अध्याय 1ईंटें, मनके तथा अस्थियाँ (हड़प्पा सभ्यता)

शिक्षण नोट्स35 मिनट

NCERT — भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग-1 (Reprint 2026-27)

0. प्रस्तावना — मुहर से सभ्यता तक

  • हड़प्पाई मुहर (Seal) — हड़प्पा/सिंधु घाटी सभ्यता की सबसे विशिष्ट पुरावस्तु (Artefact)।
  • निर्माण सामग्री — सेलखड़ी (Steatite) नामक पत्थर।
  • मुहरों पर — जानवरों के चित्र + एक ऐसी लिपि (Script) के चिह्न जो आज तक पढ़ी नहीं जा सकी।
  • इस अध्याय का केंद्रीय प्रश्न: हम हड़प्पा सभ्यता के विषय में क्या जानते हैं और कैसे जानते हैं?
    • अर्थात् — पुरातात्त्विक साक्ष्यों (Archaeological Evidence) की व्याख्या (Interpretation) कैसे की जाती है, और व्याख्याओं में बदलाव कैसे आता है।
  • शिक्षण-सूत्र: पूरा अध्याय “साक्ष्य → व्याख्या → पुनर्व्याख्या” की पद्धति पर चलता है — विद्यार्थियों को यही इतिहास-लेखन की विधि सिखानी है।

शर्तें, स्थान और समय (Terms, Places, Time)

  • “हड़प्पा सभ्यता” = सिंधु घाटी सभ्यता (Indus Valley Civilisation)। नाम हड़प्पा उस स्थान से — जहाँ इस सभ्यता की पहली बार पहचान हुई।
  • कुल समय-काल: लगभग 6000 ई.पू. से 1300 ई.पू.
चरणकालविशेषता
आरंभिक हड़प्पा (Early Harappan)6000–2600 ई.पू.प्रारंभिक/ग्रामीण चरण
परिपक्व हड़प्पा (Mature Harappan)2600–1900 ई.पू.शहरी चरण — सबसे समृद्ध
उत्तर हड़प्पा (Late Harappan)1900–1300 ई.पू.पतन का चरण
  • विशिष्ट पुरावस्तुएँ — मिट्टी के बर्तन, ईंटें (पकी और कच्ची), मुहरें, बाट, मोती, ताँबे-काँसे की वस्तुएँ, टेराकोटा।
  • विस्तार (Extent): अफ़गानिस्तान, बलूचिस्तान, सिंध, पाकिस्तानी पंजाब + भारत में जम्मू, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र।
  • ई.पू./BC-BCE नोट (पृ. 2): B.C. = बिफोर क्राइस्ट; A.D. = एनो डॉमिनी (ईसा के जन्म-वर्ष से); अब C.E. (कॉमन एरा) व B.C.E. (बिफोर कॉमन एरा) प्रचलित; B.P. = बिफोर प्रेजेंट। पुस्तक में ई.पू. (BCE) व ई. (CE) प्रयुक्त।

हड़प्पा की बस्तियाँ (बॉक्स, पृ. 2)

  • भारतीय उपमहाद्वीप में अब तक 2000 से अधिक हड़प्पा पुरास्थल ज्ञात।
  • अधिकांश स्थल सिंधु और सरस्वती नदी घाटियों के बीच; लगभग 2/3 बस्तियाँ सरस्वती बेसिन में।
  • पाँच प्रमुख शहर: राखीगढ़ी, मोहनजोदड़ो, हड़प्पा, धौलावीरा, गनवेरीवाला।
  • शेष श्रेणियाँ — क्षेत्रीय केंद्र, कृषि गाँव, बंदरगाह (Port), विनिर्माण केंद्र।

1. आरंभ (Beginnings)

  • हड़प्पा से पहले भी इस क्षेत्र में कई संस्कृतियाँ — प्रत्येक की विशिष्ट मृद्भाण्ड शैली (Pottery Style)।
  • इनसे कृषि, पशुपालन तथा कुछ शिल्प के साक्ष्य मिलते हैं; बस्तियाँ छोटी, बड़ी संरचनाएँ लगभग नहीं।
  • हालिया साक्ष्य: 7000 ई.पू. के शुरुआती कृषक समुदायों से हड़प्पा संस्कृति के उद्भव के संकेत।
  • मुख्य निष्कर्ष: शहरी चरण (परिपक्व हड़प्पा), आरंभिक हड़प्पा चरण से क्रमिक परिवर्तन और आंतरिक विकास का परिणाम था — अचानक बाहर से आयी सभ्यता नहीं।

2. निर्वाह के तरीके (Subsistence Strategies)

2(क) आहार (Diet)

  • हड़प्पावासी पेड़-पौधों के उत्पाद, जानवर (मछली सहित) खाते थे।
  • जले अनाज के दाने व बीज — इनका अध्ययन करने वाले विशेषज्ञ = पुरा-वनस्पतिज्ञ (Archaeo-botanist)।
  • प्राप्त अनाज: गेहूँ, जौ, दाल, सफ़ेद चना, तिल; बाजरा — गुजरात के स्थलों से; चावल — अपेक्षाकृत कम।
  • जानवरों की हड्डियाँ: मवेशी, भेड़, बकरी, भैंस, सूअर — जीव-पुरातत्त्वविदों (Zoo-archaeologists) के अनुसार ये पालतू थे।
  • जंगली प्रजातियाँ: वराह (सूअर), हिरण, घड़ियाल; मछली व पक्षियों की हड्डियाँ भी।
  • अनुत्तरित प्रश्न: हड़प्पावासी स्वयं शिकार करते थे या आखेटक-समुदायों से माँस प्राप्त करते थे — ज्ञात नहीं।

2.1 कृषि प्रौद्योगिकी (Agricultural Technology)

  • अनाज के दाने कृषि के संकेत देते हैं, पर वास्तविक विधियों की जानकारी कठिन।
  • वृषभ (Bull) — मुहरों के रेखांकन व मृण्मूर्तियाँ → अनुमान: खेत जोतने के लिए बैलों का प्रयोग।
  • हल (Plough) के साक्ष्य:
    • चोलिस्तान व बनावली (हरियाणा) — मिट्टी से बने हल के प्रतिरूप (Terracotta models)।
    • कालीबंगन (राजस्थान) — जुते हुए खेत का साक्ष्य (आरंभिक हड़प्पा स्तर) — हल-रेखाओं के दो समूह एक-दूसरे को समकोण पर काटते हुए → एक साथ दो अलग-अलग फ़सलें उगाई जाती थीं।
  • कटाई के औज़ार — लकड़ी के हत्थों में बिठाए पत्थर के फलक या धातु के औज़ार? — स्पष्ट नहीं।
  • सिंचाई (Irrigation): अधिकांश स्थल अर्ध-शुष्क (Semi-arid) क्षेत्रों में — सिंचाई आवश्यक रही होगी।
    • शोर्तुगई (अफ़गानिस्तान) — नहरों के अवशेष; पंजाब-सिंध में नहीं (संभवतः गाद से भर गईं)।
    • कुओं का पानी भी सिंचाई हेतु प्रयुक्त होने की संभावना।
    • धौलावीरा (गुजरात) — जलाशय (Reservoirs) — संभवतः कृषि हेतु जल-संचयन।

स्रोत 1 (पृ. 4): “पुरावस्तुओं की पहचान कैसे की जाती है”

  • मोहनजोदड़ो के उत्खननों की आरंभिक रिपोर्ट — अर्नेस्ट मैके, फर्दर एक्सकैवेशन्स एट मोहनजोदड़ो, 1937।
  • अनाज पीसने हेतु अवतल चक्कियाँ (Saddle Querns) — बड़ी संख्या में; कठोर, कंकरीले, अग्निज या बलुआ पत्थर से निर्मित।
  • दो प्रकार: (1) जिन पर दूसरा छोटा पत्थर आगे-पीछे चलाया जाता था; (2) ‘सालन पत्थर’ — जड़ी-बूटियों/मसालों को कूटने हेतु।
  • विधि-शिक्षा: पुरातत्त्वविद वर्तमान समय की तुलनाओं से प्राचीन पुरावस्तुओं का प्रयोग समझते हैं (मैके की तुलना आधुनिक चक्कियों से)।

3. योजनाबद्ध शहर : मोहनजोदड़ो (Planned Urban Centre)

  • सभ्यता का सबसे अनूठा पहलू — शहरी केंद्रों का विकास।
  • मोहनजोदड़ो सबसे प्रसिद्ध; परंतु सबसे पहले खोजा गया स्थल हड़प्पा।
  • बस्ती दो भागों में:
दुर्ग (Citadel)निचला शहर (Lower Town)
आकार/स्थितिछोटा, ऊँचाई पर (पश्चिम)बड़ा, नीचे (पूर्व)
ऊँचाई का कारणसंरचनाएँ कच्ची ईंटों के चबूतरों परकई भवन ऊँचे चबूतरों पर (नींव-कार्य)
घेराबंदीदीवार से घिरा — निचले शहर से अलगयह भी दीवार से घिरा
  • श्रम का पैमाना: अनुमान — यदि एक श्रमिक प्रतिदिन 1 घनीय मीटर मिट्टी ढोता, तो केवल आधार बनाने हेतु 40 लाख श्रम-दिवस लगते।
  • पूर्व-नियोजन (Planning) के प्रमाण:
    1. पहले चबूतरे बने → फिर उन पर निश्चित क्षेत्र में भवन-निर्माण (पहले नियोजन, फिर कार्यान्वयन)।
    2. ईंटें — धूप में सुखाई या भट्ठी में पकाई — निश्चित अनुपात: लंबाई = चौड़ाई की चार गुनी, ऊँचाई की दोगुनी (4:2:1) — सभी हड़प्पा बस्तियों में समान।

दुर्ग बॉक्स (पृ. 6): नियोजन में विविधताएँ

  • अधिकांश बस्तियाँ: छोटा ऊँचा पश्चिमी भाग + बड़ा निचला पूर्वी भाग। परंतु —
  • धौलावीरा व लोथल (गुजरात): पूरी बस्ती किलेबंद; शहर के कई हिस्से भी दीवारों से घिरे।
  • लोथल: दुर्ग दीवार से घिरा नहीं था, पर कुछ ऊँचाई पर बनाया गया था।

3.1 नालों का निर्माण (Drainage System)

  • सबसे अनूठी विशिष्टता — ध्यानपूर्वक नियोजित जल निकास प्रणाली।
  • सड़कें/गलियाँ लगभग ‘ग्रिड’ पद्धति (Grid Pattern) में — एक-दूसरे को समकोण पर काटती हुईं।
  • क्रम: पहले नालियों के साथ गलियाँ बनीं → फिर अगल-बगल आवास — घरों के गंदे पानी हेतु प्रत्येक घर की कम से कम एक दीवार का गली से सटा होना आवश्यक।

स्रोत 2 (पृ. 7): “अब तक खोजी गई प्राचीनतम प्रणाली” — मैके

  • मैके: “निश्चित रूप से यह अब तक खोजी गई सर्वथा संपूर्ण प्राचीन प्रणाली है।”
  • हर आवास गली की नालियों से जुड़ा; मुख्य नाले गारे में जमाई गई ईंटों से बने, हटाई जा सकने वाली ईंटों से ढँके (सफ़ाई हेतु); कुछ स्थानों पर चूना पत्थर की पट्टिकाओं से ढँके।
  • घरों की नालियाँ पहले एक हौदी/मलकुंड (Sump) में खाली होती थीं — ठोस पदार्थ जमता, गंदा पानी गली की नाली में बहता।
  • लंबे नालों में अंतरालों पर सफ़ाई हेतु हौदियाँ।
  • “पुरातत्त्व का अजूबा”: मलबे (मुख्यतः रेत) के छोटे-छोटे ढेर नालों के अगल-बगल मिले → सफ़ाई के बाद कचरा हमेशा हटाया नहीं जाता था। (अर्नेस्ट मैके, अर्ली इंडस सिविलाईज़ेशन, 1948)
  • नोट: जल निकास प्रणालियाँ केवल बड़े शहरों तक सीमित नहीं — छोटी बस्तियों में भी। लोथल — आवास कच्ची ईंटों के, नालियाँ पकी ईंटों की।

3.2 गृह स्थापत्य (Domestic Architecture)

  • निचला शहर — आवासीय भवन; कई भवन आँगन (Courtyard) पर केंद्रित, चारों ओर कमरे।
  • आँगन — खाना पकाने, कताई जैसी गतिविधियों का केंद्र (विशेषतः गर्म-शुष्क मौसम में)।
  • एकांतता (Privacy) का महत्त्व:
    • भूमि-तल की दीवारों में खिड़कियाँ नहीं।
    • मुख्य द्वार से आंतरिक भाग/आँगन का सीधा अवलोकन नहीं होता।
  • प्रत्येक घर में ईंटों के फ़र्श वाला स्नानघर — नालियाँ दीवार के माध्यम से सड़क की नालियों से जुड़ीं।
  • कुछ घरों में दूसरे तल/छत पर जाने की सीढ़ियों के अवशेष।
  • कुएँ: कई आवासों में; अधिकांशतः ऐसे कक्ष में जिसमें बाहर से आया जा सकता था (संभवतः राहगीरों द्वारा प्रयुक्त)। मोहनजोदड़ो में कुओं की कुल संख्या — लगभग 700।

3.3 दुर्ग (The Citadel)

  • दुर्ग पर संरचनाएँ — संभवतः विशिष्ट सार्वजनिक प्रयोजनों हेतु:
  • (1) मालगोदाम (Warehouse): विशाल संरचना — ईंटों के केवल निचले हिस्से शेष; ऊपरी हिस्से (संभवतः लकड़ी के) नष्ट।
  • (2) विशाल स्नानागार (The Great Bath):
    • आँगन में बना आयताकार जलाशय, चारों ओर गलियारा।
    • तल तक जाने हेतु उत्तर व दक्षिण में दो सीढ़ियाँ।
    • किनारों पर ईंटें जमाकर, जिप्सम के गारे से जलबद्ध (Watertight)।
    • तीनों ओर कक्ष — एक में बड़ा कुआँ; जलाशय का पानी एक बड़े नाले में बहता।
    • उत्तर में — छोटी संरचना, आठ स्नानघर — गलियारे के दोनों ओर चार-चार; प्रत्येक की नालियाँ गलियारे के नाले से मिलतीं।
    • व्याख्या: संरचना का अनोखापन + दुर्ग की विशिष्ट संरचनाओं का सान्निध्य → प्रयोग किसी प्रकार के विशेष आनुष्ठानिक स्नान (Ritual Bath) हेतु।

हड़प्पा की दुर्दशा (बॉक्स, पृ. 6)

  • हड़प्पा (सबसे पहले खोजा गया स्थल) — ईंट चुराने वालों द्वारा बुरी तरह नष्ट।
  • 1875 — अलेक्ज़ैंडर कनिंघम (भारतीय पुरातात्त्विक सर्वेक्षण/ASI के पहले डायरेक्टर जनरल; “भारतीय पुरातत्त्व के जनक”) ने लिखा — प्राचीन स्थल से ले जाई गई ईंटें लाहौर-मुल्तान रेल-पटरी के “लगभग 100 मील” हेतु पर्याप्त थीं।
  • इसके विपरीत मोहनजोदड़ो कहीं बेहतर संरक्षित।

4. सामाजिक भिन्नताओं का अवलोकन (Social Differences)

4.1 शवाधान (Burials)

  • सामाजिक-आर्थिक भिन्नताएँ जानने की एक विधि — शवाधानों का अध्ययन।
  • तुलना: मिस्र के पिरामिड (कुछ हड़प्पा के समकालीन) — राजकीय शवाधान, अपार धन-संपत्ति। हड़प्पा में ऐसा नहीं।
  • हड़प्पाई शवाधान: मृतक आमतौर पर गर्तों (Pits) में; कभी-कभी गर्त की बनावट भिन्न — कहीं सतहों पर ईंटों की चिनाई — क्या यह सामाजिक भिन्नता है? कहना कठिन।
  • कुछ कब्रों में मृद्भाण्ड व आभूषण — मृत्युपरांत प्रयोग की मान्यता का संकेत? पुरुषों और महिलाओं दोनों के शवाधानों से आभूषण मिले।
  • 1980 के दशक के मध्य — हड़प्पा कब्रिस्तान: एक पुरुष की खोपड़ी के समीप — शंख के तीन छल्ले, जैस्पर (Jasper) के मनके, सैकड़ों सूक्ष्म मनकों वाला आभूषण।
  • कहीं-कहीं मृतक ताँबे के दर्पणों के साथ।
  • निष्कर्ष: कुल मिलाकर हड़प्पावासी मृतकों के साथ बहुमूल्य वस्तुएँ दफ़नाने में विश्वास नहीं रखते थे।

4.2 ‘विलासिता’ की वस्तुओं की खोज (Looking for “Luxuries”)

  • दूसरी विधि — पुरावस्तुओं का वर्गीकरण: उपयोगी (Utilitarian) बनाम विलास (Luxury) की वस्तुएँ।
  • उपयोगी: रोज़मर्रा की — पत्थर/मिट्टी जैसे सामान्य पदार्थों से — चक्कियाँ, मृद्भाण्ड, सूइयाँ, झाँवा — बस्तियों में सर्वत्र।
  • कीमती/विलास: दुर्लभ, महँगी, अस्थानीय पदार्थों या जटिल तकनीकों से बनी।
    • उदाहरण: फ़यॉन्स (Faience — घिसी हुई रेत/बालू + रंग + चिपचिपे पदार्थ के मिश्रण को पकाकर बना पदार्थ) के छोटे पात्र — बनाना कठिन → कीमती।
  • जटिल स्थिति: फ़यॉन्स जैसी दुर्लभ सामग्री से बनी तकलियाँ (Spindle whorls) — रोज़मर्रा की वस्तु या विलास?
  • वितरण-अध्ययन (Distribution study): महँगे पदार्थों की दुर्लभ वस्तुएँ सामान्यतः मोहनजोदड़ो, हड़प्पा जैसी बड़ी बस्तियों में केंद्रित; छोटी बस्तियों में विरल।
    • उदाहरण: फ़यॉन्स के लघुपात्र (संभवतः सुगंधित द्रव्यों हेतु) — अधिकांशतः मोहनजोदड़ो व हड़प्पा से; कालीबंगन जैसी छोटी बस्तियों से बिल्कुल नहीं।
  • सोना — दुर्लभ व कीमती; हड़प्पा स्थलों से मिले सभी स्वर्णाभूषण संचयों (Hoards) से प्राप्त।
  • संचय (Hoard) बॉक्स (पृ. 10): लोगों द्वारा सावधानीपूर्वक, अधिकांशतः पात्रों (घड़ों) में रखी वस्तुएँ — आभूषण या पुनः प्रयोग हेतु सँभाली धातुएँ; स्वामी न लौटे तो वे वहीं रहती हैं जब तक कोई पुरातत्त्वविद न खोज निकाले।

5. शिल्प-उत्पादन के विषय में जानकारी (Craft Production)

चन्हुदड़ो (Chanhudaro)

  • मोहनजोदड़ो (125 हेक्टेयर) की तुलना में बहुत छोटी (7 हेक्टेयर) बस्ती — लगभग पूरी तरह शिल्प-उत्पादन में संलग्न।
  • शिल्प कार्य: मनके बनाना, शंख की कटाई, धातुकर्म, मुहर निर्माण, बाट बनाना।

मनकों की सामग्री व आकार

  • पत्थर: कार्नीलियन (सुंदर लाल), जैस्पर, स्फटिक (Crystal), क्वार्ट्ज़, सेलखड़ी।
  • धातुएँ: ताँबा, काँसा, सोना। अन्य: शंख, फ़यॉन्स, पकी मिट्टी।
  • कुछ मनके — दो या अधिक पत्थरों को जोड़कर; कुछ सोने के टोप वाले।
  • आकार: चक्राकार, बेलनाकार, गोलाकार, ढोलाकार, खंडित; कुछ उत्कीर्णन/चित्रकारी/रेखाचित्रों से सज्जित।

निर्माण तकनीकें

  • सेलखड़ी (मुलायम पत्थर) — आसानी से कार्य; कुछ मनके सेलखड़ी चूर्ण के लेप को साँचे में ढालकर — इससे ज्यामितीय आकारों से आगे विविध आकार संभव।
    • सेलखड़ी के सूक्ष्म मनके कैसे बनते थे — पुरातत्त्वविदों के लिए आज भी पहेली।
  • कार्नीलियन का लाल रंग — पीले रंग के कच्चे माल व उत्पादन के विभिन्न चरणों में मनकों को आग में पकाकर प्राप्त।
  • प्रक्रिया: पिंडों को तोड़ना → शल्क निकालकर अंतिम रूप → घिसाई, पॉलिश, छेद।
  • छेद करने के विशेष उपकरण — चन्हुदड़ो, लोथल तथा (हाल में) धौलावीरा से प्राप्त।

विशिष्ट केंद्र

  • नागेश्वर व बालाकोट — समुद्र-तट के समीप — शंख से बनी वस्तुओं (चूड़ियाँ, करछियाँ, पच्चीकारी) के विशिष्ट केंद्र → माल अन्य बस्तियों तक ले जाया जाता।
  • चन्हुदड़ो व लोथल से तैयार माल (जैसे मनके) → मोहनजोदड़ो व हड़प्पा जैसे बड़े शहरी केंद्रों तक।

5.1 उत्पादन केंद्रों की पहचान (Identifying Centres of Production)

  • पुरातत्त्वविद ढूँढ़ते हैं:
    1. प्रस्तर पिंड (Nodules), पूरे शंख, ताँबा-अयस्क जैसा कच्चा माल
    2. औज़ार
    3. अपूर्ण वस्तुएँ
    4. त्याग दिया गया माल
    5. कूड़ा-करकट (Waste) — सबसे अच्छे संकेतकों में से एक।
  • तर्क: शंख/पत्थर काटने पर टुकड़े कूड़े के रूप में उत्पादन-स्थान पर फेंके जाते।
  • कभी-कभी बड़े बेकार टुकड़ों से छोटी वस्तुएँ बनतीं, पर बहुत छोटे टुकड़े कार्यस्थल पर ही छूट जाते।
  • इन्हीं संकेतों से ज्ञात: शिल्प-उत्पादन केवल विशिष्ट छोटे केंद्रों में नहीं — मोहनजोदड़ो व हड़प्पा जैसे बड़े शहरों में भी होता था।

6. माल प्राप्त करने संबंधी नीतियाँ (Strategies for Procuring Materials)

  • कुछ कच्चा माल स्थानीय (मिट्टी); अन्य — पत्थर, लकड़ी, धातु — जलोढ़क मैदान (Alluvial plain) से बाहर से।
  • परिवहन: बैलगाड़ियों के मिट्टी के खिलौना-प्रतिरूप → स्थल मार्ग; साथ ही सिंधु व उपनदियों के नदी-मार्ग तथा तटीय मार्ग।

6.1 उपमहाद्वीप तथा उसके आगे से आने वाला माल

  • नीति 1 — बस्तियाँ स्थापित करना:
बस्तीसामग्री
नागेश्वर, बालाकोटशंख
शोर्तुगई (सुदूर अफ़गानिस्तान)लाजवर्द मणि (Lapis Lazuli — कीमती नीला पत्थर) के स्रोत के निकट
लोथलकार्नीलियन (गुजरात में भड़ौच से), सेलखड़ी (दक्षिणी राजस्थान/उत्तरी गुजरात), धातु (राजस्थान) के स्रोतों के निकट
  • नीति 2 — अभियान (Expeditions) भेजना:
    • राजस्थान का खेतड़ी अंचल → ताँबा; दक्षिण भारत → सोना।
    • अभियानों से स्थानीय समुदायों से संपर्क; इन इलाकों में यदा-कदा मिलने वाली हड़प्पाई पुरावस्तुएँ ऐसे संपर्कों की संकेतक।
    • खेतड़ी क्षेत्र के साक्ष्य = गणेश्वर-जोधपुरा संस्कृति — मृद्भाण्ड हड़प्पाई से भिन्न; ताँबे की वस्तुओं की असाधारण संपदा → संभवतः यहाँ के निवासी हड़प्पावासियों को ताँबा भेजते थे।

6.2 सुदूर क्षेत्रों से संपर्क (Contact with Distant Lands)

  • ओमान (अरब प्रायद्वीप का दक्षिण-पूर्वी छोर) से ताँबा:
    • रासायनिक विश्लेषण (Chemical analyses): ओमानी ताँबे व हड़प्पाई पुरावस्तुओं — दोनों में निकल (Nickel) के अंश → साझा उद्भव के संकेत।
    • बड़ा हड़प्पाई मर्तबान — ऊपर काली मिट्टी की मोटी परत (तरल पदार्थों का रिसाव रोकने हेतु) — ओमानी स्थलों से प्राप्त → संभवतः सामग्री का ओमानी ताँबे से विनिमय (Exchange)।
  • मेसोपोटामिया के लेख (तीसरी सहस्राब्दि ई.पू.): तीन क्षेत्रों से संपर्क —
लेखों का नामसंभावित पहचान
दिलमुन (Dilmun)बहरीन द्वीप
मगान (Magan)ओमान
मेलुहा (Meluhha)संभवतः हड़प्पाई क्षेत्र
  • मेलुहा से प्राप्त उत्पाद: कार्नीलियन, लाजवर्द मणि, ताँबा, सोना, विविध लकड़ियाँ।
  • मेसोपोटामिया के ताँबे में भी निकल के अंश।
  • मेसोपोटामियाई मिथक: “तुम्हारा पक्षी हाजा पक्षी हो, उसकी आवाज़ राजप्रासाद में सुनाई दे” — कई पुरातत्त्वविदों का मत: हाजा पक्षी = मोर।
  • लेख मेलुहा को नाविकों का देश कहते हैं; मुहरों पर जहाज़ों व नावों के चित्रांकन → संपर्क सामुद्रिक मार्ग से।
  • अन्य पुरातात्त्विक साक्ष्य: मेसोपोटामिया के स्थलों से हड़प्पाई मुहरें, बाट, पासे, मनके।
    • चित्र 1.18: मेसोपोटामिया की विशिष्ट बेलनाकार मुहर (Cylindrical seal) — पर उस पर बना कूबड़दार वृषभ सिंधु क्षेत्र से लिया गया प्रतीत।
    • चित्र 1.19: बहरीन में मिली गोलाकार ‘फारस की खाड़ी’ प्रकार की मुहर — कभी-कभी हड़प्पाई चित्र; ‘दिलमुन’ के स्थानीय बाट हड़प्पाई मानक का अनुसरण करते थे।

7. मुहरें, लिपि तथा बाट (Seals, Script, Weights)

7.1 मुहरें और मुद्रांकन (Seals and Sealings)

  • प्रयोग — लंबी दूरी के संपर्कों को सुविधाजनक बनाने हेतु।
  • विधि: थैले का मुख रस्सी से बाँधा → गाँठ पर गीली मिट्टी जमाकर मुहरों से दबाया → मुद्रांकन (Sealing)।
  • मुद्रांकन अक्षुण्ण = थैले से छेड़-छाड़ नहीं हुई; मुद्रांकन से प्रेषक (Sender) की पहचान भी।

7.2 एक रहस्यमय लिपि (An Enigmatic Script)

  • मुहरों पर एक पंक्ति में कुछ लिखा — संभवतः मालिक का नाम व पदवी; चित्र (आमतौर पर जानवर) — अनपढ़ लोगों हेतु सांकेतिक अर्थ।
  • अधिकांश अभिलेख संक्षिप्त; सबसे लंबे में लगभग 26 चिह्न।
  • लिपि आज तक पढ़ी नहीं जा सकी; वर्णमालीय (Alphabetical) नहीं — चिह्न बहुत अधिक: लगभग 375–400।
  • दाईं से बाईं ओर लिखी जाती थी — कुछ मुहरों पर दाईं ओर चौड़ा अंतराल, बाईं ओर संकुचन → उत्कीर्णक ने दाईं ओर से लिखना आरंभ किया।
  • लिखावट मिली है: मुहरें, ताँबे के औज़ार, मर्तबानों के अँवठ (Rims), ताँबे व मिट्टी की लघुपट्टिकाएँ, आभूषण, अस्थि-छड़ें, एक प्राचीन सूचना पट्ट (Signboard — धौलावीरा)।
  • नष्टप्राय वस्तुओं पर भी लिखा जाता रहा होगा → क्या साक्षरता व्यापक थी? — विचारणीय प्रश्न।

7.3 बाट (Weights)

  • विनिमय — बाटों की सूक्ष्म/परिशुद्ध प्रणाली से नियंत्रित।
  • सामग्री: सामान्यतः चर्ट (Chert) नामक पत्थर; घनाकार (Cubical), निशान-रहित।
  • निचले मानदंड द्विआधारी (Binary): 1, 2, 4, 8, 16, 32… 160, 200, 320, 640।
  • ऊपरी मानदंड दशमलव प्रणाली (Decimal): अनुसरण करते थे।
  • छोटे बाट — संभवतः आभूषणों और मनकों को तौलने हेतु। धातु के तराजू के पलड़े भी मिले।

8. प्राचीन सत्ता (Ancient Authority)

  • जटिल निर्णयों व कार्यान्वयन के संकेत:
    1. हड़प्पाई पुरावस्तुओं में असाधारण एकरूपता — मृद्भाण्ड, मुहरें, बाट, ईंटें।
    2. ईंटें — किसी एक केंद्र पर नहीं बनतीं, फिर भी जम्मू से गुजरात तक समान अनुपात।
    3. बस्तियाँ विशेष स्थानों पर आवश्यकतानुसार स्थापित।
    4. ईंटें बनाने, विशाल दीवारों व चबूतरों हेतु श्रम संगठित किया गया।
  • केंद्रीय प्रश्न: इन क्रियाकलापों को कौन संगठित करता था?

8.1 प्रासाद तथा शासक (Palaces and Kings)

  • सत्ता-केंद्र के पुरातात्त्विक विवरण — कोई त्वरित उत्तर नहीं।
  • मोहनजोदड़ो का एक विशाल भवन — ‘प्रासाद’ (Palace) की संज्ञा — पर उससे संबद्ध कोई भव्य वस्तुएँ नहीं मिलीं।
  • एक पत्थर की मूर्ति — ‘पुरोहित-राजा’ (Priest-King):
    • नाम-कारण: पुरातत्त्वविद मेसोपोटामिया के इतिहास व वहाँ के ‘पुरोहित-राजाओं’ से परिचित थे → वही समानताएँ सिंधु में ढूँढ़ीं।
    • परंतु हड़प्पा की आनुष्ठानिक प्रथाएँ अभी ठीक से समझी नहीं गईं; न यह जानने के साधन हैं कि अनुष्ठान करने वालों के पास राजनीतिक सत्ता थी या नहीं।
  • शासन-स्वरूप पर तीन मत:
    1. हड़प्पाई समाज में शासक नहीं थे — सभी की सामाजिक स्थिति समान।
    2. कई शासक — मोहनजोदड़ो, हड़प्पा आदि के अपने अलग-अलग राजा।
    3. एक ही राज्य (Single State) — तर्क: पुरावस्तुओं में समानताएँ, नियोजित बस्तियाँ, ईंटों के आकार का निश्चित अनुपात, कच्चे माल के स्रोतों के समीप बस्तियों की स्थापना।
  • पुस्तक का झुकाव: तीसरा मत सर्वाधिक युक्तिसंगत प्रतीत — क्योंकि इतने जटिल फ़ैसले सामूहिक रूप से लिए-लागू किए जाने की संभावना कम।
  • (पृ. 17) कुछ विद्वानों का यह भी प्रतीत होना — हड़प्पावासियों ने एक प्रकार की लोकतांत्रिक प्रणाली अपनाई थी — कुछ भवन व सुविधाएँ लोगों के लिए, लोगों के द्वारा बनाई गईं।

9. सभ्यता का अंत (The End of the Civilisation)

  • लगभग 1800 ई.पू. — चोलिस्तान जैसे क्षेत्रों में अधिकांश विकसित हड़प्पा स्थल त्याग दिए गए; गुजरात, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश की नयी बस्तियों में आबादी बढ़ी।
  • 1900 ई.पू. के बाद भी अस्तित्व में रहे स्थलों की भौतिक संस्कृति में परिवर्तन:
    • विशिष्ट पुरावस्तुओं का लोप — बाट, मुहरें, विशिष्ट मनके।
    • लेखन, लंबी दूरी का व्यापार, शिल्प विशेषज्ञता समाप्त।
    • थोड़ी वस्तुओं हेतु थोड़ा माल; आवास-निर्माण तकनीकों का ह्रास; बड़ी सार्वजनिक संरचनाओं का निर्माण बंद।
  • कुल मिलाकर → ग्रामीण जीवनशैली की ओर संकेत; ये संस्कृतियाँ = “उत्तर हड़प्पा” या “अनुवर्ती संस्कृतियाँ (Successor Cultures)”।
  • पतन की व्याख्याएँ (कारण): जलवायु परिवर्तन (Climate change), वनों की कटाई, अत्यधिक बाढ़, नदियों का सूख जाना/मार्ग बदलना, भूमि का अत्यधिक उपयोग।
    • सीमा: कुछ ‘कारण’ कुछ बस्तियों हेतु सही, पर पूरी सभ्यता के पतन की व्याख्या नहीं करते।
  • एकीकरण-तत्त्व का अंत: प्रतीत होता है कि एक सुदृढ़ एकीकरण के तत्त्व — संभवतः हड़प्पाई राज्य — का अंत हो गया — प्रमाण: मुहरों, लिपि, विशिष्ट मनकों, मृद्भाण्डों का लोप; मानकीकृत बाट के स्थान पर स्थानीय बाट; शहरों का पतन व परित्याग।
  • उपमहाद्वीप में नए शहरों के विकास हेतु — एक सहस्राब्दि से भी अधिक प्रतीक्षा करनी पड़ी।

स्रोत 3 (पृ. 18): एक ‘आक्रमण’ के साक्ष्य — व्याख्या-परिवर्तन का सर्वोत्तम उदाहरण

  1. जॉन मार्शल (मोहनजोदड़ो एंड द इंडस सिविलाईज़ेशन, 1931): डैडमैन लेन (Deadman Lane) — खोपड़ी का भाग, छाती-हाथ की हड्डियाँ — भुरभुरी अवस्था; 1925 में इसी भाग से सोलह लोगों के अस्थि-पंजर आभूषणों सहित।
  2. आर.ई.एम. व्हीलर (हड़प्पा 1946; एंशिएंट इंडिया, 1947): ऋग्वेद में पुर शब्द = प्राचीर/किला/गढ़; युद्ध-देवता इंद्र = पुरंदर (गढ़-विध्वंसक) → “मोहनजोदड़ो के अंतिम चरण में पुरुषों, महिलाओं और बच्चों का जनसंहार — पारिस्थितिक साक्ष्यों के आधार पर इंद्र (आर्य) अभियुक्त।”
  3. जॉर्ज डेल्स (द मिथिकल मैसेकर एट मोहनजोदड़ो, 1964): पुनर्परीक्षण — सभी अस्थि-पंजर एक ही काल के नहीं; केवल दो में संहार के निश्चित संकेत; अधिकांश लापरवाही से बनाए शवाधान; विनाश/अग्निकांड का कोई स्तर नहीं, कवचयुक्त सैनिकों के शव नहीं, अंतिम आत्मरक्षा के साक्ष्य नहीं → जनसंहार मिथक ध्वस्त।
  • सीख: तथ्यों का सावधानीपूर्वक पुनरीक्षण कभी-कभी पूर्ववर्ती व्याख्याओं को पूरी तरह उलट देता है।
  • राखीगढ़ी (हरियाणा, हिसार ज़िला) का अनुवांशिक अनुसंधान (वसंत शिंदे एट.अल., 2019):
    • सबसे बड़ा हड़प्पाकालीन शहर — 550 हेक्टेयर।
    • कंकाल अवशेषों से डीएनए (DNA) — डेक्कन कॉलेज पुणे, सेल्युलर एंड मॉलिक्यूलर बायोलॉजी हैदराबाद, हार्वर्ड मेडिकल कॉलेज के सहयोग से।
    • निष्कर्ष: हड़प्पावासी इसी क्षेत्र के मूल निवासी; अनुवांशिक जड़ें 10,000 ई.पू. से; उनका डीएनए आज तक कायम — दक्षिण एशियाई आबादी का अधिकांश हिस्सा उन्हीं के वंशज।
    • व्यापार-संपर्कों के बावजूद जीनों का मिश्रण कम मात्रा में।
    • अनुवांशिक निरंतरता → तथाकथित आर्यों के बड़े पैमाने पर आगमन (Aryan invasion/migration) के सिद्धांत को पूर्णतः गलत सिद्ध करता है।
    • सीमावर्ती/दूर-दराज़ के लोग भारतीय समाज में समाहित होते रहे; हड़प्पावासी ईरान व मध्य एशिया की ओर बढ़े तो जीन वहाँ फैलते गए।
    • 3-D चेहरों का पुनर्निर्माण — हरियाणा की वर्तमान आबादी के चेहरों से समानता → 5000 वर्षों की अनुवांशिक व सांस्कृतिक निरंतरता।
    • कुछ विद्वानों का तर्क: हड़प्पावासी ही वैदिक लोग थे।
    • आर्कियोजेनेटिक्स (Archaeogenetics): प्राचीन जनसंख्या के डीएनए का अध्ययन।

10. हड़प्पा सभ्यता की खोज (Discovering the Harappan Civilisation)

  • शहरों के नष्ट होने पर लोग सब भूल गए; बाद के निवासी सतह पर मिलती अपरिचित पुरावस्तुओं का अर्थ नहीं समझ पाते थे।

10.1 कनिंघम का भ्रम (Cunningham’s Confusion)

  • अलेक्ज़ैंडर कनिंघम — ASI के पहले डायरेक्टर जनरल; 19वीं शताब्दी के मध्य से उत्खनन।
  • कार्य-पद्धति: लिखित स्रोतों (साहित्य व अभिलेख) को प्राथमिकता; रुचि — आरंभिक ऐतिहासिक काल (छठी शताब्दी ई.पू.–चौथी शताब्दी ई.) व उसके बाद के पुरातत्त्व में।
  • चीनी बौद्ध तीर्थयात्रियों (चौथी–सातवीं शताब्दी ई.) के वृत्तांतों से आरंभिक बस्तियों की पहचान करते थे।
  • हड़प्पा उन यात्रा-वृत्तांतों में नहीं था; एक अंग्रेज़ ने कनिंघम को हड़प्पाई मुहर दी — उन्होंने ध्यान तो दिया, पर उसे परिचित काल-खंड (उनकी मान्यता: भारतीय इतिहास का आरंभ गंगा घाटी के पहले शहरों से) में दिनांकित करने का असफल प्रयास किया → हड़प्पा का महत्त्व समझने में चूक।
  • चित्र 1.24: कनिंघम द्वारा हड़प्पा से प्राप्त पहली ज्ञात मुहर का रेखाचित्र।

पुरास्थल, टीले, स्तर (बॉक्स, पृ. 20)

  • पुरास्थल (Site): वह स्थान जहाँ वस्तुओं/संरचनाओं के निर्माण, प्रयोग व परित्याग के अवशेष हों।
  • टीला (Mound): एक ही स्थान पर निरंतर आवास से भूमि-खंड के उपयोग/पुनःउपयोग व मलबे से बनी ऊँचाई।
  • स्तर (Strata): आवास के स्तर — रंग, प्रकृति, पुरावस्तुओं में भिन्न; “बंजर स्तर (Sterile layer)” = परित्यक्त काल के, आवास-लक्षणों से रहित।
  • नियम: सामान्यतः सबसे निचला स्तर प्राचीनतम, सबसे ऊपरी नवीनतम।
  • स्तर क्रम विज्ञान (Stratigraphy): स्तरों का अध्ययन; पुरावस्तुओं को सांस्कृतिक काल-खंडों से संबद्ध कर पुरास्थल का पूरा सांस्कृतिक क्रम ज्ञात होता है।

10.2 एक नवीन प्राचीन सभ्यता की घोषणा

  • दया राम साहनी — 20वीं शताब्दी के आरंभिक दशकों में हड़प्पा में मुहरें खोजीं — आरंभिक ऐतिहासिक स्तरों से कहीं अधिक प्राचीन स्तरों से।
  • राखाल दास बनर्जी — मोहनजोदड़ो से वैसी ही मुहरें → अनुमान: दोनों स्थल एक ही पुरातात्त्विक संस्कृति के भाग।
  • 1924 — जॉन मार्शल (ASI डायरेक्टर जनरल) ने पूरे विश्व के समक्ष सिंधु घाटी में एक नवीन सभ्यता की खोज की घोषणा की।
  • एस.एन. राव (द स्टोरी ऑफ़ इंडियन आर्कियोलॉजी): “मार्शल ने भारत को जहाँ पाया था, उसे उससे तीन हज़ार वर्ष पीछे छोड़ा।”
    • कारण: मेसोपोटामिया के पुरास्थलों में हड़प्पाई जैसी मुहरें पहले मिली थीं, तब पहचानी नहीं गईं — अब ज्ञात हुआ कि यह सभ्यता मेसोपोटामिया की समकालीन।
  • मार्शल का योगदान व सीमा:
    • भारत में कार्य करने वाले पहले पेशेवर पुरातत्त्वविद; यूनान व क्रीट के अनुभव के साथ; कनिंघम की तरह आकर्षक खोजों में रुचि, पर दैनिक जीवन की पद्धतियों में भी उत्सुकता।
    • सीमा: स्तर-विन्यास (Stratigraphy) की पूरी तरह अनदेखी — पूरे टीले में समान परिमाण वाली नियमित क्षैतिज इकाइयों के साथ उत्खनन → अलग-अलग स्तरों की पुरावस्तुएँ सामूहिक रूप से वर्गीकृत → संदर्भ-संबंधी बहुमूल्य जानकारी हमेशा के लिए लुप्त।

10.3 नयी तकनीकें तथा प्रश्न

  • 1944 — आर.ई.एम. व्हीलर (ASI डायरेक्टर जनरल) ने समस्या का निदान किया: एकसमान क्षैतिज इकाइयों की बजाय टीले के स्तर-विन्यास का अनुसरण आवश्यक; सेना के पूर्व-ब्रिगेडियर के रूप में पुरातत्त्व में सैनिक परिशुद्धता का समावेश।
  • विभाजन (1947) का प्रभाव: प्रमुख ज्ञात पुरास्थल पाकिस्तान में चले गए → भारतीय पुरातत्त्वविदों ने भारत में स्थल खोजे:
    • कच्छ में सर्वेक्षण; पंजाब व हरियाणा में अन्वेषण — कालीबंगन, लोथल, राखीगढ़ी और हाल में धौलावीरा की खोज व उत्खनन।
  • 1980 के दशक से — अंतर्राष्ट्रीय रुचि; हड़प्पा व मोहनजोदड़ो पर उपमहाद्वीप व विदेशी विशेषज्ञों का संयुक्त कार्य; आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकें — सतह-अन्वेषण से मिट्टी, पत्थर, धातु, वनस्पति व जानवरों के अवशेष; हर सूक्ष्म टुकड़े का विश्लेषण।

हड़प्पा में व्हीलर (बॉक्स, पृ. 21)

  • व्हीलर का संस्मरण (माई आर्कियोलॉजिकल मिशन टू इंडिया एंड पाकिस्तान, 1976) — 1944 की गर्म रात, चाँदनी में टीलों का अवलोकन, अगली सुबह 5.30 बजे से कार्य — आरंभिक पुरातत्त्वविदों की साहस-भावना का उदाहरण।

11. अतीत को जोड़कर पूरा करने की समस्याएँ (Problems of Piecing Together the Past)

  • हड़प्पाई लिपि से कोई मदद नहीं → भौतिक साक्ष्य (Material evidence) ही आधार: मृद्भाण्ड, औज़ार, आभूषण, घरेलू सामान।
  • परिरक्षण-पूर्वाग्रह (Preservation bias):
    • जैविक पदार्थ — कपड़ा, चमड़ा, लकड़ी, सरकंडे — सामान्यतः सड़ जाते हैं (विशेषतः ऊष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में)।
    • बच जाते हैं — पत्थर, पकी मिट्टी, धातु।
    • केवल टूटी/अनुपयोगी वस्तुएँ ही फेंकी जाती थीं; अच्छी वस्तुएँ पुनः चक्रित (Recycled) → अक्षत बहुमूल्य वस्तुएँ मिलना प्रायः संयोग।

11.1 खोजों का वर्गीकरण (Classifying finds)

  • पुनःप्राप्ति (Recovery) आरंभ मात्र है → फिर वर्गीकरण (Classification):
    1. पदार्थ के अनुसार — पत्थर, मिट्टी, धातु, अस्थि, हाथीदाँत आदि।
    2. उपयोगिता के अनुसार (अधिक जटिल) — औज़ार? आभूषण? दोनों? आनुष्ठानिक वस्तु?
  • उपयोगिता समझने के तरीके:
    • आधुनिक वस्तुओं से समानता — मनके, चक्कियाँ, पत्थर के फलक, पात्र।
    • प्राप्ति-संदर्भ (Context): वस्तु कहाँ मिली — घर में, नाले में, कब्र में, भट्ठी में?
    • अप्रत्यक्ष साक्ष्य (Indirect evidence): कपास के टुकड़े कुछ स्थलों से मिले, पर पहनावे के लिए मूर्तियों में चित्रण पर निर्भर।
  • पुरातत्त्वविदों को संदर्भ की रूपरेखाएँ (Frames of reference) विकसित करनी पड़ती हैं — पहली हड़प्पाई मुहर तब तक नहीं समझी जा सकी जब तक सही संदर्भ (सांस्कृतिक अनुक्रम + मेसोपोटामिया से तुलना) नहीं मिला।

11.2 व्याख्या की समस्याएँ (Problems of interpretation)

  • सबसे अधिक समस्याएँ — धार्मिक प्रथाओं के पुनर्निर्माण में।
  • आरंभिक दृष्टिकोण: असामान्य-अपरिचित वस्तु = संभवतः धार्मिक महत्त्व।
    • मातृदेवियाँ (Mother Goddesses): आभूषणों से लदी, विस्तृत प्रसाधन वाली नारी मृण्मूर्तियाँ।
    • पुरोहित-राजा: मानकीकृत मुद्रा (एक हाथ घुटने पर) वाली दुर्लभ पत्थर की पुरुष मूर्तियाँ।
    • आनुष्ठानिक संरचनाएँ: विशाल स्नानागार; कालीबंगन व लोथल की वेदियाँ (Fire altars)।
  • मुहरों से धार्मिक पुनर्निर्माण:
    • पेड़-पौधे उत्कीर्ण मुहरें → प्रकृति-पूजा के संकेत।
    • एकश्रृंगी (Unicorn) — एक सींग वाला काल्पनिक, संश्लिष्ट जानवर।
    • ‘आद्य शिव’ (Proto-Shiva) मुहरें: पालथी मारकर ‘योगी’ की मुद्रा में बैठी आकृति, कभी-कभी जानवरों से घिरी → हिंदू धर्म के प्रमुख देवता शिव का आरंभिक रूप मानी गई।
    • पत्थर की शंक्वाकार वस्तुएँ → लिंग के रूप में वर्गीकृत। (लिंग = परिष्कृत पत्थर जिसकी पूजा भगवान शिव के रूप में होती है।)
  • व्याख्या-पद्धति की समीक्षा: पुनर्निर्माण इस अनुमान पर — आरंभिक व बाद की परंपराओं में समानताएँ होती हैं; पुरातत्त्वविद ज्ञात से अज्ञात (वर्तमान से अतीत) की ओर बढ़ते हैं।
    • चक्कियों-पात्रों के लिए युक्तिसंगत; ‘धार्मिक’ प्रतीकों के लिए संदिग्ध।
  • ‘आद्य शिव’ पर आपत्ति: ऋग्वेद (लगभग 1500–1000 ई.पू. के बीच संकलित) में रुद्र का उल्लेख — बाद की पौराणिक परंपराओं में शिव का नाम — परंतु ऋग्वेद में रुद्र न पशुपति (जानवरों/मवेशियों का स्वामी) है, न योगी → चित्रण रुद्र के विवरण से मेल नहीं खाता। कुछ विद्वानों का सुझाव: यह आकृति शमन (Shaman) हो सकती है।
    • शमन: वे महिलाएँ/पुरुष जो जादुई व इलाज की शक्तियों तथा दूसरी दुनिया से संपर्क का दावा करते हैं।
  • मैके (अर्ली इंडस सिविलाईज़ेशन, 1948) — चित्र 1.28 के पत्थरों पर: लाजवर्द मणि, जैस्पर, चाल्सेडनी के दो इंच से छोटे सुंदर तराशे शंकु — लिंग माने गए हैं, या संभवतः पट्टों पर खेले जाने वाले खेलों में प्रयुक्त होते थे → एक ही वस्तु की दो भिन्न व्याख्याएँ संभव।
  • उपलब्धियाँ व अनुत्तरित प्रश्न (पृ. 24):
    • बेहतर ज्ञान: अर्थव्यवस्था, सामाजिक भिन्नताएँ, कार्यप्रणाली।
    • अनुत्तरित: क्या विशाल स्नानागार आनुष्ठानिक संरचना थी? साक्षरता कितनी व्यापक? कब्रिस्तानों में सामाजिक भिन्नताएँ कम क्यों? क्या महिलाएँ मृद्भाण्ड बनाती थीं या केवल रँगती थीं? शिल्पकर्मियों के क्या कार्य? नारी मृण्मूर्तियों का क्या उपयोग?
    • स्त्री-पुरुष संबंधों से जुड़े पहलुओं पर बहुत कम अन्वेषण — भविष्य के लिए पूरी तरह नया क्षेत्र।
    • यदि कोई द्विभाषिक अभिलेख (Bilingual inscription) मिले तो लिपि पढ़ने और भाषाओं के प्रश्नों पर विराम संभव।
    • हड़प्पा और वैदिक लोगों के संबंधों पर और शोध आवश्यक; कुछ विद्वानों का तर्क — हड़प्पावासी ही वैदिक लोग थे।

कालरेखाएँ (Timelines)

कालरेखा 1 — आरंभिक भारतीय पुरातत्त्व के प्रमुख कालखंड

कालकालखंड
20 लाख वर्ष (वर्तमान से पूर्व)निम्न पुरापाषाण (Lower Palaeolithic)
80,000मध्य पुरापाषाण
35,000उच्च पुरापाषाण
12,000मध्य पाषाण (Mesolithic)
10,000नवपाषाण (Neolithic — आरंभिक कृषक तथा पशुपालक)
6,000ताम्रपाषाण (Chalcolithic — ताँबे का पहली बार प्रयोग)
2600 ई.पू.हड़प्पा सभ्यता
1000 ई.पू.आरंभिक लौहकाल, महापाषाण शवाधान
600–400 ई.पू.आरंभिक ऐतिहासिक काल
(सभी तिथियाँ अनुमानित; प्राचीनतम साक्ष्य की सूचक)

कालरेखा 2 — हड़प्पाई पुरातत्त्व के विकास के प्रमुख चरण

वर्षघटना
1875हड़प्पाई मुहर पर कनिंघम की रिपोर्ट
1921दया राम साहनी — हड़प्पा में उत्खनन आरंभ
1922मोहनजोदड़ो में उत्खनन प्रारंभ (राखाल दास बनर्जी)
1946आर.ई.एम. व्हीलर — हड़प्पा में उत्खनन
1955एस.आर. राव — लोथल में खुदाई आरंभ
1960बी.बी. लाल व बी.के. थापर — कालीबंगन में उत्खनन आरंभ
1974एम.आर. मुगल — बहावलपुर में अन्वेषण
1980जर्मन-इतालवी संयुक्त दल — मोहनजोदड़ो में सतह-अन्वेषण
1986अमरीकी दल — हड़प्पा में उत्खनन
1990आर.एस. बिष्ट — धौलावीरा में उत्खनन आरंभ
1997अमरेंद्र नाथ — राखीगढ़ी में खुदाई
2013वसंत शिंदे — राखीगढ़ी में पुरातत्त्व-अनुवांशिक अनुसंधान

NCERT अभ्यास प्रश्न (पृ. 26–27)

उत्तर दीजिए (100–150 शब्द):

  1. हड़प्पा सभ्यता के शहरों में लोगों को उपलब्ध भोजन सामग्री की सूची; उपलब्ध कराने वाले समूहों की पहचान।
  2. पुरातत्त्वविद हड़प्पाई समाज में सामाजिक-आर्थिक भिन्नताओं का पता किस प्रकार लगाते हैं? किन भिन्नताओं पर ध्यान?
  3. क्या जल निकास प्रणाली नगर-योजना की ओर संकेत करती है? कारण सहित।
  4. मनके बनाने हेतु प्रयुक्त पदार्थों की सूची; किसी एक प्रकार का मनका बनाने की प्रक्रिया।
  5. चित्र 1 (शवाधान) का वर्णन — शव कैसे रखा गया, समीप की वस्तुएँ, शरीर पर पुरावस्तुएँ, कंकाल के लिंग का ज्ञान।

लघु निबंध (लगभग 500 शब्द): 6. मोहनजोदड़ो की विशिष्टताओं का वर्णन। 7. शिल्प उत्पादन हेतु आवश्यक कच्चे माल की सूची व प्राप्ति के तरीके। 8. पुरातत्त्वविद किस प्रकार अतीत का पुनर्निर्माण करते हैं। 9. हड़प्पाई समाज में शासकों द्वारा किए जाने वाले संभावित कार्यों की चर्चा।

मानचित्र कार्य: 10. मानचित्र 1 — कृषि-साक्ष्य वाले स्थल (पेंसिल घेरा), शिल्प-उत्पादन (क्रॉस), कच्चा माल (‘क’)।

परियोजना कार्य: 11. संग्रहालय-भ्रमण रिपोर्ट (दस वस्तुएँ)। 12. पत्थर/धातु/मिट्टी की दस वर्तमान वस्तुओं के रेखाचित्र — हड़प्पाई चित्रों से तुलना।

शिक्षक-संदर्भ: चर्चा कीजिए (In-text Discussion Prompts)

  1. (पृ. 3) मानचित्र 1 व 2 की तुलना — बस्तियों के वितरण में समानताएँ/असमानताएँ।
  2. (पृ. 4) आहार संबंधी आदतें जानने हेतु पुरातत्त्वविद कौन से साक्ष्य प्रयोग करते हैं?
  3. (पृ. 4) क्या इन औज़ारों का प्रयोग फ़सल कटाई हेतु होता होगा?
  4. (पृ. 5) निचला शहर दुर्ग से किस प्रकार भिन्न है?
  5. (पृ. 7) आँगन कहाँ है? सीढ़ियाँ कहाँ? प्रवेशद्वार कैसा? (चित्र 1.9)
  6. (पृ. 8) मोहनजोदड़ो के कौन से वास्तुकला संबंधी लक्षण नियोजन की ओर संकेत करते हैं? क्या दुर्ग पर मालगोदाम व स्नानागार के अतिरिक्त अन्य संरचनाएँ भी हैं?
  7. (पृ. 10) आधुनिक अंतिम संस्कार विधियाँ — किस सीमा तक सामाजिक भिन्नताओं को परिलक्षित करती हैं?
  8. (पृ. 11) अध्याय की पत्थर की पुरावस्तुओं की सूची — उपयोगी या विलास?
  9. (पृ. 14) हड़प्पाई क्षेत्र से ओमान, दिलमुन, मेसोपोटामिया तक मार्ग।
  10. (पृ. 15) चित्र 1.22 — मिट्टी के टुकड़े पर कितनी मुहरों की छाप? वर्तमान लंबी-दूरी विनिमय के तरीके — लाभ व समस्याएँ।
  11. (पृ. 16) क्या हड़प्पाई समाज में सभी लोग समान रहे होंगे?
  12. (पृ. 21) कौन से विषय कनिंघम को रुचिकर लगते? 1947 के बाद कौन-कौन से प्रश्न रोचक माने गए?
  13. (पृ. 24) हड़प्पाई अर्थव्यवस्था के वे पहलू जिनका पुनर्निर्माण पुरातात्त्विक साक्ष्यों से किया गया है।

अतिरिक्त पठन (पुस्तक-सूची, पृ. 27)

  • रेमंड तथा ब्रिजेट आल्चिन, ऑरिजिंस ऑफ़ ए सिविलाईज़ेशन (1997)
  • जी.एस. पोसल, द इंडस सिविलाईज़ेशन (2003)
  • शीरीन रत्नागर, अंडरस्टैंडिंग हड़प्पा (2001)
  • वेबसाइट: www.harappa.com