★= परीक्षा में बार-बार पूछे जाने वाले बिंदु | अंतिम पृष्ठ पर ‘अंतिम-10-मिनट’ सूची
1. मूल तथ्य★
- संविधान लागू: 26 जनवरी 1950; दुनिया का सबसे लंबा संविधान।
- निर्माण-अवधि: दिसंबर 1946 – नवंबर 1949; 11 सत्र, 165 दिन बैठकें; कुल 3 वर्ष; बहसों का मुद्रित रिकॉर्ड 11 खंड।
- लंबाई का कारण: देश का आकार + विविधता + गहरा बिखराव → विस्तृत, सुविचारित संविधान अनिवार्य।
- दोहरा लक्ष्य: घावों पर मरहम + ऊँच-नीच की संस्कृति में लोकतांत्रिक संस्थाओं का विकास।
2. उथल-पुथल का दौर (पृष्ठभूमि)
- स्मृतियाँ: 1942 भारत छोड़ो (सबसे व्यापक जनांदोलन), बोस का सशस्त्र प्रयास, 1946 वसंत — RIN (शाही नौसेना) विद्रोह (बम्बई; जन-सहानुभूति सिपाहियों से), 40 के दशक के अंत के मज़दूर-किसान आंदोलन।
- इन जनांदोलनों की पहचान — व्यापक हिंदू-मुस्लिम एकता; इसके विपरीत कांग्रेस-लीग सुलह में विफल।
- अगस्त 1946 कलकत्ता से ~साल भर की हिंसा; विभाजन-घोषणा; करोड़ों शरणार्थी — “तत्क्षण मृत्यु तथा पीढ़ियों पुरानी जड़ों से उखड़ जाने के बीच चुनाव”।
- रियासतें: उपमहाद्वीप का ~एक-तिहाई भू-भाग; ब्रिटिश ताज की अधीनता स्वीकारी थी; अंग्रेज़ों के जाते ही स्थिति ‘अजीब’; कुछ महाराजा “टुकड़ों में बँटे भारत में स्वतंत्र सत्ता का सपना” देख रहे थे।
- नेहरू, 14 अगस्त मध्यरात्रि: “बहुत समय पहले हमने नियति से साक्षात्कार किया था… भारत जीवन और स्वतंत्रता की ओर जाग रहा है।”
3. संविधान सभा का गठन★
- चुनाव सार्वभौमिक मताधिकार से नहीं — 1945-46 की सर्दियों के प्रांतीय चुनाव → प्रांतीय विधायिकाओं द्वारा सदस्य चुने गए।
- कांग्रेस — सामान्य सीटों पर भारी जीत; लीग — अधिकांश आरक्षित मुस्लिम सीटें, पर बहिष्कार (अलग संविधान, पाकिस्तान-माँग); समाजवादी भी शुरू में दूर (‘अंग्रेज़ों की बनाई संस्था’)।
- परिणाम: 82% सदस्य कांग्रेस के — पर एकमत नहीं (समाजवादी ↔ ज़मींदार-हिमायती; साम्प्रदायिक-निकट ↔ पक्के धर्मनिरपेक्ष)।
- जनमत का प्रभाव: बहसें अख़बारों में; सार्वजनिक बहस; जनता से सुझाव आमंत्रित; भाषाई अल्पसंख्यक (मातृभाषा), धार्मिक अल्पसंख्यक (विशेष हित), दलित (शोषण-अंत + आरक्षण) की अपेक्षाएँ।
- सभा में 300 सदस्य; 15 महिला सदस्य (तालिका: अम्मू स्वामीनाथन, दक्षियानी वेलायुधन, बेगम एजाज रसूल, दुर्गाबाई देशमुख, हंसा मेहता, सरोजिनी नायडू-बिहार, राजकुमारी अमृत कौर, सुचेता कृपलानी, विजयलक्ष्मी पंडित, एनी मैस्करीन आदि)।
4. छह मुख्य आवाज़ें + दो अधिकारी★
| व्यक्ति | भूमिका |
|---|---|
| नेहरू | उद्देश्य प्रस्ताव (13-12-1946); झंडा-प्रस्ताव (तिरंगा+नीला चक्र) |
| पटेल | परदे के पीछे; रिपोर्ट-प्रारूप; विरोधी विचारों में सहमति |
| राजेंद्र प्रसाद | अध्यक्ष — चर्चा को रचनात्मक दिशा |
| अम्बेडकर | विधिवेत्ता-अर्थशास्त्री; गाँधी की सलाह पर विधि मंत्री; प्रारूप समिति अध्यक्ष; प्रारूप पारित कराने की ज़िम्मेदारी |
| के.एम. मुंशी (गुजरात), अल्लादि कृष्णास्वामी अय्यर (मद्रास) | प्रारूप पर महत्त्वपूर्ण सुझाव |
| बी.एन. राव | संवैधानिक सलाहकार; विदेशी व्यवस्थाओं के अध्ययन से चर्चा-पत्र |
| एस.एन. मुखर्जी | मुख्य योजनाकार — जटिल प्रस्ताव → स्पष्ट वैधिक भाषा |
- प्रमुख समितियाँ: प्रारूप — अम्बेडकर; संघ शक्ति/संघ संविधान/राज्य — नेहरू; प्रांतीय संविधान/परामर्श — पटेल; नियम/संचालन — प्रसाद; झंडा/मूल अधिकार — कृपलानी; अल्पसंख्यक उपसमिति — एच.सी. मुखर्जी।
5. उद्देश्य प्रस्ताव (स्रोत 1)★
- 13 दिसंबर 1946; भारत = “स्वतंत्र सम्प्रभु गणराज्य”; नागरिकों को न्याय, समानता, स्वतंत्रता; अल्पसंख्यकों-पिछड़े/जनजातीय क्षेत्रों-दमित वर्गों हेतु “पर्याप्त रक्षात्मक प्रावधान”।
- तीन विदेशी उदाहरण: अमेरिका (डेढ़ सदी टिकाऊ संविधान), फ्रांस (‘टेनिस कोर्ट की शपथ’ — काम पूरा होने तक डटे रहना), रूस (नया राज्य-प्रकार; पड़ोसी)। — “सफलताओं से सीखना, विफलताओं से बचना।”
- ‘लोकतांत्रिक’ शब्द क्यों नहीं? — ‘गणराज्य’ में निहित; अनावश्यक शब्द नहीं; “लोकतंत्र से कम कुछ भी नहीं”; अंतर्वस्तु में आर्थिक लोकतंत्र भी।
- “हम सिर्फ नकल करने वाले नहीं हैं… हो सकता है कि हम उससे बेहतर कुछ रच दें”; व्यवस्था “हमारे लोगों के स्वभाव के अनुरूप और उनको स्वीकार्य”।
- समाजवाद: “मैं समाजवाद का समर्थक हूँ… एक दिन पूरी दुनिया को इसी मार्ग पर चलना होगा।”
- मीमांसा: क्रांतियों का हवाला = भारतीय संघर्ष उनके समकक्ष; पर वे ब्लूप्रिंट नहीं; लक्ष्य — उदारवादी लोकतंत्र + समाजवादी आर्थिक न्याय का भारतीय समावेश।
6. लाहिड़ी बनाम नेहरू (स्रोत 2)★
- सोमनाथ लाहिड़ी (कम्युनिस्ट): सभा पर “ब्रिटिश साम्राज्यवाद का स्याह साया”; सभा “ब्रिटिश बंदूकों, सेना, आर्थिक-वित्तीय शिकंजे के साये” में; सत्ता अब भी अंग्रेज़ों के हाथ; सुझाव — “यहाँ और अभी स्वतंत्रता की घोषणा”।
- संदर्भ: 1946-47 के जाड़े — अंग्रेज़ मौजूद; अंतरिम सरकार वायसराय+लंदन की देखरेख में।
- नेहरू का उत्तर: गठन में ब्रिटिश हाथ स्वीकार, पर — “सरकारें सरकारी कागजों से नहीं बनतीं। सरकार जनता की इच्छा की अभिव्यक्ति होती है… हम उतनी दूर तक ही जाएँगे जितनी दूर तक लोग हमें ले जाना चाहेंगे।”
- 19वीं सदी की जड़ें: बाल-विवाह विरोध/विधवा-विवाह समर्थन; विवेकानंद (धर्म-सुधार); ज्योतिबा फुले (दमित जातियाँ); कम्युनिस्ट-सोशलिस्ट (मज़दूर-किसान) → राष्ट्रीय आंदोलन = लोकतंत्र-न्याय-अधिकार-समानता का भी संघर्ष।
- 1909/1919/1935 बनाम 1946-49 ★: पहले के क़ानून औपनिवेशिक सरकार ने थोपे (भारतीयों की प्रत्यक्ष हिस्सेदारी नहीं); 1935 में भी मताधिकार वयस्कों के 10-15%; विधायिकाएँ गवर्नर के प्रति उत्तरदायी → एक ही प्रक्रिया नहीं। (1919 — कार्यपालिका आंशिक उत्तरदायी; 1935 — लगभग पूर्ण; 1937 — 8/11 प्रांतों में कांग्रेस।)
7. पृथक निर्वाचिका की बहस (स्रोत 3-4-5)★★
- पक्ष — बी. पोकर बहादुर (मद्रास, 27 अगस्त 1947): अल्पसंख्यक सब जगह हैं, हटाए नहीं जा सकते; ऐसा ढाँचा चाहिए जिसमें सद्भाव से जिएँ, मतभेद घटें; इसके लिए पूरा प्रतिनिधित्व; ग़ैर-मुसलमान मुसलमानों की ज़रूरतें नहीं समझ सकते, न सही प्रतिनिधि चुन सकते।
- विपक्ष:
- धुलेकर: “अंग्रेज़ों ने संरक्षण के नाम पर खेल खेला… अब कोई तुम्हें बहकाने वाला नहीं।”
- पटेल: पृथक निर्वाचिका = “विष”; समुदाय-से-समुदाय भिड़ाया, राष्ट्र के टुकड़े, रक्तपात, विभाजन का कारण; “शांति चाहते हो तो फौरन छोड़ दो”; स्रोत 3 — “अंग्रेज़ तो चले गए, मगर जाते-जाते शरारत का बीज बो गए”; “एक भी स्वतंत्र देश दिखा दो जहाँ पृथक निर्वाचिका हो।”
- पंत (स्रोत 4): “आत्मघाती” — स्थायी अलगाव; कभी बहुसंख्यक में रूपांतरित नहीं हो पाएँगे; निराशा अपंग बना देगी; “हवाबंद कमरा जहाँ हवा के लिए भी औरों पर निर्भर”; (स्रोत 5) — लोकतंत्र में आत्मानुशासन; “खंडित निष्ठा के लिए कोई जगह नहीं — सारी निष्ठाएँ राज्य पर केंद्रित”; “महत्त्व केवल नागरिक का — पिरामिड का आधार भी नागरिक, चोटी भी नागरिक।”
- मुस्लिम-स्वर भीतर से: बेगम ऐज़ाज़ रसूल — पृथक निर्वाचिका आत्मघाती (बहुसंख्यकों से कट जाएँगे); 1949 तक ज़्यादातर मुस्लिम सदस्य सहमत — बेहतर है लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका।
- पीछे की चिंता: एकीकृत राज्य — व्यक्ति ‘नागरिक के साँचे’ में; समुदाय = सांस्कृतिक इकाइयाँ (सांस्कृतिक अधिकार हाँ, राजनीतिक पृथकता नहीं)।
8. ‘अल्पसंख्यक’ की चार परिभाषाएँ★
| कौन | परिभाषा |
|---|---|
| बहादुर | धार्मिक अल्पसंख्यक — पृथक निर्वाचिका से प्रतिनिधित्व |
| रंगा (स्रोत 6) | आर्थिक — “असली अल्पसंख्यक इस देश की जनता”: आदिवासी (व्यापारी ‘मुक्त बाज़ार’ से ज़मीन छीनते, बंधनों में ग़ुलाम), गाँववाले (सूदखोर-ज़मींदार-मालगुजार का शोषण; शिक्षा नहीं); “उन्हें सहारों की ज़रूरत है। उन्हें एक सीढ़ी चाहिए।” |
| नागप्पा/वेलायुधन | हरिजन संख्या से अल्पसंख्यक नहीं (20-25%; सात करोड़) — समस्या = सुनियोजित हाशियाकरण |
| जयपाल सिंह | आदिवासी संख्या से अल्पसंख्यक नहीं, पर संरक्षण-योग्य |
- रंगा की खाई: “हममें से ज़्यादातर उस जनता का हिस्सा नहीं… तब तक हम उनके ट्रस्टी।”
9. जयपाल सिंह और दमित जातियाँ★
- जयपाल सिंह: “मेरे लोगों को 6,000 साल से अपमानित-उपेक्षित…” फिर भी नेहरू के शब्दों पर विश्वास — “नया अध्याय… अवसरों की समानता”; बेदखली — जंगल-चरागाह छिने; ‘आदिम-पिछड़ा’ कहकर हिकारत; “आपको हमारे साथ घुलना-मिलना चाहिए”; पृथक निर्वाचिका नहीं — पर सीटों का आरक्षण ज़रूरी (आवाज़ सुनने को मजबूर करना)।
- दमित जातियाँ: समस्या संरक्षण से नहीं — जाति-समाज के कायदे-मूल्यों से (सेवा-श्रम लिया, साथ खाना नहीं, मंदिर बंद); नागप्पा: “अब और कष्ट उठाने को तैयार नहीं… अपनी बात कैसे मनवानी है”; खाण्डेलकर: “हमें हज़ारों साल तक दबाया गया… दिमाग-देह काम नहीं करती, हृदय भावशून्य”; वेलायुधन (स्रोत 7): “सात करोड़ हरिजन अल्पसंख्यक नहीं… सामाजिक अपंगताओं का फौरन खात्मा” — चाहिए नैतिक सुरक्षा का आवरण।
- विभाजन-हिंसा के बाद अम्बेडकर ने भी पृथक निर्वाचिका छोड़ी। अंतिम समाधान: अस्पृश्यता-उन्मूलन + मंदिर सब जातियों को + विधायिकाओं-सरकारी नौकरियों में आरक्षण; चेतावनी-वाक्य — “सामाजिक भेदभाव केवल संवैधानिक कानून से खत्म नहीं… समाज की सोच बदलनी होगी।”
- हंसा मेहता (स्रोत 8): महिलाओं के लिए न्याय — आरक्षित सीटें/पृथक क्षेत्र नहीं; “हमने विशेषाधिकार कभी नहीं माँगे — सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक न्याय… बराबरी।”
10. केंद्र बनाम राज्य (स्रोत 9)★★
- नेहरू-पत्र: विभाजन के बाद “दुर्बल केंद्रीय शासन… हानिकारक” — शांति, समन्वय, अंतरराष्ट्रीय आवाज़ में अक्षम।
- तीन सूचियाँ: केंद्रीय (केवल केंद्र), राज्य (केवल राज्य), समवर्ती (साझा); अन्य संघों की तुलना में कहीं ज़्यादा विषय केंद्र में; समवर्ती भी भारी; खनिज व प्रमुख उद्योग केंद्र के।
- अनुच्छेद 356: गवर्नर की सिफारिश पर केंद्र राज्य-सरकार के सारे अधिकार ले सकता है।
- राजकोषीय संघवाद: सीमा शुल्क+कंपनी कर → केंद्र; आय कर+आबकारी → साझा; राज्य स्तरीय शुल्क → राज्य; राज्य स्वयं — ज़मीन-संपत्ति कर, ब्रिकी कर, बोतलबंद शराब कर।
- सन्तनम (मद्रास): पुनर्वितरण से केंद्र भी मजबूत (अति-बोझ घातक); प्रांत खोखले (भूराजस्व के सिवा सब केंद्र को); ‘खैरात’ व्यंग्य; वरना एकल व्यवस्था ही बना लो; कुछ सालों में प्रांत “केंद्र के विरुद्ध”; उड़ीसा-सदस्य: “केंद्र बिखर जाएगा।”
- मुदालियार (स्रोत 9, 21-8-1947): शक्तिशाली-केंद्र समर्थक “ज़्यादा बड़े देशभक्त” नहीं; निगरानी चाहने वालों में देशभक्ति की कमी नहीं।
- शक्तिशाली-केंद्र पक्ष: अम्बेडकर — “शक्तिशाली और एकीकृत केंद्र… 1935 के एक्ट से भी ज़्यादा शक्तिशाली”; सड़क-हिंसा → साम्प्रदायिक हिंसा रोकने को केंद्र-शक्ति; गोपालस्वामी अय्यर — “ज़्यादा से ज़्यादा मजबूत”; बालकृष्ण शर्मा — योजना, संसाधन, शासन, विदेशी आक्रमण से रक्षा।
- मोड़ का तर्क ★: विभाजन-पूर्व प्रांतीय स्वायत्तता = लीग को भरोसा देने की कोशिश; विभाजन के बाद वह दबाव समाप्त; औपनिवेशिक एकल व्यवस्था पहले से मौजूद; अफरा-तफरी+आर्थिक नियोजन → “केंद्र के अधिकारों की ओर स्पष्ट झुकाव”।
11. भाषा-प्रश्न (स्रोत 10)★★
- गाँधी-हिंदुस्तानी: हिंदी+उर्दू का मेल; जनता के बड़े हिस्से की; संस्कृतियों के आदान-प्रदान से समृद्ध साझी भाषा; हिंदू-मुसलमान, उत्तर-दक्षिण को जोड़ने वाली आदर्श संचार-भाषा; तीस के दशक तक कांग्रेस — हिंदुस्तानी = राष्ट्रीय भाषा।
- बदलाव: 19वीं सदी के अंत से — हिंदी संस्कृतनिष्ठ (फ़ारसी-अरबी शब्द बाहर), उर्दू फ़ारसीनिष्ठ → “भाषा भी धार्मिक पहचान की राजनीति का हिस्सा”।
- स्रोत 10 (हरिजन सेवक, 12-10-1947): “न संस्कृतनिष्ठ हिंदी, न फ़ारसीनिष्ठ उर्दू — दोनों का सुंदर मिश्रण… क्षेत्रीय भाषाओं से खुलकर उधार… खुद को हिंदी या उर्दू से बाँध लेना देशभक्ति… के विरुद्ध अपराध।”
- धुलेकर-प्रसंग 1 (आरंभिक सत्र): “हिंदुस्तानी नहीं जानते वे सदस्यता के पात्र नहीं — चले जाना चाहिए” → हंगामा; नेहरू का हस्तक्षेप; भाषा-प्रश्न 3 साल बाधा बनता रहा।
- भाषा समिति का फार्मूला ★: देवनागरी लिपि में हिंदी = राजकीय भाषा; संक्रमण क्रमिक — पहले 15 साल अंग्रेज़ी जारी; प्रत्येक प्रांत को एक क्षेत्रीय भाषा चुनने का अधिकार; ‘राष्ट्रभाषा’ नहीं, ‘राजभाषा’ कहकर भावनाओं को शांत करने का प्रयास।
- धुलेकर-प्रसंग 2 (13 सितंबर 1949): राजभाषा नहीं — राष्ट्रभाषा घोषित हो; “रियायत नहीं — ऐतिहासिक प्रक्रिया की परिणति”; अध्यक्ष की टोका-टाकी।
- दुर्गाबाई (मद्रास): सहमति का सवाल अचानक विवादास्पद; दक्षिण में विरोध बहुत — ‘प्रांतीय भाषाओं की जड़ें खोदने का प्रयास’; स्वयं गाँधी के आह्वान पर दक्षिण में हिंदी-प्रचार किया, स्कूल खोले; अब आक्रामकता देख “सकते में हूँ”; हिंदुस्तानी से उर्दू-क्षेत्रीय शब्द निकाले जा रहे — समावेशी स्वरूप कमज़ोर करना = बेचैनी और भय।
- समायोजन-स्वर: शंकरराव देव (बम्बई) — दिल से समर्थन चाहिए तो संदेह मत जगाओ; टी.ए. रामलिंगम चेट्टियार (मद्रास) — एहतियात; भय निराधार हों तो भी शांत करो वरना “गहरी कड़वाहट”; “परस्पर समायोजन… थोपने का सवाल नहीं।”
12. निष्कर्ष — दो केंद्रीय अभिलक्षण★★
- विधि: संविधान = विवाद+परिचर्चा+लेन-देन; “दो विरोधी विचारों के बीच की ज़मीन।”
- (1) सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार: हर वयस्क को वोट — “ख़ास किस्म का भरोसा”, विदेशों में पूर्वोदाहरण नहीं; अमेरिका-ब्रिटेन का क्रम: संपत्तिवान पुरुष → शिक्षित पुरुष → (लंबे-कटु संघर्षों बाद) श्रमिक-किसान पुरुष → महिलाएँ (और भी लंबा संघर्ष)। भारत — एक ही छलाँग में सबको।
- (2) धर्मनिरपेक्षता: प्रस्तावना में गुण गिनाए नहीं गए, पर मुख्य अभिलक्षण आदर्श रूप में; मूल अधिकारों से: धार्मिक स्वतंत्रता (अनु. 25-28), सांस्कृतिक-शैक्षिक अधिकार (अनु. 29-30), समानता (अनु. 14, 16, 17); सभी धर्मों से समान व्यवहार; हितैषी संस्थाओं का अधिकार; सरकारी शिक्षण-संस्थाओं में अनिवार्य धार्मिक शिक्षा पर रोक; रोज़गार में धार्मिक भेदभाव अवैध; पर सामाजिक-सुधार की कानूनी गुंजाइश (अस्पृश्यता-रोक; पारिवारिक कानून-परिवर्तन) → “पूर्ण विच्छेद नहीं — विवेकपूर्ण फासला।”
- बदलते विचार: कुछ सदस्यों ने 3 वर्षों में तर्कों/घटनाओं से विचार बदले — खुले दिलो-दिमाग।
13. काल-रेखा (चुनी हुई)★
1945: 26 जुलाई लेबर-सरकार; दिसंबर-जनवरी आम चुनाव → 1946: 16 मई कैबिनेट मिशन योजना; 16 जून लीग-स्वीकृति + अंतरिम सरकार-प्रस्ताव; 16 अगस्त प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस; 2 सितंबर अंतरिम सरकार (नेहरू उपराष्ट्रपति); 13 अक्तूबर लीग शामिल; 3-6 दिसंबर लंदन-वार्ता विफल; 9 दिसंबर सभा के अधिवेशन शुरू → 1947: 29 जनवरी लीग की भंग-माँग; 16 जुलाई अंतरिम सरकार की आख़िरी बैठक; 11 अगस्त जिन्ना पाक-सभा अध्यक्ष; 14 अगस्त पाक-स्वतंत्रता; 14-15 मध्यरात्रि भारत → 1949: दिसंबर हस्ताक्षर (लागू: 26-1-1950)।
स्मरण-सूत्र
- “न-प-गा-रं-ज-द-सं-भा” — बहस-क्रम: नकल-नहीं (उद्देश्य) → पृथक निर्वाचिका → गाँधी-भाषा… या सरल: “उ-पृ-अ-के-भा” = उद्देश्य → पृथक निर्वाचिका → अल्पसंख्यक-परिभाषा → केंद्र-राज्य → भाषा।
- छह आवाज़ें: “ने-प-प्र + अ-मुं-अ” (नेहरू-पटेल-प्रसाद + अम्बेडकर-मुंशी-अय्यर); अधिकारी: “राव-मुखर्जी”।
- धर्मनिरपेक्ष अनुच्छेद: “25-28 धर्म, 29-30 संस्कृति, 14-16-17 समानता”।
- कर-बँटवारा: “सीमा-कंपनी केंद्र के, आय-आबकारी आधे-आधे, ज़मीन-ब्रिकी-शराब राज्य के”।
अंतिम-10-मिनट (परीक्षा-द्वार पर)
- 26-1-1950; सबसे लंबा; दिस.1946-नव.1949; 11 सत्र-165 दिन; 11 खंड; 82% कांग्रेसी; 300 सदस्य; 15 महिलाएँ।
- उद्देश्य प्रस्ताव 13-12-1946 — स्वतंत्र सम्प्रभु गणराज्य; रक्षात्मक प्रावधान; “नकल नहीं”।
- RIN विद्रोह 1946-वसंत, बम्बई; रियासतें = 1/3 भू-भाग।
- पटेल: ‘विष’, ‘शरारत का बीज’ (खंड 5); पंत: ‘आत्मघाती’, ‘हवाबंद कमरा’, ‘खंडित निष्ठा’ (27-8-1947, खंड 2); बेगम ऐज़ाज़ रसूल।
- रंगा: असली अल्पसंख्यक = जनता; ‘सीढ़ी’; जयपाल सिंह: 6,000 साल; नागप्पा: 20-25%; वेलायुधन: सात करोड़; खाण्डेलकर: हज़ारों साल; हंसा मेहता: विशेषाधिकार नहीं।
- अनुच्छेद 356; तीन सूचियाँ; सन्तनम बनाम अम्बेडकर (‘1935 से भी शक्तिशाली’); मुदालियार 21-8-1947।
- भाषा: देवनागरी-हिंदी राजभाषा; 15 वर्ष अंग्रेज़ी; प्रांतीय भाषा; धुलेकर 13-9-1949; दुर्गाबाई; स्रोत 10 = हरिजन सेवक 12-10-1947।
- मताधिकार-छलाँग; धर्मनिरपेक्षता = ‘विवेकपूर्ण फासला’ (अनु. 25-28/29-30/14-16-17)।