अध्याय 5 — मुद्रण संस्कृति और आधुनिक दुनिया · भारत और समकालीन विश्व-2 · कक्षा 10
कक्षा — 10 · विषय — इतिहास (भारत और समकालीन विश्व–2) · पृष्ठ — 105 से 128
अपने चारों तरफ़ देखिए — क्या-क्या छपा हुआ है?
किताबें · पत्र-पत्रिकाएँ · अख़बार · मशहूर तसवीरों की नक़लें नाटक के प्रोग्राम · सरकारी सूचनाएँ · कैलेंडर · डायरी सड़क किनारे के विज्ञापन और सिनेमा के पोस्टर
“मुद्रित या छपी हुई सामग्री के बग़ैर दुनिया की कल्पना हमारे लिए कितनी मुश्किल है!” — पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 105
और अध्याय अपना असली सवाल पूछता है
“हम मुद्रित दुनिया के अस्तित्व को मानकर चलते हैं, यह सोचने की भी ज़रूरत नहीं पड़ती कि छपाई के पहले भी एक दुनिया थी।” यह इतिहास क्या है? आधुनिक दुनिया को बनाने में इसकी क्या भूमिका थी?
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 105
यह अध्याय तकनीक का इतिहास नहीं है — यह इस बात का इतिहास है कि जब आम लोगों के हाथ में पढ़ने की ताक़त आई, तो सत्ता ने क्या किया
पूरे अध्याय की धुरी — ये दो वाक्य याद रखिए
छपाई = आज़ादी
- मार्टिन लूथर, धर्म-सुधारक
- “मुद्रण ईश्वर की दी हुई महानतम देन है, सबसे बड़ा तोहफ़ा।”
- पृष्ठ 112
छपाई = ख़तरा
- इरैस्मस, विद्वान
- “किताबें भिनभिनाती मक्खियों की तरह हैं… इनका ज़्यादा हिस्सा तो विद्वता के लिए हानिकारक ही है।”
- स्रोत-क, पृष्ठ 113
पूरा अध्याय इन्हीं दो वाक्यों के बीच चलता है — हर दौर में कुछ लोगों ने छपाई का स्वागत किया और कुछ उससे डरते रहे
अध्याय को नौ भागों में देखिए
पृष्ठ 106 से 128
| भाग | विषय | मुख्य बात |
|---|---|---|
| 1–2 | शुरुआती किताबें और यूरोप | छपाई पूर्वी एशिया में जन्मी, यूरोप वहाँ से सीखा |
| 3–4 | मुद्रण क्रांति और पढ़ने का जुनून | नया पाठक वर्ग बना, और उसी के साथ डर भी |
| 5 | उन्नीसवीं सदी | बच्चे, महिलाएँ और मज़दूर नए पाठक बने |
| 6–7 | भारत का मुद्रण संसार | पांडुलिपियों के देश में प्रेस आई और बहस छिड़ी |
| 8–9 | नए रूप और प्रतिबंध | आवाज़ मिली, और सरकार ने क़ानून बनाया |
और इस अध्याय की पाँच कहानियाँ — आधा अध्याय इन्हीं में है
इन्हें याद रखिए, तिथियाँ अपने आप टँग जाएँगी
| # | कहानी | एक वाक्य में |
|---|---|---|
| 1 | मार्को पोलो (1295) | एक यात्री चीन से छपाई का ज्ञान लेकर लौटा |
| 2 | गुटेन्बर्ग (1448) | जैतून पेरने की प्रेस से किताब छपने लगी |
| 3 | मेनोकियो (16वीं सदी) | एक किसान ने पढ़कर अपनी व्याख्या बनाई, और मारा गया |
| 4 | राससुन्दरी देबी (1876) | रसोई में छिपकर पढ़ना सीखा, आत्मकथा लिखी |
| 5 | काशीबाबा (1938) | एक मिल-मज़दूर ने ख़ुद किताब लिखी और छापी |
1 | शुरुआती छपी किताबें | चीन · जापान · कोरिया
छपाई कहाँ जन्मी — यह पहला वाक्य ही परीक्षा में आता है
पृष्ठ 106
- “मुद्रण की सबसे पहली तकनीक चीन, जापान और कोरिया में विकसित हुई। यह छपाई हाथ से होती थी”
- तक़रीबन 594 ई. से चीन में स्याही लगे काठ के ब्लॉक या तख़्ती पर काग़ज़ रगड़कर किताबें छापी जाने लगी थीं
- काग़ज़ पतला और छिद्रित था, इसलिए दोनों तरफ़ छपाई संभव नहीं थी
- इसीलिए पारंपरिक चीनी किताब ‘एकॉर्डियन’ शैली में, किनारों को मोड़कर सिलकर बनाई जाती थी
- ख़ुशनवीसी यानी सुलेखन करने वाले दक्ष सुलेखक या ख़ुशख़त कहलाते थे
हम अकसर मानते हैं कि छपाई यूरोप की देन है — यह ग़लत है; छपाई पूर्वी एशिया की देन है और यूरोप वहाँ से सीखा
चीनी राजतंत्र सबसे बड़ा उत्पादक क्यों था
पृष्ठ 106 — कारण-सहित याद कीजिए
- चीन की नौकरशाही सिविल सेवा परीक्षा से नियुक्त होती थी
- यह नौकरशाही विशालकाय थी
- इसलिए चीनी राजतंत्र इन परीक्षाओं के लिए बड़ी तादाद में किताबें छपवाता था
- सोलहवीं सदी में परीक्षा देने वालों की तादाद बढ़ी
- लिहाज़ा छपी किताबों की मात्रा भी उसी अनुपात में बढ़ गई
एक वाक्य में — चीन में छपाई की सबसे बड़ी ज़रूरत सरकारी नौकरी की परीक्षा ने पैदा की थी
सत्रहवीं सदी — जब पढ़ना एक शग़ल बन गया
पृष्ठ 106
- शहरी संस्कृति के फलने-फूलने से छपाई के इस्तेमाल में विविधता आई
- अब उपभोक्ता सिर्फ़ विद्वान और अधिकारी नहीं रहे
- व्यापारी अपने रोज़मर्रा के कारोबार की जानकारी के लिए मुद्रित सामग्री इस्तेमाल करने लगे
- नए पाठक वर्ग को काल्पनिक क़िस्से, कविताएँ, आत्मकथाएँ और रूमानी नाटक पसंद थे
- अमीर महिलाओं ने भी पढ़ना शुरू किया और कुछ ने अपने रचे काव्य और नाटक भी छापे
यह वाक्य ध्यान से देखिए — महिलाओं का पढ़ना और छपना चीन में सत्रहवीं सदी में ही शुरू हो गया था; भारत में यही बात उन्नीसवीं सदी में होगी
जापान और कोरिया — दो और शुरुआती केंद्र
जापान
- चीनी बौद्ध प्रचारक 768–770 ई. के आसपास तकनीक लेकर आए
- 868 ई. की डायमंड सूत्र सबसे पुरानी छपी पुस्तक बताई जाती है
- एदो (बाद में तोक्यो) में पुस्तकालय और दुकानें छपी सामग्री से अटी पड़ी थीं
- महिलाओं, संगीत, हिसाब-किताब, चाय अनुष्ठान, फूलसाज़ी और रसोई पर किताबें
कोरिया
- त्रिपीटका कोरियाना — तेरहवीं सदी का मध्य
- लगभग 80,000 वुडब्लॉक्स पर उकेरा गया · यूनेस्को 2007
- जिक्जी — धातुई चलअक्षर से मुद्रित, चौदहवीं सदी का अंत
- दूसरा खंड आज फ़्रांस की नेशनल लाइब्रेरी में · यूनेस्को 2001
बहुत महत्त्वपूर्ण तुलना — धातु के चलअक्षर कोरिया में चौदहवीं सदी के अंत में थे, जबकि गुटेन्बर्ग ने 1448 तक अपना यंत्र बनाया
एक अध्याय, अस्सी हज़ार तख़्तियाँ
त्रिपीटका कोरियाना — तेरहवीं शताब्दी के मध्य में बना बौद्ध ग्रंथों का कोरियाई संग्रह, जिसे लगभग 80,000 वुडब्लॉक्स पर उकेरा गया था
इसे 2007 में यूनेस्को मेमोरी ऑफ़ द वर्ल्ड रजिस्टर में अंकित किया गया
बॉक्स 1 — कितागावा उतामारो और उकियो शैली
पृष्ठ 107
- 1753 ई. में एदो में जन्म
- उकियो यानी ‘तैरती दुनिया के चित्र’ नाम की नयी चित्रकला शैली में अहम योगदान
- इन चित्रों में आम शहरी जीवन का चित्रण किया गया
- इनकी छपी प्रतियाँ यूरोप और अमेरिका पहुँचीं और माने, मोने तथा वान गॉग जैसे चित्रकारों को प्रभावित किया
- प्रकाशक त्सुताया जुज़ाबूरो विषय चुनकर कलाकारों से चित्र बनाने का क़रार करते थे
इस प्रक्रिया में मूल आरेख तो ग़ायब हो जाता था, पर उसकी छपी नक़ल बच जाती थी
2 | यूरोप में मुद्रण का आना | मार्को पोलो से गुटेन्बर्ग तक
यूरोप तक छपाई का सफ़र — यह क्रम याद कीजिए
- 11वीं सदीचीनी काग़ज़ रेशम मार्ग से यूरोप पहुँचा
- 1295मार्को पोलो चीन से इटली लौटा और वुडब्लॉक छपाई का ज्ञान साथ लाया
- 15वीं सदी की शुरुआतकपड़े, ताश के पत्ते और धार्मिक चित्र तख़्ती से छपने लगे
- 1430 का दशकगुटेन्बर्ग ने नयी तकनीक पर काम शुरू किया
- 1448गुटेन्बर्ग ने अपना यंत्र मुकम्मल कर लिया
पहले काग़ज़ आया, फिर तकनीक, फिर प्रेस — परीक्षा में यही क्रम पूछा जाता है
पांडुलिपियों से माँग क्यों पूरी नहीं होती थी
पृष्ठ 108 — पाँच कारण
- नक़ल उतारना बेहद ख़र्चीला काम था
- यह समयसाध्य था, यानी बहुत समय लेता था
- यह श्रमसाध्य था, यानी बहुत मेहनत माँगता था
- पांडुलिपियाँ अकसर नाज़ुक होती थीं; लाने-ले जाने और रख-रखाव में मुश्किलें थीं
- इसलिए उनका सर्कुलेशन यानी चलन सीमित रहा
एक विक्रेता के यहाँ 50 कातिब काम करते थे — फिर भी माँग पूरी नहीं होती थी
किताब किसके लिए — यही अध्याय का पहला बँटवारा है
अमीरों के लिए
- मुद्रित किताबों को सस्ती और अश्लील माननेवाले कुलीन वर्ग और भिक्षु-संघ
- उनके लिए विलासी संस्करण बेशक़ीमती वेलम (चर्म-पत्र) पर छपते थे
आम पाठकों के लिए
- व्यापारी और विश्वविद्यालय के विद्यार्थी
- वे सस्ती मुद्रित किताबें ख़रीदते थे
यह छोटा-सा वाक्य पूरे अध्याय का सार है — अमीरों को छपी किताब ‘सस्ती’ लगती थी, और साधारण लोगों को वही किताब वरदान लगती थी
गुटेन्बर्ग — पुराने अनुभव से नया आविष्कार
पृष्ठ 108–109
| उसका पुराना अनुभव | नए आविष्कार में क्या बना |
|---|---|
| तेल और जैतून पेरने की मशीन | प्रिंटिंग प्रेस का मॉडल या आदर्श |
| सुनारी और साँचे का काम | धातुई अक्षरों की आकृतियों को गढ़ने का तरीक़ा |
| शीशे को इच्छित आकृतियों में गढ़ने की महारत | टाइप की बारीक़ गढ़ाई |
यह पंक्ति ज़रूर लिखिए — “जैतून प्रेस ही प्रिंटिंग प्रेस का मॉडल या आदर्श बना, और साँचे का उपयोग अक्षरों की धातुई आकृतियों को गढ़ने के लिए किया गया”
पहली छपी किताब — बाइबिल
गुटेन्बर्ग ने 1448 तक अपना यंत्र मुकम्मल कर लिया। उसने जो पहली किताब छापी वह थी बाइबिल — तक़रीबन 180 प्रतियाँ बनाने में उसे तीन साल लगे, जो उस समय के हिसाब से काफ़ी तेज़ था
पर पाठ्यपुस्तक साफ़ कहती है — “यह नयी तकनीक हाथ से किताबें छापने की तकनीक की जगह पूरी तरह से नहीं ले पाई”
गुटेन्बर्ग प्रेस काम कैसे करती थी
चित्र 6, पृष्ठ 109
- स्क्रू से लगा एक लंबा हैंडल था; उसे घुमाकर प्लाटेन को गीले काग़ज़ पर दबा दिया जाता था
- गुटेन्बर्ग ने रोमन वर्णमाला के तमाम 26 अक्षरों के लिए टाइप बनाए
- और जुगत लगाई कि इन्हें इधर-उधर ‘मूव’ कराकर शब्द बनाए जा सकें
- लिहाज़ा इसे ‘मूवेबल टाइप प्रिंटिंग मशीन’ के नाम से जाना गया
- यही अगले 300 सालों तक छपाई की बुनियादी तकनीक रही
पहले हर छपाई के लिए तख़्ती पर ख़ास आकार उकेरना पड़ता था; अब वही 26 अक्षर बार-बार, अलग-अलग क्रम में काम आते थे
एक घंटे में ढाई सौ पन्ने
गुटेन्बर्ग प्रेस एक घंटे में 250 पन्ने (एक साइड) छाप सकता था। हर छपाई के लिए तख़्ती पर ख़ास आकार उकेरने की पुरानी तकनीक की तुलना में अब किताबें छापना निहायत तेज़ हो गया
यही रफ़्तार ‘मुद्रण क्रांति’ की असली बुनियाद थी
शुरुआती छपी किताबें पांडुलिपियों जैसी क्यों दिखती थीं
पृष्ठ 109
- धातुई अक्षर हाथ की सजावटी शैली का अनुकरण करते थे
- हाशिये पर फूल-पत्तियों की डिज़ाइन बनाई जाती थी, और चित्र अकसर पेंट किए जाते थे
- अमीरों की किताबों में हाशिये की जगह बेल-बूटों के लिए ख़ाली छोड़ दी जाती थी
- हर ख़रीदार अपनी रुचि के हिसाब से डिज़ाइन और पेंटर ख़ुद तय करके उसे सँवार सकता था
कोई भी नयी तकनीक शुरू में पुरानी की नक़ल करती है — आज भी शुरुआती वेबसाइटें अख़बार जैसी दिखती थीं
मुद्रण क्रांति के आँकड़े
पृष्ठ 109
| तथ्य | आँकड़ा |
|---|---|
| यूरोप-भर में छापेख़ाने खुलने का काल | 1450–1550, क़रीब सौ साल |
| कैसे फैला | जर्मनी के मुद्रक दूसरे देश जाकर छापेख़ाने खुलवाते थे |
| पंद्रहवीं सदी के दूसरे हिस्से में किताबें | 2 करोड़ |
| सोलहवीं सदी में | 20 करोड़ |
| गुटेन्बर्ग की बाइबिल की बची प्रतियाँ | 180 में से केवल 50 |
“हाथ की छपाई की जगह यांत्रिक मुद्रण के आने पर ही मुद्रण क्रांति संभव हुई”
3 | मुद्रण क्रांति और उसका असर | नया पाठक वर्ग और नया डर
मुद्रण क्रांति क्या थी — यह परिभाषा शब्दश: याद कीजिए
“छापेख़ाने का आविष्कार महज़ तकनीकी दृष्टि से नाटकीय बदलाव की शुरुआत नहीं था। पुस्तक-उत्पादन के नए तरीक़ों ने लोगों की ज़िंदगी बदल दी: इसकी बदौलत सूचना और ज्ञान से, संस्था और सत्ता से उनका रिश्ता ही बदल गया। इससे लोकचेतना बदली और बदला चीज़ों को देखने का नज़रिया।”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 111
तीन शब्दों में याद कीजिए — सूचना · सत्ता · सोच — तीनों से रिश्ता बदला, इसी को क्रांति कहते हैं
नया पाठक वर्ग कैसे बना — पाँच कड़ी
पृष्ठ 111
- छपाई से किताबों की क़ीमत गिरी
- किताब की हर प्रति के उत्पादन में लगने वाला वक़्त और श्रम कम हो गया
- बड़ी तादाद में प्रतियाँ छापना आसान हो गया
- बाज़ार किताबों से पट गया
- पाठक वर्ग भी बृहत्तर होता गया
“अगर पहले की जनता श्रोता थी, तो कह सकते हैं कि अब पाठक-जनता अस्तित्व में आ गई थी”
पर एक बड़ी दीवार थी — और मुद्रकों ने उसे चतुराई से पार किया
समस्या
- किताबें सिर्फ़ साक्षर ही पढ़ सकते थे
- यूरोप के अधिकांश देशों में बीसवीं सदी तक साक्षरता की दर सीमित थी
- तो प्रकाशक लोगों में दिलचस्पी कैसे जगाएँ?
हल
- मुद्रकों ने लोकगीत और लोककथाएँ छापनी शुरू कीं
- ऐसी किताबें तसवीरों से ख़ूब सजी-धजी यानी सचित्र होती थीं
- इन्हें सामूहिक ग्रामीण सभाओं में या शहरी शराबघरों में गाया-सुनाया जाता था
नतीजा — “मौखिक और मुद्रित संस्कृतियों के बीच की विभाजक रेखा धुँधली पड़ गई; श्रोता और पाठक वर्ग एक-दूसरे में घुल-मिल गए”
अगर छपाई इतनी अच्छी थी, तो लोग डरे क्यों?
प्रिंट का डर — चार कारण
पृष्ठ 112
- आशंका थी कि छपे शब्द की सुगमता का आमलोगों के ज़ेहन पर क्या असर होगा
- भय था कि अगर छपे हुए और पढ़े जा रहे पर कोई नियंत्रण न होगा तो लोगों में बाग़ी और अधार्मिक विचार पनपने लगेंगे
- डर था कि ऐसा हुआ तो ‘मूल्यवान’ साहित्य की सत्ता ही नष्ट हो जाएगी
- धर्मगुरुओं और सम्राटों तथा कई लेखकों एवं कलाकारों की यह चिंता नव-मुद्रित साहित्य की व्यापक आलोचना का आधार बनी
ध्यान दीजिए — डरने वाला हमेशा वही था जिसके पास सत्ता थी
मार्टिन लूथर और प्रोटेस्टेंट धर्मसुधार
पृष्ठ 112 — यह अभ्यास प्रश्न 1-ख है
- लूथर ने रोमन कैथलिक चर्च की कुरीतियों की आलोचना करते हुए अपनी पिच्चानवे स्थापनाएँ लिखीं
- इसकी एक छपी प्रति विटेनबर्ग के गिरजाघर के दरवाज़े पर टाँगी गई, जिसमें चर्च को शास्त्रार्थ की चुनौती थी
- जल्द ही लूथर के लेख बड़ी तादाद में छापे और पढ़े जाने लगे
- नतीजे में चर्च में विभाजन हो गया और प्रोटेस्टेंट धर्मसुधार की शुरुआत हुई
- न्यू टेस्टामेंट के लूथर के अनुवाद की 5000 प्रतियाँ कुछ ही हफ़्तों में बिक गईं; तीन महीने में दूसरा संस्करण निकालना पड़ा
इसीलिए लूथर ने कहा — “मुद्रण ईश्वर की दी हुई महानतम देन है, सबसे बड़ा तोहफ़ा”
मेनोकियो — इस अध्याय की सबसे मार्मिक कहानी
पृष्ठ 112–113 — यह अभ्यास प्रश्न 1-ग है
- सोलहवीं सदी की इटली के एक किसान मेनोकियो ने अपने इलाक़े में उपलब्ध किताबें पढ़नी शुरू कीं
- उन किताबों के आधार पर उसने बाइबिल के नए अर्थ लगाने शुरू कर दिए
- उसने ईश्वर और सृष्टि के बारे में ऐसे विचार बनाए कि रोमन कैथलिक चर्च उससे क्रुद्ध हो गया
- चर्च ने धर्म-विरोधी विचारों को दबाने के लिए इन्क्वीज़ीशन (धर्म-अदालत) शुरू किया
- मेनोकियो को दो बार पकड़ा गया और आख़िरकार उसे मौत की सज़ा दे दी गई
- और चर्च 1558 ई. से प्रतिबंधित किताबों की सूची रखने लगा
एक किसान ने पढ़कर अपनी राय बनाई — और उसकी सज़ा मौत थी; यही इस अध्याय की सबसे कड़वी सच्चाई है
स्रोत-क — किताब का डर
“किताबें भिनभिनाती मक्खियों की तरह हैं, दुनिया का कौन-सा कोना है, जहाँ ये नहीं पहुँच जातीं?… (मुद्रक) बकवास, बेवकूफ़, सनसनीख़ेज़, धर्मविरोधी, अज्ञानी, और षड्यंत्रकारी किताबें छापते हैं, और उनकी तादाद ऐसी है कि मूल्यवान साहित्य का मूल्य ही नहीं रह जाता।”
इरैस्मस, एडेजेज़, 1508 · पाठ्यपुस्तक स्रोत-क, पृष्ठ 113
यह अभ्यास प्रश्न 2-ख है — तीन बातें याद रखिए: मक्खियाँ · विद्वता को हानि · मूल्यवान साहित्य का मूल्य ख़त्म
4 | पढ़ने का जुनून | सस्ती किताबें और फ़्रांसीसी क्रांति
अठारहवीं सदी के अंत तक साक्षरता
अलग-अलग संप्रदाय के चर्चों ने गाँवों में स्कूल स्थापित किए और किसानों-कारीगरों को शिक्षित करना शुरू किया। इसका नतीजा यह हुआ कि अठारहवीं सदी के अंत तक यूरोप के कुछ हिस्सों में साक्षरता दर 60 से 80 प्रतिशत तक हो गई
लोगों को किताबें चाहिए थीं, इसलिए मुद्रक ज़्यादा से ज़्यादा किताबें छापने लगे
सस्ती किताबों की दुनिया — यह तालिका ज़रूर याद कीजिए
पृष्ठ 114
| नाम | क्या था | कहाँ |
|---|---|---|
| पंचांग | चाँद-सूरज की गति, ज्वार-भाटा और दैनिक जीवन की जानकारी देता वार्षिक प्रकाशन | यूरोप-भर |
| पेनी चैपबुक्स | एक पैसे में मिलने वाली पॉकेट-आकार की किताबें | इंग्लैंड |
| चैपमेन | इन एकपैसिया किताबों को बेचने वाले फेरीवाले | इंग्लैंड |
| बिब्लियोथीक ब्ल्यू | सस्ते काग़ज़ पर छपी, नीली जिल्द में बँधी छोटी किताबें | फ़्रांस |
“अलग-अलग उद्देश्य और दिलचस्पी के हिसाब से किताबों के कई आकार-प्रकार थे” — छपाई ने किताब को अमीरों की चीज़ से हटाकर सबकी चीज़ बना दिया
विज्ञान और दर्शन भी आम लोगों तक पहुँचे
पृष्ठ 114
- अठारहवीं सदी के आरंभ से पत्रिकाओं का प्रकाशन शुरू हुआ, जिनमें ख़बर के साथ मनोरंजन भी था
- प्राचीन व मध्यकालीन ग्रंथ संकलित किए गए, और नक़्शों के साथ वैज्ञानिक ख़ाके भी बड़ी मात्रा में छापे गए
- जब आइज़ैक न्यूटन जैसे वैज्ञानिकों ने आविष्कार प्रकाशित किए तो उनके लिए विज्ञान-बोध वाला बड़ा पाठक-वर्ग तैयार हो चुका था
- टॉमस पेन, वॉल्टेयर और ज़्याँ ज़ाक रूसो की किताबें भी भारी मात्रा में छपने और पढ़ी जाने लगीं
वॉल्टेयर और रूसो के नाम आपने अध्याय 1 में भी पढ़े थे — वहाँ वे क्रांति के प्रेरक थे; यहाँ आप देख रहे हैं कि उनके विचार लोगों तक पहुँचे कैसे
“अब तुम्हारे काँपने का वक़्त आ गया है!”
“छापाख़ाना प्रगति का सबसे ताक़तवर औज़ार है, इससे बन रही जनमत की आँधी में निरंकुशवाद उड़ जाएगा।” और — “हे निरंकुशवादी शासकों, अब तुम्हारे काँपने का वक़्त आ गया है! आभासी लेखक की क़लम के जोर के आगे तुम हिल उठोगे!”
लुई सेबेस्तिएँ मर्सिए, अठारहवीं सदी के फ़्रांस के उपन्यासकार · पृष्ठ 114–115
मर्सिए के उपन्यासों में नायक अकसर किताबें पढ़ने से बदल जाते हैं — वे किताबें घोंटते हैं और किताबों की दुनिया में जीते हैं
मुद्रण संस्कृति और फ़्रांसीसी क्रांति — तीन तर्क
पृष्ठ 115
| तर्क | सार |
|---|---|
| पहला | ज्ञानोदय के चिंतकों के विचार फैले — उन्होंने परंपरा, अंधविश्वास और निरंकुशवाद की आलोचना की और चर्च तथा राज्य की सत्ता पर प्रहार करके परंपरा-आधारित व्यवस्था को दुबला कर दिया |
| दूसरा | छपाई ने वाद-विवाद-संवाद की नयी संस्कृति को जन्म दिया; पुराने मूल्यों पर आम जनता के बीच बहस हुई और ‘सार्वजनिक दुनिया’ बनी |
| तीसरा | 1780 के दशक तक राजशाही का मज़ाक उड़ाने वाले साहित्य और कार्टूनों का ढेर लग गया, जिसने लोगों को राजतंत्र के ख़िलाफ़ भड़काया |
इस तालिका को याद कीजिए — पर अगली स्लाइड के बिना यह उत्तर अधूरा है
और अब पाठ्यपुस्तक की सावधानी — यही पूरे अंक दिलाती है
“लोग-बाग़ हर तरह की सामग्री पढ़ते थे। एक तरफ़ वे अगर रूसो और वॉल्टेयर पढ़ रहे थे तो दूसरी तरफ़ चर्च और राज्य का प्रोपेगैंडा भी… इस तरह, मुद्रण ने उनके मानस को सीधे तौर पर भले नहीं रचा हो, पर इसने अलग ढंग से सोचने की संभावनाएँ ज़रूर खोलीं।”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 116
यह वाक्य आपके हर बड़े उत्तर की अंतिम पंक्ति बनना चाहिए — इतिहास में सीधा कारण-परिणाम नहीं होता
5 | उन्नीसवीं सदी | बच्चे · महिलाएँ · मज़दूर · नयी मशीनें
बच्चे पाठकों की अहम श्रेणी कैसे बने
पृष्ठ 117
- उन्नीसवीं सदी के आख़िर से प्राथमिक शिक्षा के अनिवार्य होने के चलते बच्चे पाठकों की अहम श्रेणी बन गए
- प्रकाशन उद्योग के लिए पाठ्य-पुस्तकों का उत्पादन महत्त्वपूर्ण हो गया
- फ़्रांस में 1857 में सिर्फ़ बाल-पुस्तकें छापने के लिए एक प्रेस स्थापित किया गया
- जर्मनी के ग्रिम बंधुओं ने बरसों लगाकर किसानों के बीच से लोक-कथाएँ जमा कीं, जो 1812 के संकलन में छपीं
- बच्चों के लिए अनुपयुक्त या कुलीन वर्गों को अश्लील लगने वाली सामग्री प्रकाशित संस्करण में शामिल नहीं की जाती थी
“पुरानी ग्रामीण लोककथाओं को नया रूप मिला — छपने से वे दर्ज तो हुईं, पर इस प्रक्रिया में बदल भी गईं”
महिलाएँ — पाठिका और लेखिका दोनों
पृष्ठ 117
- पेनी मैगज़ीन्स या एकपैसिया पत्रिकाएँ ख़ास तौर पर उन्हीं के लिए होती थीं
- वैसे ही जैसे सही चाल-चलन और गृहस्थी सिखाने वाली निर्देशिकाएँ
- उपन्यास छपने लगे तो महिलाओं को उनका अहम पाठक माना गया
- मशहूर उपन्यासकारों में लेखिकाएँ अग्रणी थीं — जेन ऑस्टिन, ब्रॉण्ट बहनें, जॉर्ज इलियट
- उनके लेखन से नयी नारी की परिभाषा उभरी — सुदृढ़ व्यक्तित्व, गहरी सूझ-बूझ, अपना दिमाग़ और अपनी इच्छाशक्ति
पेनी मैगज़ीन का प्रकाशन इंग्लैंड में 1832–1850 के बीच हुआ और यह मूलत: मज़दूर वर्ग के लिए थी
बॉक्स 3 — मज़दूर जो आग की रोशनी में पढ़ता था
पृष्ठ 117
- सत्रहवीं सदी से ही किराए पर किताब देने वाले पुस्तकालय अस्तित्व में आ गए थे
- उन्नीसवीं सदी के इंग्लैंड में इनका उपयोग सफ़ेद-कॉलर मज़दूरों, दस्तकारों और निम्नवर्गीय लोगों को शिक्षित करने में हुआ
- यॉर्कशायर के मेकैनिक थॉमस वुड पुराने अख़बार ख़रीदकर शाम को आग की रोशनी में पढ़ते थे, क्योंकि मोमबत्ती के पैसे नहीं थे
- रूसी क्रांतिकारी लेखक मैक्सिम गोर्की की मेरा बचपन और मेरे विश्वविद्यालय इन्हीं संघर्षों की कहानियाँ हैं
काम के दिन छोटे होने पर मज़दूरों को आत्म-अभिव्यक्ति का वक़्त मिला और उन्होंने बड़ी संख्या में राजनीतिक पर्चे तथा आत्मकथाएँ लिखीं
नए तकनीकी परिष्कार — यह तालिका पक्की कीजिए
- 18वीं सदी का अंतप्रेस धातु से बनने लगे
- 19वीं सदी का मध्यरिचर्ड एम. हो. का शक्ति चालित बेलनाकार प्रेस — 8000 शीट प्रति घंटा
- 19वीं सदी का अंतऑफ़सेट प्रेस — एक साथ छह रंग की छपाई
- 20वीं सदी का आरंभबिजली से चलने वाले प्रेस
- 1930आर्थिक मंदी से सस्ते पेपरबैक या अजिल्द संस्करण
काग़ज़ डालने की विधि, प्लेट की गुणवत्ता, स्वचालित पेपर-रील और फ़ोटो-विद्युतीय रंग-नियंत्रण — इन सबसे छपे पन्ने का रंग-रूप ही बदल गया
एक घंटे में आठ हज़ार ताव
उन्नीसवीं सदी के मध्य तक न्यूयॉर्क के रिचर्ड एम. हो. ने शक्ति चालित बेलनाकार प्रेस को कारगर बना लिया था, जिससे प्रति घंटे 8000 शीट या ताव छप सकते थे
गुटेन्बर्ग के 250 पन्ने से 8000 ताव तक — चार सौ साल में यही थी छपाई की छलाँग
बेचने के नए गुर
पृष्ठ 118
- उन्नीसवीं सदी की पत्रिकाओं ने उपन्यासों को धारावाहिक छापा, जिससे उपन्यास लिखने की एक ख़ास शैली विकसित हुई
- इंग्लैंड में 1920 के दशक में लोकप्रिय किताबें सस्ती शिलिंग शृंखला के तहत छापी गईं
- किताबों की जिल्द का आवरण या डस्ट कवर भी बीसवीं सदी की तकनीकी नवइयत है
- 1930 की आर्थिक मंदी में बिक्री गिरने के भय से प्रकाशकों ने सस्ते पेपरबैक छापे
अध्याय 3 और 4 से जोड़िए — वहाँ आपने महामंदी और विज्ञापन पढ़ा था; यहाँ दोनों एक साथ दिख रहे हैं
6 | भारत का मुद्रण संसार | पांडुलिपि से प्रेस तक
मुद्रण युग से पहले की पांडुलिपियाँ
पृष्ठ 119
- भारत में संस्कृत, अरबी, फ़ारसी और विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं में हस्त-लिखित पांडुलिपियों की पुरानी और समृद्ध परंपरा थी
- ये ताड़ के पत्तों या हाथ से बने काग़ज़ पर नक़्ल कर बनाई जाती थीं
- कभी-कभी पन्नों पर बेहतरीन तसवीरें भी बनाई जाती थीं; फिर उन्हें तख़्तियों की जिल्द में या सिलकर बाँध दिया जाता था
- उन्नीसवीं सदी के अंत तक, छपाई आने के बाद भी, पांडुलिपियाँ छापी जाती रहीं
यह बात ज़रूर याद रखिए — भारत में लिखने-पढ़ने की परंपरा छपाई से बहुत पहले से थी
पर पांडुलिपियों की चार समस्याएँ थीं
पृष्ठ 119
| क्रम | समस्या |
|---|---|
| 1 | पांडुलिपियाँ नाज़ुक होती थीं |
| 2 | वे काफ़ी महँगी भी थीं |
| 3 | उन्हें बड़ी सावधानी से पकड़ना होता था |
| 4 | लिपियों के अलग-अलग तरीक़े से लिखे जाने से उन्हें पढ़ना भी आसान नहीं था |
इसीलिए उनका व्यापक दैनिक इस्तेमाल नहीं होता था
क्या बिना किताब पढ़े भी कोई साक्षर बन सकता है?
बंगाल की पाठशालाओं का चौंकाने वाला उदाहरण
पृष्ठ 120
- पूर्व-औपनिवेशिक बंगाल में ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक पाठशालाओं का बड़ा जाल था
- लेकिन विद्यार्थी आमतौर पर किताबें नहीं पढ़ते थे
- गुरु याददाश्त से किताबें सुनाते थे
- और विद्यार्थी उन्हें लिख लेते थे
- इस तरह कई-सारे लोग बिना कोई किताब पढ़े साक्षर बन जाते थे
यानी उस समय ‘साक्षर होना’ और ‘किताब पढ़ना’ दो अलग बातें थीं — यही ‘मौखिक बनाम मुद्रित’ वाली बात है
छपाई भारत आई — यह क्रम याद कीजिए
- 16वीं सदी का मध्यप्रिंटिंग प्रेस गोवा में पुर्तगाली धर्म-प्रचारकों के साथ आई
- 1579कैथलिक पुजारियों ने कोचीन में पहली तमिल किताब छापी
- 1674 तककोंकणी और कन्नड़ में लगभग 50 किताबें छप चुकी थीं
- 1713पहली मलयालम किताब छपी
- 1780जेम्स ऑगस्टस हिक्की का बंगाल गजट शुरू हुआ
ध्यान दीजिए — भारत में छपाई सबसे पहले धर्म-प्रचार के लिए आई, व्यापार या शिक्षा के लिए नहीं; ठीक वैसे ही जैसे गुटेन्बर्ग ने पहली किताब बाइबिल छापी थी
हिक्की और भारत का पहला अख़बार
पृष्ठ 120
- जेम्स ऑगस्टस हिक्की ने 1780 से बंगाल गजट नामक साप्ताहिक पत्रिका का संपादन शुरू किया
- उन्होंने इसे ‘हर किसी के लिए खुली एक व्यावसायिक पत्रिका, जो किसी के प्रभाव में नहीं है’ कहा
- हिक्की ढेर सारे विज्ञापन छापता था, जिनमें दासों की बिक्री के इश्तहार भी शामिल थे
- पर साथ ही वह वरिष्ठ अंग्रेज़ अधिकारियों से जुड़ी गपबाज़ी भी छापता था
- नाराज़ होकर गवर्नर जनरल वॉरेन हेस्टिंग्स ने उस पर मुक़दमा कर दिया
भारतीयों का पहला प्रयास — राजा राममोहन राय के क़रीबी गंगाधर भट्टाचार्य का बंगाल गजट
7 | धार्मिक सुधार और सार्वजनिक बहसें | प्रिंट में छिड़ी बहस
छपाई ने बहस के साथ तीन काम किए
पृष्ठ 121
- छपी हुई पुस्तिकाओं और अख़बारों ने नए विचारों का प्रचार-प्रसार किया
- उन्होंने बहस की शक्ल भी तय की
- इन बहसों में व्यापक जन-समुदाय भी हिस्सा ले सकता था और अपने मत ज़ाहिर कर सकता था
- इस तरह के मत-मंतांतर से नए विचार उभरे
- विधवा-दाह, एकेश्वरवाद, ब्राह्मण पुजारीवर्ग और मूर्ति-पूजा जैसे मुद्दों पर तेज़ बहस ठनी हुई थी
ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुँचने के ख़याल से इन्हें आम बोलचाल की भाषा में छापा गया
बहस के दो पक्ष — दोनों ने छपाई का ही सहारा लिया
सुधारवादी
- राजा राममोहन राय ने 1821 से संवाद कौमुदी प्रकाशित किया
- वे विधवा-दाह और मूर्ति-पूजा जैसी कुरीतियों में सुधार चाहते थे
- भाषा आम बोलचाल की रखी, ताकि ज़्यादा लोगों तक पहुँचे
रूढ़िवादी
- उन्होंने राममोहन राय के विचारों से टक्कर लेने के लिए समाचार चंद्रिका का सहारा लिया
- वे समाज-सुधारकों के तर्कों के ख़िलाफ़ खड़े थे
- उनका हथियार भी वही था — छपा हुआ शब्द
यही ‘सार्वजनिक बहस’ है — दोनों पक्षों के पास अब एक ही हथियार था, छपा हुआ शब्द
उलमा, देवबंद और लिथोग्राफ़ी
पृष्ठ 121
- उत्तर भारत में उलमा मुस्लिम राजवंशों के पतन को लेकर चिंतित थे
- डर था कि कहीं औपनिवेशिक शासक धर्मांतरण को बढ़ावा न दें, या मुस्लिम क़ानून न बदल डालें
- इससे निबटने के लिए उन्होंने सस्ती लिथोग्राफ़ी प्रेस से धर्मग्रंथों के फ़ारसी और उर्दू अनुवाद, धार्मिक अख़बार तथा गुटके निकाले
- सन् 1867 में स्थापित देवबंद सेमिनरी ने हज़ारों फ़तवे जारी किए
- पूरी उन्नीसवीं सदी में कई इस्लामी संप्रदाय और सेमिनरी पैदा हुए
हर कोई अपना संप्रदाय बढ़ाना चाहता था और दूसरों के असर को काटना चाहता था
हिंदू धार्मिक ग्रंथों का छपना
पृष्ठ 121
- तुलसीदास की सोलहवीं सदी की किताब रामचरितमानस का पहला मुद्रित संस्करण 1810 में कलकत्ता से प्रकाशित हुआ
- उन्नीसवीं सदी के मध्य तक सस्ते लिथोग्राफ़ी संस्करणों से उत्तर भारत का बाज़ार पट गया
- लखनऊ के नवल किशोर प्रेस और बंबई के श्री वेंकटेश्वर प्रेस में अनेक भारतीय भाषाओं में अनगिनत धार्मिक किताबें छपीं
- मुद्रित और लाने-ले जाने में आसान होने के कारण आस्थावान इन्हें कहीं भी, किसी समय पढ़ सकते थे
- इन्हें अनपढ़ लोगों की बड़ी भीड़ में बोल-बोल कर भी पढ़ा जा सकता था
यानी भारत में भी वही हुआ जो यूरोप में हुआ था — छपी सामग्री मौखिक अंदाज़ में फैली
और यह वाक्य पूरे भारतीय हिस्से का निष्कर्ष है
“लेकिन प्रिंट ने समुदाय के बीच सिर्फ़ मत-मतांतर ही नहीं पैदा किए, बल्कि इसने समुदायों को अंदर से, और विभिन्न हिस्सों को पूरे भारत से जोड़ने का काम भी किया।”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 122
छपाई ने एक साथ दो उलटे काम किए — उसने लोगों को बाँटा भी और जोड़ा भी
8 | प्रकाशन के नए रूप | उपन्यास · तसवीरें · महिलाएँ · ग़रीब जनता
उपन्यास और नयी दृश्य-संस्कृति
पृष्ठ 123
- छापेख़ाने से नए तरह के लेखन के लिए भूख जागी; लोग छपे पन्नों में अपनी ज़िंदगी और अपने रिश्ते देखना चाहते थे
- यूरोप में विकसित उपन्यास ने जल्दी ही अपनी ख़ास भारतीय शक्ल और शैली अख़्तियार कर ली
- राजा रवि वर्मा जैसे चित्रकारों ने आम खपत के लिए तसवीरें बनाईं — उनका अपना रवि वर्मा प्रेस था
- सस्ती तसवीरें और कैलेंडर ख़रीदकर ग़रीब भी अपने घरों और दफ़्तरों में सजाते थे
- 1870 के दशक तक सामाजिक-राजनीतिक विषयों पर कैरिकेचर और कार्टून छपने लगे थे
साम्राज्यवादी व्यंग्यचित्रों में राष्ट्रवादियों का मज़ाक उड़ता था, तो राष्ट्रवादी भी साम्राज्यवादी सत्ता पर निशाना साधने में पीछे नहीं रहे
महिलाएँ और मुद्रण — दोनों पक्ष लिखिए, तभी पूरे अंक मिलेंगे
आवाज़ मिली
- मध्यवर्गीय घरों में महिलाओं का पढ़ना बहुत बढ़ गया
- उदारवादी पिता और पति घर पर पढ़ाने लगे, फिर स्कूल भेजने लगे
- कई पत्रिकाओं ने लेखिकाओं को जगह दी और नारी-शिक्षा की ज़रूरत रेखांकित की
और रोक भी लगी
- परंपरावादी हिंदू मानते थे कि पढ़ी-लिखी कन्याएँ विधवा हो जाती हैं
- दक़ियानूसी मुसलमानों को लगता था कि रूमानी अफ़साने पढ़कर औरतें बिगड़ जाएँगी
- राम चड्ढा की स्त्री धर्म विचार औरतों को आज्ञाकारी बीवी बनना सिखाती थी
एक ही तकनीक ने दो उलटे काम किए — क्योंकि तकनीक अपने आप में न अच्छी होती है न बुरी
राससुन्दरी देबी — इस अध्याय की सबसे प्रेरक कहानी
पूर्वी बंगाल में, उन्नीसवीं सदी के प्रारंभ में, कट्टर रूढ़िवादी परिवार में ब्याही कन्या राससुन्दरी देबी ने रसोई में छिप-छिप कर पढ़ना सीखा। बाद में उन्होंने आमार जीबोन नामक आत्मकथा लिखी, जो 1876 में प्रकाशित हुई — यह बंगाली भाषा में प्रकाशित पहली संपूर्ण आत्म-कहानी थी।
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 124
यानी बंगाली में आत्मकथा-लेखन की शुरुआत ही एक स्त्री से हुई — और वह स्त्री रसोई में छिपकर पढ़ना सीखी थी
और लिखने वाली अन्य महिलाएँ
पृष्ठ 124–125
- कैलाशबाशिनी देवी ने 1860 के दशक से लिखा — कैसे महिलाएँ घरों में बंदी और अनपढ़ बनाकर रखी जाती हैं
- और कैसे जिनकी सेवा वे करती हैं, वही उन्हें दुत्कारते हैं
- ताराबाई शिंदे और पंडिता रमाबाई ने 1880 के दशक में महाराष्ट्र से उच्च जाति की नारियों की दयनीय हालत पर जोश और रोष से लिखा
- एक तमिल उपन्यास में एक स्त्री ने लिखा — “मेरे जीवन की आधी से ज़्यादा ख़ुशियाँ किताबें पढ़ने से आई हैं”
- गंभीर हिंदी छपाई की शुरुआत 1870 के दशक से हुई और इसका बड़ा हिस्सा नारी-शिक्षण को समर्पित हुआ
बेगम रोकैया शेखावत हुसैन ने 1926 में पूछा — “अगर पुरुष पढ़-लिखकर नहीं भटकते, तो महिलाएँ क्यों बिगड़ जाएँगी, भला?”
प्रिंट और ग़रीब जनता
पृष्ठ 125–126
- उन्नीसवीं सदी के मद्रासी शहरों में सस्ती किताबें चौक-चौराहों पर बिकती थीं, जिससे ग़रीब लोग भी उन्हें ख़रीद सकते थे
- बीसवीं सदी के आरंभ से सार्वजनिक पुस्तकालय खुलने लगे; स्थानीय अमीरों के लिए पुस्तकालय खोलना प्रतिष्ठा की बात थी
- ज्योतिबा फुले ने गुलामगिरी (1871) में जाति प्रथा के अत्याचारों पर लिखा
- भीमराव अंबेडकर और ई.वी. रामास्वामी नायकर ने जाति पर ज़ोरदार क़लम चलाई और उनके लेखन पूरे भारत में पढ़े गए
छपाई का सबसे बड़ा काम यही था — जिनके पास आवाज़ नहीं थी, उन्हें आवाज़ मिली
और मज़दूरों ने भी ख़ुद छापना शुरू किया
कानपुर के मिल-मज़दूर काशीबाबा ने 1938 में छोटे और बड़े सवाल लिख और छाप कर जातीय तथा वर्गीय शोषण के बीच का रिश्ता समझाने की कोशिश की। 1935 से 1955 के बीच सुदर्शन चक्र के नाम से लिखने वाले एक और मिल-मज़दूर का लेखन सच्ची कविताएँ में छपा।
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 126
बंगलौर के सूती-मिल-मज़दूरों ने ख़ुद को शिक्षित करने के लिए पुस्तकालय बनाए — प्रेरणा उन्हें बंबई के मिल-मज़दूरों से मिली थी
9 | प्रिंट और प्रतिबंध | सरकार को डर किससे था
पहली सेंसरशिप भारतीयों पर नहीं, अंग्रेज़ों पर लगी थी — क्यों?
कंपनी को डर भारतीयों से नहीं था
पृष्ठ 127
- ईस्ट इंडिया कंपनी के तहत 1798 से पहले का शासन सेंसरशिप को लेकर ज़्यादा परेशान नहीं था
- मुद्रित सामग्री को नियंत्रित करने के इसके शुरुआती क़दम कंपनी के कुप्रशासन की आलोचना करने वाले अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ उठे
- कंपनी को चिंता थी कि इन आलोचनाओं का लाभ उठाकर इंग्लैंड में बैठे इनके निंदक कहीं भारत पर इनके व्यापारिक एकाधिकार पर हमला न बोल दें
- 1835 में गवर्नर जनरल बेंटिंक प्रेस क़ानून की पुनर्समीक्षा को राज़ी हुआ
- फिर उदारवादी अफ़सर टॉमस मेकॉले ने पहले की आज़ादियों को बहाल करते हुए नए क़ानून बनाए
कंपनी एक व्यापारिक कंपनी थी — उसे डर अपने प्रतिद्वंद्वियों से था, भारतीयों से नहीं
1878 — वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट
पृष्ठ 127 — यह अभ्यास प्रश्न 2-ग है
- 1857 के विद्रोह के बाद प्रेस की स्वतंत्रता के प्रति रवैया बदल गया और क्रुद्ध अंग्रेज़ों ने ‘देसी’ प्रेस का मुँह बंद करने की माँग की
- ज्यों-ज्यों भाषाई समाचार पत्र राष्ट्रवाद के समर्थन में मुखर होते गए, त्यों-त्यों कड़े नियंत्रण के प्रस्ताव पर बहस तेज़ हुई
- आइरिश प्रेस क़ानून के तर्ज पर 1878 में वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट लागू कर दिया गया
- सरकार को भाषाई प्रेस की रपट और संपादकीय सेंसर करने का व्यापक हक़ मिल गया
- बाग़ी रपट पर पहले चेतावनी; अनसुनी होने पर अख़बार ज़ब्त और छपाई की मशीनें छीन ली जाती थीं
ध्यान दीजिए — यह क़ानून सिर्फ़ भारतीय भाषाओं के अख़बारों पर लागू था, अंग्रेज़ी अख़बारों पर नहीं
अगस्त 1942 — नब्बे अख़बारों का दमन
पहले विश्वयुद्ध में भारतीय रक्षा नियम के तहत 22 अख़बारों को ज़मानत देनी पड़ी, जिनमें से 18 ने ख़ुद को बंद कर देना उचित समझा। 1919 में रॉलट समिति ने कार्रवाइयाँ और सख़्त कीं। और अगस्त 1942 में तक़रीबन 90 अख़बारों का दमन किया गया
पर दमन के बावजूद राष्ट्रवादी अख़बार देश के हर कोने में बढ़ते-फैलते गए
तिलक और केसरी
पृष्ठ 127
- दमन की नीति के बावजूद राष्ट्रवादी अख़बारों ने औपनिवेशिक कुशासन की रिपोर्टिंग जारी रखी
- जब पंजाब के क्रांतिकारियों को 1907 में कालापानी भेजा गया…
- …तो बालगंगाधर तिलक ने अपने केसरी में उनके प्रति गहरी हमदर्दी जताई
- नतीजे के तौर पर उन्हें 1908 में क़ैद कर लिया गया
- जिसके परिणामस्वरूप भारत-भर में व्यापक विरोध हुए
सरकार को वफ़ादार संपादक ढूँढ़ना भी मुश्किल पड़ता था — द फ़्रेंड ऑफ़ इंडिया ने सरकारी मदद लेने से ही इनकार कर दिया
और अंत में — गांधी, 1922
“वाणी की स्वतंत्रता…. प्रेस की आज़ादी…. सामूहिकता की आज़ादी। भारत सरकार अब जनमत को व्यक्त करने और बनाने के इन तीन ताक़तवर औज़ारों को दबाने की कोशिश कर रही है। स्वराज, ख़िलाफ़त… की लड़ाई, सबसे पहले तो इन संकटग्रस्त आज़ादियों की लड़ाई है।”
महात्मा गांधी · पाठ्यपुस्तक स्रोत-च, पृष्ठ 127
यह अभ्यास प्रश्न 1-घ है — इन आज़ादियों के बिना स्वराज की माँग रखने का साधन ही नहीं बचता
10 | समापन | पूरे अध्याय की एक तालिका
एक नज़र में पूरा अध्याय
आख़िरी दिन के लिए
| भाग | मुख्य बात एक वाक्य में |
|---|---|
| 1 | छपाई पूर्वी एशिया में जन्मी — 594 ई. चीन, 868 ई. डायमंड सूत्र, 80,000 ब्लॉक का त्रिपीटका, धातु-टाइप वाली जिक्जी |
| 2 | मार्को पोलो 1295 में तकनीक लाया; गुटेन्बर्ग ने 1448 में प्रेस बनाई; 1450–1550 में छापेख़ाने फैले |
| 3–4 | नया पाठक वर्ग बना; लूथर ने स्वागत किया, चर्च ने 1558 से किताबें प्रतिबंधित कीं, मेनोकियो मारा गया |
| 5 | बच्चे, महिलाएँ और मज़दूर नए पाठक बने; प्रेस 8000 शीट प्रति घंटा तक पहुँचा |
| 6–7 | प्रेस 16वीं सदी में गोवा आई; 1780 में हिक्की; 1821 में संवाद कौमुदी; 1810 में रामचरितमानस |
| 8–9 | राससुन्दरी देबी, फुले, काशीबाबा को आवाज़ मिली; और सरकार ने 1878 का क़ानून बनाया |
और सिर्फ़ छह तिथियाँ अनिवार्य हैं
- 594 ई.चीन में छपाई शुरू
- 1295मार्को पोलो लौटा
- 1448गुटेन्बर्ग का यंत्र तैयार
- 1780हिक्की का बंगाल गजट
- 1878वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट
- 1942नब्बे अख़बारों का दमन
बाक़ी सब तिथियाँ इन्हीं छह के आसपास टँग जाएँगी
पूरे अध्याय का निचोड़
छपाई ने सिर्फ़ किताबें सस्ती नहीं कीं। उसने यह बदल दिया कि कौन पढ़ सकता है, कौन अपनी बात कह सकता है, और सत्ता किससे डरती है। जिसके पास सत्ता थी वह डरा, और जिसके पास आवाज़ नहीं थी उसे आवाज़ मिली।
अध्याय 5 का सार
लूथर ने इसे ईश्वर का तोहफ़ा कहा, इरैस्मस ने मक्खियाँ, चर्च ने सूची बनाई, सरकार ने क़ानून बनाया — और राससुन्दरी देबी ने रसोई में छिपकर पढ़ना सीखा