अध्याय 9 — उपनिवेशवाद और देहात | कक्षा XII इतिहास | भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग-3
कक्षा — 12 · विषय — इतिहास (भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग-3)
1797 की एक शाम — बर्दवान में नीलामी
- राजा की भूसंपदाएँ (महाल) बिक रही हैं — राजस्व बाकाया है
- ऊँची-ऊँची बोलियाँ लग रही हैं
- पर कलेक्टर को एक अजीब पेंच दिखा…
- ख़रीददार कौन थे? राजा के अपने ही नौकर और एजेंट!
नीलामी में 95% से अधिक बिक्री फ़र्जी थी — यह नाटक क्यों? यही अध्याय की पहली पहेली है
अध्याय का नक्शा — तीन क्षेत्र, एक विधि
प्रस्तावना, पृ. 227
- बंगाल — ज़मींदार, नीलामियाँ, जोतदार
- राजमहल की पहाड़ियाँ — पहाड़िया बनाम संथाल
- बम्बई दक्कन — रैयत बनाम ऋणदाता (1875)
- हर कहानी सरकारी अभिलेखों से — और हर अभिलेख पर सवाल भी
★“लोग क़ानूनों का पालन करने के लिए मजबूर होते हुए भी… विरोध करने से नहीं हिचकते थे… वे उनके परिणामों में कुछ फेर-बदल कर देते थे”
1 | बंगाल और ज़मींदार | इस्तमरारी बंदोबस्त; नीलामी; जोतदार; पाँचवीं रिपोर्ट
इस्तमरारी बंदोबस्त — 1793
गवर्नर जनरल चार्ल्स कार्नवालिस
- पृष्ठभूमि — 1770 के दशक से बंगाल की ग्रामीण अर्थव्यवस्था संकट में: बार-बार अकाल, घटती पैदावार
- नुस्ख़ा — संपत्ति के अधिकार + स्थायी राजस्व-दरें → कृषि में निवेश
- आशा — योमॅन किसानों व धनी भूस्वामियों का वर्ग उभरेगा; कंपनी का वफ़ादार रहेगा
- बंदोबस्त हुआ — राजाओं और ताल्लुक़दारों से; अब वे ‘ज़मींदार’; माँग सदा के लिए निर्धारित
★परिभाषा: “ज़मींदार गाँव में भू-स्वामी नहीं था, बल्कि वह राज्य का राजस्व समाहर्ता (संग्राहक) मात्र था”
ज़मींदार चूक क्यों करते थे? — चार कारण
§1.3
- 1. प्रारंभिक माँगें बहुत ऊँची — भविष्य की ‘प्रत्याशित हानि’ से बचने के लिए (तर्क: बोझ शनै:-शनै: घटेगा)
- 2. ऊँची माँग 1790 के दशक में लागू — जब कृषि-कीमतें नीची थीं
- 3. माँग अपरिवर्तनीय — फ़सल कैसी भी हो, समय पर भुगतान; ★सूर्यास्त विधि: नियत तिथि के सूर्यास्त तक भुगतान नहीं → नीलामी
- 4. बंदोबस्त ने ज़मींदार की शक्ति सीमित कर दी
परिणाम — बंदोबस्त के बाद 75% से अधिक ज़मींदारियाँ हस्तांतरित
कंपनी का शिकंजा
ज़मींदार को ‘वश में’ रखने के कदम
- सैन्य-टुकड़ियाँ भंग; सीमा शुल्क समाप्त
- कचहरियाँ कंपनी-नियुक्त कलेक्टर की देखरेख में
- स्थानीय न्याय व पुलिस की शक्ति छीनी गई
- कलेक्टर का कार्यालय — सत्ता का विकल्पी केंद्र
- वसूली-अधिकारी अमला गाँव आता; पर रैयत कभी जान-बूझकर देरी करते; जोतदार-मंडल ज़मींदार की परेशानी पर ख़ुश
1798 में अकेले बर्दवान ज़िले में बकाया-वसूली के 30,000 से अधिक वाद लंबित!
जोतदारों का उदय
§1.4 — बुकानन का दिनाजपुर-सर्वेक्षण
- धनी किसान — 19वीं सदी के प्रारंभ तक कई हज़ार एकड़ ज़मीनें
- स्थानीय व्यापार और साहूकारी पर भी नियंत्रण
- खेती बटाईदारों (अधियार/बरगादार) से — अपना हल, मेहनत, आधी उपज
- ज़मींदार से अधिक प्रभावी — क्योंकि गाँव में ही रहते थे
- जमा-वृद्धि का प्रतिरोध; भुगतान में देरी; ★नीलामी में ख़ुद ज़मीनें ख़रीदते
- अन्य नाम — हवलदार, गाँटीदार, मंडल
“भूस्वामी इस वर्ग को पसंद नहीं करते थे… पर इनके बिना ज़रूरतमंद काश्तकारों को पैसा उधार कौन देता” — बुकानन
ज़मींदारों का जवाब — फ़र्जी बिक्री
§1.5 — हथकंडों का चक्र
- बर्दवान-राजा ने पहले संपत्ति का हिस्सा अपनी माता को दिया — स्त्रियों की संपत्ति नहीं छीनी जाती थी
- एजेंट ऊँची बोलियाँ लगाते → ख़रीद-राशि देने से इनकार → फिर नीलामी → फिर वही → थके ख़रीददार → नीची क़ीमत पर ज़मींदार को वापसी
- ★1793-1801: चार बड़ी ज़मींदारियों की बेनामी ख़रीद = 30 लाख रु.; कुल बिक्रियों में 15% नक़ली
- बाहरी ख़रीददार आए तो — लठियाल पीट कर भगाते; पुराने रैयत घुसने न देते (ज़मींदार = अन्नदाता)
ज़मींदार आसानी से विस्थापित नहीं हुए — पर 1930 के दशक की मंदी में अंतत: ‘भट्ठा बैठ गया’ और जोतदार जमे
पाँचवीं रिपोर्ट — 1813
§1.6 — ब्रिटिश संसद में
- 1,002 पृष्ठ; 800+ पृष्ठ परिशिष्ट — अर्ज़ियाँ, कलेक्टर-रिपोर्टें, तालिकाएँ
- पृष्ठभूमि — इंग्लैंड में कंपनी पर हमले: एकाधिकार-विरोधी, निजी व्यापारी, उद्योगपति, “लाभ केवल कंपनी को”
- संसद के अधिनियम; जाँच समितियाँ; प्रवर समिति की यह रिपोर्ट
- डेढ़ शताब्दी तक ग्रामीण बंगाल की धारणा इसी से बनती रही
★आधुनिक शोध: लेखक “कुप्रशासन की आलोचना पर तुले” थे — ज़मींदारी-पतन का वर्णन अतिरंजित
रिपोर्ट का लहज़ा पढ़िए
स्रोत 2 — पाँचवीं रिपोर्ट से
बाकीदारों में कुछ लोग देश के बहुत पुराने परिवारों में से थे। ये थे: नदिया, राजशाही, विशनपुर के राजा… साल दर साल उनकी जागीरों के टूटते जाने से उनकी हालत बिगड़ गई। उन्हें ग़रीबी और बरबादी का सामना करना पड़ा।
करुण-नाटकीय स्वर लेखक का एजेंडा दिखाता है — और दो वर्षों के आँकड़ों से दीर्घकालीन निष्कर्ष नहीं निकाले जा सकते।
2 | कुदाल और हल | पहाड़िया; संथाल; दामिन-इ-कोह; बुकानन
पहाड़िया — जंगल जिनकी पहचान था
§2.1 — राजमहल की पहाड़ियों के इर्द-गिर्द
- झूम खेती — झाड़ियाँ काटना, घास-फूँस जलाना; ★राख की पोटाश से उपजाऊ ज़मीन
- कुदाल से हलकी खुरच; दालें व ज्वार-बाजरा — अपने खाने के लिए; फिर परती छोड़कर नयी जगह
- जंगल से — महुआ (खाना), रेशम-कोया व राल (बिक्री), काठकोयला; घास = चरागाह
- पूरा प्रदेश “निजी भूमि… पहचान और जीवन का आधार” — बाहरी प्रवेश का प्रतिरोध
- मैदानों पर हमले — अभाव-वर्षों में; ताक़त-प्रदर्शन; राजनीतिक संबंध
शांति-सौदे: ज़मींदार ख़िराज देते, व्यापारी पथकर — बदले में सुरक्षा
औपनिवेशिक दृष्टि और दो नीतियाँ
§2.1 — जंगल के प्रति
- अंग्रेज़ चाहते थे स्थायी कृषि का विस्तार — राजस्व, निर्यात-फ़सलें, ‘सुव्यवस्थित समाज’
- जंगल = उजाड़; वनवासी = “असभ्य, बर्बर, उपद्रवी और क्रूर” — ‘सभ्य बनाना’ होगा
- 1770 का दशक — निर्मूलन की क्रूर नीति: पहाड़ियों का शिकार और संहार
- 1780 का दशक — क्लीवलैंड (भागलपुर का कलेक्टर) की शांति-नीति: मुखियाओं को वार्षिक भत्ता
- परिणाम — बहुतों ने भत्ता ठुकराया; लेने वाले समुदाय में सत्ता खो बैठे — ‘वैतनिक मुखिया’
1810-11 में बुकानन को पहाड़िया लोगों ने संदेह से देखा — “प्रत्येक गोरा आदमी” जंगल-ज़मीन छीनने वाली शक्ति का प्रतिनिधि लगा
एक ही पहाड़ी — दो आँखें
चित्र 9.8-9.9 (होजेज, 1782) बनाम अधिकारी
औपनिवेशिक अधिकारी
- भूदृश्य “भयंकर तथा उजाड़”
- “उपद्रवी जंगली लोगों” का निवास
- शासन करना कठिन
- सफ़ाया = प्रगति
चित्रकार विलियम होजेज
- वही दृश्य “मनमोहक और रमणीय”
- स्वच्छंदतावाद — प्रकृति-पूजा
- अज्ञात भूदृश्यों की खोज
- एक्वाटिंट — ताम्रपट्टी पर अम्ल से छपाई
चित्र भी स्रोत हैं — और चित्रकार की आँख भी एक ‘नीति’ है
संथाल — ‘अगुआ बाशिंदे’
§2.2 — 1780 के दशक से बंगाल में
- ज़मींदार उन्हें भाड़े पर रखते; ब्रिटिश ने जंगल महालों में बसने का न्योता दिया
- पहाड़िया हल को तैयार नहीं; संथाल “आदर्श बाशिंदे” — सफ़ाये में हिचक नहीं, पूरी ताक़त से जुताई
- ★दामिन-इ-कोह (1832) — सीमांकित क्षेत्र, “संथालों की भूमि” घोषित
- शर्त — ज़मीन का कम-से-कम 1/10 भाग पहले 10 वर्षों में जोतना
- सर्वेक्षण → नक्शा → चारों ओर खंबे — मैदानों और पहाड़ों, दोनों से अलग घेरा
बुकानन गंजुरिया देखकर बोला — “मानव श्रम के समुचित प्रयोग से” इलाक़े की काया पलट गई है
दामिन का विस्तार
संथालों के गाँव (1838 → 1851)। जनसंख्या 3,000 से बढ़कर 82,000 से अधिक। खेती फैली — और कंपनी की तिजोरियों में राजस्व भी। संथाल गीतों की लंबी ‘यात्रा’ को दामिन में मानो पूर्ण विराम मिला।
पर वादे की ज़मीन छिनने लगी
§2.2 — संथाल-मोहभंग के तीन कारण
- राज्य — संथालों की साफ़ की गई ज़मीन पर भारी कर
- साहूकार (दिकू) — बहुत ऊँची दर पर ब्याज; कर्ज़ न चुकने पर ज़मीन पर क़ब्ज़ा
- ज़मींदार — दामिन क्षेत्र पर नियंत्रण का दावा
- उधर पहाड़िया — बंजर ऊपरी पहाड़ियों में सिमटे; झूम के लिए उर्वर ज़मीन दुर्लभ; ग़रीब होते गए
1850 के दशक तक संथालों ने तय किया — “आदर्श संसार… जहाँ उनका अपना शासन हो” — के लिए विद्रोह का समय आ गया है
संथाल विद्रोह — 1855-56
नेता — सिधू मांझी (चित्र 9.11)
- ज़मींदारों, साहूकारों और औपनिवेशिक राज — तीनों के विरुद्ध
- दमन के बाद — संथाल परगना: भागलपुर व बीरभूम से 5,500 वर्ग मील
- आशा — नया परगना + विशेष क़ानून = संथाल संतुष्ट होंगे
- इलस्ट्रेटेड लंदन न्यूज़ (1856) के चित्र — युद्ध, जलते गाँव, जंज़ीरों में कैदी; हाथी पर विजयगर्वित अधिकारी
जलते गाँवों के चित्र ब्रिटेन में “गर्वपूर्वक” दिखाए गए — ‘अजेय हुकूमत’ का विज्ञापन
बुकानन की आँखें किसकी थीं?
§2.3 — चिकित्सक से सर्वेक्षक (1794-1815)
- कंपनी का कर्मचारी; यात्रा-ख़र्च कंपनी का — उसे सूचनाएँ चाहिए थीं
- साथ में — नक्शा नवीस, सर्वेक्षक, कुली; गाँव में ‘सरकार का एजेंट’
- साफ़ हिदायतें — क्या देखना, खोजना, लिखना है
- खोजा — लौह खनिज, अबरक, ग्रेनाइट, साल्टपीटर; नमक-लोहे की स्थानीय विधियाँ
- हर भूदृश्य में सवाल — “इसे अधिक उत्पादक कैसे बनाया जाए?”
“उसकी प्राथमिकताएँ स्थानीय निवासियों से भिन्न थीं” — वह वनवासी जीवन-शैली का आलोचक था
‘प्रगति’ की भाषा
स्रोत 5 — बुकानन, निचली राजमहल पहाड़ियाँ
कमी है तो बस इस क्षेत्र में कुछ प्रगति की… यहाँ लकड़ी की जगह टसर और लाख के लिए बड़े-बड़े बागान लगाए जा सकते हैं; बाक़ी जंगल को भी साफ़ किया जा सकता है…
जो जंगल पहाड़िया के लिए ‘पूर्ण जीवन’ था, बुकानन के लिए ‘अधूरा संसाधन’ — इस एक अंतर में उपनिवेशवाद की पूरी दृष्टि है।
3 | देहात में विद्रोह | दक्कन 1875; रैयतवाड़ी; कपास; दंगा आयोग
12 मई 1875 — सूपा की मंडी में
§3.1 — पूना ज़िले का बड़ा गाँव, विपणन केंद्र
- आस-पास के रैयत इकट्ठे हुए — माँग: साहूकारों के बही-खाते और ऋणबंध
- इनकार पर हमला — खाते जलाए, अनाज-दुकानें लूटीं, कहीं-कहीं घरों में आग
- फैलाव — पूना → अहमदनगर → 6,500 वर्ग किमी, 30+ गाँव; स्वरूप सब जगह एक-समान
- अंग्रेज़ों को 1857 की याद; थाने बैठे, सेना आई; 95 गिरफ़्तार
सोना-चाँदी नहीं — रैयत ने सबसे पहले काग़ज़ जलाए। क्यों? उत्तर आगे…
नयी प्रणाली — रैयतवाड़ी
§3.2 — इस्तमरारी बंगाल से बाहर क्यों नहीं गई
- 1810 के बाद कीमतें बढ़ीं → ज़मींदारों की आय बढ़ी → पर स्थायी माँग से सरकार हिस्सा नहीं ले सकती थी → नए प्रदेशों में अस्थायी बंदोबस्त
- ★वैचारिक आधार — डेविड रिकार्डो (1820 के दशक का प्रसिद्ध अर्थशास्त्री): भूस्वामी का हक़ केवल ‘औसत लगान’; अधिशेष पर राज्य का कर — वरना किसान किरायाजीवी बन जाएँगे
- “बंगाल के इतिहास ने रिकार्डो की पुष्टि कर दी” — ज़मींदार पट्टेदार-किरायाजीवी लगे
- रैयतवाड़ी — राजस्व सीधे रैयत से; औसत आय का अनुमान; क्षमता-आकलन; ★हर 30 साल पुनर्सर्वेक्षण — दरें बढ़तीं
“इसलिए राजस्व की माँग अब चिरस्थायी नहीं रही”
माँग, अकाल और कर्ज़ का चक्र
§3.3 — पहला बंदोबस्त 1820 का दशक
- माँग इतनी ऊँची कि किसान गाँव छोड़कर भागे; कलेक्टरों की कठोर वसूली — फ़सल ज़ब्त, समूचे गाँव पर जुर्माना
- 1832 के बाद — कीमतों में तेज़ गिरावट (डेढ़ दशक); ★1832-34 का अकाल — दक्कन का 1/3 पशुधन ख़त्म, आधी मानव जनसंख्या काल-ग्रस्त
- जीने-राजस्व-बीज-बैल-शादी — हर चीज़ के लिए उधार; कर्ज़ चढ़ता गया
- 1845 के बाद कीमतें सुधरीं; खेती फैली — पर विस्तार के लिए फिर उधार
1840 के दशक तक अधिकारियों को हर जगह किसान “कर्ज़ के बोझ तले” दबे मिले
कपास में तेज़ी — 1861
1862 तक ब्रिटेन के कुल कपास-आयात का 90 प्रतिशत अकेले भारत से! कारण — अमेरिकी गृहयुद्ध (1861): अमेरिका से आयात 20 लाख गाँठों से गिरकर 55 हज़ार रह गया। बम्बई से गाँव तक अग्रिमों की शृंखला दौड़ी — कपास की हर एकड़ पर 100 रु. तक।
तेज़ी से तबाही तक
§3.4-3.5
- पृष्ठभूमि — ब्रिटेन की 3/4 कपास अमेरिका से; 1857 कपास आपूर्ति संघ; 1859 मैनचेस्टर कॉटन कंपनी
- 1860-64 — कपास-रकबा दोगुना; पर लाभ कुछ धनी किसानों को; अधिकांश कर्ज़ में और दबे
- 1865 — गृहयुद्ध ख़त्म; अमेरिकी कपास लौटी; निर्यात गिरा
- साहूकारों ने अग्रिम बंद किए, बकाया माँगा
- उसी समय नया राजस्व-बंदोबस्त — माँग में 50 से 100% वृद्धि!
ऋण का स्रोत सूखा + माँग दुगुनी — रैयत फिर ऋणदाता के द्वार गया, और इस बार इनकार मिला
अन्याय का अनुभव — असली चिंगारी
§3.6 — गुस्सा कर्ज़ पर नहीं, धोखे पर
- रैयत क्रुद्ध थे कि ऋणदाता संवेदनहीन हो गया — “देहात के प्रथागत मानकों (रूढ़ि रिवाजों) का उल्लंघन”
- ★प्रथागत मानक — ब्याज मूलधन से अधिक नहीं; आयोग का केस: 100 रु. पर 2,000+ रु. ब्याज!
- 1859 परिसीमन क़ानून (बांड 3 वर्ष मान्य) → ऋणदाता ने घुमाया: हर 3 साल नया बंधपत्र — मिश्रधन नया ‘मूलधन’
- हथकंडे — रसीद-इनकार; जाली आँकड़े; फ़सल सस्ते में; अंतत: संपत्ति पर क़ब्ज़ा
- दस्तावेज़ों का आतंक — अनजाने हस्ताक्षर-अँगूठे; “हर लिखे हुए शब्द से डरने लगे” — पर ऋण के लिए लाचार
इसीलिए 12 मई 1875 को सबसे पहले बही-खाते जले — काग़ज़ ही ग़ुलामी का ताला था
अपने ही बैलों का किराया
स्रोत 9 — भाड़ा-पत्र (नवंबर 1873)
मैंने आपको देय ऋण के खाते में… अपनी दो गाड़ियाँ… और चार बैल बेचे हैं… मैंने उन्हीं दो गाड़ियों और चार बैलों को आपसे भाड़े पर लिया है। मैं हर माह चार रुपए की दर से किराया दूँगा…
किसान अपने ही बैलों का किरायेदार बन गया — और यह दस्तावेज़ अदालत में मान्य था। स्रोत 10 की गणना: 12 वर्षों में 1,000 रु. पर ब्याज 2,028 रु. से अधिक।
दक्कन दंगा आयोग — 1878
§4 — सरकारी स्रोत कैसे पढ़ें
- बम्बई-सरकार गंभीर नहीं थी; भारत सरकार (1857-भय) के दबाव से आयोग बना; रिपोर्ट 1878 में संसद में
- सामग्री — ज़िलों में जाँच; रैयत-साहूकार-गवाहों के बयान; दरों-कीमतों-ब्याज के आँकड़े; कलेक्टर-रिपोर्टें
- ★पर आयोग से पूछा ही यह गया था — क्या सरकारी माँग कारण थी?
- उत्तर आया — माँग कारण नहीं; सारा दोष साहूकारों का
“औपनिवेशिक सरकार यह मानने को कदापि तैयार नहीं थी कि जनता में असंतोष… कभी सरकारी कार्रवाई के कारण उत्पन्न हुआ था”
अध्याय की अंतिम सीख
§4 — विधि-सूत्र
सरकारी रिपोर्टें इतिहास के पुनर्निर्माण के लिए बहुमूल्य स्रोत होती हैं। लेकिन उन्हें हमेशा सावधानीपूर्वक पढ़ा जाना चाहिए।
मिलान कीजिए — समाचारपत्रों, गैर-सरकारी वृत्तांतों, वैधिक अभिलेखों और यथासंभव मौखिक स्रोतों से। यही इस पूरे अध्याय की विधि है।
एक नज़र में — 1765 से 1878
- 1765कंपनी को बंगाल की दीवानी
- 1793इस्तमरारी बंदोबस्त (कार्नवालिस)
- 1813पाँचवीं रिपोर्ट ब्रिटिश संसद में
- 1832दामिन-इ-कोह का सीमांकन
- 1855-56संथाल विद्रोह → संथाल परगना
- 1861अमेरिकी गृहयुद्ध — कपास में तेज़ी
- 187512 मई — सूपा से दक्कन-विद्रोह
- 1878दक्कन दंगा आयोग की रिपोर्ट
परीक्षा-दृष्टि — याद रखने योग्य
अंतिम पुनरावृत्ति
- 1793 • ‘समाहर्ता मात्र’ • सूर्यास्त विधि • 95% फ़र्जी • बेनामी 30 लाख • लठियाल
- जोतदार — दिनाजपुर, अधियार/बरगादार, हवलदार-गाँटीदार-मंडल
- पाँचवीं रिपोर्ट 1813 — 1002 पृष्ठ; अतिरंजित पतन-चित्र
- पहाड़िया — झूम-कुदाल-पोटाश; ख़िराज-पथकर; 1770s संहार / 1780s क्लीवलैंड
- संथाल — 1832 दामिन (1/10, 10 वर्ष); 40→1,473; दिकू; 1855-56; 5,500 वर्ग मील
- दक्कन — रिकार्डो-रैयतवाड़ी (30 वर्ष); 1832-34 अकाल; 1861/1865; 50-100% वृद्धि; परिसीमन-क़ानून 1859; 1875 सूपा; आयोग 1878
तीन क्षेत्र अलग रखिए — और हर स्रोत के साथ पूछिए: किसने, क्यों लिखा?