यह फ़ाइल परीक्षा से एक दिन पहले पढ़ने के लिए है। इसमें केवल वही बातें हैं जो परीक्षा में सबसे ज़्यादा पूछी जाती हैं। हर बात पूरे वाक्य में लिखी गई है, ताकि आप इसे सीधे उत्तर-पुस्तिका में उतार सकें।
पहले पूरी कहानी एक पैराग्राफ़ में
हम सोचते हैं कि औद्योगीकरण का मतलब केवल कारख़ाने हैं, पर यह ग़लत है। कारख़ानों से पहले भी यूरोप में अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार के लिए बड़े पैमाने पर उत्पादन होता था, जिसे ‘आदि-औद्योगीकरण’ कहते हैं। शहरों के गिल्ड बहुत ताक़तवर थे, इसलिए सौदागर गाँवों में जाकर किसानों से काम करवाने लगे। इंग्लैंड में पहले कारख़ाने 1730 के दशक में खुले और कपास नए युग का पहला प्रतीक बनी। पर औद्योगीकरण की रफ़्तार उतनी तेज़ नहीं थी जितनी हम सोचते हैं — नयी तकनीक महँगी थी, मशीनें ख़राब हो जाती थीं और उन्नीसवीं सदी की शुरुआत तक पूरे इंग्लैंड में भाप के सिर्फ़ 321 इंजन थे। ब्रिटेन में मज़दूर सस्ते थे, इसलिए उद्योगपति मशीनों की बजाय हाथ के श्रम को ही पसंद करते थे। उधर भारत में उलटा हुआ। पहले भारत के महीन कपड़े का दुनिया में दबदबा था, पर ईस्ट इंडिया कंपनी ने सत्ता मिलते ही गुमाश्ता नियुक्त करके बुनकरों को अपने शिकंजे में ले लिया। फिर मैनचेस्टर का सस्ता कपड़ा आया और भारतीय बुनकर का निर्यात बाज़ार भी ढह गया और स्थानीय बाज़ार भी सिकुड़ गया। 1854 में बंबई में पहली कपड़ा मिल लगी और भारतीय व्यवसायी उद्योग लगाने लगे, जिनकी पूँजी ज़्यादातर चीन के व्यापार से आई थी। पहले विश्व युद्ध ने भारतीय उद्योगों को असली मौक़ा दिया। पर सबसे अनोखी बात यह है कि भारत में हथकरघे ख़त्म नहीं हुए — 1900 से 1940 के बीच उनका उत्पादन तीन गुना हो गया।
भाग 1 — आदि-औद्योगीकरण (पूर्व-औद्योगीकरण)
परिभाषा — यह अभ्यास प्रश्न 3 है, शब्दश: याद कीजिए
“इंग्लैंड और यूरोप में फ़ैक्ट्रियों की स्थापना से भी पहले ही अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार के लिए बड़े पैमाने पर औद्योगिक उत्पादन होने लगा था। यह उत्पादन फ़ैक्ट्रियों में नहीं होता था। बहुत सारे इतिहासकार औद्योगीकरण के इस चरण को आदि-औद्योगीकरण (proto-industrialisation) का नाम देते हैं।”
‘आदि’ का अर्थ: किसी चीज़ की पहली या प्रारंभिक अवस्था का संकेत।
सौदागर गाँवों में क्यों गए — छह कारण (यह अभ्यास प्रश्न 1-ख है)
- विश्व व्यापार के विस्तार और उपनिवेशों की स्थापना के कारण चीज़ों की माँग बढ़ने लगी थी।
- इस माँग को पूरा करने के लिए केवल शहरों में रहते हुए उत्पादन नहीं बढ़ाया जा सकता था।
- शहरों में शहरी दस्तकारी और व्यापारिक गिल्ड्स काफ़ी ताक़तवर थे।
- गिल्ड्स उत्पादकों के संगठन होते थे, जो कारीगरों को प्रशिक्षण देते थे, उत्पादकों पर नियंत्रण रखते थे, प्रतिस्पर्धा और मूल्य तय करते थे तथा व्यवसाय में नए लोगों को आने से रोकते थे।
- शासकों ने भी विभिन्न गिल्ड्स को ख़ास उत्पादों के उत्पादन और व्यापार का एकाधिकार दिया हुआ था।
- फलस्वरूप नए व्यापारी शहरों में कारोबार नहीं कर सकते थे, इसलिए वे गाँवों की तरफ़ जाने लगे।
गाँव वाले क्यों तैयार हुए — चार कारण
- यह एक ऐसा समय था जब खुले खेत ख़त्म होते जा रहे थे और कॉमन्स की बाड़ाबंदी की जा रही थी।
- साझा ज़मीनों से जलावन की लकड़ी, बेरियाँ, सब्ज़ियाँ, भूसा और चारा बीनकर काम चलाने वाले छोटे किसान (कॉटेजर) और ग़रीब किसान आमदनी के नए स्रोत ढूँढ़ रहे थे।
- बहुतों के पास छोटे-मोटे खेत तो थे लेकिन उनसे घर के सारे लोगों का पेट नहीं भर सकता था।
- सौदागरों के लिए काम करते हुए वे गाँव में ही रहते हुए अपने छोटे-छोटे खेतों को भी सँभाल सकते थे, और उन्हें पूरे परिवार के श्रम संसाधनों के इस्तेमाल का मौक़ा भी मिल गया।
इंग्लैंड के कपड़ा व्यवसाय की शृंखला
स्टेप्लर (ऊन छाँटना) → कातने वाले (धागा) → बुनकर (कपड़ा) → फ़ुलर्स (समेटना) → रंगसाज़ (रंगना) → लंदन (फ़िनिशिंग) → अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार
तीन बातें ज़रूर लिखिए:
- यह आदि-औद्योगिक व्यवस्था व्यवसायिक आदान-प्रदान के नेटवर्क का हिस्सा थी।
- इस पर सौदागरों का नियंत्रण था और चीज़ों का उत्पादन कारख़ानों की बजाय घरों में होता था।
- उत्पादन के प्रत्येक चरण में प्रत्येक सौदागर 20–25 मज़दूरों से काम करवाता था, इसलिए कपड़ों के हर सौदागर के पास सैकड़ों मज़दूर काम करते थे।
भाग 2 — कारख़ानों का उदय
- इंग्लैंड में सबसे पहले 1730 के दशक में कारख़ाने खुले लेकिन उनकी संख्या में तेज़ी से इज़ाफ़ा अठारहवीं सदी के आख़िर में ही हुआ।
- कपास (कॉटन) नए युग का पहला प्रतीक थी।
- 1760 में ब्रिटेन अपने कपास उद्योग की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए 25 लाख पौंड कच्चे कपास का आयात करता था; 1787 में यह आयात बढ़कर 220 लाख पौंड तक पहुँच गया।
- अठारहवीं सदी के आविष्कारों ने उत्पादन प्रक्रिया के हर चरण — कार्डिंग, ऐंठना व कताई, और लपेटने — की कुशलता बढ़ा दी।
- इसके बाद रिचर्ड आर्कराइट ने सूती कपड़ा मिल की रूपरेखा सामने रखी।
मिल क्यों बनी — चार कारण:
- अभी तक कपड़ा उत्पादन पूरे देहात में फैला हुआ था और लोग यह काम अपने-अपने घर पर करते थे।
- अब महँगी नयी मशीनें ख़रीदकर उन्हें कारख़ानों में लगाया जा सकता था।
- कारख़ाने में सारी प्रक्रियाएँ एक छत के नीचे और एक मालिक के हाथों में आ गई थीं।
- इससे उत्पादन प्रक्रिया पर निगरानी, गुणवत्ता का ध्यान रखना और मज़दूरों पर नज़र रखना संभव हो गया, जो गाँवों में संभव नहीं था।
भाग 3 — औद्योगिक परिवर्तन की रफ़्तार (चार बातें)
पहली — कौन-से उद्योग सबसे तेज़ बढ़े?
- सूती उद्योग और कपास उद्योग ब्रिटेन के सबसे फलते-फूलते उद्योग थे और 1840 के दशक तक कपास सबसे बड़ा उद्योग बन चुका था।
- इसके बाद लोहा और स्टील उद्योग आगे निकल गए, क्योंकि 1840 के दशक से इंग्लैंड में और 1860 के दशक से उपनिवेशों में रेलवे का विस्तार होने लगा था।
- 1873 तक ब्रिटेन के लोहा और स्टील निर्यात का मूल्य लगभग 7.7 करोड़ पौंड हो गया था, जो कपास निर्यात के मूल्य से दोगुना था।
दूसरी — परंपरागत उद्योग ख़त्म नहीं हुए।
- उन्नीसवीं सदी के आख़िर में भी तकनीकी रूप से विकसित औद्योगिक क्षेत्र में काम करने वाले मज़दूरों की संख्या कुल मज़दूरों में 20 प्रतिशत से ज़्यादा नहीं थी।
- कपड़ा उद्योग गतिशील तो था लेकिन उसके उत्पादन का बड़ा हिस्सा कारख़ानों में नहीं बल्कि घरेलू इकाइयों में होता था।
तीसरी — परंपरागत उद्योगों में भी बदलाव आ रहे थे।
- खाद्य प्रसंस्करण, निर्माण, पॉटरी, काँच के काम, चर्मशोधन, फ़र्नीचर और औज़ारों के उत्पादन जैसे ग़ैर-मशीनी क्षेत्रों में जो तरक़्क़ी हो रही थी वह मुख्य रूप से साधारण और छोटे-छोटे आविष्कारों का ही परिणाम थी।
चौथी — तकनीक अपनाने की गति धीमी थी।
- नयी तकनीक महँगी थी और सौदागर व व्यापारी उनके इस्तेमाल के सवाल पर फूँक-फूँक कर क़दम बढ़ाते थे।
- मशीनें अकसर ख़राब हो जाती थीं और उनकी मरम्मत पर काफ़ी ख़र्चा आता था।
- वे उतनी अच्छी भी नहीं थीं जितना उनके आविष्कारकों और निर्माताओं का दावा था।
भाप के इंजन का उदाहरण — यह पूरा याद कीजिए
- जेम्स वॉट ने न्यूकोमेन द्वारा बनाए गए भाप के इंजन में सुधार किए और नए इंजन को पेटेंट करा लिया।
- इस मॉडल का उत्पादन उनके दोस्त उद्योगपति मैथ्यू बूल्टन ने किया, पर सालों तक उन्हें कोई ख़रीदार नहीं मिला।
- उन्नीसवीं सदी की शुरुआत तक पूरे इंग्लैंड में भाप के सिर्फ़ 321 इंजन थे। इनमें से 80 इंजन सूती उद्योगों में, 9 ऊन उद्योगों में और बाक़ी खनन, नहर निर्माण और लौह कार्यों में इस्तेमाल हो रहे थे।
- निष्कर्ष: “यानी मज़दूरों की उत्पादन क्षमता को कई गुना बढ़ाने की संभावना वाली सबसे शक्तिशाली प्रौद्योगिकी को अपनाने में भी उद्योगपति बहुत हिचकिचा रहे थे।”
- इसीलिए इतिहासकार अब मानते हैं कि “उन्नीसवीं सदी के मध्य का औसत मज़दूर मशीनों पर काम करने वाला नहीं बल्कि परंपरागत कारीगर और मज़दूर ही होता था।”
भाग 4 — हाथ का श्रम बनाम मशीन (सबसे ज़्यादा पूछा जाने वाला प्रश्न)
प्रश्न: “उन्नीसवीं सदी के यूरोप में कुछ उद्योगपति मशीनों की बजाय हाथ से काम करने वाले श्रमिकों को प्राथमिकता क्यों देते थे?”
| क्रम | कारण |
|---|---|
| 1 | विक्टोरिया कालीन ब्रिटेन में मानव श्रम की कोई कमी नहीं थी; ग़रीब किसान और बेकार लोग बड़ी संख्या में शहरों को जाते थे। |
| 2 | जब श्रमिकों की बहुतायत होती है तो वेतन गिर जाते हैं, इसलिए उद्योगपतियों को श्रमिकों की कमी या वेतन के मद में भारी लागत जैसी कोई परेशानी नहीं थी। उन्हें ऐसी मशीनों में कोई दिलचस्पी नहीं थी जिन पर बहुत ज़्यादा ख़र्चा आने वाला हो। |
| 3 | बहुत सारे उद्योगों में श्रमिकों की माँग मौसमी आधार पर घटती-बढ़ती रहती थी — गैसघरों और शराबख़ानों में जाड़ों में, बुक बाइंडरों और प्रिंटरों को क्रिसमस से पहले, और बंदरगाहों पर जहाज़ों की मरम्मत जाड़ों में। ऐसे उद्योगों में उद्योगपति मशीनों की बजाय मज़दूरों को ही काम पर रखना पसंद करते थे। |
| 4 | मशीनों से एक जैसे तय क़िस्म के उत्पाद ही बड़ी संख्या में बनाए जा सकते थे, लेकिन बाज़ार में बारीक डिज़ाइन और ख़ास आकारों वाली चीज़ों की काफ़ी माँग रहती थी। ब्रिटेन में उन्नीसवीं सदी के मध्य में 500 तरह के हथौड़े और 45 तरह की कुल्हाड़ियाँ बनाई जा रही थीं, जिनके लिए यांत्रिक प्रौद्योगिकी नहीं बल्कि इनसानी निपुणता की ज़रूरत थी। |
| 5 | विक्टोरिया कालीन ब्रिटेन में उच्च वर्ग के लोग — कुलीन और पूँजीपति वर्ग — हाथों से बनी चीज़ों को तरजीह देते थे, क्योंकि उन्हें परिष्कार और सुरुचि का प्रतीक माना जाता था। |
अंत में यह वाक्य ज़रूर लिखिए: “मशीनों से बनने वाले उत्पादों को उपनिवेशों में निर्यात कर दिया जाता था।”
अमेरिका से तुलना: “जिन देशों में मज़दूरों की कमी होती है वहाँ उद्योगपति मशीनों का इस्तेमाल करना ज़्यादा पसंद करते हैं। उन्नीसवीं सदी के अमेरिका में यही स्थिति थी। लेकिन ब्रिटेन में कामगारों की कोई कमी नहीं थी।”
भाग 5 — मज़दूरों की ज़िंदगी
नौकरी कैसे मिलती थी:
- नौकरी मिलने की संभावना यारी-दोस्ती, कुनबे-कुटुंब के ज़रिए जान-पहचान पर निर्भर करती थी।
- सबके पास ऐसे सामाजिक संपर्क नहीं होते थे; रोज़गार चाहने वाले बहुत सारे लोगों को हफ़्तों इंतज़ार करना पड़ता था।
- वे पुलों के नीचे या रैन-बसेरों में रातें काटते थे और बहुत सारे निर्धन क़ानून विभाग द्वारा चलाए जाने वाले अस्थायी बसेरों में रुकते थे।
वेतन का सच:
- उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में वेतन में कुछ सुधार आया, लेकिन इससे मज़दूरों की हालत में बेहतरी का पता नहीं चलता।
- लंबे नेपोलियनी युद्ध के दौरान क़ीमतें तेज़ी से बढ़ीं तो मज़दूरों की आय के वास्तविक मूल्य में भारी कमी आ गई — उन्हें वेतन तो पहले जितना मिलता था लेकिन उससे वे पहले जितनी चीज़ें नहीं ख़रीद सकते थे।
- मज़दूरों की आमदनी सिर्फ़ वेतन दर पर नहीं, रोज़गार की अवधि पर भी निर्भर होती थी।
आँकड़े:
- उन्नीसवीं सदी के मध्य में सबसे अच्छे हालात में भी लगभग 10 प्रतिशत शहरी आबादी निहायत ग़रीब थी।
- 1830 के दशक में आई आर्थिक मंदी जैसे दौरों में बेरोज़गारों की संख्या विभिन्न क्षेत्रों में 35 से 75 प्रतिशत तक पहुँच जाती थी।
स्पिनिंग जेनी पर हमले (अभ्यास प्रश्न 1-क):
“बेरोज़गारी की आशंका के कारण मज़दूर नयी प्रौद्योगिकी से चिढ़ते थे। जब ऊन उद्योग में स्पिनिंग जेनी मशीन का इस्तेमाल शुरू किया गया तो हाथ से ऊन कातने वाली औरतें इस तरह की मशीनों पर हमला करने लगीं। जेनी के इस्तेमाल पर यह टकराव लंबे समय तक चलता रहा।”
स्पिनिंग जेनी क्या थी: जेम्स हरग्रीव्ज़ द्वारा 1764 में बनाई गई इस मशीन ने कताई की प्रक्रिया तेज़ कर दी और मज़दूरों की माँग घटा दी। एक ही पहिया घुमाने वाला एक मज़दूर बहुत सारी तकलियों को घुमा देता था और एक साथ कई धागे बनने लगते थे।
1840 के दशक के बाद: शहरों में निर्माण की गतिविधियाँ तेज़ी से बढ़ीं — सड़कें चौड़ी हुईं, नए रेलवे स्टेशन बने, सुरंगें बनीं, निकासी और सीवर व्यवस्था बिछाई गई और नदियों के तटबंध बनाए गए। परिवहन उद्योग में काम करने वालों की संख्या 1840 के दशक में दोगुना और अगले 30 सालों में एक बार फिर दोगुना हो गई।
भाग 6 — भारत का कपड़ा और सूरत का पतन
पहले भारत का दबदबा था:
- मशीन उद्योगों के युग से पहले अंतर्राष्ट्रीय कपड़ा बाज़ार में भारत के रेशमी और सूती उत्पादों का ही दबदबा रहता था।
- बहुत सारे देशों में मोटा कपास पैदा होता था लेकिन भारत में पैदा होने वाला कपास महीन क़िस्म का था।
| रास्ता | विवरण |
|---|---|
| ज़मीन का रास्ता | आर्मीनियन और फ़ारसी सौदागर पंजाब से अफ़ग़ानिस्तान, पूर्वी फ़ारस और मध्य एशिया के रास्ते चीज़ें ले जाते थे; कपड़ों के थान ऊँटों की पीठ पर लाद कर पश्चिमोत्तर सीमा से पहाड़ी दर्रों और रेगिस्तानों के पार जाते थे |
| समुद्री रास्ता | गुजरात के तट पर स्थित सूरत बंदरगाह के ज़रिए भारत खाड़ी और लाल सागर के बंदरगाहों से जुड़ा था; कोरोमंडल तट पर मछलीपटनम और बंगाल में हुगली के माध्यम से भी दक्षिण-पूर्वी एशियाई बंदरगाहों के साथ व्यापार चलता था |
सूरत हाशिये पर कैसे पहुँचा (अभ्यास प्रश्न 1-ग) — पाँच बिंदु:
- यूरोपीय कंपनियों की ताक़त बढ़ती जा रही थी।
- पहले उन्होंने स्थानीय दरबारों से कई तरह की रियायतें हासिल कीं।
- उसके बाद उन्होंने व्यापार पर इज़ारेदारी अधिकार प्राप्त कर लिए।
- इससे सूरत व हुगली, दोनों पुराने बंदरगाह कमज़ोर पड़ गए और इनसे होने वाले निर्यात में नाटकीय कमी आई।
- पहले जिस क़र्ज़ से व्यापार चलता था वह ख़त्म होने लगा और धीरे-धीरे स्थानीय बैंकर दिवालिया हो गए।
आँकड़ा: सत्रहवीं सदी के आख़िरी सालों में सूरत बंदरगाह से होने वाले व्यापार का कुल मूल्य 1.6 करोड़ रुपये था; 1740 के दशक तक यह गिर कर केवल 30 लाख रुपये रह गया।
नए बंदरगाह: सूरत व हुगली कमज़ोर पड़ रहे थे और बंबई व कलकत्ता की स्थिति सुधर रही थी। पुराने बंदरगाहों की जगह नए बंदरगाहों का बढ़ता महत्त्व औपनिवेशिक सत्ता की बढ़ती ताक़त का संकेत था।
भाग 7 — गुमाश्ता और बुनकरों की तबाही
पहले बुनकर की स्थिति अच्छी थी:
- 1760 और 1770 के दशकों में बंगाल और कर्नाटक में राजनीतिक सत्ता स्थापित करने से पहले कंपनी को निर्यात के लिए लगातार सप्लाई आसानी से नहीं मिल पाती थी।
- फ़्रांसीसी, डच और पुर्तगालियों के साथ-साथ स्थानीय व्यापारी भी होड़ में रहते थे।
- इस प्रकार बुनकर और आपूर्ति सौदागर ख़ूब मोल-भाव करते थे और अपना माल सबसे ऊँची बोली लगाने वाले ख़रीदार को ही बेचते थे।
सत्ता मिलते ही कंपनी ने दो काम किए (यह ‘चर्चा करें’ प्रश्न 2 है):
पहला — गुमाश्ता की नियुक्ति (अभ्यास प्रश्न 1-घ):
- कंपनी ने कपड़ा व्यापार में सक्रिय व्यापारियों और दलालों को ख़त्म करने तथा बुनकरों पर ज़्यादा प्रत्यक्ष नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश की।
- कंपनी ने बुनकरों पर निगरानी रखने, माल इकट्ठा करने और कपड़ों की गुणवत्ता जाँचने के लिए वेतनभोगी कर्मचारी तैनात कर दिए जिन्हें गुमाश्ता कहा जाता था।
दूसरा — पेशगी और पाबंदी:
- कंपनी को माल बेचने वाले बुनकरों को अन्य ख़रीदारों के साथ कारोबार करने पर पाबंदी लगा दी गई।
- इसके लिए उन्हें पेशगी रक़म दी जाती थी और काम का ऑर्डर मिलने पर कच्चा माल ख़रीदने के लिए क़र्ज़ा दे दिया जाता था।
- जो क़र्ज़ा लेते थे उन्हें अपना बनाया हुआ कपड़ा गुमाश्ता को ही देना पड़ता था; वे उसे किसी और व्यापारी को नहीं बेच सकते थे।
टकराव क्यों हुआ:
- पहले आपूर्ति सौदागर बुनकर गाँवों में ही रहते थे, बुनकरों से उनके नज़दीकी ताल्लुक़ात होते थे, वे उनकी ज़रूरतों का ख़याल रखते थे और संकट के समय उनकी मदद करते थे।
- नए गुमाश्ता बाहर के लोग थे और उनका गाँवों से पुराना सामाजिक संबंध नहीं था।
- वे दंभपूर्ण व्यवहार करते थे, सिपाहियों व चपरासियों को लेकर आते थे और माल समय पर तैयार न होने पर बुनकरों को सज़ा देते थे — उन्हें अकसर पीटा जाता था और कोड़े बरसाए जाते थे।
- अब बुनकर न तो दाम पर मोलभाव कर सकते थे और न ही किसी और को माल बेच सकते थे।
बुनकरों का विरोध — तीन तरीक़े:
- कर्नाटक और बंगाल में बहुत सारे स्थानों पर बुनकर गाँव छोड़ कर चले गए और अपने रिश्तेदारों के यहाँ किसी और गाँव में करघा लगा लेते थे।
- कई स्थानों पर कंपनी और उसके अफ़सरों का विरोध करते हुए गाँव के व्यापारियों के साथ मिलकर बुनकरों ने बग़ावत कर दी।
- बहुत सारे बुनकर क़र्ज़ा लौटाने से इनकार करने लगे, उन्होंने करघे बंद कर दिए और खेतों में मज़दूरी करने लगे।
भाग 8 — मैनचेस्टर का आना (सबसे महत्त्वपूर्ण भाग)
1772 में ईस्ट इंडिया कंपनी के अफ़सर हेनरी पतुलो ने कहा था कि भारतीय कपड़े की माँग कभी कम नहीं हो सकती क्योंकि दुनिया के किसी और देश में इतना अच्छा माल नहीं बनता। पर हुआ इसका उलटा।
| वर्ष | भारत के कुल निर्यात में सूती माल का हिस्सा |
|---|---|
| 1811–12 | 33 प्रतिशत |
| 1850–51 | मात्र 3 प्रतिशत |
ऐसा क्यों हुआ — दो दबाव:
- जब इंग्लैंड में कपास उद्योग विकसित हुआ तो वहाँ के उद्योगपतियों ने सरकार पर दबाव डाला कि वह आयातित कपड़ों पर आयात शुल्क वसूल करे, जिससे मैनचेस्टर में बने कपड़े बाहरी प्रतिस्पर्धा के बिना इंग्लैंड में आराम से बिक सकें।
- दूसरी तरफ़ उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी पर दबाव डाला कि वह ब्रिटिश कपड़ों को भारतीय बाज़ारों में भी बेचे।
| वर्ष | भारतीय आयात में सूती कपड़े का हिस्सा |
|---|---|
| अठारहवीं सदी के आख़िर में | न के बराबर |
| 1850 | 31 प्रतिशत |
| 1870 | 50 प्रतिशत से ऊपर |
बुनकर के सामने दो समस्याएँ एक साथ — यह वाक्य ज़रूर लिखिए:
“इस प्रकार भारत में कपड़ा बुनकरों के सामने एक-साथ दो समस्याएँ थीं। उनका निर्यात बाज़ार ढह रहा था और स्थानीय बाज़ार सिकुड़ने लगा था।”
तीसरी मार — कच्चे माल की समस्या (1860 का दशक):
- जब अमेरिकी गृहयुद्ध शुरू हुआ और अमेरिका से कपास की आमद बंद हो गई तो ब्रिटेन भारत से कच्चा माल मँगाने लगा।
- भारत से कच्चे कपास के निर्यात में इस वृद्धि से उसकी क़ीमत आसमान छूने लगी।
- भारतीय बुनकरों को कच्चे माल के लाले पड़ गए और उन्हें मनमानी क़ीमत पर कच्ची कपास ख़रीदनी पड़ती थी।
चौथी मार: उन्नीसवीं सदी के आख़िर में भारतीय कारख़ानों में उत्पादन होने लगा और बाज़ार मशीनों की बनी चीज़ों से पट गया।
भाग 9 — भारत में फ़ैक्ट्रियों का आना
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1854 | बंबई में पहली कपड़ा मिल लगी; दो साल बाद उत्पादन शुरू |
| 1855 | बंगाल में देश की पहली जूट मिल |
| 1862 | बंबई में चार मिलें (94,000 तकलियाँ और 2,150 करघे); दूसरी जूट मिल |
| 1860 का दशक | कानपुर में एल्गिन मिल |
| 1861 | अहमदाबाद की पहली कपड़ा मिल |
| 1874 | मद्रास में पहली कताई और बुनाई मिल |
पूँजी कहाँ से आई — चार उद्यमी याद कीजिए
सबसे बड़ा स्रोत चीन का व्यापार था। अठारहवीं सदी के आख़िर से अंग्रेज़ भारतीय अफ़ीम का चीन को निर्यात करने लगे थे और उसके बदले चीन से चाय ख़रीदते थे। इस व्यापार में बहुत सारे भारतीय कारोबारी सहायक की हैसियत में पहुँच गए थे और व्यापार से पैसा कमाने के बाद उनमें से कुछ भारत में औद्योगिक उद्यम स्थापित करना चाहते थे।
| उद्यमी | विवरण |
|---|---|
| द्वारकानाथ टैगोर (बंगाल) | चीन के व्यापार से कमाकर 1830–1840 के दशकों में 6 संयुक्त उद्यम कंपनियाँ लगाईं; 1840 के दशक के व्यावसायिक संकटों में उनके उद्यम बैठ गए |
| डिनशॉ पेटिट और जमशेदजी नुसरवानजी टाटा (बंबई) | इन पारसियों ने आंशिक रूप से चीन को निर्यात करके और आंशिक रूप से इंग्लैंड को कच्ची कपास निर्यात करके पैसा कमाया |
| सेठ हुकुमचंद (कलकत्ता) | मारवाड़ी व्यवसायी; 1917 में देश की पहली जूट मिल लगाई |
| जी.डी. बिड़ला के पिता और दादा | इन्होंने भी चीन के साथ व्यापार किया था |
भारतीय व्यवसायियों के लिए जगह सिकुड़ती गई — यह ज़रूर लिखिए:
- उन्हें अपना तैयार माल यूरोप में बेचने से रोक दिया गया।
- अब वे मुख्य रूप से कच्चे माल और अनाज — कच्ची कपास, अफ़ीम, गेहूँ और नील — का ही निर्यात कर सकते थे जिनकी अंग्रेज़ों को ज़रूरत थी।
- धीरे-धीरे उन्हें जहाज़रानी व्यवसाय से भी बाहर धकेल दिया गया।
यूरोपीय प्रबंधकीय एजेंसियाँ: बर्ड हीगलर्स एंड कंपनी, एंड्रयू यूल, और जार्डीन स्किनर एंड कंपनी सबसे बड़ी कंपनियाँ थीं। ये पूँजी जुटाती थीं, संयुक्त उद्यम कंपनियाँ लगाती थीं और उनका प्रबंधन सँभालती थीं। ज़्यादातर मामलों में भारतीय वित्तपोषक पूँजी उपलब्ध कराते थे जबकि निवेश और व्यवसाय से संबंधित फ़ैसले यूरोपीय एजेंसियाँ लेती थीं।
भाग 10 — मज़दूर कहाँ से आए और जॉबर कौन था
| वर्ष | भारतीय फ़ैक्ट्रियों में मज़दूर |
|---|---|
| 1901 | 5,84,000 |
| 1946 | 24,36,000 |
- ज़्यादातर औद्योगिक इलाक़ों में मज़दूर आसपास के ज़िलों से आते थे।
- 1911 में बंबई के सूती कपड़ा उद्योग में काम करने वाले 50 प्रतिशत से ज़्यादा मज़दूर पास के रत्नागिरी ज़िले से आए थे।
- कानपुर की मिलों में काम करने वाले ज़्यादातर कानपुर ज़िले के ही गाँवों से आते थे।
- मिल मज़दूर बीच-बीच में अपने गाँव जाते रहते थे; वे फ़सलों की कटाई व त्योहारों के समय गाँव लौट जाते थे।
- बाद में संयुक्त प्रांत के लोग बंबई के कपड़ा मिलों और कलकत्ता के जूट मिलों में काम करने पहुँच रहे थे।
जॉबर — यह पक्का याद कीजिए:
- उद्योगपति नए मज़दूरों की भर्ती के लिए प्राय: एक जॉबर रखते थे।
- जॉबर कोई पुराना और विश्वस्त कर्मचारी होता था।
- वह अपने गाँव से लोगों को लाता था, उन्हें काम का भरोसा देता था, उन्हें शहर में जमने के लिए मदद देता था और मुसीबत में पैसे से मदद करता था।
- इस प्रकार जॉबर ताक़तवर और मज़बूत व्यक्ति बन गया था।
- बाद में जॉबर मदद के बदले पैसे व तोहफ़ों की माँग करने लगे और मज़दूरों की ज़िंदगी को नियंत्रित करने लगे।
- इन्हें अलग-अलग इलाक़ों में ‘सरदार’ या ‘मिस्त्री’ आदि भी कहते थे।
भाग 11 — पहला विश्व युद्ध और भारतीय उद्योग
प्रश्न: “पहले विश्व युद्ध के समय भारत का औद्योगिक उत्पादन क्यों बढ़ा?”
| क्रम | कारण |
|---|---|
| 1 | ब्रिटिश कारख़ाने सेना की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए युद्ध संबंधी उत्पादन में व्यस्त थे, इसलिए भारत में मैनचेस्टर के माल का आयात कम हो गया। |
| 2 | भारतीय बाज़ारों को रातोंरात एक विशाल देशी बाज़ार मिल गया। |
| 3 | युद्ध लंबा खिंचा तो भारतीय कारख़ानों में भी फ़ौज के लिए जूट की बोरियाँ, फ़ौजियों के लिए वर्दी के कपड़े, टेंट और चमड़े के जूते, घोड़े व खच्चर की जीन तथा बहुत सारे अन्य सामान बनने लगे। |
| 4 | नए कारख़ाने लगाए गए और पुराने कारख़ाने कई पालियों में चलने लगे। |
| 5 | बहुत सारे नए मज़दूरों को काम पर रखा गया और हरेक को पहले से भी ज़्यादा समय तक काम करना पड़ता था। |
युद्ध के बाद: भारतीय बाज़ार में मैनचेस्टर को पहले वाली हैसियत कभी हासिल नहीं हो पाई। आधुनिकीकरण न कर पाने और अमेरिका, जर्मनी व जापान के मुक़ाबले कमज़ोर पड़ जाने के कारण ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था चरमरा गई थी। उपनिवेशों में विदेशी उत्पादों को हटाकर स्थानीय उद्योगपतियों ने घरेलू बाज़ारों पर क़ब्ज़ा कर लिया।
युद्ध से पहले के तीन बदलाव भी याद रखिए:
- स्वदेशी आंदोलन को गति मिलने से राष्ट्रवादियों ने लोगों को विदेशी कपड़े के बहिष्कार के लिए प्रेरित किया।
- औद्योगिक समूह अपने सामूहिक हितों की रक्षा के लिए संगठित हो गए और उन्होंने आयात शुल्क बढ़ाने तथा अन्य रियायतें देने के लिए सरकार पर दबाव डाला।
- 1906 के बाद चीन भेजे जाने वाले भारतीय धागे के निर्यात में कमी आने लगी, इसलिए भारत के उद्योगपति धागे की बजाय कपड़ा बनाने लगे। 1900 से 1912 के बीच भारत में सूती कपड़े का उत्पादन दोगुना हो गया।
भाग 12 — भारत के औद्योगिक विकास का अनूठापन
बड़े उद्योगों का हिस्सा बहुत छोटा था:
| आँकड़ा | विवरण |
|---|---|
| 1911 | बड़े उद्योगों में से 67 प्रतिशत बंगाल और बंबई में स्थित थे |
| 1911 | पंजीकृत फ़ैक्ट्रियों में कुल औद्योगिक श्रम शक्ति का केवल 5 प्रतिशत काम करता था |
| 1931 | यह संख्या बढ़कर 10 प्रतिशत हुई |
| बाक़ी मज़दूर | गली-मोहल्लों में स्थित छोटी-छोटी वर्कशॉप और घरेलू इकाइयों में काम करते थे |
| 1900–1940 | हथकरघों पर बने कपड़े का उत्पादन तीन गुना हो गया |
हथकरघे क्यों बचे रहे — तीन कारण:
पहला — फ़्लाई शटल।
- अगर लागत में बहुत ज़्यादा इज़ाफ़ा न हो और उत्पादन बढ़ सकता हो तो हाथ से काम करने वालों को नयी तकनीक अपनाने में कोई परेशानी नहीं होती।
- बीसवीं सदी के दूसरे दशक तक बुनकर फ़्लाई शटल वाले करघों का इस्तेमाल करने लगे थे। इससे कामगारों की उत्पादन क्षमता बढ़ी, उत्पादन तेज़ हुआ और श्रम की माँग में कमी आई।
- 1941 तक भारत में 35 प्रतिशत से ज़्यादा हथकरघों में फ़्लाई शटल लगे हुए थे; त्रावणकोर, मद्रास, मैसूर, कोचीन और बंगाल में तो यह 70 से 80 प्रतिशत तक था।
फ़्लाई शटल क्या है: यह रस्सियों और पुलियों के ज़रिए चलने वाला एक यांत्रिक औज़ार है जिसका बुनाई के लिए इस्तेमाल किया जाता है। यह क्षैतिज धागे (ताना) को लम्बवत् धागे (बाना) में पिरो देती है। इसके आविष्कार से बुनकरों को बड़े करघे चलाना और चौड़े अरज का कपड़ा बनाने में काफ़ी मदद मिली।
दूसरा — महीन कपड़े की माँग स्थिर रहती थी।
- मोटे कपड़े को मुख्य रूप से ग़रीब ही ख़रीदते थे और उसकी माँग में भारी उतार-चढ़ाव आते थे। ख़राब फ़सल और अकाल के समय वे कपड़ा नहीं ख़रीद सकते थे।
- बेहतर क़िस्म के कपड़े की माँग खाते-पीते तबक़े में ज़्यादा थी और उसमें उतार-चढ़ाव कम आते थे। जब ग़रीब भूखों मर रहे होते थे तब भी अमीर यह कपड़ा ख़रीद सकते थे।
- अकालों से बनारसी या बालूचरी साड़ियों की बिक्री पर असर नहीं पड़ता था।
तीसरा — मिलें कुछ चीज़ें बना ही नहीं सकती थीं।
- मिल विशेष प्रकार की बुनाई की नक़ल नहीं कर सकते थे।
- बुने हुए बॉर्डर वाली साड़ियों या मद्रास की प्रसिद्ध लुंगियों की जगह ले लेना मिलों के लिए आसान नहीं था।
पर बुनकर की ज़िंदगी आसान नहीं थी — यह अंत ज़रूर लिखिए:
“उनकी ज़िंदगी बहुत कठोर थी। उन्हें दिन-रात काम करना पड़ता था। अकसर पूरा परिवार — बच्चे, बूढ़े, औरतें — उत्पादन के किसी न किसी काम में हाथ बढ़ाता था। लेकिन ये फ़ैक्ट्रियों के युग में अतीत के अवशेष भर नहीं थे। उनका जीवन और श्रम औद्योगीकरण की प्रक्रिया का अभिन्न अंग थे।”
भाग 13 — विज्ञापन और नयी उपभोक्ता संस्कृति
विज्ञापन की भूमिका:
- विज्ञापन विभिन्न उत्पादों को ज़रूरी और वांछनीय बना देते हैं। वे लोगों की सोच बदल देते हैं और नयी ज़रूरतें पैदा कर देते हैं।
- औद्योगीकरण की शुरुआत से ही विज्ञापनों ने विभिन्न उत्पादों के बाज़ार को फैलाने में और एक नयी उपभोक्ता संस्कृति रचने में अपनी भूमिका निभाई है।
लेबल के तीन फ़ायदे:
- ख़रीदारों को कंपनी का नाम व उत्पादन की जगह पता चल जाती थी।
- लेबल ही चीज़ों की गुणवत्ता का प्रतीक भी था।
- जब किसी लेबल पर मोटे अक्षरों में ‘मेड इन मैनचेस्टर’ लिखा दिखाई देता तो ख़रीदारों को कपड़ा ख़रीदने में किसी तरह का डर नहीं रहता था।
देवी-देवताओं का इस्तेमाल:
- लेबलों पर भारतीय देवी-देवताओं की तसवीरें प्राय: होती थीं।
- देवी-देवताओं की तसवीर के बहाने निर्माता यह दिखाने की कोशिश करते थे कि ईश्वर भी चाहता है कि लोग उस चीज़ को ख़रीदें।
- कृष्ण या सरस्वती की तसवीरों का फ़ायदा यह होता था कि विदेशों में बनी चीज़ भी भारतीयों को जानी-पहचानी सी लगती थी।
कैलेंडर की भूमिका:
- अख़बारों और पत्रिकाओं को तो पढ़े-लिखे लोग ही समझ सकते थे लेकिन कैलेंडर उनको भी समझ में आ जाते थे जो पढ़ नहीं सकते थे।
- चाय की दुकानों, दफ़्तरों व मध्यवर्गीय घरों में ये कैलेंडर लटकते रहते थे।
- जो इन कैलेंडरों को लगाते थे वे विज्ञापन को भी हर रोज़, पूरे साल देखते थे।
महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों का इस्तेमाल: देवताओं की तसवीरों की तरह महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों, सम्राटों व नवाबों की तसवीरें भी विज्ञापनों व कैलेंडरों में ख़ूब इस्तेमाल होती थीं। इनका संदेश यह होता था कि अगर आप इस शाही व्यक्ति का सम्मान करते हैं तो इस उत्पाद का भी सम्मान कीजिए।
भारतीय विज्ञापन: जब भारतीय निर्माताओं ने विज्ञापन बनाए तो उनमें राष्ट्रवादी संदेश साफ़ दिखाई देता था। इनका आशय यह था कि अगर आप राष्ट्र की परवाह करते हैं तो उन चीज़ों को ख़रीदिए जिन्हें भारतीयों ने बनाया है। ये विज्ञापन स्वदेशी के राष्ट्रवादी संदेश के वाहक बन गए थे।
भाग 14 — निष्कर्ष
“ज़ाहिर है कि उद्योगों के युग में बड़े-बड़े प्रौद्योगिकीय बदलाव आए हैं, फ़ैक्ट्रियों का उदय हुआ है और नयी औद्योगिक श्रमशक्ति अस्तित्व में आई है। लेकिन इस युग में हाथ से बनने वाली चीज़ें और छोटे पैमाने का उत्पादन भी औद्योगिक भूदृश्य का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा रहा है।”
अंत में — याद रखने के आसान तरीक़े
1. पूरा अध्याय एक वाक्य में
“औद्योगीकरण न इतना तेज़ था, न इतना सबके लिए फ़ायदेमंद, जितना उसकी तसवीरें दिखाती हैं।”
2. दो देशों की उलटी कहानी — यह तालिका पक्की कर लीजिए
| ब्रिटेन | भारत | |
|---|---|---|
| मज़दूर | बहुत थे, इसलिए मशीन कम अपनाई गई | बहुत थे, पर उनका रोज़गार मशीन ने छीन लिया |
| कपास | आयात 1760 में 25 लाख से बढ़कर 1787 में 220 लाख पौंड | निर्यात में सूती माल 33% से घटकर 3% रह गया |
| मोड़ का साल | 1840 का दशक (रेलवे और लोहा-स्टील) | पहला विश्व युद्ध |
3. चार आँकड़े — बस इतना पक्का कर लीजिए 321 भाप के इंजन · 33% → 3% भारत का सूती निर्यात · 1854 बंबई की पहली मिल · तीन गुना हथकरघा उत्पादन (1900–1940)
4. तीन शब्द जो हर साल पूछे जाते हैं आदि-औद्योगीकरण · गुमाश्ता · जॉबर
5. उत्तर लिखने का नियम इस अध्याय के हर बड़े उत्तर में कम से कम एक आँकड़ा और एक नाम ज़रूर लिखिए। आँकड़ा दिखाता है कि आपने पढ़ा है, और नाम दिखाता है कि आपने समझा है।