इन नोट्स को परीक्षा से एक दिन पहले पढ़िए। यहाँ हर बात पूरे वाक्य में लिखी है, ताकि आप इसे सीधे उत्तर में उतार सकें।
पहले यह याद कीजिए — अध्याय की कहानी एक पैराग्राफ़ में
आज हम जिन देशों को जानते हैं, वे दो सौ साल पहले यूरोप में थे ही नहीं। उस समय वहाँ राजाओं के बड़े-बड़े साम्राज्य थे, जिनमें अलग-अलग भाषा बोलने वाले लोग रहते थे और उन्हें आपस में जोड़ने वाली एकमात्र चीज़ सम्राट के प्रति उनकी निष्ठा थी। 1789 की फ़्रांसीसी क्रांति से यह विचार पैदा हुआ कि देश राजा का नहीं, बल्कि जनता का होता है। यह विचार नेपोलियन की सेनाओं के साथ पूरे यूरोप में फैला। 1815 में नेपोलियन की हार के बाद राजाओं ने वियना संधि करके पुरानी व्यवस्था लौटाने की कोशिश की, पर विचार को दबाया नहीं जा सका। 1830 और 1848 में क्रांतियाँ हुईं, जो असफल तो रहीं पर बेकार नहीं गईं। अंत में 1871 तक जर्मनी और इटली दोनों एक राष्ट्र बन गए — लेकिन यह काम जनता की क्रांति से नहीं, बल्कि राजाओं की सेना और कूटनीति से हुआ। उन्नीसवीं सदी के अंत तक राष्ट्रवाद का चेहरा बदल गया और वह साम्राज्यवाद से जुड़कर 1914 में प्रथम विश्व युद्ध तक ले गया।
भाग 1 — शुरुआत की दो चीज़ें
सॉर्र्यू का चित्र, 1848
फ़्रांसीसी कलाकार फ़्रेडरिक सॉर्र्यू ने 1848 में चार चित्रों की एक शृंखला बनाई, जिसमें उसने ‘जनतांत्रिक और सामाजिक गणतंत्रों’ से बनी दुनिया का सपना दिखाया। पहले चित्र में यूरोप और अमेरिका के लोग एक लंबी क़तार में स्वतंत्रता की प्रतिमा की वंदना करते हुए चल रहे हैं। स्वतंत्रता को एक महिला के रूप में दिखाया गया है, जिसके एक हाथ में ज्ञानोदय की मशाल और दूसरे में मनुष्य के अधिकारों का घोषणापत्र है। जुलूस का नेतृत्व संयुक्त राज्य अमेरिका और स्विट्ज़रलैंड कर रहे हैं, क्योंकि वे तब तक राष्ट्र-राज्य बन चुके थे। यह चित्र एक कल्पनादर्शी (युटोपिया) है, यानी यह सपना उस समय सच नहीं हुआ था।
अर्न्स्ट रेनन का उत्तर, 1882
फ़्रांसीसी दार्शनिक अर्न्स्ट रेनन ने 1882 में सॉर्बोन विश्वविद्यालय में ‘राष्ट्र क्या है?’ विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि राष्ट्र समान भाषा, नस्ल, धर्म या क्षेत्र से नहीं बनता। उनके अनुसार राष्ट्र “लंबे प्रयासों, त्याग और निष्ठा का चरम बिंदु” है और वह “एक बड़ी और व्यापक एकता” है। उनका सबसे प्रसिद्ध वाक्य यह है कि “राष्ट्र का अस्तित्व रोज़ का जनमत-संग्रह है।” उनका मानना था कि राष्ट्रों का होना ज़रूरी है क्योंकि “उनका होना स्वतंत्रता की गारंटी है।”
भाग 2 — फ़्रांसीसी क्रांति और राष्ट्र का विचार
राष्ट्रवाद की पहली स्पष्ट अभिव्यक्ति 1789 में फ़्रांसीसी क्रांति के साथ हुई। क्रांति से पहले फ़्रांस पर एक निरंकुश राजा का शासन था। क्रांति के बाद प्रभुसत्ता राजा के हाथ से निकलकर फ़्रांसीसी नागरिकों के समूह के हाथ में चली गई।
क्रांतिकारियों ने सामूहिक पहचान बनाने के लिए आठ क़दम उठाए
- पितृभूमि (la patrie) और नागरिक (le citoyen) जैसे विचारों पर बल दिया, जिससे लोगों को लगा कि वे एक संयुक्त समुदाय हैं।
- तिरंगा झंडा चुना गया, जिसने पुराने राजध्वज की जगह ली।
- इस्टेट जेनरल का नाम बदलकर नेशनल एसेंबली कर दिया गया।
- नयी स्तुतियाँ रची गईं, शपथें ली गईं और शहीदों का गुणगान हुआ — और यह सब राष्ट्र के नाम पर हुआ।
- एक केंद्रीय प्रशासनिक व्यवस्था लागू की गई, जिसने सभी नागरिकों के लिए समान क़ानून बनाए।
- आंतरिक आयात-निर्यात शुल्क समाप्त कर दिए गए।
- भार तथा नापने की एकसमान व्यवस्था लागू की गई।
- क्षेत्रीय बोलियों को हतोत्साहित किया गया और पेरिस की फ़्रेंच राष्ट्र की साझा भाषा बन गई।
नेपोलियन के सुधार
नेपोलियन ने फ़्रांस में राजतंत्र वापस लाकर प्रजातंत्र को नष्ट कर दिया, लेकिन प्रशासन में उसने क्रांतिकारी सिद्धांत लागू किए। 1804 की नागरिक संहिता (नेपोलियन की संहिता) ने जन्म पर आधारित विशेषाधिकार समाप्त कर दिए तथा क़ानून के समक्ष बराबरी और संपत्ति के अधिकार को सुरक्षित बनाया। उसने डच गणतंत्र, स्विट्ज़रलैंड, इटली और जर्मनी में प्रशासनिक विभाजनों को सरल किया, सामंती व्यवस्था खत्म की और किसानों को भू-दासत्व तथा जागीरदारी शुल्कों से मुक्ति दिलाई। शहरों में कारीगरों के श्रेणी-संघों के नियंत्रण हटा दिए गए और यातायात तथा संचार-व्यवस्थाओं को सुधारा गया।
फिर विरोध क्यों हुआ
शुरू में हॉलैंड, स्विट्ज़रलैंड, ब्रसेल्स, मेंज़, मिलान और वॉरसा में फ़्रांसीसी सेनाओं का स्वागत हुआ, पर यह उत्साह जल्दी ही दुश्मनी में बदल गया। इसके तीन कारण थे — बढ़े हुए कर, सेंसरशिप, और फ़्रेंच सेना में जबरन भर्ती। लोगों को लगा कि इन नुक़सानों के सामने प्रशासनिक फ़ायदे कम हैं।
भाग 3 — अठारहवीं सदी का यूरोप और नया मध्यवर्ग
उस समय यूरोप कैसा था
मध्य अठारहवीं सदी के यूरोप में आज जैसे राष्ट्र-राज्य नहीं थे। जर्मनी, इटली और स्विट्ज़रलैंड राजशाहियों, डचियों और कैंटनों में बँटे हुए थे। पूर्वी और मध्य यूरोप निरंकुश राजतंत्रों के अधीन था। वहाँ के लोग अपने आप को एक सामूहिक पहचान का भागीदार नहीं मानते थे, अलग-अलग भाषाएँ बोलते थे और विभिन्न जातीय समूहों के सदस्य थे।
हैब्सबर्ग साम्राज्य इसका सबसे अच्छा उदाहरण है। उसमें टिरॉल, ऑस्ट्रिया और सुडेटनलैंड में जर्मन-भाषी थे; लॉम्बार्डी और वेनेशिया इतालवी-भाषी थे; हंगरी में आधे लोग मैग्यार बोलते थे; गालीसिया में कुलीन वर्ग पोलिश बोलता था। इसके अलावा बोहेमियन, स्लोवाक, स्लोवेन्स, क्रोएट और राउमन लोग अधीन अवस्था में रहते थे। इन सबको जोड़ने वाला एकमात्र तत्व सम्राट के प्रति उनकी निष्ठा थी।
कुलीन वर्ग और मध्यवर्ग
ज़मीन का मालिक कुलीन वर्ग यूरोप का सबसे प्रभुत्वशाली वर्ग था, पर संख्या में वह छोटा था। वह राजनीतिक कार्यों के लिए फ़्रेंच भाषा का प्रयोग करता था और उसके परिवार वैवाहिक बंधनों से जुड़े रहते थे। जनसंख्या के अधिकांश लोग कृषक थे — पश्चिम में किराएदार और छोटे काश्तकार, तथा पूर्वी और मध्य यूरोप में भूदास।
औद्योगिक उत्पादन और व्यापार में वृद्धि से शहरों का विकास हुआ और वाणिज्यिक वर्गों का उदय हुआ। इंग्लैंड में औद्योगीकरण अठारहवीं सदी के दूसरे भाग में शुरू हुआ, जबकि फ़्रांस और जर्मनी के कुछ हिस्सों में यह उन्नीसवीं शताब्दी के दौरान हुआ। इस प्रक्रिया से श्रमिक-वर्ग और मध्य वर्ग अस्तित्व में आए। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि कुलीन विशेषाधिकारों की समाप्ति के बाद शिक्षित और उदारवादी मध्य वर्गों के बीच ही राष्ट्रीय एकता के विचार लोकप्रिय हुए।
भाग 4 — उदारवाद के तीन अर्थ (सबसे महत्त्वपूर्ण भाग)
उदारवाद यानी liberalism शब्द लातिन के liber से बना है, जिसका अर्थ है ‘आज़ाद’।
राजनीतिक अर्थ
उदारवाद का मतलब था व्यक्ति के लिए आज़ादी और क़ानून के समक्ष सबकी बराबरी। राजनीतिक रूप से यह सहमति से बनी सरकार पर ज़ोर देता था। फ़्रांसीसी क्रांति के बाद से यह निरंकुश शासक और पादरीवर्ग के विशेषाधिकारों की समाप्ति, संविधान तथा संसदीय प्रतिनिधि सरकार का पक्षधर था। उन्नीसवीं सदी के उदारवादी निजी संपत्ति के स्वामित्व की अनिवार्यता पर भी बल देते थे।
मताधिकार की सीमा
यह ज़रूरी नहीं था कि क़ानून के समक्ष बराबरी का विचार सबके लिए मताधिकार के पक्ष में था। क्रांतिकारी फ़्रांस में मत देने का अधिकार केवल संपत्तिवान पुरुषों को था; संपत्ति-विहीन पुरुष और सभी महिलाएँ राजनीतिक अधिकारों से वंचित थे। जैकोबिन शासन के समय केवल थोड़े समय के लिए सभी वयस्क पुरुषों को मताधिकार मिला। नेपोलियन की संहिता ने सीमित मताधिकार वापस लाया और महिलाओं को अवयस्क का दर्जा देते हुए उन्हें पिताओं और पतियों के अधीन कर दिया। इसी कारण पूरी उन्नीसवीं सदी में महिलाओं और संपत्ति-विहीन पुरुषों ने समान राजनीतिक अधिकारों की माँग करते हुए विरोध-आंदोलन चलाए।
आर्थिक अर्थ
आर्थिक क्षेत्र में उदारवाद बाज़ारों की मुक्ति और चीज़ों तथा पूँजी के आवागमन पर राज्य के नियंत्रण को खत्म करने के पक्ष में था। जर्मन इलाक़ों में नेपोलियन के क़दमों से 39 राज्यों का महासंघ बना, जिनमें से हर एक की अपनी मुद्रा और नाप-तौल प्रणाली थी। 1833 में हैम्बर्ग से न्यूरेम्बर्ग जाने वाले व्यापारी को ग्यारह सीमाशुल्क नाकों से गुज़रना पड़ता था और हर बार लगभग 5% शुल्क देना पड़ता था। कपड़ा नापने का पैमाना ऐले हर जगह अलग था — फ़्रैंकफ़र्ट में 54.7 सेंटीमीटर, मेंज़ में 55.1, न्यूरेम्बर्ग में 65.6 और फ़्राईबर्ग में 53.5 सेंटीमीटर।
1834 में प्रशा की पहल पर ज़ॉल्वेराइन नामक शुल्क संघ बना, जिसमें अधिकांश जर्मन राज्य शामिल हुए। इसने शुल्क अवरोधों को समाप्त किया और मुद्राओं की संख्या तीस से घटाकर दो कर दी। इसके अलावा रेलवे के जाल ने गतिशीलता बढ़ाई। इस तरह आर्थिक राष्ट्रवाद की लहर ने राष्ट्रवादी भावनाओं को मज़बूत बनाया।
भाग 5 — रूढ़िवाद और वियना संधि, 1815
नया रूढ़िवाद
1815 में नेपोलियन की हार के बाद यूरोपीय सरकारें रूढ़िवाद की भावना से प्रेरित थीं। रूढ़िवादी मानते थे कि राजतंत्र, चर्च, सामाजिक ऊँच-नीच, संपत्ति और परिवार जैसी पारंपरिक संस्थाओं को बनाए रखना चाहिए। लेकिन अधिकतर रूढ़िवादी क्रांति से पहले के दौर में वापसी नहीं चाहते थे। नेपोलियन के परिवर्तनों से उन्होंने जान लिया था कि आधुनिकीकरण राजतंत्र जैसी पारंपरिक संस्थाओं को मज़बूत बनाने में सक्षम था। एक आधुनिक सेना, कुशल नौकरशाही, गतिशील अर्थव्यवस्था तथा सामंतवाद और भूदासत्व की समाप्ति निरंकुश राजतंत्रों को शक्ति दे सकती थी।
वियना संधि के मुख्य फ़ैसले
1815 में ब्रिटेन, रूस, प्रशा और ऑस्ट्रिया के प्रतिनिधि वियना में मिले। सम्मेलन की मेज़बानी ऑस्ट्रिया के चांसलर ड्यूक मैटरनिख ने की। संधि के मुख्य फ़ैसले ये थे —
| क्षेत्र | फ़ैसला |
|---|---|
| फ़्रांस | बूबों वंश सत्ता में बहाल; नेपोलियन के जीते इलाक़े वापस लिए गए |
| फ़्रांस की सीमाओं पर | कई राज्य क़ायम किए गए ताकि भविष्य में फ़्रांस विस्तार न कर सके |
| उत्तर में | नीदरलैंड्स का राज्य बना, जिसमें बेल्जियम शामिल था |
| दक्षिण में | पीडमॉण्ट में जेनोआ जोड़ा गया |
| प्रशा को | पश्चिमी सीमाओं पर नए इलाक़े, और सैक्सनी का एक हिस्सा |
| ऑस्ट्रिया को | उत्तरी इटली का नियंत्रण |
| रूस को | पोलैंड का एक हिस्सा |
| जर्मन महासंघ | नेपोलियन का बनाया 39 राज्यों वाला महासंघ बरक़रार रखा गया |
दमन और सेंसरशिप
1815 की रूढ़िवादी व्यवस्थाएँ निरंकुश थीं और आलोचना तथा असहमति बर्दाश्त नहीं करती थीं। ज़्यादातर सरकारों ने सेंसरशिप के नियम बनाए, जिनका उद्देश्य अख़बारों, किताबों, नाटकों और गीतों पर नियंत्रण लगाना था। इसीलिए उदारवादी राष्ट्रवादियों का एक मुख्य मुद्दा प्रेस की आज़ादी था।
क्रांतिकारी और मेत्सिनी
दमन के भय से अनेक उदारवादी-राष्ट्रवादी भूमिगत हो गए और गुप्त संगठन बनाने लगे। उनमें सबसे प्रसिद्ध ज्युसेपे मेत्सिनी था, जिसका जन्म 1805 में जेनोआ में हुआ। वह पहले कार्बोनारी का सदस्य बना और चौबीस साल की उम्र में लिगुरिया में क्रांति करने के कारण बहिष्कृत कर दिया गया। इसके बाद उसने दो संगठन बनाए — मारसेई में ‘यंग इटली’ और बर्न में ‘यंग यूरोप’। उसका विश्वास था कि राष्ट्र ही मनुष्यों की प्राकृतिक इकाई है, इसलिए इटली को जोड़कर एक एकीकृत गणतंत्र बनाना ही उसकी मुक्ति का आधार है। मैटरनिख ने उसे ‘हमारी सामाजिक व्यवस्था का सबसे ख़तरनाक दुश्मन’ बताया।
भाग 6 — क्रांतियों का युग, 1830–1848
जुलाई क्रांति, 1830
प्रथम विद्रोह फ़्रांस में जुलाई 1830 में हुआ। उदारवादी क्रांतिकारियों ने बूबों राजा को उखाड़ फेंका और लुई फ़िलिप के नेतृत्व में एक संवैधानिक राजतंत्र स्थापित किया। मैटरनिख ने टिप्पणी की कि “जब फ़्रांस छींकता है तो बाक़ी यूरोप की सर्दी-ज़ुकाम हो जाता है।” इसी क्रांति से ब्रसेल्स में विद्रोह भड़का और बेल्जियम नीदरलैंड्स से अलग हो गया।
यूनान का स्वतंत्रता संग्राम
पंद्रहवीं सदी से यूनान ऑटोमन साम्राज्य का हिस्सा था। यूरोप में क्रांतिकारी राष्ट्रवाद की प्रगति से यूनानियों का संघर्ष 1821 में शुरू हुआ। उन्हें निर्वासन में रह रहे यूनानियों और पश्चिमी यूरोप के उन लोगों का समर्थन मिला जो प्राचीन यूनानी संस्कृति के प्रति सहानुभूति रखते थे। कवियों और कलाकारों ने यूनान को यूरोपीय सभ्यता का पालना बताया। अंग्रेज़ कवि लॉर्ड बायरन ने धन इकट्ठा किया और युद्ध में लड़ने भी गए, जहाँ 1824 में बुख़ार से उनकी मृत्यु हो गई। अंततः 1832 की कुस्तुनतुनिया की संधि ने यूनान को एक स्वतंत्र राष्ट्र की मान्यता दी।
संस्कृति की भूमिका — रूमानीवाद
राष्ट्रवाद का विकास केवल युद्धों और क्षेत्रीय विस्तार से नहीं हुआ; राष्ट्र के विचार के निर्माण में संस्कृति ने एक अहम भूमिका निभाई। रूमानीवाद एक सांस्कृतिक आंदोलन था जिसने तर्क और विज्ञान के महिमामंडन की आलोचना की और भावनाओं, अंतर्दृष्टि तथा रहस्यवादी भावनाओं पर ज़ोर दिया।
जर्मन दार्शनिक योहान गॉटफ़्रीड ने दावा किया कि सच्ची जर्मन संस्कृति उसके आम लोगों (das volk) में निहित थी और राष्ट्र की सच्ची आत्मा (volkgeist) लोकगीतों, जन-काव्य और लोकनृत्यों से प्रकट होती थी। ग्रिम बंधुओं ने छह साल गाँव-गाँव घूमकर लोक कथाएँ इकट्ठी कीं और 1812 में पहला संग्रह प्रकाशित किया; उन्होंने 33 खंडों में जर्मन भाषा का शब्दकोश भी बनाया।
पोलैंड का उदाहरण सबसे शक्तिशाली है। अठारहवीं सदी के अंत में रूस, प्रशा और ऑस्ट्रिया ने पोलैंड का विभाजन कर दिया था, फिर भी संगीत और भाषा के ज़रिये राष्ट्रीय भावना जीवित रखी गई। कैरोल कुर्पिंस्की ने पोलोनेस और माजुरका जैसे लोकनृत्यों को राष्ट्रीय प्रतीकों में बदल दिया। रूसी क़ब्ज़े के बाद पोलिश भाषा को स्कूलों से हटाकर रूसी भाषा जबरन लादी गई। 1831 के असफल विद्रोह के बाद लोगों ने भाषा को हथियार बनाया और चर्च तथा धार्मिक शिक्षा में पोलिश का प्रयोग किया। इसके कारण बड़ी संख्या में पादरियों और बिशपों को जेल में डाला गया और साइबेरिया भेजा गया।
भूख, कठिनाइयाँ और जन विद्रोह
1830 का दशक यूरोप में भारी कठिनाइयाँ लेकर आया। जनसंख्या में ज़बरदस्त वृद्धि हुई और नौकरी ढूँढ़ने वालों की तादाद उपलब्ध रोज़गार से अधिक हो गई। ग्रामीण आबादी शहरों की ग़रीब बस्तियों में रहने लगी। नगरों के लघु उत्पादकों को इंग्लैंड से आयातित मशीन से बने सस्ते कपड़े से कड़ी प्रतिस्पर्धा झेलनी पड़ी। जहाँ कुलीन वर्ग सत्ता में था, वहाँ कृषक सामंती शुल्कों के बोझ तले दबे थे।
1848 में खाने-पीने की कमी और बेरोज़गारी से पेरिस के लोग सड़कों पर उतर आए, जगह-जगह अवरोध लगाए गए और लुई फ़िलिप को भागना पड़ा। राष्ट्रीय सभा ने गणतंत्र की घोषणा करते हुए 21 वर्ष से ऊपर सभी वयस्क पुरुषों को मताधिकार दिया और काम के अधिकार की गारंटी दी।
1845 में सिलेसिया के बुनकरों ने ठेकेदारों के ख़िलाफ़ विद्रोह किया, क्योंकि वे कच्चा माल देकर बना हुआ कपड़ा लेते थे पर दाम बहुत कम देते थे। 4 जून को दोपहर 2 बजे बुनकरों की भीड़ ठेकेदार की कोठी पहुँची और ज़्यादा मज़दूरी की माँग की। धमकी मिलने पर उन्होंने घर में घुसकर सामान तोड़ दिया और कपड़े का भंडार लूट लिया। ठेकेदार 24 घंटे बाद सेना बुलाकर लौटा और उसके बाद हुए टकराव में ग्यारह बुनकरों को गोली मार दी गई।
1848: उदारवादियों की क्रांति और फ़्रैंकफ़र्ट संसद
1848 में ग़रीब किसानों-मज़दूरों के विद्रोह के समानांतर पढ़े-लिखे मध्यवर्गों की भी एक क्रांति हो रही थी। जर्मनी, इटली, पोलैंड और ऑस्ट्रो-हंगेरियन साम्राज्य में उदारवादी मध्यवर्गों ने संविधानवाद की माँग को राष्ट्रीय एकीकरण की माँग से जोड़ दिया।
18 मई 1848 को 831 निर्वाचित प्रतिनिधियों ने सेंट पॉल चर्च में फ़्रैंकफ़र्ट संसद में अपना स्थान ग्रहण किया। उन्होंने जर्मन राष्ट्र के लिए एक संविधान का प्रारूप तैयार किया, जिसमें राजा को संसद के अधीन रहना था। पर प्रशा के राजा फ़्रेडरीख विल्हेम चतुर्थ ने ताज अस्वीकार कर दिया। इसके साथ ही कुलीन वर्ग और सेना का विरोध बढ़ गया और संसद का सामाजिक आधार कमज़ोर हो गया, क्योंकि मध्य वर्गों ने मज़दूरों और कारीगरों की माँगों का विरोध किया और उनका समर्थन खो बैठे। अंत में सैनिकों को बुलाया गया और एसेंबली भंग होने पर मजबूर हुई।
महिलाओं ने आंदोलन में सक्रिय भाग लिया — उन्होंने अपने राजनीतिक संगठन स्थापित किए, अख़बार शुरू किए, तथा राजनीतिक बैठकों और प्रदर्शनों में शिरकत की। फिर भी उन्हें एसेंबली के चुनाव में मताधिकार से वंचित रखा गया और फ़्रैंकफ़र्ट संसद में उन्हें केवल दर्शक-दीर्घा में खड़े होने दिया गया।
1848 का असली नतीजा
रूढ़िवादी ताक़तें 1848 में उदारवादी आंदोलनों को दबा पाने में कामयाब हुईं, किंतु वे पुरानी व्यवस्था बहाल नहीं कर पाईं। राजाओं को समझ आ गया कि रियायतें देकर ही क्रांति और दमन के चक्र को समाप्त किया जा सकता है। इसका नतीजा यह हुआ कि हैब्सबर्ग क्षेत्रों और रूस में भूदासत्व और बंधुआ मज़दूरी समाप्त कर दी गई और हैब्सबर्ग शासकों ने हंगरी के लोगों को ज़्यादा स्वायत्तता प्रदान की।
भाग 7 — जर्मनी और इटली का निर्माण
1848 के बाद यूरोप में राष्ट्रवाद का जनतंत्र और क्रांति से अलगाव होने लगा, और रूढ़िवादियों ने राज्य की सत्ता बढ़ाने के लिए राष्ट्रवादी भावनाओं का इस्तेमाल किया।
जर्मनी का एकीकरण
1848 में मध्यवर्गीय जर्मन लोगों ने निर्वाचित संसद द्वारा शासित राष्ट्र-राज्य बनाने का प्रयास किया, पर यह उदारवादी पहल राजशाही और फ़ौज की ताक़त ने मिलकर दबा दी। उनका प्रशा के बड़े भूस्वामियों (Junkers) ने भी समर्थन किया।
इसके बाद प्रशा ने राष्ट्रीय एकीकरण के आंदोलन का नेतृत्व सँभाल लिया। प्रमुख मंत्री ऑटो वॉन बिस्मार्क इस प्रक्रिया का जनक था, जिसने प्रशा की सेना और नौकरशाही की मदद ली। सात वर्ष के दौरान ऑस्ट्रिया, डेन्मार्क और फ़्रांस से तीन युद्धों में प्रशा को जीत हुई और एकीकरण की प्रक्रिया पूरी हुई। 18 जनवरी 1871 को वर्साय के महल के शीशमहल (हॉल ऑफ़ मिरर्स) में प्रशा के राजा विलियम प्रथम को जर्मनी का सम्राट घोषित किया गया।
नए राज्य ने जर्मनी की मुद्रा, बैंकिंग और क़ानूनी तथा न्यायिक व्यवस्थाओं के आधुनिकीकरण पर ज़ोर दिया, और प्रशा द्वारा उठाए क़दम बाक़ी जर्मनी के लिए अकसर एक मॉडल बने।
इटली का एकीकरण
उन्नीसवीं सदी के मध्य में इटली सात राज्यों में बँटा हुआ था, जिनमें से केवल सार्डिनिया-पीडमॉण्ट में एक इतालवी राजघराने का शासन था। उत्तरी भाग ऑस्ट्रियाई हैब्सबर्गों के अधीन, मध्य इलाक़ों पर पोप का शासन और दक्षिणी क्षेत्र स्पेन के बूबों राजाओं के अधीन था। इतालवी भाषा ने भी साझा रूप हासिल नहीं किया था।
एकीकरण तीन व्यक्तियों के काम से हुआ —
पहला, ज्युसेपे मेत्सिनी, जिसने 1830 के दशक में एकीकृत इतालवी गणराज्य के लिए कार्यक्रम प्रस्तुत किया और ‘यंग इटली’ नामक गुप्त संगठन बनाया।
दूसरा, काउंट कैमिलो दे कावूर, जो सार्डिनिया-पीडमॉण्ट का मंत्री प्रमुख था। वह न तो एक क्रांतिकारी था और न ही जनतंत्र में विश्वास रखने वाला, और वह इतालवी भाषा से कहीं बेहतर फ़्रेंच बोलता था। फ़्रांस से उसकी चतुर कूटनीतिक संधि के कारण सार्डिनिया-पीडमॉण्ट 1859 में ऑस्ट्रियाई बलों को हरा पाने में कामयाब हुआ।
तीसरा, ज्युसेपे गैरीबॉल्डी (1807–82)। उसने 1860 में दक्षिण इटली की तरफ़ ‘हज़ार लोगों का अभियान’ (एक्सपिडिशन ऑफ़ द थाउज़ेंड) का नेतृत्व किया, जिसमें स्वयंसेवकों की संख्या लगभग 30,000 तक पहुँच गई। वे ‘रेड शर्ट्स’ के नाम से लोकप्रिय हुए और दो सिसिलियों के राज्य में प्रवेश कर स्थानीय किसानों का समर्थन पाने में सफल रहे। 1867 में उसकी सेना पेपल राज्यों से लड़ने रोम गई, पर वहाँ तैनात फ़्रांसीसी और पेपल सैनिकों के सामने टिक नहीं पाई। 1870 में जब प्रशा से युद्ध के दौरान फ़्रांस ने रोम से अपने सैनिक हटा लिए, तब जाकर पेपल राज्य इटली में सम्मिलित हुए।
1861 में विक्टर इमेनुएल द्वितीय को एकीकृत इटली का राजा घोषित किया गया। लेकिन इटली के अधिकांश निवासी, जिनमें निरक्षरता की दर काफ़ी ऊँची थी, अभी भी उदारवादी-राष्ट्रवादी विचारधारा से अनजान थे। दक्षिणी इटली के जिन किसानों ने गैरीबॉल्डी को समर्थन दिया, उन्होंने इटालिया के बारे में कभी सुना ही नहीं था और वे मानते थे कि ला टालिया विक्टर इमेनुएल की पत्नी थी।
ब्रिटेन की अजीब दास्तान
ब्रिटेन में राष्ट्र-राज्य का निर्माण अचानक हुई क्रांति का परिणाम नहीं था; यह एक लंबी चलने वाली प्रक्रिया का नतीजा था। अठारहवीं सदी के पहले ब्रितानी राष्ट्र था ही नहीं — अंग्रेज़, वेल्श, स्कॉट और आयरिश की मुख्य पहचान नृजातीय थी।
जैसे-जैसे आंग्ल राष्ट्र की धन-दौलत और सत्ता बढ़ी, वह दूसरों पर प्रभुत्व जमाने में सफल हुआ। 1688 में आंग्ल संसद ने राजतंत्र से ताक़त छीन ली और 1707 के ‘ऐक्ट ऑफ़ यूनियन’ से ‘यूनाइटेड किंगडम ऑफ़ ग्रेट ब्रिटेन’ का गठन हुआ। स्कॉटलैंड की ख़ास संस्कृति और राजनीतिक संस्थानों को योजनाबद्ध तरीक़े से दबाया गया; स्कॉटिश हाइलैंड्स के लोगों को अपनी गेलिक भाषा बोलने या राष्ट्रीय पोशाक पहनने की मनाही थी और बहुतों को वतन छोड़ने पर मजबूर किया गया। आयरलैंड में अंग्रेज़ों ने प्रोटेस्टेंट लोगों को बहुसंख्यक कैथलिक देश पर प्रभुत्व बढ़ाने में मदद की, और वोल्फ़ टोन के असफल विद्रोह (1798) के बाद 1801 में आयरलैंड को बलपूर्वक यूनाइटेड किंगडम में शामिल कर लिया गया। नए ब्रितानी राष्ट्र में यूनियन जैक और ‘गॉड सेव अवर नोबल किंग’ को ख़ूब बढ़ावा दिया गया और पुराने राष्ट्र मातहत सहयोगी के रूप में ही रह पाए।
भाग 8 — राष्ट्र की दृश्य-कल्पना
राजा को चित्र या मूर्ति में दिखाना आसान है, पर राष्ट्र को चेहरा कैसे दिया जाए? इस समस्या का हल कलाकारों ने राष्ट्र का मानवीकरण करके निकाला — यानी उन्होंने एक देश को इस तरह चित्रित किया जैसे वह कोई व्यक्ति हो। राष्ट्रों को नारी भेष में प्रस्तुत किया जाता था, और यह नारी असल जीवन की कोई ख़ास महिला नहीं थी, बल्कि राष्ट्र के अमूर्त विचार को ठोस रूप देने का प्रयास थी। इस तरह नारी की छवि राष्ट्र का रूपक बन गई।
फ़्रांस में इस नारी रूपक को लोकप्रिय ईसाई नाम मारीआन दिया गया, जिसने जन-राष्ट्र के विचार को रेखांकित किया। उसके चिह्न लाल टोपी, तिरंगा और कलगी थे, जो स्वतंत्रता और गणतंत्र के प्रतीक हैं। मारीआन की प्रतिमाएँ सार्वजनिक चौकों पर लगाई गईं ताकि जनता को एकता के राष्ट्रीय प्रतीक की याद आती रहे, और उसकी छवि सिक्कों और डाक टिकटों पर भी अंकित की गई।
इसी तरह जर्मेनिया जर्मन राष्ट्र का रूपक बन गई। चित्रों में जर्मेनिया बलूत वृक्ष के पत्तों का मुकुट पहनती है, क्योंकि जर्मन बलूत वीरता का प्रतीक है।
जर्मेनिया के प्रतीकों के अर्थ (यह तालिका ज़रूर याद कीजिए)
| प्रतीक | अर्थ |
|---|---|
| टूटी हुई बेड़ियाँ | आज़ादी मिलना |
| बाज़-छाप कवच | जर्मन साम्राज्य की प्रतीक-शक्ति |
| बलूत पत्तियों का मुकुट | बहादुरी |
| तलवार | मुक़ाबले की तैयारी |
| तलवार पर लिपटी जैतून की डाली | शांति की चाह |
| काला, लाल और सुनहरा तिरंगा | 1848 में उदारवादी-राष्ट्रवादियों का झंडा, जिसे ड्यूक्स ने प्रतिबंधित किया |
| उगते सूर्य की किरणें | एक नए युग का सूत्रपात |
भाग 9 — राष्ट्रवाद और साम्राज्यवाद
उन्नीसवीं सदी की अंतिम चौथाई तक राष्ट्रवाद का वह आदर्शवादी उदारवादी-जनतांत्रिक स्वभाव नहीं रहा जो सदी के प्रथम भाग में था; अब वह सीमित लक्ष्यों वाला संकीर्ण सिद्धांत बन गया। राष्ट्रवादी समूह एक-दूसरे के प्रति अनुदार होते चले गए और लड़ने के लिए हमेशा तैयार रहते थे, और प्रमुख यूरोपीय शक्तियों ने अपने साम्राज्यवादी उद्देश्यों के लिए अधीन लोगों की राष्ट्रवादी आकांक्षाओं का इस्तेमाल किया।
बाल्कन क्षेत्र में तनाव क्यों पनपा
1871 के बाद यूरोप में गंभीर राष्ट्रवादी तनाव का स्रोत बाल्कन क्षेत्र था। इसमें रोमानिया, बुल्गेरिया, अल्बेनिया, यूनान, मेसिडोनिया, क्रोएशिया, बोस्निया-हर्ज़ेगोविना, स्लोवेनिया, सर्बिया और मॉन्टिनिग्रो शामिल थे, और वहाँ के निवासियों को आमतौर पर स्लाव पुकारा जाता था।
तनाव के मुख्य कारण ये थे —
- इस क्षेत्र में भौगोलिक और जातीय भिन्नता थी।
- बाल्कन का एक बड़ा हिस्सा ऑटोमन साम्राज्य के नियंत्रण में था।
- रूमानी राष्ट्रवाद के विचारों के फैलने और ऑटोमन साम्राज्य के विघटन से स्थिति काफ़ी विस्फोटक हो गई।
- ऑटोमन साम्राज्य ने आधुनिकीकरण और आंतरिक सुधारों से मज़बूत बनना चाहा, किंतु उसे बहुत कम सफलता मिली।
- एक के बाद एक अधीन यूरोपीय राष्ट्रीयताएँ स्वतंत्रता की घोषणा करने लगीं।
- बाल्कन लोगों ने इतिहास का इस्तेमाल यह साबित करने के लिए किया कि वे कभी स्वतंत्र थे और बाद में विदेशी शक्तियों ने उन्हें अधीन कर लिया।
- बाल्कन राज्य एक-दूसरे से भारी ईर्ष्या करते थे और हर एक ज़्यादा से ज़्यादा इलाक़ा हथियाना चाहता था।
- यूरोपीय बड़ी शक्तियों के बीच व्यापार, उपनिवेशों तथा नौसैनिक और सैन्य ताक़त के लिए गहरी प्रतिस्पर्धा थी।
- रूस, जर्मनी, इंग्लैंड और ऑस्ट्रो-हंगरी में से हर ताक़त बाल्कन पर अन्य शक्तियों की पकड़ कमज़ोर करके अपना प्रभाव बढ़ाना चाहती थी।
इससे इस इलाक़े में कई युद्ध हुए और अंततः प्रथम विश्व युद्ध हुआ।
अंतिम बात
साम्राज्यवाद से जुड़कर राष्ट्रवाद 1914 में यूरोप को महाविपदा की ओर ले गया। लेकिन इसी बीच उपनिवेश बनाए गए देशों में साम्राज्य-विरोधी आंदोलन विकसित हुए, जो इस अर्थ में राष्ट्रवादी थे कि वे सभी स्वतंत्र राष्ट्र-राज्य का निर्माण करने के लिए संघर्ष कर रहे थे। राष्ट्रवाद के यूरोपीय विचार कहीं और ज्यों-के-त्यों नहीं दोहराए गए, क्योंकि हर जगह लोगों ने अपनी तरह का विशिष्ट राष्ट्रवाद विकसित किया। फिर भी यह विचार कि समाजों को ‘राष्ट्र-राज्यों’ में गठित किया जाना चाहिए, अब स्वाभाविक और सार्वभौम मान लिया गया।
अंत में — याद रखने के आसान तरीक़े
इटली के एकीकरण के तीन नाम याद कीजिए — “मन का गीत” म = मेत्सिनी (विचार दिया) · क = कावूर (कूटनीति की) · गी = गैरीबॉल्डी (लड़ाई लड़ी)
जर्मनी के एकीकरण के तीन युद्ध — ऑस्ट्रिया, डेन्मार्क और फ़्रांस से, सात वर्ष में, बिस्मार्क के नेतृत्व में
चार महत्त्वपूर्ण वर्ष 1789 क्रांति · 1815 वियना संधि · 1848 क्रांतियों का साल · 1871 जर्मनी और (लगभग) इटली दोनों पूरे
दो रूपक — मारीआन (फ़्रांस, लाल टोपी) और जर्मेनिया (जर्मनी, बलूत का मुकुट)
दो संधियाँ जिनसे देश बने — 1832 कुस्तुनतुनिया (यूनान स्वतंत्र) और 1707 ऐक्ट ऑफ़ यूनियन (ग्रेट ब्रिटेन बना)
एक वाक्य जो हर उत्तर में काम आता है — “साझेपन की यह भावना अनंत काल से नहीं थी; यह संघर्षों और नेताओं तथा आम लोगों की सरगर्मियों से निर्मित हुई थी।”