं को हमेशा अपने ज़ेहन में रखना चाहिए और उन्हें पूरा करने का प्रयास करना चाहिए।”

  • सभा = उन लोगों की आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति का साधन जिन्होंने स्वतंत्रता के आंदोलनों में हिस्सा लिया था।
  • उन्नीसवीं सदी से जुड़ाव: लोकतंत्र, समानता, न्याय के आदर्श भारत में सामाजिक संघर्षों से गहरे जुड़ चुके थे —
    • समाज सुधारकों का बाल-विवाह विरोध व विधवा-विवाह समर्थन = सामाजिक न्याय की अलख;
    • विवेकानंद का हिंदू धर्म-सुधार अभियान = धर्मों को और ज़्यादा न्यायसंगत बनाने का प्रयास;
    • महाराष्ट्र में ज्योतिबा फुले — दमित जातियों की पीड़ा का प्रश्न;
    • कम्युनिस्टों और सोशलिस्टों का मज़दूर-किसान संगठन = आर्थिक और सामाजिक न्याय की लड़ाई।
  • “एक दमनकारी और अवैध सरकार के खिलाफ राष्ट्रीय आंदोलन अपरिहार्य रूप से लोकतंत्र व न्याय का, नागरिकों के अधिकारों और समानता का संघर्ष भी था।”
  • चरणबद्ध संवैधानिक सुधार: प्रतिनिधित्व की माँग बढ़ने पर अंग्रेज़ों के क़ानून — 1909, 1919 और 1935; 1919 में कार्यपालिका आंशिक रूप से प्रांतीय विधायिका के प्रति उत्तरदायी; 1935 के गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया एक्ट के अंतर्गत लगभग पूरी तरह; 1937 के चुनाव — 11 में से 8 प्रांतों में कांग्रेस सरकार।
  • चित्र 12.7: एडविन मांटेग्यू (बाएँ) — 1919 के मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों की रूपरेखा; प्रांतीय विधायिकाओं में सीमित प्रतिनिधित्व।

2-घ. पहले के प्रयोग बनाम 1946-49 (पृ. 327)

  • इसके बावजूद — पहले के संवैधानिक बदलावों और 1946 से अगले तीन सालों की घटनाओं को “स्वाभाविक रूप से एक ही प्रक्रिया का हिस्सा नहीं” मान सकते:
    • पहले के प्रयोग प्रतिनिध्यात्मक सरकार की बढ़ती माँग के जवाब थे; विभिन्न क़ानूनों (1909, 1919, 1935) को पारित करने की प्रक्रिया में भारतीयों की कोई प्रत्यक्ष हिस्सेदारी नहीं — उन्हें औपनिवेशिक सरकार ने ही लागू किया था।
    • निर्वाचन मंडल का दायरा बढ़ता गया, लेकिन 1935 में भी मताधिकार वयस्क आबादी के 10-15 प्रतिशत तक सीमित; सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार की व्यवस्था नहीं।
    • 1935 के क़ानून के तहत निर्वाचित विधायिकाएँ औपनिवेशिक शासन के ढाँचे में काम करती थीं; अंग्रेज़ों द्वारा नियुक्त गवर्नर के प्रति उत्तरदायी।
  • 13 दिसंबर 1946 को नेहरू जिस कल्पना की बात कर रहे थे वह “एक स्वतंत्र संप्रभु भारतीय गणराज्य के संविधान की कल्पना” थी।
  • 🗣️ चर्चा कीजिए (पृ. 327): नेहरू ने “उद्देश्य प्रस्ताव” पर अपने भाषण में कौन से विचार पेश किए?

खंड 3 — अधिकारों का निर्धारण (पृ. 327-333)

3-क. प्रश्न-भूमि

  • नागरिकों के अधिकार कैसे निर्धारित हों? उत्पीड़ित समूहों को विशेष अधिकार? अल्पसंख्यकों के क्या अधिकार? वास्तव में अल्पसंख्यक किसे कहा जाए?
  • बहस बढ़ने पर साफ़ हुआ — इनमें से किसी सवाल का ऐसा उत्तर मौजूद नहीं जिस पर पूरी सभा सहमत हो; उत्तर “विचारों में टकराव और व्यक्तिगत मुठभेड़ों से ही पैदा होने थे।”
  • नेहरू के उद्घाटन भाषण का हवाला — “जनता की इच्छा”; निर्माताओं को “जनता के दिलों में समायी आकांक्षाओं और भावनाओं” को पूरा करना है — आसान नहीं: आज़ादी की उम्मीद के साथ विभिन्न समूह अलग-अलग तरह से अपनी इच्छाएँ व्यक्त करने लगे; सभी अभिव्यक्तियों पर बहस; परस्पर विरोधी विचारों के बीच समाधान और आम सहमति ज़रूरी।

3.1 पृथक निर्वाचिका की समस्या (पृ. 327-330)

(i) बी. पोकर बहादुर का पक्ष

  • 27 अगस्त 1947 — मद्रास के बी. पोकर बहादुर — पृथक निर्वाचिका बनाए रखने के पक्ष में प्रभावशाली भाषण:
    • अल्पसंख्यक सब जगह होते हैं; “उन्हें हम चाह कर भी नहीं हटा सकते”;
    • ज़रूरत ऐसे राजनीतिक ढाँचे की जिसमें अल्पसंख्यक भी औरों के साथ सद्भाव से जी सकें और समुदायों के बीच मतभेद कम-से-कम हों;
    • इसके लिए — राजनीतिक व्यवस्था में अल्पसंख्यकों का पूरा प्रतिनिधित्व, उनकी आवाज़ सुनी जाए, विचारों पर ध्यान दिया जाए;
    • देश के शासन में मुसलमानों की सार्थक हिस्सेदारी सुनिश्चित करने के लिए पृथक निर्वाचिका के अलावा और कोई रास्ता नहीं;
    • मुसलमानों की ज़रूरतों को ग़ैर-मुसलमान अच्छी तरह नहीं समझ सकते; न ही अन्य समुदायों के लोग मुसलमानों का कोई सही प्रतिनिधि चुन सकते हैं।

(ii) राष्ट्रवादी प्रतिक्रिया

  • इस बयान से ज़्यादातर राष्ट्रवादी भड़क गए; गरमागरम बहस; ज़्यादातर की नज़र में पृथक निर्वाचिका = लोगों को बाँटने के लिए अंग्रेज़ों की चाल।
  • आर.वी. धुलेकर (बहादुर को संबोधित): “अंग्रेज़ों ने संरक्षण के नाम पर अपना खेल खेला। इसकी आड़ में उन्होंने तुम्हें (अल्पसंख्यकों) फुसला लिया है। अब इस आदत को छोड़ दो…। अब कोई तुम्हें बहकाने वाला नहीं है।”
  • विभाजन के कारण नेता और भड़के — गृहयुद्ध, दंगों और हिंसा की निरंतर आशंका।
  • सरदार पटेल: पृथक निर्वाचिका “एक ऐसा विष है जो हमारे देश की पूरी राजनीति में समा चुका है”; यह ऐसी माँग थी जिसने समुदाय को समुदाय से भिड़ा दिया, राष्ट्र के टुकड़े कर दिए, रक्तपात को जन्म दिया और देश-विभाजन का कारण बनी। — “क्या तुम इस देश में शांति चाहते हो? अगर चाहते हो तो इसे (पृथक निर्वाचिका को) फौरन छोड़ दो।”
  • चित्र 12.8: 1946 के जाड़ों में भारतीय नेता एटली से वार्ता करने लंदन गए — वार्ताओं का कोई नतीजा नहीं (बाएँ से — लियाकत अली, मोहम्मद अली जिन्ना, बलदेव सिंह, पैथिक-लॉरेंस)।

स्रोत 3 — “अंग्रेज़ तो चले गए, मगर जाते-जाते शरारत का बीज बो गए” (पृ. 328; यथावत् सार)

सरदार वल्लभ भाई पटेल ने कहा था:

  • यह दोहराने का कोई मतलब नहीं कि हम पृथक निर्वाचिका की माँग इसलिए कर रहे हैं क्योंकि हमारे लिए यही अच्छा है — “यह बात हम बहुत समय से सुन रहे हैं… इसी आंदोलन के कारण अब हम एक विभाजित राष्ट्र हैं…।”
  • “क्या आप मुझे एक भी स्वतंत्र देश दिखा सकते हैं जहाँ पृथक निर्वाचिका हो? अगर आप मुझे दिखा दें तो मैं आपकी बात मान लूँगा।”
  • “अगर इस अभागे देश में विभाजन के बाद भी पृथक निर्वाचिका की व्यवस्था बनाए रखी गई तो यहाँ जीने का कोई मतलब नहीं होगा।”
  • “यह सिर्फ मेरे भले की बात नहीं बल्कि आपका भला भी इसी में है कि हम अतीत को भूल जाएँ। एक दिन हम एकजुट हो सकते हैं…”
  • “अंग्रेज़ तो चले गए, मगर जाते-जाते शरारत का बीज बो गए हैं। हम इस शरारत को और बढ़ाना नहीं चाहते। (सुनिए, सुनिए।)”
  • अंग्रेज़ों ने जब यह विचार पेश किया था तो उन्हें उम्मीद नहीं थी कि इतनी जल्दी भागना पड़ेगा; उन्होंने तो अपने शासन की सुविधा के लिए यह किया था। “खैर, कोई बात नहीं। मगर अब वे अपनी विरासत पीछे छोड़ गए हैं। अब हम इससे बाहर निकलेंगे या नहीं?” — संविधान सभा बहस, खंड 5

(iii) गोविंद वल्लभ पंत का तर्क (पृ. 329)

  • गोविन्द वल्लभ पंत: यह प्रस्ताव “न केवल राष्ट्र के लिए बल्कि अल्पसंख्यकों के लिए भी खतरनाक”।
  • बहादुर से दो बातों पर सहमत: लोकतंत्र की सफलता इस पर निर्भर है कि वह समाज के विभिन्न तबकों में कितना आत्मविश्वास पैदा कर पाती है; मुक्त देश में प्रत्येक नागरिक के साथ ऐसा आचरण हो जिससे “न केवल उसकी भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति हो बल्कि उसमें स्वाभिमान का आध्यात्मिक भाव भी पैदा हो”; बहुल समुदाय का दायित्व — अल्पसंख्यकों की समस्याओं को समझे, उनकी आकांक्षाओं को महसूस करे।
  • इसके बावजूद विरोध: पृथक निर्वाचिका “आत्मघाती माँग” — अल्पसंख्यकों को स्थायी रूप से अलग-थलग कर देगी, उन्हें कमज़ोर बनाएगी, शासन में प्रभावी हिस्सेदारी से वंचित करेगी।

स्रोत 4 — “मेरा मानना है कि पृथक निर्वाचिका अल्पसंख्यकों के लिए आत्मघाती साबित होगी” (पृ. 329; यथावत् सार)

27 अगस्त 1947 को बहस में गोविंद वल्लभ पंत:

  • पृथक निर्वाचिका अल्पसंख्यकों के लिए आत्मघाती; उन्हें बहुत भारी नुकसान।
  • “अगर उन्हें हमेशा के लिए अलग-थलग कर दिया गया तो वे कभी भी खुद को बहुसंख्यकों में रूपांतरित नहीं कर पाएँगे। निराशा का भाव शुरू से ही उन्हें अपंग बना देगा।”
  • “आप क्या चाहते हैं और हमारा अंतिम उद्देश्य क्या है? क्या अल्पसंख्यक हमेशा अल्पसंख्यक के रूप में ही रहना चाहते हैं या वे भी एक दिन एक महान राष्ट्र का अभिन्न अंग बनने और उसकी नियति को निर्धारित व नियंत्रित करने का सपना देखते हैं?”
  • “अगर उन्हें शेष समुदाय से अलग रखा जाता है और ऐसे हवाबंद कमरे में काटकर रखा जाता है जहाँ उन्हें हवा के लिए भी औरों पर निर्भर रहना पड़ेगा तो यह उनके लिए भयानक रूप से खतरनाक होगा…।”
  • “अगर अल्पसंख्यक पृथक निर्वाचिकाओं से जीतकर आते रहे तो कभी प्रभावी योगदान नहीं दे पाएँगे।” — संविधान सभा बहस, खंड 2
  • 💡 बूझिए (पृ. 329): स्रोत 3 और 4 को पढ़िए — पृथक निर्वाचिकाओं के विरोध में कौन-कौन से तर्क दिए गए हैं?

(iv) एकीकृत राज्य की चिंता; नागरिक-केंद्रित दृष्टि (पृ. 329-330)

  • इन सारी दलीलों के पीछे एकीकृत राज्य के निर्माण की चिंता: राजनीतिक एकता व राष्ट्र-स्थापना के लिए प्रत्येक व्यक्ति को “राज्य के नागरिक के साँचे” में ढालना था; हर समूह को राष्ट्र के भीतर समाहित किया जाना था।
  • संविधान नागरिकों को अधिकार देगा, परंतु नागरिकों को भी राज्य के प्रति निष्ठा का वचन देना होगा।
  • समुदायों को सांस्कृतिक इकाइयों के रूप में मान्यता व सांस्कृतिक अधिकारों का आश्वासन दिया जा सकता था; मगर राजनीतिक रूप से सभी समुदायों के सदस्यों को राज्य के सामान्य सदस्यों के रूप में काम करना था — अन्यथा निष्ठाएँ विभाजित होतीं।
  • पंत: “हमारे भीतर यह आत्मघाती और अपमानजनक आदत बनी हुई है कि हम कभी नागरिक के रूप में नहीं सोचते बल्कि समुदाय के रूप में ही सोच पाते हैं…। हमें याद रखना चाहिए कि महत्त्व केवल नागरिक का होता है। सामाजिक पिरामिड का आधार भी नागरिक है और उसकी चोटी भी नागरिक ही होता है।”
  • सामुदायिक अधिकारों पर बल से बहुत सारे राष्ट्रवादियों में भय: निष्ठाएँ खंडित होंगी; शक्तिशाली राष्ट्र व शक्तिशाली राज्य की स्थापना नहीं हो पाएगी।
  • सारे मुसलमान भी पृथक निर्वाचिका के समर्थन में नहीं थे: बेगम ऐज़ाज़ रसूल — पृथक निर्वाचिका आत्मघाती; अल्पसंख्यक बहुसंख्यकों से कट जाएँगे।
  • 1949 तक सभा के ज़्यादातर मुस्लिम सदस्य सहमत — पृथक निर्वाचिका अल्पसंख्यकों के हितों के ही खिलाफ; बेहतर — मुसलमान लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभाएँ ताकि राजनीतिक व्यवस्था में उनकी निर्णायक आवाज़ हो।

स्रोत 5 — “खंडित निष्ठा के लिए कोई जगह नहीं” (पृ. 330; यथावत् सार)

गोविंद वल्लभ पंत — निष्ठावान नागरिक बनने के लिए लोगों को समुदाय और खुद को बीच में रखकर सोचने की आदत छोड़नी होगी:

  • “लोकतंत्र की सफलता के लिए व्यक्ति को आत्मानुशासन की कला का प्रशिक्षण लेना होगा। लोकतंत्र में व्यक्ति को अपने लिए कम तथा औरों के लिए ज़्यादा फिक्र करनी चाहिए।”
  • “यहाँ खंडित निष्ठा के लिए कोई जगह नहीं है। सारी निष्ठाएँ केवल राज्य पर केंद्रित होनी चाहिए।”
  • “यदि किसी लोकतंत्र में आप प्रतिस्पर्धी निष्ठाएँ रख देते हैं या ऐसी व्यवस्था खड़ी कर देते हैं जिसमें कोई व्यक्ति या समूह अपने अपव्यय पर अंकुश लगाने की बजाय बृहत्तर या आम हितों की ज़रा भी परवाह नहीं करता, तो ऐसे लोकतंत्र का डूबना निश्चित है।” — संविधान सभा बहस, खंड 2
  • 💡 बूझिए (पृ. 330): जी. बी. पंत निष्ठावादी नागरिकों के अभिलक्षणों को कैसे परिभाषित करते हैं?

3.2 “केवल इस प्रस्ताव से काम चलने वाला नहीं है” (पृ. 330-332)

  • उद्देश्य प्रस्ताव का स्वागत करते हुए एन.जी. रंगा — किसान आंदोलन के नेता, समाजवादी विचारों वाले — का आह्वान: ‘अल्पसंख्यक’ शब्द की व्याख्या आर्थिक स्तर पर की जानी चाहिए; रंगा की नज़र में असली अल्पसंख्यक = गरीब और दबे-कुचले लोग।
  • क़ानूनी अधिकारों का स्वागत — पर सीमाएँ चिह्नित: जब तक संविधान-सम्मत अधिकारों को लागू करने का प्रभावी इंतज़ाम नहीं होगा, तब तक ग़रीबों के लिए अधिकारों का कोई मतलब नहीं — न जीने का अधिकार सधेगा, न पूर्ण रोजगार; न सभा-सम्मेलन-संगठन की नागरिक स्वतंत्रताएँ सार्थक होंगी।
  • ज़रूरत — ऐसी परिस्थितियाँ बनाई जाएँ जहाँ जनता संविधान-प्रदत्त अधिकारों का प्रभावी ढंग से प्रयोग कर सके। रंगा: “उन्हें सहारों की ज़रूरत है। उन्हें एक सीढ़ी चाहिए।”

स्रोत 6 — “जी नहीं, असली अल्पसंख्यक इस देश की जनता है” (पृ. 331; यथावत् सार)

एन.जी. रंगा (उद्देश्य प्रस्ताव का स्वागत करते हुए):

  • “अल्पसंख्यकों के बारे में बहुत बातें हो रही हैं। असली अल्पसंख्यक कौन हैं? तथाकथित पाकिस्तानी प्रांतों में रहने वाले हिंदू, सिख और यहाँ तक कि मुसलमान भी अल्पसंख्यक नहीं हैं। जी नहीं, असली अल्पसंख्यक तो इस देश की जनता है।”
  • “यह जनता इतनी दबी-कुचली और इतनी उत्पीड़ित है कि अभी तक साधारण नागरिक के अधिकारों का लाभ भी नहीं उठा पा रही है।”
  • आदिवासी इलाकों का उदाहरण: उनके अपने क़ानून, जनजातीय क़ानून — क़ानूनन उनकी ज़मीन उनसे छीनी नहीं जा सकती। “लेकिन हमारे व्यापारी वहाँ जाते हैं, और तथाकथित मुक्त बाज़ार के नाम पर उनकी ज़मीन छीन लेते हैं।” क़ानून के बावजूद व्यापारी आदिवासियों को “तरह-तरह के बंधनों में जकड़कर ग़ुलाम बना लेते हैं और पीढ़ी-दर-पीढ़ी दासता के नर्क में ढकेल देते हैं।”
  • गाँव वालों का उदाहरण: “वहाँ सूदखोर पैसा लेकर जाता है और गाँव वालों का (पैसा) अपनी जेब में डाल लेता है। वहाँ ज़मींदार हैं और मालगुजार व अन्य लोग हैं जो इन गरीब देहातियों का शोषण करते हैं। इन लोगों में मूलभूत शिक्षा तक नहीं है।”
  • “असली अल्पसंख्यक यही लोग हैं जिन्हें सुरक्षा और सुरक्षा का आश्वासन मिलना चाहिए। उन्हें आवश्यक सुरक्षा प्रदान करने के लिए केवल इस प्रस्ताव से काम चलने वाला नहीं है…।” — संविधान सभा बहस, खंड 2
  • 💡 बूझिए (पृ. 331): रंगा द्वारा ‘अल्पसंख्यक’ की अवधारणा को किस तरह परिभाषित किया गया है?

रंगा — प्रतिनिधित्व की खाई (पृ. 331)

  • रंगा ने आम जनता और सभा में उसके प्रतिनिधित्व का दावा करने वालों के बीच मौजूद विशाल खाई की ओर ध्यान खींचा:

“हम किसका प्रतिनिधित्व कर रहे हैं? अपने देश की आम जनता का। और इसके बावजूद हममें से ज़्यादातर लोग उस जनता का हिस्सा नहीं हैं। हम उनके हैं, उनके लिए काम करना चाहते हैं, लेकिन जनता खुद संविधान सभा तक नहीं पहुँच पा रही है। इसमें कुछ समय लग सकता है, तब तक हम यहाँ उनके ट्रस्टी हैं, उनके हिमायती हैं और उनके पक्ष में आवाज़ उठाने का भरसक प्रयास कर रहे हैं।”

जयपाल सिंह — आदिवासियों की आवाज़ (पृ. 332)

  • रंगा ने आदिवासियों को भी ऐसे ही (वंचित) समूहों में गिना; उनके प्रतिनिधियों में जयपाल सिंह जैसे “ज़बरदस्त वक्ता” शामिल।
  • उद्देश्य प्रस्ताव के स्वागत में जयपाल सिंह (यथावत् सार):

”…एक आदिवासी होने के नाते मुझसे यह उम्मीद नहीं की जाती कि मैं इस प्रस्ताव की पेचीदगियों को समझता होऊँगा। लेकिन मेरा सहज विवेक कहता है कि हममें से हरेक व्यक्ति को मुक्ति के उस मार्ग पर चलना चाहिए और मिलकर लड़ना चाहिए। महोदय, अगर भारतीय जनता में ऐसा कोई समूह है जिसके साथ सही व्यवहार नहीं किया गया है तो वह मेरा समूह है। मेरे लोगों को पिछले 6,000 साल से अपमानित किया जा रहा है, उपेक्षित किया जा रहा है…। मेरे समाज का पूरा इतिहास भारत के गैर-मूल निवासियों के हाथों लगातार शोषण और छीनाझपटी का इतिहास रहा है जिसके बीच जब-तब विद्रोह और अव्यवस्था भी फैली है। इसके बावजूद मैं पंडित जवाहरलाल नेहरू के शब्दों पर विश्वास करता हूँ। मैं आप सबके इस संकल्प का विश्वास करता हूँ कि अब हम एक नया अध्याय रचने जा रहे हैं। स्वतंत्र भारत का एक ऐसा अध्याय जहाँ सबके पास अवसरों की समानता होगी, जहाँ किसी की उपेक्षा नहीं होगी।”

  • सिंह का सुंदर वक्तव्य — आदिवासियों की सुरक्षा तथा उन्हें आम आबादी के स्तर पर लाने के लिए ज़रूरी परिस्थितियाँ रचने की आवश्यकता पर:
    • आदिवासी क़बीले संख्या की दृष्टि से अल्पसंख्यक नहीं, लेकिन उन्हें संरक्षण की आवश्यकता है;
    • उन्हें वहाँ से बेदखल कर दिया गया जहाँ वे रहते थे; उनके जंगलों और चरागाहों से वंचित; नए घरों की तलाश में भागने को मजबूर;
    • शेष समाज उन्हें आदिम और पिछड़ा मानते हुए हिकारत की नज़र से देखता है।
  • भावनात्मक और भौतिक फासले ख़त्म करने का जज़्बाती बयान: “हमारा कहना है कि आपको हमारे साथ घुलना-मिलना चाहिए। हम आपके साथ मेलजोल चाहते हैं…।”
  • जयपाल सिंह पृथक निर्वाचिका के हक़ में नहीं थे; पर मानते थे — विधायिका में आदिवासियों के प्रतिनिधित्व के लिए सीटों के आरक्षण की व्यवस्था ज़रूरी, ताकि “औरों को आदिवासियों की आवाज़ सुनने और उनके पास आने के लिए मजबूर” किया जा सके।

संविधान सभा में महिला सदस्य (पृ. 332 — तालिका, यथावत्)

सदस्यरजिस्टर पर हस्ताक्षरक्षेत्र
1. अम्मू स्वामीनाथन9 दिसंबर 1946मद्रास/साधारण
2. दक्षियानी वेलायुधन9 दिसंबर 1946मद्रास/साधारण
3. बेगम एजाज रसूल14 जुलाई 1947संयुक्त प्रांत/मुस्लिम
4. दुर्गाबाई देशमुख9 दिसंबर 1946मद्रास/साधारण
5. हंसा जीवराज मेहता9 दिसंबर 1946मुंबई/साधारण
6. कमला चौधरी9 दिसंबर 1946संयुक्त प्रांत/साधारण
7. लीला रॉय9 दिसंबर 1946पश्चिम बंगाल/साधारण
8. मालती चौधरी9 दिसंबर 1946उडीसा/साधारण
9. पूर्णिमा बनर्जी9 दिसंबर 1946संयुक्त प्रांत/साधारण
10. राजकुमारी अमृत कौर21 दिसंबर 1946केंद्रीय प्रांत और बरार/साधारण
11. रेणुका रे14 जुलाई 1947पश्चिम बंगाल/साधारण
12. सरोजिनी नायडू9 दिसंबर 1946बिहार/साधारण
13. सुचेता कृपलानी9 दिसंबर 1946संयुक्त प्रांत/साधारण
14. विजयलक्ष्मी पंडित17 दिसंबर 1946संयुक्त प्रांत/साधारण
15. एनी मैस्करीन29 दिसंबर 1948ट्रावणकोर और कोचीन संघ

शिक्षक-नोट: सभा में 15 महिला सदस्य — यह तालिका परीक्षा-दृष्टि से उपयोगी (सरोजिनी नायडू — बिहार से; राजकुमारी अमृत कौर — केंद्रीय प्रांत से; बेगम एजाज रसूल — एकमात्र मुस्लिम-क्षेत्र से)। वर्तनी-भेद: तालिका में ‘दक्षियानी वेलायुधन’, पृ. 333 के स्रोत-परिचय में ‘दक्षायणी वेलायुधन’ — दोनों एक ही व्यक्ति (Dakshayani Velayudhan)।

3.3 “हमें हज़ारों साल तक दबाया गया है” (पृ. 332-333)

  • दमित जातियों (Depressed Castes) के अधिकार कैसे परिभाषित हों?
  • स्मरण: राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान अम्बेडकर ने दमित जातियों के लिए पृथक निर्वाचिका की माँग की थी; महात्मा गाँधी ने विरोध किया था — ऐसा करने से ये समुदाय “स्थायी रूप से शेष समाज से कट जाएँगे।”
  • सभा में दमित जातियों के कुछ सदस्यों का आग्रह: ‘अस्पृश्यों’ की समस्या केवल संरक्षण और बचाव से हल नहीं हो सकती; उनकी अपंगता के पीछे जाति-विभाजित समाज के सामाजिक कायदे-कानूनों और नैतिक मूल्य-मान्यताओं का हाथ है; समाज ने उनकी सेवाओं और श्रम का इस्तेमाल किया परंतु उन्हें सामाजिक तौर पर खुद से दूर रखा — अन्य जातियाँ घुलने-मिलने से कतरातीं, साथ खाना नहीं खातीं, मंदिरों में नहीं जाने दिया जाता।
  • जे. नागप्पा (मद्रास): “हम सदा कष्ट उठाते रहे हैं पर अब और कष्ट उठाने को तैयार नहीं हैं। हमें अपनी ज़िम्मेदारियों का अहसास हो गया है। हमें मालूम है कि अपनी बात कैसे मनवानी है।”
  • नागप्पा: संख्या की दृष्टि से हरिजन अल्पसंख्यक नहीं — आबादी में हिस्सा 20-25 प्रतिशत; उनकी पीड़ा का कारण — उन्हें बाकायदा समाज व राजनीति के हाशिए पर रखा गया है — संख्यात्मक महत्त्वहीनता नहीं; न शिक्षा तक पहुँच, न शासन में हिस्सेदारी।
  • के.जे. खाण्डेलकर (मध्य प्रांत) — सवर्ण-बहुमत वाली सभा को संबोधित:

“हमें हज़ारों साल तक दबाया गया है। … दबाया गया … इस हद तक दबाया कि हमारे दिमाग, हमारी देह काम नहीं करती और अब हमारा हृदय भी भावशून्य हो चुका है। न ही हम आगे बढ़ने के लायक रह गए हैं। यही हमारी स्थिति है।”

  • बँटवारे की हिंसा के बाद अम्बेडकर तक ने पृथक निर्वाचिका की माँग छोड़ दी थी।
  • सभा का अंतिम सुझाव: (1) अस्पृश्यता का उन्मूलन किया जाए; (2) हिंदू मंदिर सभी जातियों के लिए खोल दिए जाएँ; (3) निचली जातियों को विधायिकाओं और सरकारी नौकरियों में आरक्षण दिया जाए।
  • सजग स्वीकारोक्ति: बहुत सारे लोगों का मानना था कि इससे भी सारी समस्याएँ हल नहीं होंगी — “सामाजिक भेदभाव को केवल संवैधानिक कानून पारित करके खत्म नहीं किया जा सकता। समाज की सोच में बदलाव लाना होगा।” परंतु लोकतांत्रिक जनता ने इन प्रावधानों का स्वागत किया।
  • 🗣️ चर्चा कीजिए (पृ. 333): आदिवासियों के लिए सुरक्षात्मक उपायों की माँग करते हुए जयपाल सिंह कौन-कौन से तर्क देते हैं?

स्रोत 7 — “हम अपनी सामाजिक अक्षमताओं को हटाना चाहते हैं” (पृ. 333; यथावत्)

मद्रास की दक्षायणी वेलायुधन की दलील:

“हमें सब तरह की सुरक्षाएँ नहीं चाहिए। इस देश के कमज़ोरों को नैतिक सुरक्षा का आवरण चाहिए…। मैं यह नहीं मान सकती कि सात करोड़ हरिजनों को अल्पसंख्यक माना जा सकता है…। जो हम चाहते हैं वह यह है… हमारी सामाजिक अपंगताओं का फौरन खात्मा।” — संविधान सभा बहस, खंड 1

स्रोत 8 — “हमने विशेषाधिकार कभी नहीं माँगे” (पृ. 333; यथावत्)

बम्बई की हंसा मेहता ने महिलाओं के लिए न्याय की माँग की — आरक्षित सीटों की नहीं, न ही पृथक चुनाव क्षेत्रों की:

“हमने विशेषाधिकार कभी नहीं माँगे। हमने सामाजिक न्याय, आर्थिक न्याय और राजनीतिक न्याय की माँग की है। हमने उस बराबरी की माँग की है जिसके बिना पारस्परिक आदर और समझ नहीं बन सकते, जिसके बिना पुरुष और महिला के बीच वास्तविक सहयोग संभव नहीं है।”

खंड 4 — राज्य की शक्तियाँ (पृ. 334-336)

4-क. तीन सूचियाँ और केंद्र का पलड़ा

  • सभा में काफी बहस — केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के अधिकार क्या हों?
  • नेहरू — शक्तिशाली केंद्र के पक्ष में; सभा-अध्यक्ष के नाम पत्र: “अब जबकि विभाजन एक हकीकत बन चुका है… एक दुर्बल केंद्रीय शासन की व्यवस्था देश के लिए हानिकारक होगी क्योंकि ऐसा केंद्र शांति स्थापित करने में, आम सरोकारों के बीच समन्वय स्थापित करने में और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पूरे देश के लिए आवाज़ उठाने में सक्षम नहीं होगा।”
  • संविधान के मसविदे में विषयों की तीन सूचियाँ:
    • केंद्रीय सूची — विषय केवल केंद्र सरकार के अधीन;
    • राज्य सूची — केवल राज्य सरकारों के अंतर्गत;
    • समवर्ती सूची — केंद्र और राज्य दोनों की साझा ज़िम्मेदारी।
  • अन्य संघों की तुलना में बहुत ज़्यादा विषय केवल केंद्रीय नियंत्रण में रखे गए; समवर्ती सूची में भी — प्रांतों की इच्छाओं की उपेक्षा करते हुए — बहुत ज़्यादा विषय।
  • खनिज पदार्थों तथा प्रमुख उद्योगों पर भी नियंत्रण केंद्र को।
  • अनुच्छेद 356 — गवर्नर की सिफारिश पर केंद्र सरकार को राज्य सरकार के सारे अधिकार अपने हाथ में लेने का अधिकार।
  • राजकोषीय संघवाद की जटिल व्यवस्था:
    • कुछ करों की सारी आय केंद्र के पास — जैसे सीमा शुल्क (कस्टम ड्यूटी) और कंपनी कर;
    • कुछ की आय राज्य-केंद्र के बीच बँटी — जैसे आय कर और आबकारी शुल्क (एक्साइज़);
    • अन्य की आय पूरी तरह राज्यों को — जैसे राज्य स्तरीय शुल्क;
    • राज्य अपने स्तर पर कुछ अधिभार और कर वसूल सकते थे — जैसे ज़मीन और संपत्ति कर, ब्रिकी कर, बोतलबंद शराब पर कर।

4.1 “केंद्र बिखर जाएगा” (पृ. 334-335)

  • राज्यों के अधिकारों की सबसे शक्तिशाली हिमायत — मद्रास के सदस्य के. सन्तनम:
    • शक्तियों का पुनर्वितरण न केवल राज्यों को बल्कि केंद्र को भी मज़बूत बनाने के लिए ज़रूरी;
    • “यह दलील एक ज़िद-सी बन गई है कि तमाम शक्तियाँ केंद्र को सौंप देने से वह मजबूत हो जाएगा” — यह ग़लतफ़हमी; केंद्र के पास ज़रूरत से ज़्यादा ज़िम्मेदारियाँ होंगी तो वह प्रभावी ढंग से काम नहीं कर पाएगा; कुछ दायित्व घटाकर राज्यों को सौंपने से केंद्र ज़्यादा मजबूत हो सकता है;
    • मौजूदा वितरण राज्यों को पंगु बना देगा: राजकोषीय प्रावधान प्रांतों को खोखला कर देंगे — भूराजस्व के अलावा ज़्यादातर कर केंद्र को दे दिए गए हैं; “यदि पैसा ही नहीं होगा तो राज्यों में विकास परियोजनाएँ कैसे चलेंगी?”
    • “मैं ऐसा संविधान नहीं चाहता जिसमें इकाई को आकर केंद्र से यह कहना पड़े कि ‘मैं अपने लोगों की शिक्षा की व्यवस्था नहीं कर सकता। मैं उन्हें साफ-सफाई नहीं दे सकता, मुझे सड़कों में सुधार, उद्योगों की स्थापना के लिए खैरात दे दीजिए।’ बेहतर होगा कि हम संघीय व्यवस्था को पूरी तरह खत्म कर दें और एकल व्यवस्था (यूनिटरी सिस्टम) स्थापित करें।”
    • चेतावनी: पर्याप्त जाँच-पड़ताल बिना प्रस्तावित वितरण लागू हुआ तो “हमारा भविष्य अंधकार में पड़ जाएगा”; कुछ ही सालों में सारे प्रांत “केंद्र के विरुद्ध” उठ खड़े होंगे।
  • प्रांतों के बहुत सारे अन्य सदस्य भी इन्हीं आशंकाओं से परेशान; ज़ोर — समवर्ती व केंद्रीय सूची में कम-से-कम विषय रखे जाएँ।
  • उड़ीसा के एक सदस्य की चेतावनी: संविधान में शक्तियों के बेहिसाब केंद्रीकरण के कारण “केंद्र बिखर जाएगा।”

स्रोत 9 — “बेहतर देशभक्त कौन है?” (पृ. 335; यथावत्)

मैसूर के सर ए. रामास्वामी मुदालियार — 21 अगस्त 1947 की बहस में:

“शक्तिशाली केंद्र की हिमायत के बहाने दिल को यह तसल्ली देने का कोई फायदा नहीं है कि हम ज़्यादा बड़े देशभक्त हैं और जो इन संसाधनों पर कड़ी नज़र रखना चाहते हैं उनके भीतर राष्ट्रीय भावना या देशभक्ति का अभाव है।”

4.2 “आज हमें एक शक्तिशाली सरकार की आवश्यकता है” (पृ. 335-336)

  • प्रांतों के लिए अधिक शक्तियों की माँग पर सभा में तीखी प्रतिक्रियाएँ; शक्तिशाली केंद्र की ज़रूरत असंख्य अवसरों पर रेखांकित।
  • अम्बेडकर की घोषणा: वे “एक शक्तिशाली और एकीकृत केंद्र” चाहते हैं (सुनिए, सुनिए); “1935 के गवर्नमेंट एक्ट में हमने जो केंद्र बनाया था उससे भी ज़्यादा शक्तिशाली केंद्र।”
  • सड़कों की हिंसा (देश टुकड़े-टुकड़े हो रहा था) के हवाले से बहुत सारे सदस्यों का बार-बार कहना: केंद्र की शक्तियों में भारी इज़ाफा हो ताकि वह साम्प्रदायिक हिंसा रोक सके।
  • गोपालस्वामी अय्यर: “केंद्र ज़्यादा से ज़्यादा मजबूत होना चाहिए।”
  • बालकृष्ण शर्मा (संयुक्त प्रांत) — विस्तार से: शक्तिशाली केंद्र ज़रूरी ताकि वह देश के हित में योजना बना सके, उपलब्ध आर्थिक संसाधनों को जुटा सके, उचित शासन-व्यवस्था स्थापित कर सके और देश को विदेशी आक्रमण से बचा सके।
  • ऐतिहासिक मोड़: विभाजन से पहले कांग्रेस प्रांतों को काफी स्वायत्तता देने पर सहमत थी — कुछ हद तक यह मुस्लिम लीग को भरोसा दिलाने की कोशिश थी कि लीग-शासित प्रांतों में दखलअंदाज़ी नहीं होगी।
  • बँटवारे के बाद ज़्यादातर राष्ट्रवादियों की राय बदल चुकी थी: अब विकेंद्रीकृत संरचना के पहले जैसे राजनीतिक दबाव नहीं बचे।
  • औपनिवेशिक शासन द्वारा थोपी गई एकल व्यवस्था पहले से ही मौजूद थी; उस ज़माने की घटनाओं से केंद्रीयतावाद को बढ़ावा — अफरा-तफरी पर अंकुश और आर्थिक विकास की योजना के लिए ज़रूरी माना गया।
  • निष्कर्ष: “इस प्रकार संविधान में भारतीय संघ के घटक राज्यों के अधिकारों की तुलना में केंद्र के अधिकारों की ओर स्पष्ट झुकाव दिखाई देता है।”
  • 🗣️ चर्चा कीजिए (पृ. 336): एक शक्तिशाली केंद्र सरकार की हिमायत में क्या दलीलें दी जा रही थीं?

खंड 5 — राष्ट्र की भाषा (पृ. 336-339)

5-क. हिंदुस्तानी और गाँधी

  • प्रश्न: अलग-अलग भाषाएँ बोलने वाले, अलग सांस्कृतिक विरासत वाले लोगों से एक राष्ट्र का निर्माण कैसे हो? भाषा ही न समझें तो लोग एक-दूसरे से जुड़ें कैसे?
  • सभा में भाषा के मुद्दे पर कई महीनों बहस; कई बार काफी तनाव।
  • तीस के दशक तक कांग्रेस मान चुकी थी — हिंदुस्तानी को राष्ट्रीय भाषा का दर्जा दिया जाए।
  • गाँधी का मत: हरेक को ऐसी भाषा बोलनी चाहिए जिसे लोग आसानी से समझ सकें; हिंदुस्तानी — हिंदी और उर्दू के मेल से बनी — भारतीय जनता के बहुत बड़े हिस्से की भाषा; विविध संस्कृतियों के आदान-प्रदान से समृद्ध हुई साझी भाषा; समय के साथ बहुत तरह के स्रोतों के नए-नए शब्द और अर्थ इसमें समाते गए; विभिन्न क्षेत्रों के बहुत सारे लोग इसे समझने लगे।
  • गाँधी को लगता था: यह बहुसांस्कृतिक भाषा विविध समुदायों के बीच संचार की आदर्श भाषा हो सकती है — हिंदुओं और मुसलमानों को, उत्तर और दक्षिण के लोगों को एकजुट कर सकती है।
  • किंतु — उन्नीसवीं सदी के आख़िर से हिंदुस्तानी धीरे-धीरे बदल रही थी; साम्प्रदायिक टकराव गहराने के साथ हिंदी और उर्दू एक-दूसरे से दूर जा रही थीं: एक तरफ़ फ़ारसी-अरबी मूल के शब्द हटाकर हिंदी को संस्कृतनिष्ठ बनाने की कोशिश; दूसरी तरफ़ उर्दू लगातार फ़ारसी के नज़दीक। नतीजा: भाषा भी धार्मिक पहचान की राजनीति का हिस्सा बन गई।
  • लेकिन हिंदुस्तानी के साझा चरित्र में गाँधी की आस्था कम नहीं हुई।

स्रोत 10 — “राष्ट्रीय भाषा की क्या विशेषताएँ होनी चाहिए?” (पृ. 336; यथावत्)

अपनी मृत्यु से कुछ माह पहले महात्मा गाँधी ने भाषा के प्रश्न पर विचार दोहराए:

“यह हिंदुस्तानी न तो संस्कृतनिष्ठ हिंदी होनी चाहिए और न ही फ़ारसीनिष्ठ उर्दू। यह दोनों का सुंदर मिश्रण होना चाहिए। उसे विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं से शब्द खुलकर उधार लेने चाहिए। विदेशी भाषाओं के ऐसे शब्द लेने में कोई हर्ज नहीं है जो हमारी राष्ट्रीय भाषा में अच्छी तरह और आसानी से घुलमिल सकते हैं। इस प्रकार हमारी राष्ट्रीय भाषा एक समृद्ध और शक्तिशाली भाषा होनी चाहिए जो मानवीय विचारों और भावनाओं के पूरे समुच्चय को अभिव्यक्ति दे सके। खुद को हिंदी या उर्दू से बाँध लेना देशभक्ति की भावना तथा समझदारी के विरुद्ध एक अपराध होगा।” — हरिजन सेवक, 12 अक्तूबर 1947

5.1 हिंदी की हिमायत (पृ. 337-338)

  • सभा के एक शुरुआती सत्र में संयुक्त प्रांत के कांग्रेसी सदस्य आर.वी. धुलेकर ने पुरज़ोर आवाज़ उठाई — हिंदी को संविधान-निर्माण की भाषा के रूप में इस्तेमाल किया जाए।
  • जब किसी ने कहा कि सभी सदस्य हिंदी नहीं समझते, तो धुलेकर का पलटवार: “इस सदन में जो लोग भारत का संविधान रचने बैठे हैं और हिंदुस्तानी नहीं जानते वे इस सभा की सदस्यता के पात्र नहीं हैं। उन्हें चले जाना चाहिए।” → सभा में हंगामा; धुलेकर हिंदी में भाषण देते रहे; नेहरू के हस्तक्षेप से शांति बहाल — पर भाषा का सवाल अगले तीन साल बार-बार कार्रवाइयों में बाधा डालता और सदस्यों को उत्तेजित करता रहा।
  • तकरीबन 3 साल बाद — 13 सितंबर 1949 — राष्ट्र की भाषा के सवाल पर धुलेकर के भाषण ने फिर तूफान खड़ा किया।
  • तब तक सभा की भाषा समिति अपनी रिपोर्ट पेश कर चुकी थी; गतिरोध तोड़ने का फार्मूला:
    • देवनागरी लिपि में लिखी हिंदी भारत की राजकीय भाषा होगी — परंतु इस फार्मूले की घोषणा समिति ने नहीं की थी;
    • हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की ओर धीरे-धीरे बढ़ा जाए;
    • पहले 15 साल तक सरकारी कामों में अंग्रेज़ी का इस्तेमाल जारी रहेगा;
    • प्रत्येक प्रांत को अपने कामों के लिए कोई एक क्षेत्रीय भाषा चुनने का अधिकार होगा।
  • शब्द-चयन का महत्त्व: हिंदी को ‘राष्ट्रभाषा’ की बजाय ‘राजभाषा’ कहकर भाषा समिति ने विभिन्न पक्षों की भावनाओं को शांत करने और सर्वस्वीकृत समाधान पेश करने का प्रयास किया।
  • धुलेकर बीच-बचाव की मुद्रा से राज़ी नहीं: हिंदी को राजभाषा नहीं, राष्ट्रभाषा घोषित किया जाए; ‘थोपे जाने’ की शिकायत करने वालों की आलोचना; गाँधी का नाम लेकर हिंदुस्तानी के पैरोकारों का मज़ाक:

“महोदय, इस बात पर मेरे से ज़्यादा हर्ष किसी और को नहीं होगा कि हिंदी को देश की राजभाषा घोषित कर दिया गया है…। कुछ लोग कहते हैं कि यह हिंदी को एक रियायत दी गई है। मैं कहता हूँ, ‘बिलकुल नहीं’ — यह एक ऐतिहासिक प्रक्रिया की परिणति है।”

  • बहुत सारे सदस्यों को धुलेकर के अंदाज़ से परेशानी; सभा-अध्यक्ष ने कई बार टोका: “इस तरह बात करके मेरे विचार में आप अपनी बात को आगे नहीं बढ़ा पाएँगे।” — लेकिन धुलेकर अपने ही अंदाज़ में बोलते रहे।

5.2 वर्चस्व का भय (पृ. 338-339)

  • धुलेकर के बाद मद्रास की सदस्य श्रीमती जी. दुर्गाबाई की चिंता (यथावत्):

“अध्यक्ष महोदय, अभी हाल तक भारत की राष्ट्रीय भाषा का जो सवाल लगभग सहमति तक पहुँच गया था, अचानक बेहद विवादास्पद मुद्दा बन गया है। चाहे यह सही हुआ हो या गलत, गैर-हिंदी भाषी इलाकों के लोगों को यह अहसास कराया जा रहा है कि यह झगड़ा, या हिंदी भाषी इलाकों का यह रवैया असल में इस राष्ट्र की साझा संस्कृति पर भारत की अन्य शक्तिशाली भाषाओं के स्वाभाविक प्रभाव को रोकने की लड़ाई है।”

  • दुर्गाबाई ने सदन को बताया — दक्षिण में हिंदी का विरोध बहुत ज़्यादा: “विरोधियों का यह मानना संभवत: सही है कि हिंदी के लिए हो रहा यह प्रचार प्रांतीय भाषाओं की जड़ें खोदने का प्रयास है…।”
  • फिर भी — दुर्गाबाई (व अन्य कई सदस्यों) ने गाँधी के आह्वान का पालन किया था: दक्षिण में हिंदी का प्रचार, विरोध का सामना, हिंदी के स्कूल खोले, कक्षाएँ चलायीं।
  • “अब इस सबका क्या नतीजा निकलता है?” — दुर्गाबाई: “सदी के शुरुआती सालों में हमने जिस उत्साह से हिंदी को अपनाया था, मैं उसके विरुद्ध यह आक्रामकता देखकर सकते में हूँ।”
  • दुर्गाबाई हिंदुस्तानी को जनता की भाषा स्वीकार कर चुकी थीं — “मगर अब उस भाषा को बदला जा रहा था; उर्दू तथा अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के शब्दों को उससे निकाला जा रहा था।” उनका मानना: हिंदुस्तानी के समावेशी और साझा स्वरूप को कमज़ोर करने वाले किसी भी क़दम से विभिन्न भाषायी समूहों के बीच बेचैनी और भय पैदा होना निश्चित है।
  • चर्चा तीखी होने पर बहुत सारे सदस्यों का आह्वान — परस्पर समायोजन व सम्मान की भावना:
    • श्री शंकरराव देव (बम्बई): कांग्रेसी तथा गाँधी के अनुयायी के नाते हिंदुस्तानी को राष्ट्र की भाषा के रूप में स्वीकार कर चुके हैं; चेतावनी: “अगर आप (हिंदी के लिए) दिल से समर्थन चाहते हैं तो आपको ऐसा कोई क़दम नहीं उठाना चाहिए जिससे मेरे भीतर संदेह पैदा हो और मेरी आशंकाओं को बल मिले।”
    • श्री टी.ए. रामलिंगम चेट्टियार (मद्रास): जो कुछ भी किया जाए, एहतियात के साथ किया जाए; आक्रामक होकर काम करने से हिंदी का कोई भला नहीं; लोगों के भय निराधार भी हों तो भी उन्हें शांत किया जाना चाहिए, वरना “लोगों में गहरी कड़वाहट रह जाएगी।” — “जब हम साथ रहना चाहते हैं और एक एकीकृत राष्ट्र की स्थापना करना चाहते हैं तो परस्पर समायोजन होना ही चाहिए और लोगों पर चीज़ें थोपने का सवाल नहीं उठना चाहिए…।”

निष्कर्ष (पृ. 339-340)

  • निष्कर्षत: भारतीय संविधान गहन विवादों और परिचर्चाओं से गुज़रते हुए बना; कई प्रावधान लेन-देन की प्रक्रिया से; सहमति तब बनी जब सदस्यों ने दो विरोधी विचारों के बीच की ज़मीन तैयार कर ली।
  • पहला केंद्रीय अभिलक्षण — सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार: इस पर काफी हद तक सहमति — प्रत्येक वयस्क भारतीय को मताधिकार। इसके पीछे “एक ख़ास किस्म का भरोसा” — जिसके पूर्वोदाहरण अन्य देशों के इतिहास में नहीं थे:
    • दूसरे लोकतंत्रों में पूर्ण वयस्क मताधिकार धीरे-धीरे, कई चरणों से मिला;
    • संयुक्त राज्य अमेरिका और यूनाइटेड किंगडम — शुरू में मताधिकार केवल संपत्ति रखने वाले पुरुषों को; फिर पढ़े-लिखे पुरुष शामिल; लंबे व कटु संघर्षों के बाद श्रमिक और किसान वर्ग के पुरुषों को; ऐसा अधिकार पाने के लिए महिलाओं को और भी लंबा संघर्ष करना पड़ा।
  • दूसरा अभिलक्षण — धर्मनिरपेक्षता पर बल:
    • संविधान की प्रस्तावना में धर्मनिरपेक्षता के गुण गिनाए तो नहीं गए थे, परंतु संविधान व समाज को चलाने के लिए भारतीय संदर्भों में उसके मुख्य अभिलक्षणों का ज़िक्र आदर्श रूप में किया गया था;
    • माध्यम — मूल अधिकारों की शृंखला: ‘धार्मिक स्वतंत्रता’ (अनुच्छेद 25-28); “सांस्कृतिक व शैक्षिक अधिकार” (अनुच्छेद 29, 30); ‘समानता के अधिकार’ (अनुच्छेद 14, 16, 17);
    • राज्य ने सभी धर्मों के प्रति समान व्यवहार की गारंटी दी; उन्हें अपनी हितैषी संस्थाएँ बनाए रखने का अधिकार दिया;
    • राज्य ने खुद को विभिन्न धार्मिक समुदायों से दूर रखने की कोशिश की; अपने स्कूलों-कॉलेजों में अनिवार्य धार्मिक शिक्षा पर रोक; सरकार ने रोज़गार में धार्मिक भेद-भाव को अवैध ठहराया;
    • लेकिन — दूसरी ओर, धार्मिक समुदायों से जुड़े सामाजिक सुधार कार्यक्रमों के लिए कुछ कानूनी गुंजाइश रखी गई — इसी वजह से अस्पृश्यता पर कानूनी रोक लग पाई और व्यक्तिगत एवं पारिवारिक कानूनों में परिवर्तन हो पाए;
    • सूत्र-वाक्य: “भारतीय राजनीतिक धर्मनिरपेक्षता में राज्य व धर्म के बीच पूर्ण विच्छेद नहीं रहा। हमने दोनों के बीच एक विवेकपूर्ण फासला बनाने की कोशिश की है।”
  • बहसों से क्या समझ मिलती है: संविधान-निर्माण में कैसी-कैसी विरोधी आवाज़ें उठीं, कैसी-कैसी माँगें की गईं; चर्चाएँ उन आदर्शों-सिद्धांतों के बारे में बताती हैं जिनका ज़िक्र निर्माताओं ने किया — पर याद रहे: आदर्शों को विशेष संदर्भों के मुताबिक बदला गया।
  • बदलते विचार: सभा के कुछ सदस्यों ने तीन वर्षों की चर्चाओं के साथ-साथ अपने विचार ही बदल डाले — कुछ ने दूसरों के तर्कों के प्रकाश में अपनी समझ बदली और खुले दिलो-दिमाग से काम किया; कुछ अन्य ने आस-पास की घटनाओं को देखते हुए विचार बदले।
  • चित्र 12.9: संविधान सौंपते हुए बी.आर. अम्बेडकर और राजेंद्र प्रसाद एक-दूसरे को बधाई देते हुए।

काल-रेखा (पृ. 341 — यथावत्)

वर्षतिथिघटना
194526 जुलाईब्रिटेन में लेबर पार्टी की सरकार सत्ता में
1945दिसंबर-जनवरीभारत में आम चुनाव
194616 मईकैबिनेट मिशन अपनी संवैधानिक योजना की घोषणा करता है
194616 जूनमुस्लिम लीग कैबिनेट मिशन की संवैधानिक योजना पर स्वीकृति देती है
194616 जूनकैबिनेट मिशन केंद्र में अंतरिम सरकार के गठन का प्रस्ताव पेश करता है
194616 अगस्तमुस्लिम लीग द्वारा ‘प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस’ का एलान
19462 सितंबरकांग्रेस अंतरिम सरकार का गठन — नेहरू उपराष्ट्रपति (वाइस-प्रेसिडेंट) बनाए जाते हैं
194613 अक्तूबरमुस्लिम लीग अंतरिम सरकार में शामिल होने का फ़ैसला लेती है
19463-6 दिसंबरब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली कुछ भारतीय नेताओं से मिलते हैं — वार्ताओं का कोई नतीजा नहीं
19469 दिसंबरसंविधान सभा के अधिवेशन शुरू
194729 जनवरीमुस्लिम लीग संविधान सभा को भंग करने की माँग करती है
194716 जुलाईअंतरिम सरकार की आख़िरी बैठक
194711 अगस्तजिन्ना पाकिस्तान की संविधान सभा के अध्यक्ष निर्वाचित
194714 अगस्तपाकिस्तान की स्वतंत्रता — कराची में जश्न
194714-15 अगस्त मध्यरात्रिभारत में स्वतंत्रता का जश्न
1949दिसंबरसंविधान पर हस्ताक्षर

शिक्षक-नोट (पूरक तिथियाँ, पाठ-बाहर): संविधान अंगीकृत — 26 नवंबर 1949; लागू — 26 जनवरी 1950 (भूमिका में उल्लिखित)। सभा का पहला अधिवेशन — 9 दिसंबर 1946 (अध्यक्षता: अस्थायी अध्यक्ष सच्चिदानंद सिन्हा — पाठ-बाहर; स्थायी अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद)।

NCERT अभ्यास (पृ. 341-342) — उत्तर-दिशा सहित

उत्तर दीजिए (100-150 शब्द)

  1. उद्देश्य प्रस्ताव में किन आदर्शों पर ज़ोर दिया गया था? → स्वतंत्र सम्प्रभु गणराज्य; न्याय-समानता-स्वतंत्रता का आश्वासन; अल्पसंख्यकों-पिछड़े व जनजातीय क्षेत्रों-दमित वर्गों के लिए पर्याप्त रक्षात्मक प्रावधान; भारतीय प्रयोग का ऐतिहासिक संदर्भ (अमेरिकी-फ्रांसीसी-रूसी); ‘नकल नहीं’ — लोगों के स्वभाव के अनुरूप लोकतंत्र; आर्थिक लोकतंत्र की अंतर्वस्तु।
  2. विभिन्न समूह ‘अल्पसंख्यक’ शब्द को किस तरह परिभाषित कर रहे थे? → बहादुर — धार्मिक अल्पसंख्यक (मुसलमान), पृथक निर्वाचिका ज़रूरी; नागप्पा/वेलायुधन — हरिजन संख्या से अल्पसंख्यक नहीं (20-25%; सात करोड़), समस्या सामाजिक हाशियाकरण; जयपाल सिंह — आदिवासी संख्या से अल्पसंख्यक नहीं पर संरक्षण-योग्य; रंगा — आर्थिक व्याख्या: असली अल्पसंख्यक = गरीब, दबे-कुचले जन; हंसा मेहता — महिलाएँ: विशेषाधिकार नहीं, न्याय व बराबरी।
  3. प्रांतों के लिए ज़्यादा शक्तियों के पक्ष में क्या तर्क दिए गए? → सन्तनम: पुनर्वितरण से केंद्र भी मज़बूत (अति-बोझ से अप्रभावी); राजकोषीय प्रावधान प्रांतों को खोखला करेंगे (भूराजस्व के सिवा सब केंद्र को) — विकास कैसे?; ‘खैरात माँगती इकाई’ वाला व्यंग्य — ऐसा हो तो एकल व्यवस्था ही बेहतर; भविष्य अंधकारमय, प्रांत ‘केंद्र के विरुद्ध’ उठेंगे; उड़ीसा-सदस्य — बेहिसाब केंद्रीकरण से “केंद्र बिखर जाएगा”; मुदालियार — शक्तिशाली-केंद्र समर्थक बड़े देशभक्त नहीं।
  4. महात्मा गाँधी को ऐसा क्यों लगता था कि हिंदुस्तानी राष्ट्रीय भाषा होनी चाहिए? → जनता के बड़े हिस्से की भाषा; हिंदी-उर्दू का मेल — साम्प्रदायिक सेतु; संस्कृतियों के आदान-प्रदान से समृद्ध; क्षेत्रीय-विदेशी शब्दों को आत्मसात करने वाली समावेशी भाषा; उत्तर-दक्षिण, हिंदू-मुसलमान को जोड़ने वाली; स्रोत 10 — हिंदी/उर्दू से बँधना “देशभक्ति के विरुद्ध अपराध”।

लघु निबंध (250-300 शब्द)

  1. वे कौन सी ऐतिहासिक ताकतें थीं जिन्होंने संविधान का स्वरूप तय किया? → राष्ट्रीय आंदोलन के आदर्श (लोकतंत्र-न्याय-समानता; 19वीं सदी के सामाजिक संघर्ष: सुधारक, विवेकानंद, फुले, वामपंथ); औपनिवेशिक संवैधानिक विरासत (1909/1919/1935 — ढाँचा मिला पर सीमित मताधिकार व गवर्नर-नियंत्रण; 1935-एक्ट से भी शक्तिशाली केंद्र की चाह); विभाजन-हिंसा (पृथक निर्वाचिका की अस्वीकृति; शक्तिशाली केंद्र; धर्मनिरपेक्षता); रियासत-एकीकरण की चुनौती; जनांदोलनों की स्मृति (1942, RIN, मज़दूर-किसान); वैश्विक उदाहरण (अमेरिकी-फ्रांसीसी-रूसी — सीखना पर नकल नहीं)।
  2. दमित समूहों की सुरक्षा के पक्ष में किए गए विभिन्न दावों पर चर्चा कीजिए। → नागप्पा (20-25%; हाशियाकरण), खाण्डेलकर (हज़ारों साल का दमन), वेलायुधन (सात करोड़; नैतिक सुरक्षा; सामाजिक अपंगताओं का फौरन खात्मा), जयपाल सिंह (आदिवासी: 6,000 साल का अपमान; बेदखली; सीट-आरक्षण), रंगा (आर्थिक अल्पसंख्यक; सीढ़ी चाहिए); समाधान — अस्पृश्यता-उन्मूलन, मंदिर सबके लिए, विधायिका-नौकरियों में आरक्षण; सीमा-चेतना — कानून भर से सामाजिक सोच नहीं बदलती।
  3. कुछ सदस्यों ने राजनीतिक परिस्थिति और मजबूत केंद्र की ज़रूरत में क्या संबंध देखा? → विभाजन-हिंसा → शांति-स्थापना हेतु शक्तिशाली केंद्र (नेहरू-पत्र); सड़कों की हिंसा → साम्प्रदायिक हिंसा रोकने को केंद्र-शक्ति (अनेक सदस्य); अम्बेडकर — 1935 से भी शक्तिशाली केंद्र; शर्मा — योजना, संसाधन, शासन, विदेशी आक्रमण से रक्षा; लीग को स्वायत्तता-आश्वासन की ज़रूरत विभाजन के बाद समाप्त; अफरा-तफरी पर अंकुश व नियोजित आर्थिक विकास।
  4. संविधान सभा ने भाषा के विवाद को हल करने के लिए क्या रास्ता निकाला? → भाषा समिति का फार्मूला: देवनागरी-हिंदी राजकीय भाषा; ‘राष्ट्रभाषा’ नहीं ‘राजभाषा’ शब्द; 15 वर्ष अंग्रेज़ी जारी; प्रांतों को क्षेत्रीय भाषा चुनने का अधिकार; क्रमिक संक्रमण; परस्पर समायोजन-सम्मान के आह्वान (देव, चेट्टियार); थोपने का निषेध।
  5. मानचित्र कार्य: वर्तमान राजनीतिक मानचित्र — राज्यवार भाषाएँ; राजभाषाएँ चिह्नित; 1950 के दशक के प्रारंभ के मानचित्र से तुलना — अंतर से भाषा और राज्यों के आयोजन (भाषावार पुनर्गठन) का संबंध। 10-11. परियोजना कार्य: हालिया संवैधानिक परिवर्तन का अध्ययन (parliamentofindia.nic.in पर CAD); भारतीय संविधान की तुलना — अमेरिका/फ्रांस/दक्षिण अफ्रीका — धर्मनिरपेक्षता / अल्पसंख्यक-अधिकार / केंद्र-राज्य संबंध में से दो विषयों पर।

शिक्षक-संदर्भ: स्रोत व इन-टेक्स्ट प्रश्न तालिका

स्रोतवक्ता-विषयखंड-संदर्भ
1नेहरू — “हम सिर्फ नकल करने वाले नहीं हैं” (13-12-1946; CAD खंड 1)§2
2सोमनाथ लाहिड़ी — “साहसिक शब्द, उदात्त शब्द” (CAD खंड 1)§2.1
3पटेल — “शरारत का बीज” (CAD खंड 5)§3.1
4पंत — “आत्मघाती साबित होगी” (27-8-1947; CAD खंड 2)§3.1
5पंत — “खंडित निष्ठा के लिए कोई जगह नहीं” (CAD खंड 2)§3.1
6रंगा — “असली अल्पसंख्यक इस देश की जनता है” (CAD खंड 2)§3.2
7दक्षायणी वेलायुधन — “सामाजिक अक्षमताओं को हटाना” (CAD खंड 1)§3.3
8हंसा मेहता — “विशेषाधिकार कभी नहीं माँगे”§3.3
9रामास्वामी मुदालियार — “बेहतर देशभक्त कौन है?” (21-8-1947)§4.1
10गाँधी — “राष्ट्रीय भाषा की विशेषताएँ” (हरिजन सेवक, 12-10-1947)§5

इन-टेक्स्ट प्रश्न: बूझिए ×4 (पृ. 324 — ‘लोकतांत्रिक’ शब्द क्यों नहीं; पृ. 326 — ब्रिटिश बंदूकों का साया क्यों; पृ. 329 — स्रोत 3-4 के विरोध-तर्क; पृ. 330 — पंत के निष्ठावान नागरिक; पृ. 331 — रंगा की ‘अल्पसंख्यक’ परिभाषा) | चर्चा कीजिए ×4 (पृ. 321 — राजनीतिक हालात का असर; पृ. 327 — उद्देश्य प्रस्ताव के विचार; पृ. 333 — जयपाल सिंह के तर्क; पृ. 336 — शक्तिशाली केंद्र की दलीलें)

चित्र-सूची: 12.1 हस्ताक्षर (दिस. 1949) | 12.2 विनाश-छवियाँ | 12.3 नेहरू का मध्यरात्रि-भाषण | 12.4 अधिवेशन (पटेल) | 12.5 अम्बेडकर — हिंदू कोड बिल | 12.6 अंतरिम सरकार | 12.7 एडविन मांटेग्यू | 12.8 लंदन-वार्ता 1946 (जिन्ना आदि) | 12.9 अम्बेडकर-प्रसाद बधाई

समग्र दृष्टि

पाँच स्तंभ

  1. प्रक्रिया: 11 सत्र-165 दिन-3 वर्ष; समितियाँ; 11-खंडीय बहस-रिकॉर्ड; जनमत-अख़बार-सुझाव — लोकतंत्र बनने से पहले लोकतांत्रिक विधि से बना।
  2. दृष्टि: उद्देश्य प्रस्ताव — गणराज्य+न्याय-समानता-स्वतंत्रता+रक्षात्मक प्रावधान; ‘नकल नहीं’ — उदारवादी लोकतंत्र + समाजवादी आर्थिक न्याय की भारतीय व्याख्या।
  3. अधिकार: पृथक निर्वाचिका अस्वीकृत (विष/आत्मघाती) → नागरिक-केंद्रित राष्ट्र; पर आरक्षण (विधायिका-नौकरियाँ) + अस्पृश्यता-उन्मूलन + सांस्कृतिक अधिकार; ‘अल्पसंख्यक’ की चार परिभाषाओं की टक्कर।
  4. ढाँचा: तीन सूचियाँ; केंद्र की ओर स्पष्ट झुकाव (विभाजन+हिंसा+योजना); अनुच्छेद 356; राजकोषीय संघवाद; सन्तनम-चेतावनी बनाम अम्बेडकर-घोषणा।
  5. पहचान: भाषा-समझौता (राजभाषा-फार्मूला); सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार (अभूतपूर्व भरोसा); धर्मनिरपेक्षता — ‘विवेकपूर्ण फासला’।

तीर-शृंखलाएँ

  • विभाजन-हिंसा → पृथक निर्वाचिका पर आक्रोश → नागरिक-एकता का आग्रह → अम्बेडकर द्वारा भी माँग-त्याग → आरक्षण-मार्ग
  • लीग-आश्वासन हेतु प्रांतीय स्वायत्तता (पूर्व-विभाजन) → विभाजन → दबाव समाप्त → शक्तिशाली केंद्र → सूचियों-356-वित्त में झुकाव
  • हिंदुस्तानी (गाँधी-आदर्श) → साम्प्रदायिक राजनीति में हिंदी-उर्दू दूरी → धुलेकर बनाम दुर्गाबाई → भाषा समिति: राजभाषा+15 वर्ष अंग्रेज़ी+प्रांतीय भाषा
  • 1909→1919→1935 (औपनिवेशिक, सीमित, थोपे गए) ⇏ 1946-49 (स्वतंत्र, संप्रभु, जन-शक्ति-स्रोत) — निरंतरता नहीं, छलाँग

5 सामान्य भ्रांतियाँ

  1. “संविधान सभा सार्वभौमिक मताधिकार से चुनी गई थी” — नहीं; प्रांतीय विधायिकाओं (1945-46 चुनाव, सीमित मताधिकार) द्वारा परोक्ष चुनाव।
  2. “82% कांग्रेसी = एक स्वर” — नहीं; समाजवादी से ज़मींदार-हिमायती तक, साम्प्रदायिक-निकट से पक्के धर्मनिरपेक्ष तक — विविध; बहस-समझौते की आदत।
  3. “अम्बेडकर अकेले संविधान-लेखक” — प्रारूप समिति के अध्यक्ष व पारित करवाने के सूत्रधार; साथ में मुंशी-अय्यर, बी.एन. राव (सलाहकार), एस.एन. मुखर्जी (मुख्य योजनाकार), समितियों का तंत्र।
  4. “हिंदी को राष्ट्रभाषा घोषित किया गया” — नहीं; राजभाषा (देवनागरी); 15 वर्ष अंग्रेज़ी साथ; यही शब्द-भेद समझौते की कुंजी था।
  5. “धर्मनिरपेक्षता = राज्य-धर्म का पूर्ण अलगाव” — भारतीय मॉडल में पूर्ण विच्छेद नहीं — ‘विवेकपूर्ण फासला’; सुधार-हेतु हस्तक्षेप की गुंजाइश (अस्पृश्यता-रोक, पारिवारिक कानून)।

सूत्र-वाक्य

“जिस सभा को अंग्रेज़ों की बंदूकों का साया घेरे था, उसने अपनी शक्ति का स्रोत जनता की इच्छा को बताया — और तीन साल की बहसों से वह दस्तावेज़ गढ़ा जिसने हज़ारों साल के दबे हुओं को नागरिकता, हर वयस्क को मत, और राष्ट्र को ‘नकल नहीं, बेहतर रचने’ का संकल्प दिया।”

अतिरिक्त पठन (पृ. 342 — यथावत्)

  1. ग्रेनविले ऑस्टिन (1972), दि इंडियन कॉन्स्टीट्यूशन: दि कॉर्नरस्टॉन ऑफ ए नेशन, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, नयी दिल्ली
  2. राजीव भार्गव, “डेमोक्रेटिक विज़न ऑफ ए न्यू रिपब्लिक”, ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया: सोशल एंड पॉलिटिकल डायनेमिक्स ऑफ डेमोक्रेसी (सं. एफ. आर. फ्रेंकिल एवं अन्य), ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, नयी दिल्ली
  3. सुमित सरकार, “इंडियन डेमोक्रेसी: दि हिस्टॉरिकल इनहेरिटेंस”, दि सक्सेस ऑफ इंडियाज़ डेमोक्रेसी (सं. अतुल कोहली), कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस, कैम्ब्रिज
  4. सुमित सरकार (1983), मॉडर्न इंडिया: 1885-1947, मेकमिलन, नयी दिल्ली
  • वेबसाइट: parliamentofindia.nic.in/ls/debates/debates.htm — संविधान सभा की बहसों का डिजिटल संस्करण