पुस्तक: भारत और समकालीन विश्व–2 (कक्षा 10, NCERT) · खण्ड I — घटनाएँ और प्रक्रियाएँ पाठ्यपुस्तक पृष्ठ: 29 से 50 तक
इस फ़ाइल को कैसे पढ़ें
यह फ़ाइल पूरे अध्याय की पूरी और आसान व्याख्या है। इसमें हर बात पूरे वाक्यों में लिखी गई है, ताकि आप इसे पढ़कर समझ सकें और वैसे ही उत्तर-पुस्तिका में लिख भी सकें।
कठिन शब्दों के अर्थ भाग 10 में और सभी महत्त्वपूर्ण तिथियाँ भाग 11 में दी गई हैं।
एक ज़रूरी बात पहले जान लीजिए। बोर्ड परीक्षा में मानचित्र के प्रश्न इसी अध्याय से आते हैं। इसलिए इसे पढ़ते समय हर स्थान का नाम अलग से रेखांकित कीजिए — चंपारण, खेड़ा, अहमदाबाद, अमृतसर, चौरी-चौरा, दांडी, बारदोली। इनकी पूरी सूची 05-प्रश्न बैंक के भाग ‘च’ में दी गई है।
0. सबसे पहले यह समझ लीजिए — यह अध्याय है किस बारे में?
पिछले अध्याय में आपने पढ़ा कि यूरोप में राष्ट्रवाद कैसे पैदा हुआ। वहाँ राष्ट्रवाद मुख्य रूप से राजाओं के विरुद्ध था — लोग चाहते थे कि देश राजा का नहीं, जनता का हो।
भारत में कहानी थोड़ी अलग है। यहाँ राष्ट्रवाद अंग्रेज़ों के विरुद्ध पैदा हुआ। पाठ्यपुस्तक का पहला वाक्य यही कहता है — “दूसरे उपनिवेशों की तरह भारत में भी आधुनिक राष्ट्रवाद के उदय की परिघटना उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलन के साथ गहरे तौर पर जुड़ी हुई थी।”
इसका मतलब यह है कि भारतीय अपने आप को ‘एक’ तब मानने लगे जब उन्होंने एक साझा दुश्मन का सामना किया। पाठ्यपुस्तक के शब्दों में — “उत्पीड़न और दमन के साझा भाव ने विभिन्न समूहों को एक-दूसरे से बाँध दिया था।”
लेकिन यहीं एक बहुत ज़रूरी बात भी है, जिसे पूरा अध्याय बार-बार दोहराता है:
“लेकिन हर वर्ग और समूह पर उपनिवेशवाद का असर एक जैसा नहीं था। उनके अनुभव भी अलग थे और स्वतंत्रता के मायने भी भिन्न थे।”
यानी सब लोग अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ थे, पर सबके अपने-अपने कारण थे और सबका ‘स्वराज’ अलग-अलग था। किसान के लिए स्वराज का मतलब था लगान से छुटकारा; बागान मज़दूर के लिए इसका मतलब था गाँव आने-जाने की आज़ादी; व्यापारी के लिए इसका मतलब था बिना रोक-टोक व्यापार।
एक वाक्य में पूरा अध्याय: महात्मा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने अलग-अलग समूहों को जोड़कर एक विशाल आंदोलन खड़ा किया, पर इस एकता में टकराव के बिंदु भी छिपे हुए थे।
और अध्याय का अंतिम वाक्य इसी बात को सबसे सुंदर ढंग से कहता है:
“संक्षेप में, जो राष्ट्र उभर रहा था वह औपनिवेशिक शासन से मुक्ति की चाह रखने वाली बहुत सारी आवाज़ों का पुंज था।”
1. पहला विश्वयुद्ध, ख़िलाफ़त और असहयोग (पाठ का भाग 1)
1.1 युद्ध ने भारत की हालत कैसे बिगाड़ी
1919 के बाद के सालों में राष्ट्रीय आंदोलन नए इलाक़ों तक फैल गया, उसमें नए सामाजिक समूह शामिल हो गए और संघर्ष की नयी पद्धतियाँ सामने आ रही थीं। ऐसा क्यों हुआ, इसका उत्तर पहले विश्वयुद्ध में है।
पहले विश्वयुद्ध (1914–1918) ने एक नयी आर्थिक और राजनीतिक स्थिति पैदा कर दी थी। इसके कारण आम लोगों की मुश्किलें बहुत बढ़ गईं। नीचे दी गई तालिका में सारे कारण एक साथ दिए गए हैं —
| क्रम | युद्ध का असर | उससे क्या हुआ |
|---|---|---|
| 1 | रक्षा व्यय में भारी इज़ाफ़ा हुआ | इस ख़र्चे की भरपाई के लिए युद्ध के नाम पर क़र्ज़ लिए गए और करों में वृद्धि की गई |
| 2 | सीमा शुल्क बढ़ा दिया गया और आयकर शुरू किया गया | आम आदमी की जेब पर सीधा बोझ पड़ा |
| 3 | युद्ध के दौरान क़ीमतें तेज़ी से बढ़ रही थीं | 1913 से 1918 के बीच क़ीमतें दोगुनी हो चुकी थीं, जिससे आम लोगों की मुश्किलें बढ़ गईं |
| 4 | गाँवों में सिपाहियों को जबरन भर्ती किया गया | इसके कारण ग्रामीण इलाक़ों में व्यापक ग़ुस्सा था |
| 5 | 1918–19 और 1920–21 में देश के बहुत सारे हिस्सों में फ़सल ख़राब हो गई | इसके कारण खाद्य पदार्थों का भारी अभाव पैदा हो गया |
| 6 | उसी समय फ़्लू की महामारी फैल गई | 1921 की जनगणना के मुताबिक़ दुर्भिक्ष और महामारी के कारण 120–130 लाख लोग मारे गए |
लोगों को उम्मीद थी कि युद्ध ख़त्म होने के बाद उनकी मुसीबतें कम हो जाएँगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
इसी समय एक नया नेता सामने आया और उसने संघर्ष का एक नया ढंग, एक नया तरीक़ा पेश किया।
इस तालिका को याद रखने का आसान तरीक़ा: युद्ध ने तीन चीज़ें एक साथ कीं — कर बढ़ाए, क़ीमतें बढ़ाईं और जवान छीने। और ऊपर से अकाल और महामारी आ गई। 120–130 लाख लोगों की मौत का आँकड़ा ज़रूर याद रखिए — यह संख्या उत्तर में लिखने पर परीक्षक को दिखता है कि आपने अध्याय ध्यान से पढ़ा है।
1.2 सत्याग्रह का विचार (भाग 1.1)
महात्मा गांधी जनवरी 1915 में भारत लौटे। इससे पहले वे दक्षिण अफ़्रीका में थे। उन्होंने एक नए तरह के जनांदोलन के रास्ते पर चलते हुए वहाँ की नस्लभेदी सरकार से सफलतापूर्वक लोहा लिया था। इस पद्धति को वे सत्याग्रह कहते थे।
सत्याग्रह का पूरा अर्थ इस प्रकार है (यह अभ्यास प्रश्न 2 है, इसलिए पूरा याद कीजिए):
- सत्याग्रह के विचार में सत्य की शक्ति पर आग्रह और सत्य की खोज पर ज़ोर दिया जाता था।
- इसका अर्थ यह था कि अगर आपका उद्देश्य सच्चा है, यदि आपका संघर्ष अन्याय के ख़िलाफ़ है, तो उत्पीड़क से मुक़ाबला करने के लिए आपको किसी शारीरिक बल की आवश्यकता नहीं है।
- प्रतिशोध की भावना या आक्रामकता का सहारा लिए बिना सत्याग्रही केवल अहिंसा के सहारे भी अपने संघर्ष में सफल हो सकता है।
- इसके लिए दमनकारी शत्रु की चेतना को झिंझोड़ना चाहिए।
- उत्पीड़क शत्रु को ही नहीं बल्कि सभी लोगों को हिंसा के ज़रिए सत्य को स्वीकार करने पर विवश करने की बजाय सच्चाई को देखने और सहज भाव से स्वीकार करने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए।
- इस संघर्ष में अंततः सत्य की ही जीत होती है।
- गांधीजी का विश्वास था कि अहिंसा का यह धर्म सभी भारतीयों को एकता के सूत्र में बाँध सकता है।
स्रोत-क में गांधीजी के अपने शब्द दिए गए हैं, जो बहुत महत्त्वपूर्ण हैं:
“कहा जाता है कि ‘निष्क्रिय प्रतिरोध’ दुर्बलों का हथियार है। लेकिन इस लेख में जिस शक्ति की बात की गई है उसे केवल ताक़तवर ही इस्तेमाल कर सकते हैं। यह निष्क्रिय प्रतिरोध की शक्ति नहीं है; इसके लिए तो सघन सक्रियता चाहिए। दक्षिण अफ़्रीका का आंदोलन निष्क्रिय नहीं बल्कि सक्रिय आंदोलन था…”
“सत्याग्रह शारीरिक बल नहीं है। सत्याग्रही अपने शत्रु को कष्ट नहीं पहुँचाता; वह अपने शत्रु का विनाश नहीं चाहता। …सत्याग्रह के प्रयोग में दुर्भावना के लिए कोई स्थान नहीं होता।”
“सत्याग्रह तो शुद्ध आत्मबल है। सत्य ही आत्मा का आधार होता है। इसीलिए इस बल को सत्याग्रह का नाम दिया गया है। आत्मा ज्ञान से हमेशा लैस होती है। इसमें प्यार की लौ जलती है… अहिंसा सर्वोच्च धर्म है।”
यहाँ सबसे ज़रूरी बात समझिए। गांधीजी बार-बार कह रहे हैं कि सत्याग्रह कमज़ोरी नहीं, ताक़त है। वे ‘निष्क्रिय प्रतिरोध’ शब्द को अस्वीकार करते हैं और कहते हैं कि यह “सक्रिय आंदोलन” है, जिसके लिए “सघन सक्रियता” चाहिए। परीक्षा में जब भी सत्याग्रह पर प्रश्न आए, यह बात ज़रूर लिखिए — इससे आपका उत्तर बाक़ी विद्यार्थियों से अलग दिखेगा।
1.3 भारत में गांधीजी के पहले तीन सत्याग्रह (मानचित्र के लिए बहुत ज़रूरी)
भारत आने के बाद गांधीजी ने कई स्थानों पर सत्याग्रह आंदोलन चलाया। शुरुआती तीन आंदोलन ये थे —
| वर्ष | स्थान | किसके लिए और किसके ख़िलाफ़ |
|---|---|---|
| 1917 | चंपारण (बिहार) | उन्होंने इस इलाक़े का दौरा किया और दमनकारी बागान व्यवस्था के ख़िलाफ़ किसानों को संघर्ष के लिए प्रेरित किया |
| 1917 | खेड़ा ज़िला (गुजरात) | वहाँ के किसानों की मदद के लिए सत्याग्रह का आयोजन किया। फ़सल ख़राब हो जाने और प्लेग की महामारी के कारण खेड़ा ज़िले के किसान लगान चुकाने की हालत में नहीं थे। वे चाहते थे कि लगान वसूली में ढील दी जाए। |
| 1918 | अहमदाबाद (गुजरात) | वे सूती कपड़ा कारख़ानों के मज़दूरों के बीच सत्याग्रह आंदोलन चलाने अहमदाबाद पहुँचे |
इन तीनों को एक साथ याद कीजिए — ‘च-ख-अ’ (चंपारण, खेड़ा, अहमदाबाद)। और यह भी ध्यान दीजिए कि तीनों अलग-अलग तबक़ों के लिए थे — पहला बागान-किसानों के लिए, दूसरा लगान देने वाले किसानों के लिए, तीसरा कारख़ाना मज़दूरों के लिए। यानी गांधीजी शुरू से ही अलग-अलग वर्गों को जोड़ रहे थे।
1.4 रॉलट एक्ट (भाग 1.2)
इन कामयाबियों से उत्साहित गांधीजी ने 1919 में प्रस्तावित रॉलट एक्ट (1919) के ख़िलाफ़ एक राष्ट्रव्यापी सत्याग्रह आंदोलन चलाने का फ़ैसला लिया।
रॉलट एक्ट क्या था और लोग उसके विरोध में क्यों थे — यह अभ्यास प्रश्न 1-ग है:
- भारतीय सदस्यों के भारी विरोध के बावजूद इस क़ानून को इम्पीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल ने बहुत जल्दबाज़ी में पारित कर दिया था।
- इस क़ानून के ज़रिए सरकार को राजनीतिक गतिविधियों को कुचलने का अधिकार मिल गया था।
- सरकार राजनीतिक क़ैदियों को दो साल तक बिना मुक़दमा चलाए जेल में बंद रख सकती थी।
महात्मा गांधी ऐसे अन्यायपूर्ण क़ानूनों के ख़िलाफ़ अहिंसक ढंग से नागरिक अवज्ञा चाहते थे। इसे 6 अप्रैल को एक हड़ताल से शुरू होना था।
आंदोलन कैसे फैला:
- विभिन्न शहरों में रैली-जुलूसों का आयोजन किया गया।
- रेलवे वर्कशॉप्स में कामगार हड़ताल पर चले गए।
- दुकानें बंद हो गईं।
- इस व्यापक जन-उभार से चिंतित तथा रेलवे व टेलीग्राफ़ जैसी संचार सुविधाओं के भंग हो जाने की आशंका से भयभीत अंग्रेज़ों ने राष्ट्रवादियों पर दमन शुरू कर दिया।
- अमृतसर में बहुत सारे स्थानीय नेताओं को हिरासत में ले लिया गया।
- गांधीजी के दिल्ली में प्रवेश करने पर पाबंदी लगा दी गई।
- 10 अप्रैल को पुलिस ने अमृतसर में एक शांतिपूर्ण जुलूस पर गोली चला दी।
- इसके बाद लोग बैंकों, डाकख़ानों और रेलवे स्टेशनों पर हमले करने लगे।
- मार्शल लॉ लागू कर दिया गया और जनरल डायर ने कमान सँभाल ली।
1.5 जलियाँवाला बाग़ हत्याकांड — 13 अप्रैल 1919
यह अभ्यास प्रश्न 3-क है, जिसमें अख़बार के लिए रिपोर्ट लिखने को कहा गया है। इसलिए पूरी घटना क्रम से पढ़िए।
- उस दिन अमृतसर में बहुत सारे गाँव वाले सालाना वैसाखी मेले में शिरकत करने के लिए जलियाँवाला बाग़ मैदान में जमा हुए थे।
- काफ़ी लोग तो सरकार द्वारा लागू किए गए दमनकारी क़ानून का विरोध प्रकट करने के लिए एकत्रित हुए थे।
- यह मैदान चारों तरफ़ से बंद था।
- शहर से बाहर होने के कारण वहाँ जुटे लोगों को यह पता नहीं था कि इलाक़े में मार्शल लॉ लागू किया जा चुका है।
- जनरल डायर हथियारबंद सैनिकों के साथ वहाँ पहुँचा और जाते ही उसने मैदान से बाहर निकलने के सारे रास्तों को बंद कर दिया।
- इसके बाद उसके सिपाहियों ने भीड़ पर अंधाधुंध गोलियाँ चला दीं। सैकड़ों लोग मारे गए।
- बाद में उसने बताया कि वह सत्याग्रहियों के ज़हन में दहशत और विस्मय का भाव पैदा करके ‘एक नैतिक प्रभाव’ उत्पन्न करना चाहता था।
इसके बाद क्या हुआ:
- जैसे-जैसे जलियाँवाला बाग़ की ख़बर फैली, उत्तर भारत के बहुत सारे शहरों में लोग सड़कों पर उतरने लगे।
- हड़तालें होने लगीं, लोग पुलिस से मोर्चा लेने लगे और सरकारी इमारतों पर हमला करने लगे।
- सरकार ने इन कार्रवाइयों को निर्ममता से कुचलने का रास्ता अपनाया।
- सरकार लोगों को अपमानित और आतंकित करना चाहती थी। इसके उदाहरण देखिए —
- सत्याग्रहियों को ज़मीन पर नाक रगड़ने के लिए मजबूर किया गया।
- उन्हें सड़क पर घिसट कर चलने और सारे साहिबों को सलाम मारने के लिए मजबूर किया गया।
- लोगों को कोड़े मारे गए।
- गाँवों (गुजराँवाला, पंजाब) पर बम बरसाए गए।
- हिंसा फैलते देख महात्मा गांधी ने आंदोलन वापस ले लिया।
पाठ्यपुस्तक में चित्र 3 है — ‘जनरल डायर के हुक्म से सिपाही लोगों को घिसट कर चलने के लिए मजबूर कर रहे हैं, पंजाब, 1919’। यह चित्र दिखाता है कि दमन केवल गोली तक सीमित नहीं था — उसका मक़सद लोगों की गरिमा तोड़ना भी था। परीक्षा में यह बात लिखने से आपका उत्तर गहरा हो जाता है।
1.6 ख़िलाफ़त का मुद्दा — दो समुदायों को जोड़ने की कोशिश
भले ही रॉलट सत्याग्रह एक बहुत बड़ा आंदोलन था, लेकिन अभी भी वह मुख्य रूप से शहरों और क़स्बों तक ही सीमित था।
महात्मा गांधी पूरे भारत में और भी ज़्यादा जनाधार वाला आंदोलन खड़ा करना चाहते थे। लेकिन उनका मानना था कि हिंदू-मुसलमानों को एक-दूसरे के नज़दीक लाए बिना ऐसा कोई आंदोलन नहीं चलाया जा सकता।
उन्हें लगता था कि ख़िलाफ़त का मुद्दा उठाकर वे दोनों समुदायों को नज़दीक ला सकते हैं।
ख़िलाफ़त का मामला क्या था — इसे क्रम से समझिए:
- पहले विश्वयुद्ध में ऑटोमन तुर्की की हार हो चुकी थी।
- इस आशय की अफ़वाहें फैली हुई थीं कि इस्लामिक विश्व के आध्यात्मिक नेता (ख़लीफ़ा) ऑटोमन सम्राट पर एक बहुत सख़्त शांति संधि थोपी जाएगी।
- ख़लीफ़ा की तात्कालिक शक्तियों की रक्षा के लिए मार्च 1919 में बंबई में एक ख़िलाफ़त समिति का गठन किया गया था।
- मोहम्मद अली और शौकत अली बंधुओं के साथ-साथ कई युवा मुस्लिम नेताओं ने इस मुद्दे पर संयुक्त जनकार्रवाई की संभावना तलाशने के लिए महात्मा गांधी के साथ चर्चा शुरू कर दी थी।
- सितंबर 1920 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में महात्मा गांधी ने भी दूसरे नेताओं को इस बात पर राज़ी कर लिया कि ख़िलाफ़त आंदोलन के समर्थन और स्वराज के लिए एक असहयोग आंदोलन शुरू किया जाना चाहिए।
1.7 असहयोग ही क्यों? (भाग 1.3)
अपनी प्रसिद्ध पुस्तक हिंद स्वराज (1909) में महात्मा गांधी ने कहा था कि भारत में ब्रिटिश शासन भारतीयों के सहयोग से ही स्थापित हुआ था और यह शासन इसी सहयोग के कारण चल पा रहा है। अगर भारत के लोग अपना सहयोग वापस ले लें तो साल भर के भीतर ब्रिटिश शासन ढह जाएगा और स्वराज की स्थापना हो जाएगी।
यह पूरे आंदोलन का सबसे महत्त्वपूर्ण तर्क है। गांधीजी कह रहे हैं कि अंग्रेज़ हमसे ताक़तवर नहीं हैं — वे इसलिए राज कर रहे हैं क्योंकि हम उनका साथ दे रहे हैं। अगर हम साथ देना बंद कर दें, तो राज अपने आप गिर जाएगा। इसी विचार को कक्षा में समझने के लिए यह सवाल पूछिए — अगर कोई क्लर्क काम पर न जाए, कोई वकील अदालत न जाए, कोई विद्यार्थी स्कूल न जाए, तो सरकार कैसे चलेगी?
असहयोग का कार्यक्रम चरणबद्ध था:
- सबसे पहले लोगों को सरकार द्वारा दी गई पदवियाँ लौटा देनी चाहिए।
- सरकारी नौकरियों, सेना, पुलिस, अदालतों, विधायी परिषदों, स्कूलों और विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करना चाहिए।
- अगर सरकार दमन का रास्ता अपनाती है तो व्यापक सविनय अवज्ञा अभियान भी शुरू किया जाए।
1920 की गर्मियों में गांधीजी और शौकत अली आंदोलन के लिए समर्थन जुटाते हुए देश भर में यात्राएँ करते रहे।
कांग्रेस के भीतर विवाद:
- कांग्रेस में बहुत सारे लोग इन प्रस्तावों पर सशंकित थे।
- वे नवंबर 1920 में विधायी परिषद के लिए होने वाले चुनावों का बहिष्कार करने में हिचकिचा रहे थे।
- उन्हें भय था कि इस आंदोलन में लोग हिंसा कर सकते हैं।
- सितंबर से दिसंबर तक कांग्रेस में भारी खींचतान चलती रही।
- आख़िरकार दिसंबर 1920 में कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन में एक समझौता हुआ और असहयोग कार्यक्रम पर स्वीकृति की मोहर लगा दी गई।
दो अधिवेशन याद रखिए — सितंबर 1920, कलकत्ता (जहाँ गांधीजी ने नेताओं को राज़ी किया) और दिसंबर 1920, नागपुर (जहाँ कार्यक्रम स्वीकृत हुआ)। दोनों मानचित्र के प्रश्न में आ सकते हैं।
2. आंदोलन के भीतर अलग-अलग धाराएँ (पाठ का भाग 2)
असहयोग-ख़िलाफ़त आंदोलन जनवरी 1921 में शुरू हुआ।
इस आंदोलन में विभिन्न सामाजिक समूहों ने हिस्सा लिया लेकिन हरेक की अपनी-अपनी आकांक्षाएँ थीं। सभी ने स्वराज के आह्वान को स्वीकार तो किया लेकिन उनके लिए उसके अर्थ अलग-अलग थे।
यह वाक्य पूरे भाग 2 की कुंजी है। आगे जो भी पढ़ें, यह याद रखिए कि हर समूह ‘स्वराज’ शब्द अपने-अपने अर्थ में समझ रहा था।
2.1 शहरों में आंदोलन (भाग 2.1)
आंदोलन की शुरुआत शहरी मध्यवर्ग की हिस्सेदारी के साथ हुई।
बहिष्कार का असर:
| क्षेत्र | क्या हुआ |
|---|---|
| शिक्षा | हज़ारों विद्यार्थियों ने स्कूल-कॉलेज छोड़ दिए। हेडमास्टरों और शिक्षकों ने इस्तीफ़े सौंप दिए। |
| क़ानून | वकीलों ने मुक़दमे लड़ना बंद कर दिया। |
| चुनाव | मद्रास के अलावा ज़्यादातर प्रांतों में परिषद् चुनावों का बहिष्कार किया गया। |
मद्रास का अपवाद (यह ज़रूर याद रखिए, क्योंकि यह एक अलग तरह की बात दिखाता है): मद्रास में ग़ैर-ब्राह्मणों द्वारा बनाई गई जस्टिस पार्टी का मानना था कि काउंसिल में प्रवेश के ज़रिए उन्हें वे अधिकार मिल सकते हैं जो सामान्य रूप से केवल ब्राह्मणों को मिल पाते हैं, इसलिए इस पार्टी ने चुनावों का बहिष्कार नहीं किया।
आर्थिक मोर्चे पर असर और भी ज़्यादा नाटकीय रहा:
- विदेशी सामानों का बहिष्कार किया गया।
- शराब की दुकानों की पिकेटिंग की गई।
- विदेशी कपड़ों की होली जलाई जाने लगी।
- 1921 से 1922 के बीच विदेशी कपड़ों का आयात आधा रह गया था। उसकी क़ीमत 102 करोड़ से घटकर 57 करोड़ रह गई।
- बहुत सारे स्थानों पर व्यापारियों ने विदेशी चीज़ों का व्यापार करने या विदेशी व्यापार में पैसा लगाने से इनकार कर दिया।
- जब बहिष्कार आंदोलन फैला और लोग आयातित कपड़े को छोड़कर केवल भारतीय कपड़े पहनने लगे तो भारतीय कपड़ा मिलों और हथकरघों का उत्पादन भी बढ़ने लगा।
लेकिन शहरों में यह आंदोलन धीमा पड़ने लगा। इसके कारण ये थे (यह प्रश्न परीक्षा में आता है):
- खादी का कपड़ा मिलों में भारी पैमाने पर बनने वाले कपड़ों के मुक़ाबले प्रायः महँगा होता था और ग़रीब उसे नहीं ख़रीद सकते थे। वे मिलों के कपड़े का लंबे समय तक बहिष्कार कैसे कर सकते थे?
- ब्रिटिश संस्थानों के बहिष्कार से भी समस्या पैदा हो गई। आंदोलन की कामयाबी के लिए वैकल्पिक भारतीय संस्थानों की स्थापना ज़रूरी थी ताकि ब्रिटिश संस्थानों के स्थान पर उनका प्रयोग किया जा सके। लेकिन वैकल्पिक संस्थानों की स्थापना की प्रक्रिया बहुत धीमी थी।
- फलस्वरूप, विद्यार्थी और शिक्षक सरकारी स्कूलों में लौटने लगे और वकील दोबारा सरकारी अदालतों में दिखाई देने लगे।
इस भाग से एक बड़ी बात सीखने को मिलती है। बहिष्कार करना आसान है, पर विकल्प बनाना कठिन है। जब तक विकल्प तैयार न हो, लोग वापस पुरानी व्यवस्था में लौट आते हैं। यह बात अध्याय में आगे भी काम आएगी।
2.2 ग्रामीण इलाक़ों में विद्रोह (भाग 2.2)
शहरों से बढ़कर असहयोग आंदोलन देहात में भी फैल गया था। युद्ध के बाद देश के विभिन्न भागों में चले किसानों व आदिवासियों के संघर्ष भी इस आंदोलन में समा गए।
(क) अवध का किसान आंदोलन — बाबा रामचंद्र
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| नेतृत्व | अवध में संन्यासी बाबा रामचंद्र किसानों का नेतृत्व कर रहे थे |
| उनका अतीत | बाबा रामचंद्र इससे पहले फिजी में गिरमिटिया मज़दूर के तौर पर काम कर चुके थे |
| आंदोलन किसके ख़िलाफ़ | तालुक़दारों और ज़मींदारों के ख़िलाफ़, जो किसानों से भारी-भरकम लगान और तरह-तरह के कर वसूल कर रहे थे |
| किसानों की तीन समस्याएँ | (1) किसानों को बेगार करनी पड़ती थी; (2) पट्टेदार के तौर पर उनके पट्टे निश्चित नहीं होते थे; (3) उन्हें बार-बार पट्टे की ज़मीन से हटा दिया जाता था ताकि ज़मीन पर उनका कोई अधिकार स्थापित न हो सके |
| किसानों की तीन माँगें | (1) लगान कम किया जाए; (2) बेगार ख़त्म हो; (3) दमनकारी ज़मींदारों का सामाजिक बहिष्कार किया जाए |
| एक ख़ास तरीक़ा | बहुत सारे स्थानों पर ज़मींदारों को नाई-धोबी की सुविधाओं से भी वंचित करने के लिए पंचायतों ने नाई-धोबी बंद का फ़ैसला लिया |
कांग्रेस से जुड़ाव और तनाव:
- जून 1920 में जवाहर लाल नेहरू ने अवध के गाँवों का दौरा किया, गाँववालों से बातचीत की और उनकी व्यथा समझने का प्रयास किया।
- अक्तूबर तक जवाहर लाल नेहरू, बाबा रामचंद्र तथा कुछ अन्य लोगों के नेतृत्व में अवध किसान सभा का गठन कर लिया गया।
- महीने भर में इस पूरे इलाक़े के गाँवों में संगठन की 300 से ज़्यादा शाखाएँ बन चुकी थीं।
- अगले साल जब असहयोग आंदोलन शुरू हुआ तो कांग्रेस ने अवध के किसान संघर्ष को इस आंदोलन में शामिल करने का प्रयास किया।
- लेकिन किसानों के आंदोलन में ऐसे स्वरूप विकसित हो चुके थे जिनसे कांग्रेस का नेतृत्व ख़ुश नहीं था।
- 1921 में जब आंदोलन फैला तो तालुक़दारों और व्यापारियों के मकानों पर हमले होने लगे, बाज़ारों में लूटपाट होने लगी और अनाज के गोदामों पर क़ब्ज़ा कर लिया गया।
- बहुत सारे स्थानों पर स्थानीय नेता किसानों को समझा रहे थे कि गांधीजी ने ऐलान कर दिया है कि अब कोई लगान नहीं भरेगा और ज़मीन ग़रीबों में बाँट दी जाएगी।
- महात्मा का नाम लेकर लोग अपनी सारी कार्रवाइयों और आकांक्षाओं को सही ठहरा रहे थे।
यह हिस्सा बहुत महत्त्वपूर्ण है। ध्यान दीजिए कि गांधीजी ने ऐसा कुछ नहीं कहा था, पर लोगों ने उनके नाम का इस्तेमाल अपनी माँगों को सही ठहराने के लिए किया। यही ‘स्वराज के अलग-अलग अर्थ’ वाली बात का सबसे साफ़ उदाहरण है।
स्रोत-ख में एक बहुत सुंदर प्रसंग है, जिसे ज़रूर पढ़िए:
6 जनवरी 1921 को संयुक्त प्रांत में रायबरेली के पास पुलिस ने किसानों पर गोली चलाई। जवाहरलाल नेहरू घटनास्थल का दौरा करना चाहते थे, लेकिन पुलिस ने उन्हें रोक दिया। ग़ुस्से में नेहरू ने अपने आसपास खड़े किसानों को ही संबोधित किया। बाद में उन्होंने बताया —
“उनका आचरण ख़तरे के सामने होते हुए भी बहादुर, शांत और निश्चिंत लोगों जैसा था। पता नहीं उन्हें क्या महसूस हो रहा था लेकिन मुझे पता है कि मैं क्या महसूस कर रहा था। एक पल के लिए मेरा भी ख़ून खौल उठा था, अहिंसा तो न जाने कहाँ छूट गई थी — लेकिन सिर्फ़ एक पल के लिए… मैंने पूरी विनम्रता के साथ अहिंसा पर उनसे बात की — यह सबक़ उनसे ज़्यादा मुझे सीखना था — उन्होंने मेरी बात समझी और शांति से चले गए।”
इस उद्धरण की सबसे कीमती पंक्ति यह है — “यह सबक़ उनसे ज़्यादा मुझे सीखना था।” नेहरू स्वीकार कर रहे हैं कि अहिंसा में किसान उनसे आगे थे। यह उद्धरण स्रोत-आधारित प्रश्न में आ सकता है।
(ख) आदिवासी किसानों का आंदोलन — अल्लूरी सीताराम राजू
आदिवासी किसानों ने महात्मा गांधी के संदेश और स्वराज के विचार का कुछ और ही मतलब निकाला।
आंध्र प्रदेश की गूडेम पहाड़ियों में 1920 के दशक की शुरुआत में एक उग्र गुरिल्ला आंदोलन फैल गया। कांग्रेस इस तरह के संघर्ष को कभी स्वीकार नहीं कर सकती थी।
आंदोलन का कारण क्या था:
- अन्य वन क्षेत्रों की तरह यहाँ भी अंग्रेज़ी सरकार ने बड़े-बड़े जंगलों में लोगों के दाख़िल होने पर पाबंदी लगा दी थी।
- लोग इन जंगलों में न तो मवेशियों को चरा सकते थे न ही जलावन के लिए लकड़ी और फल बीन सकते थे।
- इससे पहाड़ों के लोग परेशान और ग़ुस्सा थे।
- न केवल उनकी रोज़ी-रोटी पर असर पड़ रहा था बल्कि उन्हें लगता था कि उनके परंपरागत अधिकार भी छीने जा रहे हैं।
- जब सरकार ने उन्हें सड़कों के निर्माण के लिए बेगार करने पर मजबूर किया तो लोगों ने बग़ावत कर दी।
नेता का परिचय — अल्लूरी सीताराम राजू:
- उनका दावा था कि उनके पास बहुत सारी विशेष शक्तियाँ हैं — वह सटीक खगोलीय अनुमान लगा सकते हैं, लोगों को स्वस्थ कर सकते हैं तथा गोलियाँ भी उन्हें नहीं मार सकतीं।
- राजू के व्यक्तित्व से चमत्कृत विद्रोहियों को विश्वास था कि वह ईश्वर का अवतार है।
- राजू महात्मा गांधी की महानता के गुण गाते थे।
- उनका कहना था कि वह असहयोग आंदोलन से प्रेरित हैं।
- उन्होंने लोगों को खादी पहनने तथा शराब छोड़ने के लिए प्रेरित किया।
- साथ ही उन्होंने यह दावा भी किया कि भारत अहिंसा के बल पर नहीं बल्कि केवल बलप्रयोग के ज़रिए ही आज़ाद हो सकता है।
- गूडेम विद्रोहियों ने पुलिस थानों पर हमले किए, ब्रिटिश अधिकारियों को मारने की कोशिश की और स्वराज प्राप्ति के लिए गुरिल्ला युद्ध चलाते रहे।
- 1924 में राजू को फाँसी दे दी गई। राजू अपने लोगों के बीच लोकनायक बन चुके।
राजू का उदाहरण बहुत दिलचस्प है, और इसे ध्यान से समझिए। वे एक साथ गांधीजी के प्रशंसक थे (खादी और शराब-निषेध का प्रचार करते थे) और अहिंसा के विरोधी भी (मानते थे कि आज़ादी बलप्रयोग से मिलेगी)। यानी लोगों ने गांधीजी के संदेश का वही हिस्सा लिया जो उन्हें अपनी परिस्थिति में ठीक लगा।
(ग) बारदोली सत्याग्रह, 1928 (किनारे का बॉक्स — मानचित्र के लिए ज़रूरी)
1928 में वल्लभ भाई पटेल ने गुजरात के बारदोली तालुका में किसान आंदोलन का नेतृत्व किया, जो कि भू-राजस्व को बढ़ाने के ख़िलाफ़ था। यह बारदोली सत्याग्रह के नाम से जाना जाता है और यह आंदोलन वल्लभ भाई पटेल के सक्षम नेतृत्व के तहत सफल रहा। इस संघर्ष का प्रचार व्यापक रूप से हुआ और इसे भारत के कई हिस्सों में अत्यधिक सहानुभूति प्राप्त हुई।
2.3 बागानों में स्वराज (भाग 2.3)
महात्मा गांधी के विचारों और स्वराज की अवधारणा के बारे में मज़दूरों की अपनी समझ थी।
असम के बाग़ानी मज़दूरों के लिए आज़ादी का मतलब यह था:
- वे उन चारदीवारियों से जब चाहे आ-जा सकते थे जिनमें उनको बंद करके रखा गया था।
- उनके लिए आज़ादी का मतलब था कि वे अपने गाँवों से संपर्क रख पाएँगे।
कारण क्या था:
- 1859 के इनलैंड इमिग्रेशन एक्ट के तहत बाग़ानों में काम करने वाले मज़दूरों को बिना इजाज़त बाग़ान से बाहर जाने की छूट नहीं होती थी और यह इजाज़त उन्हें विरले ही कभी मिलती थी।
जब उन्होंने असहयोग आंदोलन के बारे में सुना तो क्या हुआ:
- हज़ारों मज़दूर अपने अधिकारियों की अवहेलना करने लगे।
- उन्होंने बाग़ान छोड़ दिए और अपने घर को चल दिए।
- उनको लगता था कि अब गांधी राज आ रहा है इसलिए अब तो हरेक को गाँव में ज़मीन मिल जाएगी।
- लेकिन वे अपनी मंज़िल पर नहीं पहुँच पाए।
- रेलवे और स्टीमरों की हड़ताल के कारण वे रास्ते में ही फँसे रह गए।
- उन्हें पुलिस ने पकड़ लिया और उनकी बुरी तरह पिटाई हुई।
पाठ्यपुस्तक का निष्कर्ष (यह वाक्य बहुत महत्त्वपूर्ण है):
“इन स्थानीय आंदोलनों की अपेक्षाओं और दृष्टियों को कांग्रेस के कार्यक्रम में परिभाषित नहीं किया गया था। उन्होंने तो स्वराज शब्द का अपने-अपने हिसाब से अर्थ निकाल लिया था। उनके लिए यह एक ऐसे युग का द्योतक था जब सारे कष्ट और सारी मुसीबतें ख़त्म हो जाएँगी।”
“फिर भी, जब आदिवासियों ने गांधीजी के नाम का नारा लगाया और ‘स्वतंत्र भारत’ की हुंकार भरी तो वे एक अखिल भारतीय आंदोलन से भी भावनात्मक स्तर पर जुड़े हुए थे।”
यह दोनों वाक्य साथ पढ़िए — इनमें अध्याय का सबसे बड़ा संतुलन है। एक तरफ़ लोगों ने स्वराज का अपना अर्थ निकाला, दूसरी तरफ़ वे फिर भी एक बड़े राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़े हुए थे। दोनों बातें एक साथ सच थीं।
2.4 चौरी-चौरा और आंदोलन की वापसी
चित्र 5 का विवरण बताता है: गोरखपुर स्थित चौरी-चौरा में बाज़ार से गुज़र रहा एक शांतिपूर्ण जुलूस पुलिस के साथ हिंसक टकराव में बदल गया। इस घटना के बारे में सुनते ही महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन रोकने का आह्वान किया।
यह घटना फ़रवरी 1922 की है।
3. सविनय अवज्ञा की ओर (पाठ का भाग 3)
3.1 आंदोलन वापस लेने के बाद क्या हुआ
फ़रवरी 1922 में महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन वापस लेने का फ़ैसला कर लिया। उनको लगता था कि आंदोलन हिंसक होता जा रहा है और सत्याग्रहियों को व्यापक प्रशिक्षण की ज़रूरत है। (यह अभ्यास प्रश्न 1-घ का उत्तर है।)
कांग्रेस के भीतर दो धाराएँ बन गईं:
| धारा | कौन | क्या चाहते थे |
|---|---|---|
| पहली — परिषद-राजनीति में लौटने वाले | सी.आर. दास और मोतीलाल नेहरू | वे 1919 के गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया एक्ट के तहत गठित प्रांतीय परिषदों के चुनाव में हिस्सा लेना चाहते थे। उनको लगता था कि परिषदों में रहते हुए ब्रिटिश नीतियों का विरोध करना, सुधारों की वकालत करना और यह दिखाना भी महत्त्वपूर्ण है कि ये परिषदें लोकतांत्रिक संस्था नहीं हैं। इसके लिए उन्होंने कांग्रेस के भीतर ही स्वराज पार्टी का गठन कर डाला |
| दूसरी — उग्र जनांदोलन चाहने वाले | जवाहरलाल नेहरू और सुभाषचंद्र बोस | वे ज़्यादा उग्र जनांदोलन और पूर्ण स्वतंत्रता के लिए दबाव बनाए हुए थे |
3.2 दो नए कारक जिन्होंने राजनीति बदल दी
आंतरिक बहस और असहमति के इस माहौल में दो ऐसे तत्व थे जिन्होंने बीस के दशक के आख़िरी सालों में भारतीय राजनीति की रूपरेखा एक बार फिर बदल दी।
(क) पहला कारक — विश्वव्यापी आर्थिक मंदी
- 1926 से कृषि उत्पादों की क़ीमतें गिरने लगी थीं और 1930 के बाद तो पूरी तरह धराशायी हो गई।
- कृषि उत्पादों की माँग गिरी और निर्यात कम होने लगा।
- तो किसानों को अपनी उपज बेचना और लगान चुकाना भी भारी पड़ने लगा।
- 1930 तक ग्रामीण इलाक़े भारी उथल-पुथल से गुज़रने लगे थे।
(ख) दूसरा कारक — साइमन कमीशन
यह अभ्यास प्रश्न 3-ख है, जिसमें अख़बार की रिपोर्ट लिखने को कहा गया है।
- इसी पृष्ठभूमि में ब्रिटेन की नयी टोरी सरकार ने सर जॉन साइमन के नेतृत्व में एक वैधानिक आयोग का गठन कर दिया।
- राष्ट्रवादी आंदोलन के जवाब में गठित किए गए इस आयोग को भारत में संवैधानिक व्यवस्था की कार्यशैली का अध्ययन करना था और उसके बारे में सुझाव देने थे।
- इस आयोग में एक भी भारतीय सदस्य नहीं था, सारे अंग्रेज़ थे।
- 1928 में जब साइमन कमीशन भारत पहुँचा तो उसका स्वागत ‘साइमन कमीशन वापस जाओ’ (साइमन कमीशन गो बैक) के नारों से किया गया।
- कांग्रेस और मुस्लिम लीग, सभी पार्टियों ने प्रदर्शनों में हिस्सा लिया।
- इसी प्रदर्शन के दौरान ब्रिटिश पुलिस ने लाला लाजपत राय पर हमला किया और प्रदर्शन के दौरान मिले गहरे ज़ख़्मों के कारण उन्होंने दम तोड़ दिया।
सरकार की प्रतिक्रिया और कांग्रेस का जवाब:
- इस विरोध को शांत करने के लिए वायसराय लॉर्ड इरविन ने अक्तूबर 1929 में भारत के लिए ‘डोमिनियन स्टेट्स’ का गोलमोल सा ऐलान कर दिया।
- उन्होंने इस बारे में कोई समय सीमा भी नहीं बताई।
- उन्होंने सिर्फ़ इतना कहा कि भावी संविधान के बारे में चर्चा करने के लिए गोलमेज़ सम्मेलन आयोजित किया जाएगा।
- इस प्रस्ताव से कांग्रेस के नेता संतुष्ट नहीं थे।
लाहौर अधिवेशन, दिसंबर 1929 — यह बहुत महत्त्वपूर्ण है:
- दिसंबर 1929 में जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में ‘पूर्ण स्वराज’ की माँग को औपचारिक रूप से मान लिया गया।
- तय किया गया कि 26 जनवरी 1930 को स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया जाएगा और उस दिन लोग पूर्ण स्वराज के लिए संघर्ष की शपथ लेंगे।
- इस उत्सव की ओर बहुत कम ही लोगों ने ध्यान दिया।
- अब स्वतंत्रता के इस अमूर्त विचार को रोज़मर्रा ज़िन्दगी के ठोस मुद्दों से जोड़ने के लिए महात्मा गांधी को कोई और रास्ता ढूँढ़ना था।
स्रोत-ग में स्वतंत्रता दिवस की शपथ (26 जनवरी 1930) दी गई है:
“हमारा विश्वास है कि किसी भी समाज की तरह भारतीय जनता का भी यह एक अहरणीय (inalienable) अधिकार है कि उन्हें आज़ादी मिले, अपनी मेहनत का फल मिले, और जीवन की सभी आवश्यकताएँ पूरी हों जिससे उन्हें आगे बढ़ने के परिपूर्ण अवसर मिलें। हमारा यह भी विश्वास है कि यदि कोई भी सरकार अपनी जनता को इन अधिकारों से वंचित रखती है और दबाती है तो जनता को भी सरकार को बदलने या उसे समूल समाप्त करने का अधिकार है। …इसलिए हमारा विश्वास है कि भारत को अनिवार्य रूप से ब्रिटेन के साथ अपने सभी संबंधों को समाप्त करके पूर्ण स्वराज प्राप्त करना चाहिए।”
3.3 नमक यात्रा और सविनय अवज्ञा आंदोलन (भाग 3.1)
यह अध्याय का सबसे महत्त्वपूर्ण भाग है और इस पर ‘चर्चा करें’ का प्रश्न 2 भी है।
देश को एकजुट करने के लिए महात्मा गांधी को नमक एक शक्तिशाली प्रतीक दिखाई दिया।
नमक को ही क्यों चुना गया — यह ज़रूर याद कीजिए:
- नमक का अमीर-ग़रीब, सभी इस्तेमाल करते थे।
- यह भोजन का एक अभिन्न हिस्सा था।
- इसीलिए नमक पर कर और उसके उत्पादन पर सरकारी इजारेदारी को महात्मा गांधी ने ब्रिटिश शासन का सबसे दमनकारी पहलू बताया था।
घटनाओं का क्रम:
| तिथि | घटना |
|---|---|
| 31 जनवरी 1930 | गांधीजी ने वायसराय इरविन को एक ख़त लिखा, जिसमें उन्होंने 11 माँगों का उल्लेख किया। इनमें से कुछ सामान्य माँगें थीं जबकि कुछ माँगें उद्योगपतियों से लेकर किसानों तक विभिन्न तबक़ों से जुड़ी थीं। सबसे महत्त्वपूर्ण माँग नमक कर को ख़त्म करने के बारे में थी। |
| — | यह पत्र एक अल्टीमेटम (चेतावनी) की तरह था। उन्होंने लिखा था कि अगर 11 मार्च तक उनकी माँगें नहीं मानी गईं तो कांग्रेस सविनय अवज्ञा आंदोलन छेड़ देगी। |
| — | इरविन झुकने को तैयार नहीं थे। |
| 12 मार्च से | गांधीजी ने अपने 78 विश्वस्त वॉलंटियरों के साथ नमक यात्रा शुरू कर दी |
| यात्रा का विवरण | यह यात्रा साबरमती में गांधीजी के आश्रम से 240 किलोमीटर दूर दांडी नामक गुजराती तटीय क़स्बे में जाकर ख़त्म होनी थी। गांधीजी की टोली ने 24 दिन तक हर रोज़ लगभग 10 मील का सफ़र तय किया। गांधीजी जहाँ भी रुकते हज़ारों लोग उन्हें सुनने आते। इन सभाओं में उन्होंने स्वराज का अर्थ स्पष्ट किया और आह्वान किया कि लोग अंग्रेज़ों की शांतिपूर्वक अवज्ञा करें यानी अंग्रेज़ों का कहा न मानें। |
| 6 अप्रैल 1930 | वे दांडी पहुँचे और उन्होंने समुद्र का पानी उबालकर नमक बनाना शुरू कर दिया। यह क़ानून का उल्लंघन था। |
सविनय अवज्ञा आंदोलन असहयोग आंदोलन से किस तरह अलग था — यह प्रश्न बहुत पूछा जाता है:
“इस बार लोगों को न केवल अंग्रेज़ों का सहयोग न करने के लिए बल्कि औपनिवेशिक क़ानूनों का उल्लंघन करने के लिए आह्वान किया जाने लगा।”
यानी असहयोग में ‘साथ मत दो’ कहा गया था; सविनय अवज्ञा में ‘क़ानून तोड़ो’ कहा गया।
आंदोलन कैसे फैला:
- हज़ारों लोगों ने नमक क़ानून तोड़ा, और सरकारी नमक कारखानों के सामने प्रदर्शन किए।
- आंदोलन फैला तो विदेशी कपड़ों का बहिष्कार किया जाने लगा।
- शराब की दुकानों की पिकेटिंग होने लगी।
- किसानों ने लगान और चौकीदारी कर चुकाने से इनकार कर दिया।
- गाँवों में तैनात कर्मचारी इस्तीफ़े देने लगे।
- बहुत सारे स्थानों पर जंगलों में रहने वाले वन क़ानूनों का उल्लंघन करने लगे। वे लकड़ी बीनने और मवेशियों को चराने के लिए आरक्षित वनों में घुसने लगे।
सरकार का दमन:
- इन घटनाओं से चिंतित औपनिवेशिक सरकार कांग्रेसी नेताओं को गिरफ़्तार करने लगी।
- अप्रैल 1930 में जब महात्मा गांधी के समर्पित साथी अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ान को गिरफ़्तार किया गया तो ग़ुस्साई भीड़ सशस्त्र बख़्तरबंद गाड़ियों और पुलिस की गोलियों का सामना करते हुए सड़कों पर उतर आई। बहुत सारे लोग मारे गए।
- महीने भर बाद जब महात्मा गांधी को भी गिरफ़्तार कर लिया गया तो शोलापुर के औद्योगिक मज़दूरों ने अंग्रेज़ी शासन का प्रतीक पुलिस चौकियों, नगरपालिका भवनों, अदालतों और रेलवे स्टेशनों पर हमले शुरू कर दिए।
- भयभीत सरकार ने निर्मम दमन का रास्ता अपनाया। शांतिपूर्ण सत्याग्रहियों पर हमले किए गए, औरतों व बच्चों को मारा-पीटा गया और लगभग एक लाख लोग गिरफ़्तार किए गए।
गांधी-इरविन समझौता और गोलमेज़ सम्मेलन:
- महात्मा गांधी ने एक बार फिर आंदोलन वापस ले लिया।
- 5 मार्च 1931 को उन्होंने इरविन के साथ एक समझौते पर दस्तख़त कर दिए।
- इस गांधी-इरविन समझौते के ज़रिए गांधीजी ने लंदन में होने वाले दूसरे गोलमेज़ सम्मेलन में हिस्सा लेने पर अपनी सहमति व्यक्त कर दी (पहले गोलमेज़ सम्मेलन का कांग्रेस बहिष्कार कर चुकी थी)।
- इसके बदले सरकार राजनीतिक क़ैदियों को रिहा करने पर राज़ी हो गई।
- दिसंबर 1931 में सम्मेलन के लिए गांधीजी लंदन गए। यह वार्ता बीच में ही टूट गई और उन्हें निराश वापस लौटना पड़ा।
- यहाँ आकर उन्होंने पाया कि सरकार ने नए सिरे से दमन शुरू कर दिया है। गफ़्फ़ार ख़ान और जवाहरलाल नेहरू, दोनों जेल में थे। कांग्रेस को ग़ैरक़ानूनी घोषित कर दिया गया था।
- भारी आशंकाओं के बीच महात्मा गांधी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन दोबारा शुरू कर दिया।
- साल भर तक आंदोलन चला लेकिन 1934 तक आते-आते उसकी गति मंद पड़ने लगी थी।
3.4 लोगों ने आंदोलन को कैसे लिया (भाग 3.2)
अब यह देखिए कि सविनय अवज्ञा आंदोलन में शामिल विभिन्न सामाजिक समूह कौन थे और उन्होंने आंदोलन में हिस्सा क्यों लिया। यह ‘चर्चा करें’ प्रश्न 1 का भी उत्तर है।
(क) संपन्न किसान
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| कौन | गुजरात के पटीदार और उत्तर प्रदेश के जाट |
| क्यों जुड़े | व्यावसायिक फ़सलों की खेती करने के कारण व्यापार में मंदी और गिरती क़ीमतों से वे बहुत परेशान थे। जब उनकी नक़द आय ख़त्म होने लगी तो उनके लिए सरकारी लगान चुकाना नामुमकिन हो गया। सरकार लगान कम करने को तैयार नहीं थी। |
| उन्होंने क्या किया | संपन्न किसानों ने सविनय अवज्ञा आंदोलन का बढ़-चढ़ कर समर्थन किया। उन्होंने अपने समुदायों को एकजुट किया और कई बार अनिच्छुक सदस्यों को बहिष्कार के लिए मजबूर किया। |
| उनके लिए स्वराज का अर्थ | उनके लिए स्वराज की लड़ाई भारी लगान के ख़िलाफ़ लड़ाई थी। |
| वे निराश क्यों हुए | जब 1931 में लगानों के घटे बिना आंदोलन वापस ले लिया गया तो उन्हें बड़ी निराशा हुई। फलस्वरूप, जब 1932 में आंदोलन दुबारा शुरू हुआ तो उनमें से बहुतों ने उसमें हिस्सा लेने से इनकार कर दिया। |
(ख) ग़रीब किसान
- ग़रीब किसान केवल लगान में कमी नहीं चाहते थे।
- उनमें से बहुत सारे किसान ज़मींदारों से पट्टे पर ज़मीन लेकर खेती कर रहे थे।
- महामंदी लंबी खिंची और नक़द आमदनी गिरने लगी तो छोटे पट्टेदारों के लिए ज़मीन का किराया चुकाना भी मुश्किल हो गया।
- वे चाहते थे कि उन्हें ज़मींदारों को जो भाड़ा चुकाना था उसे माफ़ कर दिया जाए।
- इसके लिए उन्होंने कई रेडिकल आंदोलनों में हिस्सा लिया जिनका नेतृत्व अकसर समाजवादियों और कम्युनिस्टों के हाथों में होता था।
- अमीर किसानों और ज़मींदारों की नाराज़गी के भय से कांग्रेस ‘भाड़ा विरोधी’ आंदोलनों को समर्थन देने में प्रायः हिचकिचाती थी।
- इसी कारण ग़रीब किसानों और कांग्रेस के बीच संबंध अनिश्चित बने रहे।
यहाँ बहुत बारीक पर बहुत ज़रूरी अंतर है — इसे समझ लीजिए। संपन्न किसान ज़मीन के मालिक थे और वे सरकारी लगान के ख़िलाफ़ थे। ग़रीब किसान ज़मींदारों से पट्टे पर ज़मीन लेते थे और वे ज़मींदार के भाड़े के ख़िलाफ़ थे। कांग्रेस पहले का साथ दे सकती थी, दूसरे का नहीं — क्योंकि ज़मींदार भी उसके साथ थे। यही कारण है कि ग़रीब किसानों का रिश्ता कांग्रेस से हमेशा डाँवाडोल रहा।
(ग) व्यवसायी वर्ग
- पहले विश्वयुद्ध के दौरान भारतीय व्यापारियों और उद्योगपतियों ने भारी मुनाफ़ा कमाया था और वे ताक़तवर हो चुके थे।
- अपने कारोबार को फैलाने के लिए उन्होंने ऐसी औपनिवेशिक नीतियों का विरोध किया जिनके कारण उनकी व्यावसायिक गतिविधियों में रुकावट आती थी।
- वे विदेशी वस्तुओं के आयात से सुरक्षा चाहते थे और रुपया-स्टर्लिंग विदेशी विनिमय अनुपात में बदलाव चाहते थे जिससे आयात में कमी आ जाए।
- व्यावसायिक हितों को संगठित करने के लिए उन्होंने 1920 में भारतीय औद्योगिक एवं व्यावसायिक कांग्रेस और 1927 में भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग परिसंघ (फ़िक्की) का गठन किया।
- पुरुषोत्तमदास ठाकुरदास और जी.डी. बिड़ला जैसे जाने-माने उद्योगपतियों के नेतृत्व में उद्योगपतियों ने भारतीय अर्थव्यवस्था पर औपनिवेशिक नियंत्रण का विरोध किया और पहले सिविल नाफ़रमानी आंदोलन का समर्थन किया।
- उन्होंने आंदोलन को आर्थिक सहायता दी और आयातित वस्तुओं को ख़रीदने या बेचने से इनकार कर दिया।
- ज़्यादातर व्यवसायी स्वराज को एक ऐसे युग के रूप में देखते थे जहाँ कारोबार पर औपनिवेशिक पाबंदियाँ नहीं होंगी और व्यापार व उद्योग निर्बाध ढंग से फल-फूल सकेंगे।
- गोलमेज़ सम्मेलन की विफलता के बाद व्यावसायिक संगठनों का उत्साह भी मंद पड़ गया था। उन्हें उग्र गतिविधियों का भय था। वे लंबी अशांति की आशंका और कांग्रेस के युवा सदस्यों में समाजवाद के बढ़ते प्रभाव से डरे हुए थे।
(घ) औद्योगिक श्रमिक वर्ग
- औद्योगिक श्रमिक वर्ग ने सविनय अवज्ञा आंदोलन में नागपुर के अलावा और कहीं भी बहुत बड़ी संख्या में हिस्सा नहीं लिया।
- जैसे-जैसे उद्योगपति कांग्रेस के नज़दीक आ रहे थे, मज़दूर कांग्रेस से छिटकने लगे थे।
- फिर भी, कुछ मज़दूरों ने सविनय अवज्ञा आंदोलन में हिस्सा लिया। उन्होंने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार जैसे कुछ गांधीवादी विचारों को कम वेतन व ख़राब कार्यस्थितियों के ख़िलाफ़ अपनी लड़ाई से जोड़ लिया था।
- 1930 में रेलवे कामगारों की और 1932 में गोदी कामगारों की हड़ताल हुई।
- 1930 में छोटा नागपुर की टिन खानों के हज़ारों मज़दूरों ने गांधी टोपी पहनकर रैलियों और बहिष्कार अभियानों में हिस्सा लिया।
- फिर भी, कांग्रेस अपने कार्यक्रम में मज़दूरों की माँगों को समाहित करने में हिचकिचा रही थी। कांग्रेस को लगता था कि इससे उद्योगपति आंदोलन से दूर चले जाएँगे और साम्राज्यवाद विरोधी ताक़तों में फूट पड़ेगी।
(ङ) औरतें
- सिविल नाफ़रमानी आंदोलन में औरतों ने बड़े पैमाने पर हिस्सा लिया।
- गांधीजी के नमक सत्याग्रह के दौरान हज़ारों औरतें उनकी बात सुनने के लिए घर से बाहर आ जाती थीं।
- उन्होंने जुलूसों में हिस्सा लिया, नमक बनाया, विदेशी कपड़ों व शराब की दुकानों की पिकेटिंग की।
- बहुत सारी महिलाएँ जेल भी गईं।
- शहरी इलाक़ों में ज़्यादातर ऊँची जातियों की महिलाएँ सक्रिय थीं जबकि ग्रामीण इलाक़ों में संपन्न किसान परिवारों की महिलाएँ आंदोलन में हिस्सा ले रही थीं।
- गांधीजी के आह्वान के बाद औरतों को राष्ट्र की सेवा करना अपना पवित्र दायित्व दिखाई देने लगा था।
लेकिन एक बहुत ज़रूरी सीमा भी थी — इसे ज़रूर लिखिए:
“लेकिन सार्वजनिक भूमिका में इस इज़ाफ़े का मतलब यह नहीं था कि औरतों की स्थिति में कोई भारी बदलाव आने वाला था। गांधीजी का मानना था कि घर चलाना, चूल्हा-चौका सँभालना, अच्छी माँ व अच्छी पत्नी की भूमिकाओं का निर्वाह करना ही औरत का असली कर्तव्य है। इसीलिए लंबे समय तक कांग्रेस संगठन में किसी भी महत्त्वपूर्ण पद पर औरतों को जगह देने से हिचकिचाती रही। कांग्रेस को उनकी प्रतीकात्मक उपस्थिति में ही दिलचस्पी थी।”
3.5 सविनय अवज्ञा की सीमाएँ (भाग 3.3)
सभी सामाजिक समूह स्वराज की अमूर्त अवधारणा से प्रभावित नहीं थे।
(क) दलितों का प्रश्न
यह भाग बहुत महत्त्वपूर्ण और संवेदनशील है — इसे ध्यान से पढ़िए।
- ऐसा ही एक समूह राष्ट्र के ‘अछूतों’ का था। वे 1930 के बाद ख़ुद को दलित या उत्पीड़ित कहने लगे थे।
- कांग्रेस ने लंबे समय तक दलितों पर ध्यान नहीं दिया क्योंकि कांग्रेस रूढ़िवादी सवर्ण हिंदू सनातनपंथियों से डरी हुई थी।
महात्मा गांधी ने क्या किया:
- उन्होंने ऐलान किया कि अस्पृश्यता (छुआछूत) को ख़त्म किए बिना सौ साल तक भी स्वराज की स्थापना नहीं की जा सकती।
- उन्होंने ‘अछूतों’ को हरिजन यानी ईश्वर की संतान बताया।
- उन्हें मंदिरों, सार्वजनिक तालाबों, सड़कों और कुओं पर समान अधिकार दिलाने के लिए सत्याग्रह किया।
- मैला ढोनेवालों के काम को प्रतिष्ठा दिलाने के लिए वे ख़ुद शौचालय साफ़ करने लगे।
- उन्होंने ऊँची जातियों का आह्वान किया कि वे अपना हृदय परिवर्तन करें और ‘अस्पृश्यता के पाप’ को छोड़ें।
लेकिन दलित नेता क्या चाहते थे:
- बहुत सारे दलित नेता अपने समुदाय की समस्याओं का अलग राजनीतिक हल ढूँढ़ना चाहते थे।
- वे ख़ुद को संगठित करने लगे।
- उन्होंने शिक्षा संस्थानों में आरक्षण के लिए आवाज़ उठाई और अलग निर्वाचन क्षेत्रों की बात कही ताकि वहाँ से विधायी परिषदों के लिए केवल दलितों को ही चुनकर भेजा जा सके।
- उनका मानना था कि उनकी सामाजिक अपंगता केवल राजनीतिक सशक्तीकरण से ही दूर हो सकती है।
- इसलिए सविनय अवज्ञा आंदोलन में दलितों की हिस्सेदारी काफ़ी सीमित थी। महाराष्ट्र और नागपुर क्षेत्र में यह बात ख़ासतौर से दिखाई देती थी जहाँ उनके संगठन काफ़ी मज़बूत थे।
डॉ. अंबेडकर और पूना पैक्ट:
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| 1930 | डॉ. अंबेडकर ने दलितों को दमित वर्ग एसोसिएशन (Depressed Classes Association) में संगठित किया |
| दूसरा गोलमेज़ सम्मेलन | दलितों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्रों के सवाल पर महात्मा गांधी के साथ उनका काफ़ी विवाद हुआ |
| गांधीजी का आमरण अनशन | जब ब्रिटिश सरकार ने अंबेडकर की माँग मान ली तो गांधीजी आमरण अनशन पर बैठ गए। उनका मत था कि दलितों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्रों की व्यवस्था से समाज में उनके एकीकरण की प्रक्रिया धीमी पड़ जाएगी |
| सितंबर 1932 — पूना पैक्ट | आख़िरकार अंबेडकर ने गांधीजी की राय मान ली और सितंबर 1932 में पूना पैक्ट पर हस्ताक्षर कर दिए |
| परिणाम | इससे दमित वर्गों (जिन्हें बाद में अनुसूचित जाति के नाम से जाना गया) को प्रांतीय एवं केंद्रीय विधायी परिषदों में आरक्षित सीटें मिल गईं, हालाँकि उनके लिए मतदान सामान्य निर्वाचन क्षेत्रों में ही होता था |
| फिर भी | दलित आंदोलन कांग्रेस के नेतृत्व में चल रहे राष्ट्रीय आंदोलन को शंका की दृष्टि से ही देखता रहा |
(ख) मुस्लिम राजनीतिक संगठनों का प्रश्न
- भारत के कुछ मुस्लिम राजनीतिक संगठनों ने भी सविनय अवज्ञा आंदोलन के प्रति कोई ख़ास उत्साह नहीं दिखाया।
- असहयोग-ख़िलाफ़त आंदोलन के शांत पड़ जाने के बाद मुसलमानों का एक बहुत बड़ा तबक़ा कांग्रेस से कटा हुआ महसूस करने लगा था।
- 1920 के दशक के मध्य से कांग्रेस हिंदू महासभा जैसे हिंदू धार्मिक राष्ट्रवादी संगठनों के काफ़ी क़रीब दिखने लगी थी।
- जैसे-जैसे हिंदू-मुसलमानों के बीच संबंध ख़राब होते गए, दोनों समुदाय उग्र धार्मिक जुलूस निकालने लगे। इससे कई शहरों में हिंदू-मुस्लिम सांप्रदायिक टकराव व दंगे हुए। हर दंगे के साथ दोनों समुदायों के बीच फ़ासला बढ़ता गया।
1927 की कोशिश और उसकी नाकामी:
- कांग्रेस और मुस्लिम लीग ने एक बार फिर गठबंधन का प्रयास किया। 1927 में ऐसा लगा कि अब एकता स्थापित हो ही जाएगी।
- सबसे महत्त्वपूर्ण मतभेद भावी विधान सभाओं में प्रतिनिधित्व के सवाल पर थे।
- मुस्लिम लीग के नेताओं में से एक, मोहम्मद अली जिन्ना का कहना था कि अगर मुसलमानों को केंद्रीय सभा में आरक्षित सीटें दी जाएँ और मुस्लिम बहुल प्रांतों (बंगाल और पंजाब) में मुसलमानों को आबादी के अनुपात में प्रतिनिधित्व दिया जाए तो वे मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचिका की माँग छोड़ने के लिए तैयार हैं।
- प्रतिनिधित्व के सवाल पर यह बहस-मुबाहिसा चल ही रहा था कि 1928 में आयोजित किए गए सर्वदलीय सम्मेलन में हिंदू महासभा के एम.आर. जयकर ने इस समझौते के लिए किए जा रहे प्रयासों की खुलेआम निंदा शुरू कर दी जिससे इस मुद्दे के समाधान की सारी संभावनाएँ समाप्त हो गईं।
सविनय अवज्ञा के समय की स्थिति:
- जब सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू हुआ उस समय समुदायों के बीच संदेह और अविश्वास का माहौल बना हुआ था।
- कांग्रेस से कटे हुए मुसलमानों का बड़ा तबक़ा किसी संयुक्त संघर्ष के लिए तैयार नहीं था।
- बहुत सारे मुस्लिम नेता और बुद्धिजीवी भारत में अल्पसंख्यकों के रूप में मुसलमानों की हैसियत को लेकर चिंता जता रहे थे। उनको भय था कि हिंदू बहुसंख्या के वर्चस्व की स्थिति में अल्पसंख्यकों की संस्कृति और पहचान खो जाएगी।
4. सामूहिक अपनेपन का भाव (पाठ का भाग 4)
यह भाग पहले अध्याय से सीधे जुड़ता है, इसलिए इसे उसके साथ मिलाकर समझिए।
पाठ्यपुस्तक का मुख्य प्रश्न: “राष्ट्रवाद की भावना तब पनपती है जब लोग ये महसूस करने लगते हैं कि वे एक ही राष्ट्र के अंग हैं; जब वे एक-दूसरे को एकता के सूत्र में बाँधने वाली कोई साझा बात ढूँढ़ लेते हैं। लेकिन राष्ट्र लोगों के मस्तिष्क में एक यथार्थ का रूप कैसे लेता है?”
उत्तर: “सामूहिक अपनेपन की यह भावना आंशिक रूप से संयुक्त संघर्षों के चलते पैदा हुई थी। इनके अलावा बहुत सारी सांस्कृतिक प्रक्रियाएँ भी थीं जिनके ज़रिए राष्ट्रवाद लोगों की कल्पना और दिलोदिमाग़ पर छा गया था। इतिहास व साहित्य, लोक कथाएँ व गीत, चित्र व प्रतीक, सभी ने राष्ट्रवाद को साकार करने में अपना योगदान दिया था।”
4.1 भारत माता की छवि
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| कैसे शुरू हुआ | बीसवीं सदी में राष्ट्रवाद के विकास के साथ भारत की पहचान भी भारत माता की छवि का रूप लेने लगी |
| शुरुआत किसने की | इस छवि के निर्माण का आरंभ बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने किया था |
| वंदे मातरम् | 1870 के दशक में उन्होंने मातृभूमि की स्तुति के रूप में ‘वन्दे मातरम्’ गीत लिखा था। बाद में इसे उन्होंने अपने उपन्यास आनन्दमठ में शामिल कर लिया। |
| कहाँ गाया गया | यह गीत बंगाल में स्वदेशी आन्दोलन में ख़ूब गाया गया |
| चित्र किसने बनाया | स्वदेशी आंदोलन की प्रेरणा से अबनीन्द्रनाथ टैगोर ने भारत माता की विख्यात छवि को चित्रित किया (1905) |
| चित्र में क्या है | इस पेंटिंग में भारत माता को एक संन्यासिनी के रूप में दर्शाया गया है। वह शांत, गंभीर, दैवी और अध्यात्मिक गुणों से युक्त दिखाई देती है। माँ की छवि शिक्षा, भोजन और कपड़े दे रही है; एक हाथ में माला उसके संन्यासी गुण को रेखांकित करती है |
| आगे क्या हुआ | आगे चल कर जब इस छवि को बड़े पैमाने पर तसवीरों में उतारा जाने लगा और विभिन्न कलाकार यह तसवीर बनाने लगे तो भारत माता की छवि विविध रूप ग्रहण करती गई |
| महत्त्व | इस मातृ छवि के प्रति श्रद्धा को राष्ट्रवाद में आस्था का प्रतीक माना जाने लगा |
चित्र 14 का महत्त्वपूर्ण अंतर: पाठ्यपुस्तक बताती है कि “भारत माता की यह छवि अबनीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा चित्रित छवि के बिलकुल विपरीत है। यहाँ भारत माता के हाथों में त्रिशूल है और वह हाथी व शेर के बीच खड़ी है। ये दोनों ही शक्ति और सत्ता के प्रतीक हैं।”
इन दो चित्रों की तुलना ज़रूर कीजिए — एक में भारत माता शांत संन्यासिनी हैं, दूसरे में त्रिशूलधारी और शक्तिशाली। यानी एक ही विचार को अलग-अलग कलाकारों ने अलग-अलग रूप दिया। यह अभ्यास प्रश्न 4 (भारत माता और जर्मेनिया की तुलना) का भी आधार है।
4.2 लोक कथाओं का पुनरुद्धार
- राष्ट्रवाद का विचार भारतीय लोक कथाओं को पुनर्जीवित करने के आंदोलन से भी मज़बूत हुआ।
- उन्नीसवीं सदी के आख़िर में राष्ट्रवादियों ने भाटों व चारणों द्वारा गाई-सुनाई जाने वाली लोक कथाओं को दर्ज करना शुरू कर दिया।
- वे लोक गीतों व जनश्रुतियों को इकट्ठा करने के लिए गाँव-गाँव घूमने लगे।
- उनका मानना था कि यही कहानियाँ हमारी उस परंपरागत संस्कृति की सही तसवीर पेश करती हैं जो बाहरी ताक़तों के प्रभाव से भ्रष्ट और दूषित हो चुकी है।
- अपनी राष्ट्रीय पहचान को ढूँढ़ने और अपने अतीत में गौरव का भाव पैदा करने के लिए इस लोक परंपरा को बचाकर रखना ज़रूरी था।
दो प्रमुख नाम याद कीजिए:
| व्यक्ति | योगदान |
|---|---|
| रबीन्द्रनाथ टैगोर | बंगाल में ख़ुद लोक-गाथा गीत, बाल गीत और मिथकों को इकट्ठा करने निकल पड़े। उन्होंने लोक परंपराओं को पुनर्जीवित करने वाले आंदोलन का नेतृत्व किया। |
| नटेसा शास्त्री | मद्रास में द फ़ोकलोर्स ऑफ़ सदर्न इंडिया के नाम से तमिल लोक कथाओं का विशाल संकलन चार खंडों में प्रकाशित किया। उनका मानना था कि लोक कथाएँ राष्ट्रीय साहित्य होती हैं; यह ‘लोगों के असली विचारों और विशिष्टताओं की सबसे विश्वसनीय अभिव्यक्ति’ है। |
4.3 झंडे
जैसे-जैसे राष्ट्रीय आंदोलन आगे बढ़ा, राष्ट्रवादी नेता लोगों को एकजुट करने और उनमें राष्ट्रवाद की भावना भरने के लिए चिह्नों और प्रतीकों के बारे में और ज़्यादा जागरूक होते गए।
| झंडा | विवरण |
|---|---|
| स्वदेशी आंदोलन का झंडा (बंगाल) | एक तिरंगा झंडा (हरा, पीला, लाल) तैयार किया गया। इसमें ब्रिटिश भारत के आठ प्रांतों का प्रतिनिधित्व करते कमल के आठ फूल और हिंदुओं व मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करता एक अर्धचंद्र दर्शाया गया था। |
| 1921 का स्वराज का झंडा | 1921 तक गांधीजी ने भी स्वराज का झंडा तैयार कर लिया था। यह भी तिरंगा (सफ़ेद, हरा और लाल) था। इसके मध्य में गांधीवादी प्रतीक चरखे को जगह दी गई थी जो स्वावलंबन का प्रतीक था। |
| झंडे का अर्थ | जुलूसों में यह झंडा थामे चलना शासन के प्रति अवज्ञा का संकेत था। |
4.4 इतिहास की पुनर्व्याख्या
- इतिहास की पुनर्व्याख्या राष्ट्रवाद की भावना पैदा करने का एक और साधन थी।
- उन्नीसवीं सदी के अंत तक आते-आते बहुत सारे भारतीय यह महसूस करने लगे थे कि राष्ट्र के प्रति गर्व का भाव जगाने के लिए भारतीय इतिहास को अलग ढंग से पढ़ाया जाना चाहिए।
- अंग्रेज़ों की नज़र में भारतीय पिछड़े हुए और आदिम लोग थे जो अपना शासन ख़ुद नहीं सँभाल सकते।
- इसके जवाब में भारत के लोग अपनी महान उपलब्धियों की खोज में अतीत की ओर देखने लगे।
- उन्होंने उस गौरवमयी प्राचीन युग के बारे में लिखना शुरू कर दिया जब कला और वास्तुशिल्प, विज्ञान और गणित, धर्म और संस्कृति, क़ानून और दर्शन, हस्तकला और व्यापार फल-फूल रहे थे।
- उनका कहना था कि इस महान युग के बाद पतन का समय आया और भारत को ग़ुलाम बना लिया गया।
- इस राष्ट्रवादी इतिहास में पाठकों को अतीत में भारत की महानता व उपलब्धियों पर गर्व करने और ब्रिटिश शासन के तहत दुर्दशा से मुक्ति के लिए संघर्ष का मार्ग अपनाने का आह्वान किया जाता था।
लेकिन इसकी एक बड़ी समस्या भी थी — यह ज़रूर लिखिए:
“लोगों को एकजुट करने की इन कोशिशों की अपनी समस्याएँ थीं। जिस अतीत का गौरवगान किया जा रहा था वह हिंदुओं का अतीत था। जिन छवियों का सहारा लिया जा रहा था वे हिंदू प्रतीक थे। इसलिए अन्य समुदायों के लोग अलग-थलग महसूस करने लगे थे।”
5. निष्कर्ष (पाठ का अंतिम भाग)
पाठ्यपुस्तक का निष्कर्ष बहुत संतुलित है और इसे पूरा पढ़ना चाहिए:
- अंग्रेज़ सरकार के ख़िलाफ़ बढ़ता ग़ुस्सा विभिन्न भारतीय समूहों और वर्गों को स्वतंत्रता के साझा संघर्ष में खींच रहा था।
- महात्मा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने लोगों के असंतोष और परेशानियों को स्वतंत्रता के संगठित आंदोलन में समाहित करने का प्रयास किया।
- उन्होंने आंदोलन के ज़रिए पूरे देश को एकता के सूत्र में पिरोने का प्रयास किया।
- लेकिन जैसा कि हमने देखा, इन आंदोलनों में हिस्सा लेने वाले विभिन्न समूह और वर्ग अलग-अलग आकांक्षाओं और अपेक्षाओं के साथ हिस्सा ले रहे थे।
- उनकी शिकायतें बहुत व्यापक थीं इसलिए औपनिवेशिक शासन से मुक्ति का भी सबके लिए अपना-अपना अर्थ था।
- कांग्रेस ने इन विभेदों को हल करने और यह सुनिश्चित करने के लिए हमेशा प्रयास किया कि एक समूह की माँगों के कारण कोई दूसरा समूह दूर न चला जाए।
- यही वजह है कि आंदोलन के भीतर अकसर बिखराव आ जाता था।
- कांग्रेस की सरगर्मियों और राष्ट्रीय एकता के शिखर को छूने के बाद बिखराव और आंतरिक टकरावों के चरण आ जाते थे।
और अंतिम वाक्य:
“संक्षेप में, जो राष्ट्र उभर रहा था वह औपनिवेशिक शासन से मुक्ति की चाह रखने वाली बहुत सारी आवाज़ों का पुंज था।”
6. भारत छोड़ो आंदोलन (पृ. 49 का बॉक्स)
यह बॉक्स तर्कसंगत बनाई गई पुस्तक में जोड़ा गया है और परीक्षा में इससे प्रश्न आ सकता है, इसलिए पूरा याद कीजिए।
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| पृष्ठभूमि | क्रिप्स मिशन की असफलता एवं द्वितीय विश्व युद्ध के प्रभावों ने भारत में व्यापक असंतोष को जन्म दिया |
| गांधीजी की पहल | इसके फलस्वरूप गांधीजी ने एक आंदोलन शुरू किया, जिसमें उन्होंने अंग्रेज़ों के पूरी तरह से भारत छोड़ने पर ज़ोर दिया |
| 14 जुलाई 1942 | वर्धा में अपनी कार्यकारिणी में कांग्रेस कार्य समिति ने ऐतिहासिक ‘भारत छोड़ो’ प्रस्ताव पारित किया, जिसमें सत्ता का तत्काल हस्तांतरण एवं भारत छोड़ने की माँग की गई |
| 8 अगस्त 1942 | बंबई में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया, जिसमें पूरे देश में व्यापक पैमाने पर एक अहिंसक जन संघर्ष का आह्वान किया गया |
| प्रसिद्ध नारा | इसी अवसर पर गांधीजी ने प्रसिद्ध ‘करो या मरो’ भाषण दिया |
| प्रभाव | ‘भारत छोड़ो’ के इस आह्वान ने देश के अधिकतर हिस्सों में राज्य व्यवस्था को ठप्प कर दिया; लोग स्वतः ही आंदोलन में कूद पड़े |
| लोगों ने क्या किया | लोगों ने हड़तालें कीं और राष्ट्रीय गीतों एवं नारों के साथ प्रदर्शन किए एवं जुलूस निकाले |
| कौन शामिल हुए | यह आंदोलन वास्तव में एक जन आंदोलन था जिसमें छात्र, मज़दूर और किसान जैसे हज़ारों साधारण लोगों ने हिस्सा लिया |
| प्रमुख नेता | जयप्रकाश नारायण, अरुणा आसफ़ अली एवं राम मनोहर लोहिया, और बहुत सारी महिलाएँ — जैसे बंगाल से मातांगिनी हाजरा, असम से कनकलता बरुआ और उड़ीसा से रमा देवी |
| परिणाम | अंग्रेज़ों द्वारा अत्यधिक बल प्रयोग के बावजूद इसे दबाने में एक वर्ष से अधिक समय लग गया |
तीन महिला नेताओं के नाम ज़रूर याद कीजिए — मातांगिनी हाजरा (बंगाल), कनकलता बरुआ (असम) और रमा देवी (उड़ीसा)। ये नाम प्रायः छूट जाते हैं और इन्हें लिखने से उत्तर में विशेषता आती है।
7. दो आंदोलनों की तुलना (परीक्षा के लिए सबसे उपयोगी तालिका)
| आधार | असहयोग आंदोलन (1921–22) | सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930–34) |
|---|---|---|
| मुख्य आह्वान | अंग्रेज़ों का सहयोग न करो | औपनिवेशिक क़ानूनों का उल्लंघन करो |
| शुरुआत | जनवरी 1921 | 12 मार्च 1930 को नमक यात्रा से; 6 अप्रैल को दांडी में नमक बनाकर |
| प्रमुख कार्यक्रम | पदवियाँ लौटाना; सरकारी नौकरियों, स्कूलों, अदालतों और विधायी परिषदों का बहिष्कार; विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार | नमक क़ानून तोड़ना; लगान और चौकीदारी कर न देना; वन क़ानूनों का उल्लंघन; विदेशी कपड़ों का बहिष्कार |
| मुस्लिम भागीदारी | ख़िलाफ़त के कारण व्यापक | काफ़ी कम — समुदायों के बीच संदेह का माहौल था |
| महिलाओं की भागीदारी | कम | बहुत बड़े पैमाने पर |
| क्यों वापस लिया गया | चौरी-चौरा की हिंसा के बाद, फ़रवरी 1922 में | 5 मार्च 1931 के गांधी-इरविन समझौते के बाद; फिर दोबारा शुरू होकर 1934 तक मंद पड़ा |
8. मुख्य आंदोलनों और स्थानों की सूची (मानचित्र के लिए)
यह तालिका मानचित्र के प्रश्न के लिए सबसे ज़रूरी है। पूरी सूची 05-प्रश्न बैंक के भाग ‘च’ में अभ्यास के साथ दी गई है।
| स्थान | राज्य | क्या हुआ |
|---|---|---|
| चंपारण | बिहार | 1917 — दमनकारी बागान व्यवस्था के ख़िलाफ़ किसानों का सत्याग्रह |
| खेड़ा | गुजरात | 1917 — फ़सल ख़राबी और प्लेग के कारण लगान में ढील के लिए किसान सत्याग्रह |
| अहमदाबाद | गुजरात | 1918 — सूती कपड़ा कारख़ानों के मज़दूरों का सत्याग्रह |
| अमृतसर | पंजाब | 13 अप्रैल 1919 — जलियाँवाला बाग़ हत्याकांड |
| चौरी-चौरा | उत्तर प्रदेश (गोरखपुर) | फ़रवरी 1922 — हिंसक टकराव, जिसके बाद असहयोग आंदोलन वापस लिया गया |
| कलकत्ता | बंगाल | सितंबर 1920 — कांग्रेस अधिवेशन, असहयोग का प्रस्ताव |
| नागपुर | महाराष्ट्र | दिसंबर 1920 — कांग्रेस अधिवेशन, असहयोग कार्यक्रम स्वीकृत |
| लाहौर | पंजाब | दिसंबर 1929 — कांग्रेस अधिवेशन, ‘पूर्ण स्वराज’ की माँग |
| दांडी | गुजरात | 6 अप्रैल 1930 — नमक क़ानून तोड़ा गया |
| बारदोली | गुजरात | 1928 — वल्लभ भाई पटेल के नेतृत्व में किसान आंदोलन |
| मद्रास | — | जस्टिस पार्टी ने परिषद चुनावों का बहिष्कार नहीं किया |
| अवध | उत्तर प्रदेश | बाबा रामचंद्र के नेतृत्व में किसान आंदोलन; अवध किसान सभा |
| आंध्र प्रदेश की गूडेम पहाड़ियाँ | आंध्र प्रदेश | अल्लूरी सीताराम राजू का आदिवासी विद्रोह |
| शोलापुर | महाराष्ट्र | 1930 — गांधीजी की गिरफ़्तारी के बाद औद्योगिक मज़दूरों का उग्र प्रदर्शन |
9. महत्त्वपूर्ण व्यक्ति — एक नज़र में
| व्यक्ति | कौन थे / क्या किया |
|---|---|
| महात्मा गांधी | जनवरी 1915 में दक्षिण अफ़्रीका से लौटे; सत्याग्रह का विचार दिया; असहयोग, सविनय अवज्ञा और भारत छोड़ो आंदोलनों के नेता; पुस्तक हिंद स्वराज (1909) |
| जनरल डायर | 13 अप्रैल 1919 को जलियाँवाला बाग़ में गोली चलवाई; कहा कि वह ‘एक नैतिक प्रभाव’ उत्पन्न करना चाहता था |
| मोहम्मद अली और शौकत अली | ख़िलाफ़त आंदोलन के नेता; मार्च 1919 में बंबई में ख़िलाफ़त समिति |
| बाबा रामचंद्र | अवध में किसानों के नेता; पहले फिजी में गिरमिटिया मज़दूर रह चुके थे |
| जवाहरलाल नेहरू | जून 1920 में अवध के गाँवों का दौरा; अवध किसान सभा का गठन; दिसंबर 1929 के लाहौर अधिवेशन के अध्यक्ष |
| अल्लूरी सीताराम राजू | आंध्र प्रदेश की गूडेम पहाड़ियों में आदिवासी विद्रोह के नेता; 1924 में फाँसी |
| वल्लभ भाई पटेल | 1928 में बारदोली सत्याग्रह का नेतृत्व |
| सी.आर. दास और मोतीलाल नेहरू | कांग्रेस के भीतर स्वराज पार्टी का गठन; परिषद-राजनीति में लौटना चाहते थे |
| सुभाषचंद्र बोस | नेहरू के साथ उग्र जनांदोलन और पूर्ण स्वतंत्रता के पक्षधर |
| सर जॉन साइमन | 1928 के साइमन कमीशन के प्रमुख; आयोग में एक भी भारतीय सदस्य नहीं था |
| लाला लाजपत राय | साइमन कमीशन के विरोध में लाठीचार्ज से मिले ज़ख़्मों के कारण मृत्यु |
| लॉर्ड इरविन | वायसराय; अक्तूबर 1929 में ‘डोमिनियन स्टेट्स’ का गोलमोल ऐलान; 5 मार्च 1931 का गांधी-इरविन समझौता |
| अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ान | गांधीजी के समर्पित साथी; अप्रैल 1930 में गिरफ़्तारी के बाद बड़ा विरोध हुआ |
| डॉ. बी.आर. अंबेडकर | 1930 में दमित वर्ग एसोसिएशन की स्थापना; सितंबर 1932 में पूना पैक्ट |
| मोहम्मद अली जिन्ना | मुस्लिम लीग के नेता; आरक्षित सीटों के बदले पृथक निर्वाचिका की माँग छोड़ने को तैयार थे |
| एम.आर. जयकर | हिंदू महासभा के नेता; 1928 के सर्वदलीय सम्मेलन में समझौते के प्रयासों की निंदा की |
| मोहम्मद इक़बाल | 1930 में मुस्लिम लीग के अध्यक्ष; पृथक निर्वाचिका की ज़रूरत पर ज़ोर |
| बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय | 1870 के दशक में ‘वन्दे मातरम्’ लिखा; उपन्यास आनन्दमठ |
| अबनीन्द्रनाथ टैगोर | 1905 में भारत माता की विख्यात छवि चित्रित की |
| रबीन्द्रनाथ टैगोर | बंगाल में लोक-गाथा गीत, बाल गीत और मिथकों का संग्रह |
| नटेसा शास्त्री | मद्रास में द फ़ोकलोर्स ऑफ़ सदर्न इंडिया — तमिल लोक कथाओं का चार खंडों में संकलन |
| पुरुषोत्तमदास ठाकुरदास और जी.डी. बिड़ला | उद्योगपति; फ़िक्की (1927) के ज़रिए व्यावसायिक हितों का संगठन |
| जयप्रकाश नारायण, अरुणा आसफ़ अली, राम मनोहर लोहिया | भारत छोड़ो आंदोलन के प्रमुख नेता |
| मातांगिनी हाजरा, कनकलता बरुआ, रमा देवी | भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय महिला नेता (क्रमशः बंगाल, असम, उड़ीसा) |
10. कठिन शब्द और उनके अर्थ (शब्दावली)
10.1 पाठ्यपुस्तक के ‘नए शब्द’ बॉक्स से
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| जबरन भर्ती | इस प्रक्रिया में अंग्रेज़ भारत के लोगों को ज़बरदस्ती सेना में भर्ती कर लेते थे। |
| बहिष्कार | किसी के साथ संपर्क रखने और जुड़ने से इनकार करना, या गतिविधियों में हिस्सेदारी, चीज़ों की ख़रीद व इस्तेमाल से इनकार करना। आमतौर पर यह विरोध का एक रूप होता है। |
| बेगार | बिना किसी पारिश्रमिक के काम करवाना। |
| गिरमिटिया मज़दूर | औपनिवेशिक शासन के दौरान बहुत सारे लोगों को काम करने के लिए फ़िजी, गयाना, वेस्टइंडीज़ आदि स्थानों पर ले जाया गया था जिन्हें बाद में गिरमिटिया कहा जाने लगा। उन्हें एक एग्रीमेंट (अनुबंध) के तहत ले जाया जाता था; इसी एग्रीमेंट को ये मज़दूर गिरमिट कहते थे। अंग्रेज़ी में इन्हें Indentured Labour कहा जाता है। |
| पिकेटिंग | प्रदर्शन या विरोध का एक ऐसा स्वरूप जिसमें लोग किसी दुकान, फ़ैक्ट्री या दफ़्तर के भीतर जाने का रास्ता रोक लेते हैं। |
10.2 पाठ में आए अन्य कठिन शब्द
| शब्द | आसान अर्थ |
|---|---|
| सत्याग्रह | सत्य के बल पर किया जाने वाला अहिंसक संघर्ष; गांधीजी के अनुसार यह “शुद्ध आत्मबल” है |
| अहिंसा | किसी को शारीरिक या मानसिक कष्ट न पहुँचाना |
| असहयोग | सरकार के साथ सहयोग करना बंद कर देना |
| सविनय अवज्ञा | शांतिपूर्वक क़ानून तोड़ना |
| स्वराज | अपना शासन; पर अध्याय बताता है कि हर समूह के लिए इसका अर्थ अलग था |
| पूर्ण स्वराज | पूरी आज़ादी; दिसंबर 1929 के लाहौर अधिवेशन में यह माँग स्वीकार हुई |
| डोमिनियन स्टेट्स | ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर रहते हुए स्वशासन का दर्जा |
| मार्शल लॉ | सैनिक क़ानून, जिसमें सेना के पास असाधारण अधिकार आ जाते हैं |
| इजारेदारी | एकाधिकार; जब किसी वस्तु का उत्पादन या बिक्री केवल एक ही के पास हो |
| तालुक़दार | बड़े भूस्वामी, जो किसानों से लगान वसूलते थे |
| पट्टेदार | वह किसान जो किसी और की ज़मीन पट्टे (किराए) पर लेकर खेती करता है |
| पृथक निर्वाचिका | अलग निर्वाचन क्षेत्र, जहाँ केवल एक ही समुदाय के लोग मतदान करें और उसी समुदाय का प्रतिनिधि चुना जाए |
| आमरण अनशन | मृत्यु तक भूख हड़ताल |
| पूना पैक्ट | सितंबर 1932 का गांधीजी और अंबेडकर के बीच समझौता, जिससे दमित वर्गों को आरक्षित सीटें मिलीं |
| महामंदी | 1929 के बाद की विश्वव्यापी आर्थिक मंदी |
| गोलमेज़ सम्मेलन | लंदन में भावी संविधान पर चर्चा के लिए हुए सम्मेलन |
| रूपक/छवि | जब किसी विचार को किसी व्यक्ति या चित्र के रूप में दिखाया जाए (जैसे भारत माता) |
| स्वदेशी | अपने देश में बनी वस्तुएँ अपनाना और विदेशी वस्तुओं का त्याग |
| खादी | हाथ से काता और बुना हुआ कपड़ा, जो स्वावलंबन का प्रतीक बना |
| चरखा | सूत कातने का यंत्र; स्वावलंबन का प्रतीक, जिसे 1921 के स्वराज झंडे में जगह मिली |
11. महत्त्वपूर्ण तिथियाँ — एक नज़र में
पाठ्यपुस्तक के ‘कुछ महत्त्वपूर्ण तिथियाँ’ बॉक्स और पाठ, दोनों से ली गई सूची।
| तिथि | घटना |
|---|---|
| 1909 | गांधीजी की पुस्तक हिंद स्वराज प्रकाशित |
| जनवरी 1915 | महात्मा गांधी भारत लौटे |
| 1917 | चंपारण (बिहार) और खेड़ा (गुजरात) के सत्याग्रह |
| 1918 | अहमदाबाद के सूती मिल मज़दूरों का सत्याग्रह |
| 1918–19 | बाबा रामचंद्र उत्तर प्रदेश के किसानों को संगठित करते हैं |
| मार्च 1919 | बंबई में ख़िलाफ़त समिति का गठन |
| अप्रैल 1919 | रॉलट एक्ट के ख़िलाफ़ गांधीवादी हड़ताल; 13 अप्रैल को जलियाँवाला बाग़ हत्याकांड |
| जून 1920 | जवाहरलाल नेहरू का अवध के गाँवों का दौरा |
| सितंबर 1920 | कांग्रेस का कलकत्ता अधिवेशन — असहयोग का प्रस्ताव |
| दिसंबर 1920 | कांग्रेस का नागपुर अधिवेशन — असहयोग कार्यक्रम स्वीकृत |
| जनवरी 1921 | असहयोग और ख़िलाफ़त आंदोलन शुरू |
| फ़रवरी 1922 | चौरी-चौरा; गांधीजी असहयोग आंदोलन वापस ले लेते हैं |
| मई 1924 | अल्लूरी सीताराम राजू की गिरफ़्तारी; दो वर्ष से चला आ रहा हथियारबंद आदिवासी संघर्ष समाप्त |
| 1927 | भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग परिसंघ (फ़िक्की) का गठन |
| 1928 | साइमन कमीशन भारत पहुँचा; बारदोली सत्याग्रह |
| दिसंबर 1929 | लाहौर अधिवेशन; कांग्रेस ‘पूर्ण स्वराज’ की माँग को स्वीकार कर लेती है |
| 1930 | अंबेडकर दमित वर्ग एसोसिएशन की स्थापना करते हैं |
| 26 जनवरी 1930 | पहला स्वतंत्रता दिवस मनाया गया |
| मार्च 1930 | गांधीजी दांडी में नमक क़ानून का उल्लंघन करके सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू करते हैं |
| मार्च 1931 | गांधीजी सविनय अवज्ञा आंदोलन वापस ले लेते हैं (गांधी-इरविन समझौता, 5 मार्च) |
| दिसंबर 1931 | दूसरा गोलमेज़ सम्मेलन |
| 1932 | सविनय अवज्ञा आंदोलन पुनः प्रारंभ; सितंबर में पूना पैक्ट |
| 14 जुलाई 1942 | वर्धा में ‘भारत छोड़ो’ प्रस्ताव |
| 8 अगस्त 1942 | बंबई में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति का समर्थन; ‘करो या मरो’ भाषण |