पाठ्यपुस्तक — आर्थिक विकास की समझ, कक्षा 10 अर्थशास्त्र · NCERT · पृष्ठ 74 से 89
शून्य — पढ़ाने से पहले यह समझ लीजिए
यह पूरी किताब का आख़िरी अध्याय है, और यह अकेला अध्याय ऐसा है जो विद्यार्थी से कुछ करने को कहता है।
बाक़ी चार अध्यायों में वह देखने वाला था — विकास को देखा, क्षेत्रकों को देखा, मुद्रा को देखा, वैश्वीकरण को देखा। इस अध्याय में वह ख़ुद पात्र है — क्योंकि वह पहले ही दिन से एक उपभोक्ता है।
किताब की अपनी “शिक्षक के लिए निर्देश” (पृष्ठ 74) यही कहती है —
“नये उपभोक्ताओं को वास्तविकता से परिचित कराने और उपभोक्ता आंदोलन में भाग लेने हेतु उन्हें प्रोत्साहित करने की ज़रूरत है (नये उपभोक्ताओं को उपभोक्ता के रूप में सावधान और जानकार नागरिक बनना है)।” और — “हमें छात्रों को इस योग्य बनाना है कि वे समझदार उपभोक्ता के रूप में जागरूक होकर उपभोक्ता आंदोलन को नयी दिशा दें।”
अध्याय की बनावट — तीन सीढ़ियाँ★★
| सीढ़ी | पृष्ठ | विषय | सवाल जिसका उत्तर देती है |
|---|---|---|---|
| 1 | 75–77 | बाज़ार में उपभोक्ता — शोषण क्यों और कैसे | “नियमों की ज़रूरत ही क्यों है?” |
| 2 | 77–78 | उपभोक्ता आंदोलन और COPRA | “यह अधिकार आए कहाँ से?” |
| ★3 | 79–85 | छह अधिकार और निवारण का तंत्र | “अब मैं क्या कर सकता हूँ?” |
| 4 | 86–87 | आंदोलन की ईमानदार समीक्षा | “फिर भी क्या कमी रह गई?” |
★★इस अध्याय की आत्मा एक वाक्य में — “अधिकार क़ानून की किताब में लिखा होना काफ़ी नहीं है — जब तक उपभोक्ता जागरूक न हो, वह अधिकार काग़ज़ पर ही पड़ा रहता है।”
बोर्ड पर लिखने और पूरे अध्याय भर रहने देने वाली पंक्ति —
“उपभोक्ता का सबसे बड़ा हथियार क़ानून नहीं — रसीद है।”
और किताब का अपना नारा, जो हर कक्षा में दोहराइए —
“सतर्क उपभोक्ता ही सुरक्षित उपभोक्ता है।” (पृष्ठ 88)
1 — बाज़ार में उपभोक्ता (पृष्ठ 75)
हम बाज़ार में दो रूपों में होते हैं
“बाज़ार में हमारी भागीदारी उत्पादक और उपभोक्ता दोनों रूपों में होती है। वस्तुओं एवं सेवाओं के उत्पादक के रूप में, हम पहले वर्णित कृषि, उद्योग या सेवा जैसे क्षेत्रों में कार्यरत हो सकते हैं। उपभोक्ताओं की भागीदारी बाज़ार में तब होती है, जब वे अपनी आवश्यकतानुसार वस्तुओं या सेवाओं को ख़रीदते हैं। उपभोक्ता के रूप में लोगों द्वारा उपभोग किए जानेवाली ये अंतिम वस्तुएँ होती हैं।”
★अध्याय 2 से सीधा जोड़ — “तुमने पढ़ा था कि हर आदमी किसी न किसी क्षेत्रक में काम करता है। वह उसका उत्पादक वाला चेहरा था। आज उसका दूसरा चेहरा देखेंगे — उपभोक्ता वाला। और यह चेहरा सबका है — जो काम करता है उसका भी, जो नहीं करता उसका भी।”
नियमों की ज़रूरत क्यों — किताब पुरानी बातें याद दिलाती है★
“पिछले अध्यायों में हमने विकास को बढ़ावा देने के लिए ज़रूरी नियमों और नियंत्रणों या इसके लिए उठाये गए कदमों की आवश्यकता का वर्णन किया है।”
| किसके लिए नियम चाहिए | कहाँ पढ़ा था |
|---|---|
| असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों की सुरक्षा के लिए | अध्याय 2 |
| साहूकारों द्वारा लगाए जाने वाले उच्च ब्याज दर से लोगों को बचाने के लिए | अध्याय 3 |
| पर्यावरण की सुरक्षा के लिए | अध्याय 1 (धारणीयता) |
और किताब स्वप्ना का नाम फिर लेती है — “वे स्वप्ना जैसी महिला को ऋण चुकाने के लिए अपनी ज़मीन बेचने को विवश कर सकते हैं।” ★यानी अध्याय 3 की स्वप्ना यहाँ लौट आई है — बच्चों को यह ज़रूर याद दिलाइए।
और अब असली बात — अकेला उपभोक्ता कमज़ोर है★★
“बाज़ार में भी उपभोक्ताओं की सुरक्षा के लिए नियम एवं विनियमों की आवश्यकता होती है, क्योंकि अकेला उपभोक्ता प्राय: स्वयं को कमज़ोर स्थिति में पाता है। ख़रीदी गयी वस्तु या सेवा के बारे में जब भी कोई शिकायत होती है, तो विक्रेता सारा उत्तरदायित्व क्रेता पर डालने का प्रयास करता है।” ★“सामान्यत: उनकी प्रतिक्रिया होती है: ‘आपने जो ख़रीदा है अगर वह पसंद नहीं है तो कहीं और जाइए।’ मानो, बिक्री हो जाने के बाद विक्रेता की कोई ज़िम्मेदारी नहीं रह जाती। उपभोक्ता आंदोलन… इस स्थिति को बदलने का एक प्रयास है।”
कक्षा में यह वाक्य किसी बच्चे से दुकानदार की आवाज़ में बुलवाइए — “पसंद नहीं है तो कहीं और जाइए।” — और फिर पूछिए “यह वाक्य तुमने कभी सुना है?” पूरी कक्षा के हाथ खड़े हो जाएँगे। यही अध्याय की शुरुआत है।
2 — शोषण के तरीक़े (पृष्ठ 75–76)★★
(क) छोटे दुकानदार का शोषण
“बाज़ार में शोषण कई रूपों में होता है। उदाहरणार्थ, कभी-कभी व्यापारी अनुचित व्यापार करने लग जाते हैं, जैसे — • दुकानदार उचित वज़न से कम वज़न तौलते हैं • व्यापारी उन शुल्कों को जोड़ देते हैं, जिनका वर्णन पहले न किया गया हो • मिलावटी/दोषपूर्ण वस्तुएँ बेची जाती हैं”
(ख) और बड़ी कंपनियों का शोषण — यह ज़्यादा ख़तरनाक है★
“जब उत्पादक थोड़े और शक्तिशाली होते हैं और उपभोक्ता कम मात्रा में ख़रीददारी करते हैं और बिखरे हुए होते हैं, तो बाज़ार उचित तरीक़े से कार्य नहीं करता। विशेष रूप से यह स्थिति तब होती है, जब इन वस्तुओं का उत्पादन बड़ी कंपनियाँ कर रही हों।” “अधिक पूँजीवाली, शक्तिशाली और समृद्ध कंपनियाँ विभिन्न प्रकार से चालाकीपूर्वक बाज़ार को प्रभावित कर सकती हैं। उपभोक्ताओं को आकर्षित करने के लिए वे समय-समय पर मीडिया और अन्य स्रोतों से ग़लत सूचना देते हैं।”
किताब के अपने दो उदाहरण — ये ज़रूर पढ़ाइए★★
| उदाहरण | क्या हुआ |
|---|---|
| शिशु दूध पाउडर | “एक कंपनी ने यह दावा करते हुए कि माता के दूध से हमारा उत्पाद बेहतर है, सर्वाधिक वैज्ञानिक उत्पाद के रूप में शिशुओं के लिए दूध का पाउडर पूरे विश्व में कई वर्षों तक बेचा। कई वर्षों के लगातार संघर्ष के बाद कंपनी को यह स्वीकार करना पड़ा कि वह झूठे दावे करती आ रही थी।” |
| सिगरेट | “सिगरेट उत्पादक कंपनियों से यह बात मनवाने के लिए कि उनका उत्पाद कैंसर का कारण हो सकता है, न्यायालय में लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी।” |
★इन दोनों में एक ही बात साझा है — बोर्ड पर लिखिए: “सच अपने आप बाहर नहीं आया। किसी ने वर्षों लड़कर उसे बाहर निकाला।” और किताब का निष्कर्ष — “अत: उपभोक्ताओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए नियम और विनियमों की आवश्यकता है।”
कार्टूनों की दो पंक्तियाँ — इन्हें कक्षा में पढ़वाइए
(पृष्ठ 76, टूटा खिलौना पकड़े लड़का) — “उन्होंने जानबूझकर इसे ऐसा बनाया कि कुछ महीनों में ये बेकार हो जाए, ताकि मुझे नया ख़रीदना पड़े।” ★(यह “नियोजित अप्रचलन” है — नाम बताने की ज़रूरत नहीं, बात समझ आ जाए तो काफ़ी है।) (पृष्ठ 77, सिगरेट वाला) — “सभी जानते हैं कि तम्बाकू लोगों की जान ले लेता है, पर कौन कहे कि तम्बाकू कंपनियों को तम्बाकू बेचने की छूट नहीं देनी चाहिए। यही पूँजीवाद है।”
3 — उपभोक्ता आंदोलन (पृष्ठ 77)★
पहले क्या हालत थी
“उपभोक्ता आंदोलन का प्रारंभ उपभोक्ताओं के असंतोष के कारण हुआ, क्योंकि विक्रेता कई अनुचित व्यावसायिक व्यवहारों में शामिल होते थे। बाज़ार में उपभोक्ता को शोषण से बचाने के लिए कोई क़ानूनी व्यवस्था उपलब्ध नहीं थी।” ★“लम्बे समय तक, जब एक उपभोक्ता एक विशेष ब्रांड उत्पाद या दुकान से संतुष्ट नहीं होता था तो सामान्यत: वह उस ब्रांड उत्पाद को ख़रीदना बंद कर देता था या उस दुकान से ख़रीददारी करना बंद कर देता था। यह मान लिया जाता था कि उपभोक्ता की ज़िम्मेदारी है कि वह एक वस्तु या सेवा को ख़रीदते वक़्त सावधानी बरते।”
★★कक्षा में यह सवाल पूछिए — “पहले उपभोक्ता के पास एक ही हथियार था — ख़रीदना बंद कर देना। क्या यह काफ़ी था?” उत्तर की दिशा — “नहीं। क्योंकि जो पैसा जा चुका है वह वापस नहीं आता; दुकानदार को फ़र्क़ नहीं पड़ता; और अगर पूरे बाज़ार में एक ही चीज़ मिलती हो तो ‘कहीं और जाना’ भी संभव नहीं।”
और यही बदला — “संस्थाओं को लोगों में जागरूकता लाने में, भारत और पूरे विश्व में कई वर्ष लग गए। इसने वस्तुओं और सेवाओं की गुणवत्ता सुनिश्चित करने की ज़िम्मेदारी विक्रेताओं पर भी डाल दिया।”
भारत में आंदोलन का सफ़र★
| कब | क्या हुआ |
|---|---|
| 1960 का दशक | “अत्यधिक खाद्य कमी, जमाखोरी, कालाबाजारी, खाद्य पदार्थों एवं खाद्य तेल में मिलावट की वजह से 1960 के दशक में व्यवस्थित रूप में उपभोक्ता आंदोलन का उदय हुआ।” |
| 1970 का दशक | “उपभोक्ता संस्थाएँ वृहत् स्तर पर उपभोक्ता अधिकार से संबंधित आलेखों के लेखन और प्रदर्शनी का आयोजन का कार्य करने लगीं थीं।” |
| और | “उन्होंने सड़क यात्री परिवहन में अत्यधिक भीड़-भाड़ और राशन दुकानों में होने वाले अनुचित कार्यों पर नज़र रखने के लिए उपभोक्ता दल बनाया।” |
| आज | “हाल में, भारत में उपभोक्ता दलों की संख्या में भारी वृद्धि हुई है।” |
किताब की परिभाषा — भारत में उपभोक्ता आंदोलन का जन्म “‘सामाजिक बल’ के रूप में” हुआ, “अनैतिक और अनुचित व्यवसाय कार्यों से उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करने और प्रोत्साहित करने की आवश्यकता के साथ।”
4 — उपभोक्ता इंटरनेशनल और COPRA (पृष्ठ 78)★
उपभोक्ता इंटरनेशनल
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| 1985 | “संयुक्त राष्ट्र ने उपभोक्ता सुरक्षा के लिए संयुक्त राष्ट्र के दिशा-निर्देशों को अपनाया।” |
| यह क्या था | “यह… राष्ट्रों के लिए और ऐसा करने के लिए अपनी सरकारों को मजबूर करने हेतु ‘उपभोक्ता की वकालत करने वाले समूह’ के लिए, एक हथियार था।” |
| महत्त्व | “अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर यह उपभोक्ता आंदोलन का आधार बना।” |
| ★आज | “आज उपभोक्ता इंटरनेशनल 100 से भी अधिक देशों के 200 संस्थाओं का एक संरक्षक संस्था बन गया है।” |
और भारत में — 1986, COPRA★★
“इन सभी प्रयासों के परिणामस्वरूप, यह आंदोलन वृहत् स्तर पर उपभोक्ताओं के हितों के ख़िलाफ़ और अनुचित व्यवसाय शैली को सुधारने के लिए व्यावसायिक कंपनियों और सरकार दोनों पर दबाव डालने में सफल हुआ। 1986 में भारत सरकार द्वारा एक बड़ा कदम उठाया गया। यह उपभोक्ता सुरक्षा अधिनियम, 1986 क़ानून का बनना था, जो COPRA के नाम से प्रसिद्ध है।”
★यह तारीख़ जोड़कर याद कराइए — 24 दिसंबर 1986 को संसद ने COPRA पारित किया, और तभी से 24 दिसंबर = राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस है (पृष्ठ 86)।
5 — छह उपभोक्ता अधिकार (पृष्ठ 79–84)★★
“उपभोक्ता सुरक्षा अधिनियम, 1986 एक उपभोक्ता को निम्नलिखित अधिकार प्रदान करता है” (पृष्ठ 85 का अभ्यास) — (क) चयन का अधिकार · (ख) सूचना का अधिकार · (ग) निवारण का अधिकार · (घ) प्रतिनिधित्व का अधिकार · (च) सुरक्षा का अधिकार · (छ) उपभोक्ता शिक्षा का अधिकार
★★याद रखने का सूत्र — “सु-सू-च-नि-प्र-शि” सुरक्षा · सूचना · चयन · निवारण · प्रतिनिधित्व · शिक्षा (पहले तीन बताते हैं कि ख़रीदते समय क्या हक़ है; अगले तीन बताते हैं कि ग़लत हो जाने पर क्या हक़ है।)
अधिकार 1 — सुरक्षा का अधिकार (पृष्ठ 79)★
“जब हम एक उपभोक्ता के रूप में बहुत-सी वस्तुओं और सेवाओं का उपयोग करते हैं, तो हमें वस्तुओं के बाज़ारीकरण और सेवाओं की प्राप्ति के ख़िलाफ़ सुरक्षित रहने का अधिकार होता है, क्योंकि ये जीवन और संपत्ति के लिए ख़तरनाक होते हैं। उत्पादकों के लिए आवश्यक है कि वे सुरक्षा नियमों और विनियमों का पालन करें।”
रेजी का कष्ट — यह बॉक्स पूरा पढ़वाइए
| क्या | विवरण |
|---|---|
| कौन | रेजी मैथ्यू, कक्षा 9 का एक स्वस्थ लड़का, केरल |
| क्यों भर्ती हुआ | एक निजी चिकित्सालय में टॉन्सिल निकलवाने के लिए |
| क्या हुआ | “एक ई.एन.टी. सर्जन ने सामान्य बेहोशी की दवा देकर टॉन्सिल निकालने के लिए ऑपरेशन किया। अनुचित बेहोशी के कारण रेजी में दिमाग़ी असामान्यता के लक्षण आ गए, जिसकी वजह से वह जीवन भर के लिए अपंग हो गया।” |
| पहला क़दम | पिता ने राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण समिति में 5,00,000 के मुआवज़े का दावा किया |
| ! पहला झटका | “राज्य समिति ने यह कह कर मामला ख़ारिज कर दिया कि सबूत पर्याप्त नहीं है।” |
| ★दूसरा क़दम | “रेजी के पिता ने दिल्ली स्थित राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण समिति में पुन: अपील की।” |
| ★नतीजा | “मामले की जाँच करने के बाद राष्ट्रीय समिति ने अस्पताल को चिकित्सा में लापरवाही का दोषी पाया और हर्ज़ाना देने का निर्देश दिया।” |
★★रेजी की कहानी का असली सबक़ पहली जीत नहीं, पहली हार है। कक्षा से पूछिए — “अगर रेजी के पिता राज्य समिति में हारकर रुक जाते, तो क्या होता?” यही इस अध्याय का सबसे बड़ा संदेश है — “हार जाने का मतलब रास्ता ख़त्म हो जाना नहीं है। ऊपर की अदालत खुली है।”
किताब का उदाहरण भी लीजिए — प्रेशर कुकर का सेफ़्टी वॉल्व — “जो यदि ख़राब हो तो भयंकर दुर्घटना का कारण हो सकता है। सेफ़्टी वॉल्व के निर्माता को इसकी उच्च गुणवत्ता सुनिश्चित करनी चाहिए।”
! और किताब यहाँ एक कड़वी बात कहती है — “फिर भी हमें बाजार में निम्न गुणवत्तावाले उत्पाद प्राप्त होते हैं, क्योंकि इन नियमों का पर्यवेक्षण उचित रूप से नहीं हो रहा है और उपभोक्ता आंदोलन भी बहुत ज़्यादा मजबूत नहीं है।”
अधिकार 2 — सूचना का अधिकार (पृष्ठ 80)★★
पैकेट पर क्या-क्या लिखा होना चाहिए —
“ये जानकारियाँ उस वस्तु के अवयवों, मूल्य, बैच संख्या, निर्माण की तारीख़, ख़राब होने के पते के बारे में अंतिम तिथि और वस्तु बनाने वाले के पते के बारे में होती हैं।” • दवा पर — “उचित प्रयोग के बारे में निर्देश” और “अन्य प्रभावों और ख़तरों से संबंधित जानकारी” • वस्त्र पर — “धुलाई संबंधी निर्देश”
ये नियम क्यों बने —
“यह इसलिए कि उपभोक्ता जिन वस्तुओं और सेवाओं को ख़रीदता है, उसके बारे में उसे सूचना पाने का अधिकार है। तब उपभोक्ता वस्तु की किसी भी प्रकार की ख़राबी होने पर शिकायत कर सकता है, मुआवजा पाने या वस्तु बदलने की माँग कर सकता है।”
★किताब का बहुत काम का उदाहरण — “यदि हम एक उत्पाद ख़रीदते हैं और उसके ख़राब होने की अन्तिम तिथि के पहले ही वह ख़राब हो जाता है, तो हम उसे बदलने के बारे में कह सकते हैं। यदि वस्तु ख़राब होने की अंतिम समय-सीमा उस पर नहीं छपी है, तब विनिर्माता दुकानदार पर आरोप लगा देगा और अपनी ज़िम्मेदारी नहीं मानेगा।” — और आगे — “यदि लोग अंतिम तिथि समाप्त हो गई दवाओं को बेचते हैं, तो उनके ख़िलाफ़ कार्यवाही की जा सकती है।”
MRP — यह हिस्सा हर बच्चे के काम आएगा★★
“यदि, कोई व्यक्ति मुद्रित मूल्य से अधिक मूल्य पर वस्तु बेचता है तो कोई भी उसका विरोध और शिकायत कर सकता है। यह अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) के द्वारा इंगित किया हुआ होता है।” ★★“वस्तुत: उपभोक्ता, विक्रेता से अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) से कम दाम पर वस्तु देने के लिए मोल-भाव कर सकते हैं।”
कक्षा में यही सबसे उपयोगी बात है। बोर्ड पर बड़े अक्षरों में लिखिए — “MRP सबसे ऊँची क़ीमत है — तय क़ीमत नहीं।” और पूछिए — “तो जब दुकानदार कहे ‘यही रेट है, MRP है’ — तो अब तुम क्या कहोगे?”
सूचना का अधिकार (RTI) — 2005
“आज सरकार प्रदत्त विविध सेवाओं को उपयोगी बनाने के लिए सूचना पाने के अधिकार को बढ़ा दिया गया है। सन् 2005 के अक्टूबर में भारत सरकार ने एक क़ानून लागू किया जो RTI (राइट टू इनफ़ॉर्मेशन) या सूचना पाने का अधिकार के नाम से जाना जाता है और जो अपने नागरिकों को सरकारी विभागों के कार्य-कलापों की सभी सूचनाएँ पाने के अधिकार को सुनिश्चित करता है।”
अमृता का मामला (पृष्ठ 80) —
एक इंजीनियरिंग स्नातक ने सरकारी विभाग में सारे प्रमाणपत्र जमा करके इंटरव्यू दिया, पर कोई रिज़ल्ट नहीं मिला और कर्मचारियों ने उसके प्रश्नों का उत्तर देने से इनकार कर दिया। तब उसने RTI का प्रयोग करते हुए प्रार्थना-पत्र दिया कि “एक उचित समय तक परिणाम की जानकारी पाना उसका अधिकार था, जिससे कि वह अपने भविष्य की योजना बना सके।” ★नतीजा — “उसको न केवल रिज़ल्ट की घोषणा में देरी के कारणों के बारे में सूचित किया गया बल्कि उसको नियुक्ति के लिए बुलावे का पत्र मिल गया, क्योंकि उसने इंटरव्यू अच्छा दिया था।”
अधिकार 3 — चयन का अधिकार (पृष्ठ 81)★
“किसी भी उपभोक्ता को जो कि किसी सेवा को प्राप्त करता है, चाहे वह किसी भी आयु या लिंग का हो और किसी भी तरह की सेवा प्राप्त करता हो, उसको सेवा प्राप्त करते हुए हमेशा चुनने का अधिकार होगा।”
किताब के तीन उदाहरण — तीनों “जबरदस्ती जोड़ी गई ख़रीद” के हैं
| उदाहरण | क्या ग़लत है |
|---|---|
| दंतमंजन + ब्रश | “दुकानदार कहता है कि वह केवल दंतमंजन तभी बेचेगा, जब आप दंतमंजन के साथ एक ब्रश भी ख़रीदेंगे” — अगर आप ब्रश ख़रीदने के इच्छुक नहीं हैं, तब आपके चुनने के अधिकार का उल्लंघन हुआ है। |
| गैस कनेक्शन + चूल्हा | “जब आप नया गैस कनेक्शन लेते हैं तो गैस डीलर उसके साथ एक चूल्हा भी लेने के लिए दबाव डालता है।” |
| सामान्य नियम | “कई बार हमें उन वस्तुओं को ख़रीदने के लिए भी दबाव डाला जाता है, जिनको ख़रीदने की हमारी इच्छा बिलकुल नहीं होती और तब आपके पास चुनाव के लिए कोई विकल्प नहीं होता।” |
★★अबिरामी का मामला — “पैसे लौटाए गए” (पृष्ठ 81)
| चरण | क्या हुआ |
|---|---|
| कौन | अंसारी नगर की अबिरामी, एक छात्रा |
| क्या किया | दिल्ली में व्यावसायिक पाठ्यक्रम में पढ़ने के लिए एक क्षेत्रीय कोचिंग संस्थान के दो वर्षीय पाठ्यक्रम में नामांकन |
| कितना दिया | पूरे दो वर्ष के अध्ययन के लिए करीब 61,020 रुपये जमा किए |
| समस्या | “उसने यह पाया कि पढ़ाई का स्तर वहाँ ठीक नहीं है, इसीलिए उसने साल के अंत में पाठ्यक्रम को छोड़ देने का निश्चय किया। जब उसने एक साल का पैसा लौटाने की बात की, तो उसे मना कर दिया गया।” |
| ★जिला आयोग | 28,000 रुपया लौटाने का आदेश — “यह कहते हुए कि छात्रा को चुनने का अधिकार है।” |
| ! संस्थान की चाल | संस्थान ने राज्य उपभोक्ता आयोग में अपील की |
| ★★राज्य आयोग | जिला आयोग का निर्देश सुरक्षित रखते हुए, आगे संस्थान को बेकार की अपील करने के लिए 25,000 का दंड लगाया; और संस्थान को 7,000 रुपये मुआवजे और याचिका खर्च के रूप में छात्रा को देने के लिए कहा |
| ★और सबके लिए नियम | “राज्य आयोग ने सभी शिक्षा संस्थानों और व्यावसायिक संस्थाओं को विद्यार्थियों से पूरे साल की फ़ीस को एडवांस में लेने से भी मना किया। आयोग के अनुसार, इस आदेश का उल्लंघन करने पर दंड शुल्क भरना पड़ सकता है साथ ही जेल भी हो सकती है।” |
★★यह मामला बच्चों को सीधे छूता है, क्योंकि वे ख़ुद कोचिंग जाते हैं। पूछिए — “अबिरामी को 28,000 वापस मिले। पर राज्य आयोग ने जो 25,000 का दंड लगाया, वह अबिरामी को नहीं मिला — फिर वह क्यों लगाया गया?” उत्तर की दिशा — “ताकि आगे कोई संस्थान सिर्फ़ छात्र को थकाने के लिए अपील न करे। ★कुछ फ़ैसले एक आदमी के लिए नहीं, सबके लिए होते हैं।”
अधिकार 4 — क्षतिपूर्ति निवारण का अधिकार (पृष्ठ 82)★★
“उपभोक्ताओं को अनुचित सौदेबाज़ी और शोषण के विरुद्ध क्षतिपूर्ति निवारण का अधिकार है। यदि एक उपभोक्ता को कोई क्षति पहुँचाई जाती है, तो क्षति की मात्रा के आधार पर उसे क्षतिपूर्ति पाने का अधिकार होता है। इस कार्य को पूरा करने के लिए एक आसान और प्रभावी जन-प्रणाली बनाने की आवश्यकता है।”
★“उपभोक्ता, उपयुक्त उपभोक्ता केन्द्र के सम्मुख अपनी शिकायत दर्ज करा सकता है, स्वयं किसी वकील के साथ अथवा वकील की सेवा के बिना।” और आज — “उपभोक्ता, एक व्यक्ति के रूप में या एक समूह के रूप में (जिसे क्लास एक्शन सूट कहा जाता है), शारीरिक रूप में अथवा इंटरनेट के माध्यम से अपनी शिकायत दर्ज करवा सकते हैं और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के द्वारा अपने मुक़दमों की कार्यवाही करवा सकते हैं।”
★★श्री प्रकाश का मामला — नौ सीढ़ियाँ (पृष्ठ 82–83)
यह किताब का सबसे व्यावहारिक हिस्सा है। पूरी प्रक्रिया चित्रों में दी गई है — इसे बोर्ड पर क्रम से लिखवाइए —
| सीढ़ी | क्या हुआ |
|---|---|
| 1 | अपनी बेटी के लिए प्रकाश मनीऑर्डर भेजने पोस्ट-ऑफ़िस जाते हैं |
| 2 | प्रकाश को यह पता चला कि रुपये उसकी बेटी को नहीं मिले हैं |
| 3 | प्रकाश ने पोस्ट-ऑफ़िस में मनीऑर्डर के बारे में पूछताछ की |
| ! 4 | पोस्ट-ऑफ़िस द्वारा प्रकाश के प्रश्नों का संतोषजनक जवाब नहीं दिया गया |
| 5 | प्रकाश क्षेत्रीय उपभोक्ता संरक्षण परिषद् में सलाह लेने जाते हैं |
| ★6 | प्रकाश तब एक नज़दीकी उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग में मुक़दमा दर्ज करने जाते हैं और अदालत के ऑफ़िस से रजिस्ट्रेशन फ़ॉर्म लेते हैं; अदालत दूसरे पक्ष को नोटिस भेजती है |
| ★7 | वे आयोग कार्यालय में मुक़दमें पर स्वयं बहस करते हैं (वकील के बिना) |
| 8 | आयोग कार्यालय के जज दस्तावेजों का सत्यापन करते हैं और पीड़ित पक्ष तथा दूसरे पक्ष, दोनों की दलीलें सुनते हैं |
| 9 | जज आयोग का फ़ैसला सुनाते हैं |
★इन नौ सीढ़ियों में सबसे ज़रूरी दो हैं — सीढ़ी 5 — पहले परिषद् में सलाह, सीधे अदालत नहीं। और सीढ़ी 7 — ख़ुद बहस की, वकील नहीं किया। यही किताब की पूरी बात है — “यह रास्ता आम आदमी के लिए बना है।”
अधिकार 5 — प्रतिनिधित्व का अधिकार और त्रिस्तरीय तंत्र (पृष्ठ 84)★
उपभोक्ता संगठन क्या करते हैं —
“भारत में उपभोक्ता आंदोलन ने विभिन्न संगठनों के निर्माण में पहल की है, जिन्हें सामान्यतया उपभोक्ता अदालत या उपभोक्ता संरक्षण परिषद् के नाम से जाना जाता है। ये… मार्गदर्शन करती हैं कि कैसे उपभोक्ता अदालत में मुकदमा दर्ज कराएँ। बहुत से अवसरों पर ये इन आयोगों में व्यक्ति विशेष (उपभोक्ता) का प्रतिनिधित्व भी करते हैं; ये स्वयंसेवी संगठन जनता में जागरूकता पैदा करने के लिए सरकार से वित्तीय सहयोग भी प्राप्त करते हैं।”
और एक ऐसी संस्था जो हर मोहल्ले में है — “यदि आप एक आवासीय कॉलोनी में रहते हैं तो आपने ‘निवासी कल्याण संघ’ का नामपट्ट अवश्य देखा होगा। यदि उनके किसी सदस्य के साथ कोई अनुचित व्यावसायिक कार्रवाई होती है, तो उनकी तरफ़ से संस्था मामले को देखती है।”
त्रिस्तरीय न्यायिक तंत्र — यह तालिका शब्दश: याद कीजिए★★
| स्तर | नाम | कितने के दावे |
|---|---|---|
| जिला | जिला प्राधिकरण / उपभोक्ता आयोग (उपभोक्ता विवाद निवारण केन्द्र भी कहते हैं) | 1 करोड़ तक |
| राज्य | राज्य स्तरीय प्राधिकरण / राज्य आयोग | 1 करोड़ से 10 करोड़ तक |
| राष्ट्रीय | राष्ट्रीय स्तर की प्राधिकरण / राष्ट्रीय आयोग | 10 करोड़ से ऊपर |
★याद रखने का सूत्र — “एक — दस — ऊपर”
★★और अपील का रास्ता — “यदि कोई मुक़दमा जिला स्तर के आयोग में ख़ारिज कर दिया जाता है, तो उपभोक्ता राज्य स्तर के आयोग में और उसके बाद राष्ट्रीय स्तर के आयोग में भी अपील कर सकता है।” यही रेजी के पिता ने किया था। यह जोड़कर पढ़ाइए — तब दोनों बातें एक साथ बैठ जाती हैं।
और निष्कर्ष — “इस प्रकार, अधिनियम ने उपभोक्ता के रूप में उपभोक्ता न्यायालय में प्रतिनिधित्व का अधिकार देकर हमें समर्थ बनाया है।”
अधिकार 6 — उपभोक्ता शिक्षा का अधिकार
किताब इसे अलग से नहीं समझाती, पर पृष्ठ 85 के अभ्यास में यह छठे अधिकार के रूप में गिना गया है — और असल में पूरा अध्याय ही यही अधिकार है। बच्चों से यही कहिए — “यह अध्याय पढ़ना ही तुम्हारे छठे अधिकार का इस्तेमाल है।”
6 — जागरूक उपभोक्ता बनने के लिए ज़रूरी बातें (पृष्ठ 84–85)★
“जब हम विभिन्न वस्तुएँ और सेवाएँ ख़रीदते वक़्त, उपभोक्ता के रूप में अपने अधिकारों के प्रति सचेत होंगे, तब हम अच्छे और बुरे में फ़र्क करने तथा श्रेष्ठ चुनाव करने में सक्षम होंगे। एक जागरूक उपभोक्ता बनने के लिए निपुणता और ज्ञान प्राप्त करने की ज़रूरत होती है।”
मानक चिह्न — ISI, एगमार्क, हॉलमार्क★★
“जब उपभोक्ता कोई वस्तु या सेवाएँ ख़रीदता है, तो ये शब्दचिह्न (लोगो) और प्रमाणक चिह्न उन्हें अच्छी गुणवत्ता सुनिश्चित कराने में मदद करते हैं। ऐसे संगठन जो कि अनुवीक्षण तथा प्रमाणपत्रों को जारी करते हैं, उत्पादकों को उनके द्वारा श्रेष्ठ गुणवत्ता पालन करने की स्थिति में शब्दचिह्न (लोगो) प्रयोग करने की अनुमति देते हैं।”
| चिह्न | किसके लिए |
|---|---|
| आई.एस.आई. (ISI) | औद्योगिक उत्पाद — भारतीय मानक ब्यूरो द्वारा |
| एगमार्क | कृषि उत्पाद — अनाज और खाद्य तेल |
| हॉलमार्क | आभूषण (सोना-चाँदी) |
| फूड फ़ोर्टिफ़िकेशन (+F) | खाद्य पदार्थ में मुख्य पोषक तत्वों को मिलाना |
| कॉयर मार्क | नारियल रेशे के उत्पाद |
पर किताब यहाँ बहुत ईमानदार बात कहती हैध्यान
“यद्यपि ये संगठन बहुत से उत्पादों के लिए गुणवत्ता का मानदंड विकसित करते हैं, लेकिन सभी उत्पादकों का इन मानदण्डों का पालन करना ज़रूरी नहीं होता।” ★“फिर भी, कुछ उत्पाद जो उपभोक्ता की सुरक्षा और स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं या जिनका उपयोग बड़े पैमाने पर होता है… इनके उत्पादन के लिए यह अनिवार्य होता है कि उत्पादक इन संगठनों से प्रमाण प्राप्त करें।” अनिवार्य प्रमाणन वाले उत्पाद — एल.पी.जी. सिलिंडर्स · खाद्य रंग एवं उसमें प्रयुक्त सामग्री · सीमेंट · बोतलबंद पेयजल
★अभ्यास प्रश्न 5 का उत्तर यहीं है — “यदि मानकीकरण वस्तुओं की गुणवत्ता को सुनिश्चित करता है, तो क्यों बाज़ार में बहुत सी वस्तुएँ बिना आई.एस.आई. अथवा एगमार्क प्रमाणन के मौजूद हैं?” उत्तर — क्योंकि सभी उत्पादों के लिए यह प्रमाणन अनिवार्य नहीं है; केवल उन्हीं के लिए अनिवार्य है जो सुरक्षा और स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं या बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होते हैं। साथ ही पर्यवेक्षण उचित रूप से नहीं हो रहा और उपभोक्ता आंदोलन भी बहुत मजबूत नहीं है।
7 — आंदोलन की ईमानदार समीक्षा (पृष्ठ 86–87)★★
आगे बढ़े कितना
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| 24 दिसंबर | “भारत में राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस के रूप में मनाया जाता रहा है। 1986 में इसी दिन भारतीय संसद ने उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम पारित किया था।” |
| भारत की उपलब्धि | “भारत उन देशों में से एक है, जहाँ उपभोक्ता संबंधित समस्याओं के निवारण के लिए विशिष्ट न्यायालय हैं।” |
| ! संगठन | “आज देश में 2000 से अधिक उपभोक्ता संगठन हैं, जिनमें से केवल 50-60 ही अपने कार्यों के लिए पूर्ण संगठित और मान्यता प्राप्त हैं।” |
और अब कमियाँ — यह हिस्सा परीक्षा में बहुत आता हैध्यान
“फिर भी, उपभोक्ता निवारण प्रक्रिया जटिल, ख़र्चीली और समय साध्य साबित हो रही है।” • “कई बार उपभोक्ताओं को वकीलों का सहारा लेना पड़ता है” • “ये मुक़दमें आयोग की कार्यवाहियों में शामिल होने और आगे बढ़ने आदि में काफ़ी समय लेते हैं” ★• “अधिकांश ख़रीददारियों के समय रसीद नहीं दी जाती हैं, ऐसी स्थिति में प्रमाण जुटाना आसान नहीं होता।” • “इसके अलावा बाज़ार में अधिकांश ख़रीददारियाँ छोटे फुटकर दुकानों से होती हैं।”
★★तीसरी कमी पर पूरा रुकिए — यही अध्याय का सबसे व्यावहारिक सबक़ है। बोर्ड पर लिखिए — “रसीद नहीं तो सबूत नहीं। सबूत नहीं तो अधिकार नहीं।” और वहीं से आज का काम दीजिए — “आज घर जाकर जो भी ख़रीदो, रसीद माँगो। कल बताना कि किसने दी और किसने नहीं दी।” ★यह अध्याय का सबसे अच्छा गृहकार्य है।
COPRA में 2019 का संशोधन★
“उपभोक्ता के अधिकारों को मज़बूती देने हेतु कोपरा (COPRA) का वर्ष 2019 में संशोधन हुआ था। जिसमें — • “अब इंटरनेट के माध्यम से ख़रीद भी शामिल है” • “यदि कोई सेवा में कमी या दोषपूर्ण उत्पाद है, तो सेवा प्रदाता और निर्माता को भी ज़िम्मेदार ठहराया जाएगा और दंडित किया जाएगा। यहाँ तक कि जेल भी हो सकती है।” • “उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग के बाहर तटस्थ मध्यस्थ की सहायता से विवादों के निपटारे को अब उपभोक्ता आयोग के सभी तीन स्तरों पर प्रोत्साहित किया गया है।”
और किताब की आख़िरी, सबसे सच्ची बातध्यान
“कोपरा के अधिनियम के 35 वर्ष बाद भी भारत में उपभोक्ता ज्ञान बहुत धीरे-धीरे फैल रहा है। श्रमिकों के हितों की रक्षा के लिए क़ानूनों के लागू होने के बावजूद, ख़ास तौर से असंगठित क्षेत्र में ये कमज़ोर हैं। इस प्रकार, बाज़ारों के कार्य करने के लिए नियमों और विनियमों का प्राय: पालन नहीं होता।” ★★“फिर भी, उपभोक्ताओं को अपनी भूमिका और अपना महत्त्व समझने की ज़रूरत है। यह अक्सर कहा जाता है कि उपभोक्ताओं की सक्रिय भागीदारी से ही उपभोक्ता आंदोलन प्रभावी हो सकता है। इसके लिए स्वैच्छिक प्रयास और सबकी साझेदारी से युक्त संघर्ष की ज़रूरत है।”
यही अध्याय की और पूरी किताब की आख़िरी पंक्ति है — इसे बोर्ड पर लिखकर अध्याय ख़त्म कीजिए।
8 — NCERT अभ्यास के पूरे उत्तर (पृष्ठ 87–88)
प्रश्न 1 — बाज़ार में नियमों तथा विनियमों की आवश्यकता क्यों पड़ती है?
क्योंकि “अकेला उपभोक्ता प्राय: स्वयं को कमज़ोर स्थिति में पाता है” और शिकायत होने पर “विक्रेता सारा उत्तरदायित्व क्रेता पर डालने का प्रयास करता है” — उसका जवाब होता है “आपने जो ख़रीदा है अगर वह पसंद नहीं है तो कहीं और जाइए।” उदाहरण — (1) दुकानदार उचित वज़न से कम वज़न तौलते हैं; (2) व्यापारी ऐसे शुल्क जोड़ देते हैं जिनका वर्णन पहले न किया गया हो; (3) मिलावटी और दोषपूर्ण वस्तुएँ बेची जाती हैं; (4) बड़ी कंपनियाँ “मीडिया और अन्य स्रोतों से ग़लत सूचना” देती हैं — जैसे एक कंपनी ने वर्षों तक दावा किया कि उसका दूध पाउडर माता के दूध से बेहतर है, और “कई वर्षों के लगातार संघर्ष के बाद कंपनी को यह स्वीकार करना पड़ा कि वह झूठे दावे करती आ रही थी”; और सिगरेट कंपनियों से यह मनवाने के लिए कि उनका उत्पाद कैंसर का कारण हो सकता है, न्यायालय में लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी।
प्रश्न 2 — भारत में उपभोक्ता आंदोलन की शुरुआत किन कारणों से हुई?
इसकी शुरुआत उपभोक्ताओं के असंतोष से हुई, क्योंकि “विक्रेता कई अनुचित व्यावसायिक व्यवहारों में शामिल” थे और “बाज़ार में उपभोक्ता को शोषण से बचाने के लिए कोई क़ानूनी व्यवस्था उपलब्ध नहीं थी।” पहले “यह मान लिया जाता था कि उपभोक्ता की ज़िम्मेदारी है कि वह… ख़रीदते वक़्त सावधानी बरते”, और असंतुष्ट उपभोक्ता के पास केवल ख़रीदना बंद कर देने का रास्ता था। विकास — भारत में उपभोक्ता का जन्म ‘सामाजिक बल’ के रूप में हुआ। 1960 के दशक में अत्यधिक खाद्य कमी, जमाखोरी, कालाबाजारी, खाद्य पदार्थों एवं खाद्य तेल में मिलावट के कारण व्यवस्थित रूप में आंदोलन का उदय हुआ। 1970 के दशक तक उपभोक्ता संस्थाएँ आलेखों के लेखन और प्रदर्शनी करने लगीं और सड़क यात्री परिवहन में भीड़-भाड़ तथा राशन दुकानों में अनुचित कार्यों पर नज़र रखने के लिए उपभोक्ता दल बनाए। इन प्रयासों का परिणाम 1986 का उपभोक्ता सुरक्षा अधिनियम (COPRA) था, और 2019 में इसमें संशोधन हुआ।
प्रश्न 3 — दो उदाहरण देकर उपभोक्ता जागरूकता की ज़रूरत का वर्णन करें।
(1) रेजी मैथ्यू — केरल का कक्षा 9 का स्वस्थ लड़का अनुचित बेहोशी की दवा के कारण जीवन भर के लिए अपंग हो गया। उसके पिता का दावा राज्य समिति ने “सबूत पर्याप्त नहीं” कहकर ख़ारिज कर दिया, पर उन्होंने राष्ट्रीय आयोग में अपील की और अस्पताल दोषी पाया गया तथा हर्ज़ाना देने का निर्देश मिला। ★अगर वे जागरूक न होते और पहली हार पर रुक जाते, तो न्याय न मिलता। (2) अबिरामी — कोचिंग संस्थान ने 61,020 रुपये लेकर पढ़ाई का स्तर ठीक नहीं दिया और पैसे लौटाने से मना कर दिया। उसने जिला आयोग में मुक़दमा किया और 28,000 वापस मिले; संस्थान की बेकार अपील पर राज्य आयोग ने 25,000 का दंड लगाया और 7,000 मुआवजा दिलाया — और आगे के लिए सभी संस्थानों को पूरे साल की फ़ीस एडवांस लेने से मना कर दिया।
प्रश्न 4 — कुछ ऐसे कारकों की चर्चा करें, जिनसे उपभोक्ताओं का शोषण होता है।
(1) कम वज़न तौलना और बिना बताए शुल्क जोड़ना; (2) मिलावटी और दोषपूर्ण वस्तुएँ बेचना; (3) ग़लत सूचना और भ्रामक विज्ञापन — “उपभोक्ताओं को आकर्षित करने के लिए वे समय-समय पर मीडिया और अन्य स्रोतों से ग़लत सूचना देते हैं”; (4) बाज़ार की असमान शक्ति — “जब उत्पादक थोड़े और शक्तिशाली होते हैं और उपभोक्ता कम मात्रा में ख़रीददारी करते हैं और बिखरे हुए होते हैं, तो बाज़ार उचित तरीक़े से कार्य नहीं करता”; (5) जबरदस्ती जोड़ी गई ख़रीद — दंतमंजन के साथ ब्रश, गैस कनेक्शन के साथ चूल्हा; (6) रसीद न देना — “अधिकांश ख़रीददारियों के समय रसीद नहीं दी जाती हैं, ऐसी स्थिति में प्रमाण जुटाना आसान नहीं होता”; (7) और सबसे बड़ा कारक — उपभोक्ता की अपनी अनजानता, क्योंकि “उपभोक्ता ज्ञान बहुत धीरे-धीरे फैल रहा है।”
प्रश्न 5 — उपभोक्ता सुरक्षा अधिनियम, 1986 के निर्माण की ज़रूरत क्यों पड़ी?
क्योंकि बाज़ार में शोषण के अनेक रूप थे और उपभोक्ता के पास कोई क़ानूनी रास्ता नहीं था। उपभोक्ता आंदोलन ने “व्यावसायिक कंपनियों और सरकार दोनों पर दबाव” डाला। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी 1985 में संयुक्त राष्ट्र ने उपभोक्ता सुरक्षा के दिशा-निर्देश अपनाए, जो “राष्ट्रों के लिए और… अपनी सरकारों को मजबूर करने हेतु ‘उपभोक्ता की वकालत करने वाले समूह’ के लिए, एक हथियार” बने। इन्हीं सबके परिणामस्वरूप “1986 में भारत सरकार द्वारा एक बड़ा कदम उठाया गया… उपभोक्ता सुरक्षा अधिनियम, 1986 क़ानून का बनना, जो COPRA के नाम से प्रसिद्ध है।” इसने उपभोक्ता को छह अधिकार और त्रिस्तरीय न्यायिक तंत्र दिया, यानी “उपभोक्ता न्यायालय में प्रतिनिधित्व का अधिकार देकर हमें समर्थ बनाया।”
प्रश्न 6 — अपने क्षेत्र के बाज़ार में जाने पर उपभोक्ता के रूप में अपने कुछ कर्तव्यों का वर्णन करें।
(1) हर ख़रीद पर रसीद माँगूँगा और उसे सुरक्षित रखूँगा — क्योंकि रसीद के बिना प्रमाण जुटाना आसान नहीं होता; (2) पैकेट पर अवयव, मूल्य, बैच संख्या, निर्माण तिथि, अंतिम तिथि और निर्माता का पता जाँचूँगा; (3) आई.एस.आई., एगमार्क, हॉलमार्क जैसे मानक चिह्न देखूँगा; (4) MRP से अधिक क़ीमत नहीं दूँगा — और याद रखूँगा कि MRP से कम पर मोल-भाव किया जा सकता है; (5) वज़न और माप की जाँच करूँगा; (6) अनचाही जुड़ी ख़रीद स्वीकार नहीं करूँगा — यह मेरे चयन के अधिकार का उल्लंघन है; (7) ठगे जाने पर चुप नहीं रहूँगा — पहले दुकानदार से, फिर उपभोक्ता संरक्षण परिषद् से, और ज़रूरत पड़े तो उपभोक्ता आयोग में शिकायत करूँगा; (8) और दूसरों को भी जागरूक बनाऊँगा, क्योंकि “उपभोक्ताओं की सक्रिय भागीदारी से ही उपभोक्ता आंदोलन प्रभावी हो सकता है।”
प्रश्न 7 — शहद की बोतल और बिस्किट का पैकेट ख़रीदते समय कौन-सा लोगो या शब्द चिह्न देखेंगे और क्यों?★
शहद की बोतल पर — एगमार्क (और FSSAI), क्योंकि शहद एक कृषि उत्पाद है और एगमार्क अनाजों और खाद्य तेल जैसे कृषि उत्पादों की गुणवत्ता का प्रमाण है। बिस्किट के पैकेट पर — एफ़.एस.एस.ए.आई. / आई.एस.आई. (और +F फूड फ़ोर्टिफ़िकेशन का चिह्न, यदि पोषक तत्व मिलाए गए हों)। साथ ही दोनों पर ये भी देखूँगा — निर्माण तिथि, ख़राब होने की अंतिम तिथि, अवयवों की सूची, बैच संख्या, MRP और निर्माता का पता। क्यों — क्योंकि “ये शब्दचिह्न (लोगो) और प्रमाणक चिह्न उन्हें अच्छी गुणवत्ता सुनिश्चित कराने में मदद करते हैं”, और ख़राबी निकलने पर यही जानकारी शिकायत का आधार बनती है।
प्रश्न 8 — उपभोक्ताओं को समर्थ बनाने के लिए सरकार को कौन-से क़ानूनी मानदंड लागू करने चाहिए?
(1) COPRA के तहत बना त्रिस्तरीय तंत्र प्रभावी ढंग से चलाए — जिला (1 करोड़ तक), राज्य (1 से 10 करोड़) और राष्ट्रीय (10 करोड़ से ऊपर) आयोग; (2) छहों अधिकारों — सुरक्षा, सूचना, चयन, निवारण, प्रतिनिधित्व और उपभोक्ता शिक्षा — का कड़ाई से पालन कराए; (3) लेबल पर पूरी सूचना और MRP देना अनिवार्य बनाए, और हर ख़रीद पर रसीद देना अनिवार्य करे; (4) सुरक्षा और स्वास्थ्य से जुड़े उत्पादों — एल.पी.जी. सिलिंडर्स, खाद्य रंग, सीमेंट, बोतलबंद पेयजल — पर अनिवार्य प्रमाणन लागू रखे और उसका पर्यवेक्षण करे; (5) सूचना का अधिकार (RTI, 2005) जैसी व्यवस्थाएँ मज़बूत करे; (6) COPRA 2019 के संशोधन को लागू करे — इंटरनेट से ख़रीद शामिल, सेवा प्रदाता और निर्माता भी ज़िम्मेदार, दोष सिद्ध होने पर दंड और जेल तक, और तीनों स्तरों पर मध्यस्थता की सुविधा; (7) उपभोक्ता संगठनों को वित्तीय सहयोग दे और जागरूकता अभियान (जैसे ‘जागो ग्राहक जागो’) चलाए।
प्रश्न 9 — उपभोक्ताओं के कुछ अधिकारों को बताएँ और प्रत्येक पर कुछ पंक्तियाँ लिखें।★
(1) सुरक्षा का अधिकार — “हमें वस्तुओं के बाज़ारीकरण और सेवाओं की प्राप्ति के ख़िलाफ़ सुरक्षित रहने का अधिकार होता है, क्योंकि ये जीवन और संपत्ति के लिए ख़तरनाक होते हैं।” उदाहरण — प्रेशर कुकर का सेफ़्टी वॉल्व, और रेजी मैथ्यू का मामला। (2) सूचना का अधिकार — पैकेट पर अवयव, मूल्य, बैच संख्या, निर्माण तिथि, अंतिम तिथि और निर्माता का पता देना अनिवार्य है; ख़राबी पर शिकायत, मुआवजा या वस्तु बदलने की माँग की जा सकती है। इसी का विस्तार RTI (अक्टूबर 2005) है। (3) चयन का अधिकार — “किसी भी उपभोक्ता को… सेवा प्राप्त करते हुए हमेशा चुनने का अधिकार होगा।” दंतमंजन के साथ ब्रश या गैस कनेक्शन के साथ चूल्हा थोपना इसी का उल्लंघन है; अबिरामी का मामला इसी अधिकार पर था। (4) क्षतिपूर्ति निवारण का अधिकार — “यदि एक उपभोक्ता को कोई क्षति पहुँचाई जाती है, तो क्षति की मात्रा के आधार पर उसे क्षतिपूर्ति पाने का अधिकार होता है।” उपभोक्ता वकील के बिना भी शिकायत दर्ज करा सकता है — जैसे श्री प्रकाश ने की। (5) प्रतिनिधित्व का अधिकार — उपभोक्ता संगठन और परिषदें “इन आयोगों में व्यक्ति विशेष (उपभोक्ता) का प्रतिनिधित्व भी करते हैं”; अधिनियम ने “उपभोक्ता न्यायालय में प्रतिनिधित्व का अधिकार देकर हमें समर्थ बनाया।” (6) उपभोक्ता शिक्षा का अधिकार — उपभोक्ता को अपने अधिकारों की जानकारी पाने का हक़ है, क्योंकि “एक जागरूक उपभोक्ता बनने के लिए निपुणता और ज्ञान प्राप्त करने की ज़रूरत होती है।”
प्रश्न 10 — उपभोक्ता अपनी एकजुटता का प्रदर्शन कैसे कर सकते हैं?
(1) उपभोक्ता संगठन और उपभोक्ता दल बनाकर — जैसे 1970 के दशक में बने दल जो राशन दुकानों और सड़क परिवहन पर नज़र रखते थे; (2) क्लास एक्शन सूट के ज़रिए — “उपभोक्ता, एक व्यक्ति के रूप में या एक समूह के रूप में… अपनी शिकायत दर्ज करवा सकते हैं”; (3) निवासी कल्याण संघ जैसी स्थानीय संस्थाओं के माध्यम से, जो “उनकी तरफ़ से मामले को देखती है”; (4) जागरूकता अभियान, प्रदर्शनी, पोस्टर और आलेख के माध्यम से — जैसा उपभोक्ता संस्थाओं ने 1970 के दशक में किया; (5) अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जुड़कर — उपभोक्ता इंटरनेशनल आज 100 से भी अधिक देशों के 200 संस्थाओं का संरक्षक संस्था है; (6) और 24 दिसंबर, राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस जैसे अवसरों पर सामूहिक कार्यक्रम करके।
प्रश्न 11 — भारत में उपभोक्ता आंदोलन की प्रगति की समीक्षा करें।★
जो हासिल हुआ — (1) 1986 में COPRA बना और 2019 में उसका संशोधन हुआ, जिसमें इंटरनेट से ख़रीद भी शामिल है और सेवा प्रदाता तथा निर्माता को भी दंडित किया जा सकता है, जेल तक हो सकती है; (2) त्रिस्तरीय न्यायिक तंत्र बना — “भारत उन देशों में से एक है, जहाँ उपभोक्ता संबंधित समस्याओं के निवारण के लिए विशिष्ट न्यायालय हैं”; (3) संगठनों की संख्या बढ़ी — “आज देश में 2000 से अधिक उपभोक्ता संगठन हैं”; (4) उपभोक्ता अब ऑनलाइन शिकायत और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से भी मुक़दमा चला सकता है। ! जो कमियाँ रह गईं — (1) “केवल 50-60 ही अपने कार्यों के लिए पूर्ण संगठित और मान्यता प्राप्त हैं”; (2) “उपभोक्ता निवारण प्रक्रिया जटिल, ख़र्चीली और समय साध्य साबित हो रही है” और कई बार वकील का सहारा लेना पड़ता है; (3) ★“अधिकांश ख़रीददारियों के समय रसीद नहीं दी जाती हैं, ऐसी स्थिति में प्रमाण जुटाना आसान नहीं होता”, और अधिकांश ख़रीद छोटी फुटकर दुकानों से होती है; (4) “कोपरा के अधिनियम के 35 वर्ष बाद भी भारत में उपभोक्ता ज्ञान बहुत धीरे-धीरे फैल रहा है”; (5) “बाज़ारों के कार्य करने के लिए नियमों और विनियमों का प्राय: पालन नहीं होता”, और असंगठित क्षेत्र में श्रमिक-हित के क़ानून कमज़ोर हैं। ★निष्कर्ष — “उपभोक्ताओं की सक्रिय भागीदारी से ही उपभोक्ता आंदोलन प्रभावी हो सकता है। इसके लिए स्वैच्छिक प्रयास और सबकी साझेदारी से युक्त संघर्ष की ज़रूरत है।”
प्रश्न 12 — सुमेलित कीजिए★
| कथन | उत्तर |
|---|---|
| (1) एक उत्पाद के घटकों का विवरण | (ङ) सूचना का अधिकार |
| (2) एगमार्क | (ग) अनाजों और खाद्य तेल का प्रमाण |
| (3) स्कूटर में ख़राब इंजन के कारण हुई दुर्घटना | (क) सुरक्षा का अधिकार |
| (4) जिला उपभोक्ता आयोग विकसित करने वाली एजेंसी | (ख) उपभोक्ता मामलों में संबंध |
| (5) फूड फ़ोर्टिफ़िकेशन | (छ) खाद्य पदार्थ में मुख्य पोषक तत्वों को मिलाना |
| (6) उपभोक्ता इंटरनेशनल | (घ) उपभोक्ता कल्याण संगठनों की अंतर्राष्ट्रीय संस्था |
| (7) भारतीय मानक ब्यूरो | (च) वस्तुओं और सेवाओं के लिए मानक |
प्रश्न 13 — सही या ग़लत बताएँ★
| कथन | उत्तर | कारण |
|---|---|---|
| (क) कोपरा केवल सामानों पर लागू होता है। | ग़लत | यह सेवाओं पर भी लागू होता है — रेजी (चिकित्सा), अबिरामी (शिक्षा) और प्रकाश (डाक सेवा) तीनों सेवा के मामले हैं |
| (ख) भारत विश्व के उन देशों में से एक है, जिसके पास उपभोक्ताओं की समस्याओं के निवारण के लिए विशिष्ट प्राधिकरण हैं। | सही | किताब का अपना वाक्य है |
| (ग) जब उपभोक्ता को ऐसा लगे कि उसका शोषण हुआ है, तो उसे जिला उपभोक्ता आयोग में निश्चित रूप से मुक़दमा दायर करना चाहिए। | सही | यही निवारण का अधिकार है |
| (घ) जब अधिक मूल्य का नुक़सान हो, तभी उपभोक्ता आयोग में जाना लाभप्रद होता है। | ग़लत | क्षति की मात्रा चाहे छोटी हो, अधिकार तब भी है — प्रकाश का मामला केवल ₹6,000 का था |
| (ङ) हॉलमार्क, आभूषणों की गुणवत्ता बनाए रखनेवाला प्रमाण है। | सही | — |
| (च) उपभोक्ता समस्याओं के निवारण की प्रक्रिया अत्यंत सरल और शीघ्र होती है। | ग़लत | किताब कहती है — प्रक्रिया “जटिल, ख़र्चीली और समय साध्य” है |
| (छ) उपभोक्ता को मुआवजा पाने का अधिकार है, जो क्षति की मात्रा पर निर्भर करती है। | सही | “क्षति की मात्रा के आधार पर उसे क्षतिपूर्ति पाने का अधिकार होता है” |
9 — पृष्ठ 85 के वर्गीकरण अभ्यास के उत्तर
| मामला | अधिकार |
|---|---|
| (क) लता को नये ख़रीदे आयरन-प्रेस से विद्युत का झटका लगा | सुरक्षा का अधिकार |
| (ख) जॉन टेलीफोन सेवाओं से असंतुष्ट, जिला फोरम में मुक़दमा | निवारण का अधिकार |
| (ग) दवा समाप्ति तारीख़ पार कर चुकी है | सूचना का अधिकार |
| (घ) इक़बाल आवरण पर दी गई सारी जानकारियों की जाँच करता है | सूचना का अधिकार (उपभोक्ता शिक्षा का अधिकार भी स्वीकार्य) |
| (च) क्षेत्र में केवल एक ऑपरेटर, कोई विकल्प नहीं | चयन का अधिकार |
| (छ) दुकानदार ने ख़राब कैमरा दिया, मुख्य कार्यालय से दृढ़ता से शिकायत | निवारण का अधिकार |
10 — पृष्ठ 84 के क्रम वाले अभ्यास का उत्तर (अरिता की दीवाल घड़ी)
(छ) → (ग) → (ड.) → (ख) → (क) → (च) → (घ) → (ज)
| क्रम | क्या |
|---|---|
| 1 (छ) | वह एक खुदरा विक्रेता से दीवाल घड़ी ख़रीदती है |
| 2 (ग) | वह महसूस करती है कि दुकानदार ने उसे दोषयुक्त सामग्री दी है |
| 3 (ड.) | वह शाखा कार्यालय जाती है और डीलर के विरुद्ध शिकायत दर्ज करती है, लेकिन कोई प्रभाव नहीं पड़ता |
| 4 (ख) | वह शिकायत के लिए पेशेवर व्यक्ति से मिलती है |
| 5 (क) | वह जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग में मुक़दमा दायर करती है |
| 6 (च) | आयोग के समक्ष पहले उससे बिल और वारंटी प्रस्तुत करने को कहा गया |
| 7 (घ) | वह आयोग की कार्यवाहियों में भाग लेना शुरू कर देती है |
| 8 (ज) | कुछ ही महीनों के भीतर आयोग ने विक्रेता को बिना अतिरिक्त मूल्य लिए नयी घड़ी देने का आदेश दिया |
★छठी सीढ़ी पर पूरी कक्षा को रोकिए — “बिल और वारंटी”। अगर वे नहीं होते तो सब यहीं रुक जाता। यही वह जगह है जहाँ रसीद कहानी बचाती है।
11 — इस अध्याय के अनिवार्य तथ्य
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| 1960 का दशक | भारत में व्यवस्थित उपभोक्ता आंदोलन का उदय |
| 1970 का दशक | उपभोक्ता दल — राशन दुकानें और सड़क परिवहन |
| 1985 | संयुक्त राष्ट्र के उपभोक्ता सुरक्षा दिशा-निर्देश |
| ★1986 (24 दिसंबर) | COPRA — उपभोक्ता सुरक्षा अधिनियम; राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस |
| अक्टूबर 2005 | RTI — सूचना पाने का अधिकार |
| 2019 | COPRA में संशोधन — इंटरनेट ख़रीद, निर्माता भी ज़िम्मेदार, जेल तक, मध्यस्थता |
| उपभोक्ता इंटरनेशनल | 100 से अधिक देशों की 200 संस्थाएँ |
| उपभोक्ता संगठन | 2000 से अधिक, पर केवल 50-60 पूर्ण संगठित और मान्यता प्राप्त |
| ★त्रिस्तरीय तंत्र | जिला 1 करोड़ तक · राज्य 1 से 10 करोड़ · राष्ट्रीय 10 करोड़ से ऊपर |
| रेजी मैथ्यू | कक्षा 9, केरल, टॉन्सिल, 5,00,000 का दावा, राज्य में ख़ारिज, राष्ट्रीय में जीत |
| अबिरामी | 61,020 जमा · जिला ने 28,000 लौटाए · राज्य ने 25,000 दंड + 7,000 मुआवजा |
| छह अधिकार | सु-सू-च-नि-प्र-शि |
| अनिवार्य प्रमाणन | एल.पी.जी. सिलिंडर्स · खाद्य रंग · सीमेंट · बोतलबंद पेयजल |
12 — शब्दावली
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| उपभोक्ता | वह व्यक्ति जो अपनी आवश्यकतानुसार वस्तुएँ या सेवाएँ ख़रीदता और उनका उपभोग करता है। |
| उपभोक्ता आंदोलन | उपभोक्ताओं के असंतोष से जन्मा वह सामाजिक बल, जो अनुचित व्यापार के विरुद्ध उनके हितों की रक्षा करता है। |
| COPRA | उपभोक्ता सुरक्षा अधिनियम, 1986 — जिसने उपभोक्ता को छह अधिकार और त्रिस्तरीय तंत्र दिया; 2019 में संशोधित। |
| उपभोक्ता इंटरनेशनल | उपभोक्ता कल्याण संगठनों की अंतर्राष्ट्रीय संस्था — 100 से अधिक देशों की 200 संस्थाओं का संरक्षक। |
| MRP (अधिकतम खुदरा मूल्य) | वह सबसे ऊँची क़ीमत जिस पर वस्तु बेची जा सकती है; इससे कम पर मोल-भाव किया जा सकता है। |
| आई.एस.आई. | भारतीय मानक ब्यूरो द्वारा औद्योगिक उत्पादों को दिया जाने वाला गुणवत्ता चिह्न। |
| एगमार्क | कृषि उत्पादों (अनाज, खाद्य तेल) के लिए गुणवत्ता चिह्न। |
| हॉलमार्क | आभूषणों की गुणवत्ता का प्रमाण। |
| फूड फ़ोर्टिफ़िकेशन | खाद्य पदार्थ में मुख्य पोषक तत्वों को मिलाना। |
| क्लास एक्शन सूट | जब उपभोक्ता एक व्यक्ति के रूप में नहीं, एक समूह के रूप में शिकायत दर्ज कराते हैं। |
| उपभोक्ता आयोग | उपभोक्ता विवाद निवारण के लिए बना त्रिस्तरीय न्यायिक तंत्र — जिला, राज्य और राष्ट्रीय। |
| RTI | सूचना पाने का अधिकार (अक्टूबर 2005) — सरकारी विभागों के कार्य-कलापों की सूचना पाने का अधिकार। |
| राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस | 24 दिसंबर — इसी दिन 1986 में संसद ने COPRA पारित किया था। |
13 — एक वाक्य में पूरा अध्याय
बाज़ार में अकेला उपभोक्ता कमज़ोर है, इसलिए कम तौलने, मिलावट, अनचाही जुड़ी ख़रीद और भ्रामक विज्ञापन से बचाने के लिए नियम और विनियम ज़रूरी हैं; इसी ज़रूरत से 1960 के दशक में उपभोक्ता आंदोलन उठा, 1985 में संयुक्त राष्ट्र के दिशा-निर्देश आए और 1986 में COPRA बना, जिसने उपभोक्ता को छह अधिकार — सुरक्षा, सूचना, चयन, निवारण, प्रतिनिधित्व और शिक्षा — तथा जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर का त्रिस्तरीय तंत्र दिया, जहाँ रेजी, अबिरामी और प्रकाश जैसे आम लोग वकील के बिना भी न्याय पा सके; पर 35 वर्ष बाद भी प्रक्रिया जटिल, ख़र्चीली और समय साध्य है और उपभोक्ता ज्ञान धीरे-धीरे फैल रहा है — इसलिए किताब का अंतिम संदेश यही है कि “उपभोक्ताओं की सक्रिय भागीदारी से ही उपभोक्ता आंदोलन प्रभावी हो सकता है।”