यह दस्तावेज़ केवल शिक्षक के लिए है। इसमें पढ़ाने का क्रम, कठिन बिंदु, अपेक्षित भ्रांतियाँ, बोर्ड-कार्य और संवेदनशील विषयों को सँभालने के सुझाव हैं।
1 · इस अध्याय की एक-पंक्ति कुंजी
★★पूरा अध्याय एक ही वाक्य से खुलता और बंद होता है — “इन सवालों के जवाब बहुधा इस बात से निर्धारित होते हैं कि कौन देश कितना ताकतवर है। इस तरह ये मसले गहरे अर्थों में राजनीतिक हैं।” (पृ. 83)
पहले ही कालांश में यह वाक्य बोर्ड के कोने में लिख दीजिए और पूरे अध्याय तक मत मिटाइए। हर खंड में इसे दोहराइए —
- वैश्विक संपदा पर विवाद क्यों? → ताकत का सवाल
- ‘साझी परंतु अलग-अलग जिम्मेदारियाँ’ क्यों चाहिए? → ताकत का सवाल
- तेल और पानी पर संघर्ष क्यों? → ताकत का सवाल
- मूलवासियों की उपेक्षा क्यों? → ताकत का सवाल
2 · अध्याय का तर्क-प्रवाह — आठ पड़ावों में
| पड़ाव | क्या स्थापित होता है | पृष्ठ |
|---|---|---|
| 1. नुकसान की सूची | समस्या वास्तविक और मापी जा सकने वाली है | 82–83 |
| 2. यह राजनीति है | दो स्तरों पर — व्यावहारिक (सरकारें, सहयोग) और गहरा (ताकत) | 83 |
| 3. पृथ्वी सम्मेलन 1992 | पर्यावरण विश्व-राजनीति के केंद्र में; पर उत्तर-दक्षिण की खाई खुल गई | 83–84 |
| 4. वैश्विक संपदा | चार क्षेत्र किसी के नहीं — इसलिए सबकी जिम्मेदारी | 84–86 |
| 5. साझी परंतु अलग-अलग | समाधान का सिद्धांत — योगदान अलग, इसलिए जिम्मेदारी भी अलग | 86–87 |
| 6. साझी संपदा और देवस्थान | समुदाय भी प्रबंधन कर सकते हैं — भारतीय उदाहरण | 87–88 |
| 7. भारत का पक्ष | ऐतिहासिक उत्तरदायित्व + ठोस कदम + ! आत्म-आलोचना | 88–90 |
| 8. आंदोलन, भू-राजनीति, मूलवासी | नागरिक समाज · संसाधन-संघर्ष · और सबसे बड़ी कीमत किसने चुकायी | 90–97 |
★ध्यान दीजिए — अध्याय समस्या से शुरू होता है, समाधान की ओर बढ़ता है, और फिर उन लोगों पर आकर रुकता है जिनकी आवाज़ सबसे कम सुनी जाती है। यही उसकी नैतिक संरचना है।
3 · पहले ही दिन दो अनाथ-संदर्भ ठीक कीजिएध्यान
| # | कहाँ | गलत क्या है | सही क्या है |
|---|---|---|---|
| 1 | पृ. 82 | “अध्याय सात में हमने विश्व-राजनीति के दायरे को थोड़ा बढ़ाकर उसमें गरीबी और महामारी जैसे विषय भी शामिल कर लिए हैं।” | ! वह अब ‘अध्याय 5 — समकालीन विश्व में सुरक्षा’ है। (वहीं ‘वैश्विक निर्धनता’ और ‘स्वास्थ्य-महामारी’ के खंड हैं।) |
| 2 | पृ. 82 (अराल सागर के चित्र-शीर्षक में) | “(अराल सागर की अवस्थिति देखने समझने के लिए पृष्ठ 24 पर दिए मानचित्र को देखें।)” | ! पृष्ठ 24 अब अध्याय 2 (सत्ता के समकालीन केन्द्र) का है और उस पर चीन के कार्टून हैं — कोई मानचित्र नहीं। (यह सत्यापित है।) सोवियत-उत्तर गणराज्यों का मानचित्र अब अध्याय 1 में है। |
✓ और एक संदर्भ सही है, इसे भ्रम मत मानिए (पृ. 97) — “अगले अध्याय में वैश्वीकरण के विरोध में चल रहे आंदोलन की चर्चा की गई है।” — अगला अध्याय 7 वैश्वीकरण ही है।
★यदि ये दो सुधार न बताए जाएँ तो विद्यार्थी पूरी कक्षा गलत जगह खोजते रह जाते हैं। इन्हें कालांश 1 के पहले 3 मिनट में निपटा दीजिए।
4 · बोर्ड-कार्य — चार ढाँचे जो पूरे अध्याय को सँभालते हैं
ढाँचा 1 — केंद्रीय वाक्य(पहले दिन, कोने में, अध्याय भर के लिए)
“जवाब इस बात से तय होते हैं कि कौन देश कितना ताकतवर है।”
ढाँचा 2 — समयरेखा(कालांश 1–3 में क्रमश: भरते जाइए)
1960 का दशक → 1972 (लिमिट्स टू ग्रोथ) → 1987 (बर्टलैंड) → 1992 (रियो + UNFCCC) → 1997 (क्योटो) → 2002 (भारत का अनुमोदन) → 2016 (भारत का पेरिस-अनुमोदन)
ढाँचा 3 — उत्तर बनाम दक्षिण(कालांश 2, फिर बार-बार लौटिए)
| कसौटी | उत्तर | दक्षिण |
|---|---|---|
| मुख्य चिंता | ओज़ोन छेद और तापवृद्धि | आर्थिक विकास और पर्यावरण प्रबंधन |
| जिम्मेदारी पर रुख | “सबकी बराबर हो” | “जिसने ज्यादा बिगाड़ा, वह ज्यादा उठाए” |
| वन का अर्थ | निर्जन प्रांत | “लोग वनों में भी रहते हैं” |
| तेल/संसाधन | खपत करता है | उत्पादन करता है, कीमत चुकाता है |
★★यह सारणी हर खंड में एक पंक्ति और लेती जाती है — अंत तक यह पूरा अध्याय बन जाती है।
ढाँचा 4 — दो ‘संपदाएँ’(कालांश 2 के अंत में)
| साझी संपदा | वैश्विक संपदा |
|---|---|
| समुदाय की — चूल्हा, चारागाह, मैदान, कुआँ, नदी | किसी देश के संप्रभु क्षेत्राधिकार से बाहर |
| प्रबंधन — समुदाय (देवस्थान) | प्रबंधन — अंतर्राष्ट्रीय समुदाय |
| — | ★चार: वायुमंडल · अंटार्कटिका · समुद्री सतह · बाहरी अंतरिक्ष |
5 · कठिन बिंदु और उन्हें कैसे सँभालें
5.1 “पर्यावरण भूगोल का विषय है या राजनीति का?”★★
पाठ्यपुस्तक स्वयं यह सवाल उठाती है — “आपको लग सकता है कि ये तो नैसर्गिक घटनाएँ हैं और इनका अध्ययन राजनीति विज्ञान की जगह भूगोल वाली कक्षा में किया जाना चाहिए। लेकिन ज़रा फिर से सोचिए।”
कक्षा को यह तीन-चरणीय तर्क दीजिए —
- समस्या भौतिक है (ओज़ोन, जल, वन) → भूगोल
- समाधान के लिए सरकारों को कदम उठाने पड़ते हैं → राजनीति
- ★★और कौन कितना उठाएगा, यह तय होता है ताकत से → गहरी राजनीति
5.2 ‘साझी संपदा’ और ‘वैश्विक संपदा’ का भेद — यहीं सबसे ज्यादा गलती होती है★★
दो अलग सवाल पूछिए —
- “चारागाह किसका है?” → गाँव का = साझी संपदा
- “अंटार्कटिका किसका है?” → किसी का नहीं = वैश्विक संपदा
यही भेद प्रश्न 3 और प्रश्न 5 — दोनों का आधार है।
5.3 तीन तिथियाँ जो हर साल गड़बड़ाती हैं★★
| तिथि | क्या |
|---|---|
| 1992 | पृथ्वी सम्मेलन + UNFCCC + ‘साझी परंतु अलग-अलग जिम्मेदारियाँ’ का स्वीकार |
| 1997 | क्योटो प्रोटोकॉल |
| 2002 | भारत का हस्ताक्षर और अनुमोदन |
बोर्ड पर तीनों को एक तीर-श्रृंखला में लिखिए और कालांश 3 तथा 4 — दोनों में दोहराइए। और एक चौथी: 2 अक्तूबर 2016 — भारत का पेरिस-अनुमोदन। (तारीख भी याद रखाइए — गांधी जयंती।)
5.4 अंटार्कटिका के चार प्रतिशत★
विद्यार्थी 26%, 90% और 70% को आपस में मिला देते हैं। इसे इस क्रम में लिखवाइए —
26% = विश्व का निर्जन क्षेत्र | 90% = स्थलीय हिम | 70% = धरती का स्वच्छ जल याद रखने का सूत्र: “निर्जन कम, बर्फ सबसे ज्यादा, पानी बीच में।”
5.5 तेल के दो प्रतिशत — 30% और 64%ध्यान
यह सबसे आम भूल है।
30% = खाड़ी का विश्व तेल-उत्पादन में हिस्सा 64% = खाड़ी में विश्व के ज्ञात तेल-भंडार का हिस्सा समझाइए: “आज कम निकालते हैं, पर ज़मीन के नीचे सबसे ज्यादा उन्हीं के पास है — इसीलिए पाठ्यपुस्तक कहती है कि यह ‘एकलौता क्षेत्र है जो माँग बढ़ने पर पूर्ति कर सकता है।’”
5.6 भारत का 0.9 बनाम 3.8 — यह आँकड़ा तर्क का दिल है★★
तीन संख्याएँ एक ही पंक्ति में लिखवाइए —
विश्व औसत (2000): 3.8 टन | भारत (2000): 0.9 टन | भारत (2030 अनुमान): 1.6 टन ★और निष्कर्ष: “2030 में भी भारत विश्व के सन् 2000 के औसत के आधे से भी कम पर होगा।” यही ‘ऐतिहासिक उत्तरदायित्व’ के तर्क को नैतिक बल देता है।
5.7 ‘क्या वन निर्जन होते हैं?’ — यह बॉक्स छोड़िए मत★
यह पूरे अध्याय का सबसे गहरा विचार है और अक्सर जल्दबाज़ी में छूट जाता है। इसे एक वाक्य में सिखाइए —
उत्तर देखिए
उत्तर के लिए वन का अर्थ है ‘वहाँ कोई नहीं रहता’; दक्षिण के लिए वन का अर्थ है ‘वहाँ लोग रहते हैं’। इसी एक अंतर से दोनों की पूरी पर्यावरण-नीति अलग हो जाती है।
6 · संवेदनशील विषय — कैसे सँभालेंध्यान
| विषय | पाठ्यपुस्तक का रुख | शिक्षक के लिए सुझाव |
|---|---|---|
| ! भारत का जलवायु-पक्ष | पाठ भारत का तर्क और उसकी आलोचना दोनों देता है — साइड-टिप्पणी (पृ. 89): “पहले उन लोगों ने धरती को बर्बाद किया और अब धरती को चौपट करने की हमारी बारी है। क्या यही है हमारा पक्ष?” | ★★दोनों बोर्ड पर लिखिए। भारत का तर्क आँकड़ों से मज़बूत है (0.9 बनाम 3.8), पर आलोचना नैतिक रूप से वाजिब है। किसी एक पक्ष को थोपिए मत — उत्तर-पत्र में भी संतुलन को ही ऊँचे अंक मिलते हैं। |
| ! ‘आरक्षण की तरह’ वाली टिप्पणी (पृ. 87) | पाठ इसे सवाल के रूप में छोड़ता है, उत्तर नहीं देता | ★इसे तुलना के रूप में उठाइए, राजनीतिक बहस के रूप में नहीं। मूल बिंदु — “समानता का अर्थ हमेशा ‘एक-सा व्यवहार’ नहीं होता।” यह अवधारणा समझाकर तुरंत विषय पर लौट आइए। |
| ! बाँध और विस्थापन | पाठ नर्मदा आंदोलन का नाम लेता है और आदिवासी विस्थापन को “विकास की बहुत बड़ी कीमत” कहता है | तथ्य और पाठ्यपुस्तक की भाषा पर रहिए। समकालीन विवादों में मत उतरिए। मुख्य बात यह है कि आंदोलन ‘अहिंसा पर आधारित हैं’ — पाठ्यपुस्तक स्वयं यह रेखांकित करती है। |
| ! मूलवासी और आदिवासी | पाठ UN की परिभाषा देता है और भारत के लिए ‘अनुसूचित जनजाति’ शब्द बताता है | ★शब्दावली में सावधानी रखिए — भारत का आधिकारिक शब्द ‘अनुसूचित जनजाति’ है। समुदायों के बारे में सामान्यीकरण से बचिए। पाठ्यपुस्तक स्वयं बहुत संयत भाषा प्रयोग करती है — उसी का अनुसरण कीजिए। |
| ! ‘नव-उपनिवेशवाद’ का कार्टून (पृ. 93) | तीखा राजनीतिक व्यंग्य | कार्टून को उसके तर्क के लिए पढ़िए — “संसाधनों के लिए युद्ध” — किसी वर्तमान देश-विशेष पर चर्चा में मत जाइए। |
★★एक सामान्य नियम: जब कक्षा में कोई विद्यार्थी तीखी राजनीतिक राय दे, तो पूछिए — “पाठ्यपुस्तक इस पर क्या कहती है?” यह प्रश्न कक्षा को हमेशा वापस पाठ पर ले आता है।
7 · पाठ में मौजूद विसंगतियाँ और ध्यान देने योग्य बातें
| # | कहाँ | क्या |
|---|---|---|
| 1 | पृ. 82 | ! “अध्याय सात” — अनाथ-संदर्भ (ऊपर देखिए) |
| 2 | पृ. 82 | ! “पृष्ठ 24 पर दिए मानचित्र” — अनाथ पृष्ठ-संदर्भ (ऊपर देखिए) |
| 3 | पृ. 82 | UN मानव विकास रिपोर्ट का आँकड़ा 2016 का है — यह संशोधित संस्करण में अद्यतन किया गया है, इसे ‘पुराना’ मत कहिए |
| 4 | पृ. 87 और पृ. 88 | ‘साझी संपदा’ शब्द दो अलग अर्थों में आता है — पृ. 84 पर वैश्विक संपदा के संदर्भ में और पृ. 87 पर समुदाय की संपदा के संदर्भ में। ! यह विद्यार्थियों को भ्रमित करता है — कक्षा में स्पष्ट भेद कीजिए। |
| 5 | पृ. 90 | बायोडीजल मिशन “2011-12 तक” — यह लेखन-काल का लक्ष्य था। इसे भविष्य-वाक्य के रूप में मत पढ़ाइए; बताइए कि यह उस समय की योजना थी। |
| 6 | पृ. 94 | बॉक्स में “९५ फीसदी” देवनागरी अंकों में मुद्रित है — 95 प्रतिशत पढ़िए |
| 7 | प्रश्न 2 | ★चारों उपभाग सही हैं। विद्यार्थी मानकर चलते हैं कि कोई एक गलत होगा — यह पहले ही बता दीजिए |
| 8 | प्रश्न 3 | ★केवल (घ) गलत है। पाठ यह कहीं नहीं कहता कि उत्तरी देश ‘ज्यादा चिंतित’ हैं — वह कहता है उनकी चिंताएँ अलग हैं |
8 · मूल्यांकन-सुझाव
8.1 कक्षा में मौखिक जाँच(हर कालांश के अंत में 2 मिनट)
| कालांश | पूछिए |
|---|---|
| 1 | “पर्यावरण राजनीतिक क्यों है — दो कारण?” |
| 2 | “पृथ्वी सम्मेलन के चार परिणाम? और वैश्विक संपदा के चार क्षेत्र?” |
| 3 | “अंटार्कटिका के तीन प्रतिशत? और ‘साझी परंतु अलग-अलग’ का अर्थ?” |
| 4 | “देवस्थान के तीन नाम? और भारत के तीन आँकड़े (3.8, 0.9, 1.6)?” |
| 5 | “तीन तरह के आंदोलन? और उत्तर-दक्षिण की वन-दृष्टि में अंतर?” |
| 6 | “तेल के दो प्रतिशत? और मूलवासियों की UN परिभाषा?” |
8.2 लिखित मूल्यांकन का ढाँचा
| प्रकार | अंक | अनुशंसित प्रश्न |
|---|---|---|
| वस्तुनिष्ठ | 1×6 | संधियों के वर्ष · वैश्विक संपदा के चार · 170 देश · 8 प्रतिशत · 30%/64% · देवस्थान के नाम |
| लघु | 2×4 | साझी बनाम वैश्विक संपदा · टिकाऊ विकास · जलयुद्ध · ऐतिहासिक उत्तरदायित्व |
| दीर्घ | 4×3 | NCERT प्रश्न 4, 5, 7 |
| निबंधात्मक | 6×2 | NCERT प्रश्न 6, 8 या 9 |
| स्रोत-आधारित | 5×1 | 05-Question-Bank का खंड छ |
8.3 परियोजना-कार्य के चार सुझाव★
- ★★‘आओ मिलजुल कर करें’ को परियोजना बनाइए (पृ. 97) — दस वस्तुओं की संसाधन-गणना, कक्षा का जोड़, फिर विकसित/विकासशील/अविकसित देशों से तुलना। ★इससे ‘साझी परंतु अलग-अलग जिम्मेदारियाँ’ का तर्क विद्यार्थी स्वयं खोज लेते हैं।
- ★अपने राज्य का ‘देवस्थान’ खोजिए। विद्यार्थी अपने ज़िले/राज्य में किसी पवित्र उपवन, तालाब या वृक्ष के बारे में जानकारी जुटाएँ — कौन उसका रख-रखाव करता है, कौन-से नियम हैं।
- एक सप्ताह के अख़बार से पर्यावरण-समाचार काटकर दो स्तंभों में लगाइए — “किसने नुकसान किया” और “किसने कीमत चुकायी”। ★यह अध्याय का केंद्रीय वाक्य स्वयं सिद्ध कर देता है।
- कार्टून-विश्लेषण। अध्याय के पाँच कार्टूनों (हाथ उठाएँ · पर्यावरणविद और पौधा · नव-उपनिवेशवाद · H₂O की बोतल · एक चम्मच पर्यावरण) में से किसी एक पर 150 शब्द की टिप्पणी।
9 · ‘आओ मिलजुल कर करें’ — संसाधन-गणना(पृ. 97)
यह गतिविधि पाठ्यपुस्तक में मुद्रित है और इसका शैक्षिक मूल्य बहुत ऊँचा है — इसे वैकल्पिक मत समझिए।
| चरण | विवरण |
|---|---|
| 1 | हर विद्यार्थी रोज़मर्रा की दस वस्तुओं की सूची बनाए (कलम, कागज, इरेजर, कंप्यूटर, पानी…) |
| 2 | हर वस्तु में लगे प्राकृतिक संसाधनों की मात्रा का अनुमान। पानी के लिए — प्रति गैलन पंपिंग और परिशोधन में लगी बिजली। |
| 3 | पूरी कक्षा का जोड़ → पूरे विद्यालय का → देश के सभी विद्यालयों का अनुमान |
| 4 | ★तुलना — विकसित / विकासशील / अविकसित देशों के विद्यार्थियों की खपत से |
| 5 | भविष्य के उपभोग का अनुमान लगवाइए |
★★समापन में यह वाक्य कहिए: “आपने अभी-अभी अपने हाथ से ‘साझी परंतु अलग-अलग जिम्मेदारियाँ’ का सिद्धांत सिद्ध कर दिया है। जब खपत अलग-अलग है, तो जिम्मेदारी एक जैसी कैसे हो सकती है?” यह गतिविधि इसी उद्देश्य से बनाई गई है — और यही उसका सबसे अच्छा उपयोग है।
10 · समय की तंगी हो तो — क्या छोड़ें, क्या नहीं
| ✓ कभी मत छोड़िए | ! संक्षेप में कर सकते हैं |
|---|---|
| “जवाब इस बात से तय होते हैं कि कौन देश कितना ताकतवर है” | अराल सागर के चित्र-शीर्षक का पूरा विवरण |
| पृथ्वी सम्मेलन — 1992, रियो, 170 देश, चार परिणाम | ‘पानी में तूफान’ पोस्टर की राज्यवार सूची |
| वैश्विक संपदा के चार क्षेत्र | अंटार्कटिका के पारिस्थितिकी विवरण (पर क्रिल मछली रखिए) |
| ‘साझी परंतु अलग-अलग जिम्मेदारियाँ’ + रियो-घोषणापत्र का उद्धरण | UNEP और CLRTAP जैसे संगठनों का विस्तार |
| UNFCCC (1992) → क्योटो (1997) की कड़ी | बायोडीजल मिशन के आँकड़े |
| साझी संपदा की परिभाषा और चार कारण | देवस्थान के सभी छह नाम (तीन पर्याप्त हैं) |
| ★★देवस्थान का कुंजी-वाक्य (“संसाधनों की विरलता नहीं, प्रकृति के प्रति गहरी श्रद्धा”) | — |
| भारत का पक्ष — तीन आँकड़े और तीन कदम | सातों कदमों का विस्तार |
| ★★‘क्या वन निर्जन होते हैं?’ बॉक्स | विजनपन-अभियानों की पूरी सूची |
| तेल के दो प्रतिशत (30% और 64%) और ‘जलयुद्ध’ | ‘तेल देखो’ बॉक्स के चारों पात्रों का पूरा पाठ (पर एक ज़रूर पढ़िए) |
| ★★मूलवासी — UN परिभाषा, 8 प्रतिशत, और “विकास की बहुत बड़ी कीमत” | मूलवासियों के सभी सात आँकड़े |
11 · एक पंक्ति में — यदि केवल पाँच मिनट हों
पर्यावरण भूगोल का नहीं, राजनीति का विषय है — क्योंकि यह तय होता है कि कौन देश कितना ताकतवर है। 1992 के पृथ्वी सम्मेलन ने इसे विश्व-राजनीति के केंद्र में ला दिया, पर उत्तर और दक्षिण की खाई खुलकर सामने आ गई। वायुमंडल, अंटार्कटिका, समुद्री सतह और बाहरी अंतरिक्ष किसी के नहीं हैं — इसलिए सबकी जिम्मेदारी हैं; और चूँकि सबका योगदान अलग-अलग रहा है, इसलिए जिम्मेदारी भी अलग-अलग होगी। भारत यही कहता है — प्रति व्यक्ति उत्सर्जन 0.9 टन बनाम विश्व औसत 3.8 टन — और साथ में ठोस कदम भी उठाता है। वन, खनिज और बाँध के आंदोलन बताते हैं कि पहल सरकारों से नहीं, कार्यकर्ताओं से आयी। और अंत में — तेल तथा पानी की भू-राजनीति के बीच वे लोग खड़े हैं जिन्होंने “विकास की बहुत बड़ी कीमत चुकायी है।”