यह पन्ना उनके लिए है जो घर पर बारहवीं के बच्चे के साथ बैठते हैं। इतिहास आपको याद हो, यह ज़रूरी नहीं: हर सवाल के आगे लिखा है कि जवाब में क्या आना चाहिए।
बारहवीं के बच्चे से सवाल-जवाब करके परखने से ज़्यादा काम आता है उससे समझवाना। उससे कहिए, “मुझे यह अध्याय समझाओ, मैंने नहीं पढ़ा।” समझाते समय बच्चे को ख़ुद पता चल जाता है कि कौन-सी बात पक्की है और कौन-सी कच्ची।
किताब की अपनी पंक्तियाँ उद्धरण-चिह्नों में, पृष्ठ संख्या के साथ दी हैं। पृष्ठ संख्याएँ NCERT भारतीय इतिहास के कुछ विषय (कक्षा 12, पुस्तक 1) के 2026-27 में छपे संस्करण की हैं।
1. इस अध्याय में क्या है
यह अध्याय ईसा पूर्व 600 से ईसा संवत् 600 तक के विचारों, विश्वासों और इमारतों की बात करता है। इसमें दो कड़ियाँ साथ-साथ चलती हैं। पहली कड़ी विचारकों और उनके विश्वासों की है: उस युग के चिंतकों और शिक्षकों ने जीवन, मृत्यु, दुख और मुक्ति पर क्या प्रश्न पूछे और क्या उत्तर दिए। यज्ञ, उपनिषद, नियतिवादी और भौतिकवादी, महावीर और जैन धर्म, बुद्ध और संघ, फिर महायान, वैष्णव और शैव परंपराएँ इसी कड़ी में आती हैं।
दूसरी कड़ी इमारतों और मूर्तियों की है, और उन्हें पढ़ने की। स्तूप कैसे और किसके दान से बने, अमरावती खो गया और साँची क्यों बचा, मूर्तियों में कथाएँ, प्रतीक और लोक परंपराएँ कैसे दिखती हैं, और मंदिर और गुफाएँ कैसे बनीं, यह सब यहाँ है। साँची का स्तूप पूरे अध्याय का केंद्र है। किताब उसे उस युग की बची हुई इमारतों में सबसे सुरक्षित बताती है। अध्याय का अंत इस सवाल पर होता है कि इन इमारतों और मूर्तियों को देखकर क्या हम सब कुछ समझ सकते हैं।
किताब यह बात इन हिस्सों में समझाती है:
| हिस्सा | किताब क्या बताती है | पृष्ठ |
|---|---|---|
| साँची की एक झलक | भोपाल की शाहजहाँ बेगम ने अपनी आत्मकथा में साँची का वर्णन किया। फ्रांसीसियों ने पूर्वी तोरणद्वार ले जाने की इजाज़त माँगी, पर अंत में मूल तोरणद्वार अपनी जगह रहा। दोनों बेगमों ने रख-रखाव के लिए धन दिया। | 82–84 |
| यज्ञ से नए प्रश्न तक | ऋग्वेद के यज्ञ; उपनिषदों में जीवन का अर्थ, मृत्यु के बाद जीवन और पुनर्जन्म पर प्रश्न; शिक्षकों के वाद-विवाद; नियतिवादी (आजीविक) और भौतिकवादी (लोकायत) विचार; बौद्ध ग्रंथ कैसे तैयार हुए। | 84–87 |
| महावीर और जैन धर्म | महावीर से पहले 23 तीर्थंकर; संपूर्ण विश्व प्राणवान है; अहिंसा; कर्म और मुक्ति; पाँच व्रत। | 88–89 |
| बुद्ध, उनकी शिक्षाएँ और संघ | सिद्धार्थ का महल छोड़ना और ज्ञान पाना; अनित्य, दुख और मध्यम मार्ग; संघ, भिक्खु, भिक्खुनी और थेरी; थेरीगाथा और विनय पिटक के नियम। | 89–94 |
| स्तूप | स्तूप क्यों बने, किसके दान से बने, और उनकी बनावट कैसी थी। | 95–97 |
| अमरावती, साँची और उनकी मूर्तियाँ | अमरावती का स्तूप खो गया और साँची बच गया; साँची की मूर्तियों में जातक कथा, प्रतीक और लोक परंपराएँ। | 98–103 |
| नयी परंपराएँ और मंदिर | महायान, वैष्णव और शैव परंपराएँ, भक्ति, अवतार; गर्भगृह, शिखर और चट्टान काटकर बनी गुफाएँ। | 103–107 |
| क्या हम सब कुछ देख-समझ सकते हैं? | यूरोप के विद्वानों की उलझन, और महाबलीपुरम की चट्टान पर मतभेद। | 107–109 |
| दो कालरेखाएँ | कालरेखा 1 में महत्वपूर्ण धार्मिक बदलाव; कालरेखा 2 में प्राचीन इमारतों और मूर्तियों की खोज और संरक्षण के चरण (1814 से 1989 तक)। | 110 |
2. बच्चे से समझिए: दस सवाल
एक दिन में दो-तीन सवाल काफ़ी हैं। बच्चा अपने शब्दों में बताए, तो भी ठीक है; बस नीचे लिखी बातें उसके जवाब में आ जाएँ।
| सवाल | जवाब में यह आना चाहिए | पृष्ठ |
|---|---|---|
| साँची का स्तूप आज इतना सुरक्षित क्यों है, और भोपाल की बेगमों का इसमें क्या हाथ है? | उन्नीसवीं सदी में फ्रांसीसियों ने पूर्वी तोरणद्वार फ्रांस ले जाने की इजाज़त शाहजहाँ बेगम से माँगी; अंग्रेज़ों ने भी कोशिश की। अंत में दोनों प्लास्टर प्रतिकृतियों से संतुष्ट हो गए और मूल तोरणद्वार भोपाल राज्य में अपनी जगह रहा। शाहजहाँ बेगम और उनकी उत्तराधिकारी सुल्तानजहाँ बेगम ने रख-रखाव के लिए धन दिया, और सुल्तानजहाँ बेगम ने संग्रहालय और अतिथिशाला के लिए भी अनुदान दिया। किताब के शब्दों में “इसके पीछे कुछ विवेकपूर्ण निर्णयों की बड़ी भूमिका है।” | 82–83 |
| यज्ञ क्या थे, और उपनिषदों के चिंतक क्या पूछ रहे थे? | यज्ञों में ऋग्वेद की स्तुतियाँ पढ़ी जाती थीं और लोग मवेशी, बेटे, स्वास्थ्य, लंबी आयु जैसी चीज़ों के लिए प्रार्थना करते थे। शुरू में यज्ञ सामूहिक होते थे, बाद में (लगभग 1000-500 ईसा पूर्व) कुछ यज्ञ घरों के मालिक करने लगे, और राजसूय और अश्वमेध जैसे जटिल यज्ञ सरदार और राजा करते थे। उपनिषदों (छठी सदी ई.पू. से) में लोग जीवन का अर्थ, मृत्यु के बाद जीवन की संभावना और पुनर्जन्म के बारे में जानना चाहते थे। छांदोग्य उपनिषद बहते पवन को “निश्चय ही एक यज्ञ है” कहता है, यानी यज्ञ का अर्थ ही नए ढंग से सोचा जा रहा था। | 84–85 |
| नियतिवादी और भौतिकवादी क्या मानते थे, और उनके बारे में हमें कैसे पता चलता है? | नियतिवादी (आजीविक परंपरा, जैसे मक्खलि गोसाल) मानते थे कि सब कुछ पूर्व निर्धारित है: “सुख और दुख मानो पूर्व निर्धारित मात्रा में माप कर दिए गए हैं।” भौतिकवादी (लोकायत परंपरा, जैसे अजीत केसकंबलिन्) कहते थे कि दान, यज्ञ या चढ़ावा जैसी कोई चीज़ नहीं होती और “मनुष्य चार तत्वों से बना होता है।” इन दोनों परंपराओं के अपने ग्रंथ नष्ट हो गए हैं, इसलिए उनके बारे में दूसरी परंपराओं के ग्रंथों से, जैसे सुत्त पिटक से, पता चलता है। | 87 |
| जैन धर्म की मुख्य शिक्षाएँ क्या हैं, और क्या यह महावीर से शुरू हुआ? | नहीं। जैन परंपरा के अनुसार महावीर से पहले 23 शिक्षक हो चुके थे, जिन्हें तीर्थंकर कहते हैं, और मूल सिद्धांत उनके जन्म से पहले उत्तर भारत में प्रचलित थे। शिक्षाएँ: “संपूर्ण विश्व प्राणवान है” (पत्थर, चट्टान और जल में भी जीवन माना जाता है); अहिंसा, यानी किसी भी जीव को न मारना; जन्म-पुनर्जन्म का चक्र कर्म से तय होता है और उससे मुक्ति त्याग और तपस्या से मिलती है; साधु-साध्वी के पाँच व्रत: हत्या न करना, चोरी न करना, झूठ न बोलना, ब्रह्मचर्य और धन संग्रह न करना। | 88 |
| बुद्ध की मुख्य शिक्षाएँ क्या थीं? | विश्व अनित्य है और लगातार बदल रहा है; वह आत्माविहीन है, क्योंकि कुछ भी स्थायी या शाश्वत नहीं; इस क्षणभंगुर दुनिया में दुख मनुष्य के जीवन का अंतर्निहित तत्व है; और घोर तपस्या और विषयासक्ति के बीच मध्यम मार्ग अपनाकर दुखों से मुक्ति मिल सकती है। प्रारंभिक परंपराओं में भगवान का होना या न होना अप्रासंगिक था। किताब के शब्दों में, “बुद्ध मानते थे कि समाज का निर्माण इनसानों ने किया था न कि ईश्वर ने।” | 91–92 |
| संघ क्या था, और उसमें महिलाएँ कब आईं? | संघ बुद्ध की स्थापित भिक्षुओं की संस्था थी, जिसके सदस्य धम्म के शिक्षक बने; दान पर निर्भर होने से वे भिक्खु कहलाए। शुरू में सिर्फ़ पुरुष आ सकते थे; बाद में महिलाओं को भी अनुमति मिली, और बौद्ध ग्रंथों के अनुसार बुद्ध के प्रिय शिष्य आनंद ने बुद्ध को समझाकर यह अनुमति पाई। बुद्ध की उपमाता महाप्रजापति गोतमी पहली भिक्खुनी बनीं। राजा, धनवान, गृहपति, कर्मकार, दास, शिल्पी, सभी अनुयायी बने, और संघ में आने पर सब बराबर माने जाते थे। | 92 |
| स्तूप क्या है, और क्यों और कैसे बने? | बुद्ध से जुड़े अवशेष, जैसे उनकी अस्थियाँ या उनका इस्तेमाल किया हुआ सामान, कुछ पवित्र जगहों पर गाड़ दिए गए थे; इन टीलों को स्तूप कहते थे। अशोकावदान के अनुसार असोक ने बुद्ध के अवशेष हर महत्वपूर्ण शहर में बाँटकर उन पर स्तूप बनाने का आदेश दिया। स्तूप दान से बने। अभिलेखों में दानकर्ता मिलते हैं: सातवाहन जैसे राजा, शिल्पकारों और व्यापारियों की श्रेणियाँ (साँची के एक तोरणद्वार का हिस्सा हाथी दाँत का काम करने वाले शिल्पकारों के दान से बना), सैकड़ों स्त्री-पुरुष, और भिक्खु और भिक्खुनियाँ भी। | 96 |
| अमरावती का स्तूप खो गया, तो साँची कैसे बचा? | अमरावती में 1796 में एक स्थानीय राजा ने मंदिर बनाने के लिए उसके पत्थर इस्तेमाल करने का निश्चय किया, और उसकी मूर्तियाँ बाद में मद्रास, कलकत्ता और लंदन तक पहुँचीं। आज उसका महाचैत्य “अब सिर्फ एक छोटा सा टीला है जिसका सारा गौरव नष्ट हो चुका है।” साँची की खोज 1818 में हुई, जब उसके तीन तोरणद्वार खड़े थे। किताब पूछती है कि साँची क्यों बच गया, और कहती है कि शायद अमरावती की खोज थोड़ी पहले हो गई थी। तब तक विद्वान इस बात का महत्त्व नहीं समझ पाए थे कि किसी पुरातात्विक अवशेष को उठाकर ले जाने की बजाय खोज की जगह पर ही संरक्षित करना ज़रूरी है। साँची के तोरणद्वार पेरिस या लंदन भेजने का सुझाव भी आया, पर स्तूप वहीं रहा। | 83, 98–99 |
| साँची की मूर्तियाँ समझने में बौद्ध साहित्य कहाँ तक काम आता है? | जहाँ तक काम आता है: उत्तरी तोरणद्वार का एक दृश्य (चित्र 4.13) पहली नज़र में फूस की झोंपड़ी और पेड़ों वाला ग्रामीण दृश्य लगता है, पर कला इतिहासकार उसे वेसान्तर जातक का दृश्य बताते हैं; और बुद्ध को कई मूर्तिकारों ने रिक्त स्थान, स्तूप, चक्र जैसे प्रतीकों से दिखाया है। जहाँ अकेला काफ़ी नहीं: पेड़ पकड़कर झूलती स्त्री (शालभंजिका), जानवर और सर्प लोक परंपराओं से आए लगते हैं। किताब के अनुसार “ऐसी मूर्तिकला को अक्षरश: नहीं समझा जा सकता है।” | 99–103 |
| महायान, वैष्णव और शैव परंपराओं में क्या नया था, और शुरू के मंदिर कैसे थे? | “ईसा की प्रथम सदी के बाद बौद्ध अवधारणाओं और व्यवहार में बदलाव नज़र आते हैं”: मुक्तिदाता की कल्पना, बोधिसत्त, और बुद्ध और बोधिसत्तों की मूर्तियों की पूजा। इस नयी परंपरा को महायान कहा गया। किताब की कालरेखा 1 महायान बौद्ध मत के विकास को “लगभग दूसरी सदी ईसा पूर्व से आगे” रखती है। वैष्णव (विष्णु) और शैव (शिव) परंपराओं में भक्ति, यानी एक विशेष देवता की पूजा और भक्त का प्रेम और समर्पण, केंद्र में थी; वैष्णववाद में दस अवतार माने गए। शुरू के मंदिर एक चौकोर कमरे गर्भगृह के रूप में थे, जिसमें एक दरवाज़ा होता था; बाद में उसके ऊपर शिखर बना। कुछ मंदिर पहाड़ी काटकर गुफाओं के रूप में बने, और चट्टान काटकर बनाने की इस परंपरा का सबसे विकसित रूप आठवीं सदी का कैलाशनाथ मंदिर है। | 103–107, 110 |
3. छह बातें जिनमें बच्चे अक्सर उलझते हैं
अगर बच्चा इनमें से कोई बात बोले या लिखे, तो वहीं रुककर पूछिए: “किताब में यह कहाँ लिखा है?”
| बच्चा लिख देता है | सही बात | पृष्ठ |
|---|---|---|
| आजीविक भौतिकवादी थे | आजीविक (मक्खलि गोसाल) नियतिवादी कहलाते हैं; लोकायत (अजीत केसकंबलिन्) भौतिकवादी | 87 |
| बुद्ध के प्रवचन उनके जीवन काल में लिखे गए | कोई भी संभाषण जीवन काल में नहीं लिखा गया; मृत्यु के बाद वेसली की सभा में संकलन हुआ | 86 |
| जैन धर्म महावीर से शुरू हुआ | जैन मूल सिद्धांत महावीर के जन्म से पहले प्रचलित थे; उनसे पहले 23 तीर्थंकर हो चुके थे | 88 |
| प्रारंभिक बौद्ध धर्म ईश्वर की पूजा पर टिका था | प्रारंभिक परंपराओं में भगवान का होना या न होना अप्रासंगिक था | 91 |
| हीनयान नाम पुरानी परंपरा ने ख़ुद रखा | यह नाम महायान अपनाने वालों ने दिया; पुरानी परंपरा वाले ख़ुद को थेरवादी कहते थे | 103 |
| सबसे प्राचीन कृत्रिम गुफाएँ बौद्ध भिक्खुओं के लिए बनीं | ईसा पूर्व तीसरी सदी में असोक के आदेश से आजीविक संप्रदाय के संतों के लिए | 107 |
4. किताब के शब्द, आसान भाषा में
बच्चे से पूछिए कि इनमें से कौन-से शब्द वह बिना देखे समझा सकता है। जो न समझा पाए, उसे वहीं किताब का पृष्ठ खोलने दीजिए।
| किताब का शब्द | आसान मतलब | पृष्ठ |
|---|---|---|
| यज्ञ | वैदिक अनुष्ठान, जिसमें ऋग्वेद की स्तुतियाँ पढ़ी जाती थीं; पहले सामूहिक, बाद में कुछ घरों के मालिक करते थे | 84 |
| उपनिषद | उपनिषदों की विचारधाराएँ, छठी सदी ई.पू. से, जिनमें जीवन का अर्थ, मृत्यु के बाद जीवन और पुनर्जन्म पर प्रश्न पूछे गए | 84–85 |
| कुटागारशाला | नुकीली छत वाली झोपड़ी, जहाँ घुमक्कड़ शिक्षक बहस करते थे | 85 |
| नियतिवादी | जो मानते थे कि सब कुछ पूर्व निर्धारित है; आजीविक परंपरा, जैसे मक्खलि गोसाल | 87 |
| भौतिकवादी | लोकायत परंपरा, जैसे अजीत केसकंबलिन्: मनुष्य चार तत्वों से बना है, मृत्यु के बाद कोई नहीं बचता | 87 |
| तीर्थंकर | जैन परंपरा के वे महापुरुष जो पुरुषों और महिलाओं को जीवन की नदी के पार पहुँचाते हैं; महावीर से पहले 23 हुए | 88 |
| अहिंसा | किसी भी जीव, यानी इनसान, जानवर, पेड़-पौधे या कीड़े-मकोड़े, को न मारना; जैन दर्शन का केंद्र | 88 |
| धम्म | बुद्ध की शिक्षा। किताब कहती है कि बुद्ध ने बाकी जीवन “धर्म या सम्यक जीवनयापन की शिक्षा दी”, और संघ के भिक्षु “धम्म के शिक्षक” बने | 90, 92 |
| मध्यम मार्ग | घोर तपस्या और विषयासक्ति के बीच का रास्ता, जिससे दुखों से मुक्ति मिल सकती है | 91 |
| निर्वाण | अहं और इच्छा का खत्म हो जाना | 92 |
| संघ | बुद्ध की स्थापित भिक्षुओं की संस्था, जिसके सदस्य धम्म के शिक्षक बने | 92 |
| भिक्खु, भिक्खुनी | संघ के भिक्षु और संघ में आई स्त्री; पहली भिक्खुनी महाप्रजापति गोतमी | 92 |
| थेरी | ऐसी महिलाएँ जिन्होंने निर्वाण प्राप्त कर लिया हो | 92 |
| त्रिपिटक | ‘तीन टोकरियाँ’: विनय पिटक (संघ के नियम), सुत्त पिटक (बुद्ध की शिक्षाएँ), अभिधम्म पिटक (दर्शन) | 86 |
| स्तूप | बुद्ध से जुड़े अवशेषों, जैसे अस्थियाँ या बुद्ध का इस्तेमाल किया सामान, पर बना टीला | 96 |
| अंड, हर्मिका, यष्टि, छत्री | अंड गोलार्ध मिट्टी का टीला; उसके ऊपर छज्जे जैसी हर्मिका (देवताओं के घर का प्रतीक); उससे निकला मस्तूल यष्टि; उस पर अक्सर लगी छतरी छत्री | 96 |
| वेदिका, तोरणद्वार | वेदिका टीले के चारों ओर का घेरा, जो पवित्र स्थल को सामान्य दुनिया से अलग करता था; तोरणद्वार उसमें चारों दिशाओं के नक्काशीदार द्वार | 97 |
| दक्षिणावर्त परिक्रमा | टीले को दाईं ओर रखकर घूमना, मानो आकाश में सूर्य के पथ का अनुकरण | 97 |
| शालभंजिका | संस्कृत में वर्णित, पेड़ पकड़कर झूलती स्त्री की मूर्ति; लोक विश्वास में उसके छूने से वृक्षों में फूल और फल आते थे | 101 |
| बोधिसत्त | परम करुणामय जीव, जो सत्कार्यों से कमाया पुण्य दूसरों की सहायता में लगाते थे | 103 |
| महायान, हीनयान, थेरवाद | महायान बौद्ध चिंतन की नयी परंपरा; महायान अपनाने वालों ने पुरानी परंपरा को हीनयान कहा; पुरानी परंपरा वाले ख़ुद को थेरवादी कहते थे | 103 |
| भक्ति | एक विशेष देवता की पूजा, जिसमें भक्त और ईश्वर का रिश्ता प्रेम और समर्पण का माना जाता था | 104 |
| अवतार | विश्व की रक्षा के लिए भगवान के अलग-अलग रूप; वैष्णव परंपरा में दस अवतारों की कल्पना | 104 |
| पुराण | प्रथम सहस्राब्दि के मध्य से ब्राह्मणों के रचे, संस्कृत श्लोकों के ग्रंथ, जो ऊँची आवाज़ में पढ़े जाते थे | 104–105 |
| गर्भगृह, शिखर | गर्भगृह शुरू के मंदिर का चौकोर कमरा, एक दरवाज़े वाला, जिसमें मूर्ति रहती थी; शिखर उसके ऊपर बना ऊँचा ढाँचा | 105 |
5. लिखे हुए जवाब कैसे जाँचें
किताब के बारह प्रश्न पृष्ठ 111 से 113 पर हैं। प्रश्न 1 से 5 लगभग 100-150 शब्दों में लिखने हैं, प्रश्न 6 से 9 लगभग 500 शब्दों के निबंध हैं, प्रश्न 10 मानचित्र का काम है, और प्रश्न 11 और 12 परियोजनाएँ हैं (कोई एक करनी है)। हर प्रश्न के नीचे लिखा है कि अच्छे जवाब में क्या होना चाहिए। शब्द वही न हों तो चिंता मत कीजिए; बातें आ जाएँ, तो जवाब ठीक है।
प्रश्न 1: उपनिषद, नियतिवादी और भौतिकवादी (पृष्ठ 84–87)
- मुख्य बात: हाँ, उनके विचार अलग थे। नियतिवादी मानते थे कि कोई कुछ नहीं बदल सकता, और भौतिकवादी मानते थे कि मृत्यु के बाद कोई नहीं बचता; उपनिषदों के विचारक इन्हीं बातों पर प्रश्न पूछ रहे थे, जैसे “क्या पुनर्जन्म अतीत के कर्मों से होता है?” (पृष्ठ 84, 87)
- उपनिषद (छठी सदी ई.पू. से): जीवन का अर्थ, मृत्यु के बाद जीवन की संभावना और पुनर्जन्म पर प्रश्न। छांदोग्य उपनिषद आत्मा को बीज की गिरी से छोटी और सब लोकों से बड़ी बताता है।
- नियतिवादी (आजीविक, जैसे मक्खलि गोसाल): सुख और दुख पहले से माप कर दिए गए हैं, उन्हें बदला नहीं जा सकता।
- भौतिकवादी (लोकायत, जैसे अजीत केसकंबलिन्): मनुष्य चार तत्वों से बना है, मृत्यु के बाद कोई नहीं बचता, दान और यज्ञ जैसी कोई चीज़ नहीं।
- यह भी आए तो और अच्छा: नियतिवादियों और भौतिकवादियों के अपने ग्रंथ नष्ट हो गए; उनके विचार सुत्त पिटक जैसी दूसरी परंपराओं से पता चलते हैं।
प्रश्न 2: जैन धर्म की शिक्षाएँ (पृष्ठ 88–89)
- मुख्य बात: जैनों के मूल सिद्धांत महावीर के जन्म से पहले उत्तर भारत में प्रचलित थे; जैन परंपरा के अनुसार उनसे पहले 23 तीर्थंकर हो चुके थे।
- शिक्षाएँ: संपूर्ण विश्व प्राणवान है; अहिंसा; कर्म से जन्म-पुनर्जन्म का चक्र और त्याग व तपस्या से मुक्ति; पाँच व्रत (हत्या, चोरी, झूठ, ब्रह्मचर्य और धन संग्रह के बारे में)।
- यह भी आए तो और अच्छा: मुक्ति के लिए संसार का त्याग ज़रूरी माना गया, इसलिए विहारों में रहना अनिवार्य नियम बना; और जैन विद्वानों ने प्राकृत, संस्कृत और तमिल जैसी भाषाओं में बहुत साहित्य रचा।
प्रश्न 3: साँची और भोपाल की बेगमें (पृष्ठ 82–83, 110)
- मुख्य बात: साँची आज जिस हालत में है, उसमें शाहजहाँ बेगम और उनकी उत्तराधिकारी सुल्तानजहाँ बेगम के फ़ैसलों और अनुदान की बड़ी भूमिका है।
- पूर्वी तोरणद्वार: फ्रांसीसियों ने उसे फ्रांस ले जाने की इजाज़त माँगी, अंग्रेज़ों ने भी कोशिश की; अंत में दोनों प्लास्टर प्रतिकृतियों से संतुष्ट हुए और मूल अपनी जगह रहा।
- धन: दोनों बेगमों ने रख-रखाव के लिए धन दिया। सुल्तानजहाँ बेगम ने संग्रहालय, अतिथिशाला और जॉन मार्शल के ग्रंथों के प्रकाशन के लिए अनुदान दिया।
- लिखित वर्णन: शाहजहाँ बेगम (शासनकाल 1868-1901) की आत्मकथा ताज–उल-इकबाल तारीख भोपाल में साँची का वर्णन है।
- यह भी आए तो और अच्छा: 1989 में साँची को विश्व कला दाय स्थान घोषित किया गया (पृष्ठ 110)।
प्रश्न 4: हुविष्क के समय का अभिलेख (पृष्ठ 111)
अभिलेख में भिक्खुनी धनवती का नाम है, जिन्होंने अपने माता-पिता के साथ मधुवनक में बोधिसत्त की मूर्ति स्थापित की। नीचे हर उपप्रश्न का जवाब है।
- (क) तारीख कैसे तय हुई: कुषाण शासक महाराजा हुविष्क के तैंतीसवें साल में, गर्म मौसम के पहले महीने के आठवें दिन, यानी राज्य वर्ष, ऋतु, महीना और दिन देकर।
- (ख) मूर्ति क्यों: यह अनुमान का प्रश्न है, इसलिए “शायद” वाला जवाब ठीक है। महायान में बोधिसत्त करुणामय माने गए और उनकी मूर्तियों की पूजा होती थी; स्तूपों के अभिलेख बताते हैं कि भिक्खु और भिक्खुनियाँ भी दान देते थे।
- (ग) रिश्तेदार: माता-पिता, और बुद्धमिता, जिनकी बहन की बेटी धनवती हैं। भिक्खु बल रिश्तेदार नहीं हैं; वे गुरु हैं (धनवती के या बुद्धमिता के: वाक्य दोनों तरह पढ़ा जा सकता है)।
- (घ) ग्रंथ: बल और बुद्धमिता को “त्रिपिटक जानने वाले” कहा गया है, इसलिए माना जा सकता है कि धनवती भी त्रिपिटक जानती थीं।
- (ड.) किससे सीखा: भिक्खु बल से, या अपनी मौसी बुद्धमिता से। “भिक्खु बल की शिष्या” शब्द धनवती के लिए भी पढ़े जा सकते हैं और बुद्धमिता के लिए भी, इसलिए इनमें से कोई भी नाम, कारण के साथ, ठीक जवाब है।
प्रश्न 5: लोग संघ में क्यों जाते थे (पृष्ठ 85, 92–94)
- मुख्य बात: कई कारण थे, कुछ धर्म के, कुछ समाज के, कुछ व्यक्ति के।
- प्रश्न “आपके अनुसार” पूछता है, इसलिए बच्चा किताब की बातों से अपना तर्क बनाएगा। पृष्ठ 94 पर किताब बताती है कि बौद्ध धर्म तेज़ी से क्यों फैला; बच्चा इन कारणों को संघ में जाने से जोड़ सकता है।
- धार्मिक असंतोष: लोग उस समय की धार्मिक प्रथाओं से असंतुष्ट थे, और तेज़ी से हो रहे सामाजिक बदलावों ने उन्हें उलझन में डाल रखा था (पृष्ठ 94)।
- जन्म नहीं, आचरण: बौद्ध शिक्षाओं में जन्म के आधार पर श्रेष्ठता की बजाय अच्छे आचरण और मूल्यों को महत्त्व मिला, इसलिए स्त्री-पुरुष इस धर्म की ओर आकर्षित हुए (पृष्ठ 94)।
- बराबरी: संघ में राजा से दास और शिल्पी तक आए, और संघ में आने पर सब बराबर माने जाते थे (पृष्ठ 92)।
- अपना प्रयास: बुद्ध ने सिखाया कि मुक्ति का प्रयास हर व्यक्ति ख़ुद कर सकता है (“तुम सब अपने लिए खुद ही ज्योति बनो”, पृष्ठ 92)।
- यह भी आए तो और अच्छा: संघ में आई स्त्रियाँ थेरी कहलाईं; थेरीगाथा में पुन्ना नाम की एक दासी भी अपनी बात कहती है।
प्रश्न 6: साँची की मूर्तिकला और बौद्ध साहित्य (पृष्ठ 96, 99–103)
यह प्रश्न पूछता है कि बौद्ध साहित्य जानने से साँची की मूर्तियाँ कहाँ तक समझ आती हैं। जवाब के दो हिस्से होने चाहिए।
- जहाँ साहित्य से मदद मिली: चित्र 4.13 पहली नज़र में झोंपड़ी और पेड़ों वाला गाँव का दृश्य लगता है, पर कला इतिहासकार उसे वेसान्तर जातक का दृश्य बताते हैं। बुद्ध को रिक्त स्थान, स्तूप, चक्र और पेड़ जैसे प्रतीकों से दिखाया गया, जिन्हें बुद्ध के चरित से समझा गया। महापरिनिब्बान सुत्त (स्रोत 8) से स्तूप की पूजा के दृश्य समझ आते हैं।
- जहाँ अकेला बौद्ध साहित्य काफ़ी नहीं था: किताब कहती है कि साँची की “बहुत सी अन्य मूर्तियाँ शायद बौद्ध मत से सीधी जुड़ी नहीं थीं।” शालभंजिका संस्कृत साहित्य और लोक परंपरा से समझ आई; कमल और हाथियों के बीच की महिला को कुछ इतिहासकार बुद्ध की माँ माया मानते हैं, तो दूसरे गजलक्ष्मी; और सर्प का प्रतीक ऐसी लोक परंपराओं से लिया लगता है “जिनका ग्रंथों में हमेशा ज़िक्र नहीं होता था” (पृष्ठ 101–103)।
- उदाहरण: जेम्स फर्गुसन बौद्ध साहित्य से अनभिज्ञ थे, इसलिए उन्होंने साँची को वृक्ष और सर्प पूजा का केंद्र मान लिया।
- निष्कर्ष: किताब के अनुसार ऐसी मूर्तिकला को “अक्षरश: नहीं समझा जा सकता” (पृष्ठ 100)।
प्रश्न 7: चित्र 4.32 और 4.33, गाँव और शहर (पृष्ठ 99, 112)
यहाँ बच्चे को चित्र खोलकर देखना है। आप उसके जवाब में ये बातें खोजिए।
- चित्र 4.32 को गाँव का दृश्य मानने के कारण: गुंबद जैसी छत वाली दो झोंपड़ियाँ, पेड़, नीचे पानी के पौधे, मवेशी जैसे जानवर, एक हाथी, और कंधे पर डंडे उठाए लोग।
- चित्र 4.33 को शहर का दृश्य मानने के कारण: खंभों वाली दो मंज़िला इमारत, बीच में रेलिंग की पट्टी, मेहराब वाली जालीदार खिड़कियाँ, और खानों में बैठी भीड़।
- निष्कर्ष: झोंपड़ी, पेड़, पानी और जानवर गाँव की पहचान हैं; खंभों और जालीदार खिड़कियों वाली दो मंज़िला इमारत और भीड़ शहर की। बच्चा कुछ और कहे, तो देखिए कि वह चित्र की किन चीज़ों से अपनी बात साबित करता है।
प्रश्न 8: वैष्णव और शैव परंपराएँ, मूर्ति और मंदिर (पृष्ठ 104–110)
- मुख्य बात: कालरेखा 1 के अनुसार लगभग दूसरी सदी ईसा पूर्व से आगे वैष्णववाद, शैववाद और देवी पूजन परंपराएँ बढ़ीं, और लगभग तीसरी सदी ईसवी में सबसे पुराने मंदिर बने (पृष्ठ 110)।
- पृष्ठभूमि: एक विशेष देवता की भक्ति; वैष्णववाद में दस अवतार।
- मूर्तियाँ: एहोल का वराह अवतार (लगभग छठी सदी), देवगढ़ में शेषनाग पर विष्णु (पाँचवीं सदी), शिव का प्रतीक लिंग, महाबलीपुरम् की दुर्गा (छठी सदी)। देवताओं की पहचान शिरोवस्त्र, आभूषण, आयुध और बैठने की शैली से होती थी, और अर्थ पुराणों की कहानियों से समझ आता है।
- मंदिर: चौकोर कमरा गर्भगृह, फिर ऊपर शिखर, बाद में विशाल सभास्थल और ऊँची दीवारें; चट्टान काटकर बनी गुफाओं की परंपरा आठवीं सदी के कैलाशनाथ मंदिर, एलोरा, तक पहुँची।
- यह भी आए तो और अच्छा: इन्हें पढ़ना कठिन था। उन्नीसवीं सदी के यूरोपीय विद्वानों को कई सिरों और हाथों वाली मूर्तियाँ विकृत लगीं, और महाबलीपुरम (तमिलनाडु) की विशाल चट्टान (चित्र 4.30) पर कौन-सी कथा दिखाई गई है, इस पर कला इतिहासकारों में आज भी मतभेद हैं (पृष्ठ 108–109)।
प्रश्न 9: स्तूप क्यों और कैसे बने (पृष्ठ 95–99)
- क्यों: लोग बहुत पुराने समय से कुछ जगहों को पवित्र मानते थे। बुद्ध के अवशेषों पर बने टीले स्तूप कहलाए। महापरिनिब्बान सुत्त (स्रोत 8) में बुद्ध का थूप बनाने का निर्देश है, और अशोकावदान के अनुसार असोक ने अवशेष बाँटकर स्तूप बनवाए।
- किसके दान से: राजा, शिल्पकारों और व्यापारियों की श्रेणियाँ (साँची का एक तोरणद्वार हाथी दाँत का काम करने वालों के दान से बना), सैकड़ों स्त्री-पुरुष, और भिक्खु-भिक्खुनियाँ।
- बनावट: अंड, उसके ऊपर हर्मिका, यष्टि और छत्री; चारों ओर वेदिका; चारों दिशाओं में तोरणद्वार; और दक्षिणावर्त परिक्रमा।
- निष्कर्ष: स्तूप बुद्ध के अवशेषों के प्रति श्रद्धा से बने, और उन्हें बनाने में राजाओं से लेकर आम स्त्री-पुरुषों और भिक्खु-भिक्खुनियों तक का दान लगा।
प्रश्न 10: मानचित्र का काम (पृष्ठ 86, 89, 95)
यह बच्चे की अपनी खोज है। जाँचने की बातें ये हैं।
- सिर्फ़ वही इलाके चिह्नित हों जिनका किताब नाम लेती है: बुद्ध के संदेश “मध्य एशिया होते हुए चीन, कोरिया और जापान, श्रीलंका से समुद्र पार कर म्याँमार, थाइलैंड और इंडोनेशिया तक फैले” (पृष्ठ 89)। मध्य एशिया वाला रास्ता ज़मीन का है, और श्रीलंका से आगे का रास्ता समुद्र का।
- फा-शिएन और श्वैन त्सांग जैसे तीर्थयात्री बौद्ध ग्रंथों की खोज में चीन से भारत आए थे।
- जो रास्ता किताब में न मिले, उसे अपनी ओर से न गढ़ें; एटलस देखें या शिक्षक से पूछें।
प्रश्न 11 और 12: परियोजनाएँ
इनमें से कोई एक करनी है। दोनों में बच्चा अपनी खोज करता है, इसलिए कोई एक जवाब नहीं है।
- प्रश्न 11, पड़ोस की परंपरा: बच्चा अपने आसपास की किसी परंपरा का पूजा स्थल चुने, लोगों से विनम्रता से अनुमति लेकर बात करे, और पता करे कि आज कौन-से धार्मिक ग्रंथ इस्तेमाल होते हैं और उन्हें कैसे सँभालकर रखा और आगे पहुँचाया जाता है; पूजा में मूर्तियाँ हैं या नहीं, और हैं तो वे इस अध्याय की मूर्तियों से मिलती हैं या अलग हैं। फिर पूजा की इमारत की तुलना शुरू के स्तूपों और मंदिरों से करे। जिनसे बात की, उनका नाम उनकी अनुमति से ही लिखा जाए।
- प्रश्न 12, पाँच तसवीरें: इस अध्याय की धार्मिक परंपराओं से जुड़ी, अलग-अलग काल और इलाकों की कम से कम पाँच मूर्तियों और चित्रों की तसवीरें इकट्ठी हों। शीर्षक हटाकर हर तसवीर दो लोगों को दिखाई जाए और उनके वर्णन जैसे के तैसे लिखे जाएँ। फिर उनके वर्णनों की तुलना करते हुए खोज की रिपोर्ट लिखी जाए; उसमें यह आ सकता है कि लोग किन चीज़ों से पहचान पाए और कहाँ चूके। इसे अध्याय से जोड़ा जाए: इतिहासकार भी परिचित चीज़ों के आधार पर अपरिचित को समझते हैं, और ग्रंथ न जानने पर फर्गुसन जैसी ग़लत व्याख्या हो सकती है।
अपने को जाँचने के लिए बच्चा रिवीजन नोट्स में किताब के सभी प्रश्नों के उत्तर देख सकता है, लिखने के बाद।
6. घर पर दस मिनट की बातचीत
इनमें से कोई एक चुन लीजिए, चाहे खाने के बाद, चाहे सैर पर। पहले बच्चे को बोलने दीजिए; फिर नीचे की बातों से मिलाइए। ये तीनों प्रश्न किताब के अपने “चर्चा कीजिए” वाले प्रश्न हैं।
पहली बातचीत: साँची क्यों बच गया? (पृष्ठ 99)
बच्चे से कहिए कि अध्याय की शुरुआत की साँची वाली कहानी याद करके बताए कि साँची का स्तूप क्यों बचा रहा। जवाब में ये बातें आ सकती हैं:
- फ्रांसीसी और अंग्रेज़ पूर्वी तोरणद्वार की जगह प्लास्टर प्रतिकृतियों से संतुष्ट हो गए।
- शाहजहाँ बेगम और सुल्तानजहाँ बेगम ने रख-रखाव, संग्रहालय, अतिथिशाला और जॉन मार्शल की पुस्तकों के प्रकाशन के लिए अनुदान दिया।
- किताब के अनुसार शायद हम भाग्यशाली रहे कि इस स्तूप पर किसी रेल ठेकेदार या निर्माता की नज़र नहीं पड़ी।
- अमरावती की खोज शायद थोड़ी पहले हो गई थी, जब खोज की जगह पर ही संरक्षण की बात नहीं समझी गई थी; साँची के लिए यह बात मान ली गई।
दूसरी बातचीत: मूर्ति देखकर कहानी (पृष्ठ 90)
बच्चे से पूछिए कि अगर उसे बुद्ध के जीवन के बारे में पता न होता, तो क्या वह चित्र 4.7 की मूर्ति देखकर समझ पाता कि उसमें क्या दिखाया गया है? जवाब में यह आना चाहिए:
- शायद नहीं। मूर्ति में एक सजा हुआ घोड़ा है जिस पर कोई सवार नहीं दिखता, और आसपास लोग हैं। कहानी जाने बिना यह कोई जुलूस लगेगा।
- सिद्धार्थ के महल छोड़ने की कथा पता हो, तभी समझ आता है कि खाली घोड़ा बुद्ध के जाने को दिखाता है।
- किताब भी आगे पृष्ठ 100 पर कहती है कि ऐसी मूर्तिकला को “अक्षरश: नहीं समझा जा सकता है।”
तीसरी बातचीत: जब लिखा हुआ न मिले (पृष्ठ 87)
पूछिए कि जब लिखित सामग्री न हो, या बची ही न हो, तो विचारों और मान्यताओं का इतिहास बनाने में क्या दिक्कतें आती हैं। जवाब में ये बातें आ सकती हैं:
- आजीविक और लोकायत परंपराओं के ग्रंथ नष्ट हो गए, इसलिए उनके विचार दूसरी परंपराओं से मिलते हैं, जो उन्हें अधूरा या अपने ढंग से बता सकती हैं।
- कई परंपराओं के विचार और आचार ग्रंथों में लिखे ही नहीं गए।
- चित्र और इमारतें पढ़ना कठिन है: मूर्तियाँ “अक्षरश:” नहीं समझी जा सकतीं, और ग्रंथ के बिना फर्गुसन ने साँची को ग़लत समझा (पृष्ठ 100, 103)।
- रोज़ के और ख़ास अवसरों के बहुत-से रीति-रिवाज कभी स्थायी रूप से दर्ज़ ही नहीं हुए।
7. महाबलीपुरम की चट्टान: एक सवाल जिसका एक जवाब नहीं
अध्याय का आख़िरी हिस्सा (पृष्ठ 107–109) बच्चे को यह सिखाता है कि इतिहासकार भी हर बात पक्की नहीं जानते। इसका सबसे अच्छा उदाहरण महाबलीपुरम (तमिलनाडु) की विशाल चट्टान है (चित्र 4.30)।
चट्टान पर किसी कथा का जीता-जागता चित्रण है, पर कौन-सी कथा? कला इतिहासकारों ने पुराणों के साहित्य में इसे पहचानने के लिए बहुत खोजबीन की, फिर भी वे एकमत नहीं हैं।
- कुछ विद्वान मानते हैं कि इसमें गंगा नदी का स्वर्ग से उतरना दिखाया गया है। चट्टान की सतह के बीच की प्राकृतिक दरार शायद नदी को दिखाती है। यह कथा महाकाव्यों और पुराणों में मिलती है।
- दूसरे विद्वान मानते हैं कि यहाँ महाभारत में वर्णित अर्जुन की तपस्या है, जो दिव्यास्त्र पाने के लिए की गई थी। वे मूर्तियों के बीच एक साधु के केंद्र में होने को महत्त्व देते हैं।
किताब यह भी याद दिलाती है कि बहुत-से रीति-रिवाज, धार्मिक विश्वास और व्यवहार इमारतों, मूर्तियों या चित्रों के रूप में स्थायी रूप से दर्ज़ ही नहीं हुए। किताब के शब्दों में, इस अध्याय के शानदार उदाहरण “एक विशाल ज्ञान राशि की मात्र ऊपरी परत हैं।”
बच्चे से पूछिए कि उसे दोनों में से कौन-सी बात ज़्यादा ठीक लगती है, पर साथ में यह भी कि चट्टान में क्या देखकर। यहाँ जवाब से ज़्यादा कारण मायने रखता है: दरार, साधु की जगह और कथाओं के नाम, इनमें से जो भी वह चुने, उसे चित्र से जोड़कर बताए। इस सवाल का आख़िरी जवाब किताब भी नहीं देती।
अगर सिर्फ़ पाँच मिनट हों
ये चार सवाल पूछ लीजिए। चारों ठीक हों, तो अध्याय की मुख्य बातें आ गई हैं।
| सवाल | जवाब |
|---|---|
| साँची का स्तूप आज इतना सुरक्षित क्यों है? | फ्रांसीसी और अंग्रेज़ पूर्वी तोरणद्वार की जगह प्लास्टर प्रतिकृतियों से संतुष्ट हो गए, और भोपाल की शाहजहाँ बेगम और सुल्तानजहाँ बेगम ने रख-रखाव और संग्रहालय के लिए अनुदान दिया। |
| लोग संघ में क्यों जाते थे? | संघ में राजा से दास तक सब आए, और आने पर सब बराबर माने जाते थे; बुद्ध ने सिखाया कि मुक्ति का रास्ता हर व्यक्ति को ख़ुद ढूँढ़ना है। किताब यह भी बताती है कि बौद्ध धर्म तेज़ी से फैला, क्योंकि लोग उस समय की धार्मिक प्रथाओं से असंतुष्ट थे और बौद्ध शिक्षाओं में जन्म की बजाय आचरण को महत्त्व था। |
| स्तूप क्यों बने और किसके दान से? | बुद्ध के अवशेषों पर बने टीले स्तूप कहलाए, और वे राजाओं, शिल्पकारों व व्यापारियों की श्रेणियों, सैकड़ों स्त्री-पुरुषों और भिक्खु-भिक्खुनियों के दान से बने। |
| साँची की मूर्तियाँ समझने में बौद्ध साहित्य कहाँ तक काम आता है? | बहुत हद तक: जातक कथाएँ और बुद्ध के चरित से कई दृश्य और प्रतीक समझ आते हैं। पर किताब के अनुसार ऐसी मूर्तिकला को “अक्षरश: नहीं समझा जा सकता है।” शालभंजिका, जानवर और सर्प के लिए लोक परंपराएँ भी जाननी पड़ती हैं। |
बच्चे के लिए इसी अध्याय के और पन्ने
- रिवीजन नोट्स: पूरा अध्याय छोटे में, किताब के सभी प्रश्नों के उत्तर के साथ।
- प्रश्न बैंक: परीक्षा जैसे प्रश्न, उत्तर के साथ। बच्चा पहले ख़ुद लिखे, फिर मिलाए।
- फ़्लैशकार्ड: बाईं ओर सवाल, दाईं ओर जवाब। जवाब ढककर बोलिए, फिर मिलाइए; रोज़ पाँच मिनट दोहराने के लिए।
- परख प्रश्न: सोचकर जवाब देने वाले प्रश्न, किताब के स्रोतों और उदाहरणों पर, हर प्रश्न का उत्तर साथ में।
- इंटरैक्टिव अध्याय: पूरा अध्याय स्क्रीन पर, हिस्सा-दर-हिस्सा।