पुस्तक: भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग-2 | पृष्ठ: 170–195 | कालावधि: लगभग चौदहवीं से सोलहवीं शताब्दी
भाग 0 — अध्याय को समझने की कुंजी
0.1 शीर्षक को तीन हिस्सों में पढ़िए
“एक साम्राज्य की राजधानी : विजयनगर”
| हिस्सा | संकेत |
|---|---|
| “एक साम्राज्य” | अध्याय राजनीतिक इतिहास भी है — वंश, नायक, युद्ध, पतन |
| “की राजधानी” | ★पर मुख्य विषय साम्राज्य नहीं, शहर है — यह एक नगर-अध्ययन है |
| “विजयनगर” | नाम स्वयं एक साक्ष्य है — “विजय का शहर”; शहर और साम्राज्य दोनों के लिए एक ही नाम |
★★शिक्षण-सूत्र: यह अध्याय “विजयनगर का इतिहास” नहीं, “विजयनगर को कैसे जाना गया” है। हर खंड में NCERT यह पूछती है — यह बात हमें कैसे पता चली? उत्तर बदलता रहता है: कभी पुरातत्त्व, कभी अभिलेख, कभी विदेशी यात्री, कभी लोक-स्मृति।
0.2 अध्याय का केंद्रीय तर्क — प्रस्तावना में ही★★
प्रस्तावना (पृ. 170) में NCERT चार बातें एक साथ कह देती है:
(क) एक नाम, दो अर्थ
“विजयनगर अथवा ‘विजय का शहर’ एक शहर और एक साम्राज्य, दोनों के लिए प्रयुक्त नाम था।”
(ख) उत्थान और विनाश
“इस साम्राज्य की स्थापना चौदहवीं शताब्दी में की गई थी। अपने चरमोत्कर्ष पर यह उत्तर में कृष्णा नदी से लेकर प्रायद्वीप के सुदूर दक्षिण तक फैला हुआ था। 1565 में इस पर आक्रमण कर इसे लूटा गया और बाद में यह उजड़ गया। हालाँकि सत्रहवीं–अठारहवीं शताब्दियों तक यह पूरी तरह से विनष्ट हो गया था…”
(ग) …पर स्मृति नहीं मरी
”…पर फिर भी कृष्णा-तुंगभद्रा दोआब क्षेत्र के निवासियों की स्मृतियों में यह जीवित रहा। उन्होंने इसे हम्पी नाम से याद रखा। इस नाम का आविर्भाव यहाँ की स्थानीय मातृदेवी पम्पादेवी के नाम से हुआ था।”
(घ) और पुनर्खोज पाँच प्रकार के स्रोतों से हुई
“इन मौखिक परंपराओं के साथ-साथ पुरातात्त्विक खोजों, स्थापत्य के नमूनों, अभिलेखों तथा अन्य दस्तावेज़ों ने विजयनगर साम्राज्य को पुन: खोजने में विद्वानों की सहायता की।”
★★इन चारों को मिलाकर अध्याय का पद्धति-सूत्र बनता है: “एक शहर भौतिक रूप से नष्ट हो सकता है, पर वह स्मृति में, पत्थर में और लिखित शब्द में बचा रह सकता है। इतिहासकार इन तीनों को जोड़कर ही उसे पुन: खड़ा करता है।”
🧭 अध्याय 1 (ईंटें, मनके तथा अस्थियाँ) से सीधा जोड़: वहाँ हड़प्पा को केवल पुरातत्त्व से जाना गया था, क्योंकि लिपि नहीं पढ़ी जा सकी। यहाँ विजयनगर को पुरातत्त्व + अभिलेख + यात्री-वृत्तांत + साहित्य + लोक-स्मृति — पाँच स्रोतों से जाना गया। साक्ष्य जितने अधिक, चित्र उतना समृद्ध — पर विरोधाभास भी उतने ही अधिक।
0.3 अध्याय की संरचना — एक ही शहर, तीन अंचल
★यह तालिका कक्षा के पहले दिन श्यामपट्ट पर बना दीजिए — इसके बिना खंड 3 से 6 बिखरे हुए लगते हैं।
| खंड | विषय | प्रकृति |
|---|---|---|
| §1 | हम्पी की खोज | इतिहास-लेखन (यह कैसे पता चला) |
| §2 | राय, नायक तथा सुल्तान | राजनीतिक इतिहास (2.1 व्यापार, 2.2 उत्थान-पतन, 2.3 अमर-नायक) |
| §3 | राजधानी तथा उसके परिप्रदेश | नगर-भूगोल (3.1 जल, 3.2 किलेबंदी, 3.3 शहरी केंद्र) |
| §4 | राजकीय केंद्र | सत्ता का स्थापत्य (4.1 महानवमी डिब्बा, 4.2 अन्य भवन) |
| §5 | धार्मिक केंद्र | धर्म और वैधता (5.1 राजधानी का चयन, 5.2 गोपुरम्-मण्डप) |
| §6 | महलों, मन्दिरों तथा बाज़ारों का अंकन | आधुनिक प्रलेखन (1976, 1980 का दशक) |
| §7 | उत्तरों की खोज में प्रश्न | साक्ष्य की सीमा (जो हम नहीं जान सकते) |
0.4 शहर के तीन अंचल — पूरे अध्याय की रीढ़★★★
यह अध्याय का सबसे महत्त्वपूर्ण एक विचार है। विद्यार्थी को यह याद हो जाए तो आधा अध्याय याद हो जाता है।
| अंचल | स्थिति | प्रमुख अवशेष | कार्य |
|---|---|---|---|
| धार्मिक केंद्र | तुंगभद्रा नदी के तट से लगा चट्टानी उत्तरी भाग | विरुपाक्ष मन्दिर, विट्ठल मन्दिर, रथ गलियाँ | पवित्र भूदृश्य — पम्पादेवी-विरुपाक्ष की मान्यता |
| शहरी केंद्र | धार्मिक और राजकीय केंद्र के बीच | आवास, चीनी मिट्टी के टुकड़े, मस्जिद-मक़बरे, छोटे मन्दिर | सामान्य जन-जीवन |
| राजकीय केंद्र | बस्ती का दक्षिण-पश्चिमी भाग | महानवमी डिब्बा, कमल महल, हाथियों का अस्तबल, हज़ार राम मन्दिर | सत्ता का प्रदर्शन |
★जोड़ने वाला तत्त्व: धार्मिक केंद्र और शहरी केंद्र के बीच एक कृषि क्षेत्र था, जिसे हिरिया नहर सींचती थी। यही NCERT का सबसे मौलिक निष्कर्ष है — “किलेबंदी के भीतर खेत”।
भाग 1 — खंड-दर-खंड विस्तृत नोट्स
§1. हम्पी की खोज (पृ. 170)
1.1 कर्नल कॉलिन मैकेन्जी — 1800 ई.
- हम्पी के भग्नावशेष 1800 ई. में एक अभियंता तथा पुराविद (Engineer and Antiquarian) — कर्नल कॉलिन मैकेन्जी (Colin Mackenzie) — द्वारा प्रकाश में लाए गए।
- मैकेन्जी ईस्ट इण्डिया कंपनी (East India Company) में कार्यरत थे।
- उन्होंने इस स्थान का पहला सर्वेक्षण मानचित्र (Survey Map) तैयार किया।
- ★उनकी शुरुआती जानकारी का स्रोत: विरुपाक्ष मंदिर तथा पम्पादेवी के पूजास्थल के पुरोहितों की स्मृतियाँ — अर्थात् आरंभ मौखिक परंपरा से हुआ, पुरातत्त्व से नहीं।
1.2 खोज के आगे के चरण
| वर्ष | घटना | स्रोत का प्रकार |
|---|---|---|
| 1800 | मैकेन्जी की यात्रा तथा पहला सर्वेक्षण मानचित्र | मानचित्रण + मौखिक स्मृति |
| 1836 से | अभिलेखकर्ताओं ने विरुपाक्ष तथा हम्पी के अन्य मंदिरों से कई दर्जन अभिलेख इकट्ठा करना आरंभ किया | अभिलेख (Inscriptions) |
| 1856 से | छाया चित्रकारों ने यहाँ के भवनों के चित्र संकलित करने आरंभ किए, जिससे शोधकर्ता उनका अध्ययन कर पाए | छायाचित्र (Photographs) |
1.3 पुनर्निर्माण की विधि — चार स्रोतों का मिलान★
इतिहासकारों ने शहर तथा साम्राज्य के इतिहास के पुनर्निर्माण के प्रयास में इन स्रोतों का मिलान किया:
| स्रोत | उदाहरण |
|---|---|
| 1. पुरातात्त्विक अवशेष | दीवारें, मंच, स्तंभ-आधार, चीनी मिट्टी के टुकड़े |
| 2. अभिलेख | मंदिरों को दिए गए दानों का विवरण, महत्त्वपूर्ण घटनाएँ |
| 3. विदेशी यात्रियों के वृत्तांत | निकोलो दे कॉन्ती, अब्दुर रज़्ज़ाक, पेस, नूनिज़ आदि |
| 4. स्थानीय साहित्य | तेलुगु, कन्नड़, तमिल तथा संस्कृत में लिखा गया साहित्य |
🔎 शिक्षण-बिंदु: ध्यान दीजिए कि साहित्य चार भाषाओं में है। यह स्वयं साम्राज्य की बहुभाषी प्रकृति का प्रमाण है — जिसे NCERT खंड 2 में दोहराती है।
स्रोत 1 (पृ. 171): “कॉलिन मैकेन्जी”
तथ्यात्मक विवरण
- जन्म 1754 ई.
- प्रसिद्धि अभियंता, सर्वेक्षक तथा मानचित्रकार (Engineer, Surveyor and Cartographer) के रूप में।
- 1815 में भारत का पहला सर्वेयर जनरल (First Surveyor General of India) बनाए गए।
- 1821 में अपनी मृत्यु तक वे इस पद पर रहे।
उनका उद्देश्य (उन्हीं के शब्दों में — दो उद्धरण)
- उन्होंने “भारत के अतीत को बेहतर ढंग से समझने और उपनिवेश के प्रशासन को आसान बनाने” के लिए इतिहास से संबंधित स्थानीय परंपराओं का संकलन तथा ऐतिहासिक स्थलों का सर्वेक्षण करना आरंभ किया।
- ★“ब्रिटिश प्रशासन के सुप्रभाव में आने से पहले दक्षिण भारत खराब प्रबंधन की दुर्गति से लंबे समय तक जूझता रहा।”
- ★विजयनगर के अध्ययन से उन्हें विश्वास हो गया कि कंपनी “स्थानीय लोगों के अलग-अलग कबीलों, जो इस समय भी जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा थे, को अब भी प्रभावित करने वाले इनमें से कई संस्थाओं, कानूनों तथा रीति-रिवाज़ों के विषय में बहुत महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ” हासिल कर सकती थी।
★★परीक्षा-दृष्टि (अत्यंत महत्त्वपूर्ण): यह स्रोत केवल “मैकेन्जी कौन थे” नहीं बताता — यह औपनिवेशिक ज्ञान-संग्रह (Colonial Knowledge Gathering) का उदाहरण है। ज्ञान और शासन का संबंध — मैकेन्जी ने इतिहास इसलिए नहीं खोजा कि इतिहास प्यारा था, बल्कि इसलिए कि शासन आसान हो। पहला उद्धरण स्पष्ट रूप से ब्रिटिश शासन को न्यायोचित ठहराने वाला है।
🧭 कक्षा में पूछिए: “यदि यही सर्वेक्षण किसी स्थानीय विद्वान ने किया होता, तो क्या वह भी यही वाक्य लिखता?”
चित्र 7.2 (पृ. 171): मैकेन्जी और उनके सहायक
- यह थॉमस हिकी (Thomas Hickey) द्वारा बनाए गए तैलचित्र (Oil Painting) का किसी अज्ञात चित्रकार द्वारा बनाया गया प्रतिरूप है।
- यह लगभग 1825 ई. का है और रॉयल एशियाटिक सोसायटी ऑफ़ ब्रिटेन एण्ड आयरलैण्ड के संकलन से संबद्ध है।
- चित्र में कौन-कौन है:
- मैकेन्जी के बायीं ओर — दूरबीन थामे उनका चपरासी स्नाजी
- दायीं ओर — उनके ब्राह्मण सहायक: एक जैन पंडित (दायीं ओर) और उनके पीछे तेलुगु ब्राह्मण कावलेरी वेन्तक लच्छमैया
🔎 इन-टेक्स्ट प्रश्न (पृ. 171): “मैकेन्जी और उनके देशज सूचनादाताओं को चित्रकार ने किस प्रकार चित्रित किया है? उनके तथा उनके सूचनादाताओं के विषय में दर्शकों पर किस प्रकार के विचार डालने का प्रयास किया गया है?”
शिक्षक-संकेत: मैकेन्जी केंद्र में, खड़े, चमकीली लाल वर्दी में, सीधे दर्शक को देखते हुए — सूचनादाता किनारे, हल्के रंगों में, सहायक की मुद्रा में। संदेश: ज्ञान भारतीयों से आया, पर श्रेय अंग्रेज़ को मिला। यह प्रश्न सीधे PARAKH के “दृष्टिकोण-विविधता” आयाम से जुड़ता है।
§2. राय, नायक तथा सुल्तान (पृ. 171–175)
2.1 साम्राज्य की स्थापना और स्वरूप
- परंपरा और अभिलेखीय साक्ष्यों के अनुसार विजयनगर साम्राज्य की स्थापना दो भाइयों — हरिहर और बुक्का — द्वारा 1336 में की गई थी।
- साम्राज्य की अस्थिर सीमाओं में अलग-अलग भाषाएँ बोलने वाले तथा अलग-अलग धार्मिक परंपराओं को मानने वाले लोग रहते थे।
! सावधानी (NCERT की अनिश्चितता-भाषा): काल-रेखा 1 में तिथि “1336?” लिखी है और नीचे नोट है — “प्रश्नचिह्न अनिश्चित तिथि की ओर संकेत करता है।” अर्थात् 1336 निश्चित नहीं, संभावित है। उत्तर लिखते समय यह सूक्ष्मता रखी जाए तो अंक बढ़ते हैं।
2.2 पड़ोसियों से संघर्ष — किसके लिए?
- अपनी उत्तरी सीमाओं पर विजयनगर शासकों ने अपने समकालीन राजाओं से संघर्ष किया, जिनमें थे:
- दक्कन के सुल्तान
- उड़ीसा के गजपति शासक
- ★संघर्ष का कारण (दो, और दोनों आर्थिक हैं):
- उर्वर नदी घाटियाँ
- लाभकारी विदेशी व्यापार से उत्पन्न संपदा पर अधिकार
★★अत्यंत महत्त्वपूर्ण: NCERT स्पष्ट कहती है कि संघर्ष धार्मिक नहीं, आर्थिक था। यही खंड 2.2 के अंत में दोहराया गया है। यह अध्याय का सबसे बड़ा भ्रांति-निवारण है।
- साथ ही इन राज्यों के बीच संपर्क से विचारों का आदान-प्रदान, विशेष रूप से स्थापत्य के क्षेत्र में, होने लगा।
- विजयनगर के शासकों ने अवधारणाओं और भवन निर्माण की तकनीकों को ग्रहण किया जिन्हें उन्होंने आगे और विकसित किया।
2.3 पूर्ववर्ती परंपराएँ — चोल और होयसाल
- इस साम्राज्य के कई भागों ने पहले शक्तिशाली राज्यों का विकास देखा था:
- तमिलनाडु में चोल
- कर्नाटक में होयसाल
- इन क्षेत्रों के शासक वर्ग ने विशाल मंदिरों को संरक्षण (Patronage) प्रदान किया था:
| मंदिर | स्थान | संरक्षक वंश |
|---|---|---|
| बृहदेश्वर मंदिर | तंजावुर | चोल |
| चन्नकेशव मंदिर | बेलूर | होयसाल |
- ★विजयनगर के शासकों, जो अपने आप को राय कहते थे, ने इन परंपराओं को आगे बढ़ाया और उन्हें नयी ऊँचाइयों तक पहुँचाया।
बॉक्स (पृ. 171): “कर्नाटक साम्राज्यमु”
जहाँ इतिहासकार ‘विजयनगर साम्राज्य’ शब्द का प्रयोग करते हैं, वहीं समकालीन लोगों ने उसे ‘कर्नाटक साम्राज्यमु’ की संज्ञा दी।
★शिक्षण-बिंदु: यह छोटा-सा बॉक्स एक बड़ा पद्धति-सिद्धांत छिपाए हुए है — इतिहास की शब्दावली आधुनिक इतिहासकारों की गढ़ी हुई होती है, समकालीन लोगों की नहीं। एक अंक का प्रश्न बहुत संभावित है।
बॉक्स (पृ. 172): “हाथी, घोड़े और लोग”
- गजपति का शाब्दिक अर्थ हाथियों का स्वामी होता है। पंद्रहवीं शताब्दी में उड़ीसा के एक शक्तिशाली शासक वंश का यही नाम था।
- ★विजयनगर की लोक प्रचलित परंपराओं में:
| पदवी | अर्थ | किसके लिए |
|---|---|---|
| अश्वपति | घोड़ों के स्वामी | दक्कन के सुल्तान |
| नरपति | लोगों के स्वामी | विजयनगर के राय |
| गजपति | हाथियों के स्वामी | उड़ीसा के शासक |
★शिक्षण-सूत्र (कक्षा में तुरंत लगने वाला): यह त्रिकोण दक्षिण भारत की तीन शक्तियों की आत्म-छवि है — घोड़ा = सुल्तान, हाथी = गजपति, मनुष्य = राय। तीनों ने अपनी सैनिक शक्ति के प्रतीक को ही अपनी पहचान बना लिया।
§2.1 शासक और व्यापारी (पृ. 172)
2.1.1 घोड़ों का व्यापार — युद्धकला की माँग
- ★मूल तर्क-शृंखला: इस काल में युद्धकला प्रभावशाली अश्वसेना (Cavalry) पर आधारित होती थी → इसलिए प्रतिस्पर्धी राज्यों के लिए अरब तथा मध्य एशिया से घोड़ों का आयात बहुत महत्त्वपूर्ण था।
- यह व्यापार आरंभिक चरणों में अरब व्यापारियों द्वारा नियंत्रित था।
- व्यापारियों के स्थानीय समूह, जिन्हें कुदिरई चेट्टी (Kudirai Chetti) अथवा घोड़ों के व्यापारी कहा जाता था, भी इन विनिमयों में भाग लेते थे।
2.1.2 पुर्तगालियों का प्रवेश — 1498 ई.
- 1498 ई. से कुछ और लोग पटल पर उभर कर आए — ये पुर्तगाली (Portuguese) थे।
- वे उपमहाद्वीप के पश्चिमी तट पर आए और व्यापारिक तथा सामरिक केंद्र स्थापित करने का प्रयास करने लगे।
- ★उनकी बेहतर सामरिक तकनीक, विशेष रूप से बंदूकों के प्रयोग ने उन्हें इस काल की उलझी हुई राजनीति में एक महत्त्वपूर्ण शक्ति बनकर उभरने में सहायता की।
2.1.3 विजयनगर के बाज़ार
- विजयनगर मसालों, वस्त्रों तथा रत्नों के अपने बाज़ारों के लिए प्रसिद्ध था।
- ऐसे शहरों के लिए व्यापार एक प्रतिष्ठा का मानक माना जाता था।
- यहाँ की समृद्ध जनता महँगी विदेशी वस्तुओं की माँग करती थी — विशेष रूप से रत्नों और आभूषणों की।
- दूसरी ओर व्यापार से प्राप्त राजस्व राज्य की समृद्धि में महत्त्वपूर्ण योगदान देता था।
★दो-तरफ़ा लाभ (परीक्षा-बिंदु): व्यापार से (क) जनता को विलासिता मिली, (ख) राज्य को राजस्व मिला। दोनों बिंदु अलग-अलग लिखे जाएँ।
स्रोत 2 (पृ. 173): “राजा और व्यापारी”
पृष्ठभूमि
- विजयनगर के सबसे प्रसिद्ध शासक कृष्णदेव राय (शासनकाल 1509–29) ने शासनकला के विषय में अमुक्तमाल्यद (Amuktamalyada) नामक तेलुगु भाषा में एक कृति लिखी।
उद्धरण (व्यापारियों के विषय में)
“एक राजा को अपने बन्दरगाहों को सुधारना चाहिए और वाणिज्य को इस प्रकार प्रोत्साहित करना चाहिए कि घोड़ों, हाथियों, रत्नों, चंदन, मोती तथा अन्य वस्तुओं का खुले तौर पर आयात किया जा सके… उसे प्रबंध करना चाहिए कि उन विदेशी नाविकों जिन्हें तूफ़ानों, बीमारी या थकान के कारण उनके देश में उतरना पड़ता है, की भली-भाँति देखभाल की जा सके… सुदूर देशों के व्यापारियों, जो हाथियों और अच्छे घोड़ों का आयात करते हैं, को रोज़ बैठक में बुलाकर, तोहफ़े देकर तथा उचित मुनाफ़े की स्वीकृति देकर अपने साथ संबद्ध करना चाहिए। ऐसा करने पर ये वस्तुएँ कभी भी तुम्हारे दुश्मनों तक नहीं पहुँचेंगी।”
★★स्रोत-विश्लेषण (बोर्ड में बार-बार पूछा गया): इस उद्धरण में चार नीतियाँ हैं — (1) बंदरगाहों का सुधार, (2) मुक्त आयात, (3) विदेशी नाविकों की सुरक्षा (आपदा में भी), (4) व्यापारियों को उपहार तथा उचित मुनाफ़ा। और अंतिम वाक्य उद्देश्य खोल देता है — यह परोपकार नहीं, सामरिक रणनीति है: घोड़े हमें मिलें, शत्रु को नहीं। आर्थिक नीति और सैनिक नीति एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
🔎 इन-टेक्स्ट प्रश्न (पृ. 173): “आपके विचार में राजा व्यापार को प्रोत्साहित करने का इच्छुक क्यों था? इन विनिमयों से किन समूहों को लाभ पहुँचा होगा?” संकेत: लाभ — (क) राज्य (राजस्व + घोड़े), (ख) अरब व पुर्तगाली व्यापारी, (ग) कुदिरई चेट्टी जैसे स्थानीय व्यापारी, (घ) समृद्ध नगरवासी, (ङ) बंदरगाह-नगरों के श्रमिक-नाविक।
§2.2 राज्य का चरमोत्कर्ष तथा पतन (पृ. 173–174)
2.2.1 चार राजवंश — सत्ता की शृंखला
- राजनीति में सत्ता के दावेदारों में शासकीय वंश के सदस्य तथा सैनिक कमांडर शामिल थे।
| क्रम | वंश | कब तक / विशेष |
|---|---|---|
| 1 | संगम वंश | पहला राजवंश; 1485 तक नियंत्रण रखा |
| 2 | सुलुव वंश | सैनिक कमांडर थे; संगमों को उखाड़ फेंका; 1503 तक सत्ता में रहे |
| 3 | तुलुव वंश | सुलुवों का स्थान लिया; ★कृष्णदेव राय तुलुव वंश से ही संबद्ध था |
| 4 | अरावीडु वंश | 1542 तक केंद्र पर नियंत्रण इनके हाथों में चला गया; सत्रहवीं शताब्दी के अंत तक सत्ता पर काबिज़ रहे |
★स्मरण-सूत्र: सं–सु–तु–अ (संगम → सुलुव → तुलुव → अरावीडु)। ध्यान दीजिए — दो बार सैनिक कमांडरों ने सत्ता छीनी। यह अध्याय के अमर-नायक प्रणाली की अंतर्निहित कमज़ोरी से सीधे जुड़ता है।
2.2.2 कृष्णदेव राय (शासनकाल 1509–29) — चरमोत्कर्ष
- ★उसके शासन की चारित्रिक विशेषता — विस्तार और दृढ़ीकरण (Expansion and Consolidation)।
सैनिक उपलब्धियाँ (तिथियाँ अक्षरश: याद रखें)
| वर्ष | उपलब्धि |
|---|---|
| 1512 | रायचूर दोआब (तुंगभद्रा और कृष्णा नदियों के बीच का क्षेत्र) हासिल किया गया |
| 1514 | उड़ीसा के शासकों का दमन किया गया |
| 1520 | बीजापुर के सुल्तान को बुरी तरह पराजित किया गया |
- हालाँकि राज्य हमेशा सामरिक रूप से तैयार रहता था, लेकिन फिर भी यह अतुलनीय शांति और समृद्धि की स्थितियों में फला-फूला।
निर्माण-कार्य
- कुछ बेहतरीन मंदिरों के निर्माण तथा कई महत्त्वपूर्ण दक्षिण भारतीय मंदिरों में भव्य गोपुरमों को जोड़ने का श्रेय कृष्णदेव को ही जाता है।
- उसने अपनी माँ के नाम पर विजयनगर के समीप ही नगलपुरम् नामक उपनगर की स्थापना भी की थी।
- ★विजयनगर के संदर्भ में सबसे विस्तृत विवरण कृष्णदेव राय के या उसके तुरंत बाद के कालों से प्राप्त होते हैं।
★★पद्धति-बिंदु (अत्यंत सूक्ष्म): इस अंतिम वाक्य का अर्थ है कि हमारा विजयनगर-ज्ञान असंतुलित है — हम साम्राज्य के चरमोत्कर्ष के बारे में बहुत जानते हैं, आरंभिक 170 वर्षों के बारे में बहुत कम। यह स्रोत की उपलब्धता से उत्पन्न पक्षपात (Source Bias) है।
2.2.3 पतन — 1529 से 1565 तक
- 1529 में कृष्णदेव की मृत्यु के पश्चात राजकीय ढाँचे में तनाव उत्पन्न होने लगा।
- उसके उत्तराधिकारियों को विद्रोही नायकों या सेनापतियों से चुनौती का सामना करना पड़ा।
- 1542 तक केंद्र पर नियंत्रण अरावीडु वंश के हाथों में चला गया, जो सत्रहवीं शताब्दी के अंत तक सत्ता पर काबिज़ रहे।
- पहले की ही तरह इस काल में भी विजयनगर शासकों और दक्कन सल्तनतों के शासकों की सामरिक महत्त्वाकांक्षाओं के चलते समीकरण बदलते रहे।
- अंतत: यह स्थिति विजयनगर के विरुद्ध दक्कन सल्तनतों के बीच मैत्री-समझौते के रूप में परिणत हुई।
2.2.4 1565 — राक्षसी-तांगड़ी का युद्ध★★
- 1565 में विजयनगर की सेना प्रधानमंत्री रामराय के नेतृत्व में राक्षसी-तांगड़ी (Rakshasi-Tangadi) — जिसे तालीकोटा (Talikota) के नाम से भी जाना जाता है — के युद्ध में उतरी।
- वहाँ उसे बीजापुर, अहमदनगर तथा गोलकुण्डा की संयुक्त सेनाओं द्वारा करारी शिकस्त मिली।
- विजयी सेनाओं ने विजयनगर शहर पर धावा बोलकर उसे लूटा।
- कुछ ही वर्षों के भीतर यह शहर पूरी तरह से उजड़ गया।
- अब साम्राज्य का केंद्र पूर्व की ओर स्थानांतरित हो गया, जहाँ अरावीडु राजवंश ने पेनुकोण्डा से और बाद में चन्द्रगिरी (तिरुपति के समीप) से शासन किया।
★तीन नाम एक साथ याद रखें: युद्ध के दो नाम (राक्षसी-तांगड़ी = तालीकोटा) और तीन विजेता सल्तनतें (बीजापुर + अहमदनगर + गोलकुण्डा)। एक-अंकीय प्रश्नों का पसंदीदा स्थल।
2.2.5 सुल्तान और राय — संबंध की जटिलता (पृ. 174)★★★
यह अध्याय का सबसे महत्त्वपूर्ण वैचारिक खंड है।
- हालाँकि विजयनगर शहर के विध्वंस के लिए सुल्तानों की सेनाएँ उत्तरदायी थीं, फिर भी सुल्तानों और रायों के संबंध धार्मिक भिन्नताएँ होने पर भी हमेशा या अपरिहार्य रूप से शत्रुतापूर्ण नहीं रहते थे।
चार प्रमाण जो NCERT देती है:
| # | प्रमाण |
|---|---|
| 1 | कृष्णदेव राय ने सल्तनतों में सत्ता के कई दावेदारों का समर्थन किया |
| 2 | उसने “यवन राज्य की स्थापना करने वाला” विरुद धारण करके गौरव महसूस किया |
| 3 | बीजापुर के सुल्तान ने कृष्णदेव राय की मृत्यु के पश्चात विजयनगर में उत्तराधिकार के विवाद को सुलझाने के लिए हस्तक्षेप किया |
| 4 | वास्तव में विजयनगर शासक और सल्तनतें दोनों ही एक-दूसरे के स्थायित्व को निश्चित करने की इच्छुक थीं |
- रामराय की जोखिम भरी नीति: उसने एक सुल्तान को दूसरे के विरुद्ध करने की कोशिश की, किंतु वे सुल्तान एक हो गए और उन्होंने उसे निर्णायक रूप से पराजित कर दिया।
★★★बोर्ड/UPSC-स्तरीय निष्कर्ष: मध्यकालीन दक्षिण भारत की राजनीति को “हिंदू बनाम मुसलमान” के ढाँचे में पढ़ना ऐतिहासिक रूप से ग़लत है। गठजोड़ धर्म से नहीं, सत्ता के हित से बनते-टूटते थे। NCERT का शब्द “अपरिहार्य रूप से (Inevitably) नहीं” बहुत सोच-समझकर चुना गया है।
विडंबना यह है कि जिस रामराय ने सुल्तानों की आपसी फूट का सबसे अधिक लाभ उठाया, वही उनकी एकता का शिकार बना।
बॉक्स (पृ. 174): “यवन”
यवन संस्कृत भाषा का शब्द है जिसका प्रयोग यूनानियों तथा उत्तर-पश्चिम से उपमहाद्वीप में आनेवाले अन्य लोगों के लिए किया जाता था।
§2.3 राय तथा नायक (पृ. 175)
2.3.1 नायक कौन थे?
- साम्राज्य में शक्ति का प्रयोग करने वालों में सेना प्रमुख होते थे जो:
- समान्यत: किलों पर नियंत्रण रखते थे
- जिनके पास सशस्त्र समर्थक होते थे
- ये प्रमुख आमतौर पर एक स्थान से दूसरे स्थान तक भ्रमणशील रहते थे।
- ★कई बार बसने के लिए उपजाऊ भूमि की तलाश में किसान भी उनका साथ देते थे।
- इन प्रमुखों को नायक कहते थे और ये आमतौर पर तेलुगु या कन्नड़ भाषा बोलते थे।
- कई नायकों ने विजयनगर शासक की प्रभुसत्ता के आगे समर्पण किया था, पर ये अक्सर विद्रोह कर देते थे और इन्हें सैनिक कार्रवाई के माध्यम से ही वश में किया जाता था।
2.3.2 अमर-नायक प्रणाली★★
- अमर-नायक प्रणाली विजयनगर साम्राज्य की एक प्रमुख राजनीतिक खोज (Major Political Innovation) थी।
- ★ऐसा प्रतीत होता है कि इस प्रणाली के कई तत्त्व दिल्ली सल्तनत की इक़्ता (Iqta) प्रणाली से लिए गए थे।
! NCERT की अनिश्चितता-भाषा: “ऐसा प्रतीत होता है” — यह निश्चित कथन नहीं। उत्तर में यही सावधानी रखें।
प्रणाली का कार्य-चक्र (छह चरणों में)
| चरण | क्या होता था |
|---|---|
| 1 | अमर-नायक सैनिक कमांडर थे, जिन्हें राय द्वारा प्रशासन के लिए राज्य-क्षेत्र दिये जाते थे |
| 2 | वे किसानों, शिल्पकर्मियों तथा व्यापारियों से भू-राजस्व तथा अन्य कर वसूल करते थे |
| 3 | वे राजस्व का कुछ भाग व्यक्तिगत उपयोग तथा घोड़ों और हाथियों के निर्धारित दल के रख-रखाव के लिए अपने पास रख लेते थे |
| 4 | ★ये दल विजयनगर शासकों को एक प्रभावी सैनिक शक्ति प्रदान करने में सहायक होते थे, जिसकी मदद से उन्होंने पूरे दक्षिणी प्रायद्वीप को अपने नियंत्रण में किया |
| 5 | राजस्व का कुछ भाग मन्दिरों तथा सिंचाई के साधनों के रख-रखाव के लिए खर्च किया जाता था |
| 6 | अमर-नायक राजा को वर्ष में एक बार भेंट भेजते थे और अपनी स्वामिभक्ति प्रकट करने के लिए राजकीय दरबार में उपहारों के साथ स्वयं उपस्थित हुआ करते थे |
- नियंत्रण का तरीक़ा: राजा कभी-कभी उन्हें एक से दूसरे स्थान पर स्थानांतरित कर उन पर अपना नियंत्रण दर्शाता था।
- ★★पर सत्रहवीं शताब्दी में इनमें से कई नायकों ने अपने स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिए। इस कारण केंद्रीय राजकीय ढाँचे का विघटन तेज़ी से होने लगा।
★★★केंद्रीय विरोधाभास (निबंधात्मक प्रश्न का हृदय): अमर-नायक प्रणाली ने साम्राज्य को बनाया भी और तोड़ा भी।
पक्ष परिणाम शक्ति नायकों की सेनाओं से पूरे दक्षिणी प्रायद्वीप पर नियंत्रण संभव हुआ दुर्बलता वही नायक जब चाहें स्वतंत्र हो सकते थे — और सत्रहवीं शताब्दी में हो गए कारण: सैनिक शक्ति केंद्र के पास नहीं, वितरित थी। यह विकेंद्रीकरण का अनिवार्य जोखिम है। इसी से मदुरई, तंजावुर, इक्केरी, मैसूर जैसे नायक राज्य निकले।
बॉक्स (पृ. 175): “अमर”
अमर शब्द का आविर्भाव मान्यतानुसार संस्कृत शब्द समर से हुआ है जिसका अर्थ है लड़ाई या युद्ध। यह फ़ारसी शब्द अमीर से भी मिलता-जुलता है जिसका अर्थ है — ऊँचे पद का कुलीन व्यक्ति।
★शिक्षण-बिंदु: एक ही शब्द की दो संभावित व्युत्पत्तियाँ — एक संस्कृत, एक फ़ारसी। यह स्वयं इस बात का प्रमाण है कि विजयनगर की राजनीतिक शब्दावली मिश्रित थी। यह “इक़्ता से तत्त्व लिए गए” वाले कथन को भाषिक समर्थन देता है।
🗣 चर्चा कीजिए… (पृ. 175)ध्यान
“मानचित्र 1 पर चन्द्रगिरी, मदुरई, इक्केरी, तंजावुर तथा मैसूर को चिह्नित कीजिए, ये सभी नायक शक्ति के केंद्र थे। यह भी चर्चा कीजिए कि नदियों और पहाड़ों ने किन मायनों में विजयनगर के साथ संचार को सरल अथवा बाधित किया।”
शिक्षक-संकेत (दोनों पक्ष):
| सरल किया | बाधित किया |
|---|---|
| नदी-घाटियाँ प्राकृतिक मार्ग बनीं; तुंगभद्रा-कृष्णा दोआब उपजाऊ और सुगम | पहाड़ी भूभाग ने सड़कों को घुमावदार बना दिया (खंड 3.2 देखें — “सड़कें घाटियों से होकर घूमती थीं”) |
| नदियों ने जल तथा सिंचाई दी, जिससे बड़ी बस्तियाँ संभव हुईं | नदियाँ सीमा-विवाद का कारण भी बनीं (रायचूर दोआब पर संघर्ष) |
| तट तक पहुँच से बंदरगाह व्यापार संभव हुआ | दूरस्थ नायक-केंद्रों पर केंद्र का नियंत्रण कठिन — यही विघटन का एक कारण बना |
§3. विजयनगर : राजधानी तथा उसके परिप्रदेश (पृ. 176–179)
- यह उस समय के सबसे प्रसिद्ध शहरों में से एक था।
- अधिकांश राजधानियों की तरह ही यह भी एक विशिष्ट भौतिक रूपरेखा (Physical Layout) तथा स्थापत्य शैली (Architectural Style) से अभिलक्षित थी।
बॉक्स (पृ. 176): “शहर के विषय में खोज” — स्रोतों की सूची
(क) अभिलेख
- विजयनगर के राजाओं तथा उनके नायकों के बड़ी संख्या में अभिलेख मिले हैं जिनमें:
- मन्दिरों को दिए जानेवाले दानों का उल्लेख
- महत्त्वपूर्ण घटनाओं का विवरण
(ख) यात्री-वृत्तांत — ★इन्हें तालिका में याद रखना सबसे आसान है:
| यात्री | देश/पहचान | शताब्दी |
|---|---|---|
| निकोलो दे कॉन्ती | इतालवी व्यापारी | पंद्रहवीं |
| अब्दुर रज़्ज़ाक | फ़ारस के राजा का दूत | पंद्रहवीं |
| अफ़ानासी निकितिन | रूस का व्यापारी | पंद्रहवीं |
| दुआर्ते बरबोसा | पुर्तगाल | सोलहवीं |
| डोमिंगो पेस | पुर्तगाल | सोलहवीं |
| फर्नाओ नूनिज़ | पुर्तगाल | सोलहवीं |
★★स्मरण-सूत्र: पंद्रहवीं शताब्दी = तीन अलग-अलग देश (इटली, फ़ारस, रूस)। सोलहवीं शताब्दी = तीनों पुर्तगाली (बरबोसा, पेस, नूनिज़)। यह विभाजन 1498 के पुर्तगाली आगमन से ठीक मेल खाता है — यही अभ्यास प्रश्न 10 (मानचित्र कार्य) का आधार है।
स्रोत 3 (पृ. 176): “विशाल, फैला हुआ शहर” — डोमिंगो पेस
“इस शहर का परिमाप मैं यहाँ नहीं लिख रहा हूँ क्योंकि यह एक स्थान से पूरी तरह नहीं देखा जा सकता, पर मैं एक पहाड़ पर चढ़ा जहाँ से मैं इसका एक बड़ा भाग देख पाया। मैं इसे पूरी तरह से नहीं देख पाया क्योंकि यह कई पर्वत शृंखलाओं के बीच स्थित है। वहाँ से मैंने जो देखा वह मुझे रोम जितना विशाल प्रतीत हुआ, और देखने में अत्यंत सुन्दर; इसमें पेड़ों के कई उपवन हैं, आवासों के बगीचों में, तथा पानी की कई नालियाँ जो इसमें आती हैं, तथा कई स्थानों पर झीलें हैं; तथा राजा के महल के समीप ही खजूर के पेड़ों का बगीचा तथा अन्य फल प्रदान करने वाले वृक्ष थे।”
★स्रोत-विश्लेषण: पेस के इस छोटे-से अंश में चार बातें हैं जो पूरे खंड 3 का पूर्वाभास देती हैं — (1) शहर इतना बड़ा कि एक नज़र में न समाए, (2) पहाड़ियों से घिरा (खंड 3.1 का भूगोल), (3) जल-प्रबंधन — नालियाँ और झीलें (खंड 3.1), (4) हरियाली और बग़ीचे — अर्थात् शहर के भीतर कृषि (खंड 3.2)।
साथ ही “रोम जितना विशाल” — एक यूरोपीय यात्री अपने पाठकों को परिचित पैमाना दे रहा है। यह तुलनात्मक विवरण की सीमा भी है और उसकी उपयोगिता भी।
🔎 इन-टेक्स्ट प्रश्न (पृ. 176): “क्या आप आज किसी शहर में ये अभिलक्षण देख सकते हैं? आपके विचार में पेस ने उद्यानों तथा जल-स्रोतों को विशेष-उल्लेख के लिए क्यों चुना?” संकेत: क्योंकि (क) उसके अपने देश (पुर्तगाल/यूरोप) के शहर इतने हरे-भरे नहीं थे, (ख) एक शुष्क प्रायद्वीपीय क्षेत्र में इतना जल-प्रबंध असाधारण उपलब्धि था, (ग) उद्यान और जल राजकीय वैभव के प्रतीक थे।
§3.1 जल-संपदा (पृ. 177)
3.1.1 प्राकृतिक भूगोल
- ★सबसे चौंकाने वाला तथ्य: विजयनगर की भौगोलिक स्थिति के विषय में सबसे चौंकाने वाला तथ्य तुंगभद्रा नदी द्वारा यहाँ निर्मित एक प्राकृतिक कुण्ड (Natural Basin) है।
- यह नदी उत्तर-पूर्व दिशा में बहती है।
- आस-पास का भूदृश्य रमणीय ग्रेनाइट की पहाड़ियों से परिपूर्ण है जो शहर के चारों ओर करधनी का निर्माण करती सी प्रतीत होती हैं।
- इन पहाड़ियों से कई जल-धाराएँ आकर नदी से मिलती हैं।
3.1.2 जल-प्रबंधन की आवश्यकता
- लगभग सभी धाराओं के साथ-साथ बाँध बनाकर अलग-अलग आकारों के हौज़ (Tanks) बनाए गए थे।
- ★चूँकि यह प्रायद्वीप के सबसे शुष्क क्षेत्रों में से एक था, इसलिए पानी के संचयन और इसे शहर तक ले जाने का व्यापक प्रबंध करना आवश्यक था।
★★यही अभ्यास प्रश्न 2 का मूल तर्क है: “विजयनगर की जल-आवश्यकताओं को किस प्रकार पूरा किया जाता था?” — उत्तर भूगोल की विडंबना से शुरू होना चाहिए: नदी पास थी, पर क्षेत्र शुष्क था।
3.1.3 दो प्रमुख जल-संरचनाएँ
| संरचना | काल | कार्य |
|---|---|---|
| कमलपुरम् जलाशय | पंद्रहवीं शताब्दी के आरंभिक वर्ष | इसके पानी से न केवल आस-पास के खेतों की सिंचाई होती थी, बल्कि इसे एक नहर के माध्यम से “राजकीय केंद्र” तक भी ले जाया गया था |
| हिरिया नहर | संभवत: संगम वंश के राजाओं द्वारा निर्मित | तुंगभद्रा पर बने बाँध से पानी लाया जाता था; इसका प्रयोग “धार्मिक केंद्र” से “शहरी केंद्र” को अलग करने वाली घाटी को सींचने में किया जाता था। ★आज भी भग्नावशेषों के बीच देखी जा सकती है |
★ध्यान दीजिए: दोनों संरचनाओं का दोहरा कार्य था — कृषि + नगर-आपूर्ति। कमलपुरम् जलाशय का जल राजकीय केंद्र तक जाता था, यह सत्ता की प्राथमिकता दर्शाता है।
स्रोत 4 (पृ. 177): “हौज़ों/जलाशयों का निर्माण किस प्रकार होता था?”
पृष्ठभूमि: कृष्णदेव राय द्वारा बनवाए गए जलाशय के विषय में पेस लिखता है:
“राजा ने एक जलाशय बनवाया… दो पहाड़ियों के मुख-विवर पर जिससे दोनों में से किसी पहाड़ी से आने वाला सारा जल वहाँ इकट्ठा हो, इसके अलावा जल 9 मील (लगभग 15 किमी) से भी अधिक की दूरी से आता है जो बाहरी शृंखला के निचले हिस्से के साथ-साथ बनाए गए पाइपों से आता है। यह जल एक झील से लाया जाता है जो छलकाव से खुद एक छोटी नदी में मिलती है। जलाशय में तीन विशाल स्तंभ बने हैं जिन पर खूबसूरती से चित्र उकेरे गए हैं; ये ऊपरी भाग में कुछ पाइपों से जुड़े हुए हैं जिनसे ये अपने बगीचों तथा धान के खेतों की सिंचाई के पानी लाते हैं। इस जलाशय को बनाने के लिए इस राजा ने एक पूरी पहाड़ी को तुड़वा दिया… जलाशय में मैंने इतने लोगों को कार्य करते देखा कि वहाँ पन्द्रह से बीस हज़ार आदमी थे, चींटियों की तरह…”
★★स्रोत-विश्लेषण (बहुत महत्त्वपूर्ण — अभ्यास प्रश्न 2 और खंड 7 दोनों से जुड़ता है):
तत्त्व उद्धरण से प्रमाण निष्कर्ष इंजीनियरी कौशल दो पहाड़ियों के मुख-विवर पर, 15 किमी दूर से पाइप उन्नत जल-अभियांत्रिकी का ज्ञान भूदृश्य का परिवर्तन “एक पूरी पहाड़ी को तुड़वा दिया” प्रकृति को बदलने की क्षमता = राजकीय शक्ति श्रम का पैमाना 15,000 से 20,000 आदमी विशाल श्रम-संगठन सौंदर्य-बोध “तीन विशाल स्तंभ… खूबसूरती से चित्र उकेरे” उपयोगी संरचना भी कलात्मक थी ! “चींटियों की तरह” — यह उपमा ध्यान से पढ़िए। पेस को श्रमिक अनगिनत और अनाम दिखे। यही खंड 7 का प्रश्न है — “वे लोग जिन्होंने अपना श्रम दान दिया, वे क्या सोचते थे?” स्रोत उन्हें गिनता है, पर बोलने नहीं देता।
चित्र 7.5 (पृ. 177)
राजकीय केंद्र की ओर जाती एक कृत्रिम जल प्रणाली — यह चित्र कमलपुरम् जलाशय से राजकीय केंद्र तक जल ले जाने वाली नहर का दृश्य प्रमाण है।
§3.2 किलेबंदियाँ तथा सड़कें (पृ. 177–178)
3.2.1 अब्दुर रज़्ज़ाक का विवरण
- पंद्रहवीं शताब्दी में फ़ारस के शासक द्वारा कालीकट (कोज़ीकोड) भेजा गया दूत अब्दुर रज़्ज़ाक किलेबंदी से बहुत प्रभावित हुआ।
- उसने दुर्गों की सात पंक्तियों का उल्लेख किया।
- ★इनसे न केवल शहर को बल्कि कृषि में प्रयुक्त आसपास के क्षेत्र तथा जंगलों को भी घेरा गया था।
3.2.2 सबसे बाहरी दीवार का निर्माण-कौशल
| विशेषता | विवरण |
|---|---|
| विस्तार | शहर के चारों ओर बनी पहाड़ियों को आपस में जोड़ती थी |
| स्वरूप | विशाल राजगिरी (Masonry) संरचना, थोड़ी सी शुण्डाकार (Tapering) |
| ★गारा | गारे या जोड़ने के लिए किसी भी वस्तु का निर्माण में कहीं भी प्रयोग नहीं किया गया था |
| ★तकनीक | पत्थर के टुकड़े फानाकार (Wedge-shaped) थे, जिसके कारण वे अपने स्थान पर टिके रहते थे |
| भीतरी भाग | दीवारों के अंदर का भाग मिट्टी और मलवे के मिश्रण से बना हुआ था |
| बुर्ज | वर्गाकार तथा आयताकार बुर्ज बाहर की ओर निकले हुए थे |
★★यह “गारा-रहित फानाकार चिनाई” वाला बिंदु परीक्षा में बहुत पूछा जाता है। एक-अंकीय और तीन-अंकीय, दोनों में।
3.2.3 किलेबंदी के भीतर खेत — अध्याय का सबसे मौलिक तर्क★★★
- इस किलेबंदी की सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह थी कि इससे खेतों को भी घेरा गया था।
दो प्रत्यक्षदर्शी प्रमाण:
- अब्दुर रज़्ज़ाक: “पहली, दूसरी और तीसरी दीवारों के बीच जुते हुए खेत, बग़ीचे तथा आवास हैं।”
- पेस: “इस पहली परिधि से शहर में प्रवेश करने तक की दूरी बहुत है, जिसमें खेत हैं जहाँ वे धान उगाते हैं और कई उद्यान हैं और बहुत जल जो दो झीलों से लाया जाता है।”
पुरातात्त्विक पुष्टि:
- ★इन कथनों की आज के पुरातत्त्वविदों द्वारा पुष्टि की गई है, जिन्होंने धार्मिक केंद्र तथा नगरीय केंद्र के बीच एक कृषि क्षेत्र के साक्ष्य खोज निकाले हैं।
- यह क्षेत्र एक व्यापक नहर प्रणाली के माध्यम से सींचा जाता था, जिसमें तुंगभद्रा से जल लाया जाता था।
★★★यही पद्धति का सर्वोत्तम उदाहरण है: लिखित स्रोत (दो यात्री) + पुरातात्त्विक साक्ष्य = विश्वसनीय निष्कर्ष। जब दो स्वतंत्र स्रोत एक ही बात कहें और खुदाई भी वही दिखाए, तब इतिहासकार निश्चिंत होता है। कक्षा में यह “स्रोतों का मिलान (Corroboration)” का आदर्श उदाहरण है।
3.2.4 ऐसा क्यों किया गया? — घेराबंदी की रणनीति
- इन-टेक्स्ट प्रश्न (पृ. 178): “आपके विचार में कृषि-क्षेत्रों को क़िलेबंद भूभाग में क्यों समाहित किया जाता था?”
NCERT का उत्तर (तर्क-शृंखला):
| चरण | कथन |
|---|---|
| 1 | अक्सर मध्यकालीन घेराबंदियों का मुख्य उद्देश्य प्रतिपक्ष को खाद्य सामग्री से वंचित कर समर्पण के लिए बाध्य करना होता था |
| 2 | ये घेराबंदियाँ कई महीनों और यहाँ तक कि वर्षों तक चल सकती थीं |
| 3 | आम तौर पर शासक ऐसी परिस्थितियों से निपटने के लिए किलेबंद क्षेत्रों के भीतर ही विशाल अनाजगार (Granaries) का निर्माण करवाते थे |
| 4 | ★विजयनगर के शासकों ने पूरे कृषि भूभाग को बचाने के लिए एक अधिक महँगी तथा व्यापक नीति को अपनाया |
★★यही अभ्यास प्रश्न 3 है — “शहर के किलेबंद क्षेत्र में कृषि क्षेत्र को रखने के आपके विचार में क्या फ़ायदे और नुकसान थे?”
फ़ायदे नुकसान लंबी घेराबंदी में भी खाद्य आत्मनिर्भरता निर्माण-लागत बहुत अधिक (NCERT का शब्द: “अधिक महँगी”) किसान और जल-स्रोत सुरक्षित रक्षा-रेखा बहुत लंबी → अधिक सैनिकों की आवश्यकता नगर को निरंतर आपूर्ति, अकाल का भय कम कमज़ोर बिंदु अधिक — जितनी लंबी दीवार, उतने अधिक द्वार शासक की दूरदर्शिता का प्रदर्शन = वैधता रख-रखाव का स्थायी आर्थिक बोझ
3.2.5 दूसरी और तीसरी किलेबंदी
- दूसरी किलेबंदी — नगरीय केंद्र के आंतरिक भाग के चारों ओर बनी हुई थी।
- तीसरी किलेबंदी — इससे शासकीय केंद्र को घेरा गया था, जिसमें महत्त्वपूर्ण इमारतों के प्रत्येक समूह को अपनी ऊँची दीवारों से घेरा गया था।
★स्मरण-सूत्र: किलेबंदी बाहर से भीतर की ओर तीन घेरे — (1) खेत+जंगल+शहर, (2) नगरीय केंद्र, (3) शासकीय केंद्र → और उसके भीतर भी हर इमारत-समूह की अपनी दीवार। सुरक्षा की परतें भीतर जाते-जाते सघन होती जाती हैं।
3.2.6 प्रवेशद्वार और इंडो-इस्लामिक स्थापत्य
- दुर्ग में प्रवेश के लिए अच्छी तरह सुरक्षित प्रवेशद्वार थे जो शहर को मुख्य सड़कों से जोड़ते थे।
- प्रवेशद्वार स्थापत्य के विशिष्ट नमूने थे जो अक्सर उन संरचनाओं को परिभाषित करते थे जिनमें प्रवेश को वे नियंत्रित करते हैं।
- ★किलेबंद बस्ती में जाने के लिए बने प्रवेशद्वार पर बनी मेहराब (Arch) और साथ ही द्वार के ऊपर बनी गुंबद (Dome) (चित्र 7.6) तुर्की सुल्तानों द्वारा प्रवर्तित स्थापत्य के चारित्रिक तत्त्व माने जाते हैं।
- ★★कला-इतिहासकार इस शैली को इंडो-इस्लामिक (हिंद-इस्लामी) कहते हैं क्योंकि इसका विकास विभिन्न क्षेत्रों की स्थानीय स्थापत्य की परंपराओं के साथ संपर्क से हुआ।
🔎 इन-टेक्स्ट प्रश्न (पृ. 178): “इन दो प्रवेश-द्वारों के बीच समानताओं तथा विभिन्नताओं का वर्णन कीजिए। आपके विचार में विजयनगर के शासकों ने इण्डो-इस्लामी स्थापत्य के तत्त्वों को क्यों अपनाया?”
शिक्षक-संकेत: क्योंकि (क) मेहराब और गुंबद तकनीकी रूप से श्रेष्ठ थे — बड़ा खुला स्थान संभव, (ख) यह शैली उस समय सत्ता और आधुनिकता का प्रतीक थी, (ग) दक्कन सल्तनतों से निरंतर संपर्क था — विचारों का आदान-प्रदान स्वाभाविक था (खंड 2 का कथन याद कीजिए), (घ) यह धार्मिक विरोध नहीं, सांस्कृतिक ग्रहण था — जो खंड 2.2.5 के निष्कर्ष को पुष्ट करता है।
3.2.7 सड़कें
- पुरातत्त्वविदों ने शहर के अंदर की तथा वहाँ से बाहर जाने वाली सड़कों का अध्ययन किया है।
- इनकी पहचान — प्रवेशद्वारों से होकर जाने वाले रास्तों के अनुरेखण तथा फर्श वाली सड़कों की खोजों से की गई है।
- ★सड़कें सामान्यत: पहाड़ी भूभाग से बचकर घाटियों से होकर ही इधर-उधर घूमती थीं।
- सबसे महत्त्वपूर्ण सड़कों में से कई मंदिर के प्रवेशद्वारों से आगे बढ़ी हुई थीं और इनके दोनों ओर बाज़ार थे।
★जोड़: यह वाक्य खंड 5.2 की “रथ गलियों” से सीधे मिलता है। मंदिर = धार्मिक केंद्र + आर्थिक केंद्र। पवित्रता और वाणिज्य एक ही सड़क पर।
§3.3 शहरी केंद्र (पृ. 178–179)
3.3.1 साक्ष्य की विषमता
- ★शहरी केंद्र की ओर जाने वाली सड़कों पर चलें तो सामान्य लोगों के आवासों के अपेक्षाकृत कम पुरातात्त्विक साक्ष्य हैं।
★★यह वाक्य पूरे अध्याय की सबसे बड़ी सीमा है — हम महलों और मंदिरों के बारे में बहुत जानते हैं, सामान्य जन के बारे में बहुत कम। कारण: महल पत्थर के थे, आम आवास मिट्टी और छप्पर के। यह साक्ष्य का पक्षपात (Bias of Evidence) है, न कि तत्कालीन समाज का सच्चा चित्र।
3.3.2 अमीर व्यापारियों के आवास
- कुछ स्थानों, जिनमें शहरी केंद्र का उत्तर-पूर्वी कोना भी शामिल है, में परिष्कृत चीनी मिट्टी (Fine Chinese Porcelain) पाई गई है।
- पुरातत्त्वविदों का सुझाव है कि हो सकता है इन स्थानों में अमीर व्यापारी रहते हों।
! अनिश्चितता-भाषा: “हो सकता है”, “सुझाव है” — निष्कर्ष नहीं, अनुमान। यह आयातित विलासिता की वस्तु से सामाजिक स्तर का अनुमान लगाने का उदाहरण है।
3.3.3 मुस्लिम रिहायशी मुहल्ला
- ★यह मुस्लिम रिहायशी मुहल्ला भी था।
- यहाँ स्थित मक़बरों तथा मस्जिदों के विशिष्ट कार्य हैं, फिर भी उनका स्थापत्य हम्पी में मिले मन्दिरों के मण्डपों के स्थापत्य से मिलता-जुलता है।
★★★यह वाक्य अध्याय के सबसे महत्त्वपूर्ण वाक्यों में से एक है। भवन का कार्य अलग (मस्जिद/मक़बरा बनाम मंदिर), पर स्थापत्य-भाषा साझा। अर्थात् कारीगर, तकनीक और सौंदर्य-बोध साझा थे, चाहे संरक्षक अलग-अलग धर्मों के हों। यह खंड 2.2.5 (सुल्तान-राय संबंध) का भौतिक प्रमाण है।
3.3.4 सामान्य लोगों के आवास — बरबोसा का विवरण
- सामान्य लोगों के आवास, जो अब अस्तित्व में नहीं हैं, का सोलहवीं शताब्दी का पुर्तगाली यात्री बरबोसा कुछ इस प्रकार वर्णन करता है:
“लोगों के अन्य आवास छप्पर के हैं, पर फिर भी सुदृढ़ हैं, और व्यवसाय के आधार पर कई खुले स्थानों वाली लंबी गलियों में व्यवस्थित हैं।”
★दो निष्कर्ष: (1) छप्पर के आवास → इसीलिए आज कोई अवशेष नहीं, (2) व्यवसाय के आधार पर गलियाँ → व्यावसायिक आधार पर बस्ती का संगठन, अर्थात् एक सुव्यवस्थित नगर-समाज।
3.3.5 क्षेत्र-सर्वेक्षण के निष्कर्ष
- क्षेत्र-सर्वेक्षण इंगित करते हैं कि इस पूरे क्षेत्र में बहुत से पूजा स्थल और छोटे मन्दिर थे जो विविध प्रकार के संप्रदायों, जो संभवत: विभिन्न समुदायों द्वारा संरक्षित थे, के प्रचलन की ओर संकेत करते हैं।
- सर्वेक्षणों से यह भी इंगित होता है कि कुएँ, बरसात के पानी वाले जलाशय और साथ ही मन्दिरों के जलाशय संभवत: सामान्य नगर निवासियों के लिए पानी के स्रोत का कार्य करते थे।
चित्र 7.8, 7.9, 7.10 (पृ. 179)
- चित्र 7.8 — उत्खनित पटरी का एक भाग
- चित्र 7.9 — चीनी मिट्टी के बर्तनों के टुकड़े | 🔎 प्रश्न: “आपके विचार में ये टुकड़े मूलत: किस प्रकार के बर्तनों का हिस्सा थे?”
- चित्र 7.10 — विजयनगर में एक मस्जिद | 🔎 प्रश्न: “क्या इस मस्जिद में इण्डो-इस्लामी स्थापत्य के चारित्रिक तत्व विद्यमान हैं?”
🗣 चर्चा कीजिए… (पृ. 179)ध्यान
“विजयनगर की रूपरेखा की तुलना अपने नगर या गाँव की रूपरेखा से कीजिए।”
शिक्षक-संकेत (तुलना के बिंदु): जल-स्रोत कहाँ हैं • बाज़ार किस मार्ग पर है • धार्मिक स्थल केंद्र में या किनारे • प्रशासनिक भवन कहाँ • क्या व्यवसाय के आधार पर मुहल्ले बँटे हैं (जैसे सुनारों का बाज़ार, कुम्हारों का मुहल्ला) • क्या कोई पुरानी दीवार/द्वार बचा है।
राजस्थान-संदर्भ: जयपुर, जोधपुर, बीकानेर, उदयपुर — परकोटा (नगर-प्राचीर), दरवाज़े, बावड़ियाँ, व्यवसाय-आधारित मुहल्ले — विद्यार्थियों के लिए यह तुलना बहुत जीवंत होती है।
§4. राजकीय केंद्र (पृ. 179–183)
4.1 स्थिति और स्वरूप
- राजकीय केंद्र बस्ती के दक्षिण-पश्चिमी भाग में स्थित था।
- ★हालाँकि इसे राजकीय केंद्र की संज्ञा दी गई है, पर इसमें 60 से भी अधिक मन्दिर सम्मिलित थे।
- स्पष्टत: मन्दिरों और संप्रदायों को प्रश्रय देना शासकों के लिए महत्त्वपूर्ण था, जो इन देव-स्थलों में प्रतिष्ठित देवी-देवताओं से संबंध के माध्यम से अपनी सत्ता को स्थापित करने तथा वैधता प्रदान करने का प्रयास कर रहे थे।
- लगभग तीस संरचनाओं की पहचान महलों के रूप में की गई है। ये अपेक्षाकृत बड़ी संरचनाएँ हैं जो आनुष्ठानिक कार्यों से संबद्ध नहीं होतीं।
4.2 मंदिर और धर्मेतर भवन में निर्माण का अंतर★★
| प्रकार | निर्माण-सामग्री |
|---|---|
| मंदिर | पूरी तरह से राजगिरी (पत्थर की चिनाई) से निर्मित |
| धर्मेतर भवन (महल आदि) | अधिरचना विकारी (नाशवान) वस्तुओं से बनाई गई |
★★★यह छोटा-सा वाक्य पूरे अध्याय की व्याख्या-कुंजी है। इसी कारण —
- मंदिर आज भी खड़े हैं, महल केवल आधार (मंच) के रूप में बचे हैं
- हम धार्मिक जीवन के बारे में बहुत जानते हैं, राजकीय दैनिक जीवन के बारे में बहुत कम
- खंड 6 का उद्धरण (फ़्रिट्ज़, मिशेल, नागराज राव) इसी की पुष्टि करता है — लकड़ी की पूरी श्रेणी की कल्पना करनी पड़ती है
कक्षा में पूछिए: “क्या इसका अर्थ यह है कि विजयनगर में धर्म राजनीति से अधिक महत्त्वपूर्ण था? या केवल यह कि पत्थर लकड़ी से अधिक टिकाऊ है?” — यही ऐतिहासिक विवेक की परीक्षा है।
§4.1 महानवमी डिब्बा (पृ. 180–181)
4.1.1 नामकरण की समस्या
- इस क्षेत्र की कुछ अधिक विशिष्ट संरचनाओं का नामकरण भवनों के आकार और साथ ही उनके कार्यों के आधार पर किया गया है।
- ★“राजा का भवन” नामक संरचना अंत:क्षेत्र में सबसे विशाल है, परंतु इसके राजकीय आवास होने का कोई निश्चित साक्ष्य नहीं मिला है।
! यह वाक्य याद रखिए — नाम आधुनिक विद्वानों के दिए हुए हैं, तत्कालीन नहीं। यही अभ्यास प्रश्न 6 का आधार है।
4.1.2 दो प्रभावशाली मंच
- इसके दो सबसे प्रभावशाली मंच हैं, जिन्हें सामान्यत: “सभा मंडप” तथा “महानवमी डिब्बा” कहा जाता है।
- पूरा क्षेत्र ऊँची दोहरी दीवारों से घिरा है और इनके बीच में एक गली है।
(क) सभा मंडप
- एक ऊँचा मंच है जिसमें पास-पास तथा निश्चित दूरी पर लकड़ी के स्तंभों के लिए छेद बने हुए हैं।
- इसमें दूसरी मंज़िल, जो इन स्तंभों पर टिकी थी, तक जाने के लिए सीढ़ी बनी हुई थी।
- ★स्तंभों के एक दूसरे से बहुत पास-पास होने से बहुत कम खुला स्थान बचता होगा और इसलिए यह स्पष्ट नहीं है कि यह मंडप किस प्रयोजन के लिए बनाया गया था।
(ख) महानवमी डिब्बा
| विशेषता | विवरण |
|---|---|
| स्थिति | शहर के सबसे ऊँचे स्थानों में से एक पर स्थित |
| स्वरूप | विशालकाय मंच |
| ★आकार | लगभग 11,000 वर्ग फीट के आधार से 40 फीट की ऊँचाई तक जाता है |
| ऊपरी संरचना | ऐसे साक्ष्य मिले हैं जिनसे पता चलता है कि इस पर एक लकड़ी की संरचना बनी थी |
| आधार | मंच का आधार उभारदार उत्कीर्णन (Relief Carvings) से पटा पड़ा है (चित्र 7.12) |
★संख्या याद रखें: 11,000 वर्ग फीट × 40 फीट। यह एक अंक के प्रश्न के लिए आदर्श है और [big] स्लाइड के लिए भी।
4.1.3 महानवमी का त्यौहार★★
- इस संरचना से जुड़े अनुष्ठान, संभवत:, सितंबर तथा अक्टूबर के शरद मासों में मनाए जाने वाले दस दिन के हिंदू त्यौहार के महानवमी (शाब्दिक अर्थ — महान नवाँ दिवस) के अवसर पर निष्पादित किए जाते थे।
त्यौहार के क्षेत्रीय नाम (★तालिका में याद रखें):
| क्षेत्र | नाम |
|---|---|
| उत्तर भारत | दशहरा |
| बंगाल | दुर्गा पूजा |
| प्रायद्वीपीय भारत | नवरात्री अथवा महानवमी |
- इस अवसर पर विजयनगर शासक अपने रुतबे, ताक़त तथा अधिराज्य का प्रदर्शन करते थे।
अनुष्ठान और आयोजन (चार श्रेणियों में):
| श्रेणी | विवरण |
|---|---|
| धर्मानुष्ठान | मूर्ति की पूजा, राज्य के अश्व की पूजा, तथा भैंसों और अन्य जानवरों की बलि |
| मनोरंजन/प्रतिस्पर्धा | नृत्य, कुश्ती प्रतिस्पर्धा |
| शोभायात्रा | साज़ लगे घोड़ों, हाथियों तथा रथों और सैनिकों की शोभायात्रा |
| राजनीतिक अनुष्ठान | प्रमुख नायकों तथा अधीनस्थ राजाओं द्वारा राजा और उसके अतिथियों को दी जाने वाली औपचारिक भेंट |
- ★इन उत्सवों के गहन सांकेतिक अर्थ थे।
- त्यौहार के अंतिम दिन राजा अपनी तथा अपने नायकों की सेना का खुले मैदान में आयोजित भव्य समारोह में निरीक्षण करता था।
- इस अवसर पर नायक, राजा के लिए बड़ी मात्रा में भेंट तथा साथ ही नियत कर भी लाते थे।
★★★यही अभ्यास प्रश्न 4 का हृदय है — “आपके विचार में महानवमी डिब्बा से संबद्ध अनुष्ठानों का क्या महत्त्व था?”
चार स्तरीय उत्तर:
स्तर महत्त्व धार्मिक देवी की पूजा से दैवीय स्वीकृति — राजा ईश्वर का प्रतिनिधि राजनीतिक नायकों की उपस्थिति स्वयं स्वामिभक्ति की सार्वजनिक घोषणा थी आर्थिक भेंट + नियत कर — यह एक राजस्व-संग्रह का अवसर भी था सैनिक सेना का निरीक्षण — शक्ति का प्रदर्शन, मित्र और शत्रु दोनों के लिए संदेश ★एक वाक्य में: “महानवमी उत्सव वह अवसर था जब धर्म, राजस्व और सेना — तीनों एक साथ, एक ही मंच पर, सबके सामने प्रदर्शित होते थे।”
4.1.4 अनसुलझी पहेली★
- क्या “महानवमी डिब्बा” जो आज अस्तित्व में है, वह इस विस्तृत अनुष्ठान का केंद्र था?
- विद्वानों का मानना है कि संरचना के चारों ओर का स्थान सशस्त्र आदमियों, औरतों तथा बड़ी संख्या में जानवरों की शोभायात्रा के लिए पर्याप्त नहीं था।
- राजकीय केंद्र में स्थित कई और संरचनाओं की तरह यह भी एक पहेली बना हुआ है।
★★NCERT की ईमानदारी: पुस्तक अपने ही निष्कर्ष पर प्रश्नचिह्न लगाती है। यह अध्याय का चरित्र है — निश्चितता से अधिक जिज्ञासा। उत्तर में यह अनिश्चितता अवश्य लिखी जाए।
बॉक्स (पृ. 180): “विजय का एक भवन?”
पृष्ठभूमि: सभा मंडप तथा महानवमी डिब्बा को पेस संयुक्त रूप से “विजय का भवन” की संज्ञा देता है। उसके विषय में वह लिखता है:
“इन संरचनाओं में एक के ऊपर एक, दो मंच हैं, सुंदरता से चित्रित… ऊपरी मंच पर… इस विजय के भवन में राजा ने कपड़े से बना एक कमरा बनवाया है… जहाँ मूर्ति का एक पूजा स्थल है… और एक अन्य में बीच में एक चबूतरा रखा हुआ है, जिस पर राज्य का सिंहासन खड़ा हुआ है, (मुकुट तथा राजकीय पायल)…”
★स्रोत-विश्लेषण: पेस के इस विवरण से तीन बातें निकलती हैं जो पुरातत्त्व से नहीं मिल सकतीं — (1) मंच चित्रित (रंगीन) थे — आज केवल भूरा पत्थर दिखता है; (2) ऊपर कपड़े का कमरा बनाया जाता था — कोई अवशेष नहीं बचता; (3) वहाँ मूर्ति का पूजा-स्थल और राज्य का सिंहासन दोनों थे — अर्थात् देवता और राजा एक ही मंच पर।
यही यात्री-वृत्तांत की अपूरणीय उपयोगिता है — वह वही बताता है जो नष्ट हो चुका है।
🔎 इन-टेक्स्ट प्रश्न (पृ. 180, चित्र 7.12)
“क्या आप इन चित्रों के विषयों को पहचान सकते हैं?” — मंच के आधार पर उत्कीर्णित पटलों में हाथी, घोड़े, सैनिक, नर्तक, शोभायात्रा के दृश्य हैं, जो ऊपर वर्णित महानवमी-अनुष्ठानों से ठीक मेल खाते हैं — अर्थात् पत्थर पर उत्कीर्ण चित्र और पेस का लिखित विवरण एक-दूसरे की पुष्टि करते हैं।
§4.2 राजकीय केंद्र में स्थित अन्य भवन (पृ. 181–183)
4.2.1 लोटस महल (कमल महल)★
- राजकीय केंद्र के सबसे सुंदर भवनों में एक लोटस (कमल) महल है।
- ★इसका यह नामकरण उन्नीसवीं शताब्दी के अंग्रेज़ यात्रियों ने किया था।
- हालाँकि यह नाम निश्चित रूप से रोमांचक है, लेकिन इतिहासकार इस बारे में निश्चित नहीं हैं कि यह भवन किस कार्य के लिए बना था।
- एक सुझाव, जो मैकेन्जी द्वारा बनाए गए मानचित्र से लिया गया है, यह है कि यह परिषदीय सदन (Council Chamber) था जहाँ राजा अपने परामर्शदाताओं से मिलता था।
स्थापत्य-विशेषताएँ:
- ★कमल महल में नौ मीनारें थीं — बीच में एक ऊँची, तथा आठ उसकी भुजाओं के साथ-साथ।
- मेहराबें संभवत: इंडो-इस्लामी तकनीकों से प्रभावित थीं।
चित्र 7.13 — खड़ा रेखाचित्र क्या है?
खड़ा रेखाचित्र (Elevation) किसी वस्तु अथवा संरचना का ऊर्ध्व (Vertical) अवलोकन होता है। यह हमें उन अभिलक्षणों के विषय में जानकारी देता है जो एक छाया-चित्र में नहीं देखे जा सकते।
★★यह परिभाषा अत्यंत महत्त्वपूर्ण है — इसके साथ ही याद रखें:
शब्द अर्थ खड़ा रेखाचित्र (Elevation) संरचना का ऊर्ध्व अवलोकन — सामने से कैसी दिखती है नक्शा (Plan) संरचना का समस्तरी (Horizontal) अवलोकन — ऊपर से कैसी दिखती है (चित्र 7.16 ख)
🔎 इन-टेक्स्ट प्रश्न (पृ. 181)
“चित्र 7.13 तथा 7.15 की तुलना कीजिए तथा उन अभिलक्षणों की सूची बनाइये जो दोनों में हैं, और साथ ही उनकी भी जो इनमें से केवल एक में ही देखे जा सकते हैं। चित्र 7.14 में बनी मेहराब की तुलना चित्र 7.6 में बनी मेहराब से कीजिए। कमल महल में नौ मीनारें थीं — बीच में एक ऊँची, तथा आठ उसकी भुजाओं के साथ-साथ। छाया-चित्र तथा खड़े रेखाचित्र में आप कितनी-कितनी मीनारें देख पाते हैं? यदि आप कमल महल का फिर से नामकरण करते तो इसे क्या कहते?”
शिक्षक-संकेत: यह प्रश्न विद्यार्थी को सिखाता है कि रेखाचित्र में सभी नौ मीनारें दिखाई जा सकती हैं, पर छाया-चित्र में केवल वे जो कैमरे के कोण से दिखें। यही खड़े रेखाचित्र की उपयोगिता है। अंतिम भाग (पुनर्नामकरण) PARAKH की सृजनात्मकता से सीधे जुड़ता है।
4.2.2 हज़ार राम मन्दिर
- हालाँकि अधिकांश मन्दिर धार्मिक केंद्र में स्थित थे, लेकिन राजकीय केंद्र में भी कई थे।
- इनमें से एक अत्यंत दर्शनीय को हज़ार राम मन्दिर कहा जाता है।
- ★संभवत: इसका प्रयोग केवल राजा और उनके परिवार द्वारा ही किया जाता था।
- बीच के देवस्थल की मूर्तियाँ अब नहीं हैं; लेकिन दीवारों पर बनाए गए पटल मूर्तियाँ सुरक्षित हैं।
- ★इनमें मन्दिर की आंतरिक दीवारों पर उत्कीर्णित रामायण से लिए गए कुछ दृश्यांश सम्मिलित हैं।
★संकेत: राजकीय केंद्र में रामायण का उत्कीर्णन आकस्मिक नहीं है। राम = आदर्श राजा। शासक स्वयं को राम की परंपरा से जोड़कर वैधता प्राप्त करता है। यह खंड 5.1 के “श्री विरुपाक्ष” और “हिन्दू सूरतराणा” वाले तर्क का ही विस्तार है।
4.2.3 “हाथियों का अस्तबल”
- चित्र 7.16(क) — “हाथियों के अस्तबल” का खड़ा रेखाचित्र
- चित्र 7.16(ख) — “हाथियों के अस्तबल” का नक्शा। “नक्शा एक संरचना का समस्तरी अवलोकन देता है।”
- चित्र 7.17 — कमल महल के समीप स्थित “हाथियों का अस्तबल”
🔎 इन-टेक्स्ट प्रश्न (पृ. 182): “चित्र 7.16(क) तथा 7.16(ख) की तुलना चित्र 7.17 से कीजिए। प्रत्येक में दिखाई देने वाले अभिलक्षणों की सूची बनाइए। क्या आपको लगता है कि ये वास्तव में हाथियों के अस्तबल थे?”
★★यह प्रश्न अभ्यास प्रश्न 6 और 7 दोनों की तैयारी है। नाम आधुनिक अनुमान है — गुंबददार कक्षों की पंक्ति किसी भी बड़े प्रयोजन की हो सकती थी। अस्तबल के लिए इतनी अलंकृत गुंबदें क्यों? यही संदेह जगाना NCERT का उद्देश्य है।
4.2.4 नायकों की निर्माण-परंपरा
- ★शहर पर आक्रमण के पश्चात विजयनगर की कई संरचनाएँ विनष्ट हो गई थीं, पर नायकों ने महलनुमा संरचनाओं के निर्माण की परंपरा को जारी रखा। इनमें से कई भवन आज भी अस्तित्व में हैं।
- चित्र 7.19 — मदुरई के सभा मण्डप का आंतरिक भाग (“मेहराबों को ध्यान से देखिए।”)
★महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष: राजधानी नष्ट हुई, पर स्थापत्य-परंपरा नहीं मरी — वह नायक राज्यों (मदुरई, तंजावुर, जिंजी) में चलती रही। यह खंड 5.2 के अंत में मंदिरों के संदर्भ में दोहराया गया है।
🗣 चर्चा कीजिए… (पृ. 183)ध्यान
“नायकों ने विजयनगर के शासकों की भवन निर्माण परंपराओं को जारी क्यों रखा?”
शिक्षक-संकेत: (क) वैधता — स्वतंत्र होने के बाद उन्हें यह दिखाना था कि वे वैध उत्तराधिकारी हैं; (ख) प्रतिष्ठा — वही स्थापत्य-भाषा जो सम्राट की थी; (ग) धार्मिक संरक्षण से जनता में स्वीकृति; (घ) कारीगर वही थे — जब राजधानी उजड़ी तो शिल्पी नायक-दरबारों में चले गए; (ङ) आर्थिक साधन — नायकों के पास राजस्व-अधिकार पहले से थे।
§5. धार्मिक केंद्र (पृ. 184–188)
§5.1 राजधानी का चयन (पृ. 184)
5.1.1 पवित्र भूदृश्य — तीन मान्यताएँ
- अब हम तुंगभद्रा नदी के तट से लगे शहर के चट्टानी उत्तरी भाग की ओर ध्यान केन्द्रित करते हैं।
| मान्यता | विवरण |
|---|---|
| 1. रामायण से जुड़ाव | स्थानीय मान्यताओं के अनुसार ये पहाड़ियाँ रामायण में उल्लिखित बाली और सुग्रीव के वानर राज्य की रक्षा करती थीं |
| 2. पम्पादेवी-विरुपाक्ष विवाह | अन्य मान्यताओं के अनुसार स्थानीय मातृदेवी पम्पादेवी ने इन पहाड़ियों में विरुपाक्ष — जो राज्य के संरक्षक देवता तथा शिव का एक रूप माने जाते हैं — से विवाह के लिए तप किया था। ★आज तक यह विवाह विरुपाक्ष मन्दिर में हर वर्ष धूम-धाम से आयोजित किया जाता है। |
| 3. जैन उपस्थिति | इन पहाड़ियों में विजयनगर साम्राज्य के पूर्वकालिक जैन मन्दिर भी मिले हैं |
- ★दूसरे शब्दों में, यह क्षेत्र कई-धार्मिक मान्यताओं से संबद्ध था।
★★यही अभ्यास प्रश्न 1 का दूसरा भाग है — पुरोहितों की स्मृतियाँ (मैकेन्जी का स्रोत) और पुरातत्त्व एक-दूसरे के पूरक कैसे बने। मान्यता ने स्थान बताया, पुरातत्त्व ने अवशेष खोजे।
5.1.2 मन्दिर निर्माण की लंबी परंपरा
- इस क्षेत्र में मन्दिर निर्माण का एक लंबा इतिहास रहा है जो पल्लव, चालुक्य, होयसाल तथा चोल वंशों तक जाता है।
★★मन्दिर क्यों बनाए जाते थे — पाँच कारण:
| # | कारण |
|---|---|
| 1 | शासक अपने आप को ईश्वर से जोड़ने के लिए मन्दिर निर्माण को प्रोत्साहन देते थे — अक्सर देवता को व्यक्त अथवा अव्यक्त रूप से राजा से जोड़ा जाता था |
| 2 | मन्दिर शिक्षा के केंद्रों के रूप में भी कार्य करते थे |
| 3 | शासक और अन्य लोग मन्दिर के रख-रखाव के लिए भूमि या अन्य संपदा दान में देते थे |
| 4 | अतएव, मन्दिर महत्त्वपूर्ण धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक तथा आर्थिक केंद्रों के रूप में विकसित हुए |
| 5 | शासकों के दृष्टिकोण से मन्दिरों का निर्माण, मरम्मत तथा रखरखाव — अपनी सत्ता, संपत्ति तथा निष्ठा के लिए समर्थन तथा मान्यता के महत्त्वपूर्ण माध्यम थे |
★स्मरण-सूत्र: मंदिर = धार्मिक + सामाजिक + सांस्कृतिक + आर्थिक केंद्र (चार शब्द, अक्षरश: NCERT के)।
5.1.3 शासन की वैधता — तीन प्रतीक★★★
- यह संभव है कि विजयनगर के स्थान का चयन वहाँ विरुपाक्ष तथा पम्पादेवी के मन्दिरों के अस्तित्व से प्रेरित था।
| प्रतीक | विवरण | अर्थ |
|---|---|---|
| 1. विरुपाक्ष की ओर से शासन | विजयनगर के शासक भगवान विरुपाक्ष की ओर से शासन करने का दावा करते थे | राजा देवता का प्रतिनिधि, स्वयं सर्वोच्च नहीं |
| 2. “श्री विरुपाक्ष” | सभी राजकीय आदेशों पर सामान्यतया कन्नड़ लिपि में “श्री विरुपाक्ष” शब्द अंकित होता था | हर राजाज्ञा पर दैवीय मुहर |
| 3. “हिन्दू सूरतराणा” | शासक देवताओं से अपने गहन संबंधों के संकेतक के रूप में विरुद “हिन्दू सूरतराणा” का प्रयोग भी करते थे। यह अरबी भाषा के शब्द सुल्तान, जिसका अर्थ है राजा, का संस्कृत अनुवाद था और शाब्दिक रूप में इसका अर्थ था हिंदू सुल्तान | सांस्कृतिक ग्रहण का प्रमाण |
★★★“हिन्दू सूरतराणा” — इस एक शब्द पर पूरा निबंध लिखा जा सकता है। एक हिंदू राजा एक अरबी उपाधि का संस्कृत अनुवाद अपनी पदवी बनाता है। यह इस बात का सबसे संक्षिप्त प्रमाण है कि —
- सत्ता की शब्दावली धार्मिक सीमाओं को पार करती थी
- सुल्तान शब्द उस युग में प्रतिष्ठा का मानक बन चुका था
- यह नकल नहीं, प्रतिस्पर्धा है — “हम भी वही हैं, बल्कि हिंदू रूप में”
यह खंड 2.2.5 (सुल्तान-राय संबंध) और खंड 3.2.6 (इंडो-इस्लामी स्थापत्य) — दोनों से जुड़ता है। तीनों मिलकर अध्याय का सबसे बड़ा तर्क बनाते हैं।
5.1.4 नवाचार
- विजयनगर के शासकों ने पूर्वकालिक परंपराओं को अपनाया, उनमें नवीनता लाई और उन्हें आगे विकसित किया।
- ★अब राजकीय प्रतिकृति मूर्तियाँ (Royal Portrait Sculpture) मन्दिरों में प्रदर्शित की जाने लगीं।
- ★राजा की मन्दिरों की यात्राओं को महत्त्वपूर्ण राजकीय अवसर माना जाने लगा, जिन पर साम्राज्य के महत्त्वपूर्ण नायक भी उसके साथ जाते थे।
★जोड़: चित्र 7.31 (पृ. 192) — चिदम्बरम के मन्दिर के गोपुरम् में रखी कृष्णदेव राय की प्रतिमा — यही “राजकीय प्रतिकृति मूर्ति” का प्रत्यक्ष उदाहरण है। मंदिर में राजा की मूर्ति = देवता के घर में राजा की स्थायी उपस्थिति।
§5.2 गोपुरम् और मण्डप (पृ. 185–188)
5.2.1 नए स्थापत्य-तत्त्व
- मन्दिर स्थापत्य के संदर्भ में इस समय तक कई नए तत्त्व प्रकाश में आते हैं।
- इनमें विशाल स्तर पर बनाई गई संरचनाएँ जो राजकीय सत्ता की द्योतक थीं, शामिल हैं।
★★राय गोपुरम् (राजकीय प्रवेशद्वार) — तीन कार्य:
| # | कार्य |
|---|---|
| 1 | केंद्रीय देवालयों की मीनारों को बौना प्रतीत कराते थे |
| 2 | लंबी दूरी से ही मन्दिर के होने का संकेत देते थे |
| 3 | ★शासकों की ताकत की याद दिलाते थे, जो इतनी ऊँची मीनारों के निर्माण के लिए आवश्यक साधन, तकनीक तथा कौशल जुटाने में सक्षम थे |
- अन्य विशिष्ट अभिलक्षणों में मण्डप तथा लंबे स्तंभों वाले गलियारे, जो अक्सर मंदिर परिसर में स्थित देवस्थलों के चारों ओर बने थे, सम्मिलित हैं।
★★★सबसे सूक्ष्म बिंदु: गोपुरम् मंदिर के केंद्र (गर्भगृह) से ऊँचा होता है। अर्थात् राजा द्वारा बनवाया प्रवेशद्वार, देवता के गर्भगृह से बड़ा। यह वास्तुशिल्प में व्यक्त एक राजनीतिक कथन है — “मैं देवता का सेवक हूँ, पर मेरी सेवा सबसे बड़ी दिखेगी।” निबंधात्मक प्रश्नों के लिए यह वाक्य बहुमूल्य है।
5.2.2 विरुपाक्ष मन्दिर★★
| पक्ष | विवरण |
|---|---|
| निर्माण-काल | कई शताब्दियों में हुआ |
| प्राचीनता | अभिलेखों से पता चलता है कि सबसे प्राचीन मन्दिर नवीं-दसवीं शताब्दियों का था |
| विस्तार | विजयनगर साम्राज्य की स्थापना के बाद इसे कहीं अधिक बड़ा किया गया |
| ★कृष्णदेव राय का योगदान (1) | मुख्य मन्दिर के सामने बना मण्डप कृष्णदेव राय ने अपने राज्यारोहण के उपलक्ष्य में बनवाया था। इसे सूक्ष्मता से उत्कीर्णित स्तंभों से सजाया गया था |
| ★कृष्णदेव राय का योगदान (2) | पूर्वी गोपुरम् के निर्माण का श्रेय भी उसे ही दिया जाता है |
| ★★परिणाम | इन परिवर्धनों का अर्थ था कि केंद्रीय देवालय पूरे परिसर के एक छोटे भाग तक सीमित रह गया था |
★★अंतिम पंक्ति पर ध्यान दीजिए — यह केवल स्थापत्य का विवरण नहीं, शक्ति-संतुलन का विवरण है। जैसे-जैसे राजकीय परिवर्धन बढ़े, देवालय अनुपात में छोटा होता गया।
मन्दिर के सभागारों का प्रयोग (चार प्रकार):
- कुछ ऐसे थे जिनमें देवताओं की मूर्तियाँ संगीत, नृत्य और नाटकों के विशेष कार्यक्रमों को देखने के लिए रखी जाती थीं
- अन्य सभागारों का प्रयोग देवी-देवताओं के विवाह के उत्सव पर आनंद मनाने के लिए
- कुछ अन्य का प्रयोग देवी-देवताओं को झूला झुलाने के लिए
- ★इन अवसरों पर विशिष्ट मूर्तियों का प्रयोग होता था जो छोटे केंद्रीय देवालयों में स्थापित मूर्तियों से भिन्न होती थीं
★शिक्षण-बिंदु: मंदिर केवल पूजा-स्थल नहीं, उत्सव-स्थल था — संगीत, नृत्य, नाटक, विवाह, झूला। देवता के लिए मनोरंजन का आयोजन — यह मध्यकालीन भक्ति की सजीव, सामाजिक प्रकृति दिखाता है। (अध्याय 6 — भक्ति परंपराओं — से सीधा जोड़।)
5.2.3 विट्ठल मन्दिर
- दूसरा देवस्थल, विट्ठल मन्दिर, भी रोचक है।
- यहाँ के प्रमुख देवता विट्ठल थे जो सामान्यत: महाराष्ट्र में पूजे जाने वाले विष्णु के एक रूप हैं।
- ★★इस देवता की पूजा को कर्नाटक में आरंभ करना उन माध्यमों का द्योतक है जिनसे एक साम्राज्यिक संस्कृति के निर्माण के लिए विजयनगर के शासकों ने अलग-अलग परंपराओं को आत्मसात किया।
- अन्य मन्दिरों की तरह ही इस मन्दिर में भी कई सभागार तथा रथ के आकार का एक अनूठा मन्दिर भी है (चित्र 7.24)।
★★यह एक और उदाहरण है सांस्कृतिक ग्रहण का — महाराष्ट्र का देवता कर्नाटक की राजधानी में। साम्राज्य केवल भूमि नहीं जीतता, वह संस्कृतियाँ भी समेटता है। (तुलना: “हिन्दू सूरतराणा”, इंडो-इस्लामी मेहराब — तीनों एक ही प्रवृत्ति के रूप हैं।)
5.2.4 रथ गलियाँ
- मन्दिर परिसरों की एक चारित्रिक विशेषता रथ गलियाँ हैं जो मन्दिर के गोपुरम् से सीधी रेखा में जाती हैं।
- इन गलियों का फर्श पत्थर के टुकड़ों से बनाया गया था और इनके दोनों ओर स्तंभ वाले मण्डप थे जिनमें व्यापारी अपनी दुकानें लगाया करते थे।
★★धर्म और वाणिज्य का मिलन: मंदिर के ठीक सामने बाज़ार। यह खंड 3.2.7 (“सड़कें मंदिर के प्रवेशद्वारों से आगे बढ़ी हुई थीं और इनके दोनों ओर बाज़ार थे”) से अक्षरश: मेल खाता है। तीर्थयात्री ही ग्राहक थे।
5.2.5 नायकों का योगदान
- ★जिस प्रकार नायकों ने किलेबन्दी की परंपराओं को जारी रखा तथा और अधिक व्यापक बनाया, ठीक वैसा ही उन्होंने मन्दिर निर्माण की परंपराओं के संदर्भ में भी किया।
- यहाँ तक कि कुछ सबसे दर्शनीय गोपुरमों का निर्माण भी स्थानीय नायकों द्वारा किया गया था।
- चित्र 7.26 — मदुरई के नायकों द्वारा बनवाया गया एक गोपुरम्
अन्य महत्त्वपूर्ण चित्र (§5)
- चित्र 7.20 — आकाश से लिया गया विरुपाक्ष मन्दिर का दृश्य
- चित्र 7.21 — विरुपाक्ष मन्दिर का नक्शा (“अधिकांश वर्गाकार संरचनाएँ देवस्थल हैं। दो प्रमुख प्रवेश द्वारों को काले रंग से भरा गया है। प्रत्येक छोटा बिंदु एक स्तंभ को दर्शाता है।”)
- चित्र 7.22 — दैवीय विवाहों के आयोजन में प्रयुक्त होने वाला एक कल्याण मंडप
- चित्र 7.23 — मूर्तियों वाले स्तम्भ का एक रेखाचित्र
- चित्र 7.24 — विट्ठल मन्दिर का रथ | 🔎 “क्या आपको लगता है कि वास्तव में इस प्रकार के रथ बनाए जाते होंगे?”
- चित्र 7.25 — जिंजी का झूलता मण्डप
🗣 चर्चा कीजिए… (पृ. 188)ध्यान
“आनुष्ठानिक स्थापत्य की पूर्ववर्ती परंपराओं को विजयनगर के शासकों ने कैसे और क्यों अपनाया तथा रूपान्तरित किया?”
शिक्षक-संकेत (कैसे और क्यों — अलग-अलग):
| कैसे (रूपांतरण) | क्यों (उद्देश्य) |
|---|---|
| राय गोपुरम् जोड़े — देवालय से भी ऊँचे | राजकीय सत्ता का दृश्य प्रदर्शन |
| मण्डप और स्तंभ-गलियारे बनवाए | उत्सव-आधारित सामूहिक धर्म को स्थान |
| राजकीय प्रतिकृति मूर्तियाँ मंदिर में रखीं | राजा की स्थायी दैवीय उपस्थिति |
| इंडो-इस्लामी मेहराब-गुंबद अपनाए | बेहतर तकनीक + समकालीन प्रतिष्ठा |
| विट्ठल जैसे बाहरी देवता आत्मसात किए | साम्राज्यिक (बहु-क्षेत्रीय) संस्कृति का निर्माण |
§6. महलों, मन्दिरों तथा बाज़ारों का अंकन (पृ. 188–190)
6.1 जानकारी का भण्डार
- हमने विजयनगर के विषय में जानकारी के भण्डार का विश्लेषण किया है — फोटोग्राफ, नक्शे, संरचनाओं के खड़े रेखाचित्र तथा मूर्तियाँ।
- यह सब कैसे खोजा गया?
- मैकेन्जी द्वारा किए गए आरंभिक सर्वेक्षणों के बाद यात्रा वृत्तांतों और अभिलेखों से मिली जानकारी को एक साथ जोड़ा गया।
6.2 संरक्षण का इतिहास★
| काल | घटना |
|---|---|
| बीसवीं शताब्दी | इस स्थान का संरक्षण भारतीय पुरातात्त्विक सर्वेक्षण (Archaeological Survey of India) तथा कर्नाटक पुरातात्त्विक एवं संग्रहालय विभाग द्वारा किया गया |
| ★1976 | हम्पी को राष्ट्रीय महत्त्व के स्थल के रूप में मान्यता मिली |
| ★1980 के दशक का आरंभ | विविध प्रकार के अभिलेख प्रयोग से, व्यापक तथा गहन सर्वेक्षणों के माध्यम से, विजयनगर से मिले भौतिक अवशेषों के सूक्ष्मता से प्रलेखन की एक महत्त्वपूर्ण परियोजना का शुभारंभ किया गया |
| लगभग बीस वर्ष | पूरे विश्व के दर्जनों विद्वानों ने इस जानकारी को इकट्ठा और संरक्षित करने का कार्य किया |
★ध्यान दीजिए: यह एक अंतर्राष्ट्रीय, बहु-विद्वान, बीस-वर्षीय परियोजना थी — कोई एक व्यक्ति का काम नहीं। यह आधुनिक पुरातत्त्व की सामूहिक प्रकृति दर्शाता है।
6.3 मानचित्र निर्माण की विधि (तीन चरण)★★
“इस विशद प्रक्रिया के सिर्फ़ एक हिस्से को बारीकी से देखते हैं। यह है मानचित्र निर्माण।”
| चरण | विधि |
|---|---|
| 1 | संपूर्ण क्षेत्र को 25 वर्गाकार भागों में बाँटा गया और प्रत्येक वर्ग को वर्णमाला के एक अक्षर से इंगित किया गया |
| 2 | फिर इन छोटे वर्गों को पुन: और भी छोटे वर्गों के समूहों में बाँटा गया |
| 3 | लेकिन इतना काफ़ी नहीं था: आगे फिर छोटे वर्गों को और छोटी इकाइयों में बाँटा गया |
- जैसा कि आप देख सकते हैं, ये गहन सर्वेक्षण बहुत परिश्रम से किए गए थे, और इनसे हज़ारों संरचनाओं के अंशों — छोटे देवस्थलों और आवासों से लेकर विशाल मन्दिरों तक — को पुन: उजागर किया गया।
- उनका प्रलेखन भी किया गया।
- ★इस सबके कारण सड़कों, रास्तों और बाज़ारों आदि के अवशेषों को पुन: प्राप्त किया जा सका है। इन सभी की स्थिति की पहचान स्तंभ आधारों तथा मंचों के माध्यम से की गई है — एक समय जो बाज़ार, जीवंत थे, उनका बस अब यही कुछ बचा है।
★★अंतिम वाक्य को कक्षा में धीरे से पढ़िए। “एक समय जो बाज़ार जीवंत थे, उनका बस अब यही कुछ बचा है” — स्तंभों के आधार और मंच। यह पूरे अध्याय का भावनात्मक शिखर है और पेस के स्रोत 5 (बाज़ार का जीवंत वर्णन) से जोड़कर पढ़ाने पर अत्यंत प्रभावी होता है।
6.4 चित्र 7.27 से 7.30 — मानचित्रों की शृंखला
| चित्र | विवरण |
|---|---|
| 7.27 | विजयनगर स्थल का विस्तृत मानचित्र (A से Z तक वर्ग; हम्पी, कमलापुरम्, कादिरामपुरम्, अनेगोंदी, गंगावती, नगेनहतली, अनंतसायनपुडी, होस्पेटे) |
| 7.28 | चित्र 7.27 का वर्ग N (NA, NB, NC… NZ में उपविभाजित) |
| 7.29 | चित्र 7.28 का वर्ग NM |
| 7.30 | चित्र 7.29 के मन्दिर का नक्शा |
🔎 इन-टेक्स्ट प्रश्न (पृ. 189): “अंग्रेजी वर्णमाला का कौन सा अक्षर प्रयोग नहीं किया गया था? मानचित्र में दिए गए पैमाने का प्रयोग करते हुए किसी एक छोटे वर्ग की लंबाई नापिए।” तथा “इस मानचित्र में कौन सा पैमाना प्रयोग किया गया है?”
🔎 इन-टेक्स्ट प्रश्न (पृ. 190): “किसी एक मन्दिर को पहचानिए। दीवारों, एक केंद्रीय देवालय, तथा मन्दिर तक जाने वाले रास्तों के अवशेषों को खोजिए।” तथा “गोपुरम्, सभागारों, स्तंभावलियों तथा केंद्रीय देवालय को पहचानिए। बाहरी प्रवेशद्वार से केंद्रीय देवालय तक पहुँचने के लिए आप किन भागों से होकर गुज़रेंगे?”
★शिक्षण-सुझाव: ये चार चित्र मिलकर “ज़ूम-इन” का पाठ पढ़ाते हैं — पूरा क्षेत्र → एक वर्ग → एक उप-वर्ग → एक भवन। यही पुरातात्त्विक सर्वेक्षण का मूल तरीक़ा है। कक्षा में इसे मानचित्र के चार स्तर कहकर पढ़ाइए।
6.5 लकड़ी की खोई हुई दुनिया★★
जॉन एम. फ़्रिट्ज़, जॉर्ज मिशेल तथा एम.एस. नागराज राव, जिन्होंने इस स्थान पर वर्षों तक कार्य किया, ने जो लिखा वह याद रखना महत्त्वपूर्ण है:
“विजयनगर के स्मारकों के अपने अध्ययन में हमें नष्ट हो चुकी लकड़ी की वस्तुओं — स्तंभ, टेक (ब्रैकेट), धरन, भीतरी छत, लटकते हुए छज्जों के अंदरूनी भाग तथा मीनारों — की एक पूरी श्रेणी की कल्पना करनी पड़ती है जो प्लास्टर से सजाए और संभवत: चटकीले रंगों से चित्रित थे।”
- हालाँकि लकड़ी की संरचनाएँ अब नहीं हैं और केवल पत्थर की संरचनाएँ अस्तित्व में हैं, यात्रियों द्वारा पीछे छोड़े गए विवरण उस समय के स्पंदन से पूर्ण जीवन के कुछ आयामों को पुनर्निर्मित करने में सहायक होते हैं।
★★★यह अध्याय का सबसे बड़ा पद्धति-पाठ है: जो हम देखते हैं ≠ जो था। आज विजयनगर भूरा, नंगा पत्थर है। तब वह लकड़ी, प्लास्टर और चटकीले रंगों से भरा था। इतिहासकार को जो नष्ट हो गया उसकी कल्पना करनी पड़ती है — पर कल्पना मनमानी नहीं, वह साक्ष्य से नियंत्रित होती है (स्तंभों के छेद, यात्रियों के विवरण)।
🧭 अध्याय 1 से जोड़: वहाँ भी हड़प्पा के “नष्ट हो चुके” कपड़ों, लकड़ी, अन्न पर यही तर्क था। पुरातत्त्व वही बचाता है जो सड़ता नहीं।
§7. उत्तरों की खोज में प्रश्न (पृ. 191–192)
7.1 भवन हमें क्या बताते हैं
| # | भवन क्या बताते हैं |
|---|---|
| 1 | सुरक्षित भवन हमें उन तरीकों के विषय में बताते हैं जिनसे स्थानों को व्यवस्थित किया गया और उन्हें प्रयोग में लाया गया |
| 2 | वह हमें यह भी बताते हैं कि किन वस्तुओं और तकनीकों से उनका निर्माण किया गया और कैसे किया गया |
| 3 | उदाहरण के लिए, किसी शहर की किलेबंदी के अध्ययन से हम उसकी प्रतिरक्षण आवश्यकताओं और सामरिक तैयारी को समझ सकते हैं |
| 4 | यदि हम उनकी अन्य स्थानों के भवनों से तुलना करें तो भवन हमें विचारों के फैलाव और सांस्कृतिक प्रभावों के बारे में भी बताते हैं |
| 5 | ★वे उन विचारों को ज़ाहिर करते हैं जो निर्माणकर्ता या प्रश्रयदाता व्यक्त करना चाहते थे |
| 6 | वे अक्सर ऐसे चिह्नों से परिपूर्ण रहते हैं जो उनके सांस्कृतिक संदर्भ का परिणाम होते हैं |
| 7 | ★इन्हें हम समझ सकते हैं जब हम अन्य स्रोतों, जैसे साहित्य, अभिलेखों तथा लोकप्रचलित परंपराओं से मिली जानकारी को संयोजित करें |
7.2 भवन हमें क्या नहीं बताते — पहला समूह (सामान्य जन)★★★
- स्थापत्य तत्त्वों के परीक्षण से हमें यह नहीं पता चलता कि सामान्य पुरुष, महिलाएँ तथा बच्चे — जो शहर और उसके आसपास के क्षेत्र में रहने वाली जनसंख्या का एक बड़ा भाग थे — इन प्रभावशाली भवनों के विषय में क्या सोचते थे।
NCERT के अपने प्रश्न:
- क्या उनकी शाही केंद्र अथवा धार्मिक केंद्र के किसी भी भाग में पहुँच हो सकती थी?
- क्या वे मूर्ति के सामने से तेज़ी से निकल जाते अथवा देखने के लिए रुकते, सोचते और उसके जटिल प्रतीक चित्रण को समझने का प्रयास करते?
- और वे लोग जिन्होंने इन विशाल निर्माण परियोजनाओं पर कार्य किया था, इन उद्यमों के विषय में क्या सोचते थे जिसके लिए उन्होंने अपना श्रम दान दिया था?
7.3 भवन हमें क्या नहीं बताते — दूसरा समूह (निर्माता और श्रमिक)★★★
NCERT का नीला अनुच्छेद — यह पूरे अध्याय का समापन-प्रश्न है:
“हालाँकि, क्या निर्माण करना है, स्थान, कौन-सा माल प्रयोग करना है और किस शैली का अनुसरण करना है, ये सभी निर्णय शासक लेते थे, पर इतने विशाल उद्यमों के लिए आवश्यक विशिष्ट ज्ञान किसके पास था? भवनों के नक्शे कौन बनाता था? राजगीर, पत्थर काटने वाले, मूर्तिकार जो वास्तविक निर्माण कार्य करते थे, कहाँ से आते थे? क्या उन्हें युद्ध के दौरान पड़ोसी क्षेत्रों से बंदी बनाया जाता था? उन्हें किस प्रकार के वेतन मिलते थे? निर्माण गतिविधियों का अधीक्षण कौन करता था? निर्माण के लिए कच्चा माल कैसे और कहाँ से लाया जाता था? ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं जिनके उत्तर हम भवनों या उनके अवशेषों को देखने मात्र से नहीं दे सकते। संभवत: अन्य स्रोतों के प्रयोग से जारी शोध कुछ और संकेत दे सकें।”
★★★यही अध्याय का अंतिम और सबसे गहरा संदेश है: इतिहास में जो सबसे भव्य दिखता है, उसे बनाने वाले सबसे अधिक अदृश्य होते हैं। हम कृष्णदेव राय का चेहरा जानते हैं (चित्र 7.31, पेस का वर्णन), पर उन 20,000 श्रमिकों में से एक का भी नाम नहीं जानते जिन्हें पेस ने “चींटियों की तरह” देखा था।
कक्षा-प्रयोग: पेस के स्रोत 4 (“पन्द्रह से बीस हज़ार आदमी, चींटियों की तरह”) और खंड 7 के इस अनुच्छेद को साथ-साथ पढ़ाइए। प्रश्न पूछिए — “पेस ने उन्हें गिना, पर उनका नाम क्यों नहीं लिखा? क्या यह उसकी चूक थी, या उसके युग की दृष्टि?”
स्रोत 5 (पृ. 191): “बाज़ार”
(क) पेस का सजीव विवरण
“आगे जाने पर एक चौड़ी और सुंदर गली पाते हैं… इस गली में कई व्यापारी रहते हैं और वहाँ आप सभी प्रकार के माणिक्य, और हीरे, और पन्ने, और मोती, और छोटे मोती, और वस्त्र, और पृथ्वी पर होने वाली हर वस्तु जिसे आप खरीदना चाहेंगे, पाएँगे। फिर हर शाम को आप एक मेला देख सकते हैं जहाँ से कई सामान्य घोड़े तथा टट्टू और कई तुरंज और नींबू और संतरे और अंगूर और उद्यान में उगने वाली हर प्रकार की वस्तुएँ और लकड़ी मिलती है: इस गली में आप हर वस्तु पा सकते हैं।”
(ख) पेस का समग्र आकलन
- वह शहर का वर्णन ★“विश्व के सबसे अच्छे संभरण वाले शहर” के रूप में करता है जहाँ बाज़ार “चावल, गेहूँ, अनाज, भारतीय मकई और कुछ मात्रा में जौ तथा सेम, मूँग, दालें, काला चना जैसे खाद्य पदार्थों से भरे रहते थे” जो सभी सस्ते दामों पर तथा प्रचुर मात्रा में उपलब्ध रहते थे।
(ग) फर्नाओ नूनिज़ का विवरण
- नूनिज़ के अनुसार विजयनगर के बाज़ार “प्रचुर मात्रा में फलों, अंगूरों और संतरों, नींबू, अनार, कटहल तथा आम से भरे रहते थे और सभी बहुत सस्ते।”
- बाज़ारों में मांस भी बड़ी मात्रा में बिकता था। नूनिज़ उल्लेख करता है कि “भेड़-बकरी का मांस, सूअर, मृगमांस, तीतर-मांस, खरगोश, कबूतर, बटेर और सभी प्रकार के पक्षी, चिड़ियाँ, चूहे तथा बिल्लियाँ और छिपकलियाँ” बिसनग (विजयनगर) के बाज़ारों में बिकती थीं।
★★स्रोत-विश्लेषण (अभ्यास प्रश्न 9 का मुख्य आधार):
निष्कर्ष प्रमाण विलासिता और दैनिक ज़रूरत साथ-साथ एक ही गली में हीरे-पन्ने भी और शाम को नींबू-संतरे का मेला भी खाद्य-सुरक्षा “सस्ते दामों पर, प्रचुर मात्रा में” — दो अलग यात्री, एक ही निष्कर्ष व्यापक खाद्य-विविधता अनाज, दालें, फल, और अनेक प्रकार का मांस सामाजिक संकेत ★चूहे, बिल्लियाँ और छिपकलियाँ भी बिकते थे → अर्थात् समाज के निर्धनतम वर्ग भी बाज़ार का हिस्सा थे ! सावधानी: यह विदेशी यात्री की दृष्टि है। “विश्व के सबसे अच्छे संभरण वाले शहर” — यह अतिशयोक्ति भी हो सकती है, क्योंकि यात्री प्राय: असाधारण को ही दर्ज़ करता है और उसे अपने देश से तुलना करके देखता है। पेस ने सामान्य भारतीय गाँव नहीं देखा — उसने साम्राज्य की राजधानी देखी।
बॉक्स (पृ. 192): “कृष्णदेव राय”
- परिदृश्य की कुछ समस्याओं को पुन: याद करने के लिए तमिलनाडु में चिदम्बरम के मन्दिर के गोपुरम् में रखी कृष्णदेव राय की इस सुंदर प्रतिमा को देखिए (चित्र 7.31)।
- ★स्वाभाविक है कि शासक इसी रूप में अपने आप को प्रस्तुत करना चाहता था।
- और पेस राजा का वर्णन कुछ इस प्रकार करता है:
“मझला कद, गोरा रंग और अच्छी काठी, कुछ मोटा, राजा के चेहरे पर चेचक के दाग़ हैं।”
★★★यह बॉक्स पूरे अध्याय का लघु-रूप है।
स्रोत कृष्णदेव राय कैसा दिखता है प्रतिमा (राजकीय प्रतिकृति) आदर्श, दिव्य, हाथ जोड़े, निष्कलंक — जैसा राजा दिखना चाहता था पेस का विवरण मझला कद, कुछ मोटा, चेहरे पर चेचक के दाग़ — जैसा वह वास्तव में दिखता था ★एक वाक्य में: “कला हमें आदर्श दिखाती है, विवरण हमें मनुष्य।” यही दो प्रकार के स्रोतों का अंतर है — और यही इतिहासकार का काम है, दोनों को साथ रखकर पढ़ना। कक्षा में यह तुलना सबसे अधिक याद रह जाने वाली होती है।
भाग 2 — काल-रेखाएँ (पृ. 193)
काल-रेखा 1 — महत्वपूर्ण राजनीतिक परिवर्तन
| काल | घटनाएँ |
|---|---|
| लगभग 1200–1300 ईसवी | दिल्ली सल्तनत की स्थापना (1206) |
| लगभग 1300–1400 ईसवी | विजयनगर साम्राज्य की स्थापना (1336?); बहमनी राज्य की स्थापना (1347); जौनपुर, कश्मीर और मदुरई में सल्तनतें |
| लगभग 1400–1500 ईसवी | उड़ीसा के गजपति राज्य की स्थापना (1435); गुजरात और मालवा की सल्तनतों की स्थापना; अहमदाबाद, बीजापुर तथा बेरार सल्तनतों का उदय (1490) |
| लगभग 1500–1600 ईसवी | पुर्तगालियों द्वारा गोवा पर विजय (1510); बहमनी राज्य का विनाश; गोलकुंडा की सल्तनत का उदय (1518); बाबर द्वारा मुगल साम्राज्य की स्थापना (1526) |
नोट (NCERT का अपना): “प्रश्नचिह्न अनिश्चित तिथि की ओर संकेत करता है।”
★★इस काल-रेखा को पढ़ने का सही तरीक़ा: यह केवल विजयनगर की काल-रेखा नहीं — यह पूरे उपमहाद्वीप की है। इसका संदेश यह है कि विजयनगर अकेला नहीं उभरा — यह दिल्ली सल्तनत के कमज़ोर पड़ने पर उभरे अनेक क्षेत्रीय राज्यों में से एक था (बहमनी, गजपति, जौनपुर, कश्मीर, मदुरई, गुजरात, मालवा…)। चौदहवीं-पंद्रहवीं शताब्दी = क्षेत्रीय राज्यों का युग।
काल-रेखा 2 — विजयनगर की खोज व संरक्षण की मुख्य घटनाएँ
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1800 | कॉलिन मैकेन्जी द्वारा विजयनगर की यात्रा |
| 1856 | अलेक्ज़ैंडर ग्रिनलो ने हम्पी के पुरातात्विक अवशेषों के पहले विस्तृत चित्र लिए |
| 1876 | पुरास्थल की मंदिर की दीवारों के अभिलेखों का जे.एफ. फ्लीट द्वारा प्रलेखन आरंभ |
| 1902 | जॉन मार्शल के अधीन संरक्षण कार्य आरंभ |
| 1986 | हम्पी को यूनेस्को द्वारा विश्व पुरातत्व स्थल घोषित किया जाना |
★एक-पंक्ति तीर-शृंखला (याद करने के लिए): 1800 मैकेन्जी → 1856 ग्रिनलो → 1876 फ्लीट → 1902 मार्शल → 1976 राष्ट्रीय महत्त्व → 1986 यूनेस्को
! ध्यान दीजिए — 1976 (राष्ट्रीय महत्त्व का स्थल) काल-रेखा 2 में नहीं, खंड 6 के मुख्य पाठ में है। दोनों को मिलाकर पढ़ाना चाहिए।
★जोड़: जॉन मार्शल का नाम अध्याय 1 में भी आया था (हड़प्पा-मोहनजोदड़ो, 1924)। वही व्यक्ति, वही संस्था (ASI), दो अलग सभ्यताएँ।
भाग 3 — NCERT अभ्यास प्रश्न (पृ. 194–195)
उत्तर दीजिए (लगभग 100–150 शब्दों में)
- पिछली दो शताब्दियों में हम्पी के भवनावशेषों के अध्ययन में कौन-सी पद्धतियों का प्रयोग किया गया है? आपके अनुसार यह पद्धतियाँ विरुपाक्ष मन्दिर के पुरोहितों द्वारा प्रदान की गई जानकारी का किस प्रकार पूरक रहीं?
- विजयनगर की जल-आवश्यकताओं को किस प्रकार पूरा किया जाता था?
- शहर के किलेबंद क्षेत्र में कृषि क्षेत्र को रखने के आपके विचार में क्या फ़ायदे और नुकसान थे?
- आपके विचार में महानवमी डिब्बा से संबद्ध अनुष्ठानों का क्या महत्त्व था?
- चित्र 7.33 विरुपाक्ष मन्दिर के एक अन्य स्तंभ का रेखाचित्र है। क्या आप कोई पुष्प-विषयक रूपांकन देखते हैं? किन जानवरों को दिखाया गया है? आपके विचार में उन्हें क्यों चित्रित किया गया है? मानव आकृतियों का वर्णन कीजिए।
निम्नलिखित पर एक लघु निबंध लिखिए (लगभग 250–300 शब्दों में)
- “शाही केंद्र” शब्द शहर के जिस भाग के लिए प्रयोग किए गए हैं, क्या वे उस भाग का सही वर्णन करते हैं।
- कमल महल और हाथियों के अस्तबल जैसे भवनों का स्थापत्य हमें उनके बनवाने वाले शासकों के विषय में क्या बताता है?
- स्थापत्य की कौन-कौन-सी परंपराओं ने विजयनगर के वास्तुविदों को प्रेरित किया? उन्होंने इन परंपराओं में किस प्रकार बदलाव किए?
- अध्याय के विभिन्न विवरणों से आप विजयनगर के सामान्य लोगों के जीवन की क्या छवि पाते हैं?
मानचित्र कार्य
- विश्व के सीमारेखा मानचित्र पर इटली, पुर्तगाल, ईरान तथा रूस को सन्निकटता से अंकित कीजिए। उन मार्गों को पहचानिए जिनका प्रयोग पृ. 176 पर उल्लिखित यात्रियों ने विजयनगर पहुँचने के लिए किया था।
★संकेत: इटली → निकोलो दे कॉन्ती • पुर्तगाल → बरबोसा, पेस, नूनिज़ • ईरान (फ़ारस) → अब्दुर रज़्ज़ाक • रूस → अफ़ानासी निकितिन।
परियोजना कार्य (कोई एक)
- भारतीय उपमहाद्वीप के किसी एक ऐसे प्रमुख शहर के विषय में और जानकारी हासिल कीजिए जो लगभग चौदहवीं–सत्रहवीं शताब्दियों में फला-फूला। शहर के स्थापना का वर्णन कीजिए। क्या कोई ऐसे लक्षण हैं जो इनके राजनीतिक केंद्र होने की ओर संकेत करें? क्या ऐसे भवन हैं जो आनुष्ठानिक रूप से महत्त्वपूर्ण हों? कौन-से ऐसे लक्षण हैं जो शहरी भाग को आस-पास के क्षेत्रों से विभाजित करते हैं?
- अपने आस-पास के किसी धार्मिक भवन को देखिए। रेखाचित्र के माध्यम से छत, स्तंभों, मेहराबों, यदि हों तो, गलियारों, रास्तों, सभागारों, प्रवेशद्वारों, जलआपूर्ति आदि का वर्णन कीजिए। इन सभी की तुलना विरुपाक्ष मन्दिर के अभिलक्षणों से कीजिए। वर्णन कीजिए कि भवन का हर भाग किस प्रयोग में लाया जाता था। इसके इतिहास के विषय में पता कीजिए।
भाग 4 — शिक्षक-संदर्भ : सभी इन-टेक्स्ट प्रश्न (चर्चा कीजिए तथा चित्र-प्रश्न)
🗣 “चर्चा कीजिए…” के चार प्रॉम्प्टध्यान
| पृष्ठ | प्रॉम्प्ट |
|---|---|
| 175 | मानचित्र 1 पर चन्द्रगिरी, मदुरई, इक्केरी, तंजावुर तथा मैसूर को चिह्नित कीजिए, ये सभी नायक शक्ति के केंद्र थे। यह भी चर्चा कीजिए कि नदियों और पहाड़ों ने किन मायनों में विजयनगर के साथ संचार को सरल अथवा बाधित किया |
| 179 | विजयनगर की रूपरेखा की तुलना अपने नगर या गाँव की रूपरेखा से कीजिए |
| 183 | नायकों ने विजयनगर के शासकों की भवन निर्माण परंपराओं को जारी क्यों रखा? |
| 188 | आनुष्ठानिक स्थापत्य की पूर्ववर्ती परंपराओं को विजयनगर के शासकों ने कैसे और क्यों अपनाया तथा रूपान्तरित किया? |
🔎 चित्र एवं स्रोत से जुड़े इन-टेक्स्ट प्रश्न
| पृष्ठ | प्रश्न |
|---|---|
| 171 | मैकेन्जी और उनके देशज सूचनादाताओं को चित्रकार ने किस प्रकार चित्रित किया है? दर्शकों पर किस प्रकार के विचार डालने का प्रयास किया गया है? |
| 173 | आपके विचार में राजा व्यापार को प्रोत्साहित करने का इच्छुक क्यों था? इन विनिमयों से किन समूहों को लाभ पहुँचा होगा? |
| 174 | उन आधुनिक राज्यों को चिह्नित कीजिए जो विजयनगर साम्राज्य का भाग थे |
| 176 | नक्शे पर बने तीन अंचलों को पहचानिए। क्या आप नदियों से जुड़ती नहरें देख सकते हैं? कितनी किलेबन्द दीवारें? क्या धार्मिक केंद्र किलेबन्द था? |
| 176 | क्या आप आज किसी शहर में ये अभिलक्षण देख सकते हैं? पेस ने उद्यानों तथा जल-स्रोतों को विशेष-उल्लेख के लिए क्यों चुना? |
| 178 | इन दो प्रवेश-द्वारों के बीच समानताओं तथा विभिन्नताओं का वर्णन कीजिए। विजयनगर के शासकों ने इण्डो-इस्लामी स्थापत्य के तत्त्वों को क्यों अपनाया? |
| 179 | आपके विचार में ये टुकड़े मूलत: किस प्रकार के बर्तनों का हिस्सा थे? (चित्र 7.9) |
| 179 | क्या इस मस्जिद में इण्डो-इस्लामी स्थापत्य के चारित्रिक तत्व विद्यमान हैं? (चित्र 7.10) |
| 180 | क्या आप इन चित्रों के विषयों को पहचान सकते हैं? (चित्र 7.12 — महानवमी डिब्बा के उत्कीर्णन) |
| 181 | चित्र 7.13 तथा 7.15 की तुलना कीजिए… कितनी-कितनी मीनारें देख पाते हैं? यदि आप कमल महल का फिर से नामकरण करते तो इसे क्या कहते? |
| 182 | चित्र 7.16(क)/(ख) की तुलना 7.17 से कीजिए। क्या आपको लगता है कि ये वास्तव में हाथियों के अस्तबल थे? |
| 183 | क्या आप नृत्य के दृश्यांशों को पहचान सकते हैं? हाथियों और घोड़ों को पटलों पर क्यों चित्रित किया गया? (चित्र 7.18) |
| 185 | नक्शे में दिए स्केल का प्रयोग कर मुख्य गोपुरम् से केंद्रीय देवालय की दूरी नापिए। जलाशय से देवालय तक जाने के लिए सबसे आसान मार्ग कौन सा रहा होगा? (चित्र 7.21) |
| 186 | स्तंभ पर आप जो देख रहे हैं उसका वर्णन कीजिए (चित्र 7.23) |
| 187 | क्या आपको लगता है कि वास्तव में इस प्रकार के रथ बनाए जाते होंगे? (चित्र 7.24) |
| 189 | अंग्रेजी वर्णमाला का कौन सा अक्षर प्रयोग नहीं किया गया था? पैमाने से एक छोटे वर्ग की लंबाई नापिए |
| 189 | इस मानचित्र में कौन सा पैमाना प्रयोग किया गया है? (चित्र 7.28) |
| 190 | किसी एक मन्दिर को पहचानिए। दीवारों, केंद्रीय देवालय तथा रास्तों के अवशेष खोजिए |
| 190 | गोपुरम्, सभागारों, स्तंभावलियों तथा केंद्रीय देवालय को पहचानिए। बाहरी प्रवेशद्वार से केंद्रीय देवालय तक किन भागों से होकर गुज़रेंगे? |
भाग 5 — मानचित्र 1 (पृ. 174) : दक्षिण भारत, लगभग चौदहवीं–अठारहवीं शताब्दी
प्रमुख स्थान (परीक्षा हेतु)
| श्रेणी | स्थान |
|---|---|
| राजधानी | विजयनगर (तुंगभद्रा के तट पर) |
| दक्कन सल्तनतों के केंद्र | बीदर, गुलबर्गा, बीजापुर, गोलकुंडा, हैदराबाद, वारंगल |
| नायक शक्ति के केंद्र | चन्द्रगिरि, मदुरई, इक्केरी, तंजावुर, मैसूर (चर्चा कीजिए, पृ. 175) |
| पश्चिमी तट के बंदरगाह | गोवा, भटकल, बसरूर (बारसिलोर), मंगलौर, कन्ननोर, कालीकट, कोचीन, क्विलोन |
| पूर्वी तट | मसुलिपटनम, मैलापुर |
| अन्य नगर/स्थल | केरी, चित्रदुर्ग, कोलार, कांचीपुरम, जिंजी, चिदम्बरम, रामानाथपुरम, तिरुवल्ली |
| नदियाँ | कृष्णा, तुंगभद्रा, पेन्नार, कावेरी, वैगाई |
| जल-निकाय | अरब सागर, हिंद महासागर, मन्नार की खाड़ी |
| द्वीप | श्रीलंका |
नोट: मानचित्र एक रेखाचित्र है — “पैमाना नहीं दिया गया है।”
★मानचित्र-आधारित एक-अंकीय प्रश्न की तैयारी: कालीकट (जहाँ अब्दुर रज़्ज़ाक भेजा गया) • गोवा (1510 में पुर्तगाली विजय) • चन्द्रगिरि (अरावीडु वंश की बाद की राजधानी) • तंजावुर (बृहदेश्वर मंदिर) — इन चार को अवश्य याद कराइए।
भाग 6 — अध्याय की समग्र दृष्टि (शिक्षक हेतु)
6.1 अध्याय के पाँच स्तंभ — एक ही पृष्ठ पर★★
| # | केंद्रीय विचार | मुख्य प्रमाण |
|---|---|---|
| 1 | एक नष्ट शहर को पाँच प्रकार के स्रोतों से पुन: खड़ा किया गया | लोक-स्मृति (हम्पी/पम्पादेवी) + पुरातत्त्व + अभिलेख + यात्री + चार भाषाओं का साहित्य |
| 2 | राजनीति धर्म से नहीं, सत्ता के हित से चलती थी | कृष्णदेव राय का सुल्तानों को समर्थन • “यवन राज्य की स्थापना करने वाला” विरुद • बीजापुर का हस्तक्षेप • “हिन्दू सूरतराणा” |
| 3 | शहर की योजना ही सत्ता का कथन थी | तीन अंचल • सात किलेबंदियाँ • किलेबंदी में खेत • देवालय से ऊँचा गोपुरम् • महानवमी डिब्बा |
| 4 | साम्राज्य को जिसने बनाया, उसी ने तोड़ा | अमर-नायक प्रणाली — सैनिक शक्ति दी, फिर सत्रहवीं शताब्दी में स्वतंत्र राज्य बन गए |
| 5 | जो बचा है वह सब कुछ नहीं है | पत्थर बचा, लकड़ी गई • महल के केवल मंच बचे • सामान्य जन के आवास छप्पर के थे, इसलिए अदृश्य |
6.2 पूरे अध्याय की एक-पंक्ति तीर-शृंखलाएँ★
राजनीतिक क्रम:
1336? स्थापना (हरिहर–बुक्का) → संगम (1485 तक) → सुलुव (1503 तक) → तुलुव (कृष्णदेव राय 1509–29) → अरावीडु (1542 से) → 1565 राक्षसी-तांगड़ी → पेनुकोण्डा → चन्द्रगिरी → सत्रहवीं सदी में नायक स्वतंत्र
कृष्णदेव राय की विजय-शृंखला:
1512 रायचूर दोआब → 1514 उड़ीसा → 1520 बीजापुर → 1529 मृत्यु
खोज व संरक्षण की शृंखला:
1800 मैकेन्जी → 1836 अभिलेख-संग्रह → 1856 ग्रिनलो/छायाचित्र → 1876 फ्लीट → 1902 मार्शल → 1976 राष्ट्रीय महत्त्व → 1980 का दशक: प्रलेखन परियोजना → 1986 यूनेस्को
शहर में प्रवेश का क्रम (बाहर से भीतर):
खेत व जंगल → पहली किलेबंदी → शहरी केंद्र → दूसरी किलेबंदी → राजकीय केंद्र → तीसरी किलेबंदी → भवन-समूह की अपनी दीवार
6.3 पाँच सामान्य भ्रांतियाँ (कक्षा में अवश्य सुधारें)ध्यान
| भ्रांति | वास्तविकता |
|---|---|
| “विजयनगर बनाम सुल्तान = हिंदू बनाम मुसलमान युद्ध” | ★संघर्ष उर्वर भूमि और व्यापार की संपदा के लिए था; गठजोड़ धर्म पार करके बनते थे |
| “1565 में विजयनगर साम्राज्य समाप्त हो गया” | शहर उजड़ा; साम्राज्य अरावीडु वंश के अधीन सत्रहवीं शताब्दी के अंत तक चला (पेनुकोण्डा, चन्द्रगिरी से) |
| “महानवमी डिब्बा एक मंदिर था” | वह एक विशाल मंच था (11,000 वर्ग फीट × 40 फीट), जिस पर लकड़ी की संरचना थी |
| “कमल महल और हाथियों का अस्तबल — नाम प्राचीन हैं” | ★दोनों नाम आधुनिक हैं — कमल महल का नामकरण उन्नीसवीं सदी के अंग्रेज़ यात्रियों ने किया; अस्तबल का कार्य भी निश्चित नहीं |
| “हम्पी नाम अंग्रेज़ों ने दिया” | नहीं — यह स्थानीय मातृदेवी पम्पादेवी से आया और लोक-स्मृति में जीवित रहा |
6.4 अध्याय का सूत्र-वाक्य★
“विजयनगर हमें यह नहीं सिखाता कि अतीत कैसा था — यह सिखाता है कि अतीत को कैसे जाना जाता है। पत्थर बताता है कि क्या बना; यात्री बताता है कि वह कैसा दिखता था; अभिलेख बताता है कि किसने बनवाया — पर जिसने अपने हाथों से बनाया, वह आज भी मौन है।”
भाग 7 — अतिरिक्त पठन (NCERT द्वारा सुझाया, पृ. 195)
| लेखक | वर्ष | कृति | प्रकाशक |
|---|---|---|---|
| बसुंधरा फिलियोजट | 2006 (पुनर्मुद्रण) | विजयनगर | नेशनल बुक ट्रस्ट, न्यू दिल्ली |
| जॉर्ज मिशेल | 1995 | आर्किटैक्चर एंड आर्ट ऑफ सदर्न इंडिया | कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस, कैम्ब्रिज |
| के.ए. नीलकंठ शास्त्री | 1955 | ए हिस्ट्री ऑफ साउथ इंडिया | ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, न्यू दिल्ली |
| बर्टन स्टीन | 1989 | विजयनगर (द न्यू कैम्ब्रिज हिस्ट्री ऑफ इंडिया, वॉल्यूम 1, पार्ट 2) | फाउंडेशन बुक्स, न्यू दिल्ली |
NCERT द्वारा सुझाई वेबसाइट: http://www.museum.upenn.edu/new/kresearch/Exp_Rese_Disc/Asia/vrp/HTML/Vijay_Hist.shtml
यह मास्टर फ़ाइल इस अध्याय की सभी अन्य सामग्रियों (पाठ योजना, रिवीजन नोट्स, प्रश्न बैंक, फ्लैशकार्ड, PARAKH प्रश्न बैंक, शिक्षक मार्गदर्शिका तथा प्रस्तुति) का एकमात्र आधार है।