पाठ्यपुस्तक — आर्थिक विकास की समझ, कक्षा 10 अर्थशास्त्र · NCERT · पृष्ठ 39 से 53 (16 पृष्ठ)
शून्य — पढ़ाने से पहले यह समझ लीजिए
यह अध्याय दो भागों में बँटा है, और दूसरा भाग पहले से कहीं ज़्यादा महत्त्वपूर्ण है।
| भाग | पृष्ठ | विषय |
|---|---|---|
| पहला | 39–42 | मुद्रा — विनिमय का माध्यम, आधुनिक रूप, बैंक और माँग जमा |
| दूसरा | 43–52 | ★साख (ऋण) — दो स्थितियाँ, शर्तें, औपचारिक-अनौपचारिक स्रोत, स्वयं सहायता समूह |
★अध्याय का केंद्रीय विचार एक वाक्य में — “ऋण अपने आप में न अच्छा है न बुरा — वह उस परिस्थिति पर निर्भर करता है जिसमें वह लिया गया।”
पाठ्यपुस्तक के अपने शब्दों में — “ऋण उपयोगी होगा या नहीं, यह परिस्थिति के ख़तरों और हानि होने पर प्राप्त सहयोग की संभावना पर निर्भर करता है।” (पृष्ठ 44)
बोर्ड पर लिखने और पूरे अध्याय भर रहने देने वाली दो पंक्तियाँ —
सलीम के लिए ऋण ने कमाई बढ़ाई। स्वप्ना के लिए उसी ऋण ने ज़मीन बिकवा दी। और फ़र्क़ सिर्फ़ इतना था कि एक की फसल चल गई और दूसरे की नहीं।
1 — मुद्रा: विनिमय का एक माध्यम (पृष्ठ 39)
आवश्यकताओं का दोहरा संयोग — यह परिभाषा शब्दश: याद कीजिए★★
“ज़रा सोचिए कि जूता निर्माता यदि बिना मुद्रा का इस्तेमाल किए जूते का सीधे गेहूँ से विनिमय करता तो उसे कितनी कठिनाई होती। उसे गेहूँ उगाने वाले ऐसे किसान को खोजना पड़ता जो न केवल गेहूँ बेचना चाहता हो, बल्कि साथ में जूते भी ख़रीदना चाहता हो।”
★“अर्थात् दोनों पक्ष एक दूसरे से चीज़ें ख़रीदने और बेचने पर सहमति रखते हों। इसे आवश्यकताओं का दोहरा संयोग कहा जाता है।” “एक व्यक्ति जो वस्तु बेचने की इच्छा रखता है, वही वस्तु दूसरा व्यक्ति ख़रीदने की भी इच्छा रखता हो। वस्तु विनिमय प्रणाली, जहाँ मुद्रा का उपयोग किये बिना वस्तुओं का विनिमय होता है, वहाँ आवश्यकताओं का दोहरा संयोग होना अनिवार्य विशिष्टता है।”
और मुद्रा इस समस्या को कैसे हल करती है
“इसकी तुलना में ऐसी अर्थव्यवस्था जहाँ मुद्रा का प्रयोग होता है, मुद्रा महत्त्वपूर्ण मध्यवर्ती भूमिका प्रदान करके आवश्यकताओं के दोहरे संयोग की ज़रूरत को ख़त्म कर देती है।” “जूता निर्माता के लिए ज़रूरी नहीं रह जाता कि वो ऐसे किसान को ढूँढ़ें, जो न केवल उसके जूते ख़रीदे बल्कि साथ-साथ उसको गेहूँ भी बेचे। उसे केवल अपने जूते के लिए ख़रीददार ढूँढ़ना है।” ★“चूँकि मुद्रा विनिमय प्रक्रिया में मध्यस्थता का काम करती है, इसे विनिमय का माध्यम कहा जाता है।”
क्यों हर कोई मुद्रा लेना पसंद करता है —
“जिस व्यक्ति के पास मुद्रा है, वह इसका विनिमय किसी भी वस्तु या सेवा ख़रीदने के लिए आसानी से कर सकता है।”
कक्षा में यह करके दिखाइए — पाँच बच्चों को अलग-अलग चीज़ें दे दीजिए (पेंसिल, रबड़, कॉपी, टिफ़िन, पानी की बोतल) और कहिए कि बिना पैसे के आपस में बदलकर सबको अपनी मनचाही चीज़ पानी है। दो मिनट में कक्षा उलझ जाएगी — और तभी कहिए: “इसी उलझन का नाम है आवश्यकताओं का दोहरा संयोग।”
2 — मुद्रा के आधुनिक रूप (पृष्ठ 40)
विकास-क्रम
| चरण | क्या मुद्रा थी |
|---|---|
| प्रारंभिक काल | भारतीय अनाज और पशु |
| इसके बाद | सोना, चाँदी और ताँबे जैसी धातुओं के सिक्के — “जिसका चलन पिछली सदी तक रहा” |
| आधुनिक | करेंसी — काग़ज़ के नोट और सिक्के |
करेंसी — और यह तर्क बहुत ज़रूरी है★★
“आधुनिक मुद्रा बहुमूल्य धातुओं जैसे सोना-चाँदी और ताँबे के बने सिक्कों से नहीं बनी है। अनाज और पशुओं की तरह ये रोज़मर्रा की चीज़ें भी नहीं हैं। आधुनिक मुद्रा का इस प्रकार का अपना कोई इस्तेमाल नहीं है।” “फिर, इसे विनिमय का माध्यम क्यों स्वीकार किया जाता है? इसे विनिमय का माध्यम इसलिए स्वीकार किया जाता है, क्योंकि किसी देश की सरकार इसे प्राधिकृत करती है।”
चार क़ानूनी बातें —
- “भारत में भारतीय रिज़र्व बैंक केंद्रीय सरकार की तरफ़ से करेंसी नोट जारी करता है।”
- “भारतीय क़ानून के अनुसार, किसी व्यक्ति या संस्था को मुद्रा जारी करने की इजाज़त नहीं है।”
- “इसके अलावा क़ानून विनिमय के माध्यम के रूप में रुपये का इस्तेमाल करने की वैधता प्रदान करता है, जिसे भारत में, सौदों में अदायगी के लिए मना नहीं किया जा सकता।”
- ★“भारत में कोई व्यक्ति क़ानूनी तौर पर रुपयों में अदायगी को अस्वीकार नहीं कर सकता। इसलिए, रुपया व्यापक स्तर पर विनिमय का माध्यम स्वीकार किया गया है।”
★अभ्यास प्रश्न 4 का उत्तर यहीं है — “10 रुपये के नोट को देखिए। इसके ऊपर क्या लिखा है?” नोट पर लिखा होता है — “मैं धारक को दस रुपये अदा करने का वचन देता हूँ”, और नीचे भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर के हस्ताक्षर होते हैं; साथ ही यह भी कि नोट केंद्रीय सरकार द्वारा प्रत्याभूत (guaranteed) है। इसका अर्थ — “यह काग़ज़ का टुकड़ा अपने आप में कुछ नहीं है। इसका मूल्य सिर्फ़ इस वचन से है कि सरकार और रिज़र्व बैंक इसके पीछे खड़े हैं।”
3 — बैंकों में निक्षेप और माँग जमा (पृष्ठ 40–41)
लोग बैंक में पैसा क्यों रखते हैं
“किसी समय पर, लोगों को रोज़मर्रा की आवश्यकताओं के लिए कुछ ही करेंसी की ज़रूरत होती है। उदाहरण के लिए, हर महीने के आख़िर में वेतन वाले मज़दूरों के पास अतिरिक्त नकद होता है।” “वे इसे बैंकों में अपने नाम से खाता खोलकर जमा कर देते हैं। बैंक ये जमा स्वीकार करते हैं और इस पर सूद भी देते हैं।”
तीन फ़ायदे —
- “लोगों का धन बैंकों के पास सुरक्षित रहता है”
- “और इस पर सूद भी मिलता है”
- “लोगों को अपनी आवश्यकता के अनुसार इसमें से धन निकालने की सुविधा भी उपलब्ध होती है”
माँग जमा — परिभाषा★★
“चूँकि बैंक खातों में जमा धन को माँग के ज़रिए निकाला जा सकता है, इसलिए इस जमा को ‘माँग जमा’ कहा जाता है।”
चैक — और यह क्यों महत्त्वपूर्ण है
“माँग जमा एक अन्य दिलचस्प सुविधा देता है। यह सुविधा इसे मुद्रा का (विनिमय का माध्यम) महत्त्वपूर्ण लक्षण प्रदान करती है।” “चैक एक ऐसा काग़ज़ है, जो बैंक को किसी व्यक्ति के खाते से चैक पर लिखे नाम के किसी दूसरे व्यक्ति को एक ख़ास रकम का भुगतान करने का आदेश देता है।”
चैक द्वारा भुगतान — पूरी प्रक्रिया (पृष्ठ 41 का बॉक्स)
| चरण | क्या होता है |
|---|---|
| 1 | जूता निर्माता एम. सलीम को चमड़ा आपूर्तिकर्ता को भुगतान करना है |
| 2 | वह एक विशेष रकम का चैक लिखता है — यानी अपने बैंक को यह रकम देने का आदेश |
| 3 | चमड़ा आपूर्तिकर्ता वह चैक अपने बैंक खाते में जमा कर देता है |
| 4 | धन एक बैंक खाते से दूसरे बैंक खाते में कुछ दिनों में अंतरित हो जाता है |
| 5 | ★“यह लेन-देन बिना नकद की अदायगी के पूरा हो जाता है” |
★निष्कर्ष — “माँग जमा में मुद्रा के अनिवार्य लक्षण मिलते हैं… चूँकि माँग जमाओं को करेंसी के साथ-साथ व्यापक स्तर पर भुगतान का माध्यम स्वीकार किया जाता है, इसलिए आधुनिक अर्थव्यवस्था में इसे भी मुद्रा समझा जाता है।” “बैंकों के लिए इन जमा के बदले कोई भी माँग जमा एवं भुगतान नहीं होगा। मुद्रा के आधुनिक रूप — करेंसी और जमा — आधुनिक बैंक प्रणाली की कार्यप्रणाली से बहुत क़रीब से जुड़े हुए हैं।”
पृष्ठ 42 के प्रश्नों के उत्तर —
- “सलीम और प्रेम के बीच लेन-देन के बाद?” → (ख) सलीम के बैंक खाते में शेष घट जाता है और प्रेम के बैंक खाते में शेष बढ़ जाता है।
- “माँग जमा को मुद्रा क्यों समझा जाता है?” → क्योंकि उसे चैक के ज़रिए बिना नकद के भुगतान में इस्तेमाल किया जा सकता है और उसे व्यापक स्तर पर भुगतान का माध्यम स्वीकार किया जाता है।
4 — बैंकों की ऋण संबंधी गतिविधियाँ (पृष्ठ 42)★
“बैंक जनता से जो धन जमा खातों में स्वीकार करते हैं, उसका क्या करते हैं?”
15 प्रतिशत वाला नियम★★
“बैंक जमा रकम का एक छोटा हिस्सा अपने पास नकद के रूप में रखते हैं। उदाहरण के लिए, आजकल भारत में बैंक जमा का केवल 15 प्रतिशत हिस्सा नकद के रूप में अपने पास रखते हैं।” “इसे किसी एक दिन में जमाकर्ताओं द्वारा धन निकालने की संभावना को देखते हुए यह प्रावधान किया गया है। चूँकि किसी एक विशेष दिन में, केवल कुछ जमाकर्ता ही नकद निकालने के लिए आते हैं, इसलिए बैंक का काम इतने नकद से आराम से चल जाता है।”
बैंक की मध्यस्थ भूमिका★★
“बैंक जमा राशि के एक बड़े भाग को ऋण देने के लिए इस्तेमाल करते हैं… बैंक जमा राशि का लोगों की ऋण-आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए इस्तेमाल करते हैं।” ★“इस तरह, बैंक जिनके पास अतिरिक्त राशि है (जमाकर्ता) एवं जिन्हें राशि की ज़रूरत है (कर्ज़दार) के बीच मध्यस्थता का काम करते हैं।”
बैंक कमाते कैसे हैं
“बैंक जमा पर जो ब्याज देते हैं उससे ज़्यादा ब्याज ऋण पर लेते हैं। कर्ज़दारों से लिए गए ब्याज और जमाकर्ताओं को दिये गये ब्याज के बीच का अंतर बैंकों की आय का प्रमुख स्रोत है।”
पृष्ठ 42 का चित्र — इसे बोर्ड पर बनाइए
| बाईं ओर — जमाकर्ता | बीच में — बैंक | दाईं ओर — कर्ज़दार |
|---|---|---|
| लोग जमा करते हैं | बैंक की आय बढ़ती है | लोग ऋण लेते हैं |
| लोग धन निकालते हैं और ब्याज पाते हैं | लोग ऋण लौटाते हैं और ब्याज देते हैं |
किताब का ही सवाल कक्षा में रखिए — “अगर सभी जमाकर्ता एक ही समय में अपनी धन राशि की माँग करने बैंक पहुँच जाएँ तो क्या होगा?” उत्तर की दिशा — “बैंक के पास तो केवल 15 प्रतिशत नकद है — बाक़ी तो ऋण के रूप में बाहर गया हुआ है। इसीलिए बैंक भरोसे पर चलता है।”
5 — साख की दो विभिन्न स्थितियाँ (पृष्ठ 43) — अध्याय का दिल★★
ऋण की परिभाषा — शब्दश:
“ऋण (उधार) से हमारा तात्पर्य एक सहमति से है जहाँ साहूकार कर्ज़दार को धन, वस्तुएँ या सेवाएँ मुहैया कराता है और बदले में भविष्य में कर्ज़दार से भुगतान करने का वादा लेता है।”
स्थिति 1 — त्यौहार का मौसम (सलीम)
| बात | विवरण |
|---|---|
| माँग | शहर के एक बड़े व्यापारी से 3000 जोड़ी जूतों की माँग, एक महीने के अन्दर पूरी करनी है |
| ज़रूरत | सिलाई और चिपकाने के काम के लिए अतिरिक्त मज़दूर; और कच्चा माल |
| दो स्रोतों से ऋण | (1) चमड़ा व्यापारी को चमड़ा अभी देने का प्रस्ताव और बाद में भुगतान का वादा; (2) बड़े व्यापारी से 1000 जूतों के लिए अग्रिम भुगतान के रूप में नकद कर्ज़ |
| नतीजा | “महीने के आख़िर में सलीम जूते पहुँचाने में कामयाब होता है। उसे अच्छा-ख़ासा लाभ भी होता है और वह उधार लिए धन की अदायगी भी कर देता है।” |
★“सलीम उत्पादन के लिए कार्यशील पूँजी की ज़रूरत को ऋण के द्वारा पूरा करता है… इस प्रकार ऋण एक महत्त्वपूर्ण तथा सकारात्मक भूमिका अदा करता है।”
स्थिति 2 — स्वप्ना की समस्या
| बात | विवरण |
|---|---|
| कौन | एक छोटी किसान, अपनी 3 एकड़ ज़मीन पर मूँगफली उगाती है |
| ऋण | खेती के खर्चों के लिए साहूकार से, इस उम्मीद पर कि फसल तैयार होने पर चुका देगी |
| क्या हुआ | “फसल पर कीटनाशकों के हमले से फसल बर्बाद हो जाती है… महँगी कीटनाशक दवाइयाँ छिड़कने से कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ता” |
| अगला साल | “वह साहूकार का कर्ज़ लौटाने में असफल रहती है और साल के अंदर यह कर्ज़ बड़ी रकम बन जाता है… अगले साल दुबारा उधार लेती है” |
| अंत | “इस साल फसल सामान्य रहती है, लेकिन इतनी कमाई नहीं होती कि वह अपना कर्ज़ वापस कर सके। वह कर्ज़ में फँस जाती है। उसे कर्ज़ को चुकाने के लिए अपनी ज़मीन का कुछ हिस्सा बेचना पड़ता है।” |
★★“ऋण ने स्वप्ना की कमाई को बढ़ाने के बजाय उसकी स्थिति बदतर कर दी। इसे आम भाषा में कर्ज़-जाल कहा जाता है। इस मामले में ऋण कर्ज़दार को ऐसी परिस्थिति में धकेल देता है, जहाँ से बाहर निकलना काफ़ी कष्टदायक होता है।”
और अध्याय का सबसे बड़ा निष्कर्ष★★
“एक स्थिति में ऋण आय बढ़ाने में सहयोग करता है, जिससे व्यक्ति की स्थिति पहले से बेहतर हो जाती है। दूसरी स्थिति में, फसल बर्बाद होने के कारण ऋण व्यक्ति को अपने जाल में फँसा देता है।” ★“ऋण उपयोगी होगा या नहीं, यह परिस्थिति के ख़तरों और हानि होने पर प्राप्त सहयोग की संभावना पर निर्भर करता है।”
तालिका (पृष्ठ 44) — पूरी भरी हुई★
| प्रश्न | सलीम | स्वप्ना |
|---|---|---|
| उन्हें ऋण की आवश्यकता क्यों पड़ी? | उत्पादन की कार्यशील पूँजी के लिए — अतिरिक्त मज़दूर रखने और कच्चा माल ख़रीदने के लिए, ताकि एक महीने में 3000 जोड़ी जूते पूरे कर सके | खेती के ख़र्चों के लिए — 3 एकड़ ज़मीन पर मूँगफली उगाने हेतु बीज, खाद और कीटनाशक ख़रीदने के लिए |
| जोखिम क्या था? | यदि समय पर ऑर्डर पूरा न कर पाता तो व्यापारी को जूते न पहुँचा पाता और उधार चुकाना कठिन हो जाता | यदि फसल बर्बाद हो जाए तो कर्ज़ चुकाना असंभव — और खेती मुख्यत: मौसम पर निर्भर है |
| परिणाम क्या हुए? | ऑर्डर पूरा हुआ, अच्छा-ख़ासा लाभ हुआ और उधार भी चुक गया — यानी ऋण ने आय बढ़ाई | फसल कीटनाशकों से बर्बाद हुई, कर्ज़ बढ़ता गया, और अंतत: ज़मीन का कुछ हिस्सा बेचना पड़ा — यानी कर्ज़-जाल |
और दो प्रश्नों के उत्तर —
- “मान लीजिए, सलीम को व्यापारियों से ऑर्डर मिलते रहते हैं। 6 साल बाद उसकी स्थिति क्या होगी?” → हर बार वह कार्यशील पूँजी के लिए ऋण लेकर लाभ कमाएगा और चुकाएगा; उसका उत्पादन, आय और साख — तीनों बढ़ेंगे, और वह शायद अपना कारख़ाना बड़ा कर लेगा।
- “कौन से कारण हैं, जो स्वप्ना की स्थिति को जोखिम भरा बनाते हैं?” → ★तीनों कारण अलग-अलग लिखवाइए —
- कीटनाशक दवाइयाँ — महँगी हैं और फिर भी फसल बचा नहीं पातीं
- साहूकार की भूमिका — ऊँची ब्याज दर, जिससे कर्ज़ साल भर में बड़ी रकम बन जाता है
- मौसम — खेती मुख्यत: मौसम पर निर्भर है, जो किसी के वश में नहीं
ग्रामीण साख की एक ज़रूरी बात
“ग्रामीण क्षेत्रों में साख की मुख्य माँग फसल उगाने के लिए होती है… इन आगतों को ख़रीदने और फसल की बिक्री होने के बीच कम से कम 3-4 महीने का अंतराल होता है। आमतौर से किसान ऋतु के आरंभ में फसल उगाने के लिए उधार लेते हैं और फसल तैयार होने के बाद वापस कर देते हैं। उधार की अदायगी मुख्यत: फसल की कमाई पर निर्भर है।”
6 — ऋण की शर्तें (पृष्ठ 44–45)★
चार शर्तें — यह सूची याद कीजिए
“ब्याज दर, समर्थक ऋणाधार, आवश्यक कागज़ात और भुगतान के तरीक़ों को सम्मिलित रूप से ऋण की शर्तें कहा जाता है।”
समर्थक ऋणाधार (Collateral) — परिभाषा शब्दश:★★
“समर्थक ऋणाधार ऐसी संपत्ति है, जिसका मालिक कर्ज़दार है (जैसे कि भूमि, इमारत, गाड़ी, पशु, बैंकों में पूँजी) और इसका इस्तेमाल वह उधारदाता को गारंटी देने के रूप में करता है, जब तक कि ऋण का भुगतान नहीं हो जाता।” “यदि कर्ज़दार उधार वापस नहीं कर पाता, तो उधारदाता को भुगतान प्राप्ति के लिए संपत्ति या समर्थक ऋणाधार बेचने का अधिकार होता है।”
आम उदाहरण — ज़मीन · बैंकों में जमा पूँजी · पशु — “जिनका उपयोग कर्ज़ लेने के लिए किया जाता है।”
मेघा का आवास ऋण — तालिका पूरी भरी हुई (पृष्ठ 45)★
| विवरण | उत्तर |
|---|---|
| ऋण राशि | 5 लाख रुपये |
| ऋण-अवधि | 10 साल |
| आवश्यक कागज़ात | नौकरी और वेतन संबंधी रिकार्ड |
| ब्याज दर | 12 प्रतिशत वार्षिक |
| अदायगी का स्वरूप | मासिक किस्तों में |
| समर्थक ऋणाधार | घर के सभी कागज़ — “जिन्हें मेघा द्वारा ब्याज समेत कर्ज़ लौटाने पर वापस किया जाएगा” |
और तीन प्रश्नों के उत्तर (पृष्ठ 45) —
- “उधारदाता उधार देते समय समर्थक ऋणाधार की माँग क्यों करता है?” → ताकि यदि कर्ज़दार उधार वापस न कर पाए, तो उधारदाता उस संपत्ति को बेचकर अपना भुगतान प्राप्त कर सके — यानी यह उसकी गारंटी है।
- “हमारे देश की एक बहुत बड़ी आबादी निर्धन है। क्या यह उनके कर्ज़ लेने की क्षमता को प्रभावित करती है?” → ★हाँ, बहुत गहरे तक। निर्धनों के पास गिरवी रखने लायक़ संपत्ति नहीं होती, इसलिए बैंक उन्हें ऋण देने से हिचकिचाते हैं और उन्हें साहूकार के पास ऊँची ब्याज दर पर जाना पड़ता है।
- रिक्त स्थान — “ऋण लेते समय कर्ज़दार आसान ऋण शर्तों को देखता है।” → निम्न ब्याज दर, आसान अदायगी की शर्तें, कम समर्थक ऋणाधार एवं आवश्यक कागज़ात।
7 — सोनपुर गाँव: विविध प्रकार के साख प्रबंध (पृष्ठ 46–47)★★
रोहित और रंजन ने 15 नवम्बर 2019 को सोनपुर गाँव में चार लोगों से बात की —
| कौन | कितनी ज़मीन | किससे ऋण | ब्याज दर | शर्तें और नतीजा |
|---|---|---|---|---|
| श्यामल (छोटा किसान) | 1.5 एकड़ | पहले गाँव के महाजन से; अब गाँव के एक व्यापारी से | महाजन — 5 प्रतिशत मासिक (60 प्रतिशत वार्षिक); व्यापारी — 3 प्रतिशत मासिक | व्यापारी कृषि संबंधित आगतें मुहैया कराता है और फसल तैयार होने पर वापस लेता है; साथ ही यह वादा लेता है कि फसल उसी को बेचेगा |
| अरुण (मध्यम किसान) | 7 एकड़ | बैंक | 8.5 प्रतिशत वार्षिक | अगले तीन वर्षों में कभी भी लौटा सकता है; वह उपज का कुछ हिस्सा बेचकर अदायगी करेगा और बाक़ी आलू शीत भंडार गृह में रखकर उसके बदले नया ऋण लेना चाहता है |
| रमा (भूमिहीन कृषि मज़दूर) | कोई नहीं | भूस्वामी-नियोक्ता (जो मध्यवर्गीय भूस्वामी है) | 5 प्रतिशत मासिक | वह कर्ज़ भूस्वामी के यहाँ काम करके वापस करती है; अधिकांशत: नया ऋण लेना पड़ जाता है जबकि पुराना लौटा भी नहीं पाती; अभी 5,000 रुपये देने हैं |
| कृषक सहकारी समिति | — | 2300 किसान सदस्य | — | सदस्यों से जमा प्राप्त करती है, उसे ऋणाधार मानकर बैंक से बड़ा ऋण लेती है, और उस पूँजी से सदस्यों को कर्ज़ देती है |
सोनपुर से निकलने वाले पाँच निष्कर्ष★
| प्रश्न (पृष्ठ 47) | उत्तर |
|---|---|
| सोनपुर में ऋण के स्रोत? | महाजन · व्यापारी · भूस्वामी-नियोक्ता · बैंक · कृषक सहकारी समिति |
| छोटे किसान, मध्यम किसान और भूमिहीन मज़दूर की शर्तों की तुलना? | जिसके पास जितनी ज़्यादा ज़मीन, उसे उतना सस्ता ऋण। अरुण (7 एकड़) को 8.5% वार्षिक; श्यामल (1.5 एकड़) को 36% वार्षिक (3% मासिक); रमा (भूमिहीन) को 60% वार्षिक (5% मासिक) — और वह भी मज़दूरी करके चुकाना पड़ता है। |
| श्यामल की तुलना में अरुण को खेती से ज़्यादा आय क्यों? | क्योंकि उसके पास ज़्यादा ज़मीन (7 एकड़) है, सस्ता बैंक ऋण मिलता है, लौटाने के लिए तीन साल का समय है, और वह शीत भंडार गृह में रखकर अच्छी क़ीमत पर बेच सकता है — जबकि श्यामल को महँगे ऋण पर और फसल उसी व्यापारी को सस्ते में बेचनी पड़ती है। |
| क्या सभी को सस्ता कर्ज़ मिल सकता है? | नहीं — केवल उन्हें जिनके पास समर्थक ऋणाधार है, यानी ज़मीन या संपत्ति वाले किसान। भूमिहीन मज़दूरों को नहीं। |
| समय के साथ रमा का ऋण? | बढ़ जाएगा |
| अरुण बैंक से उधार ले पाता है क्योंकि? | बैंक समर्थक ऋणाधार की माँग करते हैं जो कि हर किसी के पास नहीं होती। |
★★यह पूरा गाँव-अध्ययन एक ही बात सिद्ध करता है — “जिसके पास पहले से है, उसे सस्ता कर्ज़ मिलता है। जिसके पास नहीं है, उसे महँगा।”
8 — भारत में औपचारिक क्षेत्रक में साख (पृष्ठ 48)★★
दो वर्ग
| वर्ग | कौन आता है |
|---|---|
| औपचारिक क्षेत्रक ऋण | बैंक और सहकारी समितियाँ |
| अनौपचारिक क्षेत्रक ऋण | साहूकार, व्यापारी, मालिक, रिश्तेदार, दोस्त इत्यादि |
आलेख 1 — ग्रामीण भारत में ऋण के स्रोत, 2019★
| स्रोत | प्रतिशत | वर्ग |
|---|---|---|
| व्यावसायिक बैंक | 51% | औपचारिक |
| साहूकार | 23% | अनौपचारिक |
| सहकारी समितियाँ/बैंक | 10% | औपचारिक |
| रिश्तेदार एवं मित्र | 7% | अनौपचारिक |
| अन्य औपचारिक एजेंसियाँ | 5% | औपचारिक |
| अन्य अनौपचारिक एजेंसियाँ | 3% | अनौपचारिक |
| ज़मींदार | 1% | अनौपचारिक |
जोड़कर देखिए — औपचारिक = 51 + 10 + 5 = 66 प्रतिशत; अनौपचारिक = 23 + 7 + 3 + 1 = 34 प्रतिशत। ! पर आगे किताब यह भी कहती है कि “औपचारिक स्रोत अभी भी ग्रामीण परिवारों की कुल ऋण ज़रूरतों का केवल 50 प्रतिशत पूरा कर पाता है” — दोनों बातें अलग-अलग चीज़ें नाप रही हैं, इसलिए दोनों को अलग-अलग याद कीजिए।
भारतीय रिज़र्व बैंक की भूमिका — तीन काम★★
“भारतीय रिज़र्व बैंक ऋणों के औपचारिक स्रोतों की कार्यप्रणाली पर नज़र रखता है।”
| # | काम |
|---|---|
| 1 | “आर.बी.आई. नज़र रखता है कि बैंक वास्तव में नकद शेष बनाए हुए हैं” (जमा का न्यूनतम नकद हिस्सा) |
| 2 | “आर.बी.आई. इस पर भी नज़र रखता है कि बैंक केवल लाभ अर्जित करने वाले व्यवसायियों और व्यापारियों को ही ऋण मुहैया नहीं करा रहे, बल्कि छोटे किसानों, छोटे उद्योगों, छोटे कर्ज़दारों इत्यादि को भी ऋण दे रहे हैं” |
| 3 | “समय-समय पर, बैंकों द्वारा आर.बी.आई. को यह जानकारी देनी पड़ती है कि वे कितना और किनको ऋण दे रहे हैं और उसकी ब्याज की दरें क्या हैं” |
और अनौपचारिक क्षेत्रक में?ध्यान
★★“अनौपचारिक क्षेत्रक में ऋणदाताओं की गतिविधियों की देखरेख करने वाली कोई संस्था नहीं है। वे ऐच्छिक दरों पर ऋण दे सकते हैं। उन्हें नाजायज़ तरीक़ों से अपने पैसे वापस लेने से रोकने वाला कोई नहीं है।”
ऊँची लागत के तीन नुक़सान
- “ऋण की ऊँची लागत का अर्थ है कर्ज़दार की आय का अधिकतर हिस्सा ऋण की अदायगी में ही ख़र्च हो जाता है। इसलिए, कर्ज़दारों के पास अपने लिए कम आय बचती है” — जैसा श्यामल के मामले में देखा।
- “कुछ मामलों में ऋण की ऊँची ब्याज दरों के कारण कर्ज़ वापस करने की रकम कर्ज़दार की आय से भी अधिक हो जाती है। इसके कारण ऋण का बोझ बढ़ जाता है और व्यक्ति ऋण-जाल में फँस जाता है” — जैसा रमा के मामले में।
- “ऐसा भी संभव है कि जो लोग कर्ज़ लेकर अपना उद्यम शुरू करना चाहते हैं, वे ऋण की अधिक लागत को देख कर पीछे हट जाएँ।”
★“इन सभी कारणों को देखते हुए बैंकों और सहकारी समितियों को ज़्यादा कर्ज़ देना चाहिए… वे फसल उगा सकते हैं, कोई कारोबार कर सकते हैं, छोटे उद्योग लगा सकते हैं… सस्ता और सामर्थ्य के अनुकूल कर्ज़ देश के विकास के लिए अति आवश्यक है।”
9 — औपचारिक और अनौपचारिक साख — किसे क्या मिलता है? (पृष्ठ 49)★★
आलेख 2 — शहरी परिवारों द्वारा लिए गए ऋण
| परिवार | औपचारिक स्रोत | अनौपचारिक स्रोत |
|---|---|---|
| गरीब परिवार | 46% | 54% |
| कम संपत्ति वाले परिवार | 62% | 38% |
| समृद्ध परिवार | 73% | 27% |
| अमीर परिवार | 83% | 17% |
★★किताब का अपना विश्लेषण — “शहरी क्षेत्रों के निर्धन परिवारों के कर्ज़ों की 54 प्रतिशत ज़रूरतें अनौपचारिक स्रोतों से पूरी होती हैं… अमीर परिवारों के केवल 17 प्रतिशत कर्ज़ अनौपचारिक स्रोतों से जबकि 83 प्रतिशत औपचारिक स्रोतों से हैं। इसी तरह की तस्वीर ग्रामीण क्षेत्रों में भी है।” ★“अमीर परिवार औपचारिक ऋणदाताओं से सस्ता ऋण ले रहे हैं, जबकि गरीब परिवारों को कर्ज़ के लिए बहुत सारा पैसा देना पड़ता है।”
इससे निकलने वाली दो बातें
| # | बात |
|---|---|
| पहला | “औपचारिक स्रोत अभी भी ग्रामीण परिवारों की कुल ऋण ज़रूरतों का केवल 50 प्रतिशत पूरा कर पाता है। बाक़ी ज़रूरतें अनौपचारिक स्रोतों से पूरी होती हैं”; और अनौपचारिक ऋण पर ब्याज दरें बहुत अधिक होती हैं जो “आय बढ़ाने का काम कम ही कर पाता है”। इसलिए “बैंकों और सहकारी समितियों को अपनी गतिविधियाँ विशेषकर ग्रामीण इलाक़ों में बढ़ाने की ज़रूरत” है। |
| दूसरा | “यदि एक तरफ़ औपचारिक स्रोत के ऋणों का विस्तार होना चाहिए तो दूसरी ओर यह भी ज़रूरी है कि यह ऋण सभी लोगों को प्राप्त हो सके… यह ज़रूरी है कि औपचारिक ऋण का अधिक समान वितरण हो, ताकि गरीब परिवार भी सस्ते ऋण का फ़ायदा उठा सकें।” |
पृष्ठ 50 के चार प्रश्नों के उत्तर —
- “ऋण के औपचारिक और अनौपचारिक स्रोतों में क्या अंतर है?” → औपचारिक में बैंक और सहकारी समितियाँ आते हैं, जिन पर रिज़र्व बैंक नज़र रखता है और जिनकी ब्याज दरें कम होती हैं। अनौपचारिक में साहूकार, व्यापारी, मालिक, रिश्तेदार और दोस्त आते हैं, जिनकी देखरेख करने वाली कोई संस्था नहीं है, जो ऐच्छिक दरों पर ऋण देते हैं और जिन्हें नाजायज़ तरीक़ों से पैसे वापस लेने से रोकने वाला कोई नहीं है।
- “सभी लोगों के लिए यथोचित दरों पर ऋण क्यों उपलब्ध होना चाहिए?” → क्योंकि सस्ता ऋण आय बढ़ाता है — लोग फसल उगा सकते हैं, कारोबार कर सकते हैं, छोटे उद्योग लगा सकते हैं; और महँगा ऋण कर्ज़-जाल में धकेल देता है।
- “क्या भारतीय रिज़र्व बैंक के जैसा कोई निरीक्षक होना चाहिए जो अनौपचारिक ऋणदाताओं पर नज़र रखे?” → आदर्श रूप में हाँ; पर यह काम कठिन होगा क्योंकि ये ऋणदाता बहुत बड़ी संख्या में, बिखरे हुए और अपंजीकृत हैं, और उनका अधिकांश लेन-देन लिखा-पढ़ी के बिना, ज़बानी होता है।
- “गरीब परिवारों की तुलना में अमीर परिवारों के औपचारिक ऋणों का हिस्सा अधिक क्यों?” → क्योंकि उनके पास समर्थक ऋणाधार और आवश्यक कागज़ात होते हैं, जो बैंक माँगते हैं — और गरीबों के पास नहीं होते।
10 — निर्धनों के स्वयं सहायता समूह (पृष्ठ 50–51)★★
समस्या पहले
“भारत के सभी ग्रामीण क्षेत्रों में बैंक मौजूद नहीं हैं। जहाँ कहीं मौजूद भी हैं, बैंक से कर्ज़ लेना अनौपचारिक स्रोत से कर्ज़ लेने की तुलना में ज़्यादा मुश्किल है।” ★“जैसा कि हमने मेघा के मामले में देखा, बैंक से कर्ज़ लेने के लिए ऋणाधार और विशेष कागज़ातों की ज़रूरत पड़ती है। ऋणाधार की अनुपलब्धता एक प्रमुख कारण है, जिससे गरीब बैंकों से ऋण नहीं ले पाते।” “दूसरी ओर, अनौपचारिक ऋणदाता जैसे साहूकार इन कर्ज़दारों को व्यक्तिगत स्तर पर जानते हैं और इस कारण अक्सर बिना ऋणाधार के भी ऋण देने के लिए तैयार हो जाते हैं… लेकिन, महाजन ब्याज की दरें बहुत ऊँची रखते हैं, लेन-देन की लिखा पढ़ी भी पूरी नहीं करते और निर्धन कर्ज़दारों को तंग करते हैं।”
स्वयं सहायता समूह — पूरी बनावट★
| बात | विवरण |
|---|---|
| कौन | “ग्रामीण क्षेत्रों के गरीबों विशेषकर महिलाओं को छोटे-छोटे स्वयं सहायता समूहों में संगठित करने और उनकी बचत पूँजी को एकत्रित करने पर आधारित” |
| आकार | “एक-दूसरे के पड़ोसी 15-20 सदस्य” |
| बैठक | “जो नियमित रूप से मिलते हैं और बचत करते हैं” |
| बचत | “प्रति व्यक्ति बचत 25 रुपए से लेकर 100 रुपए या अधिक हो सकती है” |
| छोटे कर्ज़ | “सदस्य अपनी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए छोटे कर्ज़ समूह से ही ले सकते हैं” |
| ★ब्याज | “समूह इन कर्ज़ों पर ब्याज लेता है लेकिन यह साहूकार द्वारा लिए जाने वाले ब्याज से कम होता है” |
| ★बैंक से ऋण | “एक या दो वर्षों के बाद, अगर समूह नियमित रूप से बचत करता है, तो समूह बैंक से ऋण लेने के योग्य हो जाता है। ऋण समूह के नाम पर दिया जाता है” |
| मक़सद | “सदस्यों के लिए स्वरोज़गार के अवसरों का सृजन करना” |
| किन कामों के लिए | “गिरवी ज़मीन छुड़वाने, कार्यशील पूँजी (बीज, खाद, बाँस और कपड़े ख़रीदने के लिए), घर बनाने, सिलाई की मशीन, हथकरघा, पशु इत्यादि संपत्ति ख़रीदने के लिए” |
और सबसे बड़ी बात — निर्णय कौन लेता है★★
“बचत और ऋण गतिविधियों से संबंधी ज़्यादातर महत्त्वपूर्ण निर्णय समूह के सदस्य स्वयं लेते हैं। समूह दिए जाने वाले ऋण — उसका लक्ष्य, उसकी रकम, ब्याज दर, वापस लौटाने की अवधि आदि के बारे में निर्णय करता है। इस ऋण को लौटाने की ज़िम्मेदारी भी समूह की होती है।” ★“एक भी सदस्य अगर ऋण वापस नहीं लौटाता तो समूह के अन्य सदस्य इस मामले को गंभीरता से लेते हैं। इसी कारण, बैंक निर्धन महिलाओं को ऋण देने के लिए तैयार हो जाते हैं जब वे अपने को स्वयं सहायता समूहों में संगठित कर लेती हैं, यद्यपि उनके पास कोई ऋणाधार नहीं होता।”
★यही इस अध्याय की सबसे सुंदर बात है — समूह ही ऋणाधार बन जाता है। यानी ज़मीन की जगह भरोसा गिरवी रखा जाता है।
तीन लाभ
- “स्वयं सहायता समूह कर्ज़दारों को ऋणाधार की कमी की समस्या से उबारने में मदद करते हैं”
- “उन्हें समयानुसार विभिन्न प्रकार की आवश्यकताओं के लिए एक उचित ब्याज दर पर ऋण मिल जाता है”
- ★“इसके अतिरिक्त यह समूह ग्रामीण क्षेत्रों के गरीबों को संगठित करने में मदद करते हैं। इससे न केवल महिलाएँ आर्थिक रूप से स्वावलंबी हो जाती हैं, बल्कि समूह की नियमित बैठकों के ज़रिए लोगों को एक आम मंच मिलता है, जहाँ वह तरह-तरह के सामाजिक विषयों जैसे — स्वास्थ्य, पोषण और घरेलू हिंसा इत्यादि पर आपस में चर्चा कर पाती हैं।”
11 — बांग्लादेश का ग्रामीण बैंक (पृष्ठ 52)★
| बात | विवरण |
|---|---|
| शुरुआत | 1970 में एक छोटे पैमाने से |
| 2018 में | 9 लाख सदस्य, जो बांग्लादेश के 81,600 गाँवों में फैले हुए थे |
| कौन | “ऋण लेने वाली ज़्यादातर महिलाएँ हैं जिनका संबंध समाज के गरीब तबके से है” |
| क्या साबित किया | “इन कर्ज़दारों ने दिखा दिया है कि न केवल गरीब महिलाएँ भरोसेमंद कर्ज़दार हैं, बल्कि वे विभिन्न तरह की छोटी आय वाली गतिविधियों को सफलतापूर्वक शुरू करने और चला सकने में सक्षम हैं।” |
प्रो. मोहम्मद युनूस का कथन — यह याद रखिए★★
“अगर गरीब लोगों को सही और उचित शर्तों पर ऋण उपलब्ध कराया जा सकता है, तो लाखों छोटे लोग अपनी लाखों छोटी-छोटी गतिविधियों के जरिए विकास का सबसे बड़ा चमत्कार कर सकते हैं।” — प्रो. मोहम्मद युनूस, ग्रामीण बैंक के संस्थापक एवं 2006 में शांति के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित
कक्षा में यह ज़रूर बताइए — “नोबेल पुरस्कार अर्थशास्त्र का नहीं, शांति का मिला था। क्यों?” उत्तर की दिशा — “क्योंकि समिति ने माना कि ग़रीबी दूर करना ही स्थायी शांति की जड़ है।”
12 — NCERT अभ्यास के पूरे उत्तर (पृष्ठ 52–53)
प्रश्न 1 — जोखिम वाली परिस्थितियों में ऋण कर्ज़दार के लिए और समस्याएँ खड़ी कर सकता है। स्पष्ट कीजिए।
यदि किसी कारण से कर्ज़दार की कमाई नहीं हो पाती, तो ऋण उसकी मदद करने के बजाय उसे और गहरे संकट में धकेल देता है। स्वप्ना का उदाहरण — उसने 3 एकड़ ज़मीन पर मूँगफली के लिए साहूकार से ऋण लिया; कीटनाशकों के हमले से फसल बर्बाद हो गई; वह कर्ज़ नहीं लौटा पाई और साल के अंदर वह कर्ज़ बड़ी रकम बन गया; अगले साल उसे दुबारा उधार लेना पड़ा और अंतत: कर्ज़ चुकाने के लिए अपनी ज़मीन का कुछ हिस्सा बेचना पड़ा। ★“ऋण ने स्वप्ना की कमाई को बढ़ाने के बजाय उसकी स्थिति बदतर कर दी। इसे आम भाषा में कर्ज़-जाल कहा जाता है। इस मामले में ऋण कर्ज़दार को ऐसी परिस्थिति में धकेल देता है, जहाँ से बाहर निकलना काफ़ी कष्टदायक होता है।” यही रमा के साथ भी हुआ — 5 प्रतिशत मासिक ब्याज पर लिया कर्ज़ लौटाना कठिन होता गया और उसे बार-बार नया ऋण लेना पड़ा।
प्रश्न 2 — मुद्रा आवश्यकताओं के दोहरे संयोग की समस्या को किस तरह सुलझाती है?
आवश्यकताओं का दोहरा संयोग का अर्थ है कि “एक व्यक्ति जो वस्तु बेचने की इच्छा रखता है, वही वस्तु दूसरा व्यक्ति ख़रीदने की भी इच्छा रखता हो” — और वस्तु विनिमय प्रणाली में यह अनिवार्य विशिष्टता है। मुद्रा इस समस्या को इस प्रकार सुलझाती है — “मुद्रा महत्त्वपूर्ण मध्यवर्ती भूमिका प्रदान करके आवश्यकताओं के दोहरे संयोग की ज़रूरत को ख़त्म कर देती है।” जूता निर्माता को अब ऐसा किसान ढूँढ़ने की ज़रूरत नहीं जो जूते भी ख़रीदे और गेहूँ भी बेचे; उसे केवल अपने जूते के लिए ख़रीददार ढूँढ़ना है, और मुद्रा मिलने पर वह बाज़ार से गेहूँ या कोई भी वस्तु ख़रीद सकता है। मेरा अपना उदाहरण — एक शिक्षक पढ़ाता है और वेतन (मुद्रा) पाता है; उससे वह सब्ज़ी, कपड़े और दवा ख़रीद लेता है। यदि मुद्रा न होती तो उसे ऐसा सब्ज़ी वाला ढूँढ़ना पड़ता जो अपने बच्चों को पढ़वाना भी चाहता हो।
प्रश्न 3 — अतिरिक्त मुद्रा वाले लोगों और ज़रूरतमंद लोगों के बीच बैंक किस तरह मध्यस्थता करते हैं?
लोग अपना अतिरिक्त धन बैंकों में जमा करते हैं; बैंक ये जमा स्वीकार करते हैं और इस पर सूद भी देते हैं, और लोगों को आवश्यकता के अनुसार धन निकालने की सुविधा मिलती है। बैंक जमा रकम का एक छोटा हिस्सा — भारत में लगभग 15 प्रतिशत — नकद के रूप में अपने पास रखते हैं, क्योंकि किसी एक दिन में केवल कुछ जमाकर्ता ही नकद निकालने आते हैं। शेष बड़े भाग को वे ऋण देने के लिए इस्तेमाल करते हैं। ★“इस तरह, बैंक जिनके पास अतिरिक्त राशि है (जमाकर्ता) एवं जिन्हें राशि की ज़रूरत है (कर्ज़दार) के बीच मध्यस्थता का काम करते हैं।” और “बैंक जमा पर जो ब्याज देते हैं उससे ज़्यादा ब्याज ऋण पर लेते हैं। कर्ज़दारों से लिए गए ब्याज और जमाकर्ताओं को दिये गये ब्याज के बीच का अंतर बैंकों की आय का प्रमुख स्रोत है।”
प्रश्न 4 — 10 रुपये के नोट पर क्या लिखा है? इसकी व्याख्या कीजिए।
नोट पर भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर के हस्ताक्षर के साथ यह वचन लिखा होता है — “मैं धारक को दस रुपये अदा करने का वचन देता हूँ”; और यह भी अंकित रहता है कि नोट केंद्रीय सरकार द्वारा प्रत्याभूत है। इसकी व्याख्या — आधुनिक मुद्रा बहुमूल्य धातुओं से नहीं बनी है और “आधुनिक मुद्रा का इस प्रकार का अपना कोई इस्तेमाल नहीं है”। फिर भी उसे स्वीकार किया जाता है “क्योंकि किसी देश की सरकार इसे प्राधिकृत करती है”। भारत में भारतीय रिज़र्व बैंक केंद्रीय सरकार की तरफ़ से करेंसी नोट जारी करता है, “किसी व्यक्ति या संस्था को मुद्रा जारी करने की इजाज़त नहीं” है, और “कोई व्यक्ति क़ानूनी तौर पर रुपयों में अदायगी को अस्वीकार नहीं कर सकता”। यानी नोट का मूल्य काग़ज़ में नहीं, उस वचन और क़ानूनी वैधता में है।
प्रश्न 5 — हमें भारत में ऋण के औपचारिक स्रोतों को बढ़ाने की क्यों ज़रूरत है?
(1) क्योंकि औपचारिक स्रोत अभी भी ग्रामीण परिवारों की कुल ऋण ज़रूरतों का केवल 50 प्रतिशत पूरा कर पाते हैं। (2) अनौपचारिक ऋणदाताओं से लिए गए उधार पर ब्याज की दरें बहुत अधिक होती हैं, इसलिए “यह उधार कर्ज़दाताओं की आय बढ़ाने का काम कम ही कर पाता है”। (3) ऊँची लागत से कर्ज़दार की आय का अधिकतर हिस्सा अदायगी में ही चला जाता है और कभी-कभी वापसी की रकम आय से भी अधिक हो जाती है — तब व्यक्ति ऋण-जाल में फँस जाता है। (4) कुछ लोग ऋण की अधिक लागत देखकर अपना उद्यम शुरू करने से ही पीछे हट जाते हैं। (5) अनौपचारिक क्षेत्रक में कोई देखरेख करने वाली संस्था नहीं है — “वे ऐच्छिक दरों पर ऋण दे सकते हैं। उन्हें नाजायज़ तरीक़ों से अपने पैसे वापस लेने से रोकने वाला कोई नहीं है।” ★इसलिए “सस्ता और सामर्थ्य के अनुकूल कर्ज़ देश के विकास के लिए अति आवश्यक है।” साथ ही यह भी ज़रूरी है कि “औपचारिक ऋण का अधिक समान वितरण हो, ताकि गरीब परिवार भी सस्ते ऋण का फ़ायदा उठा सकें।”
प्रश्न 6 — गरीबों के लिए स्वयं सहायता समूहों के संगठनों के पीछे मूल विचार क्या है?
मूल विचार यह है कि ऋणाधार की अनुपलब्धता ही वह प्रमुख कारण है जिससे गरीब बैंकों से ऋण नहीं ले पाते — इसलिए ऋणाधार की जगह समूह की सामूहिक ज़िम्मेदारी को गारंटी बना दिया जाए। इसमें 15-20 पड़ोसी सदस्य नियमित रूप से मिलते और 25 से 100 रुपए या अधिक बचाते हैं; ज़रूरत पड़ने पर समूह से ही छोटे कर्ज़ लेते हैं, जिन पर साहूकार से कम ब्याज लगता है। एक या दो वर्षों की नियमित बचत के बाद समूह बैंक से ऋण लेने योग्य हो जाता है और ऋण समूह के नाम पर मिलता है। ★सबसे अहम — “एक भी सदस्य अगर ऋण वापस नहीं लौटाता तो समूह के अन्य सदस्य इस मामले को गंभीरता से लेते हैं। इसी कारण, बैंक निर्धन महिलाओं को ऋण देने के लिए तैयार हो जाते हैं… यद्यपि उनके पास कोई ऋणाधार नहीं होता।” और लाभ केवल आर्थिक नहीं है — “न केवल महिलाएँ आर्थिक रूप से स्वावलंबी हो जाती हैं, बल्कि समूह की नियमित बैठकों के ज़रिए लोगों को एक आम मंच मिलता है, जहाँ वह… स्वास्थ्य, पोषण और घरेलू हिंसा इत्यादि पर आपस में चर्चा कर पाती हैं।”
प्रश्न 7 — क्या कारण हैं कि बैंक कुछ कर्ज़दारों को कर्ज़ देने के लिए तैयार नहीं होते?
(1) समर्थक ऋणाधार का अभाव — बैंक ऐसी संपत्ति माँगते हैं “जिसका मालिक कर्ज़दार है (जैसे कि भूमि, इमारत, गाड़ी, पशु, बैंकों में पूँजी)”, जो निर्धनों के पास नहीं होती। “ऋणाधार की अनुपलब्धता एक प्रमुख कारण है, जिससे गरीब बैंकों से ऋण नहीं ले पाते।” (2) आवश्यक कागज़ातों का अभाव — जैसे मेघा को नौकरी और वेतन संबंधी रिकार्ड दिखाने पड़े; अनियमित आय वाले लोगों के पास ऐसे कागज़ नहीं होते। (3) अदायगी की अनिश्चितता — जिनकी आय मौसम या दैनिक काम पर निर्भर है, उनसे वापसी का भरोसा कम रहता है। (4) भारत के सभी ग्रामीण क्षेत्रों में बैंक मौजूद नहीं हैं, और जहाँ हैं वहाँ प्रक्रिया अनौपचारिक स्रोत की तुलना में कहीं ज़्यादा मुश्किल है।
प्रश्न 8 — भारतीय रिज़र्व बैंक अन्य बैंकों की गतिविधियों पर किस तरह नज़र रखता है? यह ज़रूरी क्यों है?
कैसे — (1) यह देखता है कि बैंक वास्तव में नकद शेष बनाए हुए हैं; (2) यह देखता है कि बैंक केवल लाभ अर्जित करने वाले व्यवसायियों और व्यापारियों को ही ऋण नहीं दे रहे, बल्कि छोटे किसानों, छोटे उद्योगों और छोटे कर्ज़दारों को भी दे रहे हैं; (3) समय-समय पर बैंकों को आर.बी.आई. को बताना पड़ता है कि वे कितना और किनको ऋण दे रहे हैं और ब्याज की दरें क्या हैं। क्यों ज़रूरी — क्योंकि बैंक जमा का केवल लगभग 15 प्रतिशत ही नकद रखते हैं, इसलिए जमाकर्ताओं का धन सुरक्षित रहना चाहिए; और क्योंकि छोटे कर्ज़दारों तक सस्ता ऋण पहुँचना विकास के लिए ज़रूरी है। इसके विपरीत अनौपचारिक क्षेत्रक में ऐसी कोई संस्था नहीं है, इसीलिए वहाँ मनमानी ब्याज दरें और नाजायज़ वसूली चलती है।
प्रश्न 9 — विकास में ऋण की भूमिका का विश्लेषण कीजिए।
सकारात्मक भूमिका — “सलीम उत्पादन के लिए कार्यशील पूँजी की ज़रूरत को ऋण के द्वारा पूरा करता है। ऋण उसे उत्पादन के कार्यशील ख़र्चों तथा उत्पादन को समय पर पूरा करने में मदद करता है और वह अपनी कमाई बढ़ा पाता है। इस प्रकार ऋण एक महत्त्वपूर्ण तथा सकारात्मक भूमिका अदा करता है।” इसी तरह अरुण 8.5 प्रतिशत वार्षिक पर बैंक ऋण लेकर खेती से अच्छी आय कमाता है। नकारात्मक भूमिका — स्वप्ना के मामले में फसल बर्बाद होने पर ऋण कर्ज़-जाल बन गया और उसे ज़मीन बेचनी पड़ी; रमा को 5 प्रतिशत मासिक ब्याज पर बार-बार नया कर्ज़ लेना पड़ता है। ★निष्कर्ष — “ऋण उपयोगी होगा या नहीं, यह परिस्थिति के ख़तरों और हानि होने पर प्राप्त सहयोग की संभावना पर निर्भर करता है।” इसीलिए विकास के लिए ज़रूरी है कि सस्ता और सामर्थ्य के अनुकूल ऋण मिले और औपचारिक ऋण का समान वितरण हो।
प्रश्न 10 — मानव को छोटा व्यवसाय करने के लिए ऋण चाहिए। वह बैंक से ले या साहूकार से?
उसे यह ऋण की शर्तों के आधार पर तय करना चाहिए — ब्याज दर, समर्थक ऋणाधार, आवश्यक कागज़ात और भुगतान के तरीक़े। बैंक बेहतर है क्योंकि वहाँ ब्याज दर बहुत कम होती है (अरुण को 8.5% वार्षिक, जबकि श्यामल को महाजन से 60% वार्षिक), और रिज़र्व बैंक उसकी निगरानी करता है। पर बैंक तभी संभव है जब उसके पास समर्थक ऋणाधार और आवश्यक कागज़ात हों। यदि नहीं हैं, तो उसे स्वयं सहायता समूह से जुड़ना चाहिए — क्योंकि वहाँ समूह की सामूहिक ज़िम्मेदारी ही ऋणाधार बन जाती है और ब्याज साहूकार से कम होता है। साहूकार आख़िरी विकल्प होना चाहिए, क्योंकि “महाजन ब्याज की दरें बहुत ऊँची रखते हैं, लेन-देन की लिखा पढ़ी भी पूरी नहीं करते और निर्धन कर्ज़दारों को तंग करते हैं।”
प्रश्न 11 — भारत में 80 प्रतिशत किसान छोटे किसान हैं★
(क) बैंक छोटे किसानों को ऋण देने से क्यों हिचकिचा सकते हैं?
क्योंकि उनके पास समर्थक ऋणाधार और आवश्यक कागज़ात नहीं होते; उनकी आय मौसम और फसल पर निर्भर है, इसलिए अदायगी अनिश्चित रहती है; और ऋण की रकम छोटी होने पर भी बैंक की प्रक्रिया-लागत उतनी ही आती है।
(ख) वे दूसरे कौन हैं, जिनसे छोटे किसान कर्ज़ ले सकते हैं?
साहूकार/महाजन · व्यापारी · भूस्वामी-नियोक्ता · रिश्तेदार एवं मित्र · सहकारी समितियाँ · स्वयं सहायता समूह — जैसा सोनपुर में श्यामल (महाजन और व्यापारी), रमा (भूस्वामी) और सहकारी समिति (2300 सदस्य) के उदाहरणों में देखा।
(ग) उदाहरण देकर स्पष्ट कीजिए कि किस तरह ऋण की शर्तें छोटे किसानों के प्रतिकूल हो सकती हैं।
श्यामल को महाजन से 5 प्रतिशत मासिक (60 प्रतिशत वार्षिक) पर ऋण लेना पड़ता था। अब वह व्यापारी से 3 प्रतिशत मासिक पर लेता है, पर उसे यह वादा भी करना पड़ता है कि फसल उसी को बेचेगा — और “फसल की क़ीमतें फसल काटते समय कम होती हैं इसलिए वह किसानों से कम क़ीमत पर फसल ख़रीदकर और बाद में क़ीमत बढ़ने पर बेचकर भारी मुनाफ़ा कमाता है।” रमा को भूस्वामी से 5 प्रतिशत मासिक पर कर्ज़ मिलता है, जिसे वह उसके यहाँ काम करके चुकाती है; यद्यपि भूस्वामी उसके साथ अच्छा व्यवहार नहीं करता, फिर भी वह लगातार काम करती है ताकि ज़रूरत पड़ने पर ऋण मिल सके। इसकी तुलना में अरुण (7 एकड़) को बैंक से 8.5 प्रतिशत वार्षिक पर और तीन साल में कभी भी लौटाने की सुविधा मिलती है।
(घ) सुझाव दीजिए कि किस तरह छोटे किसानों को सस्ता ऋण उपलब्ध कराया जा सकता है।
(1) बैंकों और सहकारी समितियों को ग्रामीण इलाक़ों में अपनी गतिविधियाँ बढ़ानी चाहिए, ताकि “कर्ज़दारों की अनौपचारिक स्रोत पर से निर्भरता घटे”; (2) कृषक सहकारी समितियाँ बनाई जाएँ — जैसे सोनपुर की समिति, जो सदस्यों की जमा को ऋणाधार मानकर बैंक से बड़ा ऋण लेती है; (3) स्वयं सहायता समूह बढ़ाए जाएँ, ताकि बिना ऋणाधार के भी उचित ब्याज दर पर ऋण मिल सके; (4) ऋणाधार और कागज़ातों की शर्तें सरल की जाएँ; और (5) औपचारिक ऋण का अधिक समान वितरण हो, “ताकि गरीब परिवार भी सस्ते ऋण का फ़ायदा उठा सकें।”
प्रश्न 12 — रिक्त स्थानों की पूर्ति
| (क) | गरीब परिवारों की ऋण की अधिकांश ज़रूरतें अनौपचारिक स्रोतों से पूरी होती हैं। | | (ख) | ऊँची ऋण की लागत ऋण का बोझ बढ़ाती है। | | (ग) | भारतीय रिज़र्व बैंक केन्द्रीय सरकार की ओर से करेंसी नोट जारी करता है। | | (घ) | बैंक जमा पर देने वाले ब्याज से ऋण पर अधिक ब्याज लेते हैं। | | (ङ) | समर्थक ऋणाधार सम्पत्ति है जिसका मालिक कर्ज़दार होता है जिसे वह ऋण लेने के लिए गारंटी के रूप में इस्तेमाल करता है, जब तक ऋण चुकता नहीं हो जाता। |
प्रश्न 13 — सही उत्तर का चयन
| प्रश्न | उत्तर |
|---|---|
| (क) स्वयं सहायता समूह में बचत और ऋण संबंधित अधिकतर निर्णय लिए जाते हैं — | सदस्यों द्वारा |
| (ख) ऋण के औपचारिक स्रोतों में शामिल नहीं है — | नियोक्ता |
अतिरिक्त परियोजना (पृष्ठ 53) — तालिका के सुझाए उत्तर★
| व्यवसाय | ऋण लेने का कारण | बैंक से मिलने की संभावना |
|---|---|---|
| निर्माण मज़दूर | बीमारी, बच्चों की पढ़ाई, घर की मरम्मत | कम — न ऋणाधार, न नियमित आय का प्रमाण |
| कंप्यूटर शिक्षित स्नातक छात्र | उच्च शिक्षा, अपना छोटा उद्यम शुरू करना | कुछ हद तक — शिक्षा ऋण संभव |
| सरकारी सेवा में नियोजित व्यक्ति | घर, गाड़ी, बच्चों की शिक्षा | ★अधिक — नियमित वेतन और कागज़ात हैं |
| दिल्ली में प्रवासी मज़दूर | परिवार को पैसे भेजना, आपात ख़र्च | बहुत कम |
| घरेलू नौकरानी | बच्चों की पढ़ाई, बीमारी, विवाह | बहुत कम |
| छोटा व्यापारी | कार्यशील पूँजी, माल ख़रीदना, दुकान बढ़ाना | मध्यम — यदि दुकान पंजीकृत और ऋणाधार हो |
| ऑटो रिक्शा चालक | ऑटो ख़रीदना या मरम्मत | मध्यम — ऑटो स्वयं ऋणाधार बन सकता है |
| बंद फैक्टरी का मज़दूर | रोज़मर्रा का ख़र्च, नया काम शुरू करना | बहुत कम — कोई आय नहीं, कोई ऋणाधार नहीं |
★वर्गीकरण का आधार — (1) नियमित आय है या नहीं · (2) समर्थक ऋणाधार है या नहीं · (3) आवश्यक कागज़ात हैं या नहीं। और निष्कर्ष वही निकलेगा — “जिसके पास पहले से है, उसे ही बैंक कर्ज़ देता है।”
13 — इस अध्याय के अनिवार्य आँकड़े
| आँकड़ा | किसका |
|---|---|
| 15 प्रतिशत | बैंक जमा का जितना हिस्सा नकद रखते हैं |
| 3000 जोड़ी जूते / एक महीना | सलीम का ऑर्डर |
| 3 एकड़ | स्वप्ना की ज़मीन (मूँगफली) |
| 5 लाख · 12% वार्षिक · 10 साल | मेघा का आवास ऋण |
| 1.5 एकड़ · 5% मासिक (60% वार्षिक) → 3% मासिक | श्यामल |
| 7 एकड़ · 8.5% वार्षिक · 3 वर्ष | अरुण |
| 5% मासिक · ₹5,000 | रमा |
| 2300 किसान सदस्य | कृषक सहकारी समिति |
| 51 · 23 · 10 · 7 · 5 · 3 · 1 | आलेख 1 — व्यावसायिक बैंक, साहूकार, सहकारी, रिश्तेदार-मित्र, अन्य औपचारिक, अन्य अनौपचारिक, ज़मींदार |
| 54% / 46% | गरीब शहरी परिवार — अनौपचारिक / औपचारिक |
| 17% / 83% | अमीर शहरी परिवार — अनौपचारिक / औपचारिक |
| केवल 50 प्रतिशत | ग्रामीण परिवारों की ऋण ज़रूरत जो औपचारिक स्रोत पूरी करते हैं |
| 15-20 सदस्य · ₹25 से 100 · 1-2 वर्ष | स्वयं सहायता समूह |
| 1970 · 9 लाख सदस्य · 81,600 गाँव · 2006 नोबेल | बांग्लादेश का ग्रामीण बैंक और प्रो. युनूस |
| 80 प्रतिशत | भारत में छोटे किसान (अभ्यास प्रश्न 11) |
14 — शब्दावली
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| विनिमय का माध्यम | वह चीज़ जो लेन-देन में मध्यस्थता करे — यानी मुद्रा। |
| आवश्यकताओं का दोहरा संयोग | जब दोनों पक्ष एक-दूसरे से चीज़ें ख़रीदने और बेचने पर सहमत हों। |
| वस्तु विनिमय प्रणाली | वह प्रणाली जहाँ मुद्रा के बिना वस्तुओं का सीधा विनिमय होता है। |
| करेंसी | काग़ज़ के नोट और सिक्के — मुद्रा का आधुनिक रूप। |
| माँग जमा | बैंक खाते में जमा वह धन जिसे माँग के ज़रिए कभी भी निकाला जा सके। |
| चैक | वह काग़ज़ जो बैंक को किसी के खाते से दूसरे व्यक्ति को ख़ास रकम देने का आदेश देता है। |
| साख / ऋण | वह सहमति जिसमें उधारदाता धन, वस्तुएँ या सेवाएँ देता है और बदले में भविष्य में भुगतान का वादा लेता है। |
| कार्यशील पूँजी | उत्पादन के रोज़मर्रा के ख़र्चों के लिए चाहिए धन — जैसे कच्चा माल और मज़दूरी। |
| कर्ज़-जाल | वह स्थिति जब कर्ज़ चुकाना असंभव हो जाए और व्यक्ति और गहरे संकट में फँस जाए। |
| समर्थक ऋणाधार | कर्ज़दार की वह संपत्ति जो वह उधारदाता को गारंटी के रूप में देता है। |
| ऋण की शर्तें | ब्याज दर, समर्थक ऋणाधार, आवश्यक कागज़ात और भुगतान के तरीक़े — सम्मिलित रूप से। |
| औपचारिक ऋण | बैंकों और सहकारी समितियों से मिलने वाला ऋण, जिस पर रिज़र्व बैंक की निगरानी होती है। |
| अनौपचारिक ऋण | साहूकार, व्यापारी, मालिक, रिश्तेदार और दोस्तों से मिलने वाला ऋण — कोई निगरानी नहीं। |
| स्वयं सहायता समूह | 15-20 पड़ोसियों का समूह जो नियमित बचत करता है और आपस में तथा बैंक से ऋण लेता है। |
| भारतीय रिज़र्व बैंक | वह केंद्रीय बैंक जो करेंसी जारी करता है और अन्य बैंकों पर नज़र रखता है। |
15 — एक वाक्य में पूरा अध्याय
मुद्रा विनिमय का माध्यम है जो आवश्यकताओं के दोहरे संयोग की समस्या ख़त्म कर देती है; उसके आधुनिक रूप करेंसी और माँग जमा हैं, जो बैंक प्रणाली से जुड़े हैं — बैंक जमा का केवल 15 प्रतिशत नकद रखकर बाक़ी से जमाकर्ता और कर्ज़दार के बीच मध्यस्थता करते हैं; ऋण सलीम के लिए वरदान और स्वप्ना के लिए कर्ज़-जाल बना, क्योंकि “ऋण उपयोगी होगा या नहीं, यह परिस्थिति के ख़तरों और हानि होने पर प्राप्त सहयोग की संभावना पर निर्भर करता है”; ऋण की चार शर्तें होती हैं जिनमें समर्थक ऋणाधार सबसे निर्णायक है — इसी कारण अमीरों को 83 प्रतिशत औपचारिक ऋण और गरीबों को केवल 46 प्रतिशत मिलता है; इसलिए ज़रूरी है कि औपचारिक ऋण बढ़े और उसका समान वितरण हो, और स्वयं सहायता समूह जैसे रास्ते बनें जहाँ ज़मीन की जगह भरोसा गिरवी रखा जा सके।