पुस्तक: विश्व इतिहास के कुछ विषय (कक्षा XI, NCERT) · खंड चार — आधुनिकीकरण की ओर · विषय 6 पाठ्यपुस्तक पृष्ठ: खंड-परिचय 124–127 · कालक्रम चार 128–134 · अध्याय 135–152
0. इस अध्याय की केंद्रीय धुरी — पढ़ाने से पहले यह समझ लें
यह अध्याय विजय की कहानी नहीं, विजय के औचित्य (justification) की कहानी है।
पूरे पाठ में एक ही प्रश्न बार-बार लौटता है — जब एक समूह दूसरे की ज़मीन ले लेता है, तो वह अपने मन को कैसे समझाता है कि यह ठीक है? NCERT इसका उत्तर तीन स्तरों पर देती है —
- भाषा के स्तर पर — मूल निवासियों को ‘असभ्य’, ‘आलसी’, ‘पिछड़े हुए आदिम’, ‘मर-खपने लायक’ कहा गया; ज़मीन को टेरा न्यूलिअस (‘जो किसी की नहीं है’) कहा गया।
- कानून के स्तर पर — समझौतों पर दस्तखत करवाए गए, अदालतें बनीं, संविधान लिखे गए — पर संपत्ति और वोट का अधिकार केवल गोरों के लिए।
- इतिहास-लेखन के स्तर पर — पाठ्यपुस्तकों ने लिखा कि यूरोपीयों ने इन देशों की ‘खोज’ की, मानो वहाँ पहले कोई था ही नहीं। यही वह ‘महान ऑस्ट्रेलियाई चुप्पी’ है जिसे 1968 में स्टैनर ने तोड़ा।
इसीलिए अध्याय का अंत विस्थापन पर नहीं, वापसी पर होता है — 1982 का कनाडाई संवैधानिक प्रावधान, 1992 का माबो फ़ैसला, 1999 का राष्ट्रीय क्षमायाचना दिवस। यानी इतिहास बदला नहीं जा सकता, पर इतिहास-लेखन बदला जा सकता है — और वह बदलाव खुद एक ऐतिहासिक घटना है।
एक वाक्य में अध्याय: जिन देशों को यूरोप ने ‘खोजा’ कहा, वे खोजे नहीं गए थे — वे छीने गए थे; और यह बात स्वीकारने में दुनिया को दो सौ साल लगे।
1. खंड चार का परिचय — ‘आधुनिकीकरण’ का अर्थ (पृ. 124–127)
1.1 अब तक की यात्रा और आगे का रास्ता
पिछले खंडों में मध्यकालीन और प्रारम्भिक आधुनिक विश्व की तीन प्रक्रियाएँ पढ़ी गईं — सामंतवाद, यूरोपीय पुनर्जागरण, तथा यूरोप एवं एशिया, अफ़्रीका, अमरीका के बीच सम्पर्क अथवा टकराव।
आधुनिक विश्व को बनाने वाली घटनाएँ 15वीं शताब्दी के मध्य से शुरू हुईं। विश्व इतिहास के दो परिवर्तनों ने वह ज़मीन तैयार की जिसे ‘आधुनिकीकरण’ कहा गया —
| परिवर्तन | क्या किया |
|---|---|
| औद्योगिक क्रांति | उत्पादन का ढाँचा बदला |
| राजनीतिक क्रांतियाँ | प्रजा को नागरिक में तब्दील कर दिया |
राजनीतिक क्रांतियों की शुरुआत — अमरीकी क्रांति (1776–81) और फ्रांसीसी क्रांति (1789–94)।
पढ़ाने का बिंदु: ‘प्रजा से नागरिक’ — यही आधुनिकता की सबसे छोटी परिभाषा है। प्रजा वह है जिस पर शासन किया जाता है; नागरिक वह है जो शासन में हिस्सेदार है। पूरा अध्याय 6 इस बात पर टिका है कि मूल निवासियों को यह ‘नागरिक’ का दर्जा नहीं दिया गया — वे न प्रजा रहे, न नागरिक बने।
1.2 औद्योगिकीकरण का कोई एक ‘मॉडल’ नहीं
ब्रिटेन दुनिया का पहला औद्योगिक राष्ट्र रहा। लंबे अरसे से यह समझा जाता था कि ब्रिटेन का औद्योगीकरण दूसरे देशों के लिए आदर्श नमूना (मॉडल) प्रस्तुत करता है। हालाँकि इतिहासकारों ने इन पहले के विचारों पर प्रश्न उठाए हैं।
प्रत्येक देश ने दूसरों के अनुभवों से सीखा, फिर भी प्रस्तुत नमूनों का अंधानुकरण नहीं किया।
| देश | औद्योगिकीकरण का क्रम |
|---|---|
| ब्रिटेन | पहला चरण — कोयला और सूती कपड़े के उद्योग; दूसरा चरण — रेलवे के आविष्कार से शुरू |
| रूस | औद्योगिक विकास काफ़ी देर से — 19वीं शताब्दी के आखिर में; यहाँ रेलवे और भारी उद्योग पहले ही चरण में विकसित होने लगे |
राज्य और बैंकों की भूमिका भी प्रत्येक देश में भिन्न-भिन्न रही।
ब्रिटेन के औद्योगिक विकास ने अमरीका और जर्मनी जैसी महत्त्वपूर्ण औद्योगिक शक्तियों की प्रगति को प्रभावित किया — पर इसने यह भी दर्शाया कि ब्रिटेन को औद्योगीकरण की कितनी मानवीय और भौतिक कीमत चुकानी पड़ी:
- ग़रीब मज़दूरों, ख़ासकर बच्चों की दुर्दशा
- पर्यावरण का क्षय
- हैज़ा और तपेदिक की महामारियाँ
विषय 7 में जापान का उदाहरण आएगा — कैडमियम और पारे के ज़हर के फैलने से हुआ औद्योगिक प्रदूषण, जिसने लोगों को अंधाधुंध औद्योगीकरण के खिलाफ़ जन आंदोलन के लिए जागृत किया।
1.3 उपनिवेशवाद की तीन किस्में
यूरोपीय शक्तियों ने औद्योगिक क्रांति के बहुत पहले से अमरीका, एशिया और दक्षिण अफ़्रीका के हिस्सों में उपनिवेश बनाना शुरू कर दिया था।
पश्चिमी पूँजीवाद के तीन रूप — व्यापारिक, औद्योगिक और वित्तीय। 20वीं सदी के शुरू में जापानी उपनिवेशवाद ने तीसरी दुनिया के बहुत से हिस्सों में उपनिवेश बनाए।
| किस्म | स्वरूप | उदाहरण |
|---|---|---|
| पहली | यूरोपीय गोरे लोग वहाँ जाकर बस गए (आबादकार उपनिवेश) | अमरीका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड |
| दूसरी | सीधा औपनिवेशिक नियंत्रण, पर आबादकार नहीं | भारत में ब्रिटिश शासन |
| तीसरी | बिना सत्ता हाथ में लिए दखलअंदाज़ी → अर्ध-उपनिवेश | चीन — ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, रूस, अमरीका और जापान ने संसाधनों से फ़ायदा उठाया, चीन की प्रभुसत्ता को गंभीर ठेस पहुँची |
1.4 राष्ट्रवाद — दो प्रकार
लगभग सभी देशों में शक्तिशाली राष्ट्रीय आंदोलनों ने औपनिवेशिक शोषण को चुनौती दी। राष्ट्रवाद बिना औपनिवेशिक संदर्भ के भी उभरा — जैसे पश्चिम या जापान में। सभी किस्मों का राष्ट्रवाद लोक प्रभुसत्ता (popular sovereignty) के सिद्धांतों पर आधारित है — राजनीतिक सत्ता जनता के हाथ में होनी चाहिए। इसी वजह से राष्ट्रवाद एक आधुनिक अवधारणा है।
| नागरिक राष्ट्रवाद (civic) | जातीय/धार्मिक राष्ट्रवाद (ethnic) |
|---|---|
| भाषा, धर्म, जाति और लिंग पर ध्यान दिए बिना प्रभुसत्ता सभी लोगों के हाथ में | राष्ट्रीय एकता किसी भाषा, धर्म या कुछ परंपराओं के इर्द-गिर्द |
| बराबर अधिकार वाले नागरिकों का समुदाय | लोगों को जातीयता के आधार पर परिभाषित किया जाता है, समान नागरिकता के आधार पर नहीं |
| राष्ट्रीयता को जातीयता और धर्म से परे हटकर नागरिकता से परिभाषित करता है | बहु-जातीय देश में प्रभुसत्ता चुने हुए समूहों-समुदायों तक सीमित हो सकती है, जिन्हें अल्पसंख्यकों से बेहतर समझा जाता है |
समसामयिक काल में अधिकतर पश्चिमी देश राष्ट्रीयता को जातीयता की बजाय समान अधिकारों से परिभाषित करते हैं। एक प्रमुख अपवाद जर्मनी है — जहाँ जातीय राष्ट्रवाद की विचारधारा का लंबा और कष्टदायी इतिहास रहा। यह इतिहास, एक तरह से, 1806 में जर्मन राज्यों पर फ्रांस के शाही कब्ज़े के खिलाफ़ प्रतिक्रिया से शुरू हुआ।
नागरिक राष्ट्रवाद की विचारधारा विश्व भर में जातीय/धार्मिक राष्ट्रवाद के साथ प्रतियोगिता करती आई है। यही हाल आधुनिक भारत, चीन और जापान में भी रहा है।
1.5 आधुनिकीकरण के कई मॉडल
जैसे औद्योगीकरण के भिन्न-भिन्न तरीके रहे, वैसे ही आधुनिकीकरण के कई मॉडल। विभिन्न समाजों ने अपनी विशिष्ट आधुनिकता विकसित की। जापान, चीन, ताइवान और दक्षिण कोरिया के उदाहरणों से बहुत कुछ समझ में आता है।
जापान:
- उपनिवेशी नियंत्रण से आज़ाद रहने में सफल; 20वीं सदी के दौरान तेज़ी से आर्थिक और औद्योगिक प्रगति
- द्वितीय विश्व युद्ध की शर्मनाक हार के बाद अर्थव्यवस्था के पुनर्निर्माण को “केवल युद्ध के बाद के चमत्कार के रूप में नहीं देखना चाहिए” — यह उस उन्नति का नतीजा था जो जापान 19वीं और 20वीं शताब्दी के शुरू में बनाने में कामयाब हुआ था
- 1910 तक प्राथमिक विद्यालय की फ़ीस लगभग खत्म हो गई थी और सब बच्चों के लिए दाखिला अनिवार्य था
- फिर भी दिक्कतें थीं — लोकतंत्र और सैन्यवाद के बीच; जातीय राष्ट्रवाद और नागरिक राष्ट्र निर्माण के बीच; और जिसे जापानी ‘परंपरा’ और ‘पश्चिमीकरण’ कहते हैं, उसके बीच
चीन:
- औपनिवेशिक शोषण और अपने नौकरशाह-सामंत वर्ग का प्रतिरोध — किसान विद्रोह, सुधार और क्रांति के ज़रिये
- 1930 के दशक के शुरुआती सालों में चीनी साम्यवादी पार्टी (जिसकी ताकत किसानों में थी) ने औपनिवेशिक शक्तियों और देश के कुलीन वर्ग का प्रतिनिधित्व कर रहे राष्ट्रवादियों का सामना शुरू किया
- समतावादी विचारधारा, भूमि सुधारों पर ज़ोर, और महिलाओं की समस्याओं के प्रति जागरूकता ने 1949 में विदेशी उपनिवेशवाद और राष्ट्रवादियों को उखाड़ फेंकने में मदद की
- सत्ता में आने के बाद असमानताएँ घटाने, शिक्षा फैलाने और राजनीतिक जागरूकता बनाने में सफल
- इसके बावजूद — एक-पार्टी ढाँचा और राज्य-प्रायोजित दमन ने 1960 के दशक के मध्य के बाद बढ़ते असंतोष में योगदान किया
- साम्यवादी पार्टी नियंत्रण रख पाई क्योंकि बाज़ार के कुछ सिद्धांतों को अपनाकर उसने खुद का पुनराविष्कार किया और चीन को आर्थिक शक्ति में तब्दील करने के लिए कड़ी मेहनत की
विभिन्न देशों ने आधुनिकता को अलग-अलग तरीके से समझा है और अलग-अलग तरीकों से प्राप्त करने की कोशिश की है।
1.6 खंड-परिचय का सबसे मूल्यवान पैराग्राफ़ (पृ. 125)
आबादकारों की बुर्जुआ मानसिकता ने उन्हें ज़मीन और पानी को लेकर सब कुछ बेचने और खरीदने के लिए प्रेरित किया।
लेकिन मूल निवासी, जो यूरोपीय अमरीकियों को असभ्य नज़र आते थे, का प्रश्न था —
“अगर आप हवा की ताज़गी और पानी के बुलबुलों के मालिक नहीं हैं, तो उसे कोई कैसे खरीद सकता है?”
मूल निवासियों को ज़मीन, मछली और जानवरों पर मालिकाना हक़ जताने की ज़रूरत महसूस नहीं हुई। उन्हें इन चीज़ों को बेचने और खरीदने की वस्तुओं के रूप में बदलने की कोई इच्छा नहीं थी। अगर चीज़ों के आदान-प्रदान की ज़रूरत थी, तो उन्हें आसानी से उपहार में दिया जा सकता था।
ज़ाहिर है कि मूल निवासी और यूरोपीय, सभ्यता की प्रतियोगी अवधारणाओं का प्रतिनिधित्व कर रहे थे।
मूल निवासियों ने यूरोपीय अतिवृष्टि से अपनी संस्कृति को मिटने नहीं दिया। 20वीं सदी के मध्य की अमरीकी और कनाडा की सरकारें चाहती थीं कि मूल निवासी ‘मुख्यधारा से जुड़ें’। इसी दौर में ऑस्ट्रेलिया में सत्ताधारियों ने उनकी परंपरा और संस्कृति को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ करने का प्रयास किया।
NCERT का प्रश्न (कक्षा में ज़रूर पूछें):
किसी को हैरत हो सकती है कि आख़िर ‘मुख्यधारा’ का मतलब क्या है? आर्थिक और राजनीतिक शक्ति किस तरह ‘मुख्यधारा की संस्कृति’ के निर्माण को प्रभावित करती है?
2. कालक्रम चार (लगभग 1700–2000) — पृ. 128–134
कालरेखा बताती है कि पिछले तीन सौ वर्षों में दुनिया के अलग-अलग भागों में क्या घटित हो रहा था। इसमें हैं — अफ़्रीका का दास-व्यापार, दक्षिण अफ़्रीका में रंगभेद, यूरोप में सामाजिक आंदोलन, राष्ट्र राज्यों का निर्माण, साम्राज्यिक शक्तियों का विस्तार, उपनिवेशीकरण, जनतंत्रीय और उपनिवेश-विरोधी आंदोलन, तथा वे अन्वेषण और प्रौद्योगिक विकास जो आधुनिकता संबंधी विचारों के सहयोगी रहे।
NCERT की चेतावनी: कालरेखा कुछ तिथियों पर ही प्रकाश डालती है। “जब आप इन कालरेखाओं की कड़ियों को देखते हैं तो यह न सोचें कि आपको केवल इन्हीं तिथियों को ही जानना है। इसका भी पता लगाएँ कि क्यों विभिन्न कालों की कालरेखाएँ विभिन्न तिथियों पर प्रकाश डालती हैं और इनका चयन आपको यह सब बताता है।”
2.1 अफ़्रीका और यूरोप
| तिथि | अफ़्रीका | यूरोप |
|---|---|---|
| 1720–30 | दाहोमी के राजा अगाज़ (1724–34) ने दास-व्यापार पर प्रतिबंध लगाया; 1740 ई. में इसे फिर से लागू किया गया | — |
| 1730–40 | — | कैरोलस लिनेअस (Carolus Linnaeus) ने पौधों और जानवरों का वर्गीकरण करने के लिए वर्गिकीय प्रणाली (taxonomic system) की खोज की (1735) |
| 1750–60 | दक्षिण अफ़्रीका के केप टाउन में पहली बार चेचक (1755) का प्रकोप, जिसे नाविकों ने फैलाया | — |
| 1770–80 | अंतरराष्ट्रीय दास-व्यापार अपने चरम उत्कर्ष पर; लाखों अश्वेत अफ़्रीकी लोगों को प्रत्येक वर्ष अटलांटिक के पार भेजा जाता था, जिनमें दो तिहाई समुद्री यात्रा के दौरान मर जाते थे | रूस में इमेलियन पगाचेव ने कृषक विद्रोह (1773–75) का नेतृत्व किया |
| 1780–90 | — | फ्रांसीसी क्रांति (1789) का प्रारंभ |
| 1800–1810 | मोहम्मद अली ने मिस्र में शासन किया, 1805–48; मिस्र ऑटोमन साम्राज्य से अलग हो गया | — |
| 1820–30 | पश्चिम अफ़्रीका में लाइबेरिया की स्थापना (1822) — जो स्वतंत्र दासों का देश था | लुई ब्रेल ने अंगुलियों से पढ़ने की प्रणाली विकसित की (1823); इंग्लैंड में यात्री रेलगाड़ी चलाई गई (1825) |
| 1830–40 | अब्दुल-कादिर ने फ्रांसीसियों के अल्जीरिया में बसने के विरुद्ध (1832–47) आंदोलन किया | — |
| 1840–50 | — | अनेक यूरोपीय देशों में उदारवादी और सामाजिक आंदोलन (1848) |
| 1860–70 | स्वेज़ नहर व्यापार हेतु खोली गई | रूसी कृषि-दासों (serfs) को स्वतंत्र किया गया (1861) |
| 1870–80 | — | जर्मनी और इटली एक संयुक्त राष्ट्र राज्यों के रूप में उभर कर आए |
| 1880–90 | यूरोप के लोगों का ‘अफ़्रीका के लिए संघर्ष’ प्रारंभ हुआ | — |
| 1890–1900 | — | पहली फ़िल्म का निर्माण (1895); पहला ओलंपिक खेल एथेंस में (1896) |
| 1900–1910 | महात्मा गांधी ने नस्लवादी कानूनों के खिलाफ़ सत्याग्रह की वकालत की (1906) | — |
| 1910–20 | दक्षिण अफ़्रीका ने श्वेत लोगों के लिए 87 प्रतिशत भूमि आरक्षित करने हेतु कानून बनाया (1913) | प्रथम विश्व युद्ध (1914–1918), 1917 की रूसी क्रांति |
| 1920–30 | — | मुस्तफ़ा कमाल के नेतृत्व में तुर्की गणराज्य बना (1923) |
| 1930–40 | अंगोला से मोज़ाम्बिक तक प्रथम ट्रांस-अफ़्रीकी रेलसेवा पूर्ण हुई (1931) | हिटलर ने जर्मन शासन की बागडोर हथिया ली (1933); द्वितीय विश्व युद्ध (1939–45) |
| 1940–50 | दक्षिण अफ़्रीका में अफ़्रीकी नेशनल पार्टी की विजय (1948), रंगभेद नीति की स्थापना | ब्रिटेन ने आयरिश स्वतंत्रता को मान्यता दी (1949) |
| 1950–60 | उप-सहारा अफ़्रीकी क्षेत्र में घाना प्रथम स्वतंत्र देश बना (1957) | डी.एन.ए. की खोज; रूस ने अंतरिक्षयान स्पूतनिक भेजा (1957) |
| 1960–70 | अफ़्रीकी एकता संगठन की स्थापना (1963) | यूरोप में विरोध आंदोलन (1968) |
| 1980–90 | — | मिख़ाइल गोरबाचेव सोवियत रूस के नेता बने (1985); संपूर्ण विश्व में वेब का प्रारंभ (1989) |
| 1990–2000 | दक्षिण अफ़्रीका में नेल्सन मंडेला को रिहा किया गया (1990); रंगभेद को समाप्त करने की प्रक्रिया आरंभ | वैज्ञानिकों ने डॉली (1997) क्लोन भेड़ बनाई, जिससे आनुवंशिक इंजीनियरिंग की सीमा के बारे में नए विवाद प्रारंभ हुए |
2.2 एशिया और दक्षिणी एशिया
| तिथि | एशिया | दक्षिणी एशिया |
|---|---|---|
| 1720–30 | गुजिन तुशू जिचेंग (Gujin tushu jicheng) नामक सबसे विशाल विश्वकोश को चीन के मंचू शासक कांगक्षी ने छपा कर अधिकृत किया | — |
| 1740–1750 | — | मराठों ने उत्तरी भारत में अपनी प्रभुता का विस्तार किया |
| 1750–1760 | एओकी कोन्यो (Aoki Konyo), एक जापानी विद्वान ने डच-जापानी शब्दकोश का संकलन किया (1758) | राबर्ट क्लाइव ने बंगाल के नवाब को प्लासी के युद्ध में पराजित किया (1757) |
| 1780–90 | अंग्रेज़ों ने भारत से चीन को अफ़ीम का निर्यात किया जिसमें अत्यधिक वृद्धि हुई | — |
| 1790–1800 | — | रणजीत सिंह ने पंजाब में सिख राज्य की स्थापना की (1799) |
| 1820–30 | जावा के लोगों की डचों के खिलाफ़ बग़ावत (1825–30) | सती प्रथा को ग़ैर-कानूनी घोषित किया गया (1829) |
| 1830–40 | ऑटोमन सुल्तान अब्दुल मजीद ने आधुनिकीकरण के कार्यक्रम शुरू किए (1839) | — |
| 1850–60 | थाईलैंड के राजा रामा चतुर्थ का शासन, उसने अपने देश में विदेशी व्यापार की शुरुआत की (1853) | रेल और टेलीग्राफ़ लाइन का आरंभ (1853); महान विद्रोह (1857) |
| 1860–70 | फ्रांसीसियों के इंडोचीन (दक्षिण-एशिया) में आधिपत्य का प्रारंभ (1862) | — |
| 1870–80 | जापान की प्रथम रेल-सेवा, टोकियो से याकोहामा, का प्रारंभ (1872) | दक्कन और दक्षिण भारत में अकाल (1876–78), पचास लाख से अधिक लोगों की मृत्यु |
| 1880–90 | ब्रिटेन ने बर्मा (म्यांमार) पर अधिकार किया (1885–86) | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना (1885) |
| 1900–1910 | जापानी जलसेना ने रूसी जहाज़ी बेड़ों को परास्त किया (1905) | — |
| 1910–20 | बेल्फोर (Balfour) घोषणा-पत्र ने फिलिस्तीन में यहूदियों को स्वदेश देने का आश्वासन दिया (1917) | — |
| 1920–30 | — | महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन प्रारंभ किया (1921); ई.वी. रामास्वामी नायकर ने तमिलनाडु में आत्म-सम्मान आंदोलन प्रारंभ किया (1925) |
| 1930–40 | इराक़ से सीरिया तक ब्रिटिश तेल पाइपलाइन बनी (1934) | अर्देशीर ईरानी की आलम आरा (1931) सबसे पहली टॉकी फ़िल्म थी; बगदाद को इस्तांबुल से जोड़ने वाली बर्लिन-बगदाद रेलवे का परिचालन शुरू (1940) |
| 1940–50 | संयुक्त राष्ट्र अमरीका ने जापानी नगर हिरोशिमा और नागासाकी (1945) पर अणु बम गिराया जिसमें लगभग 1,20,000 व्यक्तियों की मृत्यु हुई, बाद में बहुत से लोग विकिरण के प्रभाव से मरे; चीनी लोक-गणतंत्र का संघटन (1949) | भारत छोड़ो आंदोलन (1942); भारत और पाकिस्तान को स्वतंत्रता मिली (1947) |
| 1950–60 | बांडुंग (Bandung) सम्मेलन (1955) ने गुट निरपेक्ष आंदोलन को मज़बूत किया | भारत गणराज्य बना (1950) |
| 1960–70 | अरब नेताओं ने फिलिस्तीन मुक्ति संगठन की स्थापना की (1964); वियतनाम में युद्ध (1965–73) | सिरमावो भंडारनायके विश्व की प्रथम महिला प्रधानमंत्री (1960) |
| 1970–80 | ईरान के शाह का तख़्ता-पलट (1979) | बांग्लादेश स्वतंत्र राष्ट्र बना (1971) |
| 1980–90 | बेजिंग, चीन के तिआननमेन चौक में प्रजातंत्र के लिए विशाल प्रदर्शन (1989) | भोपाल यूनियन कार्बाइड के कीटनाशी (pesticides) प्लांट में रिसाव (1984) — इतिहास की बहुत भयंकर औद्योगिक दुर्घटना, हज़ारों व्यक्तियों की मृत्यु |
| 1990–2000 | इराक़, कुवैत और अमरीका के मध्य खाड़ी युद्ध | भारत और पाकिस्तान ने नाभिकीय परीक्षण (nuclear tests) किए (1998) |
2.3 अमरीका और ऑस्ट्रेलिया/प्रशांत महासागरीय द्वीप
| तिथि | अमरीका | ऑस्ट्रेलिया/प्रशांत महासागरीय द्वीप |
|---|---|---|
| 1720–30 | पुर्तगालियों ने ब्राज़ील में कॉफ़ी का प्रचलन किया (1727) | डच नाविक रोगेवीन (Roggeveen) समोआ द्वीपों और प्रशांत महासागर के ईस्टर द्वीप में पहुँचा (1722) |
| 1730–40 | स्टोनो दास विद्रोह का नेतृत्व एक शिक्षित दास जेमी ने किया (1739) | — |
| 1740–1750 | जुआन सेंटोस (Juan Santos), जिसे अताहुआल्पा II भी कहते हैं, ने पेरू के मूल निवासियों का नेतृत्व किया किंतु उसका विद्रोह असफल रहा (1742) | — |
| 1760–1770 | ब्रिटिश लोगों के विरुद्ध ओटावा कबीले के चीफ़ पोन्तियक ने विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व किया (1763) | कैप्टन कुक की प्रशांत महासागरीय तीन यात्राओं में प्रथम (1768–71) |
| 1770–1780 | अमरीकी स्वतंत्रता की घोषणा (1776) | — |
| 1780–90 | अमरीका का संविधान बना; डॉलर का पहली बार अमरीकी मुद्रा के रूप में प्रयोग (1787) | प्रथम ब्रिटिश अपराधियों को ऑस्ट्रेलिया के बोटानी बे (Botany Bay) भेजा गया (1788) |
| 1800–1810 | — | मैथ्यू फ़्लिंडर्स (Matthew Flinders) ने परिक्रमा की और ऑस्ट्रेलिया नाम रखा जिसका अर्थ ‘दक्षिणी’ है (1801–03) |
| 1820–30 | साइमन बोलिवर (Simon Bolivar) ने वेनिज़ुएला को स्वतंत्रता दिलाई (1821) | — |
| 1830–40 | अमरीका में ‘ट्रेल ऑफ़ टियर्स’ (आँसुओं की पगडंडी); इसमें हज़ारों पूर्वी क्षेत्र के अमरीकी मूल निवासियों को जबरन पश्चिम की ओर खदेड़ा गया जिसमें बहुतों ने मार्ग में ही दम तोड़ दिया (1838) | चार्ल्स डार्विन ने प्रशांत महासागर में गलपगोस (Galapagos) द्वीपों की यात्रा की (1831) जिसके फलस्वरूप विकास के सिद्धांत को समझने में सहायता मिली |
| 1840–50 | सेनेका फ़ॉल्स (Seneca Falls), न्यूयार्क की बैठक में अमरीकी महिलाओं के समान अधिकार का आह्वान किया गया (1848) | ब्रिटिश और माओरिस ने न्यूज़ीलैंड में वेटंगी (Waitangi) की संधि (1840) पर हस्ताक्षर किए; इसके बाद माओरिस लोगों ने अनेक विद्रोह किए (1844–88) |
| 1850–60 | — | ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के बीच भाप की नियमित जलयान सेवा पहली बार शुरू (1856) |
| 1860–70 | अमरीका में गृह युद्ध (1861–65); संविधान के तेरहवें संशोधन द्वारा दास प्रथा पर प्रतिबंध | ब्रिटेन से ऑस्ट्रेलिया बंदियों को भेजने पर प्रतिबंध (1868) |
| 1870–80 | टेलीफ़ोन, रिकार्ड-प्लेयर, बिजली के बल्ब का अन्वेषण | — |
| 1880–90 | कोका-कोला की खोज (1886) | — |
| 1890–1900 | — | न्यूज़ीलैंड में महिलाओं को मताधिकार मिला (1893) |
| 1900–1910 | राइट ब्रदर्स ने हवाई जहाज़ का आविष्कार किया (1903) | — |
| 1910–1920 | हेनरी फ़ोर्ड ने कार उत्पादन का प्रारंभ किया (1913); पनामा नहर खोली गई (1914) | पश्चिम समोआ की एक बटा पाँच जनसंख्या इन्फ़्लूएंज़ा से समाप्त हो गई (1918) |
| 1920–30 | अमरीका की वॉल स्ट्रीट स्टॉक एक्सचेंज में भारी गिरावट (1929); महामंदी, 1932 तक 1 करोड़ बीस लाख व्यक्ति बेरोज़गार | न्यूज़ीलैंड सरकार के विरुद्ध समोआ के मोओ लोगों का विद्रोह (1929) |
| 1940–50 | संयुक्त राष्ट्र अमरीका ने द्वितीय विश्व युद्ध में भाग लिया | — |
| 1950–60 | क्यूबा क्रांति के बाद फिदेल कास्त्रो, 1958 सत्ता में आए | — |
| 1960–70 | संयुक्त राज्य अमरीका में नागरिक अधिकार आंदोलन (1963); अमरीकी नागरिक अधिकार अधिनियम (1964) में प्रजातीय पार्थक्य पर प्रतिबंध; मार्टिन लूथर किंग की हत्या (1968); अमरीकी अंतरिक्ष-यात्री चंद्रमा की भूमि पर उतरा (1969) | — |
| 1970–80 | महिलाओं के आंदोलनों के कारण अमरीकी कांग्रेस ने समान अवसर अधिनियम पारित किया | टोंगा और फ़ीजी ने ब्रिटेन की अधीनता से मुक्त होकर स्वतंत्रता प्राप्त की (1970); पपुआ न्यू गिनी ऑस्ट्रेलिया की अधीनता से मुक्त होकर स्वतंत्र हो गया |
| 1980–90 | — | न्यूज़ीलैंड को नाभिकीय अस्त्रमुक्त क्षेत्र घोषित किया गया (1984); रेरोटोंगा की संधि ने दक्षिण पेसिफ़िक को नाभिकीय अस्त्र मुक्त क्षेत्र (Nuclear Free Zone) घोषित किया |
क्रियाकलाप (पृ. 134): यदि आप इस पुस्तक में दी गई चार कालरेखाओं की तुलना करें तो आप बाएँ खाने में दिए गए तिथि क्रम के कालों में विभिन्नता पाएँगे। इसके पीछे के कारणों के बारे में आप क्या सोचते हैं? अपने आप एक कालरेखा बनाने की कोशिश करिए और घटनाओं के अपने चयन के कारण बताइए।
पढ़ाने का बिंदु: यह क्रियाकलाप वास्तव में इतिहास-लेखन का प्रश्न है। कालक्रम एक में हज़ारों वर्ष के खाने थे, कालक्रम चार में दस-दस वर्ष के। जैसे-जैसे हम वर्तमान के पास आते हैं, समय के खाने छोटे होते जाते हैं — क्योंकि स्रोत बढ़ते जाते हैं और परिवर्तन की गति तेज़ होती जाती है। यह इतिहासकार का चयन है, प्रकृति का नियम नहीं।
3. अध्याय का प्रवेश-द्वार (पृ. 135)
इस अध्याय में अमरीका और ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासियों के इतिहास के कुछ पहलू पेश किए गए हैं।
18वीं सदी से दक्षिणी अमरीका के और भी हिस्सों में, तथा मध्य, उत्तरी अमरीका, दक्षिण अफ़्रीका, ऑस्ट्रेलिया तथा न्यूज़ीलैंड के इलाकों में यूरोप से आए आप्रवासी बसने लगे। इस प्रक्रिया ने वहाँ के बहुत से मूल निवासियों को दूसरे इलाकों में जाने पर मजबूर किया।
शब्दावली की सीढ़ी:
- यूरोपीय लोगों की ऐसी बस्तियों को ‘कॉलोनी’ (उपनिवेश) कहा जाता था
- जब इन उपनिवेशों के बाशिंदे यूरोपीय ‘मातृदेश’ से स्वतंत्र हो गए, तो उन्हें ‘राज्य’ या देश का दर्ज़ा हासिल हो गया
19वीं और 20वीं सदी में एशियाई देशों के लोग भी इनमें से कुछ देशों में आ बसे। आज ये यूरोपीय और एशियाई लोग इन देशों में बहुसंख्यक हैं, और वहाँ के मूल निवासियों की संख्या कम रह गई है। वे शहरों में मुश्किल से ही नज़र आते हैं।
पर भाषा गवाही देती रहती है — लोग भूल गए हैं कि कभी देश का अधिकतर हिस्सा उन्हीं के कब्ज़े में था, और यह भी कि कई नदियों, शहरों के नाम ‘देसी’ नामों से बने हैं:
| देश | देसी नामों से बने स्थान-नाम |
|---|---|
| संयुक्त राज्य अमरीका | ओहियो (Ohio), मिसीसिपी (Mississippi), सिएटल (Seattle) |
| कनाडा | सस्कातचेवान (Saskatchewan) |
| ऑस्ट्रेलिया | वॉलान्गॉन्ग (Wollongong), परामत्ता (Parramatta) |
कक्षा-प्रयोग: ‘सिएटल’ शहर का नाम उसी प्रधान सिएटल के नाम पर है जिसका 1854 का पत्र पृ. 145 पर छपा है। यानी जिस व्यक्ति की ज़मीन छीनी गई, उसके नाम पर उसी ज़मीन पर बना शहर आज खड़ा है। यह विडंबना बोर्ड में लिखकर छोड़ दें — बहस अपने आप शुरू होगी।
3.1 इतिहास-लेखन का मोड़ (पृ. 135, नीले अक्षरों में)
| काल | मूल निवासियों का इतिहास कैसे लिखा गया |
|---|---|
| 20वीं सदी के मध्य तक | पाठ्यपुस्तकों में बताया जाता था कि किस तरह यूरोपवासियों ने उत्तरी और दक्षिणी अमरीका तथा ऑस्ट्रेलिया की ‘खोज’ की। मूल बाशिंदों का शायद ही कभी ज़िक्र होता था, सिवाय यह बताने के कि यूरोपीय लोगों के प्रति उनका रवैया शत्रुतापूर्ण था |
| 1840 के दशक से | अमरीका में मानवविज्ञानियों ने उन पर अध्ययन आरंभ कर दिया था |
| 1960 के दशक से | इन मूल निवासियों को अपने इतिहास को लिखने या बयान करने (मौखिक इतिहास) के लिए प्रेरित किया गया |
| आज | मूल निवासियों द्वारा लिखे गए इतिहास और कथाकृतियाँ पढ़ना संभव है; संग्रहालयों में ‘देसी कला’ की दीर्घाएँ तथा आदिवासी जीवन-शैली को दिखलाने वाले विशेष संग्रहालय। संयुक्त राज्य अमरीका में नया अमरीकी इंडियन राष्ट्रीय संग्रहालय ख़ुद अमरीकी इंडियनों की देख-रेख में बना है |
4. यूरोपीय साम्राज्यवाद (पृ. 135–136)
स्पेन और पुर्तगाल के अमरीकी साम्राज्य का सत्रहवीं सदी के बाद विस्तार नहीं हुआ। तब तक फ्रांस, हॉलैंड और इंग्लैंड जैसे दूसरे देशों ने अपनी व्यापारिक गतिविधियों का विस्तार करना और अमरीका, अफ़्रीका तथा एशिया में अपने उपनिवेश बसाना शुरू कर दिया।
आयरलैंड भी कमोबेश इंग्लैंड का उपनिवेश ही था, क्योंकि वहाँ बसे हुए ज़्यादातर भूस्वामी अंग्रेज़ ही थे।
अठारहवीं सदी से यह बहुत साफ़-साफ़ दिखने लगा कि यद्यपि मुनाफ़े की संभावना ने ही लोगों को उपनिवेश बसाने के लिए प्रेरित किया था, लेकिन जो नियंत्रण स्थापित किया गया, उसकी ‘प्रकृति’ में महत्त्वपूर्ण विविधताएँ थीं।
| क्षेत्र | नियंत्रण की प्रकृति |
|---|---|
| दक्षिण एशिया | व्यापारिक कंपनियों ने अपने को राजनीतिक सत्ता का रूप दिया, स्थानीय शासकों को हराया, इलाके का विस्तार किया। पुरानी सुविकसित प्रशासकीय व्यवस्था को जारी रखा और भूस्वामियों से कर वसूलते रहे। बाद में व्यापार सुगम बनाने के लिए रेलवे का निर्माण, खदानें खुदवाईं और बड़े-बड़े बाग़ान स्थापित किए |
| अफ़्रीका (दक्षिणी अफ़्रीका को छोड़कर) | यूरोपीय लोग सर्वत्र समुद्र तटों पर ही व्यापार करते रहे। 19वीं सदी के आख़िरी दौर में ही वे अंदरूनी इलाकों में जाने का साहस कर सके। इसके बाद कुछ यूरोपीय मुल्कों के बीच अपने उपनिवेशों के रूप में अफ़्रीका का बँटवारा करने का समझौता हुआ |
‘सेटलर’ (Settler/आबादकार) शब्द का प्रयोग:
| कहाँ | किनके लिए |
|---|---|
| दक्षिण अफ़्रीका | डच के लिए |
| आयरलैंड, न्यूज़ीलैंड, ऑस्ट्रेलिया | ब्रिटिश के लिए |
| अमरीका | यूरोपीय लोगों के लिए |
इन उपनिवेशों की राजभाषा अंग्रेज़ी थी — कनाडा को छोड़ कर, जहाँ फ्रांसीसी भी एक राजभाषा है।
4.1 ‘नयी दुनिया’ के देशों को यूरोपवासियों द्वारा दिए गए नाम (पृ. 136 का बॉक्स)
| नाम | उत्पत्ति |
|---|---|
| ‘अमरीका’ | पहली बार अमेरिगो वेसपुकी (1451–1512) का यात्रा-वृत्तांत छपने के बाद प्रयुक्त |
| ‘कनाडा’ | कनाटा से निकला शब्द (1535 में खोजी ज़ाक कार्टियर को मिली जानकारी के मुताबिक, ह्यूरॉन-इरोक्वइस की भाषा में कनाटा का मतलब था, ‘गाँव’) |
| ‘ऑस्ट्रेलिया’ | महान दक्षिणी महासागर में स्थित भूमि के लिए सोलहवीं सदी में प्रयुक्त नाम (लातिनी में ‘दक्षिण’ को ऑस्ट्रल कहते हैं) |
| ‘न्यूज़ीलैंड’ | हॉलैंड के तासमान द्वारा दिया गया नाम, जिसने सबसे पहले 1642 में इन टापुओं को देखा था (डच भाषा में ‘समुद्र’ को ज़ी कहते हैं) |
जियोग्राफ़िकल डिक्शनरी (पृ. 805–822) में अमरीका और ऑस्ट्रेलिया के ऐसे सौ से ज़्यादा स्थान-नामों की सूची दी गई है, जो ‘न्यू’ से शुरू होते हैं।
पढ़ाने का बिंदु: नाम रखना सत्ता का पहला काम है। ध्यान दें कि ‘कनाडा’ अकेला नाम है जो देसी भाषा से आया — और वह भी एक ग़लतफ़हमी से (कार्टियर ने ‘गाँव’ शब्द को पूरे देश का नाम समझ लिया)। बाकी सब नाम यूरोप की ओर इशारा करते हैं — या तो किसी यूरोपीय व्यक्ति की ओर, या यूरोप से दिशा (दक्षिण) की ओर, या यूरोप की किसी जगह के ‘नए’ संस्करण की ओर। सौ से ज़्यादा ‘न्यू’ — यानी यूरोप ने नयी दुनिया को अपनी प्रतिलिपि के रूप में देखा।
5. उत्तरी अमरीका — भूगोल और मूल निवासी (पृ. 137–138)
5.1 भूगोल
उत्तरी अमरीका का महाद्वीप उत्तरध्रुवीय वृत्त से लेकर कर्क रेखा तक और प्रशांत महासागर से अटलांटिक महासागर तक फैला है।
| भू-आकृति | स्थिति |
|---|---|
| पथरीले पहाड़ों की शृंखला (Rockies) | पश्चिम में |
| सिएरा नेवादा पर्वत | और पश्चिम में |
| अरिज़ोना और नेवादा की मरुभूमि | थोड़ा और पश्चिम |
| ग्रेट (विस्तृत) मैदानी इलाके, ग्रेट झीलें, मिसीसिपी और ओहियो नदियाँ, अप्पालाचियन पर्वतों की घाटियाँ | पूरब में |
| मेक्सिको | दक्षिण दिशा में |
कनाडा का 40 फ़ीसदी इलाका जंगलों से ढँका है। कई क्षेत्रों में तेल, गैस और खनिज संसाधन — जिनके चलते संयुक्त राज्य अमरीका और कनाडा में ढेरों बड़े उद्योग। आजकल कनाडा में गेहूँ, मकई और फल बड़े पैमाने पर, और मत्स्य-उद्योग एक महत्त्वपूर्ण उद्योग है।
महत्त्वपूर्ण वाक्य: खनन, उद्योग और बड़े पैमाने की खेती का विकास पिछले 200 सालों में ही यूरोप, अफ़्रीका और चीन के आप्रवासियों के हाथों हुआ है। लेकिन यूरोपवासियों की जानकारी में आने से पहले हज़ारों सालों से उत्तरी अमरीका में लोग रह रहे थे।
5.2 मूल निवासी — कब और कहाँ से
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| सबसे पहले बाशिंदे | 30,000 साल पहले बेरिंग स्ट्रेट के आर-पार फैले भूमि-सेतु के रास्ते एशिया से आए |
| दक्षिण की ओर बढ़े | 10,000 साल पहले, आख़िरी हिमयुग के दौरान |
| सबसे पुरानी मानव कृति | एक तीर की नोक — 11,000 साल पुरानी |
| आबादी बढ़नी शुरू | तक़रीबन 5000 साल पहले, जब जलवायु में ज़्यादा स्थिरता आई |
‘नेटिव’ (मूल बाशिंदा) का मतलब होता है ऐसा व्यक्ति, जो अपने मौजूदा निवास-स्थान में ही पैदा हुआ था। बीसवीं सदी के आरंभिक वर्षों तक यह पद यूरोपीय लोगों द्वारा अपने उपनिवेशों के बाशिंदों के लिए इस्तेमाल होता था।
5.3 विलियम मैकलिश का उद्धरण —अमरीका से पहले का दिन (पृ. 137)
“अमरीका की पूर्वसंध्या (यानी जब यूरोपीय लोग आए और इस महाद्वीप को उन्होंने अमरीका नाम दिया) से ठीक पहले तक विविधता हर जगह पसरी हुई थी। लोग सौ से भी ज़्यादा ज़बानें बोलते थे। वे शिकार, मछली पकड़ना, संग्रहण, बाग़वानी और खेती में से जो-जो मुमकिन हो, वह सब आज़माते हुए अपनी जीविका कमाते थे। मिट्टी की गुणवत्ता और उसके इस्तेमाल तथा देख-भाल के लिए कितने प्रयास की दरकार है, इसी पर जीने के तरीके का उनका चुनाव निर्भर करता था। सांस्कृतिक और सामाजिक पूर्वग्रह के आधार पर कुछ दूसरी चीज़ें तय होती थीं। मछली, अनाज, बाग़ के पेड़-पौधे, मांस — इनके अधिशेष हमारे यहाँ ताकतवर, श्रेणीबद्ध समाजों की रचना में मददगार बने, लेकिन वहाँ नहीं। कुछ संस्कृतियाँ सहस्राब्दियों तक कायम रहीं …”
यह उद्धरण अध्याय का वैचारिक केंद्र है। मैकलिश यह कह रहे हैं कि अधिशेष (surplus) हर जगह एक ही परिणाम नहीं देता। यूरोप और मेसोपोटामिया में अधिशेष ने राजा, पुरोहित और वर्ग-विभाजन पैदा किए (याद कीजिए अध्याय 1 का उरुक); उत्तरी अमरीका में वही अधिशेष था, पर वैसा समाज नहीं बना — क्योंकि लोगों ने वैसा चुना ही नहीं। यानी इतिहास में आर्थिक निर्धारणवाद (economic determinism) की सीमा है। यह बात कक्षा में स्पष्ट कर दें — यह अध्याय 1 और अध्याय 6 के बीच का सबसे मज़बूत पुल है।
5.4 जीवन-शैली
- नदी घाटी के साथ-साथ बने गाँवों में समूह बना कर रहते थे
- मछली और मांस खाते थे, सब्ज़ियाँ तथा मकई उगाते थे
- अक्सर मांस की तलाश में लंबी यात्राओं पर — मुख्य रूप से ‘बाइसन’ (जंगली भैंसों) की तलाश, जो घास के मैदानों में घूमते
- (यह सत्रहवीं सदी से आसान हो गया, जब इन मूल निवासियों ने घुड़सवारी शुरू कर दी। वे घोड़े स्पेनी आबादकारों से ख़रीदते थे।)
- लेकिन वे उतने ही जानवर मारते, जितने की उन्हें भोजन के लिए ज़रूरत होती थी
- बड़े पैमाने पर खेती करने की कोई कोशिश नहीं की; अपनी आवश्यकताओं से अधिक उत्पादन नहीं करते थे — इसलिए केंद्रीय तथा दक्षिणी अमरीका की तरह राजशाही और साम्राज्य का विकास नहीं किया
- इलाके को लेकर कबीलों के बीच झगड़े की कुछ मिसालें, पर कुल मिलाकर ज़मीन पर नियंत्रण कोई मुद्दा नहीं था। वे ज़मीन पर अपनी ‘मिल्कियत’ की कोई ज़रूरत महसूस किए बग़ैर उससे मिलनेवाले भोजन और आश्रय से संतुष्ट थे
- परंपरा की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता: औपचारिक संबंध और दोस्तियाँ कायम करना तथा उपहारों का आदान-प्रदान करना। चीज़ें उन्हें ख़रीदने की बजाय उपहार के तौर पर हासिल होती थीं
- वेमपुम बेल्ट — रंगीन सीपियों को आपस में सिलकर बनायी जाने वाली पट्टी; किसी समझौते के बाद स्थानीय कबीलों के बीच इसका आदान-प्रदान होता था
- अनेक भाषाएँ बोली जाती थीं, हालाँकि वे लिखी नहीं जाती थीं
- उनका विश्वास था कि समय की गति चक्रीय है
- हर कबीले के पास अपनी उत्पत्ति और इतिहास के ब्यौरे थे जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलते आ रहे थे
- कुशल कारीगर थे, ख़ूबसूरत कपड़े बुनते थे
- वे धरती को पढ़ सकते थे — जलवायु और विभिन्न भू-दृश्यों को वे उसी तरह समझ सकते थे, जैसे पढ़े-लिखे लोग लिखी हुई चीज़ें पढ़ते हैं
पढ़ाने का बिंदु: “धरती को पढ़ सकते थे” — यह पूरे अध्याय का सबसे अच्छा वाक्य है। यूरोपीय मानदंड में ‘साक्षरता’ = लिपि। NCERT यहाँ साक्षरता की परिभाषा को ही चुनौती दे रही है। इसे ‘असभ्य’ की परिभाषा (पृ. 140) से जोड़ें — वहाँ ‘सभ्य’ की तीन कसौटियाँ थीं: साक्षरता, संगठित धर्म, शहरीपन। तीनों यूरोप की अपनी परिभाषाएँ थीं, सार्वभौमिक नहीं।
6. यूरोपियनों से मुक़ाबला (पृ. 138–139)
6.1 शब्दावली — ‘नयी दुनिया’ के मूल बाशिंदों के लिए अंग्रेज़ी में प्रयुक्त पद (पृ. 138 का बॉक्स)
| पद | अर्थ / टिप्पणी |
|---|---|
| aborigine | native people of Australia (लातिन में ऐब का मतलब है ‘से’ और ओरिजिन का ‘शुरुआत’) |
| Aboriginal | एक विशेषण, जिसे संज्ञा की तरह इस्तेमाल करने की ग़लती अक्सर की जाती है |
| American Indian / Amerind / Amerindian | उत्तरी और दक्षिणी अमरीका तथा कैरेबियन के मूल निवासी |
| First Nations peoples | मूल निवासियों के संगठित समूह, जिन्हें कनाडाई सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त थी (1876 के इंडियन्स एक्ट में ‘बैंड्स’ पद का इस्तेमाल किया गया था, लेकिन 1980 के दशक से ‘नेशन्स’ शब्द प्रयुक्त होने लगा) |
| indigenous people | ऐसे लोग, जो किसी जगह में हमेशा से रहते आए हैं |
| native American | उत्तरी और दक्षिणी अमरीका के देसी लोग (यह पद अब बहुप्रचलित है) |
| ‘Red Indian’ | गेहुँए वर्ण के लोग, जिनके निवास-स्थान को कोलंबस ने ग़लती से इंडिया समझ लिया था |
चित्र: विस्कॉन्सिन के विनेबागो कबीले की एक महिला। 1860 के दशक में इस कबीले के लोग नेबरास्का स्थानांतरित कर दिए गए।
मूल निवासियों के नाम ऐसी चीज़ों को दिये गये जिनका इन क़बीलों से कोई संबंध नहीं था:
| नाम | किस चीज़ को दिया गया |
|---|---|
| डकोटा | हवाईजहाज़ |
| चिरोकी | जीप |
| पोंटिआक | कार |
| मोहॉक | बाल-कटाई |
कक्षा-प्रयोग: यह सूची भारत के लिए भी बनवाएँ — ‘चीता’, ‘नाग’, ‘अर्जुन’, ‘पृथ्वी’ मिसाइलें; ‘सफ़ारी’, ‘सूमो’ गाड़ियाँ। प्रश्न: जब किसी समुदाय का नाम वस्तु बन जाता है, तो समुदाय का क्या होता है? यह प्रतीकात्मक विनियोजन (symbolic appropriation) का सटीक उदाहरण है।
6.2 होपी कथा — ली ब्राउन की एक वार्ता से, 1986 (पृ. 139)
“प्रस्तर की पट्टी पर यह खुदा था कि होपी यह मानते थे कि उनके पास वापस आने वाले पहले भाई और बहन धरती के पार से कछुओं के रूप में आएँगे। वे इनसान होंगे, पर कछुओं के रूप में आएँगे। इसलिए जब समय आया, तो होपी लोग धरती के उस पार से आनेवाले उन कछुओं का स्वागत करने के लिए एक ख़ास गाँव में इकट्ठा हुए। वे सुबह-सुबह उठ गए और उन्होंने सूर्योदय देखा। उन्होंने मरुभूमि के पार निगाह दौड़ाई और उन्हें बख़्तरबंद स्पेनी कॉन्क्विस्टाडोर दिखलाई पड़े, जो धरती के उस छोर से आते कछुओं की तरह लग रहे थे। सो, उन्होंने समझा, ये वही हैं जिनका इंतज़ार था। इसलिए वे स्पेनी इनसान के पास गए और हाथ मिलाने की उम्मीद में अपना हाथ बढ़ाया, लेकिन स्पेनी ने उनके हाथ में कोई सस्ती-सी चीज़ पकड़ा दी। और इससे पूरे उत्तरी अमरीका में यह बात फैल गई कि बहुत कठिन समय आनेवाला है, कि शायद कुछ भाइयों और बहनों ने सभी चीज़ों की पवित्रता को भुला दिया है और इसकी वजह से धरती पर सभी इनसान काफ़ी कष्ट पानेवाले हैं।”
होपी अब कैलिफ़ोर्निया के निकट रहने वाले आदिवासी हैं।
पढ़ाने का बिंदु: दो हाथ — एक मिलाने के लिए बढ़ा, दूसरे ने सामान थमा दिया। यही पूरे अध्याय का रूपक है: एक पक्ष संबंध चाहता था, दूसरा लेन-देन। इसे पृ. 140 के ‘उपहार बनाम माल’ वाले हिस्से से सीधे जोड़ें।
ध्यान दें कि यह स्रोत 1986 की मौखिक वार्ता है, जो 16वीं सदी की घटना बता रही है। यह मौखिक इतिहास (oral history) का उदाहरण है — इसकी शक्ति यह है कि यह मूल निवासियों का अपना दृष्टिकोण देता है; इसकी सीमा यह है कि इसमें बाद की स्मृति और व्याख्या घुल-मिल गई है। दोनों बातें विद्यार्थियों को बताएँ।
6.3 शुरुआती मुलाक़ातें
सत्रहवीं सदी में दो महीने के कठिन समुद्री अभियान के बाद उत्तरी अमरीका के उत्तरी तट पर पहुँचे यूरोपीय व्यापारियों को यह देख कर सुकून मिला कि वहाँ के स्थानीय लोगों का व्यवहार दोस्ताना और गर्मजोशी-भरा है।
दक्षिण अमरीका गए स्पेनियों के विपरीत, जो वहाँ की सोने की प्रचुरता से अभिभूत हो गए थे, ये लोग मछली और रोएँदार खाल के व्यापार के लिए आए थे — जिसमें उन्हें शिकार-कुशल देसी लोगों की ओर से अपेक्षित मदद मिली।
थोड़ा और दक्षिण में, मिसीसिपी के किनारे-किनारे, फ्रांसीसियों ने पाया कि देसी लोग नियमित रूप से जमा होते थे। इसका मक़सद था — ऐसे हस्तशिल्पों का आदान-प्रदान करना जो किसी ख़ास कबीले में ही बनते थे, या ऐसे खाद्य पदार्थों का आदान-प्रदान जो अन्य इलाक़ों में उपलब्ध नहीं थे।
यूरोपीय लोग बदले में क्या देते थे:
| वस्तु | परिणाम |
|---|---|
| कंबल | — |
| लोहे के बर्तन | कभी-कभी मिट्टी के पात्रों की जगह इस्तेमाल |
| बंदूकें (जो जानवरों को मारने में तीर-धनुष की अच्छी पूरक साबित हुईं) | शिकार का तरीका बदला |
| शराब | वहाँ के बाशिंदों का पहले शराब से परिचय नहीं था। वे जल्दी ही इसकी आदत के शिकार हो गए, जो कि यूरोपीय लोगों के लिए अच्छा साबित हुआ, क्योंकि इसने उन्हें व्यापार के लिए अपनी शर्तें थोपने में सक्षम बनाया। |
(यूरोपीय लोगों ने उन मूल निवासियों से तंबाकू की आदत ग्रहण की।)
पढ़ाने का बिंदु: यह आदान-प्रदान दोतरफ़ा था — शराब गई, तंबाकू आई। पर परिणाम एकतरफ़ा था, क्योंकि शराब ने सौदेबाज़ी की शक्ति (bargaining power) छीन ली। यही असमान विनिमय (unequal exchange) है — वस्तुएँ दोनों ओर से चलीं, पर लाभ एक ओर गया।
6.4 प्रारंभिक यूरोपीय पहुँच की कालरेखा (पृ. 139)
| क्यूबेक (फ्रांसीसी) | अमरीकी उपनिवेश (ब्रिटिश/अन्य) |
|---|---|
| 1497 में जॉन कैबोट ‘न्यूफ़ाउंडलैंड’ पहुँचा | 1507 अमेरिगो डे वेसपुकी की ‘ट्रैवेल्स’ प्रकाशित हुई |
| 1534 जैक कार्टियर ने सेंट लॉरेंस नदी के किनारे-किनारे यात्रा की और मूल बाशिंदों से मिला | — |
| 1608 फ्रांसीसियों ने क्यूबेक उपनिवेश की खोज की | 1607 ब्रिटिश लोगों ने वर्जीनिया उपनिवेश की खोज की |
| — | 1620 ब्रिटिश लोगों ने प्लाइमाउथ (मेसाचुसैट्स में) की खोज की |
7. पारस्परिक धारणाएँ (पृ. 140–141)
7.1 यूरोपीय दृष्टि में मूल निवासी
अठारहवीं सदी में पश्चिमी यूरोप के लोग ‘सभ्य’ मनुष्य की पहचान तीन आधारों पर ही करते थे:
- साक्षरता
- संगठित धर्म
- शहरीपन
उन्हें अमरीका के मूल निवासी ‘असभ्य’ प्रतीत हुए।
तीन यूरोपीय नज़रिये — एक ही समय में:
| व्यक्ति | नज़रिया |
|---|---|
| ज्यां जैक रूसो (फ्रांसीसी दर्शनशास्त्री) जैसे कुछ यूरोपीय | ऐसे लोग तारीफ़ के काबिल थे, क्योंकि वे ‘सभ्यता’ की विकृतियों से अछूते थे। इसके लिए एक प्रचलित पद था — ‘उदात्त उत्तम जंगली’ (The noble savage) |
| विलियम वड्सवर्थ (अंग्रेज़ी कवि) | वे ”जंगलों में” रहते हैं, ”जहाँ कल्पनाशक्ति के पास उन्हें भावसंपन्न करने, उन्हें ऊँचा उठाने या परिष्कृत करने का अवसर बहुत कम है” — जिसका मतलब यह कि प्रकृति के निकट रहनेवालों की कल्पनाशक्ति और भावना अत्यंत सीमित होती है! वड्सवर्थ किसी भी अमरीकी मूल निवासी से नहीं मिले थे। |
| थॉमस जैफ़र्सन (संयुक्त राज्य अमरीका के तीसरे प्रेसिडेंट, वड्सवर्थ के समकालीन) | ”यह अभागी नस्ल, जिसे सभ्य बनाने के लिए हमने इतनी ज़हमत उठाई … अपने उन्मूलन का औचित्य सिद्ध करती है।” — ऐसे शब्द, जिन पर आज के समय में कड़ा विरोध ज़ाहिर किया जाता है |
7.2 वाशिंगटन इरविंग — जो सचमुच मिले थे (पृ. 140 का नीला बॉक्स)
यह दिलचस्प है कि एक दूसरे लेखक, वाशिंगटन इरविंग, जो वड्सवर्थ से ख़ासे छोटे थे और जो मूल निवासियों से सचमुच मिले थे, उनका वर्णन बिलकुल भिन्न रूप में किया —
“जिन इंडियन्स की असली ज़िंदगी को देखने का मुझे मौक़ा मिला, वे कविताओं में वर्णित अपने रूप से काफ़ी भिन्न हैं। यह सच है कि गोरे लोगों, जिनकी नीयत पर वे भरोसा नहीं करते और जिनकी भाषा भी नहीं समझते, की संगत में रहने पर वे काफ़ी कम बोलते हैं। पर परिस्थितियाँ वैसी ही हों, तो गोरा आदमी भी उन्हीं की तरह अल्पभाषी हो जाता है। ये इंडियन्स जब अपनों के बीच होते हैं, तो वे नक़ल उतारने के उस्ताद साबित होते हैं और गोरों की नक़ल उतार कर अपना ख़ूब मनोरंजन करते हैं … वही गोरे, जो समझते हैं कि इंडियन्स को अपनी भव्यता और गरिमा के प्रति गहरे आदरभाव से ओत-प्रोत कर चुके हैं … गोरे लोग ग़रीब इंडियन्स के साथ ऐसे पेश आते हैं (मैं इसका साक्षी हूँ), मानो उनमें और जानवरों में बहुत कम फ़र्क़ हो।”
पढ़ाने का बिंदु — तीन-स्तंभ की तुलना कक्षा में बनवाएँ: रूसो ने मूल निवासी की प्रशंसा की, वड्सवर्थ ने निंदा — और दोनों में से कोई मूल निवासी से मिला नहीं था। इरविंग मिले थे, और उनका वर्णन दोनों से अलग है। यह इतिहास-लेखन का बुनियादी पाठ है: प्रशंसा और निंदा दोनों कल्पना पर टिकी हो सकती हैं; प्रत्यक्ष अनुभव तीसरा उत्तर देता है। ‘उदात्त उत्तम जंगली’ भी उतनी ही रूढ़ि (stereotype) है जितनी ‘असभ्य जंगली’ — क्योंकि दोनों में मूल निवासी अपनी नहीं, यूरोप की ज़रूरत बोल रहा है।
7.3 मूल निवासियों की दृष्टि में यूरोपीय (पृ. 140 का किनारा)
मूल निवासियों की कई लोककथाओं में यूरोपीय जनों का मज़ाक उड़ाया गया था और उनका वर्णन लालची और धूर्त के रूप में किया गया था, लेकिन चूँकि वे काल्पनिक कथाओं की शक्ल में थीं, इसलिए यूरोपीय लोग उनके सही संदर्भ को काफ़ी बाद में जाकर समझ पाए।
यह वाक्य पूरे अध्याय में सबसे कम ध्यान पाने वाला, पर सबसे महत्त्वपूर्ण वाक्य है। यह बताता है कि मूल निवासियों के पास अपना विश्लेषण था — वे यूरोपीयों को समझ रहे थे और उन पर टिप्पणी कर रहे थे। बस उनका माध्यम लोककथा था, न कि यात्रा-वृत्तांत। और चूँकि यूरोप ने केवल लिखित को ‘ज्ञान’ माना, इसलिए यह विश्लेषण दर्ज ही नहीं हुआ।
7.4 उपहार बनाम माल
| मूल बाशिंदों के लिए | यूरोपीय लोगों के लिए |
|---|---|
| आदान-प्रदान की चीज़ें दोस्ती में दिए गए ‘उपहार’ थीं | मछली और रोएँदार खाल ‘माल’ थे, जिसे मुनाफ़ा कमाने के लिए यूरोप में बेचना था |
| — | बेची जानेवाली चीज़ों के दाम, पूर्ति के आधार पर, साल-दर-साल बदलते रहते थे |
| मूल निवासी इसे समझ नहीं सकते थे — उन्हें सुदूर यूरोप में स्थित ‘बाज़ार’ का ज़रा भी बोध नहीं था। उनके लिए तो यह सब पहेली की तरह था कि यूरोपीय व्यापारी उनकी चीज़ों के बदले में कभी तो ढेर सारा सामान देते थे और कभी बहुत कम | — |
| वे यूरोपीय लोगों के लालच को देख कर भी दुखी होते थे। प्रचुर मात्रा में रोएँदार खाल हासिल करने के लिए उन्होंने सैकड़ों ऊदबिलावों को हलाल किया, और मूल बाशिंदे इससे काफ़ी विचलित थे। उन्हें डर था कि जानवर उनसे इस विध्वंस का बदला लेंगे। | — |
पढ़ाने का बिंदु: “जानवर बदला लेंगे” — यह अंधविश्वास नहीं, पारिस्थितिक नैतिकता (ecological ethic) की भाषा है। तुलना कीजिए ‘उतने ही जानवर मारते जितने की ज़रूरत’ (पृ. 137) से और 1890 तक जंगली भैंसों के उन्मूलन (पृ. 146) से। भारत में बिश्नोई समुदाय और खेजड़ली (1730) की घटना से जोड़कर पढ़ाया जा सकता है।
7.5 आबादकार क्यों आए
शुरुआत में आए यूरोपीय लोग, जो कि व्यापारी थे, के पीछे-पीछे अमरीका में ‘बसने’ के लिए भी लोग आए।
17वीं सदी से यूरोपीय लोगों के कुछ समूह ईसाइयत के भिन्न संप्रदाय से ताल्लुक रखने की वजह से उत्पीड़न के शिकार थे —
- कैथलिक प्रभुत्व के देशों में रहनेवाले प्रोटेस्टेंट
- प्रोटेस्टेंटवाद को राजधर्म का दर्ज़ा देनेवाले देशों के कैथलिक
उनमें से बहुतों ने यूरोप छोड़ दिया और एक नयी ज़िंदगी शुरू करने के लिए अमरीका चले गए।
जब तक वहाँ खाली ज़मीनें थीं, कोई समस्या नहीं आई, लेकिन धीरे-धीरे वे और अंदर, मूल निवासियों के गाँवों की ओर बढ़े। उन्होंने जंगलों की सफ़ाई के लिए अपने लोहे के औज़ारों का इस्तेमाल किया, ताकि खेती की जा सके।
7.6 जंगल को देखने के दो तरीके
| मूल निवासी | यूरोपीय लोग |
|---|---|
| उन्होंने उन रास्तों की पहचान की, जो यूरोपीय लोगों के लिए अदृश्य थे | उनकी कल्पना में कटे हुए जंगल की जगह छोटे-छोटे खेत उभरते थे |
जैफ़र्सन का सपना एक ऐसे देश का था जो छोटे-छोटे खेतों वाले यूरोपीय लोगों से आबाद था। मूल निवासी — जो अपनी ज़रूरतों के लिए फ़सलें उगाते, न कि बिक्री और मुनाफ़े के लिए, और जो ज़मीन का ‘मालिक’ बनने को ग़लत मानते थे — इस बात को नहीं समझ सकते थे। यही चीज़ उन्हें जैफ़र्सन की निगाह में ‘असभ्य’ बनाती थी।
यह अध्याय का सबसे तीखा वाक्य है। ‘असभ्य’ की परिभाषा यहाँ साक्षरता या धर्म नहीं रह गई — ‘असभ्य’ वह है जो ज़मीन को बेचने की चीज़ नहीं मानता। यानी सभ्यता की कसौटी अब निजी संपत्ति बन गई है। खंड-परिचय की ‘बुर्जुआ मानसिकता’ वाली बात यहाँ पूरी होती है।
7.7 राजनीतिक कालरेखा (पृ. 141)
| कनाडा | संयुक्त राज्य अमरीका |
|---|---|
| 1701 क्यूबेक के मूल निवासियों के साथ फ्रांसीसियों का समझौता | — |
| 1763 क्यूबेक पर ब्रिटिशों की विजय | 1781 ब्रिटेन ने संयुक्त राज्य अमरीका को एक स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता दी |
| 1774 क्यूबेक एक्ट | 1783 ब्रिटिश लोगों ने संयुक्त राज्य अमरीका को मध्य-पश्चिम सौंपा |
| 1791 कनाडा संवैधानिक एक्ट | — |
क्रियाकलाप 1 (पृ. 141): यूरोपीय लोगों और अमरीकी मूल निवासियों के मन में एक-दूसरे की जो छवि थी तथा प्रकृति को देखने के जो उनके अलग-अलग तरीके थे, उन पर विचार करें।
8. संयुक्त राज्य अमरीका का विस्तार (पृ. 141–142)
8.1 मानचित्र 1 — कैसे बना आज का अमरीका
| भूभाग | कैसे आया |
|---|---|
| मूल तेरह उपनिवेश | 1783 — संयुक्त राज्य अमरीका |
| लुइज़ीआना | 1803 में फ़्रांस से ख़रीदा गया |
| उत्तर-पश्चिम सीमा क्षेत्र | 1818, 1842 में ग्रेट ब्रिटेन द्वारा दी गई |
| फ्लोरिडा | 1819 में स्पेन से ख़रीदी गई |
| टेक्सस | 1845 |
| ऑरेगॉन देश | 1846 में ग्रेट ब्रिटेन से संधि द्वारा |
| कैलिफ़ोर्निया, न्यू मेक्सिको, उथाह क्षेत्र | 1848 में मेक्सिको द्वारा दी गई (युद्ध के बाद) |
| दक्षिण-पश्चिम की पट्टी | 1857 में गैड्सडेन द्वारा ख़रीदी गई |
| अलास्का | रूस द्वारा 1867 में दिया गया |
जिन मुल्कों को हम कनाडा और संयुक्त राज्य अमरीका के नाम से जानते हैं, वे 18वीं सदी के अंत में वजूद में आए। अपने वर्तमान क्षेत्रफल का एक छोटा हिस्सा ही उस समय उनके कब्ज़े में था। मौजूदा आकार तक पहुँचने के लिए अगले सौ सालों में उन्होंने अपने नियंत्रण वाले इलाक़े में काफ़ी इज़ाफ़ा किया।
किसी के मन में यह ख़याल नहीं आया कि उन इलाक़ों में रहने वाले मूल बाशिंदों की भी रज़ामंदी ली जाए।
संयुक्त राज्य अमरीका की पश्चिमी ‘सरहद’ (फ्रंटियर) खिसकती रहती थी, और जैसे-जैसे यह खिसकती जाती, मूल निवासी भी पीछे खिसकने के लिए बाध्य किए जाते थे।
‘फ्रंटियर’ शब्द को बोर्ड पर लिखकर समझाएँ: भूगोल में सीमा स्थिर होती है; अमरीकी ‘फ्रंटियर’ चलती हुई सीमा थी। और यह किसी दूसरे देश से सीमा नहीं थी — यह ‘सभ्यता’ और ‘जंगल’ के बीच की काल्पनिक रेखा थी। इसीलिए 1892 में जब जनगणना ने कहा कि अब कोई फ्रंटियर नहीं बची (पृ. 146), तो वह भूगोल की नहीं, विचारधारा की घोषणा थी।
8.2 विस्तार और प्रतिरोध की कालरेखा (पृ. 142)
| कनाडा | संयुक्त राज्य अमरीका |
|---|---|
| — | 1803 फ्रांस से लुइज़ीआना की ख़रीद |
| — | 1825–58 संयुक्त राज्य अमरीका के मूल निवासी आरक्षित क्षेत्रों में पहुँचाए गए |
| 1837 फ्रांसीसी कनाडाई विद्रोह | 1832 जस्टिस मार्शल का फ़ैसला |
| 1840 उच्चतर और निम्नतर कनाडा की कैनेडियन यूनियन | 1849 अमरीकी गोल्ड रश |
| 1859 कनाडा गोल्ड रश | 1861–65 अमरीकी गृहयुद्ध |
| 1867 कनाडा महासंघ | 1865–90 अमरीकी इंडियन युद्ध |
| 1869–85 कनाडा में मेटिसों द्वारा रेड रिवर विद्रोह | 1870 पारमहाद्वीपीय रेलवे |
| 1876 कनाडा इंडियन्स एक्ट | 1890 अमरीका में जंगली भैंसे का प्रायः उन्मूलन |
| 1885 पारमहाद्वीपीय रेलवे के ज़रिए पूर्वी और पश्चिमी तटों का जुड़ाव | 1892 अमरीकी फ्रंटियर का ‘अंत’ |
8.3 यूरोपीय आप्रवासी कौन थे और क्या चाहते थे
19वीं सदी में अमरीका के भूदृश्य में ज़बरदस्त बदलाव आए। ज़मीन के प्रति यूरोपीय लोगों का रवैया मूल निवासियों से अलग था।
| आप्रवासी समूह | प्रेरणा |
|---|---|
| ब्रिटेन और फ्रांस से आए कुछ प्रवासी | छोटे बेटे होने के कारण पिता की संपत्ति के उत्तराधिकारी नहीं बन सकते थे और इसी वजह से अमरीका में ज़मीन के मालिक बनना चाहते थे |
| जर्मनी, स्वीडन और इटली से आए आप्रवासी | जिनकी ज़मीनें बड़े किसानों के हाथ चली गई थीं और वे ऐसी ज़मीन चाहते थे, जिसे अपना कह सकें |
| पोलैंड के लोग | प्रेयरी (prairie) चारागाहों में काम करना अच्छा लगता था, जो उन्हें अपने घरों के स्टेपीज़ (घास के मैदानों) की याद दिलाते थे |
बहुत कम कीमत पर बड़ी संपत्तियाँ ख़रीद पाना उन्हें बहुत रास आ रहा था।
उन्होंने ज़मीन की सफ़ाई की और खेती का विकास किया। उन्होंने ऐसी फ़सलें (धान और कपास) उगाईं, जो यूरोप में नहीं उगाई जा सकती थीं और इसीलिए वहाँ उन्हें ऊँचे मुनाफ़े पर बेचा जा सकता था।
अपने विस्तृत खेतों को जंगली जानवरों – भेड़िए और पहाड़ी शेरों – से बचाने के लिए उन्होंने शिकार के ज़रिए उनका सफ़ाया ही कर दिया। 1873 में कँटीले तारों की खोज के बाद ही वे अपने को पूरी तरह सुरक्षित महसूस कर पाए।
8.4 दक्षिण, दास प्रथा और गृहयुद्ध (पृ. 143)
घर के बाहर काम करने के लिहाज़ से दक्षिणी इलाके की जलवायु यूरोपीय जनों के लिए काफ़ी गर्म थी, और दक्षिण अमरीकी उपनिवेशों का यह अनुभव रहा था कि दास बनाए गए मूल निवासी बहुत बड़ी संख्या में मौत के शिकार हुए थे।
इसीलिए बाग़ान-मालिकों ने अफ़्रीका से दास ख़रीदे।
दासप्रथा-विरोधी समूहों के विरोध के चलते दासों के व्यापार पर तो रोक लग गई, लेकिन जो अफ़्रीकी संयुक्त राज्य अमरीका में थे, वे और उनके बच्चे दास ही बने रहे।
संयुक्त राज्य अमरीका के उत्तरी राज्यों ने, जहाँ अर्थतंत्र बग़ानों पर (और इसीलिए दासप्रथा पर) टिका हुआ नहीं था, दासप्रथा को खत्म करने के पक्ष में दलीलें दीं और उसे एक अमानवीय प्रथा बताया।
1861–65 में दासप्रथा को जारी रखनेवाले और उसके ख़ात्मे की वकालत करने वाले राज्यों के बीच युद्ध हुआ। दासता विरोधियों की जीत हुई। दासप्रथा खत्म कर दी गई, हालाँकि अफ़्रीकी मूल के अमरीकियों को नागरिक स्वतंत्रताओं के लिए अपने संघर्ष में विजय 20वीं सदी में आकर ही मिल पाई और तभी स्कूलों तथा ट्रेनों-बसों में उन्हें अलग रखने की व्यवस्था समाप्त हुई।
कनाडा की समस्या: कनाडाई सरकार के सामने एक समस्या थी, जो लंबे समय तक हल नहीं हो पाई थी, और जो मूल निवासियों के सवाल के मुकाबले ज़्यादा ज़रूरी प्रतीत होती थी — 1763 में ब्रिटिश लोगों ने फ़्रांस के साथ हुई लड़ाई में कनाडा को जीता था। वहाँ फ्रांसीसी आबादकार लगातार स्वायत्त राजनीतिक दर्ज़े की माँग कर रहे थे। 1867 में कनाडा को स्वायत्त राज्यों के एक महासंघ के रूप में संगठित करके ही इस समस्या का हल निकल पाया।
यह वाक्य ध्यान से पढ़ाएँ — “जो मूल निवासियों के सवाल के मुकाबले ज़्यादा ज़रूरी प्रतीत होती थी”। यानी दो यूरोपीय समूहों (ब्रिटिश और फ्रांसीसी) के बीच का झगड़ा प्राथमिकता पा गया, और जिनकी ज़मीन थी उनका सवाल टलता रहा — 1982 तक।
9. अपनी ज़मीन से मूल बाशिंदों की बेदख़ली (पृ. 143–145)
9.1 बेदख़ली का तरीक़ा
जैसे-जैसे संयुक्त राज्य अमरीका ने अपनी बस्तियों का विस्तार किया, ज़मीन की बिक्री के समझौते पर दस्तख़त कराने के बाद मूल निवासियों को वहाँ से हटने के लिए प्रेरित या बाध्य किया गया।
- उन्हें दी गई कीमतें बहुत कम थीं
- इसके भी उदाहरण मिलते हैं कि अमरीकियों ने धोखे से उनसे ज़्यादा ज़मीन ले ली या पैसा देने के मामले में वायदाख़िलाफ़ी की
- उच्च अधिकारी भी मूल बाशिंदों की बेदख़ली को ग़लत नहीं मानते थे
9.2 जॉर्जिया प्रकरण और चिरोकी — 1832 का फ़ैसला
जॉर्जिया संयुक्त राज्य अमरीका का एक राज्य है। यहाँ के अधिकारियों की दलील थी कि चिरोकी कबीला राज्य के कानून से शासित तो होता है, लेकिन वे नागरिक अधिकारों का उपयोग नहीं कर सकते।
(ध्यान देने की बात है कि मूल निवासियों में से ऐसे थे, जिन्होंने अंग्रेज़ी सीखी और अमरीकी जीवन-शैली को समझने की सबसे ज़्यादा कोशिश की थी, और तब भी उन्हें नागरिक अधिकार नहीं दिए गए।)
1832 में संयुक्त राज्य के मुख्य न्यायाधीश, जॉन मार्शल ने एक महत्त्वपूर्ण फ़ैसला सुनाया। उन्होंने कहा कि चिरोकी कबीला “एक विशिष्ट समुदाय है और उसके स्वत्वाधिकार वाले इलाके में जॉर्जिया का कानून लागू नहीं होता” और वे कुछ मामलों में सम्प्रभुतासंपन्न हैं।
राष्ट्रपति एंड्रू जैक्सन, जिनकी छवि आर्थिक और राजनीतिक पक्षपात के खिलाफ़ लड़ने वाली की थी, इंडियन्स का मामला आने पर वह बिलकुल उलट गए। उन्होंने मुख्य न्यायाधीश की इस बात को मानने से इनकार कर दिया और चिरोकियों को अपनी ज़मीन से हाँक कर विस्तृत अमरीकी मरुभूमि (Great American Desert) की ओर खदेड़ने के लिए अमरीकी फ़ौज भेज दी।
जिन 15000 लोगों को वहाँ से हटने पर मजबूर किया गया, उनमें से एक चौथाई अपने ‘आँसुओं की राह’ (Trail of Tears) के सफ़र में ही मर-खप गए।
यह अध्याय का सबसे महत्त्वपूर्ण संवैधानिक क्षण है। अदालत ने मूल निवासियों के पक्ष में फ़ैसला दिया, और कार्यपालिका ने उसे मानने से इनकार कर दिया। यानी जिस देश के संविधान पर ‘लोकतांत्रिक भावना’ का गर्व था, वहाँ न्यायपालिका का आदेश तब बेअसर हो गया जब वह मूल निवासियों के हक़ में था। कक्षा में प्रश्न रखें: कानून का शासन तब क्या मायने रखता है जब उसे लागू करने वाला ही उसे मानने से इनकार कर दे?
9.3 बेदख़ली के औचित्य (justification) की दलीलें
जिन लोगों ने पहले से रहनेवाले कबीलों की ज़मीनें ले लीं, वे इस आधार पर अपने को उचित ठहराते थे कि —
- चूँकि मूल निवासी ज़मीन का अधिकतम इस्तेमाल करना नहीं जानते, इसलिए वह उनके कब्ज़े में रहनी ही नहीं चाहिए
- वे इस बिना पर भी मूल निवासियों की आलोचना करते कि वे आलसी हैं — इसलिए बाज़ार हेतु उत्पादन करने में अपने शिल्प-कौशल का इस्तेमाल नहीं करते
- अंग्रेज़ी सीखने और ‘ढंग के’ कपड़े (जिसका मतलब था, यूरोपीयों जैसे कपड़े) पहनने में उनकी दिलचस्पी नहीं है
- कुल मिलाकर उनका कहना यह था कि वे ‘मर-खपने’ लायक ही हैं
खेती की ज़मीन निकालने के लिए प्रेयरीज़ साफ़ की गईं, और जंगली भैंसों को मारा गया।
एक फ्रांसीसी आगंतुक ने लिखा — “आदिम जानवरों के साथ-साथ आदिम मनुष्य लुप्त हो जाएगा”।
9.4 क्रियाकलाप 2 — जनसांख्यिक आँकड़े (पृ. 144)
इन दो तरह के जनसांख्यिक आँकड़ों पर टिप्पणी करें:
| वर्ग | संयुक्त राज्य अमरीका — 1820 | स्पेनी अमरीका — 1800 |
|---|---|---|
| मूल निवासी | 6 लाख | 75 लाख |
| गोरे | 90 लाख | 33 लाख |
| मिले-जुले यूरोपीय | 1 लाख | 53 लाख |
| काले | 19 लाख | 8 लाख |
| कुल | 1 करोड़ 16 लाख | 1 करोड़ 69 लाख |
इस तालिका को पढ़ाने का सही तरीक़ा: कुल आबादी दोनों में लगभग बराबर है, पर संरचना बिलकुल उलटी है।
- सं.रा.अ. में मूल निवासी कुल आबादी का लगभग 5%, गोरे लगभग 78%; मिले-जुले (mixed) केवल 1 लाख
- स्पेनी अमरीका में मूल निवासी लगभग 44%, गोरे लगभग 20%; मिले-जुले पूरे 53 लाख (लगभग 31%)
निष्कर्ष: स्पेनी उपनिवेशवाद ने मूल निवासियों पर शासन किया और उनके साथ मिश्रण भी हुआ (मेस्तीज़ो समाज); ब्रिटिश-आबादकार उपनिवेशवाद ने मूल निवासियों को हटाया — मिश्रण लगभग नहीं हुआ। यही ‘शोषण-उपनिवेश’ (exploitation colony) और ‘आबादकार-उपनिवेश’ (settler colony) का बुनियादी अंतर है, और यही खंड-परिचय की “तीन किस्में” वाली बात का ठोस प्रमाण है।
सावधानी: दोनों आँकड़े अलग-अलग वर्षों (1820 और 1800) और अलग-अलग क्षेत्रफल के हैं, इसलिए यह पूर्ण तुलना नहीं है — पर प्रवृत्ति स्पष्ट है। विद्यार्थियों को यह सीमा बताना ज़रूरी है।
9.5 रिज़र्वेशन्स
इस बीच मूल निवासी पश्चिम की ओर धकेल दिए गए थे। उन्हें ‘स्थायी तौर पर अपनी’ ज़मीन दे दी गई थी, लेकिन अक्सर उन्हें उस जगह से भी बेदख़ल होना पड़ता, जब उनकी ज़मीन के अंदर सीसा, सोना या तेल जैसे खनिज के होने का पता चलता।
- प्रायः कई समूहों को मूलतः किसी एक के कब्ज़े वाली ज़मीन में ही साझा करने के लिए बाध्य किया जाता, जिससे उनके बीच झगड़े हो जाते थे
- मूल निवासी छोटे इलाकों में क़ैद कर दिए गए थे, जिन्हें ‘रिज़र्वेशन्स’ (आरक्षण) कहा जाता था
- ये प्रायः ऐसी ज़मीन होती थी, जिसके साथ उनका पहले से कोई रिश्ता नहीं होता था
ऐसा नहीं है कि अपनी ज़मीनें उन्होंने बिना लड़े छोड़ दी हों:
| स्थान | प्रतिरोध |
|---|---|
| संयुक्त राज्य | फ़ौज ने 1865 से 1890 के बीच विद्रोहों की एक पूरी शृंखला का दमन किया |
| कनाडा | 1869 से 1885 के बीच मेटिसों (यूरोपीय-मूल निवासियों के वंशज) के सशस्त्र विद्रोह हुए थे |
लेकिन इन लड़ाइयों के बाद उन्होंने हार मान ली।
9.6 प्रधान सिएटल का पत्र, 1854 (पृ. 145) — पूरा उद्धरण
1854 में, संयुक्त राज्य अमरीका के राष्ट्रपति को मूल निवासियों के एक नेता, सिएटल के प्रधान का ख़त मिला। राष्ट्रपति ने प्रधान से एक समझौते पर दस्तख़त करने के लिए कहा था। समझौते के अनुसार सिएटल के लोगों की रिहाइशी ज़मीन का एक बड़ा हिस्सा अमरीकी सरकार को सौंपा जाना था। प्रधान ने जवाब दिया —
“आप आकाश को, भूमि की ऊष्मा को कैसे ख़रीद या बेच सकते हैं? यह ख़याल ही हम लोगों के लिए बहुत अजूबा है। अगर आप हवा की ताज़गी और पानी की चमक के स्वामी नहीं हैं, तो आप उसे ख़रीद कैसे सकते हैं?
धरती का हर हिस्सा मेरी जनता के लिए पुण्य-पावन है। चीड़ की चमकती हुई हर सुई, हर बालुका-तट, घने जंगलों में पसरा हर कुहरा, सफ़ाई करनेवाला और गुनगुनाने वाला हर कीड़ा मेरे लोगों की स्मृति और अनुभवों में पवित्र है। पेड़ों में दौड़ता हुआ रस ‘रेड मैन’ की स्मृतियों का वाहक है … .
इसलिए वाशिंगटन में बैठा महान मुखिया (ग्रेट चीफ़) जब यह संदेश भेजता है कि वह हमारी ज़मीन ख़रीदना चाहता है, तो वह हमसे कुछ ज़्यादा ही उम्मीद करता है। महान मुखिया का संदेश है कि वह हमारे लिए कोई जगह मुकर्रर कर देंगे, ताकि हम आराम से रह सकेंगे। वह हमारे पिता होंगे और हम उनके बच्चे होंगे। इसलिए हम इस ज़मीन को ख़रीदे जाने के प्रस्ताव पर विचार करेंगे। लेकिन यह आसान न होगा। क्योंकि यह ज़मीन हमारे लिए पावन है।
धाराओं और नदियों में बहता हुआ चमकीला पानी सिर्फ़ पानी नहीं है, वह हमारे पुरखों का लहू है। अगर हम आपको ज़मीन बेच दें, तो आपको यह याद रखना होगा कि वह पवित्र है और अपने बच्चों को सिखाना होगा कि वह पवित्र है और उसके तालाबों के निथरे हुए पानी में दिखता हर भूतहा प्रतिबिंब मेरी जनता के जीवन की घटनाओं और स्मृतियों का बयान करता है। पानी की कलकल मेरे पिता के पिता की आवाज़ है …”
स्रोत-आलोचना ज़रूर सिखाएँ (यह इस अध्याय की सबसे बड़ी शिक्षक-ज़िम्मेदारी है): यह पत्र जिस रूप में आज विश्वप्रसिद्ध है, वह प्रधान सिएटल का शब्दशः लिखा पत्र नहीं है। विस्तृत चर्चा 07 और 09 फ़ाइलों में है। बोर्ड-उत्तर में NCERT के पाठ का ही अनुसरण करें, पर कक्षा में यह बताना इतिहास पढ़ाने का असली काम है — क्योंकि यह विद्यार्थी को सिखाता है कि एक सच्चा भाव और एक प्रामाणिक दस्तावेज़ दो अलग चीज़ें हैं।
9.7 ‘मानवशास्त्र’ का जन्म (पृ. 145 का किनारा)
यह महत्त्वपूर्ण है कि इसी समय (1840 के दशक से) उत्तरी अमरीका में ‘मानवशास्त्र’ विषय (जो कि फ्रांस में विकसित हुआ था) की शुरुआत हुई।
यह शुरुआत स्थानीय ‘आदिम’ समुदायों और यूरोप के ‘सभ्य’ समुदायों के बीच के अंतर के अध्ययन के लिए हुई थी।
कुछ मानवशास्त्रियों ने यह स्थापित किया कि जिस तरह यूरोप में ‘आदिम’ लोग नहीं पाए जाते, उसी तरह अमरीकी मूल निवासी भी ‘समाप्त हो जाएँगे’।
यह अध्याय का सबसे तीखा बौद्धिक बिंदु है: एक विज्ञान का जन्म हुआ जिसका काम था यह सिद्ध करना कि जिनका अध्ययन किया जा रहा है, वे लुप्त होने वाले हैं। यानी अकादमिक ज्ञान ने बेदख़ली को वैज्ञानिक अनिवार्यता का रूप दे दिया। इसी को 09 फ़ाइल में ‘सलवेज एथ्नोग्राफ़ी’ (salvage ethnography) के रूप में विस्तार से समझाया गया है।
इसे पृ. 144 के फ्रांसीसी आगंतुक के वाक्य (“आदिम जानवरों के साथ-साथ आदिम मनुष्य लुप्त हो जाएगा”) से जोड़ें — एक ही विचार, एक बार आम आदमी की भाषा में, एक बार विज्ञान की भाषा में।
10. गोल्ड रश और उद्योगों की वृद्धि (पृ. 145–146)
यह उम्मीद हमेशा से की जाती थी कि उत्तरी अमरीका में धरती के नीचे सोना है। 1840 के दशक में संयुक्त राज्य अमरीका के कैलीफ़ोर्निया में सोने के कुछ चिह्न मिले। इसने ‘गोल्ड रश’ को जन्म दिया — उस आपाधापी का नाम, जिसमें हज़ारों की संख्या में आतुर यूरोपीय लोग चुटकियों में अपनी तक़दीर सँवार लेने की उम्मीद में अमरीका पहुँचे।
परिणाम:
| परिणाम | विवरण |
|---|---|
| रेलवे | पूरे महाद्वीप में रेलवे-लाइनों का निर्माण, जिसके लिए हज़ारों चीनी श्रमिकों की नियुक्ति हुई |
| समयरेखा | संयुक्त राज्य अमरीका रेलवे का काम 1870 में पूरा हुआ, कनाडा की रेलवे का 1885 में |
| उद्योगपति | एंड्रू कार्नेगी — स्कॉटलैंड से आया हुआ एक ग़रीब आप्रवासी और सं.रा.अ. के पहले करोड़पति उद्योग-स्वामियों में से एक — ने कहा: “पुराने राष्ट्र घोंघे की चाल से सरकते हैं, नया गणराज्य किसी एक्सप्रेस की गति से दौड़ रहा है।” |
औद्योगीकरण के कारण — इंग्लैंड बनाम उत्तरी अमरीका:
| इंग्लैंड | उत्तरी अमरीका |
|---|---|
| औद्योगिक क्रांति के एक ख़ास समय में होने के पीछे एक कारण यह भी था कि छोटे खेतिहर बड़े किसानों के हाथों अपनी ज़मीन से वंचित होकर कारखानों की नौकरी की ओर मुड़ रहे थे | उद्योग कई अलग तरह के कारणों से विकसित हुए — (1) रेलवे के साज़-सामान बनाने के लिए, ताकि दूर-दूर की जगहों को तीव्र परिवहन द्वारा जोड़ा जा सके; (2) ऐसे यंत्रों का उत्पादन, जिनसे बड़े पैमाने की खेती को आसान बनाया जा सके |
सं.रा.अ. और कनाडा, दोनों जगहों पर औद्योगिक नगरों का विकास हुआ, और कारखानों की संख्या तेज़ी से बढ़ी।
1860 में सं.रा.अ. का अर्थतंत्र अविकसित अवस्था में था। 1890 में वह दुनिया की अग्रणी औद्योगिक शक्ति बन चुका था।
बड़े पैमाने की खेती का भी विस्तार हुआ। बड़े-बड़े इलाके साफ़ किए गए और खेतों के रूप में उनके टुकड़े किए गए। 1890 तक आते-आते जंगली भैंसों का लगभग पूरी तरह उन्मूलन किया जा चुका था, और इस तरह शिकार वाली वह जीवनचर्या भी समाप्त हुई, जिसे मूल बाशिंदे सदियों से जीते आ रहे थे।
1892 में संयुक्त राज्य अमरीका का महाद्वीपीय विस्तार पूरा हो चुका था। प्रशांत महासागर और अटलांटिक महासागर के बीच का क्षेत्र राज्यों में विभाजित किया जा चुका था। अब कोई ‘फ्रंटियर’ नहीं रहा, जो कई दशकों तक यूरोपीय आबादकारों को पश्चिम की ओर खींचता रहा था।
कुछ ही वर्षों के भीतर संयुक्त राज्य अमरीका हवाई और फिलिपीन्स में अपने उपनिवेश बसा रहा था। वह एक साम्राज्यवादी शक्ति बन चुका था।
कक्षा में यह क्रम बोर्ड पर लिखें: फ्रंटियर का अंत (1892) → कुछ ही वर्षों में हवाई और फिलिपीन्स (1898)। जब भीतर की सरहद खत्म हुई, तो सरहद बाहर खोजी गई। यानी अमरीकी साम्राज्यवाद कोई नयी नीति नहीं थी — वह उसी विस्तार का समुद्र-पार विस्तार था जो सौ साल से महाद्वीप के भीतर चल रहा था। यह अध्याय का सबसे बड़ा वैचारिक निष्कर्ष है।
11. संवैधानिक अधिकार (पृ. 146–147)
आबादकारों ने 1770 के दशक में आज़ादी के अपने संघर्ष में ‘लोकतांत्रिक भावना’ के जिस नारे के तहत एकजुटता बनाई थी, वही पुरानी दुनिया की राजशाही और अभिजात तंत्र के खिलाफ़ संयुक्त राज्य अमरीका की पहचान बनी।
उनके लिए यह भी अहम था कि उनके संविधान में व्यक्ति के ‘संपत्ति के अधिकार’ को शामिल किया गया, जिसे रद्द करने की छूट राज्य को नहीं थी।
लेकिन लोकतांत्रिक अधिकार (राष्ट्रपति और कांग्रेस के प्रतिनिधियों के चुनाव में वोट देने का अधिकार) और संपत्ति का अधिकार, दोनों सिर्फ़ गोरे लोगों के लिए थे।
11.1 डेनियल पॉल का तर्क — 2000
एक कनाडाई मूल निवासी, डेनियल पॉल ने 2000 में इस ओर ध्यान खींचा कि अमरीकी स्वाधीनता संग्राम और फ्रांसीसी क्रांति के समय लोकतंत्र के पक्ष में आवाज़ बुलंद करने वाले थॉमस पाइन ने “समाज का संगठन करने के लिए इंडियन्स का इस्तेमाल एक मॉडल के तौर पर किया।”
इसके आधार पर उसने दलील दी कि “अमरीकी मूल निवासियों ने मिसाल बन कर यूरोपीय लोगों के लंबे लोकतंत्रोन्मुखी आंदोलन के बीज बोये थे”। (वी वर नॉट द सेवेजेज़, पृष्ठ 333)
यह दलील पलट देने वाली (inversion) है, और इसे कक्षा में ज़ोर देकर पढ़ाएँ। यूरोप ने मूल निवासियों को ‘असभ्य’ कहा और उन्हें ‘सभ्य बनाने’ के नाम पर उजाड़ा — जबकि यूरोप के अपने लोकतांत्रिक विचार का एक स्रोत उन्हीं मूल निवासियों की सामाजिक व्यवस्था थी। यानी छात्र ने गुरु को असभ्य कहा।
इस दावे की ऐतिहासिक जाँच (इरोक्वइस लीग / ‘Great Law of Peace’ की बहस) 07 और 09 फ़ाइलों में है — यह एक जीवित शैक्षणिक विवाद है, बंद प्रश्न नहीं।
11.2 कार्ल मार्क्स का अवलोकन (पृ. 147 का किनारा)
महान जर्मन दार्शनिक कार्ल मार्क्स (1818–83) ने अमरीकी फ्रंटियर को “आख़िरी सकारात्मक पूँजीवादी यूटोपिया” के रूप में देखा है —
“सीमाहीन प्रकृति और स्थान, जिसके अनुरूप अपने को ढालती है मुनाफ़े की सीमाहीन चाहत।” – ‘बस्तियात एंड कैरे’, ग्रुंड्रिसे
इसे इस तरह खोलें: मार्क्स कह रहे हैं कि पूँजीवाद को असीमित विस्तार चाहिए — और अमरीकी फ्रंटियर पहली बार ऐसी जगह लगी जहाँ प्रकृति भी असीमित लग रही थी, इसलिए मुनाफ़े की चाहत भी असीमित हो सकती थी। लेकिन प्रकृति असीमित नहीं थी — 1890 तक भैंसे खत्म, 1892 तक फ्रंटियर खत्म। यूटोपिया की उम्र सिर्फ़ सौ साल की निकली। आज के पर्यावरण-संकट से यह सीधे जुड़ता है।
11.3 तीन असमानताओं की तुलना — NCERT की अपनी तालिका (पृ. 148)
| समूह | कैसा व्यवहार | दिया गया तर्क |
|---|---|---|
| ब्रिटिश राज के अधीन भारतीय | मनमाने ढंग से इन पर कर लगाये गए; उन्हें बराबर नहीं माना गया | कि अभी प्रतिनिधित्व की सरकार की ज़िम्मेदारी के लिए तैयार नहीं हैं |
| अमरीका और ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासी | इन्हें नागरिक के रूप में नहीं देखा गया; असमान माना गया | कि ये ‘पिछड़े हुए आदिम’ हैं जिनकी कोई स्थानबद्ध कृषि नहीं थी; भविष्य के बारे में न सोचते थे न बचत करते थे; उनके पास शहर नहीं थे |
| अमरीका में अफ़्रीकी मूल के दास | व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित, बराबर नहीं माना गया | “दासप्रथा उनकी अपनी सामाजिक व्यवस्था का हिस्सा” है; काले लोग निकृष्ट हैं |
यह तालिका पूरे अध्याय की कुंजी है और परीक्षा में सबसे ज़्यादा उपयोगी। तीनों तर्क अलग-अलग लगते हैं, पर संरचना एक ही है: “तुम्हारे पास वह नहीं है जो हमारे पास है, इसलिए तुम्हें बराबरी नहीं मिलेगी।” और तीनों में जो ‘कमी’ गिनाई गई, वह यूरोप की अपनी विशेषताओं की सूची थी — प्रतिनिधि सरकार, स्थायी कृषि, शहर, संचय। यही खंड-परिचय के ‘मुख्यधारा’ वाले प्रश्न का उत्तर है: ‘मुख्यधारा’ का मतलब है, वह धारा जिसके पास सत्ता है।
क्रियाकलाप 3 (पृ. 148): अमरीकी इतिहासकार हावर्ड स्पॉडेक के इस कथन पर टिप्पणी करें —
“अमरीकी क्रांति का जो प्रभाव (गोरे) आबादकारों के लिए था, उससे ठीक विपरीत मूल निवासियों के लिए था — फैलाव सिकुड़न बन गया, लोकतंत्र तानाशाही बन गया, संपन्नता विपन्नता बन गई, और मुक्ति क़ैद बन गई।”
कक्षा-प्रयोग: इस वाक्य के चार जोड़ों को बोर्ड पर दो स्तंभों में लिखवाएँ और हर जोड़े के लिए अध्याय से एक-एक ठोस प्रमाण ढुँढ़वाएँ — फैलाव/सिकुड़न → फ्रंटियर का खिसकना; लोकतंत्र/तानाशाही → जैक्सन का मार्शल के फ़ैसले को ठुकराना; संपन्नता/विपन्नता → गोल्ड रश और 1928 की मेरिअम रिपोर्ट; मुक्ति/क़ैद → रिज़र्वेशन्स। यह अभ्यास ‘निबंधात्मक उत्तर’ लिखने का सबसे अच्छा प्रशिक्षण है।
12. बदलाव की लहर — अमरीका और कनाडा (पृ. 147)
1920 के दशक तक संयुक्त राज्य अमरीका और कनाडा के मूल निवासियों के लिए कुछ भी बेहतर होना शुरू नहीं हुआ।
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1928 | संयुक्त राज्य अमरीका की समस्त जनता को प्रभावित करनेवाली बड़ी आर्थिक मंदी से कुछ साल पहले, समाजवैज्ञानिक लेवाइस मेरिअम के निर्देशन में संपन्न हुआ एक सर्वेक्षण प्रकाशित हुआ — दि प्रॉब्लम ऑफ़ इंडियन एडमिनिस्ट्रेशन — जिसमें रिज़र्वेशन्स में रह रहे मूल निवासियों की स्वास्थ्य एवं शिक्षा सुविधाओं की दरिद्रता का बड़ा ही दारुण चित्र प्रस्तुत किया गया |
| — | गोरे अमरीकियों के मन में उन मूल निवासियों के प्रति सहानुभूति जागी, जिन्हें अपनी संस्कृति को पूरा-पूरा निभाने से रोका जाता था और साथ-ही-साथ नागरिकता के लाभों से भी वंचित रखा जाता था |
| 1934 | इंडियन रीऑर्गनाईज़ेशन एक्ट — जिसके द्वारा रिज़र्वेशन्स में मूल निवासियों को ज़मीन ख़रीदने और ऋण लेने का अधिकार हासिल हुआ |
| 1950–60 के दशक | संयुक्त राज्य और कनाडा की सरकारों ने मूल बाशिंदों के लिए किए गए विशेष प्रावधानों को खत्म करने पर विचार किया, इस उम्मीद से कि इससे वे ‘मुख्यधारा में शामिल’ होंगे, अर्थात वे यूरोपीय संस्कृति को अपनाएँगे। लेकिन मूल निवासी ऐसा नहीं चाहते थे। |
| 1954 | अनेक मूल निवासियों ने अपने द्वारा तैयार किए गए ‘डिक्लेरेशन ऑफ़ इंडियन राइट्स’ में इस शर्त के साथ सं.रा.अ. की नागरिकता स्वीकार की कि उनके रिज़र्वेशन्स वापस नहीं लिए जाएँगे और उनकी परंपराओं में दखलंदाज़ी नहीं की जाएगी |
| 1969 (कनाडा) | सरकार ने घोषणा की कि वह “आदिवासी अधिकारों को मान्यता नहीं” देगी। मूल निवासियों ने सुसंगठित तरीके से इसका विरोध करते हुए धरना-प्रदर्शनों और वाद-विवादों की एक पूरी शृंखला आयोजित की |
| 1982 (कनाडा) | एक संवैधानिक धारा के तहत मूल निवासियों के मौजूदा आदिवासी अधिकारों और समझौता-आधारित अधिकारों को स्वीकृति मिलने तक यह सवाल हल नहीं हो पाया |
परन्तु इन अधिकारों की बारीकियों के बारे में बहुत से फ़ैसले बाकी हैं — पर अब यह बहुत साफ़ है कि इन दोनों मुल्कों के मूल निवासियों ने, 18वीं सदी के मुकाबले अपनी संख्या बहुत कम हो जाने के बावजूद, अपनी संस्कृति को निभाने के अपने अधिकारों को लेकर पुरज़ोर दावेदारी की है और, ख़ास तौर से कनाडा में, अपनी पवित्र भूमि पर अधिकार की भी दावेदारी की है। ऐसी दावेदारी 1880 के दशक में उनके पुरखे नहीं कर सकते थे।
इस अंतिम वाक्य को रेखांकित करवाएँ। यह अध्याय की सबसे संतुलित बात है: संख्या घटी, पर आवाज़ बढ़ी। इतिहास में हार का मतलब हमेशा चुप्पी नहीं होता।
13. ऑस्ट्रेलिया (पृ. 148–150)
13.1 मूल निवासी — दो समूह
उत्तरी और दक्षिण अमरीका की तरह ही ऑस्ट्रेलिया में भी मानव निवास का इतिहास लंबा है।
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| शुरुआती मनुष्य | ‘ऐबॉरिजिनीज़’ कहे जाने वाले आदिमानव (यह कई भिन्न-भिन्न समाजों के लिए प्रयुक्त एक सामान्य नाम है) ऑस्ट्रेलिया में 40,000 साल पहले आने शुरू हुए (संभवतः उससे भी पहले) |
| कहाँ से | वे ऑस्ट्रेलिया के साथ एक भू-सेतु से जुड़े न्यू गिनी से आए थे |
| उनका अपना दृष्टिकोण | मूल निवासियों की अपनी परंपराओं के हिसाब से वे ऑस्ट्रेलिया आए नहीं थे, बल्कि हमेशा से यहीं थे |
| ‘स्वप्नकाल’ | बीती सदियाँ ‘स्वप्नकाल’ कही जाती थीं। इस कथन को समझना यूरोपीय लोगों के लिए मुश्किल था, क्योंकि इसमें अतीत और वर्तमान का अंतर धुँधला हो जाता था |
| समुदाय | 18वीं सदी के आख़िरी दौर में 350 से 750 तक समुदाय; हर समुदाय की अपनी भाषा (इनमें से 200 भाषाएँ आज भी बोली जाती हैं) |
| टॉरस स्ट्रेट टापूवासी | देसी लोगों का एक और विशाल समूह, जो उत्तर में रहता है। ‘ऐबॉरिजिनी’ शब्द इनके लिए इस्तेमाल नहीं होता, क्योंकि यह माना जाता है कि वे कहीं और से आए हैं और एक अलग नस्ल के हैं |
| जनसंख्या | 2005 में कुल मिला कर वे ऑस्ट्रेलिया की आबादी का 2.4 फ़ीसदी हिस्सा थे |
ऑस्ट्रेलिया की आबादी बहुत छितरायी हुई है, और आज भी वहाँ ज़्यादातर शहर समुद्रतट के साथ-साथ बसे हैं (जहाँ 1770 में ब्रिटिश लोग पहली बार पहुँचे थे), क्योंकि बीच का इलाका शुष्क मरुभूमि है।
‘स्वप्नकाल’ (Dreamtime) को हल्के में न लें। यह ‘सपना’ नहीं है — यह समय की एक भिन्न अवधारणा है, जिसमें सृष्टि की घटनाएँ अतीत में घटी भी हैं और अभी भी घट रही हैं। इसे उत्तरी अमरीकी मूल निवासियों के ‘चक्रीय समय’ (पृ. 138) से जोड़ें, और दोनों को यूरोप के रैखिक समय से अलग करके दिखाएँ। यह पूरे अध्याय में सांस्कृतिक अनुवाद (cultural translation) की असंभवता का सबसे साफ़ उदाहरण है।
13.2 यूरोपियों का ऑस्ट्रेलिया पहुँचना (पृ. 148)
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1606 | डच यात्रियों ने ऑस्ट्रेलिया को देखा |
| 1642 | तास्मान इस टापू पर पहुँचा। बाद में टापू का नाम तस्मानिया रखा गया |
| 1770 | जेम्स कुक बॉटनी खाड़ी पहुँचता है, जिसका नामकरण हुआ, न्यू साउथ वेल्स |
| 1788 | ब्रिटेन के दंडितों की बस्ती बनायी गई। सिडनी की स्थापना हुई |
13.3 कुक की हत्या — और एक घटना का ‘इस्तेमाल’
ऑस्ट्रेलिया में यूरोपीय आबादकारों, मूल निवासियों और ज़मीन के बीच आपसी रिश्तों का किस्सा उत्तरी और दक्षिणी अमरीका के किस्से से कई बिंदुओं पर मिलता-जुलता है, हालाँकि इसकी शुरुआत 300 साल बाद हुई।
मूल निवासियों के साथ हुई मुलाक़ात को लेकर कैप्टन कुक और उसके जत्थे के आरंभिक ब्यौरे मूल निवासियों के दोस्ताना व्यवहार के बारे में उत्साहपूर्ण हैं।
लेकिन जब एक मूल निवासी ने कुक की हत्या कर दी — हवाई में, ऑस्ट्रेलिया में नहीं — तब ब्रिटिशों का रवैया पूरी तरह से उलट गया।
जैसा कि प्रायः होता आया है, इस तरह की एक घटना औपनिवेशिक ताकतों द्वारा बाद में दूसरों के खिलाफ़ किए गए हिंसक व्यवहार का औचित्य साबित करने के लिए इस्तेमाल की गई।
यह वाक्य पूरे अध्याय का सूत्र-वाक्य है। एक घटना, एक जगह (हवाई), एक व्यक्ति — और उसका उपयोग दूसरी जगह (ऑस्ट्रेलिया), दूसरे लोगों के खिलाफ़। भारतीय संदर्भ में तुलना कीजिए: 1857 के कानपुर प्रकरण का उपयोग पूरे उत्तर भारत में दमन के औचित्य के रूप में। यह उपनिवेशवाद की सामान्य विधि है, अपवाद नहीं।
13.4 सिडनी के इलाके का एक वर्णन, 1790 (पृ. 149)
(पी. ग्रिमशॉ, एम. लेक, ए. मैक्ग्राथ, एम. क्वार्टली, क्रिएटिंग ए नेशन)
“ब्रिटिशों की उपस्थिति ने आदिवासियों के उत्पादन को नाटकीय ढंग से अस्त-व्यस्त कर दिया। हज़ारों भूखे मुखों के आने से, जिनके पीछे-पीछे सैकड़ों और आए, स्थानीय खाद्य संसाधनों पर अभूतपूर्व दबाव पड़ा।
तो दारूक लोगों ने इन सबके बारे में क्या सोचा होगा? उनके लिए पवित्र स्थानों का इतने बड़े पैमाने पर विनाश और अपनी ज़मीन के प्रति विचित्र, हिंसक बरताव समझ से परे था। ये नवागंतुक बिना वजह पेड़ों को काटते जाते। यह बिना वजह इसलिए जान पड़ता था कि उन्हें न डोंगी बनानी थीं, न जंगली शहद इकट्ठा करना था और न ही जानवर पकड़ने थे। पत्थरों को हटाकर उनका चट्टा लगा दिया गया, मिट्टी खोद कर उसे आकार देकर पका दिया गया, ज़मीन में गड्ढे बना दिए गए, बहुत भारी-भरकम इमारतें तैयार कर दी गईं।
पहले-पहल उन्होंने इस सफ़ाई की तुलना किसी पवित्र आनुष्ठानिक भूमि के निर्माण से की होगी … संभवत: उन्होंने सोचा कि एक विशाल कर्मकांडी जलसा होने जा रहा है और यह एक खतरनाक धंधा होगा, जिससे उन्हें पूरी तरह दूर रहना चाहिए। इसमें कोई संदेह नहीं कि इसके बाद दारूक उन बस्तियों से बच कर रहने लगे, और राजकीय अपहरण ही उन्हें वापस लाने का एकमात्र तरीका था।”
यह स्रोत असाधारण है, और इसे धीरे-धीरे पढ़ाएँ। यह उलटी नज़र (reverse gaze) का उदाहरण है — इतिहासकार यहाँ यह कल्पना करने की कोशिश कर रहे हैं कि मूल निवासी यूरोपीयों को कैसे देख रहे थे। और उनकी नज़र में यूरोपीय निर्माण-कार्य तर्कहीन कर्मकांड लग रहा था — ठीक वैसे ही जैसे यूरोपीयों को मूल निवासियों के कर्मकांड तर्कहीन लगते थे।
कक्षा का सबसे अच्छा प्रश्न: अगर सिडनी में इमारत बनाना ‘बिना वजह’ लगा, तो किसकी ‘वजह’ सही थी? उत्तर यह है कि तर्कसंगतता (rationality) भी सांस्कृतिक होती है — और जिसके पास ताकत होती है, उसकी तर्कसंगतता ‘सार्वभौमिक’ कहलाती है।
यह भी नोट करें: ‘राजकीय अपहरण’ (official kidnapping) — यानी सरकार बच्चों/लोगों को उठा ले जाती थी। यह वाक्य पृ. 151 के ‘गुम हुए बच्चों’ से सीधा जुड़ता है।
13.5 विनाश का पैमाना और आबादकार कौन थे (पृ. 150)
यूरोपीय लोगों के आगमन को सभी मूल बाशिंदों ने खतरे की तरह नहीं देखा। वह यह अनुमान नहीं लगा पाए कि 19वीं और 20वीं सदी के दरम्यान —
- कीटाणुओं के असर से
- अपनी ज़मीनें खोने के चलते
- और आबादकारों के साथ हुई लड़ाइयों में
लगभग 90 फ़ीसदी मूल बाशिंदों को अपनी जान गँवानी पड़ेगी।
ब्राज़ील में पुर्तगाली कैदियों को बसाने का प्रयोग तब जाकर बंद कर दिया गया, जब उनके हिंसक बरताव ने मूल निवासियों को प्रतिहिंसा पर उतारू कर दिया। ब्रिटिशों ने स्वतंत्र होने तक अमरीकी उपनिवेशों में यही तरीका अपनाया, और फिर उसे ऑस्ट्रेलिया में भी जारी रखा।
ऑस्ट्रेलिया के ज़्यादातर शुरुआती आबादकार इंग्लैंड से निर्वासित होकर आए थे और उनके कारावास पूरा होने पर ब्रिटेन वापस न लौटने की शर्त पर उन्हें ऑस्ट्रेलिया में स्वतंत्र जीवन जीने की इजाज़त दे दी गई। अपने क्षेत्र से इतने भिन्न इस इलाके में किसी भी तरह के सहारे के बग़ैर जीवनयापन करने के लिए उन्होंने खेती के लिए ली गई ज़मीन से मूल निवासियों को निकाल बाहर करने में कोई झिझक नहीं दिखलाई।
यह एक असाधारण विडंबना है जिसे कक्षा में ज़रूर उठाएँ: ऑस्ट्रेलिया के पहले आबादकार खुद कैदी थे — यानी ब्रिटिश समाज के सबसे शक्तिहीन लोग। और वे पहुँचते ही और भी शक्तिहीन लोगों के लिए ताकतवर बन गए। उत्पीड़ित होना उत्पीड़क न बनने की गारंटी नहीं है — यह इतिहास का एक कठोर सबक़ है।
13.6 ऑस्ट्रेलिया का विकास (पृ. 150 की तालिका)
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1850 | ऑस्ट्रेलियाई बस्तियों को स्वशासन का अधिकार |
| 1851 | चीनी कुलियों का आप्रवास। 1855 में कानून बना कर इसे रोका गया |
| 1851–61 | गोल्ड रश |
| 1901 | छह राज्यों को लेकर ऑस्ट्रेलियाई संघ का निर्माण |
| 1911 | कैनबरा राजधानी बनाई गई |
| 1948–75 | 20 लाख यूरोपीय लोग ऑस्ट्रेलिया में आकर बस गए |
13.7 आर्थिक विकास और नस्ली नीति
यूरोपीय बस्तियों के तहत ऑस्ट्रेलिया का आर्थिक विकास अमरीका जितना भिन्नतापूर्ण नहीं था।
क्रम इस प्रकार रहा — भेड़ों के विशाल फ़ार्म और खानें; उसके पश्चात मदिरा बनाने हेतु अंगूर के बाग़ और गेहूँ की खेती, जो एक लंबी अवधि में और काफ़ी परिश्रम से विकसित हो पाई। इन्होंने ऑस्ट्रेलिया की संपन्नता की बुनियाद तैयार की।
कैनबरा का नामकरण: जब राज्यों को मिलाया गया और 1911 में ऑस्ट्रेलिया की एक राजधानी बनाने की योजना चल रही थी, तब उसके लिए ‘वूलव्हीटगोल्ड’ (Woolwheat gold) नाम का सुझाव दिया गया था! अंततः उसका नाम कैनबरा रखा गया जो एक स्थानीय शब्द कैमबरा (Kamberra) से बना है, जिसका अर्थ है ‘सभा-स्थल’।
इस मज़ेदार तथ्य का गहरा अर्थ है: ‘वूल + व्हीट + गोल्ड’ = ऊन + गेहूँ + सोना — यानी राजधानी का नाम तीन निर्यात वस्तुओं पर रखने का प्रस्ताव! यह आबादकार-अर्थव्यवस्था की आत्म-छवि है। और अंत में जो नाम चुना गया, वह देसी शब्द था जिसका अर्थ है ‘सभा-स्थल’ — लोकतंत्र का प्रतीक। जिनकी भाषा से नाम लिया गया, उन्हें उस सभा में जगह 1962 तक नहीं मिली (मताधिकार के लिए 07 फ़ाइल देखें)।
श्रम और नस्ल:
- कुछ मूल निवासी ऐसे सख़्त हालात में खेतों में काम करते थे कि उसका दासप्रथा से अंतर बहुत कम था
- बाद में चीनी आप्रवासियों ने सस्ता श्रम मुहैया कराया, जैसा कि कैलिफ़ोर्निया में हुआ था
- लेकिन ग़ैर-गोरों पर बढ़ती हुई निर्भरता के चलते दोनों देशों की सरकारों ने चीनी आप्रवासियों को प्रतिबंधित कर दिया
- 1974 तक लोगों के मन में यह भय घर कर गया था कि दक्षिण एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के ‘गहरी रंगत वाले’ लोग बड़ी तादाद में ऑस्ट्रेलिया आ सकते हैं, और इसीलिए ‘गैर-गोरों’ को बाहर रखने के लिए सरकार ने एक नीति अपनाई (यह ‘श्वेत ऑस्ट्रेलिया नीति’ कहलाती है)
क्रियाकलाप 4 (पृ. 150): 1911 में यह घोषणा हुई कि नयी दिल्ली और कैनबरा को क्रमशः ब्रिटिश भारत और ऑस्ट्रेलियाई राष्ट्रमण्डल की राजधानी बनाया जाएगा। उस समय में इन देशों के मूल निवासियों की राजनीतिक स्थितियों की तुलना कीजिए और उसकी विषमता को रेखांकित कीजिए।
यह क्रियाकलाप भारतीय विद्यार्थी के लिए सबसे कीमती है — इसे ज़रूर करवाएँ। 1911 में भारत में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस 26 साल पुरानी थी, 1909 का मॉर्ले-मिंटो सुधार लागू हो चुका था, सीमित प्रतिनिधित्व मिलना शुरू था; उसी वर्ष ऑस्ट्रेलिया में मूल निवासियों की गणना तक जनगणना में नहीं होती थी (संघीय संविधान की धारा 127)। यानी भारत में उपनिवेशवाद ने ‘प्रजा’ बनाया, ऑस्ट्रेलिया में उसने ‘अनुपस्थित’ बना दिया। यही खंड-परिचय की ‘तीन किस्मों’ की व्यावहारिक व्याख्या है।
14. बदलाव की लहर — ऑस्ट्रेलिया (पृ. 150–152)
14.1 चुप्पी टूटती है
1968 में एक मानवशास्त्री डब्ल्यू.ई.एच. स्टैनर के एक व्याख्यान से लोगों में बिजली की तरंग-सी दौड़ गई। व्याख्यान का शीर्षक था — दि ग्रेट ऑस्ट्रेलियन साइलेंस (महान ऑस्ट्रेलियाई चुप्पी) — इतिहासकारों की मूल निवासियों के बारे में चुप्पी।
1970 के दशक से उत्तरी अमरीका की तरह ही यहाँ भी मूल निवासियों को एक नए रूप में समझने की चाहत जग चुकी थी। उन्हें —
- मानवशास्त्रीय जिज्ञासाओं के रूप में नहीं, बल्कि विशिष्ट संस्कृतियों वाले समुदायों के रूप में
- प्रकृति और जलवायु को समझने की विशिष्ट पद्धतियों के रूप में
- ऐसे समुदायों के रूप में जिनके पास अपनी कथाओं और कपड़ासाज़ी-चित्रकारी-हस्तशिल्प के कौशल का विशाल भंडार था, और वह भंडार सराहने, आदर तथा अभिलेखन के योग्य था
इन सबकी तह में वह ज़रूरी सवाल था, जिसे आगे चल कर हेनरी रेनॉल्ड्स ने अपनी प्रभावशाली पुस्तक, व्हाइ वरंट वी टोल्ड? (हमें बताया क्यों नहीं गया?) में सामने रखा। इस किताब में ऑस्ट्रेलियाई इतिहास लेखन के उस ढर्रे की भर्त्सना की गई थी, जिसमें कैप्टन कुक की ‘खोज’ से ही इतिहास की शुरुआत मानी जाती थी।
उसके बाद से:
- मूल निवासियों की संस्कृतियों का अध्ययन करने के लिए विश्वविद्यालयी विभागों की स्थापना
- कलादीर्घाओं (आर्ट गैलरीज़) में देसी कलाओं की दीर्घाएँ शामिल
- संग्रहालयों में देसी संस्कृति को समझनेवाले कल्पनाशील तरीके से सज्जित कमरों के लिए जगह
- मूल निवासियों ने अपने जीवन-इतिहास लिखना शुरू किया
यह सब एक अद्भुत प्रयास है। यह प्रयास समय रहते शुरू हो गया। अगर मूल निवासियों की संस्कृतियों की अनदेखी बदस्तूर जारी रहती, तो इस समय तक उसका काफ़ी कुछ विस्मृति की गर्त में जा चुका होता।
1974 से ‘बहुसंस्कृतिवाद’ ऑस्ट्रेलिया की राजकीय नीति रही है, जिसने मूल निवासियों की संस्कृतियों और यूरोप तथा एशिया के आप्रवासियों की संस्कृतियों को समान आदर दिया है।
14.2 ज्यूडिथ राइट की कविता — ‘दो स्वप्नसमय’, ऊडगेरू नूनुक्कल के लिए (पृ. 151)
ऑस्ट्रेलियाई लेखिका ज्यूडिथ राइट (Judith Wright) (1915–2000) ने ऑस्ट्रेलियाई मूल निवासियों के अधिकारों के लिए ज़ोरदार आवाज़ बुलंद की। उन्होंने गोरे और मूल निवासियों को अलग-अलग रखने से होनेवाले कई नुकसानों को लेकर अत्यंत प्रभावशाली कविताएँ लिखीं।
“विदीर्ण हृदय वाली मेरी बहन कैथी, मैं नहीं जानती कि काग़ज़ की छाल पर लिखी तुम्हारे सपनों के समय की हर्ष-विषादमय कहानियों के लिए मैं तुम्हें कैसे धन्यवाद दूँ? तुम गहरी रंगत वाले उन बच्चों में से एक थीं, जिनके साथ खेलने की मुझे इजाज़त न थी – नदी-तट पर अपना खेमा गाड़नेवाले, ग़लत रंग के लोग (मैं तुम्हें गोरा न बना सकी।) इसलिए काफ़ी देर से मैं तुम्हें मिली, काफ़ी देर से शुरुआत हुई जानने की उन्होंने मुझे नहीं बताया था कि जिस ज़मीन को मैं इतना प्यार करती हूँ वह तुम्हारे ही हाथों से छीनी गई थी।”
– ‘दो स्वप्नसमय’, ऊडगेरू नूनुक्कल (Oodgeroo Noonuccal) के लिए
इस कविता की अंतिम दो पंक्तियाँ पूरे अध्याय का निचोड़ हैं। ध्यान दें कि यह कविता एक गोरी लेखिका ने एक मूल निवासी कवयित्री के लिए लिखी है। ऊडगेरू नूनुक्कल स्वयं ऑस्ट्रेलिया की पहली प्रकाशित आदिवासी कवयित्री थीं। यानी यह कविता चुप्पी टूटने का ही एक रूप है — और “उन्होंने मुझे नहीं बताया था” ठीक वही वाक्य है जो रेनॉल्ड्स की पुस्तक का शीर्षक है (व्हाइ वरंट वी टोल्ड?)। कविता और इतिहास-लेखन एक ही सवाल पूछ रहे हैं।
“मैं तुम्हें गोरा न बना सकी” — यह पंक्ति ‘गुम हुए बच्चों’ (Stolen Generations) की ओर इशारा करती है, जहाँ मिश्रित रक्त वाले बच्चों को ‘गोरा बनाने’ के लिए ही परिवारों से छीना गया था।
14.3 टेरा न्यूलिअस और माबो फ़ैसला
1970 के दशक से, जब संयुक्त राष्ट्र संघ और दूसरी अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों की बैठकों में ‘मानवाधिकार’ शब्द सुनाई पड़ने लगा, ऑस्ट्रेलियाई जनता को यह अहसास हुआ कि —
संयुक्त राज्य अमरीका, कनाडा और न्यूज़ीलैंड के विपरीत, ऑस्ट्रेलिया में यूरोपीय लोगों द्वारा किए गए भूमि-अधिग्रहण को औपचारिक बनाने के लिए मूल निवासियों के साथ कोई समझौता-पत्र तैयार नहीं किया गया है।
सरकार हमेशा से ऑस्ट्रेलिया की ज़मीन को टेरा न्यूलिअस (terra nullius) कहती आई थी। इसका मतलब था, ‘जो किसी की नहीं है’।
इसके अलावा, वहाँ अपने आदिवासी रिश्तेदारों से छीने गए मिश्रित रक्तवाले (मूल निवासी-यूरोपीय) बच्चों का एक लंबा और यंत्रणापूर्ण इतिहास भी था।
इन सवालों पर खड़े हुए आंदोलन के कारण तहकीकातें शुरू हुईं और दो महत्त्वपूर्ण निर्णय लिए गए:
- इस बात को मान्यता देना कि मूल निवासियों का ज़मीन के साथ, जो कि उनके लिए ‘पवित्र’ है, मज़बूत ऐतिहासिक संबंध रहा है और इसका आदर किया जाना चाहिए
- पिछली गलतियों को धोया तो नहीं जा सकता, लेकिन ‘गोरों’ और ‘रंगबिरंगे लोगों’ को अलग-अलग रखने की कोशिश करके बच्चों के साथ जो अन्याय किया गया है, उसके लिए सार्वजनिक रूप से माफ़ी माँगी जानी चाहिए
14.4 अंतिम कालरेखा (पृ. 152)
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1974 | ‘गोरे ऑस्ट्रेलिया’ की नीति का ख़ात्मा, एशियाई आप्रवासियों को प्रवेश की इजाज़त |
| 1992 | ऑस्ट्रेलियाई हाई कोर्ट द्वारा (माबो केस में) टेरा न्यूलिअस की कानूनी अवैधता की घोषणा और 1770 के पहले से ज़मीन पर मूल निवासियों के दावों को मान्यता |
| 1995 | आदिवासी और टॉरस स्ट्रेट टापूवासी बच्चों को उनके परिवारों से अलग किए जाने के मामले में राष्ट्रीय जाँच |
| 1999 | 1820 से 1970 के दशक के बीच ‘गुम हुए’ बच्चों से माफ़ीनामे के तौर पर ‘राष्ट्रीय क्षमायाचना दिवस’ (A National Sorry Day) (26 मई) |
1992 के माबो फ़ैसले का महत्त्व समझाएँ: अदालत ने यह नहीं कहा कि सरकार ने ग़लत किया — उसने कहा कि जिस कानूनी आधार पर सब कुछ खड़ा था, वह आधार ही झूठा था। टेरा न्यूलिअस का अर्थ था ‘खाली ज़मीन’। 1992 में अदालत ने माना कि ज़मीन खाली नहीं थी। यानी 222 साल पुरानी एक कानूनी कल्पना गिर गई।
तुलना कीजिए 1832 के मार्शल फ़ैसले से — वहाँ अदालत ने मूल निवासियों के पक्ष में कहा और सरकार ने ठुकरा दिया; 1992 में अदालत ने कहा और सरकार ने माना (1993 का नेटिव टाइटल एक्ट)। 160 साल का अंतर — यही ‘बदलाव की लहर’ है।
15. अभ्यास प्रश्न (पृ. 152) — पाठ्यपुस्तक के अपने प्रश्न
संक्षेप में उत्तर दीजिए:
- दक्षिणी और उत्तरी अमरीका के मूल निवासियों के बीच के फ़र्कों से संबंधित किसी भी बिन्दु पर टिप्पणी करिए।
- आप उन्नीसवीं सदी के संयुक्त राज्य अमरीका में अंग्रेज़ी के उपयोग के अतिरिक्त अंग्रेज़ों के आर्थिक और सामाजिक जीवन की कौन-सी विशेषताएँ देखते हैं?
- अमरीकियों के लिए ‘फ्रंटियर’ के क्या मायने थे?
- इतिहास की किताबों में ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासियों को शामिल क्यों नहीं किया गया था?
संक्षेप में निबंध लिखिए: 5. लोगों की संस्कृति को समझाने में संग्रहालय की गैलरी में प्रदर्शित चीज़ें कितनी कामयाब रहती हैं? किसी संग्रहालय को देखने के अपने अनुभव के आधार पर सोदाहरण विचार करिए। 6. कैलिफ़ोर्निया में चार लोगों के बीच 1880 में हुई किसी मुलाक़ात की कल्पना करिए। ये चार लोग हैं: एक अफ़्रीकी ग़ुलाम, एक चीनी मज़दूर, गोल्ड रश के चक्कर में आया हुआ एक जर्मन और होपी कबीले का एक मूल निवासी। उनकी बातचीत का वर्णन करिए।
प्रश्न 6 इस अध्याय का सबसे रचनात्मक प्रश्न है और PARAKH की ‘सृजनात्मकता’ कसौटी पर पूरा उतरता है। इसका उत्तर लिखवाते समय ध्यान दिलाएँ कि चारों पात्र एक ही जगह, एक ही समय, बिलकुल अलग कारणों से पहुँचे हैं — एक ज़बरन लाया गया, एक अनुबंधित श्रमिक के रूप में आया, एक अपनी इच्छा से सोने की तलाश में आया, और एक वहीं का था। यही 19वीं सदी के वैश्विक श्रम-प्रवाह का पूरा नक्शा है।
16. महत्त्वपूर्ण तिथियाँ — एक नज़र में
| तिथि | घटना |
|---|---|
| 30,000 वर्ष पूर्व | बेरिंग भूमि-सेतु से एशिया से उत्तरी अमरीका में पहला आगमन |
| 40,000 वर्ष पूर्व | ऐबॉरिजिनीज़ का न्यू गिनी से ऑस्ट्रेलिया आगमन |
| 1492/1497–1534 | कोलंबस, जॉन कैबोट (न्यूफ़ाउंडलैंड 1497), ज़ाक कार्टियर (1534) |
| 1606, 1642, 1770, 1788 | ऑस्ट्रेलिया — डच दर्शन, तास्मान, कुक (बॉटनी खाड़ी), दंडितों की बस्ती/सिडनी |
| 1763 | ब्रिटिशों की क्यूबेक पर विजय; पोन्तियक का विरोध प्रदर्शन |
| 1776–1783 | अमरीकी स्वतंत्रता की घोषणा; 1781 मान्यता; 1783 मध्य-पश्चिम |
| 1803 | लुइज़ीआना की ख़रीद |
| 1832 | जस्टिस जॉन मार्शल का चिरोकी-पक्षीय फ़ैसला |
| 1838 | ट्रेल ऑफ़ टियर्स — 15,000 में से एक चौथाई की मृत्यु |
| 1840 | वेटंगी की संधि (न्यूज़ीलैंड); उच्चतर-निम्नतर कनाडा की यूनियन |
| 1840 का दशक | कैलिफ़ोर्निया में सोना; उत्तरी अमरीका में मानवशास्त्र का आरंभ |
| 1849 / 1851–61 | अमरीकी गोल्ड रश / ऑस्ट्रेलियाई गोल्ड रश |
| 1854 | प्रधान सिएटल का पत्र; 1855 ऑस्ट्रेलिया में चीनी आप्रवास पर रोक |
| 1861–65 | अमरीकी गृहयुद्ध; दासप्रथा का अंत |
| 1865–90 | अमरीकी इंडियन युद्ध |
| 1867 | कनाडा महासंघ; अलास्का की ख़रीद |
| 1869–85 | मेटिसों का रेड रिवर विद्रोह |
| 1870 / 1885 | सं.रा.अ. / कनाडा पारमहाद्वीपीय रेलवे |
| 1873 | कँटीले तारों की खोज |
| 1876 | कनाडा इंडियन्स एक्ट |
| 1890 | जंगली भैंसों का प्रायः उन्मूलन |
| 1892 | अमरीकी फ्रंटियर का ‘अंत’ |
| 1901 / 1911 | ऑस्ट्रेलियाई संघ / कैनबरा राजधानी |
| 1928 / 1934 | मेरिअम रिपोर्ट / इंडियन रीऑर्गनाईज़ेशन एक्ट |
| 1954 | डिक्लेरेशन ऑफ़ इंडियन राइट्स |
| 1968 | स्टैनर का ‘दि ग्रेट ऑस्ट्रेलियन साइलेंस’ |
| 1969 / 1982 | कनाडा — आदिवासी अधिकारों से इनकार / संवैधानिक मान्यता |
| 1974 | ‘गोरे ऑस्ट्रेलिया’ नीति का अंत; बहुसंस्कृतिवाद राजकीय नीति |
| 1992 | माबो केस — टेरा न्यूलिअस अवैध घोषित |
| 1995 / 1999 | बच्चों के अलगाव की राष्ट्रीय जाँच / राष्ट्रीय क्षमायाचना दिवस (26 मई) |
17. शब्दावली (Glossary)
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| आधुनिकीकरण | वह प्रक्रिया जिसमें औद्योगिक क्रांति और राजनीतिक क्रांतियों ने प्रजा को नागरिक में बदला |
| कॉलोनी (उपनिवेश) | यूरोपीय लोगों द्वारा बसाई गई बस्ती जो मातृदेश के अधीन हो |
| सेटलर (आबादकार) | उपनिवेश में जाकर स्थायी रूप से बस जाने वाला यूरोपीय |
| फ्रंटियर (सरहद) | सं.रा.अ. की खिसकती हुई पश्चिमी सीमा; 1892 में ‘समाप्त’ घोषित |
| रिज़र्वेशन | मूल निवासियों के लिए नियत छोटा क्षेत्र, प्रायः उनकी मूल भूमि से असंबद्ध |
| टेरा न्यूलिअस | लातिनी — ‘जो किसी की नहीं है’; 1992 में माबो केस में अवैध घोषित |
| स्वप्नकाल (Dreamtime) | ऑस्ट्रेलियाई मूल निवासियों की समय-अवधारणा, जिसमें अतीत और वर्तमान का अंतर धुँधला है |
| वेमपुम बेल्ट | रंगीन सीपियों से बनी पट्टी, समझौते के बाद कबीलों के बीच आदान-प्रदान |
| उदात्त उत्तम जंगली (noble savage) | रूसो से जुड़ी वह धारणा कि ‘असभ्य’ लोग सभ्यता की विकृतियों से अछूते हैं |
| मेटिस | कनाडा में यूरोपीय और मूल निवासियों के मिश्रित वंशज |
| ट्रेल ऑफ़ टियर्स | 1838 में चिरोकियों का जबरन विस्थापन |
| लोक प्रभुसत्ता | यह सिद्धांत कि राजनीतिक सत्ता जनता के हाथ में होनी चाहिए |
| नागरिक राष्ट्रवाद | भाषा-धर्म-जाति-लिंग से परे समान नागरिकता पर आधारित राष्ट्रवाद |
| जातीय राष्ट्रवाद | भाषा, धर्म या परंपरा के इर्द-गिर्द बनाया गया राष्ट्रवाद |
| मानवशास्त्र | 1840 के दशक से उत्तरी अमरीका में विकसित विषय, ‘आदिम’ और ‘सभ्य’ समुदायों के अंतर के अध्ययन हेतु |
| महान ऑस्ट्रेलियाई चुप्पी | स्टैनर (1968) का पद — मूल निवासियों के बारे में इतिहासकारों की चुप्पी |
| बहुसंस्कृतिवाद | 1974 से ऑस्ट्रेलिया की राजकीय नीति, सभी संस्कृतियों को समान आदर |