Chapter 5मुद्रण संस्कृति और आधुनिक दुनिया

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यह फ़ाइल केवल शिक्षक के लिए है। इसमें वे बातें हैं जो विद्यार्थी की फ़ाइलों में नहीं दी गईं — कक्षा की असली दिक़्क़तें, उनके हल, और विषय की वह गहराई जो पढ़ाने का आत्मविश्वास देती है।


भाग 1 — अध्याय की असली संरचना

यह अध्याय देखने में नौ भागों का है, पर पढ़ाने के लिए इसे तीन हिस्सों में बाँटिए —

हिस्सापाठ्यपुस्तक के भागपृष्ठअसल में यह क्या है
हिस्सा 1 — तकनीक की कहानीभाग 1 और 2106–110छपाई कैसे बनी और कहाँ से कहाँ गई। यहाँ नाम और तिथियाँ ज़्यादा हैं।
हिस्सा 2 — यूरोप में समाज पर असरभाग 3, 4, 5111–118यहाँ से अध्याय बहस बन जाता है — छपाई अच्छी थी या ख़तरनाक।
हिस्सा 3 — भारतभाग 6, 7, 8, 9119–128वही बहस, पर औपनिवेशिक संदर्भ में; और यहाँ आवाज़ पाने वालों की कहानियाँ हैं।

अध्याय की एक-वाक्य आत्मा

यह अध्याय तकनीक का इतिहास नहीं है। यह इस बात का इतिहास है कि जब आम लोगों के हाथ में पढ़ने-लिखने की ताक़त आई, तो सत्ता ने क्या किया।

पाठ्यपुस्तक ने यह बात दो उद्धरणों में क़ैद कर रखी है — लूथर का “ईश्वर का सबसे बड़ा तोहफ़ा” और इरैस्मस की “भिनभिनाती मक्खियाँ”। इन दोनों को पहले ही दिन बोर्ड पर लिखिए और पूरे अध्याय में उन्हें वहीं रहने दीजिए।

इस अध्याय की कहानी-रीढ़ (पाँच लोग)

कक्षा 10 के कमज़ोर विद्यार्थी सूची याद नहीं रख पाते, पर कहानी नहीं भूलते। इन पाँच पर टिकिए —

#कौनक्यों याद रहेगा
1मार्को पोलो (1295)एक यात्री जो तकनीक साथ लाया
2गुटेन्बर्ग (1448)जिसने अंगूर-प्रेस से किताब छाप दी
3मेनोकियो (16वीं सदी)जिसे पढ़ने की सज़ा मौत मिली
4राससुन्दरी देबी (1876)जिसने रसोई में छिपकर पढ़ना सीखा
5काशीबाबा (1938)जिस मज़दूर ने ख़ुद किताब छापी

अगर सिर्फ़ ये पाँच कहानियाँ बच्चों के मन में बैठ गईं, तो अध्याय का सत्तर प्रतिशत हो गया। बाक़ी तिथियाँ इन्हीं के आसपास टँग जाएँगी।

भाग 2 — वे दस जगहें जहाँ बच्चे सबसे ज़्यादा अटकते हैं

1. विदेशी नाम मुँह में नहीं चढ़ते

दिक़्क़त क्या है — गुटेन्बर्ग, इरैस्मस, मेनोकियो, मर्सिए, कितागावा उतामारो, त्सुताया जुज़ाबूरो — कक्षा 10 के हिंदी माध्यम के बच्चे इन नामों से घबरा जाते हैं और अध्याय को “कठिन” मान लेते हैं।

हल —

  • पहले दिन ही बोर्ड पर सिर्फ़ चार नाम लिखिए — गुटेन्बर्ग, लूथर, इरैस्मस, मेनोकियो। कहिए कि “बाक़ी नाम सिर्फ़ पहचानने हैं, याद नहीं करने।”
  • हर नाम के साथ एक चित्र या एक क्रिया जोड़िए — गुटेन्बर्ग = प्रेस, लूथर = दरवाज़े पर काग़ज़, इरैस्मस = मक्खी, मेनोकियो = सज़ा।
  • उतामारो और जुज़ाबूरो जैसे नाम बोर्ड पर लिखिए ज़रूर, पर साफ़ कह दीजिए — “यह परीक्षा में नहीं आएगा, यह सिर्फ़ जानने के लिए है।” इससे बच्चों का डर आधा हो जाता है।

2. “छपाई चीन में हुई?” — यह बात भरोसे में नहीं आती

दिक़्क़त — बच्चों के मन में यह बैठा होता है कि हर आविष्कार यूरोप में हुआ। जब उन्हें बताया जाता है कि छपाई 594 ई. से चीन में थी, तो वे इसे गंभीरता से नहीं लेते — या इसे “बस एक तथ्य” मानकर आगे बढ़ जाते हैं।

हल — संख्याओं से टकराइए। बोर्ड पर लिखिए —

चीन594 ई.
कोरिया (धातु के अक्षर)चौदहवीं सदी का अंत
गुटेन्बर्ग1448

फिर पूछिए — “कोरिया और गुटेन्बर्ग में कितने साल का फ़र्क़ है?” (लगभग 78 साल)। फिर पूछिए — “तो फिर श्रेय गुटेन्बर्ग को क्यों मिलता है?” उत्तर: क्योंकि उसकी तकनीक बड़े पैमाने पर फैली, कोरिया की नहीं फैल पाई। आविष्कार और प्रसार दो अलग चीज़ें हैं। यह एक बातचीत बच्चों की पूरी सोच बदल देती है।

3. डायमंड सूत्र वाली पाठ्यपुस्तक की भूल

दिक़्क़त — पाठ्यपुस्तक (पृष्ठ 106) डायमंड सूत्र को “जापान की सबसे पुरानी” पुस्तक बताती है। यह ग़लत है — वह चीन की पुस्तक है, दुनहुआंग की गुफ़ा से मिली, आज ब्रिटिश लाइब्रेरी में है। अंग्रेज़ी मूल NCERT में भी यही भूल है।

हल —

  • बोर्ड परीक्षा में पाठ्यपुस्तक का ही अनुसरण करवाइए।
  • पर कक्षा में यह बात ज़रूर बताइए — क्योंकि यही अध्याय सिखा रहा है कि छपा हुआ सब कुछ सही नहीं होता।
  • कहिए — “देखो, जिस अध्याय में इरैस्मस कह रहे हैं कि छपी हर बात भरोसे लायक़ नहीं, उसी अध्याय में एक ग़लत बात छपी है। यही तो वह बता रहे थे।” यह क्षण कक्षा में बिजली की तरह काम करता है।
  • पूरा विवरण फ़ाइल 07 के भाग 1 में है।

4. “मुद्रण क्रांति” शब्द ख़ाली लगता है

दिक़्क़त — बच्चे “क्रांति” शब्द पर अटक जाते हैं। उन्हें लगता है कि कोई लड़ाई हुई होगी। और परिभाषा वे रट लेते हैं पर समझते नहीं।

हल — तीन शब्द बोर्ड पर लिखिए और वहीं छोड़ दीजिए —

सूचना · सत्ता · सोच

कहिए — “इन तीनों से लोगों का रिश्ता बदल गया। बस, इसी को मुद्रण क्रांति कहते हैं।”

फिर एक ठोस उदाहरण दीजिए —

  • पहले धर्म की व्याख्या सिर्फ़ पादरी कर सकता था। छपाई के बाद मेनोकियो जैसा किसान भी करने लगा।
  • यही “सत्ता से रिश्ता बदलना” है।

5. “मौखिक से मुद्रित” वाली बात हवा में रह जाती है

दिक़्क़त — पाठ्यपुस्तक का यह हिस्सा (पृष्ठ 111) सबसे महत्त्वपूर्ण है और सबसे ज़्यादा फिसलता है। “श्रोता-जनता से पाठक-जनता” जैसा वाक्य बच्चे रट लेते हैं पर उसका अर्थ नहीं समझते।

हल — कक्षा में यह करके दिखाइए —

  • एक बच्चे को खड़ा करके अख़बार का एक पैराग्राफ़ ऊँची आवाज़ में पढ़वाइए।
  • बाक़ी बच्चों से पूछिए — “जो तुमने अभी सुना, वह छपा हुआ था या बोला हुआ?”
  • जवाब: दोनों। यही ‘धुँधली विभाजक रेखा’ है।
  • फिर बॉक्स 2 (जेम्स लॉकिंग्टन, पृष्ठ 114) पढ़वाइए — जहाँ गाँव के लोग शाम को अपने बच्चों से क़िस्से पढ़वाकर सुनते थे।

6. फ़्रांसीसी क्रांति वाला हिस्सा उलझा देता है

दिक़्क़त — पाठ्यपुस्तक पहले तीन तर्क देती है, फिर उन्हीं तर्कों की सीमा भी बताती है। बच्चे भ्रमित हो जाते हैं — “आख़िर छपाई से क्रांति हुई या नहीं?”

हल — साफ़-साफ़ कहिए कि यह भ्रम नहीं, यही इतिहास का तरीक़ा है।

बोर्ड पर दो ख़ाने बनाइए —

छपाई ने क्या कियाछपाई ने क्या नहीं किया
नए विचार फैलाएलोगों के दिमाग़ को सीधे नहीं बदला
बहस की संस्कृति बनाईहर पढ़ने वाले को क्रांतिकारी नहीं बना दिया
राजशाही का मज़ाक फैलायालोग चर्च और राज्य का प्रचार भी पढ़ते थे

फिर पाठ्यपुस्तक की अंतिम पंक्ति लिखवाइए — “मुद्रण ने उनके मानस को सीधे तौर पर भले नहीं रचा हो, पर इसने अलग ढंग से सोचने की संभावनाएँ ज़रूर खोलीं।”

यह पंक्ति बच्चों से कंठस्थ करवाइए। यह इस अध्याय की सबसे ज़्यादा अंक दिलाने वाली पंक्ति है, और सबसे परिपक्व विचार भी।

7. भारत वाला हिस्सा बहुत लंबा लगता है

दिक़्क़त — भाग 6 से 9 तक चार भाग हैं, दर्जनों नाम हैं, और बच्चे थक जाते हैं।

हल — इसे तीन नामों पर टाँग दीजिए —

नामकिस चीज़ का प्रतिनिधि
राममोहन रायधार्मिक बहस — भाग 7
राससुन्दरी देबीमहिलाएँ — भाग 8.1
काशीबाबाग़रीब जनता और मज़दूर — भाग 8.2

और भाग 9 (प्रतिबंध) को एक वाक्य में बाँधिए — “जब ये तीनों बोलने लगे, तो सरकार ने क़ानून बनाया।”

8. “छपाई ने बाँटा भी और जोड़ा भी” — यह उलटा लगता है

दिक़्क़त — बच्चे कहते हैं कि “सर, आप एक बार बाँटने की बात कहते हैं, फिर जोड़ने की। कौन-सा सही है?”

हल — दोनों सही हैं, और इसका उदाहरण दीजिए —

  • बाँटा: संवाद कौमुदी बनाम समाचार चंद्रिका — सुधारक और रूढ़िवादी आमने-सामने आ गए।
  • जोड़ा: रामचरितमानस का सस्ता संस्करण पूरे उत्तर भारत में एक साथ पहुँचा; अंबेडकर और पेरियार के लेखन पूरे भारत में पढ़े गए।
  • और सबसे अच्छा उदाहरण: भारत का पहला उर्दू अख़बार जाम-ए-जहाँ नुमा एक बंगाली हिंदू हरिहर दत्त ने निकाला था। (यह पाठ्यपुस्तक में नहीं है — फ़ाइल 07 देखिए।)

फिर आज से जोड़िए — “मोबाइल भी तो यही करता है ना? लोगों को जोड़ता भी है और लड़वाता भी है।” बच्चे तुरंत समझ जाते हैं।

9. “1882” वाली छपाई की भूल

दिक़्क़त — पृष्ठ 121 पर लिखा है कि फ़ारसी अख़बार “1882 में” छपे, जबकि पूरा अनुच्छेद 1820 के दशक का है। तेज़ बच्चे यह पकड़ लेते हैं और पूछ बैठते हैं।

हल —

  • बच्चे की पीठ थपथपाइए — उसने वही किया जो एक इतिहासकार करता है।
  • कहिए — “सही वर्ष 1822 है। छपाई में 2 की जगह 8 आ गया।”
  • पूछिए — “तुमने कैसे पकड़ा?” उत्तर: क्योंकि उससे पहले वाली पंक्ति 1821 की है। यही ‘आंतरिक साक्ष्य’ है — इतिहास की सबसे बुनियादी विधि।
  • बोर्ड में पाठ्यपुस्तक ही लिखने को कहिए।

10. “अंग्रेज़ों पर पहली सेंसरशिप?” — यह पचता नहीं

दिक़्क़त — पृष्ठ 127 का यह वाक्य बच्चों को उलटा लगता है कि कंपनी के शुरुआती सेंसरशिप-क़दम अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ थे।

हल — कारण साफ़ कीजिए —

  • कंपनी एक व्यापारिक कंपनी थी, सरकार नहीं।
  • उसे डर भारतीयों से नहीं, बल्कि इंग्लैंड में बैठे अपने प्रतिद्वंद्वियों से था, जो उसके व्यापारिक एकाधिकार को ख़त्म करवाना चाहते थे।
  • इसलिए वह उन अंग्रेज़ों को चुप कराना चाहती थी जो कंपनी के कुप्रशासन की ख़बरें छाप रहे थे।
  • 1857 के बाद जब कंपनी की जगह ताज (Crown) आया और डर भारतीय राष्ट्रवाद से हुआ, तब जाकर 1878 का वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट आया।

यह कड़ी बच्चों को अध्याय 2 (भारत में राष्ट्रवाद) से भी जोड़ देती है।

भाग 3 — कक्षा में पूछे जाने वाले कठिन प्रश्न

“सर, अगर छपाई इतनी अच्छी थी तो चर्च ने विरोध क्यों किया? क्या वे मूर्ख थे?”

यह सबसे अच्छा सवाल है और इसे टालिए मत। उत्तर: चर्च मूर्ख नहीं था — वह अपनी सत्ता बचा रहा था। सदियों से धर्म की व्याख्या करने का अधिकार सिर्फ़ उसके पास था। पाठ्यपुस्तक ख़ुद कहती है (पृष्ठ 113) कि चर्च को “लगता था कि लोगों की आस्था, उनके विश्वास पर सिर्फ़ उसका अधिकार है, और उसकी बात ही अंतिम है।” फिर पूछिए — “आज कौन-सी संस्था अपनी बात को अंतिम मानती है?” (यह चर्चा सँभालकर चलाइए, पर चलाइए ज़रूर।)

“मेनोकियो के बारे में हमें कैसे पता चला, अगर उसे मार दिया गया?”

यह सवाल इतिहास-लेखन की समझ खोलता है। उत्तर: हमें उसकी कहानी इसलिए पता है क्योंकि इन्क्वीज़ीशन ने उसकी पूछताछ का पूरा रिकॉर्ड लिखकर रखा था। यानी जिस संस्था ने उसे मारा, उसी के काग़ज़ों से हमें उसकी आवाज़ मिली। कहिए — “इतिहास अकसर ऐसे ही मिलता है — ग़रीब और कमज़ोर लोगों की बात हमें उन्हीं काग़ज़ों से मिलती है जो सत्ता ने बनाए थे।” यह कक्षा 10 के स्तर पर बहुत बड़ी समझ है।

“अगर औरतों को पढ़ने से रोका जाता था, तो राससुन्दरी देबी ने कैसे सीखा?”

उत्तर: उन्होंने रसोई में छिप-छिप कर सीखा — पति की किताब के पन्नों को याद करके, और चुराए हुए पन्ने से अक्षर मिलाकर। उन्होंने अपनी आत्मकथा साठ साल की उम्र के बाद लिखी। यहाँ रुककर पूछिए — “उन्हें इसमें कितने साल लगे होंगे?” और फिर — “आज तुम्हें पढ़ने के लिए क्या-क्या मिला हुआ है?” यह क्षण कक्षा में बहुत असर करता है, ख़ासकर लड़कियों पर।

“क्या भारत में छपाई अंग्रेज़ लाए?”

सावधानी से उत्तर दीजिए, क्योंकि उत्तर ‘हाँ’ नहीं है।

  • प्रेस भारत में पुर्तगाली धर्म-प्रचारक लाए, सोलहवीं सदी में गोवा में — अंग्रेज़ नहीं।
  • अंग्रेज़ों की कंपनी ने सत्रहवीं सदी के अंत तक छापेख़ाने का आयात शुरू किया, पर अंग्रेज़ी प्रेस काफ़ी देर तक विकसित नहीं हो पाया।
  • और सबसे ज़रूरी — भारत में छपाई से पहले पांडुलिपियों की बहुत समृद्ध परंपरा थी, संस्कृत, अरबी, फ़ारसी और क्षेत्रीय भाषाओं में।

यह अंतिम बात ज़रूर कहिए, वरना बच्चों के मन में यह बैठ जाता है कि भारत में लिखना-पढ़ना अंग्रेज़ों से शुरू हुआ। यह ग़लत है।

“आज तो सब मोबाइल पर है, तो क्या किताबें ख़त्म हो जाएँगी?”

उत्तर: आँकड़ा दीजिए, राय नहीं। भारत में अख़बारों की प्रसार-संख्या आज भी बढ़ रही है, जबकि अमेरिका और यूरोप में घट रही है। दैनिक भास्कर की लगभग 35.6 लाख प्रतियाँ रोज़ छपती हैं। (विवरण फ़ाइल 07 भाग 7 में।) फिर सवाल उन्हीं पर लौटा दीजिए — “अगर छपाई ने जनता को श्रोता से पाठक बनाया, तो मोबाइल हमें क्या बना रहा है?”

भाग 4 — विषय की वह गहराई जो शिक्षक को पता होनी चाहिए

यह हिस्सा बोर्ड-उत्तर के लिए नहीं है। यह आपके अपने वैचारिक अधिकार के लिए है — ताकि कक्षा में कोई भी सवाल आपको चौंकाए नहीं।

(क) ‘मुद्रण क्रांति’ शब्द पर इतिहासकारों की बहस

पाठ्यपुस्तक जिस ढाँचे का इस्तेमाल करती है, वह मुख्यत: एलिज़ाबेथ आइज़नस्टाइन के काम से आता है, जिन्होंने तर्क दिया कि छपाई ने ज्ञान को ‘स्थिर’ (fixed) और तुलनीय बना दिया — अब हर प्रति एक जैसी थी, इसलिए विद्वान एक-दूसरे के काम की जाँच कर सकते थे।

पर इसकी आलोचना भी हुई है। एड्रियन जॉन्स जैसे इतिहासकारों ने दिखाया कि शुरुआती छपाई में भी बहुत अशुद्धियाँ, चोरी और भिन्नताएँ थीं — यानी ‘स्थिरता’ अपने आप नहीं आई, उसे बनाना पड़ा।

पाठ्यपुस्तक इस बहस में नहीं जाती, और अच्छा ही करती है। पर आपको पता होना चाहिए — क्योंकि यही कारण है कि पाठ्यपुस्तक बार-बार “कई इतिहासकारों का मानना है” जैसे शब्द इस्तेमाल करती है। वह तथ्य नहीं, राय बता रही है, और यह बात बच्चों को दिखाइए।

(ख) ‘सार्वजनिक क्षेत्र’ (Public Sphere) की अवधारणा

पाठ्यपुस्तक पृष्ठ 115 पर कहती है कि छपाई से बनी “सार्वजनिक दुनिया” से सामाजिक क्रांति के विचारों का सूत्रपात हुआ।

यह अवधारणा जर्मन विचारक यूरगेन हाबरमास की है — उन्होंने इसे public sphere (सार्वजनिक क्षेत्र) कहा। उनका तर्क था कि अठारहवीं सदी के यूरोप में कॉफ़ीहाउसों, अख़बारों और पत्रिकाओं ने एक ऐसी जगह बनाई जो न राज्य थी न परिवार — जहाँ नागरिक बराबरी से बहस कर सकते थे।

पाठ्यपुस्तक ने यह नाम नहीं दिया, पर पूरा भाग 7 (धार्मिक सुधार और सार्वजनिक बहसें) इसी विचार पर खड़ा है।

कक्षा में सरल रूप: “एक ऐसी जगह जहाँ कोई भी अपनी बात कह सके — न घर, न सरकार, बल्कि बीच की कोई जगह।” अख़बार वही जगह था।

(ग) मेनोकियो और ‘सूक्ष्म-इतिहास’ (Microhistory)

मेनोकियो की कहानी इतिहास में इसलिए मशहूर है क्योंकि इतालवी इतिहासकार कार्लो गिंज़बर्ग ने उस पर पूरी किताब लिखी — The Cheese and the Worms (1976)।

यह ‘सूक्ष्म-इतिहास’ का उदाहरण है — जिसमें एक साधारण व्यक्ति के जीवन को इतने बारीक़ी से देखा जाता है कि उससे पूरे युग की तस्वीर बन जाती है।

यह जानकारी आपके लिए इसलिए ज़रूरी है कि जब कोई तेज़ बच्चा पूछे “एक किसान इतना प्रसिद्ध कैसे हो गया?”, तो आप कह सकें — “क्योंकि एक इतिहासकार ने तय किया कि आम आदमी की कहानी भी इतिहास है।”

(घ) लिथोग्राफ़ी भारत में इतनी सफल क्यों हुई

पाठ्यपुस्तक लिथोग्राफ़ी का ज़िक्र बार-बार करती है (पृष्ठ 121, 125) पर कारण नहीं बताती। कारण तकनीकी है और बहुत रोचक है —

  • गुटेन्बर्ग की मूवेबल टाइप तकनीक रोमन वर्णमाला के लिए बनी थी, जिसमें अक्षर अलग-अलग और सीधे होते हैं।
  • पर नस्तालीक़ (उर्दू-फ़ारसी की लिपि) में अक्षर आपस में जुड़े और तिरछे चलते हैं। हर अक्षर का रूप उसकी जगह के हिसाब से बदलता है।
  • धातु के टाइप से यह छापना बेहद कठिन और भद्दा लगता था।
  • लिथोग्राफ़ी में लिखावट सीधे पत्थर पर उतारी जाती थी — यानी ख़ुशनवीस की क़लम जस-की-तस छप जाती थी।

इसीलिए उर्दू, फ़ारसी और देवनागरी की छपाई भारत में लिथोग्राफ़ी से हुई, न कि लेटरप्रेस से। और इसीलिए भारत में छपी शुरुआती किताबें भी हस्तलिखित पांडुलिपि जैसी दिखती थीं — ठीक वही बात जो पाठ्यपुस्तक ने यूरोप के बारे में पृष्ठ 109 पर कही है। यह तुलना कक्षा में बहुत असरदार लगती है।

(ङ) ‘वर्नाक्युलर’ शब्द का औपनिवेशिक अर्थ

अंग्रेज़ों की नज़र में अंग्रेज़ी ‘भाषा’ थी और भारतीय भाषाएँ ‘वर्नाक्युलर’ यानी ‘देसी बोली’।

इसलिए 1878 का क़ानून सिर्फ़ भारतीय भाषाओं के अख़बारों पर लागू हुआ, अंग्रेज़ी अख़बारों पर नहीं।

यह बात कक्षा में ज़रूर बताइए, क्योंकि इससे उपनिवेशवाद का असली चेहरा दिखता है — क़ानून सबके लिए एक जैसा नहीं था। और यही बात अध्याय 2 (भारत में राष्ट्रवाद) की भावना से जुड़ती है।

(च) राससुन्दरी देबी का ऐतिहासिक महत्त्व

पाठ्यपुस्तक कहती है कि आमार जीबोन “बंगाली भाषा में प्रकाशित पहली संपूर्ण आत्म-कहानी” थी। इस वाक्य में दो शब्द ध्यान से पढ़िए — ‘बंगाली भाषा में’ और ‘संपूर्ण’।

यानी बंगाली में आत्मकथा-लेखन की शुरुआत ही एक स्त्री से हुई — किसी पुरुष से नहीं।

यह तथ्य कक्षा में ज़ोर देकर कहिए। एक ऐसी भाषा जिसमें आत्मकथा की परंपरा एक स्त्री ने शुरू की, और वह स्त्री रसोई में छिपकर पढ़ना सीखी थी। इस एक वाक्य से लड़कियों के लिए पूरा अध्याय बदल जाता है।

भाग 5 — भाषा-संबंधी सावधानियाँ

ग़लत तरीक़ासही तरीक़ाकारण
“छपाई से क्रांति हो गई”“छपाई ने क्रांति के लिए परिस्थितियाँ बनाने में मदद की”पाठ्यपुस्तक ख़ुद सीधा कारण नहीं मानती
“चर्च बुरा था”“चर्च को अपनी सत्ता जाने का डर था”इतिहास में ‘बुरा-अच्छा’ नहीं, ‘कारण’ होता है
“अंग्रेज़ छपाई भारत लाए”“प्रेस पुर्तगाली धर्म-प्रचारक लाए; भारत में पहले से पांडुलिपियों की समृद्ध परंपरा थी”तथ्य ग़लत हो जाता है और औपनिवेशिक धारणा बनती है
“डायमंड सूत्र जापान की किताब है”बोर्ड में पाठ्यपुस्तक लिखिए, पर कक्षा में सच बताइएमूल NCERT की भूल है
“महिलाओं को छपाई से फ़ायदा हुआ”“छपाई ने महिलाओं को आवाज़ भी दी और बाँधने के नए तरीक़े भी दिए”एकतरफ़ा उत्तर पर आधे अंक कटते हैं
“मुद्रण क्रांति यानी छपाई की मशीन आना”“मुद्रण क्रांति यानी सूचना, सत्ता और सोच से लोगों का रिश्ता बदलना”यही परिभाषा का असली अर्थ है

भाग 6 — मूल्यांकन की योजना

चरणकबक्या जाँचेंकैसे
1कालांश 3 के बादचीन-जापान-कोरिया और मार्को पोलो का क्रमपाँच मिनट की मौखिक जाँच
2कालांश 5 के बादलूथर, इरैस्मस, मेनोकियो — तीनों की स्थितिलिखित, 10 अंक
3कालांश 7 के बादतकनीकी परिष्कार की तालिका और तिथियाँफ्लैशकार्ड समूह 11 और 12 से
4कालांश 10 के बादमहिलाएँ और ग़रीब जनता वाले अभ्यास प्रश्नपूरा लिखित उत्तर, 8 अंक
5कालांश 11 के बादपूरा अध्याय05-प्रश्न बैंक का कोई एक नमूना पत्र
6एक हफ़्ते बादधारण (retention)फ्लैशकार्ड से 20 प्रश्न, केवल मौखिक

एक सुझाव: इस अध्याय में लिखित परीक्षा से पहले एक मौखिक ‘बहस’ ज़रूर करवाइए (PARAKH प्रश्न 12)। जो बच्चे बोलकर तर्क बना लेते हैं, वे लिखकर भी बना लेते हैं।

भाग 7 — अंतिम शिक्षक-टिप्पणी

यह पूरी पुस्तक का आख़िरी अध्याय है। इसलिए इसे समापन की तरह पढ़ाइए।

अंतिम कालांश में बोर्ड पर पाँचों अध्यायों के नाम लिखिए और एक-एक वाक्य में जोड़ दिखाइए —

अध्यायजोड़
1. यूरोप में राष्ट्रवादविचार फैले — पर फैले कैसे? छपाई से।
2. भारत में राष्ट्रवादगांधी का संदेश गाँव पहुँचा — पहुँचा कैसे? अख़बारों और पर्चों से।
3. भूमंडलीकृत विश्वदुनिया जुड़ी — तकनीक से। छपाई भी वैसी ही एक तकनीक थी।
4. औद्योगीकरण का युगकारख़ाना एक छत के नीचे आया — छापाख़ाना भी एक कारख़ाना ही था।
5. मुद्रण संस्कृतिऔर यह सब हम जानते कैसे हैं? क्योंकि किसी ने छापा था।

यह आख़िरी पंक्ति सबसे ताक़तवर है। कहिए —

“तुम जो यह किताब पढ़ रहे हो, यह भी छपी हुई है। पाँच सौ साल पहले तुम्हारे हाथ में यह नहीं होती। और जिन लोगों की कहानियाँ इसमें हैं — मेनोकियो, राससुन्दरी देबी, काशीबाबा — वे इसीलिए बचे रह गए क्योंकि किसी ने उन्हें छाप दिया।”

और अंत में यह सवाल छोड़कर कक्षा से जाइए —

“आज तुम्हारे हाथ में मोबाइल है, जो छापेख़ाने से भी ताक़तवर है। तुम उससे क्या छापोगे?”