अध्याय 3बंधुत्व, जाति तथा वर्ग

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NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 3

यह पन्ना उनके लिए है जो घर पर बारहवीं के बच्चे के साथ बैठते हैं। इतिहास आपको याद हो, यह ज़रूरी नहीं: हर सवाल के आगे लिखा है कि जवाब में क्या आना चाहिए।

बारहवीं के बच्चे से सवाल-जवाब करके परखने से ज़्यादा काम आता है उससे समझवाना। उससे कहिए, “मुझे यह अध्याय समझाओ, मैंने नहीं पढ़ा।” समझाते समय बच्चे को ख़ुद पता चल जाता है कि कौन-सी बात पक्की है और कौन-सी कच्ची।

किताब की अपनी पंक्तियाँ उद्धरण-चिह्नों में, पृष्ठ संख्या के साथ दी हैं। पृष्ठ संख्याएँ NCERT भारतीय इतिहास के कुछ विषय (कक्षा 12, पुस्तक 1) के 2026-27 में छपे संस्करण की हैं।


1. इस अध्याय में क्या है

यह अध्याय लगभग 600 ई.पू. से 600 ईसवी तक के आरंभिक समाज की बात करता है: परिवार और विवाह, वर्ण और जाति, संपत्ति और प्रतिष्ठा (पृष्ठ 53)। हर हिस्से में दो बातें आमने-सामने रखी गई हैं। एक तरफ़ संस्कृत के ब्राह्मणीय ग्रंथों (धर्मसूत्र, धर्मशास्त्र, मनुस्मृति) में तय किए गए मानदंड हैं। दूसरी तरफ़ अभिलेख, पालि और तमिल ग्रंथ, चीनी यात्रियों के विवरण और महाभारत की कहानियाँ हैं, जो दिखाती हैं कि इन नियमों का पालन हर जगह नहीं होता था। किताब के शब्दों में ब्राह्मणों का प्रभाव “सार्वभौमिक कदापि नहीं था” (पृष्ठ 58)।

अध्याय की दूसरी कड़ी यह है कि इतिहासकार एक ग्रंथ को कैसे पढ़ते हैं। उदाहरण महाभारत है, जो अपने वर्तमान रूप में एक लाख श्लोकों से अधिक का है। इतिहासकार उसे उसकी भाषा, विषयवस्तु, लेखकों, तिथियों और पुरातत्व के साक्ष्य के साथ मिलाकर पढ़ते हैं। अध्याय पूरा होने तक बच्चे को यह बताना आना चाहिए कि ग्रंथ के नियम क्या कहते थे, लोग असल में क्या करते थे, और इन दोनों में फ़र्क़ कहाँ दिखता है।

किताब यह बात सात हिस्सों में समझाती है:

हिस्साकिताब क्या बताती हैपृष्ठ
महाभारत का समालोचनात्मक संस्करण1919 में वी.एस. सुकथांकर के नेतृत्व में विद्वानों ने देश भर की संस्कृत पांडुलिपियाँ जुटाईं, श्लोकों की तुलना की और वे श्लोक चुने जो लगभग सभी पांडुलिपियों में मिले। इसमें सैंतालीस वर्ष लगे और 13,000 पृष्ठ बने।54
परिवार, बंधुता और विवाहपितृवंशिकता का आदर्श, गोत्र के नियम, विवाह के आठ प्रकार। सातवाहन रानियों ने पिता का गोत्र नाम रखा; सातवाहन राजा माता के नाम से जाने जाते थे, फिर भी उनके यहाँ उत्तराधिकार पितृवंशिक था।55–60
वर्ण, जाति और वर्ण व्यवस्था के बाहर के लोगचार वर्णों की ‘जीविका’, अक्षत्रिय राजा, जातियों की बढ़ती संख्या और श्रेणियाँ, और वर्ण व्यवस्था के बाहर माने गए अस्पृश्य, जिनमें चाण्डाल सबसे निम्न कोटि में रखे गए।61–67
संपत्ति और प्रतिष्ठास्त्री और पुरुष के संपत्ति पर अलग अधिकार, वर्ण के हिसाब से संपत्ति के अधिकार, बौद्ध आलोचना, और तमिल संगम साहित्य में संसाधन मिल-बाँटकर इस्तेमाल करने की अपेक्षा।68–71
सामाजिक अनुबंध की बौद्ध व्याख्यासुत्तपिटक के मिथक में लोग एक मनुष्य को चुनते हैं और ‘कर’ उसकी सेवा का मूल्य है।72
इतिहासकार महाभारत को कैसे पढ़ते हैंमहाभारत की भाषा और विषयवस्तु; लेखक और तिथियाँ (सूत, फिर ब्राह्मण, फिर बाद के जोड़); हस्तिनापुर में बी.बी. लाल का उत्खनन; द्रौपदी का विवाह।72–77
एक गतिशील ग्रंथमहाभारत के अनेक भाषाओं में पाठान्तर; महाश्वेता देवी की बांग्ला कहानी “कुंती ओ निषादी”।77–78

2. बच्चे से समझिए: दस सवाल

एक दिन में दो-तीन सवाल काफ़ी हैं। बच्चा अपने शब्दों में बताए, तो भी ठीक है; बस नीचे लिखी बातें उसके जवाब में आ जाएँ।

सवालजवाब में यह आना चाहिएपृष्ठ
महाभारत का समालोचनात्मक संस्करण क्या है, और कैसे बना?देश के अलग-अलग भागों से अलग-अलग लिपियों में लिखी पांडुलिपियाँ इकट्ठी की गईं, सबके श्लोकों की तुलना हुई, और वे श्लोक चुने गए जो लगभग सभी में मिले। काम 1919 में शुरू हुआ और सैंतालीस वर्ष चला। 13,000 पृष्ठों में से आधे से अधिक क्षेत्रीय प्रभेदों का ब्योरा देते हैं, जो पादटिप्पणियों और परिशिष्टों में रखे गए।54
पितृवंशिकता क्या है, और विशिष्ट परिवारों में यह इतनी अहम क्यों थी?वह वंश परंपरा जो पिता से पुत्र, फिर पौत्र, प्रपौत्र आदि से चलती है। इसमें पिता की मृत्यु के बाद पुत्र उनके संसाधनों पर, और राजाओं के मामले में सिंहासन पर भी, अधिकार जमा सकते थे। अधिकतर राजवंश लगभग छठी शताब्दी ई.पू. से इसका अनुसरण करते थे। यह महाकाव्य से पहले भी थी; महाभारत की मुख्य कथावस्तु ने इसे और सुदृढ़ किया।55
गोत्र के दो नियम क्या थे, और सातवाहन रानियों ने क्या किया?पहला, विवाह के बाद स्त्री पिता के नहीं, पति के गोत्र की मानी जाती थी। दूसरा, एक ही गोत्र के सदस्य आपस में विवाह नहीं कर सकते थे। सातवाहन रानियों के नाम गौतम और वसिष्ठ गोत्रों से बने थे, जो उनके पिता के गोत्र थे, और कुछ रानियाँ एक ही गोत्र की थीं।58–60
ब्राह्मण लेखकों के नियम सब जगह क्यों नहीं माने जाते थे?ब्राह्मण लेखक चाहते थे कि सब उनके नियम मानें, पर क्षेत्रीय विभिन्नता और संचार की बाधाओं के कारण उनका प्रभाव “सार्वभौमिक कदापि नहीं था”। धर्मशास्त्र ख़ुद विवाह के आठ प्रकार मानते हैं, जिनमें पहले चार ‘उत्तम’ और बाकी निंदित थे; संभव है कि निंदित पद्धतियाँ उन लोगों में चलती थीं जो ब्राह्मणीय नियम नहीं मानते थे।58
धर्मसूत्रों और धर्मशास्त्रों में चारों वर्णों की ‘जीविका’ क्या थी, और किताब के अनुसार वर्ण किस आधार पर निर्धारित किए गए थे?ब्राह्मण: वेदों और अन्य शास्त्रों का अध्ययन और अध्यापन, यज्ञ करना और कराना, दान देना और ग्रहण करना। क्षत्रिय: युद्ध करना, लोगों की रक्षा, न्याय संचालन (साथ में अध्ययन, यज्ञ कराना, दान देना)। वैश्य: कृषि, पशुपालन और व्यापार (साथ में अध्ययन, यज्ञ, दान)। शूद्र: बाकी तीन वर्णों की सहायता। किताब के अनुसार इस व्यवस्था में वर्णों को योग्यता, कार्य और व्यवसाय, क्षमताओं और रुचियों के आधार पर निर्धारित किया गया था। श्रीमद्भगवद् गीता जैसे ग्रंथ भी संकेत करते हैं कि चार वर्णों की व्यवस्था “गुण अथवा विशेषताएँ और कर्म अथवा कार्य” पर आधारित थी, जन्म से तय कोई कठोर व्यवस्था नहीं।61
क्या शासक हमेशा क्षत्रिय होते थे?नहीं। शास्त्रों के अनुसार केवल क्षत्रिय राजा हो सकते थे, पर शुंग और कण्व, जो मौर्यों के उत्तराधिकारी थे, ब्राह्मण थे। मौर्यों के उद्भव पर बहस होती रही है। सातवाहन गोतमी-पुत्त सिरी-सातकनि ने स्वयं को “अनूठा ब्राह्मण” बताया। किताब के शब्दों में राजत्व क्षत्रिय कुल में जन्म लेने पर “शायद ही निर्भर करता था”।62–63
वर्ण और जाति में क्या फ़र्क़ है, और श्रेणी क्या है?वर्ण चार ही थे, पर जातियों की कोई निश्चित संख्या नहीं थी; नए सामाजिक समूहों और नए व्यवसायों से संपर्क के साथ उनकी संख्या बढ़ती रही। एक ही जीविका वाली जातियाँ कभी-कभी श्रेणियों में भी संगठित होती थीं। उदाहरण: लगभग पाँचवीं शताब्दी ईसवी के मंदसौर अभिलेख में रेशम के बुनकरों की श्रेणी, जो लाट (गुजरात) से दशपुर (मंदसौर) गई और सूर्य देवता का मंदिर बनवाया।63–64
चाण्डाल कौन थे, और चीन से आए यात्रियों ने क्या लिखा?शवों की अंत्येष्टि करने और मृत पशुओं को छूने वाले, जिन्हें वर्ण व्यवस्था वाले समाज में सबसे निम्न कोटि में रखा गया। फा-शिएन (लगभग पाँचवीं शताब्दी ईसवी) के अनुसार अस्पृश्यों को सड़क पर करताल बजाकर अपने होने की सूचना देनी पड़ती थी। श्वैन-त्सांग (लगभग सातवीं शताब्दी ईसवी) के अनुसार वधिक और सफ़ाई करने वाले नगर से बाहर रहते थे।66
संपत्ति पर स्त्री और पुरुष के अधिकार कैसे अलग थे?मनुस्मृति पुरुषों के लिए धन अर्जित करने के सात तरीके बताती है, जबकि स्त्रियों के छ: तरीके सब भेंट या उपहार हैं। स्त्रीधन, यानी विवाह के समय मिले उपहार, पर स्त्री का स्वामित्व माना जाता था और पति का उस पर कोई अधिकार नहीं था। फिर भी सामान्यत: भूमि, पशु और धन पर पुरुषों का ही नियंत्रण था।68–69
बौद्धों ने वर्ण व्यवस्था की आलोचना कैसे की, और सुत्तपिटक का मिथक राजा के बारे में क्या कहता है?बौद्धों ने माना कि समाज में विषमता थी, पर यह भेद “न तो नैसर्गिक थे और न ही स्थायी”; उन्होंने जन्म के आधार पर सामाजिक प्रतिष्ठा को अस्वीकार किया। सुत्तपिटक के मिथक में लोगों ने एक मनुष्य को चुना, जिसे महासम्मत्त कहा गया, और ‘कर’ उसकी सेवा का मूल्य था।69, 72

3. छह बातें जिनमें बच्चे अक्सर उलझते हैं

बच्चा लिख देता हैसही बातपृष्ठ
महाभारत एक ही लेखक ने एक ही समय में लिखा।महाभारत कई चरणों में बना: संभवत: मूल कथा सूतों की थी, पाँचवीं शताब्दी ई.पू. से ब्राह्मणों ने उसे लिखा, लगभग 200 ई.पू. से 200 ईसवी के बीच श्रीकृष्ण को विष्णु का रूप बताया जाने लगा, और लगभग 200-400 ईसवी में उपदेशात्मक प्रकरण जुड़े। परंपरा ऋषि व्यास को रचयिता मानती है।74–75
सातवाहन राजा माता के नाम से जाने जाते थे, इसलिए उत्तराधिकार मातृवंशिक था।मातृनाम के बावजूद सातवाहन राजाओं में सिंहासन का उत्तराधिकार पितृवंशिक होता था।60
राजा हमेशा क्षत्रिय होते थे।शुंग और कण्व ब्राह्मण थे, मौर्यों के उद्भव पर बहस है, ब्राह्मण शकों को मलेच्छ मानते थे, और सातवाहन शासक गोतमी-पुत्त सिरी-सातकनि ने स्वयं को “अनूठा ब्राह्मण” बताया।62–63
वर्णों की तरह जातियाँ भी चार थीं।वर्ण चार थे, पर जातियों की कोई निश्चित संख्या नहीं थी।63
हस्तिनापुर नाम का वह गाँव निश्चित रूप से महाभारत वाला हस्तिनापुर है।वह कुरुओं की राजधानी हो सकती थी; नामों की समानता संयोग भी हो सकती है।75
बहुपति प्रथा आरंभिक भारत की सबसे प्रचलित विवाह पद्धति थी।कुछ आरंभिक स्रोत बताते हैं कि यह न एकमात्र पद्धति थी, न सबसे अधिक प्रचलित।77

4. किताब के शब्द, आसान भाषा में

किताब का शब्दआसान मतलबपृष्ठ
कुलसंस्कृत ग्रंथों में परिवार के लिए शब्द55
ज्ञातिबांधवों का बड़ा समूह। हिंदी किताब के बॉक्स में यहाँ ‘जाति’ छपा है; यह शब्द ज्ञाति (बांधवों का बड़ा समूह) है, वर्ण व्यवस्था वाली जाति नहीं।55
वंशकिसी कुल के पीढ़ी-दर-पीढ़ी के पूर्वज, जो इकट्ठे रूप में एक ही वंश के माने जाते हैं55
पितृवंशिकतावह वंश परंपरा जो पिता से पुत्र, फिर पौत्र, प्रपौत्र आदि से चलती है55
मातृवंशिकतावह वंश परंपरा जो माँ से जुड़ी होती है55
बहिर्विवाहगोत्र से बाहर विवाह57
अंतर्विवाहसमूह के भीतर ही विवाह; यह समूह एक गोत्र, कुल, जाति या एक ही स्थान पर बसने वालों का हो सकता है57
बहुपत्नी प्रथाएक पुरुष की अनेक पत्नियाँ होने की परिपाटी57
बहुपति प्रथाएक स्त्री के अनेक पति होने की पद्धति57
कन्यादानविवाह में कन्या की भेंट; इसे पिता का महत्वपूर्ण धार्मिक कर्तव्य माना गया57
धर्मसूत्र, धर्मशास्त्रसंस्कृत ग्रंथ जिनमें लगभग 500 ई.पू. से ब्राह्मणों के बनाए सामाजिक मानदंड संकलित किए गए58
मनुस्मृतिधर्मशास्त्रों में सबसे महत्वपूर्ण; संकलन लगभग 200 ई.पू. से 200 ईसवी के बीच58
गोत्रलगभग 1000 ई.पू. के बाद से चली ब्राह्मणीय पद्धति; हर गोत्र एक वैदिक ऋषि के नाम पर होता था और उसके सदस्य उस ऋषि के वंशज माने जाते थे58
मातृनाममाता के नाम से बना नाम, जैसे गोतमी–पुत्त यानी ‘गोतमी का पुत्र’59–60
वर्णधर्मसूत्रों और धर्मशास्त्रों में बताई गई चार वर्गों वाली व्यवस्था: ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र61
जातिसमाज के वर्गीकरण का दूसरा शब्द; वर्ण चार ही थे, पर जातियों की कोई निश्चित संख्या नहीं थी63
मलेच्छब्राह्मण जिन्हें बर्बर या अन्यदेशीय मानते थे, जैसे मध्य एशिया से आए शक; कभी-कभी असंस्कृत भाषा बोलने वाले लोगों को भी मलेच्छ कहकर हेय दृष्टि से देखा जाता था62, 65
श्रेणीएक ही जीविका या व्यवसाय वाली जातियों का संगठन63
वणिकसंस्कृत ग्रंथों और अभिलेखों में व्यापारी के लिए शब्द64
निषादवन में रहने वाला शिकारी समुदाय; स्रोत 7 में एकलव्य को वनवासी निषाद बताया गया है62, 64
अस्पृश्यवर्ण व्यवस्था के बाहर माने गए लोग, जिनसे अपने को ‘पवित्र’ मानने वाले भोजन तक नहीं लेते थे65–66
चाण्डालशवों की अंत्येष्टि करने और मृत पशुओं को छूने वाले; वर्ण व्यवस्था वाले समाज में सबसे निम्न कोटि में रखे गए66
स्त्रीधनविवाह के समय मिले उपहार, जिन पर स्त्री का स्वामित्व माना जाता था68
महासम्मत्तबौद्ध मिथक में सब लोगों द्वारा चुने गए मनुष्य की उपाधि72
समालोचनात्मक संस्करणदेश भर की पांडुलिपियों के श्लोकों की तुलना करके तैयार किया गया महाभारत का पाठ54
आख्यानमहाभारत का कहानियों वाला भाग73
उपदेशात्मकनिर्देश या शिक्षा देने वाला भाग; इसमें सामाजिक आचार-विचार के मानदंड हैं73
सूतभाट सारथी, जो क्षत्रिय योद्धाओं के साथ युद्धक्षेत्र में जाते थे; संभवत: महाभारत की मूल कथा के रचयिता यही थे74
इतिहासआरंभिक संस्कृत परंपरा में महाभारत की श्रेणी; इस शब्द का अर्थ है ‘ऐसा ही था’74

5. लिखे हुए जवाब कैसे जाँचें

किताब के 12 प्रश्न पृष्ठ 80–81 पर हैं। प्रश्न 1 से 5 छोटे उत्तर (लगभग 100 से 150 शब्द) माँगते हैं, प्रश्न 6 से 9 लघु निबंध (लगभग 500 शब्द), प्रश्न 10 मानचित्र का काम है, और प्रश्न 11 तथा 12 परियोजनाएँ हैं, जिनमें से कोई एक करनी है। मानचित्र और परियोजनाएँ बच्चे की अपनी खोज और रचना हैं। इनमें आपको पूरा जवाब नहीं जाँचना; बस देखिए कि माँगे हुए हिस्से आ गए हैं या नहीं।

प्रश्न 1: विशिष्ट परिवारों में पितृवंशिकता क्यों महत्वपूर्ण थी

  • मुख्य बात: शासक और धनी परिवारों में पितृवंशिकता से तय होता था कि संसाधन और सत्ता आगे किसके हाथ जाएँगे। पिता की मृत्यु के बाद पुत्र उनके संसाधनों पर, और राजाओं के मामले में सिंहासन पर भी, अधिकार जमा सकते थे।
  • चलन: अधिकतर राजवंश लगभग छठी शताब्दी ई.पू. से पितृवंशिकता का अनुसरण करते थे।
  • स्रोत 1 और स्रोत 2: ऋग्वेद के विवाह मंत्र में कामना है कि वधू के “उत्तम पुत्र हों”; महाभारत में दुर्योधन को डर है कि पांडवों को विरासत मिली तो “उनके बाद उनके पुत्र, पौत्र और फिर प्रपौत्र इस पैतृक संपत्ति के अधिकारी हो जाएँगे”।
  • बेटियाँ: उनका विवाह गोत्र से बाहर, ‘उचित’ समय पर ‘उचित’ व्यक्ति से कराया जाता था, और कन्यादान को पिता का महत्वपूर्ण धार्मिक कर्तव्य माना गया।
  • यह भी आए तो और अच्छा: नियम में लचीलापन था। पुत्र न होने पर कभी भाई और कभी बंधु-बांधव गद्दी पर बैठे, और प्रभावती गुप्त जैसी स्त्रियों ने सत्ता संभाली।

प्रश्न 2: क्या शासक निश्चित रूप से क्षत्रिय ही होते थे

  • जवाब नहीं है। शास्त्रों के अनुसार केवल क्षत्रिय राजा हो सकते थे, पर अनेक महत्वपूर्ण राजवंश दूसरे वर्णों से निकले।
  • मौर्य: बाद के बौद्ध ग्रंथ उन्हें क्षत्रिय बताते हैं, जबकि ब्राह्मणीय शास्त्र उन्हें ‘निम्न’ कुल का मानते हैं; उनके उद्भव पर बहस होती रही है।
  • शुंग और कण्व: मौर्यों के उत्तराधिकारी, जो ब्राह्मण थे।
  • शक: मध्य एशिया से आए शकों को ब्राह्मण मलेच्छ मानते थे, फिर भी शक राजा रुद्रदामन (लगभग दूसरी शताब्दी ईसवी) के संस्कृत अभिलेख में सुदर्शन सरोवर के जीर्णोद्धार का वर्णन है।
  • सातवाहन: गोतमी-पुत्त सिरी-सातकनि ने स्वयं को “अनूठा ब्राह्मण” बताया, फिर भी उसने रुद्रदामन के परिवार से विवाह संबंध बनाए।
  • निष्कर्ष की पंक्ति: राजनीतिक सत्ता हर वह व्यक्ति पा सकता था जो समर्थन और संसाधन जुटा सके; राजत्व क्षत्रिय कुल में जन्म लेने पर “शायद ही निर्भर करता था”।

प्रश्न 3: द्रोण, हिडिम्बा और मातंग की कथाएँ

  • द्रोण (स्रोत 7): ब्राह्मण द्रोण ने वनवासी निषाद एकलव्य को शिष्य बनाने से मना कर दिया। एकलव्य ने अभ्यास से महारत पाई, तो अर्जुन के याद दिलाने पर द्रोण ने गुरु दक्षिणा में उसका अँगूठा माँग लिया।
  • हिडिम्बा (स्रोत 9): एक राक्षस स्त्री ने स्वयं भीम से विवाह का प्रस्ताव रखा। युधिष्ठिर इस शर्त पर माने कि भीम दिन भर हिडिम्बा के साथ रहें और रात को लौट आएँ।
  • मातंग (स्रोत 10, पालि की मातंग जातक): चाण्डाल के रूप में जन्मे बोधिसत्त मातंग का पुत्र माण्डव्यकुमार तीन वेद पढ़कर रोज़ 16,000 ब्राह्मणों को भोजन कराता था। मातंग ने कहा, “जिन्हें अपने जन्म पर गर्व है पर अज्ञानी हैं वे भेंट के पात्र नहीं हैं।”
  • अंतर: द्रोण की कथा मानदंड को लागू करती है, हिडिम्बा की कथा उसमें समझौता दिखाती है, और मातंग की कथा उसे नकारती है। पहली दो संस्कृत महाभारत से हैं, तीसरी बौद्ध परंपरा के पालि ग्रंथ से और चाण्डाल के नज़रिए से कही गई है।

प्रश्न 4: सामाजिक अनुबंध की बौद्ध अवधारणा और पुरुषसूक्त वाला ब्राह्मणीय दृष्टिकोण

  • ब्राह्मणीय दृष्टिकोण: प्रश्न में ‘पुरुषसूक्त’ का नाम है। ऋग्वेद (मंडल 10, सूक्त 90) के इस सूक्त में चारों वर्ण एक ही आदि-पुरुष के अंगों से जोड़े गए हैं: ब्राह्मण उसका मुख था, राजन्य (क्षत्रिय) उसकी भुजाएँ बनाए गए, वैश्य उसकी जंघाएँ थे और पैरों से शूद्र जन्मा (मूल पाठ, मंत्र 12)। अध्याय में यही दृष्टिकोण स्रोत 13 में ब्राह्मणों के इस दावे में दिखता है कि वे सर्वश्रेष्ठ हैं और “ब्रह्मा के मुख से जन्मे हैं” (पृष्ठ 70)।
  • समय के साथ बदलाव: ऋग्वेद में चारों वर्णों के नाम एक साथ केवल इसी सूक्त में आते हैं, और यह सूक्त ऋग्वेद के सबसे बाद में रचे गए हिस्सों में से एक, दसवें मंडल, में है। उत्तर वैदिक काल में ब्राह्मण माने जाने के लिए जन्म ज़रूरी माना जाने लगा, पर ऐसा लगता है कि अकेला जन्म काफ़ी नहीं था: वैदिक कर्मकांड की परंपरा (श्रुति) का ज्ञान भी चाहिए था (IGNOU, इकाई 4)। लगभग छठी शताब्दी ई.पू. से बौद्धों ने जन्म के आधार पर सामाजिक प्रतिष्ठा को अस्वीकार किया (पृष्ठ 69)।
  • बौद्ध मिथक: व्यवस्था मनुष्यों के अपने कर्म से बनी, जब मनुष्य लालची, प्रतिहिंसक और कपटी हो गए और उन्होंने स्वयं एक व्यक्ति को चुना।
  • राजा: शास्त्रों के अनुसार केवल क्षत्रिय राजा हो सकते थे; बौद्ध मिथक में राजा महासम्मत्त है, यानी सब लोगों द्वारा चुना गया, और ‘कर’ उसकी सेवा के बदले दिया जाने वाला मूल्य है।
  • विषमता: बौद्धों ने माना कि विषमता थी, पर यह भेद “न तो नैसर्गिक थे और न ही स्थायी”।
  • बदलाव: आर्थिक और सामाजिक संबंध बनाने में मनुष्य के अपने कर्म का बड़ा हाथ था; और यदि मनुष्य स्वयं किसी व्यवस्था को बनाए रखने के लिए ज़िम्मेदार थे, तो भविष्य में उसे बदल भी सकते थे।

प्रश्न 5: युधिष्ठिर के अभिवादन की सूची (पृष्ठ 80 का अवतरण)

  • प्रश्न अवतरण में नमस्कार के क्रम का आधार पूछता है। मोटे तौर पर उम्र, लिंग, भेद और बंधुत्व, चारों के मेल से सूची बनी है।
  • भेद: सबसे पहले धृतराष्ट्र के घर के ब्राह्मण और मुख्य पुरोहित आते हैं, और लगभग अंत में दासियाँ और उनकी संतानें।
  • गुरु: ब्राह्मणों के ठीक बाद द्रोण और कृपाचार्य; युधिष्ठिर उनके सामने नतमस्तक होते हैं।
  • उम्र, लिंग, बंधुत्व: भीष्म और वृद्ध धृतराष्ट्र दुर्योधन और युवा योद्धाओं से पहले आते हैं; पुरुषों के बाद स्त्रियाँ आती हैं, पहले वृद्धा स्त्रियाँ, फिर पत्नियाँ, कुलवधुएँ और पुत्रियाँ; और पूरा परिवार रिश्ते के हिसाब से गिना गया है।
  • अन्य आधार भी आए तो अच्छा: दासी से जन्मे विदुर को “सर्वोपरि” नमस्कार मिलता है, और युधिष्ठिर उन्हें “हमारे पिता और माता के सदृश” कहते हैं; गणिकाओं का अलग से उल्लेख है।

प्रश्न 6: विंटरविट्ज़ का कथन

  • प्रश्न मौरिस विंटरविट्ज़ के इस कथन पर चर्चा माँगता है कि महाभारत संपूर्ण साहित्य का प्रतिनिधित्व करता है और उसमें “बहुत सारी और अनेक प्रकार की चीज़ें” हैं।
  • अनेक प्रकार की सामग्री: आख्यान (कहानियाँ) और उपदेशात्मक (सामाजिक आचार-विचार के मानदंड), जिसका सबसे महत्वपूर्ण अंश भगवद्गीता है; युद्धों, वनों, राजमहलों और बस्तियों का जीवंत चित्रण।
  • कई सदियाँ, कई हाथ: सूतों की मूल कथा, फिर ब्राह्मण, फिर बाद के जोड़, और 10,000 से कम श्लोकों से एक लाख तक का विकास।
  • पूरे उपमहाद्वीप का ग्रंथ: पांडुलिपियाँ उत्तर में कश्मीर और नेपाल से दक्षिण में केरल और तमिलनाडु तक की, और अनेक क्षेत्रीय प्रभेद।
  • अनेक स्वर: निषाद एकलव्य, राक्षस हिडिम्बा, युद्ध रोकने की सलाह देती गांधारी, प्रश्न पूछती द्रौपदी।
  • सावधानी भी आए तो और अच्छा: किताब कहती है कि ऐसे उद्धरण अक्षरश: सत्य न भी हों, तो भी बताते हैं कि लिखने वाले क्या सोचते थे; और “सृजनात्मक साहित्य की अपनी कथा संबंधी ज़रूरतें होती हैं जो हमेशा समाज में मौजूद वास्तविकताओं को नहीं दर्शातीं।”

प्रश्न 7: क्या महाभारत का एक ही रचयिता था

  • परंपरा ऋषि व्यास को रचयिता मानती है।
  • पर साक्ष्य कई चरण दिखाते हैं: संभवत: मूल कथा भाट सारथियों, यानी सूतों, ने रची और वह मौखिक रूप में चली; पाँचवीं शताब्दी ई.पू. से ब्राह्मणों ने उसे लिखा; लगभग 200 ई.पू. से 200 ईसवी के बीच विष्णु की आराधना बढ़ी और श्रीकृष्ण को विष्णु का रूप बताया गया; लगभग 200-400 ईसवी में मनुस्मृति से मिलते-जुलते उपदेशात्मक प्रकरण जुड़े।
  • नतीजा: जो ग्रंथ शुरू में संभवत: 10,000 श्लोकों से भी कम का था, वह एक लाख श्लोकों वाला हो गया।
  • निष्कर्ष यह आए कि एक ही रचयिता होना संभव नहीं लगता, क्योंकि ग्रंथ सदियों तक अनेक सूतों, ब्राह्मणों और लेखकों के हाथों बढ़ा; व्यास का नाम परंपरा के रूप में आए तो अच्छा।

प्रश्न 8: स्त्री-पुरुष संबंधों की विषमताएँ

  • वंश और विवाह: पितृवंशिकता में पुत्र ही पिता के संसाधनों और सिंहासन के अधिकारी थे; बेटियों का विवाह गोत्र से बाहर कराया जाता था; विवाह के बाद स्त्री पति के गोत्र की मानी जाती थी।
  • संपत्ति: मनुस्मृति में पुरुषों के लिए धन अर्जित करने के सात तरीके, स्त्रियों के छ: तरीके सब भेंट या उपहार। स्त्रीधन पर पति का अधिकार नहीं था, पर भूमि, पशु और धन पर सामान्यत: पुरुषों का नियंत्रण था, और इससे सामाजिक हैसियत की भिन्नता “अधिक प्रखर हुई”।
  • द्यूत का प्रकरण: युधिष्ठिर ने द्रौपदी को दाँव पर लगाया। एक मत यह था कि “पत्नी पर पति का नियंत्रण सदैव रहता है”; माना जाता है कि द्रौपदी ने स्वयं प्रश्न उठाया।
  • दूसरा पहलू भी आए तो अच्छा: प्रभावती गुप्त धनी थीं और कुछ परिस्थितियों में सत्ता संभालती थीं; गांधारी ने दुर्योधन को युद्ध न करने की सलाह दी; सातवाहन रानियों ने पिता का गोत्र रखा।

प्रश्न 9: ब्राह्मणीय नियम सब जगह नहीं माने जाते थे: साक्ष्य

  • मुख्य बात: ब्राह्मणों का प्रभाव “सार्वभौमिक कदापि नहीं था”।
  • धर्मशास्त्र ख़ुद आठ प्रकार के विवाह मानते हैं; पहले चार ‘उत्तम’, बाकी निंदित।
  • सातवाहन रानियाँ: पिता का गोत्र नाम रखा, और कुछ रानियाँ एक ही गोत्र की थीं, जो बहिर्विवाह के नियम के विरुद्ध था। गोतमी-पुत्त सिरी-सातकनि ने वर्णों के बीच विवाह रोकने का दावा किया, फिर भी रुद्रदामन के परिवार से विवाह संबंध जोड़ा।
  • बहुपति प्रथा: द्रौपदी का पाँच पांडवों से विवाह। इतिहासकारों का सुझाव है कि संभवत: यह प्रथा शासकों के विशिष्ट वर्ग में मौजूद थी।
  • समुदाय से बाहर के विवाह: भीम और हिडिम्बा; मातंग जातक में चाण्डाल मातंग और व्यापारी की पुत्री दिथ्थ मांगलिक।
  • उत्तराधिकार में फेरबदल: भाई या बंधु-बांधव का गद्दी पर बैठना, और प्रभावती गुप्त।

प्रश्न 10: मानचित्र 1 और अध्याय 2 का मानचित्र 1

  • यह बच्चे की अपनी खोज है। देखिए कि उसने इस अध्याय के मानचित्र 1 (पृष्ठ 56) और अध्याय 2 के मानचित्र 1 (महाजनपद) को साथ रखकर कुरु–पांचाल के आसपास के महाजनपदों और नगरों की सूची बनाई हो, और हर नाम के आगे लिखा हो कि वह किस मानचित्र पर मिला।
  • संकेत: कुरु–पांचाल के आसपास के नामों में कुरु, शूरसेन, मत्स्य, अवन्ति, इंद्रप्रस्थ, मथुरा और उज्जयिनी दोनों मानचित्रों पर हैं, जबकि हस्तिनापुर, विराट और अयोध्या सिर्फ़ इस अध्याय के मानचित्र पर हैं। पांचाल अध्याय 2 के मानचित्र पर अलग से छपा है; इस अध्याय के मानचित्र पर वह सिर्फ़ शीर्षक में है।

प्रश्न 11: दूसरी भाषाओं में महाभारत

  • यह बच्चे की अपनी खोज है, इसलिए नतीजे उसकी चुनी हुई सामग्री पर निर्भर करेंगे।
  • देखिए कि अध्याय के दो प्रसंग चुने गए हों (जैसे एकलव्य, हिडिम्बा, द्यूत और द्रौपदी के प्रश्न, द्रौपदी का विवाह या लाक्षागृह), और अपनी या किसी और भारतीय भाषा में उनका कोई पाठ, लोककथा, नाटक या कहानी ढूँढ़ी गई हो। तुलना में यह आए कि कथा कौन कह रहा है, किसका नज़रिया सामने है, क्या जोड़ा या छोड़ा गया, और अंत कैसा है। किताब प्रस्तुति का रूप तय नहीं करती; एक तालिका (प्रसंग, संस्कृत पाठ में, दूसरी भाषा के पाठ में, समानता, अंतर) और नीचे छोटा सार एक अच्छा तरीका है।
  • किताब का उदाहरण महाश्वेता देवी की बांग्ला कहानी “कुंती ओ निषादी” है (पृष्ठ 78)। हर पाठ का नाम, भाषा और लेखक साफ़ लिखे हों।

प्रश्न 12: एकलव्य की कथा अपने नज़रिए से

  • यह भी बच्चे की अपनी रचना है।
  • देखिए कि किताब की घटनाएँ वही रहीं (द्रोण का मना करना, मिट्टी की प्रतिमा, अर्जुन का प्रण याद दिलाना, गुरु दक्षिणा में अँगूठा), पर कथा कहने वाला नया है: एकलव्य, द्रोण, अर्जुन, एकलव्य की माँ, या वह कुत्ता भी।
  • किताब लंबाई तय नहीं करती। अंत में दो-तीन पंक्तियाँ कि यह नज़रिया क्यों चुना, अच्छा जोड़ है।

सभी 12 प्रश्नों के पूरे उत्तर रिवीजन नोट्स के “अपने को जाँचिए” वाले हिस्से में हैं। बच्चे का जवाब उनसे शब्द-शब्द न मिले, तो भी ठीक है, अगर ज़रूरी बातें आ गई हों।

6. घर पर दस मिनट की बातचीत

बारहवीं के बच्चे से पूछताछ कम, बातचीत ज़्यादा कीजिए। खाने के समय या कहीं आते-जाते इनमें से कोई एक बात छेड़िए।

पृष्ठ 60 पर किताब पूछती है कि आजकल बच्चों का नामकरण कैसे होता है, और क्या वे नाम सातवाहन राजाओं के नामों से मिलते हैं या अलग हैं। सातवाहन राजाओं को मातृनाम से पहचाना जाता था, जैसे गोतमी–पुत्त, यानी गोतमी का पुत्र; फिर भी उनके यहाँ सिंहासन का उत्तराधिकार पितृवंशिक था (पृष्ठ 59–60)। बच्चे से पूछिए कि घर के किसी एक सदस्य का नाम कैसे रखा गया: पिता के नाम पर, माता के नाम पर, या किसी और आधार पर। फिर कहिए कि उसे सातवाहन नामों से मिलाकर देखे। इसका कोई एक जवाब नहीं; बच्चा अपने घर की बात किताब से जोड़ सके, तो अच्छा।

या एकलव्य की कथा बच्चे से सुनिए (स्रोत 7, पृष्ठ 62)। फिर पूछिए कि यही कथा द्रोण, अर्जुन, एकलव्य की माँ या उस कुत्ते की ज़ुबानी कही जाती तो क्या बदलता। किताब का प्रश्न 12 भी यही माँगता है, इसलिए बच्चे का जवाब आगे उसके काम आएगा।

या पृष्ठ 72 का सुत्तपिटक का मिथक याद कीजिए, जिसमें लोग एक मनुष्य को चुनते हैं और ‘कर’ उसकी सेवा का मूल्य है। बच्चे से पूछिए कि अपने गाँव या मोहल्ले में किसी चुने हुए प्रतिनिधि (जैसे सरपंच या पार्षद) से लोग क्या उम्मीद करते हैं और उसे क्यों चुनते हैं। मिलान का कोई एक जवाब नहीं; बस बच्चा किताब की बात अपने आसपास से जोड़ सके, तो अच्छा।

7. महाकाव्य का हस्तिनापुर और खुदाई का हस्तिनापुर: एक सवाल जिसका एक जवाब नहीं

पृष्ठ 76 पर किताब किनारे में पूछती है कि बी.बी. लाल की खोज और महाकाव्य में वर्णित हस्तिनापुर में समानता है या नहीं। लाल ने 1951-52 में मेरठ ज़िले (उ.प्र.) के हस्तिनापुर नामक गाँव में उत्खनन किया और आबादी के पाँच स्तर पाए। किताब मानती है कि नामों की समानता संयोग हो सकती है, पर गंगा के ऊपरी दोआब में, जहाँ कुरु राज्य था, इस पुरास्थल का होना बताता है कि यह कुरुओं की राजधानी हो सकती थी (पृष्ठ 75)।

दूसरे स्तर (लगभग बारहवीं से सातवीं शताब्दी ई.पू.) पर मिट्टी की दीवारें और कच्ची मिट्टी की ईंटें मिलीं; तीसरे स्तर (लगभग छठी से तीसरी शताब्दी ई.पू.) पर कच्ची और कुछ पक्की ईंटों के घर, ईंटों के नाले और वलय-कूप थे। दूसरी तरफ़ स्रोत 15 में महाभारत का हस्तिनापुर सैकड़ों प्रासादों वाला, इंद्र की नगरी जैसा नगर है।

इसलिए इस पहले सवाल का जवाब यह है: समानता बहुत कम है। लाल के विवरण में मिट्टी और ईंटों के घर हैं, सैकड़ों प्रासादों वाला नगर नहीं; हाँ, उत्खनन सीमित क्षेत्र में ही हुआ था।

इस अंतर से किताब आगे पूछती है कि क्या नगर का यह चित्रण महाकाव्य के मुख्य कथानक में बाद में (ईसा पूर्व छठी शताब्दी के पश्चात), जब इस क्षेत्र में नगर बने, जोड़ दिया गया, या यह कवियों की कल्पना की उड़ान थी, जिसे किसी और साक्ष्य से मिलाकर प्रमाणित नहीं किया जा सकता। इस दूसरे सवाल का कोई एक सही जवाब नहीं है, और आपको भी नहीं देना है। बच्चा किसी भी तरफ़ झुके, उससे कारण पूछिए, और बात पृष्ठ 75–76 के स्रोत 15 तथा लाल के विवरण से जोड़ने को कहिए।

इस बातचीत से अध्याय की बड़ी बात निकलती है। किताब कहती है कि महाभारत से लिए गए ऐसे उद्धरण अक्षरश: सत्य न भी हों, तो भी बताते हैं कि ग्रंथ लिखने वाले क्या सोचते थे (पृष्ठ 57), और याद दिलाती है कि “सृजनात्मक साहित्य की अपनी कथा संबंधी ज़रूरतें होती हैं जो हमेशा समाज में मौजूद वास्तविकताओं को नहीं दर्शातीं” (पृष्ठ 77)।

साथ सुनने के लिए

NCERT के आधिकारिक यूट्यूब चैनल पर महाभारत के बारे में एक हिंदी ऑडियोबुक है, यानी किसी पाठ को पढ़कर सुनाया गया रूप:

चाहें तो बच्चे के साथ बैठकर सुन लीजिए, और बाद में पूछिए कि उसे कौन-सा प्रसंग या कौन-सी बात सबसे ज़्यादा याद रही।

अगर सिर्फ़ पाँच मिनट हों

ये चार सवाल पूछ लीजिए। चारों ठीक हों, तो अध्याय की मुख्य बातें आ गई हैं।

सवालजवाब
ब्राह्मण लेखकों के बनाए नियम क्या सब जगह माने जाते थे?नहीं। उनका प्रभाव “सार्वभौमिक कदापि नहीं था”। धर्मशास्त्र ख़ुद आठ तरह के विवाह मानते हैं, और सातवाहन रानियों ने विवाह के बाद भी पिता का गोत्र नाम रखा।
क्या आरंभिक राज्यों में शासक हमेशा क्षत्रिय होते थे?नहीं। शुंग और कण्व ब्राह्मण थे, मौर्यों के उद्भव पर बहस है, और सातवाहन गोतमी-पुत्त सिरी-सातकनि ने स्वयं को “अनूठा ब्राह्मण” बताया।
क्या महाभारत किसी एक लेखक ने एक बार में लिखा?नहीं। मूल कथा संभवत: सूतों की थी, पाँचवीं शताब्दी ई.पू. से ब्राह्मणों ने उसे लिखा, और लगभग 200-400 ईसवी तक उसमें और प्रकरण जुड़ते रहे; 10,000 से कम श्लोक बढ़कर एक लाख हो गए।
क्या खुदाई से पक्का हो गया कि हस्तिनापुर गाँव ही महाभारत वाला हस्तिनापुर है?नहीं। वह कुरुओं की राजधानी हो सकती थी; नामों की समानता संयोग भी हो सकती है, लाल को साधारण घर मिले, सैकड़ों प्रासादों वाला नगर नहीं, और खुदाई सीमित क्षेत्र में हुई।

बच्चे के लिए इसी अध्याय के और पन्ने

  • रिवीजन नोट्स: पूरा अध्याय छोटे में, किताब के सभी प्रश्नों के उत्तर के साथ।
  • प्रश्न बैंक: परीक्षा जैसे प्रश्न, उत्तर के साथ। बच्चा पहले ख़ुद लिखे, फिर मिलाए।
  • फ़्लैशकार्ड: बाईं ओर सवाल, दाईं ओर जवाब। जवाब ढककर बोलिए, फिर मिलाइए; रोज़ पाँच मिनट दोहराने के लिए।
  • परख प्रश्न: सोचकर जवाब देने वाले प्रश्न, किताब के स्रोतों और उदाहरणों पर, हर प्रश्न का उत्तर साथ में।
  • इंटरैक्टिव अध्याय: पूरा अध्याय स्क्रीन पर, हिस्सा-दर-हिस्सा।