Chapter 2भारत में राष्ट्रवाद

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परीक्षा से एक दिन पहले यही फ़ाइल पढ़िए। यहाँ हर बात पूरे वाक्य में लिखी है, ताकि आप इसे सीधे उत्तर में उतार सकें।


पहले पूरी कहानी एक पैराग्राफ़ में

पहले विश्वयुद्ध (1914–18) ने भारत में करों, क़ीमतों और जबरन भर्ती के कारण भारी परेशानी पैदा कर दी, और उसके बाद अकाल तथा फ़्लू की महामारी में 120–130 लाख लोग मारे गए। ठीक इसी समय महात्मा गांधी जनवरी 1915 में दक्षिण अफ़्रीका से लौटे और उन्होंने सत्याग्रह का नया तरीक़ा दिया। उन्होंने चंपारण, खेड़ा और अहमदाबाद में सत्याग्रह किए और फिर रॉलट एक्ट के ख़िलाफ़ राष्ट्रव्यापी आंदोलन छेड़ा, जिसके दौरान 13 अप्रैल 1919 को जलियाँवाला बाग़ हत्याकांड हुआ। हिंदू-मुसलमानों को जोड़ने के लिए उन्होंने ख़िलाफ़त का मुद्दा उठाया और जनवरी 1921 में असहयोग आंदोलन शुरू हुआ, जो फ़रवरी 1922 में चौरी-चौरा की हिंसा के बाद वापस ले लिया गया। आगे चलकर महामंदी और साइमन कमीशन ने राजनीति फिर बदली, दिसंबर 1929 के लाहौर अधिवेशन में ‘पूर्ण स्वराज’ की माँग मानी गई, और 12 मार्च 1930 को नमक यात्रा से सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू हुआ। इस पूरे दौर में हर समूह ने ‘स्वराज’ का अपना-अपना अर्थ निकाला — और अध्याय का अंतिम वाक्य यही कहता है कि “जो राष्ट्र उभर रहा था वह औपनिवेशिक शासन से मुक्ति की चाह रखने वाली बहुत सारी आवाज़ों का पुंज था।”

भाग 1 — पहला विश्वयुद्ध का असर

पहले विश्वयुद्ध ने एक नयी आर्थिक और राजनीतिक स्थिति पैदा कर दी थी। इसके छह परिणाम इस प्रकार थे —

  1. रक्षा व्यय में भारी इज़ाफ़ा हुआ और इसकी भरपाई के लिए युद्ध के नाम पर क़र्ज़ लिए गए तथा करों में वृद्धि की गई।
  2. सीमा शुल्क बढ़ा दिया गया और आयकर शुरू किया गया।
  3. 1913 से 1918 के बीच क़ीमतें दोगुनी हो चुकी थीं, जिससे आम लोगों की मुश्किलें बढ़ गईं।
  4. गाँवों में सिपाहियों को जबरन भर्ती किया गया, जिसके कारण ग्रामीण इलाक़ों में व्यापक ग़ुस्सा था।
  5. 1918–19 और 1920–21 में फ़सल ख़राब हो गई, जिससे खाद्य पदार्थों का भारी अभाव पैदा हो गया।
  6. उसी समय फ़्लू की महामारी फैल गई। 1921 की जनगणना के मुताबिक़ दुर्भिक्ष और महामारी के कारण 120–130 लाख लोग मारे गए।

लोगों को उम्मीद थी कि युद्ध ख़त्म होने के बाद उनकी मुसीबतें कम हो जाएँगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

भाग 2 — सत्याग्रह का विचार

महात्मा गांधी जनवरी 1915 में भारत लौटे। इससे पहले वे दक्षिण अफ़्रीका में थे, जहाँ उन्होंने एक नए तरह के जनांदोलन के रास्ते पर चलते हुए वहाँ की नस्लभेदी सरकार से सफलतापूर्वक लोहा लिया था। इस पद्धति को वे सत्याग्रह कहते थे।

सत्याग्रह का पूरा अर्थ:

  • इसमें सत्य की शक्ति पर आग्रह और सत्य की खोज पर ज़ोर दिया जाता था।
  • अगर आपका उद्देश्य सच्चा है और आपका संघर्ष अन्याय के ख़िलाफ़ है, तो उत्पीड़क से मुक़ाबला करने के लिए किसी शारीरिक बल की आवश्यकता नहीं है।
  • प्रतिशोध या आक्रामकता का सहारा लिए बिना सत्याग्रही केवल अहिंसा के सहारे भी अपने संघर्ष में सफल हो सकता है।
  • इसके लिए दमनकारी शत्रु की चेतना को झिंझोड़ना चाहिए और सभी लोगों को सच्चाई को सहज भाव से स्वीकार करने के लिए प्रेरित करना चाहिए।
  • इस संघर्ष में अंततः सत्य की ही जीत होती है।
  • गांधीजी का विश्वास था कि अहिंसा का यह धर्म सभी भारतीयों को एकता के सूत्र में बाँध सकता है।

गांधीजी के अपने शब्द (स्रोत-क): “सत्याग्रह तो शुद्ध आत्मबल है।” और “दक्षिण अफ़्रीका का आंदोलन निष्क्रिय नहीं बल्कि सक्रिय आंदोलन था।”

सबसे ज़रूरी बात: गांधीजी ने साफ़ कहा कि सत्याग्रह ‘निष्क्रिय प्रतिरोध’ नहीं है और यह दुर्बलों का हथियार नहीं है — “इस शक्ति को केवल ताक़तवर ही इस्तेमाल कर सकते हैं।”

भारत में पहले तीन सत्याग्रह

वर्षस्थानकिसके लिए
1917चंपारण (बिहार)दमनकारी बागान व्यवस्था के ख़िलाफ़ किसानों को संघर्ष के लिए प्रेरित किया
1917खेड़ा (गुजरात)फ़सल ख़राब होने और प्लेग की महामारी के कारण किसान लगान चुकाने की हालत में नहीं थे; वे लगान वसूली में ढील चाहते थे
1918अहमदाबाद (गुजरात)सूती कपड़ा कारख़ानों के मज़दूरों के बीच सत्याग्रह

भाग 3 — रॉलट एक्ट और जलियाँवाला बाग़

रॉलट एक्ट, 1919 — विरोध के तीन कारण

  1. भारतीय सदस्यों के भारी विरोध के बावजूद इसे इम्पीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल ने बहुत जल्दबाज़ी में पारित कर दिया था।
  2. इस क़ानून के ज़रिए सरकार को राजनीतिक गतिविधियों को कुचलने का अधिकार मिल गया था।
  3. सरकार राजनीतिक क़ैदियों को दो साल तक बिना मुक़दमा चलाए जेल में बंद रख सकती थी।

गांधीजी ने 6 अप्रैल को हड़ताल से अहिंसक नागरिक अवज्ञा शुरू करने का फ़ैसला किया। विभिन्न शहरों में रैली-जुलूस हुए, रेलवे वर्कशॉप्स में कामगार हड़ताल पर चले गए और दुकानें बंद हो गईं। अमृतसर में स्थानीय नेताओं को हिरासत में ले लिया गया, गांधीजी के दिल्ली प्रवेश पर पाबंदी लगी, और 10 अप्रैल को पुलिस ने अमृतसर में एक शांतिपूर्ण जुलूस पर गोली चला दी। इसके बाद मार्शल लॉ लागू कर दिया गया और जनरल डायर ने कमान सँभाल ली।

जलियाँवाला बाग़ हत्याकांड — 13 अप्रैल 1919

  1. उस दिन अमृतसर में बहुत सारे गाँव वाले सालाना वैसाखी मेले में शिरकत करने के लिए जलियाँवाला बाग़ मैदान में जमा हुए थे।
  2. काफ़ी लोग सरकार द्वारा लागू किए गए दमनकारी क़ानून का विरोध प्रकट करने के लिए एकत्रित हुए थे।
  3. यह मैदान चारों तरफ़ से बंद था और शहर से बाहर होने के कारण लोगों को यह पता नहीं था कि इलाक़े में मार्शल लॉ लागू हो चुका है।
  4. जनरल डायर हथियारबंद सैनिकों के साथ पहुँचा और उसने मैदान से बाहर निकलने के सारे रास्तों को बंद कर दिया।
  5. उसके सिपाहियों ने भीड़ पर अंधाधुंध गोलियाँ चला दीं और सैकड़ों लोग मारे गए।
  6. बाद में उसने बताया कि वह सत्याग्रहियों के ज़हन में दहशत और विस्मय का भाव पैदा करके ‘एक नैतिक प्रभाव’ उत्पन्न करना चाहता था।

इसके बाद उत्तर भारत के बहुत सारे शहरों में लोग सड़कों पर उतरने लगे। सरकार ने दमन का रास्ता अपनाया — सत्याग्रहियों को ज़मीन पर नाक रगड़ने, सड़क पर घिसट कर चलने और साहिबों को सलाम मारने के लिए मजबूर किया गया; लोगों को कोड़े मारे गए और गुजराँवाला (पंजाब) जैसे गाँवों पर बम बरसाए गए। हिंसा फैलते देख महात्मा गांधी ने आंदोलन वापस ले लिया।

भाग 4 — ख़िलाफ़त और असहयोग

ख़िलाफ़त का मुद्दा

रॉलट सत्याग्रह मुख्य रूप से शहरों और क़स्बों तक ही सीमित था। गांधीजी और भी ज़्यादा जनाधार वाला आंदोलन चाहते थे, लेकिन उनका मानना था कि हिंदू-मुसलमानों को एक-दूसरे के नज़दीक लाए बिना ऐसा कोई आंदोलन नहीं चलाया जा सकता।

  • पहले विश्वयुद्ध में ऑटोमन तुर्की की हार हो चुकी थी।
  • अफ़वाहें थीं कि इस्लामिक विश्व के आध्यात्मिक नेता (ख़लीफ़ा) ऑटोमन सम्राट पर एक बहुत सख़्त शांति संधि थोपी जाएगी।
  • मार्च 1919 में बंबई में एक ख़िलाफ़त समिति का गठन किया गया।
  • मोहम्मद अली और शौकत अली बंधुओं ने गांधीजी से चर्चा शुरू की।
  • सितंबर 1920 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में तय हुआ कि ख़िलाफ़त आंदोलन के समर्थन और स्वराज के लिए असहयोग आंदोलन शुरू किया जाए।

असहयोग ही क्यों?

अपनी पुस्तक हिंद स्वराज (1909) में गांधीजी ने कहा था कि भारत में ब्रिटिश शासन भारतीयों के सहयोग से ही स्थापित हुआ था और यह शासन इसी सहयोग के कारण चल पा रहा है। अगर भारत के लोग अपना सहयोग वापस ले लें तो साल भर के भीतर ब्रिटिश शासन ढह जाएगा और स्वराज की स्थापना हो जाएगी।

कार्यक्रम चरणबद्ध था:

  1. सरकार द्वारा दी गई पदवियाँ लौटा देना।
  2. सरकारी नौकरियों, सेना, पुलिस, अदालतों, विधायी परिषदों, स्कूलों और विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार।
  3. अगर सरकार दमन का रास्ता अपनाए तो व्यापक सविनय अवज्ञा अभियान।

कांग्रेस में विवाद हुआ, क्योंकि बहुत से लोग नवंबर 1920 के चुनावों का बहिष्कार करने में हिचकिचा रहे थे और उन्हें हिंसा का भय था। आख़िरकार दिसंबर 1920 में कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन में समझौता हुआ और असहयोग कार्यक्रम पर स्वीकृति की मोहर लगी।

भाग 5 — आंदोलन के भीतर अलग-अलग धाराएँ

असहयोग-ख़िलाफ़त आंदोलन जनवरी 1921 में शुरू हुआ। इसमें विभिन्न सामाजिक समूहों ने हिस्सा लिया, लेकिन हरेक की अपनी-अपनी आकांक्षाएँ थीं। सभी ने स्वराज के आह्वान को स्वीकार तो किया लेकिन उनके लिए उसके अर्थ अलग-अलग थे।

शहरों में आंदोलन

  • हज़ारों विद्यार्थियों ने स्कूल-कॉलेज छोड़ दिए; हेडमास्टरों और शिक्षकों ने इस्तीफ़े सौंप दिए; वकीलों ने मुक़दमे लड़ना बंद कर दिया।
  • मद्रास के अलावा ज़्यादातर प्रांतों में परिषद् चुनावों का बहिष्कार किया गया। मद्रास में ग़ैर-ब्राह्मणों की जस्टिस पार्टी ने बहिष्कार नहीं किया, क्योंकि उसे लगता था कि काउंसिल में प्रवेश से उसे वे अधिकार मिल सकते हैं जो सामान्य रूप से केवल ब्राह्मणों को मिल पाते हैं।
  • विदेशी सामानों का बहिष्कार, शराब की दुकानों की पिकेटिंग और विदेशी कपड़ों की होली जलाई जाने लगी।
  • 1921 से 1922 के बीच विदेशी कपड़ों का आयात आधा रह गया; उसकी क़ीमत 102 करोड़ से घटकर 57 करोड़ रह गई।
  • भारतीय कपड़ा मिलों और हथकरघों का उत्पादन बढ़ने लगा।

शहरों में आंदोलन धीमा क्यों पड़ा — तीन कारण:

  1. खादी का कपड़ा मिलों के कपड़ों के मुक़ाबले प्रायः महँगा होता था और ग़रीब उसे नहीं ख़रीद सकते थे।
  2. ब्रिटिश संस्थानों के बहिष्कार से समस्या पैदा हुई, क्योंकि वैकल्पिक भारतीय संस्थानों की स्थापना की प्रक्रिया बहुत धीमी थी।
  3. फलस्वरूप विद्यार्थी और शिक्षक सरकारी स्कूलों में लौटने लगे और वकील दोबारा सरकारी अदालतों में दिखाई देने लगे।

ग्रामीण इलाक़ों में विद्रोह

अवध — बाबा रामचंद्र के नेतृत्व में:

  • बाबा रामचंद्र संन्यासी थे और इससे पहले फिजी में गिरमिटिया मज़दूर के तौर पर काम कर चुके थे।
  • आंदोलन तालुक़दारों और ज़मींदारों के ख़िलाफ़ था, जो भारी-भरकम लगान और तरह-तरह के कर वसूल कर रहे थे।
  • किसानों को बेगार करनी पड़ती थी; पट्टे निश्चित नहीं होते थे; उन्हें बार-बार पट्टे की ज़मीन से हटा दिया जाता था।
  • किसानों की माँगें थीं — लगान कम हो, बेगार ख़त्म हो, और दमनकारी ज़मींदारों का सामाजिक बहिष्कार हो।
  • पंचायतों ने ज़मींदारों के लिए नाई-धोबी बंद का फ़ैसला लिया।
  • जून 1920 में जवाहरलाल नेहरू ने अवध के गाँवों का दौरा किया और अक्तूबर तक अवध किसान सभा का गठन हो गया, जिसकी महीने भर में 300 से ज़्यादा शाखाएँ बन चुकी थीं।
  • 1921 में तालुक़दारों और व्यापारियों के मकानों पर हमले हुए, बाज़ारों में लूटपाट हुई और अनाज के गोदामों पर क़ब्ज़ा कर लिया गया।
  • लोग महात्मा का नाम लेकर अपनी सारी कार्रवाइयों को सही ठहरा रहे थे, जबकि गांधीजी ने ऐसा कुछ नहीं कहा था।

आंध्र प्रदेश की गूडेम पहाड़ियाँ — अल्लूरी सीताराम राजू:

  • सरकार ने जंगलों में लोगों के दाख़िल होने पर पाबंदी लगा दी थी, जिससे लोग न मवेशी चरा सकते थे, न जलावन की लकड़ी और फल बीन सकते थे।
  • जब सरकार ने उन्हें सड़कों के निर्माण के लिए बेगार करने पर मजबूर किया तो लोगों ने बग़ावत कर दी।
  • राजू का दावा था कि उनके पास विशेष शक्तियाँ हैं और गोलियाँ भी उन्हें नहीं मार सकतीं।
  • वे गांधीजी की महानता के गुण गाते थे और कहते थे कि वे असहयोग आंदोलन से प्रेरित हैं; उन्होंने लोगों को खादी पहनने तथा शराब छोड़ने के लिए प्रेरित किया।
  • साथ ही उन्होंने यह दावा भी किया कि भारत अहिंसा के बल पर नहीं बल्कि केवल बलप्रयोग के ज़रिए ही आज़ाद हो सकता है।
  • 1924 में राजू को फाँसी दे दी गई और वे लोकनायक बन गए।

बारदोली, 1928: वल्लभ भाई पटेल ने गुजरात के बारदोली तालुका में भू-राजस्व बढ़ाने के ख़िलाफ़ किसान आंदोलन का नेतृत्व किया, जो सफल रहा।

बागानों में स्वराज

  • असम के बाग़ानी मज़दूरों के लिए आज़ादी का मतलब यह था कि वे उन चारदीवारियों से जब चाहे आ-जा सकते थे जिनमें उनको बंद करके रखा गया था, और वे अपने गाँवों से संपर्क रख पाएँगे।
  • 1859 के इनलैंड इमिग्रेशन एक्ट के तहत मज़दूरों को बिना इजाज़त बाग़ान से बाहर जाने की छूट नहीं थी।
  • असहयोग आंदोलन के बारे में सुनकर हज़ारों मज़दूर बाग़ान छोड़कर अपने घर चल दिए, यह सोचकर कि अब गांधी राज आ रहा है और हरेक को गाँव में ज़मीन मिल जाएगी।
  • लेकिन रेलवे और स्टीमरों की हड़ताल के कारण वे रास्ते में ही फँस गए, पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया और उनकी बुरी तरह पिटाई हुई।

चौरी-चौरा, फ़रवरी 1922: गोरखपुर स्थित चौरी-चौरा में बाज़ार से गुज़र रहा एक शांतिपूर्ण जुलूस पुलिस के साथ हिंसक टकराव में बदल गया। इस घटना के बारे में सुनते ही महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन रोकने का आह्वान किया।

भाग 6 — सविनय अवज्ञा की ओर

आंदोलन वापस लेने के बाद कांग्रेस में दो धाराएँ

गांधीजी को लगता था कि आंदोलन हिंसक होता जा रहा है और सत्याग्रहियों को व्यापक प्रशिक्षण की ज़रूरत है।

धारानेताक्या चाहते थे
परिषद-राजनीतिसी.आर. दास और मोतीलाल नेहरू1919 के गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया एक्ट के तहत गठित प्रांतीय परिषदों के चुनाव में हिस्सा लेना; इसके लिए कांग्रेस के भीतर स्वराज पार्टी बनाई
उग्र जनांदोलनजवाहरलाल नेहरू और सुभाषचंद्र बोसज़्यादा उग्र जनांदोलन और पूर्ण स्वतंत्रता

दो नए कारक

पहला — विश्वव्यापी आर्थिक मंदी: 1926 से कृषि उत्पादों की क़ीमतें गिरने लगी थीं और 1930 के बाद पूरी तरह धराशायी हो गईं। माँग गिरी, निर्यात कम हुआ, और किसानों को अपनी उपज बेचना तथा लगान चुकाना भारी पड़ने लगा।

दूसरा — साइमन कमीशन:

  • ब्रिटेन की नयी टोरी सरकार ने सर जॉन साइमन के नेतृत्व में एक वैधानिक आयोग का गठन किया, जिसे भारत में संवैधानिक व्यवस्था की कार्यशैली का अध्ययन करना था।
  • इस आयोग में एक भी भारतीय सदस्य नहीं था, सारे अंग्रेज़ थे।
  • 1928 में जब साइमन कमीशन भारत पहुँचा तो उसका स्वागत ‘साइमन कमीशन वापस जाओ’ के नारों से किया गया।
  • कांग्रेस और मुस्लिम लीग, सभी पार्टियों ने प्रदर्शनों में हिस्सा लिया।
  • इसी प्रदर्शन के दौरान ब्रिटिश पुलिस ने लाला लाजपत राय पर हमला किया और गहरे ज़ख़्मों के कारण उन्होंने दम तोड़ दिया।

सरकार की प्रतिक्रिया: वायसराय लॉर्ड इरविन ने अक्तूबर 1929 में भारत के लिए ‘डोमिनियन स्टेट्स’ का गोलमोल सा ऐलान कर दिया, पर कोई समय सीमा नहीं बताई।

लाहौर अधिवेशन, दिसंबर 1929: जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में ‘पूर्ण स्वराज’ की माँग औपचारिक रूप से मान ली गई और तय हुआ कि 26 जनवरी 1930 को स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया जाएगा।

नमक यात्रा और सविनय अवज्ञा

नमक को क्यों चुना गया: नमक का अमीर-ग़रीब, सभी इस्तेमाल करते थे और यह भोजन का एक अभिन्न हिस्सा था। इसीलिए नमक पर कर और उसके उत्पादन पर सरकारी इजारेदारी को गांधीजी ने ब्रिटिश शासन का सबसे दमनकारी पहलू बताया।

तिथिघटना
31 जनवरी 1930गांधीजी ने वायसराय इरविन को 11 माँगों वाला ख़त लिखा; सबसे महत्त्वपूर्ण माँग नमक कर को ख़त्म करने की थी; यह एक अल्टीमेटम की तरह था कि 11 मार्च तक माँगें न मानी गईं तो कांग्रेस सविनय अवज्ञा आंदोलन छेड़ देगी
12 मार्च 193078 विश्वस्त वॉलंटियरों के साथ नमक यात्रा शुरू; साबरमती से 240 किलोमीटर दूर दांडी तक; 24 दिन में हर रोज़ लगभग 10 मील
6 अप्रैल 1930दांडी पहुँचकर समुद्र का पानी उबालकर नमक बनाया — यह क़ानून का उल्लंघन था

यह आंदोलन असहयोग से किस तरह अलग था: “इस बार लोगों को न केवल अंग्रेज़ों का सहयोग न करने के लिए बल्कि औपनिवेशिक क़ानूनों का उल्लंघन करने के लिए आह्वान किया जाने लगा।”

आंदोलन कैसे फैला: हज़ारों लोगों ने नमक क़ानून तोड़ा; विदेशी कपड़ों का बहिष्कार हुआ; शराब की दुकानों की पिकेटिंग हुई; किसानों ने लगान और चौकीदारी कर चुकाने से इनकार कर दिया; गाँवों में तैनात कर्मचारी इस्तीफ़े देने लगे; और लोग वन क़ानूनों का उल्लंघन करके आरक्षित वनों में घुसने लगे।

सरकार का दमन: अप्रैल 1930 में अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ान की गिरफ़्तारी के बाद बहुत सारे लोग मारे गए। महीने भर बाद गांधीजी की गिरफ़्तारी पर शोलापुर के औद्योगिक मज़दूरों ने पुलिस चौकियों, नगरपालिका भवनों, अदालतों और रेलवे स्टेशनों पर हमले शुरू कर दिए। शांतिपूर्ण सत्याग्रहियों पर हमले किए गए, औरतों व बच्चों को मारा-पीटा गया और लगभग एक लाख लोग गिरफ़्तार किए गए।

गांधी-इरविन समझौता: 5 मार्च 1931 को गांधीजी ने इरविन के साथ समझौते पर दस्तख़त किए और दूसरे गोलमेज़ सम्मेलन में हिस्सा लेने पर सहमति दी; बदले में सरकार राजनीतिक क़ैदियों को रिहा करने पर राज़ी हो गई। दिसंबर 1931 में वे लंदन गए, पर वार्ता टूट गई और वे निराश लौटे। आंदोलन दोबारा शुरू हुआ, पर 1934 तक उसकी गति मंद पड़ने लगी थी।

भाग 7 — किस समूह ने क्यों हिस्सा लिया (सबसे महत्त्वपूर्ण तालिका)

समूहक्यों जुड़ेउनके लिए स्वराज का अर्थकहाँ पीछे हटे
संपन्न किसान (गुजरात के पटीदार, उत्तर प्रदेश के जाट)व्यापार में मंदी और गिरती क़ीमतों से नक़द आय ख़त्म हो गई; सरकारी लगान चुकाना नामुमकिन हो गयाभारी लगान के ख़िलाफ़ लड़ाई1931 में लगानों के घटे बिना आंदोलन वापस लेने से निराश; 1932 में बहुतों ने हिस्सा लेने से इनकार किया
ग़रीब किसानमहामंदी में ज़मींदारों को ज़मीन का किराया चुकाना मुश्किल हो गयाभाड़ा माफ़ होकांग्रेस ‘भाड़ा विरोधी’ आंदोलनों को समर्थन देने में हिचकिचाती थी, इसलिए संबंध अनिश्चित बने रहे
व्यवसायी वर्गऔपनिवेशिक नीतियों से व्यावसायिक गतिविधियों में रुकावट; विदेशी आयात से सुरक्षा चाहते थेऐसा युग जहाँ कारोबार पर औपनिवेशिक पाबंदियाँ न होंगोलमेज़ सम्मेलन की विफलता के बाद उत्साह मंद पड़ा; उग्र गतिविधियों और समाजवाद के बढ़ते प्रभाव से डरे
औद्योगिक मज़दूरकुछ ने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार को कम वेतन व ख़राब कार्यस्थितियों के ख़िलाफ़ अपनी लड़ाई से जोड़ लियाबेहतर वेतन और काम की स्थितियाँनागपुर के अलावा बड़ी संख्या में हिस्सा नहीं लिया; कांग्रेस उनकी माँगें शामिल करने में हिचकिचाती थी
औरतेंगांधीजी के आह्वान के बाद राष्ट्र की सेवा पवित्र दायित्व लगने लगाराष्ट्र की सेवाकांग्रेस लंबे समय तक किसी महत्त्वपूर्ण पद पर औरतों को जगह देने से हिचकिचाती रही; उसे उनकी प्रतीकात्मक उपस्थिति में ही दिलचस्पी थी

महिलाओं ने क्या किया: जुलूसों में हिस्सा लिया, नमक बनाया, विदेशी कपड़ों व शराब की दुकानों की पिकेटिंग की, और बहुत सारी महिलाएँ जेल भी गईं। शहरी इलाक़ों में ज़्यादातर ऊँची जातियों की महिलाएँ सक्रिय थीं जबकि ग्रामीण इलाक़ों में संपन्न किसान परिवारों की महिलाएँ।

संगठन याद रखिए: 1920 — भारतीय औद्योगिक एवं व्यावसायिक कांग्रेस; 1927 — भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग परिसंघ (फ़िक्की); नेता — पुरुषोत्तमदास ठाकुरदास और जी.डी. बिड़ला।

भाग 8 — सविनय अवज्ञा की सीमाएँ

दलितों का प्रश्न

  • राष्ट्र के ‘अछूत’, जो 1930 के बाद ख़ुद को दलित या उत्पीड़ित कहने लगे थे, स्वराज की अमूर्त अवधारणा से प्रभावित नहीं थे।
  • कांग्रेस ने लंबे समय तक दलितों पर ध्यान नहीं दिया क्योंकि वह रूढ़िवादी सवर्ण हिंदू सनातनपंथियों से डरी हुई थी।

गांधीजी ने क्या किया:

  • ऐलान किया कि अस्पृश्यता को ख़त्म किए बिना सौ साल तक भी स्वराज की स्थापना नहीं की जा सकती।
  • ‘अछूतों’ को हरिजन यानी ईश्वर की संतान बताया।
  • उन्हें मंदिरों, सार्वजनिक तालाबों, सड़कों और कुओं पर समान अधिकार दिलाने के लिए सत्याग्रह किया।
  • मैला ढोनेवालों के काम को प्रतिष्ठा दिलाने के लिए वे ख़ुद शौचालय साफ़ करने लगे।

दलित नेता क्या चाहते थे:

  • अपने समुदाय की समस्याओं का अलग राजनीतिक हल।
  • शिक्षा संस्थानों में आरक्षण और अलग निर्वाचन क्षेत्र, ताकि वहाँ से केवल दलितों को ही चुनकर भेजा जा सके।
  • उनका मानना था कि उनकी सामाजिक अपंगता केवल राजनीतिक सशक्तीकरण से ही दूर हो सकती है।

अंबेडकर और पूना पैक्ट: 1930 में अंबेडकर ने दलितों को दमित वर्ग एसोसिएशन में संगठित किया। दूसरे गोलमेज़ सम्मेलन में अलग निर्वाचन क्षेत्रों के सवाल पर गांधीजी से उनका काफ़ी विवाद हुआ। जब ब्रिटिश सरकार ने अंबेडकर की माँग मान ली तो गांधीजी आमरण अनशन पर बैठ गए, क्योंकि उनका मत था कि अलग निर्वाचन क्षेत्रों से समाज में दलितों के एकीकरण की प्रक्रिया धीमी पड़ जाएगी। आख़िरकार सितंबर 1932 में पूना पैक्ट पर हस्ताक्षर हुए, जिससे दमित वर्गों को प्रांतीय एवं केंद्रीय विधायी परिषदों में आरक्षित सीटें मिलीं, हालाँकि उनके लिए मतदान सामान्य निर्वाचन क्षेत्रों में ही होता था।

मुस्लिम संगठनों का प्रश्न

  • असहयोग-ख़िलाफ़त आंदोलन के शांत पड़ जाने के बाद मुसलमानों का एक बहुत बड़ा तबक़ा कांग्रेस से कटा हुआ महसूस करने लगा था।
  • 1920 के दशक के मध्य से कांग्रेस हिंदू महासभा जैसे हिंदू धार्मिक राष्ट्रवादी संगठनों के काफ़ी क़रीब दिखने लगी थी।
  • दोनों समुदाय उग्र धार्मिक जुलूस निकालने लगे, जिससे कई शहरों में सांप्रदायिक टकराव व दंगे हुए।
  • 1927 में एकता का प्रयास हुआ। मोहम्मद अली जिन्ना का कहना था कि अगर मुसलमानों को केंद्रीय सभा में आरक्षित सीटें दी जाएँ और मुस्लिम बहुल प्रांतों (बंगाल और पंजाब) में आबादी के अनुपात में प्रतिनिधित्व दिया जाए तो वे पृथक निर्वाचिका की माँग छोड़ने के लिए तैयार हैं।
  • लेकिन 1928 के सर्वदलीय सम्मेलन में हिंदू महासभा के एम.आर. जयकर ने समझौते के प्रयासों की खुलेआम निंदा शुरू कर दी, जिससे समाधान की सारी संभावनाएँ समाप्त हो गईं।
  • सविनय अवज्ञा के समय समुदायों के बीच संदेह और अविश्वास का माहौल था और मुस्लिम नेताओं को भय था कि हिंदू बहुसंख्या के वर्चस्व में अल्पसंख्यकों की संस्कृति और पहचान खो जाएगी।

भाग 9 — सामूहिक अपनेपन का भाव

“सामूहिक अपनेपन की यह भावना आंशिक रूप से संयुक्त संघर्षों के चलते पैदा हुई थी। इनके अलावा बहुत सारी सांस्कृतिक प्रक्रियाएँ भी थीं जिनके ज़रिए राष्ट्रवाद लोगों की कल्पना और दिलोदिमाग़ पर छा गया था। इतिहास व साहित्य, लोक कथाएँ व गीत, चित्र व प्रतीक, सभी ने राष्ट्रवाद को साकार करने में अपना योगदान दिया था।”

भारत माता

  • इस छवि के निर्माण का आरंभ बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने किया था।
  • 1870 के दशक में उन्होंने मातृभूमि की स्तुति के रूप में ‘वन्दे मातरम्’ गीत लिखा, जिसे बाद में उन्होंने अपने उपन्यास आनन्दमठ में शामिल कर लिया। यह गीत बंगाल में स्वदेशी आन्दोलन में ख़ूब गाया गया।
  • स्वदेशी आंदोलन की प्रेरणा से अबनीन्द्रनाथ टैगोर ने 1905 में भारत माता की विख्यात छवि को चित्रित किया।
  • इस पेंटिंग में भारत माता को एक संन्यासिनी के रूप में दर्शाया गया है। वह शांत, गंभीर, दैवी और अध्यात्मिक गुणों से युक्त दिखाई देती है।
  • आगे चलकर अलग-अलग कलाकारों ने अलग-अलग रूप दिए — चित्र 14 में भारत माता के हाथों में त्रिशूल है और वह हाथी व शेर के बीच खड़ी है, जो शक्ति और सत्ता के प्रतीक हैं।
  • इस मातृ छवि के प्रति श्रद्धा को राष्ट्रवाद में आस्था का प्रतीक माना जाने लगा।

लोक कथाएँ

  • उन्नीसवीं सदी के आख़िर में राष्ट्रवादियों ने भाटों व चारणों द्वारा गाई-सुनाई जाने वाली लोक कथाओं को दर्ज करना शुरू कर दिया और वे लोक गीतों व जनश्रुतियों को इकट्ठा करने के लिए गाँव-गाँव घूमने लगे।
  • उनका मानना था कि यही कहानियाँ हमारी उस परंपरागत संस्कृति की सही तसवीर पेश करती हैं जो बाहरी ताक़तों के प्रभाव से भ्रष्ट और दूषित हो चुकी है।
  • बंगाल में रबीन्द्रनाथ टैगोर ख़ुद लोक-गाथा गीत, बाल गीत और मिथकों को इकट्ठा करने निकल पड़े।
  • मद्रास में नटेसा शास्त्री ने द फ़ोकलोर्स ऑफ़ सदर्न इंडिया के नाम से तमिल लोक कथाओं का विशाल संकलन चार खंडों में प्रकाशित किया। उनका मानना था कि लोक कथाएँ राष्ट्रीय साहित्य होती हैं और यह ‘लोगों के असली विचारों और विशिष्टताओं की सबसे विश्वसनीय अभिव्यक्ति’ है।

झंडे

झंडाविवरण
स्वदेशी आंदोलन (बंगाल)तिरंगा — हरा, पीला, लाल; इसमें ब्रिटिश भारत के आठ प्रांतों का प्रतिनिधित्व करते कमल के आठ फूल और हिंदुओं व मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करता एक अर्धचंद्र था
1921 का स्वराज झंडातिरंगा — सफ़ेद, हरा और लाल; मध्य में चरखा, जो स्वावलंबन का प्रतीक था। जुलूसों में यह झंडा थामे चलना शासन के प्रति अवज्ञा का संकेत था।

इतिहास की पुनर्व्याख्या

  • अंग्रेज़ों की नज़र में भारतीय पिछड़े हुए और आदिम लोग थे जो अपना शासन ख़ुद नहीं सँभाल सकते।
  • इसके जवाब में भारत के लोग अपनी महान उपलब्धियों की खोज में अतीत की ओर देखने लगे और उस गौरवमयी प्राचीन युग के बारे में लिखने लगे जब कला और वास्तुशिल्प, विज्ञान और गणित, धर्म और संस्कृति, क़ानून और दर्शन, हस्तकला और व्यापार फल-फूल रहे थे।
  • लेकिन इसकी अपनी समस्या थी — “जिस अतीत का गौरवगान किया जा रहा था वह हिंदुओं का अतीत था। जिन छवियों का सहारा लिया जा रहा था वे हिंदू प्रतीक थे। इसलिए अन्य समुदायों के लोग अलग-थलग महसूस करने लगे थे।”

भाग 10 — भारत छोड़ो आंदोलन

  • क्रिप्स मिशन की असफलता एवं द्वितीय विश्व युद्ध के प्रभावों ने भारत में व्यापक असंतोष को जन्म दिया।
  • 14 जुलाई 1942 को वर्धा में कांग्रेस कार्य समिति ने ऐतिहासिक ‘भारत छोड़ो’ प्रस्ताव पारित किया, जिसमें सत्ता का तत्काल हस्तांतरण एवं भारत छोड़ने की माँग की गई।
  • 8 अगस्त 1942 को बंबई में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया।
  • इसी अवसर पर गांधीजी ने प्रसिद्ध ‘करो या मरो’ भाषण दिया।
  • यह एक जन आंदोलन था जिसमें छात्र, मज़दूर और किसान जैसे हज़ारों साधारण लोगों ने हिस्सा लिया।
  • प्रमुख नेता — जयप्रकाश नारायण, अरुणा आसफ़ अली और राम मनोहर लोहिया।
  • महिला नेता — मातांगिनी हाजरा (बंगाल), कनकलता बरुआ (असम) और रमा देवी (उड़ीसा)।
  • अंग्रेज़ों द्वारा अत्यधिक बल प्रयोग के बावजूद इसे दबाने में एक वर्ष से अधिक समय लग गया।

भाग 11 — निष्कर्ष

अंग्रेज़ सरकार के ख़िलाफ़ बढ़ता ग़ुस्सा विभिन्न भारतीय समूहों और वर्गों को स्वतंत्रता के साझा संघर्ष में खींच रहा था। महात्मा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने लोगों के असंतोष और परेशानियों को स्वतंत्रता के संगठित आंदोलन में समाहित करने का प्रयास किया। लेकिन इन आंदोलनों में हिस्सा लेने वाले विभिन्न समूह और वर्ग अलग-अलग आकांक्षाओं और अपेक्षाओं के साथ हिस्सा ले रहे थे और औपनिवेशिक शासन से मुक्ति का भी सबके लिए अपना-अपना अर्थ था। कांग्रेस ने इन विभेदों को हल करने का प्रयास किया, यही वजह है कि आंदोलन के भीतर अकसर बिखराव आ जाता था।

“संक्षेप में, जो राष्ट्र उभर रहा था वह औपनिवेशिक शासन से मुक्ति की चाह रखने वाली बहुत सारी आवाज़ों का पुंज था।”

अंत में — याद रखने के आसान तरीक़े

गांधीजी के पहले तीन सत्याग्रह — ‘च-ख-अ’ चंपारण (1917, बिहार) · खेड़ा (1917, गुजरात) · अहमदाबाद (1918, गुजरात)

चार बड़ी तारीख़ें 1919 जलियाँवाला बाग़ · 1921 असहयोग शुरू · 1930 नमक यात्रा · 1942 भारत छोड़ो

दो आंदोलनों का फ़र्क़ एक वाक्य में असहयोग = “साथ मत दो” · सविनय अवज्ञा = “क़ानून तोड़ो”

दो आंदोलन क्यों रुके असहयोग — चौरी-चौरा (फ़रवरी 1922) · सविनय अवज्ञा — गांधी-इरविन समझौता (5 मार्च 1931)

तीन अधिवेशन कलकत्ता सितंबर 1920 (असहयोग का प्रस्ताव) · नागपुर दिसंबर 1920 (स्वीकृति) · लाहौर दिसंबर 1929 (पूर्ण स्वराज)

दो संख्याएँ जो उत्तर को मज़बूत बनाती हैं 120–130 लाख (अकाल और महामारी से मौतें) · 102 करोड़ से 57 करोड़ (विदेशी कपड़ों के आयात में गिरावट)

चार किसान नेता और उनके इलाक़े बाबा रामचंद्र — अवध · अल्लूरी सीताराम राजू — गूडेम पहाड़ियाँ (आंध्र) · वल्लभ भाई पटेल — बारदोली (गुजरात) · जवाहरलाल नेहरू — अवध किसान सभा

एक वाक्य जो लगभग हर उत्तर में काम आता है “सभी ने स्वराज के आह्वान को स्वीकार तो किया लेकिन उनके लिए उसके अर्थ अलग-अलग थे।”