अध्याय 8किसान, ज़मींदार और राज्य

शिक्षण नोट्स73 मिनट

पुस्तक: भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग-2 | पृष्ठ: 196–223 | कालावधि: लगभग सोलहवीं–सत्रहवीं शताब्दी

भाग 0 — अध्याय को समझने की कुंजी

0.1 शीर्षक को तीन हिस्सों में पढ़िए

“किसान, ज़मींदार और राज्य : कृषि समाज और मुग़ल साम्राज्य”

हिस्सासंकेत
“किसान”अध्याय का नायक सामान्य खेतिहर है — राजा नहीं
“ज़मींदार”बीच की कड़ी — न पूरा किसान, न पूरा राज्य; पिरामिड का “संकरा शीर्ष”
“राज्य”मुग़ल राज्य — जिसकी आमदनी का बहुत बड़ा हिस्सा कृषि से आता था
“कृषि समाज”विषय केवल खेती (अर्थ) नहीं — समाज भी: जाति, पंचायत, महिलाएँ, जंगल

★★शिक्षण-सूत्र: यह अध्याय तीन कोनों वाले रिश्ते की कहानी है — किसान ↔ ज़मींदार ↔ राज्य — जिनके बीच NCERT के ही शब्दों में “सहयोग, प्रतियोगिता और संघर्ष” तीनों चलते थे। हर खंड में पूछिए — इस रिश्ते का कौन-सा कोना बोल रहा है, और किसकी आवाज़ दर्ज़ हुई है?

0.2 अध्याय का केंद्रीय तर्क — प्रस्तावना में ही (पृ. 196)★★

(क) समाज गाँवों का था

“सोलहवीं-सत्रहवीं सदी के दौरान हिंदुस्तान में करीब-करीब 85 फ़ीसदी लोग गाँवों में रहते थे।”

(ख) दोनों पक्ष एक ही फ़सल के दावेदार थे

“छोटे खेतिहर और भूमिहर संभ्रांत दोनों ही कृषि उत्पादन से जुड़े थे और दोनों ही फ़सल के हिस्सों के दावेदार थे। इससे उनके बीच सहयोग, प्रतियोगिता और संघर्ष के रिश्ते बने।”

(ग) राज्य बाहरी ताक़त के रूप में दाख़िल हुआ

“इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण मुग़ल राज्य था जो अपनी आमदनी का बहुत बड़ा हिस्सा कृषि उत्पादन से उगाही करता था। राज्य के नुमाइंदे — राजस्व निर्धारित करने वाले, राजस्व वसूली करने वाले, हिसाब रखने वाले — ग्रामीण समाज पर काबू रखने की कोशिश करते थे।”

(घ) और बाज़ार भी गाँव में घुस आया

“चूँकि कई फ़सलें बिक्री के लिए उगाई जाती थीं, इसलिए व्यापार, मुद्रा और बाज़ार भी गाँवों में घुस आए और इससे खेती वाले इलाके शहर से जुड़ गए।”

★★चारों को मिलाकर अध्याय का सूत्र: “मुग़लकालीन गाँव बंद, आत्मनिर्भर टापू नहीं था — उसमें राज्य भी घुसा था, बाज़ार भी और शहर भी।” (यही §2.4 ‘छोटा गणराज्य?’ के प्रश्न का बीज है।)

0.3 अध्याय की संरचना

खंडविषयप्रकृति
§1किसान और कृषि उत्पादन (1.1–1.4)अर्थ — स्रोत, ज़मीन, सिंचाई-तकनीक, फ़सलें
§2ग्रामीण समुदाय (2.1–2.4)समाज — जाति, पंचायत, दस्तकार, “छोटा गणराज्य?”
§3कृषि समाज में महिलाएँजेंडर
§4जंगल और कबीले (4.1–4.2)बसे गाँवों के परे
§5ज़मींदारबीच की कड़ी
§6भू-राजस्व प्रणालीराज्य
§7चाँदी का बहावविश्व-अर्थव्यवस्था से जोड़
§8अबुल फ़ज़्ल की आइन-ए-अकबरीस्रोत की समीक्षा (अध्याय जहाँ से शुरू हुआ, वहीं लौटता है)

★ध्यान दीजिए: अध्याय स्रोत (आइन) से शुरू होता है (§1.1) और स्रोत की आलोचना (§8) पर समाप्त — बीच में समाज की परतें। यह वृत्ताकार बनावट परीक्षा-उत्तरों में दिखाना प्रभावशाली रहता है।

भाग 1 — खंड-दर-खंड विस्तृत नोट्स

§1. किसान और कृषि उत्पादन (पृ. 196–201)

  • खेतिहर समाज की बुनियादी इकाई गाँव थी, जिसमें किसान रहते थे।
  • किसान के साल भर के काम: ज़मीन की जुताई, बीज बोना, फ़सल पकने पर कटाई; साथ ही कृषि-आधारित वस्तुओं (शक्कर, तेल इत्यादि) के उत्पादन में शिरकत।
  • ★पर केवल मैदानी खेती ही ग्रामीण भारत नहीं: सूखी ज़मीनें, पहाड़ी इलाके, और जंगलों से घिरा बहुत बड़ा भूखंड — इन भौगोलिक विविधताओं का ख़्याल रखना चाहिए।

§1.1 स्रोतों की तलाश (पृ. 197)

1.1.1 बुनियादी समस्या

  • ★★“चूँकि किसान अपने बारे में खुद नहीं लिखा करते थे” — ग्रामीण समाज के क्रियाकलापों की जानकारी हमें उन लोगों से नहीं मिलती जो खेतों में काम करते थे।
  • नतीजतन मुख्य स्रोत — वे ऐतिहासिक ग्रंथ व दस्तावेज़ जो मुग़ल दरबार की निगरानी में लिखे गए।

1.1.2 सबसे महत्त्वपूर्ण स्रोत — आइन-ए-अकबरी

  • लेखक — अकबर के दरबारी इतिहासकार अबुल फ़ज़्ल; संक्षेप में आइन।
  • इसमें दर्ज़ था — खेतों की नियमित जुताई की तसल्ली, करों की उगाही, राज्य व ग्रामीण सत्ताधीशों (ज़मींदारों) के रिश्तों के नियमन के राज्य-इंतज़ाम का लेखा-जोखा।
  • ★★आइन का मुख्य उद्देश्य: अकबर के साम्राज्य का एक ऐसा खाका पेश करना जहाँ एक मज़बूत सत्ताधारी वर्ग सामाजिक मेल-जोल बनाकर रखता था। आइन के लेखक के मुताबिक मुग़ल राज्य के ख़िलाफ़ कोई बगावत या स्वायत्त सत्ता की दावेदारी का असफल होना पहले ही तय था।
  • ★★★“दूसरे शब्दों में, किसानों के बारे में जो कुछ हमें आइन से पता चलता है वह सत्ता के ऊँचे गलियारों का नज़रिया है।”

1.1.3 पूरक स्रोत

स्रोतविवरण
प्रांतीय दस्तावेज़सत्रहवीं-अठारहवीं सदियों के गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान से मिलने वाले दस्तावेज़ — सरकार की आमदनी की विस्तृत जानकारी
ईस्ट इंडिया कंपनी के दस्तावेज़पूर्वी भारत के कृषि-संबंधों का उपयोगी खाका
  • ये सभी स्रोत किसानों, ज़मींदारों और राज्य के बीच तने झगड़ों को दर्ज़ करते हैं; और यह समझने में मदद करते हैं कि किसान राज्य को किस नज़रिये से देखते थे और राज्य से उन्हें कैसे न्याय की उम्मीद थी।

★पद्धति-सूत्र: केंद्र का स्रोत (आइन) + दूर के इलाक़ों के स्रोत (गुजरात-महाराष्ट्र-राजस्थान + कंपनी दस्तावेज़) → एक-दूसरे की काट-जाँच। राजस्थान का नाम RBSE विद्यार्थियों को ज़रूर बताइए — हमारे प्रदेश के दस्तावेज़ इस इतिहास के स्रोत हैं।

§1.2 किसान और उनकी ज़मीन (पृ. 197–198)

1.2.1 किसान के लिए शब्द

  • मुग़ल काल के भारतीय-फ़ारसी स्रोत — रैयत (बहुवचन रिआया) या मुज़रियान; साथ ही किसान या आसामी।

1.2.2 खुद-काश्त और पाहि-काश्त★★

सत्रहवीं सदी के स्रोत दो किस्म के किसानों की चर्चा करते हैं:

किस्मकौन
खुद-काश्तवे किसान जो उन्हीं गाँवों में रहते थे जिनमें उनकी ज़मीन थी
पाहि-काश्तवे खेतिहर जो दूसरे गाँवों से ठेके पर खेती करने आते थे

पाहि-काश्त बनने के दो कारण:

  1. अपनी मर्ज़ी से — जैसे करों की शर्तें किसी दूसरे गाँव में बेहतर मिलें
  2. मजबूरन — जैसे अकाल या भुखमरी के बाद आर्थिक परेशानी से

1.2.3 किसान के पास कितना था?

क्षेत्रतथ्य
उत्तर भारतऔसत किसान के पास शायद ही कभी एक जोड़ी बैल और दो हल से ज़्यादा; ज़्यादातर के पास इससे भी कम
गुजरात6 एकड़ के करीब ज़मीन वाले समृद्ध माने जाते थे
बंगालऔसत किसान की ज़मीन की ऊपरी सीमा 5 एकड़; 10 एकड़ वाला अमीर आसामी

1.2.4 मिल्कियत

  • ★खेती व्यक्तिगत मिल्कियत के सिद्धांत पर आधारित थी। किसानों की ज़मीन उसी तरह खरीदी और बेची जाती थी जैसे दूसरे संपत्ति मालिकों की।
  • उन्नीसवीं सदी के दिल्ली-आगरा इलाके का विवरण (सत्रहवीं सदी पर भी लागू):

“हल जोतने वाले खेतिहर किसान हर ज़मीन की हदों पर मिट्टी, ईंट और काँटों से पहचान के लिए निशान लगाते हैं, और ज़मीन के ऐसे हज़ारों टुकड़े किसी भी गाँव में देखे जा सकते हैं।”

स्रोत 1 (पृ. 198): “किसान बस्तियों का बसना-उजड़ना” — बाबरनामा

पृष्ठभूमि: हिंदुस्तानी कृषि समाज की इस ख़ासियत ने मुग़ल शासक बाबर की तेज़ निगाहों को चौंकाया; उसने इसे अपने संस्मरण बाबरनामा में नोट किया:

“हिंदुस्तान में बस्तियाँ और गाँव, दरअसल शहर के शहर, एक लमहे में ही वीरान भी हो जाते हैं और बस भी जाते हैं। वर्षों से आबाद किसी बड़े शहर के बाशिंदे उसे छोड़कर चले जाते हैं… डेढ़ दिनों के अंदर उनका हर नामोनिशान मिट जाता है। दूसरी ओर, अगर वे किसी जगह पर बसना चाहते हैं तो उन्हें पानी के रास्ते खोदने की ज़रूरत नहीं होती क्योंकि उनकी सारी फ़सलें बारिश के पानी में उगती हैं, और चूँकि हिंदुस्तान की आबादी बेशुमार है, लोग उमड़ते चले आते हैं। वे एक सरोवर या कुआँ बना लेते हैं; घर बनाने या दीवार खड़ी करने की भी ज़रूरत नहीं होती… ख़स की घास बहुतायत में, जंगल अपार हैं, झोंपड़ियाँ बनाई जाती हैं, और यकायक एक गाँव या शहर खड़ा हो जाता है!”

★★स्रोत-विश्लेषण: इस अंश से किसान-गतिशीलता (Peasant Mobility) के भौतिक आधार निकलते हैं — (1) वर्षा-आधारित खेती (सिंचाई-ढाँचे में पूँजी नहीं फँसी), (2) सस्ती निर्माण-सामग्री (घास-लकड़ी की झोंपड़ी), (3) अपार जंगल (नयी ज़मीन उपलब्ध), (4) बेशुमार आबादी (श्रम उपलब्ध)। यही गतिशीलता पाहि-काश्त, “गाँव छोड़कर भागने” (§2.2) और जंगल-सफ़ाये (§4) — तीनों की कुंजी है।

🔎 इन-टेक्स्ट प्रश्न (पृ. 198): “कृषि जीवन के उन पहलुओं का विवरण दीजिए जो बाबर को उत्तर भारत के इलाके की ख़ासियत लगे।”

§1.3 सिंचाई और तकनीक (पृ. 198–200)

1.3.1 विस्तार के कारण और प्राथमिकता

  • ★कृषि के लगातार विस्तार के तीन कारण — (1) ज़मीन की बहुतायत, (2) मज़दूरों की मौजूदगी, (3) किसानों की गतिशीलता।
  • खेती का प्राथमिक उद्देश्य लोगों का पेट भरना था → रोज़मर्रा के खाने की फ़सलें — चावल, गेहूँ, ज्वार — सबसे ज़्यादा उगाई जाती थीं।
वर्षाफ़सल
प्रति वर्ष 40 इंच या ज़्यादाचावल (कमोबेश)
कम बारिशगेहूँ
और कमतर बारिशज्वार-बाजरे
  • ★“मानसून भारतीय कृषि की रीढ़ था, जैसा कि आज भी है।”

1.3.2 सिंचाई

  • कुछ फ़सलों के लिए अतिरिक्त पानी → सिंचाई के कृत्रिम उपाय।
  • ★सिंचाई कार्यों को राज्य की मदद: उत्तर भारत में राज्य ने कई नयी नहरें व नाले खुदवाए और कई पुरानी नहरों की मरम्मत करवाई — जैसे शाहजहाँ के शासनकाल में पंजाब में शाह नहर।

1.3.3 तकनीक — पशुबल-आधारित

तकनीकविवरण
हललकड़ी का हलका हल — एक छोर पर लोहे की नुकीली धार या फाल; मिट्टी को बहुत गहरे नहीं खोदते थे, जिससे तेज़ गर्मी के महीनों में नमी बची रहती थी
बरमाबैलों के जोड़े के सहारे खींचा जाने वाला — बीज बोने के लिए; ★पर बीजों को हाथ से छिड़क कर बोने का रिवाज ज़्यादा प्रचलित
गुड़ाई-निराईलकड़ी की मूठ वाले लोहे के पतले धार वाले औज़ार

स्रोत 2 (पृ. 199): “पेड़ों और खेतों की सिंचाई” — बाबरनामा

बाबर द्वारा उत्तर भारत में देखे गए सिंचाई-उपकरण:

“हिंदुस्तान के मुल्क का ज़्यादातर हिस्सा मैदानी ज़मीन पर बसा हुआ है… कहीं भी बहते पानी (का इंतज़ाम) नहीं… शरद ऋतु की फ़सलें बारिश के पानी से ही पैदा हो जाती हैं; और ये हैरानगी की बात है कि बसंत ऋतु की फ़सलें तब भी पैदा हो जाती हैं जब बारिश बिलकुल ही नहीं होती।”

(क) रहट (लाहौर, दीपालपुर — दोनों आज के पाकिस्तान में):

“वे रस्सी के दो गोलाकार फंदे बनाते हैं जो कुएँ की गहराई के मुताबिक लंबे होते हैं। इन फंदों में थोड़ी-थोड़ी दूरी पर लकड़ी के गुटके लगाते हैं और इन गुटकों पर घड़े बाँध देते हैं… इन रस्सियों को कुएँ के ऊपर पहियों से लटकाया जाता है। पहिये की धुरी पर एक और पहिया; इस अंतिम पहिये को बैल के ज़रिये घुमाया जाता है; इस पहिये के दाँत दूसरे पहिये के दाँतों को जकड़ लेते हैं…”

(ख) बालटी-विधि (आगरा, चाँदवार और बयाना — आज के उत्तर प्रदेश में):

“कुएँ के किनारे पर वे लकड़ी के कन्ने गाड़ देते हैं, इन कन्नों के बीच बेलन टिकाते हैं, एक बड़ी बालटी में रस्सी बाँधते हैं… एक शख़्स को बैल हाँकना पड़ता है, दूसरा बालटी से पानी निकालता है।”

🔎 इन-टेक्स्ट प्रश्न (पृ. 199): “सिंचाई के जिन साधनों का ज़िक्र बाबर ने किया है उनकी तुलना विजयनगर की सिंचाई (अध्याय 7) व्यवस्था से कीजिए। इन दोनों अलग-अलग प्रणालियों में किस-किस तरह के संसाधनों की ज़रूरत पड़ती होगी? इनमें से किन-किन प्रणालियों में कृषि तकनीक में सुधार के लिए किसानों की भागेदारी ज़रूरी होती होगी?” शिक्षक-संकेत: विजयनगर — राज्य-स्तरीय विशाल हौज़-बाँध-नहरें (15-20 हज़ार श्रमिक); उत्तर भारत — घरेलू-स्तरीय रहट-बालटी (एक परिवार, एक-दो बैल)। पहली में राजकीय पूँजी-श्रम; दूसरी में किसान की अपनी भागीदारी केंद्रीय।

बॉक्स (पृ. 200): “तम्बाकू का प्रसार”★

चरणतथ्य
आगमनयह पौधा सबसे पहले दक्कन पहुँचा; वहाँ से सत्रहवीं सदी के शुरुआती वर्षों में उत्तर भारत लाया गया
आइन मेंआइन उत्तर भारत की फ़सलों की सूची में तम्बाकू का ज़िक्र नहीं करती
1604अकबर और उसके अभिजातों ने 1604 ई. में पहली बार तम्बाकू देखा
लतइसी समय हुक्के या चिलम में धूम्रपान की लत ने ज़ोर पकड़ा
पाबंदीजहाँगीर इस बुरी आदत के फैलने से इतना चिंतित हुआ कि उसने पाबंदी लगा दी — जो पूरी तरह बेअसर साबित हुई
सत्रहवीं सदी का अंततम्बाकू पूरे भारत में खेती, व्यापार और उपयोग की मुख्य वस्तुओं में से एक था

§1.4 फ़सलों की भरमार (पृ. 200–201)

1.4.1 दो मौसम, अनेक फ़सलें

  • खेती मौसम के दो मुख्य चक्रों में — खरीफ़ (पतझड़ में) और रबी (वसंत में)।
  • सूखे इलाकों और बंजर ज़मीन को छोड़ दें तो ज़्यादातर जगहों पर साल में कम से कम दो फ़सलें; जहाँ बारिश या सिंचाई के साधन हर वक्त मौजूद थे, वहाँ तीन फ़सलें भी।

★आइन के आँकड़े (अक्षरश: याद रखें):

प्रांतकिस्में
आगरा39 किस्म की फ़सलें (दोनों मौसम मिलाकर)
दिल्ली43 फ़सलों की पैदावार
बंगालसिर्फ़ चावल की 50 किस्में

1.4.2 जिन्स-ए-कामिल — सर्वोत्तम फ़सलें★★

  • दैनिक आहार की खेती पर ज़ोर था, मगर खेती सिर्फ़ गुज़ारे के लिए नहीं थी।
  • स्रोतों में जिन्स-ए-कामिल (सर्वोत्तम फ़सलें) जैसे लफ़्ज़ मिलते हैं।
  • ★मुग़ल राज्य किसानों को ऐसी फ़सलों की खेती के लिए बढ़ावा देता था क्योंकि इनसे राज्य को ज़्यादा कर मिलता था।
  • कपास और गन्ने जैसी फ़सलें बेहतरीन जिन्स-ए-कामिल थीं:
    • कपास — मध्य भारत और दक्कनी पठार में फैले बड़े-बड़े टुकड़ों पर
    • बंगाल — अपनी चीनी के लिए मशहूर
  • तिलहन (जैसे सरसों) और दलहन भी नकदी फ़सलों में आती थीं।
  • ★निष्कर्ष: “एक औसत किसान की ज़मीन पर पेट भरने के लिए होने वाले उत्पादन और व्यापार के लिए किए जाने वाले उत्पादन एक दूसरे से जुड़े हुए थे।”

बॉक्स (पृ. 200): “कृषि की समृद्धि और आबादी की बढ़ोतरी”★

  • कृषि उत्पादन के विविध और लचीले तरीक़ों का बड़ा नतीजा — आबादी धीरे-धीरे बढ़ने लगी।
  • आर्थिक इतिहासकारों की गणना: समय-समय पर होने वाली भूखमरी और महामारी के बावजूद, 1600 से 1700 के बीच भारत की आबादी लगभग 5 करोड़ बढ़ी — 200 वर्षों में करीब-करीब 33 फ़ीसदी बढ़ोतरी।

1.4.3 नयी दुनिया से नयी फ़सलें★

  • सत्रहवीं सदी में दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से कई नयी फ़सलें उपमहाद्वीप पहुँचीं:
फ़सलमार्ग/स्रोत
मक्का (भारतीय मकई)भारत में अफ्रीका और स्पेन के रास्ते आया; सत्रहवीं सदी तक पश्चिम भारत की मुख्य फ़सलों में
टमाटर, आलू, मिर्चनयी दुनिया से लाई गई सब्ज़ियाँ
अनानास, पपीतानयी दुनिया से आए फल

🗣 चर्चा कीजिए… (पृ. 201)ध्यान

“इस अनुभाग में खेती संबंधी जिन क्रियाकलापों और तकनीकों की चर्चा हुई है उनमें से कौन-कौन सी अध्याय 2 में वर्णित तकनीकों और क्रियाकलापों से मिलती-जुलती हैं और कौन कौन सी भिन्न हैं?” शिक्षक-संकेत: मिलती-जुलती — हल-बैल, लोहे का फाल, सिंचाई-कुएँ, दो फ़सलें; भिन्न — रहट का व्यापक प्रयोग, नयी दुनिया की फ़सलें, नकदी फ़सलों को राज्य-प्रोत्साहन, ज़मीन की खरीद-बिक्री का विकसित बाज़ार।

§2. ग्रामीण समुदाय (पृ. 201–206)

2.0 तीन घटक

  • किसान की अपनी ज़मीन पर व्यक्तिगत मिल्कियत थी; साथ ही वे एक सामूहिक ग्रामीण समुदाय का हिस्सा थे।
  • ★समुदाय के तीन घटक — (1) खेतिहर किसान, (2) पंचायत, (3) गाँव का मुखिया (मुक़द्दम या मंडल)।

§2.1 जाति और ग्रामीण माहौल (पृ. 201–202)

  • ★★जाति और अन्य जाति जैसे भेदभावों की वजह से खेतिहर किसान कई तरह के समूहों में बँटे थे।
  • खेतों की जुताई करने वालों में एक बड़ी तादाद ऐसे लोगों की थी जो नीच समझे जाने वाले कामों में लगे थे, या खेतों में मज़दूरी करते थे।
  • ★“हालाँकि खेती लायक ज़मीन की कमी नहीं थी, फिर भी कुछ जाति के लोगों को सिर्फ़ नीच समझे जाने वाले काम ही दिए जाते थे। इस तरह वे ग़रीब रहने के लिए मजबूर थे।”
  • जनगणना उस वक्त नहीं होती थी, पर उपलब्ध आँकड़ों से — गाँव की आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा ऐसे ही समूहों का था; संसाधन सबसे कम; जाति व्यवस्था की पाबंदियों से बँधे; हालत आधुनिक भारत के दलितों जैसी।

अन्य संप्रदायों में भी भेदभाव:

समूहस्थिति
हलालख़ोरान (मुसलमान समुदायों में)‘नीच’ कामों से जुड़े — गाँव की हदों के बाहर ही रह सकते थे
मल्लाहज़ादे (बिहार; शाब्दिक अर्थ — नाविकों के पुत्र)तुलना दासों से की जा सकती थी

जाति-गरीबी-हैसियत का रिश्ता:

  • ★समाज के निचले तबकों में जाति, गरीबी और सामाजिक हैसियत के बीच सीधा रिश्ता था — “ऐसा बीच के समूहों में नहीं था।”

बीच के समूहों की गतिशीलता (उदाहरण अक्षरश:):

समूहतथ्य
राजपूत-जाटसत्रहवीं सदी में मारवाड़ में लिखी गई एक किताब राजपूतों की चर्चा किसानों के रूप में करती है; जाट भी किसान थे लेकिन जाति व्यवस्था में उनकी जगह राजपूतों के मुक़ाबले नीची थी
गौरव समुदाय (वृंदावन, उत्तर प्रदेश)सत्रहवीं सदी में राजपूत होने का दावा किया — बावजूद इसके कि वे ज़मीन की जुताई में लगे थे
अहीर, गुज्जर, मालीपशुपालन और बागवानी में बढ़ते मुनाफ़े की वजह से सामाजिक सीढ़ी में ऊपर उठीं
सदगोप, कैवर्त (पूर्वी इलाके)पशुपालक व मछुआरी जातियाँ किसानों जैसी सामाजिक स्थिति पाने लगीं

§2.2 पंचायतें और मुखिया (पृ. 202–204)

2.2.1 पंचायत की बनावट

  • गाँव की पंचायत बुज़ुर्गों का जमावड़ा — आमतौर पर गाँव के महत्त्वपूर्ण लोग जिनके पास अपनी संपत्ति के पुश्तैनी अधिकार होते थे।
  • बहु-जातीय गाँवों में पंचायत में भी विविधता — यह एक ऐसा अल्पतंत्र (Oligarchy) था जिसमें गाँव के अलग-अलग संप्रदायों और जातियों की नुमाइंदगी होती थी।
  • ★पर “छोटे-मोटे और ‘नीच’ काम करने वाले खेतिहर मज़दूरों के लिए इसमें कोई जगह होती होगी, इसकी संभावना कम ही है।”
  • पंचायत का फ़ैसला गाँव में सबको मानना पड़ता था।

2.2.2 मुखिया (मुक़द्दम या मंडल)

पहलूविवरण
चुनावकुछ स्रोतों से लगता है — गाँव के बुज़ुर्गों की आम सहमति से; इस चुनाव के बाद ज़मींदार से मंज़ूरी लेनी पड़ती थी
कार्यकालअपने ओहदे पर तभी तक जब तक बुज़ुर्गों को उस पर भरोसा — ऐसा न होने पर बुज़ुर्ग उसे बर्खास्त कर सकते थे
मुख्य कामगाँव के आमदनी और ख़र्चे का हिसाब-किताब अपनी निगरानी में बनवाना — पंचायत का पटवारी उसकी मदद करता था

2.2.3 पंचायत का ख़ज़ाना

  • ख़र्चा गाँव के उस आम ख़ज़ाने से चलता था जिसमें हर व्यक्ति अपना योगदान देता था।
  • उपयोग: (1) कर अधिकारियों की ख़ातिरदारी का ख़र्च, (2) बाढ़ जैसी प्राकृतिक विपदाओं से निपटना, (3) ऐसे सामुदायिक कार्य जो किसान खुद नहीं कर सकते थे — जैसे मिट्टी के छोटे-मोटे बाँध बनाना या नहर खोदना।

2.2.4 पंचायत का सामाजिक काम — जाति की हदें★★

  • एक बड़ा काम — यह तसल्ली करना कि गाँव के अलग-अलग समुदायों के लोग अपनी जाति की हदों के अंदर रहें।
  • पूर्वी भारत में सभी शादियाँ मंडल की मौजूदगी में होती थीं।
  • ★“‘जाति की अवहेलना रोकने के लिए’ लोगों के आचरण पर नज़र रखना गाँव के मुखिया की ज़िम्मेदारियों में से एक था।”
  • दंड के अधिकार: जुर्माना लगाने और समुदाय से निष्कासित करने जैसे ज़्यादा गंभीर दंड — निष्कासन एक कड़ा कदम, सीमित समय के लिए; दंडित व्यक्ति को (दिए गए समय के लिए) गाँव छोड़ना पड़ता था — इस दौरान वह अपनी जाति और पेशे से हाथ धो बैठता था। ऐसी नीतियों का मकसद जातिगत रिवाजों की अवहेलना रोकना था।

2.2.5 जाति पंचायतें

  • ग्राम पंचायत के अलावा गाँव में हर जाति की अपनी पंचायत होती थी — समाज में काफ़ी ताकतवर।
  • ★राजस्थान में जाति पंचायतें — अलग-अलग जातियों के लोगों के बीच दीवानी झगड़ों का निपटारा; ज़मीन से जुड़े दावेदारियों के झगड़े; यह तय करना कि शादियाँ जातिगत मानदंडों के मुताबिक हो रही हैं या नहीं; गाँव के आयोजन में किसको किसके ऊपर तरजीह; कर्मकांडीय वर्चस्व का क्रम।
  • ★★“फ़ौजदारी न्याय को छोड़ दें तो ज़्यादातर मामलों में राज्य जाति पंचायत के फ़ैसलों को मानता था।”

2.2.6 पंचायत से न्याय की उम्मीद — दरख़्वास्तें★★

  • पश्चिम भारत — ख़ासकर राजस्थान और महाराष्ट्र — के संकलित दस्तावेज़ों में ऐसी कई अर्ज़ियाँ हैं जिनमें पंचायत से “ऊँची” जातियों या राज्य के अधिकारियों के ख़िलाफ़ ज़बरन कर उगाही या बेगार वसूली की शिकायत की गई है।
  • ये अर्ज़ियाँ आमतौर पर ग्रामीण समुदाय के सबसे निचले तबके के लोग लगाते थे — अक्सर सामूहिक तौर पर भी।
  • सबसे बड़ी शिकायत — बहुत ज़्यादा कर की माँग, जिससे किसानों का दैनिक गुज़ारा जोखिम में पड़ जाता था, ख़ासकर सूखे या विपदाओं के दौरान।
  • ★★“उनकी नज़रों में ज़िंदा रहने के लिए न्यूनतम बुनियादी साधन उनका परंपरागत रिवाजी हक़ था” — वे समझते थे कि पंचायत को इसकी सुनवाई करनी चाहिए और सुनिश्चित करना चाहिए कि राज्य अपना नैतिक फ़र्ज़ अदा करे और न्याय करे।
  • अत्यधिक कर की माँगों के मामले में पंचायत अक्सर समझौते का सुझाव देती थी।
  • ★★जहाँ समझौते नहीं हो पाते थे, वहाँ किसान विरोध के ज़्यादा उग्र रास्ते अपनाते थे — जैसे गाँव छोड़कर भाग जाना। जोतने लायक खाली ज़मीन अपेक्षाकृत आसानी से उपलब्ध थी जबकि श्रम को लेकर प्रतियोगिता थी — इस वजह से “गाँव छोड़कर भाग जाना खेतिहरों के हाथ में एक बड़ा प्रभावी हथियार था।”

बॉक्स (पृ. 202): “भ्रष्ट मंडल”

मंडल अक्सर अपने ओहदे का ग़लत इस्तेमाल करते थे। मुख्यत: आरोप — (1) वे पटवारी के साथ मिलकर हिसाब-किताब में हेरा-फेरी करते थे, (2) अपनी ज़मीन पर कर का आकलन कम करके अतिरिक्त बोझ छोटे किसानों पर डाल देते थे।

§2.3 ग्रामीण दस्तकार (पृ. 204–205)

  • अंग्रेज़ी शासन के शुरुआती वर्षों के गाँवों के सर्वेक्षण और मराठों के दस्तावेज़ — गाँवों में दस्तकार काफ़ी अच्छी तादाद में; कहीं-कहीं कुल घरों के 25 फ़ीसदी घर दस्तकारों के।
  • ★किसान-दस्तकार का भेद कई बार मुश्किल — कई समूह दोनों किस्म के काम करते थे: खेतिहर परिवार रँगरेज़ी, कपड़े पर छपाई, मिट्टी के बरतनों को पकाने, खेती के औज़ार बनाने-मरम्मत में शिरकत करते थे; खेती से फ़ुरसत के महीनों (बुआई-सुहाई के बीच, सुहाई-कटाई के बीच) में दस्तकारी।

अदायगी की व्यवस्थाएँ (तीन रूप)★★

व्यवस्थाविवरण
1. फ़सल का हिस्सा / ज़मीन का टुकड़ाकुम्हार, लोहार, बढ़ई, नाई, यहाँ तक कि सुनार — सेवाओं के बदले गाँव वाले उन्हें फ़सल का एक हिस्सा या गाँव की ज़मीन का एक टुकड़ा (शायद खेती लायक होने पर भी बेकार पड़ी) दे देते थे; अदायगी की सूरत शायद पंचायत तय करती थी
2. मीरास / वतन (महाराष्ट्र)ऐसी ज़मीनें दस्तकारों की मीरास या वतन बन गईं — जिन पर उनका पुश्तैनी अधिकार होता था
3. जजमानीथोड़े बदले रूप में — दस्तकार और हरेक खेतिहर परिवार परस्पर बातचीत से अदायगी की व्यवस्था तय करते; वस्तुओं और सेवाओं का विनिमय। ★अठारहवीं सदी के स्रोत: बंगाल में ज़मींदार लोहारों, बढ़इयों और सुनारों तक को उनकी सेवाओं के बदले “रोज़ का भत्ता और खाने के लिए नकदी” देते थे — इस व्यवस्था को जजमानी कहते थे। ! हालाँकि यह शब्द सोलहवीं-सत्रहवीं सदी में बहुत इस्तेमाल नहीं होता था
  • ★निष्कर्ष: गाँव के छोटे स्तर पर फेर-बदल के रिश्ते पेचीदा थे; नकद अदायगी का चलन बिलकुल ही नदारद नहीं था।

§2.4 एक “छोटा गणराज्य”? (पृ. 205–206)

  • ★★उन्नीसवीं सदी के कुछ अंग्रेज़ अफ़सरों ने भारतीय गाँवों को एक ऐसे “छोटे गणराज्य” के रूप में देखा जहाँ लोग सामूहिक स्तर पर भाईचारे के साथ संसाधनों और श्रम का बँटवारा करते थे।
  • ★★“लेकिन ऐसा नहीं लगता कि गाँव में सामाजिक बराबरी थी।” प्रमाण:
    1. संपत्ति की व्यक्तिगत मिल्कियत थी
    2. जाति और जेंडर (सामाजिक लिंग) के नाम पर समाज में गहरी विषमताएँ थीं
    3. कुछ ताकतवर लोग गाँव के मसलों पर फ़ैसले लेते थे और कमज़ोर वर्गों का शोषण करते थे; न्याय करने का अधिकार भी उन्हीं को मिला हुआ था
  • ★इससे भी महत्त्वपूर्ण: गाँवों और शहरों के बीच व्यापार की वजह से गाँवों में भी नकद के रिश्ते फैल चुके थे:
    • मुग़लों के केंद्रीय इलाक़ों में कर की गणना और वसूली भी नकद में
    • निर्यात के लिए उत्पादन करने वाले दस्तकारों को मज़दूरी या पूर्व भुगतान नकद में
    • कपास, रेशम या नील जैसी व्यापारिक फ़सलें पैदा करने वालों का भुगतान भी नकदी में

बॉक्स (पृ. 206): “गाँव में मुद्रा” — तैवर्नियर★

सत्रहवीं सदी में फ्रांसीसी यात्री ज्यां बैप्टिस्ट तैवर्नियर को यह बात उल्लेखनीय लगी कि “भारत में वे गाँव बहुत ही छोटे कहे जाएँगे जिनमें मुद्रा की फेर बदल करने वाले, जिन्हें सराफ़ कहते हैं, न हों। एक बैंकर की तरह सराफ़ हवाला भुगतान करते हैं (और) अपनी मर्ज़ी के मुताबिक पैसे के मुकाबले रुपये की क़ीमत बढ़ा देते हैं और कौड़ियों के मुकाबले पैसे की।”

  • चित्र 8.6 — सराफ़ अपने काम में लगा हुआ है।

🗣 चर्चा कीजिए… (पृ. 206)ध्यान

“इस अनुभाग में जिन पंचायतों का ज़िक्र किया गया है, वे आपके मुताबिक किस तरह से आज की ग्राम पंचायतों से मिलती-जुलती थीं अथवा भिन्न थीं?” शिक्षक-संकेत: मिलती-जुलती — गाँव-स्तरीय विवाद-निपटारा, सामुदायिक कार्य, ख़ज़ाना/बजट; भिन्न — आज संवैधानिक (73वाँ संशोधन, 1992), निर्वाचित, आरक्षण (महिलाएँ, SC/ST); तब अल्पतंत्र — पुश्तैनी बुज़ुर्ग, “नीच” कामगारों की जगह नहीं, जाति की हदें लागू करना मुख्य काम।

§3. कृषि समाज में महिलाएँ (पृ. 206–207)

3.1 श्रम-विभाजन

  • ★महिलाएँ और मर्द “कंधे से कंधा मिलाकर खेतों में” काम करते थे — मर्द खेत जोतते थे व हल चलाते थे; महिलाएँ बुआई, निराई और कटाई के साथ-साथ पकी हुई फ़सल का दाना निकालने का काम करती थीं।
  • छोटी ग्रामीण इकाइयों और किसान की व्यक्तिगत खेती के विकास के साथ — घर-परिवार के संसाधन और श्रम ही उत्पादन की बुनियाद बने → लिंग-बोध के आधार पर घर (महिला) / बाहर (मर्द) का फ़र्क मुमकिन नहीं था।

3.2 फिर भी पूर्वाग्रह

  • महिलाओं की जैव वैज्ञानिक क्रियाओं को लेकर पूर्वाग्रह बने रहे:
    • पश्चिमी भारत — राजस्वला महिलाओं को हल या कुम्हार का चाक छूने की इजाज़त नहीं
    • बंगाल — मासिक-धर्म के समय महिलाएँ पान के बगान में नहीं घुस सकती थीं

3.3 दस्तकारी और वाणिज्यीकरण

  • सूत कातना, बरतन बनाने के लिए मिट्टी को साफ़ करना और गूँधना, कपड़ों पर कढ़ाई — उत्पादन के ऐसे पहलू महिलाओं के श्रम पर निर्भर थे।
  • ★“किसी वस्तु का जितना वाणिज्यीकरण होता था, उसके उत्पादन के लिए महिलाओं के श्रम की उतनी ही माँग होती थी।”
  • किसान और दस्तकार महिलाएँ ज़रूरत पड़ने पर न सिर्फ़ खेतों में काम करती थीं बल्कि नियोक्ताओं के घरों पर भी जाती थीं और बाज़ारों में भी।

3.4 महिला = महत्त्वपूर्ण संसाधन; पर नियंत्रण भी★★

  • समाज श्रम पर निर्भर था, इसलिए बच्चे पैदा करने की क़ाबिलियत की वजह से महिलाओं को महत्त्वपूर्ण संसाधन के रूप में देखा जाता था।
  • ★शादी-शुदा महिलाओं की कमी थी — कारण: कुपोषण, बार-बार माँ बनने और प्रसव के वक़्त मौत की वजह से महिलाओं में मृत्युदर बहुत ज़्यादा।
  • → किसान व दस्तकार समाज में ऐसे सामाजिक रिवाज जो संभ्रांत समूहों से बहुत अलग थे:
    • कई ग्रामीण संप्रदायों में शादी के लिए ★“दुल्हन की क़ीमत” (Bride-price) अदा करने की ज़रूरत — न कि दहेज की
    • तलाकशुदा महिलाएँ और विधवाएँ दोनों ही कानूनी तौर पर शादी कर सकती थीं
  • ★★दूसरा पहलू — नियंत्रण: महिलाओं की प्रजनन शक्ति को इतनी अहमियत दी जाती थी कि उस पर काबू खोने का बड़ा डर था। स्थापित रिवाजों के मुताबिक घर का मुखिया मर्द होता था; महिला पर परिवार और समुदाय के मर्दों द्वारा पुरज़ोर काबू; बेवफ़ाई के शक पर ही महिलाओं को भयानक दंड दिए जा सकते थे।

3.5 महिलाएँ और न्याय

  • राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र आदि पश्चिमी भारत के इलाकों से मिले दस्तावेज़ों में ऐसी दरख़्वास्तें — जो महिलाओं ने न्याय और मुआवज़े की उम्मीद से ग्राम पंचायत को भेजी थीं:
    • पत्नियाँ अपने पतियों की बेवफ़ाई का विरोध करती दिखाई देती हैं, या आरोप कि गृहस्थी के मर्द पत्नी और बच्चों की अनदेखी करता है
    • ★मर्दों की बेवफ़ाई हमेशा दंडित नहीं होती थी; लेकिन राज्य और “ऊँची” जाति के लोग अक्सर यह सुनिश्चित करने की कोशिश करते कि परिवार के भरण-पोषण का इंतज़ाम हो जाए
    • ★★ज़्यादातर, जब महिलाएँ पंचायत को दरख़्वास्त देतीं, उनके नाम दस्तावेज़ों में दर्ज नहीं किए जाते — दरख़्वास्त करने वाली का हवाला “गृहस्थी के मर्द/मुखिया की माँ, बहन या पत्नी” के रूप में दिया जाता था

3.6 संपत्ति में महिलाओं के अधिकार★★

तथ्यविवरण
भूमिहर भद्रजनमहिलाओं को पुश्तैनी संपत्ति का हक़ मिला हुआ था
पंजाबमहिलाएँ (विधवा महिलाएँ भी) पुश्तैनी संपत्ति के विक्रेता के रूप में ग्रामीण ज़मीन के बाज़ार में सक्रिय हिस्सेदारी रखती थीं
हिंदू और मुसलमान महिलाएँज़मींदारी उत्तराधिकार में मिलती थी जिसे बेचने अथवा गिरवी रखने के लिए वे स्वतंत्र थीं
बंगालमहिला ज़मींदार भी पाई जाती थीं — ★अठारहवीं सदी की सबसे बड़ी और मशहूर ज़मींदारियों में से एक थी राजशाही की ज़मींदारी “जिसकी कर्ता-धर्ता एक स्त्री थी”

🗣 चर्चा कीजिए… (पृ. 207)ध्यान

“क्या आपके प्रांत में कृषि भूमि पर महिलाओं और मर्दों की पहुँच में कोई फ़र्क है?”

चित्र: 8.7 सूत कातती महिला | 8.8(क) फ़तेहपुर सीकरी का निर्माण — महिलाएँ पत्थर तोड़ रही हैं | 8.8(ख) बोझा ढोती महिलाएँ — “आस-पास के दूसरे गाँवों से आने वाली महिलाएँ अक्सर ऐसे निर्माण-स्थलों पर काम करती थीं।”

§4. जंगल और कबीले (पृ. 208–211)

§4.1 बसे हुए गाँवों के परे (पृ. 208)

4.1.1 जंगल का विस्तार

  • गहरी खेती वाले उत्तर और उत्तर-पश्चिमी प्रदेशों को छोड़ दें तो ज़मीन के विशाल हिस्से जंगल या झाड़ियों (खरबंदी) से घिरे थे।
  • फैलाव: झारखंड सहित पूरे पूर्वी भारत, मध्य भारत, उत्तरी क्षेत्र (भारत-नेपाल सीमावर्ती तराई), दक्षिणी भारत का पश्चिमी घाट और दक्कन के पठारों में।
  • ★अखिल भारतीय औसत निकालना लगभग असंभव, फिर भी समसामयिक स्रोतों के आधार पर अंदाज़ा — औसत करीब-करीब 40 फ़ीसदी।

4.1.2 ‘जंगली’ का असली अर्थ★★

  • समसामयिक रचनाएँ जंगल में रहने वालों के लिए जंगली शब्द इस्तेमाल करती हैं।
  • ★★“लेकिन जंगली होने का मतलब सभ्यता का न होना बिलकुल नहीं था” (जैसा आजकल इस शब्द का प्रचलित अर्थ है)। उन दिनों इसका इस्तेमाल ऐसे लोगों के लिए होता था जिनका गुज़ारा जंगल के उत्पादों, शिकार और स्थानांतरीय खेती से होता था।
  • ये काम मौसम के मुताबिक होते थे — भीलों का उदाहरण:
ऋतुकाम
बसंतजंगल के उत्पाद इकट्ठा करना
गर्मीमछली पकड़ना
मानसून के महीनेखेती
शरद व जाड़ाशिकार
  • यह सिलसिला लगातार गतिशीलता की बुनियाद पर खड़ा था — जंगलवासी कबीलों की ख़ासियत।

4.1.3 राज्य की नज़र में जंगल

  • ★राज्य के लिए जंगल उलट फेर वाला इलाका था — “बदमाशों को शरण देने वाला अड्डा (मवास)”।
  • बाबर कहता है — जंगल एक ऐसा रक्षाकवच था “जिसके पीछे परगना के लोग कड़े विद्रोही हो जाते थे और कर अदा करने से मुकर जाते थे।”

§4.2 जंगलों में घुसपैठ (पृ. 208–211)

4.2.1 राज्य की घुसपैठ

  • हाथियों के लिए: राज्य को सेना के लिए हाथियों की ज़रूरत → जंगलवासियों से ली जाने वाली पेशकश में अक्सर हाथी भी शामिल।
  • ★★शिकार अभियान = सद्भावनापूर्ण शासन: मुग़ल राजनीतिक विचारधारा में गरीबों और अमीरों सहित सबके साथ जुड़ते हुए राज्य के गहरे सरोकार का एक लक्षण — शिकार अभियान। दरबारी इतिहासकारों की मानें तो शिकार के बहाने बादशाह साम्राज्य के कोने-कोने का दौरा करता था और अलग-अलग इलाकों के लोगों की समस्याओं और शिकायतों पर व्यक्तिगत रूप से गौर करता था।
  • दरबारी चित्रों में शिकार का विषय बार-बार — चित्रकार अक्सर छोटा-सा एक ऐसा दृश्य डाल देते थे जो सद्भावनापूर्ण शासन का संकेत देता था। (चित्र 8.9 — नीलगाय का शिकार करते हुए शाहजहाँ, बादशाहनामा से; 🔎 इन-टेक्स्ट प्रश्न: “इसमें ऐसा कौन सा सांकेतिक तत्व है जो शिकार और एक आदर्श न्याय व्यवस्था को जोड़ता है?”)

4.2.2 वाणिज्यिक घुसपैठ

  • वाणिज्यिक खेती का असर जंगलवासियों की ज़िंदगी पर भी।
  • जंगल के उत्पाद — शहद, मधुमोम और लाक — की बहुत माँग; ★लाक जैसी कुछ वस्तुएँ सत्रहवीं सदी में भारत से समुद्र पार होने वाले निर्यात की मुख्य वस्तुएँ थीं।
  • हाथी भी पकड़े और बेचे जाते थे।
  • व्यापार में वस्तुओं की अदला-बदली भी — कुछ कबीले भारत और अफ़ग़ानिस्तान के बीच ज़मीनी व्यापार में लगे थे, जैसे पंजाब का लोहानी कबीला — वे पंजाब के गाँवों और शहरों के बीच होने वाले व्यापार में भी शिरकत करते थे।

4.2.3 सामाजिक बदलाव — सरदार से राजा

  • कबीलों के भी सरदार होते थे — बहुत कुछ ग्रामीण समुदाय के “बड़े आदमियों” की तरह।
  • ★★कई कबीलों के सरदार ज़मींदार बन गए, कुछ तो राजा भी हो गये।
  • राजा बनने पर सेना की ज़रूरत → उन्होंने अपने ही खानदान के लोगों को सेना में भर्ती किया, या अपने ही भाई-बंधुओं से सैन्य सेवा की माँग की।
  • सिंध इलाके की कबीलाई सेनाओं में 6000 घुड़सवार और 7000 पैदल सिपाही होते थे।
  • ★असम में अहोम राजाओं के अपने पायक होते थे — वे लोग जिन्हें ज़मीन के बदले सैनिक सेवा देनी पड़ती थी; अहोम राजाओं ने जंगली हाथी पकड़ने पर अपने एकाधिकार का ऐलान भी कर रखा था।
  • ★कबीलाई व्यवस्था से राजतांत्रिक प्रणाली की तरफ़ संक्रमण बहुत पहले ही शुरू हो चुका था, लेकिन ऐसा लगता है कि सोलहवीं सदी में आकर ही यह प्रक्रिया पूरी तरह विकसित हुई — इसकी जानकारी उत्तर-पूर्वी इलाकों में कबीलाई राज्यों के बारे में आइन की बातों से मिलती है।
  • उदाहरण: सोलहवीं-सत्रहवीं सदी में कोच राजाओं ने पड़ोसी कबीलों के साथ एक के बाद एक युद्ध किया और उन पर कब्ज़ा जमा लिया।

4.2.4 सांस्कृतिक प्रभाव

  • जंगल के इलाकों में नए सांस्कृतिक प्रभावों के विस्तार की भी शुरुआत हुई।
  • ★कुछ इतिहासकारों का सुझाव — नए बसे इलाकों के खेतिहर समुदायों ने जिस तरह धीरे-धीरे इस्लाम को अपनाया उसमें सूफ़ी संतों (पीर) ने एक बड़ी भूमिका अदा की (🧭 अध्याय 6 भी देखिए)।

स्रोत 3 (पृ. 209): “कृषि बस्तियों के लिए जंगलों का सफ़ाया” — चंडीमंगल★

पृष्ठभूमि: सोलहवीं सदी में मुकुंदराम चक्रवर्ती की लिखी बंगाली कविता चंडीमंगल। कविता के नायक कालकेतु ने जंगल खाली करवा के एक साम्राज्य की स्थापना की:

“ख़बर मिलते ही, परदेसी आने लगे तमाम जगहों से। फिर कालकेतु ने ख़रीद कर बाँटे उनमें भारी भरकम चाकू, कुल्हाड़ी, और भाले-बरछे। उत्तर से आए दास सैकड़ों उमड़ते हुए… दक्खिन से आए फ़सल कटाई वाले एक उद्यमी के साथ पाँच सौ। पश्चिम से आया ज़फ़र मियाँ, साथ में बाईस हज़ार लोग — हाथों में सुलेमानी मोती की माला, जपते हुए पीर ओ पैग़म्बर का नाम। जंगलों को हटाने के बाद उन्होंने बसाए बाज़ार। सैकड़ों सैकड़ों की तादाद में बिदेसी जंगलों को (जैसे) खा लिए, और घुस आए वहाँ। कुल्हाड़ियों की आवाज़ सुनकर शेर डर गए और दहाड़ते हुए भाग निकले।”

★★स्रोत-विश्लेषण: (1) जंगल-सफ़ाया संगठित, औज़ार-वितरित, बहु-क्षेत्रीय प्रवासी श्रम से हुआ (उत्तर के दास, दक्खिन के कटाई वाले, पश्चिम से ज़फ़र मियाँ); (2) ज़फ़र मियाँ के 22,000 लोग + पीर-पैग़म्बर का जाप — पूर्वी बंगाल में कृषि-विस्तार और इस्लाम के प्रसार का साथ-साथ चलना — यही 4.2.4 वाले इतिहासकारों के सुझाव का काव्य-प्रमाण; (3) “शेर डर गए और भाग निकले” — पारिस्थितिक विस्थापन की काव्य-छवि।

🔎 इन-टेक्स्ट प्रश्न (पृ. 209): “यह पद्यांश जंगल में घुसपैठ के कौन से रूपों को उजागर करता है? इसके संदेश की तुलना चित्र 8.9 में दिये गए लघु चित्र से कीजिए। जंगल में रहने वाले लोगों के अनुसार पद्यांश में किन्हें ‘बिदेसी’ बताया गया है?”

स्रोत 4 (पृ. 210): “पहाड़ी कबीलों और मैदानों के बीच व्यापार, लगभग 1595” — आइन★

अवध सूबे (आज के उत्तर प्रदेश का हिस्सा) के मैदानी इलाकों और पहाड़ी कबीलों के लेन-देन के बारे में अबुल फ़ज़्ल:

“उत्तर के पहाड़ों से इंसानों, मोटे-मोटे घोड़ों और बकरों की पीठ पर लादकर बेशुमार सामान ले जाए जाते हैं, जैसे कि सोना, ताँबा, शीशा, कस्तूरी, सुरागाय (याक) की पूँछ, शहद, चुक (संतरे के रस और नींबू के रस को साथ उबालकर बनाया जाने वाला एक अम्ल), अनार दाना, अदरख, लंबी मिर्च, मजीठ (जिससे लाल रंग बनाया जाता है) की जड़ें, सुहागा, ज़दवार, जड़ी-बूटियाँ, मोम, ऊनी कपड़े, लकड़ी के सामान, चील, बाज़, काले बाज़, मर्लिन (बाज़ पक्षी की ही एक किस्म), और अन्य वस्तुएँ। इसके बदले, वे सफ़ेद और रंगीन कपड़े, कहरुबा (एक पीला-भूरा धातु जिससे गहने बनाए जाते थे), नमक, हींग, गहने और शीशे व मिट्टी के बरतन वापिस ले जाते हैं।”

🔎 इन-टेक्स्ट प्रश्न (पृ. 210): “इस अनुच्छेद में परिवहन के कौन से तरीक़ों का ज़िक्र किया गया है? आपके मुताबिक, इनका इस्तेमाल क्यों किया जाता था? मैदानों से जो सामान पहाड़ ले जाए जाते थे, उनमें से हर एक वस्तु किस काम में लाई जाती होगी, इसका खुलासा कीजिए।” संकेत: परिवहन — इंसानों, घोड़ों और बकरों की पीठ (पहाड़ी रास्तों पर पहिया-गाड़ी असंभव); मैदान से गया सामान — कपड़े (पहनने), नमक (पहाड़ों में दुर्लभ — भोजन), हींग (मसाला/औषधि), गहने-कहरुबा (आभूषण), शीशे-मिट्टी के बरतन (घरेलू उपयोग)।

परिभाषा-बॉक्स (पृ. 209)

  • परगना — मुग़ल प्रांतों में एक प्रशासनिक प्रमंडल
  • पेशकश — मुग़ल राज्य के द्वारा ली जाने वाली एक तरह की भेंट

🗣 चर्चा कीजिए… (पृ. 211)ध्यान

“पता कीजिए कि आपके प्रांत में किन क्षेत्रों को आजकल जंगल वाले इलाके के रूप में पहचाना जाता है? क्या इन इलाकों में आज ज़िंदगियाँ बदल रही हैं? इन बदलावों की वजहें वही हैं जिनका ज़िक्र हमने इस अनुभाग में किया है या उनसे अलग?” राजस्थान-संकेत: उदयपुर-डूंगरपुर-बाँसवाड़ा-प्रतापगढ़ का भील-क्षेत्र, सरिस्का-रणथंभौर; आज के कारण — खनन, पर्यटन, वन अधिकार अधिनियम 2006 — तुलना करवाइए।

§5. ज़मींदार (पृ. 211–213)

5.1 ज़मींदार कौन?

  • ★ऐसा तबका जिनकी कमाई तो खेती से आती थी लेकिन जो कृषि उत्पादन में सीधे हिस्सेदारी नहीं करते थे।
  • अपनी ज़मीन के मालिक; ग्रामीण समाज में ऊँची हैसियत की वजह से कुछ ख़ास सामाजिक और आर्थिक सुविधाएँ।
  • ★ऊँची हैसियत के दो कारण: (1) जाति, (2) राज्य को कुछ ख़ास किस्म की सेवाएँ (ख़िदमत)।

5.2 ज़मींदार की संपत्ति और ताक़त — तीन आधार

आधारविवरण
1. मिल्कियतविस्तृत व्यक्तिगत ज़मीन — इसे मिल्कियत (संपत्ति) कहते थे; इस पर ज़मींदार के निजी इस्तेमाल के लिए खेती होती थी, अक्सर दिहाड़ी के मज़दूर या पराधीन मज़दूर काम करते थे; ज़मींदार इन ज़मीनों को बेच सकते थे, किसी और के नाम कर सकते थे या गिरवी रख सकते थे
2. कर वसूली का अधिकारवे अक्सर राज्य की ओर से कर वसूल कर सकते थे — इसके बदले उन्हें वित्तीय मुआवज़ा मिलता था
3. सैनिक संसाधनज़्यादातर ज़मींदारों के पास अपने किले भी थे और अपनी सैनिक टुकड़ियाँ — जिनमें घुड़सवारों, तोपखाने और पैदल सिपाहियों के जत्थे होते थे

5.3 पिरामिड का संकरा शीर्ष★★

  • “अगर हम मुग़लकालीन गाँवों में सामाजिक संबंधों की कल्पना एक पिरामिड के रूप में करें, तो ज़मींदार इसके संकरे शीर्ष का हिस्सा थे।”
  • अबुल फ़ज़्ल इशारा करता है कि “ऊँची जाति” के ब्राह्मण-राजपूत गठबंधन ने ग्रामीण समाज पर पहले ही अपना ठोस नियंत्रण बना रखा था; इसमें तथाकथित मध्यम जातियों की भी ख़ासी नुमाइंदगी थी, और इसी तरह कई मुसलमान ज़मींदारों की भी।

5.4 ज़मींदारी कैसे बनी? (उत्पत्ति और विस्तार)★★

  • जंग में जीत — समसामयिक दस्तावेज़ों से लगता है कि यह ज़मींदारों की उत्पत्ति का संभावित स्रोत रहा होगा; ताकतवर सैनिक सरदारों द्वारा कमज़ोर लोगों को बेदखल करना ज़मींदारी फैलाने का एक तरीक़ा था। ! मगर — इसकी संभावना कम ही है कि राज्य किसी ज़मींदार को इतने आक्रामक रुख की इजाज़त देता हो, जब तक एक राज्यादेश (सनद) के ज़रिये पुष्टि न कर दी गई हो।
  • ★इससे भी महत्त्वपूर्ण — ज़मींदारी को पुख़्ता करने की धीमी प्रक्रिया (स्रोतों में दस्तावेज़ शामिल), तीन/चार तरीक़े:
    1. नयी ज़मीनों को बसाकर (जंगल-बारी)
    2. अधिकारों के हस्तांतरण के ज़रिये
    3. राज्य के आदेश से
    4. या फिर ख़रीद कर
  • ★यही वे प्रक्रियाएँ थीं जिनके ज़रिये अपेक्षाकृत “निचली” जातियों के लोग भी ज़मींदारों के दर्जे में दाख़िल हो सकते थे — क्योंकि इस काल में ज़मींदारी धड़ल्ले से खरीदी और बेची जाती थी।
  • परिवार/वंश-आधारित ज़मींदारियाँ: राजपूतों और जाटों ने ऐसी रणनीति अपनाकर उत्तर भारत में ज़मीन की बड़ी-बड़ी पट्टियों पर नियंत्रण पुख़्ता किया; इसी तरह मध्य और दक्षिण-पश्चिम बंगाल में किसान-पशुचारियों (जैसे, सदगोप) ने ताकतवर ज़मींदारियाँ खड़ी कीं।

5.5 ज़मींदार और कृषि-विकास★★

  • ज़मींदारों ने खेती लायक ज़मीनों को बसाने में अगुआई की और खेतिहरों को खेती के साजो-सामान व उधार देकर उन्हें वहाँ बसने में मदद भी की।
  • ज़मींदारी की खरीद-फ़रोख़्त से गाँवों के मौद्रीकरण (Monetisation) की प्रक्रिया में तेज़ी आई।
  • ज़मींदार अपनी मिल्कियत की ज़मीनों की फ़सल भी बेचते थे।
  • ऐसे सबूत हैं — ज़मींदार अक्सर बाज़ार (हाट) स्थापित करते थे जहाँ किसान भी अपनी फ़सलें बेचने आते थे।

5.6 शोषक या संरक्षक? — दो पहलू★★★

  • “हालाँकि इसमें कोई शक नहीं कि ज़मींदार शोषण करने वाला तबका था, लेकिन किसानों से उनके रिश्तों में पारस्परिकता (Reciprocity), पैतृकवाद (Paternalism) और संरक्षण (Patronage) का पुट था।”
  • दो पहलू इस बात की पुष्टि करते हैं:
    1. ★भक्ति संतों ने जहाँ जातिगत और दूसरी किस्मों के अत्याचारों की बड़ी बेबाकी से निंदा की (🧭 अध्याय 6 भी देखिए), वहीं उन्होंने ज़मींदारों को (या फिर, दिलचस्प बात है, साहूकारों को) किसानों के शोषक या उन पर अत्याचार करने वाले के रूप में नहीं दिखाया — आमतौर पर राज्य का राजस्व अधिकारी ही उनके गुस्से का निशाना बना
    2. ★सत्रहवीं सदी में भारी संख्या में कृषि विद्रोह हुए और उनमें राज्य के ख़िलाफ़ ज़मींदारों को अक्सर किसानों का समर्थन मिला

बॉक्स (पृ. 212): “एक समांतर सैनिक बल!”★

आइन के मुताबिक, मुग़ल भारत में ज़मींदारों की मिली-जुली सैनिक शक्ति: 384,558 घुड़सवार; 4,277,057 पैदल; 1863 हाथी; 4260 तोप; और 4,500 नाव।

🗣 चर्चा कीजिए… (पृ. 213)ध्यान

“आज़ादी के बाद भारत में ज़मींदारी व्यवस्था ख़त्म कर दी गई। इस अनुभाग को पढ़िए और उन कारणों की पहचान कीजिए जिनकी वजह से ऐसा किया गया।” संकेत: शोषण-तंत्र; बिचौलिया — जोतने वाले का ज़मीन पर अधिकार नहीं; कर-वसूली की सत्ता निजी हाथों में; सैनिक ताक़त; भूमि-सुधार व “जोतने वाले को ज़मीन” का सिद्धांत।

§6. भू-राजस्व प्रणाली (पृ. 213–215)

6.1 राजस्व = आर्थिक बुनियाद

  • ★ज़मीन से मिलने वाला राजस्व मुग़ल साम्राज्य की आर्थिक बुनियाद थी।
  • इसलिए कृषि उत्पादन पर नियंत्रण और तेज़ी से फैलते साम्राज्य के तमाम इलाक़ों में राजस्व आकलन व वसूली के लिए एक प्रशासनिक तंत्र खड़ा करना ज़रूरी था।
  • दीवान — जिसके दफ़्तर पर पूरे राज्य की वित्तीय व्यवस्था की देख-रेख की ज़िम्मेदारी थी।
  • ★राजस्व अधिकारी और हिसाब रखने वाले खेती की दुनिया में दाख़िल हुए और कृषि संबंधों को शक्ल देने में एक निर्णायक ताकत बनकर उभरे।

6.2 भू-राजस्व के इंतज़ाम के दो चरण★★

  • कर का बोझ निर्धारित करने से पहले मुग़ल राज्य ने ज़मीन और उस पर होने वाले उत्पादन के बारे में ख़ास किस्म की सूचनाएँ इकट्ठा करने की कोशिश की।
चरणनामअर्थ
1जमाकर निर्धारण — निर्धारित रक़म
2हासिलवास्तविक वसूली — सचमुच वसूली गई रक़म
  • ★अमील-गुज़ार (राजस्व वसूली करने वाला) के लिए अकबर का हुक्म — जहाँ उसे कोशिश करनी चाहिए कि खेतिहर नक़द भुगतान करे, वहीं फ़सलों में भुगतान का विकल्प भी खुला रहे।
  • राजस्व निर्धारित करते समय राज्य अपना हिस्सा ज़्यादा से ज़्यादा रखने की कोशिश करता था; मगर स्थानीय हालात की वजह से कभी-कभी सचमुच में इतनी वसूली कर पाना संभव नहीं हो पाता था।

6.3 ज़मीन की नपाई

  • हर प्रांत में जुती हुई ज़मीन और जोतने लायक ज़मीन — दोनों की नपाई की गई।
  • अकबर के शासन काल में अबुल फ़ज़्ल ने आइन में ऐसी ज़मीनों के सभी आँकड़ों को संकलित किया।
  • बाद के बादशाहों के शासनकाल में भी नपाई के प्रयास जारी — ★1665 ई. में औरंगज़ेब ने अपने राजस्व कर्मचारियों को स्पष्ट निर्देश दिया कि हर गाँव में खेतिहरों की संख्या का सालाना हिसाब रखा जाए (स्रोत 7)।
  • ! इसके बावजूद सभी इलाक़ों की नपाई सफलतापूर्वक नहीं हुई — उपमहाद्वीप के कई बड़े हिस्से जंगलों से घिरे थे और इनकी नपाई नहीं हुई।

स्रोत 5 (पृ. 214): “अकबर के शासन में भूमि का वर्गीकरण” — आइन★★

“अकबर बादशाह ने अपनी गहरी दूरदर्शिता के साथ ज़मीनों का वर्गीकरण किया और हरेक (वर्ग की ज़मीन) के लिए अलग-अलग राजस्व निर्धारित किया।”

वर्गपरिभाषा (अक्षरश:)
पोलजवह ज़मीन जिसमें एक के बाद एक हर फ़सल की सालाना खेती होती है और जिसे कभी खाली नहीं छोड़ा जाता
परौतीवह ज़मीन जिस पर कुछ दिनों के लिए खेती रोक दी जाती है ताकि वह अपनी खोयी ताकत वापस पा सके
चचरवह ज़मीन जो तीन या चार वर्षों तक खाली रहती है
बंजरवह ज़मीन जिस पर पाँच या उससे ज़्यादा वर्षों से खेती नहीं की गई

“पहले दो प्रकार की ज़मीन की तीन किस्में हैं: अच्छी, मध्यम और खराब। वे हर किस्म की ज़मीन के उत्पाद को जोड़ देते हैं, और इसका तीसरा हिस्सा मध्यम उत्पाद माना जाता है, जिसका एक-तिहाई हिस्सा शाही शुल्क माना जाता है।”

🔎 इन-टेक्स्ट प्रश्न (पृ. 214): “अपने अधीन इलाक़ों में ज़मीन का वर्गीकरण करते वक़्त मुग़ल राज्य ने किन सिद्धांतों का पालन किया? राजस्व निर्धारण किस प्रकार किया जाता था?” संकेत: सिद्धांत — खेती की निरंतरता (कितने वर्ष खाली) + उर्वरता (अच्छी-मध्यम-खराब); निर्धारण — तीनों किस्मों का औसत (मध्यम उत्पाद) → उसका एक-तिहाई राज्य का हिस्सा।

स्रोत 6 (पृ. 215): “नक़द या जीन्स?” — आइन★★

अमील-गुज़ार सिर्फ़ नक़द लेने की आदत न डाले बल्कि फ़सल में भी लेने के लिए तैयार रहे। फ़सल में वसूली के तरीक़े:

#तरीक़ाविवरण (अक्षरश:)
1कणकुतहिंदी ज़ुबान में कण = अनाज, और कुत = अंदाज़ा… अगर कोई शक हो, तो फ़सल को तीन अलग-अलग पुलिंदों — अच्छा, मध्यम और बदतर — में काटना चाहिए, और इस तरह शक दूर करना चाहिए। अक्सर अंदाज़े से किया गया ज़मीन का आकलन भी पर्याप्त रूप से सही नतीजा देता है
2बटाई (जिसे भाओली भी कहते हैं)फ़सल काट कर जमा कर लेते हैं और फिर सभी पक्षों की मौजूदगी में व रज़ामंदी में बँटवारा करते हैं। लेकिन इसमें कई समझदार निरीक्षकों की ज़रूरत — वर्ना दुष्ट-बुद्धि और मक्कार धोखेबाज़ी की नीयत रखते हैं
3खेत बटाईजब वे बीज बोने के बाद खेत बाँट लेते हैं
4लाँग बटाईफ़सल काटने के बाद, वे उसका ढेर बना लेते हैं और फिर उसे आपने में बाँट लेते हैं; हरेक (पक्ष) अपना हिस्सा घर ले जाता है और उससे मुनाफ़ा कमाता है

🔎 इन-टेक्स्ट प्रश्न (पृ. 215): “राजस्व निर्धारण व वसूली की हरेक प्रणाली में खेतिहरों पर क्या फ़र्क पड़ता होगा?”

स्रोत 7 (पृ. 215): “जमा” — औरंगज़ेब का हुक्म (1665 ई.)★

“वे परगनाओं के अमीनों को निर्देश दें कि वे हर गाँव, हर किसान (आसामीवार) के बावत खेती की मौजूदा हालात (मौजूदात) पता करें, और बारीकी से उनकी जाँच करने के बाद सरकार के वित्तीय हितों (किफ़ायत) व किसानों के कल्याण को ध्यान में रखते हुए जमा निर्धारित करें।”

🔎 इन-टेक्स्ट प्रश्न: “आपकी राय में बादशाह ने विस्तृत सर्वेक्षण पर क्यों ज़ोर दिया?” संकेत: वास्तविक स्थिति पर आधारित निर्धारण = न वसूली में घाटा, न किसान पर असहनीय बोझ — “किफ़ायत” और “कल्याण” दोनों शब्द हुक्म में ही हैं।

परिभाषा-बॉक्स (पृ. 214)

  • अमीन — एक मुलाज़िम जिसकी ज़िम्मेदारी यह सुनिश्चित करना थी कि प्रांतों में राजकीय नियम कानूनों का पालन हो रहा है।
  • मनसबदारी व्यवस्था (बॉक्स): मुग़ल प्रशासनिक व्यवस्था के शीर्ष पर एक सैनिक-नौकरशाही तंत्र (मनसबदारी) — राज्य के सैनिक व नागरिक मामलों की ज़िम्मेदारी; कुछ मनसबदारों को नक़दी भुगतान (नक़दी), ज़्यादातर को साम्राज्य के अलग-अलग हिस्सों में राजस्व के आबंटन (जागीर) के ज़रिये; समय-समय पर उनका तबादला (अध्याय 9 देखिए)।

मानचित्र 1 (पृ. 214): मुग़ल साम्राज्य का विस्तार

चरणवर्ष
बाबर का शासन1530
अकबर का शासन1605
औरंगज़ेब का शासन1707
  • चिह्नित स्थान: समरकंद, बल्ख, काबुल, कंधार, लाहौर, पानीपत, दिल्ली, आम्बेर, अजमेर, आगरा, गोवा, पटना, रोहतास। (रेखाचित्र — पैमाना नहीं दिया गया है।)
  • 🔎 इन-टेक्स्ट प्रश्न: “भू-राजस्व की वसूली पर साम्राज्य के विस्तार का क्या प्रभाव पड़ा?”

🗣 चर्चा कीजिए… (पृ. 215)ध्यान

“क्या आप मुग़लों की भू-राजस्व प्रणाली को एक लचीली व्यवस्था मानेंगे?” संकेत — ‘हाँ’ के पक्ष में: नक़द और जीन्स दोनों विकल्प; चार भूमि-वर्ग, अलग-अलग दरें; कणकुत/बटाई के कई तरीक़े; जमा बनाम हासिल का व्यावहारिक भेद; मौजूदात-जाँच; ‘नहीं’ के पक्ष में: राज्य हिस्सा अधिकतम रखने की कोशिश; बहुत ज़्यादा कर की शिकायतें (§2.2); किसानों का भागना। संतुलित उत्तर सर्वोत्तम।

§7. चाँदी का बहाव (पृ. 215–217)

7.1 बड़े साम्राज्यों का युग

  • मुग़ल साम्राज्य एशिया के उन बड़े साम्राज्यों में एक था जो सोलहवीं व सत्रहवीं सदी में सत्ता और संसाधनों पर अपनी पकड़ मज़बूत बनाने में कामयाब रहे — ★मिंग (चीन), सफ़ावी (ईरान), और ऑटोमन (तुर्की)।
  • इन साम्राज्यों की राजनीतिक स्थिरता ने चीन से लेकर भूमध्य सागर तक ज़मीनी व्यापार का जीवंत जाल बिछाने में मदद की।
  • खोजी यात्राओं से और ‘नयी दुनिया’ के खुलने से यूरोप के साथ एशिया के, ख़ास कर भारत के, व्यापार में भारी विस्तार हुआ।

7.2 चाँदी क्यों आई और क्या हुआ?★★

  • भारत से निर्यात होने वाली वस्तुओं का भुगतान करने के लिए एशिया में भारी मात्रा में चाँदी आई — इसका एक बड़ा हिस्सा भारत की तरफ़ खिंच गया।
  • ★“यह भारत के लिए अच्छा था क्योंकि यहाँ चाँदी के प्राकृतिक संसाधन नहीं थे।”
  • नतीजतन, सोलहवीं से अठारहवीं सदी के बीच भारत में धातु मुद्रा — ख़ास कर चाँदी के रुपयों — की उपलब्धि में अच्छी स्थिरता बनी रही।
  • दोहरा परिणाम: (1) अर्थव्यवस्था में मुद्रा संचार और सिक्कों की ढलाई में अभूतपूर्व विस्तार, (2) मुग़ल राज्य को नकदी कर उगाहने में आसानी।

7.3 जोवान्नी कारेरी

  • इटली का एक मुसाफ़िर जोवान्नी कारेरी — लगभग 1690 ई. में भारत से होकर गुज़रा।
  • उसने इस बात का बड़ा सजीव चित्र पेश किया कि किस तरह चाँदी तमाम दुनिया से होकर भारत पहुँचती थी; उसी से यह भी पता चलता है कि सत्रहवीं सदी के भारत में बड़ी अद्भुत मात्रा में नकद और वस्तुओं का आदान-प्रदान हो रहा था।

स्रोत 8 (पृ. 217): “भारत में चाँदी कैसे आई?” — कारेरी★

जोवान्नी कारेरी के लेख (बर्नियर के लेख पर आधारित) का अंश:

“(मुग़ल) साम्राज्य की धन-संपत्ति का अंदाज़ा लगाने के लिए पाठक इस बात पर गौर करें कि दुनिया भर में विचरने वाला सारा सोना-चाँदी आख़िरकार यहीं पहुँच जाता है। ये सब जानते हैं कि इसका बहुत बड़ा हिस्सा अमेरिका से आता है, और यूरोप के कई राज्यों से होते हुए (इसका) थोड़ा-सा हिस्सा कई तरह की वस्तुओं के लिए तुर्की में जाता है; और थोड़ा-सा हिस्सा रेशम के लिए… फ़ारस पहुँचता है। अब चूँकि तुर्की लोग कॉफ़ी से अलग नहीं रह सकते, जो कि ओमान और अरबिया से आती है… (और) न ही फ़ारस, अरबिया और तुर्की (के लोग) भारत की वस्तुओं के बिना रह सकते हैं… (वे) मुद्रा की विशाल मात्रा लाल सागर पर… मोचा भेजते हैं; (इसी तरह) फ़ारस की खाड़ी पर स्थित बसरा भेजते हैं;… बाद में ये (सारी संपत्ति) जहाज़ों से इन्दोस्तान (हिंदुस्तान) भेज दी जाती है। भारतीय जहाज़ों के अलावा जो डच, अंग्रेज़ी और पुर्तगाली जहाज़ हर साल इंदोस्तान की वस्तुएँ लेकर पेगू, तानस्सेरी (म्यांमार के हिस्से), स्याम (थाईलैंड), सीलोन (श्रीलंका)… मालदीव के टापू, मोज़ाम्बीक और अन्य जगहों ले जाते हैं, (इन्हीं जहाज़ों को) निश्चित तौर पर बहुत सारा सोना-चाँदी इन देशों से लेकर वहाँ (हिंदुस्तान) पहुँचाना पड़ता है। वो सब कुछ, जो डच लोग जापान की खानों से हासिल करते हैं, देर-सवेर इंदोस्तान (को) चला जाता है; और यहाँ से यूरोप को जाने वाली सारी वस्तुएँ, चाहे वो फ्रांस जाएँ या इंग्लैंड या पुर्तगाल, सभी नकद में खरीदी जाती हैं, जो (नकद) वहीं (हिंदुस्तान में) रह जाता है।”

★स्रोत-विश्लेषण: कारेरी विश्व-मुद्रा-प्रवाह का नक्शा खींचता है — अमेरिका की खानों से निकला सोना-चाँदी → यूरोप → (तुर्की-फ़ारस-अरब के रास्ते) → मोचा-बसरा → हिंदुस्तान; साथ ही जापान की खानों से डच-मार्ग। हर रास्ता भारत पर आकर ख़त्म — क्योंकि भारत वस्तुएँ बेचता था और बदले में केवल नकद लेता था। यही “भारत = चाँदी का गड्ढा (Sink)” वाला प्रसिद्ध चित्र है — अभ्यास प्रश्न 4 का मुख्य आधार।

चित्र: 8.11 अकबर द्वारा जारी चाँदी के रुपये की दोनों तरफ़ें | 8.12 औरंगज़ेब द्वारा जारी चाँदी का रुपया | 8.13 यूरोपीय बाज़ारों की माँगों को पूरा करने के लिए भारतीय उपमहाद्वीप के वस्त्र उत्पादन का एक उदाहरण

🗣 चर्चा कीजिए… (पृ. 216)ध्यान

“पता लगाइए कि वर्तमान में आपके राज्य में कृषि उत्पादन पर कर लगाए जाते हैं या नहीं। आज की राज्य सरकारों की राजकोषीय नीतियों और मुग़ल राजकोषीय नीतियों में समानताओं और भिन्नताओं को समझाइए।”

§8. अबुल फ़ज़्ल की आइन-ए-अकबरी (पृ. 217–221)

8.1 रचना

  • आइन-ए-अकबरी आँकड़ों के वर्गीकरण की एक बहुत बड़े ऐतिहासिक और प्रशासनिक परियोजना का नतीजा थी, जिसका ज़िम्मा बादशाह अकबर के हुक्म पर अबुल फ़ज़्ल ने उठाया।
  • ★अकबर के शासन के बयालीसवें वर्ष, 1598 ई. में, पाँच संशोधनों के बाद, इसे पूरा किया गया।
  • आइन उस बृहत्तर परियोजना का हिस्सा थी जिसकी पहल अकबर ने की — परिणाम अकबरनामा, जिसे तीन जिल्दों में रचा गया:
    • पहली दो जिल्दें — ऐतिहासिक दास्तान (अध्याय 9 में करीबी नज़र)
    • तीसरी जिल्द — आइन-ए-अकबरी — शाही नियम कानून के सारांश और साम्राज्य के एक राजपत्र (Gazetteer) की सूरत में

8.2 विषय-वस्तु

  • आइन कई मसलों पर विस्तार से चर्चा करती है: दरबार, प्रशासन और सेना का संगठन; राजस्व के स्रोत; अकबरी साम्राज्य के प्रांतों का भूगोल; लोगों के साहित्यिक, सांस्कृतिक व धार्मिक रिवाज — साथ ही सूबों के बारे में पेचीदे और आँकड़ेबद्ध सूचनाएँ।
  • इन सूचनाओं को इकट्ठा करके सिलसिलेवार संकलित करना एक महत्त्वपूर्ण शाही कवायद थी — इसने बादशाह को साम्राज्य के तमाम इलाक़ों में प्रचलित रिवाजों और पेशों की जानकारी दी।
  • ★★“फिर भी यह ध्यान रखना महत्त्वपूर्ण है कि आइन का नज़रिया क्षेत्रों के बारे में केंद्र का नज़रिया है, या यूँ कहें कि समाज के शीर्ष से देखी हुई समाज की तसवीर।”

8.3 पाँच भाग (दफ़्तर)★★

भागनामविषय
1मंज़िल-आबादीशाही घर-परिवार और उसके रख-रखाव से ताल्लुक
2सिपह-आबादीसैनिक व नागरिक प्रशासन और नौकरों की व्यवस्था; शाही अफ़सरों (मनसबदार), विद्वानों, कवियों और कलाकारों की संक्षिप्त जीवनियाँ
3मुल्क-आबादीसाम्राज्य व प्रांतों के वित्तीय पहलुओं तथा राजस्व की दरों के आँकड़े + ★“बारह प्रांतों का बयान”
4–5(चौथी-पाँचवीं किताबें)भारत के लोगों के मज़हबी, साहित्यिक और सांस्कृतिक रीति-रिवाज; आख़िर में अकबर के “शुभ वचनों” का एक संग्रह

8.4 मुल्क-आबादी का ब्योरा★

  • सांख्यिकी सूचनाएँ तफ़सील से — जिसमें सूबों और उनकी तमाम प्रशासनिक व वित्तीय इकाइयों (सरकार, परगना और महल) के भौगोलिक, स्थलाकृतिक और आर्थिक रेखाचित्र।
  • हर प्रांत व उसकी इकाइयों की कुल मापी गई ज़मीन और निर्धारित राजस्व (जमा)।
  • सूबा स्तर के बाद सूबों के नीचे की इकाई सरकारों के बारे में — तालिकाबद्ध तरीके से, जहाँ हर तालिका में आठ खाने:
खानासूचना
1परगनात/महल
2क़िला
3अराज़ी और ज़मीन-ए-पाईमूद (मापे गए इलाके)
4नकदी (नक़द निर्धारित राजस्व)
5सुयूरग़ल (दान में दिया गया राजस्व अनुदान)
6ज़मींदार
7–8★ज़मींदारों की जातियाँ, और उनके घुड़सवार, पैदल सिपाही (प्यादा) व हाथी (फ़ील) सहित उनकी फ़ौज

स्रोत 9 (पृ. 219): “खुशकिस्मती के गुलाब बाग की सिंचाई” — अबुल फ़ज़्ल की विधि★★

अबुल फ़ज़्ल ने खुलासा किया कि उसने कैसे और किनसे सूचनाएँ हासिल कीं:

”…मुझे यह शानदार हुक्म दिया गया, ‘शानदार घटनाओं और राज्य-क्षेत्र अधीन करने वाली हमारी फ़तहों की दास्तान ईमानदारी के कलम से लिखो…’। तसल्ली से, मैंने काफ़ी खोजबीन और मेहनत करके महामहिम की गतिविधियों के सबूत और दस्तावेज़ इकट्ठे किए और बहुत समय तक राज्य के मुलाज़िमों व शाही परिवार के सदस्यों के साथ जवाब तलब किया। मैंने सच बोलने वाले समझदार बुज़ुर्गों और फुर्तीले दिमाग वाले, सत्यकर्मी जवानों दोनों (की बातों) को परखा, और उनके बयानों को लिखित रूप से दर्ज किया। सूबों को शाही हुक्म जारी किया गया कि पुराने मुलाज़िमों में जिस किसी को बीते वक्त की घटनाएँ याद हों… वे अपने संस्मरणों को लिखें और उसे दरबार भेज दें… उसे शाही मौजूदगी में पढ़कर सुनाया जाए… और ये कि ऐसे ब्योरे जो जाँच-पड़ताल की बारीकियों की वजह से… उसी समय अंजाम तक नहीं लाए जा सकें, उन्हें मैं बाद में दर्ज करूँ… मैंने इलाही संवत के उन्नीसवें साल से — जब महामहिम का दानिशमंद अक्ल से दस्तावेज़ दफ़्तर स्थापित किया गया था — घटनाओं का इतिहासवृत्त हासिल किया… मैंने उन सभी हुक्मों की मूल प्रति या नकल हासिल की… जो राज्याभिषेक से लेकर आज तक सूबों को जारी किए गए थे। …मैंने वे कच्चे मसौदे व ज्ञापनपत्र भी हासिल किए जो जानकार और दूरदर्शी लोगों ने लिखे थे। इन तरीकों से खुशकिस्मती के इस गुलाब बाग (अकबरनामा) को सींचने और नमी देने के लिए मैंने हौज़ बनाया।”

★★स्रोत-विश्लेषण — अबुल फ़ज़्ल की छह विधियाँ: (1) दस्तावेज़-सबूत इकट्ठे करना, (2) राज्य के मुलाज़िमों-शाही परिवार से जवाब-तलबी (मौखिक साक्ष्य), (3) बुज़ुर्गों-जवानों के बयानों को परखकर लिखित दर्ज करना, (4) सूबों से संस्मरण मँगवाना व दरबार में पढ़वाना, (5) दस्तावेज़ दफ़्तर से इतिहासवृत्त, शाही हुक्मों की मूल प्रतियाँ/नकलें, (6) कच्चे मसौदे-ज्ञापनपत्र। यानी मौखिक + लिखित, दोनों; और सत्यापन (‘परखा’) की चेतना।

🔎 इन-टेक्स्ट प्रश्न (पृ. 219): “उन सभी स्रोतों की सूची बनाएँ जिनका इस्तेमाल अबुल फ़ज़्ल ने अपनी किताब पूरी करने के लिए किया। कृषि संबंधों को समझने के लिए इनमें से कौन से स्रोत सबसे उपयोगी होते? आपके मुताबिक किस हद तक अबुल फ़ज़्ल की किताब अकबर से उसके रिश्ते से प्रभावित हुई होगी?”

8.5 आइन की विश्वसनीयता और सीमाएँ★★

विश्वसनीयता के पक्ष में:

  • यह किताब अधिकारिक दस्तावेज़ों की महज नकल से कहीं बढ़ कर थी।
  • पांडुलिपि को लेखक द्वारा पाँच बार संशोधित किया गया — प्रामाणिकता की खोज में अबुल फ़ज़्ल काफ़ी सावधानी बरत रहे थे।
  • मौखिक बयानों को तथ्य के रूप में शामिल करने से पहले अन्य स्रोतों से उसकी असलियत और सच्चाई की पुष्टि की कोशिश।
  • सांख्यिकी वाले खंडों में सभी आँकड़ों को अंकों के साथ शब्दों में भी लिखा गया — ताकि बाद की प्रतियों में नकल की गलतियाँ कम से कम हों।

सीमाएँ (जिन इतिहासकारों ने ध्यान से अध्ययन किया, उनके अनुसार):

#सीमा
1जोड़ करने में कई ग़लतियाँ — या तो अंकगणित की छोटी-मोटी चूक या नकल उतारने के दौरान अबुल फ़ज़्ल के सहयोगियों की भूल; आमतौर पर मामूली — किताब के आँकड़ों की व्यापक सच्चाई को कम नहीं करतीं
2★संख्यात्मक आँकड़ों में विषमताएँ — सभी सूबों से आँकड़े एक ही शक्ल में नहीं एकत्रित; जहाँ कई सूबों के लिए ज़मींदारों की जाति के मुताबिक विस्तृत सूचनाएँ संकलित की गईं, वहीं बंगाल और उड़ीसा के लिए ऐसी सूचनाएँ मौजूद नहीं
3★जहाँ सूबों के राजकोषीय आँकड़े बड़ी तफ़सील से दिए गए हैं, वहीं उन्हीं इलाकों से कीमतों और मज़दूरी जैसे महत्त्वपूर्ण मापदंड इतने अच्छे से दर्ज नहीं
4★★कीमतों-मज़दूरी की जो विस्तृत सूची आइन में है, वह साम्राज्य की राजधानी आगरा या उसके इर्द-गिर्द के इलाकों से ली गई है — “ज़ाहिर है कि देश के बाकी हिस्सों के लिए इन आँकड़ों की प्रासंगिकता सीमित है।”

8.6 फिर भी — एक असामान्य दस्तावेज़★★

  • “इन सीमाओं के बावजूद, आइन अपने समय के लिए एक असामान्य व अनोखा दस्तावेज़ है।”
  • मुग़ल साम्राज्य के गठन-संरचना की झलकियाँ और बाशिंदों-उत्पादों के सांख्यिकीय आँकड़े देकर अबुल फ़ज़्ल मध्यकालीन इतिहासकारों की अब तक प्रचलित परंपराओं से कहीं आगे निकल गए — जो ज़्यादातर राजनीतिक वारदातों (जंग, फ़तह, सियासी साज़िशें, वंशीय उथल-पुथल) के बारे में ही लिखते थे।
  • देश-लोग-उत्पादों का ज़िक्र गाहे बगाहे प्रसंगवश ही आता था — वह भी “साज-सज्जा” के लेख के रूप में।
  • ★आइन सत्रहवीं सदी के मुहाने पर भारत के अध्ययन के लिए एक संदर्भ बिंदु बन गया।
  • कृषि संबंधों के लिए आइन के सांख्यिकीय सबूतों की अहमियत चुनौतियों के परे है; इससे भी महत्त्वपूर्ण — लोगों, उनके पेशों-व्यवसायों, साम्राज्य की व्यवस्था और उच्चाधिकारियों की सूचनाएँ — जिनकी मदद से इतिहासकार समकालीन भारत के सामाजिक ताने-बाने का इतिहास पुन: रचते हैं।

बॉक्स (पृ. 220): “आइन का अनुवाद”

आइन की अहमियत की वजह से कई विद्वानों ने इसका अनुवाद किया। हेनरी ब्लॉकमेन ने इसे संपादित किया और कलकत्ता (आज का कोलकाता) के एशियाटिक सोसाइटी ने अपनी बिब्लियोथिका शृंखला में इसे छापा। इस किताब का तीन खंडों में अंग्रेज़ी अनुवाद भी किया गया — पहले खंड का मानक अंग्रेज़ी अनुवाद ब्लॉकमेन का है (कलकत्ता, 1873); बाकी के दो खंडों के अनुवाद एच.एस. जैरेट ने किए (कलकत्ता, 1891 और 1894)।

भाग 2 — काल रेखा (पृ. 221): मुग़ल साम्राज्य के इतिहास के मुख्य पड़ाव

वर्षघटना
1526दिल्ली के सुलतान, इब्राहिम लोदी को पानीपत में हराकर बाबर पहला मुग़ल बादशाह बनता है
1530–40हुमायूँ के शासन का पहला चरण
1540–55शेरशाह से हार कर हुमायूँ सफ़ावी दरबार में प्रवासी बन कर रहता है
1555–56हुमायूँ खोये हुए राज्य को फिर से हासिल करता है
1556–1605अकबर का शासन काल
1605–27जहाँगीर का शासन काल
1628–58शाहजहाँ का शासन काल
1658–1707औरंगज़ेब का शासन काल
1739नादिरशाह भारत पर आक्रमण करता है और दिल्ली को लूटता है
1761अहमद शाह अब्दाली पानीपत के तीसरे युद्ध में मराठों को हराता है
1765बंगाल के दीवानी अधिकार ईस्ट इंडिया कंपनी को सौंप दिये जाते हैं
1857अंतिम मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र को अंग्रेज़ गद्दी से हटा देते हैं और देश निकाला देकर रंगून (आज का यांगोन, म्यांमार) भेज देते हैं

भाग 3 — NCERT अभ्यास प्रश्न (पृ. 222–223)

उत्तर दीजिए (लगभग 100 से 150 शब्दों में)

  1. कृषि इतिहास लिखने के लिए आइन को स्रोत के रूप में इस्तेमाल करने में कौन सी समस्याएँ हैं? इतिहासकार इन समस्याओं से कैसे निपटते हैं?
  2. सोलहवीं-सत्रहवीं सदी में कृषि उत्पादन को किस हद तक महज़ गुज़ारे के लिए खेती कह सकते हैं? अपने उत्तर के कारण स्पष्ट कीजिए।
  3. कृषि उत्पादन में महिलाओं की भूमिका का विवरण दीजिए।
  4. विचाराधीन काल में मौद्रिक कारोबार की अहमियत की विवेचना उदाहरण देकर कीजिए।
  5. उन सबूतों की जाँच कीजिए जो ये सुझाते हैं कि मुग़ल राजकोषीय व्यवस्था के लिए भू-राजस्व बहुत महत्त्वपूर्ण था।

निम्नलिखित पर एक लघु निबंध लिखिए (लगभग 250-300 शब्दों में)

  1. आपके मुताबिक कृषि समाज में सामाजिक व आर्थिक संबंधों को प्रभावित करने में जाति किस हद तक एक कारक थी?
  2. सोलहवीं और सत्रहवीं सदी में जंगल वासियों की ज़िंदगी किस तरह बदल गई?
  3. मुग़ल भारत में ज़मींदारों की भूमिका की जाँच कीजिए।
  4. पंचायत और गाँव का मुखिया किस तरह से ग्रामीण समाज का नियमन करते थे? विवेचना कीजिए।

मानचित्र कार्य

  1. विश्व के बहिर्रेखा वाले नक्शे पर उन इलाकों को दिखाएँ जिनका मुग़ल साम्राज्य के साथ आर्थिक संपर्क था। इन इलाकों के साथ यातायात-मार्गों को भी दिखाएँ।

संकेत: अमेरिका (चाँदी) → यूरोप (फ्रांस, इंग्लैंड, पुर्तगाल, नीदरलैंड) → तुर्की/ऑटोमन → फ़ारस (सफ़ावी) → मोचा (लाल सागर), बसरा (फ़ारस की खाड़ी) → भारत; पूर्व में — पेगू-तानस्सेरी (म्यांमार), स्याम (थाईलैंड), सीलोन, मालदीव, मोज़ाम्बीक, जापान (डच), चीन (मिंग), अफ़ग़ानिस्तान (लोहानी ज़मीनी मार्ग)।

परियोजना कार्य (कोई एक)

  1. पड़ोस के एक गाँव का दौरा कीजिए। पता कीजिए कि वहाँ कितने लोग रहते हैं, कौन सी फ़सलें उगाई जाती हैं, कौन से जानवर पाले जाते हैं, कौन से दस्तकार समूह रहते हैं, महिलाएँ ज़मीन की मालिक हैं या नहीं, और वहाँ की पंचायत किस तरह काम करती है। सोलहवीं-सत्रहवीं सदी की जानकारी से तुलना करते हुए समानताएँ नोट कीजिए; परिवर्तन और निरंतरता दोनों की व्याख्या कीजिए।
  2. आइन का एक छोटा सा अंश चुन लीजिए (10 से 12 पृष्ठ, दी गई वेबसाइट पर उपलब्ध)। इसे ध्यान से पढ़िए और इस बात का ब्योरा दीजिए कि इसका इस्तेमाल एक इतिहासकार किस तरह से कर सकता है?

भाग 4 — शिक्षक-संदर्भ : सभी इन-टेक्स्ट प्रश्न व “चर्चा कीजिए”

🗣 “चर्चा कीजिए…” के छह प्रॉम्प्टध्यान

पृष्ठप्रॉम्प्ट
201इस अनुभाग की खेती-तकनीकें अध्याय 2 से कौन-सी मिलती-जुलती/भिन्न?
206ये पंचायतें आज की ग्राम पंचायतों से कैसे मिलती-जुलती/भिन्न?
207आपके प्रांत में कृषि भूमि पर महिलाओं-मर्दों की पहुँच में फ़र्क?
211आपके प्रांत के जंगल वाले इलाके; क्या ज़िंदगियाँ बदल रही हैं; वजहें वही या अलग?
213आज़ादी के बाद ज़मींदारी ख़त्म करने के कारण पहचानिए
215–216मुग़ल भू-राजस्व लचीली व्यवस्था? • वर्तमान राज्य में कृषि-कर; राजकोषीय नीतियों की तुलना

🔎 चित्र/स्रोत-आधारित इन-टेक्स्ट प्रश्न

पृष्ठप्रश्न
198बाबर को उत्तर भारत की ख़ासियत लगे कृषि जीवन के पहलू (स्रोत 1)
199बाबर के सिंचाई-साधनों की विजयनगर से तुलना; संसाधन; किसानों की भागीदारी (स्रोत 2)
201चित्र 8.3 — महिलाएँ-पुरुष क्या-क्या करते दिखाए गए हैं? गाँव की वास्तुकला का वर्णन
203चित्र 8.4 — चित्रकार ने गाँव के बुज़ुर्गों और कर अधिकारियों में फ़र्क कैसे डाला?
204चित्र 8.5 — कपड़ा उत्पादन की दर्शायी गतिविधियों का वर्णन
208चित्र 8.9 — शिकार और आदर्श न्याय-व्यवस्था को जोड़ने वाला सांकेतिक तत्व
209स्रोत 3 — जंगल में घुसपैठ के रूप; चित्र 8.9 से तुलना; ‘बिदेसी’ कौन
210स्रोत 4 — परिवहन के तरीक़े; मैदान से गई हर वस्तु का उपयोग
214स्रोत 5 — भूमि-वर्गीकरण के सिद्धांत; राजस्व-निर्धारण की विधि • मानचित्र — विस्तार का भू-राजस्व वसूली पर प्रभाव
215स्रोत 6 — हरेक प्रणाली में खेतिहरों पर फ़र्क • स्रोत 7 — विस्तृत सर्वेक्षण पर ज़ोर क्यों
219स्रोत 9 — अबुल फ़ज़्ल के स्रोतों की सूची; कृषि हेतु सबसे उपयोगी; अकबर-संबंध का असर

भाग 5 — अध्याय की समग्र दृष्टि (शिक्षक हेतु)

5.1 अध्याय के पाँच स्तंभ★★

#केंद्रीय विचारमुख्य प्रमाण
1किसान स्वयं मौन है — स्रोत ऊपर से बोलते हैं“किसान खुद नहीं लिखते”; आइन = “सत्ता के ऊँचे गलियारों का नज़रिया”; महिलाओं के नाम तक दर्ज नहीं
2खेती गुज़ारे और बाज़ार — दोनों के लिए थीजिन्स-ए-कामिल; 39-43-50 किस्में; नकद कर; सराफ़; निर्यात
3गाँव “छोटा गणराज्य” नहीं थाव्यक्तिगत मिल्कियत; जाति-जेंडर विषमता; अल्पतंत्र-पंचायत; नकद के रिश्ते
4गतिशीलता ही किसान की ताक़त थीबाबरनामा का बसना-उजड़ना; पाहि-काश्त; “गाँव छोड़कर भागना प्रभावी हथियार”; जंगल = रक्षाकवच
5राज्य-ज़मींदार-किसान का त्रिकोण सरल शोषण-कथा नहींज़मींदार शोषक भी, संरक्षक भी; भक्ति-संतों का निशाना राजस्व अधिकारी; विद्रोहों में ज़मींदार-किसान साथ

5.2 एक-पंक्ति तीर-शृंखलाएँ★

मुग़ल वंश-क्रम:

1526 बाबर → हुमायूँ (1530-40, 1555-56) → अकबर (1556-1605) → जहाँगीर (1605-27) → शाहजहाँ (1628-58) → औरंगज़ेब (1658-1707) → 1739 नादिरशाह → 1761 पानीपत-3 → 1765 दीवानी → 1857 ज़फ़र

भूमि-वर्ग (उपजाऊ से बंजर):

पोलज → परौती → चचर (3-4 वर्ष खाली) → बंजर (5+ वर्ष)

फ़सल-वसूली के तरीक़े:

कणकुत (अंदाज़ा) → बटाई/भाओली (कटाई बाद बँटवारा) → खेत बटाई (बुवाई बाद खेत बँटे) → लाँग बटाई (ढेर बाँटे)

आइन के पाँच दफ़्तर:

मंज़िल-आबादी → सिपह-आबादी → मुल्क-आबादी → (4-5) रीति-रिवाज + शुभ वचन

5.3 पाँच सामान्य भ्रांतियाँध्यान

भ्रांतिवास्तविकता
“मुग़लकालीन गाँव आत्मनिर्भर-बंद इकाई था”व्यापार, मुद्रा, बाज़ार, सराफ़, निर्यात — गाँव शहर व विश्व-अर्थव्यवस्था से जुड़ा था
“खेती केवल गुज़ारे के लिए थी”जिन्स-ए-कामिल, तिलहन-दलहन नकदी, राज्य-प्रोत्साहन — पेट भरना और व्यापार जुड़े हुए थे
“जजमानी 16वीं-17वीं सदी की सर्वव्यापी व्यवस्था थी”★NCERT: यह शब्द सोलहवीं-सत्रहवीं सदी में बहुत इस्तेमाल नहीं होता था — 18वीं सदी के बंगाल-स्रोतों से
“ज़मींदार = केवल शोषक”पारस्परिकता-पैतृकवाद-संरक्षण का पुट; बाज़ार बसाना, उधार; विद्रोहों में किसानों का साथ
“‘जंगली’ = असभ्य”★NCERT स्पष्ट — मतलब जंगल-उत्पाद, शिकार, स्थानांतरीय खेती से गुज़ारा — सभ्यता का न होना बिलकुल नहीं

5.4 अध्याय का सूत्र-वाक्य★

“मुग़ल साम्राज्य की बुनियाद क़िले नहीं, खेत थे — और उन खेतों में काम करने वाले करोड़ों हाथों की कहानी हमें उनकी अपनी आवाज़ में नहीं, राज्य के दस्तावेज़ों की दरारों से पढ़नी पड़ती है।”

भाग 6 — अतिरिक्त पठन (NCERT द्वारा सुझाया, पृ. 223)

लेखकवर्षकृतिप्रकाशक
सुमित गुहा1999एनवायरनमेंट एंड एथिनीसिटी इन इंडियाकैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस, कैम्ब्रिज
इरफान हबीब1999द अग्रेरियन सिस्टम ऑफ मुग़ल इंडिया 1556-1707 (सेकंड एडिशन)ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, न्यू दिल्ली
डब्ल्यू.एच. मोरलैंड1983 (पुनर्मुद्रण)इंडिया एट द डेथ ऑफ अकबर: एन इकोनॉमिक स्टडीओरियंटल, न्यू दिल्ली
तपन रायचौधरी एंड इरफान हबीब (संपा.)2004द कैम्ब्रिज इकोनॉमिक हिस्ट्री ऑफ इंडिया, वॉल्यूम 1ओरियंट लॉंगमैन, न्यू दिल्ली
डीटमर रोथरमंड1993एन इकोनॉमिक हिस्ट्री ऑफ इंडिया — फ्रॉम प्री-कोलोनियल टाइम्स टू 1991राउटलेज, लंदन
संजय सुब्रह्मण्यम (संपा.)1994मनी एंड दि मार्केट इन इंडिया 1100-1700ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, न्यू दिल्ली

NCERT द्वारा सुझाई वेबसाइट: http://persian.packhum.org (आइन का पाठ)


यह मास्टर फ़ाइल इस अध्याय की सभी अन्य सामग्रियों (पाठ योजना, रिवीजन नोट्स, प्रश्न बैंक, फ्लैशकार्ड, PARAKH प्रश्न बैंक, शिक्षक मार्गदर्शिका तथा प्रस्तुति) का एकमात्र आधार है।