Chapter 11महात्मा गाँधी और राष्ट्रीय आंदोलन

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पुस्तक: भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग-3 | पृष्ठ: 286–315 | काल: 1915–1948

भाग 0 — अध्याय को समझने की कुंजी

0.1 प्रस्तावना का ढाँचा (पृ. 286)

  • राष्ट्रवाद के इतिहास में प्राय: एक अकेले व्यक्ति को राष्ट्र-निर्माण से जोड़कर देखा जाता है — इटली के निर्माण के साथ गैरीबाल्डी, अमेरिकी स्वतंत्रता युद्ध के साथ जॉर्ज वाशिंगटन, वियतनाम के औपनिवेशिक मुक्ति-संघर्ष के साथ हो ची मिन्ह; इसी तरह महात्मा गाँधी भारतीय राष्ट्र के ‘पिता’।
  • गाँधी जी स्वतंत्रता-संघर्ष के सभी नेताओं में सर्वाधिक प्रभावशाली और सम्मानित — अत: विशेषण ग़लत नहीं। लेकिन — वाशिंगटन/हो ची मिन्ह की तरह गाँधी का राजनीतिक जीवन-वृत्त भी उस समाज ने सँवारा और नियंत्रित किया जिसमें वे रहते थे; ★★“कोई व्यक्ति चाहे कितना ही महान क्यों न हो, वह न केवल इतिहास बनाता है बल्कि स्वयं भी इतिहास द्वारा बनाया जाता है।”
  • अध्याय 1915–1948 में गाँधी की गतिविधियाँ; समाज के विभिन्न हिस्सों से उनके संपर्क; उनके प्रेरित-नेतृत्व किए लोकप्रिय संघर्ष; और वे स्रोत जिनसे इतिहासकार एक नेता का जीवन-वृत्त व सामाजिक आंदोलन पुनर्निर्मित करते हैं।

★★शिक्षण-सूत्र: अध्याय के दो पंख — (1) 1915-48 का घटना-इतिहास (चंपारन से शहादत तक), (2) स्रोत-इतिहास (§6 — भाषण बनाम पत्र, आत्मकथा, पुलिस-रिपोर्ट, अख़बार)। बोर्ड-प्रश्न दोनों से बराबर आते हैं — उपशीर्षक याद रखिए: ‘सविनय अवज्ञा और उससे आगे’।

भाग 1 — खंड-दर-खंड विस्तृत नोट्स

§1. स्वयं की उद्घोषणा करता एक नेता (पृ. 287–289)

1.1 दक्षिण अफ्रीका से वापसी

  • मोहनदास करमचंद गाँधी विदेश में दो दशक रहने के बाद जनवरी 1915 में गृहभूमि लौटे; अधिकांश समय दक्षिण अफ्रीका में — वकील के रूप में गए, बाद में वहाँ के भारतीय समुदाय के नेता बने।
  • ★इतिहासकार चंद्रन देवनेसन की टिप्पणी — “दक्षिण अफ्रीका ने ही गाँधी जी को ‘महात्मा’ बनाया।”
  • दक्षिण अफ्रीका में ही गाँधी ने पहली बार सत्याग्रह के रूप में जानी गई अहिंसात्मक विरोध की अपनी विशिष्ट तकनीक का इस्तेमाल किया; विभिन्न धर्मों के बीच सौहार्द बढ़ाया; तथा उच्च जातीय भारतीयों को निम्न जातियों व महिलाओं के प्रति भेदभाव के लिए चेतावनी दी।

1.2 1915 का भारत — 1893 से भिन्न

  • यह अब भी ब्रिटिश उपनिवेश था, पर राजनीतिक दृष्टि से कहीं अधिक सक्रिय; अधिकांश प्रमुख शहरों-कस्बों में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की शाखाएँ; 1905-07 के स्वदेशी आंदोलन से मध्य वर्गों में व्यापक अपील।
  • स्वदेशी आंदोलन से उभरे नेता — बाल गंगाधर तिलक (महाराष्ट्र), विपिन चंद्र पाल (बंगाल), लाला लाजपत राय (पंजाब) — ‘लाल, बाल और पाल’; ★तीनों के मूल निवास-क्षेत्र दूर-दूर — यह जोड़ संघर्ष के अखिल भारतीय चरित्र की सूचना देता था।
  • इनके लड़ाकू विरोध के मुक़ाबले ‘उदारवादियों’ का समूह — क्रमिक व लगातार प्रयासों का हिमायती; इनमें गाँधी के मान्य राजनीतिक परामर्शदाता गोपाल कृष्ण गोखले और मोहम्मद अली जिन्ना — जो गाँधी की ही तरह गुजराती मूल के, लंदन में प्रशिक्षित वकील थे।
  • ★गोखले की सलाह — एक वर्ष ब्रिटिश भारत की यात्रा करें ताकि “इस भूमि और इसके लोगों को जान सकें।”

1.3 बनारस हिंदू विश्वविद्यालय का भाषण (फरवरी 1916)★★

  • पहली महत्त्वपूर्ण सार्वजनिक उपस्थिति — फरवरी 1916, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के उद्घाटन समारोह में।
  • आमंत्रितों में राजा और मानवप्रेमी (जिनके दान से BHU बना); एनी बेसेंट जैसे कांग्रेस-नेता; इन प्रतिष्ठितों की तुलना में गाँधी अपेक्षाकृत अज्ञात — निमंत्रण भारत की प्रतिष्ठा से नहीं, दक्षिण अफ्रीका के कार्य के आधार पर।
  • ★भाषण — मज़दूर ग़रीबों की ओर ध्यान न देने के कारण भारतीय विशिष्ट वर्ग को आड़े हाथों लिया: BHU की स्थापना “निश्चय ही अत्यंत शानदार”, पर “धनी व सजे-सँवरे भद्रजनों की उपस्थिति” और “लाखों गरीब” भारतीयों की अनुपस्थिति की विषमता पर चिंता।
  • उद्धरण: विशेष सुविधा प्राप्त आमंत्रितों से — “भारत के लिए मुक्ति तब तक संभव नहीं है जब तक कि आप अपने को इन अलंकरणों से मुक्त न कर लें और इन्हें भारत के अपने हमवतनों की भलाई में न लगा दें।” … “हमारे लिए स्वशासन का तब तक कोई अभिप्राय नहीं है जब तक हम किसानों से उनके श्रम का लगभग सम्पूर्ण लाभ स्वयं अथवा अन्य लोगों को ले लेने की अनुमति देते रहेंगे। हमारी मुक्ति केवल किसानों के माध्यम से ही हो सकती है। न तो वकील, न डॉक्टर, न ही ज़मींदार इसे सुरक्षित रख सकते हैं।”
  • ★★दोहरा अर्थ: (1) वास्तविक तथ्य का उद्घाटन — भारतीय राष्ट्रवाद तब वकीलों, डॉक्टरों और ज़मींदारों जैसे विशिष्ट वर्गों द्वारा निर्मित था; (2) मंशा की घोषणा — भारतीय राष्ट्रवाद को सम्पूर्ण भारतीय जनता का और अधिक अच्छा प्रतिनिधि बनाने की गाँधी की स्वयं की इच्छा की प्रथम सार्वजनिक उद्घोषणा।
  • उसी वर्ष के अंतिम माह — दिसम्बर 1916, लखनऊ की वार्षिक कांग्रेस में बिहार के चंपारन से आए एक किसान ने अंग्रेज़ नील उत्पादकों के किसानों के प्रति कठोर व्यवहार के बारे में बताया।
  • 🗣️ चर्चा कीजिए (पृ. 289): 1915 से पूर्व के राष्ट्रीय आंदोलनों की जानकारी इकट्ठा कीजिए; क्या गाँधी जी की टिप्पणियाँ न्यायसंगत हैं?

§2. असहयोग की शुरुआत और अंत (पृ. 289–295)

2.1 स्थानिक संघर्षों से राष्ट्रीय आंदोलन तक

  • 1917 का अधिकांश समय — चंपारन: किसानों के लिए काश्तकारी की सुरक्षा + अपनी पसंद की फ़सल उपजाने की आज़ादी।
  • 1918 — गृह राज्य गुजरात के दो अभियान: अहमदाबाद के श्रम विवाद में हस्तक्षेप — कपड़ा मिल मज़दूरों के लिए काम करने की बेहतर स्थितियों की माँग; फिर खेड़ा में फ़सल चौपट होने पर राज्य से लगान माफ़ी की माँग।
  • ★चंपारन, अहमदाबाद और खेड़ा की पहल से गाँधी ऐसे राष्ट्रवादी के रूप में उभरे जिनमें ग़रीबों के लिए गहरी सहानुभूति थी — पर ये सभी स्थानिक संघर्ष थे।

2.2 रॉलेट सत्याग्रह (1919)

  • 1919 में औपनिवेशिक शासकों ने स्वयं ऐसा मुद्दा दे दिया जिससे कहीं विस्तृत आंदोलन संभव हुआ — 1914-18 के महान युद्ध के दौरान प्रेस पर प्रतिबंध व बिना जाँच के कारावास; अब सर सिडनी रॉलेट की अध्यक्षता वाली समिति की संस्तुतियों के आधार पर इन कठोर उपायों को जारी रखा गया।
  • जवाब में गाँधी का देशभर में ‘रॉलेट एक्ट’ के ख़िलाफ़ अभियान — उत्तरी और पश्चिमी भारत के कस्बों में बंद के समर्थन में दुकानों-स्कूलों के बंद होने से जीवन लगभग ठहर-सा गया।
  • पंजाब में विशेष रूप से कड़ा विरोध — बहुतों ने युद्ध में अंग्रेज़ों के पक्ष में सेवा की थी और बदले में ईनाम की अपेक्षा थी — मिली रॉलेट एक्ट; पंजाब जाते समय गाँधी क़ैद; स्थानीय कांग्रेसजन गिरफ़्तार; हालात तनावपूर्ण होते गए और ★अप्रैल 1919 — अमृतसर में ख़ूनख़राबे का चरमोत्कर्ष: एक अंग्रेज़ ब्रिगेडियर ने एक राष्ट्रवादी सभा पर गोली चलाने का हुक्म दिया — जलियाँवाला बाग हत्याकांड — चार सौ से अधिक लोग मारे गए।
  • ★“रॉलेट सत्याग्रह से ही गाँधी जी एक सच्चे राष्ट्रीय नेता बन गए।”

2.3 असहयोग + खिलाफ़त

  • सफलता से उत्साहित गाँधी ने अंग्रेज़ी शासन के ख़िलाफ़ ‘असहयोग’ का आह्वान किया — भारतीय उपनिवेशवाद का ख़ात्मा चाहने वालों से आग्रह: स्कूल, कॉलेज, न्यायालय न जाएँ; कर न चुकाएँ; संक्षेप में — “अंग्रेज़ी सरकार के साथ (सभी) ऐच्छिक संबंधों के परित्याग” का पालन।
  • ★गाँधी का कथन — असहयोग ठीक ढंग से पालन हो तो भारत एक वर्ष के भीतर स्वराज!
  • संघर्ष का और विस्तार — खिलाफ़त आंदोलन से हाथ मिला लिए, जो हाल में तुर्की शासक कमाल अतातुर्क द्वारा समाप्त किए गए सर्व-इस्लामवाद के प्रतीक ख़लीफ़ा की पुनर्स्थापना की माँग कर रहा था।
  • (📦 बॉक्स — खिलाफ़त आंदोलन क्या था?: 1919-1920; मुहम्मद अली और शौकत अली के नेतृत्व में भारतीय मुसलमानों का आंदोलन; माँगें — पहले के ऑटोमन साम्राज्य के सभी इस्लामी पवित्र स्थानों पर तुर्की सुल्तान अथवा ख़लीफ़ा का नियंत्रण बना रहे; जज़ीरात-उल-अरब (अरब, सीरिया, इराक, फिलिस्तीन) इस्लामी सम्प्रभुता के अधीन रहें; ख़लीफ़ा के पास इतने क्षेत्र हों कि वह इस्लामी विश्वास की रक्षा कर सके; कांग्रेस ने समर्थन किया और गाँधी ने इसे असहयोग से मिलाने की कोशिश की।)

2.4 एक लोकप्रिय आंदोलन की तैयारी (§2.1)

  • आशा — असहयोग को खिलाफ़त से मिलाने से हिंदू और मुसलमान — दोनों प्रमुख धार्मिक समुदाय — मिलकर औपनिवेशिक शासन का अंत कर देंगे; इन आंदोलनों ने “एक लोकप्रिय कार्रवाई के बहाव को उन्मुक्त कर दिया जो औपनिवेशिक भारत में बिलकुल ही अभूतपूर्व थी।”
  • भागीदारी: विद्यार्थियों ने सरकारी स्कूल-कॉलेज छोड़े; वकीलों ने अदालत जाने से मना किया; श्रमिक-वर्ग हड़तालें — ★सरकारी आँकड़े: 1921 में 396 हड़तालें, 6 लाख श्रमिक, 70 लाख कार्यदिवसों का नुकसान।
  • देहात: उत्तरी आंध्र की पहाड़ी जनजातियों ने वन्य क़ानूनों की अवहेलना की; अवध के किसानों ने कर नहीं चुकाए; कुमाऊँ के किसानों ने औपनिवेशिक अधिकारियों का सामान ढोने से मना कर दिया।
  • ★★इन विरोध आंदोलनों को कभी-कभी स्थानीय राष्ट्रवादी नेतृत्व की अवज्ञा करते हुए कार्यान्वित किया गया — किसानों-श्रमिकों ने “ऊपर से प्राप्त निर्देशों पर टिके रहने के बजाय अपने हितों से मेल खाते तरीकों” से ‘असहयोग’ किया।
  • ★लुई फिशर (अमरीकी जीवनी-लेखक): “असहयोग भारत और गाँधी जी के जीवन के एक युग का ही नाम हो गया। असहयोग शांति की दृष्टि से नकारात्मक किंतु प्रभाव की दृष्टि से बहुत सकारात्मक था। इसके लिए प्रतिवाद, परित्याग तथा स्व-अनुशासन आवश्यक थे। यह स्वशासन के लिए एक प्रशिक्षण था।”
  • ★“1857 के विद्रोह के बाद पहली बार, असहयोग आंदोलन के परिणामस्वरूप अंग्रेज़ी राज की नींव हिल गई।”

2.5 चौरी-चौरा और वापसी; मुक़दमा

  • फरवरी 1922 — किसानों के एक समूह ने संयुक्त प्रांत के चौरी-चौरा पुरवा में एक पुलिस स्टेशन पर आक्रमण कर आग लगा दी; कई पुलिस वालों की जान गई।
  • हिंसा की इस कार्रवाई से गाँधी ने आंदोलन तत्काल वापस लिया — ★“किसी भी तरह की उत्तेजना को निहत्थे और एक तरह से भीड़ की दया पर निर्भर व्यक्तियों की घृणित हत्या के आधार पर उचित नहीं ठहराया जा सकता है।”
  • असहयोग के दौरान हज़ारों भारतीय जेल में; स्वयं गाँधी मार्च 1922 में राजद्रोह के आरोप में गिरफ़्तार।
  • ★★जज जस्टिस सी.एन. ब्रूमफील्ड का सज़ा सुनाते समय महत्त्वपूर्ण भाषण: “इस तथ्य को नकारना असंभव होगा कि मैंने आज तक जिनकी जाँच की है… आप उनसे भिन्न श्रेणी के हैं… आपके लाखों देशवासियों की दृष्टि में आप एक महान देशभक्त और नेता हैं। यहाँ तक कि राजनीति में जो लोग आपसे भिन्न मत रखते हैं वे भी आपको उच्च आदर्शों और पवित्र जीवन वाले व्यक्ति के रूप में देखते हैं।” — क़ानून की अवहेलना के कारण 6 वर्षों की जेल, पर ब्रूमफील्ड ने जोड़ा — “यदि भारत में घट रही घटनाओं की वजह से सरकार के लिए सज़ा के इन वर्षों में कमी और आपको मुक्त करना संभव हुआ तो इससे मुझसे ज़्यादा कोई प्रसन्न नहीं होगा।”

2.6 जन नेता (§2.2)

  • 1922 तक गाँधी ने भारतीय राष्ट्रवाद को एकदम परिवर्तित कर दिया — फरवरी 1916 के BHU-वायदे को पूरा किया; अब यह व्यवसायियों-बुद्धिजीवियों का ही आंदोलन नहीं — हज़ारों किसान, श्रमिक और कारीगर भागीदार।
  • लोग उन्हें आदर से अपना ‘महात्मा’ कहने लगे; प्रशंसा — गाँधी उनकी तरह के वस्त्र पहनते, उनकी तरह रहते, उनकी भाषा बोलते थे; अन्य नेताओं की तरह सामान्य जनसमूह से अलग नहीं खड़े होते — समानुभूति और घनिष्ठ संबंध।
  • ★वस्त्र: जहाँ अन्य नेता पश्चिमी शैली के सूट या भारतीय बंदगला पहनते थे, गाँधी लोगों के बीच साधारण धोती में; प्रत्येक दिन का कुछ हिस्सा चरखा चलाने में; अन्य राष्ट्रवादियों को भी प्रोत्साहित किया; ★सूत कताई के कार्य ने पारंपरिक जाति व्यवस्था में प्रचलित मानसिक श्रम और शारीरिक श्रम की दीवार को तोड़ने में मदद दी।

स्रोत 1 (पृ. 292): “चरखा”★

  • गाँधी मशीनों के आधुनिक युग के घोर आलोचक — जिसमें मशीनों ने मानव को गुलाम बनाकर श्रम को हटा दिया था; चरखा = ऐसे मानव समाज का प्रतीक जिसमें मशीनों और प्रौद्योगिकी को महिमामंडित नहीं किया जाएगा; चरखा ग़रीबों को पूरक आमदनी देकर स्वावलम्बी बना सकता था।

“मेरी आपत्ति मशीन के प्रति सनक से है… ये तब तक ‘श्रम बचाते’ रहेंगे जब तक कि हज़ारों लोग बिना काम के और भूख से मरने के लिए सड़कों पर न फेंक दिए जाएँ। मैं मानव समुदाय के किसी एक हिस्से के लिए नहीं बल्कि सभी के लिए समय और श्रम बचाना चाहता हूँ: मैं धन का केंद्रीकरण कुछ ही लोगों के हाथों में नहीं बल्कि सभी के हाथों में करना चाहता हूँ।” — यंग इंडिया, 13 नवंबर 1924 “खद्दर मशीनरी को नष्ट नहीं करना चाहता बल्कि यह इसके प्रयोग को नियमित करता है और इसके विकास को नियंत्रित… पहिया अपने आप में ही मशीनरी का एक उत्कृष्ट नमूना है।” — यंग इंडिया, 17 मार्च 1927

2.7 किसानों की नज़र में महात्मा — शाहिद अमीन का अध्ययन★★

  • इतिहासकार शाहिद अमीन ने पूर्वी उत्तर प्रदेश के किसानों के मन में गाँधी की कल्पना को स्थानीय प्रेस की रिपोर्टों और अफ़वाहों के ज़रिये खोजा; फरवरी 1921 में क्षेत्र-यात्रा के दौरान हर जगह भीड़ का प्यार-भरा स्वागत।
  • गोरखपुर के हिंदी समाचारपत्र की रिपोर्ट: भटनी में संबोधन; ट्रेन गोरखपुर रवाना; नूनखार, देवरिया, गौरी बाज़ार, चौरी-चौरा और कुसुम्ही स्टेशनों पर 15-20 हज़ार से कम लोग नहीं; कुसुम्ही में जंगल के बीच स्टेशन पर भी 10,000+; प्रेम में अभिभूत होकर लोग रोते हुए; देवरिया में लोग भेनी (दान) देना चाहते थे — गोरखपुर में देने को कहा; चौरी-चौरा में एक मारवाड़ी सज्जन ने कुछ दे दिया — चादर फैली और रुपयों-सिक्कों की बारिश; गोरखपुर स्टेशन के बाहर ऊँची गाड़ी पर खड़े होकर दर्शन।
  • चामत्कारिक शक्तियों की अफ़वाहें: कुछ स्थानों पर — उन्हें राजा ने किसानों के दुख-तकलीफ़ों में सुधार के लिए भेजा है; उनके पास सभी स्थानीय अधिकारियों के निर्देश अस्वीकृत करने की शक्ति; कहीं — गाँधी की शक्ति अंग्रेज़ बादशाह से उत्कृष्ट; उनके आने से औपनिवेशिक शासक ज़िले से भाग जाएँगे; विरोध करने वालों के भयंकर परिणाम — आलोचकों के घर रहस्यात्मक रूप से गिर गए, फसल चौपट।

स्रोत 2 (पृ. 293–294): “चामत्कारिक व अविश्वसनीय” — शाहिद अमीन★

संयुक्त प्रांत के स्थानीय समाचार-पत्रों में दर्ज अफ़वाहें — शक्ति परखने वालों को अचंभा: (1) बस्ती के सिकंदर साहू — 15 फरवरी: विश्वास तब करूँगा जब कारख़ाने का गन्ने के रस-भरा उबलता कड़ाहा दो भाग में टूट जाए — तुरंत टूट गया; (2) आज़मगढ़ के किसान — खेत का गेहूँ तिल में बदल जाए तो प्रामाणिकता मानूँ — अगले दिन सारा गेहूँ तिल। विरोधियों की त्रासदी: (1) गोरखपुर के सज्जन ने चरखे की आवश्यकता पर प्रश्न उठाया — घर में आग; (2) अप्रैल 1921 — जुआ रोकने पर एक ने मना कर गाँधीजी को अपशब्द कहे — अगले दिन उसकी बकरी को उसके ही चार कुत्तों ने काट खाया; (3) शराब छोड़ने का निश्चय तोड़कर दुकान जा रहे व्यक्ति के रास्ते में रोड़ों की बारिश — गाँधीजी का नाम लेते ही बंद। 🔎 इन-टेक्स्ट (पृ. 294): अध्याय 10 की अफ़वाह-विधि से — गाँधी जी के विषय में अफ़वाहों से क्या पता चलता है?

  • ‘गाँधी बाबा’, ‘गाँधी महाराज’, ‘महात्मा’ — भारतीय किसान के लिए उद्धारक: ऊँचे करों और दमनात्मक अधिकारियों से सुरक्षा; जीवन में मान-मर्यादा और स्वायत्तता की वापसी।
  • अपील को बल — सात्विक जीवन-शैली, धोती और चरखे जैसे प्रतीकों का विवेकपूर्ण प्रयोग; ★जाति से व्यापारी, पेशे से वकील — पर सादी जीवन-शैली और हाथों से काम के लगाव से ग़रीब श्रमिकों से समानुभूति — और बदले में उनकी समानुभूति; अन्य राजनेता कृपा-दृष्टि से देखते थे, गाँधी उनके जैसे दिखकर, समझकर, जीवन से जुड़कर।

2.8 संगठन और अनुयायी

  • जन-अपील कपट-मुक्त; पर सफलता का राज़ सावधानीपूर्वक संगठन भी: कांग्रेस की नयी शाखाएँ; रजवाड़ों में राष्ट्रवादी सिद्धांत के लिए ‘प्रजा मंडलों’ की शृंखला; ★राष्ट्रवादी संदेश शासकों की अंग्रेज़ी की जगह मातृभाषा में; कांग्रेस की प्रांतीय समितियाँ ब्रिटिश भारत की कृत्रिम सीमाओं की अपेक्षा भाषाई क्षेत्रों पर आधारित; राष्ट्रवाद देश के सुदूर हिस्सों और अब तक अछूते सामाजिक वर्गों तक।
  • व्यापारी-उद्योगपति: भारतीय उद्यमियों ने समझा कि स्वतंत्र भारत में अंग्रेज़ प्रतिद्वंद्वियों को मिलने वाले लाभ ख़त्म हो जाएँगे; जी.डी. बिड़ला जैसे कुछ उद्यमियों ने खुला समर्थन, अन्य ने मौन; ★गाँधी के प्रशंसकों में गरीब किसान और धनी उद्योगपति दोनों — हालाँकि दोनों के कारण भिन्न और संभवत: परस्पर विरोधी।
  • ★‘गाँधीवादी राष्ट्रवाद’ का विकास बहुत हद तक उनके अनुयायियों पर निर्भर; 1917-1922 के बीच प्रतिभाशाली वर्ग गाँधी से जुड़ा — महादेव देसाई, वल्लभ भाई पटेल, जे.बी. कृपलानी, सुभाष चंद्र बोस, अबुल कलाम आज़ाद, जवाहरलाल नेहरू, सरोजिनी नायडू, गोविंद वल्लभ पंत, सी. राजगोपालाचारी — भिन्न-भिन्न क्षेत्रों व धार्मिक परंपराओं से; इन्होंने अनगिनत अन्य भारतीयों को कांग्रेस में आने को प्रेरित किया।
  • फरवरी 1924 में जेल से रिहा; अब ध्यान — घर में बुने कपड़े (खादी) को बढ़ावा और छुआछूत की समाप्ति; ★“गाँधी जी राजनीतिक जितने थे उतने ही वे समाज सुधारक थे” — विश्वास: स्वतंत्रता के योग्य बनने के लिए भारतीयों को बाल विवाह और छुआछूत जैसी बुराइयों से मुक्त होना होगा; हिंदू-मुसलमानों के बीच सौहार्द; आर्थिक स्वावलंबन — आयातित मिल-वस्त्र की जगह खादी।
  • 🗣️ चर्चा कीजिए (पृ. 295): असहयोग क्या था? विभिन्न सामाजिक वर्गों ने आंदोलन में किन विभिन्न तरीकों से भाग लिया?

§3. नमक सत्याग्रह — नज़दीक से एक नज़र (पृ. 295–301)

3.1 पृष्ठभूमि — साइमन से पूर्ण स्वराज तक

  • असहयोग की समाप्ति के कई वर्ष बाद तक गाँधी समाज सुधार में; 1928 में पुन: राजनीति में प्रवेश की सोची — उस वर्ष सभी श्वेत सदस्यों वाले साइमन कमीशन (उपनिवेश की स्थितियों की जाँच हेतु इंग्लैंड से) के विरुद्ध अखिल भारतीय अभियान; गाँधी ने स्वयं भाग नहीं लिया पर आशीर्वाद दिया; उसी वर्ष बारदोली किसान सत्याग्रह को भी।
  • दिसंबर 1929, लाहौर कांग्रेस — दो दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण: (1) जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता — युवा पीढ़ी को नेतृत्व की छड़ी सौंपने का प्रतीक; (2) ★‘पूर्ण स्वराज’/पूर्ण स्वतंत्रता की उद्घोषणा।
  • ★26 जनवरी 1930 — विभिन्न स्थानों पर राष्ट्रीय ध्वज फहराकर, देशभक्ति के गीत गाकर ‘स्वतंत्रता दिवस’ मनाया गया; गाँधी के सुस्पष्ट निर्देश — हर गाँव-शहर में एक ही समय संगोष्ठियाँ; नगाड़े से समय की घोषणा; ध्वज-वंदन से शुरुआत; दिन का बाकी हिस्सा रचनात्मक कार्य में — “सूत कताई हो अथवा ‘अछूतों’ की सेवा अथवा हिंदुओं व मुसलमानों का पुनर्मिलन अथवा निषिद्ध कार्य अथवा ये सभी एक साथ” — जो असंभव नहीं; प्रतिज्ञा — “अन्य लोगों की तरह भारतीय लोगों को भी स्वतंत्रता और अपने कठिन परिश्रम के फल का आनंद लेने का अहरणीय अधिकार है… यदि कोई भी सरकार लोगों को इन अधिकारों से वंचित रखती है या उनका दमन करती है तो लोगों को इन्हें बदलने अथवा समाप्त करने का भी अधिकार है।”

3.2 दाण्डी (§3.1)

  • ‘स्वतंत्रता दिवस’ के तुरंत बाद घोषणा — ब्रिटिश भारत के सर्वाधिक घृणित क़ानूनों में से एक — नमक के उत्पादन और विक्रय पर राज्य का एकाधिकार — तोड़ने के लिए यात्रा का नेतृत्व।
  • ★★नमक ही क्यों — कुशल समझदारी: प्रत्येक भारतीय घर में नमक का प्रयोग अपरिहार्य, पर लोग घरेलू प्रयोग तक के लिए नमक बनाने से रोके गए — दुकानों से ऊँचे दाम पर खरीदने को बाध्य; नमक पर राज्य का एकाधिपत्य बहुत अलोकप्रिय; इसी को निशाना बनाकर गाँधी अंग्रेज़ी शासन के खिलाफ व्यापक असंतोष को संघटित करने की सोच रहे थे।
  • अधिकांश भारतीयों को चुनौती का महत्त्व समझ में आ गया — पर अंग्रेज़ी राज को नहीं; गाँधी ने वाइसराय लॉर्ड इर्विन को पूर्व सूचना दी थी, पर इर्विन महत्त्व समझ नहीं पाए।
  • ★12 मार्च 1930 — साबरमती आश्रम से समुद्र की ओर चलना शुरू; तीन हफ़्तों बाद गंतव्य पहुँचे; मुट्ठी भर नमक बनाकर स्वयं को क़ानून की निगाह में अपराधी बना लिया; इसी बीच देश के अन्य भागों में समानांतर नमक यात्राएँ।

स्रोत 3 (पृ. 297): “नमक सत्याग्रह क्यों?” — CWMG खंड 49★★

प्रतिदिन की सूचनाएँ — कैसे अन्यायपूर्ण तरीके से नमक कर तैयार किया गया है; बिना कर (जो कभी-कभी नमक के मूल्य का चौदह गुना) अदा किए नमक के प्रयोग को रोकने के लिए सरकार उस नमक को नष्ट कर देती है जिससे वह लाभ पर नहीं बेच पाती; यह राष्ट्र की अत्यधिक महत्त्वपूर्ण आवश्यकता पर कर; जनता को उत्पादन से रोकती है और प्रकृति ने जिसे बिना श्रम के उत्पादित किया है उसे नष्ट करती है; टनों नमक कोंकण तट पर नष्ट; दाण्डी में भी वही; जहाँ प्राकृतिक नमक उठा लेने की संभावना दिखती है वहाँ अधिकारी नियुक्त — जिनका एकमात्र कार्य विनाश — “बहुमूल्य राष्ट्रीय संपदा को राष्ट्रीय खर्चे से ही नष्ट किया जाता है और लोगों के मुँह से नमक छीन लिया जाता है।” ★नमक एकाधिकार — चौतरफा अभिशाप (चार): (1) लोगों को बहुमूल्य सुलभ ग्राम उद्योग से वंचित; (2) प्रकृति की बहुतायत संपदा का अतिशय विनाश; (3) विनाश का अर्थ और अधिक राष्ट्रीय खर्च; (4) चरमोत्कर्ष — भूखे लोगों से हज़ार प्रतिशत से अधिक की उगाही। जनता की उदासीनता से कर टिका रहा; अब जनता जग चुकी है — कर को समाप्त करना होगा; कितनी जल्दी — यह लोगों की क्षमता पर निर्भर। 🔎 इन-टेक्स्ट: सरकार नमक क्यों नष्ट करती थी? गाँधी नमक कर को अन्य करों की तुलना में अधिक दमनात्मक क्यों मानते थे?

स्रोत 4 (पृ. 298): “कल हम नमक कर क़ानून तोड़ेंगे” — 5 अप्रैल 1930, दाण्डी★

यक़ीन नहीं था कि यहाँ तक आने दिया जाएगा; साबरमती में गिरफ़्तारी की अफ़वाह; “सरकार साथियों को दाण्डी आने देगी पर मुझे निश्चय ही नहीं छोड़ेगी” — मैं पहुँचा हूँ; “इसमें शांति और अहिंसा का कम हाथ नहीं है; इस सत्ता को सब महसूस करते हैं”; सरकार चाहती तो हर एक को गिरफ़्तार कर सकती थी; शांति की सेना को गिरफ़्तार करने का साहस नहीं — हम प्रशंसा करते हैं; शर्मिंदगी वाले काम से बचना शिष्ट-सभ्यता है; गिरफ़्तार न करने के लिए बधाई — भले ही विश्व जनमत के ख़याल से ही क्यों न हो। “कल हम नमक कर क़ानून तोड़ेंगे। सरकार इसको बर्दाश्त करती है कि नहीं, यह सवाल अलग है।” धैर्य-सहिष्णुता के लिए अभिनंदन… ★“यदि मुझे और गुजरात व देश भर के सारे मुख्य नेताओं को गिरफ़्तार कर लिया जाता है तो क्या होगा? यह आंदोलन इस विश्वास पर आधारित है कि जब एक पूरा राष्ट्र उठ खड़ा होता है और आगे बढ़ने लगता है तो उसे नेता की ज़रूरत नहीं रह जाती।” 🔎 इन-टेक्स्ट: इस भाषण के आधार पर बताइए कि गाँधी जी औपनिवेशिक राज्य को कैसे देखते थे?

3.3 विरोध की असंख्य धाराएँ और दमन

  • स्वीकृत राष्ट्रीय अभियान के अलावा विरोध की असंख्य धाराएँ: देश के विशाल भाग में किसानों ने दमनकारी औपनिवेशिक वन क़ानूनों का उल्लंघन (वे और मवेशी उन्हीं जंगलों में नहीं जा सकते थे जहाँ एक ज़माने में बेरोकटोक घूमते थे); कुछ कस्बों में फैक्ट्री कामगार हड़ताल पर; वकीलों ने ब्रिटिश अदालतों का बहिष्कार; विद्यार्थियों ने सरकारी शिक्षा संस्थानों में पढ़ने से इनकार।
  • 1920-22 की तरह गाँधी के आह्वान ने तमाम भारतीय वर्गों को असंतोष व्यक्त करने को प्रेरित किया; ★नमक सत्याग्रह के सिलसिले में लगभग 60,000 गिरफ़्तार — गाँधी जी भी।
  • यात्रा की प्रगति के स्रोत: नज़र रखने के लिए तैनात पुलिस अफ़सरों की गोपनीय रिपोर्टें; रास्ते के गाँवों के भाषण — सरकारी नौकरियाँ छोड़कर स्वतंत्रता संघर्ष में शामिल होने का आह्वान; ★वसना गाँव में ऊँची जाति वालों से: “यदि आप स्वराज के हक में आवाज़ उठाते हैं तो आपको अछूतों की सेवा करनी पड़ेगी। सिर्फ़ नमक कर या अन्य करों के ख़त्म हो जाने से आपको स्वराज नहीं मिल जाएगा। स्वराज के लिए आपको अपनी उन ग़लतियों का प्रायश्चित करना होगा जो आपने अछूतों के साथ कीं। स्वराज के लिए हिंदू, मुसलमान, पारसी और सिख, सबको एकजुट होना पड़ेगा। ये स्वराज की सीढ़ियाँ हैं।”
  • पुलिस जासूसों की रिपोर्टें — सभाओं में तमाम जातियों की औरत-मर्द शामिल; हज़ारों वॉलंटियर राष्ट्रवादी उद्देश्य के लिए सामने; बहुत सारे सरकारी अफ़सर इस्तीफ़ा देकर; ज़िला पुलिस सुपरिंटेंडेंट की रिपोर्ट: “श्री गाँधी शांत और निश्चिंत दिखाई दिए। वे जैसे-जैसे आगे बढ़ रहे हैं, उनकी ताकत बढ़ती जा रही है।”
  • ★टाइम पत्रिका — पहले गाँधी की कद-काठी पर हँसी: “तकुए जैसे शरीर” और “मकड़ी जैसे पेट” का मज़ाक; पहली रिपोर्ट में मंज़िल तक पहुँचने पर गहरी शंका — दूसरे दिन पैदल चलने के बाद गाँधी “ज़मीन पर पसर गए थे”; इस “मरियल साधु” में आगे जाने की ताकत पर अविश्वास। ★एक हफ़्ते में सोच बदली — भारी जनसमर्थन ने अंग्रेज़ शासकों को “ग़हरे तौर पर बेचैन” कर दिया; अब गाँधी को “साधु” और “राजनेता” कहा — जो “ईसाई धर्मावलंबियों के ख़िलाफ़ ईसाई तरीकों का ही हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहा है।”

3.4 संवाद (§3.2) — यात्रा का तिहरा महत्त्व और गोलमेज़

★★नमक यात्रा कम से कम तीन कारणों से उल्लेखनीय:

  1. यही वह घटना थी जिसके चलते महात्मा गाँधी दुनिया की नज़र में आए — यात्रा को यूरोप और अमेरिकी प्रेस की व्यापक कवरेज।
  2. यह पहली राष्ट्रवादी गतिविधि जिसमें औरतों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया — समाजवादी कार्यकर्ता कमलादेवी चट्टोपाध्याय ने गाँधी को समझाया कि वे आंदोलनों को पुरुषों तक सीमित न रखें; कमलादेवी स्वयं उन असंख्य औरतों में थीं जिन्होंने नमक या शराब क़ानूनों का उल्लंघन कर सामूहिक गिरफ़्तारी दी।
  3. तीसरा और संभवत: सबसे महत्त्वपूर्ण — नमक यात्रा के कारण ही अंग्रेज़ों को यह अहसास हुआ कि उनका राज बहुत दिन नहीं टिक सकेगा और उन्हें भारतीयों को भी सत्ता में हिस्सा देना पड़ेगा।
  • इसी लक्ष्य से ब्रिटिश सरकार ने लंदन में ‘गोल मेज सम्मेलनों’ का आयोजन शुरू किया:
    • पहला — नवम्बर 1930: देश के प्रमुख नेता शामिल नहीं हुए → बैठक निरर्थक।
    • जनवरी 1931 में गाँधी जेल से रिहा; अगले महीने वाइसराय से कई लंबी बैठकें → ★‘गाँधी-इर्विन समझौते’ पर सहमति — शर्तें: सविनय अवज्ञा आंदोलन वापस; सारे क़ैदियों की रिहाई; तटीय इलाकों में नमक उत्पादन की अनुमति। ★रैडिकल राष्ट्रवादियों की आलोचना — गाँधी वाइसराय से भारतीयों के लिए राजनीतिक स्वतंत्रता का आश्वासन हासिल नहीं कर पाए थे — केवल वार्ताओं का आश्वासन।
    • दूसरा — 1931 के आख़िर, लंदन: गाँधी कांग्रेस का नेतृत्व करते हुए; दावा — उनकी पार्टी पूरे भारत का प्रतिनिधित्व करती है; ★★तीन पार्टियों की चुनौती: मुस्लिम लीग — वह मुस्लिम अल्पसंख्यकों के हित में काम करती है; राजे-रजवाड़े — कांग्रेस का उनके नियंत्रण वाले भूभाग पर कोई अधिकार नहीं; तेज़-तर्रार वकील और विचारक बी.आर. अंबेडकर — गाँधी जी और कांग्रेस पार्टी निचली जातियों का प्रतिनिधित्व नहीं करते।
  • सम्मेलन नतीजे पर नहीं पहुँचा — गाँधी खाली हाथ लौटे; लौटकर सविनय अवज्ञा फिर शुरू।
  • नए वाइसराय लॉर्ड विलिंग्डन को गाँधी से बिलकुल हमदर्दी नहीं; बहन को निजी ख़त — ★“अगर गाँधी न होता तो यह दुनिया वाकई बहुत ख़ूबसूरत होती… वह जो भी क़दम उठाता है उसे ईश्वर की प्रेरणा का परिणाम कहता है लेकिन उसके पीछे असल में एक गहरी राजनीतिक चाल होती है… सच यह है कि हम निहायत अव्यावहारिक, रहस्यवादी और अंधविश्वासी जनता के बीच रह रहे हैं जो गाँधी को भगवान मान बैठी है।”

स्रोत 5 (पृ. 300): “पृथक निर्वाचिका के बारे में समस्या” — गोलमेज़ में गाँधी★

दमित वर्गों के लिए पृथक निर्वाचिका प्रस्ताव के ख़िलाफ़: “‘अस्पृश्यों’ के लिए पृथक निर्वाचिका का प्रावधान करने से उनकी दासता स्थायी रूप ले लेगी… क्या आप चाहते हैं कि ‘अस्पृश्य’ हमेशा ‘अस्पृश्य’ ही बने रहें? पृथक निर्वाचिका से उनके प्रति कलंक का यह भाव और मजबूत हो जाएगा। ज़रूरत इस बात की है कि ‘अस्पृश्यता’ का विनाश किया जाए…”

स्रोत 6 (पृ. 301): “पृथक निर्वाचिका पर अम्बेडकर के विचार”★★

“हमारे सामने एक ऐसा वर्ग है जो निश्चय ही अस्तित्व के संघर्ष में ख़ुद को क़ायम नहीं रख सकता। जिस धर्म से ये लोग बँधे हुए हैं वह उन्हें सम्माननीय स्थान देने की बजाय कोढ़ियों की तरह देखता है… आर्थिक रूप से यह वर्ग दो वक़्त की रोटी के लिए सवर्ण हिंदुओं पर पूरी तरह आश्रित है; जिसके पास आजीविका का कोई स्वतंत्र साधन नहीं… समग्र इतिहास में हिंदू समाज ने उनके सामने खुलने वाली हर संभावना को बंद कर दिया है जिससे दमित वर्गों को जीवन में ऊपर उठने का कोई अवसर न मिल सके। इन परिस्थितियों में सभी निष्पक्ष सोच वाले व्यक्ति सहमत होंगे कि… ऐसे अपंग समुदाय के पास संगठित निरंकुशता के विरुद्ध जीवन के संघर्ष का एकमात्र रास्ता यही है कि उसे राजनीतिक सत्ता में हिस्सा मिले जिससे वह अपनी रक्षा कर सके।” — डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर, “व्हाट कांग्रेस एंड गाँधी हैव डन टू दि अनटचेबल्स”, राइटिंग्स एंड स्पीचेस, खंड 9, पृ. 312 🗣️ चर्चा कीजिए (पृ. 302): स्रोत 5 एवं 6 को पढ़िए — दमित वर्गों के लिए पृथक निर्वाचिका के मुद्दे पर अम्बेडकर और महात्मा गाँधी के बीच काल्पनिक संवाद लिखिए।

3.5 1935 अधिनियम से क्रिप्स तक

  • ★1935 के नए गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया एक्ट में सीमित प्रातिनिधिक शासन का आश्वासन; दो साल बाद (1937) सीमित मताधिकार पर चुनाव — कांग्रेस को ज़बरदस्त सफलता; ★11 में से 8 प्रांतों में कांग्रेस के “प्रधानमंत्री” सत्ता में — ब्रिटिश गवर्नर की देखरेख में।
  • सितंबर 1939 — कांग्रेस मंत्रिमंडलों के सत्ता में आने के दो साल बाद दूसरा विश्व युद्ध; गाँधी और नेहरू दोनों हिटलर व नात्सियों के कट्टर आलोचक; फ़ैसला — अगर अंग्रेज़ युद्ध के बाद भारत को स्वतंत्रता देने पर राज़ी हों तो कांग्रेस उनके युद्ध प्रयासों में सहायता दे सकती है; सरकार ने प्रस्ताव ख़ारिज किया → कांग्रेसी मंत्रिमंडलों का इस्तीफ़ा (अक्टूबर 1939); 1940-41 में कांग्रेस ने स्वतंत्रता की माँग के दबाव हेतु अलग-अलग (व्यक्तिगत) सत्याग्रह कार्यक्रम।
  • ★मार्च 1940 — मुस्लिम लीग ने उपमहाद्वीप के मुस्लिम-बहुल इलाकों के लिए कुछ स्वायत्तता की माँग का प्रस्ताव; अब राजनीतिक भूदृश्य जटिल: “अब यह संघर्ष भारतीय बनाम ब्रिटिश नहीं रह गया था… अब यह कांग्रेस, मुस्लिम लीग और ब्रिटिश शासन, तीन धुरियों के बीच का संघर्ष था।”
  • ब्रिटेन में सर्वदलीय सरकार — लेबर पार्टी के सदस्य भारतीय आकांक्षाओं से हमदर्द; पर प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल कट्टर साम्राज्यवादी — कथन: उन्हें सम्राट का सर्वोच्च मंत्री इसलिए नियुक्त नहीं किया गया कि “वह ब्रिटिश साम्राज्य को टुकड़े-टुकड़े कर दें।”
  • 1942 के बसंत में चर्चिल ने गाँधी-कांग्रेस से समझौते के लिए सर स्टेफ़र्ड क्रिप्स को भारत भेजा; ★वार्ता टूटी — कांग्रेस की ज़िद: धुरी शक्तियों से भारत की रक्षा में सहायता के बदले वाइसराय पहले अपनी कार्यकारी परिषद में किसी भारतीय को रक्षा सदस्य नियुक्त करे।

§4. भारत छोड़ो (पृ. 303–304)

  • क्रिप्स मिशन की विफलता के बाद गाँधी का तीसरा बड़ा आंदोलन — अगस्त 1942 — “अंग्रेज़ों भारत छोड़ो”।
  • गाँधी फ़ौरन गिरफ़्तार; पर देश भर के युवा कार्यकर्ता हड़तालों और तोड़फोड़ से आंदोलन चलाते रहे; कांग्रेस में जयप्रकाश नारायण जैसे समाजवादी सदस्य भूमिगत प्रतिरोध में सबसे सक्रिय; पश्चिम में सतारा और पूर्व में मेदिनीपुर जैसे कई ज़िलों में “स्वतंत्र” सरकार (प्रतिसरकार) की स्थापना।
  • अंग्रेज़ों का काफ़ी सख़्त रवैया; फिर भी विद्रोह दबाने में सरकार को साल से ज़्यादा समय।
  • (📦 बॉक्स — सतारा, 1943: 19वीं सदी के आख़िर से महाराष्ट्र में जाति व्यवस्था और ज़मींदारी के ख़िलाफ़ ग़ैर-ब्राह्मण आंदोलन विकसित; 1930 के दशक तक राष्ट्रवादी आंदोलन से संबंध; 1943 में सतारा ज़िले के कुछ युवा नेताओं ने सेवा दलों और तूफ़ान दलों (ग्राम इकाई) के साथ मिलकर प्रतिसरकार (समानांतर सरकार) स्थापित की; जन-अदालतों का आयोजन तथा रचनात्मक कार्य; कुनबी किसानों के दबदबे व दलितों के सहयोग से चलने वाली सतारा प्रतिसरकार सरकारी दमन और अंतिम दौर में कांग्रेस की असहमति के बावजूद 1946 के चुनावों तक चलती रही।)
  • ★“‘भारत छोड़ो’ (Quit India) आंदोलन सही मायने में एक जनांदोलन था जिसमें लाखों आम हिंदुस्तानी शामिल थे।” युवाओं को बड़ी संख्या में आकर्षित किया — कॉलेज छोड़कर जेल का रास्ता।
  • ★जिस दौरान कांग्रेस के नेता जेल में थे, जिन्ना तथा मुस्लिम लीग के उनके साथी अपना प्रभाव क्षेत्र फैलाने में लगे — इन्हीं सालों में लीग को पंजाब और सिंध में अपनी पहचान बनाने का मौका मिला जहाँ अब तक उसका कोई ख़ास वजूद नहीं था।
  • जून 1944 — विश्व युद्ध समाप्ति की ओर; गाँधी रिहा; जेल से निकलकर कांग्रेस और लीग के बीच फ़ासले को पाटने के लिए जिन्ना से कई बार बात।
  • 1945 — ब्रिटेन में लेबर पार्टी की सरकार — भारतीय स्वतंत्रता के पक्ष में; उसी समय वाइसराय लॉर्ड वावेल ने कांग्रेस-लीग प्रतिनिधियों की कई बैठकें आयोजित कीं।
  • ★1946 की शुरुआत — प्रांतीय विधान मंडलों के नए चुनाव: “सामान्य” श्रेणी में कांग्रेस को भारी सफलता; मुसलमानों के लिए आरक्षित सीटों पर मुस्लिम लीग को भारी बहुमत — “राजनीतिक ध्रुवीकरण पूरा हो चुका था।”
  • 1946 की गर्मियों — कैबिनेट मिशन: कांग्रेस और लीग को ऐसी संघीय व्यवस्था पर राज़ी करने का प्रयास जिसमें भारत के भीतर विभिन्न प्रांतों को सीमित स्वायत्तता दी जा सकती थी — यह प्रयास भी विफल।
  • वार्ता टूटने के बाद जिन्ना ने पाकिस्तान की स्थापना के लीग की माँग के समर्थन में “प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस” का आह्वान — ★16 अगस्त 1946; उसी दिन कलकत्ता में ख़ूनी संघर्ष — हिंसा कलकत्ता से ग्रामीण बंगाल, बिहार, संयुक्त प्रांत व पंजाब तक; कुछ स्थानों पर मुसलमानों को, कुछ अन्य स्थानों पर हिंदुओं को निशाना बनाया गया।
  • फरवरी 1947 — वावेल की जगह लॉर्ड माउंटबेटन; वार्ताओं का एक अंतिम दौर; सुलह-प्रयास विफल होने पर ऐलान — ब्रिटिश भारत को स्वतंत्रता मिलेगी, लेकिन उसका विभाजन भी होगा; औपचारिक सत्ता-हस्तांतरण के लिए 15 अगस्त नियत।
  • उस दिन जश्न; ★दिल्ली में संविधान सभा के अध्यक्ष ने मोहनदास करमचंद गाँधी को ‘राष्ट्रपिता’ की उपाधि देते हुए बैठक शुरू की — “बहुत देर तक करतल ध्वनि”; असेम्बली के बाहर भीड़ — “महात्मा गाँधी की जय!”

§5. आख़िरी, बहादुराना दिन (पृ. 305–306)

  • 15 अगस्त 1947 को गाँधी राजधानी के उत्सवों में नहीं — वे उस समय कलकत्ता में थे; न किसी कार्यक्रम में हिस्सा, न झंडा फहराया; उस दिन 24 घंटे का उपवास; ★जिस स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया था वह “एक अकल्पनीय कीमत पर” मिली — राष्ट्र विभाजित; हिंदू-मुसलमान एक-दूसरे की गर्दन पर सवार।
  • जीवनी-लेखक डी.जी. तेंदुलकर: सितंबर-अक्टूबर में गाँधी — “पीड़ितों को सांत्वना देते हुए अस्पतालों और शरणार्थी शिविरों के चक्कर” लगा रहे थे; सिखों, हिंदुओं और मुसलमानों से आह्वान — अतीत को भुला कर, अपनी पीड़ा पर ध्यान देने की बजाय एक-दूसरे के प्रति भाईचारे का हाथ बढ़ाने और शांति से रहने का संकल्प लें।
  • गाँधी और नेहरू के आग्रह पर कांग्रेस ने ‘अल्पसंख्यकों के अधिकारों’ पर प्रस्ताव पारित किया; कांग्रेस ने ‘दो राष्ट्र सिद्धांत’ को कभी स्वीकार नहीं किया था; अपनी इच्छा के विरुद्ध बँटवारे पर मंज़ूरी दी तो भी दृढ़ विश्वास — ★“भारत बहुत सारे धर्मों और बहुत सारी नस्लों का देश है और उसे ऐसे ही बनाए रखा जाना चाहिए।” पाकिस्तान में हालात जो रहें, भारत “एक लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र होगा जहाँ सभी नागरिकों को पूर्ण अधिकार प्राप्त होंगे तथा धर्म के आधार पर भेदभाव के बिना सभी को राज्य की ओर से संरक्षण का अधिकार होगा”; आश्वासन — अल्पसंख्यकों के नागरिक अधिकारों के किसी भी अतिक्रमण के विरुद्ध हर मुमकिन रक्षा।
  • ★बहुत सारे विद्वानों ने स्वतंत्रता बाद के महीनों को गाँधी के जीवन का “श्रेष्ठतम क्षण” कहा; बंगाल में शांति के अभियान के बाद दिल्ली आए; यहाँ से दंगाग्रस्त पंजाब के ज़िलों में जाना चाहते थे; पर राजधानी में ही शरणार्थियों की आपत्तियों से सभाएँ अस्त-व्यस्त — बहुतों को उनकी सभाओं में क़ुरान की आयतें पढ़ने की प्रथा पर आपत्ति; नारे — गाँधी उन हिंदुओं-सिखों की पीड़ा की बात क्यों नहीं करते जो अभी भी पाकिस्तान में फँसे हैं; तेंदुलकर — गाँधी “पाकिस्तान में भी अल्पसंख्यक समुदाय के कष्टों के बारे में समान रूप से चिंतित” थे; वहाँ भी जाना चाहते थे — पर कैसे जाते जब दिल्ली में ही मुसलमानों को पूरी सुरक्षा का आश्वासन नहीं दे पा रहे थे।
  • 20 जनवरी — गाँधी पर हमला, पर अविचलित काम करते रहे; 26 तारीख़ की प्रार्थना-सभा में — बीते सालों में इस दिन (26 जनवरी) को स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाए जाने का ज़िक्र; स्वतंत्रता मिल चुकी, पर शुरुआती महीने गहरे मोहभंग वाले; फिर भी विश्वास — “बुरी घड़ी बीत चुकी है”; भारत के लोग अब “सभी वर्गों और धर्मों की समानता” के लिए काम करेंगे; “अल्पसंख्यक समुदाय पर बहुल समुदाय का वर्चस्व व श्रेष्ठता स्थापित नहीं होगी” — अल्पसंख्यक चाहे संख्या-प्रभाव में कितना भी छोटा हो; आशा — ★“यद्यपि भौगोलिक और राजनीतिक रूप से भारत दो भागों में बँट चुका है लेकिन हृदय से हम सभी सदैव मित्र एवं भाई रहेंगे…”
  • गाँधी ने स्वतंत्र और अखंड भारत के लिए जीवन भर युद्ध लड़ा; देश बँटा तो इच्छा — दोनों देश सम्मान और दोस्ती के संबंध रखें। बहुत सारे भारतीयों को उनका यह सहृदय आचरण पसंद नहीं था।
  • ★★30 जनवरी की शाम — दैनिक प्रार्थना सभा में एक युवक ने गोली मारकर हत्या; हत्यारे ने कुछ समय बाद आत्मसमर्पण किया — नाम नाथूराम गोडसे।
  • मृत्यु पर गहरे शोक की लहर; भावभीनी श्रद्धांजलियाँ; जॉर्ज ऑरवेल तथा एलबर्ट आइंस्टीन जैसे विख्यात गैर-भारतीयों के शोक-संदेश; ★टाइम पत्रिका — जो कभी उपहास करती थी — ने उनके बलिदान की तुलना अब्राहम लिंकन के बलिदान से की: एक धर्मांध अमरीकी ने लिंकन को मारा था क्योंकि लिंकन नस्ल या रंग से परे मानवमात्र की समानता में विश्वास रखते थे; एक धर्मांध हिंदू ने गाँधी की जीवन-लीला समाप्त की क्योंकि गाँधी कठिन क्षणों में भी दोस्ती-भाईचारे में विश्वास रखते थे, विभिन्न धर्मों के बीच दोस्ती की अनिवार्यता पर बल देते थे; टाइम — “दुनिया जानती थी कि उसने उनकी मृत्यु पर वैसे ही मौन धारण कर लिया है जिस प्रकार उसने लिंकन की मृत्यु पर किया था।”
  • चित्र 11.15 — मृत्यु का प्रचलित चित्र: लोक-छवियों में गाँधी को देवता का रूप; नेहरू व पटेल (कांग्रेस की दो अलग-अलग धाराएँ) चिता के दोनों ओर; स्वर्ग से गाँधी आशीर्वाद देते।

§6. गाँधी को समझना (पृ. 307–313)

6.1 सार्वजनिक स्वर और निजी लेखन

  • गाँधी और उनके सहयोगियों व प्रतिद्वंद्वियों — दोनों तरह के समकालीनों — के लेखन और भाषण महत्त्वपूर्ण स्रोत।
  • ★★भेद: भाषण — सार्वजनिक विचार; व्यक्तिगत पत्र — निजी विचारों की झलक: गुस्सा-पीड़ा, असंतोष-बेचैनी, आशाएँ-हताशाएँ — जो सार्वजनिक वक्तव्यों में व्यक्त नहीं हो सकतीं।
  • ! पर सावधानी: कई बार निजी-सार्वजनिक का फ़र्क़ टूट जाता है — बहुत से पत्र व्यक्तियों को लिखे जाने से व्यक्तिगत हैं पर जनता के लिए भी होते हैं; भाषा इस अहसास से तय होती है कि संभव है एक दिन उन्हें प्रकाशित कर दिया जाए; प्रकाशन की आशंका के कारण बहुत लोग निजी पत्रों में भी मत स्वतंत्रतापूर्वक व्यक्त नहीं कर पाते।
  • ★गाँधी अपने अख़बार ‘हरिजन’ में उन्हें लिखे गए पत्र प्रकाशित करते थे; नेहरू ने राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान लिखे गए पत्रों का संकलन ‘ए बंच ऑफ़ ओल्ड लेटर्स’ नाम से प्रकाशित किया।

स्रोत 7 (पृ. 307–309): “एक घटना पत्रों के आइने में”★★

पृष्ठभूमि: 1920 के दशक में नेहरू समाजवाद से प्रभावित; 1928 में यूरोप-यात्रा से लौटे तो सोवियत संघ के प्रयोगों से गहरे प्रभावित; समाजवादियों (जयप्रकाश नारायण, नरेंद्र देव, एन.जी. रंगा आदि) से निकट काम — कांग्रेस के भीतर समाजवादियों और रूढ़िवादियों में खाई; 1936 में कांग्रेस-अध्यक्ष बनने पर नेहरू ने फ़ासीवाद के ख़िलाफ़ जमकर बयान दिए, मज़दूरों-किसानों की माँगों का समर्थन किया। संकट: समाजवादी वक्तव्यों से चिंतित रूढ़िवादियों — राजेंद्र प्रसाद और सरदार पटेल के नेतृत्व में कांग्रेस वर्किंग कमेटी — ने इस्तीफ़े की धमकी; बम्बई के कुछ प्रसिद्ध उद्योगपतियों ने नेहरू की आलोचना में बयान; प्रसाद और नेहरू दोनों वर्धा आश्रम में गाँधी के पास; ★गाँधी ने फिर मध्यस्थ की भूमिका — नेहरू के रैडिकल तेवरों पर अंकुश + प्रसाद आदि को नेहरू के नेतृत्व की अहमियत पर ध्यान देने को प्रेरित।

तीन पत्र (ए बंच ऑफ़ ओल्ड लेटर्स से):

  1. राजेन्द्र प्रसाद → नेहरू (वर्धा, 1 जुलाई 1936): महात्मा जी से लंबी बातचीत; आपको दुख हुआ, पत्र के भावों से आहत हुए; शर्मिंदा करने का इरादा कभी नहीं; पत्र और इस्तीफ़े वापस; पर — आप प्रेस के बयानों में कांग्रेस के सामान्य कार्यक्रम पर उतना नहीं बोल रहे जितना उस विषय (समाजवाद) पर जिसे कांग्रेस ने स्वीकृति नहीं दी; आप वर्किंग कमेटी के अल्पसंख्यक वर्ग के प्रवक्ता की तरह बोल रहे हैं, न कि उस बहुल वर्ग के प्रतिनिधि के रूप में जिसके आप अध्यक्ष हैं; हमारे विरुद्ध लगातार अभियान — हमें ऐसे व्यक्तियों के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है “जिनका समय बीत चुका है, जो पुराने पड़ चुके और अप्रासंगिक विचारों का प्रतिनिधित्व करते हैं”… हमें आपसे वह संरक्षण नहीं मिल रहा जो एक सहकर्मी और अध्यक्ष से मिलना चाहिए।
  2. जवाहरलाल → बापू (इलाहाबाद, 5 जुलाई 1936): शारीरिक दुर्बलता व मानसिक अशांति; वर्किंग कमेटी की बैठकों में बुरी तरह थक जाता हूँ; संकट टालने के आपके कष्ट के लिए आभारी; राजेन्द्र बाबू के (दूसरे) पत्र के गंभीर आरोप देखे; आशय यह कि मैं एक असहनीय मुसीबत बन चुका हूँ — मेरे गुण भी ख़तरनाक क्योंकि “वे एक ग़लत रथ (समाजवाद) को आगे बढ़ा रहे हैं”; अपने विचारों के बारे में पुस्तक में विस्तार से लिखा है; “मेरे विचार आकस्मिक नहीं हैं। वे मेरा हिस्सा हैं”; भविष्य में बदल सकता हूँ पर जब तक नहीं छोड़ता, अभिव्यक्त करना ही होगा; व्यापक एकता को महत्त्वपूर्ण मानता हूँ — इसलिए कोमलतम शब्दों में व्यक्त किया और समाजवाद को निश्चित निष्कर्ष की बजाय विचार-विमर्श के प्रस्ताव के रूप में रखा; चुनावों में मेरा रवैया लाभकारी — जनता में उत्साह का संचार; पर मेरे कोमल-अस्पष्ट रवैये को भी सहयोगी ख़तरनाक और क्षतिकारक मानते हैं; यहाँ तक कहा गया कि भारत में गरीबी और बेरोजगारी पर बार-बार जोर देना बेवकूफी थी…; आप वक्तव्य जारी करना चाहते हैं — स्वागत करूँगा — हर दृष्टिकोण देश के सामने आना चाहिए।
  3. बापू → जवाहरलाल (सेगाँव, 15 जुलाई 1936): तुम्हारा पत्र हृदय छू गया; तुम्हें सबसे ज़्यादा ठेस पहुँची है; तथ्य यह है कि तुम्हारे साथियों के पास तुम्हारे जैसा साहस और बेबाकी नहीं — परिणाम विनाशकारी; मैंने उन्हें समझाया है कि तुमसे उन्मुक्त और निर्भय होकर बात करें; साहस नहीं है इसलिए “जब भी बोलते हैं ऊटपटाँग ही बोलते हैं” और तुम चिढ़ जाते हो; वे तुमसे डरते हैं क्योंकि तुम चिढ़ते हो और उनके सामने धैर्य खो देते हो; वे तुम्हारी फटकार और साहबी अंदाज से आहत हैं, और सबसे बढ़कर तुम्हारे भीतर जो अचूकता और श्रेष्ठतर ज्ञान का भाव दिखायी देता है उससे परेशान हैं; ★“मुझे यह पूरा प्रसंग एक त्रासद प्रहसन जैसा दिखाई दे रहा है” — चाहता हूँ तुम इस मसले को हलका होकर देखो; “इस काँटों के ताज (कांग्रेस की अध्यक्षता) के लिए तुम्हारा नाम मैंने ही प्रस्तावित किया था। भले ही सिर छिल जाए इसे उतारना मत”; कमेटी की बैठकों में हास्य-विनोद दोबारा दिखाओ — यह तुम्हारे लिए सबसे सामान्य भूमिका है; चाहता हूँ तार से बताओ कि पत्र पढ़ते ही तुम्हें वैसी ही ख़ुशी मिली जैसी लाहौर में नए साल पर, जब कहते हैं कि तुम तिरंगे के चारों ओर झूम-झूम कर नाचे थे; अपने कंठ को थोड़ा आराम दो। — मेरा प्यार, बापू

🔎 इन-टेक्स्ट (पृ. 309): (क) पत्रों से — समय के साथ कांग्रेस के आदर्श किस तरह विकसित हो रहे थे? (ख) राष्ट्रीय आंदोलन में गाँधी की भूमिका के बारे में पत्रों से क्या पता चलता है? (ग) क्या ऐसे पत्रों से कांग्रेस की आंतरिक कार्यप्रणाली के बारे में विशेष दृष्टि मिलती है?

6.2 छवि गढ़ना (आत्मकथाएँ)

  • आत्मकथाएँ मानवीय विवरणों से समृद्ध अतीत का ब्योरा; ★पर — स्मृति के आधार पर लिखी जातीं; बतातीं हैं — लेखक को क्या याद रहा, कौन-सी चीज़ें महत्त्वपूर्ण लगीं, वह क्या याद रखना चाहता था, वह औरों की नज़र में अपनी ज़िंदगी को किस तरह दर्शाना चाहता था; ★★“आत्मकथा लिखना अपनी तस्वीर गढ़ने का एक तरीक़ा है।” — पढ़ते समय वह देखने का प्रयास करना चाहिए जो लेखक हमें नहीं दिखाना चाहता; चुप्पियों के कारण — इच्छित या अनिच्छित विस्मृति के कृत्यों — को समझना चाहिए।

6.3 पुलिस की नज़र से

  • सरकारी रिकॉर्ड महत्त्वपूर्ण स्रोत — पुलिसकर्मियों-अधिकारियों के पत्र व रिपोर्टें तब गोपनीय थीं, अब अभिलेखागारों में सबके लिए उपलब्ध।
  • ★गृह विभाग की पाक्षिक रिपोर्टें (हर पंद्रह दिन/पखवाड़े में तैयार) — स्थानीय इलाकों से पुलिस की मार्फ़त सूचनाओं पर आधारित, “लेकिन उनमें यह भी दिख जाता था कि आला अधिकारी क्या देखते थे या क्या मानना चाहते थे” — राजद्रोह-विद्रोह की संभावना मानते हुए भी वे ख़ुद को आश्वासन देना चाहते थे कि इन आशंकाओं का कोई आधार नहीं।
  • ★★नमक सत्याग्रह की पाक्षिक रिपोर्टें: गृह विभाग यह मानने को तैयार नहीं था कि गाँधी की कार्रवाइयों के प्रति कोई व्यापक जनसमर्थन पैदा हो रहा था; यात्रा को “एक नाटक, एक करतब, ब्रिटिश शासन के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने के प्रति अनिच्छुक तथा शासन के अंतर्गत सुखपूर्वक जीवन व्यतीत कर रहे लोगों को गोलबंद करने की एक हताश कोशिश” के रूप में प्रस्तुत किया गया।
  • 🔎 इन-टेक्स्ट (पृ. 310): क्या आपको चित्र 11.16 (बम्बई में वॉलंटियरों की पुलिस से भिड़ंत) और पाक्षिक रिपोर्टों की जानकारियों के बीच कोई अंतर्विरोध दिखायी देता है?

स्रोत 8 (पृ. 311–312): “गृह विभाग की पाक्षिक रिपोर्टें (गोपनीय)”★★

मार्च 1930 का पहला पखवाड़ा: गुजरात — तेज़ बदलावों पर गहरी नज़र; असर का अंदाज़ा मुश्किल; रबी अच्छी — किसान कटाई में व्यस्त; विद्यार्थी परीक्षा-तैयारी में। मध्य प्रांत-बेरार — पटेल-गिरफ़्तारी पर कांग्रेसियों के अलावा ख़ास उत्तेजना नहीं; पर नागपुर में गाँधी-यात्रा की बधाई-सभा में 3,000+। बंगाल — सेनगुप्ता की अखिल बंगाल सविनय अवज्ञा परिषद; “कोई विशेष उत्साह नहीं… आम जनता पर कोई गहरा असर नहीं”; ★गौरतलब — “इन बैठकों में महिलाओं की संख्या बढ़ती जा रही है।” बिहार-उड़ीसा — चौकीदारी टैक्स के भुगतान न करने की चर्चा; प्रयोग के लिए इलाक़ा नहीं चुना गया; गाँधी-गिरफ़्तारी पर कयास। मद्रास — आम जनता यात्रा को नाटकीय और कार्यक्रम को अव्यावहारिक मानती है “परंतु हिंदू जनता उन्हें अगाध श्रद्धा की दृष्टि से देखती है” — गिरफ़्तारी की संभावना में गहरी रुचि; राजनीतिक प्रभावों के बारे में ग़लतफ़हमियाँ। बम्बई — केसरी प्रेस की आक्रामक भाषा: “सत्याग्रह की सक्रियता और निष्क्रियता, दोनों से सरकार को ही नुकसान… अगर सरकार श्री गाँधी को दंडित करती है तो भी राष्ट्र की विजय होगी और अगर सरकार उन्हें अपने रास्ते पर चलने देती है तो राष्ट्र की और भी बड़ी विजय होगी”; विविध वृत्त (मध्यमार्गी) — आंदोलन की व्यर्थता की ओर संकेत, पर सरकार को चेतावनी — दमन का रास्ता उसके उद्देश्य को कमज़ोर कर देगा। मार्च 1930 का दूसरा पखवाड़ा: बंगाल — सबका ध्यान यात्रा पर; “लोग इस बात का इंतज़ार कर रहे हैं कि गाँधी के साथ क्या किया जाता है… अगर कार्रवाई हुई तो बंगाल के ज्वलनशील हालात में चिंगारी भड़क उठेगी”; फ़िलहाल गंभीर आसार नहीं। मध्य प्रांत-बेरार — 12 मार्च की बैठकों में काफ़ी लोग; शराब की दुकानों का बहिष्कार व वन क़ानूनों का उल्लंघन सबसे संभावित कार्य-दिशा। पंजाब — झेलम ज़िले में नमक क़ानून तोड़ने के संगठित प्रयासों के आसार; मुल्तान, गुजराँवाला के संकेत। संयुक्त प्रांत — गतिविधियों में तेज़ी; गाँधी के आदेश पर वॉलंटियरों की भर्ती, गाँवों में प्रचार, नमक क़ानून-उल्लंघन की तैयारी। अप्रैल 1930 का पहला पखवाड़ा: संयुक्त प्रांत — चीज़ें बहुत तेज़ी से आगे बढ़ीं; आगरा, कानपुर, बनारस, इलाहाबाद, लखनऊ, मेरठ, रायबरेली, फर्रुखाबाद, इटावा, बलिया, मैनपुरी में नमक क़ानून की खुलेआम अवहेलना; ★14 अप्रैल की सुबह पंडित जवाहरलाल नेहरू गिरफ़्तार — यूथ लीग की बैठक हेतु मध्य प्रांत जाते हुए; नैनी सेंट्रल जेल; 6 माह के साधारण कारावास की सज़ा। बिहार-उड़ीसा — कुछ स्थानों पर ग़ैरक़ानूनी नमक-उत्पादन के अनोखे मगर छोटे प्रयास। मध्य प्रांत — जबलपुर में सेठ गोविंद दास का रासायनिक नमक — लागत बाज़ार भाव से कई गुना। मद्रास — समुद्र का पानी उबालकर बनाए नमक की ज़ब्ती पर विशाखापटनम में पुलिस को भारी विरोध। बंगाल — मुफ़स्सिल में अवैध नमक-निर्माण के प्रयास; 24 परगना और मिदनापुर मुख्य केंद्र; “वास्तव में बहुत कम नमक बनाया गया… ज़्यादातर ज़ब्त… बर्तनों को नष्ट कर दिया गया।”

🔎 इन-टेक्स्ट (पृ. 313) — चार प्रश्न: (1) स्रोत की पृष्ठभूमि रिपोर्टों की विषय-वस्तु को किस हद तक प्रभावित करती है — उद्धरण लेकर तर्क; (2) क्या गृह विभाग गाँधी की संभावित गिरफ़्तारी के बारे में लोगों की सोच सही ढंग से दर्ज नहीं कर रहा था? (5 अप्रैल के दाण्डी-भाषण से मिलाइए); (3) महात्मा गाँधी को गिरफ़्तार क्यों नहीं किया गया?; (4) गृह विभाग लगातार यह क्यों कहता रहा कि दांडी यात्रा के प्रति लोगों में कोई उत्साह नहीं है?

6.4 अख़बारों से

  • अंग्रेज़ी तथा विभिन्न भारतीय भाषाओं के समकालीन अख़बार — गाँधी की गतिविधियों पर नज़र; आम भारतीय उनके बारे में क्या सोचते थे — इसका भी संकेत।
  • ★पर अख़बारी ब्योरों को पूर्वाग्रह से मुक्त नहीं मानना चाहिए — प्रकाशक ऐसे लोग थे जिनकी अपनी राजनीतिक सोच व विश्व-दृष्टि थी; उनके विचारों से तय होता था कि क्या प्रकाशित होगा और रिपोर्टिंग किस तरह होगी; लंदन से निकलने वाले अख़बार के विवरण भारतीय राष्ट्रवादी अख़बार की रिपोर्टों जैसे नहीं हो सकते थे।
  • ★★विधि-सूत्र: रिपोर्टें देखनी चाहिए पर नतीजे निकालते हुए ख़ास एहतियात; हर वक्तव्य को यथार्थ घटनाक्रम का सच्चा ब्योरा नहीं माना जा सकता; रिपोर्टों में अक्सर अफ़सरों की आशंकाओं-बेचैनियों की झलक — जो आंदोलन नियंत्रित नहीं कर पा रहे थे, गिरफ़्तारी के परिणाम नहीं समझ पा रहे थे; ★“औपनिवेशिक सरकार, जनता और उसकी गतिविधियों पर जितनी नज़र रखती थी, अपने शासन के आधार के बारे में उसकी चिंता उतनी ही बढ़ती जाती थी।”
  • चित्र 11.17 — राष्ट्रवाद के वृक्ष में गाँधी केंद्र-छाया के रूप में; चारों ओर अन्य नेता-मनीषी — लोकप्रिय छापों में गाँधी की समझ।

भाग 2 — काल-रेखा (पृ. 314)

वर्षघटना
1915महात्मा गाँधी दक्षिण अफ्रीका से लौटते हैं
1917चंपारन आंदोलन
1918खेड़ा (गुजरात) में किसान आंदोलन तथा अहमदाबाद में मजदूर आंदोलन
1919रॉलट सत्याग्रह (मार्च-अप्रैल); जलियाँवाला बाग हत्याकांड (अप्रैल)
1921असहयोग आंदोलन और खिलाफ़त आंदोलन
1928बारदोली में किसान आंदोलन
1929लाहौर अधिवेशन (दिसंबर) में “पूर्ण स्वराज” कांग्रेस का लक्ष्य घोषित
1930सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू; दांडी यात्रा (मार्च-अप्रैल)
1931गाँधी-इर्विन समझौता (मार्च); दूसरा गोल मेज सम्मेलन (दिसंबर)
1935गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट — सीमित प्रातिनिधिक सरकार का आश्वासन
1939कांग्रेस मंत्रिमंडलों का त्यागपत्र
1942भारत छोड़ो आंदोलन शुरू (अगस्त)
1946गाँधी साम्प्रदायिक हिंसा रोकने के लिए नोआखली तथा अन्य हिंसाग्रस्त इलाकों का दौरा करते हैं

भाग 3 — NCERT अभ्यास प्रश्न (पृ. 314–315)

उत्तर दीजिए (लगभग 100 से 150 शब्दों में)

  1. महात्मा गाँधी ने खुद को आम लोगों जैसा दिखाने के लिए क्या किया?
  2. किसान महात्मा गाँधी को किस तरह देखते थे?
  3. नमक क़ानून स्वतंत्रता संघर्ष का महत्त्वपूर्ण मुद्दा क्यों बन गया था?
  4. राष्ट्रीय आंदोलन के अध्ययन के लिए अख़बार महत्त्वपूर्ण स्रोत क्यों हैं?
  5. चरखे को राष्ट्रवाद का प्रतीक क्यों चुना गया?

लघु निबंध (लगभग 250 से 300 शब्दों में)

  1. असहयोग आंदोलन एक तरह का प्रतिरोध कैसे था?
  2. गोल मेज सम्मेलन में हुई वार्ता से कोई नतीजा क्यों नहीं निकल पाया?
  3. महात्मा गाँधी ने राष्ट्रीय आंदोलन के स्वरूप को किस तरह बदल डाला?
  4. निजी पत्रों और आत्मकथाओं से किसी व्यक्ति के बारे में क्या पता चलता है? ये स्रोत सरकारी ब्योरों से किस तरह भिन्न होते हैं?

मानचित्र कार्य

  1. दाण्डी मार्च के मार्ग का पता लगाइए। गुजरात के नक्शे पर इस यात्रा के मार्ग को चिह्नित कीजिए और उस पर पड़ने वाले मुख्य शहरों व गाँवों को चिह्नित कीजिए।

संकेत: साबरमती आश्रम (अहमदाबाद) → असलाली → नडियाद → आणंद → बोरसद → वसना → भरूच → सूरत → नवसारी → दाण्डी (लगभग 240 मील/385 किमी; 12 मार्च – 6 अप्रैल 1930)।

परियोजना कार्य (कोई एक)

  1. दो राष्ट्रवादी नेताओं की आत्मकथाएँ पढ़िए — लेखकों ने अपने जीवन और समय को किस तरह अलग-अलग प्रस्तुत किया है; राष्ट्रीय आंदोलन की किस प्रकार व्याख्या की है; विचारों में क्या भिन्नता है — रिपोर्ट लिखिए।
  2. राष्ट्रीय आंदोलन की कोई एक घटना चुनिए; तत्कालीन नेताओं के पत्रों और भाषणों को खोजकर पढ़िए (कुछ अब प्रकाशित हैं); उच्च स्तर पर राष्ट्रीय नेतृत्व की गतिविधियों को स्थानीय नेता किस तरह देखते थे — जानने की कोशिश कर आंदोलन के बारे में लिखिए।

भाग 4 — शिक्षक-संदर्भ : सभी इन-टेक्स्ट प्रश्न व “चर्चा कीजिए”

पृष्ठप्रश्न/प्रॉम्प्ट
289🗣️ 1915 से पूर्व के राष्ट्रीय आंदोलन; क्या गाँधी की (BHU) टिप्पणियाँ न्यायसंगत हैं?
294🔎 (अफ़वाह-बॉक्स) अध्याय 10 की विधि से — गाँधी-अफ़वाहों से क्या पता चलता है?
295🗣️ असहयोग क्या था? विभिन्न सामाजिक वर्गों ने किन तरीकों से भाग लिया?
297🔎 सरकार नमक क्यों नष्ट करती थी? नमक कर अधिक दमनात्मक क्यों?
298🔎 (दाण्डी-भाषण) गाँधी औपनिवेशिक राज्य को कैसे देखते थे?
302🗣️ स्रोत 5-6 — अम्बेडकर-गाँधी के बीच काल्पनिक संवाद लिखिए
309🔎 (क)(ख)(ग) — पत्रों से कांग्रेस के आदर्श, गाँधी की भूमिका, आंतरिक कार्यप्रणाली
310🔎 चित्र 11.16 बनाम पाक्षिक रिपोर्टें — अंतर्विरोध?
313🔎 पाक्षिक रिपोर्टों पर चार प्रश्न (पृष्ठभूमि-प्रभाव; गिरफ़्तारी-सोच; गिरफ़्तार क्यों नहीं; ‘उत्साह नहीं’ की रट)

भाग 5 — अध्याय की समग्र दृष्टि (शिक्षक हेतु)

5.1 अध्याय के पाँच स्तंभ★★

#केंद्रीय विचारमुख्य प्रमाण
1नेता इतिहास बनाता भी है, इतिहास से बनता भी हैप्रस्तावना-सूत्र; दक्षिण अफ्रीका ने ‘महात्मा’ बनाया; अनुयायियों पर निर्भर गाँधीवादी राष्ट्रवाद
2BHU-वायदा → 1922 तक पूरा: विशिष्ट-वर्गीय राष्ट्रवाद → जन-राष्ट्रवादBHU-भाषण; चंपारन-खेड़ा-अहमदाबाद; असहयोग की अभूतपूर्व भागीदारी; धोती-चरखा-मातृभाषा
3किसानों का गाँधी ऊपर से नहीं गढ़ा गयाशाहिद अमीन — अफ़वाहें, ‘गाँधी बाबा’; अपने हितों से मेल खाते तरीक़े; स्थानीय नेतृत्व की अवज्ञा
4नमक-चयन = रणनीतिक प्रतिभा; यात्रा के तीन ऐतिहासिक परिणामहर घर की ज़रूरत; विश्व-नज़र; महिला-भागीदारी (कमलादेवी); राज की नश्वरता का अहसास
5हर स्रोत की अपनी स्थितिभाषण/पत्र; आत्मकथा की चुप्पियाँ; पाक्षिक रिपोर्टों का ‘मानना चाहते थे’; अख़बारों के पूर्वाग्रह

5.2 एक-पंक्ति तीर-शृंखलाएँ★

आंदोलन-क्रम: 1915 वापसी → 1916 BHU → 1917 चंपारन → 1918 खेड़ा-अहमदाबाद → 1919 रॉलेट-जलियाँवाला → 1921 असहयोग-खिलाफ़त → 1922 चौरी-चौरा व मुक़दमा → 1924 रिहाई-रचनात्मक कार्य → 1928 साइमन-बारदोली → 1929 लाहौर ‘पूर्ण स्वराज’ → 26 जन. 1930 स्वतंत्रता दिवस → 12 मार्च–6 अप्रैल दांडी → 1931 गाँधी-इर्विन; RTC-2 → 1935 एक्ट → 1937 चुनाव (8/11) → 1939 इस्तीफ़े → 1942 क्रिप्स; भारत छोड़ो → 1944 जिन्ना-वार्ता → 1946 चुनाव-कैबिनेट मिशन-प्रत्यक्ष कार्यवाही → 1947 विभाजन-स्वतंत्रता → 30 जन. 1948 शहादत स्रोत-चौकड़ी (§6): सार्वजनिक भाषण ↔ निजी पत्र ↔ आत्मकथा ↔ पुलिस-रिपोर्ट/अख़बार — हर एक की स्थिति पूछो

5.3 पाँच सामान्य भ्रांतियाँध्यान

भ्रांतिवास्तविकता
“गाँधी अकेले दम पर राष्ट्र बने”“स्वयं भी इतिहास द्वारा बनाया जाता है”; अनुयायी-संगठन-जनकल्पना की भूमिका
“किसानों ने आदेश पर आंदोलन किया”“ऊपर से प्राप्त निर्देशों के बजाय अपने हितों से मेल खाते तरीक़े”; स्थानीय नेतृत्व की अवज्ञा भी
“नमक छोटा-सा प्रतीकात्मक मुद्दा था”हर घर की अपरिहार्य ज़रूरत + चौतरफा अभिशाप — व्यापक असंतोष का संगठन-सूत्र
“गाँधी-इर्विन समझौता पूर्ण विजय था”रैडिकल आलोचना — राजनीतिक स्वतंत्रता का आश्वासन नहीं, केवल वार्ता का
“पाक्षिक रिपोर्टें तटस्थ आँखें थीं”“आला अधिकारी क्या मानना चाहते थे” — ‘उत्साह नहीं’ की रट बनाम 60,000 गिरफ़्तारियाँ

5.4 अध्याय का सूत्र-वाक्य★

“गाँधी ने राष्ट्रवाद को अंग्रेज़ी बोलते दरबारों से निकालकर धोती, चरखे और नमक की मुट्ठी में रख दिया — और इतिहासकार उस सफ़र को भाषणों से ही नहीं, चिट्ठियों की तकलीफ़, अफ़वाहों की उड़ान और पुलिस-रिपोर्टों की बेचैनी से भी पढ़ता है।”

भाग 6 — अतिरिक्त पठन (NCERT द्वारा सुझाया, पृ. 315)

लेखकवर्षकृति
शेखर बंद्योपाध्याय2004फ्रॉम प्लासी टू पार्टीशन: ए हिस्ट्री ऑफ मॉडर्न इंडिया (ऑरिएंट लॉंगमैन)
सर्वपल्ली गोपाल1975जवाहरलाल नेहरू: ए बायोग्राफी, खंड I, 1889-1947 (ऑक्सफ़ोर्ड)
डेविड हार्डीमैन2003गाँधी इन हिज़ टाइम एंड आवर्स (पर्मानेंट ब्लैक)
ज्ञानेन्द्र पांडेय1978दि असेंडेंसी ऑफ द कांग्रेस इन उत्तर प्रदेश, 1926-34 (ऑक्सफ़ोर्ड)
सुमित सरकार1983मॉडर्न इंडिया, 1885-1947 (मैक्मिलन)

वेबसाइट: कलेक्टेड वर्क्स ऑफ महात्मा गाँधी — http://www.gandhiserve.org/cwmg/cwmg.html


यह मास्टर फ़ाइल इस अध्याय की सभी अन्य सामग्रियों का एकमात्र आधार है।