Chapter 4औद्योगीकरण का युग

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इस फ़ाइल में हर प्रश्न के साथ पूरा लिखा हुआ उत्तर दिया गया है। पहले उत्तर पढ़िए, फिर पुस्तक बंद करके वही उत्तर अपनी कॉपी में लिखिए, और अंत में मिलाकर देखिए कि कौन-सी बात छूट गई।


उत्तर लिखने का तरीक़ा

अंकउत्तर की लंबाईकैसे लिखें
1 अंकएक वाक्यसीधे उत्तर लिखिए, भूमिका मत बाँधिए
2 अंकलगभग 30 से 40 शब्द, या 2 बिंदुपहले एक वाक्य में उत्तर, फिर एक वाक्य में कारण या उदाहरण
3 अंकलगभग 60 से 80 शब्द, या 3 बिंदुतीन अलग-अलग बातें लिखिए; हर बात पूरे वाक्य में
4 अंकलगभग 100 से 120 शब्द, या 4 से 5 बिंदुएक वाक्य की भूमिका, फिर चार बिंदु, फिर एक वाक्य का निष्कर्ष
स्रोत-आधारितजो पूछा है बस वहीउत्तर गद्यांश में ही छिपा होता है; उसी की भाषा इस्तेमाल कीजिए

इस अध्याय के लिए एक विशेष सलाह। इस अध्याय में आँकड़े और नाम, दोनों बहुत हैं। हर बड़े उत्तर में कम से कम एक आँकड़ा और एक नाम ज़रूर लिखिए। आँकड़ा दिखाता है कि आपने पढ़ा है, और नाम दिखाता है कि आपने समझा है।

भाग क — वस्तुनिष्ठ प्रश्न (1 अंक)

1‘आदि’ शब्द का क्या अर्थ है?

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उत्तर: किसी चीज़ की पहली या प्रारंभिक अवस्था का संकेत।

2आदि-औद्योगीकरण किसे कहते हैं?

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उत्तर: इंग्लैंड और यूरोप में फ़ैक्ट्रियों की स्थापना से पहले अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार के लिए बड़े पैमाने पर होने वाले उस औद्योगिक उत्पादन को आदि-औद्योगीकरण कहते हैं, जो फ़ैक्ट्रियों में नहीं बल्कि घरों में होता था।

3गिल्ड क्या थे?

उत्तर देखिए

उत्तर: गिल्ड्स उत्पादकों के संगठन होते थे, जो कारीगरों को प्रशिक्षण देते थे, उत्पादकों पर नियंत्रण रखते थे, प्रतिस्पर्धा और मूल्य तय करते थे तथा व्यवसाय में नए लोगों को आने से रोकते थे।

4‘कॉटेजर’ किसे कहते थे?

उत्तर देखिए

उत्तर: वे छोटे किसान, जो साझा ज़मीनों से जलावन की लकड़ी, बेरियाँ, सब्ज़ियाँ, भूसा और चारा बीनकर अपनी रोज़ी-रोटी चलाते थे।

5स्टेप्लर कौन होता था?

उत्तर देखिए

उत्तर: ऐसा व्यक्ति जो रेशों के हिसाब से ऊन को ‘स्टेपल’ करता है या छाँटता है।

6फ़ुलर कौन होता था?

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उत्तर: ऐसा व्यक्ति जो ‘फुल’ करता है यानी चुनटों के सहारे कपड़े को समेटता है।

7कार्डिंग क्या है?

उत्तर देखिए

उत्तर: वह प्रक्रिया जिसमें कपास या ऊन आदि रेशों को कताई के लिए तैयार किया जाता है।

8इंग्लैंड में लंदन को किस नाम से जाना जाता था और क्यों?

उत्तर देखिए

उत्तर: लंदन को फ़िनिशिंग सेंटर के रूप में जाना जाता था, क्योंकि वहीं कपड़ों की फ़िनिशिंग होती थी।

9आदि-औद्योगिक व्यवस्था में एक सौदागर हर चरण में कितने मज़दूरों से काम करवाता था?

उत्तर देखिए

उत्तर: 20 से 25 मज़दूरों से; इसका मतलब यह था कि कपड़ों के हर सौदागर के पास सैकड़ों मज़दूर काम करते थे।

10इंग्लैंड में सबसे पहले कारख़ाने कब खुले?

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उत्तर: 1730 के दशक में, लेकिन उनकी संख्या में तेज़ी से इज़ाफ़ा अठारहवीं सदी के आख़िर में ही हुआ।

11नए युग का पहला प्रतीक कौन-सी वस्तु थी?

उत्तर देखिए

उत्तर: कपास (कॉटन)।

121760 और 1787 में ब्रिटेन का कच्चे कपास का आयात कितना था?

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उत्तर: 1760 में 25 लाख पौंड और 1787 में बढ़कर 220 लाख पौंड।

13सूती कपड़ा मिल की रूपरेखा किसने सामने रखी?

उत्तर देखिए

उत्तर: रिचर्ड आर्कराइट ने।

14मिल में उत्पादन के तीन फ़ायदे क्या थे?

उत्तर देखिए

उत्तर: सारी प्रक्रियाएँ एक छत के नीचे और एक मालिक के हाथों में आ गईं, जिससे उत्पादन प्रक्रिया पर निगरानी, गुणवत्ता का ध्यान रखना और मज़दूरों पर नज़र रखना संभव हो गया।

151840 के दशक तक ब्रिटेन का सबसे बड़ा उद्योग कौन-सा था?

उत्तर देखिए

उत्तर: कपास उद्योग; इसके बाद लोहा और स्टील उद्योग आगे निकल गए।

161873 तक ब्रिटेन के लोहा और स्टील निर्यात का मूल्य कितना था?

उत्तर देखिए

उत्तर: लगभग 7.7 करोड़ पौंड, जो इंग्लैंड के कपास निर्यात के मूल्य से दोगुना था।

17उन्नीसवीं सदी के आख़िर में तकनीकी रूप से विकसित औद्योगिक क्षेत्र में कितने मज़दूर काम करते थे?

उत्तर देखिए

उत्तर: कुल मज़दूरों में उनकी संख्या 20 प्रतिशत से ज़्यादा नहीं थी।

18भाप के पहले इंजन का निर्माता कौन था?

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उत्तर: न्यूकोमेन; जेम्स वॉट ने उसमें सुधार करके नए इंजन का पेटेंट कराया।

19जेम्स वॉट के इंजन का उत्पादन किसने किया?

उत्तर देखिए

उत्तर: उनके दोस्त उद्योगपति मैथ्यू बूल्टन ने।

20उन्नीसवीं सदी की शुरुआत तक पूरे इंग्लैंड में भाप के कितने इंजन थे?

उत्तर देखिए

उत्तर: सिर्फ़ 321 इंजन; इनमें से 80 सूती उद्योगों में, 9 ऊन उद्योगों में और बाक़ी खनन, नहर निर्माण और लौह कार्यों में इस्तेमाल हो रहे थे।

21उन्नीसवीं सदी के मध्य का औसत मज़दूर कैसा होता था?

उत्तर देखिए

उत्तर: वह मशीनों पर काम करने वाला नहीं बल्कि परंपरागत कारीगर और मज़दूर ही होता था।

22उन्नीसवीं सदी के मध्य में ब्रिटेन में कितने प्रकार के हथौड़े और कुल्हाड़ियाँ बनाई जाती थीं?

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उत्तर: 500 तरह के हथौड़े और 45 तरह की कुल्हाड़ियाँ।

23उन्नीसवीं सदी के मध्य में शहरी आबादी का कितना हिस्सा निहायत ग़रीब था?

उत्तर देखिए

उत्तर: सबसे अच्छे हालात में भी लगभग 10 प्रतिशत।

241830 के दशक की मंदी में बेरोज़गारी कितनी थी?

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उत्तर: विभिन्न क्षेत्रों में 35 से 75 प्रतिशत तक।

25स्पिनिंग जेनी किसने और कब बनाई?

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उत्तर: जेम्स हरग्रीव्ज़ ने 1764 में।

26स्पिनिंग जेनी ने क्या किया?

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उत्तर: इसने कताई की प्रक्रिया तेज़ कर दी और मज़दूरों की माँग घटा दी; एक ही पहिया घुमाने वाला एक मज़दूर बहुत सारी तकलियों को घुमा देता था।

271840 के दशक के बाद परिवहन उद्योग में मज़दूरों की संख्या का क्या हुआ?

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उत्तर: वह 1840 के दशक में दोगुना और अगले 30 सालों में एक बार फिर दोगुना हो गई।

28मशीन उद्योगों के युग से पहले अंतर्राष्ट्रीय कपड़ा बाज़ार पर किसका दबदबा था?

उत्तर देखिए

उत्तर: भारत के रेशमी और सूती उत्पादों का।

29भारत का कपास दूसरे देशों से किस मामले में अलग था?

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उत्तर: बहुत सारे देशों में मोटा कपास पैदा होता था लेकिन भारत में पैदा होने वाला कपास महीन क़िस्म का था।

30सूरत बंदरगाह किन बंदरगाहों से जुड़ा हुआ था?

उत्तर देखिए

उत्तर: गुजरात के तट पर स्थित सूरत बंदरगाह के ज़रिए भारत खाड़ी और लाल सागर के बंदरगाहों से जुड़ा हुआ था।

31सूरत बंदरगाह के व्यापार का मूल्य कैसे गिरा?

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उत्तर: सत्रहवीं सदी के आख़िरी सालों में यह 1.6 करोड़ रुपये था, जो 1740 के दशक तक गिर कर केवल 30 लाख रुपये रह गया।

32पुराने बंदरगाहों की जगह कौन-से नए बंदरगाह उभरे?

उत्तर देखिए

उत्तर: बंबई और कलकत्ता।

33गुमाश्ता कौन था?

उत्तर देखिए

उत्तर: कंपनी का वेतनभोगी कर्मचारी, जिसे बुनकरों पर निगरानी रखने, माल इकट्ठा करने और कपड़ों की गुणवत्ता जाँचने के लिए तैनात किया जाता था।

341772 में हेनरी पतुलो ने क्या कहा था?

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उत्तर: उन्होंने कहा था कि भारतीय कपड़े की माँग कभी कम नहीं हो सकती क्योंकि दुनिया के किसी और देश में इतना अच्छा माल नहीं बनता।

351811-12 और 1850-51 में भारत के निर्यात में सूती माल का हिस्सा कितना था?

उत्तर देखिए

उत्तर: 1811-12 में 33 प्रतिशत और 1850-51 में मात्र 3 प्रतिशत।

361850 और 1870 में भारतीय आयात में सूती कपड़े का हिस्सा कितना था?

उत्तर देखिए

उत्तर: 1850 में 31 प्रतिशत और 1870 तक यह 50 प्रतिशत से ऊपर चला गया।

371860 के दशक में भारतीय बुनकरों के सामने कौन-सी नयी समस्या आई?

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उत्तर: उन्हें अच्छी कपास नहीं मिल पा रही थी, क्योंकि अमेरिकी गृहयुद्ध के बाद ब्रिटेन भारत से कच्चा माल मँगाने लगा और कपास की क़ीमत आसमान छूने लगी।

38बंबई में पहली कपड़ा मिल कब लगी?

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उत्तर: 1854 में; दो साल बाद उसमें उत्पादन होने लगा।

39बंगाल में देश की पहली जूट मिल कब चालू हुई?

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उत्तर: 1855 में; दूसरी 7 साल बाद 1862 में।

401862 में बंबई में कितनी मिलें थीं?

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उत्तर: चार मिलें, जिनमें 94,000 तकलियाँ और 2,150 करघे थे।

41उत्तरी भारत में एल्गिन मिल कहाँ और कब खुली?

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उत्तर: कानपुर में, 1860 के दशक में।

42मद्रास में पहली कताई और बुनाई मिल कब खुली?

उत्तर देखिए

उत्तर: 1874 में।

43द्वारकानाथ टैगोर कौन थे?

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उत्तर: बंगाल के उद्यमी, जिन्होंने चीन के साथ व्यापार में ख़ूब पैसा कमाया और 1830–1840 के दशकों में 6 संयुक्त उद्यम कंपनियाँ लगाईं।

44जमशेदजी जीजीभोय कौन थे?

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उत्तर: वे एक पारसी बुनकर के बेटे थे, जिन्होंने चीन के साथ व्यापार और जहाज़रानी का काम किया; उनके पास जहाज़ों का एक विशाल बेड़ा था।

45देश की पहली जूट मिल कलकत्ता में किसने और कब लगाई?

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उत्तर: मारवाड़ी व्यवसायी सेठ हुकुमचंद ने 1917 में।

46भारत का पहला लौह एवं इस्पात संयंत्र कहाँ और कब स्थापित हुआ?

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उत्तर: 1912 में जे.एन. टाटा ने जमशेदपुर में स्थापित किया।

47सबसे बड़ी यूरोपीय प्रबंधकीय एजेंसियाँ कौन-सी थीं?

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उत्तर: बर्ड हीगलर्स एंड कंपनी, एंड्रयू यूल, और जार्डीन स्किनर एंड कंपनी।

481901 और 1946 में भारतीय फ़ैक्ट्रियों में कितने मज़दूर काम करते थे?

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उत्तर: 1901 में 5,84,000 और 1946 तक यह संख्या बढ़कर 24,36,000 हो चुकी थी।

491911 में बंबई के सूती मज़दूर मुख्यत: किस ज़िले से आते थे?

उत्तर देखिए

उत्तर: 50 प्रतिशत से ज़्यादा मज़दूर पास के रत्नागिरी ज़िले से आते थे।

50जॉबर कौन होता था?

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उत्तर: कोई पुराना और विश्वस्त कर्मचारी, जिसे उद्योगपति नए मज़दूरों की भर्ती के लिए रखते थे।

51जॉबर को और किन नामों से जाना जाता था?

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उत्तर: अलग-अलग इलाक़ों में उन्हें ‘सरदार’ या ‘मिस्त्री’ आदि भी कहते थे।

521900 से 1912 के बीच भारत में सूती कपड़े का उत्पादन कितना बढ़ा?

उत्तर देखिए

उत्तर: दोगुना हो गया।

531911 में बड़े उद्योगों में से कितने प्रतिशत बंगाल और बंबई में थे?

उत्तर देखिए

उत्तर: 67 प्रतिशत।

541911 और 1931 में पंजीकृत फ़ैक्ट्रियों में कितनी औद्योगिक श्रम शक्ति काम करती थी?

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उत्तर: 1911 में 5 प्रतिशत और 1931 में 10 प्रतिशत।

551900 से 1940 के बीच हथकरघों पर बने कपड़े का उत्पादन कितना बढ़ा?

उत्तर देखिए

उत्तर: तीन गुना हो गया।

56फ़्लाई शटल क्या है?

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उत्तर: यह रस्सियों और पुलियों के ज़रिए चलने वाला एक यांत्रिक औज़ार है, जो क्षैतिज धागे (ताना) को लम्बवत् धागे (बाना) में पिरो देता है।

571941 में भारत के कितने हथकरघों में फ़्लाई शटल लगे थे?

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उत्तर: 35 प्रतिशत से ज़्यादा; त्रावणकोर, मद्रास, मैसूर, कोचीन और बंगाल में तो यह 70 से 80 प्रतिशत तक था।

58मिलें कौन-से कपड़े नहीं बना सकती थीं?

उत्तर देखिए

उत्तर: मिल विशेष प्रकार की बुनाई की नक़ल नहीं कर सकते थे; बुने हुए बॉर्डर वाली साड़ियों या मद्रास की प्रसिद्ध लुंगियों की जगह ले लेना उनके लिए आसान नहीं था।

59‘प्राच्य’ (Orient) का क्या अर्थ है?

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उत्तर: भूमध्य सागर के पूर्व में स्थित देश; आमतौर पर यह शब्द एशिया के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

60मैनचेस्टर के लेबल पर मोटे अक्षरों में क्या लिखा होता था और उसका क्या फ़ायदा था?

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उत्तर: ‘मेड इन मैनचेस्टर’ लिखा होता था, जिससे ख़रीदारों को कपड़ा ख़रीदने में किसी तरह का डर नहीं रहता था।

भाग ख — लघूत्तरात्मक प्रश्न (2 अंक)

1पूर्व-औद्योगीकरण (आदि-औद्योगीकरण) का मतलब बताएँ।

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उत्तर: इंग्लैंड और यूरोप में फ़ैक्ट्रियों की स्थापना से भी पहले ही अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार के लिए बड़े पैमाने पर औद्योगिक उत्पादन होने लगा था और यह उत्पादन फ़ैक्ट्रियों में नहीं होता था। बहुत सारे इतिहासकार औद्योगीकरण के इस चरण को आदि-औद्योगीकरण का नाम देते हैं।

2गिल्ड्स की क्या भूमिका थी?

उत्तर देखिए

उत्तर: गिल्ड्स उत्पादकों के संगठन होते थे, जो उत्पादक कारीगरों को प्रशिक्षण देते थे, उत्पादकों पर नियंत्रण रखते थे, प्रतिस्पर्धा और मूल्य तय करते थे तथा व्यवसाय में नए लोगों को आने से रोकते थे। शासकों ने भी विभिन्न गिल्ड्स को ख़ास उत्पादों के उत्पादन और व्यापार का एकाधिकार दिया हुआ था।

3गाँव के ग़रीब किसान सौदागरों के लिए काम करने को तुरंत तैयार क्यों हो गए?

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उत्तर: यह एक ऐसा समय था जब खुले खेत ख़त्म होते जा रहे थे और कॉमन्स की बाड़ाबंदी की जा रही थी, इसलिए छोटे और ग़रीब किसान आमदनी के नए स्रोत ढूँढ़ रहे थे। उनके पास छोटे-मोटे खेत तो थे लेकिन उनसे घर के सारे लोगों का पेट नहीं भर सकता था, और सौदागरों के लिए काम करते हुए वे गाँव में ही रहते हुए अपने खेतों को भी सँभाल सकते थे।

4आदि-औद्योगिक व्यवस्था की तीन विशेषताएँ बताइए।

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उत्तर: यह व्यवस्था व्यवसायिक आदान-प्रदान के नेटवर्क का हिस्सा थी, इस पर सौदागरों का नियंत्रण था और चीज़ों का उत्पादन कारख़ानों की बजाय घरों में होता था। उत्पादन के प्रत्येक चरण में प्रत्येक सौदागर 20–25 मज़दूरों से काम करवाता था, इसलिए कपड़ों के हर सौदागर के पास सैकड़ों मज़दूर काम करते थे।

5इंग्लैंड में कपड़ा बनने की पूरी शृंखला बताइए।

उत्तर देखिए

उत्तर: व्यवसायी स्टेप्लर्स से ऊन ख़रीदते थे और उसे सूत कातने वालों के पास पहुँचा देते थे। इससे जो धागा मिलता था उसे बुनकरों, फ़ुलर्स और रंगसाज़ों के पास ले जाया जाता था। लंदन में कपड़ों की फ़िनिशिंग होती थी, इसके बाद निर्यातक व्यापारी कपड़े को अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में बेच देते थे; इसीलिए लंदन को फ़िनिशिंग सेंटर के रूप में ही जाना जाने लगा था।

6कारख़ानों में उत्पादन के क्या फ़ायदे थे?

उत्तर देखिए

उत्तर: महँगी नयी मशीनें ख़रीदकर उन्हें कारख़ानों में लगाया जा सकता था और कारख़ाने में सारी प्रक्रियाएँ एक छत के नीचे और एक मालिक के हाथों में आ गई थीं। इसके चलते उत्पादन प्रक्रिया पर निगरानी, गुणवत्ता का ध्यान रखना और मज़दूरों पर नज़र रखना संभव हो गया था, जो गाँवों में उत्पादन होने पर संभव नहीं था।

71840 के दशक के बाद लोहा और स्टील उद्योग कपास से आगे कैसे निकल गया?

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उत्तर: 1840 के दशक से इंग्लैंड में और 1860 के दशक से उसके उपनिवेशों में रेलवे का विस्तार होने लगा था, जिससे लोहे और स्टील की ज़रूरत तेज़ी से बढ़ी। 1873 तक ब्रिटेन के लोहा और स्टील निर्यात का मूल्य लगभग 7.7 करोड़ पौंड हो गया था, जो इंग्लैंड के कपास निर्यात के मूल्य से दोगुना था।

8नयी तकनीक को अपनाने में उद्योगपति क्यों हिचकिचाते थे?

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उत्तर: नयी तकनीक महँगी थी, इसलिए सौदागर व व्यापारी उनके इस्तेमाल के सवाल पर फूँक-फूँक कर क़दम बढ़ाते थे। मशीनें अकसर ख़राब हो जाती थीं, उनकी मरम्मत पर काफ़ी ख़र्चा आता था और वे उतनी अच्छी भी नहीं थीं जितना उनके आविष्कारकों और निर्माताओं का दावा था।

9भाप के इंजन का उदाहरण क्या सिद्ध करता है?

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उत्तर: जेम्स वॉट के भाप के इंजन को सालों तक कोई ख़रीदार नहीं मिला और उन्नीसवीं सदी की शुरुआत तक पूरे इंग्लैंड में भाप के सिर्फ़ 321 इंजन थे। इससे यह सिद्ध होता है कि मज़दूरों की उत्पादन क्षमता को कई गुना बढ़ाने की संभावना वाली सबसे शक्तिशाली प्रौद्योगिकी को अपनाने में भी उद्योगपति बहुत हिचकिचा रहे थे।

10ब्रिटेन में मज़दूरों की कमी क्यों नहीं थी?

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उत्तर: विक्टोरिया कालीन ब्रिटेन में मानव श्रम की कोई कमी नहीं थी, क्योंकि ग़रीब किसान और बेकार लोग कामकाज की तलाश में बड़ी संख्या में शहरों को जाते थे। जब श्रमिकों की बहुतायत होती है तो वेतन गिर जाते हैं, इसलिए उद्योगपतियों को श्रमिकों की कमी या वेतन के मद में भारी लागत जैसी कोई परेशानी नहीं थी।

11मौसमी काम वाले उद्योगों में मशीनों की जगह मज़दूर क्यों रखे जाते थे?

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उत्तर: गैसघरों और शराबख़ानों में जाड़ों के दौरान ख़ासा काम रहता था, क्रिसमस के समय बुक बाइंडरों और प्रिंटरों को दिसंबर से पहले अतिरिक्त मज़दूरों की दरकार रहती थी और बंदरगाहों पर जहाज़ों की मरम्मत जाड़ों में की जाती थी। जिन उद्योगों में मौसम के साथ उत्पादन घटता-बढ़ता रहता था वहाँ उद्योगपति मशीनों की बजाय मज़दूरों को ही काम पर रखना पसंद करते थे।

12उच्च वर्ग हाथ से बनी चीज़ों को क्यों पसंद करता था?

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उत्तर: विक्टोरिया कालीन ब्रिटेन में उच्च वर्ग के लोग — कुलीन और पूँजीपति वर्ग — हाथों से बनी चीज़ों को तरजीह देते थे, क्योंकि हाथ से बनी चीज़ों को परिष्कार और सुरुचि का प्रतीक माना जाता था। उनकी फ़िनिश अच्छी होती थी, उनको एक-एक करके बनाया जाता था और उनका डिज़ाइन अच्छा होता था; मशीनों से बनने वाले उत्पादों को उपनिवेशों में निर्यात कर दिया जाता था।

13अमेरिका और ब्रिटेन में मशीनों के इस्तेमाल में क्या अंतर था?

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उत्तर: जिन देशों में मज़दूरों की कमी होती है वहाँ उद्योगपति मशीनों का इस्तेमाल करना ज़्यादा पसंद करते हैं ताकि कम से कम मज़दूरों का इस्तेमाल करके वे अपना काम चला सकें, और उन्नीसवीं सदी के अमेरिका में यही स्थिति थी। लेकिन ब्रिटेन में कामगारों की कोई कमी नहीं थी, इसलिए वहाँ उद्योगपति हाथ के श्रम को ही प्राथमिकता देते थे।

14मज़दूरों को नौकरी कैसे मिलती थी?

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उत्तर: नौकरी मिलने की संभावना यारी-दोस्ती, कुनबे-कुटुंब के ज़रिए जान-पहचान पर निर्भर करती थी; अगर किसी कारख़ाने में आपका रिश्तेदार या दोस्त लगा हुआ है तो नौकरी मिलने की संभावना ज़्यादा रहती थी। सबके पास ऐसे सामाजिक संपर्क नहीं होते थे, इसलिए रोज़गार चाहने वाले बहुत सारे लोगों को हफ़्तों इंतज़ार करना पड़ता था और वे पुलों के नीचे या रैन-बसेरों में रातें काटते थे।

15वेतन बढ़ने के बावजूद मज़दूरों की हालत क्यों नहीं सुधरी?

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उत्तर: औसत आँकड़ों से अलग-अलग व्यवसायों के बीच आने वाले फ़र्क़ और साल-दर-साल होने वाले उतार-चढ़ाव छिपे रह जाते थे। मिसाल के तौर पर, जब लंबे नेपोलियनी युद्ध के दौरान क़ीमतें तेज़ी से बढ़ीं तो मज़दूरों को वेतन तो पहले जितना मिलता था लेकिन उससे वे पहले जितनी चीज़ें नहीं ख़रीद सकते थे।

16ब्रिटेन की महिला कामगारों ने स्पिनिंग जेनी मशीनों पर हमले क्यों किए?

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उत्तर: बेरोज़गारी की आशंका के कारण मज़दूर नयी प्रौद्योगिकी से चिढ़ते थे। जब ऊन उद्योग में स्पिनिंग जेनी मशीन का इस्तेमाल शुरू किया गया तो हाथ से ऊन कातने वाली औरतों का काम छिन गया, इसलिए वे इस तरह की मशीनों पर हमला करने लगीं और जेनी के इस्तेमाल पर यह टकराव लंबे समय तक चलता रहा।

171840 के दशक के बाद शहरों में कौन-से नए रोज़गार पैदा हुए?

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उत्तर: सड़कों को चौड़ा किया गया, नए रेलवे स्टेशन बने, रेलवे लाइनों का विस्तार किया गया, सुरंगें बनाई गईं, निकासी और सीवर व्यवस्था बिछाई गई और नदियों के तटबंध बनाए गए। परिवहन उद्योग में काम करने वालों की संख्या 1840 के दशक में दोगुना और अगले 30 सालों में एक बार फिर दोगुना हो गई।

18भारतीय कपड़े का व्यापार किन दो रास्तों से होता था?

उत्तर देखिए

उत्तर: ज़मीन के रास्ते आर्मीनियन और फ़ारसी सौदागर पंजाब से अफ़ग़ानिस्तान, पूर्वी फ़ारस और मध्य एशिया के रास्ते चीज़ें ले जाते थे और कपड़ों के थान ऊँटों की पीठ पर लाद कर पहाड़ी दर्रों के पार जाते थे। समुद्री रास्ते सूरत बंदरगाह के ज़रिए भारत खाड़ी और लाल सागर के बंदरगाहों से जुड़ा था, और मछलीपटनम व हुगली के माध्यम से दक्षिण-पूर्वी एशियाई बंदरगाहों से व्यापार चलता था।

19सूरत बंदरगाह अठारहवीं सदी के अंत तक हाशिये पर कैसे पहुँच गया?

उत्तर देखिए

उत्तर: यूरोपीय कंपनियों ने पहले स्थानीय दरबारों से रियायतें हासिल कीं और फिर व्यापार पर इज़ारेदारी अधिकार प्राप्त कर लिए, जिससे सूरत व हुगली दोनों पुराने बंदरगाह कमज़ोर पड़ गए। इन बंदरगाहों से होने वाले निर्यात में नाटकीय कमी आई और सत्रहवीं सदी के आख़िर में 1.6 करोड़ रुपये का व्यापार 1740 के दशक तक गिरकर केवल 30 लाख रुपये रह गया।

20नए बंदरगाहों का उदय किस बात का संकेत था?

उत्तर देखिए

उत्तर: सूरत व हुगली की जगह बंबई व कलकत्ता का उदय औपनिवेशिक सत्ता की बढ़ती ताक़त का संकेत था। नए बंदरगाहों के ज़रिए होने वाला व्यापार यूरोपीय कंपनियों के नियंत्रण में था और यूरोपीय जहाज़ों के ज़रिए होता था।

21ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत में बुनकरों पर निगरानी रखने के लिए गुमाश्तों को क्यों नियुक्त किया?

उत्तर देखिए

उत्तर: राजनीतिक सत्ता स्थापित हो जाने के बाद कंपनी ने प्रतिस्पर्धा ख़त्म करने, लागतों पर अंकुश रखने और कपास व रेशम से बनी चीज़ों की नियमित आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए प्रबंधन और नियंत्रण की एक नयी व्यवस्था लागू कर दी। इसके तहत उसने कपड़ा व्यापार में सक्रिय व्यापारियों और दलालों को ख़त्म करने तथा बुनकरों पर ज़्यादा प्रत्यक्ष नियंत्रण स्थापित करने के लिए वेतनभोगी कर्मचारी तैनात किए, जिन्हें गुमाश्ता कहा जाता था।

22पुराने आपूर्ति सौदागर और नए गुमाश्ता में क्या अंतर था?

उत्तर देखिए

उत्तर: पहले आपूर्ति सौदागर अकसर बुनकर गाँवों में ही रहते थे और बुनकरों से उनके नज़दीकी ताल्लुक़ात होते थे; वे बुनकरों की ज़रूरतों का ख़याल रखते थे और संकट के समय उनकी मदद करते थे। नए गुमाश्ता बाहर के लोग थे, उनका गाँवों से पुराना सामाजिक संबंध नहीं था, वे दंभपूर्ण व्यवहार करते थे और माल समय पर तैयार न होने पर बुनकरों को पीटते व कोड़े बरसाते थे।

23बुनकरों ने कंपनी का विरोध किन तरीक़ों से किया?

उत्तर देखिए

उत्तर: कर्नाटक और बंगाल में बहुत सारे स्थानों पर बुनकर गाँव छोड़ कर चले गए और अपने रिश्तेदारों के यहाँ किसी और गाँव में करघा लगा लेते थे; कई स्थानों पर उन्होंने गाँव के व्यापारियों के साथ मिलकर बग़ावत कर दी। कुछ समय बाद बहुत सारे बुनकर क़र्ज़ा लौटाने से इनकार करने लगे, उन्होंने करघे बंद कर दिए और खेतों में मज़दूरी करने लगे।

24भारतीय बुनकरों के सामने एक साथ कौन-सी दो समस्याएँ थीं?

उत्तर देखिए

उत्तर: पहली समस्या यह थी कि उनका निर्यात बाज़ार ढह रहा था — भारत के निर्यात में सूती माल का हिस्सा 1811-12 के 33 प्रतिशत से घटकर 1850-51 में मात्र 3 प्रतिशत रह गया। दूसरी समस्या यह थी कि उनका स्थानीय बाज़ार सिकुड़ने लगा था, क्योंकि स्थानीय बाज़ार में मैनचेस्टर के आयातित मालों की भरमार थी और कम लागत पर मशीनों से बनने वाले आयातित कपास उत्पाद इतने सस्ते थे कि बुनकर उनका मुक़ाबला नहीं कर सकते थे।

25अमेरिकी गृहयुद्ध ने भारतीय बुनकरों को कैसे प्रभावित किया?

उत्तर देखिए

उत्तर: जब अमेरिकी गृहयुद्ध शुरू हुआ और अमेरिका से कपास की आमद बंद हो गई तो ब्रिटेन भारत से कच्चा माल मँगाने लगा, जिससे भारत से कच्चे कपास के निर्यात में वृद्धि हुई और उसकी क़ीमत आसमान छूने लगी। भारतीय बुनकरों को कच्चे माल के लाले पड़ गए, उन्हें मनमानी क़ीमत पर कच्ची कपास ख़रीदनी पड़ती थी और ऐसी सूरत में बुनकरी के सहारे पेट पालना संभव नहीं था।

26भारतीय उद्यमियों के पास पूँजी कहाँ से आई?

उत्तर देखिए

उत्तर: अठारहवीं सदी के आख़िर से अंग्रेज़ भारतीय अफ़ीम का चीन को निर्यात करने लगे थे और उसके बदले चीन से चाय ख़रीदते थे; इस व्यापार में बहुत सारे भारतीय कारोबारी सहायक की हैसियत में पहुँच गए थे। व्यापार से पैसा कमाने के बाद उनमें से कुछ व्यवसायी भारत में औद्योगिक उद्यम स्थापित करना चाहते थे।

27भारतीय व्यवसायियों के लिए जगह कैसे सिकुड़ती गई?

उत्तर देखिए

उत्तर: जैसे-जैसे भारतीय व्यापार पर औपनिवेशिक शिकंजा कसता गया, भारतीय व्यवसायियों को अपना तैयार माल यूरोप में बेचने से रोक दिया गया। अब वे मुख्य रूप से कच्चे माल और अनाज — कच्ची कपास, अफ़ीम, गेहूँ और नील — का ही निर्यात कर सकते थे जिनकी अंग्रेज़ों को ज़रूरत थी, और धीरे-धीरे उन्हें जहाज़रानी व्यवसाय से भी बाहर धकेल दिया गया।

28यूरोपीय प्रबंधकीय एजेंसियों की क्या भूमिका थी?

उत्तर देखिए

उत्तर: पहले विश्वयुद्ध तक यूरोपीय प्रबंधकीय एजेंसियाँ भारतीय उद्योगों के विशाल क्षेत्र का नियंत्रण करती थीं; ये पूँजी जुटाती थीं, संयुक्त उद्यम कंपनियाँ लगाती थीं और उनका प्रबंधन सँभालती थीं। ज़्यादातर मामलों में भारतीय वित्तपोषक पूँजी उपलब्ध कराते थे जबकि निवेश और व्यवसाय से संबंधित फ़ैसले यूरोपीय एजेंसियाँ लेती थीं, और उनके वाणिज्यिक परिसंघों में भारतीय व्यवसायियों को शामिल नहीं किया जाता था।

29भारत में मिल मज़दूर कहाँ से आते थे?

उत्तर देखिए

उत्तर: ज़्यादातर औद्योगिक इलाक़ों में मज़दूर आसपास के ज़िलों से आते थे; 1911 में बंबई के सूती कपड़ा उद्योग में काम करने वाले 50 प्रतिशत से ज़्यादा मज़दूर पास के रत्नागिरी ज़िले से आए थे। बाद में जब नए कामों की ख़बर फैली तो दूर-दूर से भी लोग आने लगे — जैसे संयुक्त प्रांत के लोग बंबई के कपड़ा मिलों और कलकत्ता के जूट मिलों में काम करने पहुँच रहे थे।

30जॉबर की भूमिका और उसका दुरुपयोग बताइए।

उत्तर देखिए

उत्तर: जॉबर कोई पुराना और विश्वस्त कर्मचारी होता था, जो अपने गाँव से लोगों को लाता था, उन्हें काम का भरोसा देता था, उन्हें शहर में जमने के लिए मदद देता था और मुसीबत में पैसे से मदद करता था। इस प्रकार जॉबर ताक़तवर और मज़बूत व्यक्ति बन गया, और बाद में जॉबर मदद के बदले पैसे व तोहफ़ों की माँग करने लगे तथा मज़दूरों की ज़िंदगी को नियंत्रित करने लगे।

31यूरोपीय प्रबंधकीय एजेंसियों की दिलचस्पी किन उत्पादों में थी?

उत्तर देखिए

उत्तर: उन्होंने औपनिवेशिक सरकार से सस्ती क़ीमत पर ज़मीन लेकर चाय व कॉफ़ी के बाग़ान लगाए और खनन, नील व जूट व्यवसाय में पैसे का निवेश किया। इनमें से ज़्यादातर ऐसे उत्पाद थे जिनकी भारत में बिक्री के लिए नहीं बल्कि मुख्य रूप से निर्यात के लिए आवश्यकता थी।

32भारत की शुरुआती सूती मिलें कपड़े की बजाय धागा क्यों बनाती थीं?

उत्तर देखिए

उत्तर: भारत आने वाले ब्रिटिश मालों में धागा बहुत अच्छा नहीं था, इसलिए भारत के शुरुआती सूती मिलों में कपड़े की बजाय मोटे सूती धागे ही बनाए जाते थे; जब धागे का आयात किया जाता था तो वह हमेशा बेहतर क़िस्म का होता था। भारतीय कताई मिलों में बनने वाले धागे का भारत के हथकरघा बुनकर इस्तेमाल करते थे या उन्हें चीन को निर्यात कर दिया जाता था।

33भारत के उद्योगपति धागे की बजाय कपड़ा कब और क्यों बनाने लगे?

उत्तर देखिए

उत्तर: 1906 के बाद चीन भेजे जाने वाले भारतीय धागे के निर्यात में कमी आने लगी थी, क्योंकि चीनी बाज़ारों में चीन और जापान की मिलों के उत्पाद छा गए थे। फलस्वरूप भारत के उद्योगपति धागे की बजाय कपड़ा बनाने लगे और 1900 से 1912 के बीच भारत में सूती कपड़े का उत्पादन दोगुना हो गया।

34युद्ध के बाद मैनचेस्टर अपनी पुरानी हैसियत क्यों नहीं पा सका?

उत्तर देखिए

उत्तर: आधुनिकीकरण न कर पाने और अमेरिका, जर्मनी व जापान के मुक़ाबले कमज़ोर पड़ जाने के कारण ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था चरमरा गई थी; कपास का उत्पादन बहुत कम रह गया था और ब्रिटेन से होने वाले सूती कपड़े के निर्यात में ज़बरदस्त गिरावट आई। उपनिवेशों में विदेशी उत्पादों को हटाकर स्थानीय उद्योगपतियों ने घरेलू बाज़ारों पर क़ब्ज़ा कर लिया और धीरे-धीरे अपनी स्थिति मज़बूत बना ली।

35फ़्लाई शटल के आने से हथकरघा कामगारों को क्या फ़ायदा हुआ?

उत्तर देखिए

उत्तर: फ़्लाई शटल रस्सियों और पुलियों के ज़रिए चलने वाला एक यांत्रिक औज़ार है जो क्षैतिज धागे को लम्बवत् धागे में पिरो देता है; इससे बुनकरों को बड़े करघे चलाना और चौड़े अरज का कपड़ा बनाने में काफ़ी मदद मिली। इससे कामगारों की उत्पादन क्षमता बढ़ी, उत्पादन तेज़ हुआ और श्रम की माँग में कमी आई; 1941 तक भारत में 35 प्रतिशत से ज़्यादा हथकरघों में फ़्लाई शटल लगे हुए थे।

36कुछ बुनकर मिलों से मुक़ाबला करने में बेहतर स्थिति में क्यों थे?

उत्तर देखिए

उत्तर: मोटे कपड़े को मुख्य रूप से ग़रीब ख़रीदते थे और उसकी माँग में भारी उतार-चढ़ाव आते थे, जबकि बेहतर क़िस्म के कपड़े की माँग खाते-पीते तबक़े में ज़्यादा थी जिसमें उतार-चढ़ाव कम आते थे। अकालों से बनारसी या बालूचरी साड़ियों की बिक्री पर असर नहीं पड़ता था, और मिलें बुने हुए बॉर्डर वाली साड़ियों या मद्रास की प्रसिद्ध लुंगियों की नक़ल नहीं कर सकती थीं।

37विज्ञापनों की क्या भूमिका होती है?

उत्तर देखिए

उत्तर: विज्ञापन विभिन्न उत्पादों को ज़रूरी और वांछनीय बना देते हैं; वे लोगों की सोच बदल देते हैं और नयी ज़रूरतें पैदा कर देते हैं। औद्योगीकरण की शुरुआत से ही विज्ञापनों ने विभिन्न उत्पादों के बाज़ार को फैलाने में और एक नयी उपभोक्ता संस्कृति रचने में अपनी भूमिका निभाई है।

38लेबल पर भारतीय देवी-देवताओं की तसवीरें क्यों लगाई जाती थीं?

उत्तर देखिए

उत्तर: देवी-देवताओं की तसवीर के बहाने निर्माता यह दिखाने की कोशिश करते थे कि ईश्वर भी चाहता है कि लोग उस चीज़ को ख़रीदें। कृष्ण या सरस्वती की तसवीरों का फ़ायदा यह होता था कि विदेशों में बनी चीज़ भी भारतीयों को जानी-पहचानी सी लगती थी।

39कैलेंडर विज्ञापन का बेहतर माध्यम क्यों माने जाते थे?

उत्तर देखिए

उत्तर: अख़बारों और पत्रिकाओं को तो पढ़े-लिखे लोग ही समझ सकते थे लेकिन कैलेंडर उनको भी समझ में आ जाते थे जो पढ़ नहीं सकते थे। चाय की दुकानों, दफ़्तरों व मध्यवर्गीय घरों में ये कैलेंडर लटकते रहते थे और जो इन्हें लगाते थे वे विज्ञापन को हर रोज़, पूरे साल देखते थे।

40भारतीय निर्माताओं के विज्ञापनों में क्या ख़ास था?

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उत्तर: जब भारतीय निर्माताओं ने विज्ञापन बनाए तो उनमें राष्ट्रवादी संदेश साफ़ दिखाई देता था; इनका आशय यह था कि अगर आप राष्ट्र की परवाह करते हैं तो उन चीज़ों को ख़रीदिए जिन्हें भारतीयों ने बनाया है। ये विज्ञापन स्वदेशी के राष्ट्रवादी संदेश के वाहक बन गए थे।

भाग ग — लघूत्तरात्मक प्रश्न (3 अंक)

1सत्रहवीं शताब्दी में यूरोपीय शहरों के सौदागर गाँवों में किसानों और कारीगरों से काम करवाने क्यों लगे?

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उत्तर:

  • उस समय विश्व व्यापार के विस्तार और दुनिया के विभिन्न भागों में उपनिवेशों की स्थापना के कारण चीज़ों की माँग बढ़ने लगी थी, और इस माँग को पूरा करने के लिए केवल शहरों में रहते हुए उत्पादन नहीं बढ़ाया जा सकता था।
  • इसकी वजह यह थी कि शहरों में शहरी दस्तकारी और व्यापारिक गिल्ड्स काफ़ी ताक़तवर थे। ये गिल्ड्स कारीगरों को प्रशिक्षण देते थे, उत्पादकों पर नियंत्रण रखते थे, प्रतिस्पर्धा और मूल्य तय करते थे तथा व्यवसाय में नए लोगों को आने से रोकते थे।
  • शासकों ने भी विभिन्न गिल्ड्स को ख़ास उत्पादों के उत्पादन और व्यापार का एकाधिकार दिया हुआ था। फलस्वरूप नए व्यापारी शहरों में कारोबार नहीं कर सकते थे, इसलिए वे गाँवों की तरफ़ जाने लगे।

2गाँवों के ग़रीब किसान और दस्तकार सौदागरों के लिए काम करने को क्यों तैयार हो गए?

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उत्तर:

  • यह एक ऐसा समय था जब खुले खेत ख़त्म होते जा रहे थे और कॉमन्स की बाड़ाबंदी की जा रही थी, इसलिए साझा ज़मीनों से लकड़ी, बेरियाँ, सब्ज़ियाँ, भूसा और चारा बीनकर काम चलाने वाले छोटे किसान और ग़रीब किसान आमदनी के नए स्रोत ढूँढ़ रहे थे।
  • बहुतों के पास छोटे-मोटे खेत तो थे लेकिन उनसे घर के सारे लोगों का पेट नहीं भर सकता था, इसलिए जब सौदागरों ने माल पैदा करने के लिए पेशगी रक़म दी तो किसान फ़ौरन तैयार हो गए।
  • सौदागरों के लिए काम करते हुए वे गाँव में ही रहते हुए अपने छोटे-छोटे खेतों को भी सँभाल सकते थे, इस आमदनी ने खेती के कारण सिमटती आय में बड़ा सहारा दिया और उन्हें पूरे परिवार के श्रम संसाधनों के इस्तेमाल का मौक़ा भी मिल गया।

3औद्योगीकरण की रफ़्तार धीमी थी — इसे तीन तर्कों से सिद्ध कीजिए।

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उत्तर:

  • नए उद्योग परंपरागत उद्योगों को इतनी आसानी से हाशिए पर नहीं ढकेल सकते थे; उन्नीसवीं सदी के आख़िर में भी तकनीकी रूप से विकसित औद्योगिक क्षेत्र में काम करने वाले मज़दूरों की संख्या कुल मज़दूरों में 20 प्रतिशत से ज़्यादा नहीं थी।
  • कपड़ा उद्योग एक गतिशील उद्योग था लेकिन उसके उत्पादन का बड़ा हिस्सा कारख़ानों में नहीं बल्कि घरेलू इकाइयों में होता था।
  • प्रौद्योगिकीय बदलावों की गति धीमी थी क्योंकि नयी तकनीक महँगी थी, मशीनें अकसर ख़राब हो जाती थीं, उनकी मरम्मत पर काफ़ी ख़र्चा आता था और वे उतनी अच्छी भी नहीं थीं जितना उनके आविष्कारकों का दावा था। इसका सबसे अच्छा प्रमाण यह है कि उन्नीसवीं सदी की शुरुआत तक पूरे इंग्लैंड में भाप के सिर्फ़ 321 इंजन थे।

4उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में मज़दूरों की ज़िंदगी कैसी थी?

उत्तर देखिए

उत्तर:

  • नौकरी मिलने की संभावना यारी-दोस्ती और कुनबे-कुटुंब के ज़रिए जान-पहचान पर निर्भर करती थी; सबके पास ऐसे सामाजिक संपर्क नहीं होते थे, इसलिए बहुत सारे लोगों को हफ़्तों इंतज़ार करना पड़ता था और वे पुलों के नीचे या रैन-बसेरों में रातें काटते थे।
  • बहुत सारे उद्योगों में मौसमी काम की वजह से कामगारों को बीच-बीच में बहुत समय तक ख़ाली बैठना पड़ता था; काम का सीज़न गुज़र जाने के बाद ग़रीब दोबारा सड़क पर आ जाते थे।
  • उन्नीसवीं सदी के मध्य में सबसे अच्छे हालात में भी लगभग 10 प्रतिशत शहरी आबादी निहायत ग़रीब थी, और 1830 के दशक की मंदी जैसे दौरों में बेरोज़गारों की संख्या विभिन्न क्षेत्रों में 35 से 75 प्रतिशत तक पहुँच जाती थी।

5भारतीय कपड़े का अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार पर दबदबा क्यों था?

उत्तर देखिए

उत्तर:

  • मशीन उद्योगों के युग से पहले अंतर्राष्ट्रीय कपड़ा बाज़ार में भारत के रेशमी और सूती उत्पादों का ही दबदबा रहता था; बहुत सारे देशों में मोटा कपास पैदा होता था लेकिन भारत में पैदा होने वाला कपास महीन क़िस्म का था।
  • ज़मीन के रास्ते आर्मीनियन और फ़ारसी सौदागर पंजाब से अफ़ग़ानिस्तान, पूर्वी फ़ारस और मध्य एशिया के रास्ते ये चीज़ें ले जाते थे और कपड़ों के थान ऊँटों की पीठ पर लाद कर पहाड़ी दर्रों और रेगिस्तानों के पार पहुँचाए जाते थे।
  • समुद्री रास्ते सूरत बंदरगाह भारत को खाड़ी और लाल सागर के बंदरगाहों से जोड़ता था, तथा कोरोमंडल तट पर मछलीपटनम और बंगाल में हुगली के माध्यम से दक्षिण-पूर्वी एशियाई बंदरगाहों के साथ ख़ूब व्यापार चलता था।

6भारतीय सौदागरों का व्यापारिक नेटवर्क कैसे काम करता था?

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उत्तर:

  • निर्यात व्यापार के इस नेटवर्क में बहुत सारे भारतीय व्यापारी और बैंकर सक्रिय थे; वे उत्पादन में पैसा लगाते थे, चीज़ों को लेकर जाते थे और निर्यातकों को पहुँचाते थे।
  • माल भेजने वाले आपूर्ति सौदागरों के ज़रिये बंदरगाह नगर देश के भीतरी इलाक़ों से जुड़े हुए थे; ये सौदागर बुनकरों को पेशगी देते थे, बुनकरों से तैयार कपड़ा ख़रीदते थे और उसे बंदरगाहों तक पहुँचाते थे।
  • बंदरगाह पर बड़े जहाज़ मालिक और निर्यात व्यापारियों के दलाल क़ीमत पर मोल-भाव करते थे और आपूर्ति सौदागरों से माल ख़रीद लेते थे।

7कंपनी की सत्ता स्थापित होने से पहले बुनकर की स्थिति कैसी थी?

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उत्तर:

  • 1760 और 1770 के दशकों में बंगाल और कर्नाटक में राजनीतिक सत्ता स्थापित करने से पहले ईस्ट इंडिया कंपनी को निर्यात के लिए लगातार सप्लाई आसानी से नहीं मिल पाती थी।
  • बुने हुए कपड़े को हासिल करने के लिए फ़्रांसीसी, डच और पुर्तगालियों के साथ-साथ स्थानीय व्यापारी भी होड़ में रहते थे।
  • इस प्रकार बुनकर और आपूर्ति सौदागर ख़ूब मोल-भाव करते थे और अपना माल सबसे ऊँची बोली लगाने वाले ख़रीदार को ही बेचते थे। लंदन भेजे गए अपने पत्रों में कंपनी के अफ़सरों ने आपूर्ति में मुश्किल और ऊँचे दामों का बार-बार ज़िक्र किया है।

8गुमाश्तों और बुनकरों के बीच टकराव क्यों हुआ?

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उत्तर:

  • पहले आपूर्ति सौदागर अकसर बुनकर गाँवों में ही रहते थे और बुनकरों से उनके नज़दीकी ताल्लुक़ात होते थे; वे बुनकरों की ज़रूरतों का ख़याल रखते थे और संकट के समय उनकी मदद करते थे।
  • नए गुमाश्ता बाहर के लोग थे और उनका गाँवों से पुराना सामाजिक संबंध नहीं था; वे दंभपूर्ण व्यवहार करते थे, सिपाहियों व चपरासियों को लेकर आते थे और माल समय पर तैयार न होने की स्थिति में बुनकरों को सज़ा देते थे। सज़ा के तौर पर बुनकरों को अकसर पीटा जाता था और कोड़े बरसाए जाते थे।
  • अब बुनकर न तो दाम पर मोलभाव कर सकते थे और न ही किसी और को माल बेच सकते थे; उन्हें कंपनी से जो क़ीमत मिलती थी वह बहुत कम थी पर वे क़र्ज़ों की वजह से कंपनी से बँधे हुए थे।

9उन्नीसवीं सदी में भारत के कपड़ा निर्यात में गिरावट क्यों आई?

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उत्तर:

  • जब इंग्लैंड में कपास उद्योग विकसित हुआ तो वहाँ के उद्योगपतियों ने सरकार पर दबाव डाला कि वह आयातित कपड़ों पर आयात शुल्क वसूल करे, जिससे मैनचेस्टर में बने कपड़े बाहरी प्रतिस्पर्धा के बिना इंग्लैंड में आराम से बिक सकें।
  • दूसरी तरफ़ उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी पर दबाव डाला कि वह ब्रिटिश कपड़ों को भारतीय बाज़ारों में भी बेचे, जिससे उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में ब्रिटेन के वस्त्र उत्पादों के निर्यात में नाटकीय वृद्धि हुई।
  • परिणाम यह हुआ कि भारत के कुल निर्यात में सूती माल का हिस्सा 1811-12 के 33 प्रतिशत से घटकर 1850-51 में मात्र 3 प्रतिशत रह गया, जबकि भारतीय आयात में सूती कपड़े का हिस्सा 1850 में 31 प्रतिशत और 1870 तक 50 प्रतिशत से ऊपर चला गया।

10भारत में शुरुआती उद्योग किन लोगों ने लगाए?

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उत्तर:

  • बंगाल में द्वारकानाथ टैगोर ने चीन के साथ व्यापार में ख़ूब पैसा कमाया और उद्योगों में निवेश करने लगे; 1830–1840 के दशकों में उन्होंने 6 संयुक्त उद्यम कंपनियाँ लगा ली थीं।
  • बंबई में डिनशॉ पेटिट और जमशेदजी नुसरवानजी टाटा जैसे पारसियों ने आंशिक रूप से चीन को निर्यात करके और आंशिक रूप से इंग्लैंड को कच्ची कपास निर्यात करके पैसा कमा लिया था; टाटा आगे चलकर देश में विशाल औद्योगिक साम्राज्य स्थापित करने वाले बने।
  • 1917 में कलकत्ता में देश की पहली जूट मिल लगाने वाले मारवाड़ी व्यवसायी सेठ हुकुमचंद ने भी चीन के साथ व्यापार किया था, और यही काम प्रसिद्ध उद्योगपति जी.डी. बिड़ला के पिता और दादा ने किया था।

11मज़दूरों को नौकरी पाना क्यों मुश्किल था और जॉबर ने क्या भूमिका निभाई?

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उत्तर:

  • हालाँकि मिलों की संख्या बढ़ती जा रही थी और मज़दूरों की माँग भी बढ़ रही थी, लेकिन रोज़गार चाहने वालों की संख्या रोज़गारों के मुक़ाबले हमेशा ज़्यादा रहती थी और मिलों में प्रवेश भी निषिद्ध था।
  • इसलिए उद्योगपति नए मज़दूरों की भर्ती के लिए प्राय: एक जॉबर रखते थे, जो कोई पुराना और विश्वस्त कर्मचारी होता था। वह अपने गाँव से लोगों को लाता था, उन्हें काम का भरोसा देता था, शहर में जमने के लिए मदद देता था और मुसीबत में पैसे से मदद करता था।
  • इस प्रकार जॉबर ताक़तवर और मज़बूत व्यक्ति बन गया था; बाद में जॉबर मदद के बदले पैसे व तोहफ़ों की माँग करने लगे और मज़दूरों की ज़िंदगी को नियंत्रित करने लगे। इन्हें अलग-अलग इलाक़ों में ‘सरदार’ या ‘मिस्त्री’ भी कहते थे।

12बीसवीं सदी की शुरुआत में भारतीय औद्योगीकरण में कौन-से तीन बदलाव आए?

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उत्तर:

  • स्वदेशी आंदोलन को गति मिलने से राष्ट्रवादियों ने लोगों को विदेशी कपड़े के बहिष्कार के लिए प्रेरित किया।
  • औद्योगिक समूह अपने सामूहिक हितों की रक्षा के लिए संगठित हो गए और उन्होंने आयात शुल्क बढ़ाने तथा अन्य रियायतें देने के लिए सरकार पर दबाव डाला।
  • 1906 के बाद चीन भेजे जाने वाले भारतीय धागे के निर्यात में कमी आने लगी थी क्योंकि चीनी बाज़ारों में चीन और जापान की मिलों के उत्पाद छा गए थे; फलस्वरूप भारत के उद्योगपति धागे की बजाय कपड़ा बनाने लगे और 1900 से 1912 के बीच भारत में सूती कपड़े का उत्पादन दोगुना हो गया।

13भारत में बड़े उद्योगों का हिस्सा बहुत छोटा था — इसे आँकड़ों से सिद्ध कीजिए।

उत्तर देखिए

उत्तर:

  • 1911 में बड़े उद्योगों में से ज़्यादातर — 67 प्रतिशत — बंगाल और बंबई में स्थित थे, और बाक़ी पूरे देश में छोटे स्तर के उत्पादन का ही दबदबा रहा।
  • पंजीकृत फ़ैक्ट्रियों में कुल औद्योगिक श्रम शक्ति का बहुत छोटा हिस्सा ही काम करता था — यह संख्या 1911 में 5 प्रतिशत और 1931 में 10 प्रतिशत थी।
  • बाक़ी मज़दूर गली-मोहल्लों में स्थित छोटी-छोटी वर्कशॉप और घरेलू इकाइयों में काम करते थे; इसके अलावा 1900 से 1940 के बीच हथकरघों पर बने कपड़े का उत्पादन तीन गुना हो चुका था।

14बीसवीं सदी में हथकरघा उद्योग कैसे बचा रहा?

उत्तर देखिए

उत्तर:

  • इसके पीछे आंशिक रूप से तकनीकी बदलावों का हाथ था। बीसवीं सदी के दूसरे दशक तक बुनकर फ़्लाई शटल वाले करघों का इस्तेमाल करने लगे थे, जिससे कामगारों की उत्पादन क्षमता बढ़ी, उत्पादन तेज़ हुआ और श्रम की माँग में कमी आई। 1941 तक भारत में 35 प्रतिशत से ज़्यादा हथकरघों में फ़्लाई शटल लगे हुए थे।
  • दूसरा कारण यह था कि बेहतर क़िस्म के कपड़े की माँग खाते-पीते तबक़े में ज़्यादा थी जिसमें उतार-चढ़ाव कम आते थे; अकालों से बनारसी या बालूचरी साड़ियों की बिक्री पर असर नहीं पड़ता था।
  • तीसरा कारण यह था कि मिल विशेष प्रकार की बुनाई की नक़ल नहीं कर सकते थे; बुने हुए बॉर्डर वाली साड़ियों या मद्रास की प्रसिद्ध लुंगियों की जगह ले लेना मिलों के लिए आसान नहीं था।

15मैनचेस्टर के लेबल किस काम आते थे?

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उत्तर:

  • लेबल का फ़ायदा यह होता था कि ख़रीदारों को कंपनी का नाम व उत्पादन की जगह पता चल जाती थी, और लेबल ही चीज़ों की गुणवत्ता का प्रतीक भी था।
  • जब किसी लेबल पर मोटे अक्षरों में ‘मेड इन मैनचेस्टर’ लिखा दिखाई देता तो ख़रीदारों को कपड़ा ख़रीदने में किसी तरह का डर नहीं रहता था।
  • लेबलों पर सिर्फ़ शब्द और अक्षर ही नहीं होते थे, उन पर तसवीरें भी बनी होती थीं जो अकसर बहुत सुंदर होती थीं; इनसे उनके निर्माताओं की सोच और लोगों को आकर्षित करने के उनके तरीक़ों का अंदाज़ा लगाया जा सकता है।

16विज्ञापनों में देवताओं और महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों का इस्तेमाल क्यों होता था?

उत्तर देखिए

उत्तर:

  • लेबलों पर भारतीय देवी-देवताओं की तसवीरें प्राय: होती थीं; इनके बहाने निर्माता यह दिखाने की कोशिश करते थे कि ईश्वर भी चाहता है कि लोग उस चीज़ को ख़रीदें।
  • कृष्ण या सरस्वती की तसवीरों का फ़ायदा यह होता था कि विदेशों में बनी चीज़ भी भारतीयों को जानी-पहचानी सी लगती थी।
  • देवताओं की तसवीरों की तरह महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों, सम्राटों व नवाबों की तसवीरें भी विज्ञापनों व कैलेंडरों में ख़ूब इस्तेमाल होती थीं; इनका संदेश यह होता था कि अगर आप इस शाही व्यक्ति का सम्मान करते हैं तो इस उत्पाद का भी सम्मान कीजिए, और अगर इस उत्पाद को राजा इस्तेमाल करते हैं तो उसकी गुणवत्ता पर सवाल खड़ा नहीं किया जा सकता।

भाग घ — निबंधात्मक प्रश्न (4 अंक)

1उन्नीसवीं सदी के यूरोप में कुछ उद्योगपति मशीनों की बजाय हाथ से काम करने वाले श्रमिकों को प्राथमिकता क्यों देते थे?

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उत्तर: विक्टोरिया कालीन ब्रिटेन में मशीनों की भरमार होने के बावजूद बहुत सारे उद्योगपति हाथ से काम करने वाले श्रमिकों को ही प्राथमिकता देते थे। इसके निम्नलिखित कारण थे —

  1. विक्टोरिया कालीन ब्रिटेन में मानव श्रम की कोई कमी नहीं थी। ग़रीब किसान और बेकार लोग कामकाज की तलाश में बड़ी संख्या में शहरों को जाते थे।
  2. जब श्रमिकों की बहुतायत होती है तो वेतन गिर जाते हैं। इसीलिए उद्योगपतियों को श्रमिकों की कमी या वेतन के मद में भारी लागत जैसी कोई परेशानी नहीं थी। उन्हें ऐसी मशीनों में कोई दिलचस्पी नहीं थी जिनके कारण मज़दूरों से छुटकारा मिल जाए और जिन पर बहुत ज़्यादा ख़र्चा आने वाला हो।
  3. बहुत सारे उद्योगों में श्रमिकों की माँग मौसमी आधार पर घटती-बढ़ती रहती थी। गैसघरों और शराबख़ानों में जाड़ों के दौरान ख़ासा काम रहता था, क्रिसमस के समय बुक बाइंडरों और प्रिंटरों को अतिरिक्त मज़दूरों की दरकार रहती थी और बंदरगाहों पर जहाज़ों की मरम्मत जाड़ों में होती थी। ऐसे उद्योगों में उद्योगपति मशीनों की बजाय मज़दूरों को ही काम पर रखना पसंद करते थे।
  4. मशीनों से एक जैसे तय क़िस्म के उत्पाद ही बड़ी संख्या में बनाए जा सकते थे, लेकिन बाज़ार में बारीक डिज़ाइन और ख़ास आकारों वाली चीज़ों की काफ़ी माँग रहती थी। ब्रिटेन में उन्नीसवीं सदी के मध्य में 500 तरह के हथौड़े और 45 तरह की कुल्हाड़ियाँ बनाई जा रही थीं, जिनके लिए यांत्रिक प्रौद्योगिकी की नहीं बल्कि इनसानी निपुणता की ज़रूरत थी।
  5. उच्च वर्ग के लोग — कुलीन और पूँजीपति वर्ग — हाथों से बनी चीज़ों को तरजीह देते थे, क्योंकि उन्हें परिष्कार और सुरुचि का प्रतीक माना जाता था। उनकी फ़िनिश अच्छी होती थी और उनका डिज़ाइन अच्छा होता था।

निष्कर्षमशीनों से बनने वाले उत्पादों को उपनिवेशों में निर्यात कर दिया जाता था। इसके विपरीत उन्नीसवीं सदी के अमेरिका में मज़दूरों की कमी थी, इसलिए वहाँ उद्योगपति मशीनों का इस्तेमाल करना ज़्यादा पसंद करते थे।


2ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारतीय बुनकरों से सूती और रेशमी कपड़े की नियमित आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए क्या किया?

उत्तर देखिए

उत्तर: 1760 और 1770 के दशकों में राजनीतिक सत्ता स्थापित होने से पहले कंपनी को निर्यात के लिए लगातार सप्लाई आसानी से नहीं मिल पाती थी, क्योंकि फ़्रांसीसी, डच, पुर्तगाली और स्थानीय व्यापारी भी होड़ में रहते थे और बुनकर अपना माल सबसे ऊँची बोली लगाने वाले को बेचते थे। लेकिन सत्ता स्थापित होने के बाद कंपनी ने प्रतिस्पर्धा ख़त्म करने, लागतों पर अंकुश रखने और नियमित आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए प्रबंधन और नियंत्रण की एक नयी व्यवस्था लागू कर दी। यह काम कई चरणों में किया गया —

  1. कंपनी ने कपड़ा व्यापार में सक्रिय व्यापारियों और दलालों को ख़त्म करने तथा बुनकरों पर ज़्यादा प्रत्यक्ष नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश की।
  2. कंपनी ने बुनकरों पर निगरानी रखने, माल इकट्ठा करने और कपड़ों की गुणवत्ता जाँचने के लिए वेतनभोगी कर्मचारी तैनात कर दिए, जिन्हें गुमाश्ता कहा जाता था।
  3. कंपनी को माल बेचने वाले बुनकरों को अन्य ख़रीदारों के साथ कारोबार करने पर पाबंदी लगा दी गई और इसके लिए उन्हें पेशगी रक़म दी जाती थी।
  4. एक बार काम का ऑर्डर मिलने पर बुनकरों को कच्चा माल ख़रीदने के लिए क़र्ज़ा दे दिया जाता था। जो क़र्ज़ा लेते थे उन्हें अपना बनाया हुआ कपड़ा गुमाश्ता को ही देना पड़ता था और वे उसे किसी और व्यापारी को नहीं बेच सकते थे।
  5. नए गुमाश्ता बाहर के लोग थे जिनका गाँवों से पुराना सामाजिक संबंध नहीं था। वे दंभपूर्ण व्यवहार करते थे, सिपाहियों व चपरासियों को लेकर आते थे और माल समय पर तैयार न होने पर बुनकरों को पीटते व कोड़े बरसाते थे।

निष्कर्षइस व्यवस्था से बुनकर न तो दाम पर मोलभाव कर सकते थे और न ही किसी और को माल बेच सकते थे। इसीलिए बहुत सारे बुनकर गाँव छोड़कर चले गए, कुछ ने बग़ावत कर दी और कुछ ने करघे बंद करके खेतों में मज़दूरी करना शुरू कर दिया।


3पहले विश्व युद्ध के समय भारत का औद्योगिक उत्पादन क्यों बढ़ा?

उत्तर देखिए

उत्तर: पहले विश्व युद्ध तक भारत में औद्योगिक विकास धीमा रहा था, लेकिन युद्ध ने एक बिलकुल नयी स्थिति पैदा कर दी। इसके निम्नलिखित कारण थे —

  1. ब्रिटिश कारख़ाने सेना की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए युद्ध संबंधी उत्पादन में व्यस्त थे, इसलिए भारत में मैनचेस्टर के माल का आयात कम हो गया।
  2. भारतीय बाज़ारों को रातोंरात एक विशाल देशी बाज़ार मिल गया।
  3. युद्ध लंबा खिंचा तो भारतीय कारख़ानों में भी फ़ौज के लिए जूट की बोरियाँ, फ़ौजियों के लिए वर्दी के कपड़े, टेंट और चमड़े के जूते, घोड़े व खच्चर की जीन तथा बहुत सारे अन्य सामान बनने लगे।
  4. नए कारख़ाने लगाए गए और पुराने कारख़ाने कई पालियों में चलने लगे।
  5. बहुत सारे नए मज़दूरों को काम पर रखा गया और हरेक को पहले से भी ज़्यादा समय तक काम करना पड़ता था।

निष्कर्षयुद्ध के दौरान औद्योगिक उत्पादन तेज़ी से बढ़ा। युद्ध के बाद भी भारतीय बाज़ार में मैनचेस्टर को पहले वाली हैसियत कभी हासिल नहीं हो पाई, क्योंकि ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था चरमरा गई थी और उपनिवेशों में स्थानीय उद्योगपतियों ने घरेलू बाज़ारों पर क़ब्ज़ा कर लिया।


4भारत में औद्योगिक विकास का अनूठापन क्या था?

उत्तर देखिए

उत्तर: भारत का औद्योगीकरण यूरोप जैसा नहीं था। यहाँ फ़ैक्ट्री उद्योगों के बढ़ने के बावजूद छोटे पैमाने का और हाथ का उत्पादन ख़त्म नहीं हुआ, बल्कि कई मामलों में बढ़ गया।

  1. अर्थव्यवस्था में विशाल उद्योगों का हिस्सा बहुत छोटा था। 1911 में बड़े उद्योगों में से ज़्यादातर — 67 प्रतिशत — बंगाल और बंबई में स्थित थे और बाक़ी पूरे देश में छोटे स्तर के उत्पादन का ही दबदबा रहा।
  2. पंजीकृत फ़ैक्ट्रियों में कुल औद्योगिक श्रम शक्ति का बहुत छोटा हिस्सा ही काम करता था — 1911 में 5 प्रतिशत और 1931 में 10 प्रतिशत। बाक़ी मज़दूर गली-मोहल्लों में स्थित छोटी-छोटी वर्कशॉप और घरेलू इकाइयों में काम करते थे।
  3. कुछ मामलों में तो बीसवीं सदी के दौरान हाथ से होने वाले उत्पादन में दरअसल इज़ाफ़ा हुआ था; 1900 से 1940 के बीच हथकरघों पर बने कपड़े का उत्पादन तीन गुना हो चुका था।
  4. इसका एक कारण तकनीकी बदलाव थे। बीसवीं सदी के दूसरे दशक तक बुनकर फ़्लाई शटल वाले करघों का इस्तेमाल करने लगे थे, जिससे उत्पादन क्षमता बढ़ी और श्रम की माँग में कमी आई। 1941 तक भारत में 35 प्रतिशत से ज़्यादा हथकरघों में फ़्लाई शटल लगे हुए थे।
  5. दूसरा कारण यह था कि मिलें विशेष प्रकार की बुनाई की नक़ल नहीं कर सकती थीं; बुने हुए बॉर्डर वाली साड़ियों या मद्रास की प्रसिद्ध लुंगियों की जगह ले लेना उनके लिए आसान नहीं था।

निष्कर्षइसका यह अर्थ नहीं है कि बुनकरों की ज़िंदगी आसान थी। उन्हें दिन-रात काम करना पड़ता था और अकसर पूरा परिवार — बच्चे, बूढ़े, औरतें — उत्पादन के किसी न किसी काम में हाथ बढ़ाता था। लेकिन जैसा पाठ्यपुस्तक कहती है, “ये फ़ैक्ट्रियों के युग में अतीत के अवशेष भर नहीं थे। उनका जीवन और श्रम औद्योगीकरण की प्रक्रिया का अभिन्न अंग थे।”


5उन्नीसवीं सदी में भारतीय बुनकरों की तबाही के कारणों की व्याख्या कीजिए।

उत्तर देखिए

उत्तर: 1772 में ईस्ट इंडिया कंपनी के अफ़सर हेनरी पतुलो ने कहा था कि भारतीय कपड़े की माँग कभी कम नहीं हो सकती, लेकिन उन्नीसवीं सदी में भारतीय बुनकरों पर एक के बाद एक चार मार पड़ीं —

  1. पहली मार — इंग्लैंड ने अपना बाज़ार बंद कर दिया। जब वहाँ कपास उद्योग विकसित हुआ तो उद्योगपतियों ने सरकार पर दबाव डालकर आयातित कपड़ों पर आयात शुल्क लगवा दिया, जिससे भारतीय कपड़े को ब्रिटिश बाज़ार से बेदख़ल होना पड़ा और दूसरे अंतर्राष्ट्रीय बाज़ारों में भी भारी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ा। भारत के निर्यात में सूती माल का हिस्सा 1811-12 के 33 प्रतिशत से घटकर 1850-51 में मात्र 3 प्रतिशत रह गया।
  2. दूसरी मार — भारत का बाज़ार खोल दिया गया। ब्रिटिश उद्योगपतियों ने कंपनी पर दबाव डाला कि वह ब्रिटिश कपड़ों को भारतीय बाज़ारों में भी बेचे। भारतीय आयात में सूती कपड़े का हिस्सा 1850 में 31 प्रतिशत और 1870 तक 50 प्रतिशत से ऊपर चला गया। कम लागत पर मशीनों से बनने वाले आयातित उत्पाद इतने सस्ते थे कि बुनकर उनका मुक़ाबला नहीं कर सकते थे।
  3. तीसरी मार — कच्चे माल का संकट। 1860 के दशक में जब अमेरिकी गृहयुद्ध शुरू हुआ और अमेरिका से कपास की आमद बंद हो गई तो ब्रिटेन भारत से कच्चा माल मँगाने लगा। इससे कपास की क़ीमत आसमान छूने लगी और भारतीय बुनकरों को मनमानी क़ीमत पर कच्ची कपास ख़रीदनी पड़ती थी।
  4. चौथी मार — भारतीय कारख़ाने। उन्नीसवीं सदी के आख़िर में भारतीय कारख़ानों में भी उत्पादन होने लगा और बाज़ार मशीनों की बनी चीज़ों से पट गया।

निष्कर्षइसका परिणाम यह हुआ कि 1850 के दशक तक देश के ज़्यादातर बुनकर इलाक़ों में गिरावट और बेकारी के ही क़िस्सों की भरमार थी। पटना के आयुक्त ने लिखा कि जहानाबाद में कपड़े का उत्पादन बिलकुल बंद हो गया है और यह “मैनचेस्टर में बनी सस्ती और टिकाऊ वस्तुओं का परिणाम है जिससे स्थानीय निर्माता प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकते।”


6भारत में फ़ैक्ट्रियों के उदय और प्रारंभिक उद्यमियों का वर्णन कीजिए।

उत्तर देखिए

उत्तर: उन्नीसवीं सदी के मध्य से भारत में आधुनिक फ़ैक्ट्री उद्योग की शुरुआत हुई।

  1. बंबई में पहली कपड़ा मिल 1854 में लगी और दो साल बाद उसमें उत्पादन होने लगा। 1862 में वहाँ ऐसी चार मिलें काम कर रही थीं, जिनमें 94,000 तकलियाँ और 2,150 करघे थे।
  2. उसी समय बंगाल में जूट मिलें खुलने लगीं। वहाँ देश की पहली जूट मिल 1855 में और दूसरी 7 साल बाद 1862 में चालू हुई। उत्तरी भारत में एल्गिन मिल 1860 के दशक में कानपुर में खुली, साल भर बाद अहमदाबाद की पहली कपड़ा मिल चालू हुई और 1874 में मद्रास में भी पहली कताई और बुनाई मिल खुल गई।
  3. पूँजी का सबसे बड़ा स्रोत चीन के साथ व्यापार था। अठारहवीं सदी के आख़िर से अंग्रेज़ भारतीय अफ़ीम का चीन को निर्यात करने लगे थे और उसके बदले चाय ख़रीदते थे; इस व्यापार में बहुत सारे भारतीय कारोबारी सहायक की हैसियत में पहुँच गए थे और व्यापार से पैसा कमाने के बाद उनमें से कुछ भारत में औद्योगिक उद्यम स्थापित करना चाहते थे।
  4. बंगाल में द्वारकानाथ टैगोर ने 1830–1840 के दशकों में 6 संयुक्त उद्यम कंपनियाँ लगाईं; बंबई में डिनशॉ पेटिट और जमशेदजी नुसरवानजी टाटा जैसे पारसियों ने चीन के निर्यात और इंग्लैंड को कच्ची कपास बेचकर पैसा कमाया; मारवाड़ी व्यवसायी सेठ हुकुमचंद ने 1917 में कलकत्ता में देश की पहली जूट मिल लगाई; और यही काम जी.डी. बिड़ला के पिता और दादा ने किया था।
  5. कुछ अन्य वाणिज्यिक समूह विदेश व्यापार से जुड़े हुए नहीं थे — वे एक जगह से दूसरी जगह माल ले जाते थे, सूद पर पैसा चलाते थे और व्यापारियों को पैसा देते थे; जब उद्योगों में निवेश के अवसर आए तो उनमें से बहुतों ने फ़ैक्ट्रियाँ लगा लीं।

निष्कर्षलेकिन पहले विश्वयुद्ध तक भारतीय उद्योगों के विशाल क्षेत्र पर यूरोपीय प्रबंधकीय एजेंसियों — बर्ड हीगलर्स एंड कंपनी, एंड्रयू यूल और जार्डीन स्किनर एंड कंपनी — का ही नियंत्रण था। ज़्यादातर मामलों में भारतीय वित्तपोषक पूँजी उपलब्ध कराते थे जबकि निवेश और व्यवसाय से संबंधित फ़ैसले यूरोपीय एजेंसियाँ लेती थीं।


7विज्ञापनों ने नयी उपभोक्ता संस्कृति रचने में क्या भूमिका निभाई?

उत्तर देखिए

उत्तर: जब नयी चीज़ें बनती हैं तो लोगों को उन्हें ख़रीदने के लिए प्रेरित भी करना पड़ता है। इसके लिए विज्ञापन का सहारा लिया गया।

  1. विज्ञापन विभिन्न उत्पादों को ज़रूरी और वांछनीय बना देते हैं। वे लोगों की सोच बदल देते हैं और नयी ज़रूरतें पैदा कर देते हैं। औद्योगीकरण की शुरुआत से ही विज्ञापनों ने विभिन्न उत्पादों के बाज़ार को फैलाने में और एक नयी उपभोक्ता संस्कृति रचने में अपनी भूमिका निभाई है।
  2. जब मैनचेस्टर के उद्योगपतियों ने भारत में कपड़ा बेचना शुरू किया तो वे कपड़े के बंडलों पर लेबल लगाते थे। इससे ख़रीदारों को कंपनी का नाम व उत्पादन की जगह पता चल जाती थी और लेबल ही चीज़ों की गुणवत्ता का प्रतीक भी था। जब किसी लेबल पर मोटे अक्षरों में ‘मेड इन मैनचेस्टर’ लिखा दिखाई देता तो ख़रीदारों को कपड़ा ख़रीदने में किसी तरह का डर नहीं रहता था।
  3. इन लेबलों पर भारतीय देवी-देवताओं की तसवीरें प्राय: होती थीं। देवी-देवताओं की तसवीर के बहाने निर्माता यह दिखाने की कोशिश करते थे कि ईश्वर भी चाहता है कि लोग उस चीज़ को ख़रीदें, और कृष्ण या सरस्वती की तसवीरों का फ़ायदा यह होता था कि विदेशों में बनी चीज़ भी भारतीयों को जानी-पहचानी सी लगती थी।
  4. उन्नीसवीं सदी के आख़िर में निर्माता कैलेंडर छपवाने लगे थे। अख़बारों और पत्रिकाओं को तो पढ़े-लिखे लोग ही समझ सकते थे लेकिन कैलेंडर उनको भी समझ में आ जाते थे जो पढ़ नहीं सकते थे। चाय की दुकानों, दफ़्तरों व मध्यवर्गीय घरों में ये कैलेंडर लटकते रहते थे और लोग विज्ञापन को हर रोज़, पूरे साल देखते थे।
  5. देवताओं की तरह महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों, सम्राटों व नवाबों की तसवीरें भी ख़ूब इस्तेमाल होती थीं। इनका संदेश यह होता था कि अगर आप इस शाही व्यक्ति का सम्मान करते हैं तो इस उत्पाद का भी सम्मान कीजिए।

निष्कर्षजब भारतीय निर्माताओं ने विज्ञापन बनाए तो उनमें राष्ट्रवादी संदेश साफ़ दिखाई देता था — कि अगर आप राष्ट्र की परवाह करते हैं तो उन चीज़ों को ख़रीदिए जिन्हें भारतीयों ने बनाया है। इस तरह ये विज्ञापन स्वदेशी के राष्ट्रवादी संदेश के वाहक बन गए थे।


8‘औद्योगीकरण की तसवीरें पूरी सच्चाई नहीं बतातीं’ — इस कथन की व्याख्या कीजिए।

उत्तर देखिए

उत्तर: अध्याय की शुरुआत में दी गई दो तसवीरें — ‘डॉन ऑफ़ द सेंचुरी’ (1900) और ‘दो जादूगर’ (1901) — आधुनिक विश्व की विजयगाथा कहती हैं। पहली में प्रगति की देवी के पीछे रेलवे, कैमरा, मशीनें, प्रिंटिंग प्रेस और कारख़ाना दिखाई देते हैं, और दूसरी में आधुनिक मेकैनिक पुल, जहाज़ और गगनचुंबी इमारतें बनाता दिखता है। लेकिन ये तसवीरें पूरी सच्चाई नहीं बतातीं —

  1. औद्योगीकरण उतना तेज़ नहीं था। उन्नीसवीं सदी के आख़िर में भी तकनीकी रूप से विकसित औद्योगिक क्षेत्र में काम करने वाले मज़दूरों की संख्या कुल मज़दूरों में 20 प्रतिशत से ज़्यादा नहीं थी, और उन्नीसवीं सदी की शुरुआत तक पूरे इंग्लैंड में भाप के सिर्फ़ 321 इंजन थे।
  2. मशीनों ने सबका जीवन बेहतर नहीं किया। जब ऊन उद्योग में स्पिनिंग जेनी का इस्तेमाल शुरू हुआ तो हाथ से ऊन कातने वाली औरतों का काम छिन गया और वे मशीनों पर हमला करने लगीं।
  3. मज़दूरों की ज़िंदगी कठिन थी। उन्नीसवीं सदी के मध्य में सबसे अच्छे हालात में भी लगभग 10 प्रतिशत शहरी आबादी निहायत ग़रीब थी और 1830 के दशक की मंदी में बेरोज़गारी 35 से 75 प्रतिशत तक पहुँच जाती थी।
  4. उपनिवेशों में यह और भी क्रूर था। भारत के निर्यात में सूती माल का हिस्सा 33 प्रतिशत से घटकर 3 प्रतिशत रह गया और लाखों बुनकर बेरोज़गार हो गए। गुमाश्तों की व्यवस्था में बुनकरों को पीटा जाता था और कोड़े बरसाए जाते थे।
  5. और यह सब होते हुए भी हाथ का उत्पादन ख़त्म नहीं हुआ। भारत में 1911 में केवल 5 प्रतिशत और 1931 में 10 प्रतिशत औद्योगिक श्रम शक्ति ही पंजीकृत फ़ैक्ट्रियों में काम करती थी, जबकि 1900 से 1940 के बीच हथकरघों पर बने कपड़े का उत्पादन तीन गुना हो गया।

निष्कर्षजैसा पाठ्यपुस्तक कहती है — “इस युग में हाथ से बनने वाली चीज़ें और छोटे पैमाने का उत्पादन भी औद्योगिक भूदृश्य का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा रहा है।” इसलिए औद्योगीकरण की चमकदार तसवीरों के पीछे छिपी इस दूसरी सच्चाई को भी देखना ज़रूरी है।

भाग ङ — स्रोत-आधारित प्रश्न (4 अंक)

स्रोत 1 — काम की तलाश में

“मैं हमेशा लंदन जाना चाहता था। मेरी इच्छा हमेशा एक पुराने दोस्त के ख़तों को पढ़कर और मज़बूत हो जाती थी… वह ओल्ड केंट रोड गैस वर्क्स में काम करता है। आख़िरकार मैंने जाने का मन बना लिया… नवंबर 1881 में। दो दोस्तों के साथ मैं सफ़र पर निकल पड़ा। हम इस आशा से भरे हुए थे कि वहाँ पहुँचते ही अपने दोस्त की मदद से हमें रोज़गार मिल जाएगा… लंदन तक के रास्ते के लिए खाने और रात को ठहरने का पैसा भी नहीं था। कई दिन हम 20 मील और कई बार उससे कम पैदल चलते थे… तीसरे दिन हमारे पैसे ख़त्म हो गए… दो रातें हमने बाहर ही सोते हुए गुज़ारीं…” — बिल थोर्न, मौसमी काम की तलाश में निकलने वाले मज़दूरों में से एक (स्रोत-क)

प्रश्न: (क) बिल थोर्न लंदन क्यों जाना चाहते थे? (1) (ख) उन्हें रास्ते में क्या-क्या कठिनाइयाँ झेलनी पड़ीं? (1) (ग) इस स्रोत से उन्नीसवीं सदी के मज़दूरों की स्थिति के बारे में क्या पता चलता है? (2)

उत्तर देखिए

उत्तर: (क) वे लंदन जाना चाहते थे क्योंकि उनका एक पुराना दोस्त वहाँ ओल्ड केंट रोड गैस वर्क्स में काम करता था और उन्हें आशा थी कि उसकी मदद से उन्हें भी रोज़गार मिल जाएगा। (ख) उनके पास रास्ते के लिए खाने और रात को ठहरने का पैसा नहीं था; वे कई दिन 20 मील और कई बार उससे कम पैदल चलते थे, तीसरे दिन उनके पैसे ख़त्म हो गए और उन्हें दो रातें खुले में सोकर गुज़ारनी पड़ीं। (ग) इससे पता चलता है कि नौकरी मिलने की संभावना यारी-दोस्ती और जान-पहचान पर निर्भर करती थी, और रोज़गार चाहने वाले लोगों को काम की तलाश में सैकड़ों मील पैदल चलना पड़ता था। यह भी पता चलता है कि उनके पास न रहने की जगह थी न खाने का साधन, और वे पुलों के नीचे या रैन-बसेरों में रातें काटते थे। यानी औद्योगीकरण की चमक के पीछे मज़दूर की ज़िंदगी बहुत कठिन थी।


स्रोत 2 — स्पिनिंग जेनी पर हमला

“कोयला मज़दूरों और उनकी बीवियों के गिरोह की परेशानी के कारण… क्योंकि उनकी बीवियों का काम स्पिनिंग इंजन के कारण छिन गया था… शुरू में वे बड़े अड़ियल ढंग से आगे बढ़े। ऊन उत्पादन में अभी अपनाई गई मशीनों को वे टुकड़े-टुकड़े कर देना चाहते थे क्योंकि उनकी वजह से शारीरिक श्रम की माँग घटने वाली थी। औरतों ने हंगामा मचाया हुआ था। आदमियों को समझाना आसान था इसलिए कुछ खींचतान के बाद उन्हें शांतिपूर्वक घर जाने के लिए तैयार कर लिया गया।” — एक मजिस्ट्रेट की 1790 की रिपोर्ट (स्रोत-ख)

प्रश्न: (क) मज़दूरों की बीवियों का काम क्यों छिन गया था? (1) (ख) वे मशीनों को टुकड़े-टुकड़े क्यों कर देना चाहते थे? (1) (ग) स्पिनिंग जेनी क्या थी और इसने कताई उद्योग को कैसे बदला? (2)

उत्तर देखिए

उत्तर: (क) उनकी बीवियों का काम स्पिनिंग इंजन यानी स्पिनिंग जेनी मशीन के आ जाने के कारण छिन गया था। (ख) वे मशीनों को टुकड़े-टुकड़े कर देना चाहते थे क्योंकि उनकी वजह से शारीरिक श्रम की माँग घटने वाली थी, जिससे उनकी बेरोज़गारी बढ़ जाती। (ग) स्पिनिंग जेनी जेम्स हरग्रीव्ज़ द्वारा 1764 में बनाई गई मशीन थी। इसने कताई की प्रक्रिया तेज़ कर दी और मज़दूरों की माँग घटा दी, क्योंकि एक ही पहिया घुमाने वाला एक मज़दूर बहुत सारी तकलियों को घुमा देता था और एक साथ कई धागे बनने लगते थे। इसी कारण हाथ से ऊन कातने वाली औरतें इस तरह की मशीनों पर हमला करने लगीं और जेनी के इस्तेमाल पर यह टकराव लंबे समय तक चलता रहा।


स्रोत 3 — पटना के आयुक्त की रिपोर्ट

“ऐसा लगता है कि 20 साल पहले जहानाबाद और बिहार में कपड़ों का बड़े पैमाने पर उत्पादन होता था। जहानाबाद में यह बिल्कुल बंद हो गया है जबकि बिहार में बहुत कम उत्पादन होता है। यह मैनचेस्टर में बनी सस्ती और टिकाऊ वस्तुओं का परिणाम है जिससे स्थानीय निर्माता प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकते।” — जे. कृष्णमूर्ति के लेख में उद्धृत (स्रोत-ग)

प्रश्न: (क) जहानाबाद में कपड़ों के उत्पादन की क्या स्थिति हो गई थी? (1) (ख) इसका मुख्य कारण क्या बताया गया है? (1) (ग) मैनचेस्टर का कपड़ा भारतीय बुनकरों के लिए इतना बड़ा ख़तरा क्यों बन गया? (2)

उत्तर देखिए

उत्तर: (क) जहाँ 20 साल पहले वहाँ कपड़ों का बड़े पैमाने पर उत्पादन होता था, वहाँ अब यह बिलकुल बंद हो गया था; बिहार में भी बहुत कम उत्पादन होता था। (ख) इसका मुख्य कारण मैनचेस्टर में बनी सस्ती और टिकाऊ वस्तुएँ बताई गई हैं, जिनसे स्थानीय निर्माता प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकते थे। (ग) मैनचेस्टर के कपड़े कम लागत पर मशीनों से बनते थे, इसलिए वे इतने सस्ते थे कि हाथ से बुनने वाले भारतीय बुनकर उनका मुक़ाबला नहीं कर सकते थे। ब्रिटिश उद्योगपतियों के दबाव में ईस्ट इंडिया कंपनी ने ब्रिटिश कपड़ों को भारतीय बाज़ारों में बेचना शुरू कर दिया था, जिससे भारतीय आयात में सूती कपड़े का हिस्सा 1850 में 31 प्रतिशत और 1870 तक 50 प्रतिशत से ऊपर चला गया। इस तरह बुनकर का स्थानीय बाज़ार भी सिकुड़ गया और उसका निर्यात बाज़ार भी ढह गया।


स्रोत 4 — मिल मज़दूर और उसका गाँव

“मज़दूर अपने बेटों को मिल में काम पर रखवाने के लिए जॉबर को पैसा देते थे… मिल मज़दूर शारीरिक और भावनात्मक रूप से उसके गाँव से गहरे तौर पर जुड़े होते थे। वह गाँव जाकर फ़सलों की कटाई करता था। कोंकणी लोग धान काटने और घाटी यानी गन्ना काटने गाँव में जाते थे। यह एक स्वीकृत व्यवस्था थी जिसके लिए मिल वाले छुट्टी दे देते थे।” — बंबई के एक मिल मज़दूर वसंत पारकर (स्रोत-ङ)

प्रश्न: (क) मज़दूर जॉबर को पैसा क्यों देते थे? (1) (ख) मिल मज़दूर गाँव क्यों जाते थे? (1) (ग) इस स्रोत के आधार पर जॉबर की भूमिका समझाइए। (2)

उत्तर देखिए

उत्तर: (क) मज़दूर अपने बेटों को मिल में काम पर रखवाने के लिए जॉबर को पैसा देते थे। (ख) मिल मज़दूर शारीरिक और भावनात्मक रूप से अपने गाँव से गहरे तौर पर जुड़े होते थे और फ़सलों की कटाई के लिए गाँव जाते थे — कोंकणी लोग धान काटने और घाटी के लोग गन्ना काटने जाते थे। (ग) जॉबर कोई पुराना और विश्वस्त कर्मचारी होता था, जिसे उद्योगपति नए मज़दूरों की भर्ती के लिए रखते थे। वह अपने गाँव से लोगों को लाता था, उन्हें काम का भरोसा देता था, शहर में जमने के लिए मदद देता था और मुसीबत में पैसे से मदद करता था। इस प्रकार जॉबर ताक़तवर और मज़बूत व्यक्ति बन गया, और बाद में जॉबर मदद के बदले पैसे व तोहफ़ों की माँग करने लगे तथा मज़दूरों की ज़िंदगी को नियंत्रित करने लगे।

भाग च — चित्र-आधारित अभ्यास

इस अध्याय से बोर्ड परीक्षा में मानचित्र का प्रश्न नहीं आता, लेकिन चित्रों पर आधारित प्रश्न पूछे जा सकते हैं और पाठ्यपुस्तक की गतिविधियाँ भी चित्रों पर ही आधारित हैं।

1चित्र 1 (‘डॉन ऑफ़ द सेंचुरी’, 1900) में क्या-क्या दिखाया गया है?

उत्तर देखिए

उत्तर: तसवीर के मध्य में एक देवी जैसी आकृति है जो हाथ में नयी शताब्दी की ध्वजा लिए प्रगति का फ़रिश्ता दिखाई देती है। उसका एक पाँव पंखों वाले पहिये पर टिका हुआ है, जो समय का प्रतीक है, और उसकी उड़ान भविष्य की ओर है। उसके पीछे उन्नति के चिह्न तैर रहे हैं — रेलवे, कैमरा, मशीनें, प्रिंटिंग प्रेस और कारख़ाना।

2चित्र 2 (‘दो जादूगर’, 1901) क्या दर्शाता है?

उत्तर देखिए

उत्तर: ऊपर वाले हिस्से में प्राच्य इलाक़े का अलादीन है जिसने अपने जादुई चिराग़ को रगड़ कर एक भव्य महल बना दिया है, और नीचे एक आधुनिक मेकैनिक है जो अपने आधुनिक औज़ारों से पुल, जहाज़, मीनार और गगनचुंबी इमारतें बनाता है। अलादीन पूरब और अतीत का प्रतीक है, जबकि मेकैनिक पश्चिम और आधुनिकता का।

3चित्र 3 (अठारहवीं सदी में कताई) से क्या पता चलता है?

उत्तर देखिए

उत्तर: इससे पता चलता है कि परिवार के सभी सदस्य धागा बनाने के काम में लगे रहते थे, और एक चरखे पर केवल एक ही तकली बन रही थी। यह आदि-औद्योगिक उत्पादन का चित्र है, जिसमें उत्पादन घरों में होता था और पूरे परिवार का श्रम इस्तेमाल होता था।

4चित्र 11 (स्पिनिंग जेनी, 1835) से क्या पता चलता है?

उत्तर देखिए

उत्तर: इससे पता चलता है कि एक ही पहिये से कितनी सारी तकलियाँ घूमने लगती थीं। यही कारण था कि इस मशीन से मज़दूरों की माँग घट गई और हाथ से ऊन कातने वाली औरतें इस पर हमला करने लगीं।

5चित्र 24 (भारत में बड़े पैमाने के उद्योगों वाले इलाक़े, 1931) से क्या निष्कर्ष निकलता है?

उत्तर देखिए

उत्तर: इस मानचित्र में बंगाल और बंबई के गोले सबसे बड़े हैं, जबकि पंजाब, संयुक्त प्रांत, बिहार, मध्य प्रांत और मद्रास के गोले बहुत छोटे हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि 1911 में बड़े उद्योगों में से 67 प्रतिशत बंगाल और बंबई में ही स्थित थे और बाक़ी पूरे देश में छोटे स्तर के उत्पादन का ही दबदबा रहा।

6चित्र 26, 27 और 28 (विज्ञापन के लेबल और कैलेंडर) से क्या पता चलता है?

उत्तर देखिए

उत्तर: चित्र 26 (क) में मैनचेस्टर के लेबलों पर कार्तिक, लक्ष्मी और सरस्वती जैसे भारतीय देवी-देवता चित्रित हैं; चित्र 26 (ख) में महाराजा रणजीत सिंह का चित्र है; चित्र 27 में सनलाइट साबुन के कैलेंडर पर भगवान विष्णु आसमान से रोशनी लाते दिखाए गए हैं; और चित्र 28 में एक भारतीय मिल के लेबल पर एक देवी अहमदाबाद के मिल में बना कपड़ा दान कर रही हैं और भारत में बने कपड़े के इस्तेमाल का आह्वान कर रही हैं। इनसे पता चलता है कि निर्माता देवी-देवताओं और ऐतिहासिक व्यक्तित्वों के सहारे उत्पाद के प्रति सम्मान और भरोसा पैदा करना चाहते थे, और भारतीय विज्ञापन स्वदेशी के राष्ट्रवादी संदेश के वाहक बन गए थे।

भाग छ — तीन नमूना परीक्षा-पत्र (स्वयं अभ्यास के लिए)

नमूना पत्र 1 (कुल 20 अंक)

1‘आदि’ शब्द का क्या अर्थ है? (1)

2स्पिनिंग जेनी किसने और कब बनाई? (1)

3गुमाश्ता कौन था? (1)

4बंबई में पहली कपड़ा मिल कब लगी? (1)

5सत्रहवीं शताब्दी में यूरोपीय शहरों के सौदागर गाँवों में किसानों से काम करवाने क्यों लगे? (3)

6गुमाश्तों और बुनकरों के बीच टकराव क्यों हुआ? (3)

7उन्नीसवीं सदी के यूरोप में कुछ उद्योगपति मशीनों की बजाय हाथ के श्रमिकों को प्राथमिकता क्यों देते थे? (4)

8स्रोत 2 (स्पिनिंग जेनी पर हमला) पर आधारित प्रश्न। (4)

9आदि-औद्योगिक व्यवस्था की तीन विशेषताएँ बताइए। (2)

नमूना पत्र 2 (कुल 20 अंक)

1उन्नीसवीं सदी की शुरुआत तक इंग्लैंड में भाप के कितने इंजन थे? (1)

2जॉबर को और किन नामों से जाना जाता था? (1)

3फ़्लाई शटल क्या है? (1)

41811-12 और 1850-51 में भारत के निर्यात में सूती माल का हिस्सा कितना था? (1)

5औद्योगीकरण की रफ़्तार धीमी थी — इसे तीन तर्कों से सिद्ध कीजिए। (3)

6भारत में शुरुआती उद्योग किन लोगों ने लगाए? (3)

7ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारतीय बुनकरों से नियमित आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए क्या किया? (4)

8स्रोत 3 (पटना के आयुक्त की रिपोर्ट) पर आधारित प्रश्न। (4)

9सूरत बंदरगाह हाशिये पर कैसे पहुँच गया? (2)

नमूना पत्र 3 (कुल 20 अंक)

1नए युग का पहला प्रतीक कौन-सी वस्तु थी? (1)

21911 में बंबई के सूती मज़दूर मुख्यत: किस ज़िले से आते थे? (1)

3सबसे बड़ी यूरोपीय प्रबंधकीय एजेंसियाँ कौन-सी थीं? (1)

41900 से 1940 के बीच हथकरघा उत्पादन कितना बढ़ा? (1)

5भारत में बड़े उद्योगों का हिस्सा बहुत छोटा था — आँकड़ों से सिद्ध कीजिए। (3)

6विज्ञापनों में देवताओं और महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों का इस्तेमाल क्यों होता था? (3)

7पहले विश्व युद्ध के समय भारत का औद्योगिक उत्पादन क्यों बढ़ा? (4)

8स्रोत 4 (मिल मज़दूर और उसका गाँव) पर आधारित प्रश्न। (4)

9अमेरिकी गृहयुद्ध ने भारतीय बुनकरों को कैसे प्रभावित किया? (2)