पुस्तक: भारत और समकालीन विश्व–2 (कक्षा 10, NCERT) · खण्ड II — जीविका, अर्थव्यवस्था एवं समाज पाठ्यपुस्तक पृष्ठ: 53 से 78 तक
इस फ़ाइल को कैसे पढ़ें
यह फ़ाइल पूरे अध्याय की पूरी और आसान व्याख्या है। इसमें हर बात पूरे वाक्यों में लिखी गई है, ताकि आप इसे पढ़कर समझ भी सकें और वैसे ही उत्तर-पुस्तिका में लिख भी सकें।
कठिन शब्दों के अर्थ भाग 12 में और सभी महत्त्वपूर्ण तिथियाँ व आँकड़े भाग 13 में दिए गए हैं।
एक ज़रूरी बात पहले जान लीजिए। यह अध्याय पिछले दो अध्यायों से अलग है। पिछले दोनों अध्याय राजनीति के थे — कौन लड़ा, किसने आंदोलन चलाया। यह अध्याय अर्थव्यवस्था का है — पैसा, व्यापार, मज़दूर और सामान कैसे एक देश से दूसरे देश जाते रहे। इसमें कोई मानचित्र-कार्य नहीं है, लेकिन आँकड़े बहुत हैं, और बोर्ड परीक्षा में प्रश्न अकसर उन्हीं आँकड़ों पर बनते हैं।
0. सबसे पहले यह समझ लीजिए — यह अध्याय है किस बारे में?
आप रोज़ ‘वैश्वीकरण’ शब्द सुनते होंगे। आमतौर पर लोग समझते हैं कि यह पिछले लगभग पचास सालों की चीज़ है। पाठ्यपुस्तक का पहला पैराग्राफ़ इसी ग़लतफ़हमी को तोड़ता है —
“भूमंडलीकृत विश्व के बनने की प्रक्रिया — व्यापार का, काम की तलाश में एक जगह से दूसरी जगह जाते लोगों का, पूँजी व बहुत सारी चीज़ों की वैश्विक आवाजाही का — एक लंबा इतिहास रहा है।”
यानी दुनिया आज से नहीं, हज़ारों साल से जुड़ी हुई है। पाठ्यपुस्तक इसके तीन शुरुआती प्रमाण देती है —
- 3,000 ईसा पूर्व में समुद्री तटों पर होने वाले व्यापार के माध्यम से सिंधु घाटी की सभ्यता उस इलाक़े से जुड़ी हुई थी जिसे आज हम पश्चिमी एशिया के नाम से जानते हैं।
- हज़ार साल से भी ज़्यादा समय से मालदीव के समुद्र में पाई जाने वाली कौड़ियाँ चीन और पूर्वी अफ़्रीका तक पहुँचती रही हैं। (इन कौड़ियों को पैसे या मुद्रा के रूप में इस्तेमाल किया जाता था।)
- बीमारी फैलाने वाले कीटाणुओं का दूर-दूर तक पहुँचने का इतिहास भी सातवीं सदी तक ढूँढा जा सकता है। तेरहवीं सदी के बाद तो इनके प्रसार को निश्चय ही साफ़ देखा जा सकता है।
इस अध्याय में यात्रा करने वाली चीज़ें केवल सामान नहीं हैं। पाठ्यपुस्तक साफ़ लिखती है कि यात्रियों, व्यापारियों, पुजारियों और तीर्थयात्रियों के साथ “तरह-तरह की चीज़ें, पैसा, मूल्य-मान्यताएँ, हुनर, विचार, आविष्कार और यहाँ तक कि कीटाणु और बीमारियाँ भी” एक जगह से दूसरी जगह जाती रहीं।
एक वाक्य में पूरा अध्याय: दुनिया धीरे-धीरे एक-दूसरे से जुड़ती चली गई, पर यह जुड़ाव सबके लिए ख़ुशी नहीं लाया — किसी को नयी फ़सलें और नौकरियाँ मिलीं, तो किसी को बीमारी, ग़ुलामी और ग़रीबी।
अध्याय को चार बड़े हिस्सों में बाँटकर याद कीजिए —
| भाग | काल | मुख्य बात |
|---|---|---|
| भाग 1 | आधुनिक युग से पहले | दुनिया रेशम मार्ग, भोजन और बीमारियों के ज़रिए जुड़ी |
| भाग 2 | 1815 से 1914 | तीन प्रवाह — व्यापार, श्रम और पूँजी — ने विश्व अर्थव्यवस्था बनाई |
| भाग 3 | 1914 से 1945 | दो महायुद्ध और महामंदी ने उस अर्थव्यवस्था को तोड़ दिया |
| भाग 4 | 1945 के बाद | ब्रेटन वुड्स से पुनर्निर्माण, और फिर आज का वैश्वीकरण |
1. आधुनिक युग से पहले (पाठ का भाग 1)
1.1 रेशम मार्ग (सिल्क रूट) से जुड़ती दुनिया
आधुनिक काल से पहले के युग में दुनिया के दूर-दूर स्थित भागों के बीच व्यापारिक और सांस्कृतिक संपर्कों का सबसे जीवंत उदाहरण सिल्क मार्गों के रूप में दिखाई देता है।
नाम कहाँ से पड़ा? — ‘सिल्क मार्ग’ नाम से पता चलता है कि इस मार्ग से पश्चिम को भेजे जाने वाले चीनी रेशम (सिल्क) का कितना महत्त्व था।
अब इसकी पाँच बातें ध्यान से देखिए —
- इतिहासकारों ने बहुत सारे सिल्क मार्गों के बारे में बताया है। ये मार्ग ज़मीन या समुद्र से होकर गुज़रने वाले थे।
- ये रास्ते न केवल एशिया के विशाल क्षेत्रों को एक-दूसरे से जोड़ते थे बल्कि एशिया को यूरोप और उत्तरी अफ़्रीका से भी जोड़ते थे।
- ऐसे मार्ग ईसा पूर्व के समय में ही सामने आ चुके थे और लगभग पंद्रहवीं शताब्दी तक अस्तित्व में थे।
- इसी रास्ते से चीनी पॉटरी जाती थी और इसी रास्ते से भारत व दक्षिण-पूर्व एशिया के कपड़े व मसाले दुनिया के दूसरे भागों में पहुँचते थे।
- वापसी में सोने-चाँदी जैसी क़ीमती धातुएँ यूरोप से एशिया पहुँचती थीं।
पर इन रास्तों पर केवल सामान नहीं चला — धर्म भी चले। पाठ्यपुस्तक कहती है कि “व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान, दोनों प्रक्रियाएँ साथ-साथ चलती थीं।” इसके तीन उदाहरण याद कीजिए —
- शुरुआती काल के ईसाई मिशनरी निश्चय ही इसी मार्ग से एशिया में आते होंगे।
- कुछ सदी बाद मुस्लिम धर्मोपदेशक भी इसी रास्ते से दुनिया में फैले।
- इससे भी बहुत पहले पूर्वी भारत में उपजा बौद्ध धर्म सिल्क मार्ग की विविध शाखाओं से ही कई दिशाओं में फैल चुका था।
याद रखने का तरीक़ा: सिल्क मार्ग पर तीन चीज़ें पश्चिम की ओर गईं — रेशम, पॉटरी, मसाले-कपड़े। और तीन चीज़ें पूरब की ओर आईं — सोना-चाँदी, ईसाई मत, इस्लाम। और एक चीज़ भारत से चारों दिशाओं में गई — बौद्ध धर्म।
1.2 भोजन की यात्रा — स्पैघेत्ती और आलू
हमारे खाद्य पदार्थ दूर देशों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान के कई उदाहरण पेश करते हैं। इसका कारण बहुत सरल है — जब भी व्यापारी और मुसाफ़िर किसी नए देश में जाते थे, जाने-अनजाने वहाँ नयी फ़सलों के बीज बो आते थे।
पहला उदाहरण — नूडल्स और स्पैघेत्ती। माना जाता है कि नूडल्स चीन से पश्चिम में पहुँचे और वहाँ उन्हीं से स्पैघेत्ती का जन्म हुआ। एक दूसरी संभावना यह भी बताई जाती है कि पास्ता अरब यात्रियों के साथ पाँचवीं सदी में सिसली पहुँचा जो अब इटली का ही एक टापू है। इसी तरह के आहार भारत और जापान में भी पाए जाते हैं, इसलिए हो सकता है कि हम कभी यह न जान सकें कि उनका जन्म कैसे हुआ होगा।
दूसरा उदाहरण — अमेरिका से आई फ़सलें। आलू, सोया, मूँगफली, मक्का, टमाटर, मिर्च, शकरकंद और ऐसे ही बहुत सारे दूसरे खाद्य पदार्थ लगभग पाँच सौ साल पहले हमारे पूर्वजों के पास नहीं थे। ये खाद्य पदार्थ यूरोप और एशिया में तब पहुँचे जब क्रिस्टोफ़र कोलंबस ग़लती से उन अज्ञात महाद्वीपों में पहुँच गया था जिन्हें बाद में अमेरिका के नाम से जाना जाने लगा।
यहाँ एक बात नोट कीजिए। पाठ्यपुस्तक साफ़ कहती है कि यहाँ ‘अमेरिका’ का मतलब उत्तरी अमेरिका, दक्षिणी अमेरिका और कैरीबियन द्वीपसमूह, सभी है। दरअसल, हमारे बहुत सारे खाद्य पदार्थ अमेरिका के मूल निवासियों यानी अमेरिकन इंडियनों से हमारे पास आए हैं।
आलू ने यूरोप की ज़िंदगी कैसे बदली? कई बार नयी फ़सलों के आने से जीवन में ज़मीन-आसमान का फ़र्क़ आ जाता था। साधारण से आलू का इस्तेमाल शुरू करने पर यूरोप के ग़रीबों की ज़िंदगी आमूल रूप से बदल गई थी। उनका भोजन बेहतर हो गया और उनकी औसत उम्र बढ़ने लगी।
पर इसी फ़सल ने एक भयानक त्रासदी भी दी। आयरलैंड के ग़रीब काश्तकार तो आलू पर इस हद तक निर्भर हो चुके थे कि जब 1840 के दशक के मध्य में किसी बीमारी के कारण आलू की फ़सल ख़राब हो गई तो लाखों लोग भुखमरी के कारण मौत के मुँह में चले गए।
चित्र 4 के नीचे दिया गया विवरण और भी सटीक आँकड़े देता है — “1845 से 1849 के बीच पड़े भयानक आयरिश आलू अकाल के दौरान आयरलैंड के लगभग 10,00,000 लोग भुखमरी के कारण मारे गए थे और इससे दोगुने लोग काम की तलाश में घर-बार बार-बार छोड़ कर दूसरे इलाक़ों में चले गए थे।”
यह उदाहरण अध्याय का सबसे कीमती उदाहरण है। यह एक साथ दो बातें सिखाता है — वैश्विक जुड़ाव से लाभ भी होता है (आलू से ग़रीबों का भोजन सुधरा) और भारी नुक़सान भी (एक ही फ़सल पर निर्भरता से अकाल आया)। परीक्षा में जब भी पूछा जाए कि “वैश्वीकरण के दोनों पक्ष बताइए”, यह उदाहरण लिख दीजिए।
1.3 विजय, बीमारी और व्यापार
सोलहवीं सदी में जब यूरोपीय जहाज़ियों ने एशिया तक का समुद्री रास्ता ढूँढ़ लिया और वे पश्चिमी सागर को पार करते हुए अमेरिका तक जा पहुँचे तो पूर्व-आधुनिक विश्व बहुत छोटा सा दिखाई देने लगा।
इससे पहले क्या स्थिति थी? — कई सदियों से हिंद महासागर के पानी में फलता-फूलता व्यापार, तरह-तरह के सामान, लोग, ज्ञान और परंपराएँ एक जगह से दूसरी जगह आ-जा रही थीं। भारतीय उपमहाद्वीप इन प्रवाहों के रास्ते में एक अहम बिंदु था। पूरे नेटवर्क में इस इलाक़े का भारी महत्त्व था।
पर यूरोपीयों के आने के बाद क्या बदला? — यूरोपीयों के दाख़िले से यह आवाजाही और बढ़ने लगी और इन प्रवाहों की दिशा यूरोप की तरफ़ भी मुड़ने लगी।
अमेरिका की भूमिका: अपनी ‘खोज’ से पहले लाखों साल से अमेरिका का दुनिया से कोई संपर्क नहीं था। लेकिन सोलहवीं सदी से उसकी विशाल भूमि और बेहिसाब फ़सलें व खनिज पदार्थ हर दिशा में जीवन का रूप-रंग बदलने लगे। आज के पेरू और मैक्सिको में मौजूद खानों से निकलने वाली क़ीमती धातुओं, ख़ासतौर से चाँदी ने भी यूरोप की संपदा को बढ़ाया और पश्चिम एशिया के साथ होने वाले उसके व्यापार को गति प्रदान की। सत्रहवीं सदी के आते-आते पूरे यूरोप में दक्षिणी अमेरिका की धन-संपदा के बारे में तरह-तरह के क़िस्से बनने लगे थे। इन्हीं किंवदंतियों की बदौलत वहाँ के लोग एल डोराडो को सोने का शहर मानने लगे और उसकी खोज में बहुत सारे खोजी अभियान शुरू किए गए।
अब अध्याय का सबसे चौंकाने वाला हिस्सा — चेचक।
सोलहवीं सदी के मध्य तक आते-आते पुर्तगाली और स्पेनिश सेनाओं की विजय का सिलसिला शुरू हो चुका था। उन्होंने अमेरिका को उपनिवेश बनाना शुरू कर दिया था।
पर यह विजय हथियारों से नहीं हुई थी। पाठ्यपुस्तक के शब्दों में —
“यूरोपीय सेनाएँ केवल अपनी सैनिक ताक़त के दम पर नहीं जीतती थीं। स्पेनिश विजेताओं के सबसे शक्तिशाली हथियारों में परंपरागत क़िस्म का सैनिक हथियार तो कोई था ही नहीं। यह हथियार तो चेचक जैसे कीटाणु थे जो स्पेनिश सैनिकों और अफ़सरों के साथ वहाँ जा पहुँचे थे।”
ऐसा क्यों हुआ, इसका कारण भी समझ लीजिए —
- लाखों साल से दुनिया से अलग-थलग रहने के कारण अमेरिका के लोगों के शरीर में यूरोप से आने वाली इन बीमारियों से बचने की रोग-प्रतिरोधी क्षमता नहीं थी।
- फलस्वरूप, इस नए स्थान पर चेचक बहुत मारक साबित हुई।
- एक बार संक्रमण शुरू होने के बाद तो यह बीमारी पूरे महाद्वीप में फैल गई। जहाँ यूरोपीय लोग नहीं पहुँचे थे वहाँ के लोग भी इसकी चपेट में आने लगे।
- इसने पूरे के पूरे समुदायों को ख़त्म कर डाला। इस तरह घुसपैठियों की जीत का रास्ता आसान होता चला गया।
और यह हथियार क्यों अजेय था? “बंदूक़ों को तो ख़रीद कर या छीन कर हमलावरों के ख़िलाफ़ भी इस्तेमाल किया जा सकता था। पर चेचक जैसी बीमारियों के मामले में तो ऐसा नहीं किया जा सकता था क्योंकि हमलावरों के पास उससे बचाव का तरीक़ा भी था और उनके शरीर में रोग प्रतिरोधी क्षमता भी विकसित हो चुकी थी।”
बॉक्स 1 — ‘जैविक’ युद्ध? पाठ्यपुस्तक ने एक बॉक्स में यह चौंकाने वाला उद्धरण दिया है। न्यू इंग्लैंड स्थित मैसाचुसेट्स बे कॉलोनी के पहले गवर्नर जॉन विनथॉर्प ने मई 1634 में लिखा था कि छोटी चेचक उपनिवेशकारों के लिए ईश्वर का वरदान है:
”…देशी जनता … छोटी चेचक के कारण लगभग पूरी ख़त्म हो चुकी थी। इस तरह परमेश्वर ने हमारी मिल्कीयत पर हमें मालिकाना दे दिया।” (स्रोत: अल्फ़्रेड क्रॉस्बी, इकोलॉजिकल इंपीरियलिज़्म)
अब यूरोप की अपनी हालत भी देखिए —
- उन्नीसवीं सदी तक यूरोप में ग़रीबी और भूख का ही साम्राज्य था।
- शहरों में बेहिसाब भीड़ थी और बीमारियों का बोलबाला था।
- धार्मिक टकराव आम थे। धार्मिक असंतुष्टों को कड़ा दंड दिया जाता था।
- इस वजह से हज़ारों लोग यूरोप से भागकर अमेरिका जाने लगे।
- अठारहवीं सदी तक अमेरिका में अफ़्रीका से भागकर लाए गए ग़ुलामों को काम में झोंक कर यूरोपीय बाज़ारों के लिए कपास और चीनी का उत्पादन किया जाने लगा था।
और आख़िर में — दुनिया का आर्थिक केंद्र कैसे बदला?
- अठारहवीं शताब्दी का काफ़ी समय बीत जाने के बाद भी चीन और भारत को दुनिया के सबसे धनी देशों में गिना जाता था। एशियाई व्यापार में भी उन्हीं का दबदबा था।
- लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि पंद्रहवीं सदी से चीन ने दूसरे देशों के साथ अपने संबंध कम करना शुरू कर दिए और वह दुनिया से अलग-थलग पड़ने लगा।
- चीन की घटती भूमिका और अमेरिका के बढ़ते महत्त्व के चलते विश्व व्यापार का केंद्र पश्चिम की ओर खिसकने लगा। अब यूरोप ही विश्व व्यापार का सबसे बड़ा केंद्र बन गया।
‘चर्चा करें’ का उत्तर (पृ. 56): “जब हम कहते हैं कि सोलहवीं सदी में दुनिया ‘सिकुड़ने’ लगी थी तो इसका क्या मतलब है?” — इसका मतलब यह है कि दुनिया आकार में छोटी नहीं हुई, बल्कि दूरियाँ छोटी हो गईं। समुद्री रास्तों की खोज के बाद जो जगहें पहले एक-दूसरे के लिए अनजान थीं, वे अब आपस में जुड़ गईं और वहाँ का सामान, लोग, विचार और बीमारियाँ एक-दूसरे तक पहुँचने लगीं।
2. उन्नीसवीं शताब्दी, 1815 से 1914 (पाठ का भाग 2)
उन्नीसवीं सदी में दुनिया तेज़ी से बदलने लगी। आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और तकनीकी कारकों ने पूरे के पूरे समाजों की कायापलट कर दी और विदेश संबंधों को नए ढरें में ढाल दिया।
2.0 तीन प्रवाह — यह अध्याय की सबसे ज़रूरी परिभाषा है
अर्थशास्त्रियों ने अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक विनिमय में तीन तरह की गतियों या ‘प्रवाहों’ का उल्लेख किया है। यह अभ्यास प्रश्न 7 है, इसलिए इसे शब्दशः याद कीजिए —
| क्रम | प्रवाह | पूरी परिभाषा (पाठ्यपुस्तक के शब्दों में) | भारत से उदाहरण |
|---|---|---|---|
| 1 | व्यापार का प्रवाह | यह मुख्य रूप से वस्तुओं (जैसे कपड़ा या गेहूँ आदि) के व्यापार तक ही सीमित था | भारत से ब्रिटेन को कच्चे कपास और अफ़ीम का निर्यात |
| 2 | श्रम का प्रवाह | इसमें लोग काम या रोज़गार की तलाश में एक जगह से दूसरी जगह जाते हैं | भारत से गिरमिटिया मज़दूरों का त्रिनिदाद, गुयाना, मॉरिशस और फ़िजी जाना |
| 3 | पूँजी का प्रवाह | इसे अल्प या दीर्घ अवधि के लिए दूर-दराज़ के इलाक़ों में निवेश कर दिया जाता है | ब्रिटेन का भारत में रेलवे और नहरों में निवेश |
अब इन तीनों के बारे में तीन बातें और याद रखिए —
- ये तीनों तरह के प्रवाह एक-दूसरे से जुड़े हुए थे और लोगों के जीवन को प्रभावित करते थे।
- कभी-कभी इन कारकों के बीच मौजूद संबंध टूट भी जाते थे।
- उदाहरण के लिए, वस्तुओं या पूँजी की आवाजाही के मुक़ाबले श्रमिकों की आवाजाही पर प्राय: ज़्यादा शर्तें और बंदिशें लगाई जाती थीं।
यह आख़िरी वाक्य बहुत काम का है। इसका मतलब यह है कि सामान और पैसा तो आसानी से आ-जा सकते थे, पर आदमी नहीं। आज भी यही होता है — विदेशी कंपनी का पैसा भारत में आसानी से आ जाता है, पर भारतीय मज़दूर को वीज़ा के लिए सालों लगते हैं।
2.1 विश्व अर्थव्यवस्था का उदय — कॉर्न लॉ की कहानी
इस पूरे हिस्से को एक कहानी की तरह याद कीजिए, क्रम से —
पहला चरण — ब्रिटेन में भोजन का संकट। अठारहवीं सदी के आख़िरी दशकों में ब्रिटेन की आबादी तेज़ी से बढ़ने लगी थी। नतीजा, देश में भोजन की माँग भी बढ़ी। जैसे-जैसे शहर फैले और उद्योग बढ़ने लगे, कृषि उत्पादों की माँग भी बढ़ने लगी। कृषि उत्पाद महँगे होने लगे।
दूसरा चरण — कॉर्न लॉ। बड़े भूस्वामियों के दबाव में सरकार ने मक्का के आयात पर भी पाबंदी लगा दी थी। जिन क़ानूनों के सहारे सरकार ने यह पाबंदी लागू की थी उन्हें ‘कॉर्न लॉ’ कहा जाता था।
तीसरा चरण — विरोध और निरस्तीकरण। खाद्य पदार्थों की ऊँची क़ीमतों से परेशान उद्योगपतियों और शहरी बाशिंदों ने सरकार को मजबूर कर दिया कि वह कॉर्न लॉ को फ़ौरन समाप्त कर दे।
चौथा चरण — इसका असर (यह अभ्यास प्रश्न 3-क है)। कॉर्न लॉ के निरस्त हो जाने के बाद जो कुछ हुआ, उसे क्रम से लिखिए —
| क्रम | परिणाम |
|---|---|
| 1 | बहुत कम क़ीमत पर खाद्य पदार्थों का आयात किया जाने लगा। |
| 2 | आयातित खाद्य पदार्थों की लागत ब्रिटेन में पैदा होने वाले खाद्य पदार्थों से भी कम थी। |
| 3 | फलस्वरूप, ब्रिटिश किसानों की हालत बिगड़ने लगी क्योंकि वे आयातित माल की क़ीमत का मुक़ाबला नहीं कर सकते थे। |
| 4 | विशाल भूभागों पर खेती बंद हो गई। हज़ारों लोग बेरोज़गार हो गए। |
| 5 | गाँवों से उजड़ कर वे या तो शहरों में या दूसरे देशों में जाने लगे। |
पाँचवाँ चरण — और इसका उलटा असर बाक़ी दुनिया पर। जब खाद्य पदार्थों की क़ीमतों में गिरावट आई तो ब्रिटेन में उपभोग का स्तर बढ़ गया। साथ ही उन्नीसवीं सदी के मध्य से ब्रिटेन की औद्योगिक प्रगति काफ़ी तेज़ रही जिससे लोगों की आय में वृद्धि हुई। इससे लोगों की ज़रूरतें बढ़ीं और खाद्य पदार्थों का और भी ज़्यादा मात्रा में आयात होने लगा।
नतीजा: पूर्वी यूरोप, रूस, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया, दुनिया के हर हिस्से में ब्रिटेन का पेट भरने के लिए ज़मीनों को साफ़ करके खेती की जाने लगी।
छठा चरण — पर सिर्फ़ ज़मीन साफ़ करना काफ़ी नहीं था। पाठ्यपुस्तक चार और ज़रूरतें गिनाती है —
- खेतिहर इलाक़ों को बंदरगाहों से जोड़ने के लिए रेलवे की भी ज़रूरत थी।
- ज़्यादा तादाद में माल ढुलाई के लिए नयी गोदियाँ बनाना और पुरानी गोदियों को फैलाना ज़रूरी था।
- नयी ज़मीनों पर खेती करने के लिए यह आवश्यक था कि दूसरे इलाक़ों के लोग वहाँ आकर बसें। यानी नए घर बनाना और नयी बस्तियाँ बसाना भी ज़रूरी था।
- इन सारे कामों के लिए पूँजी और श्रम की ज़रूरत थी।
और यहीं तीनों प्रवाह एक साथ दिखाई देते हैं —
- पूँजी का प्रवाह: लंदन जैसे वित्तीय केंद्रों से पूँजी आने लगी।
- श्रम का प्रवाह: अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे जिन स्थानों पर मज़दूरों की कमी थी वहाँ लोगों को ले जाकर बसाया जाने लगा।
- व्यापार का प्रवाह: खाद्य पदार्थ जहाज़ों से यूरोप पहुँचने लगे।
आँकड़े जो ज़रूर याद रखिए —
- उन्नीसवीं सदी में यूरोप के लगभग पाँच करोड़ लोग अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में जाकर बस गए।
- माना जाता है कि पूरी दुनिया में लगभग पंद्रह करोड़ लोग बेहतर भविष्य की चाह में अपने घर-बार छोड़कर दूर-दूर के देशों में जाकर काम करने लगे थे।
- 1890 तक एक वैश्विक कृषि अर्थव्यवस्था सामने आ चुकी थी।
- 1820 से 1914 के बीच विश्व व्यापार में 25 से 40 गुना वृद्धि हो चुकी थी। इस व्यापार में लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा ‘प्राथमिक उत्पादों’ यानी गेहूँ और कपास जैसे कृषि उत्पादों तथा कोयले जैसे खनिज पदार्थों का था।
1890 के बाद की स्थिति को पाठ्यपुस्तक ने बहुत सुंदर ढंग से लिखा है —
“अब भोजन किसी आसपास के गाँव या क़स्बे से नहीं बल्कि हज़ारों मील दूर से आने लगा था। अब अपने खेतों पर ख़ुद काम करने वाले किसान ही खाद्य पदार्थ पैदा नहीं कर रहे थे। अब यह काम ऐसे औद्योगिक मज़दूर करने लगे थे जो संभवत: हाल ही में वहाँ आए थे और ऐसे खेतों में काम कर रहे थे जहाँ महज़ एक पीढ़ी पहले संभवत: ठेठ जंगल रहे होंगे।”
भारत का उदाहरण — पंजाब की नहर कॉलोनी। बहुत छोटे पैमाने पर ही सही लेकिन इसी तरह के नाटकीय बदलाव हम अपने यहाँ पंजाब में भी देख सकते हैं। यहाँ ब्रिटिश भारतीय सरकार ने अर्द्ध-रेगिस्तानी परती ज़मीनों को उपजाऊ बनाने के लिए नहरों का जाल बिछा दिया ताकि निर्यात के लिए गेहूँ और कपास की खेती की जा सके। नयी नहरों की सिंचाई वाले इलाक़ों में पंजाब के अन्य स्थानों के लोगों को लाकर बसाया गया। उनकी बस्तियों को केनाल कॉलोनी (नहर बस्ती) कहा जाता था।
भोजन तो सिर्फ़ एक उदाहरण मात्र है। पाठ्यपुस्तक बताती है कि कपास की भी यही कहानी है, जिसकी दुनिया भर में बड़े पैमाने पर खेती की जाने लगी थी ताकि ब्रिटिश कपड़ा मिलों की माँग को पूरा किया जा सके। रबड़ की कहानी भी इससे अलग नहीं है।
2.2 तकनीक की भूमिका
इस घटनाक्रम में तकनीक की क्या भूमिका रही? रेलवे, भाप के जहाज़, टेलिग्राफ़, ये सब तकनीकी बदलाव बहुत महत्त्वपूर्ण रहे। उनके बिना उन्नीसवीं सदी में आए परिवर्तनों की कल्पना नहीं की जा सकती थी।
पर यहाँ एक बहुत गहरी बात कही गई है, उसे ध्यान से पढ़िए —
“तकनीकी प्रगति अकसर चौतरफ़ा सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक कारकों का परिणाम भी होती है।”
इसका उदाहरण भी दिया गया है — औपनिवेशीकरण के कारण यातायात और परिवहन साधनों में भारी सुधार किए गए। तेज़ चलने वाली रेलगाड़ियाँ बनीं, बोगियों का भार कम किया गया, जलपोतों का आकार बढ़ा जिससे किसी भी उत्पाद को खेतों से दूर-दूर के बाज़ारों में कम लागत पर और ज़्यादा आसानी से पहुँचाया जा सके।
अब मांस के व्यापार का उदाहरण — यह अभ्यास प्रश्न 4 का सबसे अच्छा उत्तर है।
पहले की स्थिति (1870 के दशक तक):
| समस्या | उसका असर |
|---|---|
| अमेरिका से यूरोप को मांस का निर्यात नहीं किया जाता था; केवल जिंदा जानवर ही भेजे जाते थे जिन्हें यूरोप ले जाकर ही काटा जाता था | जहाज़ में बहुत जगह घिरती थी |
| बहुत सारे जानवर लंबे सफ़र में मर जाते थे या बीमार पड़ जाते थे | नुक़सान बढ़ता था |
| बहुतों का वज़न गिर जाता था या वे खाने के लायक़ नहीं रह जाते थे | मांस की आपूर्ति घट जाती थी |
| इसी वजह से मांस खाना एक महँगा सौदा था और यूरोप के ग़रीबों की पहुँच से बाहर था | ऊँची क़ीमतों के कारण मांस उत्पादों की माँग और उत्पादन भी कम रहता था |
नयी तकनीक ने क्या बदला: “नयी तकनीक के आने पर यह स्थिति बदल गई। पानी के जहाज़ों में रेफ़्रिजरेशन की तकनीक स्थापित कर दी गई जिससे जल्दी ख़राब होने वाली चीज़ों को भी लंबी यात्राओं पर ले जाया जा सकता था।”
इसके पाँच परिणाम क्रम से लिखिए —
- इसके बाद तो जानवरों को यात्रा से पहले ही मारा जाने लगा।
- अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया या न्यूज़ीलैंड, सब जगह से जानवरों की बजाय उनका मांस ही यूरोप भेजा जाने लगा।
- इससे न केवल समुद्री यात्रा में आने वाला ख़र्चा कम हो गया बल्कि यूरोप में मांस के दाम भी गिर गए।
- यूरोप के ग़रीबों को ज़्यादा विविधतापूर्ण ख़ुराक मिलने लगी। पहले उनके पास सिर्फ़ आलू और ब्रेड होते थे। अब बहुत सारे लोगों के भोजन में मांसाहार (और मक्खन व अंडे) भी शामिल हो गया।
- जीवनस्थिति सुधरी तो देश में शांति स्थापित होने लगी और दूसरे देशों में साम्राज्यवादी मंसूबों को समर्थन मिलने लगा।
पाँचवाँ बिंदु सबसे महत्त्वपूर्ण है और बच्चे इसे अकसर छोड़ देते हैं। इसका मतलब यह है कि जब यूरोप के ग़रीब का पेट भरने लगा तो उसने अपनी सरकार की उपनिवेश बनाने की नीति का विरोध करना छोड़ दिया। यानी सस्ते मांस ने साम्राज्यवाद को मज़बूत किया।
2.3 उन्नीसवीं सदी के आख़िर में उपनिवेशवाद
उन्नीसवीं शताब्दी के आख़िरी दशकों में व्यापार बढ़ा और बाज़ार तेज़ी से फैलने लगे। पर पाठ्यपुस्तक चेतावनी देती है —
“यह केवल फैलते व्यापार और संपन्नता का ही दौर नहीं था। हमें इस प्रक्रिया के स्याह पक्ष को भी नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए।”
स्याह पक्ष क्या था?
- व्यापार में इज़ाफ़े और विश्व अर्थव्यवस्था के साथ निकटता का एक परिणाम यह हुआ कि दुनिया के बहुत सारे भागों में स्वतंत्रता और आजीविका के साधन छिनने लगे।
- उन्नीसवीं सदी के आख़िरी दशकों में यूरोपीयों की विजयों से बहुत सारे कष्टदायक आर्थिक, सामाजिक और पारिस्थितिकीय परिवर्तन आए और औपनिवेशिक समाजों को विश्व अर्थव्यवस्था में समाहित कर लिया गया।
अफ़्रीका के मानचित्र वाली बात (यह ज़रूर याद रखिए): “ज़रा अफ़्रीका के मानचित्र को देखिए। आप पाएँगे कि वहाँ के कुछ देशों की सीमाएँ तो बिलकुल सीधी लकीर जैसी हैं मानो उन्हें फुट्टा (Scale) रखकर खींचा गया हो। दुर्भाग्यवश, यही हुआ भी था।”
- अफ़्रीका पर क़ब्ज़े की कोशिश में लगी प्रतिद्वंद्वी यूरोपीय ताक़तों ने अपने-अपने इलाक़े बाँटने के लिए प्राय: इसी तरीक़े का सहारा लिया था।
- 1885 में यूरोप के ताक़तवर देशों की बर्लिन में एक बैठक हुई जिसमें अफ़्रीका के नक़्शे पर इसी तरह लकीरें खींचकर उसको आपस में बाँट लिया गया था।
नयी औपनिवेशिक ताक़तें:
- उन्नीसवीं सदी के आख़िर में ब्रिटेन और फ़्रांस ने अपने शासन वाले विदेशी क्षेत्रफल में भारी वृद्धि कर ली थी।
- बेल्जियम और जर्मनी नयी औपनिवेशिक ताक़तों के रूप में सामने आए।
- पहले स्पेन के क़ब्ज़े में रह चुके कुछ उपनिवेशों पर क़ब्ज़ा करके 1890 के दशक के आख़िरी वर्षों में संयुक्त राज्य अमेरिका भी औपनिवेशिक ताक़त बन गया।
बॉक्स 2 — सर हेनरी मॉर्टन स्टैनली। स्टैनली एक पत्रकार और खोजी थे। न्यूयॉर्क हैरल्ड ने उन्हें कई साल पहले अफ़्रीका गए लिविंग्स्टन नामक मिशनरी की खोज करने के लिए भेजा था। पाठ्यपुस्तक बताती है कि उस ज़माने के अन्य यूरोपीय और अमेरिकी अन्वेषकों की भाँति स्टैनली भी हथियारों से लैस होकर गए थे। उन्होंने वहाँ जाकर स्थानीय शिकारियों, योद्धाओं और मज़दूरों को इकट्ठा किया, स्थानीय क़बीलों के साथ लड़ाइयाँ लड़ीं, अफ़्रीकी भूदृश्य की पड़ताल की और विभिन्न इलाक़ों के नक़्शे बनाए। बाद में इन खोजों और अन्वेषणों से अफ़्रीका को जीतने में मदद मिली।
और अब बॉक्स का निष्कर्ष: “ऐसे भौगोलिक अन्वेषण केवल वैज्ञानिक जानकारियाँ इकट्ठा करने की सामान्य इच्छा से प्रेरित नहीं होते थे। उनका साम्राज्यवादी योजनाओं से सीधा संबंध होता था।”
2.4 रिंडरपेस्ट या मवेशी प्लेग
यह पूरा हिस्सा अभ्यास प्रश्न 3-ख का उत्तर है। इसे कहानी की तरह याद कीजिए।
पहले अफ़्रीका की पुरानी स्थिति समझिए —
- प्राचीन काल से ही अफ़्रीका में ज़मीन की कभी कोई कमी नहीं रही जबकि वहाँ की आबादी बहुत कम थी।
- सदियों तक अफ़्रीकियों की ज़िंदगी व कामकाज ज़मीन और पालतू पशुओं के सहारे ही चलता रहा है।
- वहाँ पैसे या वेतन पर काम करने का चलन नहीं था।
पाठ्यपुस्तक यहाँ एक बहुत अच्छा प्रश्न पूछती है — “अगर आप अफ़्रीका के किसान होते और आपके पास ज़मीन और पालतू पशु होते — जिनकी वहाँ कोई कमी नहीं थी — तो शायद आपको भी यह बात समझ में नहीं आती कि वेतन के लिए काम करने की क्या ज़रूरत है!”
अब यूरोपीयों की समस्या —
- उन्नीसवीं सदी के आख़िर में यूरोपीय ताक़तें अफ़्रीका के विशाल भूक्षेत्र और खनिज भंडारों को देखकर इस महाद्वीप की ओर आकर्षित हुई थीं।
- यूरोपीय लोग अफ़्रीका में बागानी खेती करने और खदानों का दोहन करना चाहते थे ताकि उन्हें वापस यूरोप भेजा जा सके।
- लेकिन वहाँ एक ऐसी समस्या पेश आई जिसकी उन्हें उम्मीद नहीं थी। वहाँ के लोग तनख़्वाह पर काम नहीं करना चाहते थे।
यूरोपीयों ने मज़दूर पाने के लिए क्या-क्या हथकंडे अपनाए (यह तालिका बहुत उपयोगी है) —
| क्रम | हथकंडा | उसका उद्देश्य |
|---|---|---|
| 1 | उन पर भारी भरकम कर लाद दिए गए जिनका भुगतान केवल तभी किया जा सकता था जब करदाता बागानों या खदानों में काम करता हो | लोगों को मज़दूरी करने पर मजबूर करना |
| 2 | काश्तकारों को उनकी ज़मीन से हटाने के लिए उत्तराधिकार क़ानून भी बदल दिए गए — नए क़ानून में यह व्यवस्था कर दी गई कि अब परिवार के केवल एक ही सदस्य को पैतृक संपत्ति मिलेगी | परिवार के बाक़ी लोगों को श्रम बाज़ार में ढकेलना |
| 3 | खानकर्मियों को बाड़ों में बंद कर दिया गया और उनके खुलेआम घूमने-फिरने पर पाबंदी लगा दी गई | मज़दूरों को भागने से रोकना |
और तभी रिंडरपेस्ट आ गया —
| क्रम | घटना |
|---|---|
| 1 | अफ़्रीका में रिंडरपेस्ट नाम की बीमारी सबसे पहले 1880 के दशक के आख़िरी सालों में दिखाई दी। |
| 2 | उस समय पूर्वी अफ़्रीका में एरिट्रिया पर हमला कर रहे इतालवी सैनिकों का पेट भरने के लिए एशियाई देशों से जानवर लाए जाते थे। यह बीमारी ब्रिटिश अधिपत्य वाले एशियाई देशों से आए उन्हीं जानवरों के ज़रिए यहाँ पहुँची थी। |
| 3 | अफ़्रीका के पूर्वी हिस्से से महाद्वीप में दाख़िल होने वाली यह बीमारी ‘जंगल की आग’ की तरह पश्चिमी अफ़्रीका की तरफ़ बढ़ने लगी। |
| 4 | 1892 में यह अफ़्रीका के अटलांटिक तट तक जा पहुँची। पाँच साल बाद यह केप (अफ़्रीका का धुर दक्षिणी हिस्सा) तक भी पहुँच गई। |
| 5 | रिंडरपेस्ट ने अपने रास्ते में आने वाले 90 प्रतिशत मवेशियों को मौत की नींद सुला दिया। |
इसका परिणाम — यही असली उत्तर है:
- पशुओं के ख़त्म हो जाने से तो अफ़्रीकियों के रोज़ी-रोटी के साधन ही ख़त्म हो गए।
- अपनी सत्ता को और मज़बूत करने तथा अफ़्रीकियों को श्रम बाज़ार में ढकेलने के लिए वहाँ के बागान मालिकों, खान मालिकों और औपनिवेशिक सरकारों ने बचे-खुचे पशु भी अपने क़ब्ज़े में ले लिए।
- बचे-खुचे पशु संसाधनों पर क़ब्ज़े से यूरोपीय उपनिवेशकारों को पूरे अफ़्रीका को जीतने व ग़ुलाम बना लेने का बेहतरीन मौक़ा हाथ लग गया था।
इस पूरे हिस्से का सार एक वाक्य में: एक पशु-बीमारी ने वह काम कर दिया जो यूरोपीय सेनाएँ और क़ानून मिलकर भी नहीं कर पा रहे थे — उसने अफ़्रीकियों को मज़दूर बना दिया। यह ठीक वैसा ही है जैसा चेचक ने अमेरिका में किया था।
2.5 भारत से अनुबंधित श्रमिकों का जाना
ध्यान दीजिए — पाठ्यपुस्तक में यह भाग भी ग़लती से ‘2.4’ ही छपा है, जबकि यह 2.5 होना चाहिए। आपको इससे कोई परेशानी नहीं होगी, पर जानकारी रखिए।
भारत से अनुबंधित (गिरमिटिया) श्रमिकों को ले जाया जाना भी उन्नीसवीं सदी की दुनिया की विविधता को प्रतिबिंबित करता है। पाठ्यपुस्तक इस दुनिया का वर्णन इन शब्दों में करती है —
“यह तेज़ आर्थिक वृद्धि के साथ-साथ जनता के कष्टों में वृद्धि, कुछ लोगों की आय में वृद्धि और दूसरों के लिए बेहिसाब ग़रीबी, कुछ क्षेत्रों में भारी तकनीकी प्रगति और दूसरे क्षेत्रों में उत्पीड़न के नए रूपों की ईजाद की दुनिया थी।”
अनुबंध क्या था?
- उन्नीसवीं सदी में भारत और चीन के लाखों मज़दूरों को बागानों, खदानों और सड़क व रेलवे निर्माण परियोजनाओं में काम करने के लिए दूर-दूर के देशों में ले जाया जाता था।
- भारतीय अनुबंधित श्रमिकों को ख़ास तरह के अनुबंध या एग्रीमेंट के तहत ले जाया जाता था।
- इन अनुबंधों में यह शर्त होती थी कि यदि मज़दूर अपने मालिक के बागानों में पाँच साल काम कर लेंगे तो वे स्वदेश लौट सकते हैं।
वे कहाँ से जाते थे? भारत के ज़्यादातर अनुबंधित श्रमिक मौजूदा पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य भारत और तमिलनाडु के सूखे इलाक़ों से जाते थे।
वे क्यों जाते थे? (यह प्रश्न परीक्षा में पूछा जाता है) उन्नीसवीं सदी के मध्य में इन इलाक़ों में भारी बदलाव आने लगे थे —
- कुटीर उद्योग ख़त्म हो रहे थे।
- ज़मीन का भाड़ा बढ़ गया था।
- खानों और बागानों के लिए ज़मीनों को साफ़ किया जा रहा था।
- इन परिवर्तनों से ग़रीबों के जीवन पर गहरा असर पड़ा। वे बँटाई पर ज़मीन तो ले लेते थे लेकिन उसका भाड़ा नहीं चुका पाते थे, उन पर क़र्ज़ा चढ़ने लगा।
- काम की तलाश में उन्हें अपने घर-बार छोड़ने पड़े।
वे कहाँ जाते थे? (यह सूची याद कीजिए)
| गंतव्य | विवरण |
|---|---|
| कैरीबियाई द्वीप समूह | मुख्यत: त्रिनिदाद, गुयाना और सूरीनाम |
| मॉरिशस और फ़िजी | बागानों में काम के लिए |
| सीलोन और मलाया | तमिल आप्रवासी यहाँ जाकर काम करते थे |
| असम | बहुत सारे अनुबंधित श्रमिकों को असम के चाय बागानों में काम करवाने के लिए भी ले जाया जाता था |
भर्ती में धोखाधड़ी — यह हिस्सा ज़रूर लिखिए:
- मज़दूरों की भर्ती का काम मालिकों के एजेंट किया करते थे। एजेंटों को कमीशन मिलता था।
- बहुत सारे आप्रवासी अपने गाँव में होने वाले उत्पीड़न और ग़रीबी से बचने के लिए भी इन अनुबंधों को मान लेते थे।
- एजेंट भी भावी आप्रवासियों को फुसलाने के लिए झूठी जानकारियाँ देते थे। कहाँ जाना है, यात्रा के साधन क्या होंगे, क्या काम करना होगा, और नयी जगह पर काम व जीवन के हालात कैसे होंगे, इस बारे में उन्हें सही जानकारी नहीं दी जाती थी।
- बहुत सारे आप्रवासियों को तो यह भी नहीं बताया जाता था कि उन्हें लंबी समुद्री यात्रा पर जाना है।
- अगर कोई मज़दूर अनुबंध के लिए राजी नहीं होता था तो एजेंट उसका अपहरण तक कर लेते थे।
पहुँचने के बाद क्या हुआ — ‘नयी दास प्रथा’: “उन्नीसवीं सदी की इस अनुबंध व्यवस्था को बहुत सारे लोगों ने ‘नयी दास प्रथा’ का भी नाम दिया है।” इसके कारण ये हैं —
- बागानों में या कार्यस्थल पर पहुँचने के बाद मज़दूरों को पता चलता था कि वे जैसी उम्मीद कर रहे थे यहाँ वैसे हालात नहीं हैं।
- नयी जगह की जीवन एवं कार्य स्थितियाँ कठोर थीं और मज़दूरों के पास क़ानूनी अधिकार कहने भर को भी नहीं थे।
- बहुत सारे तो भाग कर जंगलों में ही चले गए। अगर ऐसे मज़दूर पकड़े जाते तो उन्हें भारी सज़ा दी जाती थी।
स्रोत-क — एक गिरमिटिया मज़दूर की आपबीती (राम नारायण तिवारी, डेमेरारा में दस साल):
”…तमाम कोशिशों के बावजूद मैं उन कामों को ठीक से नहीं कर पाया जो मुझे सौंपे गए थे। … कुछ ही दिनों के भीतर मेरे हाथ सब जगह से छिल गए और मैं हफ़्ते भर तक काम पर नहीं जा पाया जिसके लिए मुझे सज़ा दी गई और 14 दिन जेल में काटने पड़े। … नए आप्रवासियों को काम बहुत भारी पड़ता था और वे दिन भर में अपना काम पूरा नहीं कर पाते थे। … अगर काम संतोषजनक ढंग से पूरा न हुआ तो तनख़्वाह भी काट ली जाती थी।” (स्रोत: वाणिज्य एवं उद्योग विभाग, आप्रवासन शाखा, 1916)
पर मज़दूरों ने हार नहीं मानी — यह हिस्सा सबसे सुंदर है:
“इसके बावजूद मज़दूरों ने भी ज़िंदगी बसर करने के अपने तरीक़े ढूँढ़ निकाले। बहुतों ने अपनी पुरानी और नयी संस्कृतियों का सम्मिश्रण करते हुए व्यक्तिगत और सामूहिक आत्माभिव्यक्ति के नए रूप खोज लिए।”
इसके तीन उदाहरण ज़रूर याद कीजिए —
| उदाहरण | विवरण |
|---|---|
| ‘होसे’ (त्रिनिदाद) | मुहर्रम के सालाना जुलूस को एक विशाल उत्सवी मेले का रूप दे दिया गया। इस मेले को ‘होसे’ (इमाम हुसैन के नाम पर) नाम दिया गया। उसमें सभी धर्मों व नस्लों के मज़दूर हिस्सा लेते थे। |
| रास्ताफ़ारियानवाद (Rastafarianism) | यह विद्रोही धर्म — जिसे जमैका के रैगे गायक बॉब मार्ले ने ख्याति के शिखर पर पहुँचा दिया — में भी भारतीय आप्रवासियों और कैरीबियाई द्वीपसमूह के बीच इन संबंधों की झलक देखी जा सकती है। |
| ‘चटनी म्यूज़िक’ (त्रिनिदाद और गुयाना) | यह मशहूर संगीत भी भारतीय आप्रवासियों के वहाँ पहुँचने के बाद सामने आई रचनात्मक अभिव्यक्तियों का ही उदाहरण है। |
और अब इसका बड़ा अर्थ —
“सांस्कृतिक समागम के ये स्वरूप एक नयी वैश्विक दुनिया के उदय की प्रक्रिया का अंग थे। यह ऐसी प्रक्रिया थी जिसमें अलग-अलग स्थानों की चीज़ें आपस में घुल-मिल जाती थीं, उनकी मूल पहचान और विशिष्टताएँ गुम हो जाती थीं और बिलकुल नया रूप सामने आता था।”
अनुबंध प्रथा का अंत:
- बीसवीं सदी के शुरुआती सालों से ही हमारे देश के राष्ट्रवादी नेता इस प्रथा का विरोध करने लगे थे। उनकी राय में यह बहुत अपमानजनक और क्रूर व्यवस्था थी।
- इसी दबाव के कारण 1921 में इसे ख़त्म कर दिया गया।
- लेकिन इसके बाद भी कई दशक तक भारतीय अनुबंधित मज़दूरों के वंशज कैरीबियाई द्वीप समूह में बेचैन अल्पसंख्यकों का जीवन जीते रहे। वहाँ के लोग उन्हें ‘कुली’ मानते थे और उनके साथ कुलियों जैसा बर्ताव करते थे।
आज उनके वंशज कौन हैं? पाठ्यपुस्तक तीन प्रसिद्ध नाम देती है — नोबेल पुरस्कार विजेता साहित्यकार वी. एस. नायपॉल, और वेस्ट इंडीज़ के क्रिकेट खिलाड़ी शिवनरैन चंद्रपॉल तथा रामनरेश सरवन। इनके नाम हम भारतीयों जैसे इसलिए हैं क्योंकि वे भारत से गए अनुबंधित मज़दूरों के ही वंशज हैं। नायपॉल के कुछ प्रारंभिक उपन्यासों में विछोह और परायेपन के इस अहसास को ख़ूब देखा जा सकता है।
2.6 विदेश में भारतीय उद्यमी
विश्व बाज़ार के लिए खाद्य पदार्थ व फ़सलें उगाने के वास्ते पूँजी की आवश्यकता थी। पाठ्यपुस्तक एक सीधा प्रश्न पूछती है — “बड़े बागानों के लिए तो बाज़ार और बैंकों से पैसा लिया जा सकता था। लेकिन छोटे-मोटे किसानों का क्या होता?”
यहीं से देशी साहूकार और महाजन दृश्य में आते हैं —
- शिकारीपुरी श्रॉफ़ और नट्टूकोट्टई चेट्टियार उन बहुत सारे बैंकरों और व्यापारियों में से थे जो मध्य एवं दक्षिण पूर्व एशिया में निर्यातोन्मुखी खेती के लिए क़र्ज़े देते थे।
- इसके लिए वे या तो अपनी जेब से पैसा लगाते थे या यूरोपीय बैंकों से क़र्ज़ लेते थे।
- उनके पास दूर-दूर तक पैसे पहुँचाने की एक व्यवस्थित पद्धति होती थी।
- यहाँ तक कि उन्होंने व्यावसायिक संगठनों और क्रियाकलापों के देशी स्वरूप भी विकसित कर लिए थे।
हैदराबादी सिंधी व्यापारी — “अफ़्रीका में यूरोपीय उपनिवेशकारों के पीछे-पीछे भारतीय व्यापारी और महाजन भी जा पहुँचे। हैदराबादी सिंधी व्यापारी तो यूरोपीय उपनिवेशों से भी आगे तक जा निकले। 1860 के दशक से उन्होंने दुनिया भर के बंदरगाहों पर अपने बड़े-बड़े एम्पोरियम खोल दिए। इन दुकानों में सैलानियों को आकर्षक स्थानीय और विदेशी चीज़ें मिलती थीं। यह एक फलता-फूलता कारोबार था क्योंकि सुरक्षित और आरामदेह जलपोतों के आ जाने से सैलानियों की संख्या भी दिनोंदिन बढ़ने लगी थी।”
2.7 भारतीय व्यापार, उपनिवेशवाद और वैश्विक व्यवस्था
यह हिस्सा भारत के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण है। इसे चार चरणों में समझिए।
चरण 1 — पहले भारत कपड़ा भेजता था। भारत में पैदा होने वाली महीन कपास का यूरोपीय देशों को निर्यात किया जाता था।
चरण 2 — ब्रिटेन ने दरवाज़ा बंद कर दिया।
- औद्योगीकरण के बाद ब्रिटेन में भी कपास का उत्पादन बढ़ने लगा था।
- इसी कारण वहाँ के उद्योगपतियों ने सरकार पर दबाव डाला कि वह कपास के आयात पर रोक लगाए और स्थानीय उद्योगों की रक्षा करे।
- फलस्वरूप, ब्रिटेन में आयातित कपड़ों पर सीमा शुल्क थोप दिए गए। वहाँ महीन भारतीय कपास का आयात कम होने लगा।
चरण 3 — भारतीय कपड़ा दूसरे बाज़ारों में भी हारने लगा।
- उन्नीसवीं शताब्दी की शुरुआत से ही ब्रिटिश कपड़ा उत्पादक दूसरे देशों में भी अपने कपड़े के लिए नए-नए बाज़ार ढूँढ़ने लगे थे।
- सीमा शुल्क की व्यवस्था के कारण ब्रिटिश बाज़ारों से बेदख़ल हो जाने के बाद भारतीय कपड़ों को दूसरे अंतर्राष्ट्रीय बाज़ारों में भी भारी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ा।
और अब वे आँकड़े जो परीक्षा में पूछे जाते हैं —
| वर्ष | भारत के कुल निर्यात में सूती कपड़े का हिस्सा |
|---|---|
| सन् 1800 के आसपास | 30 प्रतिशत |
| 1815 | 15 प्रतिशत |
| 1870 | केवल 3 प्रतिशत |
चरण 4 — तो फिर भारत ने किन चीज़ों का निर्यात किया? पाठ्यपुस्तक कहती है — “आँकड़ों के माध्यम से फिर एक नाटकीय कहानी सामने आती है। निर्मित वस्तुओं का निर्यात घटता जा रहा था और उतनी ही तेज़ी से कच्चे मालों का निर्यात बढ़ता जा रहा था।”
| वस्तु | बदलाव |
|---|---|
| कच्चा कपास | 1812 से 1871 के बीच निर्यात 5 प्रतिशत से बढ़कर 35 प्रतिशत तक पहुँच गया |
| नील | कपड़ों की रँगाई के लिए इस्तेमाल होने वाले नील का भी कई दशक तक बड़े पैमाने पर निर्यात होता रहा |
| अफ़ीम | 1820 के दशक से चीन को बड़ी मात्रा में अफ़ीम का निर्यात भी किया जाने लगा। कुछ समय तक तो भारतीय निर्यात में अफ़ीम का हिस्सा ही सबसे ज़्यादा रहा |
अफ़ीम का त्रिकोण — यह ज़रूर समझिए: “ब्रिटेन की सरकार भारत में अफ़ीम की खेती करवाती थी और उसे चीन को निर्यात कर देती थी। अफ़ीम के निर्यात से जो पैसा मिलता था उसके बदले चीन से ही चाय और दूसरे पदार्थों का आयात किया जाता था।”
अब ‘व्यापार अधिशेष’ समझिए — यह अध्याय की सबसे कठिन अवधारणा है।
- उन्नीसवीं शताब्दी में भारतीय बाज़ारों में ब्रिटिश औद्योगिक उत्पादों की बाढ़ ही आ गई थी।
- भारत से ब्रिटेन और शेष विश्व को भेजे जाने वाले खाद्यान्न व कच्चे मालों के निर्यात में इज़ाफ़ा हुआ।
- ब्रिटेन से जो माल भारत भेजा जाता था उसकी क़ीमत से भारत से भेजे जाने वाले माल की क़ीमत से बहुत ज़्यादा होती थी।
- भारत के साथ ब्रिटेन हमेशा ‘व्यापार अधिशेष’ की अवस्था में रहता था।
- इसका मतलब है कि आपसी व्यापार में हमेशा ब्रिटेन को ही फ़ायदा रहता था।
अब आगे — इस अधिशेष का ब्रिटेन ने क्या किया?
- ब्रिटेन इस मुनाफ़े के सहारे दूसरे देशों के साथ होने वाले व्यापारिक घाटे की भरपाई कर लेता था।
- बहुपक्षीय बंदोबस्त ऐसे ही काम करता है। इसमें एक देश के मुक़ाबले दूसरे देश को होने वाले घाटे की भरपाई किसी तीसरे देश के साथ व्यापार में मुनाफ़ा कमा कर की जाती है।
- ब्रिटेन के घाटे की भरपाई में मदद देते हुए भारत ने उन्नीसवीं सदी की विश्व अर्थव्यवस्था का रूप तय करने में एक अहम भूमिका अदा की थी।
और ‘होम चार्जेज’ — यह वह पैसा था जो भारत से बिना कुछ लौटाए चला जाता था: “ब्रिटेन के व्यापार से जो अधिशेष हासिल होता था उससे तथाकथित ‘होम चार्जेज’ (देसी ख़र्चें) का निबटारा होता था। इसके तहत ब्रितानी अफ़सरों और व्यापारियों द्वारा अपने घर में भेजी गई निजी रकम, भारतीय बाहरी क़र्ज़ों पर ब्याज और भारत में काम कर चुके ब्रितानी अफ़सरों की पेंशन शामिल थी।”
सरल भाषा में: भारत माल भेजता था, ब्रिटेन उसका मुनाफ़ा कमाता था, और उसी मुनाफ़े से भारत में काम करने वाले अंग्रेज़ अफ़सरों की तनख़्वाह और पेंशन चुकाई जाती थी। यानी भारत अपने ही शोषण का ख़र्च ख़ुद उठा रहा था।
3. महायुद्धों के बीच अर्थव्यवस्था (पाठ का भाग 3)
पहला महायुद्ध मुख्य रूप से यूरोप में ही लड़ा गया। लेकिन उसके असर सारी दुनिया में महसूस किए गए। इस युद्ध ने विश्व अर्थव्यवस्था को एक ऐसे संकट में ढकेल दिया जिससे उबरने में दुनिया को तीन दशक से भी ज़्यादा समय लग गया। इस दौरान पूरी दुनिया में चौतरफ़ा आर्थिक एवं राजनीतिक अस्थिरता बनी रही और अंत में मानवता एक और विनाशकारी महायुद्ध के नीचे कराहने लगी।
3.1 युद्धकालीन रूपांतरण
पहला विश्वयुद्ध दो खेमों के बीच लड़ा गया था —
| खेमा | देश |
|---|---|
| मित्र राष्ट्र | ब्रिटेन, फ़्रांस और रूस |
| केंद्रीय शक्तियाँ | जर्मनी, ऑस्ट्रिया-हंगरी और ऑटोमन तुर्की |
- अगस्त 1914 में जब युद्ध शुरू हुआ उस समय बहुत सारी सरकारों को यही लगता था कि यह युद्ध ज़्यादा से ज़्यादा क्रिसमस तक ख़त्म हो जाएगा। पर यह युद्ध तो चार साल से भी ज़्यादा समय तक चलता रहा।
यह युद्ध पहले के युद्धों से अलग क्यों था? — यह ‘पहला आधुनिक औद्योगिक युद्ध’ था:
- इस युद्ध में दुनिया के सबसे अगुआ औद्योगिक राष्ट्र एक-दूसरे से जूझ रहे थे और शत्रुओं को नेस्तनाबूद करने के लिए उनके पास बेहिसाब आधुनिक औद्योगिक शक्ति इकट्ठा हो चुकी थी।
- इस युद्ध में मशीनगनों, टैंकों, हवाई जहाज़ों और रासायनिक हथियारों का भयानक पैमाने पर इस्तेमाल किया गया। ये सभी चीज़ें आधुनिक विशाल उद्योगों की देन थीं।
- युद्ध के लिए दुनिया भर से असंख्य सिपाहियों की भर्ती की जानी थी और उन्हें विशाल जलपोतों व रेलगाड़ियों में भर कर युद्ध के मोर्चों पर ले जाया जाना था।
नुक़सान के आँकड़े (ज़रूर याद रखिए):
- युद्ध में 90 लाख से ज़्यादा लोग मारे गए और 2 करोड़ घायल हुए।
- मृतकों और घायलों में से ज़्यादातर कामकाजी उम्र के लोग थे।
- इस महाविनाश के कारण यूरोप में कामकाज के लायक़ लोगों की संख्या बहुत कम रह गई।
- परिवार के सदस्य घट जाने से युद्ध के बाद परिवारों की आय भी गिर गई।
समाज में बदलाव (यह अभ्यास प्रश्न 3-ग का उत्तर है):
- युद्ध संबंधी सामग्री का उत्पादन करने के लिए उद्योगों का पुनर्गठन किया गया।
- युद्ध की ज़रूरतों के मद्देनज़र पूरे के पूरे समाजों को बदल दिया गया।
- मर्द मोर्चे पर जाने लगे तो उन कामों को सँभालने के लिए घर की औरतों को बाहर आना पड़ा जिन्हें अब तक केवल मर्दों का ही काम माना जाता था।
और सबसे बड़ा बदलाव — अमेरिका कर्ज़दाता बन गया:
- युद्ध के कारण दुनिया की कुछ सबसे शक्तिशाली आर्थिक ताक़तों के बीच आर्थिक संबंध टूट गए। अब वे देश एक-दूसरे से बदला लेने पर उतारू थे।
- इस युद्ध के लिए ब्रिटेन को अमेरिकी बैंकों और अमेरिकी जनता से भारी क़र्ज़ा लेना पड़ा।
- फलस्वरूप, इस युद्ध ने अमेरिका को क़र्ज़दार की बजाय कर्ज़दाता देश बना दिया।
- कहने का आशय यह है कि युद्ध के बाद दूसरे देशों में अमेरिका व उसके नागरिकों की संपत्तियों की क़ीमत अमेरिका में दूसरे देशों की सरकारों या उन नागरिकों के स्वामित्व अथवा नियंत्रण वाली संपदाओं से कहीं ज़्यादा हो चुकी थी।
सरल भाषा में: युद्ध से पहले अमेरिका दूसरों का क़र्ज़दार था; युद्ध के बाद बाक़ी दुनिया अमेरिका की क़र्ज़दार हो गई। यही वाक्य आगे महामंदी को समझने की चाबी है।
3.2 युद्धोत्तर सुधार
ब्रिटेन की हालत:
- युद्ध से पहले ब्रिटेन दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था था। युद्ध के बाद सबसे लंबा संकट उसे ही झेलना पड़ा।
- जिस समय ब्रिटेन युद्ध से जूझ रहा था उसी समय भारत और जापान में उद्योग विकसित होने लगे थे।
- युद्ध के बाद भारतीय बाज़ार में पहले वाली वर्चस्वशाली स्थिति प्राप्त करना ब्रिटेन के लिए बहुत मुश्किल हो गया था। अब उसे जापान से भी मुक़ाबला करना था, सो अलग।
- युद्ध के ख़र्चे की भरपाई करने के लिए ब्रिटेन ने अमेरिका से जम कर क़र्ज़ें लिए थे। इसका परिणाम यह हुआ कि युद्ध ख़त्म होने तक ब्रिटेन भारी विदेशी क़र्ज़ों में दब चुका था।
बेरोज़गारी का चक्र:
- युद्ध के कारण आर्थिक उछाह का माहौल पैदा हो गया था क्योंकि माँग, उत्पादन और रोज़गारों में भारी इज़ाफ़ा हुआ था।
- पर जब युद्ध के कारण पैदा हुआ उछाह शांत होने लगा तो उत्पादन गिरने लगा और बेरोज़गारी बढ़ने लगी।
- दूसरी ओर सरकार ने भारी-भरकम युद्ध संबंधी व्यय में भी कटौती शुरू कर दी ताकि शांतिकालीन करों के सहारे ही उनकी भरपाई की जा सके।
- इन सारे प्रयासों से रोज़गार भारी तादाद में ख़त्म हुए। 1921 में हर पाँच में से एक ब्रिटिश मज़दूर के पास काम नहीं था।
- रोज़गार के बारे में बेचैनी और अनिश्चितता युद्धोत्तर वातावरण का अंग बन गई थी।
कृषि का संकट — गेहूँ का उदाहरण:
- युद्ध से पहले पूर्वी यूरोप विश्व बाज़ार में गेहूँ की आपूर्ति करने वाला एक बड़ा केंद्र था।
- युद्ध के दौरान यह आपूर्ति अस्त-व्यस्त हुई तो कनाडा, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में गेहूँ की पैदावार अचानक बढ़ने लगी।
- लेकिन जैसे ही युद्ध समाप्त हुआ पूर्वी यूरोप में गेहूँ की पैदावार सुधरने लगी और विश्व बाज़ारों में गेहूँ की अति की हालत पैदा हो गए।
- अनाज की क़ीमतें गिर गईं, ग्रामीण आय कम हो गई और किसान गहरे क़र्ज़ संकट में फँस गए।
3.3 बड़े पैमाने पर उत्पादन और उपभोग — हेनरी फ़ोर्ड की कहानी
अमेरिका में सुधार की गति तेज़ रही। 1920 के दशक की अमेरिकी अर्थव्यवस्था की एक बड़ी ख़ासियत थी बृहत उत्पादन (Mass Production) का चलन। बृहत उत्पादन की ओर बढ़ने का सिलसिला तो उन्नीसवीं सदी के आख़िर में ही शुरू हो चुका था लेकिन 1920 के दशक में तो यह अमेरिकी औद्योगिक उत्पादन की विशेषता ही बन गया था।
असेंबली लाइन का विचार कहाँ से आया? — यह कहानी बच्चों को बहुत पसंद आती है:
- कार निर्माता हेनरी फ़ोर्ड बृहत उत्पादन के विख्यात प्रणेता थे।
- उन्होंने शिकागो के एक बूचड़ख़ाने की असेंबली लाइन की तर्ज़ पर डेट्रॉयट के अपने कार कारख़ाने में भी आधुनिक असेंबली लाइन स्थापित की थी।
- शिकागो के बूचड़ख़ाने में मरे हुए जानवरों को एक कन्वेयर बेल्ट पर रख दिया जाता था और उसके दूसरे सिरे पर खड़े मांस विक्रेता अपने हिस्से का मांस उठा कर निकलते जाते थे।
- यह देख कर फ़ोर्ड को लगा कि गाड़ियों के उत्पादन के लिए भी असेंबली लाइन का तरीक़ा समय और पैसे, दोनों के लिहाज़ से किफ़ायती साबित हो सकता है।
असेंबली लाइन पर काम कैसा था?
- असेंबली लाइन पर मज़दूरों को एक ही काम — जैसे, कार के किसी ख़ास पुर्ज़े को ही लगाते रहना — मशीनी ढंग से बार-बार करते रहना होता था।
- काम की रफ़्तार इस बात से तय होती थी कि कन्वेयर बेल्ट किस रफ़्तार से चलती है।
- यह काम की गति बढ़ाकर प्रत्येक मज़दूर की उत्पादकता बढ़ाने वाला तरीक़ा था।
- कन्वेयर बेल्ट के साथ खड़े होने के बाद कोई मज़दूर अपने काम में ढील करने या कुछ पल के लिए भी अवकाश लेने का जोखिम नहीं उठा सकता था।
- और तो और, इस व्यवस्था में मज़दूर अपने साथियों के साथ बातचीत भी नहीं कर सकते थे।
परिणाम:
- हेनरी फ़ोर्ड के कारख़ाने की असेंबली लाइन से हर तीन मिनट में एक कार तैयार होकर निकलने लगी। इससे पहले की पद्धतियों के मुक़ाबले यह रफ़्तार कई गुना ज़्यादा थी।
- टी-मॉडल नामक कार बृहत उत्पादन पद्धति से बनी पहली कार थी।
मज़दूरों का विरोध और फ़ोर्ड का जवाब:
- शुरुआत में फ़ोर्ड फ़ैक्ट्री के मज़दूरों को असेंबली लाइन पर पैदा होने वाली थकान झेलने में काफ़ी मुश्किल महसूस हुई क्योंकि वे उसकी रफ़्तार को किसी भी तरह नियंत्रित नहीं कर सकते थे। बहुत सारे मज़दूरों ने काम छोड़ दिया।
- इस चुनौती से निपटने के लिए फ़ोर्ड ने हताश होकर जनवरी 1914 से वेतन दोगुना यानी 5 डॉलर प्रतिदिन कर दिया।
- साथ ही उन्होंने अपने कारख़ानों में ट्रेड यूनियन गतिविधियों पर भी पाबंदी लगा दी।
- तनख़्वाह बढ़ाने से हेनरी फ़ोर्ड के मुनाफ़े में जो कमी आई थी उसकी भरपाई करने के लिए वे अपनी असेंबली लाइन की रफ़्तार बार-बार बढ़ाने लगे। उनके मज़दूरों पर काम का बोझ लगातार बढ़ता रहता था।
- अपने इस फ़ैसले से फ़ोर्ड बहुत संतुष्ट थे। कुछ समय बाद उन्होंने कहा था कि ‘लागत कम करने के लिए’ अपनी ज़िंदगी में उन्होंने इससे अच्छा फ़ैसला कभी नहीं लिया।
बृहत उत्पादन का असर:
- फ़ोर्ड द्वारा अपनाई गई उत्पादन पद्धतियों को जल्दी ही पूरे अमेरिका में अपनाया जाने लगा। बीस के दशक में ही यूरोप में भी उनकी नक़ल की जाने लगी।
- बृहत उत्पादन पद्धति ने इंजीनियरिंग आधारित चीज़ों की लागत और क़ीमत में कमी ला दी।
- बेहतर वेतन के चलते अब बहुत सारे मज़दूर भी कार जैसी टिकाऊ उपभोक्ता वस्तुएँ ख़रीद सकते थे।
कारों के आँकड़े:
| वर्ष | अमेरिका में कारों का उत्पादन |
|---|---|
| 1919 | 20 लाख कार |
| 1929 | 50 लाख कार प्रतिवर्ष से भी ऊपर |
‘हायर-परचेज़’ व्यवस्था — इसे ज़रूर समझिए:
- इसके साथ ही बहुत सारे लोग फ़्रिज, वॉशिंग मशीन, रेडियो, ग्रामोफ़ोन प्लेयर्स आदि भी ख़रीदने लगे।
- ये सब चीज़ें ‘हायर-परचेज़’ व्यवस्था के तहत ख़रीदी जाती थीं। यानी लोग ये सारी चीज़ें क़र्ज़ें पर ख़रीदते थे और उनकी क़ीमत साप्ताहिक या मासिक किस्तों में चुकाई जाती थी।
- उल्लेखनीय है कि घरों का निर्माण या ख़रीदारी भी क़र्ज़ें पर ही की जा रही थी।
समृद्धि का चक्र: 1920 के दशक में आवास एवं निर्माण क्षेत्र में आए उछाल से अमेरिकी संपन्नता का आधार पैदा हो चुका था। बढ़ते उपभोग के लिए और ज़्यादा निवेश की ज़रूरत थी जिससे और नए रोज़गार व आमदनी में वृद्धि होने लगती थी।
- 1923 में अमेरिका शेष विश्व को पूँजी का निर्यात दोबारा करने लगा और वह दुनिया में सबसे बड़ा कर्ज़दाता देश बन गया।
- अमेरिका द्वारा आयात और पूँजी निर्यात ने यूरोपीय अर्थव्यवस्थाओं को भी संकट से उबरने में मदद दी। अगले छह साल में विश्व व्यापार व आय वृद्धि दर में काफ़ी सुधार आया।
और फिर पाठ्यपुस्तक का सबसे नाटकीय वाक्य आता है: “लेकिन यह स्थिति लंबे समय तक क़ायम नहीं रह पाई। 1929 तक आते-आते दुनिया एक ऐसे आर्थिक संकट में फँस गई जिसका दुनिया ने पहले कभी अनुभव नहीं किया था।”
3.4 महामंदी
आर्थिक महामंदी की शुरुआत 1929 से हुई और यह संकट तीस के दशक के मध्य तक बना रहा। इस दौरान दुनिया के ज़्यादातर हिस्सों के उत्पादन, रोज़गार, आय और व्यापार में भयानक गिरावट दर्ज की गई। इस मंदी का समय और असर सब देशों में एक जैसा नहीं था लेकिन आमतौर पर ऐसा माना जा सकता है कि कृषि क्षेत्रों और समुदायों पर इसका सबसे बुरा असर पड़ा। ऐसा इसलिए हुआ था क्योंकि औद्योगिक उत्पादों की तुलना में खेतिहर उत्पादों की क़ीमतों में ज़्यादा भारी और ज़्यादा समय तक कमी बनी रही।
महामंदी के कारण — यह अभ्यास प्रश्न 8 है, इसे तीन कारणों में बाँटकर लिखिए।
कारण 1 — कृषि क्षेत्र में अति उत्पादन का दुष्चक्र।
- कृषि उत्पादों की गिरती क़ीमतों के कारण स्थिति और ख़राब हो गई थी।
- क़ीमतें गिरीं और किसानों की आय घटने लगी तो आमदनी बढ़ाने के लिए किसान उत्पादन बढ़ाने का प्रयास करने लगे ताकि कम क़ीमत पर ही सही लेकिन ज़्यादा माल पैदा करके वे अपना आय स्तर बनाए रख सकें।
- फलस्वरूप, बाज़ार में कृषि उत्पादों की आमद और भी बढ़ गई। ज़ाहिर है, क़ीमतें और नीचे चली गईं।
- ख़रीदारों के अभाव में कृषि उपज पड़ी-पड़ी सड़ने लगी।
कारण 2 — अमेरिकी क़र्ज़ों का अचानक वापस खिंच जाना।
- 1920 के दशक के मध्य में बहुत सारे देशों ने अमेरिका से क़र्ज़ें लेकर अपनी निवेश संबंधी ज़रूरतों को पूरा किया था।
- जब हालात अच्छे थे तो अमेरिका से क़र्ज़ा जुटाना बहुत आसान था लेकिन संकट का संकेत मिलते ही अमेरिकी उद्यमियों के होश उड़ गए।
- 1928 के पहले छह माह तक विदेशों में अमेरिका का क़र्ज़ा एक अरब डॉलर था। साल भर के भीतर यह कर्ज़ा घटकर केवल चौथाई रह गया था।
- जो देश अमेरिकी क़र्ज़ों पर सबसे ज़्यादा निर्भर थे उनके सामने गहरा संकट आ खड़ा हुआ।
कारण 3 — बैंकों का धराशायी होना और सीमा शुल्क।
- यूरोप में कई बड़े बैंक धराशायी हो गए। कई देशों की मुद्रा की क़ीमत बुरी तरह गिर गई।
- इस झटके से ब्रिटिश पाउंड भी नहीं बच पाया।
- लैटिन अमेरिका और अन्य जगहों पर कृषि एवं कच्चे मालों की क़ीमतें तेज़ी से लुढ़कने लगीं।
- अमेरिकी सरकार इस महामंदी से अपनी अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए आयातित पदार्थों पर दो गुना सीमा शुल्क वसूल करने लगी। इस फ़ैसले ने तो विश्व व्यापार की कमर ही तोड़ दी।
अमेरिका पर सबसे बुरा असर — इसे क्रम से लिखिए:
| क्रम | घटना |
|---|---|
| 1 | क़ीमतों में कमी और मंदी की आशंका को देखते हुए अमेरिकी बैंकों ने घरेलू क़र्ज़ें देना बंद कर दिया। |
| 2 | जो क़र्ज़ें दिए जा चुके थे उनकी वसूली तेज़ कर दी गई। |
| 3 | किसान उपज नहीं बेच पा रहे थे, परिवार तबाह हो गए, कारोबार ठप पड़ गए। |
| 4 | आमदनी में गिरावट आने पर अमेरिका के बहुत सारे परिवार क़र्ज़ें चुकाने में नाकामयाब हो गए जिसके चलते उनके मकान, कार और सारी ज़रूरी चीज़ें कुर्क कर ली गईं। |
| 5 | बीस के दशक में जो उपभोक्तावादी संपन्नता दिखाई दे रही थी वह धूल के गुबार की तरह रातोंरात काफ़ूर हो गई थी। |
| 6 | बेरोज़गारी बढ़ी तो लोग काम की तलाश में दूर-दूर तक जाने लगे। |
| 7 | आख़िरकार अमेरिकी बैंकिंग व्यवस्था भी धराशायी हो गई। निवेश से अपेक्षित लाभ न पा सकने, क़र्ज़ें वसूल न कर पाने और जमाकर्ताओं की जमा पूँजी न लौटा पाने के कारण हज़ारों बैंक दिवालिया हो गए और बंद कर दिए गए। |
आँकड़े: 1933 तक 4,000 से ज़्यादा बैंक बंद हो चुके थे और 1929 से 1932 के बीच तक़रीबन 1,10,000 कंपनियाँ चौपट हो चुकी थीं।
अंत: यद्यपि 1935 तक ज़्यादातर औद्योगिक देशों में आर्थिक संकट से उबरने के संकेत दिखाई देने लगे थे लेकिन समाजों, अंतर्राष्ट्रीय संबंधों और राजनीति तथा लोगों के दिलो-दिमाग़ पर उसकी जो छाप पड़ी थी वह जल्दी मिटने वाली नहीं थी।
बॉक्स 3 — डॉरोथी लेंग की तस्वीर की कहानी। पाठ्यपुस्तक ने 1936 की उस विख्यात तस्वीर की कहानी दी है जिसमें एक भूखी माँ अपने बच्चों के साथ बैठी है। फ़ोटोग्राफ़र डॉरोथी लेंग ने बाद में लिखा —
“मैंने इस भूखी, लाचार औरत को देखा और मानो किसी चुंबक से खिंची मैं उसकी ओर बढ़ती चली गई… मैंने न तो उसका नाम पूछा न उसके अतीत के बारे में सवाल किए। उसने मुझे अपनी उम्र बताई। उसने कहा कि उसकी उम्र पैंतीस साल है। उसने कहा कि वे लोग (यानी माँ और उसके सात बच्चे) आसपास के खेतों में जाड़ों में जमी पड़ी सब्ज़ियों और उन परिंदों के सहारे ज़िंदा हैं जिन्हें उसके बच्चे मार लाते हैं… वो वहाँ बैठी थी… अपने बच्चों को चिपटाए, शायद उसे लगता था कि मेरी तसवीर उसकी कोई मदद कर सकती है इसलिए उसने मेरी मदद कर दी…”
3.5 भारत और महामंदी
यह हिस्सा अभ्यास प्रश्न 3-घ का उत्तर है और परीक्षा में बहुत पूछा जाता है।
“यदि हम इस बात पर ध्यान दें कि महामंदी से भारत पर क्या असर पड़ा तो इस बात को अच्छी तरह समझ सकते हैं कि बीसवीं सदी की शुरुआत तक वैश्विक अर्थव्यवस्था कितनी एकीकृत हो चुकी थी। दुनिया के एक हिस्से में पैदा होने वाले संकट की कँपकँपाहट बाक़ी हिस्सों तक भी पहुँच जाती थी और उससे दुनिया भर में लोगों की ज़िंदगी, अर्थव्यवस्थाएँ और समाज प्रभावित हो उठते थे।”
भारत की स्थिति:
- औपनिवेशिक भारत कृषि वस्तुओं का निर्यातक और तैयार मालों का आयातक बन चुका था।
- महामंदी ने भारतीय व्यापार को फ़ौरन प्रभावित किया।
आँकड़े जो याद रखने हैं:
| आँकड़ा | विवरण |
|---|---|
| 1928 से 1934 | देश के आयात-निर्यात घट कर लगभग आधे रह गए थे |
| 1928 से 1934 | भारत में गेहूँ की क़ीमत 50 प्रतिशत गिर गई |
| कच्चा पटसन | टाट का निर्यात बंद होने पर कच्चे पटसन की क़ीमतों में 60 प्रतिशत से भी ज़्यादा गिरावट आ गई |
किसान पर सबसे बुरी मार क्यों पड़ी?
- शहरी निवासियों के मुक़ाबले किसानों और काश्तकारों को ज़्यादा नुक़सान हुआ।
- यद्यपि कृषि उत्पादों की क़ीमत तेज़ी से नीचे गिरी लेकिन सरकार ने लगान वसूली में छूट देने से साफ़ इनकार कर दिया।
- सबसे बुरी मार उन काश्तकारों पर पड़ी जो विश्व बाज़ार के लिए उपज पैदा करते थे।
बंगाल के जूट उत्पादकों का उदाहरण:
- वे कच्चा पटसन उगाते थे जिससे कारख़ानों में टाट की बोरियाँ बनाई जाती थीं।
- जब टाट का निर्यात बंद हो गया तो कच्चे पटसन की क़ीमतों में 60 प्रतिशत से भी ज़्यादा गिरावट आ गई।
- जिन काश्तकारों ने दिन फिरने की उम्मीद में या बेहतर आमदनी के लिए उपज बढ़ाने के वास्ते क़र्ज़ें ले लिए थे उनकी हालत भी उपज का सही मोल न मिलने के कारण ख़राब थी। वे दिनोंदिन और क़र्ज़ में डूबते जा रहे थे।
बंगाल के एक कवि की पंक्तियाँ (परीक्षा में स्रोत-प्रश्न के रूप में आ सकती हैं):
चलो भाइयों, नक़द की उम्मीद में और ज़्यादा पटसन तुम उगाओ लागत और क़र्ज़ें में पिसकर नाउम्मीदी पाओ सारी पूँजी लगा-फँसाकर फ़सल खड़ी कर जाओ …घर पर बैठे बनिये देंगे पाँच रुपये मन भाव
काश्तकारों की तबाही:
- पूरे देश में काश्तकार पहले से भी ज़्यादा क़र्ज़ में डूब गए।
- ख़र्चे पूरे करने के चक्कर में उनकी बचत ख़त्म हो चुकी थी, ज़मीन सूदख़ोरों के पास गिरवी पड़ी थी, घर में जो भी गहने-ज़ेवर थे बिक चुके थे।
- मंदी के इन्हीं सालों में भारत क़ीमती धातुओं, ख़ासतौर से सोने का निर्यात करने लगा।
- प्रसिद्ध अर्थशास्त्री कीन्स का मानना था कि भारतीय सोने के निर्यात से भी वैश्विक अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने में काफ़ी मदद मिली।
- इस निर्यात ने ब्रिटेन की आर्थिक दशा सुधारने में तो निश्चय ही मदद दी लेकिन भारतीय किसानों को कोई लाभ नहीं हुआ।
और यहीं इतिहास से जुड़ाव है (यह बात परीक्षा में अलग से पूछी जाती है):
“1931 में मंदी अपने चरम पर थी और ग्रामीण भारत असंतोष व उथल-पुथल के दौर से गुज़र रहा था। उसी समय महात्मा गांधी ने सविनय अवज्ञा (सिविल नाफ़रमानी) आंदोलन शुरू किया।”
शहरी भारत पर असर अलग था:
- यह मंदी शहरी भारत के लिए इतनी दुखदाई नहीं रही।
- क़ीमतें गिरते जाने के बावजूद शहरों में रहने वाले ऐसे लोगों की हालत ठीक रही जिनकी आय निश्चित थी। जैसे, शहर में रहने वाले ज़मींदार जिन्हें अपनी ज़मीन पर बँधा-बँधाया भाड़ा मिलता था, या मध्यवर्गीय वेतनभोगी कर्मचारी।
- राष्ट्रवादी खेमे के दबाव में उद्योगों की रक्षा के लिए सीमा शुल्क बढ़ा दिए गए थे जिससे औद्योगिक क्षेत्र में भी निवेश में तेज़ी आई।
4. विश्व अर्थव्यवस्था का पुनर्निर्माण — युद्धोत्तर काल (पाठ का भाग 4)
पहला विश्व युद्ध ख़त्म होने के केवल दो दशक बाद दूसरा विश्व युद्ध शुरू हो गया।
| खेमा | देश |
|---|---|
| धुरी शक्तियाँ | मुख्य रूप से नात्सी जर्मनी, जापान और इटली |
| मित्र राष्ट्र | ब्रिटेन, सोवियत संघ, फ़्रांस और अमेरिका |
- छह साल तक चला यह युद्ध ज़मीन, हवा और पानी में असंख्य मोर्चों पर लड़ा गया।
- माना जाता है कि इस जंग के कारण प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से क़रीब 6 करोड़ लोग मारे गए। यह 1939 की वैश्विक जनसंख्या का लगभग 3 प्रतिशत था। करोड़ों लोग घायल हुए।
इस युद्ध की एक ख़ास बात ज़रूर याद रखिए: “अब तक के युद्धों में मोर्चे पर मरने वालों की संख्या ज़्यादा होती थी। इस युद्ध में ऐसे लोग ज़्यादा मरे जो किसी मोर्चे पर लड़ नहीं रहे थे।” यूरोप और एशिया के विशाल भूभाग तबाह हुए। कई शहर हवाई बमबारी या लगातार गोलाबारी के कारण मिट्टी में मिल गए।
युद्धोत्तर पुनर्निर्माण के दो प्रभाव:
- पश्चिमी विश्व में अमेरिका आर्थिक, राजनीतिक और सैनिक दृष्टि से एक वर्चस्वशाली ताक़त बन चुका था।
- दूसरी ओर सोवियत संघ भी एक वर्चस्वशाली शक्ति के रूप में सामने आया। नात्सी जर्मनी को हराने के लिए सोवियत संघ की जनता ने भारी क़ुर्बानियाँ दी थीं। जिस समय पूँजीवादी दुनिया महामंदी से जूझ रही थी उसी दौरान सोवियत संघ के लोगों ने अपने देश को एक पिछड़े खेतिहर देश की जगह एक विश्व शक्ति की हैसियत में ला खड़ा किया था।
4.1 युद्धोत्तर बंदोबस्त और ब्रेटन वुड्स संस्थान
दो महायुद्धों के बीच मिले आर्थिक अनुभवों से अर्थशास्त्रियों और राजनीतिज्ञों ने दो अहम सबक़ निकाले। यह प्रश्न ‘चर्चा करें’ में भी पूछा गया है।
पहला सबक़:
- बृहत उत्पादन पर आधारित किसी औद्योगिक समाज को व्यापक उपभोग के बिना क़ायम नहीं रखा जा सकता।
- लेकिन व्यापक उपभोग को बनाए रखने के लिए यह आवश्यक था कि आमदनी काफ़ी ज़्यादा और स्थिर हो।
- यदि रोज़गार अस्थिर होंगे तो आय स्थिर नहीं हो सकती थी। स्थिर आय के लिए पूर्ण रोज़गार भी ज़रूरी था।
- लेकिन बाज़ार पूर्ण रोज़गार की गारंटी नहीं दे सकता। क़ीमत, उपज और रोज़गार में आने वाले उतार-चढ़ावों को नियंत्रित करने के लिए सरकार का दख़ल ज़रूरी था।
- आर्थिक स्थिरता केवल सरकारी हस्तक्षेप के ज़रिये ही सुनिश्चित की जा सकती थी।
दूसरा सबक़:
- यह बाहरी दुनिया के साथ आर्थिक संबंधों के बारे में था।
- पूर्ण रोज़गार का लक्ष्य केवल तभी हासिल किया जा सकता है जब सरकार के पास वस्तुओं, पूँजी और श्रम की आवाजाही को नियंत्रित करने की ताक़त उपलब्ध हो।
इसलिए युद्धोत्तर अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य यह था कि औद्योगिक विश्व में आर्थिक स्थिरता एवं पूर्ण रोज़गार बनाए रखा जाए।
ब्रेटन वुड्स सम्मेलन — यह अभ्यास प्रश्न 5 है, इसे शब्दशः याद कीजिए:
| प्रश्न | उत्तर |
|---|---|
| कब? | जुलाई 1944 |
| कहाँ? | अमेरिका स्थित न्यू हैम्पशर के ब्रेटन वुड्स नामक स्थान पर (माउंट वाशिंगटन होटल में) |
| किस नाम से? | संयुक्त राष्ट्र मौद्रिक एवं वित्तीय सम्मेलन |
| क्या तय हुआ? | इस फ़्रेमवर्क पर सहमति बनी |
दो संस्थाएँ बनीं:
| संस्था | पूरा नाम | उद्देश्य |
|---|---|---|
| आई.एम.एफ़. | अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (International Monetary Fund) | सदस्य देशों के विदेश व्यापार में लाभ और घाटे से निपटने के लिए |
| विश्व बैंक | अंतर्राष्ट्रीय पुनर्निर्माण एवं विकास बैंक | युद्धोत्तर पुनर्निर्माण के लिए पैसे का इंतज़ाम करने के वास्ते |
- इसी वजह से विश्व बैंक और आई.एम.एफ़. को ब्रेटन वुड्स संस्थान या ब्रेटन वुड्स ट्विन (ब्रेटन वुड्स की जुड़वाँ संतान) भी कहा जाता है।
- इसी आधार पर युद्धोत्तर अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था को अकसर ब्रेटन वुड्स व्यवस्था भी कहा जाता है।
- विश्व बैंक और आई.एम.एफ़. ने 1947 में औपचारिक रूप से काम करना शुरू किया।
- इन संस्थानों की निर्णय प्रक्रिया पर पश्चिमी औद्योगिक देशों का नियंत्रण रहता है।
- अमेरिका विश्व बैंक और आई.एम.एफ़. के किसी भी फ़ैसले को वीटो कर सकता है।
स्थिर विनिमय दर — इसे ध्यान से समझिए:
- अंतर्राष्ट्रीय मौद्रिक व्यवस्था राष्ट्रीय मुद्राओं और मौद्रिक व्यवस्थाओं को एक-दूसरे से जोड़ने वाली व्यवस्था है।
- ब्रेटन वुड्स व्यवस्था निश्चित विनिमय दरों पर आधारित होती थी।
- इस व्यवस्था में राष्ट्रीय मुद्राएँ, जैसे भारतीय मुद्रा — रुपया — डॉलर के साथ एक निश्चित विनिमय दर से बँधा हुआ था। एक डॉलर के बदले में कितने रुपये देने होंगे, यह स्थिर रहता था।
- डॉलर का मूल्य भी सोने से बँधा हुआ था। एक डॉलर की क़ीमत 35 औंस सोने के बराबर निर्धारित की गई थी।
यहाँ एक सुधार ज़रूरी है, जिसका ज़िक्र 07-NCERT से आगे वाली फ़ाइल में विस्तार से किया गया है। असल में एक औंस सोने की क़ीमत 35 डॉलर तय की गई थी, न कि एक डॉलर की क़ीमत 35 औंस सोना। बोर्ड परीक्षा में पाठ्यपुस्तक का ही वाक्य लिखिए, पर सही तथ्य आपको मालूम होना चाहिए।
4.2 प्रारंभिक युद्धोत्तर वर्ष
ब्रेटन वुड्स व्यवस्था ने पश्चिमी औद्योगिक राष्ट्रों और जापान के लिए व्यापार तथा आय में वृद्धि के एक अप्रतिम युग का सूत्रपात किया।
| आँकड़ा | विवरण |
|---|---|
| 1950 से 1970 के बीच | विश्व व्यापार की विकास दर सालाना 8 प्रतिशत से भी ज़्यादा रही |
| इसी दौरान | वैश्विक आय में लगभग 5 प्रतिशत की दर से वृद्धि हो रही थी |
| विकास दर | कमोबेश स्थिर भी थी; इसमें ज़्यादा उतार-चढ़ाव नहीं आए |
| बेरोज़गारी | इस दौरान ज़्यादातर समय अधिकांश औद्योगिक देशों में बेरोज़गारी औसतन 5 प्रतिशत से भी कम ही रही |
- इन दशकों में तकनीक और उद्यम का विश्वव्यापी प्रसार हुआ।
- विकासशील देश विकसित औद्योगिक देशों के बराबर पहुँचने की जीतोड़ कोशिश कर रहे थे। इसीलिए उन्होंने आधुनिक तकनीक से चलने वाले संयंत्रों और उपकरणों के आयात पर बेहिसाब पूँजी का निवेश किया।
4.3 अनौपनिवेशीकरण और स्वतंत्रता
- दूसरा विश्व युद्ध ख़त्म होने के बाद भी दुनिया का एक बहुत बड़ा भाग यूरोपीय औपनिवेशिक शासन के अधीन था।
- अगले दो दशकों में एशिया और अफ़्रीका के ज़्यादातर उपनिवेश स्वतंत्र, स्वाधीन राष्ट्र बन चुके थे।
- लेकिन ये सभी देश ग़रीबी या संसाधनों की कमी से जूझ रहे थे। उनकी अर्थव्यवस्थाएँ और समाज लंबे समय तक चले औपनिवेशिक शासन के कारण अस्त-व्यस्त हो चुके थे।
पर आई.एम.एफ़. और विश्व बैंक उनके लिए नहीं बने थे:
- आई.एम.एफ़. और विश्व बैंक का गठन तो औद्योगिक देशों की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए ही किया गया था।
- ये संस्थान भूतपूर्व उपनिवेशों में ग़रीबी की समस्या और विकास की कमी से निपटने में दक्ष नहीं थे।
- लेकिन जिस प्रकार यूरोप और जापान ने अपनी अर्थव्यवस्थाओं का पुनर्गठन किया था उसके कारण ये देश आई.एम.एफ़. और विश्व बैंक पर बहुत निर्भर भी नहीं थे।
- इसी कारण पचास के दशक के आख़िरी सालों में आकर ब्रेटन वुड्स संस्थान विकासशील देशों पर भी पहले से ज़्यादा ध्यान देने लगे।
विडंबना — यह वाक्य ज़रूर याद रखिए:
“विडंबना यह थी कि नवस्वाधीन राष्ट्रों के रूप में भी अपनी जनता को ग़रीबी और पिछड़ेपन की गर्त से बाहर निकालने के लिए उन्हें ऐसे अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों की मदद लेनी पड़ी जिन पर भूतपूर्व औपनिवेशिक शक्तियों का ही वर्चस्व था।”
- अनौपनिवेशीकरण के बहुत साल बीत जाने के बाद भी बहुत सारे नवस्वाधीन राष्ट्रों की अर्थव्यवस्थाओं पर भूतपूर्व औपनिवेशिक शक्तियों का ही नियंत्रण बना हुआ था।
- जो देश ब्रिटेन और फ़्रांस के उपनिवेश रह चुके थे या जहाँ कभी उनका राजनीतिक प्रभुत्व रह चुका था वहाँ के महत्त्वपूर्ण संसाधनों, जैसे खनिज संपदा और ज़मीन पर अभी भी ब्रिटिश और फ़्रांसीसी कंपनियों का ही नियंत्रण था और वे इस नियंत्रण को छोड़ने के लिए किसी भी क़ीमत पर तैयार नहीं थीं।
- कई बार अमेरिका जैसे अन्य शक्तिशाली देशों की बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ भी विकासशील देशों के प्राकृतिक संसाधनों का बहुत कम क़ीमत पर दोहन करने लगती थीं।
जी-77 और नयी अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक प्रणाली (यह अभ्यास प्रश्न 9 है):
- ज़्यादातर विकासशील देशों को पचास और साठ के दशक में पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं की तेज़ प्रगति से कोई लाभ नहीं हुआ।
- इस समस्या को देखते हुए उन्होंने एक नयी अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक प्रणाली (New International Economic Order – NIEO) के लिए आवाज़ उठाई और समूह 77 (जी-77) के रूप में संगठित हो गए।
एन.आई.ई.ओ. से उनका आशय ऐसी व्यवस्था से था जिसमें उन्हें चार चीज़ें मिलें —
- अपने संसाधनों पर सही मायनों में नियंत्रण मिल सके
- विकास के लिए अधिक सहायता मिले
- कच्चे माल के सही दाम मिलें
- अपने तैयार मालों को विकसित देशों के बाज़ारों में बेचने के लिए बेहतर पहुँच मिले
बॉक्स 4 — बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ (एमएनसी):
- एक साथ बहुत सारे देशों में व्यवसाय करने वाली कंपनियों को बहुराष्ट्रीय निगम (मल्टीनेशनल कॉर्पोरेशन-एमएनसी) या बहुराष्ट्रीय कंपनी कहा जाता है।
- शुरुआती बहुराष्ट्रीय कंपनियों की स्थापना 1920 के दशक में की गई थी।
- पचास व साठ के दशक में जब अमेरिकी व्यवसाय दुनिया भर में फैलते जा रहे थे और पश्चिमी यूरोप एवं जापान भी विश्वयुद्ध के प्रभाव से बाहर निकलते हुए शक्तिशाली औद्योगिक राष्ट्र बनने की ओर अग्रसर थे उस समय ऐसी बहुत सारी नयी कंपनियाँ सामने आईं।
- बहुराष्ट्रीय कंपनियों का विश्वव्यापी प्रसार पचास और साठ के दशक की एक विशेषता था।
- इसके पीछे आंशिक रूप से इस बात का भी हाथ था कि ज़्यादातर सरकारें बाहर से आने वाली चीज़ों पर भारी आयात शुल्क वसूल करती थीं जिसके कारण बड़ी कंपनियों को अपने संयंत्र उन्हीं देशों में लगाने पड़ते थे जहाँ वे अपने उत्पाद बेचना चाहती थीं। उन्हें ‘घरेलू उत्पादकों’ के रूप में काम करना पड़ता था।
4.4 ब्रेटन वुड्स का समापन और ‘वैश्वीकरण’ की शुरुआत
यह अध्याय का अंतिम और आज की दुनिया से सबसे ज़्यादा जुड़ा हुआ हिस्सा है।
पहला कारण — अमेरिका की कमज़ोरी:
- सालों की स्थिर और तेज़ वृद्धि के बावजूद युद्धोत्तर दुनिया में सब कुछ सही नहीं चल रहा था।
- साठ के दशक से ही विदेशों में अपनी गतिविधियों की भारी लागत ने अमेरिका की वित्तीय और प्रतिस्पर्धी क्षमता को कमज़ोर कर दिया था।
- अमेरिकी डॉलर अब दुनिया की प्रधान मुद्रा के रूप में पहले जितना सम्मानित और निर्विवाद नहीं रह गया था।
- सोने की तुलना में डॉलर की क़ीमत गिरने लगी थी।
- अंतत: स्थिर विनिमय दर की व्यवस्था विफल हो गई और प्रवाहमयी या अस्थिर विनिमय दर की व्यवस्था शुरू की गई।
दूसरा कारण — विकासशील देशों का क़र्ज़ संकट:
- सत्तर के दशक के मध्य से अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों में भी भारी बदलाव आ चुके थे।
- अब तक विकासशील देश क़र्ज़ें और विकास संबंधी सहायता के लिए अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों की शरण ले सकते थे लेकिन अब उन्हें पश्चिम के व्यावसायिक बैंकों और निजी ऋणदाता संस्थानों से क़र्ज़ न लेने के लिए बाध्य किया जाने लगा।
- विकासशील विश्व में समय-समय पर क़र्ज़ संकट पैदा होने लगा जिसके कारण आय में गिरावट आती थी और ग़रीबी बढ़ने लगती थी।
- अफ़्रीका और लैटिन अमेरिका में यह समस्या सबसे ज़्यादा दिखाई दी।
तीसरा कारण — औद्योगिक देशों में बेरोज़गारी:
- औद्योगिक विश्व भी बेरोज़गारी की समस्या में फँसने लगा था।
- सत्तर के दशक के मध्य से बेरोज़गारी बढ़ने लगी। नब्बे के दशक के प्रारंभिक वर्षों तक वहाँ काफ़ी बेरोज़गारी रही।
- सत्तर के दशक के आख़िर सालों से बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ भी एशिया के ऐसे देशों में उत्पादन केंद्रित करने लगीं जहाँ वेतन कम थे।
चौथा कारण — चीन का लौटना (यह आज की दुनिया को समझने की चाबी है):
- चीन 1949 की क्रांति के बाद विश्व अर्थव्यवस्था से अलग-थलग ही था।
- परंतु चीन में नयी आर्थिक नीतियों और सोवियत खेमे के बिखराव तथा पूर्वी यूरोप में सोवियत शैली की व्यवस्था समाप्त हो जाने के पश्चात बहुत सारे देश दोबारा विश्व अर्थव्यवस्था का अंग बन गए।
- चीन जैसे देशों में वेतन तुलनात्मक रूप से कम थे। फलस्वरूप विश्व बाज़ारों पर अपना प्रभुत्व क़ायम करने के लिए प्रतिस्पर्धा कर रही विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने वहाँ जमकर निवेश करना शुरू कर दिया।
और अंत में पाठ्यपुस्तक आपसे एक सवाल पूछती है:
“क्या आपने इस बात पर ध्यान दिया है कि हमारे ज़्यादातर टेलीविज़न, मोबाइल फ़ोन और खिलौने चीन में बने होते हैं या वहाँ के जैसे ही लगते हैं? यह चीनी अर्थव्यवस्था की अल्प लागत अर्थव्यवस्था और ख़ास तौर से वहाँ के कम वेतनों का नतीजा है।”
अध्याय का अंतिम वाक्य:
“उद्योगों को कम वेतन वाले देशों में ले जाने से वैश्विक व्यापार और पूँजी प्रवाहों पर भी असर पड़ा। पिछले दो दशक में भारत, चीन और ब्राज़ील आदि देशों की अर्थव्यवस्थाओं में आए भारी बदलावों के कारण दुनिया का आर्थिक भूगोल पूरी तरह बदल चुका है।”
5. पूरे अध्याय की एक तालिका — दुनिया कब-कब जुड़ी और कब-कब टूटी
| काल | दुनिया जुड़ी या टूटी? | कैसे |
|---|---|---|
| प्राचीन काल से 15वीं सदी | जुड़ी | सिल्क मार्ग, कौड़ियाँ, धर्म, बौद्ध धर्म का प्रसार |
| 16वीं सदी | जुड़ी (पर हिंसक ढंग से) | अमेरिका की ‘खोज’, चाँदी, नयी फ़सलें, चेचक, ग़ुलाम व्यापार |
| 1815 से 1914 | सबसे ज़्यादा जुड़ी | तीन प्रवाह — व्यापार, श्रम, पूँजी; रेलवे, भाप जहाज़, टेलिग्राफ़ |
| 1914 से 1945 | टूटी | दो महायुद्ध, महामंदी, ऊँचे सीमा शुल्क, बंद बाज़ार |
| 1945 से 1970 | फिर जुड़ी (नियंत्रित ढंग से) | ब्रेटन वुड्स, स्थिर विनिमय दर, आई.एम.एफ़. और विश्व बैंक |
| 1970 के बाद | नए ढंग से जुड़ी | अस्थिर विनिमय दर, बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ, चीन का लौटना, आज का वैश्वीकरण |
इस तालिका को याद कर लीजिए। अगर परीक्षा में कोई प्रश्न पूछा जाए कि “भूमंडलीकृत विश्व के बनने की प्रक्रिया का वर्णन कीजिए” — तो यही छह पंक्तियाँ फैलाकर लिख देना पूरा उत्तर बन जाएगा।
6. तीन बीमारियाँ, तीन इतिहास — एक विशेष तुलना
पाठ्यपुस्तक में तीन जगह बीमारी ने इतिहास बदला है। इन्हें एक साथ याद रखने से तीनों याद रह जाएँगे।
| बीमारी | कहाँ | कब | परिणाम |
|---|---|---|---|
| चेचक | अमेरिका | 16वीं सदी | मूल निवासी समुदाय ख़त्म हुए; स्पेनिश विजय आसान हुई |
| आलू की फ़सल की बीमारी | आयरलैंड | 1845–1849 | लगभग 10,00,000 लोग मरे; दोगुने लोग पलायन कर गए |
| रिंडरपेस्ट (मवेशी प्लेग) | अफ़्रीका | 1880 के दशक के आख़िर से 1897 तक | 90 प्रतिशत मवेशी मरे; अफ़्रीकी मज़दूरी करने पर मजबूर हुए |
तीनों में एक ही पैटर्न है — बीमारी उस समाज को तोड़ती है जो उसके लिए तैयार नहीं था, और उस तोड़-फोड़ का फ़ायदा हमलावर उठाता है।
7. अभ्यास प्रश्नों के संकेत (पाठ्यपुस्तक पृष्ठ 78)
संक्षेप में लिखें —
- सत्रहवीं सदी से पहले होने वाले आदान-प्रदान के दो उदाहरण। — एशिया से: सिल्क मार्ग से चीनी रेशम और भारतीय मसाले पश्चिम गए, और उसी रास्ते बौद्ध धर्म फैला। अमेरिका से: आलू, मक्का, टमाटर और मिर्च यूरोप-एशिया पहुँचे।
- बीमारियों ने अमेरिकी भूभागों के उपनिवेशीकरण में कैसे मदद दी? — चेचक ने मूल निवासियों को मारा क्योंकि उनके शरीर में रोग-प्रतिरोधी क्षमता नहीं थी; यह ऐसा हथियार था जिसे छीना या ख़रीदा नहीं जा सकता था।
- (क) कॉर्न लॉ · (ख) रिंडरपेस्ट · (ग) विश्वयुद्ध से पुरुषों की मौत · (घ) भारतीय अर्थव्यवस्था पर महामंदी · (ङ) बहुराष्ट्रीय कंपनियों का एशिया जाना — इन पाँचों के उत्तर ऊपर क्रमश: भाग 2.1, 2.4, 3.1, 3.5 और 4.4 में पूरे वाक्यों में दिए गए हैं।
- खाद्य उपलब्धता पर तकनीक के प्रभाव के दो उदाहरण। — रेफ़्रिजरेशन वाले जहाज़ों से मांस सस्ता हुआ; रेलवे और तेज़ जहाज़ों से गेहूँ हज़ारों मील दूर पहुँचने लगा।
- ब्रेटन वुड्स समझौते का अर्थ। — भाग 4.1 देखिए।
चर्चा करें —
- गिरमिटिया मज़दूर बनकर पत्र लिखिए। — 06-फ़्लैशकार्ड और 08-PARAKH फ़ाइल में इसका पूरा नमूना दिया गया है।
- तीन प्रवाह और भारत के उदाहरण। — भाग 2.0 की तालिका पूरी लिख दीजिए।
- महामंदी के कारण। — भाग 3.4 के तीन कारण।
- जी-77 और ब्रेटन वुड्स की जुड़वाँ संतानों की प्रतिक्रिया। — भाग 4.3 देखिए।
8. महत्त्वपूर्ण व्यक्ति — एक नज़र में
| नाम | पहचान |
|---|---|
| क्रिस्टोफ़र कोलंबस | 1490 के दशक में ग़लती से अमेरिका पहुँचा; उसके बाद अमेरिका की फ़सलें और धातुएँ दुनिया भर में फैलीं |
| जॉन विनथॉर्प | मैसाचुसेट्स बे कॉलोनी का पहला गवर्नर; 1634 में लिखा कि चेचक उपनिवेशकारों के लिए ईश्वर का वरदान है |
| सर हेनरी मॉर्टन स्टैनली | पत्रकार और खोजी; अफ़्रीका के नक़्शे बनाए, जिनसे बाद में अफ़्रीका को जीतने में मदद मिली |
| डेविड लिविंग्स्टन | अफ़्रीका गया मिशनरी, जिसकी खोज में स्टैनली को भेजा गया था |
| राम नारायण तिवारी | भारत से गए गिरमिटिया मज़दूर; डेमेरारा में दस साल काम किया; उनका संस्मरण स्रोत-क है |
| वी. एस. नायपॉल | नोबेल पुरस्कार विजेता साहित्यकार; अनुबंधित मज़दूरों के वंशज |
| शिवनरैन चंद्रपॉल और रामनरेश सरवन | वेस्ट इंडीज़ के क्रिकेट खिलाड़ी; अनुबंधित मज़दूरों के वंशज |
| बॉब मार्ले | जमैका के रैगे गायक; रास्ताफ़ारियानवाद को ख्याति के शिखर पर पहुँचाया |
| हेनरी फ़ोर्ड | अमेरिकी कार निर्माता; बृहत उत्पादन और असेंबली लाइन के प्रणेता; टी-मॉडल कार |
| जॉन मेनार्ड कीन्स | प्रसिद्ध अर्थशास्त्री; मानते थे कि भारतीय सोने के निर्यात से वैश्विक अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने में मदद मिली |
| डॉरोथी लेंग | अमेरिकी फ़ोटोग्राफ़र; महामंदी की सबसे प्रसिद्ध तस्वीरें (1936, 1938) लीं |
| अल्फ़्रेड क्रॉस्बी | ‘इकोलॉजिकल इंपीरियलिज़्म’ के लेखक; बॉक्स 1 का स्रोत |
| शिकारीपुरी श्रॉफ़ और नट्टूकोट्टई चेट्टियार | भारतीय बैंकर-व्यापारी समुदाय; मध्य व दक्षिण-पूर्व एशिया में निर्यातोन्मुखी खेती के लिए क़र्ज़ देते थे |
9. संस्थाओं और संधियों की सूची
| नाम | वर्ष | मुख्य बात |
|---|---|---|
| बर्लिन बैठक | 1885 | यूरोप के ताक़तवर देशों ने अफ़्रीका का नक़्शा लकीरें खींचकर बाँट लिया |
| ब्रेटन वुड्स सम्मेलन | जुलाई 1944 | न्यू हैम्पशर (अमेरिका); संयुक्त राष्ट्र मौद्रिक एवं वित्तीय सम्मेलन |
| अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आई.एम.एफ़.) | काम शुरू 1947 | सदस्य देशों के विदेश व्यापार के लाभ-घाटे से निपटने के लिए |
| विश्व बैंक | काम शुरू 1947 | युद्धोत्तर पुनर्निर्माण के लिए पैसे का इंतज़ाम |
| समूह 77 (जी-77) | 1960 के दशक | विकासशील देशों का संगठन; नयी अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक प्रणाली (NIEO) की माँग |
10. दो ‘नए शब्द’ बॉक्स जो पाठ्यपुस्तक ने दिए हैं
| शब्द | पाठ्यपुस्तक की परिभाषा |
|---|---|
| असंतुष्ट | जो स्थापित विश्वासों और तरीक़ों को नहीं मानता। |
| वीटो | निषेधाधिकार; इस अधिकार के सहारे एक ही सदस्य की असहमति किसी भी प्रस्ताव को ख़ारिज करने का आधार बन जाती है। |
| आयात शुल्क (Tariff) | किसी दूसरे देश से आने वाली चीज़ों पर वसूल किया जाने वाला शुल्क। यह कर या शुल्क उस जगह लिया जाता है जहाँ से वह चीज़ देश में आती है, यानी सीमा पर, बंदरगाह पर या हवाई अड्डे पर। |
| विनिमय दर | इस व्यवस्था के ज़रिये अंतर्राष्ट्रीय व्यापार की सुविधा के लिए विभिन्न देशों की राष्ट्रीय मुद्राओं को एक-दूसरे से जोड़ा जाता है। मोटे तौर पर विनिमय दर दो प्रकार की होती है — स्थिर विनिमय दर और परिवर्तनशील विनिमय दर। |
| स्थिर विनिमय दर | जब विनिमय दर स्थिर होती हैं और उनमें आने वाले उतार-चढ़ावों को नियंत्रित करने के लिए सरकारों को हस्तक्षेप करना पड़ता है तो ऐसी विनिमय दर को स्थिर विनिमय दर कहा जाता है। |
| लचीली या परिवर्तनशील विनिमय दर | इस तरह की विनिमय दर विदेशी मुद्रा बाज़ार में विभिन्न मुद्राओं की माँग या आपूर्ति के आधार पर और सिद्धांतत: सरकारों के हस्तक्षेप के बिना घटती-बढ़ती रहती है। |
11. एक ज़रूरी सूची — यह अध्याय अध्याय 1 और 2 से कैसे जुड़ता है
| इस अध्याय की बात | पिछले अध्यायों से जोड़ |
|---|---|
| महामंदी 1931 में चरम पर थी | उसी समय गांधीजी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू किया (अध्याय 2) |
| महामंदी में कृषि क़ीमतें गिरीं | अध्याय 2 में भी यही कारण दिया गया है कि किसान सविनय अवज्ञा में क्यों शामिल हुए |
| राष्ट्रवादी नेताओं ने अनुबंध प्रथा का विरोध किया, 1921 में ख़त्म हुई | यह असहयोग आंदोलन का ही समय है (अध्याय 2) |
| राष्ट्रवादी दबाव में सीमा शुल्क बढ़ाया गया | अध्याय 2 में स्वदेशी और भारतीय उद्योगपतियों का समर्थन |
| यूरोप में उन्नीसवीं सदी की ग़रीबी और पलायन | अध्याय 1 में यूरोप के आर्थिक-सामाजिक बदलाव |
12. कठिन शब्द और उनके अर्थ (शब्दावली)
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| भूमंडलीकरण / वैश्वीकरण | दुनिया के अलग-अलग हिस्सों का व्यापार, पूँजी, लोगों और विचारों के आदान-प्रदान से आपस में जुड़ना |
| सिल्क मार्ग (रेशम मार्ग) | ज़मीन और समुद्र के वे प्राचीन रास्ते जिनसे चीन का रेशम पश्चिम जाता था और जो एशिया को यूरोप-अफ़्रीका से जोड़ते थे |
| कौड़ी | समुद्री जीव का ख़ोल, जिसे प्राचीन काल में मुद्रा के रूप में इस्तेमाल किया जाता था |
| कॉर्न लॉ | वे ब्रिटिश क़ानून जिनके तहत मक्का और अनाज के आयात पर पाबंदी लगाई गई थी |
| प्राथमिक उत्पाद | गेहूँ और कपास जैसे कृषि उत्पाद तथा कोयले जैसे खनिज पदार्थ |
| रिंडरपेस्ट | मवेशियों में प्लेग की तरह तेज़ी से फैलने वाली एक जानलेवा बीमारी |
| अनुबंधित (गिरमिटिया) श्रमिक | वह मज़दूर जिसे एक निश्चित अवधि (आमतौर पर पाँच साल) तक काम करने के अनुबंध के तहत दूसरे देश ले जाया जाता था |
| बागान (Plantation) | बड़ा खेत जहाँ एक ही नक़दी फ़सल — जैसे गन्ना, चाय, कोको — बड़े पैमाने पर उगाई जाती है |
| व्यापार अधिशेष | ऐसी स्थिति जब किसी देश का निर्यात उसके आयात से अधिक हो; यानी उसे व्यापार में लगातार फ़ायदा हो |
| होम चार्जेज (देसी ख़र्चें) | ब्रिटिश अफ़सरों की निजी रकम, भारतीय क़र्ज़ों का ब्याज और ब्रितानी अफ़सरों की पेंशन, जो भारत के व्यापार अधिशेष से चुकाई जाती थी |
| बहुपक्षीय बंदोबस्त | वह व्यवस्था जिसमें एक देश के साथ हुए घाटे की भरपाई किसी तीसरे देश से हुए मुनाफ़े से कर ली जाती है |
| बृहत उत्पादन (Mass Production) | असेंबली लाइन के सहारे कम लागत में बहुत बड़ी मात्रा में एक जैसा माल बनाना |
| असेंबली लाइन | वह कन्वेयर बेल्ट जिस पर चलते उत्पाद में हर मज़दूर एक ही पुर्ज़ा बार-बार लगाता है |
| हायर-परचेज़ | वह व्यवस्था जिसमें सामान क़र्ज़ पर ख़रीदा जाता है और उसकी क़ीमत साप्ताहिक या मासिक किस्तों में चुकाई जाती है |
| महामंदी | 1929 से तीस के दशक के मध्य तक चला वह विश्वव्यापी आर्थिक संकट जिसमें उत्पादन, आय, रोज़गार और व्यापार भारी गिरावट में आ गए |
| अनौपनिवेशीकरण | उपनिवेशों का स्वतंत्र और स्वाधीन राष्ट्र बनने की प्रक्रिया |
| बहुराष्ट्रीय कंपनी (एमएनसी) | एक साथ बहुत सारे देशों में व्यवसाय करने वाली कंपनी |
| असंतुष्ट | जो स्थापित विश्वासों और तरीक़ों को नहीं मानता |
| वीटो | निषेधाधिकार, जिससे एक सदस्य की असहमति किसी भी प्रस्ताव को ख़ारिज कर सकती है |
| आयात शुल्क (Tariff) | दूसरे देश से आने वाली चीज़ों पर सीमा, बंदरगाह या हवाई अड्डे पर वसूला जाने वाला शुल्क |
| विनिमय दर | वह दर जिससे एक देश की मुद्रा दूसरे देश की मुद्रा से जोड़ी जाती है |
| एल डोराडो | दक्षिणी अमेरिका में सोने के शहर की वह किंवदंती जिसकी खोज में यूरोपीय अभियान निकले |
13. महत्त्वपूर्ण तिथियाँ और आँकड़े — एक नज़र में
तिथियाँ
| वर्ष / काल | घटना |
|---|---|
| 3,000 ईसा पूर्व | सिंधु घाटी की सभ्यता समुद्री व्यापार से पश्चिमी एशिया से जुड़ी हुई थी |
| सातवीं सदी | बीमारी फैलाने वाले कीटाणुओं के दूर-दूर पहुँचने का इतिहास यहाँ तक ढूँढा जा सकता है |
| लगभग 15वीं सदी तक | सिल्क मार्ग अस्तित्व में रहे |
| पंद्रहवीं सदी से | चीन ने दूसरे देशों से संबंध कम करने शुरू किए |
| 16वीं सदी | यूरोपीय जहाज़ी अमेरिका पहुँचे; उपनिवेश बनाना शुरू |
| 1634 | जॉन विनथॉर्प का पत्र (बॉक्स 1) |
| 1815 से 1914 | उन्नीसवीं सदी की विश्व अर्थव्यवस्था का दौर |
| 1820 से 1914 | विश्व व्यापार में 25 से 40 गुना वृद्धि |
| 1840 के दशक का मध्य / 1845–1849 | आयरलैंड का आलू अकाल |
| 1860 के दशक से | हैदराबादी सिंधी व्यापारियों ने दुनिया भर के बंदरगाहों पर एम्पोरियम खोले |
| 1870 का दशक | इस समय तक अमेरिका से यूरोप को केवल जिंदा जानवर भेजे जाते थे |
| 1880 के दशक के आख़िरी साल | अफ़्रीका में रिंडरपेस्ट पहली बार दिखाई दी |
| 1885 | बर्लिन बैठक — अफ़्रीका का बँटवारा |
| 1890 | एक वैश्विक कृषि अर्थव्यवस्था सामने आ चुकी थी |
| 1890 का दशक | अमेरिका भी औपनिवेशिक ताक़त बन गया |
| 1892 | रिंडरपेस्ट अफ़्रीका के अटलांटिक तट तक पहुँची |
| 1897 (पाँच साल बाद) | रिंडरपेस्ट केप तक पहुँच गई |
| अगस्त 1914 | पहला विश्वयुद्ध शुरू |
| जनवरी 1914 | हेनरी फ़ोर्ड ने वेतन दोगुना यानी 5 डॉलर प्रतिदिन कर दिया |
| 1921 | भारत में अनुबंध प्रथा ख़त्म कर दी गई; इसी साल हर पाँच में से एक ब्रिटिश मज़दूर बेरोज़गार था |
| 1923 | अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा कर्ज़दाता देश बन गया |
| 1929 | महामंदी की शुरुआत |
| 1931 | मंदी अपने चरम पर; उसी समय सविनय अवज्ञा आंदोलन |
| 1933 | 4,000 से ज़्यादा अमेरिकी बैंक बंद हो चुके थे |
| 1935 | ज़्यादातर औद्योगिक देशों में संकट से उबरने के संकेत |
| 1939 | दूसरा विश्वयुद्ध शुरू |
| जुलाई 1944 | ब्रेटन वुड्स सम्मेलन |
| 1947 | विश्व बैंक और आई.एम.एफ़. ने औपचारिक रूप से काम शुरू किया |
| 1949 | चीन की क्रांति |
| 1950 से 1970 | विश्व व्यापार की विकास दर 8 प्रतिशत से ज़्यादा |
| 1970 के दशक | स्थिर विनिमय दर विफल; अस्थिर विनिमय दर की शुरुआत |
आँकड़े
| आँकड़ा | किसका |
|---|---|
| लगभग 10,00,000 | आयरिश आलू अकाल में मरे लोग (1845–49) |
| लगभग 5 करोड़ | उन्नीसवीं सदी में यूरोप से अमेरिका व ऑस्ट्रेलिया गए लोग |
| लगभग 15 करोड़ | पूरी दुनिया में घर छोड़कर दूर देशों में काम करने गए लोग |
| 25 से 40 गुना | 1820–1914 में विश्व व्यापार में वृद्धि |
| लगभग 60 प्रतिशत | उस व्यापार में प्राथमिक उत्पादों का हिस्सा |
| 90 प्रतिशत | रिंडरपेस्ट से मरे अफ़्रीकी मवेशी |
| 30% → 15% → 3% | भारत के निर्यात में सूती कपड़े का हिस्सा (1800 → 1815 → 1870) |
| 5% → 35% | भारत के निर्यात में कच्चे कपास का हिस्सा (1812 → 1871) |
| 90 लाख मृत, 2 करोड़ घायल | पहला विश्वयुद्ध |
| हर पाँच में से एक | 1921 में बेरोज़गार ब्रिटिश मज़दूर |
| हर तीन मिनट में एक कार | फ़ोर्ड की असेंबली लाइन |
| 5 डॉलर प्रतिदिन | जनवरी 1914 से फ़ोर्ड मज़दूरों का वेतन |
| 20 लाख → 50 लाख | अमेरिका में कारों का उत्पादन (1919 → 1929) |
| एक अरब डॉलर → एक चौथाई | 1928 से 1929 के बीच विदेशों में अमेरिकी क़र्ज़ा |
| 4,000 से ज़्यादा | 1933 तक बंद हुए अमेरिकी बैंक |
| 1,10,000 | 1929–1932 के बीच चौपट हुई कंपनियाँ |
| लगभग आधे | 1928–1934 में घटे भारत के आयात-निर्यात |
| 50 प्रतिशत | 1928–1934 में भारत में गेहूँ की क़ीमत में गिरावट |
| 60 प्रतिशत से ज़्यादा | कच्चे पटसन की क़ीमत में गिरावट |
| लगभग 6 करोड़ (वैश्विक जनसंख्या का 3%) | दूसरे विश्वयुद्ध में मरे लोग |
| 8 प्रतिशत से ज़्यादा | 1950–1970 में विश्व व्यापार की वार्षिक विकास दर |
| लगभग 5 प्रतिशत | इसी दौरान वैश्विक आय की वृद्धि दर |
| 5 प्रतिशत से कम | इसी दौरान औद्योगिक देशों में औसत बेरोज़गारी |