पुस्तक: भारत और समकालीन विश्व–2 (कक्षा 10, NCERT) · खण्ड III — रोज़ाना की ज़िंदगी, संस्कृति और राजनीति पाठ्यपुस्तक पृष्ठ: 105 से 128 तक
इस फ़ाइल को कैसे पढ़ें
यह फ़ाइल पूरे अध्याय की पूरी और आसान व्याख्या है। इसमें हर बात पूरे वाक्यों में लिखी गई है, ताकि आप इसे पढ़कर समझ भी सकें और वैसे ही उत्तर-पुस्तिका में लिख भी सकें।
कठिन शब्दों के अर्थ भाग 13 में और सभी महत्त्वपूर्ण तिथियाँ व आँकड़े भाग 14 में दिए गए हैं।
एक ज़रूरी बात पहले जान लीजिए। यह अध्याय खण्ड III का पहला अध्याय है। पिछले दोनों खण्डों में आपने राजनीति (राष्ट्रवाद) और अर्थव्यवस्था (भूमंडलीकरण, औद्योगीकरण) पढ़ी थी। अब आप संस्कृति पढ़ेंगे — यानी लोग क्या पढ़ते थे, क्या सोचते थे, और वह सोच कैसे बदली। यही कारण है कि इस अध्याय के बहुत सारे नाम आपको अध्याय 1 और अध्याय 2 से जाने-पहचाने लगेंगे — मार्टिन लूथर, फ़्रांसीसी क्रांति, राममोहन राय, बालगंगाधर तिलक, महात्मा गांधी।
0. सबसे पहले यह समझ लीजिए — यह अध्याय है किस बारे में?
अध्याय की शुरुआत एक बहुत सीधे सवाल से होती है। पाठ्यपुस्तक कहती है —
“मुद्रित या छपी हुई सामग्री के बग़ैर दुनिया की कल्पना हमारे लिए कितनी मुश्किल है!”
पाठ्यपुस्तक हमें अपने चारों तरफ़ देखने को कहती है और गिनाती है कि हमें कहाँ-कहाँ छपी हुई चीज़ें दिखती हैं —
- किताबें, पत्र-पत्रिकाएँ, अख़बार
- मशहूर तसवीरों की नक़लें
- मेज़ पर पड़े नाटक के प्रोग्राम, सरकारी सूचनाएँ, कैलेंडर, डायरी
- सड़क के किनारे लगे विज्ञापन और सिनेमा के पोस्टर
और फिर वह असली बात कहती है —
“हम मुद्रित दुनिया के अस्तित्व को मानकर चलते हैं, यह सोचने की भी ज़रूरत नहीं पड़ती कि छपाई के पहले भी एक दुनिया थी।”
अध्याय के तीन मुख्य प्रश्न यही हैं —
“यह इतिहास क्या है? समाज में मुद्रित सामग्री कब से चलनी शुरू हुई? आधुनिक दुनिया को बनाने में इसकी क्या भूमिका थी?”
0.1 इस अध्याय की एक ही सूत्र-बात (इसे कभी मत भूलिए)
पूरे अध्याय में दो वाक्य आमने-सामने खड़े हैं, और ये दोनों वाक्य पाठ्यपुस्तक के अपने हैं —
| किसने कहा | क्या कहा | किस बात का प्रतीक है |
|---|---|---|
| मार्टिन लूथर (धर्म-सुधारक) | “मुद्रण ईश्वर की दी हुई महानतम देन है, सबसे बड़ा तोहफ़ा।” (पृष्ठ 112) | छपाई = आज़ादी, ज्ञान, सुधार |
| इरैस्मस (विद्वान) | “किताबें भिनभिनाती मक्खियों की तरह हैं… इनका ज़्यादा हिस्सा तो विद्वता के लिए हानिकारक ही है।” (स्रोत-क, पृष्ठ 113) | छपाई = ख़तरा, अफ़वाह, बग़ावत |
इसलिए इस अध्याय की केंद्रीय बात यह है — छपाई ने सिर्फ़ किताबें सस्ती नहीं कीं। उसने यह बदल दिया कि कौन पढ़ सकता है, कौन अपनी बात कह सकता है, और सत्ता किससे डरती है। यही कारण है कि हर दौर में कुछ लोगों ने छपाई का स्वागत किया और कुछ लोग उससे डरते रहे।
यह बात आप हर उपशीर्षक में दोहराई हुई पाएँगे — चर्च ने प्रतिबंधित किताबों की सूची बनाई, अंग्रेज़ सरकार ने वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट बनाया, रूढ़िवादी परिवारों ने लड़कियों को पढ़ने से रोका। हर बार डरने वाला वही था जिसके पास सत्ता थी।
0.2 अध्याय को नौ भागों में देखिए
| भाग | विषय | मुख्य बात |
|---|---|---|
| भाग 1 | शुरुआती छपी किताबें | छपाई यूरोप में नहीं, पूर्वी एशिया में जन्मी — चीन, जापान, कोरिया |
| भाग 2 | यूरोप में मुद्रण का आना | मार्को पोलो तकनीक लाया, गुटेन्बर्ग ने प्रेस बनाई |
| भाग 3 | मुद्रण क्रांति और उसका असर | नया पाठक वर्ग बना, और उसी के साथ प्रिंट का डर भी पैदा हुआ |
| भाग 4 | पढ़ने का जुनून | किताबों ने फ़्रांसीसी क्रांति की ज़मीन तैयार की — पर कितनी, यह बहस है |
| भाग 5 | उन्नीसवीं सदी | बच्चे, महिलाएँ और मज़दूर नए पाठक बने; तकनीक तेज़ हुई |
| भाग 6 | भारत का मुद्रण संसार | पांडुलिपियों का देश, जहाँ प्रेस पुर्तगालियों के साथ आई |
| भाग 7 | धार्मिक सुधार और सार्वजनिक बहसें | छपाई से बहस का बाज़ार गर्म हुआ |
| भाग 8 | प्रकाशन के नए रूप | उपन्यास, तसवीरें, कार्टून; महिलाएँ और ग़रीब जनता पढ़ने लगीं |
| भाग 9 | प्रिंट और प्रतिबंध | सरकार ने प्रेस दबाना चाहा, पर राष्ट्रवादी अख़बार फैलते गए |
0.3 इस अध्याय की पाँच कहानियाँ — इन्हें याद रखिए, आधा अध्याय याद हो जाएगा
यह अध्याय तारीख़ों की सूची नहीं है। यह पाँच लोगों की कहानी है। परीक्षा के आधे प्रश्न इन्हीं पाँच से निकलते हैं।
| # | कहानी | एक वाक्य में |
|---|---|---|
| 1 | मार्को पोलो की वापसी (1295) | एक यात्री चीन से छपाई की तकनीक लेकर इटली लौटा, और यूरोप बदल गया। |
| 2 | गुटेन्बर्ग का ज़ैतून-प्रेस (1448) | जो प्रेस अंगूर और ज़ैतून पेरने के काम आती थी, उसी से किताब छपने लगी। |
| 3 | मेनोकियो नाम का किसान (16वीं सदी, इटली) | एक किसान ने पढ़कर बाइबिल के नए अर्थ निकाले, और चर्च ने उसे मौत की सज़ा दे दी। |
| 4 | राससुन्दरी देबी (1876) | एक स्त्री ने रसोई में छिप-छिपकर पढ़ना सीखा और बंगाली की पहली संपूर्ण आत्मकथा लिखी। |
| 5 | काशीबाबा, कानपुर का मिल-मज़दूर (1938) | एक मज़दूर ने ख़ुद किताब लिखी और छापी, ताकि जाति और वर्ग का रिश्ता समझा सके। |
1. शुरुआती छपी किताबें (पाठ का भाग 1, पृष्ठ 106–107)
1.1 छपाई कहाँ जन्मी — यह पहला वाक्य ही परीक्षा में आता है
पाठ्यपुस्तक का पहला वाक्य यह है —
“मुद्रण की सबसे पहली तकनीक चीन, जापान और कोरिया में विकसित हुई। यह छपाई हाथ से होती थी।”
यह बात ध्यान से समझिए। हम अकसर मान लेते हैं कि छपाई यूरोप की देन है। यह ग़लत है। छपाई पूर्वी एशिया की देन है, और यूरोप वहाँ से सीखा।
चीन में छपाई कैसे होती थी —
- तक़रीबन 594 ई. से चीन में किताबें छपने लगी थीं।
- तरीक़ा यह था कि स्याही लगे काठ के ब्लॉक या तख़्ती पर काग़ज़ को रगड़ दिया जाता था।
- चूँकि काग़ज़ पतला और छिद्रित होता था, इसलिए उसके दोनों तरफ़ छपाई संभव नहीं थी।
- इसीलिए पारंपरिक चीनी किताब ‘एकॉर्डियन’ शैली में बनाई जाती थी — यानी किनारों को मोड़कर सिल दिया जाता था।
यहाँ रुककर सोचिए — काग़ज़ के दोनों तरफ़ न छप पाने जैसी एक छोटी-सी तकनीकी बात ने किताब की पूरी बनावट तय कर दी। तकनीक और रूप का यही रिश्ता इस पूरे अध्याय में बार-बार आएगा।
ख़ुशनवीसी क्या थी —
- किताबों का सुलेखन या ख़ुशनवीसी करनेवाले लोग दक्ष सुलेखक या ख़ुशख़त होते थे।
- वे हाथ से बड़े सुंदर-सुडौल अक्षरों में सही-सही कलात्मक लिखाई करते थे।
1.2 चीनी राजतंत्र सबसे बड़ा उत्पादक क्यों था — यह कारण-सहित याद कीजिए
“एक लंबे अरसे तक मुद्रित सामग्री का सबसे बड़ा उत्पादक चीनी राजतंत्र था।” पर ऐसा क्यों? इसकी कड़ियाँ क्रम से समझिए —
| क्रम | कारण |
|---|---|
| 1 | चीन की नौकरशाही सिविल सेवा परीक्षा से नियुक्त होती थी। |
| 2 | यह नौकरशाही विशालकाय थी, यानी इसमें बहुत सारे लोग थे। |
| 3 | इसलिए चीनी राजतंत्र इन परीक्षाओं के लिए बड़ी तादाद में किताबें छपवाता था। |
| 4 | सोलहवीं सदी में परीक्षा देने वालों की तादाद बढ़ी। |
| 5 | लिहाज़ा, छपी किताबों की मात्रा भी उसी अनुपात में बढ़ गई। |
इसे एक वाक्य में यूँ लिखिए — चीन में छपाई की सबसे बड़ी ज़रूरत सरकारी नौकरी की परीक्षा ने पैदा की थी।
1.3 सत्रहवीं सदी — जब पढ़ना एक शग़ल बन गया
“सत्रहवीं सदी तक आते-आते चीन में शहरी संस्कृति के फलने-फूलने से छपाई के इस्तेमाल में भी विविधता आई।”
- अब मुद्रित सामग्री के उपभोक्ता सिर्फ़ विद्वान और अधिकारी नहीं रहे।
- व्यापारी अपने रोज़मर्रा के कारोबार की जानकारी लेने के लिए मुद्रित सामग्री का इस्तेमाल करने लगे।
- पढ़ना एक शग़ल भी बन गया, यानी लोग मनोरंजन के लिए भी पढ़ने लगे।
- नए पाठक वर्ग को काल्पनिक क़िस्से, कविताएँ, आत्मकथाएँ, शास्त्रीय साहित्यिक कृतियों के संकलन और रूमानी नाटक पसंद थे।
- अमीर महिलाओं ने भी पढ़ना शुरू किया और कुछ ने अपने रचे काव्य और नाटक भी छापे।
यह वाक्य विशेष रूप से याद रखिए — महिलाओं का पढ़ना और छपना चीन में सत्रहवीं सदी में ही शुरू हो गया था। भारत में यही बात उन्नीसवीं सदी में होगी (भाग 8.3 देखिए)। यह तुलना 4-अंक के प्रश्न में बहुत काम आती है।
1.4 उन्नीसवीं सदी का अंत — पश्चिमी तकनीक और शंघाई
- “पढ़ने की यह नयी संस्कृति एक नयी तकनीक के साथ आई।”
- उन्नीसवीं सदी के अंत में पश्चिमी शक्तियों द्वारा अपनी चौकियाँ स्थापित करने के साथ ही पश्चिमी मुद्रण तकनीक और मशीनी प्रेस का आयात भी हुआ।
- पश्चिमी शैली के स्कूलों की ज़रूरतों को पूरा करने वाला शंघाई प्रिंट-संस्कृति का नया केंद्र बन गया।
- हाथ की छपाई की जगह अब धीरे-धीरे मशीनी या यांत्रिक छपाई ने ले ली।
ध्यान दीजिए — छपाई चीन में जन्मी थी, पर उन्नीसवीं सदी में चीन को छपाई की नयी मशीनें पश्चिम से आयात करनी पड़ीं। यह उपनिवेशवाद का असर था — वही बात जो आपने अध्याय 3 और 4 में पढ़ी थी।
1.5 जापान में मुद्रण (उपशीर्षक 1.1, पृष्ठ 106)
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| छपाई कब पहुँची | चीनी बौद्ध प्रचारक 768–770 ई. के आसपास छपाई की तकनीक लेकर जापान आए। |
| सबसे पुरानी जापानी किताब | 868 ई. में छपी डायमंड सूत्र, जिसमें पाठ के साथ-साथ काठ पर खुदे चित्र हैं। |
| तसवीरें कहाँ बनती थीं | कपड़ों, ताश के पत्तों और काग़ज़ के नोटों पर। |
| कौन छपते थे | मध्यकालीन जापान में कवि भी छपते थे और गद्यकार भी। |
| क़ीमत | किताबें सस्ती और सुलभ थीं। |
अठारहवीं सदी के अंत में एदो का दृश्य —
- एदो (जिसे बाद में तोक्यो के नाम से जाना गया) के शहरी इलाक़े की चित्रकारी में शालीन शहरी संस्कृति का पता मिलता है।
- इन चित्रों में हम चायघर के मजमों, कलाकारों और तवायफ़ों को देख सकते हैं।
- पुस्तकालय एवं दुकानें हाथ से मुद्रित तरह-तरह की सामग्री से अटी पड़ी थीं — महिलाओं, संगीत के साज़ों, हिसाब-किताब, चाय अनुष्ठान, फूलसाज़ी, शिष्टाचार और रसोई पर लिखी किताबें।
यह सूची ज़रूर याद रखिए। यह दिखाती है कि छपाई सिर्फ़ धर्म और विद्वता के लिए नहीं थी — वह रोज़मर्रा की ज़िंदगी में घुस चुकी थी। यही इस पूरे खण्ड III का विषय है।
1.6 त्रिपीटका कोरियाना (चित्र 2(ख) का विवरण, पृष्ठ 107)
- तेरहवीं शताब्दी के मध्य में बना त्रिपीटका कोरियाना वुडब्लॉक्स (woodblocks) मुद्रण के रूप में बौद्ध ग्रंथों का कोरियाई संग्रह है।
- इन ग्रंथों को लगभग 80,000 वुडब्लॉक्स पर उकेरा गया था।
- इन्हें 2007 में यूनेस्को मेमोरी ऑफ़ द वर्ल्ड रजिस्टर में अंकित किया गया।
1.7 जिक्जी, कोरिया (चित्र 4(अ) का विवरण, पृष्ठ 108)
- कोरिया की जिक्जी (Jikji) मूवेबल मेटल टाइप (Movable metal type) के साथ मुद्रित दुनिया की सबसे पुरानी मौजूदा पुस्तकों में से एक है।
- इसमें ज़ेन (Zen) बौद्ध धर्म की मुख्य विशेषताएँ हैं।
- पुस्तक में भारत, चीन और कोरिया के लगभग 150 बौद्ध भिक्षुओं का उल्लेख किया गया है।
- इसे चौदहवीं शताब्दी के अंत में मुद्रित किया गया था।
- पुस्तक का पहला खंड उपलब्ध नहीं है; दूसरा खंड फ़्रांस की नेशनल लाइब्रेरी में उपलब्ध है।
- यह कार्य मुद्रण संस्कृति में एक महत्त्वपूर्ण तकनीकी परिवर्तन साबित हुआ। यही कारण है कि इसे 2001 में यूनेस्को मेमोरी ऑफ़ द वर्ल्ड रजिस्टर में अंकित किया गया।
बहुत महत्त्वपूर्ण तुलना। धातु के चलअक्षर (movable metal type) कोरिया में चौदहवीं सदी के अंत में इस्तेमाल हो रहे थे, जबकि गुटेन्बर्ग ने यूरोप में 1448 तक अपना यंत्र बनाया। यानी धातुई चलअक्षर की तकनीक यूरोप से पहले कोरिया में मौजूद थी। यह तथ्य 4-अंक के प्रश्न में बहुत असरदार लगता है।
1.8 बॉक्स 1 — कितागावा उतामारो (पृष्ठ 107)
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| जन्म | 1753 ई. में एदो में। |
| योगदान | उकियो (तैरती दुनिया के चित्र) नाम की एक नयी चित्रकला शैली में अहम योगदान किया। |
| विषय | इन चित्रों में आम शहरी जीवन का चित्रण किया गया। |
| यूरोप पर असर | इनकी छपी प्रतियाँ यूरोप और अमेरिका पहुँचीं और माने, मोने और वान गॉग जैसे चित्रकारों को प्रभावित किया। |
| प्रकाशक | त्सुताया जुज़ाबूरो जैसे प्रकाशकों ने विषय चुनकर कलाकारों से उन पर चित्र बनाने का क़रार किया। |
छपाई की प्रक्रिया क्या थी — इसे क्रम से लिखिए —
| चरण | क्या होता था |
|---|---|
| 1 | प्रकाशक विषय चुनकर कलाकार से क़रार करता था। |
| 2 | चित्रकार विषय की रूपरेखा बनाते थे। |
| 3 | हुनरमंद वुडब्लॉक शिल्पी उस रूपरेखा को तख़्ती पर चिपकाकर उसकी आकृति को उकेर लेते थे। |
| 4 | इस प्रक्रिया में मूल आरेख तो ग़ायब हो जाता था, पर उसकी छपी नक़ल बच जाती थी। |
चित्र 4 (पृष्ठ 107) — “सुबह का नज़ारा। रचयिता: शुम्मन कुबो, अठारहवीं सदी के अंत में।”
2. यूरोप में मुद्रण का आना (पाठ का भाग 2, पृष्ठ 108–110)
2.1 काग़ज़ पहले आया, तकनीक बाद में
- सदियों तक चीन से रेशम और मसाले रेशम मार्ग से यूरोप आते रहे थे।
- ग्यारहवीं सदी में चीनी काग़ज़ भी उसी रास्ते वहाँ पहुँचा।
- काग़ज़ ने कातिबों या मुंशियों द्वारा सावधानीपूर्वक लिखी गई पांडुलिपियों के उत्पादन को मुमकिन बनाया।
इस क्रम को मत भूलिए — पहले काग़ज़ आया (ग्यारहवीं सदी), फिर छपाई की तकनीक आई (1295 के बाद), फिर प्रेस बनी (1448)। परीक्षा में क्रम पूछा जाता है।
2.2 मार्को पोलो — 1295 (यह अभ्यास प्रश्न 1-क है)
- 1295 ई. में मार्को पोलो नामक महान खोजी यात्री चीन में काफ़ी साल खोज करने के बाद इटली वापस लौटा।
- चीन के पास वुडब्लॉक (काठ की तख़्ती) वाली छपाई की तकनीक पहले से मौजूद थी।
- मार्को पोलो यह ज्ञान अपने साथ लेकर लौटा।
- फिर क्या था, इतालवी भी तख़्ती की छपाई से किताबें निकालने लगे और जल्द ही यह तकनीक बाक़ी यूरोप में फैल गई।
पर सब लोग छपी किताबें पसंद नहीं करते थे —
- मुद्रित किताबों को सस्ती और अश्लील माननेवाले कुलीन वर्गों और भिक्षु-संघों के लिए छपी किताबों के विलासी संस्करण अभी भी बेशक़ीमती वेलम (vellum) या चर्म-पत्र पर ही छपते थे।
- व्यापारी और विश्वविद्यालय के विद्यार्थी सस्ती मुद्रित किताबें ख़रीदते थे।
यह छोटा-सा वाक्य पूरे अध्याय का सार है — अमीरों को छपी किताब ‘सस्ती और अश्लील’ लगती थी, और साधारण लोगों को वही किताब वरदान लगती थी। नयी तकनीक हमेशा ऐसे ही दो हिस्सों में बँटी प्रतिक्रिया पाती है।
2.3 पांडुलिपि से माँग पूरी क्यों नहीं हो सकती थी — पाँच कारण
“किताबों की माँग बढ़ने के साथ-साथ यूरोप-भर के पुस्तक-विक्रेता विभिन्न देशों में निर्यात करने लगे। अलग-अलग जगहों पर पुस्तक मेले लगने लगे।”
पहले यह देखिए कि माँग पूरी करने की कोशिश कैसे हुई —
- बढ़ती माँग की आपूर्ति के लिए हस्तलिखित पांडुलिपियों के उत्पादन के भी नए तरीक़े सोचे गए।
- अब सिर्फ़ अमीर लोगों के यहाँ सुलेखक या कातिब नहीं पाए जाते थे, बल्कि पुस्तक-विक्रेता भी अब उन्हें रोज़गार देने लगे।
- आम तौर पर एक विक्रेता के यहाँ 50 कातिब काम करते थे।
पर यह नाकाफ़ी था। इसके पाँच कारण पाठ्यपुस्तक ने दिए हैं —
| क्रम | कारण |
|---|---|
| 1 | नक़ल उतारना बेहद ख़र्चीला काम था। |
| 2 | यह समयसाध्य था, यानी बहुत समय लेता था। |
| 3 | यह श्रमसाध्य था, यानी बहुत मेहनत माँगता था। |
| 4 | पांडुलिपियाँ अकसर नाज़ुक होती थीं; उनके लाने-ले जाने और रख-रखाव में मुश्किलें थीं। |
| 5 | इसलिए उनका सर्कुलेशन (चलन, गश्त) सीमित रहा। |
नतीजा —
- किताबों की बढ़ती माँग के चलते वुडब्लॉक प्रिंटिंग (तख़्ती की छपाई) उत्तरोत्तर लोकप्रिय होता गया।
- पंद्रहवीं सदी की शुरुआत तक यूरोप में बड़े पैमाने पर तख़्ती की छपाई का इस्तेमाल करके कपड़े, ताश के पत्ते, और छोटी-छोटी टिप्पणियों के साथ धार्मिक चित्र छापे जा रहे थे।
- ज़ाहिर है कि किताबें छापने के लिए इससे भी तेज़ और सस्ती मुद्रण तकनीक की ज़रूरत थी।
2.4 गुटेन्बर्ग और प्रिंटिंग प्रेस (उपशीर्षक 2.1, पृष्ठ 108–109)
यह इस अध्याय की सबसे महत्त्वपूर्ण कहानी है। पूरी याद कीजिए।
गुटेन्बर्ग का बचपन और सीख —
- गुटेन्बर्ग के पिता व्यापारी थे, और वह खेती की एक बड़ी रियासत में पल-बढ़कर बड़ा हुआ।
- वह बचपन से ही तेल और जैतून पेरने की मशीनें (press) देखता आया था।
- बाद में उसने पत्थर पर पॉलिश करने की कला सीखी।
- फिर सुनारी सीखी।
- और अंत में उसने शीशे को इच्छित आकृतियों में गढ़ने में महारत हासिल कर ली।
अब देखिए, उसने अपने इसी अनुभव को आविष्कार में कैसे बदला —
| उसका पुराना अनुभव | नए आविष्कार में क्या बना |
|---|---|
| जैतून पेरने की प्रेस | प्रिंटिंग प्रेस का मॉडल या आदर्श |
| सुनारी और साँचे का काम | धातुई अक्षरों की आकृतियों को गढ़ने का तरीक़ा |
यह पंक्ति ज़रूर लिखिए — “जैतून प्रेस ही प्रिंटिंग प्रेस का मॉडल या आदर्श बना, और साँचे का उपयोग अक्षरों की धातुई आकृतियों को गढ़ने के लिए किया गया।”
पहली किताब —
- गुटेन्बर्ग ने 1448 तक अपना यंत्र मुकम्मल कर लिया था।
- उसने जो पहली किताब छापी, वह थी बाइबिल।
- तक़रीबन 180 प्रतियाँ बनाने में उसे तीन साल लगे।
- जो उस समय के हिसाब से काफ़ी तेज़ था।
पर एक ज़रूरी वाक्य यह भी है —
“पर यह नयी तकनीक हाथ से किताबें छापने की तकनीक की जगह पूरी तरह से नहीं ले पाई।”
2.5 शुरुआती छपी किताबें पांडुलिपियों जैसी क्यों दिखती थीं
यह प्रश्न परीक्षा में आता है। कारण-सहित लिखिए —
- शुरू-शुरू में तो छपी किताबें भी अपने रंग-रूप और साज-सज्जा में हस्तलिखित पांडुलिपियों जैसी दिखती थीं।
- धातुई अक्षर हाथ की सजावटी शैली का अनुकरण करते थे।
- हाशिये पर फूल-पत्तियों की डिज़ाइन बनाई जाती थी, और चित्र अकसर पेंट किए जाते थे।
- अमीरों के लिए बनाई किताबों में छपे पन्ने पर हाशिये की जगह बेल-बूटों के लिए ख़ाली छोड़ दी जाती थी।
- हर ख़रीदार अपनी रुचि के हिसाब से डिज़ाइन और पेंटर ख़ुद तय करके उसे सँवार सकता था।
यह एक बड़ा शिक्षण-बिंदु है — कोई भी नयी तकनीक शुरू में पुरानी की नक़ल करती है। आज भी शुरुआती वेबसाइटें अख़बार जैसी दिखती थीं। बच्चों को यह उदाहरण देकर समझाइए।
2.6 मुद्रण क्रांति के आँकड़े — यह तालिका याद कीजिए
| तथ्य | आँकड़ा |
|---|---|
| यूरोप के ज़्यादातर देशों में छापेख़ाने खुलने का समय | क़रीब सौ सालों के दरम्यान, 1450–1550 |
| कैसे फैला | जर्मनी के प्रिंटर या मुद्रक दूसरे देश जाकर नए छापेख़ाने खुलवाया करते थे। |
| पंद्रहवीं सदी के दूसरे हिस्से में यूरोप के बाज़ार में किताबें | 2 करोड़ मुद्रित किताबें |
| सोलहवीं सदी में यह संख्या | 20 करोड़ |
“हाथ की छपाई की जगह यांत्रिक मुद्रण के आने पर ही मुद्रण क्रांति संभव हुई।” — यह वाक्य ‘मुद्रण क्रांति क्या थी’ वाले प्रश्न में सबसे पहले लिखिए।
2.7 गुटेन्बर्ग प्रेस कैसे काम करती थी (चित्र 6 का विवरण, पृष्ठ 109)
- स्क्रू से लगा एक लंबा हैंडल होता था। उसकी मदद से स्क्रू घुमाकर प्लाटेन को गीले काग़ज़ पर दबा दिया जाता था।
- गुटेन्बर्ग ने रोमन वर्णमाला के तमाम 26 अक्षरों के लिए टाइप बनाए।
- और जुगत लगाई कि इन्हें इधर-उधर ‘मूव’ कराकर या घुमाकर शब्द बनाए जा सकें।
- लिहाज़ा, इसे ‘मूवेबल टाइप प्रिंटिंग मशीन’ के नाम से जाना गया।
- यही अगले 300 सालों तक छपाई की बुनियादी तकनीकी रही।
- गुटेन्बर्ग प्रेस एक घंटे में 250 पन्ने (एक साइड) छाप सकता था।
तुलना ज़रूर कीजिए — पहले हर छपाई के लिए तख़्ती पर ख़ास आकार उकेरना पड़ता था। अब वही 26 अक्षर बार-बार, अलग-अलग क्रम में इस्तेमाल हो सकते थे। यही ‘मूवेबल टाइप’ की असली ताक़त थी।
2.8 चित्र 7 — गुटेन्बर्ग की बाइबिल (पृष्ठ 110)
यह विवरण बहुत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इससे 4-अंक का प्रश्न बनता है —
- गुटेन्बर्ग ने कुल 180 प्रतियाँ छापी थीं, पर उनमें से 50 ही बच पाई हैं।
- ये केवल नयी तकनीक की देन नहीं थीं।
- इन्हें गुटेन्बर्ग प्रेस की धातुई टाइप से छापा ज़रूर गया था, पर इनके हाशिए पर कलाकारों ने हाथ से टीकाकारी और सुघड़ चित्रकारी की थी।
- कोई दो प्रतियाँ एक-जैसी नहीं थीं। हर प्रति का हर पन्ना अलग था।
- कुलीन तबक़ों ने इस विशिष्टता को पसंद किया। जो उनके पास था, वह अनोखा था, और वे यह दावा कर सकते थे, क्योंकि किसी और के पास उसकी हू-ब-हू नक़ल नहीं थी।
इबारत में रंग भरने के दो फ़ायदे —
| फ़ायदा | क्या होता था |
|---|---|
| 1 | पन्ना रंगीन हो जाता था, यानी सुंदर दिखता था। |
| 2 | सारे पवित्र शब्द ज़्यादा दर्शनीय और महत्त्वपूर्ण बन जाते थे। |
- लेकिन हर पन्ने पर रंग हाथ से भरे जाते थे।
- गुटेन्बर्ग ने इबारत या पाठ को काले में छापा और बाद में रंग भरे जाने के लिए जगह छोड़ दी।
2.9 चित्र 8 — एक मुद्रक की वर्कशॉप, सोलहवीं सदी (पृष्ठ 110)
- सारे काम एक ही छत के नीचे चल रहे हैं।
- दाएँ छोर पर अगले हिस्से में कम्पोज़ीटर काम कर रहे हैं।
- बाएँ सिरे पर गैलीज़ तैयार किए जा रहे हैं और धातुई अक्षरों पर स्याही लगाई जा रही है।
- पृष्ठभूमि में प्रिंटर्स प्रेस के पेंच कस रहे हैं और उन्हीं के पास प्रूफ़रीडर काम में जुटे हैं।
- बिलकुल अगले भाग में तैयार माल पड़ा है — ये दो-दो पृष्ठ वाले छपे हुए पन्ने हैं जिनकी बाइंडिंग होनी है।
यहाँ अध्याय 4 से जोड़िए। वहाँ आपने पढ़ा था कि कारख़ाने में सारी प्रक्रियाएँ एक छत के नीचे और एक मालिक के हाथों में आ गईं। छापेख़ाने में भी बिलकुल यही हुआ। मुद्रण भी एक उद्योग ही था।
3. मुद्रण क्रांति और उसका असर (पाठ का भाग 3, पृष्ठ 111–113)
3.1 मुद्रण क्रांति क्या थी — परिभाषा शब्दश: याद कीजिए
पाठ्यपुस्तक ख़ुद यह सवाल पूछती है और ख़ुद जवाब देती है —
“मुद्रण क्रांति क्या थी? छापेख़ाने का आविष्कार महज़ तकनीकी दृष्टि से नाटकीय बदलाव की शुरुआत नहीं था। पुस्तक-उत्पादन के नए तरीक़ों ने लोगों की ज़िंदगी बदल दी: इसकी बदौलत सूचना और ज्ञान से, संस्था और सत्ता से उनका रिश्ता ही बदल गया। इससे लोकचेतना बदली और बदला चीज़ों को देखने का नज़रिया।”
इस परिभाषा के तीन हिस्से हैं। इन्हें अलग-अलग लिखिए —
| हिस्सा | क्या बदला |
|---|---|
| 1 | सूचना और ज्ञान से लोगों का रिश्ता बदला। |
| 2 | संस्था और सत्ता से लोगों का रिश्ता बदला। |
| 3 | लोकचेतना बदली और चीज़ों को देखने का नज़रिया बदला। |
3.2 नया पाठक वर्ग (उपशीर्षक 3.1, पृष्ठ 111)
छापेख़ाने से नया पाठक वर्ग कैसे बना — यह कारण-शृंखला है, क्रम से लिखिए —
| क्रम | कड़ी |
|---|---|
| 1 | छपाई से किताबों की क़ीमत गिरी। |
| 2 | किताब की हर प्रति के उत्पादन में जो वक़्त और श्रम लगता था, वह कम हो गया। |
| 3 | बड़ी तादाद में प्रतियाँ छापना आसान हो गया। |
| 4 | बाज़ार किताबों से पट गया। |
| 5 | पाठक वर्ग भी बृहत्तर होता गया, यानी बड़ा होता गया। |
पढ़ने की एक नयी संस्कृति —
- अब तक आमलोग मौखिक संसार में जीते थे।
- वे धार्मिक किताबों का वाचन सुनते थे।
- गाथा-गीत उनको पढ़कर सुनाए जाते थे।
- और क़िस्से भी उनके लिए बोलकर पढ़े जाते थे।
- ज्ञान का मौखिक लेन-देन ही होता था।
- लोगबाग समूह में ही दास्तान सुनते, या कोई आयोजन देखने आते थे।
“अगर पहले की जनता श्रोता थी, तो कह सकते हैं कि अब पाठक-जनता अस्तित्व में आ गई थी।” — यह वाक्य याद कीजिए, यह सीधे परीक्षा में लिखने लायक़ है।
3.3 पर यह संक्रमण सरल नहीं था — साक्षरता की दीवार
“लेकिन यह संक्रमण सरल नहीं था।” इसके कारण —
- किताबें सिर्फ़ साक्षर ही पढ़ सकते थे।
- और यूरोप के अधिकांश देशों में बीसवीं सदी तक साक्षरता की दर सीमित थी।
तो प्रकाशकों ने क्या किया? यह हल बहुत चतुर था —
- प्रकाशकों के लिए सवाल था कि लोगों में छपी किताब के प्रति दिलचस्पी कैसे जगाएँ।
- इसके लिए उन्हें मुद्रित कृति की व्यापक पहुँच का ध्यान रखना था — जो नहीं पढ़ पाते थे, वे भी बोलकर पढ़े गए मज़मून का लुत्फ़ तो उठाते ही थे।
- इसलिए मुद्रकों ने लोकगीत और लोककथाएँ छापनी शुरू कर दीं।
- ऐसी किताबें आमतौर पर तसवीरों से ख़ूब सजी-धजी यानी सचित्र होती थीं।
- फिर इन्हें सामूहिक ग्रामीण सभाओं में या शहरी शराबघरों में गाया-सुनाया जाता था।
नतीजा —
“इस तरह मौखिक संस्कृति मुद्रित संस्कृति में दाख़िल हुई, और छपी सामग्री मौखिक अंदाज़ में प्रसारित हुई। मौखिक और मुद्रित संस्कृतियों के बीच की विभाजक रेखा धुँधली पड़ गई। श्रोता और पाठक वर्ग एक-दूसरे में घुल-मिल गए।”
यह पूरा अनुच्छेद एक 4-अंक के प्रश्न का पूरा उत्तर है। इसे ऐसे याद कीजिए — पहले जनता सुनती थी, फिर वह पढ़ने लगी, पर बीच के दौर में वह छपी हुई चीज़ को सुनती थी।
3.4 धार्मिक विवाद और प्रिंट का डर (उपशीर्षक 3.2, पृष्ठ 112)
छापेख़ाने से क्या-क्या मुमकिन हुआ —
- छापेख़ाने से विचारों के व्यापक प्रचार-प्रसार और बहस-मुबाहिसे के द्वार खुले।
- स्थापित सत्ता के विचारों से असहमत होने वाले लोग भी अब अपने विचारों को छापकर उन्हें फैला सकते थे।
- छपे हुए संदेश के ज़रिए वे लोगों को अलग ढंग से सोचने के लिए मना सकते थे, या कोई कार्रवाई करने के लिए प्रेरित कर सकते थे।
पर सब ख़ुश नहीं थे — डर क्या था? यह चार-कड़ी की शृंखला है —
| क्रम | डर |
|---|---|
| 1 | कई लोगों को छपी किताब के व्यापक प्रसार और छपे शब्द की सुगमता को लेकर यह आशंका थी कि कहीं इसका आमलोगों के ज़ेहन पर क्या असर हो। |
| 2 | भय था कि अगर छपे हुए और पढ़े जा रहे पर कोई नियंत्रण न होगा तो लोगों में बाग़ी और अधार्मिक विचार पनपने लगेंगे। |
| 3 | अगर ऐसा हुआ तो ‘मूल्यवान’ साहित्य की सत्ता ही नष्ट हो जाएगी। |
| 4 | धर्मगुरुओं और सम्राटों तथा कई लेखकों एवं कलाकारों द्वारा व्यक्त की गई यह चिंता नव-मुद्रित और नव-प्रसारित साहित्य की व्यापक आलोचना का आधार बनी। |
3.5 मार्टिन लूथर और प्रोटेस्टेंट धर्मसुधार — यह अभ्यास प्रश्न 1-ख है
पूरी घटना क्रम से —
| क्रम | घटना |
|---|---|
| 1 | धर्म-सुधारक मार्टिन लूथर ने रोमन कैथलिक चर्च की कुरीतियों की आलोचना करते हुए अपनी पिच्चानवे स्थापनाएँ लिखीं। |
| 2 | इसकी एक छपी प्रति विटेनबर्ग के गिरजाघर के दरवाज़े पर टाँगी गई। |
| 3 | इसमें लूथर ने चर्च को शास्त्रार्थ के लिए चुनौती दी थी। |
| 4 | जल्द ही लूथर के लेख बड़ी तादाद में छापे और पढ़े जाने लगे। |
| 5 | इसके नतीजे में चर्च में विभाजन हो गया और प्रोटेस्टेंट धर्मसुधार की शुरुआत हुई। |
| 6 | कुछ ही हफ़्तों में न्यू टेस्टामेंट के लूथर के तर्जुमे या अनुवाद की 5000 प्रतियाँ बिक गईं, और तीन महीने के अंदर दूसरा संस्करण निकालना पड़ा। |
और लूथर की वह मशहूर पंक्ति —
प्रिंट के प्रति तहेदिल से कृतज्ञ लूथर ने कहा — “मुद्रण ईश्वर की दी हुई महानतम देन है, सबसे बड़ा तोहफ़ा।”
“कई इतिहासकारों का यह ख़याल है कि छपाई ने नया बौद्धिक माहौल बनाया और इसमें धर्म-सुधार आंदोलन के नए विचारों के प्रसार में मदद मिली।” — इस वाक्य में ‘कई इतिहासकारों का ख़याल है’ शब्द ध्यान से देखिए। पाठ्यपुस्तक इसे निश्चित तथ्य नहीं, इतिहासकारों की राय बता रही है। उत्तर में भी यही सावधानी रखिए।
3.6 मुद्रण और प्रतिरोध — मेनोकियो की कहानी (उपशीर्षक 3.3, पृष्ठ 112–113)
यह कहानी पूरी याद कीजिए। यह अध्याय की सबसे मार्मिक कहानी है।
| क्रम | घटना |
|---|---|
| 1 | छपे हुए लोकप्रिय साहित्य के बल पर कम शिक्षित लोग धर्म की अलग-अलग व्याख्याओं से परिचित हुए। |
| 2 | सोलहवीं सदी की इटली के एक किसान मेनोकियो ने अपने इलाक़े में उपलब्ध किताबों को पढ़ना शुरू कर दिया। |
| 3 | उन किताबों के आधार पर उसने बाइबिल के नए अर्थ लगाने शुरू कर दिए। |
| 4 | उसने ईश्वर और सृष्टि के बारे में ऐसे विचार बनाए कि रोमन कैथलिक चर्च उससे क्रुद्ध हो गया। |
| 5 | ऐसे धर्म-विरोधी विचारों को दबाने के लिए रोमन चर्च ने इन्क्वीज़ीशन (धर्म-अदालत) शुरू किया। |
| 6 | मेनोकियो को दो बार पकड़ा गया और आख़िरकार उसे मौत की सज़ा दे दी गई। |
और चर्च का अंतिम क़दम —
- धर्म के पास ऐसे पाठ और उस पर उठाए जा रहे सवालों से परेशान रोमन चर्च ने प्रकाशकों और पुस्तक-विक्रेताओं पर कई तरह की पाबंदियाँ लगाईं।
- और 1558 ई. से प्रतिबंधित किताबों की सूची रखने लगे।
यह अभ्यास प्रश्न 1-ग का सीधा उत्तर है। रोमन कैथलिक चर्च ने सोलहवीं सदी के मध्य से प्रतिबंधित किताबों की सूची इसलिए रखनी शुरू की क्योंकि छपी हुई किताबों से मेनोकियो जैसे साधारण लोग धर्म की अपनी व्याख्याएँ बनाने लगे थे, जिससे चर्च की सत्ता को ख़तरा पैदा हो गया था।
3.7 स्रोत-क — “किताब का डर” (पृष्ठ 113)
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| कौन | इरैस्मस — लातिन के विद्वान और कैथलिक धर्मसुधारक। |
| उनकी स्थिति | उन्होंने कैथलिक धर्म की ज़्यादतियों की आलोचना की, पर लूथर से भी एक दूरी बनाकर रखी। |
| कहाँ लिखा | उन्होंने एडेजेज़ (1508) में लिखा। |
इरैस्मस के शब्द —
“किताबें भिनभिनाती मक्खियों की तरह हैं, दुनिया का कौन-सा कोना है, जहाँ ये नहीं पहुँच जातीं? हो सकता है कि जहाँ-तहाँ, एकाध जानने लायक चीज़ें भी बताएँ, लेकिन इनका ज़्यादा हिस्सा तो विद्वता के लिए हानिकारक ही है। बेकार ढेर हैं, क्योंकि अच्छी चीज़ों की अति भी हानिकारक ही है, इनसे बचना चाहिए… (मुद्रक) दुनिया को सिर्फ़ तुच्छ (जैसे कि मेरी लिखी) चीज़ों से ही नहीं पाट रहे, बल्कि बकवास, बेवकूफ़, सनसनीख़ेज़, धर्मविरोधी, अज्ञानी, और षड्यंत्रकारी किताबें छापते हैं, और उनकी तादाद ऐसी है कि मूल्यवान साहित्य का मूल्य ही नहीं रह जाता।”
यह अभ्यास प्रश्न 2-ख है — “छपी किताब को लेकर इरैस्मस के विचार”। पूरा उद्धरण याद रखने की ज़रूरत नहीं; तीन बातें याद रखिए — (1) किताबें मक्खियों की तरह हर जगह पहुँच जाती हैं, (2) उनका ज़्यादातर हिस्सा विद्वता के लिए हानिकारक है, (3) इतनी किताबें छपती हैं कि अच्छे साहित्य का मूल्य ही नहीं रह जाता।
3.8 चित्र 10 — द मैकॉबर डान्स (वीभत्स नाच), पृष्ठ 113
- इस सोलहवीं सदी की तसवीर में छपाई का ख़ौफ़ किस नाटकीयता से पेश किया जा रहा था, यह देखा जा सकता है।
- इस बेहद दिलचस्प वुडकट (तख़्ती-छाप) तसवीर में मुद्रण के आगमन को दुनिया के अंत से जोड़ा गया है।
- मुद्रक के वर्कशॉप को मौत के नाच का मंच बताया गया है।
- मुद्रक और उसके मज़दूर कंकालों के नियंत्रण में हैं, और उनसे मनचाही चीज़ें छपवाते हैं।
चर्चा करें (पृष्ठ 113): “छपाई से विरोधी विचारों के प्रसार को किस तरह बल मिलता था? संक्षेप में लिखें।”
4. पढ़ने का जुनून (पाठ का भाग 4, पृष्ठ 114–116)
4.1 साक्षरता कैसे बढ़ी
- पूरे सत्रहवीं और अठारहवीं सदी के दौरान यूरोप के ज़्यादातर हिस्सों में साक्षरता बढ़ती रही।
- अलग-अलग संप्रदाय के चर्चों ने गाँवों में स्कूल स्थापित किए और किसानों-कारीगरों को शिक्षित करने लगे।
- अठारहवीं सदी के अंत तक यूरोप के कुछ हिस्सों में तो साक्षरता दर 60 से 80 प्रतिशत तक हो गई थी।
- यूरोपीय देशों में साक्षरता और स्कूलों के प्रसार के साथ लोगों में पढ़ने का जैसे जुनून पैदा हो गया।
- लोगों को किताबें चाहिए थीं, इसलिए मुद्रक ज़्यादा से ज़्यादा किताबें छापने लगे।
4.2 नयी किस्म की सस्ती किताबें — यह तालिका ज़रूर याद कीजिए
“नए पाठकों की रुचि का ध्यान रखते हुए क़िस्म-क़िस्म का साहित्य छपने लगा।”
| नाम | क्या था | कहाँ |
|---|---|---|
| पंचांग | चाँद, सूरज की गति, ज्वार-भाटा के समय और लोगों के दैनिक जीवन से जुड़ी कई अहम जानकारियाँ देता वार्षिक प्रकाशन। | यूरोप-भर में |
| पेनी चैपबुक्स (चैपबुक / गुटका) | पॉकेट बुक के आकार की सस्ती किताबें, जो एक पैसे में मिलती थीं। | इंग्लैंड |
| चैपमेन | इन एकपैसिया किताबों को बेचने वाले फेरीवालों को चैपमेन कहा जाता था। | इंग्लैंड |
| बिब्लियोथीक ब्ल्यू | सस्ते काग़ज़ पर छपी और नीली जिल्द में बँधी छोटी किताबें। | फ़्रांस |
| चार-पाँच पन्ने की किताबें | प्रेम-कहानियाँ और अतीत की थोड़ी गाथाएँ, जिन्हें ‘इतिहास’ कहते थे। | फ़्रांस |
- पुस्तक विक्रेताओं ने गाँव-गाँव जाकर छोटी-छोटी किताबें बेचने वाले फेरीवालों को काम पर लगाया।
- ये किताबें मुख्यत: पंचांग के अलावा लोक-गाथाएँ और लोकगीतों की हुआ करती थीं।
- लेकिन जल्द ही मनोरंजन-प्रधान सामग्री भी आम पाठकों तक पहुँचने लगी।
- इन किताबों को ग़रीब तबक़े भी ख़रीदकर पढ़ सकते थे।
“आप देख सकते हैं कि अलग-अलग उद्देश्य और दिलचस्पी के हिसाब से किताबों के कई आकार-प्रकार थे।” — यही वाक्य यह भी समझाता है कि छपाई ने किताब को अमीरों की चीज़ से हटाकर सबकी चीज़ बना दिया।
4.3 पत्रिकाएँ, विज्ञान और दर्शन
- अठारहवीं सदी के आरंभ से पत्रिकाओं का प्रकाशन शुरू हुआ, जिनमें समसामयिक घटनाओं की ख़बर के साथ मनोरंजन भी परोसा जाने लगा।
- अख़बार और पत्रों में युद्ध और व्यापार से जुड़ी जानकारी के अलावा दूर देशों की ख़बरें होती थीं।
- उसी तरह वैज्ञानिक और दार्शनिक भी आम जनता की पहुँच के बाहर नहीं रहे।
- प्राचीन व मध्यकालीन ग्रंथ संकलित किए गए, और नक़्शों के साथ-साथ वैज्ञानिक ख़ाके भी बड़ी मात्रा में छापे गए।
- जब आइज़ैक न्यूटन जैसे वैज्ञानिकों ने अपने आविष्कार प्रकाशित करने शुरू किए तो उनके लिए विज्ञान-बोध में पगा एक बड़ा पाठक-वर्ग तैयार हो चुका था।
- टॉमस पेन, वॉल्टेयर और ज़्याँ ज़ाक रूसो जैसे दार्शनिकों की किताबें भी भारी मात्रा में छपने और पढ़ी जाने लगीं।
- ज़ाहिर है कि विज्ञान, तर्क और विवेकवाद के उनके विचार लोकप्रिय साहित्य में भी जगह पाने लगे।
अध्याय 1 से जोड़िए। वॉल्टेयर और रूसो के नाम आपने अध्याय 1 (यूरोप में राष्ट्रवाद का उदय) में भी पढ़े थे। वहाँ ये विचारक क्रांति के प्रेरक थे; यहाँ आप देख रहे हैं कि उनके विचार लोगों तक पहुँचे कैसे — छपाई के ज़रिए।
4.4 “दुनिया के ज़ालिमों, अब हिलोगे तुम!” (उपशीर्षक 4.1, पृष्ठ 114–115)
- अठारहवीं सदी के मध्य तक यह आम विश्वास बन चुका था कि किताबों के ज़रिए प्रगति और ज्ञानोदय होता है।
- कई सारे लोगों का मानना था कि किताबें दुनिया बदल सकती हैं, कि वे निरंकुशवाद और आतंकी राजसत्ता से समाज को मुक्ति दिलाकर ऐसा दौर लाएँगी जब विवेक और बुद्धि का राज होगा।
लुई सेबेस्तिएँ मर्सिए के दो प्रसिद्ध वाक्य —
| # | कथन |
|---|---|
| 1 | “छापाख़ाना प्रगति का सबसे ताक़तवर औज़ार है, इससे बन रही जनमत की आँधी में निरंकुशवाद उड़ जाएगा।” |
| 2 | “हे निरंकुशवादी शासकों, अब तुम्हारे काँपने का वक़्त आ गया है! आभासी लेखक की क़लम के जोर के आगे तुम हिल उठोगे!” |
- मर्सिए अठारहवीं सदी के फ़्रांस के एक उपन्यासकार थे।
- उनके उपन्यासों में नायक अकसर किताबें पढ़ने से बदल जाते हैं।
- वे किताबें घोंटते हैं, किताबों की दुनिया में जीते हैं, और इसी क्रम में ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं।
4.5 बॉक्स 2 — जेम्स लॉकिंग्टन की डायरी, 1791 (पृष्ठ 114)
लंदन के एक प्रकाशक जेम्स लॉकिंग्टन ने 1791 में अपनी डायरी में यह लिखा —
“पिछले बीस सालों में किताबों की बिक्री में आमतौर पर बेतहाशा वृद्धि हुई है। ग़रीब क़िस्म के किसान, या गाँव के लोग जो पहले अपनी शामें डायन-जोगिन, और भूत-प्रेत की कहानियाँ सुनते हुए बिताते थे… अब अपनी संतानों द्वारा पढ़े गए रूमानी या अन्य क़िस्सों को सुनने का आनंद लेते हुए जाड़े की रातों को छोटी करने लगे हैं। अगर जॉन शहर जा रहा है, तो उसे सख़्त हिदायत की जाएगी कि वह पेरेग्रिन पिकल्स ऐडवेंचर लेकर आए… और अगर डॉली अंडे बेचने जा रही है तो उसे कहा जाता है कि वह द हिस्ट्री ऑफ़ जोज़ेफ़ ऐण्ड्रूज़ लेकर ही वापस लौटे।”
इस बॉक्स की सबसे ज़रूरी बात — यह दिखाता है कि छपाई गाँव के साधारण घरों तक पहुँच गई थी। पहले वे शाम को भूत-प्रेत की कहानियाँ सुनते थे; अब बच्चे उन्हें किताब पढ़कर सुनाते थे। यह ठीक वही ‘मौखिक से मुद्रित की ओर’ वाला बदलाव है जो भाग 3.3 में बताया गया था।
4.6 मुद्रण संस्कृति और फ़्रांसीसी क्रांति (उपशीर्षक 4.2, पृष्ठ 115–116)
पाठ्यपुस्तक ने यहाँ एक सवाल खड़ा किया है और उसका संतुलित उत्तर दिया है। यह अध्याय का सबसे बौद्धिक हिस्सा है।
सवाल — “कई इतिहासकारों का मानना है कि मुद्रण संस्कृति ने फ़्रांसीसी क्रांति के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ रचीं। क्या हम दोनों में ऐसा संबंध बना सकते हैं?”
मूलत: तीन तरह के तर्क देखने लायक़ हैं —
| तर्क | विवरण |
|---|---|
| पहला | छपाई के चलते ज्ञानोदय के चिंतकों के विचारों का प्रसार हुआ। उनके लेखन ने कुल मिलाकर परंपरा, अंधविश्वास और निरंकुशवाद की आलोचना पेश की। उन्होंने रीति-रिवाजों की जगह विवेक के शासन पर बल दिया, और माँग की कि हर चीज़ को तर्क और विवेक की कसौटी पर ही कसा जाए। उन्होंने चर्च की धार्मिक और राज्य की निरंकुश सत्ता पर प्रहार करके परंपरा पर आधारित सामाजिक व्यवस्था को दुबला कर दिया। वॉल्टेयर और रूसो के लेखन का व्यापक पाठक-वर्ग था, और उनके पाठक एक नए, आलोचनात्मक, सवालिया और तार्किक नज़रिये से दुनिया को देखने लगे थे। |
| दूसरा | छपाई ने वाद-विवाद-संवाद की नयी संस्कृति को जन्म दिया। सारे पुराने मूल्य, संस्थाओं और क़ायदों पर आम जनता के बीच बहस-मुबाहिसे हुए और उनके पुनर्मूल्यांकन का सिलसिला शुरू हुआ। तर्क की ताक़त से परिचित यह नयी ‘पब्लिक’ धर्म और आस्था को प्रश्नांकित करने का मोल समझ चुकी थी। इस तरह बनी ‘सार्वजनिक दुनिया’ से सामाजिक क्रांति के नए विचारों का सूत्रपात हुआ। |
| तीसरा | 1780 के दशक तक राजशाही और उसकी नैतिकता का मज़ाक उड़ाने वाले साहित्य का ढेर लग चुका था। इस प्रक्रिया में सामाजिक व्यवस्था को लेकर तमाम सवाल खड़े किए गए। कार्टूनों और कैरिकेचरों (व्यंग्य चित्रों) में यह भाव उभरता था कि जनता तो मुश्किलों में फँसी है जबकि राजशाही भोग-विलास में डूबी हुई है। भूमिगत घूमने वाले इस साहित्य ने लोगों को राजतंत्र के ख़िलाफ़ भड़काया। |
अब सबसे ज़रूरी बात — पाठ्यपुस्तक की सावधानी। यह ज़रूर लिखिए —
“हम इन तर्कों को कैसे समझें? इसमें तो कोई शक नहीं कि छपाई ने विचारों को फैलाने में मदद की। लेकिन याद रहे कि लोग-बाग़ हर तरह की सामग्री पढ़ते थे। एक तरफ़ वे अगर रूसो और वॉल्टेयर पढ़ रहे थे तो दूसरी तरफ़ चर्च और राज्य का प्रोपेगैंडा या प्रचार भी। वे हर पढ़ी या देखी चीज़ से तो सीधे प्रभावित नहीं हो सकते थे। वे कुछ विचारों को स्वीकारते थे, तो कुछ को नकारते भी थे। फिर चीज़ों की अपने ढंग से व्याख्या भी करते थे। इस तरह, मुद्रण ने उनके मानस को सीधे तौर पर भले नहीं रचा हो, पर इसने अलग ढंग से सोचने की संभावनाएँ ज़रूर खोलीं।”
यह अंतिम वाक्य सोने का है — “मुद्रण ने उनके मानस को सीधे तौर पर भले नहीं रचा हो, पर इसने अलग ढंग से सोचने की संभावनाएँ ज़रूर खोलीं।” यह वाक्य आपके 4-अंक और 5-अंक के उत्तर की अंतिम पंक्ति बनना चाहिए। इतिहास में सीधा कारण-परिणाम नहीं होता — यह पूरी पुस्तक की सीख है।
4.7 स्रोत-ख — मर्सिए का उपन्यास-अंश (पृष्ठ 115)
मर्सिए ने अपनी एक किताब में छपे शब्द की ताक़त को यूँ बयान किया —
“अगर किसी ने मुझे पढ़ते देखा होगा तो उसने मुझे उस प्यासे की तरह पाया होगा जो शुद्ध ताज़ा पानी मिलने पर गटगट पीने लगता है… बड़े एहतियात से लालटेन जलाने के बाद मैं ख़ुद को किताबों में डुबो देता था। और वाक और अर्थ के प्रवाह में मैं पन्ना-दर-पन्ना बहता चला जाता था, अनायास और अनजान। ख़ामोशी के साये में घड़ियाल हर घंटे बजता चला जाता था, पर मुझे सुनाई नहीं पड़ता था। तेल ख़त्म होने से मेरी लालटेन की लौ पीली पड़ने लगती थी, पर मैं था कि पढ़ता जाता। मैं बत्ती उठाने की ज़हमत भी नहीं लेता था, कि मेरे आनंद में व्यवधान न पड़े। और वे नए विचार किस वेग से मेरे सिर में घुसते थे! मेरी बुद्धि कैसे उन्हें आत्मसात करती थी!”
- यह अंश रॉबर्ट डार्नटन की किताब द फ़ॉरबिडन बेस्ट-सेलर्स ऑफ़ प्री-रेवोलूशनरी फ़्रांस, 1995 से उद्धृत है।
चर्चा करें (पृष्ठ 116): “कुछ इतिहासकार ऐसा क्यों मानते हैं कि मुद्रण संस्कृति ने फ़्रांसीसी क्रांति के लिए ज़मीन तैयार की?”
4.8 चित्र 11 — फ़्रांसीसी क्रांति से पहले का कार्टून (पृष्ठ 116)
- यह अठारहवीं सदी के अंत का एक कार्टून है।
- इस व्यंग्य-चित्र में दिखाया गया है कि जनसाधारण — किसान, कारीगर और मज़दूर — किस तरह मुश्किल हालात में थे, जबकि ज़िंदगी के मज़े लेने वाला कुलीन वर्ग उनका दोहन करता है।
- इस तरह के कार्टूनों के चलन से क्रांति के पहले लोगों के दिल-दिमाग़ पर ख़ास असर हुआ।
5. उन्नीसवीं सदी (पाठ का भाग 5, पृष्ठ 117–118)
“उन्नीसवीं सदी में यूरोप ने जन-साक्षरता की दिशा में लंबी-लंबी छलाँगें लगाईं, जिसके बूते महिलाओं और बच्चों के रूप में बड़ी मात्रा में नया पाठकवर्ग तैयार हुआ।”
5.1 बच्चे नए पाठक कैसे बने (उपशीर्षक 5.1, पृष्ठ 117)
| क्रम | कड़ी |
|---|---|
| 1 | उन्नीसवीं सदी के आख़िर से प्राथमिक शिक्षा के अनिवार्य होने के चलते बच्चे, पाठकों की एक अहम श्रेणी बन गए। |
| 2 | प्रकाशन उद्योग के लिए पाठ्य-पुस्तकों का उत्पादन महत्त्वपूर्ण हो गया। |
| 3 | फ़्रांस में 1857 में सिर्फ़ बाल-पुस्तकें छापने के लिए एक प्रेस या मुद्रणालय स्थापित किया गया। |
| 4 | इस प्रेस में पुरानी और नयी, दोनों तरह की परी-कथाओं और लोक-कथाओं का प्रकाशन किया गया। |
ग्रिम बंधुओं की कहानी — यह बहुत महत्त्वपूर्ण है —
- जर्मनी के ग्रिम बंधुओं ने बरसों लगाकर किसानों के बीच से लोक-कथाएँ जमा कीं।
- उनके द्वारा एकत्रित सामग्री का संपादन हुआ।
- फिर कहानियों को अंतत: 1812 के एक संकलन में छापा गया।
- बच्चों के लिए अनुपयुक्त सामग्री, या जो चीज़ें कुलीन वर्गों को अश्लील लगती थीं, उन्हें प्रकाशित संस्करण में शामिल नहीं किया जाता था।
पाठ्यपुस्तक का यह वाक्य बहुत गहरा है — “इस तरह पुरानी ग्रामीण लोककथाओं को नया रूप मिला — छपने से वे दर्ज तो हुईं, पर इस प्रक्रिया में बदल भी गईं।” इसे समझाइए — जब कोई मौखिक चीज़ छपती है, तो वह बचती ज़रूर है, पर वैसी नहीं बचती जैसी थी। छापने वाला उसे अपने हिसाब से काट-छाँट देता है। यह विचार 5-अंक के प्रश्न में बहुत अच्छा लगता है।
5.2 महिलाएँ नए पाठक और लेखक के रूप में
- महिलाएँ पाठिका और लेखिका की भूमिका में ज़्यादा अहम हो गईं।
- पेनी मैगज़ीन्स या एकपैसिया पत्रिकाएँ ख़ास तौर पर उन्हीं के लिए होती थीं।
- वैसे ही जैसे कि सही चाल-चलन और गृहस्थी सिखाने वाली निर्देशिकाएँ।
- उन्नीसवीं सदी में जब उपन्यास छपने लगे तो महिलाओं को उनका अहम पाठक माना गया।
- मशहूर उपन्यासकारों में लेखिकाएँ भी अग्रणी थीं — जेन ऑस्टिन, ब्रॉण्ट बहनें, जॉर्ज इलियट आदि।
उनके लेखन से नयी नारी की परिभाषा कैसी उभरी — यह तीन-बिंदु वाला वाक्य याद कीजिए —
| बिंदु | नयी नारी की पहचान |
|---|---|
| 1 | जिसका व्यक्तित्व सुदृढ़ था। |
| 2 | जिसमें गहरी सूझ-बूझ थी। |
| 3 | जिसका अपना दिमाग़ था, अपनी इच्छाशक्ति थी। |
चित्र 12 — पेनी मैगज़ीन का आमुख। पेनी मैगज़ीन का प्रकाशन इंग्लैंड में 1832–1850 के बीच ‘सोसायटी फ़ॉर द डिफ़्यूज़न ऑफ़ यूजफुल नॉलेज’ ने किया। यह मूलत: मज़दूर वर्ग के लिए थी।
5.3 मज़दूर और पुस्तकालय
- सत्रहवीं सदी से ही किराए पर किताब देने वाले पुस्तकालय अस्तित्व में आ गए थे।
- उन्नीसवीं सदी के इंग्लैंड में ऐसे पुस्तकालयों का उपयोग सफ़ेद-कॉलर मज़दूरों, दस्तकारों और निम्नवर्गीय लोगों को शिक्षित करने के लिए किया गया।
- काम के दिन के छोटे होने के बाद मज़दूरों को अपने सुधार और आत्म-अभिव्यक्ति के लिए थोड़ा वक़्त मिलने लगा।
- उन्होंने बड़ी संख्या में राजनीतिक पर्चे, और आत्मकथाएँ लिखीं।
5.4 बॉक्स 3 — थॉमस वुड और मैक्सिम गोर्की (पृष्ठ 117)
- यॉर्कशायर के एक मेकैनिक थॉमस वुड ने बताया कि वह पुराने अख़बार ख़रीदकर शाम के वक़्त आग की रोशनी में पढ़ता था, क्योंकि उसके पास मोमबत्ती के लिए पैसे नहीं होते थे।
- ग़रीबों की आत्मकथाओं से हमें पता चलता है कि वे मुश्किल हालात में पढ़ने के लिए जद्दोजहद करते थे।
- बीसवीं सदी के रूसी क्रांतिकारी लेखक मैक्सिम गोर्की की मेरा बचपन और मेरे विश्वविद्यालय इन संघर्षों की कहानियाँ हैं।
इस बॉक्स को कक्षा में ज़रूर पढ़वाइए। यह उन बच्चों को सीधे छूता है जिनके घर में पढ़ने की सुविधा कम है।
5.5 नए तकनीकी परिष्कार (उपशीर्षक 5.2, पृष्ठ 117–118)
इस तालिका को क्रम से याद कीजिए — परीक्षा में सीधे पूछा जाता है।
| समय | तकनीकी बदलाव |
|---|---|
| अठारहवीं सदी के अंत तक | प्रेस धातु से बनने लगे थे। |
| उन्नीसवीं सदी के मध्य तक | न्यूयॉर्क के रिचर्ड एम. हो. ने शक्ति चालित बेलनाकार प्रेस को कारगर बना लिया था। इससे प्रति घंटे 8000 शीट या ताव छप सकते थे। |
| उन्नीसवीं सदी के अंत तक | ऑफ़सेट प्रेस आ गया था, जिससे एक साथ छह रंग की छपाई मुमकिन थी। |
| बीसवीं सदी के शुरू से | बिजली से चलनेवाले प्रेस के बल पर छपाई का काम बड़ी तेज़ी से होने लगा। |
और भी कई छोटे-छोटे सुधार हुए —
- काग़ज़ डालने की विधि में सुधार हुआ।
- प्लेट की गुणवत्ता बेहतर हुई।
- स्वचालित पेपर-रील और रंगों के लिए फ़ोटो-विद्युतीय नियंत्रण भी काम में आने लगे।
- इस तरह कई छोटी-छोटी मशीनी इकाइयों में कुल सुधार की बदौलत छपे हुए पन्ने का रंग-रूप ही बदल गया।
5.6 बेचने के नए गुर — यह अध्याय 4 से जुड़ता है
“मुद्रकों और प्रकाशकों ने अपने उत्पाद बेचने के नए गुर अपनाए।”
| तरीक़ा | विवरण |
|---|---|
| धारावाहिक उपन्यास | उन्नीसवीं सदी की पत्रिकाओं ने उपन्यासों को धारावाहिक छापा, जिससे उपन्यास लिखने की एक ख़ास शैली विकसित हुई। |
| सस्ती शृंखला | इंग्लैंड में 1920 के दशक में लोकप्रिय किताबें एक सस्ती शृंखला — शिलिंग शृंखला — के तहत छापी गईं। |
| डस्ट कवर | किताबों की जिल्द का आवरण या डस्ट कवर भी बीसवीं सदी की तकनीकी नवइयत है। |
| सस्ते पेपरबैक | 1930 की आर्थिक मंदी के आने से प्रकाशकों को किताबों की बिक्री गिरने का भय हुआ। लिहाज़ा, पाठकों की जेब का ख़याल रखते हुए उन्होंने सस्ते पेपरबैक या अजिल्द संस्करण छापे। |
यहाँ अध्याय 4 और अध्याय 3 दोनों से जोड़िए। अध्याय 4 में आपने पढ़ा था कि उत्पादकों ने विज्ञापन से नए उपभोक्ता बनाए; अध्याय 3 में आपने 1929 की महामंदी पढ़ी थी। यहाँ दोनों बातें एक साथ दिख रही हैं — मंदी आई तो प्रकाशकों ने सस्ता संस्करण निकाला। यह अंतर-अध्याय जोड़ 5-अंक के प्रश्न में बहुत प्रभावी लगता है।
चित्र 13 (पृष्ठ 118) —
- इंग्लैंड के एक रेलवे स्टेशन पर लगे विज्ञापन, अल्फ़्रेड कॉन्कानेन द्वारा बनाया गया लिथोग्राफ़, 1874।
- छपी हुई सूचनाएँ और इश्तहार सड़कों की दीवारों, प्लैटफ़ॉर्म और सार्वजनिक इमारतों पर लगाए जाते थे।
6. भारत का मुद्रण संसार (पाठ का भाग 6, पृष्ठ 119–120)
यहाँ से अध्याय का दूसरा आधा हिस्सा शुरू होता है। अब कहानी भारत की है।
6.1 मुद्रण युग से पहले की पांडुलिपियाँ (उपशीर्षक 6.1, पृष्ठ 119)
- भारत में संस्कृत, अरबी, फ़ारसी और विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं में हस्त-लिखित पांडुलिपियों की पुरानी और समृद्ध परंपरा थी।
- पांडुलिपियाँ ताड़ के पत्तों या हाथ से बने काग़ज़ पर नक़्ल कर बनाई जाती थीं।
- कभी-कभी तो पन्नों पर बेहतरीन तसवीरें भी बनाई जाती थीं।
- फिर उन्हें उम्र बढ़ाने के ख़याल से तख़्तियों की जिल्द में या सिलकर बाँध दिया जाता था।
- उन्नीसवीं सदी के अंत तक, छपाई के आने के बाद भी, पांडुलिपियाँ छापी जाती रहीं।
पांडुलिपियों की चार समस्याएँ — यह तालिका ज़रूर याद कीजिए —
| क्रम | समस्या |
|---|---|
| 1 | पांडुलिपियाँ नाज़ुक होती थीं। |
| 2 | वे काफ़ी महँगी भी थीं। |
| 3 | उन्हें बड़ी सावधानी से पकड़ना होता था। |
| 4 | लिपियों के अलग-अलग तरीक़े से लिखे जाने के चलते उन्हें पढ़ना भी आसान नहीं था। |
- इसलिए उनका व्यापक दैनिक इस्तेमाल नहीं होता था।
बंगाल की पाठशालाओं का उदाहरण — यह बहुत दिलचस्प है —
- हालाँकि पूर्व-औपनिवेशिक बंगाल में ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक पाठशालाओं का बड़ा जाल था।
- लेकिन विद्यार्थी आमतौर पर किताबें नहीं पढ़ते थे।
- गुरु याददाश्त से किताबें सुनाते थे, और विद्यार्थी उन्हें लिख लेते थे।
- इस तरह कई-सारे लोग बिना कोई किताब पढ़े साक्षर बन जाते थे।
यह वाक्य बच्चों को ज़रूर समझाइए — “कई-सारे लोग बिना कोई किताब पढ़े साक्षर बन जाते थे।” यानी उस समय ‘साक्षर होना’ और ‘किताब पढ़ना’ दो अलग बातें थीं। यह ठीक वही ‘मौखिक बनाम मुद्रित’ वाली बात है जो यूरोप के संदर्भ में भाग 3.3 में आई थी।
तीन पांडुलिपि-चित्र —
| चित्र | विवरण |
|---|---|
| चित्र 14 (पृष्ठ 119) | जयदेव के गीत गोविंद के कुछ पन्ने, अठारहवीं सदी। यह एकॉर्डियन शैली में हाथ से लिखी पांडुलिपि का एक नमूना है। |
| चित्र 15 (पृष्ठ 119) | हाफ़िज़ के दीवान के कुछ पन्ने, 1824। चौदहवीं सदी के शायर हाफ़िज़ की संपूर्ण शायरी दीवान में संकलित है। लेटरप्रेस के आने के बाद भी इस तरह की पांडुलिपियाँ अमीरों के लिए बनाई जाती रहीं। |
| चित्र 16 (पृष्ठ 120) | ऋग्वेद के कुछ पन्ने। यह पांडुलिपि मलयालम भाषा में अठारहवीं सदी में बनाई गई। प्रिंट के आगमन के काफ़ी बाद तक हस्तलिखित पांडुलिपियाँ प्रकाशित की जाती रहीं। |
6.2 छपाई भारत आई (उपशीर्षक 6.2, पृष्ठ 120)
यह तालिका बहुत महत्त्वपूर्ण है — भारत में छपाई का पूरा आरंभिक क्रम इसी में है।
| वर्ष / समय | घटना |
|---|---|
| सोलहवीं सदी के मध्य | प्रिंटिंग प्रेस पहले-पहल भारत के गोवा में पुर्तगाली धर्म-प्रचारकों के साथ आया। |
| — | जेसुइट पुजारियों ने कोंकणी सीखी और कई सारी पुस्तिकाएँ छापीं। |
| 1579 | कैथलिक पुजारियों ने कोचीन में पहली तमिल किताब छापी। |
| 1674 तक | कोंकणी और कन्नड़ भाषाओं में लगभग 50 किताबें छप चुकी थीं। |
| 1713 | पहली मलयालम किताब छापने वाले भी कैथलिक पुजारी ही थे। |
| — | डच प्रोटेस्टेंट धर्म-प्रचारकों ने 32 तमिल किताबें छापीं, जिनमें से कई पुरानी किताबों का अनुवाद थीं। |
ध्यान दीजिए — भारत में छपाई सबसे पहले धर्म-प्रचार के लिए आई, व्यापार या शिक्षा के लिए नहीं। यही बात यूरोप में भी थी — गुटेन्बर्ग ने पहली किताब बाइबिल ही छापी थी। यह तुलना उत्तर में ज़रूर लिखिए।
6.3 अंग्रेज़ी-भाषी प्रेस और जेम्स ऑगस्टस हिक्की
- अंग्रेज़ी-भाषी प्रेस भारत में काफ़ी देर तक विकास नहीं कर पाया था।
- यद्यपि इंग्लिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने सत्रहवीं सदी के अंत तक छापेख़ाने का आयात शुरू कर दिया था।
हिक्की की कहानी — यह पूरी याद कीजिए —
| क्रम | घटना |
|---|---|
| 1 | जेम्स ऑगस्टस हिक्की ने 1780 से बंगाल गजट नामक एक साप्ताहिक पत्रिका का संपादन शुरू किया। |
| 2 | उन्होंने ख़ुद को यूँ परिभाषित किया — ‘हर किसी के लिए खुली एक व्यावसायिक पत्रिका, जो किसी के प्रभाव में नहीं है।’ |
| 3 | यानी यह पत्रिका भारत में प्रेस चलानेवाले औपनिवेशिक शासन से आज़ाद, निजी अंग्रेज़ी उद्यम थी, और इसे अपनी स्वतंत्रता पर अभिमान था। |
| 4 | हिक्की ढेर सारे विज्ञापन छापता था, जिनमें दासों की बिक्री से जुड़े इश्तहार भी शामिल थे। |
| 5 | लेकिन साथ ही वह भारत में कार्यरत वरिष्ठ अंग्रेज़ अधिकारियों से जुड़ी गपबाज़ी भी छापता था। |
| 6 | इससे नाराज़ होकर गवर्नर जनरल वॉरेन हेस्टिंग्स ने हिक्की पर मुक़दमा कर दिया। |
| 7 | और ऐसे सरकारी आश्रय-प्राप्त अख़बारों के प्रकाशन को प्रोत्साहित करना शुरू कर दिया जो औपनिवेशिक राज की छवि पर होते हमलों से इसकी रक्षा कर सकें। |
भारतीयों के अपने अख़बार —
- अठारहवीं सदी के अंत तक कई-सारी पत्र-पत्रिकाएँ छपने लगीं।
- कुछ हिंदुस्तानी भी अपने अख़बार छापने लगे थे।
- ऐसे प्रयासों में पहला था राजा राममोहन राय के क़रीबी रहे गंगाधर भट्टाचार्य द्वारा प्रकाशित बंगाल गजट।
6.4 स्रोत-ग — विलियम बोल्ट्स, 1768 (पृष्ठ 120)
- विलियम बोल्ट्स नामक व्यक्ति को, 1768 ई. में भी, इस तरह की सूचना कलकत्ता के एक सार्वजनिक इमारत में टाँगने की ज़रूरत महसूस हुई —
“जनसाधारण के लिए : मि. बोल्ट्स पब्लिक को यह बताने के लिए इस तरीक़े का सहारा ले रहे हैं कि चूँकि शहर में छापेख़ाने की घोर कमी से नुक़सान होता है… इसलिए वे उस व्यक्ति का हर संभव उत्साहवर्धन करेंगे… जो छपाई में माहिर हो।”
- पर जल्द ही बोल्ट्स महोदय इंग्लैंड चले गए और यह वादा हवा में लटका रहा।
7. धार्मिक सुधार और सार्वजनिक बहसें (पाठ का भाग 7, पृष्ठ 121–122)
7.1 बहस का बाज़ार गर्म क्यों हुआ
- उन्नीसवीं सदी की शुरुआत से ही धार्मिक मसलों को लेकर बहसों का बाज़ार गर्म था।
- अलग-अलग समूह औपनिवेशिक समाज में हो रहे बदलावों से जूझते हुए, धर्म की अपनी-अपनी व्याख्या पेश कर रहे थे।
- कुछ तो मौजूदा रीति-रिवाजों की आलोचना करते हुए उनमें सुधार चाहते थे।
- जबकि कुछ अन्य समाज-सुधारकों के तर्कों के ख़िलाफ़ खड़े थे।
- ये सारे वाद-विवाद प्रिंट में, सरेआम पब्लिक में हुए।
छपाई ने बहस के साथ क्या-क्या किया — यह तीन-कड़ी वाला वाक्य ध्यान से याद कीजिए —
| क्रम | प्रभाव |
|---|---|
| 1 | छपी हुई पुस्तिकाओं और अख़बारों ने नए विचारों का प्रचार-प्रसार किया। |
| 2 | उन्होंने बहस की शक्ल भी तय की। |
| 3 | इन बहसों में व्यापक जन-समुदाय भी हिस्सा ले सकता था, अपने मत ज़ाहिर कर सकता था। इस तरह के मत-मंतांतर से नए विचार उभरे। |
7.2 हिंदुओं के बीच सुधार-बहस
- यह वह समय था जब समाज और धर्म-सुधारकों तथा हिंदू रूढ़िवादियों के बीच विधवा-दाह, एकेश्वरवाद, ब्राह्मण पुजारीवर्ग और मूर्ति-पूजा जैसे मुद्दों को लेकर तेज़ बहस ठनी हुई थी।
- बंगाल में जैसे-जैसे बहस चली, लगातार बढ़ती तादाद में पुस्तिकाओं और अख़बारों के ज़रिए तरह-तरह के तर्क समाज के बीच आने लगे।
- ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुँचने के ख़याल से इन्हें आम बोलचाल की भाषा में छापा गया।
| प्रकाशन | किसने / कब | पक्ष |
|---|---|---|
| संवाद कौमुदी | राममोहन राय ने 1821 से प्रकाशित किया। | सुधारवादी |
| समाचार चंद्रिका | रूढ़िवादियों ने राममोहन राय के विचारों से टक्कर लेने के लिए इसका सहारा लिया। | रूढ़िवादी |
| जाम-ए-जहाँ नामा और शम्सुल अख़बार | दो फ़ारसी अख़बार, जो इसी दौर में प्रकाशित हुए। | फ़ारसी प्रेस |
! यहाँ एक छपाई की ग़लती है, इसे जान लीजिए। पाठ्यपुस्तक (पृष्ठ 121) में लिखा है कि दोनों फ़ारसी अख़बार “1882 में” प्रकाशित हुए। पर पूरा अनुच्छेद 1820 के दशक की बहस का है — संवाद कौमुदी 1821 का है। अंग्रेज़ी मूल पुस्तक में यह वर्ष 1822 है, और इतिहास भी यही बताता है। इसलिए सही वर्ष 1822 है; ‘1882’ छपाई की एक भूल है। बोर्ड की उत्तर-पुस्तिका में पाठ्यपुस्तक का ही अनुसरण करें, पर सच्चाई जान लेना ज़रूरी है। इसकी पूरी चर्चा फ़ाइल 07 में है।
7.3 मुसलमानों के बीच — उलमा और देवबंद
उत्तर भारत में उलमा की चिंता क्या थी — कारण क्रम से लिखिए —
| क्रम | कड़ी |
|---|---|
| 1 | उत्तर भारत में उलमा मुस्लिम राजवंशों के पतन को लेकर चिंतित थे। |
| 2 | उन्हें डर था कि कहीं औपनिवेशिक शासक धर्मांतरण को बढ़ावा न दें। |
| 3 | या मुस्लिम क़ानून न बदल डालें। |
| 4 | इससे निबटने के लिए उन्होंने सस्ती लिथोग्राफ़ी प्रेस का इस्तेमाल करते हुए धर्मग्रंथों के फ़ारसी या उर्दू अनुवाद छापे और धार्मिक अख़बार तथा गुटके निकाले। |
देवबंद सेमिनरी —
- सन् 1867 में स्थापित देवबंद सेमिनरी ने मुसलमान पाठकों को रोज़मर्रा का जीवन जीने का सलीक़ा और इस्लामी सिद्धांतों के मायने समझाते हुए हज़ारों फ़तवे जारी किए।
- पूरी उन्नीसवीं सदी के दौरान कई इस्लामी संप्रदाय और सेमिनरी पैदा हुए।
- धर्म को लेकर सबकी अपनी-अपनी व्याख्याएँ थीं।
- हर कोई अपना संप्रदाय बढ़ाना चाहता था और दूसरों के असर को काटना चाहता था।
7.4 हिंदू धार्मिक ग्रंथों का छपना
- हिंदुओं के बीच भी छपाई से ख़ास तौर पर स्थानीय भाषाओं में धार्मिक पढ़ाई को काफ़ी बल मिला।
- तुलसीदास की सोलहवीं सदी की किताब रामचरितमानस का पहला मुद्रित संस्करण 1810 में कलकत्ता से प्रकाशित हुआ।
- उन्नीसवीं सदी के मध्य तक सस्ते लिथोग्राफ़ी संस्करणों से उत्तर भारत का बाज़ार पट गया।
- लखनऊ के नवल किशोर प्रेस और बंबई के श्री वेंकटेश्वर प्रेस में अनेक भारतीय भाषाओं में अनगिनत धार्मिक किताबें छपीं।
- मुद्रित और लाने-ले जाने में आसान होने के कारण आस्थावान इन्हें कहीं भी, किसी समय पढ़ सकते थे।
- इन्हें अनपढ़ लोगों की बड़ी भीड़ में बोल-बोल कर भी पढ़ा जा सकता था।
निष्कर्ष के दो वाक्य — ये ज़रूर लिखिए —
“मतलब यह कि धार्मिक पुस्तकें बड़ी तादाद में व्यापक जन-समुदाय तक पहुँच रही थीं, जिसके चलते विभिन्न धर्मों के बीच, और उनके अंदर, बहस-मुबाहिसे, और वाद-विवाद-संवाद की नयी स्थिति बन गई थी।” “लेकिन प्रिंट ने समुदाय के बीच सिर्फ़ मत-मतांतर ही नहीं पैदा किए, बल्कि इसने समुदायों को अंदर से, और विभिन्न हिस्सों को पूरे भारत से जोड़ने का काम भी किया।”
इस दूसरे वाक्य को ज़रूर रेखांकित कीजिए। छपाई ने एक साथ दो उलटे काम किए — उसने लोगों को बाँटा भी और जोड़ा भी। यही ‘दोहरा चेहरा’ इस अध्याय का मुख्य विचार है।
7.5 स्रोत-घ — “अख़बार क्यों?” (पृष्ठ 122)
पहला उद्धरण — बॉम्बे टेलीग्राफ़ एंड कोरियर, 6 जनवरी 1849 —
“पूना के कृष्णाजी त्रिम्बक राणाडे मराठी का एक अख़बार निकालना चाहते हैं, जिसमें स्थानीय दिलचस्पी की तमाम उपयोगी ख़बरों को जगह मिल सके। इसमें सार्वजनिक उपयोगिता, वैज्ञानिक अन्वेषण के अलावा प्राकृ-विद्या, सांख्यिकी, जिज्ञासाओं, देश के विभिन्न हिस्सों के बारे में आमतौर पर, और दक्कन पर ख़ासतौर पर जानकारियाँ होंगी… ऐसे तमाम लोगों से मदद और संरक्षण का निवेदन है, जो ज्ञान के प्रसार और जनकल्याण के इच्छुक हैं।”
दूसरा उद्धरण — नेटिव ओपिनियन, 3 अप्रैल 1870 —
“देसी अख़बारों और राजनीतिक सभाओं की वही भूमिका होती है, जो इंग्लैंड के हाउस ऑफ़ कॉमन्स में विपक्ष की होती है। यानी कि वह सरकारी नीतियों की आलोचनात्मक समीक्षा कर, लोगों के हित साधने में अक्षम हिस्सों को निकालें और सुधार करें, तथा उनको तेज़ी से लागू करने का काम करें। इन सभाओं को चाहिए कि वे देश के ख़ास मुद्दों पर नाना तरह की सूचनाएँ जमा करें और क्या संभव और वांछित सुधार हैं, वह बताएँ, इन कार्यों का काफ़ी असर होगा।”
इन दोनों स्रोतों को साथ पढ़िए — पहला (1849) कहता है कि अख़बार का काम ज्ञान फैलाना है; दूसरा (1870) कहता है कि अख़बार का काम सरकार की आलोचना करना है। यानी बीस साल में अख़बार की भूमिका ज्ञान से बदलकर राजनीति हो गई। यह स्रोत-आधारित प्रश्न का शानदार उत्तर है।
8. प्रकाशन के नए रूप (पाठ का भाग 8, पृष्ठ 123–126)
8.1 उपन्यास और नयी साहित्यिक विधाएँ
- छापेख़ाने से नए तरह के लेखन के लिए भूख जागी।
- जैसे-जैसे नए लोग पढ़ने लगे, छपे हुए पन्नों में अपनी ज़िंदगी, अपने तजुर्बों, अपने भोगे हुए रिश्तों को देखने की चाहत बलवती होती गई।
- यूरोप में विकसित उपन्यास नामक यह साहित्यिक विधा इन ज़रूरतों को पूरा करने में सक्षम थी।
- जल्दी ही इसने अपनी एक ख़ास भारतीय शक्ल और शैली अख़्तियार कर ली।
- अपने पाठकों को इसने अनुभव का नया संसार और मानव जीवन की विविधता का बोध प्रदान किया।
दूसरी विधाएँ —
- गीत, कहानियाँ, सामाजिक-राजनीतिक मसलों पर लेख — ये सब पाठकों की दुनिया का हिस्सा बन गए।
- अपने अलग-अलग तेवरों में इन्होंने इनसानी ज़िंदगी और अंतरंग भावनाओं, और उन सामाजिक-राजनीतिक नियमों पर बल दिया जिनसे इनका स्वरूप तय होता था।
8.2 एक नयी दृश्य-संस्कृति
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| कब | उन्नीसवीं सदी के अंत तक एक नयी तरह की दृश्य-संस्कृति आकार ले रही थी। |
| कैसे | छापेख़ानों की बढ़ती तादाद के साथ छवियों की कई नक़लें या प्रतियाँ अब बड़ी आसानी से बनाई जा सकती थीं। |
| कौन | राजा रवि वर्मा जैसे चित्रकारों ने आम खपत के लिए तसवीरें बनाईं। |
| ग़रीब दस्तकार | काठ की तख़्ती पर चित्र उकेरने वाले ग़रीब दस्तकारों ने लैटरप्रेस छापेख़ानों के क़रीब अपनी दुकानें लगाईं, और मुद्रकों से काम पाने लगे। |
| ग़रीब उपभोक्ता | बाज़ार में सुलभ सस्ती तसवीरें और कैलेंडर ख़रीदकर ग़रीब भी अपने घरों एवं दफ़्तरों में सजाया करते थे। |
और इन तसवीरों का असर —
“इन छपी तसवीरों ने आहिस्ता-आहिस्ता आधुनिकता और परंपरा, धर्म और राजनीति तथा समाज और संस्कृति के लोकप्रिय विचार-लोक को गढ़ना शुरू किया।”
कार्टून और कैरिकेचर —
- 1870 के दशक तक पत्र-पत्रिकाओं में सामाजिक-राजनीतिक विषयों पर टिप्पणी करते हुए कैरिकेचर और कार्टून छपने लगे थे।
- कुछ में शिक्षित भारतीयों के पश्चिमी पोशाक और पश्चिमी अभिरुचियों का मज़ाक उड़ाया गया।
- जबकि कुछ अन्य में सामाजिक परिवर्तन को लेकर एक डर देखा गया।
- साम्राज्यवादी व्यंग्यचित्रों में राष्ट्रवादियों का मज़ाक उड़ाया जाता था, तो राष्ट्रवादी भी साम्राज्यवादी सत्ता पर निशाना साधने में पीछे नहीं रहे।
दो महत्त्वपूर्ण चित्र —
| चित्र | विवरण |
|---|---|
| चित्र 17 (पृष्ठ 123) | राजा ऋतुध्वज द्वारा असुरों के चंगुल से राजकुमारी मदलसा को बचाया जाना — राजा रवि वर्मा का चित्र। राजा रवि वर्मा ने मिथकीय कहानियों को लेकर अनगिनत चित्र बनाए, जो उनके अपने रवि वर्मा प्रेस में छपती थीं। |
| चित्र 18 (पृष्ठ 124) | इंडियन शारिवारी का आवरण पृष्ठ। यह उन्नीसवीं सदी के अंत में प्रकाशित होने वाले व्यंग्य और विद्रूप (कैरिकेचर) विधा के कई पत्रों में से एक था। इसमें साम्राज्यवादी अंग्रेज़ की छवि ठीक बीचोबीच है; सत्ता और प्रभुता की प्रतिमूर्ति बना वह देसी लोगों को हिदायत दे रहा है। ऐसा लगता है जैसे ब्रिटिश मालिक कह रहा हो — ‘यही सही मॉडल है, जाओ जाकर इसके भारतीय संस्करण निकालो।’ |
8.3 महिलाएँ और मुद्रण (उपशीर्षक 8.1, पृष्ठ 124–125)
यह भाग बहुत महत्त्वपूर्ण है — यह अभ्यास प्रश्न 3-क का सीधा उत्तर है।
पहले सकारात्मक पक्ष —
- महिलाओं की ज़िंदगी और उनकी भावनाएँ बड़ी साफ़गोई और गहनता से लिखी जाने लगीं।
- इसलिए मध्यवर्गीय घरों में महिलाओं का पढ़ना भी पहले से बहुत ज़्यादा हो गया।
- उदारवादी पिता और पति अपने यहाँ औरतों को घर पर पढ़ाने लगे।
- और उन्नीसवीं सदी के मध्य में जब बड़े-छोटे शहरों में स्कूल बने तो उन्हें स्कूल भेजने लगे।
- कई पत्रिकाओं ने लेखिकाओं को जगह दी और उन्होंने नारी-शिक्षा की ज़रूरत को बार-बार रेखांकित किया।
- उनमें पाठ्यक्रम भी छपता था, और ज़रूरत के मुताबिक़ पाठ्य-सामग्री भी, जिसका इस्तेमाल घर बैठे स्कूली शिक्षा के लिए किया जा सकता था।
पर विरोध भी था — यह हिस्सा ज़रूर लिखिए —
| कौन | क्या मानता था |
|---|---|
| अनेक परंपरावादी हिंदू | पढ़ी-लिखी कन्याएँ विधवा हो जाती हैं। |
| दक़ियानूसी मुसलमान | उर्दू के रूमानी अफ़साने पढ़कर औरतें बिगड़ जाएँगी। |
पर बाग़ी औरतों ने यह मंज़ूर नहीं किया —
- कभी-कभार बाग़ी औरतों ने इन प्रतिबंधों को अस्वीकार भी किया।
- उत्तर भारत के एक दक़ियानूसी मुसलमान परिवार की एक ऐसी लड़की की कहानी हमें पता है, जिसने गुपचुप ढंग से न सिर्फ़ पढ़ना सीखा, बल्कि लिखा भी।
- उसके ख़ानदान वाले चाहते थे कि वह सिर्फ़ अरबी क़ुरान पढ़े, जो कि उसके पल्ले नहीं पड़ता था।
- लिहाज़ा उसने वह ज़बान पढ़ने की ज़िद की, जो उसकी अपनी थी।
राससुन्दरी देबी की कहानी — यह पूरी याद कीजिए —
| क्रम | तथ्य |
|---|---|
| 1 | पूर्वी बंगाल में, उन्नीसवीं सदी के प्रारंभ में, कट्टर रूढ़िवादी परिवार में ब्याही कन्या राससुन्दरी देबी ने रसोई में छिप-छिप कर पढ़ना सीखा। |
| 2 | बाद में चलकर उन्होंने आमार जीबोन नामक आत्मकथा लिखी। |
| 3 | जो 1876 में प्रकाशित हुई। |
| 4 | यह बंगाली भाषा में प्रकाशित पहली संपूर्ण आत्म-कहानी थी। |
यह कहानी कक्षा में ज़रूर सुनाइए। एक स्त्री ने रसोई में छिपकर पढ़ना सीखा, और वही स्त्री बंगाली की पहली संपूर्ण आत्मकथा की लेखिका बनी। इससे बच्चों को समझ आता है कि पढ़ना क्यों एक अधिकार है, सुविधा नहीं।
अन्य लेखिकाएँ और उनके विषय —
| लेखिका | कब / कहाँ | क्या लिखा |
|---|---|---|
| कैलाशबाशिनी देवी | 1860 के दशक से | महिलाओं के अनुभवों पर — कैसे वे घरों में बंदी और अनपढ़ बनाकर रखी जाती हैं, कैसे वे घर-भर के काम का बोझ उठाती हैं, और जिनकी सेवा वे करती हैं, वही उन्हें कैसे दुत्कारते हैं। |
| ताराबाई शिंदे और पंडिता रमाबाई | 1880 के दशक, महाराष्ट्र | उच्च जाति की नारियों की दयनीय हालत के बारे में जोश और रोष से लिखा। |
| एक तमिल उपन्यास की स्त्री-पात्र | — | “बहुतेरे कारणों से मेरी दुनिया छोटी है… मेरे जीवन की आधी से ज़्यादा ख़ुशियाँ किताबें पढ़ने से आई हैं…” |
भाषावार मुद्रण-संस्कृति का क्रम —
- उर्दू, तमिल, बंगाली और मराठी प्रिंट-संस्कृति पहले विकसित हो गई थी।
- पर गंभीर हिंदी छपाई की शुरुआत 1870 के दशक से ही हुई।
- जल्द ही इसका एक बड़ा हिस्सा नारी-शिक्षण को समर्पित हुआ।
- बीसवीं सदी के आरंभ में महिलाओं के लिए मुद्रित, और कभी-कभी उनके द्वारा संपादित पत्रिकाएँ लोकप्रिय हो गईं।
- इनमें औरतों की तालीम, विधवा-जीवन, विधवा-विवाह और राष्ट्रीय आंदोलन जैसे मसलों पर लेखनी चलाई गई।
- कुछ पत्रिकाओं ने महिलाओं को गृहस्थी चलाने और फ़ैशन के नुस्ख़े बताने के साथ-साथ कहानियों और धारावाहिक उपन्यासों के जरिए मनोरंजन परोसा।
पंजाब और बंगाल का उदाहरण —
| जगह | विवरण |
|---|---|
| पंजाब | बीसवीं सदी के आरंभ से ही लोकप्रिय लोक साहित्य बड़े पैमाने पर छापा गया। राम चड्ढा ने औरतों को आज्ञाकारी बीवियाँ बनने की सीख देने के उद्देश्य से अपनी बेस्ट-सेलिंग कृति स्त्री धर्म विचार लिखी। खालसा ट्रैक्ट सोसायटी (खालसा पुस्तिका सभा) ने इसी तरह के संदेश देते हुए सस्ती पुस्तिकाएँ छापीं। अच्छी औरत बनने के उपदेश को कई बार संवाद के रूप में पेश किया गया। |
| बंगाल | केंद्रीय कलकत्ता का एक पूरा इलाक़ा — बटाला — लोकप्रिय किताबों के प्रकाशन को समर्पित हो गया। यहाँ धार्मिक गुटकों और ग्रंथों के सस्ते संस्करण तो ख़रीद ही सकते थे, जो आमतौर पर अश्लील और सनसनीख़ेज़ समझा जाता था, वह भी उपलब्ध था। उन्नीसवीं सदी के अंत तक ऐसी बहुत सारी किताबों पर काठ की तख़्ती और लिथोग्राफ़ी रंगों की मदद से प्रचुर मात्रा में तसवीरें उकेरी जा रही थीं। फेरीवाले बटाला के प्रकाशन लेकर घर-घर घूमते थे, जिससे महिलाओं को फ़ुरसत के वक़्त मनपसंद किताबें पढ़ने में सहूलियत हो गई। |
ध्यान दीजिए — यह हिस्सा दोनों तरफ़ की बात कहता है। एक तरफ़ राससुन्दरी देबी जैसी औरतें अपनी बात लिख रही थीं; दूसरी तरफ़ स्त्री धर्म विचार जैसी किताबें औरतों को ‘आज्ञाकारी बीवी’ बनना सिखा रही थीं। यानी छपाई ने महिलाओं को आवाज़ भी दी और उन्हें बाँधने के नए तरीक़े भी दिए। यह संतुलन उत्तर में ज़रूर लिखिए — यही पूरे अंक दिलाता है।
8.4 स्रोत-ङ — बेगम रोकैया शेखावत हुसैन, 1926 (पृष्ठ 124)
- जानी-मानी शिक्षाविद और लेखिका बेगम रोकैया शेखावत हुसैन ने 1926 में, बंग महिला शिक्षा सम्मेलन को संबोधित करते हुए, धर्म के नाम पर महिलाओं को पढ़ने से रोकने के लिए पुरुषों की निंदा की —
“नारी-शिक्षा के विरोधी कहते हैं कि इससे महिलाएँ उद्दंड हो जाएँगी… छि:! ये ख़ुद को मुसलमान बताते हैं, और इस्लाम द्वारा औरतों को बराबरी की तालीम का हक़ देने के बुनियादी उसूल के ख़िलाफ़ जाते हैं। अगर पुरुष पढ़-लिखकर नहीं भटकते, तो महिलाएँ क्यों बिगड़ जाएँगी, भला?”
8.5 तीन काष्ठचित्र — चित्र 19, 20, 21 (पृष्ठ 125–126)
| चित्र | नाम | क्या कहता है |
|---|---|---|
| चित्र 19 | घोर कलि (प्रलयकाल), उन्नीसवीं सदी के अंत का रंगीन काष्ठचित्र | पारिवारिक संबंधों के नष्ट-भ्रष्ट होने की कल्पना। पत्नी, जैसा कि मुहावरे में कहा जाता है, पति के सिर पर सवार है। और वह ख़ुद अपनी माँ को ज़ंजीर पहनाकर जानवरों की तरह रखता है। |
| चित्र 20 | एक भारतीय दंपति, सफ़ेद-स्याह काष्ठचित्र | कलाकार का यह डर उजागर होता है कि पश्चिमी हमले से पारिवारिक व्यवस्था उलट-पुलट गई है। मर्द वीणा बजा रहा है, और औरत हुक़्क़ा खींच रही है। महिलाओं की शिक्षा की पहल के बाद पारंपरिक पारिवारिक भूमिकाओं के छिन्न-भिन्न हो जाने की आशंका तेज़ हो गई। |
| चित्र 21 | एक यूरोपीय दंपति, उन्नीसवीं सदी का काष्ठचित्र | इस तसवीर में पारंपरिक भूमिकाओं का निरूपण है। साहब शराब की बोतल थामे हैं, और मेमसाहब वायलिन बजा रही हैं। |
गतिविधि (पृष्ठ 126): “चित्र 19, 20 और 21 को ग़ौर से देखें — (क) समाज में हो रहे बदलाव को लेकर चित्रकार क्या कह रहा है? (ख) वे कौन से बदलाव हो रहे थे, कि चित्रकार ने ऐसी प्रतिक्रिया दी? (ग) क्या आप चित्रकार के मत से सहमत हैं?”
8.6 प्रिंट और ग़रीब जनता (उपशीर्षक 8.2, पृष्ठ 125–126)
यह अभ्यास प्रश्न 3-ख का सीधा उत्तर है।
सस्ती किताबें और पुस्तकालय —
- उन्नीसवीं सदी के मद्रासी शहरों में काफ़ी सस्ती किताबें चौक-चौराहों पर बेची जा रही थीं, जिसके चलते ग़रीब लोग भी बाज़ार से उन्हें ख़रीदने की स्थिति में आ गए थे।
- बीसवीं सदी के आरंभ से सार्वजनिक पुस्तकालय खुलने लगे थे, जिससे किताबों की पहुँच निस्संदेह बढ़ी।
- ये पुस्तकालय अकसर शहरों या क़स्बों में होते थे, या यदा-कदा संपन्न गाँवों में भी।
- स्थानीय अमीरों के लिए पुस्तकालय खोलना प्रतिष्ठा की बात थी।
जाति-विरोधी लेखन —
| लेखक | कृति / काल | क्या किया |
|---|---|---|
| ज्योतिबा फुले | गुलामगिरी (1871) | ‘निम्न-जातीय’ आंदोलनों के मराठी प्रणेता। उन्होंने जाति प्रथा के अत्याचारों पर लिखा। |
| भीमराव अंबेडकर | बीसवीं सदी, महाराष्ट्र | जाति पर ज़ोरदार क़लम चलाई और उनके लेखन पूरे भारत में पढ़े गए। |
| ई.वी. रामास्वामी नायकर (पेरियार) | बीसवीं सदी, मद्रास | जाति पर ज़ोरदार क़लम चलाई और उनके लेखन पूरे भारत में पढ़े गए। |
- स्थानीय विरोध आंदोलनों और संप्रदायों ने भी प्राचीन धर्मग्रंथों की आलोचना करते हुए, नए और न्यायपूर्ण समाज का सपना बुनने की मुहिम में लोकप्रिय पत्र-पत्रिकाएँ और गुटके छापे।
मज़दूरों का अपना लेखन — यह सबसे महत्त्वपूर्ण हिस्सा है —
| क्रम | तथ्य |
|---|---|
| 1 | कारख़ानों में मज़दूरों से बहुत ज़्यादा काम लिया जा रहा था, और उन्हें अपने तजुर्बों के बारे में ढंग से लिखने की शिक्षा तक नहीं मिली थी। |
| 2 | लेकिन कानपुर के मिल-मज़दूर काशीबाबा ने 1938 में छोटे और बड़े सवाल लिख और छाप कर जातीय तथा वर्गीय शोषण के बीच का रिश्ता समझाने की कोशिश की। |
| 3 | 1935 से 1955 के बीच सुदर्शन चक्र के नाम से लिखने वाले एक और मिल-मज़दूर का लेखन सच्ची कविताएँ नामक एक संग्रह में छापा गया। |
| 4 | बंगलौर के सूती-मिल-मज़दूरों ने ख़ुद को शिक्षित करने के लिए पुस्तकालय बनाए, जिसकी प्रेरणा उन्हें बंबई के मिल-मज़दूरों से मिली थी। |
| 5 | समाज-सुधारकों ने इन प्रयासों को संरक्षण दिया। |
इन प्रयासों की तीन कोशिशें —
“उनकी मूल कोशिश यह थी कि मज़दूरों के बीच नशाख़ोरी कम हो, साक्षरता आए, और उन तक राष्ट्रवाद का संदेश भी यथासंभव पहुँचे।”
यहाँ अध्याय 2 से जोड़िए। वहाँ आपने पढ़ा था कि राष्ट्रीय आंदोलन में मज़दूर शामिल हुए। यहाँ आप देख रहे हैं कि वह संदेश उन तक पहुँचा कैसे — छपे हुए पर्चों और पुस्तकालयों के ज़रिए।
चित्र 22 — लक्ष्मीनाथ बेज़बरुवा (1868–1938), पृष्ठ 126 —
- वे आधुनिक असमिया साहित्य के एक वरिष्ठ रचनाकार थे।
- बूढ़ी आइर साधु (दादी की कहानियाँ) उनकी उल्लेखनीय किताबों में से एक है।
- उन्होंने असम का लोकप्रिय गीत ‘ओ मोर अपुनर देश’ (ओ मेरी प्यारी भूमि) भी लिखा।
9. प्रिंट और प्रतिबंध (पाठ का भाग 9, पृष्ठ 127)
9.1 पहले कंपनी परेशान नहीं थी — और इसका मज़ेदार कारण
- ईस्ट इंडिया कंपनी के तहत 1798 से पहले का औपनिवेशिक शासन सेंसरशिप या पाबंदी लगाने के बारे में ज़्यादा परेशान नहीं था।
- मज़ेदार बात तो यह है कि मुद्रित सामग्री को नियंत्रित करने के इसके शुरुआती क़दम कंपनी के कुप्रशासन की आलोचना करने वाले और कंपनी के हुक्मरानों के काम को कोसने वाले अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ उठे।
- कंपनी को इस बात की चिंता थी कि इन आलोचनाओं का लाभ उठाकर इंग्लैंड में बैठे इनके निंदक कहीं भारत पर इनके व्यापारिक एकाधिकार पर हमला न बोल दें।
यह बात बच्चों को चौंकाती है — पहली सेंसरशिप भारतीयों पर नहीं, अंग्रेज़ों पर लगी थी। इसे कक्षा में ज़रूर पूछिए।
9.2 1820 से 1857 तक — नरमी का दौर
| समय | घटना |
|---|---|
| 1820 के दशक तक | कलकत्ता सर्वोच्च न्यायालय ने प्रेस की आज़ादी को नियंत्रित करने वाले कुछ क़ानून पास किए, और कंपनी ने ब्रितानी शासन का उत्सव मनाने वाले अख़बारों के प्रकाशन को प्रोत्साहन देना चालू कर दिया। |
| 1835 | अंग्रेज़ी और देसी भाषाओं के अख़बार-संपादकों द्वारा गुहार और अर्ज़ी लगाने के बाद गवर्नर जनरल बेंटिंक प्रेस क़ानून की पुनर्समीक्षा करने के लिए राज़ी हो गया। |
| 1835 के बाद | फिर उदारवादी औपनिवेशिक अफ़सर टॉमस मेकॉले ने पहले की आज़ादियों को बहाल करते हुए नए क़ानून बनाए। |
9.3 1857 के बाद — सख़्ती का दौर और वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट
यह अभ्यास प्रश्न 2-ग है। पूरा क्रम याद कीजिए —
| क्रम | घटना |
|---|---|
| 1 | 1857 के विद्रोह के बाद प्रेस की स्वतंत्रता के प्रति रवैया बदल गया। |
| 2 | क्रुद्ध अंग्रेज़ों ने ‘देसी’ प्रेस का मुँह बंद करने की माँग की। |
| 3 | ज्यों-ज्यों भाषाई समाचार पत्र राष्ट्रवाद से समर्थन में मुखर होते गए, त्यों-त्यों औपनिवेशिक सरकार में कड़े नियंत्रण के प्रस्ताव पर बहस तेज़ होने लगी। |
| 4 | आइरिश प्रेस क़ानून के तर्ज पर 1878 में वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट लागू कर दिया गया। |
इस क़ानून ने सरकार को क्या-क्या अधिकार दिए —
- इससे सरकार को भाषाई प्रेस में छपी रपट और संपादकीय को सेंसर करने का व्यापक हक़ मिल गया।
- अब से सरकार ने विभिन्न प्रदेशों में छपने वाले भाषाई अख़बारों पर नियमित नज़र रखनी शुरू कर दी।
- अगर किसी रपट को बाग़ी क़रार दिया जाता था तो अख़बार को पहले चेतावनी दी जाती थी।
- और अगर चेतावनी की अनसुनी हुई तो अख़बार को ज़ब्त किया जा सकता था और छपाई की मशीनें छीन ली जा सकती थीं।
9.4 पर दमन से अख़बार रुके नहीं — तिलक का उदाहरण
- लेकिन दमन की नीति के बावजूद राष्ट्रवादी अख़बार देश के हर कोने में बढ़ते-फैलते गए।
- उन्होंने औपनिवेशिक कुशासन की रिपोर्टिंग और राष्ट्रवादी ताक़तों की हौसला-अफ़ज़ाई जारी रखी।
- राष्ट्रवादी आलोचना को खामोश करने की तमाम कोशिशों का उग्र विरोध हुआ।
बालगंगाधर तिलक की घटना — क्रम से —
| क्रम | घटना |
|---|---|
| 1 | जब पंजाब के क्रांतिकारियों को 1907 में कालापानी भेजा गया… |
| 2 | …तो बालगंगाधर तिलक ने अपने केसरी में उनके प्रति गहरी हमदर्दी जताई। |
| 3 | नतीजे के तौर पर उन्हें 1908 में क़ैद कर लिया गया। |
| 4 | जिसके परिणामस्वरूप भारत-भर में व्यापक विरोध हुए। |
9.5 बॉक्स 4 — वफ़ादार संपादक ढूँढ़ना मुश्किल था (पृष्ठ 127)
- कभी-कभी वफ़ादार अख़बारों के संपादक खोजना सरकार के लिए मुश्किल हो जाता था।
- जब 1877 में स्थापित अख़बार स्टेट्समैन के संपादक-पद के लिए सैंडर्स को बुलाया गया तो उसने पूछा कि आज़ादी खोने के बदले उसे कितने पैसे मिलेंगे।
- द फ़्रेंड ऑफ़ इंडिया ने सरकारी मदद लेने से इसलिए इनकार कर दिया कि इससे उसे सरकारी आदेश मानने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।
9.6 बॉक्स 5 — युद्धकाल में प्रेस पर दमन (पृष्ठ 127)
“मुद्रित शब्द की ताक़त का अंदाज़ा अकसर सरकार द्वारा उसको नियंत्रित करने की कोशिशों से मिलता है। औपनिवेशिक प्रशासन हमेशा तमाम किताबों और पत्र-पत्रिकाओं पर नज़र रखता था।”
| काल | दमन |
|---|---|
| पहले विश्वयुद्ध के दौरान | भारतीय रक्षा नियम के तहत 22 अख़बारों को ज़मानत देनी पड़ी थी। इनमें से 18 ने सरकारी आदेश मानने की जगह ख़ुद को बंद कर देना उचित समझा। |
| 1919 | रॉलट के अधीन कार्यरत षड्यंत्र समिति ने विभिन्न अख़बारों के ख़िलाफ़ जुर्माना आदि कार्रवाइयों को और सख़्त बना दिया। |
| द्वितीय विश्वयुद्ध की शुरुआत पर | भारतीय रक्षा अधिनियम पारित किया गया, ताकि युद्ध-संबंधी विषयों को सेंसर किया जा सके। भारत छोड़ो आंदोलन से जुड़ी तमाम रपटें इसी के तहत सेंसर होती थीं। |
| अगस्त 1942 | तक़रीबन 90 अख़बारों का दमन किया गया। |
9.7 स्रोत-च — गांधी, 1922 (पृष्ठ 127)
गांधी ने 1922 में कहा —
“वाणी की स्वतंत्रता…. प्रेस की आज़ादी…. सामूहिकता की आज़ादी। भारत सरकार अब जनमत को व्यक्त करने और बनाने के इन तीन ताक़तवर औज़ारों को दबाने की कोशिश कर रही है। स्वराज, ख़िलाफ़त… की लड़ाई, सबसे पहले तो इन संकटग्रस्त आज़ादियों की लड़ाई है।”
यह अभ्यास प्रश्न 1-घ का सीधा उत्तर है। गांधी ने ऐसा इसलिए कहा क्योंकि उनका मानना था कि अगर वाणी, प्रेस और सभा की आज़ादी नहीं है तो स्वराज की माँग रखने का कोई साधन ही नहीं बचता। इसलिए स्वराज की लड़ाई सबसे पहले इन तीन आज़ादियों की लड़ाई है।
10. पूरे अध्याय की एक तालिका (आख़िरी दिन के लिए)
| भाग | कहाँ | मुख्य बात एक वाक्य में |
|---|---|---|
| 1 | चीन, जापान, कोरिया | छपाई पूर्वी एशिया में जन्मी — 594 ई. से चीन में, 868 ई. डायमंड सूत्र, 80,000 ब्लॉक का त्रिपीटका कोरियाना, धातु-टाइप वाली जिक्जी। |
| 2 | यूरोप | मार्को पोलो 1295 में तकनीक लाया; गुटेन्बर्ग ने 1448 में प्रेस बनाई; 1450–1550 में छापेख़ाने पूरे यूरोप में फैले। |
| 3 | यूरोप | नया पाठक वर्ग बना; लूथर ने छपाई को ईश्वर का तोहफ़ा कहा; चर्च ने 1558 से प्रतिबंधित किताबों की सूची रखी; मेनोकियो को मौत की सज़ा हुई। |
| 4 | यूरोप, ख़ासकर फ़्रांस | साक्षरता 60–80% तक पहुँची; सस्ती किताबें आईं; मुद्रण ने फ़्रांसीसी क्रांति की ज़मीन तैयार करने में मदद की — पर सीधे नहीं। |
| 5 | यूरोप | बच्चे, महिलाएँ और मज़दूर नए पाठक बने; प्रेस धातु का हुआ, 8000 शीट प्रति घंटा; सस्ते पेपरबैक आए। |
| 6 | भारत | पांडुलिपियों का देश; प्रेस 16वीं सदी में गोवा आई; 1780 में हिक्की का बंगाल गजट। |
| 7 | भारत | धार्मिक बहसें प्रिंट में आईं — संवाद कौमुदी बनाम समाचार चंद्रिका, देवबंद के फ़तवे, रामचरितमानस 1810। |
| 8 | भारत | उपन्यास, रवि वर्मा की तसवीरें, कार्टून; राससुन्दरी देबी 1876; फुले की गुलामगिरी 1871; काशीबाबा 1938। |
| 9 | भारत | 1878 वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट; तिलक 1908 में क़ैद; अगस्त 1942 में 90 अख़बारों का दमन। |
11. अभ्यास प्रश्नों के संकेत (पाठ्यपुस्तक पृष्ठ 128)
संक्षेप में लिखें
प्रश्न 1. निम्नलिखित के कारण दें —
| उपप्रश्न | उत्तर का मुख्य बिंदु | कहाँ पढ़ें |
|---|---|---|
| (क) वुडब्लॉक प्रिंट या तख़्ती की छपाई यूरोप में 1295 के बाद आई। | क्योंकि 1295 ई. में मार्को पोलो चीन में कई साल बिताने के बाद इटली लौटा और अपने साथ वुडब्लॉक छपाई का ज्ञान लेकर आया। इससे पहले यूरोप को यह तकनीक मालूम नहीं थी। | भाग 2.2 |
| (ख) मार्टिन लूथर मुद्रण के पक्ष में था और उसने इसकी खुलेआम प्रशंसा की। | क्योंकि छपाई की मदद से ही उसकी पिच्चानवे स्थापनाएँ बड़ी तादाद में लोगों तक पहुँचीं, चर्च में विभाजन हुआ और प्रोटेस्टेंट धर्मसुधार शुरू हुआ। उसके अनुवाद की 5000 प्रतियाँ कुछ हफ़्तों में बिक गईं। इसलिए उसने कहा कि “मुद्रण ईश्वर की दी हुई महानतम देन है।” | भाग 3.5 |
| (ग) रोमन कैथलिक चर्च ने सोलहवीं सदी के मध्य से प्रतिबंधित किताबों की सूची रखनी शुरू कर दी। | क्योंकि छपी किताबों के कारण मेनोकियो जैसे साधारण लोग धर्मग्रंथों की अपनी व्याख्याएँ करने लगे थे। इससे चर्च की सत्ता को ख़तरा हुआ, इसलिए उसने इन्क्वीज़ीशन शुरू किया और 1558 से प्रतिबंधित किताबों की सूची रखने लगा। | भाग 3.6 |
| (घ) महात्मा गांधी ने कहा कि स्वराज की लड़ाई दरअसल अभिव्यक्ति, प्रेस, और सामूहिकता के लिए लड़ाई है। | क्योंकि गांधी मानते थे कि ये तीनों जनमत को व्यक्त करने और बनाने के सबसे ताक़तवर औज़ार हैं। अगर सरकार इन्हें दबा देगी तो स्वराज की माँग रखने का साधन ही नहीं बचेगा। | भाग 9.7 |
प्रश्न 2. छोटी टिप्पणी में इनके बारे में बताएँ —
| उपप्रश्न | किन बिंदुओं पर लिखें |
|---|---|
| (क) गुटेन्बर्ग प्रेस | गुटेन्बर्ग का बचपन और जैतून प्रेस · साँचे से धातुई अक्षर · 1448 तक यंत्र तैयार · पहली किताब बाइबिल, 180 प्रतियाँ, तीन साल · प्लाटेन और स्क्रू · 26 रोमन अक्षरों के मूवेबल टाइप · 250 पन्ने प्रति घंटा · 300 साल तक बुनियादी तकनीक। |
| (ख) छपी किताब को लेकर इरैस्मस के विचार | लातिन के विद्वान और कैथलिक धर्मसुधारक · एडेजेज़ (1508) · किताबें भिनभिनाती मक्खियों की तरह · ज़्यादातर हिस्सा विद्वता के लिए हानिकारक · बकवास, सनसनीख़ेज़, धर्मविरोधी किताबें छपती हैं · मूल्यवान साहित्य का मूल्य ही नहीं रह जाता। |
| (ग) वर्नाक्युलर या देसी प्रेस एक्ट | 1857 के विद्रोह के बाद रवैया बदला · आइरिश प्रेस क़ानून के तर्ज पर 1878 में लागू · भाषाई प्रेस की रपट और संपादकीय सेंसर करने का व्यापक हक़ · बाग़ी रपट पर पहले चेतावनी, फिर अख़बार ज़ब्त और मशीनें छीन ली जाती थीं · फिर भी राष्ट्रवादी अख़बार फैलते गए · तिलक की क़ैद 1908। |
प्रश्न 3. उन्नीसवीं सदी में भारत में मुद्रण-संस्कृति के प्रसार का इनके लिए क्या मतलब था —
| उपप्रश्न | उत्तर के मुख्य बिंदु |
|---|---|
| (क) महिलाएँ | मध्यवर्गीय घरों में पढ़ना बढ़ा · उदारवादी पिता-पति ने घर पर पढ़ाया, फिर स्कूल भेजा · पत्रिकाओं ने लेखिकाओं को जगह दी · राससुन्दरी देबी की आमार जीबोन (1876) · कैलाशबाशिनी देवी, ताराबाई शिंदे, पंडिता रमाबाई · पर विरोध भी हुआ — परंपरावादियों ने रोका, और स्त्री धर्म विचार जैसी किताबें आज्ञाकारिता सिखाती थीं। |
| (ख) ग़रीब जनता | मद्रासी शहरों में सस्ती किताबें चौराहों पर · बीसवीं सदी से सार्वजनिक पुस्तकालय · फुले की गुलामगिरी (1871), अंबेडकर और पेरियार का लेखन · काशीबाबा की छोटे और बड़े सवाल (1938) · सुदर्शन चक्र की सच्ची कविताएँ · बंगलौर के मिल-मज़दूरों के पुस्तकालय। |
| (ग) सुधारक | बहसें प्रिंट में आईं · राममोहन राय की संवाद कौमुदी (1821) बनाम समाचार चंद्रिका · उलमा के फ़तवे और देवबंद · रामचरितमानस का पहला मुद्रित संस्करण (1810) · आम बोलचाल की भाषा में छपाई से व्यापक जन-समुदाय बहस में शामिल हुआ। |
चर्चा करें (पृष्ठ 128)
| प्रश्न | संकेत |
|---|---|
| 1. अठारहवीं सदी के यूरोप में कुछ लोगों को क्यों ऐसा लगता था कि मुद्रण संस्कृति से निरंकुशवाद का अंत, और ज्ञानोदय होगा? | मर्सिए के दोनों कथन · ज्ञानोदय के चिंतकों का प्रसार · वाद-विवाद की नयी संस्कृति · राजशाही का मज़ाक उड़ाने वाला साहित्य · भाग 4.4 और 4.6। |
| 2. कुछ लोग किताबों की सुलभता को लेकर चिंतित क्यों थे? यूरोप और भारत से एक-एक उदाहरण लेकर समझाएँ। | यूरोप — इरैस्मस और मेनोकियो की सज़ा; भारत — रूढ़िवादी परिवारों का महिलाओं को पढ़ने से रोकना, और औपनिवेशिक सरकार का वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट। |
| 3. उन्नीसवीं सदी में भारत में ग़रीब जनता पर मुद्रण संस्कृति का क्या असर हुआ? | भाग 8.6 पूरा। |
| 4. मुद्रण संस्कृति ने भारत में राष्ट्रवाद के विकास में क्या मदद की? | राष्ट्रवादी अख़बारों ने कुशासन की रिपोर्टिंग की · तिलक का केसरी · गांधी का 1922 का कथन · मज़दूरों तक राष्ट्रवाद का संदेश · दमन के बावजूद अख़बार फैलते गए। |
परियोजना कार्य (पृष्ठ 128)
“पिछले सौ सालों में मुद्रण संस्कृति में हुए अन्य बदलावों का पता लगाएँ। फिर इनके बारे में यह बताते हुए लिखें कि ये क्यों हुए और इनके कौन से नतीजे हुए?”
इस पर विस्तृत सुझाव फ़ाइल 07 (NCERT से आगे) में दिए गए हैं।
12. महत्त्वपूर्ण व्यक्ति — एक नज़र में
| नाम | कौन थे | क्यों याद रखें |
|---|---|---|
| मार्को पोलो | इटली का यात्री | 1295 में चीन से वुडब्लॉक छपाई का ज्ञान लेकर यूरोप लौटा। |
| योहान गुटेन्बर्ग | जर्मनी का आविष्कारक | 1448 तक प्रिंटिंग प्रेस बनाई; पहली किताब बाइबिल छापी। |
| मार्टिन लूथर | जर्मन धर्म-सुधारक | पिच्चानवे स्थापनाएँ; प्रोटेस्टेंट धर्मसुधार; “मुद्रण ईश्वर की महानतम देन है।” |
| इरैस्मस | लातिन के विद्वान, कैथलिक धर्मसुधारक | छपी किताबों से डरते थे; एडेजेज़ (1508)। |
| मेनोकियो | सोलहवीं सदी का इतालवी किसान | किताबें पढ़कर बाइबिल की अपनी व्याख्या की; इन्क्वीज़ीशन ने मौत की सज़ा दी। |
| लुई सेबेस्तिएँ मर्सिए | अठारहवीं सदी के फ़्रांस का उपन्यासकार | “हे निरंकुशवादी शासकों, अब तुम्हारे काँपने का वक़्त आ गया है!” |
| ग्रिम बंधु | जर्मनी के संग्रहकर्ता | लोक-कथाएँ जमा कीं; 1812 में संकलन छपा। |
| रिचर्ड एम. हो. | न्यूयॉर्क का आविष्कारक | शक्ति चालित बेलनाकार प्रेस — 8000 शीट प्रति घंटा। |
| कितागावा उतामारो | जापानी चित्रकार (जन्म 1753, एदो) | उकियो शैली; मोने और वान गॉग को प्रभावित किया। |
| जेम्स ऑगस्टस हिक्की | अंग्रेज़ संपादक | 1780 से बंगाल गजट; वॉरेन हेस्टिंग्स ने मुक़दमा किया। |
| गंगाधर भट्टाचार्य | राममोहन राय के क़रीबी | भारतीयों द्वारा निकाला गया पहला अख़बार — बंगाल गजट। |
| राजा राममोहन राय | समाज-सुधारक | 1821 से संवाद कौमुदी। |
| तुलसीदास | सोलहवीं सदी के कवि | रामचरितमानस; पहला मुद्रित संस्करण 1810, कलकत्ता। |
| राजा रवि वर्मा | चित्रकार | आम खपत के लिए तसवीरें; अपना रवि वर्मा प्रेस। |
| राससुन्दरी देबी | बंगाली लेखिका | आमार जीबोन (1876) — बंगाली की पहली संपूर्ण आत्मकथा। |
| कैलाशबाशिनी देवी | बंगाली लेखिका | 1860 के दशक से महिलाओं के अनुभवों पर लिखा। |
| ताराबाई शिंदे, पंडिता रमाबाई | महाराष्ट्र की लेखिकाएँ | 1880 के दशक में उच्च जाति की नारियों की दशा पर लिखा। |
| बेगम रोकैया शेखावत हुसैन | शिक्षाविद और लेखिका | 1926 में बंग महिला शिक्षा सम्मेलन में नारी-शिक्षा के विरोधियों की निंदा की। |
| राम चड्ढा | पंजाब के लेखक | स्त्री धर्म विचार — औरतों को आज्ञाकारी बनने की सीख। |
| ज्योतिबा फुले | समाज-सुधारक | गुलामगिरी (1871) — जाति प्रथा के अत्याचारों पर। |
| भीमराव अंबेडकर, ई.वी. रामास्वामी नायकर | समाज-सुधारक | जाति पर ज़ोरदार लेखन, पूरे भारत में पढ़े गए। |
| काशीबाबा | कानपुर का मिल-मज़दूर | छोटे और बड़े सवाल (1938) — जाति और वर्ग का रिश्ता। |
| लक्ष्मीनाथ बेज़बरुवा | असमिया साहित्यकार (1868–1938) | बूढ़ी आइर साधु; गीत ‘ओ मोर अपुनर देश’। |
| बालगंगाधर तिलक | राष्ट्रवादी नेता | केसरी; 1908 में क़ैद। |
| मैक्सिम गोर्की | रूसी क्रांतिकारी लेखक | मेरा बचपन, मेरे विश्वविद्यालय। |
| टॉमस मेकॉले | औपनिवेशिक अफ़सर | 1835 के बाद प्रेस की पुरानी आज़ादियाँ बहाल कीं। |
13. कठिन शब्द और उनके अर्थ (शब्दावली)
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| ख़ुशनवीसी | सुलेखन (Calligraphy) — हाथ से बहुत सुंदर और कलात्मक लिखाई करने की कला। |
| वेलम (Vellum) | चर्म-पत्र या जानवरों के चमड़े से बनी लेखन की सतह। |
| प्लाटेन | लेटरप्रेस छपाई में एक बोर्ड, जिसे काग़ज़ के पीछे दबाकर टाइप की छाप ली जाती थी। पहले यह बोर्ड काठ का होता था, बाद में इस्पात का बनने लगा। |
| कम्पोज़ीटर | छपाई के लिए इबारत कम्पोज़ करने वाला व्यक्ति। |
| गैली | धातुई फ़्रेम, जिसमें टाइप बिछाकर इबारत बनाई जाती थी। |
| गाथा-गीत (Ballad) | लोकगीत का ऐतिहासिक आख्यान, जिसे गाया और सुनाया जाता है। |
| शराबघर (Tavern) | वह जगह जहाँ लोग शराब पीने, खाने, दोस्तों से मिलने और बात-विचार के लिए आते थे। |
| प्रोटेस्टेंट धर्मसुधार | सोलहवीं सदी यूरोप में रोमन कैथलिक चर्च में सुधार का आंदोलन। मार्टिन लूथर प्रोटेस्टेंट सुधारकों में से एक थे। इस आंदोलन से कैथलिक ईसाई मत के विरोध में कई धाराएँ निकलीं। |
| इन्क्वीज़ीशन (धर्म-अदालत) | विधर्मियों की शिनाख़्त करने और सज़ा देने वाली रोमन कैथलिक संस्था। |
| धर्म-विरोधी | इनसान या विचार जो चर्च की मान्यताओं से असहमत हो। मध्यकाल में चर्च विधर्मियों या धर्म-द्रोह के प्रति सख़्त था; उसे लगता था कि लोगों की आस्था, उनके विश्वास पर सिर्फ़ उसका अधिकार है, और उसकी बात ही अंतिम है। |
| संप्रदाय | किसी धर्म का एक उप-समूह। |
| पंचांग | चाँद, सूरज की गति, ज्वार-भाटा के समय और लोगों के दैनिक जीवन से जुड़ी कई अहम जानकारियाँ देता वार्षिक प्रकाशन। |
| चैपबुक (गुटका) | पॉकेट बुक के आकार की किताबों के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द। इन्हें आमतौर पर फेरीवाले बेचते थे। ये सोलहवीं सदी की मुद्रण क्रांति के समय से लोकप्रिय हुए। |
| निरंकुशवाद | राजकाज की ऐसी व्यवस्था, जिसमें किसी एक व्यक्ति को संपूर्ण शक्ति प्राप्त हो, और उस पर न क़ानूनी पाबंदी लगी हो, न ही संवैधानिक। |
| उलमा | इस्लामी क़ानून और शरिया के विद्वान। |
| फ़तवा | अनिश्चय या असमंजस की स्थिति में, इस्लामी क़ानून जानने वाले विद्वान, सामान्यत: मुफ़्ती, के द्वारा की जानेवाली वैधानिक घोषणा। |
| आदि / प्रोटो | किसी चीज़ की पहली या प्रारंभिक अवस्था का संकेत (यह शब्द आपने अध्याय 4 में पढ़ा था)। |
| मूवेबल टाइप | चलअक्षर — धातु के अलग-अलग अक्षर, जिन्हें हटा-बदलकर कोई भी शब्द बनाया जा सके। |
| लिथोग्राफ़ी | पत्थर या धातु की समतल सतह पर छपाई की तकनीक, जो भारत में सस्ती और लोकप्रिय हुई। |
| सेंसरशिप | सरकार द्वारा छपने से पहले या बाद में सामग्री की जाँच और काट-छाँट। |
| कैरिकेचर | व्यंग्य-चित्र — किसी की विशेषताओं को बढ़ा-चढ़ाकर मज़ाकिया ढंग से बनाया गया चित्र। |
| वुडकट / काष्ठचित्र | काठ की तख़्ती पर उकेरकर बनाई गई छपी तसवीर। |
| सर्कुलेशन | चलन, गश्त — किसी किताब या पत्र का लोगों के बीच घूमना। |
14. महत्त्वपूर्ण तिथियाँ और आँकड़े — एक नज़र में
14.1 तिथियाँ
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 594 ई. | चीन में काठ के ब्लॉक से किताबें छपनी शुरू। |
| 768–770 ई. | चीनी बौद्ध प्रचारक छपाई की तकनीक लेकर जापान आए। |
| 868 ई. | जापान की सबसे पुरानी छपी पुस्तक — डायमंड सूत्र। |
| 11वीं सदी | चीनी काग़ज़ रेशम मार्ग से यूरोप पहुँचा। |
| 13वीं सदी का मध्य | त्रिपीटका कोरियाना — लगभग 80,000 वुडब्लॉक। |
| 1295 | मार्को पोलो चीन से इटली लौटा। |
| 14वीं सदी का अंत | कोरिया की जिक्जी — धातुई चलअक्षर से मुद्रित। |
| 15वीं सदी की शुरुआत | यूरोप में बड़े पैमाने पर तख़्ती की छपाई। |
| 1430 का दशक | गुटेन्बर्ग ने छपाई की नयी तकनीक पर काम शुरू किया। |
| 1448 | गुटेन्बर्ग ने अपना यंत्र मुकम्मल किया। |
| 1450–1550 | यूरोप के ज़्यादातर देशों में छापेख़ाने खुले। |
| 1508 | इरैस्मस की एडेजेज़। |
| 1558 | रोमन कैथलिक चर्च ने प्रतिबंधित किताबों की सूची रखनी शुरू की। |
| 16वीं सदी का मध्य | प्रिंटिंग प्रेस गोवा पहुँची। |
| 1579 | कोचीन में पहली तमिल किताब छपी। |
| 1674 | कोंकणी और कन्नड़ में लगभग 50 किताबें छप चुकी थीं। |
| 1713 | पहली मलयालम किताब छपी। |
| 1768 | विलियम बोल्ट्स की सूचना कलकत्ता में टाँगी गई। |
| 1780 | जेम्स ऑगस्टस हिक्की का बंगाल गजट शुरू। |
| 1791 | जेम्स लॉकिंग्टन की डायरी। |
| 1798 | इससे पहले तक कंपनी सेंसरशिप को लेकर परेशान नहीं थी। |
| 1810 | तुलसीदास के रामचरितमानस का पहला मुद्रित संस्करण, कलकत्ता। |
| 1812 | ग्रिम बंधुओं का लोक-कथा संकलन। |
| 1820 का दशक | कलकत्ता सर्वोच्च न्यायालय ने प्रेस पर कुछ क़ानून पास किए। |
| 1821 | राममोहन राय ने संवाद कौमुदी शुरू किया। |
| 1822 | फ़ारसी अख़बार जाम-ए-जहाँ नामा और शम्सुल अख़बार ! (पाठ्यपुस्तक में यह 1882 छपा है — छपाई की भूल)। |
| 1832–1850 | इंग्लैंड में पेनी मैगज़ीन का प्रकाशन। |
| 1835 | बेंटिंक प्रेस क़ानून की समीक्षा को राज़ी; मेकॉले ने नए क़ानून बनाए। |
| 1849 (6 जनवरी) | बॉम्बे टेलीग्राफ़ एंड कोरियर का उद्धरण (स्रोत-घ)। |
| 1857 | विद्रोह के बाद प्रेस के प्रति रवैया बदला। |
| 1857 | फ़्रांस में सिर्फ़ बाल-पुस्तकों के लिए प्रेस स्थापित। |
| 1860 का दशक | कैलाशबाशिनी देवी ने लिखना शुरू किया। |
| 1867 | देवबंद सेमिनरी की स्थापना। |
| 1870 (3 अप्रैल) | नेटिव ओपिनियन का उद्धरण (स्रोत-घ)। |
| 1870 का दशक | गंभीर हिंदी छपाई की शुरुआत; कार्टून और कैरिकेचर छपने लगे। |
| 1871 | ज्योतिबा फुले की गुलामगिरी। |
| 1874 | अल्फ़्रेड कॉन्कानेन का लिथोग्राफ़ (चित्र 13)। |
| 1876 | राससुन्दरी देबी की आमार जीबोन। |
| 1877 | स्टेट्समैन की स्थापना (बॉक्स 4)। |
| 1878 | वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट। |
| 1880 का दशक | ताराबाई शिंदे और पंडिता रमाबाई का लेखन। |
| 1907 | पंजाब के क्रांतिकारियों को कालापानी भेजा गया। |
| 1908 | बालगंगाधर तिलक क़ैद। |
| 1919 | रॉलट के अधीन षड्यंत्र समिति ने अख़बारों पर कार्रवाई सख़्त की। |
| 1920 का दशक | इंग्लैंड में शिलिंग शृंखला। |
| 1922 | गांधी का प्रेस-स्वतंत्रता पर कथन। |
| 1926 | बेगम रोकैया शेखावत हुसैन का भाषण। |
| 1930 | आर्थिक मंदी → सस्ते पेपरबैक। |
| 1935–1955 | सुदर्शन चक्र का लेखन → सच्ची कविताएँ। |
| 1938 | काशीबाबा की छोटे और बड़े सवाल। |
| अगस्त 1942 | तक़रीबन 90 अख़बारों का दमन। |
| 2001 | जिक्जी यूनेस्को मेमोरी ऑफ़ द वर्ल्ड रजिस्टर में अंकित। |
| 2007 | त्रिपीटका कोरियाना यूनेस्को मेमोरी ऑफ़ द वर्ल्ड रजिस्टर में अंकित। |
14.2 आँकड़े
| आँकड़ा | किससे जुड़ा |
|---|---|
| 80,000 | त्रिपीटका कोरियाना के वुडब्लॉक। |
| लगभग 150 | जिक्जी में उल्लिखित बौद्ध भिक्षु। |
| 50 | एक पुस्तक-विक्रेता के यहाँ काम करने वाले कातिब। |
| 180 प्रतियाँ, 3 साल | गुटेन्बर्ग की पहली बाइबिल। |
| 50 | उन 180 प्रतियों में से आज बची हुई प्रतियाँ। |
| 26 | रोमन वर्णमाला के अक्षर, जिनके गुटेन्बर्ग ने टाइप बनाए। |
| 250 पन्ने प्रति घंटा | गुटेन्बर्ग प्रेस की गति (एक साइड)। |
| 300 साल | मूवेबल टाइप छपाई की बुनियादी तकनीक बनी रही। |
| 2 करोड़ | पंद्रहवीं सदी के दूसरे हिस्से में यूरोप के बाज़ार में आईं किताबें। |
| 20 करोड़ | सोलहवीं सदी में यह संख्या। |
| 5000 प्रतियाँ | लूथर के न्यू टेस्टामेंट अनुवाद की — कुछ ही हफ़्तों में बिकीं। |
| 60–80 प्रतिशत | अठारहवीं सदी के अंत तक यूरोप के कुछ हिस्सों में साक्षरता दर। |
| 8000 शीट प्रति घंटा | रिचर्ड एम. हो. का शक्ति चालित बेलनाकार प्रेस। |
| छह रंग | उन्नीसवीं सदी के अंत के ऑफ़सेट प्रेस की क्षमता। |
| लगभग 50 किताबें | 1674 तक कोंकणी और कन्नड़ में छपीं। |
| 32 | डच प्रोटेस्टेंट धर्म-प्रचारकों द्वारा छापी गई तमिल किताबें। |
| 22 और 18 | पहले विश्वयुद्ध में ज़मानत देने वाले अख़बार; उनमें से बंद हो जाने वाले। |
| लगभग 90 | अगस्त 1942 में दमन झेलने वाले अख़बार। |
15. शिक्षक-संदर्भ: ‘चर्चा करें’ और ‘गतिविधि’ के सभी प्रॉम्प्ट
| पृष्ठ | प्रकार | प्रॉम्प्ट |
|---|---|---|
| 108 | गतिविधि | “कल्पना कीजिए आप मार्को पोलो हैं। चीन में आपने प्रिंट का कैसा संसार देखा, यह बताते हुए एक चिट्ठी लिखें।” |
| 111 | गतिविधि | “मान लीजिए आप नव-मुद्रित सस्ती किताबों का इश्तेहार देना चाहते हैं। अपनी दुकान के बाहर लगाने के लिए एक पोस्टर बनाएँ।” |
| 113 | चर्चा करें | “छपाई से विरोधी विचारों के प्रसार को किस तरह बल मिलता था? संक्षेप में लिखें।” |
| 116 | गतिविधि | “मान लीजिए कि आप क्रांति-पूर्व फ़्रांस में एक कार्टूनिस्ट या व्यंग्य-चित्रकार हैं। किसी परचे के लिए एक कार्टून बनाएँ।” |
| 116 | चर्चा करें | “कुछ इतिहासकार ऐसा क्यों मानते हैं कि मुद्रण संस्कृति ने फ़्रांसीसी क्रांति के लिए ज़मीन तैयार की?” |
| 118 | गतिविधि | “चित्र 13 को देखें। ऐसे विज्ञापनों का लोगों के मन पर क्या असर पड़ता होगा? क्या आपको लगता है कि छपी हुई चीज़ को देखकर हर व्यक्ति की एक-जैसी प्रतिक्रिया होती है?” |
| 126 | गतिविधि | “चित्र 19, 20 और 21 को ग़ौर से देखें — समाज में हो रहे बदलाव को लेकर चित्रकार क्या कह रहा है? वे कौन से बदलाव हो रहे थे, कि चित्रकार ने ऐसी प्रतिक्रिया दी? क्या आप चित्रकार के मत से सहमत हैं?” |
अंतिम बात। इस अध्याय को तिथियों की सूची मत बनाइए। इसे एक बहस की तरह पढ़िए — क्या छपाई अच्छी थी या ख़तरनाक? लूथर कहते हैं अच्छी, इरैस्मस कहते हैं ख़तरनाक, चर्च ने सूची बनाई, अंग्रेज़ सरकार ने क़ानून बनाया, और राससुन्दरी देबी ने रसोई में छिपकर पढ़ना सीखा। हर पक्ष का अपना कारण था — और इतिहास पढ़ने का मतलब यही है कि हम हर पक्ष का कारण समझें।