अध्याय 2राजा, किसान और नगर

इंटरैक्टिव अध्याय60 मिनट

NCERT — भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), अध्याय 2 (पृ. 28–52)।

पढ़िए, छाँटिए, क्रम लगाइए, सवाल पूछिए

शुरुआत

यह अध्याय लगभग 600 ई.पू. से 600 ई. तक के उपमहाद्वीप की कहानी है: राजा और उनके राज्य, गाँवों के किसान, नए नगर और व्यापार। साथ में एक सवाल पूरे अध्याय में चलता है: इतिहासकार यह सब कैसे जानते हैं? अभिलेखों, ग्रंथों, सिक्कों और चित्रों से, पर इनसे भी पूरी कहानी नहीं मिलती (पृष्ठ 28)।

अध्याय का रास्ता

  1. राजा: छठी शताब्दी ई.पू. से राज्य और साम्राज्य कैसे बने, और राजाओं ने ऊँची स्थिति पाने के लिए क्या-क्या किया?
  2. किसान: गाँवों में उपज बढ़ाने के तरीके कैसे बदले, और ग्रामीण समाज में कौन-कौन थे?
  3. नगर: नए नगरों में कौन रहते थे, व्यापार कहाँ तक जाता था, और सिक्कों से क्या पता चलता है?
  4. और पूरे अध्याय में एक सवाल: यह सब हम कैसे जानते हैं? अभिलेख कैसे पढ़े गए, और उनकी सीमाएँ क्या हैं?
  1. 1प्रिंसेप और पियदस्सीअभिलेखों को पढ़ने से इतिहास का कौन-सा रास्ता खुला?पृष्ठ 28–29
  2. 2प्रारंभिक राज्यसोलह महाजनपद कैसे थे, और मगध सबसे शक्तिशाली कैसे बना?पृष्ठ 29–31
  3. 3एक आरंभिक साम्राज्यमौर्य साम्राज्य को हम कैसे जानते हैं, और उसका प्रशासन कैसा था?पृष्ठ 32–35
  4. 4राजधर्म के नवीन सिद्धांतसरदारों और राजाओं ने ऊँची स्थिति के लिए क्या दावे किए?पृष्ठ 35–37
  5. 5बदलता हुआ देहातउपज कैसे बढ़ी, और गाँवों में कौन-कौन थे?पृष्ठ 38–41
  6. 6नगर एवं व्यापारनगरों में कौन रहते थे, और सिक्के क्या बताते हैं?पृष्ठ 41–45
  7. 7मूल बातें: लिपियाँ कैसे पढ़ी गईंब्राह्मी और खरोष्ठी कैसे पढ़ी गईं?पृष्ठ 45–48
  8. 8अभिलेख साक्ष्य की सीमाअभिलेखों से क्या नहीं पता चलता?पृष्ठ 48–49
  9. 9सार और काल-रेखापूरा अध्याय एक नज़र में, और काल रेखाएँपृष्ठ 50–51

हड़प्पा सभ्यता के बाद (पृष्ठ 28)

  • हड़प्पा सभ्यता के बाद के डेढ़ हज़ार वर्षों में सिंधु नदी और इसकी उपनदियों के किनारे रहने वाले लोगों ने ऋग्वेद की रचना की।
  • हड़प्पा सभ्यता के बाद के डेढ़ हज़ार वर्षों में ही कई क्षेत्रों में कृषक बस्तियाँ बनीं, और मध्य और दक्षिण भारत में महापाषाण नाम के पत्थरों के बड़े ढाँचे मिले हैं।
  • ईसा पूर्व छठी शताब्दी से आरंभिक राज्य, साम्राज्य और रजवाड़े बने, खेती की उपज संगठित करने के तरीके बदले, और लगभग पूरे उपमहाद्वीप में नए नगर उभरे।

वेद बहुत समय तक बोलकर और याद रखकर ही सँभाले गए। यह बात कक्षा 6 के पाठ में भी है: भारत की सांस्कृतिक जड़ें (कक्षा 6)

यह जानकारी किस तरह के स्रोत से मिलती है?

हर स्रोत को उसके खाने में रखिए: अभिलेख, ग्रंथ या सिक्के। ये सब इसी अध्याय में आएँगे।

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NCERT Kings, Farmers and Towns-early States and Economies History Class: XIIचलाइए
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1प्रिंसेप और पियदस्सी

इस पड़ाव का सवाल

प्रिंसेप ने कौन-सी लिपियाँ पढ़ीं, और उससे इतिहास का कौन-सा रास्ता खुला?

पिछली बात से कड़ी शुरुआत में आपने देखा कि इतिहासकार अभिलेखों, ग्रंथों, सिक्कों और चित्रों से इतिहास जोड़ते हैं। यह पड़ाव बताता है कि अभिलेखों को पढ़ने की शुरुआत कैसे हुई।

एक-एक करके खोलिए (पृष्ठ 28)

  1. 1जेम्स प्रिंसेप कौन थे, और उन्होंने 1830 के दशक में क्या किया?

    ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारी जेम्स प्रिंसेप ने 1830 के दशक में ब्राह्मी और खरोष्ठी लिपियों का अर्थ निकाला। सबसे आरंभिक अभिलेख और सिक्के इन्हीं दो लिपियों में मिलते हैं।

  2. 2ज़्यादातर अभिलेखों और सिक्कों पर किस राजा का नाम मिला?

    पियदस्सी का, यानी "मनोहर मुखाकृति वाले राजा" का।

  3. 3पियदस्सी कौन था, यह कैसे पता चला?

    कुछ अभिलेखों पर राजा का नाम असोक भी लिखा था। बौद्ध ग्रंथों के अनुसार असोक सबसे प्रसिद्ध शासकों में से एक था।

  4. 4इसके बाद विद्वानों ने क्या किया?

    भारतीय और यूरोपीय विद्वानों ने अभिलेखों और ग्रंथों से राजवंशों की वंशावलियाँ बनाईं। बीसवीं सदी के आरंभिक दशकों तक उपमहाद्वीप के राजनीतिक इतिहास का एक सामान्य चित्र तैयार हो गया।

  5. 5फिर विद्वानों का ध्यान किस ओर गया?

    उन्होंने देखा कि राजनीतिक परिवर्तनों और आर्थिक तथा सामाजिक विकास के बीच संबंध तो थे, पर संभवत: ये संबंध हमेशा सीधे नहीं थे।

जेम्स प्रिंसेप का छपा हुआ पुराना चित्र

चित्र: जेम्स प्रिंसेप, जिन्होंने 1830 के दशक में ब्राह्मी और खरोष्ठी लिपियों का अर्थ निकाला।

Colesworthy Grant, Lithographic Sketches of the Public Characters of Calcutta. Image: Wikimedia Commons, public domain.

ब्राह्मी के व्यंजन अक्षरों की पुरानी छपी तालिका

तालिका: प्रिंसेप की बनाई ब्राह्मी व्यंजनों की तालिका, मार्च 1838।

James Prinsep, Journal of the Asiatic Society of Bengal, vol. 7 (1838). Image: Wikimedia Commons, public domain.

अभिलेख क्या होते हैं (पृष्ठ 29)

अभिलेख में क्या होता है

  • पत्थर, धातु या मिट्टी के बर्तन जैसी कठोर सतह पर खुदा लेख।
  • बनवाने वालों की उपलब्धियाँ, क्रियाकलाप या विचार; राजाओं के काम और धार्मिक संस्थाओं को स्त्रियों और पुरुषों के दिए दान।
  • जिस अभिलेख पर तिथि नहीं है, उसका काल पुरालिपि (लेखन शैली) से तय होता है: लगभग 250 ई.पू. में अक्षर 'अ' जिस तरह लिखा जाता था, 500 ई. में वैसा नहीं लिखा जाता था।

अभिलेखों की भाषा

  • सबसे पुराने अभिलेख प्राकृत में हैं, यानी जनसामान्य की भाषाओं में।
  • इसीलिए किताब अजातसत्तु और असोक जैसे नाम प्राकृत रूप में लिखती है।
  • तमिल, पालि और संस्कृत में भी अभिलेख मिलते हैं।

जाँच पड़ाव

  1. 1जेम्स प्रिंसेप ने 1830 के दशक में किन लिपियों का अर्थ निकाला?

  2. 2"पियदस्सी" का अर्थ क्या है?

  3. 3लगभग 250 ई.पू. और 500 ई. के अभिलेखों में अक्षर 'अ' अलग ढंग से लिखा मिलता है। इससे इतिहासकारों को क्या मदद मिलती है?

2प्रारंभिक राज्य

इस पड़ाव का सवाल

छठी शताब्दी ई.पू. के सोलह महाजनपद कैसे थे, और उनमें मगध सबसे शक्तिशाली कैसे बना?

पिछली बात से कड़ी अभिलेख पढ़ लिए गए, तो विद्वानों ने राजवंशों का इतिहास जोड़ा। किताब यह इतिहास छठी शताब्दी ई.पू. के आरंभिक राज्यों से शुरू करती है।

  1. 2.1सोलह महाजनपद
  2. 2.2सोलह महाजनपदों में प्रथम: मगध

इस पड़ाव के आख़िर में: प्रश्न 2

2.1सोलह महाजनपदपृष्ठ 29–31

छठी शताब्दी ई.पू. (पृष्ठ 29)

  • छठी शताब्दी ई.पू. को एक बड़ा परिवर्तनकारी काल माना जाता है: आरंभिक राज्य, नगर, लोहे का बढ़ता प्रयोग और सिक्के। बौद्ध और जैन सहित कई दार्शनिक विचारधाराएँ भी छठी शताब्दी ई.पू. में ही बनीं।
  • बौद्ध और जैन धर्म के आरंभिक ग्रंथों में सोलह महाजनपदों का उल्लेख है। सूची हर ग्रंथ में एक जैसी नहीं है, पर वज्जि, मगध, कोशल, कुरु, पांचाल, गांधार और अवन्ति के नाम प्राय: मिलते हैं, इसलिए ये सबसे महत्वपूर्ण महाजनपद रहे होंगे।

महाजनपदों के बारे में: सही या गलत?

  1. ज़्यादातर महाजनपदों में राजा का शासन था।

  2. गण और संघ में भी केवल एक व्यक्ति राजा कहलाता था।

  3. महावीर और बुद्ध गणों से थे।

  4. धर्मशास्त्र नाम के ग्रंथों में अपेक्षा थी कि शासक क्षत्रिय वर्ण से हों।

  5. पड़ोसी राज्यों पर आक्रमण करके धन इकट्ठा करना अवैध माना जाता था।

  6. सभी महाजनपदों के पास स्थायी सेना और नौकरशाही थी।

  7. हर महाजनपद की एक राजधानी थी, जिसे प्राय: किले से घेरा जाता था।

मानचित्र 1: आरंभिक राज्य व उनकी राजधानियाँ (पृष्ठ 30)

किताब के पृष्ठ 30 वाला मानचित्र, हर नगर अपनी असली जगह पर। मोटे अक्षरों में राज्यों के नाम हैं, बिंदु के साथ नगरों के। नीचे किसी नगर के नाम पर टैप कीजिए, मानचित्र पर वह नगर उभर आएगा। "सभी नाम" दबाकर नगरों के नाम छिपाइए, फिर दबाकर वापस लाइए।

कंबोजगांधारकुरुपांचालशूरसेनमत्स्यकोशलमल्लवज्जि (वृजि)काशीमगधअंगवंगवत्सचेदिअवन्तिअश्मकअरब सागरबंगाल की खाड़ीपुष्कलावतीतक्षशिलाइन्द्रप्रस्थअहिच्छत्रमथुराश्रावस्तीकुशीनगरवैशालीचंपाकौशाम्बीवाराणसीराजगीरउज्जयिनी

Relief map: Natural Earth (public domain). Places at their Wikipedia coordinates; Kodumanal from OpenStreetMap (© OpenStreetMap contributors).

किताब के किनारे का प्रश्न

ऐसे कौन से क्षेत्र हैं जहाँ राज्य और नगर सर्वाधिक सघन रूप से बसे थे।

जवाब देखिए
  • गंगा और उसकी उपनदियों की घाटी में, यानी आज के उत्तर प्रदेश और बिहार में। मानचित्र 1 पर कोशल, काशी, वत्स, मल्ल, वज्जि, मगध और अंग जैसे महाजनपद और श्रावस्ती, कौशाम्बी, वाराणसी, कुशीनगर, वैशाली, राजगीर और चंपा जैसे नगर इसी घाटी में हैं।
  • किताब से जोड़िए: काल रेखा 1 के अनुसार लगभग 600–500 ई.पू. में गंगा घाटी में नगरीकरण हुआ, और मगध के उदय के कारणों में गंगा और उसकी उपनदियों से सस्ता और सुलभ आवागमन भी गिना गया है।
  • मानचित्र 1 पर खुद देखिए कि इस घाटी में नाम कितने पास-पास छपे हैं (पृष्ठ 30–31, 50)।

2.2सोलह महाजनपदों में प्रथम: मगधपृष्ठ 31

मगध सबसे शक्तिशाली क्यों बना: कौन क्या कहता है?

मगध (आधुनिक बिहार) छठी से चौथी शताब्दी ई.पू. में सबसे शक्तिशाली महाजनपद बना। हर कारण को उस ओर रखिए जो उसे बताता है (पृष्ठ 31)।

राजधानी: राजगाह से पाटलिपुत्र (पृष्ठ 31, 42)

  • मगध की पहली राजधानी राजगाह थी। राजगाह आधुनिक बिहार के राजगीर का प्राकृत नाम है, और इसका अर्थ है "राजाओं का घर"। यह पहाड़ियों के बीच बसा एक किलेबंद शहर था।
  • मगध के शासकों ने राजधानी को पाटलिपुत्र (आज का पटना) ले जाने का निर्णय पाँचवीं सदी ई.पू. में किया। पाटलिपुत्र गंगा के रास्ते आवागमन के मार्ग पर था, और चौथी शताब्दी ई.पू. में मगध की राजधानी बन गया।
राजगीर में पत्थरों से बनी पुरानी किलेबंदी की दीवार

तस्वीर: राजगीर (बिहार) में पत्थर की पुरानी किलेबंदी की दीवार।

Sumitsurai. Image: Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0.

किताब के किनारे का प्रश्न

किताब का चित्र 2.2: राजगीर के किले की दीवार (पृष्ठ 31)

इन दीवारों का निर्माण क्यों किया गया?

जवाब देखिए
  • सुरक्षा के लिए।
  • पड़ोसी राज्यों पर आक्रमण करके धन इकट्ठा करना भी संपत्ति जुटाने का एक वैध उपाय माना जाता था।
  • महाजनपदों की राजधानियाँ प्राय: किलेबंद होती थीं, और मगध की आरंभिक राजधानी राजगाह पहाड़ियों के बीच बसा एक किलेबंद शहर था।
  • शासक वर्ग और राजा किलेबंद नगरों में रहते थे (पृष्ठ 29–31, 42)।

चर्चा कीजिए

आपका लिखा इसी ब्राउज़र में रहता है।

जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
  • आधुनिक इतिहासकार: मगध में खेती की उपज अच्छी होती थी; लोहे की खदानें (आधुनिक झारखंड में) उपकरण और हथियार के लिए सुलभ थीं; जंगलों में हाथी मिलते थे, जो सेना का अंग थे; गंगा और उपनदियों से आवागमन सस्ता और सुलभ था।
  • आरंभिक जैन और बौद्ध लेखक: इसका श्रेय बिंबिसार, अजातसत्तु और महापद्मनंद जैसे महत्वाकांक्षी शासकों और उनके मंत्रियों की नीतियों को देते हैं।
  • भेद: आधुनिक व्याख्या भूगोल और संसाधनों पर ज़ोर देती है, आरंभिक व्याख्या व्यक्तियों पर (पृष्ठ 31)।

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Monuments of India | Rajgirचलाइए
Prasar Bharati Archives: राजगीर के स्मारकों पर प्रसार भारती अभिलेखागार का वीडियो।यूट्यूब पर देखिए

किताब के अपने प्रश्न

2महाजनपदों के विशिष्ट अभिलक्षणों का वर्णन कीजिए।

लगभग 100 से 150 शब्दों में

जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
  • छठी शताब्दी ई.पू. को परिवर्तनकारी काल माना जाता है। बौद्ध और जैन ग्रंथों में सोलह महाजनपदों का उल्लेख है, जैसे वज्जि, मगध, कोशल, कुरु, पांचाल, गांधार और अवन्ति।
  • शासन: ज़्यादातर महाजनपदों पर राजा का शासन था। गण और संघ कहलाने वाले राज्यों में लोगों का समूह शासन करता था, और समूह का हर व्यक्ति राजा कहलाता था। वज्जि संघ जैसे राज्यों में भूमि सहित कई संसाधनों पर सामूहिक नियंत्रण था।
  • राजधानी: हर महाजनपद की एक राजधानी थी, जो प्राय: किलेबंद होती थी।
  • नियम: लगभग छठी शताब्दी ई.पू. से ब्राह्मणों ने संस्कृत में धर्मशास्त्र लिखे; इनमें अपेक्षा थी कि शासक क्षत्रिय वर्ण से हों।
  • आय: शासक किसानों, व्यापारियों और शिल्पकारों से कर और भेंट लेते थे; पड़ोसी राज्यों पर आक्रमण करके धन इकट्ठा करना भी वैध माना जाता था।
  • सेना और नौकरशाही: धीरे-धीरे कुछ राज्यों ने स्थायी सेनाएँ और नौकरशाही तंत्र बना लिए; बाकी राज्य अब भी सहायक-सेना पर निर्भर थे, जिसके सैनिक प्राय: कृषक वर्ग से लिए जाते थे (पृष्ठ 29–30)।

जाँच पड़ाव

  1. 1बौद्ध और जैन धर्म के आरंभिक ग्रंथों की महाजनपद-सूचियों के बारे में कौन-सी बात सही है?

  2. 2गण या संघ में शासन कैसे होता था?

  3. 3आज के इतिहासकार मगध के सबसे शक्तिशाली बनने का कौन-सा कारण बताते हैं?

  4. 4मगध के शासकों ने राजधानी राजगाह से पाटलिपुत्र ले जाने का निर्णय कब किया?

3एक आरंभिक साम्राज्य

इस पड़ाव का सवाल

मौर्य साम्राज्य के बारे में हम कहाँ से जानते हैं, उसका प्रशासन कैसा था, और वह कितना महत्वपूर्ण था?

पिछली बात से कड़ी मगध छठी से चौथी शताब्दी ई.पू. में सबसे शक्तिशाली महाजनपद बना। अब एक साम्राज्य की बारी है: मौर्य साम्राज्य, जिसके संस्थापक चंद्रगुप्त मौर्य (लगभग 321 ई.पू.) का शासन पश्चिमोत्तर में अफ़गानिस्तान और बलूचिस्तान तक फैला था।

  1. 3.1मौर्यवंश के बारे में जानकारी प्राप्त करना
  2. 3.2साम्राज्य का प्रशासन
  3. 3.3मौर्य साम्राज्य कितना महत्वपूर्ण था?

इस पड़ाव के आख़िर में: प्रश्न 6, 10

3.1मौर्यवंश के बारे में जानकारी प्राप्त करनापृष्ठ 32

मौर्य साम्राज्य (पृष्ठ 32)

  • मौर्य साम्राज्य के संस्थापक चंद्रगुप्त मौर्य (लगभग 321 ई.पू.) का शासन पश्चिमोत्तर में अफ़गानिस्तान और बलूचिस्तान तक फैला था।
  • उनके पौत्र असोक ने कलिंग (आधुनिक उड़ीसा) पर विजय पाई।

मौर्यों के बारे में हम कहाँ से जानते हैं?

किताब मौर्य इतिहास के ये स्रोत गिनाती है। हर स्रोत को उसके खाने में रखिए (पृष्ठ 32)।

असोक के अभिलेख (पृष्ठ 32)

  • असोक पहला सम्राट था जिसने अपने अधिकारियों और प्रजा के लिए संदेश प्राकृतिक पत्थरों और पॉलिश किए हुए स्तंभों पर लिखवाए, और इनसे धम्म का प्रचार किया।
  • असोक के ज़्यादातर अभिलेख प्राकृत भाषा और ब्राह्मी लिपि में हैं; पश्चिमोत्तर के कुछ अभिलेख खरोष्ठी लिपि में हैं, और अफ़गानिस्तान में मिले अभिलेख अरामेइक और यूनानी में।
सारनाथ का सिंह शीर्ष, पुरानी तस्वीर

तस्वीर: सारनाथ में मिला असोक का सिंह शीर्ष; 1911 में छपी तस्वीर।

Vincent A. Smith (1911). Image: Wikimedia Commons, public domain.

लौरिया नंदनगढ़ का असोक स्तंभ, पुरानी तस्वीर

तस्वीर: लौरिया नंदनगढ़ (बिहार) में असोक का स्तंभ; 1865 की तस्वीर।

Benjamin Simpson (1865), British Library. Image: Wikimedia Commons, public domain.

किताब के किनारे का प्रश्न

किताब का चित्र 2.3: सिंह शीर्ष (पृष्ठ 32)

सिंह शीर्ष को आज महत्वपूर्ण क्यों माना जाता है?

जवाब देखिए
  • भारत का राजकीय प्रतीक (राष्ट्रीय चिह्न) सारनाथ में मिले असोक के सिंह शीर्ष से ही लिया गया है।
  • प्रतीक में तीन सिंह दिखते हैं (चौथा पीछे छिपा रहता है), उनके नीचे बीच में धर्मचक्र, एक ओर बैल और दूसरी ओर दौड़ता घोड़ा, और सबसे नीचे "सत्यमेव जयते"; उलटे कमल वाला निचला भाग इसमें नहीं लिया गया।
  • यह प्रतीक भारत सरकार की आधिकारिक मुहर है, इसलिए असोक के समय की यह कलाकृति आज देश की पहचान है।
  • अध्याय से जोड़िए: इतिहासकारों के अनुसार प्रस्तर मूर्तियों सहित मौर्यकालीन पुरातत्व "एक अद्भुत कला के प्रमाण थे जो साम्राज्य की पहचान माने जाते हैं", और बीसवीं सदी के राष्ट्रवादी नेताओं ने असोक को प्रेरणा का स्रोत माना (पृष्ठ 32, 34)।

भारत सरकार: राजकीय प्रतीक

3.2साम्राज्य का प्रशासनपृष्ठ 32–34

पाँच प्रमुख राजनीतिक केंद्र (पृष्ठ 32–33)

पाटलिपुत्र
राजधानी।
तक्षशिला
प्रांतीय केंद्र; लंबी दूरी के महत्वपूर्ण व्यापार मार्ग पर।
उज्जयिनी
प्रांतीय केंद्र; लंबी दूरी के महत्वपूर्ण व्यापार मार्ग पर।
तोसलि
प्रांतीय केंद्र।
सुवर्णगिरि
प्रांतीय केंद्र; नाम का अर्थ "सोने के पहाड़"; कर्नाटक में सोने की खदान के लिए उपयोगी।

इन पाँचों का उल्लेख असोक के अभिलेखों में है।

क्या पूरे साम्राज्य में एक जैसा नियंत्रण था?

  • आधुनिक पाकिस्तान के पश्चिमोत्तर सीमांत प्रांत से आंध्र प्रदेश, उड़ीसा और उत्तराखंड तक एक जैसे संदेश खुदे मिले हैं। फिर भी किताब पूछती है: "क्या इतने विशाल साम्राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था समान रही होगी?" और उत्तर देती है: "इतिहासकार अब इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि ऐसा संभव नहीं था।" (पृष्ठ 32)
  • अफ़गानिस्तान के पहाड़ों से उड़ीसा के तट तक के क्षेत्र बहुत अलग थे। किताब कहती है: "यह संभव है कि सबसे प्रबल प्रशासनिक नियंत्रण साम्राज्य की राजधानी तथा उसके आसपास के प्रांतीय केंद्रों पर रहा हो" (पृष्ठ 33)।
  • मौर्य साम्राज्य के महत्व की चर्चा में भी किताब यही कहती है: "साम्राज्य की सीमा के अंतर्गत भी नियंत्रण एकसमान नहीं था" (पृष्ठ 35)।

मानचित्र 2: असोक के अभिलेखों का वितरण (पृष्ठ 33)

किताब के पृष्ठ 33 वाला मानचित्र: असोक के अभिलेख जहाँ-जहाँ मिले, हर जगह अपनी असली स्थिति पर। निशान की आकृति से अभिलेख का प्रकार पहचानिए (नीचे संकेत देखिए)। पाटलिपुत्र राजधानी थी, तक्षशिला और उज्जयिनी प्रांतीय केंद्र (पृष्ठ 32–33)। नीचे किसी नाम पर टैप कीजिए, मानचित्र पर वह जगह उभर आएगी।

कलिंगचोलकेरलपुत्रपांड्यअरब सागरबंगाल की खाड़ीमानसेहराशहबाज़गढ़ीकंदहारकलसीगिरनारसोपाराशिशुपालगढ़जौगड़सन्नतिबहपुरबैराटभाब्रूटोपरामेरठगुजरकौशाम्बीसाँचीतक्षशिलाउज्जयिनी

मानचित्र पर तीन तरह के प्राप्ति स्थान हैं (पृष्ठ 33, 48):

  • महाशिलालेख
  • लघुशिलालेख
  • स्तंभ अभिलेख
  • राजधानी और प्रांतीय केंद्र (पृष्ठ 32–33)

पास से देखिए: गंगा घाटी के अभिलेख

बड़े मानचित्र में गंगा घाटी वाला चौखाना यहाँ बड़ा करके दिखाया है। पाटलिपुत्र के आस-पास के ये स्थान वहाँ एक-दूसरे के बहुत पास हैं, इसलिए उनके नाम यहीं दिए हैं।

निगालीसागररुम्मिनदेईरामपुरवालौरिया नंदनगढ़लौरिया अरराजसारनाथअहरौरासहसरामपाटलिपुत्र

पास से देखिए: दक्षिण के लघुशिलालेख

बड़े मानचित्र में दक्षिण वाला छोटा चौखाना यहाँ बड़ा करके दिखाया है। ये स्थान एक-दूसरे के बहुत पास हैं, इसलिए कुछ नाम एक पतली रेखा से अपने निशान से जुड़े हैं।

मास्कीगावीमठपाल्कीगुंडुजतिंग रामेश्वरसिद्दपुरब्रह्मगिरिनित्तूरराजुलमडगिरिउदेगोलाम

Relief map: Natural Earth (public domain). Places at their Wikipedia coordinates; Kodumanal from OpenStreetMap (© OpenStreetMap contributors).

किताब के किनारे का प्रश्न

क्या यह भी संभव है कि जो क्षेत्र शासकों के अधीन नहीं थे वहाँ भी उन्होंने अभिलेख उत्कीर्ण करवाए होंगे?

जवाब देखिए
  • यह सोचने का प्रश्न है, इसका कोई एक तय उत्तर नहीं।
  • हाँ, यह संभव है: अभिलेख कहीं मिल जाने भर से यह पक्का नहीं होता कि वह क्षेत्र शासक के पूरे नियंत्रण में था।
  • किताब बताती है कि साम्राज्य की सीमा के अंदर भी नियंत्रण एकसमान नहीं था, और सबसे प्रबल नियंत्रण शायद राजधानी और उसके आसपास के प्रांतीय केंद्रों पर रहा।
  • इसलिए इतिहासकार प्राप्ति स्थान के साथ अभिलेख की विषय-वस्तु भी परखते हैं (पृष्ठ 32–33)।

सेना और आवागमन (पृष्ठ 33–34)

  • राजधानी से प्रांतों तक आने-जाने में कई सप्ताह या महीने लगते होंगे, इसलिए भूमि और नदी, दोनों मार्ग चालू रखने पड़ते थे, और यात्रियों के खान-पान और सुरक्षा का प्रबंध करना पड़ता था। सेना सुरक्षा का प्रमुख माध्यम रही होगी।
  • मेगस्थनीज़ ने सैनिक गतिविधियों के संचालन के लिए "एक समिति और छ: उपसमितियों" का उल्लेख किया है।

छ: उपसमितियाँ किसके लिए थीं?

  1. नौसेना
  2. यातायात और खान-पान
  3. पैदल सैनिक
  4. अश्वारोही
  5. रथारोही
  6. हाथी

दूसरी उपसमिति उपकरण ढोने के लिए बैलगाड़ियाँ, सैनिकों का भोजन, जानवरों का चारा, और सैनिकों की देखभाल के लिए सेवक और शिल्पकार जुटाती थी।

स्रोत 1: सम्राट के अधिकारी क्या-क्या कार्य करते थे? (पृष्ठ 34)

मेगस्थनीज़ के अनुसार कुछ अधिकारी नदियों की देख-रेख और भूमि मापन करते थे, नहरों से पानी छोड़ने के मुखद्वारों का निरीक्षण करते थे ताकि हर जगह बराबर पानी पहुँचे, शिकारियों का संचालन करते थे, कर वसूलते थे, और भूमि से जुड़े व्यवसायों के साथ लकड़हारों, बढ़ई, लोहारों और खननकर्ताओं का निरीक्षण करते थे।

किताब के किनारे का प्रश्न

विभिन्न व्यावसायिक समूहों के निरीक्षण के लिए इन अधिकारियों को क्यों नियुक्त किया जाता था?

जवाब देखिए
  • स्रोत 1 के अनुसार यही अधिकारी कर भी वसूलते थे और भूमि से जुड़े व्यवसायों के साथ लकड़हारों, बढ़ई, लोहारों और खननकर्ताओं का निरीक्षण करते थे।
  • हमारी ओर से: कर वसूली से जुड़े होने के कारण इन व्यवसायों पर नज़र रखना शायद राज्य की आय के लिए ज़रूरी रहा होगा; लकड़ी, औज़ार और धातु की ज़रूरत सेना और आवागमन के लिए भी पड़ती होगी।
  • नहरों के मुखद्वारों का निरीक्षण इसलिए था कि हर जगह पानी समान रूप से पहुँचे (पृष्ठ 34)।

स्रोत 2: सेना के लिए हाथी पकड़ना (पृष्ठ 34–35)

अर्थशास्त्र में सैनिक और प्रशासनिक संगठन के विस्तृत विवरण मिलते हैं। उसमें जंगली हाथियों को पकड़ने का तरीका लिखा है: हाथी वनों के संरक्षक, महावत, सीमारक्षक, वनवासी और दूसरे लोग मिलकर, पाँच से सात हथिनियों की मदद से जंगली हाथी पकड़ते थे।

यूनानी स्रोतों के अनुसार, मौर्य सम्राट के पास छ: लाख पैदल सैनिक, तीस हज़ार घुड़सवार तथा नौ हज़ार हाथी थे। कुछ इतिहासकार इस विवरण को अतिशयोक्तिपूर्ण मानते हैं।

किताब के किनारे का प्रश्न

यदि यूनानी विवरण सही है, तो बताइए कि इतनी बड़ी सेना के भरण-पोषण के लिए मौर्य शासकों को किस तरह के संसाधनों की ज़रूरत पड़ती होगी?

जवाब देखिए
  • छ: लाख पैदल सैनिकों, तीस हज़ार घुड़सवारों और नौ हज़ार हाथियों के लिए सैनिकों का भोजन, घोड़ों और हाथियों का चारा।
  • उपकरण ढोने के लिए बैलगाड़ियाँ, और सैनिकों की देखभाल के लिए सेवक और शिल्पकार (मेगस्थनीज़ की दूसरी उपसमिति के यही काम थे)।
  • हथियारों के लिए लोहा और लकड़ी, और जंगलों से पकड़े हाथी (स्रोत 2)।
  • इन सबके लिए किसानों, व्यापारियों और शिल्पकारों से वसूला गया कर (पृष्ठ 30, 34–35)।

असोक का धम्म (पृष्ठ 34)

  • असोक ने धम्म के प्रचार से भी साम्राज्य को अखंड रखने का प्रयास किया।
  • धम्म के सिद्धांत सरल और सार्वभौमिक थे: बड़ों का आदर, संन्यासियों और ब्राह्मणों के प्रति उदारता, सेवकों और दासों के साथ उदार व्यवहार, और दूसरों के धर्मों और परंपराओं का आदर।
  • असोक के अनुसार धम्म से लोगों का जीवन इस संसार में और उसके बाद के संसार में अच्छा रहेगा।
  • धम्म के प्रचार के लिए धम्म महामात्त नाम के विशेष अधिकारी नियुक्त किए गए।

चर्चा कीजिए

आपका लिखा इसी ब्राउज़र में रहता है।

जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
  • उपयोगी: मेगस्थनीज़ चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार में आए यूनानी राजदूत थे, इसलिए उनका विवरण समकालीन है; उससे अधिकारियों के काम (स्रोत 1) और सेना की समिति-उपसमितियों का पता चलता है। अर्थशास्त्र से सेना के लिए हाथी पकड़ने जैसी व्यवस्था (स्रोत 2) का पता चलता है।
  • सावधानी: मेगस्थनीज़ के विवरण के आज कुछ अंश ही उपलब्ध हैं; अर्थशास्त्र के भी संभवत: कुछ भाग ही चंद्रगुप्त के मंत्री कौटिल्य या चाणक्य ने रचे थे; और सेना के आकार जैसे यूनानी आँकड़ों को कुछ इतिहासकार अतिशयोक्तिपूर्ण मानते हैं।
  • हमारी ओर से: इसलिए इन्हें असोक के अभिलेखों और पुरातात्विक प्रमाणों के साथ मिलाकर पढ़ना ठीक रहेगा; किताब भी बताती है कि इतिहासकारों ने मौर्य इतिहास के लिए विभिन्न प्रकार के स्रोतों का उपयोग किया है (पृष्ठ 32, 34–35)।

3.3मौर्य साम्राज्य कितना महत्वपूर्ण था?पृष्ठ 34–35

मौर्य साम्राज्य कितना महत्वपूर्ण था? दो नज़रें (पृष्ठ 34–35)

उन्नीसवीं और आरंभिक बीसवीं सदी के भारतीय इतिहासकार और नेता

  • उन्नीसवीं सदी में, जब भारत ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन एक औपनिवेशिक देश था, भारतीय इतिहासकारों को प्राचीन भारत में ऐसे साम्राज्य की संभावना चुनौतीपूर्ण और उत्साहवर्धक लगी।
  • मौर्यकालीन पुरातत्व अद्भुत कला का प्रमाण था।
  • असोक उन्हें शक्तिशाली, परिश्रमी और बाद के उपाधियाँ जोड़ने वाले राजाओं से विनीत लगे।
  • बीसवीं सदी के राष्ट्रवादी नेताओं ने असोक को प्रेरणा का स्रोत माना।

किताब की दूसरी बात

  • साम्राज्य "मात्र डेढ़ सौ साल" चला।
  • यह उपमहाद्वीप के सभी क्षेत्रों में नहीं फैला, और अपनी सीमा के अंतर्गत भी नियंत्रण एकसमान नहीं था।
  • दूसरी शताब्दी ई.पू. तक उपमहाद्वीप के कई भागों में नए शासक और रजवाड़े आ गए।
खुदाई में निकले पत्थर के खंभों के अवशेष

तस्वीर: कुम्हरार, पटना (पाटलिपुत्र) में मौर्य काल के खंभों वाले भवन के अवशेष; 1912-13 की खुदाई।

Archaeological Survey of India excavation, 1912-13. Image: Wikimedia Commons, public domain.

वीडियो

Chandragupta Maurya /चन्द्रगुप्त मौर्यचलाइए
NCERT OFFICIAL: चंद्रगुप्त मौर्य पर NCERT का वीडियो।यूट्यूब पर देखिए
Samrat Ashok / सम्राट अशोकचलाइए
NCERT OFFICIAL: सम्राट असोक पर NCERT का वीडियो।यूट्यूब पर देखिए
Sarnath | Monuments of Indiaचलाइए
Prasar Bharati Archives: सारनाथ के स्मारकों पर प्रसार भारती अभिलेखागार का वीडियो।यूट्यूब पर देखिए
Itihasa | इतिहास | चाणक्य नीति और मौर्य साम्राज्य | EP 24 | 1 September, 2022चलाइए
Sansad TV: संसद टीवी की एक चर्चा, जो किताब से आगे की बातें भी करती है। जो सुनें, उसे किताब से मिलाकर देखिए।यूट्यूब पर देखिए

किताब के अपने प्रश्न

6मौर्य प्रशासन के प्रमुख अभिलक्षणों की चर्चा कीजिए। असोक के अभिलेखों में इनमें से कौन-कौन से तत्वों के प्रमाण मिलते हैं?

लगभग 500 शब्दों में

जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
  • भूमिका: मौर्य साम्राज्य की नींव चंद्रगुप्त मौर्य (लगभग 321 ई.पू.) ने रखी, और यह अफ़गानिस्तान और बलूचिस्तान तक फैला। स्रोत: पुरातात्विक प्रमाण, मेगस्थनीज़ का विवरण, अर्थशास्त्र, जैन, बौद्ध और पौराणिक ग्रंथ, और सबसे बढ़कर असोक के अभिलेख।
  • पाँच राजनीतिक केंद्र: राजधानी पाटलिपुत्र और चार प्रांतीय केंद्र तक्षशिला, उज्जयिनी, तोसलि और सुवर्णगिरि। तक्षशिला और उज्जयिनी लंबी दूरी के व्यापार मार्ग पर थे; सुवर्णगिरि कर्नाटक की सोने की खदानों के लिए उपयोगी था।
  • नियंत्रण एकसमान नहीं: साम्राज्य की सीमा के अंदर भी नियंत्रण एकसमान नहीं था; किताब के अनुसार यह संभव है कि सबसे प्रबल प्रशासनिक नियंत्रण राजधानी और उसके आसपास के प्रांतीय केंद्रों पर रहा हो।
  • आवागमन और सुरक्षा: भूमि और नदी, दोनों मार्ग ज़रूरी थे; राजधानी से प्रांत तक कई सप्ताह या महीने लगते, इसलिए यात्रियों के खान-पान और सुरक्षा की व्यवस्था करनी पड़ती; सेना सुरक्षा का प्रमुख माध्यम थी।
  • सेना का संगठन: मेगस्थनीज़ के अनुसार एक समिति और छ: उपसमितियाँ: नौसेना, यातायात और खान-पान, पैदल सैनिक, अश्वारोही, रथारोही और हाथी।
  • अधिकारी: स्रोत 1 के अनुसार अधिकारी नदियों की देख-रेख, भूमि मापन, नहरों के मुखद्वारों का निरीक्षण, शिकारियों का संचालन, कर वसूली, और लकड़हारों, बढ़ई, लोहारों और खननकर्ताओं का निरीक्षण करते थे।
  • धम्म और धम्म महामात्त: असोक ने साम्राज्य को अखंड बनाए रखने के लिए धम्म का प्रचार भी किया, और इसके लिए धम्म महामात्त नाम के विशेष अधिकारी नियुक्त किए।
  • असोक के अभिलेखों में प्रमाण: पाँचों केंद्रों का उल्लेख; आधुनिक पाकिस्तान के पश्चिमोत्तर सीमांत प्रांत से आंध्र प्रदेश, उड़ीसा और उत्तराखंड तक एक जैसे संदेश (मानचित्र 2); धम्म के सिद्धांत; स्रोत 10 में पतिवेदकों से हर समय समाचार की व्यवस्था; स्रोत 11 में कलिंग विजय और उसके बाद की वेदना।
  • जो दूसरे स्रोतों से आता है: सेना की समितियाँ और अधिकारियों के कामों का ब्योरा मेगस्थनीज़ के विवरण से मिलता है, और सेना के आकार के यूनानी आँकड़ों को कुछ इतिहासकार अतिशयोक्तिपूर्ण मानते हैं (पृष्ठ 32–35, 47–48)।

10मानचित्र 1 और 2 की तुलना कीजिए और उन महाजनपदों की सूची बनाइए जो मौर्य साम्राज्य में शामिल रहे होंगे। क्या इस क्षेत्र में असोक के कोई अभिलेख मिले हैं?

मानचित्र कार्य

जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
  • पहला कदम: मानचित्र 1 (पृष्ठ 30) पर मोटे अक्षरों में छपे राज्यों के नाम लिखिए: कंबोज, गांधार, शूरसेन, मत्स्य, कुरु, पांचाल, कोशल, काशी, मल्ल, वज्जि (वृजि), मगध, अंग, वंग, वत्स, चेदि, अवन्ति; अश्मक भी छपा है।
  • दूसरा कदम: मानचित्र 2 (पृष्ठ 33) पर देखिए कि असोक के महाशिलालेख, लघुशिलालेख और स्तंभ अभिलेख कहाँ-कहाँ मिले, और राजधानी व प्रांतीय केंद्र कहाँ हैं।
  • तीसरा कदम: जिन महाजनपदों का क्षेत्र इन प्राप्ति स्थानों और केंद्रों के फैलाव के भीतर आता है, वे साम्राज्य में शामिल रहे होंगे।
  • किताब के संकेत: मगध साम्राज्य का केंद्र था, क्योंकि राजधानी पाटलिपुत्र वहीं थी। मानचित्र 1 के नगर तक्षशिला और उज्जयिनी मौर्य साम्राज्य के प्रांतीय केंद्र थे, इसलिए जिन महाजनपदों में ये नगर हैं, उन्हें मानचित्र 1 पर देखकर अपनी सूची में रखिए। साम्राज्य अफ़गानिस्तान और बलूचिस्तान तक फैला था, और एक जैसे संदेश पश्चिमोत्तर सीमांत प्रांत से आंध्र प्रदेश, उड़ीसा और उत्तराखंड तक मिले हैं।
  • दूसरा भाग: हाँ। उदाहरण के लिए, कौशाम्बी मानचित्र 1 पर एक नगर है और मानचित्र 2 पर वहाँ असोक का स्तंभ अभिलेख दिखाया गया है। बाकी प्राप्ति स्थान दोनों मानचित्र साथ रखकर खोजिए (पृष्ठ 30–33)।

जाँच पड़ाव

  1. 1मौर्य इतिहास के स्रोतों में किसे "प्राय: सबसे मूल्यवान स्रोत" माना जाता है?

  2. 2मौर्य साम्राज्य के पाँच प्रमुख राजनीतिक केंद्रों में राजधानी कौन-सी थी?

  3. 3मौर्य साम्राज्य में प्रशासनिक नियंत्रण के बारे में किताब क्या कहती है?

  4. 4मेगस्थनीज़ ने सैनिक गतिविधियों के संचालन के लिए किसका उल्लेख किया है?

  5. 5असोक ने धम्म के प्रचार के लिए किन अधिकारियों को नियुक्त किया?

4राजधर्म के नवीन सिद्धांत

इस पड़ाव का सवाल

दक्षिण के सरदारों और उत्तर के राजाओं ने अपनी ऊँची स्थिति के लिए कौन-से नए दावे और तरीके अपनाए?

पिछली बात से कड़ी मौर्य साम्राज्य लगभग 185 ई.पू. में समाप्त हो गया। उसके बाद उपमहाद्वीप के अलग-अलग हिस्सों में दूसरे सरदार और राजा सामने आए।

  1. 4.1दक्षिण के राजा और सरदार
  2. 4.2दैविक राजा

इस पड़ाव के आख़िर में: प्रश्न 8

4.1दक्षिण के राजा और सरदारपृष्ठ 35

दक्षिण के राजा और सरदार (पृष्ठ 35)

  • दक्कन और उससे दक्षिण के क्षेत्र तमिलकम (तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश और केरल के कुछ हिस्से) में चोल, चेर और पाण्ड्य जैसी सरदारियाँ उभरीं, जो बहुत समृद्ध और स्थायी रहीं।
  • प्राचीन तमिल संगम ग्रंथों की कविताएँ बताती हैं कि सरदारों ने संसाधन कैसे जुटाए और बाँटे।
  • कई सरदार और राजा लंबी दूरी के व्यापार से राजस्व जुटाते थे, जैसे मध्य और पश्चिम भारत के सातवाहन (लगभग द्वितीय शताब्दी ई.पू. से द्वितीय शताब्दी ई. तक) और पश्चिमोत्तर और पश्चिम में मध्य एशियाई मूल के शक शासक।

यह सरदार की बात है या राजा की?

किताब सरदार और राजा का अंतर बताती है। हर बात को सही खाने में रखिए (पृष्ठ 30, 35)।

स्रोत 3 (पृष्ठ 36)

"पाण्ड्य सरदार सेनगुत्तुवन की वनयात्रा"

यह तमिल महाकाव्य सिलप्पादिकारम् का एक अंश है:

"जब वह वन की यात्रा पर थे तो लोग नाचते-गाते हुए पहाड़ों से उतरे ठीक उसी तरह जैसे पराजित लोग विजयी का आदर करते हैं।"

वे अपने साथ उपहार लाए: हाथी दाँत, सुगंधित लकड़ी, हिरणों के बाल से बने चँवर, मधु, चंदन, गेरू, सुरमा, हल्दी, इलायची, मिर्च, फल, बाघों के बच्चे, हाथी, बंदर, बोलने वाले तोते आदि।

छपी किताब में स्रोत 3 के शीर्षक में सेनगुत्तुवन को "पाण्ड्य सरदार" लिखा है; सिलप्पादिकारम् और दूसरे तमिल स्रोतों में सेनगुत्तुवन चेर राजा हैं।

किताब के किनारे का प्रश्न

लोग यह उपहार क्यों लाए? सरदार इन उपहारों का उपयोग किसलिए करते होंगे?

जवाब देखिए
  • स्रोत 3 कहता है कि लोग नाचते-गाते पहाड़ों से उतरे "ठीक उसी तरह जैसे पराजित लोग विजयी का आदर करते हैं"; यानी उपहार सरदार की सत्ता मानने और उसका आदर करने का तरीका थे।
  • सरदार अपने अधीन लोगों से भेंट लेता था (राजा की तरह कर नहीं) और उस भेंट को अपने समर्थकों में बाँटता था; संगम कविताएँ भी बताती हैं कि सरदार संसाधनों का संकलन और वितरण कैसे करते थे (पृष्ठ 35–36)।

4.2दैविक राजापृष्ठ 36–37

दैविक राजा: कुषाण (पृष्ठ 36–37)

  • ऊँची स्थिति पाने का एक साधन था देवी-देवताओं से जुड़ना। इसका सबसे अच्छा उदाहरण कुषाण शासक हैं (लगभग प्रथम शताब्दी ई.पू. से प्रथम शताब्दी ई. तक), जिनका शासन मध्य एशिया से पश्चिमोत्तर भारत तक था।
  • कुषाणों के राजधर्म का सबसे अच्छा प्रमाण उनके सिक्के और मूर्तियाँ हैं। मथुरा के पास माट के एक देवस्थान पर और अफ़गानिस्तान के एक देवस्थान पर कुषाण शासकों की विशालकाय मूर्तियाँ मिली हैं; कुछ इतिहासकार मानते हैं कि इनसे वे स्वयं को देवतुल्य दिखाना चाहते थे।
  • कई कुषाण शासकों ने 'देवपुत्र' की उपाधि लगाई, शायद उन चीनी शासकों से प्रेरित होकर जो स्वयं को स्वर्गपुत्र कहते थे।
कनिष्क के सोने के सिक्के के दोनों ओर

सिक्का: कुषाण शासक कनिष्क का सोने का सिक्का, दोनों ओर से।

Classical Numismatic Group (cngcoins.com). Image: Wikimedia Commons, CC BY-SA 2.5.

मथुरा से मिली कुषाण राजा की बलुआ पत्थर की मूर्ति

मूर्ति: बलुआ पत्थर से बनी कुषाण राजा की एक मूर्ति, मथुरा।

Biswarup Ganguly. Image: Wikimedia Commons, CC BY-SA 3.0.

किताब के किनारे का प्रश्न

किताब का चित्र 2.4: कुषाण सिक्का (पृष्ठ 36)

राजा को किस प्रकार दर्शाया गया है?

जवाब देखिए
  • किताब का चित्र 2.4 ध्यान से देखिए: अग्र भाग पर कनिष्क खड़े हैं, लंबा वस्त्र पहने, हाथ में दंड लिए और एक छोटी वेदी पर कुछ अर्पित करते हुए; पृष्ठ भाग पर देवता हैं।
  • राजा और देवता एक ही सिक्के के दो ओर हैं।
  • किताब के अनुसार कुषाणों ने देवी-देवताओं से जुड़कर ऊँची स्थिति पाने का उपाय अपनाया, और उनके राजधर्म का सबसे अच्छा प्रमाण उनके सिक्कों और मूर्तियों से मिलता है (पृष्ठ 36)।

किताब के किनारे का प्रश्न

किताब का चित्र 2.5: बलुआ पत्थर से बनी कुषाण राजा की एक मूर्ति (पृष्ठ 37)

इस मूर्ति में ऐसी क्या विशेषताएँ हैं जिनसे यह प्रतीत होता है कि यह एक राजा की मूर्ति है?

जवाब देखिए
  • किताब का चित्र 2.5 देखिए और विशेषताएँ खुद गिनिए।
  • मूर्ति बलुआ पत्थर की है और बड़े आकार की है; आकृति लंबा कोट और जूते पहने है, एक ओर तलवार है और सामने एक लंबी गदा जैसी वस्तु पकड़े है; कोट के निचले किनारे पर अभिलेख भी खुदा है।
  • किताब बताती है कि मथुरा के पास माट के एक देवस्थान पर कुषाण शासकों की विशालकाय मूर्तियाँ लगाई गई थीं; कुछ इतिहासकारों का मानना है कि इन मूर्तियों के ज़रिए कुषाण स्वयं को देवतुल्य दिखाना चाहते थे (पृष्ठ 36–37)।

सामंत (पृष्ठ 36)

  • चौथी शताब्दी ई. में गुप्त साम्राज्य सहित कई बड़े साम्राज्यों के साक्ष्य मिलते हैं। किताब कहती है: "इनमें से कई साम्राज्य सामंतों पर निर्भर थे।"
  • सामंत अपना निर्वाह स्थानीय संसाधनों से करते थे, जिसमें भूमि पर नियंत्रण भी शामिल था। वे शासकों का आदर करते थे और उनकी सैनिक सहायता भी करते थे।
  • शक्तिशाली सामंत राजा भी बन जाते थे, और दुर्बल राजा बड़े शासकों के अधीन हो जाते थे।

गुप्त शासक और प्रशस्ति (पृष्ठ 36–37)

  • गुप्त इतिहास के स्रोत हैं साहित्य, सिक्के, अभिलेख और कवियों की प्रशस्तियाँ। इतिहासकार इनसे तथ्य निकालने का प्रयास करते हैं, पर इनके रचयिता इन्हें तथ्य का विवरण नहीं, काव्यात्मक ग्रंथ मानते थे।
  • प्रयाग प्रशस्ति (इलाहाबाद स्तंभ अभिलेख) संस्कृत में हरिषेण ने लिखी, जो गुप्त सम्राटों में संभवत: सबसे शक्तिशाली सम्राट समुद्रगुप्त के राजकवि थे।

स्रोत 4: समुद्रगुप्त की प्रशस्ति (पृष्ठ 37)

"धरती पर उनका कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं था।"

"वे अनेक सहस्र गायों के दाता हैं।"

प्रशस्ति समुद्रगुप्त को कुबेर, वरुण, इंद्र और यम के तुल्य बताती है।

समुद्रगुप्त के सोने के सिक्के के दोनों ओर

सिक्का: समुद्रगुप्त का सोने का सिक्का: राजा बैठे हुए वीणा बजा रहे हैं; दोनों ओर से।

Classical Numismatic Group (cngcoins.com). Image: Wikimedia Commons, CC BY-SA 3.0.

इलाहाबाद का असोक स्तंभ, पुरानी तस्वीर

तस्वीर: इलाहाबाद (प्रयागराज) का असोक स्तंभ, जिस पर समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति भी खुदी है; लगभग 1870 की तस्वीर।

Thomas A. Rust (c. 1870), British Library. Image: Wikimedia Commons, public domain.

चर्चा कीजिए

आपका लिखा इसी ब्राउज़र में रहता है।

जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
  • किताब के अनुसार ऊँची स्थिति पाने का एक साधन देवी-देवताओं से जुड़ना था।
  • कुषाणों ने 'देवपुत्र' उपाधि ली और अपनी विशालकाय मूर्तियाँ देवस्थानों पर लगवाईं; प्रशस्ति में समुद्रगुप्त को देवताओं के तुल्य बताया गया।
  • सोचिए: जब शक्तिशाली सामंत राजा बन सकते थे और दुर्बल राजा दूसरों के अधीन हो जाते थे, तब दैवी दर्जे का दावा राजा को बाकियों से ऊपर दिखाने में कैसे मदद करता होगा (पृष्ठ 36–37)।

किताब के अपने प्रश्न

8उत्तर-मौर्य काल में विकसित राजत्व के विचारों की चर्चा कीजिए।

लगभग 500 शब्दों में

जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
  • भूमिका: मौर्य साम्राज्य मात्र डेढ़ सौ साल चला। उसके बाद अलग-अलग क्षेत्रों में नए शासकों ने अपनी सत्ता अलग-अलग ढंग से जताई।
  • दक्षिण के सरदार और राजा: तमिलकम में चोल, चेर और पाण्ड्य सरदारियाँ उभरीं। सरदार अनुष्ठान करता, युद्ध में नेतृत्व करता और विवादों में मध्यस्थ बनता था; वह भेंट लेता और समर्थकों में बाँटता था, जबकि राजा कर वसूलते थे। संगम कविताएँ और स्रोत 3 इसका चित्र देते हैं।
  • व्यापार से राजस्व, ऊँचे दर्जे का दावा: सातवाहन और मध्य एशियाई मूल के शक शासक लंबी दूरी के व्यापार से राजस्व जुटाते थे; सत्ता में आने के बाद उन्होंने ऊँचे सामाजिक अस्तित्व का दावा कई प्रकार से किया।
  • दैविक राजा: कुषाणों ने मथुरा के पास माट के देवस्थान पर और अफ़गानिस्तान में अपनी विशालकाय मूर्तियाँ लगवाईं; कुछ इतिहासकारों के अनुसार वे स्वयं को देवतुल्य दिखाना चाहते थे। कई कुषाण शासकों ने 'देवपुत्र' की उपाधि ली, शायद उन चीनी शासकों से प्रेरित होकर जो स्वयं को स्वर्गपुत्र कहते थे।
  • सामंत: चौथी शताब्दी ई. में गुप्त साम्राज्य सहित कई बड़े साम्राज्यों के साक्ष्य मिलते हैं, और किताब के अनुसार "इनमें से कई साम्राज्य सामंतों पर निर्भर थे"। सामंत स्थानीय संसाधनों से निर्वाह करते, शासक का आदर करते और सैनिक सहायता देते थे। शक्तिशाली सामंत राजा बन जाते और दुर्बल राजा बड़े शासकों के अधीन हो जाते।
  • प्रशस्ति: हरिषेण की प्रयाग प्रशस्ति (स्रोत 4) में समुद्रगुप्त को कुबेर, वरुण, इंद्र और यम के तुल्य बताया गया और कहा गया, "धरती पर उनका कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं था।" इनके रचयिता प्रशस्तियों को तथ्य का विवरण नहीं, काव्यात्मक ग्रंथ मानते थे।
  • भूमिदान: ईसवी की आरंभिक शताब्दियों से भूमिदान के प्रमाण मिलते हैं; कुछ इतिहासकार इसे खेती फैलाने की शासकों की रणनीति मानते हैं, कुछ दुर्बल होते राजनीतिक प्रभुत्व का संकेत।
  • प्रजा की नज़र: गंदतिन्दु जातक में प्रजा कुटिल राजा को अपने दुखों के लिए भला-बुरा कहती है।
  • निष्कर्ष: उत्तर-मौर्य काल में राजत्व के विचार कई रूपों में दिखे: भेंट पर टिकी सरदारी, ऊँचे सामाजिक दर्जे का दावा, देवताओं से जुड़ाव, और कवियों की प्रशंसा (पृष्ठ 35–38, 40)।

जाँच पड़ाव

  1. 1सरदार और राजा में किताब कौन-सा अंतर बताती है?

  2. 2कई कुषाण शासकों ने कौन-सी उपाधि लगाई?

  3. 3प्रयाग प्रशस्ति किसने और किस भाषा में लिखी?

  4. 4चौथी शताब्दी ई. के बड़े साम्राज्यों के सामंतों के बारे में किताब क्या बताती है?

5बदलता हुआ देहात

इस पड़ाव का सवाल

गाँवों में लोग राजा को कैसे देखते थे, उपज कैसे बढ़ाई गई, और ग्रामीण समाज में कौन-कौन थे?

पिछली बात से कड़ी शासक किसानों, व्यापारियों और शिल्पकारों से कर और भेंट लेते थे। अब देखिए कि गाँवों में किसान कैसे रहते थे और उनकी खेती कैसे बदली।

  1. 5.1जनता में राजा की छवि
  2. 5.2उपज बढ़ाने के तरीके
  3. 5.3ग्रामीण समाज में विभिन्नताएँ
  4. 5.4भूमिदान और नए संभ्रांत ग्रामीण

इस पड़ाव के आख़िर में: प्रश्न 3, 4, 9

5.1जनता में राजा की छविपृष्ठ 38

जनता में राजा की छवि (पृष्ठ 38)

  • साधारण लोगों ने राजाओं के बारे में अपने विचार कम ही लिखे, इसलिए इतिहासकार जातक और पंचतंत्र जैसी कथाएँ पढ़ते हैं। इतिहासकारों के अनुसार इनमें से अनेक कथाओं के स्रोत मौखिक किस्से-कहानियाँ हैं, जिन्हें बाद में लिपिबद्ध किया गया होगा। जातक कथाएँ पहली सहस्राब्दि ई. के मध्य में पालि भाषा में लिखी गईं।
  • गंदतिन्दु जातक में एक कुटिल राजा की प्रजा (वृद्ध महिलाएँ, पुरुष, किसान, पशुपालक, ग्रामीण बालक, यहाँ तक कि जानवर भी) दुखी है। भेस बदलकर आए राजा से सबने शिकायत की कि "रात में डकैत उन पर हमला करते हैं तो दिन में कर इकट्ठा करने वाले अधिकारी"। बचने के लिए लोग गाँव छोड़कर जंगल में बस गए।
  • इस कथा से पता चलता है कि राजा और ग्रामीण प्रजा के संबंध तनावपूर्ण रहते थे, क्योंकि शासक राजकोष भरने के लिए बड़े-बड़े कर माँगते थे। करों की बढ़ती माँग पूरी करने के लिए किसानों ने उपज बढ़ाने के नए तरीके खोजे।

5.2उपज बढ़ाने के तरीकेपृष्ठ 38–39

उपज बढ़ाने के तरीके: सही या गलत?

  1. छठी शताब्दी ई.पू. से हल का प्रयोग गंगा और कावेरी की घाटियों के उर्वर कछारी क्षेत्र में फैल गया।

  2. लोहे के फाल वाले हल पूरे उपमहाद्वीप में एक साथ चलने लगे।

  3. धान की रोपाई से गंगा की घाटी में उपज में भारी वृद्धि हुई, पर किसानों को कमरतोड़ मेहनत करनी पड़ती थी।

  4. पूर्वोत्तर और मध्य पर्वतीय क्षेत्रों के किसानों ने कुदाल का उपयोग किया।

  5. सिंचाई के साधन केवल राजा ही बनवाते थे।

स्रोत 5: गुजरात की सुदर्शन झील (पृष्ठ 38)

सुदर्शन झील एक कृत्रिम जलाशय थी। इसकी जानकारी लगभग दूसरी शताब्दी ई. के संस्कृत के एक पाषाण अभिलेख से मिलती है, जो शक शासक रुद्रदमन की उपलब्धियाँ बताने के लिए बना था।

सुदर्शन झील की कहानी: क्रम लगाइए

अभिलेखों के अनुसार झील के साथ जो हुआ, उसे पहले से बाद के क्रम में लगाइए।

▲ पहले

  1. 1बताया जाता है कि तत्कालीन शासक रुद्रदमन ने अपने खर्चे से झील की मरम्मत करवाई थी, और इसके लिए प्रजा से कर भी नहीं लिया था।
  2. 2मौर्य काल में एक स्थानीय राज्यपाल ने झील बनवाई।
  3. 3लगभग पाँचवीं सदी में, उसी पाषाण-खंड के एक और अभिलेख के अनुसार, गुप्त वंश के एक शासक ने झील की फिर मरम्मत करवाई।
  4. 4भीषण तूफ़ान से झील के तटबंध टूट गए।

▼ बाद में

किताब के किनारे का प्रश्न

शासकों ने सिंचाई के प्रबंध क्यों किए?

जवाब देखिए
  • किताब बताती है कि करों की बढ़ती माँग के बीच उपज बढ़ाने के तरीके खोजे गए, और सिंचाई उनमें से एक थी।
  • हमारी ओर से: ज़्यादा उपज से खेती और राज्य की आय, दोनों को सहारा मिलता।
  • जो राजा या प्रभावशाली लोग सिंचाई के साधन बनवाते थे, उन्होंने अपने इन कामों का उल्लेख अभिलेखों में भी करवाया। सुदर्शन झील वाले अभिलेख में भी बताया गया है कि रुद्रदमन ने अपने खर्च से झील की मरम्मत करवाई थी (पृष्ठ 38–39)।

5.3ग्रामीण समाज में विभिन्नताएँपृष्ठ 39–40

ग्रामीण समाज में विभिन्नताएँ (पृष्ठ 39)

  • नई तकनीकों से उपज तो बढ़ी, पर लाभ सबको बराबर नहीं मिला; खेती से जुड़े लोगों में भेद बढ़ता गया।
  • बड़े ज़मींदार और ग्राम प्रधान शक्तिशाली थे और प्राय: किसानों पर नियंत्रण रखते थे। ग्राम प्रधान का पद प्राय: वंशानुगत होता था।
  • किताब के अनुसार यह भेद शायद भूमि के स्वामित्व, श्रम और नयी प्रौद्योगिकी के उपयोग पर आधारित था। ऐसी स्थिति में भूमि का स्वामित्व महत्वपूर्ण हो गया, जिसकी चर्चा प्राय: विधि ग्रंथों में की जाती थी।

गाँव के लोग: किस स्रोत में कौन-सा नाम?

किताब गाँव के लोगों के लिए दो तरह के स्रोतों के नाम देती है। हर नाम को उसके स्रोत के खाने में रखिए (पृष्ठ 39)।

स्रोत 6: मनुस्मृति (पृष्ठ 39)

मनुस्मृति आरंभिक भारत का सबसे प्रसिद्ध विधिग्रंथ है, जो संस्कृत में दूसरी शताब्दी ई.पू. और दूसरी शताब्दी ई. के बीच लिखा गया। इसमें राजा को सलाह है कि सीमाओं की पहचान के लिए ज़मीन में गुप्त निशान गाड़े जाएँ, जो समय के साथ नष्ट न हों।

किताब के किनारे का प्रश्न

क्या ये सीमा चिह्न विवाद के हल के लिए पर्याप्त रहे होंगे?

जवाब देखिए
  • यह सोचने का प्रश्न है। मनुस्मृति राजा को सलाह देती है कि सीमाओं पर पत्थर, हड्डियाँ, गाय के बाल, भूसी, राख, खपटे, गोबर, ईंट, कोयला, कंकड़ और रेत जैसे निशान ज़मीन में गाड़ दिए जाएँ, जो समय के साथ नष्ट न हों।
  • हमारी ओर से, मदद: छिपे और टिकाऊ निशान विवाद के समय गवाही दे सकते थे।
  • कमी: निशान खोदने पर ही दिखते, कोई उन्हें हटा या बदल सकता था, और यह कोई लिखित रिकॉर्ड नहीं था।
  • तुलना कीजिए: भूमिदान ताम्र पत्रों पर लिखे जाते थे (पृष्ठ 39–40)।

5.4भूमिदान और नए संभ्रांत ग्रामीणपृष्ठ 40–41

भूमिदान (पृष्ठ 40–41)

  • भूमिदान के प्रमाण ईसवी की आरंभिक शताब्दियों से मिलते हैं। कुछ अभिलेख पत्थरों पर हैं, पर ज़्यादातर ताम्र पत्रों पर, जो शायद दान लेने वालों को प्रमाण के रूप में दिए जाते थे।
  • दान प्राय: धार्मिक संस्थाओं या ब्राह्मणों को दिए गए। ज़्यादातर अभिलेख संस्कृत में हैं; सातवीं शताब्दी के बाद के कुछ अभिलेखों के अंश तमिल और तेलुगु जैसी स्थानीय भाषाओं में हैं।
  • कहीं छोटे टुकड़े दान हुए, कहीं बड़े क्षेत्र; दान लेने वालों के अधिकार भी क्षेत्र के अनुसार बदलते थे।
एक छल्ले में पिरोई ताँबे की लिखी हुई प्लेटें

ताम्र पत्र: भूमिदान के ताम्र पत्र, एक छल्ले में पिरोए हुए; गंजाम, ओडिशा से।

Subhashish Panigrahi. Image: Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0.

प्रभावती गुप्त (पृष्ठ 40)

  • प्रभावती गुप्त चंद्रगुप्त द्वितीय (लगभग 375-415 ई.) की पुत्री थी; उसका विवाह दक्कन पठार के वाकाटक परिवार में हुआ।
  • संस्कृत धर्मशास्त्रों के अनुसार महिलाओं को भूमि पर स्वतंत्र अधिकार नहीं था, फिर भी अभिलेख बताता है कि वह भूमि की स्वामी थी और उसने दान भी किया।
  • किताब दो संभावित कारण सुझाती है: वह रानी थी, इसलिए यह उदाहरण विरला हो सकता है; या धर्मशास्त्र हर स्थान पर समान रूप से लागू नहीं होते थे।

स्रोत 8: प्रभावती गुप्त और दंगुन गाँव (पृष्ठ 40–41)

प्रभावती गुप्त दंगुन गाँव के ग्राम कुटुंबिनों (गाँव के गृहस्थ और कृषक), ब्राह्मणों और अन्य वासियों को बताती है कि गाँव आचार्य चनालस्वामी को दान किया गया है।

अग्रहार की रियायतें: गाँव में पुलिस या सैनिक प्रवेश नहीं करेंगे; दौरे पर आए अधिकारियों को घास, जानवरों की खाल और कोयला देने से छूट; मदिरा खरीदने और नमक के लिए खुदाई के राजसी अधिकार से मुक्ति; खनिज-पदार्थ, खदिर वृक्ष के उत्पाद, फूल और दूध देने से छूट; दान गाँव की संपत्ति और बड़े-छोटे सभी करों सहित।

यह आदेश 13वें राज्य वर्ष में लिखा गया और चक्रदास ने उत्कीर्ण किया।

किताब के किनारे का प्रश्न

इस गाँव में कौन-कौन सी वस्तुएँ पैदा की जाती थीं?

जवाब देखिए
  • छूट की सूची से पता चलता है कि गाँव में घास, जानवरों की खाल, कोयला, खनिज-पदार्थ, खदिर वृक्ष के उत्पाद, फूल और दूध मिलते थे, क्योंकि इन्हें अधिकारियों को देने से ही छूट दी गई है।
  • गाँव मदिरा खरीदने और नमक के लिए खुदाई करने के राजसी अधिकार से भी मुक्त था (पृष्ठ 41)।

प्रश्न 4 के लिए आमने-सामने: स्रोत 3 और स्रोत 8

स्रोत 3: सेनगुत्तुवन की वनयात्रा (पृष्ठ 36)

  • कौन देता है: पहाड़ों से नाचते-गाते उतरे लोग।
  • किसे: सेनगुत्तुवन को।
  • क्या: हाथी दाँत, सुगंधित लकड़ी, चँवर, मधु, चंदन, गेरू, सुरमा, हल्दी, इलायची, मिर्च, फल, बाघों के बच्चे, हाथी, बंदर, बोलने वाले तोते आदि।
  • कैसे: "ठीक उसी तरह जैसे पराजित लोग विजयी का आदर करते हैं"।

स्रोत 8: दंगुन गाँव (पृष्ठ 40–41)

  • कौन देता था: दंगुन गाँव के लोग।
  • किसे: पहले राजा के अधिकारियों को; अब गाँव दान में आचार्य चनालस्वामी को मिला।
  • क्या: घास, जानवरों की खाल, कोयला, खनिज-पदार्थ, खदिर वृक्ष के उत्पाद, फूल, दूध; अब गाँव इन्हें अधिकारियों को देने से मुक्त है।
  • कैसे: प्रभावती गुप्त के आदेश से, जो एक अभिलेख में लिखा है।

भूमिदान पर इतिहासकारों का वाद-विवाद (पृष्ठ 41)

कुछ इतिहासकार

भूमिदान शासक वंश की रणनीति थी, ताकि खेती नए क्षेत्रों में फैले।

दूसरे इतिहासकार

भूमिदान दुर्बल होते राजनीतिक प्रभुत्व का संकेत था: सामंतों पर पकड़ ढीली हुई तो राजाओं ने दान से समर्थक जुटाए और अपनी शक्ति का आडंबर दिखाया।

जो लोग नियंत्रण से बाहर थे (पृष्ठ 41)

पशुपालक, संग्राहक, शिकारी, मछुआरे, शिल्पकार और जगह-जगह घूमकर खेती करने वाले। ये लोग प्राय: अपने जीवन और लेन-देन का विवरण नहीं रखते थे।

स्रोत 7: हर्षचरित (पृष्ठ 40)

हर्षचरित कन्नौज के शासक हर्षवर्धन की संस्कृत में लिखी जीवनी है, जिसे उनके राजकवि बाणभट्ट (लगभग सातवीं शताब्दी ई.) ने लिखा। इसमें विंध्य क्षेत्र के जंगल के किनारे की एक बस्ती का चित्रण है।

किताब के किनारे का प्रश्न

इस अंश में वर्णित लोगों को व्यवसाय के आधार पर आप कैसे वर्गीकृत करेंगे?

जवाब देखिए
  • खेती करने वाले: छोटे किसान, जिन्होंने धान की भूमि आपस में बाँट ली और जो कुदाल से खेती करते हैं।
  • जंगल की उपज जुटाने और ढोने वाले: पेड़ की छाल, फूलों के बोरे, अलसी और सन, शहद, मोरपंख, मोम, लकड़ी और घास के बोझ लेकर आने-जाने वाले लोग।
  • बेचने वाले: ग्रामीण महिलाएँ, जो जंगल के फलों की टोकरियाँ लेकर रास्ते के गाँवों में बेचने जाती हैं (पृष्ठ 40)।

चर्चा कीजिए

आपका लिखा इसी ब्राउज़र में रहता है।

जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
  • यह आपकी अपनी खोज है।
  • अपने गाँव या आसपास के किसानों से पूछिए: खेत किससे जोते जाते हैं (बैल, हल, ट्रैक्टर), सिंचाई कैसे होती है (कुआँ, ट्यूबवेल, तालाब, नहर, बारिश), और धान की रोपाई होती है या नहीं; नहीं होती, तो कौन सी फ़सलें और तरीके अपनाए जाते हैं।
  • किताब से एक संकेत: पंजाब और राजस्थान में लोहे के फाल वाले हल का प्रयोग बीसवीं सदी में शुरू हुआ (पृष्ठ 39, 41)।

किताब के अपने प्रश्न

3सामान्य लोगों के जीवन का पुनर्निर्माण इतिहासकार कैसे करते हैं?

लगभग 100 से 150 शब्दों में

जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
  • कई सामान्य लोग, जैसे पशुपालक, शिकारी, मछुआरे और घूम-घूमकर खेती करने वाले, अपने जीवन के विवरण नहीं रखते थे। इसलिए इतिहासकार कई तरह के स्रोत जोड़ते हैं।
  • कहानियाँ: जातक और पंचतंत्र जैसी कथाएँ, जो शायद मौखिक रूप में शुरू हुईं। गंदतिन्दु जातक में प्रजा रात में डकैतों और दिन में कर इकट्ठा करने वाले अधिकारियों से बचने के लिए गाँव छोड़कर जंगल में बस जाती है।
  • अभिलेख: सुदर्शन झील (स्रोत 5), भूमिदान (स्रोत 8), और नगरों के दानात्मक अभिलेख, जो दाताओं के व्यवसाय बताते हैं।
  • ग्रंथ: मनुस्मृति (स्रोत 6), हर्षचरित (स्रोत 7), और संगम साहित्य, जिसमें वेल्लालर (बड़े ज़मींदार), उल्वर (हलवाहा) और अणिमई (दास) का ज़िक्र है।
  • खेती और पुरावशेष: हल, लोहे का फाल, धान की रोपाई, सिंचाई; नगरों से मिले बर्तन, गहने, उपकरण।
  • इतिहासकार सावधान भी रहते हैं, क्योंकि अभिलेख प्राय: बड़े अवसर दर्ज करते हैं, रोज़ के सुख-दुख नहीं, और बनवाने वालों का ही दृष्टिकोण बताते हैं (पृष्ठ 38–42, 48–49)।

4पांड्य सरदार (स्रोत 3) को दी जाने वाली वस्तुओं की तुलना दंगुन गाँव (स्रोत 8) की वस्तुओं से कीजिए। आपको क्या समानताएँ और असमानताएँ दिखाई देती हैं?

लगभग 100 से 150 शब्दों में

जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
  • स्रोत 3: पहाड़ों के लोग चेर राजा सेनगुत्तुवन (किताब में "पांड्य सरदार") के लिए हाथी दाँत, सुगंधित लकड़ी, हिरणों के बाल से बने चँवर, मधु, चंदन, गेरू, सुरमा, हल्दी, इलायची, मिर्च, फल, फूल, गन्ना, सुपारी और बाघों के बच्चे, हाथी, बंदर, मोर, बोलने वाले तोते जैसे जानवर लाए।
  • स्रोत 8: दंगुन गाँव को दौरे पर आए अधिकारियों को घास, आसन के लिए जानवरों की खाल और कोयला देने से, और खनिज-पदार्थ, खदिर वृक्ष के उत्पाद, फूल और दूध देने से छूट मिली; गाँव सभी करों सहित आचार्य चनालस्वामी को दान हुआ।
  • समानताएँ: दोनों सूचियाँ स्थानीय उपज की हैं: जंगल, पेड़ और पशुओं से मिली चीज़ें (फूल दोनों में हैं)।
  • असमानताएँ: स्रोत 3 में लोग नाचते-गाते उपहार लाते हैं, "ठीक उसी तरह जैसे पराजित लोग विजयी का आदर करते हैं"; स्रोत 8 में प्रभावती गुप्त के आदेश से दंगुन गाँव को ऐसी चीज़ें देने के दायित्व से मुक्त किया गया, क्योंकि ये अग्रहार के लिए उपयुक्त रियायतें थीं (पृष्ठ 36, 41)।

9वर्णित काल में कृषि के तौर-तरीकों में किस हद तक परिवर्तन हुए?

लगभग 500 शब्दों में

जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
  • बदलाव की वजह: शासक राजकोष भरने के लिए बड़े-बड़े कर माँगते थे; करों की बढ़ती माँग पूरी करने के लिए किसानों ने उपज बढ़ाने के तरीके खोजे।
  • हल: छठी शताब्दी ई.पू. से गंगा और कावेरी की घाटियों के उर्वर कछारी क्षेत्रों में हल का प्रचलन फैला; भारी वर्षा वाले क्षेत्रों में लोहे के फाल वाले हलों से उपज बढ़ी।
  • धान की रोपाई: गंगा घाटी में धान की रोपाई से उपज बहुत बढ़ी, हालाँकि इसमें कमरतोड़ मेहनत लगती थी।
  • सिंचाई: कुओं, तालाबों और कहीं-कहीं नहरों से सिंचाई होने लगी; सिंचाई के साधन राजा या प्रभावशाली लोग भी बनवाते थे, जिनके काम अभिलेखों में दर्ज हैं। सुदर्शन झील (स्रोत 5) इसका उदाहरण है।
  • परिवर्तन की सीमा: लोहे के फाल वाले हल का उपयोग उपमहाद्वीप के कुछ ही भागों तक सीमित रहा; पंजाब और राजस्थान में यह बीसवीं सदी में आया। पूर्वोत्तर और मध्य पर्वतीय क्षेत्रों में कुदाल से खेती होती रही; हर्षचरित (स्रोत 7) में विंध्य के जंगल के किनारे के लोग कुदाल का प्रयोग करते हैं, क्योंकि घास से भरी भूमि में हल चलाना मुश्किल था।
  • समाज पर असर: नई तकनीक से उपज तो बढ़ी, पर इसका लाभ सबको बराबर नहीं मिला; भूमिहीन खेतिहर श्रमिक, छोटे किसान और बड़े ज़मींदार, ये भेद दिखने लगे। गहपति जैसे शब्द और संगम साहित्य के वेल्लालर, उल्वर और अणिमई यही भेद दिखाते हैं।
  • भूमिदान: ईसवी की आरंभिक शताब्दियों से भूमिदान हुए; इनसे नए क्षेत्रों में खेती फैली या शासकों का नियंत्रण कमज़ोर हुआ, इस पर इतिहासकारों में बहस है।
  • निष्कर्ष: खेती के तरीके कुछ उपजाऊ इलाकों में काफ़ी बदले, पर हर जगह नहीं (पृष्ठ 38–41)।

जाँच पड़ाव

  1. 1गंदतिन्दु जातक में प्रजा ने भेस बदलकर आए राजा से क्या शिकायत की?

  2. 2लोहे के फाल वाले हल का प्रयोग पंजाब और राजस्थान जैसे अर्धशुष्क क्षेत्रों में कब शुरू हुआ?

  3. 3आरंभिक तमिल संगम साहित्य में "उल्वर" किसे कहा गया है?

  4. 4प्रभावती गुप्त के अभिलेख से धर्मशास्त्रों की किस बात पर सवाल उठता है?

  5. 5भूमिदान पर इतिहासकारों के वाद-विवाद में एक मत यह है कि भूमिदान:

6नगर एवं व्यापार

इस पड़ाव का सवाल

छठी शताब्दी ई.पू. से उभरे नए नगरों में कौन रहते थे, व्यापार कहाँ तक जाता था, और सिक्कों से क्या पता चलता है?

पिछली बात से कड़ी गाँवों के साथ-साथ, छठी शताब्दी ई.पू. से लगभग पूरे उपमहाद्वीप में नए नगर भी उभरे।

  1. 6.1नए नगर
  2. 6.2नगरीय जनसंख्या: संभ्रांत वर्ग और शिल्पकार
  3. 6.3उपमहाद्वीप और उसके बाहर का व्यापार
  4. 6.4सिक्के और राजा

इस पड़ाव के आख़िर में: प्रश्न 1, 12

6.1नए नगरपृष्ठ 41–42

नए नगर (पृष्ठ 41–42)

  • लगभग छठी शताब्दी ई.पू. में उपमहाद्वीप के कई क्षेत्रों में नगर बने। ज़्यादातर नगर महाजनपदों की राजधानियाँ थे और प्राय: संचार मार्गों के किनारे बसे थे: पाटलिपुत्र नदीमार्ग पर, उज्जयिनी भूतल मार्ग पर, और पुहार समुद्रतट पर।
  • मथुरा जैसे शहर व्यावसायिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक गतिविधियों के जीवंत केंद्र थे।

पाटलिपुत्र की कहानी (पृष्ठ 42)

पाटलिपुत्र के इतिहास की ये बातें पहले से बाद के क्रम में लगाइए।

▲ पहले

  1. 1सातवीं सदी ई. में चीनी यात्री श्वैन त्सांग आया, तब यह नगर खंडहर था और इसकी जनसंख्या कम थी।
  2. 2पाँचवीं सदी ई.पू. में मगध के शासकों ने राजधानी राजगाह से यहाँ लाने का निर्णय किया।
  3. 3पाटलिग्राम नाम का एक गाँव।
  4. 4चौथी शताब्दी ई.पू. तक यह मौर्य साम्राज्य की राजधानी और एशिया के सबसे बड़े नगरों में से एक बन गया।

▼ बाद में

मानचित्र 3: कुछ महत्वपूर्ण राज्य और नगर (पृष्ठ 43)

किताब के पृष्ठ 43 वाला मानचित्र, हर नगर अपनी असली जगह पर। मोटे अक्षरों में राजवंश और राज्य हैं, बिंदु के साथ नगर। नीचे किसी नगर के नाम पर टैप कीजिए, मानचित्र पर वह नगर उभर आएगा।

कुषाणगुप्तशकवाकाटकसातवाहनचेरपांड्यचोलअरब सागरबंगाल की खाड़ीतक्षशिलामथुराकन्नौजश्रावस्तीवैशालीपाटलिपुत्रवाराणसीकौशाम्बीराजगीरमहास्थानविदिशाउज्जयिनीभरूकच्छचंद्रकेतुगढ़शिशुपालगढ़सोपारापैठनधान्यकटककोडुमनालपुहार

Relief map: Natural Earth (public domain). Places at their Wikipedia coordinates; Kodumanal from OpenStreetMap (© OpenStreetMap contributors).

किताब के किनारे का प्रश्न

किताब का मानचित्र 3 (पृष्ठ 43)

तीसरी सहस्राब्दि ई.पू. में हड़प्पा सभ्यता जिस क्षेत्र में फैली क्या वहाँ कोई नगर थे?

जवाब देखिए
  • मानचित्र 3 को अध्याय 1 के हड़प्पा वाले मानचित्र के साथ रखकर देखिए।
  • मानचित्र 3 के नगर हैं: तक्षशिला, मथुरा, कन्नौज, श्रावस्ती, वैशाली, पाटलिपुत्र, वाराणसी, कौशाम्बी, राजगीर, महास्थान, विदिशा, उज्जयिनी, भरूकच्छ, चंद्रकेतुगढ़, शिशुपालगढ़, सोपारा, पैठन, धान्यकटक, कोडूमनाल और पुहार।
  • इनमें से जो नगर हड़प्पा सभ्यता के फैलाव वाले क्षेत्र में पड़ते हैं, उनकी सूची बनाइए (पृष्ठ 43)।

6.2नगरीय जनसंख्या: संभ्रांत वर्ग और शिल्पकारपृष्ठ 42–43

नगरीय जनसंख्या: संभ्रांत वर्ग और शिल्पकार (पृष्ठ 42–43)

  • हड़प्पा के शहरों से भिन्न, इन नगरों के अधिकांश स्थलों पर व्यापक रूप से खुदाई करना संभव नहीं है, क्योंकि वहाँ आज भी लोग रहते हैं।
  • फिर भी कई तरह के पुरावशेष मिले हैं: उत्तरी कृष्ण मार्जित पात्र (चमकदार कलई वाले उत्कृष्ट कटोरे और थालियाँ, जो शायद अमीर लोग इस्तेमाल करते थे), और सोने, चाँदी, कांस्य, ताँबे, हाथी दाँत और शीशे के गहने, उपकरण, हथियार, बर्तन, साथ में सीप और पक्की मिट्टी की चीज़ें।
  • द्वितीय शताब्दी ई.पू. तक कई नगरों में छोटे दानात्मक अभिलेख मिलते हैं, जिनमें दाता के नाम के साथ प्राय: उसका व्यवसाय भी लिखा होता है।

दानात्मक अभिलेखों में लिखे व्यवसाय

  • धोबी
  • बुनकर
  • लिपिक
  • बढ़ई
  • कुम्हार
  • स्वर्णकार
  • लौहकार
  • अधिकारी
  • धार्मिक गुरु
  • व्यापारी
  • राजा

किताब के चित्र 2.6 में मथुरा की एक मूर्ति है, जिसे स्वर्णकार धर्मक की पत्नी नागपिया ने एक धार्मिक स्थल में स्थापित किया था (पृष्ठ 42)।

हो सकता है शिल्पकारों ने नगर के संभ्रांत लोगों की बढ़ती माँग पूरी करने के लिए कई तरह के लौह उपकरणों का प्रयोग किया हो (पृष्ठ 43)।

6.3उपमहाद्वीप और उसके बाहर का व्यापारपृष्ठ 43–44

उपमहाद्वीप और उसके बाहर का व्यापार (पृष्ठ 43–44)

  • छठी शताब्दी ई.पू. से नदी मार्गों और भूमार्गों का जाल बिछ गया था। भू-मार्ग मध्य एशिया और उससे आगे तक जाते थे। समुद्री मार्ग अरब सागर से उत्तरी अफ़्रीका और पश्चिम एशिया तक, और बंगाल की खाड़ी से चीन और दक्षिणपूर्व एशिया तक जाते थे।
  • शासक इन मार्गों पर नियंत्रण चाहते थे, और शायद सुरक्षा के बदले व्यापारियों से धन लेते थे।
  • व्यापारियों में पैदल फेरी वाले, बैलगाड़ी और घोड़े-खच्चरों के दल वाले, और समुद्री यात्री थे; समुद्र का रास्ता खतरनाक था, पर लाभदायक।
  • नमक, अनाज, कपड़ा, धातु और धातु के उत्पाद, पत्थर, लकड़ी और जड़ी-बूटी एक जगह से दूसरी जगह जाते थे। रोमन साम्राज्य में काली मिर्च जैसे मसालों, कपड़ों और जड़ी-बूटियों की भारी माँग थी।

स्रोत 9: मालाबार तट (पृष्ठ 44)

यह एक यूनानी समुद्र यात्री की रचना पेरिप्लस ऑफ़ एरीथ्रियन सी (लगभग प्रथम शताब्दी ई.) का अंश है। पेरिप्लस का अर्थ समुद्री यात्रा है, और एरीथ्रियन यूनानी में लाल सागर को कहते हैं।

विदेशी व्यापारी काली मिर्च और दाल चीनी खरीदने के लिए जहाज़ भेजते थे। यहाँ सिक्कों, पुखराज, सुरमा, मूँगे, कच्चे शीशे, ताँबे, टिन और सीसे का आयात होता था, और काली मिर्च का निर्यात। मोती, हाथी दाँत, रेशमी वस्त्र और हीरों जैसी कीमती चीज़ों का भी ज़िक्र है।

किताब के किनारे का प्रश्न

लेखक ने यह सूची क्यों तैयार की थी?

जवाब देखिए
  • पेरिप्लस एक यूनानी समुद्र यात्री की रचना है, और पेरिप्लस का अर्थ ही समुद्री यात्रा है।
  • सूची बताती है कि मालाबार के बाज़ारों में क्या लाया जाता है और वहाँ से क्या ले जाया जा सकता है, जैसे भारी मात्रा में काली मिर्च।
  • इसलिए संभव है कि यह सूची समुद्र के रास्ते व्यापार करने वाले व्यापारियों और नाविकों के काम आने के लिए बनी हो। सोचिए, ऐसी जानकारी किसके लिए सबसे उपयोगी होती (पृष्ठ 44)।

6.4सिक्के और राजापृष्ठ 44–45

सिक्कों का क्रम: पहले कौन, बाद में कौन?

किताब में सिक्कों की ये बातें आती हैं। इन्हें समय के क्रम में लगाइए।

▲ पहले

  1. 1कुषाणों ने सोने के सिक्के बड़े पैमाने पर जारी किए (प्रथम शताब्दी ई.)।
  2. 2सोने के सिक्के कम मिलने लगते हैं (छठी शताब्दी ई. से)।
  3. 3चाँदी और ताँबे के आहत सिक्के ढाले गए (छठी शताब्दी ई.पू.)।
  4. 4गुप्त शासकों ने सोने के सबसे भव्य सिक्कों में से कुछ जारी किए (गुप्त शासन का आरंभ लगभग 320 ई.)।
  5. 5हिंद-यूनानी शासकों ने शासक की प्रतिमा और नाम वाले सबसे पहले सिक्के जारी किए (द्वितीय शताब्दी ई.पू.)।

▼ बाद में

सिक्के और राजा (पृष्ठ 44–45)

आहत सिक्के
चाँदी और ताँबे के, छठी शताब्दी ई.पू. से; पूरे उपमहाद्वीप में मिले हैं। इनके प्रतीकों को मौर्य जैसे राजवंशों के प्रतीकों से मिलाने पर पता चला कि ये राजाओं ने जारी किए; हो सकता है व्यापारियों, धनपतियों और नागरिकों ने भी कुछ सिक्के जारी किए हों।
हिंद-यूनानी सिक्के
शासक की प्रतिमा और नाम वाले सबसे पहले सिक्के। हिंद-यूनानी शासकों ने द्वितीय शताब्दी ई.पू. में उपमहाद्वीप के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र पर नियंत्रण किया।
कुषाणों के सोने के सिक्के
बड़े पैमाने पर प्रथम शताब्दी ई. में जारी हुए; इनका आकार और वज़न रोमन सम्राटों और ईरान के पार्थियन शासकों के सिक्कों के बिलकुल समान था। ये उत्तर और मध्य भारत के कई पुरास्थलों पर मिले हैं।
रोमन सिक्के
दक्षिण भारत के कई पुरास्थलों से बड़ी संख्या में मिले हैं। यानी व्यापार राजनीतिक सीमाओं से बँधा नहीं था।
यौधेयों के सिक्के
यौधेय (प्रथम शताब्दी ई.) पंजाब और हरियाणा के कबायली गणराज्य थे। इनके ताँबे के सिक्के हज़ारों की संख्या में मिले हैं, जिनसे व्यापार में उनकी रुचि और सहभागिता दिखती है।
गुप्तों के सोने के सिक्के
सोने के सबसे भव्य सिक्कों में से कुछ; आरंभिक सिक्कों का सोना अति उत्तम था, और इनसे दूर देशों से व्यापार आसान हुआ।
चाँदी के आहत सिक्के के दोनों ओर

सिक्का: मौर्य काल का चाँदी का एक आहत सिक्का, दोनों ओर से।

Jean-Michel Moullec. Image: Wikimedia Commons, CC BY 2.0.

हिंद-यूनानी राजा मेनाण्डर का चाँदी का सिक्का

सिक्का: हिंद-यूनानी राजा मेनाण्डर का चाँदी का एक सिक्का।

StAnselm. Image: Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0.

यौधेयों के ताँबे के कुछ सिक्के

सिक्के: यौधेयों के ताँबे के सिक्के; INHCRF सिक्का संग्रहालय, नासिक।

SpeakingArch. Image: Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0.

छठी शताब्दी ई. से सोने के सिक्के कम क्यों मिलते हैं? (पृष्ठ 45)

कुछ इतिहासकार

रोमन साम्राज्य के पतन के बाद दूरवर्ती व्यापार घट गया।

दूसरे इतिहासकार

इस काल में नए नगर और व्यापार के नए तंत्र उभरे, और अभिलेखों और ग्रंथों में सिक्कों का उल्लेख होता रहा। हो सकता है सिक्के इसलिए कम मिलते हों कि वे प्रचलन में थे और किसी ने उन्हें जमा करके नहीं रखा।

चर्चा कीजिए

आपका लिखा इसी ब्राउज़र में रहता है।

जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
  • विनिमय के साधन: चाँदी और ताँबे के आहत सिक्के; कुषाणों और गुप्तों के सोने के सिक्के; यौधेयों के ताँबे के सिक्के; दक्षिण भारत में मिले रोमन सिक्के।
  • स्रोतों से पता चलने वाले विनिमय: मालाबार में सिक्कों और कई वस्तुओं के बदले काली मिर्च जैसी उपज का व्यापार (स्रोत 9); सरदार को दी जाने वाली भेंट (स्रोत 3); जंगल की उपज गाँवों में बेचना (स्रोत 7)।
  • जो पता नहीं चलता: पशुपालक, संग्राहक, शिकारी, मछुआरे और शिल्पकार जैसे लोग अपने जीवन और आदान-प्रदान के विवरण सामान्यत: नहीं रखते थे, इसलिए उनके विनिमय का ज्ञान स्रोतों से कम मिलता है (पृष्ठ 36, 40–41, 44–45)।

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Live Discussion on - इतिहास के साक्ष्य के रूप में सिक्केचलाइए
NCERT OFFICIAL: इतिहास के साक्ष्य के रूप में सिक्कों पर NCERT की लाइव चर्चा।यूट्यूब पर देखिए

किताब के अपने प्रश्न

1आरंभिक ऐतिहासिक नगरों में शिल्पकला के उत्पादन के प्रमाणों की चर्चा कीजिए। हड़प्पा के नगरों के प्रमाण से ये प्रमाण कितने भिन्न हैं?

लगभग 100 से 150 शब्दों में

जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
  • पुरावशेष: उत्कृष्ट श्रेणी के मिट्टी के कटोरे और थालियाँ, जिन पर चमकदार कलई चढ़ी है (उत्तरी कृष्ण मार्जित पात्र), जिनका उपयोग संभवत: अमीर लोग करते थे; साथ ही सोने, चाँदी, कांस्य, ताँबे, हाथी दाँत और शीशे के गहने, उपकरण, हथियार और बर्तन, और सीप व पक्की मिट्टी की वस्तुएँ।
  • लिखे हुए प्रमाण: द्वितीय शताब्दी ई.पू. से छोटे दानात्मक अभिलेख, जिनमें दाता के नाम के साथ उसका व्यवसाय भी लिखा होता है: धोबी, बुनकर, लिपिक, बढ़ई, कुम्हार, स्वर्णकार, लौहकार। उत्पादकों और व्यापारियों के संघ श्रेणी का भी उल्लेख है, जो शायद कच्चा माल खरीदकर सामान बनाती और बेचती थी।
  • इन नगरों के बारे में किताब बताती है कि हड़प्पा शहरों से भिन्न, इनके अधिकांश स्थलों पर व्यापक रूप से खुदाई करना संभव नहीं है, क्योंकि वहाँ आज भी लोग रहते हैं; फिर भी यहाँ पुरावशेषों के साथ दाताओं के अपने अभिलेख भी मिले हैं, जो शिल्पकारों के नाम और काम बताते हैं (पृष्ठ 42–43)।
  • हड़प्पा के शहरों में शिल्प का पता पुरावशेषों से चलता है: कच्चा माल, औज़ार, अधूरी वस्तुएँ, त्यागा हुआ माल और कूड़ा, जैसे चन्हुदड़ो में मनके बनाने के प्रमाण; और हड़प्पा लिपि अब तक पढ़ी नहीं जा सकी है (अध्याय 1)।

12आज प्रचलित पाँच विभिन्न नोटों और सिक्कों को इकट्ठा कीजिए। इनके दोनों ओर आप जो देखते हैं उनका वर्णन कीजिए। इन पर बने चित्रों, लिपियों और भाषाओं, माप, आकार या अन्य समानताओं और असमानताओं के बारे में एक रिपोर्ट तैयार कीजिए। इस अध्याय में दर्शित सिक्कों में प्रयुक्त सामग्रियों, तकनीकों, प्रतीकों, उनके महत्त्व और सिक्कों के संभावित कार्य की चर्चा करते हुए इनकी तुलना कीजिए।

परियोजना कार्य (कोई एक)

जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
  • यह भी आपकी अपनी खोज की परियोजना है; आपके नोट और सिक्के ही आपकी रिपोर्ट का आधार होंगे। नीचे काम करने का तरीका है।
  • पाँच अलग नोट या सिक्के लीजिए। हर एक के दोनों ओर का चित्र बनाइए या ध्यान से वर्णन कीजिए।
  • एक तालिका बनाइए: मूल्य, धातु या कागज़, आकार और माप, चित्र और प्रतीक, लिपियाँ और भाषाएँ, जारी करने वाले का नाम।
  • सामग्री से तुलना: आहत सिक्के चाँदी और ताँबे के (चित्र 2.7); कुषाणों (चित्र 2.4) और गुप्तों (चित्र 2.9) के सोने के सिक्के; यौधेयों के ताँबे के सिक्के (चित्र 2.8)।
  • तकनीक: 'आहत' नाम से ही पता चलता है कि इन सिक्कों पर प्रतीकों को आहत करके, यानी ठोककर, बनाया जाता था (चित्र 2.7)।
  • प्रतीक, चित्र और लिपि: हिंद-यूनानी सिक्कों पर पहली बार शासक का नाम और चित्र (चित्र 2.12), और नाम यूनानी और खरोष्ठी दोनों में; कुषाण सिक्के पर एक ओर राजा, दूसरी ओर देवता (चित्र 2.4)।
  • कार्य: सिक्कों से विनिमय और लंबी दूरी का व्यापार आसान हुआ; यौधेयों के हज़ारों ताँबे के सिक्के व्यापार में उनकी रुचि दिखाते हैं।
  • प्रस्तुति: तालिका, चित्र और एक पृष्ठ की रिपोर्ट, जिसमें लिखिए कि आज के और पुराने सिक्कों में क्या एक जैसा है (जारी करने वाले की पहचान, प्रतीक) और क्या अलग (सामग्री, लिपियाँ, बनाने की तकनीक) (पृष्ठ 44–47)।

जाँच पड़ाव

  1. 1छठी शताब्दी ई.पू. के नए नगरों के बारे में किताब क्या कहती है?

  2. 2इन नगरों के अधिकांश स्थलों पर व्यापक खुदाई क्यों संभव नहीं है?

  3. 3शासक की प्रतिमा और नाम वाले सबसे पहले सिक्के किसने जारी किए?

  4. 4दक्षिण भारत के कई पुरास्थलों से बड़ी संख्या में मिले रोमन सिक्कों से क्या पता चलता है?

  5. 5यौधेय कौन थे?

7मूल बातें: लिपियाँ कैसे पढ़ी गईं

इस पड़ाव का सवाल

ब्राह्मी और खरोष्ठी लिपियाँ कैसे पढ़ी गईं, और अभिलेखों से इतिहासकार क्या-क्या निकालते हैं?

पिछली बात से कड़ी राजाओं, गाँवों और नगरों की बहुत-सी बातें आपने अभिलेखों से जानीं: असोक के अभिलेख, प्रशस्ति, भूमिदान और दान के अभिलेख। यह पड़ाव बताता है कि ये अभिलेख पढ़े कैसे गए।

  1. 7.1ब्राह्मी लिपि का अध्ययन
  2. 7.2खरोष्ठी लिपि को कैसे पढ़ा गया?
  3. 7.3अभिलेखों से प्राप्त ऐतिहासिक साक्ष्य

इस पड़ाव के आख़िर में: प्रश्न 5

7.1ब्राह्मी लिपि का अध्ययनपृष्ठ 46

ब्राह्मी लिपि का अध्ययन (पृष्ठ 46)

  • आधुनिक भारतीय भाषाओं की लगभग सभी लिपियों का मूल ब्राह्मी है, और असोक के अभिलेख भी इसी लिपि में हैं।
  • अट्ठारहवीं सदी से यूरोपीय विद्वानों ने भारतीय पंडितों की सहायता से बंगाली और देवनागरी लिपि की पांडुलिपियों के अक्षरों की तुलना प्राचीन अक्षरों से की।
  • शुरू के विद्वान कई बार मान बैठे कि अभिलेख संस्कृत में हैं, जबकि प्राचीनतम अभिलेख प्राकृत में थे।
  • कई दशकों के परिश्रम के बाद जेम्स प्रिंसेप ने 1838 ई. में असोककालीन ब्राह्मी का अर्थ निकाला।

किताब के किनारे का प्रश्न

किताब का चित्र 2.11 (पृष्ठ 46)

क्या कुछ देवनागरी अक्षर ब्राह्मी से मिलते-जुलते हैं? क्या कुछ भिन्न भी हैं?

जवाब देखिए
  • किताब के चित्र 2.11 में ब्राह्मी अक्षरों के साथ उनके देवनागरी रूप दिए हैं।
  • एक-एक अक्षर मिलाइए और दो सूचियाँ बनाइए: जो मिलते-जुलते हैं और जो अलग हैं।
  • संकेत: आधुनिक भारतीय भाषाओं की लगभग सभी लिपियों का मूल ब्राह्मी है, इसलिए कुछ अक्षरों में समानता दिखनी चाहिए (पृष्ठ 46)।

7.2खरोष्ठी लिपि को कैसे पढ़ा गया?पृष्ठ 46–47

खरोष्ठी लिपि को कैसे पढ़ा गया? (पृष्ठ 46–47)

  • खरोष्ठी पश्चिमोत्तर के अभिलेखों की लिपि है।
  • इस क्षेत्र के हिंद-यूनानी राजाओं (लगभग द्वितीय–प्रथम शताब्दी ई.पू.) के सिक्कों पर राजाओं के नाम यूनानी और खरोष्ठी, दोनों लिपियों में लिखे हैं। यूनानी पढ़ने वाले यूरोपीय विद्वानों ने दोनों के अक्षर मिलाए, जैसे अपोलोडोटस के नाम में।
  • प्रिंसेप पहले ही खरोष्ठी अभिलेखों की भाषा प्राकृत पहचान चुके थे, इसलिए लंबे अभिलेख पढ़ना सरल हो गया।

कौन-सी लिपि कैसे पढ़ी गई?

हर तरीके को उस लिपि के खाने में रखिए जिसे पढ़ने में वह काम आया (पृष्ठ 46–47)।

साँची के स्तूप की रेलिंग पर खुदे अभिलेखों की छपी प्लेट

अभिलेख: साँची के स्तूप 1 की रेलिंग पर खुदे अभिलेख; 1920 में छपी प्लेट।

Ramaprasad Chanda, Memoirs of the Archaeological Survey of India (1920). Image: Wikimedia Commons, public domain.

गिरनार के असोक अभिलेख की छपी प्रतिकृति

अभिलेख: गिरनार (जूनागढ़, गुजरात) में असोक का महाशिलालेख 13; 1877 में छपी प्रतिकृति।

Alexander Cunningham, Corpus Inscriptionum Indicarum vol. 1 (1877). Image: Wikimedia Commons, public domain.

खरोष्ठी लिपि में असोक के अभिलेखों की छपी प्लेट

अभिलेख: शहबाज़गढ़ी में असोक के अभिलेख 7 और 12, खरोष्ठी लिपि में; 1925 में छपी प्लेट।

E. Hultzsch, Inscriptions of Asoka (1925). Image: Wikimedia Commons, public domain.

7.3अभिलेखों से प्राप्त ऐतिहासिक साक्ष्यपृष्ठ 47–48

अभिलेखों से प्राप्त ऐतिहासिक साक्ष्य (पृष्ठ 47–48)

  • स्रोत 10 में असोक का नाम नहीं है, केवल उपाधियाँ हैं: देवानांपिय (देवताओं का प्रिय) और पियदस्सी (देखने में सुंदर)। असोक नाम दूसरे अभिलेखों में इन उपाधियों के साथ मिलता है।
  • विषय, शैली, भाषा और पुरालिपिविज्ञान में समानता देखकर अभिलेखशास्त्रियों ने माना कि ये सब अभिलेख एक ही शासक ने बनवाए।
  • असोक कहते हैं कि उनसे पहले के शासकों ने रिपोर्ट एकत्र करने की व्यवस्था नहीं की थी। ऐसे हर कथन को इतिहासकार परखते हैं: सत्य है, संभव है या अतिशयोक्तिपूर्ण।
  • अर्थ साफ़ करने के लिए अभिलेखशास्त्री कुछ शब्द ब्रैकेट में जोड़ते हैं; यह बड़े ध्यान से करना पड़ता है, ताकि लेखक का मूल अर्थ न बदले।

स्रोत 10: राजा के आदेश (पृष्ठ 47)

राजा चाहते हैं कि पतिवेदक लोगों के समाचार उन तक हर समय पहुँचाएँ, चाहे वे खाना खा रहे हों, अंत:पुर, विश्राम कक्ष या गोशाला में हों, पालकी में ले जाए जा रहे हों या वाटिका में हों।

किताब के किनारे का प्रश्न

अभिलेखशास्त्रियों ने पतिवेदक शब्द का अर्थ संवाददाता बताया है। आधुनिक संवाददाता की तुलना में पतिवेदक के दायित्व कितने भिन्न रहे होंगे?

जवाब देखिए
  • स्रोत 10 में पतिवेदक को लोगों के समाचार सीधे राजा तक पहुँचाने थे, और वह भी हर समय, चाहे राजा खाना खा रहे हों, अंत:पुर, विश्राम कक्ष या गोशाला में हों, पालकी में हों या वाटिका में।
  • यानी वह राजा का अधिकारी था, जिसका काम शासन के लिए सूचना देना था।
  • आज का संवाददाता समाचार अखबार, रेडियो या टीवी के ज़रिए आम जनता तक पहुँचाता है।
  • सोचिए: दोनों किसके प्रति जवाबदेह हैं, और समाचार किसके काम आता है (पृष्ठ 47)।

स्रोत 11: राजा की वेदना (पृष्ठ 48)

शासन के आठ वर्ष पूरे होने पर असोक ने कलिंग (आधुनिक तटवर्ती उड़ीसा) पर विजय पाई। अभिलेख कहता है: "डेढ़ लाख पुरुषों को निष्कासित किया गया; एक लाख मारे गए और इससे भी ज़्यादा की मृत्यु हुई"।

इसके बाद देवानांपिय धम्म में डूब गए; यही कलिंग विजय का पश्चाताप है। इसकी व्याख्या प्राय: असोक की वेदना के प्रतिबिंब के रूप में की जाती है; साथ ही यह युद्ध के प्रति उनकी मनोवृत्ति में परिवर्तन को भी दर्शाता है।

पर एक उलझन है: असोक के अभिलेख आधुनिक उड़ीसा से मिले हैं, फिर भी वेदना वाला यह अभिलेख वहाँ, यानी जीते गए क्षेत्र में, नहीं मिला।

इतिहासकारों के कुछ और सवाल (पृष्ठ 48)

क्या राह चलते लोग रुककर अभिलेख पढ़ते थे, जबकि अधिकांश लोग प्राय: पढ़े-लिखे नहीं थे? क्या पाटलिपुत्र की प्राकृत हर जगह समझी जाती थी? क्या राजा के आदेश माने जाते थे? किताब कहती है कि इनके उत्तर पाना सदा आसान नहीं।

चर्चा कीजिए

आपका लिखा इसी ब्राउज़र में रहता है।

जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
  • मानचित्र 2 में तीन तरह के प्राप्ति स्थान हैं: महाशिलालेख (जैसे गिरनार, कलसी, शहबाज़गढ़ी, मानसेहरा, जौगड़), लघुशिलालेख (जैसे बैराट, भाब्रू, मास्की, ब्रह्मगिरि) और स्तंभ अभिलेख (जैसे सारनाथ, कौशाम्बी, टोपरा, मेरठ, रामपुरवा, साँची)।
  • देखिए कि (क) हर प्रकार के अभिलेख कहाँ-कहाँ हैं; (ख) क्या वे राजधानी पाटलिपुत्र और प्रांतीय केंद्रों तक्षशिला और उज्जयिनी के आसपास हैं; (ग) क्या वे व्यापार मार्गों के पास हैं। फिर तय कीजिए कि कोई एक-सा प्रारूप दिखता है या नहीं।
  • एक संकेत: कलिंग विजय की वेदना वाला अभिलेख उस विजित क्षेत्र में नहीं मिला (पृष्ठ 32–33, 48)।

किताब के अपने प्रश्न

5अभिलेखशास्त्रियों की कुछ समस्याओं की सूची बनाइए।

लगभग 100 से 150 शब्दों में

जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
  • तकनीकी सीमा: कुछ अक्षर बहुत हलके खुदे होते हैं, जिन्हें पढ़ना कठिन है; अभिलेख नष्ट भी हो सकते हैं, जिससे अक्षर लुप्त हो जाते हैं (पृष्ठ 48)।
  • शब्दों के अर्थ: सही अर्थ जानना सदा सरल नहीं, क्योंकि कुछ अर्थ किसी खास स्थान या समय से जुड़े होते हैं; विद्वान इन्हें पढ़ने की वैकल्पिक विधियों पर चर्चा करते रहते हैं (पृष्ठ 48)।
  • ब्रैकेट के शब्द: अर्थ साफ़ करने के लिए अभिलेखशास्त्री कुछ शब्द ब्रैकेट में जोड़ते हैं, और यह बड़े ध्यान से करना पड़ता है, ताकि लेखक का मूल अर्थ न बदले (पृष्ठ 47)।
  • संख्या: कई हज़ार अभिलेख मिले हैं, पर सबके अर्थ नहीं निकले, न सब प्रकाशित या अनूदित हुए। अनेक अभिलेख रहे होंगे जो कालांतर में सुरक्षित नहीं बचे; जो उपलब्ध हैं, वे संभवत: कुल अभिलेखों के अंश मात्र हैं (पृष्ठ 48)।
  • एक और मौलिक समस्या: जिसे आज हम राजनीतिक और आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण मानते हैं, जैसे खेती की दैनिक प्रक्रियाएँ, वह प्राय: दर्ज नहीं है; और अभिलेख बनवाने वालों का ही दृष्टिकोण बताते हैं, इसलिए उनके दावे परखने पड़ते हैं, जैसे असोक का यह दावा कि उनसे पहले के शासकों ने रिपोर्ट एकत्र करने की व्यवस्था नहीं की थी (पृष्ठ 47–49)।

जाँच पड़ाव

  1. 1जेम्स प्रिंसेप ने असोककालीन ब्राह्मी का अर्थ किस वर्ष निकाला?

  2. 2खरोष्ठी लिपि पढ़ने में किस चीज़ ने सबसे अधिक मदद की?

  3. 3स्रोत 10 में असोक का नाम नहीं है। फिर अभिलेखशास्त्रियों ने कैसे माना कि ये अभिलेख असोक के हैं?

  4. 4कलिंग विजय की वेदना वाले अभिलेख के बारे में कौन-सी उलझन किताब बताती है?

8अभिलेख साक्ष्य की सीमा

इस पड़ाव का सवाल

अभिलेखों से हम क्या नहीं जान पाते, और क्यों?

पिछली बात से कड़ी लिपियाँ पढ़ ली गईं, और अभिलेखों से बहुत कुछ पता चला। पर किताब यह भी बताती है कि अभिलेखों से मिलने वाली जानकारी की सीमाएँ हैं।

इस पड़ाव के आख़िर में: प्रश्न 7, 11

किताब अभिलेखों की ये सीमाएँ बताती है (पृष्ठ 48–49)

तकनीकी सीमा, और शब्दों के अर्थ
कभी-कभी अक्षर हलके ढंग से उत्कीर्ण होते हैं, जिन्हें पढ़ना मुश्किल होता है; अभिलेख नष्ट भी हो सकते हैं, जिनसे अक्षर लुप्त हो जाते हैं। शब्दों के वास्तविक अर्थ जानना भी सदा सरल नहीं, क्योंकि कुछ अर्थ किसी विशेष स्थान या समय से जुड़े होते हैं; विद्वान इनके पढ़ने की वैकल्पिक विधियों पर चर्चा करते रहते हैं।
सब अभिलेख पढ़े, छपे या अनूदित नहीं, और अनेक सुरक्षित नहीं बचे होंगे
कई हज़ार अभिलेख मिले हैं, पर सबके अर्थ नहीं निकाले जा सके हैं, न सब प्रकाशित या अनूदित हुए हैं। किताब कहती है: "अनेक अभिलेख रहे होंगे जो कालांतर में सुरक्षित नहीं बचे हैं", और जो अभी उपलब्ध हैं, वे "संभवत: कुल अभिलेखों के अंश मात्र हैं"।
एक और मौलिक समस्या
जिसे हम आज राजनीतिक और आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण मानते हैं, ज़रूरी नहीं कि वह अभिलेखों में अंकित किया ही गया हो। खेती की दैनिक प्रक्रियाएँ और रोज़मर्रा की ज़िंदगी के सुख-दुख इनमें नहीं मिलते, क्योंकि अभिलेख प्राय: बड़े और विशेष अवसरों का वर्णन करते हैं। और अभिलेख हमेशा उन्हीं व्यक्तियों के विचार व्यक्त करते हैं जो उन्हें बनवाते थे।

अभिलेखों की सीमा: सही या गलत?

  1. कुछ अभिलेखों के अक्षर हलके खुदे होते हैं, इसलिए उन्हें पढ़ना मुश्किल होता है।

  2. अभिलेखों के हर शब्द का अर्थ हर स्थान और हर समय में एक ही रहा है।

  3. अब तक मिले सभी अभिलेखों के अर्थ निकाले जा चुके हैं, और सब प्रकाशित हो चुके हैं।

  4. जो अभिलेख आज उपलब्ध हैं, वे संभवत: कुल अभिलेखों के अंश मात्र हैं।

  5. खेती की दैनिक प्रक्रियाएँ और रोज़मर्रा की ज़िंदगी के सुख-दुख अभिलेखों में खूब लिखे गए।

  6. अभिलेख हमेशा उन्हीं व्यक्तियों के विचार व्यक्त करते हैं जो उन्हें बनवाते थे।

किताब का निष्कर्ष (पृष्ठ 49)

  • किताब कहती है: "राजनीतिक और आर्थिक इतिहास का पूर्ण ज्ञान मात्र अभिलेखशास्त्र से ही नहीं मिलता है।"
  • उन्नीसवीं सदी के आखिरी दशकों और बीसवीं सदी के प्रारंभ में इतिहासकारों की रुचि मुख्य रूप से राजाओं में थी; बीसवीं सदी के मध्य से आर्थिक परिवर्तन और सामाजिक समुदायों का उदय महत्वपूर्ण बने; हाल के दशकों में हाशिए पर रहे समुदायों में रुचि बढ़ी है।

किताब के अपने प्रश्न

7यह बीसवीं शताब्दी के एक सुविख्यात अभिलेखशास्त्री, डी.सी. सरकार का वक्तव्य है: भारतीयों के जीवन, संस्कृति, और गतिविधियों का ऐसा कोई पक्ष नहीं है जिसका प्रतिबिंब अभिलेखों में नहीं है: चर्चा कीजिए।

लगभग 500 शब्दों में

जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
  • भूमिका: इस अध्याय के अभिलेख सचमुच जीवन के बहुत से पक्ष दिखाते हैं, पर किताब उनकी सीमाएँ भी बताती है।
  • राजा और राजनीति: राजाओं के नाम और उपाधियाँ (देवानांपिय, पियदस्सी), युद्ध और विजय (स्रोत 11), और राजा की प्रशंसा (प्रयाग प्रशस्ति, स्रोत 4)।
  • प्रशासन, धर्म और नीति: असोक के अभिलेखों में पाँच केंद्रों का उल्लेख; पतिवेदक (स्रोत 10); असोक का धम्म।
  • खेती, गाँव और भूमि: सुदर्शन झील के बनने और मरम्मत का ब्योरा (स्रोत 5); भूमिदान, अग्रहार, और गाँव के दायित्वों से छूट (स्रोत 8)।
  • नगर, शिल्प और स्त्रियाँ: दानात्मक अभिलेखों में धोबी, बुनकर, लिपिक, बढ़ई, कुम्हार, स्वर्णकार, लौहकार, व्यापारी; श्रेणी का उल्लेख; प्रभावती गुप्त का भूमिदान; नागपिया की भेंट (चित्र 2.6)।
  • भाषा और लिपि: प्राकृत, संस्कृत, तमिल; अक्षरों की बनावट से तिथि का अनुमान।
  • कथन की सीमाएँ: हलके या टूटे अक्षर और स्थान-समय से जुड़े अर्थ; सब अभिलेख पढ़े, प्रकाशित या अनूदित नहीं, और अनेक अभिलेख रहे होंगे जो कालांतर में सुरक्षित नहीं बचे; खेती की दैनिक प्रक्रियाएँ और रोज़ के सुख-दुख प्राय: नहीं मिलते; अभिलेख बनवाने वालों के ही विचार बताते हैं; पशुपालक, शिकारी, मछुआरे जैसे लोग अपने विवरण नहीं रखते थे।
  • निष्कर्ष: अभिलेखों में जीवन के बहुत से पक्षों की झलक है, इसलिए डी.सी. सरकार के कथन में दम है। पर किताब का निष्कर्ष है कि राजनीतिक और आर्थिक इतिहास का पूर्ण ज्ञान मात्र अभिलेखशास्त्र से ही नहीं मिलता; अभिलेखों को ग्रंथों, सिक्कों और पुरावशेषों के साथ मिलाकर पढ़ना पड़ता है (पृष्ठ 32, 37–43, 47–49)।

11एक महीने के अखबार एकत्रित कीजिए। सरकारी अधिकारियों द्वारा सार्वजनिक कार्यों के बारे में दिए गए वक्तव्यों को काटकर एकत्रित कीजिए। समीक्षा कीजिए कि इन परियोजनाओं के लिए आवश्यक संसाधनों के बारे में खबरों में क्या लिखा है। संसाधनों को किस प्रकार से एकत्र किया जाता है और परियोजनाओं का उद्देश्य क्या है। इन वक्तव्यों को कौन जारी करता है और उन्हें क्यों और कैसे प्रसारित किया जाता है? इस अध्याय में चर्चित अभिलेखों के साक्ष्यों से इनकी तुलना कीजिए। आप इनमें क्या समानताएँ और असमानताएँ पाते हैं?

परियोजना कार्य (कोई एक)

जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
  • यह आपकी अपनी खोज की परियोजना है; नतीजे आपकी कतरनों पर निर्भर करेंगे। नीचे काम करने का तरीका है।
  • एक महीने तक रोज़ का अखबार रखिए और सड़क, पुल, नहर, तालाब, स्कूल जैसे सार्वजनिक कार्यों पर सरकारी वक्तव्यों की कतरनें काटिए। हर कतरन पर तारीख और अखबार का नाम लिखिए।
  • हर कतरन के लिए एक तालिका भरिए: कार्य क्या है, उद्देश्य क्या बताया गया, पैसा और दूसरे संसाधन कहाँ से आएँगे, वक्तव्य किसने जारी किया, किस माध्यम से फैलाया गया।
  • अब अध्याय के अभिलेखों से तुलना कीजिए। सुदर्शन झील वाला अभिलेख (स्रोत 5) बताता है कि झील किसने बनवाई और किसने मरम्मत करवाई; बताया जाता है कि रुद्रदमन ने प्रजा से कर लिए बिना, अपने खर्च से मरम्मत करवाई थी। असोक के अभिलेख राजा के संदेश प्रजा तक पहुँचाने के लिए पत्थरों और स्तंभों पर खुदवाए गए।
  • समानताएँ और असमानताएँ दो स्तंभों में लिखिए, जैसे: दोनों में काम करवाने वाले की प्रशंसा होती है या नहीं; दोनों किसके दृष्टिकोण से लिखे हैं; दोनों तक आम लोगों की पहुँच कैसी है; अखबार रोज़ बदलता है, अभिलेख स्थायी था।
  • प्रस्तुति: कतरनों की फ़ाइल, एक तालिका और एक पृष्ठ का निष्कर्ष (पृष्ठ 38, 47–49)।

जाँच पड़ाव

  1. 1किताब के अनुसार आज उपलब्ध अभिलेख कुल अभिलेखों का कितना हिस्सा हैं?

  2. 2अभिलेखों में खेती की दैनिक प्रक्रियाएँ और रोज़मर्रा के सुख-दुख क्यों नहीं मिलते?

  3. 3अभिलेख किसके विचार व्यक्त करते हैं?

सारसार और काल-रेखा

पूरा अध्याय तीन बातों में

  • राजनीति: सोलह महाजनपदों में मगध सबसे शक्तिशाली बना, फिर मौर्य साम्राज्य बना। मौर्यों के बाद राजाओं ने ऊँची स्थिति पाने के नए तरीके अपनाए।
  • देहात और नगर: खेती में हल, लोहे के फाल, धान की रोपाई और सिंचाई आई; गाँवों में भूमिहीन से लेकर बड़े ज़मींदार तक थे। नगरों में शिल्पकार, व्यापारी और श्रेणियाँ थीं, और व्यापार उपमहाद्वीप के बाहर तक जाता था।
  • स्रोत: यह सब अभिलेखों, सिक्कों और ग्रंथों से पता चलता है। किताब के आख़िरी हिस्से बताते हैं कि अभिलेख कैसे पढ़े गए और उनकी सीमाएँ क्या हैं।

काल रेखा 1: प्रमुख राजनीतिक और आर्थिक विकास

इन घटनाओं को पहले से बाद के क्रम में लगाइए। साल नीचे की काल रेखा में हैं।

▲ पहले

  1. 1मौर्य साम्राज्य का अंत
  2. 2धान की रोपाई; गंगा घाटी में नगरीकरण; महाजनपद; आहत सिक्के
  3. 3कन्नौज के राजा हर्षवर्धन; चीनी यात्री श्वैन त्सांग की यात्रा
  4. 4असोक का शासन
  5. 5गुप्त शासन का आरंभ
  6. 6चंद्रगुप्त मौर्य का राज्यारोहण

▼ बाद में

और जानिए पूरी काल रेखा 1 (पृष्ठ 50)
सालक्या हुआ
लगभग 600–500 ई.पू.धान की रोपाई; गंगा घाटी में नगरीकरण; महाजनपद; आहत सिक्के
लगभग 500–400 ई.पू.मगध के शासकों की सत्ता पर पकड़
लगभग 327–325 ई.पू.सिकंदर का आक्रमण
लगभग 321 ई.पू.चंद्रगुप्त मौर्य का राज्यारोहण
लगभग 272/268–231 ई.पू.असोक का शासन
लगभग 185 ई.पू.मौर्य साम्राज्य का अंत
लगभग 200–100 ई.पू.पश्चिमोत्तर में हिंद-यूनानी शासन; दक्षिण भारत में चोल, चेर व पांड्य; दक्कन में सातवाहन
लगभग 100 ई.पू.–200 ई. तकपश्चिमोत्तर के शक (मध्य एशिया के लोग) शासक; रोमन व्यापार; सोने के सिक्के
लगभग 78 ई. (तिथि निश्चित नहीं)कनिष्क का राज्यारोहण
लगभग 100–200 ई.सातवाहन और शक शासकों द्वारा भूमिदान के अभिलेखीय प्रमाण
लगभग 320 ई.गुप्त शासन का आरंभ
लगभग 335–375 ई.समुद्रगुप्त
लगभग 375–415 ई.चंद्रगुप्त द्वितीय; दक्कन में वाकाटक
लगभग 500–600 ई.कर्नाटक में चालुक्यों का उदय और तमिलनाडु में पल्लवों का उदय
लगभग 606–647 ई.कन्नौज के राजा हर्षवर्धन; चीनी यात्री श्वैन त्सांग की यात्रा
लगभग 712अरबों की सिंध पर विजय

छपी किताब की काल रेखा 1 में लगभग 200–100 ई.पू. वाली पंक्ति में 'शक शासन' छपा है; शक अगली पंक्ति के हैं। किताब के पृष्ठ 44 के अनुसार द्वितीय शताब्दी ई.पू. में उपमहाद्वीप के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र पर हिंद-यूनानी शासकों का नियंत्रण था, इसलिए यह पंक्ति हिंद-यूनानी शासन की है।

काल रेखा 2: अभिलेखशास्त्र के क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रगति

अभिलेखों को पढ़ने और छापने के इन कामों को पहले से बाद के क्रम में लगाइए।

▲ पहले

  1. 1एपिग्राफ़िआ इंडिका का प्रथम अंक
  2. 2जेम्स प्रिंसेप ने असोक के ब्राह्मी अभिलेखों का अर्थ लगाया
  3. 3डी.सी. सरकार की इंडियन एपिग्राफ़ी एंड इंडियन एपिग्राफ़िकल ग्लोसरी
  4. 4बंगाल एशियाटिक सोसाइटी का गठन
  5. 5दक्षिण भारत के अभिलेखों के शोधपत्र एपिग्राफ़िआ कर्नाटिका का प्रथम अंक
  6. 6अलेक्ज़ैंडर कनिंघम ने असोक के अभिलेखों के एक अंश को प्रकाशित किया

▼ बाद में

और जानिए पूरी काल रेखा 2 (पृष्ठ 51)
सालक्या हुआ
1784बंगाल एशियाटिक सोसाइटी का गठन
1810 का दशककोलिन मैकेंज़ी ने संस्कृत और तमिल भाषा के 8,000 अभिलेख एकत्र किए
1838जेम्स प्रिंसेप ने असोक के ब्राह्मी अभिलेखों का अर्थ लगाया
1877अलेक्ज़ैंडर कनिंघम ने असोक के अभिलेखों के एक अंश को प्रकाशित किया
1886दक्षिण भारत के अभिलेखों के शोधपत्र एपिग्राफ़िआ कर्नाटिका का प्रथम अंक
1888एपिग्राफ़िआ इंडिका का प्रथम अंक
1965–66डी.सी. सरकार की इंडियन एपिग्राफ़ी एंड इंडियन एपिग्राफ़िकल ग्लोसरी

आख़िरी जाँच

  1. 1यह अध्याय किस काल की बात करता है?

  2. 2काल रेखा 1 के अनुसार असोक का शासन कब रहा?

  3. 3काल रेखा 1 में कनिष्क के राज्यारोहण की तिथि कैसे दी गई है?

  4. 4काल रेखा 2 के अनुसार बंगाल एशियाटिक सोसाइटी का गठन कब हुआ?

  5. 5अभिलेखों के बारे में किताब का निष्कर्ष क्या है?