Chapter 1संसाधन एवं विकास

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अध्याय 1 — संसाधन एवं विकास · समकालीन भारत-2 (भूगोल) · कक्षा 10

कक्षा — 10 · विषय — भूगोल (समकालीन भारत–2) · पृष्ठ — 1 से 12

अपने बस्ते में देखिए — इनमें से कौन-सी चीज़ ‘संसाधन’ है?

किताब · पेन · टिफ़िन · पानी की बोतल · कुर्सी · पंखा और वे चीज़ें भी सोचिए जो दिखती नहीं — बिजली, हवा, धूप

पाठ्यपुस्तक का पहला सवाल — “क्या आप उन वस्तुओं का नाम बता सकते हैं जो गाँवों और शहरों में हमारे जीवन को आराम पहुँचाते हैं?”

संसाधन की परिभाषा — यह शब्दश: याद कीजिए

“हमारे पर्यावरण में उपलब्ध प्रत्येक वस्तु जो हमारी आवश्यकताओं को पूरा करने में प्रयुक्त की जा सकती है और जिसको बनाने के लिए प्रौद्योगिकी उपलब्ध है, जो आर्थिक रूप से संभाव्य और सांस्कृतिक रूप से मान्य है, एक ‘संसाधन’ है।”

पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 1

इस परिभाषा में चार शर्तें छिपी हैं — इन्हें अलग-अलग लिखिए

परिभाषा की चार शर्तें

पृष्ठ 1

शर्तअर्थ
1. आवश्यकता पूरी करेवह चीज़ हमारे किसी काम आती हो
2. प्रौद्योगिकी उपलब्ध होउसे निकालने या इस्तेमाल करने की तकनीक हमारे पास हो
3. आर्थिक रूप से संभाव्य होउसे निकालने में जितना ख़र्च हो, उससे ज़्यादा फ़ायदा मिलता हो
4. सांस्कृतिक रूप से मान्य होसमाज उसका इस्तेमाल स्वीकार करता हो

समुद्र के पानी में सोना घुला है — पर उसे निकालना बहुत महँगा है, इसलिए वह अभी संसाधन नहीं है

और अब अध्याय की सबसे बड़ी बात

“क्या आप भी अन्य बहुत से लोगों की तरह संसाधनों को प्राकृतिक उपहार समझते हैं? ऐसा नहीं है। संसाधन मानवीय क्रियाओं का परिणाम हैं।”

पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 1

कोई चीज़ अपने आप ‘संसाधन’ नहीं होती — वह तभी बनती है जब मनुष्य उसे उपयोगी बना ले

चित्र 1.1 — प्रकृति, प्रौद्योगिकी और संस्थाओं का त्रिकोण

पृष्ठ 1 — बीच में ‘मानव’ है

  • भौतिक पर्यावरण (प्रकृति) — कोयला, पानी, मिट्टी, धूप
  • प्रौद्योगिकी — खदान की मशीन, बाँध, सोलर पैनल
  • संस्थाएँ — सरकार, पंचायत, क़ानून, योजना निकाय
  • “मानव प्रौद्योगिकी द्वारा प्रकृति के साथ क्रिया करते हैं”
  • “और अपने आर्थिक विकास की गति को तेज़ करने के लिए संस्थाओं का निर्माण करते हैं”

नदी प्रकृति है · बाँध प्रौद्योगिकी है · पानी बाँटने वाली सरकार संस्था है — तीनों मिलकर ही नदी को ‘जल संसाधन’ बनाते हैं

1 | संसाधनों का वर्गीकरण | चार आधार

चार आधार — याद रखने का सूत्र: “उ-स-स्वा-वि”

पृष्ठ 1

आधारप्रकार
(क) उत्पत्तिजैव और अजैव
(ख) समाप्यतानवीकरण योग्य और अनवीकरण योग्य
(ग) स्वामित्वव्यक्तिगत, सामुदायिक, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय
(घ) विकास का स्तरसंभावी, विकसित, भंडार और संचित कोष

यह इस अध्याय का सबसे पक्का प्रश्न है — चारों आधार और उनके प्रकार पूरे याद कीजिए

चित्र 1.2 — पूरा वर्गीकरण एक तालिका में

पृष्ठ 1 — प्रवाह-चित्र की जगह तालिका बनाइए

मुख्य वर्गउपवर्गआगे का उपवर्गउदाहरण
प्राकृतिकनवीकरण योग्यसतत् अथवा प्रवाहपवन, जल
प्राकृतिकनवीकरण योग्यजैवप्राकृतिक वनस्पति (वन), वन्य जीव
प्राकृतिकअनवीकरण योग्यपुन: चक्रीयधातु
प्राकृतिकअनवीकरण योग्यअचक्रीयजीवाश्म ईंधन
मानवीयसंरचनाएँ एवं संस्थाएँ—शिक्षा-व्यवस्था, सरकार
मानवीयमात्रा एवं गुणवत्ता—जनसंख्या, कौशल

‘पुन: चक्रीय’ बनाम ‘अचक्रीय’ — धातु गलाकर दोबारा बनती है; पेट्रोल एक बार जला तो ख़त्म

उत्पत्ति और समाप्यता के आधार पर

उत्पत्ति के आधार पर

  • जैव — जिनकी उत्पत्ति जीवमंडल से होती है
  • मनुष्य, वनस्पति जगत, प्राणी जगत, मत्स्य जीवन, पशुधन
  • अजैव — वे सभी वस्तुएँ जो निर्जीव पदार्थों से बनी हैं
  • चट्टानें और धातुएँ

समाप्यता के आधार पर

  • नवीकरण योग्य — जिन्हें भौतिक, रासायनिक या यांत्रिक प्रक्रियाओं से दोबारा उत्पन्न किया जा सकता है
  • सौर और पवन ऊर्जा, जल, वन और वन्य जीवन
  • अनवीकरण योग्य — जिनका विकास लंबे भूगर्भीय अंतराल में होता है
  • खनिज और जीवाश्म ईंधन

अनवीकरण योग्य संसाधन एक बार समाप्त होने पर दोबारा नहीं बनते — यही उनकी सबसे बड़ी बात है

स्वामित्व के आधार पर — चार प्रकार

पृष्ठ 2

प्रकारअर्थ
व्यक्तिगतजिन पर किसी एक व्यक्ति का अधिकार हो — किसान का अपना खेत, कुआँ या घर
सामुदायिकजो समुदाय के सभी सदस्यों के लिए उपलब्ध हों — गाँव की चरागाह और तालाब; शहरों के सार्वजनिक पार्क, पिकनिक स्थल और खेल के मैदान
राष्ट्रीयदेश की सीमा के भीतर के सभी संसाधन; इसमें तट रेखा से 12 समुद्री मील तक का महासागरीय क्षेत्र भी शामिल
अंतर्राष्ट्रीयतट रेखा से 200 समुद्री मील से परे खुले महासागरीय संसाधन, जिनका नियमन अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएँ करती हैं

200 समुद्री मील से परे के संसाधन किसी देश की अनुमति के बिना कोई उपयोग नहीं कर सकता

विकास के स्तर के आधार पर — चार प्रकार

पृष्ठ 2

प्रकारअर्थउदाहरण
संभावीप्रदेश में मौजूद, पर उपयोग नहीं हुआराजस्थान और गुजरात में पवन तथा सौर ऊर्जा
विकसितसर्वेक्षण हो चुका, उपयोग शुरू हैकोयले और लोहे की चालू खदानें
भंडारउपयुक्त प्रौद्योगिकी नहीं हैपानी में मौजूद हाइड्रोजन
संचित कोषतकनीक है, पर अभी उपयोग शुरू नहीं हुआबाँधों में जमा जल

! सबसे उलझाने वाला फ़र्क़ — “भंडार में तकनीक नहीं है; संचित कोष में तकनीक है, पर इस्तेमाल नहीं किया”

2 | संसाधनों का विकास | तीन समस्याएँ और एक हल

अंधाधुंध उपयोग की तीन समस्याएँ

पृष्ठ 2

  • पहली — कुछ व्यक्तियों के लालचवश संसाधनों का ह्रास हुआ है
  • दूसरी — संसाधन समाज के कुछ ही लोगों के हाथ में आ गए हैं
  • जिससे समाज दो हिस्सों — संसाधन संपन्न एवं संसाधनहीन, अर्थात् अमीर और गरीब — में बँट गया
  • तीसरी — संसाधनों के अंधाधुंध शोषण से वैश्विक पारिस्थितिकी संकट पैदा हो गया है
  • जैसे भूमंडलीय तापन, ओज़ोन परत अवक्षय, पर्यावरण प्रदूषण और भूमि निम्नीकरण

तीन शब्दों में याद कीजिए — ह्रास · बँटवारा · पारिस्थितिकी संकट

सतत् पोषणीय विकास — परिभाषा शब्दश: याद कीजिए

“सतत् पोषणीय आर्थिक विकास का अर्थ है कि विकास पर्यावरण को बिना नुकसान पहुँचाए हो और वर्तमान विकास की प्रक्रिया भविष्य की पीढ़ियों की आवश्यकता की अवहेलना न करे।”

पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 2

कक्षा में इसे ऐसे समझिए — “अगर आज हम सारा पानी ख़त्म कर देंगे, तो तुम्हारे बच्चों के लिए क्या बचेगा?”

रियो डी जेनेरो पृथ्वी सम्मेलन, 1992

पृष्ठ 2 — यह बॉक्स सीधे परीक्षा में आता है

बिंदुविवरण
कब और कहाँजून 1992, ब्राज़ील के शहर रियो डी जेनेरो में
कौन आए100 से भी अधिक राष्ट्राध्यक्ष
कौन-सा सम्मेलनप्रथम अंतर्राष्ट्रीय पृथ्वी सम्मेलन
किस पर हस्ताक्षरभूमंडलीय जलवायु परिवर्तन और जैविक विविधता पर घोषणा पत्र
और क्या हुआभूमंडलीय वन सिद्धांतों (Forest Principles) पर सहमति
सबसे बड़ा परिणामएजेंडा 21 को स्वीकृति

एजेंडा 21 — और उसका सबसे ज़रूरी वाक्य

पृष्ठ 2

  • 1992 में रियो में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण और विकास सम्मेलन (UNCED) के तत्वाधान में स्वीकृत घोषणा
  • उद्देश्य — भूमंडलीय सतत् पोषणीय विकास हासिल करना
  • यह एक कार्यसूची है जो समान हितों और सम्मिलित ज़िम्मेदारियों के अनुसार विश्व सहयोग से काम करना चाहती है
  • किन तीन चीज़ों से निपटना है — पर्यावरणीय क्षति, ग़रीबी और रोगों से
  • और मुख्य उद्देश्य — “प्रत्येक स्थानीय निकाय अपना स्थानीय एजेंडा 21 तैयार करे”

यह आख़िरी पंक्ति सबसे ज़रूरी है — ज़िम्मेदारी सिर्फ़ सरकारों की नहीं, हर पंचायत और हर वार्ड की है

3 | संसाधन नियोजन | भारत की विविधता

भारत में संसाधनों की विविधता — चार उदाहरण

पृष्ठ 2–3 — यह तालिका सीधे परीक्षा में आती है

प्रदेशप्रचुरताकमी
झारखंड, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़खनिजों और कोयले के प्रचुर भंडार—
अरुणाचल प्रदेशजल संसाधन प्रचुर मात्रा मेंमूल विकास की कमी
राजस्थानपवन और सौर ऊर्जा की बहुतायतजल संसाधनों की कमी
लद्दाखसांस्कृतिक विरासत का धनीजल, आधारभूत अवसंरचना और कुछ महत्त्वपूर्ण खनिजों की कमी

राजस्थान वाली पंक्ति ज़रूर याद कीजिए — यह RBSE की परीक्षा में लगभग हर साल आती है

संसाधन नियोजन के तीन सोपान

पृष्ठ 3 — यह सबसे पक्का प्रश्न है

  • (क) पहचान — देश के विभिन्न प्रदेशों में संसाधनों की पहचान कर उनकी तालिका बनाना
  • इस कार्य में क्षेत्रीय सर्वेक्षण, मानचित्र बनाना और गुणात्मक एवं मात्रात्मक अनुमान लगाना व मापन शामिल है
  • (ख) प्रौद्योगिकी — योजनाएँ लागू करने के लिए उपयुक्त प्रौद्योगिकी, कौशल और संस्थागत नियोजन ढाँचा तैयार करना
  • (ग) समन्वय — संसाधन विकास योजनाओं और राष्ट्रीय विकास योजना में समन्वय स्थापित करना
  • “स्वाधीनता के बाद भारत में इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए प्रथम पंचवर्षीय योजना से ही प्रयास किए गए”

तीनों को तीन शब्दों में याद कीजिए — पहचान · प्रौद्योगिकी · समन्वय

अगर किसी प्रदेश में बहुत संसाधन हों, तो क्या वह अपने आप विकसित हो जाएगा?

सिर्फ़ संसाधन होने से विकास नहीं होता

पृष्ठ 3 — यह तर्क 5-अंक के प्रश्न में आता है

  • “किसी क्षेत्र के विकास के लिए संसाधनों की उपलब्धता एक आवश्यक शर्त है”
  • “परंतु प्रौद्योगिकी और संस्थाओं में तदनुरूपी परिवर्तनों के अभाव में मात्र संसाधनों की उपलब्धता से ही विकास संभव नहीं है”
  • “देश में बहुत से क्षेत्र हैं जो संसाधन समृद्ध होते हुए भी आर्थिक रूप से पिछड़े प्रदेशों की गिनती में आते हैं”
  • “इसके विपरीत कुछ ऐसे प्रदेश भी हैं जो संसाधनों की कमी होते हुए भी आर्थिक रूप से विकसित हैं”

निष्कर्ष — “संसाधन किसी प्रदेश के विकास में तभी योगदान दे सकते हैं, जब वहाँ उपयुक्त प्रौद्योगिकी विकास और संस्थागत परिवर्तन किए जाएँ”

और इसका सबसे बड़ा ऐतिहासिक उदाहरण — उपनिवेशवाद

“उपनिवेशों में संसाधन संपन्न प्रदेश, विदेशी आक्रमणकारियों के लिए मुख्य आकर्षण रहे हैं। उपनिवेशकारी देशों ने बेहतर प्रौद्योगिकी के सहारे उपनिवेशों के संसाधनों का शोषण किया तथा उन पर अपना आधिपत्य स्थापित किया।”

पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 3

यह ठीक वही बात है जो आपने इतिहास में पढ़ी थी — भारत से कच्चा माल गया और तैयार माल आया

4 | संसाधनों का संरक्षण | गांधी से रियो तक

गांधी जी का कथन — यह उद्धरण ज़रूर याद कीजिए

“हमारे पास हर व्यक्ति की आवश्यकता पूर्ति के लिए बहुत कुछ है, लेकिन किसी के लालच की संतुष्टि के लिए नहीं।” अर्थात् — “हमारे पास पेट भरने के लिए बहुत है लेकिन पेटी भरने के लिए नहीं।”

महात्मा गांधी · पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 3

‘पेट’ और ‘पेटी’ — एक ही अक्षर का फ़र्क़, और यही पूरी बात है

गांधी जी किसे ज़िम्मेदार मानते थे

पृष्ठ 3–4

  • “उनके अनुसार विश्व स्तर पर संसाधन ह्रास के लिए लालची और स्वार्थी व्यक्ति ज़िम्मेदार है”
  • “तथा आधुनिक प्रौद्योगिकी की शोषणात्मक प्रवृत्ति भी ज़िम्मेदार है”
  • “वे अत्यधिक उत्पादन के विरुद्ध थे”
  • “और इसके स्थान पर अधिक बड़े जनसमुदाय द्वारा उत्पादन के पक्षधर थे”

यानी कुछ बड़े कारख़ानों की जगह बहुत सारे लोगों के हाथ में काम — यही गांधी जी का आर्थिक दर्शन था

संसाधन संरक्षण की अंतर्राष्ट्रीय कालरेखा

  1. 1968क्लब ऑफ़ रोम ने व्यवस्थित तरीक़े से संसाधन संरक्षण की वकालत की
  2. 1974शुमेसर ने ‘स्माल इज़ ब्यूटीफुल’ में गांधी जी के दर्शन को दोहराया
  3. 1987ब्रुन्ड्टलैंड आयोग रिपोर्ट ने सतत् पोषणीय विकास की संकल्पना दी
  4. 1987यह रिपोर्ट बाद में ‘हमारा साझा भविष्य’ नाम से पुस्तक बनी
  5. 1992रियो डी जेनेरो, ब्राज़ील में पृथ्वी सम्मेलन

! सावधानी — ‘सतत् पोषणीय विकास’ शब्द 1987 की ब्रुन्ड्टलैंड रिपोर्ट से आया, 1992 के रियो सम्मेलन से नहीं

5 | भू-संसाधन | भारत की ज़मीन

भारत का मैदानी क्षेत्र

43%

भारत का लगभग 43 प्रतिशत भू-क्षेत्र मैदान है, जो कृषि और उद्योग के विकास के लिए सुविधाजनक है। पर्वत 30 प्रतिशत और पठार लगभग 27 प्रतिशत भाग पर हैं

43 – 30 – 27 → जोड़ने पर 100; इसी तरह याद कीजिए

तीनों भू-आकृतियों का महत्त्व

चित्र 1.3, पृष्ठ 4

भू-आकृतिप्रतिशतविशेषता
मैदानलगभग 43%कृषि और उद्योग के विकास के लिए सुविधाजनक
पर्वत30%बारहमासी नदियों का प्रवाह सुनिश्चित करते हैं, पर्यटन के लिए अनुकूल, पारिस्थितिकी के लिए महत्त्वपूर्ण
पठारलगभग 27%खनिजों, जीवाश्म ईंधन और वनों का अपार संचय कोष

“भूमि एक सीमित संसाधन है, इसलिए उपलब्ध भूमि का विभिन्न उद्देश्यों के लिए उपयोग सावधानी और योजनाबद्ध तरीक़े से होना चाहिए”

भू-उपयोग की पाँच श्रेणियाँ

पृष्ठ 4

#श्रेणीउपश्रेणियाँ
1वन—
2कृषि के लिए अनुपलब्ध भूमिबंजर तथा कृषि अयोग्य भूमि · गैर-कृषि प्रयोजनों में लगाई गई भूमि (इमारतें, सड़क, उद्योग)
3परती के अतिरिक्त अन्य कृषि अयोग्य भूमिस्थायी चरागाहें · विविध वृक्षों और उपवनों के अधीन भूमि · कृषि योग्य बंजर भूमि (5 से अधिक वर्षों से खेती न हुई हो)
4परती भूमिवर्तमान परती (1 वर्ष या कम) · पुरातन परती (1 से 5 वर्ष)
5शुद्ध (निवल) बोया गया क्षेत्रवह भूमि जिस पर फ़सलें उगाई व काटी जाती हैं

तीन ‘परती’ का फ़र्क़ — वर्तमान = 1 वर्ष · पुरातन = 1 से 5 वर्ष · कृषि योग्य बंजर = 5 से ज़्यादा

भारत का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल

32.8 लाख

वर्ग किलोमीटर — पर इसके केवल 93 प्रतिशत भाग के भू-उपयोग आँकड़े उपलब्ध हैं

दो कारण — (1) असम को छोड़कर पूर्वोत्तर प्रांतों की जानकारी नहीं; (2) जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान और चीन अधिकृत क्षेत्रों का सर्वेक्षण नहीं हुआ

चित्र 1.4 — 1960–61 और 2014–15 की तुलना

स्रोत — डायरेक्टरेट ऑफ़ इकोनोमिक्स एंड स्टैटिस्टिक्स, 2017

भू-उपयोग संवर्ग1960–612014–15
वन18.11%23.3%
बंजर तथा कृषि अयोग्य भूमि12.01%5.5%
गैर-कृषि प्रयोजनों के अंतर्गत क्षेत्र4.95%8.7%
कृषि योग्य बंजर भूमि6.23%4.0%
वर्तमान परती3.73%4.9%
शुद्ध (निवल) बोया गया क्षेत्र45.26%45.5%

तीन निष्कर्ष — बोया गया क्षेत्र लगभग नहीं बढ़ा · वन बहुत धीरे बढ़े · गैर-कृषि भूमि लगभग दोगुनी हो गई

खेती से जुड़े तीन ज़रूरी आँकड़े

पृष्ठ 5

  • कुल सूचित क्षेत्र के लगभग 54 प्रतिशत हिस्से पर ही खेती हो सकती है
  • पंजाब और हरियाणा में 80 प्रतिशत भूमि पर खेती होती है
  • अरुणाचल प्रदेश, मिज़ोरम, मणिपुर और अंडमान निकोबार में 10 प्रतिशत से भी कम क्षेत्र बोया जाता है
  • इन राज्यों में पहाड़ी और वनाच्छादित क्षेत्र अधिक है, ढाल तीव्र है और मिट्टी की परत पतली है
  • राष्ट्रीय वन नीति (1952) द्वारा 33 प्रतिशत भौगोलिक क्षेत्र वनों के अंतर्गत वांछित है

यह सीमा पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखने के लिए आवश्यक है, और वन क्षेत्रों के आसपास रहने वाले लाखों लोगों की आजीविका इस पर निर्भर करती है

6 | भूमि निम्नीकरण | कारण और उपाय

भारत में निम्नीकृत भूमि

13 करोड़

हेक्टेयर भूमि इस समय भारत में निम्नीकृत है। इसमें से लगभग 28 प्रतिशत वनों के अंतर्गत अपरदित है, 56 प्रतिशत क्षेत्र जल अपरदित है और शेष क्षेत्र लवणीय तथा क्षारीय है

और याद रखिए — हम भोजन, मकान और कपड़े की अपनी मूल आवश्यकताओं का 95 प्रतिशत भाग भूमि से ही प्राप्त करते हैं

भूमि निम्नीकरण के कारण — राज्यवार

पृष्ठ 6 — यह तालिका बहुत पूछी जाती है

कारणराज्यकैसे होता है
खननझारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और उड़ीसाखदानों वाले स्थानों को गहरी खाइयों और मलबे के साथ खुला छोड़ दिया जाता है; वनोन्मूलन भी होता है
अति पशुचारणगुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्रज़रूरत से ज़्यादा पशु चराने से वनस्पति ख़त्म होती है और मिट्टी नंगी हो जाती है
अधिक सिंचाईपंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेशअति सिंचन से जलाक्रांतता पैदा होती है, जिससे लवणीयता और क्षारीयता बढ़ती है

! सावधानी — मध्य प्रदेश दो सूचियों में है, और राजस्थान अति पशुचारण वाली सूची में है

और दो कारण जो अकसर छूट जाते हैं

पृष्ठ 6

  • खनिज प्रक्रियाएँ — सीमेंट उद्योग में चूना पत्थर पीसना, और मृदा बर्तन उद्योग में चूने (खड़िया मृदा) तथा सेलखड़ी का प्रयोग
  • इनसे बहुत अधिक मात्रा में वायुमंडल में धूल विसर्जित होती है
  • जब इसकी परत भूमि पर जम जाती है तो मृदा की जल सोखने की प्रक्रिया अवरुद्ध हो जाती है
  • औद्योगिक जल निकास — इससे बाहर आने वाला अपशिष्ट पदार्थ भूमि और जल प्रदूषण का मुख्य स्रोत है

यानी भूमि सिर्फ़ खेत में नहीं बिगड़ती — कारख़ाने की धूल और पानी से भी बिगड़ती है

भूमि निम्नीकरण के सात उपाय

पृष्ठ 6

  • वनारोपण और चरागाहों का उचित प्रबंधन
  • पेड़ों की रक्षक मेखला (shelter belt) लगाना
  • पशुचारण नियंत्रण
  • रेतीले टीलों को काँटेदार झाड़ियाँ लगाकर स्थिर बनाना — शुष्क क्षेत्रों में भूमि कटाव की रोकथाम का सबसे कारगर तरीक़ा
  • बंजर भूमि का उचित प्रबंधन और खनन नियंत्रण
  • औद्योगिक जल को परिष्करण के पश्चात् विसर्जित करना

इन उपायों से जल और भूमि प्रदूषण दोनों कम किए जा सकते हैं

7 | मृदा संसाधन | मिट्टी कैसे बनती है

मृदा — सबसे महत्त्वपूर्ण नवीकरण योग्य संसाधन

“मिट्टी अथवा मृदा सबसे महत्त्वपूर्ण नवीकरण योग्य प्राकृतिक संसाधन है। यह पौधों के विकास का माध्यम है जो पृथ्वी पर विभिन्न प्रकार के जीवों का पोषण करती है।” मृदा एक जीवंत तंत्र है।

पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 6

पर ध्यान दीजिए — “कुछ सेंटीमीटर गहरी मृदा बनने में लाखों वर्ष लग जाते हैं”

मृदा बनने के कारक

पृष्ठ 6–7

  • पाँच मुख्य कारक — उच्चावच · जनक शैल अथवा संस्तर शैल · जलवायु · वनस्पति और अन्य जैव पदार्थ · समय
  • और प्रकृति के ये तत्त्व भी योगदान देते हैं —
  • तापमान परिवर्तन · बहते जल की क्रिया · पवन · हिमनदी · अपघटन क्रियाएँ
  • “मृदा में होने वाले रासायनिक और जैविक परिवर्तन भी महत्त्वपूर्ण हैं”
  • “मृदा जैव (ह्यूमस) और अजैव दोनों प्रकार के पदार्थों से बनती है”

मृदा को पहचानने के तत्त्व — उसका रंग, गहराई, गठन, आयु, और रासायनिक तथा भौतिक गुण

चित्र 1.5 — मृदा परिच्छेदिका की चार परतें

पृष्ठ 7 — ऊपर से नीचे

क्रमपरत
1 (सबसे ऊपर)ऊपरी संस्तर की मृदा
2उप-मृदा — अपक्षयित चट्टानें: बालू, गाद (सिल्ट) व मृत्तिका
3अध:स्तरीय अपक्षयित आधारी चट्टानें
4 (सबसे नीचे)अपक्षय रहित आधारी चट्टानें

ऊपर से नीचे जाते-जाते मिट्टी कम और चट्टान ज़्यादा होती जाती है — यानी मृदा जनक शैल के अपक्षय से ही बनती है

8 | मृदाओं का वर्गीकरण | भारत की छह मृदाएँ

छहों मृदाएँ एक नज़र में

पृष्ठ 7–10 — इसी क्रम में याद कीजिए

मृदाकहाँविशेषता / फ़सल
जलोढ़संपूर्ण उत्तरी मैदान; राजस्थान-गुजरात तक; पूर्वी तटीय डेल्टेसबसे उपजाऊ; गन्ना, चावल, गेहूँ, दलहन
कालीदक्कन पठार का उत्तर-पश्चिम; महाराष्ट्र, सौराष्ट्र, मालवा, म.प्र., छत्तीसगढ़नमी धारण क्षमता सबसे अधिक; कपास
लाल और पीलीदक्कन पठार का पूर्वी-दक्षिणी हिस्सा; ओडिशा, छत्तीसगढ़, प. घाट का पहाड़ी पदलोहे से लाल, जलयोजन से पीली
लेटराइटदक्षिणी राज्य, प. घाट, ओडिशा, प. बंगाल, उत्तर-पूर्वी प्रदेशनिक्षालन से बनी; चाय, कॉफ़ी, काजू
मरुस्थलीपश्चिमी राजस्थानरेतीली-लवणीय; सिंचाई से उपजाऊ
वनपहाड़ी और पर्वतीय क्षेत्र, हिमालयनदी घाटी में दोमट; ऊपरी ढाल पर मोटे कण

हर मृदा को एक ही चीज़ से बाँध दीजिए — काली = कपास · जलोढ़ = गेहूँ-चावल · लेटराइट = चाय-कॉफ़ी-काजू

जलोढ़ मृदा — देश की सबसे महत्त्वपूर्ण मृदा

पृष्ठ 7

  • “यह मृदा विस्तृत रूप से फैली हुई है और यह देश की महत्त्वपूर्ण मृदा है”
  • संपूर्ण उत्तरी मैदान जलोढ़ मृदा से बना है — सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र के निक्षेपों से
  • एक सँकरे गलियारे के द्वारा ये मृदाएँ राजस्थान और गुजरात तक फैली हैं
  • महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी के पूर्वी तटीय डेल्टे भी जलोढ़ मृदा से बने हैं
  • इसमें रेत, सिल्ट और मृत्तिका के विभिन्न अनुपात पाए जाते हैं
  • नदी के मुहाने से घाटी में ऊपर जाते हुए कणों का आकार बढ़ता है; मोटे कण द्वार, ‘चो’ क्षेत्र और तराई में मिलते हैं

यह पोटाश, फास्फोरस और चूनायुक्त होती है, इसलिए गन्ने, चावल, गेहूँ और दलहन के लिए उपयुक्त है

जलोढ़ मृदा के दो प्रकार — आयु के आधार पर

बांगर

  • पुराना जलोढ़
  • इसमें ‘कंकर’ ग्रंथियों की मात्रा ज़्यादा होती है
  • तुलनात्मक रूप से कम उपजाऊ

खादर

  • नया जलोढ़
  • इसमें बांगर की तुलना में ज़्यादा महीन कण पाए जाते हैं
  • हर साल नयी मिट्टी जमा होने से अधिक उपजाऊ

जलोढ़ मृदा वाले क्षेत्रों में गहन कृषि होती है और इसीलिए वहाँ जनसंख्या घनत्व भी अधिक है

काली मृदा — ‘रेगर’ और ‘काली कपास मृदा’

पृष्ठ 7–9

  • कपास की खेती के लिए उचित समझी जाने के कारण इसे काली कपास मृदा भी कहा जाता है
  • “जलवायु और जनक शैलों ने काली मृदा के बनने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है” — ये लावा जनक शैलों से बनी हैं
  • दक्कन पठार (बेसाल्ट) के उत्तर-पश्चिमी भागों में; महाराष्ट्र, सौराष्ट्र, मालवा, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के पठार पर
  • दक्षिण-पूर्वी दिशा में गोदावरी और कृष्णा नदियों की घाटियों तक फैली है
  • बहुत महीन कणों अर्थात् मृत्तिका से बनी है; नमी धारण करने की क्षमता बहुत अधिक होती है

कैल्शियम कार्बोनेट, मैग्नीशियम, पोटाश और चूने से परिपूर्ण — पर फास्फोरस की मात्रा कम

काली मृदा की सबसे अनोखी बात

“गर्म और शुष्क मौसम में इन मृदाओं में गहरी दरारें पड़ जाती हैं, जिससे इनमें अच्छी तरह वायु मिश्रण हो जाता है। गीली होने पर ये मृदाएँ चिपचिपी हो जाती हैं और इनको जोतना मुश्किल होता है। इसलिए, इसकी जुताई मानसून प्रारंभ होने की पहली बौछार से ही शुरू कर दी जाती है।”

पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 9

यह तथ्य 3-अंक के प्रश्न में बहुत अच्छा लगता है — काली मिट्टी को गीली होने से पहले जोतना पड़ता है

लाल-पीली मृदा और लेटराइट मृदा

लाल और पीली मृदा

  • दक्कन पठार के पूर्वी और दक्षिणी हिस्सों में, रवेदार आग्नेय चट्टानों पर, कम वर्षा वाले भागों में
  • ओडिशा, छत्तीसगढ़, मध्य गंगा मैदान का दक्षिणी छोर, पश्चिमी घाट का पहाड़ी पद
  • लाल रंग — लौह धातु के प्रसार से
  • पीला रंग — जलयोजन से

लेटराइट मृदा

  • ग्रीक शब्द ‘लेटर’ (Later) से नाम, जिसका अर्थ है ईंट
  • आर्द्र और शुष्क ऋतुओं के एक के बाद एक आने से बनती है
  • भारी वर्षा से अत्यधिक निक्षालन (leaching) का परिणाम
  • गहरी तथा अम्लीय (pH<6.0); पोषक तत्त्वों की कमी

लेटराइट पर कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु में चाय और कॉफ़ी; और तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश तथा केरल की लाल लेटराइट पर काजू

मरुस्थली मृदा — यह आपके अपने राज्य की मृदा है

पृष्ठ 9–10

  • रंग लाल और भूरा; आम तौर पर रेतीली और लवणीय
  • कुछ क्षेत्रों में नमक इतना अधिक कि झीलों से जल वाष्पीकृत करके खाने का नमक बनाया जाता है
  • शुष्क जलवायु और उच्च तापमान से वाष्पीकरण दर अधिक; ह्यूमस और नमी की मात्रा कम
  • सतह के नीचे कैल्शियम बढ़ता जाता है और नीचे की परतों में चूने के कंकर की सतह मिलती है
  • इसके कारण मृदा में जल अंत:स्यंदन (infiltration) अवरुद्ध हो जाता है

“इस मृदा को सही तरीक़े से सिंचित करके कृषि योग्य बनाया जा सकता है, जैसा कि पश्चिमी राजस्थान में हो रहा है”

वन मृदा

पृष्ठ 10

  • आमतौर पर पहाड़ी और पर्वतीय क्षेत्रों में, जहाँ पर्याप्त वर्षा-वन उपलब्ध हैं
  • इनके गठन में पर्वतीय पर्यावरण के अनुसार बदलाव आता है
  • नदी घाटियों में ये मृदाएँ दोमट और सिल्टदार होती हैं
  • ऊपरी ढालों पर इनका गठन मोटे कणों का होता है
  • हिमालय के हिमाच्छादित क्षेत्रों में इनका बहुत अपरदन होता है और ये अधिसिलिक (acidic) तथा ह्यूमस रहित होती हैं

नदी घाटियों के निचले क्षेत्रों में, विशेषकर नदी सोपानों और जलोढ़ पंखों में ये मृदाएँ उपजाऊ होती हैं

9 | मृदा अपरदन और संरक्षण | मिट्टी कैसे बचाएँ

मृदा अपरदन क्या है

“मृदा के कटाव और उसके बहाव की प्रक्रिया को मृदा अपरदन कहा जाता है। मृदा के बनने और अपरदन की क्रियाएँ आमतौर पर साथ-साथ चलती हैं और दोनों में संतुलन होता है।”

पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 10

पर मानवीय क्रियाओं — वनोन्मूलन, अति पशुचारण, निर्माण और खनन — से यह संतुलन भंग हो जाता है

मृदा अपरदन के प्रकार

पृष्ठ 10

प्रकारकैसे होता हैउदाहरण
अवनलिका अपरदनबहता जल मृत्तिकायुक्त मृदाओं को काटते हुए गहरी वाहिकाएँ बनाता है — इन्हें अवनलिकाएँ कहते हैं—
उत्खात भूमिऐसी भूमि जोतने योग्य नहीं रहती — bad landचंबल बेसिन में इसे खड्ड (ravine) भूमि कहते हैं
चादर अपरदनजल ढाल के साथ नीचे बहता है और ऊपरी मृदा घुलकर बह जाती है—
पवन अपरदनपवन द्वारा मैदान या ढालू क्षेत्र से मृदा को उड़ा ले जाना—
ग़लत जुताई सेढाल पर ऊपर से नीचे की ओर हल चलाने से वाहिकाएँ बनती हैं—

मृदा संरक्षण के चार तरीक़े

पृष्ठ 10–11 — यह अभ्यास प्रश्न 2(iii) है

तरीक़ाकैसे काम करता हैकहाँ
समोच्च जुताईसमोच्च रेखाओं के समानांतर हल चलाने से ढाल के साथ जल बहाव की गति घटती हैढाल वाली भूमि पर
सोपान कृषिढाल पर सोपान बनाकर अपरदन नियंत्रित किया जाता हैपश्चिमी और मध्य हिमालय में काफ़ी विकसित
पट्टी कृषिफ़सलों के बीच घास की पट्टियाँ उगाना, जो पवनों के बल को कमज़ोर करती हैंबड़े खेतों में
रक्षक मेखलापेड़ों को कतारों में लगाना, जिससे पवनों की गति कम होती हैपश्चिम भारत में रेत के टीलों के स्थायीकरण में महत्त्वपूर्ण योगदान

आख़िरी पंक्ति फिर आपके राज्य की है — पश्चिमी राजस्थान में रेत के टीलों को रोकने के लिए रक्षक मेखला लगाई गई है

10 | समापन | पूरे अध्याय की एक तालिका

एक नज़र में पूरा अध्याय

आख़िरी दिन के लिए

भागमुख्य बात एक वाक्य में
संसाधन की परिभाषासंसाधन प्रकृति का उपहार नहीं, मानवीय क्रियाओं का परिणाम है
वर्गीकरणचार आधार — उत्पत्ति · समाप्यता · स्वामित्व · विकास का स्तर
संसाधन विकासअंधाधुंध उपयोग से तीन समस्याएँ — ह्रास · बँटवारा · पारिस्थितिकी संकट
सतत् पोषणीय विकासविकास ऐसा हो जो पर्यावरण को नुक़सान न पहुँचाए और भविष्य की पीढ़ियों का हक़ न छीने
संसाधन नियोजनतीन सोपान — पहचान · प्रौद्योगिकी · समन्वय
भू-संसाधनमैदान 43% · पर्वत 30% · पठार 27%; भू-उपयोग की पाँच श्रेणियाँ
भू-उपयोग प्रारूप32.8 लाख वर्ग किमी. में से 93% के आँकड़े; 54% पर खेती संभव; वन 33% चाहिए पर 23.3% है
भूमि निम्नीकरण13 करोड़ हेक्टेयर; कारण — खनन, अति पशुचारण, अधिक सिंचाई
मृदा के छह प्रकारजलोढ़, काली, लाल-पीली, लेटराइट, मरुस्थली और वन मृदा
मृदा अपरदनबचाव — समोच्च जुताई, सोपान, पट्टी कृषि और रक्षक मेखला

और सिर्फ़ छह आँकड़े अनिवार्य हैं

43-30-27

मैदान-पर्वत-पठार। बाक़ी पाँच — 32.8 लाख वर्ग किमी. (कुल क्षेत्रफल) · 93% (आँकड़े उपलब्ध) · 54% (खेती संभव) · 33% (वन नीति का लक्ष्य) · 13 करोड़ हेक्टेयर (निम्नीकृत भूमि)

इन छह के अलावा कोई आँकड़ा याद न भी रहे, तो भी अच्छे अंक आ जाएँगे

और राजस्थान इस अध्याय में चार बार आता है

RBSE की परीक्षा के लिए अनिवार्य

कहाँक्या
संसाधन नियोजनपवन और सौर ऊर्जा की बहुतायत, पर जल की कमी
संभावी संसाधनराजस्थान और गुजरात में पवन तथा सौर ऊर्जा
भूमि निम्नीकरणअति पशुचारण वाले राज्यों में शामिल
मरुस्थली मृदापश्चिमी राजस्थान में सिंचाई से कृषि योग्य बनाई जा रही है

हर बार रुककर सोचिए — “यह अपने राज्य की बात है”

पूरे अध्याय का निचोड़

संसाधन प्रकृति का उपहार नहीं, मानवीय क्रियाओं का परिणाम हैं। और जिसे बनाने में प्रकृति को लाखों वर्ष लगे, उसे बिगाड़ने में हमें कुछ ही साल लगते हैं।

अध्याय 1 का सार

गांधी जी के शब्दों में — “हमारे पास पेट भरने के लिए बहुत है, लेकिन पेटी भरने के लिए नहीं।”

और अब एक आख़िरी सवाल — तुम्हारे घर में कोई ऐसी चीज़ है जो ‘पेट’ के लिए नहीं, ‘पेटी’ के लिए ख़र्च हो रही है?