Practise with cards
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कैसे इस्तेमाल करें: एक साथी से प्रश्न पढ़वाइए और मुँह-ज़बानी उत्तर दीजिए। जो कार्ड ग़लत हों, उन पर निशान लगाकर अगले दिन फिर दोहराइए।
इस अध्याय के लिए विशेष सलाह। इसमें आँकड़े और नाम दोनों बहुत हैं। समूह 12 में केवल नाम अलग से दिए गए हैं। पहले बाक़ी सब कर लीजिए, फिर आख़िरी दिन यह समूह दोहराइए।
समूह 1 — आदि-औद्योगीकरण (कार्ड 1–14)
| # | प्रश्न | उत्तर |
|---|---|---|
| 1 | औद्योगीकरण के बारे में सबसे आम ग़लतफ़हमी क्या है? | कि औद्योगिक उत्पादन का मतलब केवल फ़ैक्ट्रियों में होने वाला उत्पादन है |
| 2 | ‘आदि’ शब्द का क्या अर्थ है? | किसी चीज़ की पहली या प्रारंभिक अवस्था का संकेत |
| 3 | आदि-औद्योगीकरण किसे कहते हैं? | फ़ैक्ट्रियों की स्थापना से पहले अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार के लिए बड़े पैमाने पर होने वाले उस औद्योगिक उत्पादन को, जो फ़ैक्ट्रियों में नहीं बल्कि घरों में होता था |
| 4 | सौदागर गाँवों की तरफ़ कब रुख़ करने लगे? | सत्रहवीं और अठारहवीं शताब्दी में |
| 5 | चीज़ों की माँग क्यों बढ़ी थी? | विश्व व्यापार के विस्तार और दुनिया के विभिन्न भागों में उपनिवेशों की स्थापना के कारण |
| 6 | शहरों में उत्पादन क्यों नहीं बढ़ाया जा सकता था? | क्योंकि शहरों में शहरी दस्तकारी और व्यापारिक गिल्ड्स काफ़ी ताक़तवर थे |
| 7 | गिल्ड्स क्या करते थे? | कारीगरों को प्रशिक्षण देते थे, उत्पादकों पर नियंत्रण रखते थे, प्रतिस्पर्धा और मूल्य तय करते थे तथा व्यवसाय में नए लोगों को आने से रोकते थे |
| 8 | शासकों ने गिल्ड्स को क्या दिया था? | ख़ास उत्पादों के उत्पादन और व्यापार का एकाधिकार |
| 9 | ‘कॉटेजर’ किसे कहते थे? | वे छोटे किसान, जो साझा ज़मीनों से जलावन की लकड़ी, बेरियाँ, सब्ज़ियाँ, भूसा और चारा बीनकर काम चलाते थे |
| 10 | गाँव वाले सौदागरों के लिए काम करने को क्यों तैयार हुए? | क्योंकि खुले खेत ख़त्म हो रहे थे, कॉमन्स की बाड़ाबंदी हो रही थी और उनके छोटे खेतों से घर के सारे लोगों का पेट नहीं भर सकता था |
| 11 | गाँव में रहकर सौदागरों के लिए काम करने का क्या फ़ायदा था? | वे गाँव में रहते हुए अपने छोटे-छोटे खेतों को भी सँभाल सकते थे और उन्हें पूरे परिवार के श्रम संसाधनों के इस्तेमाल का मौक़ा भी मिल गया |
| 12 | आदि-औद्योगिक उत्पादन से क्या फ़ायदा हुआ? | इससे होने वाली आमदनी ने खेती के कारण सिमटती आय में बड़ा सहारा दिया |
| 13 | एक सौदागर हर चरण में कितने मज़दूरों से काम करवाता था? | 20 से 25 मज़दूरों से; इसलिए हर सौदागर के पास सैकड़ों मज़दूर काम करते थे |
| 14 | आदि-औद्योगिक व्यवस्था में उत्पादन कहाँ होता था? | कारख़ानों की बजाय घरों में; इस पर सौदागरों का नियंत्रण था |
समूह 2 — कपड़ा बनने की शृंखला और कारख़ानों का उदय (कार्ड 15–28)
| # | प्रश्न | उत्तर |
|---|---|---|
| 15 | स्टेप्लर कौन होता था? | ऐसा व्यक्ति जो रेशों के हिसाब से ऊन को ‘स्टेपल’ करता है या छाँटता है |
| 16 | फ़ुलर कौन होता था? | ऐसा व्यक्ति जो ‘फुल’ करता है यानी चुनटों के सहारे कपड़े को समेटता है |
| 17 | कार्डिंग क्या है? | वह प्रक्रिया जिसमें कपास या ऊन आदि रेशों को कताई के लिए तैयार किया जाता है |
| 18 | कपड़ा बनने की पूरी शृंखला क्या थी? | स्टेप्लर → कातने वाले → बुनकर → फ़ुलर्स → रंगसाज़ → लंदन (फ़िनिशिंग) → अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार |
| 19 | लंदन को किस नाम से जाना जाता था? | फ़िनिशिंग सेंटर के रूप में, क्योंकि वहीं कपड़ों की फ़िनिशिंग होती थी |
| 20 | इंग्लैंड में सबसे पहले कारख़ाने कब खुले? | 1730 के दशक में; तेज़ी से इज़ाफ़ा अठारहवीं सदी के आख़िर में हुआ |
| 21 | नए युग का पहला प्रतीक कौन-सी वस्तु थी? | कपास (कॉटन) |
| 22 | 1760 और 1787 में ब्रिटेन का कच्चे कपास का आयात कितना था? | 1760 में 25 लाख पौंड और 1787 में 220 लाख पौंड |
| 23 | अठारहवीं सदी के आविष्कारों ने किन चरणों की कुशलता बढ़ाई? | कार्डिंग, ऐंठना व कताई, और लपेटने के हर चरण की |
| 24 | सूती कपड़ा मिल की रूपरेखा किसने रखी? | रिचर्ड आर्कराइट ने |
| 25 | सूती कपड़ा मिल की ज़रूरत क्यों पड़ी? | क्योंकि महँगी नयी मशीनें ख़रीदकर उन्हें कारख़ानों में लगाया जा सकता था |
| 26 | कारख़ाने से क्या फ़ायदा हुआ? | सारी प्रक्रियाएँ एक छत के नीचे और एक मालिक के हाथों में आ गईं |
| 27 | एक छत के नीचे कारख़ाने से क्या संभव हो गया? | उत्पादन प्रक्रिया पर निगरानी, गुणवत्ता का ध्यान रखना और मज़दूरों पर नज़र रखना |
| 28 | कारख़ानों की चमक ने लोगों को क्या भुला दिया? | कि उनकी आँखों से ओझल गलियों और वर्कशॉप्स में अभी भी उत्पादन चालू है |
समूह 3 — औद्योगिक परिवर्तन की रफ़्तार (कार्ड 29–42)
| # | प्रश्न | उत्तर |
|---|---|---|
| 29 | 1840 के दशक तक ब्रिटेन का सबसे बड़ा उद्योग कौन-सा था? | कपास उद्योग |
| 30 | कपास उद्योग के बाद कौन-सा उद्योग आगे निकल गया? | लोहा और स्टील उद्योग |
| 31 | लोहा और स्टील उद्योग आगे क्यों निकल गया? | क्योंकि 1840 के दशक से इंग्लैंड में और 1860 के दशक से उपनिवेशों में रेलवे का विस्तार होने लगा था |
| 32 | 1873 तक ब्रिटेन का लोहा-स्टील निर्यात कितने का था? | लगभग 7.7 करोड़ पौंड, जो कपास निर्यात से दोगुना था |
| 33 | उन्नत औद्योगिक क्षेत्र में कितने मज़दूर काम करते थे? | उन्नीसवीं सदी के आख़िर में भी कुल मज़दूरों में 20 प्रतिशत से ज़्यादा नहीं |
| 34 | कपड़ा उद्योग का बड़ा हिस्सा कहाँ बनता था? | कारख़ानों में नहीं बल्कि घरेलू इकाइयों में |
| 35 | परंपरागत उद्योगों में तरक़्क़ी किससे हुई? | मुख्य रूप से साधारण और छोटे-छोटे आविष्कारों से |
| 36 | कौन-से ग़ैर-मशीनी क्षेत्रों में तरक़्क़ी हो रही थी? | खाद्य प्रसंस्करण, निर्माण, पॉटरी, काँच के काम, चर्मशोधन, फ़र्नीचर और औज़ारों के उत्पादन में |
| 37 | तकनीक अपनाने की गति धीमी क्यों थी? | नयी तकनीक महँगी थी, मशीनें अकसर ख़राब हो जाती थीं, मरम्मत पर ख़र्चा आता था और वे उतनी अच्छी नहीं थीं जितना दावा किया जाता था |
| 38 | भाप के पहले इंजन का निर्माता कौन था? | न्यूकोमेन |
| 39 | न्यूकोमेन के इंजन में सुधार किसने किए? | जेम्स वॉट ने, और नए इंजन को पेटेंट करा लिया |
| 40 | वॉट के नए इंजन का उत्पादन किसने किया? | उनके दोस्त उद्योगपति मैथ्यू बूल्टन ने; पर सालों तक कोई ख़रीदार नहीं मिला |
| 41 | उन्नीसवीं सदी की शुरुआत तक इंग्लैंड में भाप के कितने इंजन थे? | सिर्फ़ 321 — 80 सूती उद्योगों में, 9 ऊन उद्योगों में और बाक़ी खनन, नहर निर्माण व लौह कार्यों में |
| 42 | उन्नीसवीं सदी के मध्य का औसत मज़दूर कैसा था? | मशीनों पर काम करने वाला नहीं बल्कि परंपरागत कारीगर और मज़दूर |
समूह 4 — हाथ का श्रम बनाम मशीन (कार्ड 43–54)
| # | प्रश्न | उत्तर |
|---|---|---|
| 43 | ब्रिटेन में मज़दूरों की कमी क्यों नहीं थी? | क्योंकि ग़रीब किसान और बेकार लोग कामकाज की तलाश में बड़ी संख्या में शहरों को जाते थे |
| 44 | मज़दूर ज़्यादा होने का वेतन पर क्या असर पड़ता है? | जब श्रमिकों की बहुतायत होती है तो वेतन गिर जाते हैं |
| 45 | उद्योगपतियों को मशीनों में दिलचस्पी क्यों नहीं थी? | क्योंकि उन्हें श्रमिकों की कमी या वेतन के मद में भारी लागत जैसी कोई परेशानी नहीं थी |
| 46 | जाड़ों में किन उद्योगों में ज़्यादा काम रहता था? | गैसघरों और शराबख़ानों में; बंदरगाहों पर जहाज़ों की मरम्मत भी जाड़ों में होती थी |
| 47 | क्रिसमस से पहले किन्हें अतिरिक्त मज़दूर चाहिए होते थे? | बुक बाइंडरों और प्रिंटरों को |
| 48 | मौसमी उद्योगों में मशीन क्यों नहीं लगाई जाती थी? | क्योंकि वहाँ उत्पादन मौसम के साथ घटता-बढ़ता रहता था, इसलिए मज़दूरों को ही काम पर रखना पसंद किया जाता था |
| 49 | मशीन से क्या नहीं बन सकता था? | बारीक डिज़ाइन और ख़ास आकारों वाली चीज़ें, क्योंकि मशीन एक जैसे तय क़िस्म के उत्पाद ही बड़ी संख्या में बना सकती थी |
| 50 | उन्नीसवीं सदी के मध्य में ब्रिटेन में कितने प्रकार के हथौड़े और कुल्हाड़ियाँ बनते थे? | 500 तरह के हथौड़े और 45 तरह की कुल्हाड़ियाँ |
| 51 | हथौड़े और कुल्हाड़ियों की इतनी क़िस्में बनाने के लिए किसकी ज़रूरत थी? | यांत्रिक प्रौद्योगिकी की नहीं बल्कि इनसानी निपुणता की |
| 52 | उच्च वर्ग हाथ से बनी चीज़ें क्यों पसंद करता था? | क्योंकि उन्हें परिष्कार और सुरुचि का प्रतीक माना जाता था; उनकी फ़िनिश अच्छी होती थी और डिज़ाइन अच्छा होता था |
| 53 | मशीनों से बने उत्पादों का क्या होता था? | उन्हें उपनिवेशों में निर्यात कर दिया जाता था |
| 54 | अमेरिका में स्थिति अलग क्यों थी? | क्योंकि वहाँ मज़दूरों की कमी थी, इसलिए उद्योगपति मशीनों का इस्तेमाल ज़्यादा पसंद करते थे |
समूह 5 — मज़दूरों की ज़िंदगी (कार्ड 55–66)
| # | प्रश्न | उत्तर |
|---|---|---|
| 55 | नौकरी मिलने की संभावना किस पर निर्भर करती थी? | यारी-दोस्ती, कुनबे-कुटुंब के ज़रिए जान-पहचान पर |
| 56 | जिनके पास संपर्क नहीं थे, उनका क्या होता था? | उन्हें हफ़्तों इंतज़ार करना पड़ता था; वे पुलों के नीचे या रैन-बसेरों में रातें काटते थे |
| 57 | बहुत सारे लोग कहाँ रुकते थे? | निर्धन क़ानून विभाग द्वारा चलाए जाने वाले अस्थायी बसेरों में |
| 58 | मौसमी काम का मज़दूरों पर क्या असर पड़ता था? | उन्हें बीच-बीच में बहुत समय तक ख़ाली बैठना पड़ता था और सीज़न गुज़र जाने के बाद वे दोबारा सड़क पर आ जाते थे |
| 59 | नेपोलियनी युद्ध के दौरान क्या हुआ? | क़ीमतें तेज़ी से बढ़ीं तो मज़दूरों की आय के वास्तविक मूल्य में भारी कमी आ गई — वेतन तो पहले जितना मिलता था पर उससे वे पहले जितनी चीज़ें नहीं ख़रीद सकते थे |
| 60 | मज़दूरों की आमदनी किन दो बातों पर निर्भर होती थी? | वेतन दर पर और रोज़गार की अवधि पर |
| 61 | उन्नीसवीं सदी के मध्य में कितनी शहरी आबादी ग़रीब थी? | सबसे अच्छे हालात में भी लगभग 10 प्रतिशत निहायत ग़रीब थी |
| 62 | 1830 के दशक की मंदी में बेरोज़गारी कितनी थी? | विभिन्न क्षेत्रों में 35 से 75 प्रतिशत तक |
| 63 | स्पिनिंग जेनी किसने और कब बनाई? | जेम्स हरग्रीव्ज़ ने 1764 में |
| 64 | स्पिनिंग जेनी ने क्या किया? | कताई की प्रक्रिया तेज़ कर दी और मज़दूरों की माँग घटा दी; एक ही पहिया घुमाने वाला एक मज़दूर बहुत सारी तकलियों को घुमा देता था |
| 65 | औरतों ने स्पिनिंग जेनी पर हमला क्यों किया? | बेरोज़गारी की आशंका के कारण; हाथ से ऊन कातने वाली औरतों का काम इस मशीन से छिन गया था |
| 66 | 1840 के दशक के बाद कौन-से नए रोज़गार बने? | सड़कें चौड़ी हुईं, नए रेलवे स्टेशन बने, सुरंगें बनीं, निकासी और सीवर व्यवस्था बिछाई गई और नदियों के तटबंध बने; परिवहन उद्योग के मज़दूर 1840 के दशक में दोगुना और अगले 30 सालों में फिर दोगुना हो गए |
समूह 6 — भारत का कपड़ा और सूरत का पतन (कार्ड 67–78)
| # | प्रश्न | उत्तर |
|---|---|---|
| 67 | मशीन युग से पहले अंतर्राष्ट्रीय कपड़ा बाज़ार पर किसका दबदबा था? | भारत के रेशमी और सूती उत्पादों का |
| 68 | भारत का कपास दूसरे देशों से कैसे अलग था? | बहुत सारे देशों में मोटा कपास पैदा होता था लेकिन भारत का कपास महीन क़िस्म का था |
| 69 | ज़मीन के रास्ते व्यापार कौन करता था? | आर्मीनियन और फ़ारसी सौदागर, जो पंजाब से अफ़ग़ानिस्तान, पूर्वी फ़ारस और मध्य एशिया के रास्ते चीज़ें ले जाते थे |
| 70 | कपड़े के थान कैसे भेजे जाते थे? | ऊँटों की पीठ पर लाद कर पश्चिमोत्तर सीमा से पहाड़ी दर्रों और रेगिस्तानों के पार |
| 71 | सूरत बंदरगाह किन बंदरगाहों से जुड़ा था? | खाड़ी और लाल सागर के बंदरगाहों से |
| 72 | दक्षिण-पूर्वी एशिया से व्यापार किन बंदरगाहों से होता था? | कोरोमंडल तट पर मछलीपटनम और बंगाल में हुगली से |
| 73 | आपूर्ति सौदागर क्या करते थे? | बुनकरों को पेशगी देते थे, तैयार कपड़ा ख़रीदते थे और उसे बंदरगाहों तक पहुँचाते थे |
| 74 | भारतीय सौदागरों का नेटवर्क कब टूटने लगा? | 1750 के दशक तक |
| 75 | यूरोपीय कंपनियों ने क्या किया? | पहले स्थानीय दरबारों से रियायतें हासिल कीं, फिर व्यापार पर इज़ारेदारी अधिकार प्राप्त कर लिए |
| 76 | सूरत के व्यापार का मूल्य कैसे गिरा? | सत्रहवीं सदी के आख़िर में 1.6 करोड़ रुपये से गिरकर 1740 के दशक तक केवल 30 लाख रुपये |
| 77 | कौन-से नए बंदरगाह उभरे? | बंबई और कलकत्ता |
| 78 | नए बंदरगाहों का उदय किस बात का संकेत था? | औपनिवेशिक सत्ता की बढ़ती ताक़त का |
समूह 7 — गुमाश्ता और बुनकरों की तबाही (कार्ड 79–94)
| # | प्रश्न | उत्तर |
|---|---|---|
| 79 | सत्ता स्थापित होने से पहले बुनकर की स्थिति कैसी थी? | फ़्रांसीसी, डच, पुर्तगाली और स्थानीय व्यापारी होड़ में रहते थे, इसलिए बुनकर ख़ूब मोल-भाव करते थे और सबसे ऊँची बोली लगाने वाले को माल बेचते थे |
| 80 | सत्ता मिलने के बाद कंपनी ने क्या दावा किया? | व्यापार पर अपने एकाधिकार का |
| 81 | कंपनी की नयी व्यवस्था का उद्देश्य क्या था? | प्रतिस्पर्धा ख़त्म करना, लागतों पर अंकुश रखना और नियमित आपूर्ति सुनिश्चित करना |
| 82 | कंपनी की नयी व्यवस्था का पहला चरण क्या था? | कपड़ा व्यापार में सक्रिय व्यापारियों और दलालों को ख़त्म करना तथा बुनकरों पर प्रत्यक्ष नियंत्रण स्थापित करना |
| 83 | गुमाश्ता कौन था? | कंपनी का वेतनभोगी कर्मचारी, जो बुनकरों पर निगरानी रखता था, माल इकट्ठा करता था और कपड़ों की गुणवत्ता जाँचता था |
| 84 | कंपनी की नयी व्यवस्था का दूसरा चरण क्या था? | कंपनी को माल बेचने वाले बुनकरों को अन्य ख़रीदारों के साथ कारोबार करने पर पाबंदी लगा दी गई |
| 85 | पेशगी और क़र्ज़ का क्या मतलब था? | काम का ऑर्डर मिलने पर कच्चा माल ख़रीदने के लिए क़र्ज़ा दिया जाता था, और क़र्ज़ लेने वाले को अपना कपड़ा गुमाश्ता को ही देना पड़ता था |
| 86 | बुनकरों ने अपनी ज़मीन का क्या किया? | वे उसे भाड़े पर देकर पूरा समय बुनकरी में लगाने लगे; अब पूरा परिवार यही काम करने लगा |
| 87 | पुराने आपूर्ति सौदागर कैसे थे? | वे बुनकर गाँवों में ही रहते थे, बुनकरों से नज़दीकी ताल्लुक़ात रखते थे और संकट के समय उनकी मदद करते थे |
| 88 | नए गुमाश्ता कैसे थे? | वे बाहर के लोग थे, गाँवों से उनका पुराना सामाजिक संबंध नहीं था, वे दंभपूर्ण व्यवहार करते थे और सिपाहियों व चपरासियों को लेकर आते थे |
| 89 | माल समय पर तैयार न होने पर क्या होता था? | बुनकरों को सज़ा दी जाती थी; उन्हें अकसर पीटा जाता था और कोड़े बरसाए जाते थे |
| 90 | बुनकर कंपनी से क्यों बँधे हुए थे? | उन्हें कंपनी से जो क़ीमत मिलती थी वह बहुत कम थी, पर वे क़र्ज़ों की वजह से कंपनी से बँधे हुए थे |
| 91 | बुनकरों ने विरोध कैसे किया — पहला तरीक़ा? | कर्नाटक और बंगाल में बहुत सारे बुनकर गाँव छोड़ कर चले गए और रिश्तेदारों के यहाँ किसी और गाँव में करघा लगा लेते थे |
| 92 | बुनकरों के विरोध का दूसरा तरीक़ा? | कई स्थानों पर गाँव के व्यापारियों के साथ मिलकर बुनकरों ने बग़ावत कर दी |
| 93 | बुनकरों के विरोध का तीसरा तरीक़ा? | बहुत सारे बुनकर क़र्ज़ा लौटाने से इनकार करने लगे, उन्होंने करघे बंद कर दिए और खेतों में मज़दूरी करने लगे |
| 94 | 1772 में हेनरी पतुलो ने क्या कहा था? | कि भारतीय कपड़े की माँग कभी कम नहीं हो सकती क्योंकि दुनिया के किसी और देश में इतना अच्छा माल नहीं बनता |
समूह 8 — मैनचेस्टर का आना (कार्ड 95–106)
| # | प्रश्न | उत्तर |
|---|---|---|
| 95 | 1811-12 में भारत के निर्यात में सूती माल का हिस्सा कितना था? | 33 प्रतिशत |
| 96 | 1850-51 में भारत के निर्यात में सूती माल का हिस्सा कितना रह गया? | मात्र 3 प्रतिशत |
| 97 | इंग्लैंड के उद्योगपतियों का पहला दबाव क्या था? | इंग्लैंड के उद्योगपतियों ने सरकार पर दबाव डाला कि वह आयातित कपड़ों पर आयात शुल्क वसूल करे |
| 98 | आयात शुल्क लगने से क्या फ़ायदा हुआ? | मैनचेस्टर में बने कपड़े बाहरी प्रतिस्पर्धा के बिना इंग्लैंड में आराम से बिकने लगे |
| 99 | इंग्लैंड के उद्योगपतियों का दूसरा दबाव क्या था? | उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी पर दबाव डाला कि वह ब्रिटिश कपड़ों को भारतीय बाज़ारों में भी बेचे |
| 100 | 1850 और 1870 में भारतीय आयात में सूती कपड़े का हिस्सा कितना था? | 1850 में 31 प्रतिशत और 1870 तक 50 प्रतिशत से ऊपर |
| 101 | बुनकरों के सामने कौन-सी दो समस्याएँ एक साथ थीं? | उनका निर्यात बाज़ार ढह रहा था और स्थानीय बाज़ार सिकुड़ने लगा था |
| 102 | आयातित कपड़ा इतना सस्ता क्यों था? | क्योंकि वह कम लागत पर मशीनों से बनता था |
| 103 | 1850 के दशक तक बुनकर इलाक़ों की क्या हालत थी? | वहाँ गिरावट और बेकारी के ही क़िस्सों की भरमार थी |
| 104 | 1860 के दशक में नयी समस्या क्या आई? | बुनकरों को अच्छी कपास नहीं मिल पा रही थी |
| 105 | 1860 के दशक में बुनकरों को अच्छी कपास क्यों नहीं मिल पा रही थी? | अमेरिकी गृहयुद्ध शुरू होने पर अमेरिका से कपास की आमद बंद हो गई तो ब्रिटेन भारत से कच्चा माल मँगाने लगा और कपास की क़ीमत आसमान छूने लगी |
| 106 | उन्नीसवीं सदी के आख़िर में बुनकरों के सामने चौथी समस्या क्या आई? | भारतीय कारख़ानों में उत्पादन होने लगा और बाज़ार मशीनों की बनी चीज़ों से पट गया |
समूह 9 — भारत में फ़ैक्ट्रियों का आना (कार्ड 107–122)
| # | प्रश्न | उत्तर |
|---|---|---|
| 107 | बंबई में पहली कपड़ा मिल कब लगी? | 1854 में; दो साल बाद उत्पादन शुरू हुआ |
| 108 | 1862 में बंबई में कितनी मिलें थीं? | चार मिलें, जिनमें 94,000 तकलियाँ और 2,150 करघे थे |
| 109 | बंगाल में पहली जूट मिल कब चालू हुई? | 1855 में; दूसरी 7 साल बाद 1862 में |
| 110 | एल्गिन मिल कहाँ और कब खुली? | कानपुर में, 1860 के दशक में |
| 111 | अहमदाबाद की पहली कपड़ा मिल कब चालू हुई? | एल्गिन मिल के साल भर बाद |
| 112 | मद्रास में पहली कताई और बुनाई मिल कब खुली? | 1874 में |
| 113 | उद्यमियों की पूँजी का सबसे बड़ा स्रोत क्या था? | चीन के साथ अफ़ीम-चाय का व्यापार |
| 114 | अफ़ीम-चाय का व्यापार कैसे चलता था? | अंग्रेज़ भारतीय अफ़ीम का चीन को निर्यात करते थे और उसके बदले चीन से चाय ख़रीदते थे जो इंग्लैंड जाती थी |
| 115 | द्वारकानाथ टैगोर ने क्या किया? | चीन के व्यापार से कमाकर 1830–1840 के दशकों में 6 संयुक्त उद्यम कंपनियाँ लगाईं |
| 116 | द्वारकानाथ टैगोर के उद्यमों का क्या हुआ? | 1840 के दशक में आए व्यापक व्यावसायिक संकटों में उनके उद्यम बैठ गए |
| 117 | बंबई के दो प्रमुख पारसी उद्यमी कौन थे? | डिनशॉ पेटिट और जमशेदजी नुसरवानजी टाटा |
| 118 | डिनशॉ पेटिट और जमशेदजी टाटा ने पैसा कैसे कमाया? | आंशिक रूप से चीन को निर्यात करके और आंशिक रूप से इंग्लैंड को कच्ची कपास निर्यात करके |
| 119 | कलकत्ता में पहली जूट मिल किसने और कब लगाई? | मारवाड़ी व्यवसायी सेठ हुकुमचंद ने 1917 में |
| 120 | जी.डी. बिड़ला के पूर्वजों ने क्या किया था? | उनके पिता और दादा ने भी चीन के साथ व्यापार किया था |
| 121 | भारतीय व्यवसायी अब केवल क्या निर्यात कर सकते थे? | कच्चा माल और अनाज — कच्ची कपास, अफ़ीम, गेहूँ और नील |
| 122 | सबसे बड़ी यूरोपीय प्रबंधकीय एजेंसियाँ कौन-सी थीं? | बर्ड हीगलर्स एंड कंपनी, एंड्रयू यूल, और जार्डीन स्किनर एंड कंपनी |
समूह 10 — मज़दूर, जॉबर और युद्ध (कार्ड 123–138)
| # | प्रश्न | उत्तर |
|---|---|---|
| 123 | प्रबंधकीय एजेंसियाँ क्या करती थीं? | पूँजी जुटाती थीं, संयुक्त उद्यम कंपनियाँ लगाती थीं और उनका प्रबंधन सँभालती थीं |
| 124 | पूँजी कौन देता था और फ़ैसले कौन लेता था? | भारतीय वित्तपोषक पूँजी उपलब्ध कराते थे जबकि निवेश और व्यवसाय से संबंधित फ़ैसले यूरोपीय एजेंसियाँ लेती थीं |
| 125 | 1901 और 1946 में भारतीय फ़ैक्ट्रियों में कितने मज़दूर थे? | 1901 में 5,84,000 और 1946 में 24,36,000 |
| 126 | मज़दूर कहाँ से आते थे? | ज़्यादातर औद्योगिक इलाक़ों में आसपास के ज़िलों से |
| 127 | 1911 में बंबई के सूती मज़दूर किस ज़िले से आते थे? | 50 प्रतिशत से ज़्यादा पास के रत्नागिरी ज़िले से |
| 128 | मिल मज़दूर गाँव कब लौटते थे? | फ़सलों की कटाई और त्योहारों के समय |
| 129 | संयुक्त प्रांत के लोग कहाँ जाते थे? | बंबई के कपड़ा मिलों और कलकत्ता के जूट मिलों में |
| 130 | नौकरी पाना मुश्किल क्यों था? | क्योंकि रोज़गार चाहने वालों की संख्या रोज़गारों के मुक़ाबले हमेशा ज़्यादा रहती थी और मिलों में प्रवेश भी निषिद्ध था |
| 131 | जॉबर कौन होता था? | कोई पुराना और विश्वस्त कर्मचारी, जिसे उद्योगपति नए मज़दूरों की भर्ती के लिए रखते थे |
| 132 | जॉबर के चार काम क्या थे? | गाँव से लोगों को लाना, काम का भरोसा देना, शहर में जमने में मदद करना और मुसीबत में पैसे से मदद करना |
| 133 | जॉबर बाद में क्या करने लगे? | मदद के बदले पैसे व तोहफ़ों की माँग करने लगे और मज़दूरों की ज़िंदगी को नियंत्रित करने लगे |
| 134 | जॉबर के दूसरे नाम क्या थे? | ‘सरदार’ या ‘मिस्त्री’ |
| 135 | पहले विश्व युद्ध में मैनचेस्टर का आयात क्यों कम हो गया? | क्योंकि ब्रिटिश कारख़ाने सेना की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए युद्ध संबंधी उत्पादन में व्यस्त थे |
| 136 | पहले विश्व युद्ध में भारतीय बाज़ारों को क्या मिला? | रातोंरात एक विशाल देशी बाज़ार |
| 137 | भारतीय कारख़ानों में युद्ध के लिए क्या बनने लगा? | फ़ौज के लिए जूट की बोरियाँ, वर्दी के कपड़े, टेंट और चमड़े के जूते, घोड़े व खच्चर की जीन तथा बहुत सारे अन्य सामान |
| 138 | युद्ध के दौरान भारतीय कारख़ानों में क्या बदलाव आया? | नए कारख़ाने लगाए गए, पुराने कई पालियों में चलने लगे, नए मज़दूर रखे गए और हरेक को पहले से ज़्यादा समय तक काम करना पड़ता था |
समूह 11 — अनूठापन और विज्ञापन (कार्ड 139–152)
| # | प्रश्न | उत्तर |
|---|---|---|
| 139 | युद्ध के बाद मैनचेस्टर की क्या हालत हुई? | भारतीय बाज़ार में उसे पहले वाली हैसियत कभी हासिल नहीं हो पाई |
| 140 | ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था क्यों चरमराई? | आधुनिकीकरण न कर पाने और अमेरिका, जर्मनी व जापान के मुक़ाबले कमज़ोर पड़ जाने के कारण |
| 141 | 1911 में कितने प्रतिशत बड़े उद्योग बंगाल और बंबई में थे? | 67 प्रतिशत |
| 142 | 1911 और 1931 में पंजीकृत फ़ैक्ट्रियों में कितनी श्रम शक्ति काम करती थी? | 1911 में 5 प्रतिशत और 1931 में 10 प्रतिशत |
| 143 | पंजीकृत फ़ैक्ट्रियों के बाहर बाक़ी मज़दूर कहाँ काम करते थे? | गली-मोहल्लों में स्थित छोटी-छोटी वर्कशॉप और घरेलू इकाइयों में |
| 144 | 1900 से 1940 के बीच हथकरघा उत्पादन का क्या हुआ? | वह तीन गुना हो चुका था |
| 145 | फ़्लाई शटल क्या है? | रस्सियों और पुलियों के ज़रिए चलने वाला एक यांत्रिक औज़ार, जो क्षैतिज धागे (ताना) को लम्बवत् धागे (बाना) में पिरो देता है |
| 146 | फ़्लाई शटल से क्या फ़ायदा हुआ? | कामगारों की उत्पादन क्षमता बढ़ी, उत्पादन तेज़ हुआ और श्रम की माँग में कमी आई |
| 147 | 1941 में कितने भारतीय हथकरघों में फ़्लाई शटल थी? | 35 प्रतिशत से ज़्यादा; त्रावणकोर, मद्रास, मैसूर, कोचीन और बंगाल में 70 से 80 प्रतिशत तक |
| 148 | कौन-से बुनकर मिलों से बेहतर मुक़ाबला कर पाते थे? | महीन कपड़ा बनाने वाले, क्योंकि खाते-पीते तबक़े की माँग में उतार-चढ़ाव कम आते थे |
| 149 | मिलें क्या नहीं बना सकती थीं? | विशेष प्रकार की बुनाई — जैसे बुने हुए बॉर्डर वाली साड़ियाँ या मद्रास की प्रसिद्ध लुंगियाँ |
| 150 | विज्ञापन क्या करते हैं? | उत्पादों को ज़रूरी और वांछनीय बना देते हैं, लोगों की सोच बदल देते हैं और नयी ज़रूरतें पैदा कर देते हैं |
| 151 | लेबल के तीन फ़ायदे क्या थे? | कंपनी का नाम व उत्पादन की जगह पता चलती थी, लेबल गुणवत्ता का प्रतीक था, और ‘मेड इन मैनचेस्टर’ देखकर ख़रीदार को कोई डर नहीं रहता था |
| 152 | भारतीय विज्ञापनों में क्या ख़ास था? | उनमें राष्ट्रवादी संदेश साफ़ दिखाई देता था और वे स्वदेशी के वाहक बन गए थे |
समूह 12 — केवल नाम (कार्ड 153–154) — आख़िरी दिन के लिए
| # | नाम | पहचान |
|---|---|---|
| 153 | जमशेदजी जीजीभोय | पारसी बुनकर के बेटे; चीन के व्यापार और जहाज़रानी का काम किया |
| 154 | जे.एन. टाटा | 1912 में जमशेदपुर में भारत का पहला लौह एवं इस्पात संयंत्र स्थापित किया |