Chapter 2तीन महाद्वीपों में फैला हुआ साम्राज्य

Teaching notes66 min

NCERT — विश्व इतिहास के कुछ विषय, विषय 2 (Reprint 2026-27), पृ. 29–57

This note is written in Hindi.Read in Hindi →

खंड: दो — साम्राज्य • कालक्रम: लगभग 100 ईसा पूर्व से 1300 ईसवी

0. खंड-प्रस्तावना: साम्राज्य (पृ. 30–33)

  • मेसोपोटामिया में साम्राज्य स्थापित होने के दो सहस्राब्दी बाद तक उस क्षेत्र तथा उसके पूर्व-पश्चिम में साम्राज्य-निर्माण के विविध प्रयत्न होते रहे।
  • छठी शती ई.पू. तक ईरानियों ने असीरिया के साम्राज्य के अधिकांश भाग पर नियंत्रण स्थापित कर लिया; स्थलमार्गों के साथ-साथ भूमध्यसागरीय तटवर्ती क्षेत्रों में व्यापारिक संबंधों का विकास हुआ।
  • इन परिवर्तनों से व्यापार सुधरा → पूर्वी भूमध्यसागरीय क्षेत्र के यूनानी नगर व बस्तियाँ लाभान्वित; काला सागर के उत्तर के यायावर लोगों से घनिष्ठ व्यापारिक संपर्क का भी फ़ायदा।
  • यूनान में अधिकांश समय तक एथेंस और स्पार्टा के नगर-राज्य नागरिक जीवन के केंद्र बने रहे।
  • चतुर्थ शती ई.पू. के उत्तरार्ध में मेसीडोन (मकदूनिया) के राजा सिकंदर ने कई सैन्य अभियान किए — उत्तरी अफ़्रीका, पश्चिमी एशिया व ईरान तथा भारत में व्यास तक के क्षेत्र को जीत लिया; उसके सैनिकों ने और आगे पूर्व में जाने से मना कर दिया → सैन्य दल पीछे मुड़ गया, यद्यपि कई यूनानी इस क्षेत्र में ही रह गए।
  • हेलेनाइज़ेशन (यूनानीकरण): सिकंदर के नियंत्रण वाले पूरे क्षेत्र में यूनानियों और स्थानीय लोगों में आदर्शों और सांस्कृतिक परंपराओं का आदान-प्रदान; यूनानी भाषा इस क्षेत्र की जानी-पहचानी भाषा बन गई; सिकंदर की मृत्यु के तुरंत बाद साम्राज्य की राजनीतिक एकता विघटित; फिर भी तीन शताब्दी बाद तक यूनानी संस्कृति महत्त्वपूर्ण बनी रही — यह काल प्रायः यूनानी काल कहलाता है।
  • ! NCERT की आलोचना-दृष्टि: ‘यूनानी काल’ की मान्यता अन्य महत्त्वपूर्ण (संभवतः इससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण) संस्कृतियों — मुख्य रूप से ईरान के पुराने साम्राज्य से संबंधित ईरानी संस्कृति — की महत्ता को अस्वीकार कर देती है।

रोम का उदय (पृ. 30–31)

  • सिकंदर के साम्राज्य के विघटन से हुई राजनीतिक कलह का लाभ उठाते हुए रोम के मध्य इतालवी नगर-राज्य के छोटे किंतु सुसंगठित सैन्य बल ने दूसरी शती ई.पू. से उत्तरी अफ़्रीका और पूर्वी भूमध्यसागर पर नियंत्रण कर लिया।
  • उस समय रोम एक गणतंत्र था — सरकार निर्वाचन की जटिल व्यवस्था पर आधारित, पर राजनीतिक संस्थाएँ जन्म और धन-संपदा को महत्त्व देती थीं; समाज दासता से लाभान्वित।
  • रोम की सैन्य शक्ति ने सिकंदर के साम्राज्य का भाग रहे राज्यों के बीच व्यापार हेतु तंत्र स्थापित किया।
  • प्रथम शती ई. के मध्य — उच्च कुल में जन्मे सैन्य नायक जूलियस सीज़र के अधीन ‘रोम साम्राज्य’ वर्तमान ब्रिटेन और जर्मनी तक फैल गया।
  • लातिनी (रोम में बोली जाती) साम्राज्य की मुख्य भाषा; पूर्व के कई लोग यूनानी ही प्रयोग करते रहे; रोमवासियों में यूनानी संस्कृति के प्रति गहरा आदर-भाव।
  • प्रथम शती ई.पू. के अंतिम भाग में राजनैतिक ढाँचे में परिवर्तन (गणतंत्र → सम्राट); चतुर्थ शती ई. में सम्राट कॉन्स्टैनटाइन के ईसाई बनने के बाद साम्राज्य का काफ़ी हद तक ईसाईकरण।
  • चौथी शती ई. में शासन की सुविधा हेतु साम्राज्य पूर्वी और पश्चिमी दो हिस्सों में बँटा।
  • पश्चिम का पतन: सीमावर्ती जनजातियों (गोथ, विसीगोथ, वैंडल आदि) और रोम के बीच की व्यवस्थाएँ (व्यापार, सैन्य-भर्ती, बसने से जुड़ीं) बिगड़ने लगीं; जनजातियों के आक्रमण बढ़े; साम्राज्य के आंतरिक मतभेदों से जुड़कर — पाँचवीं शती ई. आते-आते पश्चिम का साम्राज्य नष्ट; पूर्व की सीमा के भीतर जनजातियों ने अपने-अपने राज्य स्थापित किए।
  • नौवीं शती ई. में ईसाई चर्च के प्रोत्साहन से ऐसे कुछ राज्यों को मिलाकर पवित्र रोमन साम्राज्य (Holy Roman Empire) की स्थापना — इसने पुराने रोमन साम्राज्य के साथ निरंतरता का दावा किया।

अरब साम्राज्य और मंगोल (पृ. 32–33)

  • सातवीं–पंद्रहवीं शती ई. के बीच पूर्वी रोमन साम्राज्य (कुंस्तुनतुनिया-केंद्रित) की अधिकांश भूमि पर अरब साम्राज्य ने अधिकार कर लिया।
  • दमिश्क में केंद्रित यह अरब साम्राज्य पैगम्बर मुहम्मद (जिन्होंने सातवीं शती ई. में इस्लाम धर्म की स्थापना की) के अनुयायियों या उनके उत्तराधिकारियों (जिन्होंने आरंभ में बगदाद से शासन किया) द्वारा स्थापित। (नोट: पाठ में एक स्थान पर ‘नवीं शती’ छपा है, पर आगे पृ. 33 व 54 पर स्पष्टतः ‘सातवीं शती’ — वही मानक तथ्य है।)
  • इस इलाके की यूनानी व इस्लामी परंपराओं के बीच करीबी आदान-प्रदान।
  • इस क्षेत्र के व्यापारिक तंत्र और समृद्धि ने उत्तर के पशुचारी लोगों (विभिन्न तुर्की जनजातियों) को आकर्षित किया — इन्होंने शहरों पर आक्रमण कर नियंत्रण किया।
  • आक्रमण के अंतिम प्रयासकर्ता — मंगोल; चंगेज़ ख़ान और उसके उत्तराधिकारियों के अधीन मंगोलों ने तेरहवीं शताब्दी में पश्चिम एशिया, यूरोप, मध्य एशिया और चीन में प्रवेश किया।
  • साम्राज्यों का साझा प्रेरक-तत्त्व: ये सारे प्रयास पूरे क्षेत्र में फैले व्यापारिक तंत्र के संसाधनों पर नियंत्रण की चाह से प्रेरित थे — ताकि भारत या चीन जैसे देशों से स्थापित संबंधों से फ़ायदा हो।
  • सभी साम्राज्यों ने व्यापार को स्थिरता देने के लिए प्रशासनिक व्यवस्था विकसित करने और विभिन्न तरीकों के सैन्य संगठन का प्रयास किया; किसी साम्राज्य की उपलब्धियों की महत्ता प्रायः उनके उत्तराधिकारियों द्वारा ग्रहण की जाती थी।
  • कुछ समय बाद इस क्षेत्र में बोली-लिखी जाने वाली भाषाओं में चार भाषाएँ — फ़ारसी, यूनानी, लातिनी और अरबी — महत्त्वपूर्ण हो गईं।
  • अस्थिरता के कारण: (1) विभिन्न क्षेत्रों के संसाधनों को लेकर आपसी लड़ाई-झगड़े; (2) साम्राज्यों और उत्तर के पशुचारी लोगों के संबंधों में आए संकट।
  • पशुचारकों से संबंध: साम्राज्यों को व्यापार में समर्थन भी मिलता था; उनकी सेनाओं और उत्पादों के लिए श्रम भी इन्हीं से मिलता था।
  • महत्त्वपूर्ण: सभी साम्राज्य नगर-केंद्रित नहीं थे — चंगेज़ ख़ान और उत्तराधिकारियों का मंगोल साम्राज्य अच्छा उदाहरण कि पशुचारी लोगों द्वारा भी एक लंबे समय तक साम्राज्य कायम रखा जा सकता है।
  • धर्म की भूमिका: ऐसे धर्म जो अलग-अलग भाषाएँ बोलने वाले, विभिन्न नृजातीय उत्पत्ति के लोगों को आकर्षित कर सकते थे, विशाल साम्राज्य-निर्माण की दृष्टि से बहुत महत्त्वपूर्ण — यह ईसाई धर्म (प्रथम शती ई. के आरंभिक काल में फ़िलिस्तीन में उदित) और इस्लाम धर्म (सातवीं शती ई. में उद्भूत) दोनों के विषय में सत्य।

0क. कालक्रम दो (पृ. 34–37) — लगभग 100 ई.पू. से 1300 ईसवी

  • इस कालक्रम के केंद्र-बिंदु राज्य और साम्राज्य हैं; कुछ (जैसे रोमन साम्राज्य) तीन महाद्वीपों में फैले थे।
  • इस काल में प्रमुख धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराएँ विकसित हुईं; बौद्धिक गतिविधियों से जुड़ी संस्थाओं का उदय; पुस्तकें लिखी गईं; विचार महाद्वीपों के आर-पार फैले; कई वस्तुएँ जो आज दैनिक जीवन का हिस्सा हैं, पहली बार प्रयोग में आईं।

चयनित प्रविष्टियाँ (क्षेत्रवार)

तिथिअफ़्रीकायूरोप
100–50 ई.पू.समुद्री मार्गों से दक्षिण-पूर्वी एशिया से केले पूर्वी अफ़्रीका लाए गएस्पार्टेकस 100,000 गुलामों का नेतृत्व करते हैं
50–1 ई.पू.क्लियोपेट्रा, मिस्र की रानी (51–30 ई.पू.)रोम में कोलोसियम का निर्माण (73 ई.पू.)
100–150सिकंदरिया के हीरो/नायक ने भाप से चलने वाली मशीन बनाईरोमन साम्राज्य अपने शिखर पर
150–200सिकंदरिया के टॉलेमी ने भूगोल पर पुस्तक लिखी—
300–350एक्सम (Axum) में ईसाई धर्म की शुरुआत (330)कॉन्स्टैनटाइन सम्राट बनते हैं और कुंस्तुनतुनिया नगर की स्थापना करते हैं
350–400—रोमन साम्राज्य का पूर्व-पश्चिम दो बराबर भागों में विभाजन
400–450यूरोप के वैंडल लोगों द्वारा उत्तर अफ़्रीका में राज्य (429)उत्तर-मध्य यूरोप के कबीलों का रोमन साम्राज्य पर आक्रमण
450–500—गॉल (फ्रांस) के क्लोविस का ईसाई धर्म अपनाना (496)
500–550—इटली में सेंट बेनेडिक्ट का मठ (526); इंग्लैंड में सेंट ऑगस्टीन द्वारा ईसाई धर्म की शुरुआत (596); ग्रेगो महान (590) द्वारा रोमन कैथोलिक चर्च की नींव
600–650कुछ मुसलमानों का अबीसीनिया (615) प्रवास (हिजरा)—
650–700अरब मुसलमानों की मिस्र के दक्षिण नूबिया से संधि (652)बेड द्वारा अंग्रेज़ी चर्च और व्यक्तियों का इतिहास
800–850घाना में राज्य का उदयशार्लेमेन — फ्रैंकों के राजा को पवित्र रोमन सम्राट की उपाधि (800)
850–900—कीव और नोवगोरॉड में प्रथम रूसी राज्य
900–950—पश्चिम यूरोप पर समुद्री दस्युओं (वाइकिंग) के आक्रमण
1000–50—इटली के सेलेरनो में मेडिकल स्कूल (1030)
1050–1100अलमोरिवद राज्य (1056–1147) का घाना से दक्षिण स्पेन तक विस्तारनॉर्मंडी के विलियम का इंग्लैंड पर आक्रमण (1066); प्रथम धर्मयुद्ध की घोषणा (1095)
1100–50ज़िम्बाब्वे — सोने-ताँबे की शिल्पकृतियाँ, लंबी दूरी के व्यापार का केंद्र (1120–1450)—
1150–1200—नोत्रे दम कैथीड्रल का निर्माण-आरंभ (1163)
1200–50इथियोपिया में ईसाई चर्च (1200); माली में टिंबकटू शिक्षा-केंद्रअसीसी के सेंट फ्रांसिस का मठ-संगठन (1209); मैग्नाकार्टा पर हस्ताक्षर — इंग्लैंड के लॉर्ड्स का विद्रोह, राजा कानून के अनुसार शासन को सहमत
1250–1300—आस्ट्रिया में 1918 तक राज्य करने वाले हेप्सबर्ग वंश की स्थापना

(कोलोसियम की तिथि पुस्तक में ‘73 ई.पू.’ छपी है; वास्तविक निर्माण 70–80 ईसवी — बोर्ड-उत्तर में NCERT का अनुसरण करें, शिक्षक भेद जानें।)

तिथिएशियादक्षिणी एशिया
100–50 ई.पू.चीन में हान साम्राज्य; एशिया से यूरोप तक रेशम मार्ग का विकासशक और बाख्त्री यूनानियों द्वारा उत्तर-पश्चिम में राज्य; दक्कन में सातवाहनों का उदय
50–1 ई.पू.—दक्षिण/द.पू./पूर्व एशिया और यूरोप से बढ़ता व्यापार
1–50 ईसवीरोम के प्रांत जूडिया में ईसा; अरब पर रोमन आक्रमण (24)—
50–100—उत्तर-पश्चिम व मध्य एशिया में कुषाण राज्य
100–150चीन में कागज़ का आविष्कार (118); प्रथम भूकंप-लेखी (132)—
200–250हान साम्राज्य का अंत (221); फ्रांस(?) में ससानियों का राज्य (226 — ईरान)—
250–300राजमहल में चाय, चीन (262); चुंबकीय कुतुबनुमा का प्रयोग, चीन (270)—
300–350चीनियों द्वारा घुड़सवारी में रकाब का प्रयोगगुप्त वंश की स्थापना (320)
350–400—फा-शियन की चीन से भारत यात्रा (399)
400–450—आर्यभट्ट — खगोलज्ञ और गणितज्ञ
550–600जापान में बौद्ध धर्म (594); चीन में ग्रैंड कैनाल (584–618, 50 लाख श्रमिक)एहोल और बादामी में चालुक्य मंदिर
600–650चीन में तांग वंश (618); हज़रत मुहम्मद का मदीना प्रस्थान — हिजरी युग का आरंभ (622); ससानी साम्राज्य का पतन (642)जुआन जांग की भारत-यात्रा; नालंदा शिक्षा-केंद्र के रूप में उदय
650–700उमय्या ख़िलाफ़त (661–750)—
700–750उमय्या की स्पेन पर विजय; चीन में तांग वंशअरबों की सिंध पर विजय (712)
750–800अब्बासी ख़िलाफ़त की स्थापना; बगदाद मुख्य सांस्कृतिक-वाणिज्यिक केंद्र—
800–850कम्बोडिया में खमेर राज्य (802)—
850–900प्रथम मुद्रित पुस्तक, चीन (868)—
950–1000चीन में कागज़ी मुद्रा—
1000–50इब्न सिना — फ़ारसी डॉक्टर, चिकित्सा-ग्रंथमहमूद ग़ज़नी का आक्रमण; अलबरूनी का आगमन; तंजौर में राजराजेश्वर मंदिर
1050–1100अल्प अरसालान द्वारा तुर्की (सल्जूक़) साम्राज्य (1075)—
1100–50चीन में आतिशबाज़ी का पहला लिखित विवरणकल्हण — राजतरंगिणी
1150–1200कंबोडिया का अंकोर साम्राज्य चरम पर (1180), अंकोर वाट—
1200–50चंगेज़ ख़ान द्वारा सत्ता सुदृढ़ (1206)दिल्ली सल्तनत की स्थापना (1206)
1250–1300चंगेज़ का पोता कुबलई ख़ान चीन का सम्राटअमीर खुसरो (1253–1325); कोणार्क का सूर्य मंदिर
तिथिअमरीकाआस्ट्रेलिया/प्रशांत द्वीप
300–350मेक्सिको में टीयोटीहुकान (Teotihuacan) नगर-राज्य; माया के आनुष्ठानिक केंद्र, खगोल शास्त्र, चित्रमय लिपि—
950–1000उत्तर अमरीका में प्रथम नगर (~990)पोलीनेशिया के मोरी मार्ग-निर्देशकों द्वारा न्यूज़ीलैंड की खोज
1050–1100—पोलीनेशिया के द्वीपों में शकरकंद की पैदावार (मूलतः दक्षिण अमरीका की)

क्रियाकलाप (पृ. 37): ऐसी पाँच घटनाएँ/प्रक्रियाएँ बताइए जिनमें लोगों का विभिन्न क्षेत्रों/महाद्वीपों के आर-पार आवागमन रहा; उनका अपने समय में क्या महत्त्व था?

1. प्रस्तावना: रोम साम्राज्य और स्रोत-सामग्री (पृ. 38)

  • रोम साम्राज्य के विशाल राज्य क्षेत्र में आज का अधिकांश यूरोप और उर्वर अर्द्धचंद्राकार क्षेत्र (Fertile Crescent — पश्चिमी एशिया) तथा उत्तरी अफ़्रीका का बहुत बड़ा हिस्सा शामिल था।
  • अध्याय के प्रश्न: साम्राज्य का गठन कैसे हुआ; किन राजनीतिक ताकतों ने भाग्य बनाया-सँवारा; लोग किन सामाजिक समूहों में विभाजित थे।
  • साम्राज्य अनेक स्थानीय संस्कृतियों तथा भाषाओं के वैभव से संपन्न; स्त्रियों की कानूनी स्थिति काफ़ी सुदृढ़ (आज के अनेक देशों में भी वैसी नहीं); पर अर्थव्यवस्था बहुत कुछ दास-श्रम पर चलती थी → जनता का अच्छा-खासा भाग स्वतंत्रता से वंचित।
  • पाँचवीं शताब्दी से पश्चिम में साम्राज्य छिन्न-भिन्न, पर पूर्वी आधा भाग अखंड और अत्यंत समृद्ध बना रहा।
  • आगे का सूत्र: अगले अध्याय (विषय) में खिलाफ़त — वह इसी समृद्धि की नींव पर स्थापित हुई और उसने इसकी शहरी तथा धार्मिक परंपराओं को विरासत में पाया।

स्रोत-सामग्री के तीन वर्ग (पृ. 38)★

वर्गविवरण
(क) पाठ्य सामग्री (Texts)समकालीन व्यक्तियों द्वारा लिखा इतिहास — ‘वर्ष-वृत्तांत’ (Annals) (वृत्तांत प्रतिवर्ष लिखे जाते थे); पत्र, व्याख्यान, प्रवचन, कानून आदि
(ख) प्रलेख/दस्तावेज़ (Documents)मुख्यतः उत्कीर्ण अभिलेख (पत्थर की शिलाओं पर — नष्ट नहीं हुए; यूनानी और लातिनी में बड़ी मात्रा में) और पैपाइरस के पत्तों पर लिखी पांडुलिपियाँ; पैपाइरस — सरकंडा-जैसा पौधा, मिस्र में नील नदी के किनारे; रोज़मर्रा में व्यापक प्रयोग; हज़ारों संविदापत्र, लेख, संवादपत्र, सरकारी दस्तावेज़ आज भी प्राप्त; इनका अध्ययन-प्रकाशन करने वाले विद्वान = पैपाइरोलॉजिस्ट
(ग) भौतिक अवशेष (Material remains)पुरातत्त्वविदों द्वारा खुदाई/क्षेत्र-सर्वेक्षण से — इमारतें, स्मारक व अन्य संरचनाएँ, मिट्टी के बर्तन, सिक्के, पच्चीकारी (Mosaics), यहाँ तक कि संपूर्ण भू-दृश्य (हवाई छायांकन से)
  • प्रत्येक स्रोत एक ही प्रकार की जानकारी देता है; इन्हें मिलाकर देखना अत्यंत उपयोगी; पर स्रोतों के तथ्यों में अंतर्संबंध कितनी अच्छी तरह बनता है — यह इतिहासकार की कुशलता पर निर्भर।

2. दो महाशक्तियाँ — रोम और ईरान (पृ. 39)

  • ईसा मसीह के जन्म से लेकर सातवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध (630 के दशक) तक — यूरोप, उत्तरी अफ़्रीका, मध्य-पूर्व के विशाल क्षेत्र पर दो सशक्त साम्राज्य: रोम और ईरान।
  • दोनों प्रतिद्वंद्वी, इतिहास के अधिकांश काल में आपस में लड़ते रहे; साम्राज्य एक-दूसरे के बिलकुल पास — केवल फ़रात नदी के किनारे की भूमि की संकरी पट्टी उन्हें अलग करती थी।
  • रोम की भौगोलिक स्थिति: यूरोप-अफ़्रीका के महाद्वीपों को अलग करने वाला समुद्र — भूमध्यसागर (Mediterranean) — पश्चिम में स्पेन से पूर्व में सीरिया तक; यह रोम साम्राज्य का हृदय था; रोम का भूमध्यसागर और उत्तर-दक्षिण दोनों दिशाओं में सागर के आसपास के सभी प्रदेशों पर प्रभुत्व।
  • सीमाएँ: उत्तर — दो महान नदियाँ राइन और डैन्यूब; दक्षिण — सहारा नामक अति विस्तृत रेगिस्तान।
  • ईरान: कैस्पियन सागर के दक्षिण से पूर्वी अरब तक का समूचा इलाका; कभी-कभी अफ़गानिस्तान के कुछ हिस्से भी नियंत्रण में।
  • इन दो शक्तियों ने दुनिया के उस अधिकांश भाग को बाँट रखा था जिसे चीनी लोग ‘ता-चिन’ (बृहत्तर चीन या मोटे तौर पर पश्चिम) कहा करते थे।
  • मानचित्र 1 (पृ. 39): यूरोप और उत्तरी अफ़्रीका — गॉल, एक्विटानिया, हिसपेनिया, बेटिका, गुआदल क्विवर नदी, मोरक्को, नुमिदिया, कार्थेज, अफ़्रीका प्रोकॉनस्युलेरीस, त्रिपोलितानिया, काईरीनेशिया, मिस्र (नील, फ़य्यूम), सिकंदरिया, दमिश्क, ऐंटीओक, एफिसिस, मकदूनिया, कुंस्तुनतुनिया, काला सागर, एड्रियाटिक-एजियन-टिरेनियन सागर, आल्प्स, राइन-डैन्यूब, रोम-नेपल्स-कंपेनिया-सिसली, सहारा मरुस्थल।

3. साम्राज्य का आरंभिक काल (पृ. 40–43)

3.1 दो चरण और दो साम्राज्यों की तुलना

  • रोमन साम्राज्य के दो चरण: ‘पूर्ववर्ती’ और ‘परवर्ती’ — विभाजक: तीसरी शताब्दी; तीसरी शताब्दी के मुख्य भाग तक की संपूर्ण अवधि = ‘पूर्ववर्ती साम्राज्य’, उसके बाद = ‘परवर्ती साम्राज्य’।
  • सांस्कृतिक तुलना: रोमन साम्राज्य ईरान की तुलना में कहीं अधिक विविधतापूर्ण; ईरान पर इस अवधि में पार्थियाई तथा बाद में ससानी राजवंशों का शासन — जिन पर शासन हुआ उनमें अधिकतर ईरानी; इसके विपरीत रोमन साम्राज्य क्षेत्रों-संस्कृतियों का मिलाजुला रूप, जो मुख्यतः सरकार की एक साझी प्रणाली से एक-दूसरे से जुड़े थे।
  • भाषाएँ: अनेक भाषाएँ बोली जाती थीं, पर प्रशासन के प्रयोजन हेतु केवल लातिनी और यूनानी; पूर्वी भाग के उच्चतर वर्ग यूनानी बोलते-लिखते थे, पश्चिमी भाग के लातिनी; इन भाषाओं की सीमा-रेखा भूमध्यसागर को चीरती हुई त्रिपोलितानिया (लातिनी-भाषी) और सायरेनाएका (यूनानी-भाषी) के बीच से जाती थी।
  • साम्राज्य में रहने वाले सभी एकमात्र शासक — सम्राट — की प्रजा थे, चाहे कहीं भी रहते हों, कोई भी भाषा बोलते हों।

3.2 प्रिंसिपेट और सैनेट

  • प्रथम सम्राट ऑगस्टस ने 27 ई.पू. में जो राज्य स्थापित किया = ‘प्रिंसिपेट’ (Principate); ऑगस्टस एकछत्र शासक और सत्ता का वास्तविक स्रोत, तथापि यह कल्पना जीवित रखी गई कि वह वास्तव में ‘प्रमुख नागरिक’ (Princeps — लातिनी अर्थ) है, निरंकुश शासक नहीं — ऐसा सैनेट को सम्मान देने के लिए किया गया।
  • सैनेट (Senate): वह निकाय जिसने रोम के ‘रिपब्लिक’ यानी गणतंत्र-काल में सत्ता पर नियंत्रण रखा था; कई शताब्दियों तक अस्तित्व; इसमें कुलीन एवं अभिजात वर्गों — मुख्यतः रोम के धनी परिवारों — का प्रतिनिधित्व; आगे चलकर इतालवी मूल के ज़मींदार भी शामिल।
  • साइड-बॉक्स (पृ. 40): इस साम्राज्य में ‘गणतंत्र’ (रिपब्लिक) ऐसी शासन-व्यवस्था थी जिसमें वास्तविक सत्ता ‘सैनेट’ में निहित; सैनेट पर धनवान परिवारों के एक छोटे-से समूह — अभिजात (Aristocracy) — का बोलबाला; व्यावहारिक तौर पर गणतंत्र = अभिजात वर्ग की सरकार का सैनेट के माध्यम से शासन; गणतंत्र 509 ई.पू. से 27 ई.पू. तक चला; 27 ई.पू. में जूलियस सीज़र के दत्तक पुत्र तथा उत्तराधिकारी ऑक्टेवियन ने तख्ता पलटकर सत्ता हाथ में ली और ऑगस्टस नाम से सम्राट बना; सैनेट की सदस्यता जीवन-भर — उसके लिए जन्म की अपेक्षा धन और पद-प्रतिष्ठा को अधिक महत्त्व।
  • रोम के इतिहास की अधिकांश पुस्तकें (यूनानी-लातिनी में) इन्हीं (सैनेटर) लोगों द्वारा लिखी गईं → सम्राटों की परख इस बात से होती थी कि वे सैनेट के प्रति किस तरह का व्यवहार रखते थे; सबसे बुरे सम्राट वे माने जाते थे जो सैनेट-सदस्यों से शत्रुतापूर्ण व्यवहार, शक, क्रूरता या हिंसा करते थे; कई सैनेटर गणतंत्र-युग में लौटने को तरसते थे, पर अधिकतर को अहसास था कि यह असंभव है।

3.3 सेना — तीसरी प्रमुख संस्था

  • सम्राट और सैनेट के बाद साम्राज्यिक शासन की प्रमुख संस्था = सेना।
  • तुलना: फ़ारस (ईरान) के साम्राज्य में बलात् भर्ती वाली सेना (पाद-टिप्पणी: बलात् भर्ती — कुछ वर्गों/समूहों के वयस्क पुरुषों को अनिवार्य रूप से सैनिक सेवा); रोम की सेना व्यावसायिक सेना (Professional/Paid army) — प्रत्येक सैनिक को वेतन; न्यूनतम 25 वर्ष सेवा अनिवार्य; वेतनभोगी सेना रोमन साम्राज्य की एक ख़ास विशेषता।
  • सेना सबसे बड़ा एकल संगठित निकाय — चौथी शताब्दी तक 6,00,000 सैनिक; सम्राटों का भाग्य निर्धारित करने की शक्ति रखती थी।
  • सैनिक बेहतर वेतन और सेवा-शर्तों के लिए लगातार आंदोलन करते रहते थे — प्रायः सैनिक विद्रोहों का रूप।
  • ! स्रोत-सजगता (NCERT): रोम-सेना की जो तस्वीर हमारे सामने है वह सैनेट के प्रति सहानुभूति रखने वाले इतिहासकारों द्वारा तैयार की गई थी; सैनेट सेना से घृणा करती थी और डरती थी — क्योंकि वह अप्रत्याशित हिंसा का स्रोत थी, विशेषकर तीसरी शताब्दी की तनावपूर्ण परिस्थितियों में जब सरकार को बढ़े सैन्य खर्च हेतु भारी कर लगाने पड़े।
  • निष्कर्ष: सम्राट, अभिजात वर्ग और सेना — साम्राज्य के राजनीतिक इतिहास के तीन मुख्य ‘खिलाड़ी’; सम्राट की सफलता सेना पर नियंत्रण पर निर्भर; सेनाएँ विभाजित हों → परिणाम सामान्यतः गृहयुद्ध (पाद-टिप्पणी: गृहयुद्ध — अपने ही देश में सत्ता के लिए सशस्त्र संघर्ष; दूसरे देशों से संघर्ष के विपरीत)।
  • 69 ईस्वी — एक ही वर्ष में एक के बाद एक कुल मिलाकर चार सम्राट गद्दी पर बैठे; इस वर्ष को छोड़कर पहली दो शताब्दियों में कोई बड़ा गृहयुद्ध नहीं — अपेक्षाकृत शांति।
  • उत्तराधिकार: सिंहासन यथासंभव पारिवारिक वंशक्रम पर आधारित — नैसर्गिक अथवा दत्तक (Adopted) उत्तराधिकारी; सेना भी इस सिद्धांत को पूरी तरह मानती थी; उदाहरण — टिबेरियस (Tiberius, 14–37 ईस्वी), रोम सम्राटों की लंबी कतार में दूसरा, ऑगस्टस का अपना पुत्र नहीं था — सत्ता के सहज परिवर्तन हेतु ऑगस्टस ने उसे गोद ले लिया था।

3.4 विस्तार और युद्ध

  • प्रथम दो शताब्दियों में अन्य देशों के साथ युद्ध बहुत कम — ऑगस्टस-टिबेरियस द्वारा प्राप्त साम्राज्य पहले ही लंबा-चौड़ा; और विस्तार अनावश्यक प्रतीत होता था।
  • ऑगस्टस का शासन काल ‘शांति’ के लिए याद किया जाता है — दशकों के आंतरिक संघर्ष और सदियों की सैनिक विजयों के बाद आई शांति।
  • साम्राज्य के प्रारंभिक विस्तार में एकमात्र अभियान — सम्राट ट्राजान (Trajan) का 113–17 ईस्वी में फ़रात के पार के क्षेत्रों पर निरर्थक कब्ज़ा; उत्तराधिकारियों ने उन इलाकों को छोड़ दिया।

बॉक्स (पृ. 41): सम्राट ट्राजान का स्वप्न — भारत की विजय?

“तत्पश्चात् भयंकर भूकंप से पीड़ित ऐंटिऑक में सर्दियों के बाद (115/16), 116 में ट्राजान फ़रात नदी के रास्ते आगे बढ़ता हुआ पार्थियन की राजधानी टेसीफ़ून तक चला गया और फिर वहाँ फ़ारस की खाड़ी के सिरे पर पहुँच गया। (इतिहासकार) कैसियस डियो (Cassius Dio) के अनुसार वहाँ पर वह भारत की ओर जाने वाले किसी वाणिज्यिक पोत को लालायित नज़रों से देख रहा था और चाह रहा था कि काश वह सिकंदर जैसा जवान होता।” — स्रोत: फरगस मिल्लर, दि रोमन नीयर ईस्ट

3.5 प्रत्यक्ष शासन, निकटवर्ती पूर्व और शहरीकरण (पृ. 42–43)

  • इस काल की विशेष उपलब्धि: प्रत्यक्ष शासन का क्रमिक विस्तार — अनेक आश्रित राज्यों को रोम के प्रांतीय राज्य-क्षेत्र में मिला लिया गया।
  • निकटवर्ती पूर्व ऐसे (आश्रित) राज्यों से भरा था; दूसरी शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों तक फ़रात के पश्चिम (रोम-क्षेत्र की ओर) के राज्य रोम द्वारा हड़प लिए गए। (साइड-बॉक्स: ये स्थानीय राज्य रोम के ‘आश्रित’ (Client states) थे — रोम को भरोसा था कि ये शासक अपनी सेनाओं का प्रयोग रोम के समर्थन में करेंगे; बदले में रोम ने उन्हें अलग अस्तित्व दिया।)
  • ये आश्रित राज्य अत्यंत समृद्ध — हेरॉड के राज्य से प्रतिवर्ष 54 लाख दीनारियस (= 1,25,000 कि.ग्रा. सोने) के बराबर आमदनी! दीनारियस (Denarius) = रोम का चाँदी का सिक्का, जिसमें लगभग 4.5 ग्राम विशुद्ध चाँदी।
  • (साइड-बॉक्स: ‘निकटवर्ती पूर्व’ (Near East) — रोमन साम्राज्य के भूमध्यसागरीय क्षेत्र के लोगों की दृष्टि से भूमध्यसागर के बिलकुल पूर्व का इलाका — मुख्यतः सीरिया, फ़िलिस्तीन और मेसोपोटामिया के प्रांत, और मोटे तौर पर आसपास के क्षेत्र, जैसे अरब।)
  • इटली के सिवाय (जिसे उन शताब्दियों में प्रांत नहीं माना जाता था) साम्राज्य के सभी क्षेत्र प्रांतों में बँटे थे और उनसे कर वसूला जाता था।
  • दूसरी शताब्दी में चरमोत्कर्ष: रोमन साम्राज्य स्कॉटलैंड से आर्मेनिया की सीमाओं तक और सहारा से फ़रात और कभी-कभी उससे भी आगे तक फैला।
  • बड़ा प्रश्न: आज-जैसी सरकार के बिना सम्राट इतने विशाल, विविध इलाकों पर — जिनकी आबादी दूसरी शताब्दी के मध्य में लगभग 6 करोड़ थी — नियंत्रण कैसे रखते थे? उत्तर: साम्राज्य के शहरीकरण में खोजा जा सकता है।
  • नगर-आधारित प्रणाली: दूर-दूर तक अनेक नगर स्थापित; भूमध्यसागर के तटों पर स्थापित बड़े शहरी केंद्र — कार्थेज, सिकंदरिया तथा ऐंटिऑक इनमें सबसे बड़े — साम्राज्यिक प्रणाली के मूल आधार।
  • इन्हीं शहरों के माध्यम से ‘सरकार’ प्रांतीय ग्रामीण क्षेत्रों पर कर लगाने में सफल होती थी — जिनसे साम्राज्य को अधिकांश धन-संपदा प्राप्त होती थी।
  • स्थानीय उच्च वर्ग रोमन साम्राज्य को कर वसूली और अपने क्षेत्रों के प्रशासन के कार्य में सक्रिय सहायता देते थे → इटली और प्रांतों के बीच सत्ता का आकस्मिक अंतरण — रोम के राजनीतिक इतिहास का अत्यंत रोचक पहलू।
  • दूसरी-तीसरी शताब्दियों के दौरान अधिकतर प्रशासक तथा सैनिक अफसर इन्हीं (प्रांतीय) उच्चतर वर्गों से; यह नया संभ्रांत वर्ग सैनेट के सदस्यों की तुलना में कहीं अधिक शक्तिशाली — क्योंकि उसे सम्राटों का समर्थन प्राप्त था।
  • सम्राट गैलीनस (Gallienus, 253–68) ने सैनेटरों को सैनिक कमान से हटाकर इस नए वर्ग के उदय को सुदृढ़ किया — कहा जाता है कि गैलीनस ने सैनेटरों की सेना में सेवा या पहुँच पर पाबंदी लगा दी ताकि साम्राज्य का नियंत्रण उनके हाथों में न जाने पाए।
  • संक्षेप में: पहली शताब्दी के बाद, दूसरी और तीसरी शताब्दी के प्रारंभ में सेना तथा प्रशासन में अधिकाधिक लोग प्रांतों से लिए जाने लगे — क्योंकि इन क्षेत्रों के लोगों को नागरिकता मिल चुकी थी जो पहले इटली तक सीमित थी; सैनेट पर कम-से-कम तीसरी शताब्दी तक इतालवी मूल का प्रभुत्व रहा, बाद में प्रांतों से लिए गए सैनेटर बहुसंख्यक; इटली का पतन — राजनीतिक व आर्थिक दोनों दृष्टियों से; भूमध्यसागर के अपेक्षाकृत अधिक समृद्ध और शहरीकृत भागों — जैसे स्पेन के दक्षिणी हिस्से, अफ़्रीकी और पूर्वी भाग — में नए संभ्रांत वर्गों का उदय।
  • (चित्र, पृ. 41: रोम के फोरम जूलियम की दुकानें — पुराने रोमन फोरम के विस्तार हेतु 51 ई.पू. के बाद स्तम्भों वाला चौक (पिआज़ा); पृ. 42: नाइम्स (फ्रांस) के पास पान दु गार्ड (Pont du Gard) — प्रथम सदी ई. में रोम के इंजीनियरों द्वारा पानी ले जाने हेतु बनाए गए विशाल जलसेतुओं (Aqueducts) का उदाहरण।)

3.6 नगर की परिभाषा और शहरी सुविधाएँ (पृ. 43)

  • रोम के संदर्भ में नगर = ऐसा शहरी केंद्र जिसके पास —
    1. अपने दंडनायक (मजिस्ट्रेट),
    2. नगर परिषद (सिटी काउंसिल),
    3. एक सुनिश्चित राज्य-क्षेत्र जिसमें उसके अधिकार-क्षेत्र में आने वाले कई ग्राम शामिल।
  • किसी शहर के अधिकार-क्षेत्र में दूसरा शहर नहीं हो सकता था, पर गाँव लगभग हमेशा होते थे; शाही अनुकम्पा (या नाराज़गी) से गाँवों को शहर का दर्जा और शहरों को गाँव का दर्जा दिया जा सकता था।
  • शहर में रहने का लाभ: खाने की कमी और अकाल के दिनों में भी ग्रामीण इलाकों की तुलना में बेहतर सुविधाएँ मिलने की संभावना।

बॉक्स (पृ. 43): डॉक्टर गैलेन के अनुसार रोमन शहरों का ग्रामीण क्षेत्रों के साथ बर्ताव

“कई प्रांतों में लगातार कई वर्षों से पड़ रहे अकाल ने… यह बता दिया कि लोगों में कुपोषण के कारण बीमारियाँ हो रही हैं। शहर में रहने वाले लोगों का फ़सल कटाई के शीघ्र बाद अगले पूरे वर्ष के लिए पर्याप्त खाद्यान्न अपने भंडारों में भर लेना एक रिवाज था। सारा गेहूँ, जौ, सेम तथा मसूर और दालों का काफ़ी बड़ा हिस्सा शहरियों द्वारा ले जाने के बाद… किसानों के लिए बची रह गईं… सर्दियों के लिए जो कुछ भी बचा था, उसे खा-पीकर खत्म कर देने के पश्चात् देहाती लोगों को वसंत ऋतु में अस्वास्थ्यकर खाद्यों पर निर्भर रहना पड़ा; उन्होंने पेड़ों की टहनियाँ, छालें, जड़ें, झाड़ियाँ, अखाद्य पेड़-पौधे और पत्ते खाकर किसी तरह अपने प्राणों को बचाए रखा।” — गैलेन, ऑन गुड एण्ड बैड डाइट

  • शहरी जीवन की ख़ास विशेषताएँ: सार्वजनिक स्नान-गृह (एक ईरानी शासक ने ईरान में स्नान-गृह शुरू करने का प्रयत्न किया तो उसे वहाँ के पुरोहित वर्ग के क्रोध का सामना करना पड़ा — जल पवित्र वस्तु; सार्वजनिक स्नान में उन्हें जल का अपवित्रीकरण दिखता था); शहरी लोगों को उच्च-स्तर के मनोरंजन उपलब्ध — एक कैलेंडर से ज्ञात कि वर्ष में कम से कम 176 दिन कोई-न-कोई मनोरंजक कार्यक्रम या प्रदर्शन (Spectacula) अवश्य होता था!
  • (चित्र: रोमन छावनी विन्दोनिसा — आधुनिक स्विट्ज़रलैंड — में एक रंगशाला (Amphitheatre), प्रथम शती ई.; प्रयोग सैन्य क़वायद और सैनिकों के मनोरंजन हेतु।)
  • क्रियाकलाप 1: रोमन साम्राज्य के राजनीतिक इतिहास के तीन मुख्य ‘खिलाड़ी’ कौन? प्रत्येक पर एक-दो पंक्तियाँ; सम्राट इतने बड़े साम्राज्य पर शासन कैसे करता था? किसका सहयोग महत्त्वपूर्ण था?

4. तीसरी-शताब्दी का संकट (पृ. 44)

  • पहली-दूसरी शताब्दियाँ = शांति, समृद्धि, आर्थिक विस्तार; तीसरी शताब्दी = आंतरिक तनाव के पहले बड़े संकेत।
  • 230 के दशक से साम्राज्य को कई मोर्चों पर एक साथ जूझना पड़ा —
    • ईरान में 225 ईस्वी में अधिक आक्रामक ससानी वंश (Sasanians) का उदय (इस वंश के लोग स्वयं को ‘ससानी’ कहते थे); केवल 15 वर्षों के भीतर वह तेज़ी से फ़रात की दिशा में फैला।
    • शापुर प्रथम (Shapur I) — ईरान का शासक — ने तीन भाषाओं में खुदे एक प्रसिद्ध शिलालेख में दावा किया कि उसने 60,000 की रोमन सेना का सफ़ाया कर दिया और रोम की पूर्वी राजधानी ऐंटिऑक पर कब्ज़ा भी कर लिया।
    • इसी बीच जर्मन मूल की कई जनजातियाँ — अथवा राज्य समुदाय — (प्रमुख: एलमन्नाइ, फ्रैंक और गोथ) राइन तथा डैन्यूब नदी की सीमाओं की ओर बढ़ने लगीं; 233 से 280 तक की समूची अवधि में उन प्रांतों की पूरी सीमा पर — काला सागर से आल्पस और दक्षिणी जर्मनी तक — बार-बार आक्रमण।
    • रोमवासियों को डैन्यूब से आगे का बहुत सारा क्षेत्र छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा; इस काल के सम्राट उन लोगों के विरुद्ध लगातार युद्ध करते रहे जिन्हें रोमवासी ‘विदेशी बर्बर’ (Barbarians) कहा करते थे।
  • सम्राटों की अदला-बदली: तीसरी शताब्दी में थोड़े-थोड़े अंतर से अनेक सम्राट — 47 वर्षों में 25 सम्राट — सत्तासीन हुए; यह तथ्य साम्राज्य पर छाए बेहद तनाव का स्पष्ट सूचक।

5. लिंग, साक्षरता, संस्कृति (पृ. 44–45)

5.1 परिवार और स्त्रियों की स्थिति

  • रोमन समाज की अपेक्षाकृत आधुनिक विशेषता: एकल परिवार (Nuclear family) का व्यापक चलन; वयस्क पुत्र अपने पिता के परिवार के साथ नहीं रहते थे; वयस्क भाई बहुत कम साझे परिवार में रहते थे।
  • दूसरी ओर — दासों को परिवार में सम्मिलित किया जाता था (रोमवासियों की परिवार की अवधारणा में दास शामिल)।
  • विवाह और संपत्ति:
    • सामान्यतः गणतंत्र के परवर्तीकाल (प्रथम शती ई.पू.) तक विवाह का रूप ऐसा था कि पत्नी अपनी संपत्ति अपने पति को हस्तांतरित नहीं करती थी, बल्कि अपने पैतृक परिवार में अपने पूरे अधिकार बनाए रखती थी।
    • महिला का दहेज वैवाहिक अवधि के दौरान पति के पास चला जाता था, किन्तु महिला अपने पिता की मुख्य उत्तराधिकारी बनी रहती थी और पिता की मृत्यु पर उसकी संपत्ति की स्वतंत्र मालिक बन जाती थी।
    • → रोम की महिलाओं को संपत्ति के स्वामित्व व संचालन में व्यापक कानूनी अधिकार; कानून की दृष्टि से पति-पत्नी एक वित्तीय हस्ती नहीं बल्कि दो अलग-अलग वित्तीय हस्तियाँ; पत्नी को पूर्ण वैधिक स्वतंत्रता।
    • तलाक अपेक्षाकृत आसान — पति अथवा पत्नी द्वारा केवल विवाह-भंग करने के इरादे की सूचना देना ही काफ़ी।
    • विवाह-आयु: पुरुष 28–29 / 30–32 वर्ष; लड़कियाँ 16–18 / 22–23 वर्ष → पति-पत्नी में आयु का बड़ा अंतराल → असमानता; विवाह आम तौर पर परिवार द्वारा तय (Arranged)।
    • पितृसत्ता के कठोर पक्ष: महिलाओं पर पति का प्रभुत्व, प्रायः पिटाई; महान कैथोलिक बिशप ऑगस्टीन (अधिकांश जीवन उत्तरी अफ़्रीका में) ने लिखा — उनकी माता की उनके पिता द्वारा नियमित पिटाई होती थी; उस छोटे नगर की अधिकतर पत्नियाँ ऐसी पिटाई से शरीर पर खरोंचें दिखाती रहती थीं। (साइड-बॉक्स: सेंट ऑगस्टीन (354–430) — 396 से उत्तरी अफ़्रीका के हिप्पो नगर के बिशप; चर्च के बौद्धिक इतिहास में उनका उच्चतम स्थान; बिशप ईसाई समुदाय में अत्यंत महत्त्वपूर्ण और शक्तिशाली।)
    • पिता का संतान पर अधिकार: पिताओं का बच्चों पर अत्यधिक कानूनी नियंत्रण — कभी-कभी दिल दहलाने वाली सीमा तक: अवांछित बच्चों के मामले में उन्हें ज़िंदा रखने या मार डालने तक का कानूनी अधिकार; कभी-कभी पिता शिशुओं को मारने के लिए ठंड में छोड़ देते थे।

5.2 साक्षरता (पृ. 45)

  • कामचलाऊ साक्षरता (Casual literacy) की दरें साम्राज्य के विभिन्न भागों में काफ़ी अलग-अलग। (पाद-टिप्पणी: पढ़ने-लिखने का दैनिक प्रयोग, प्रायः छोटे-मोटे संदर्भों में।)
  • पोम्पेई नगर — जो 79 ईस्वी में (विसूवियस) ज्वालामुखी फटने से दफ़न हो गया था — में व्यापक कामचलाऊ साक्षरता का ठोस प्रमाण: मुख्य गलियों की दीवारों पर अंकित विज्ञापन और समूचे शहर में अभिरेखण/भित्ति-लेखन (Graffiti)।
    • (साइड-बॉक्स: एक सर्वाधिक मज़ाकिया विज्ञापन जो पोम्पेई की दीवार पर लगा है, कहता है: “दीवार, तुम धन्य हो, अपने ऊपर इतनी उबाऊ लिखावट का बोझ ढोते हुए भी तुम बरकरार खड़ी हो, भरभराकर गिरी नहीं।”)
  • इसके विपरीत मिस्र — जहाँ सैकड़ों पैपाइरस बचे हुए हैं — में अत्यधिक औपचारिक-दस्तावेज़ (जैसे संविदा-पत्र) आमतौर पर व्यावसायिक लिपिकों द्वारा लिखे जाते थे; ये दस्तावेज़ अक्सर बताते हैं कि अमुक व्यक्ति ‘क’ अथवा ‘ख’ पढ़ या लिख नहीं सकता → साक्षरता कुछ वर्गों में अपेक्षाकृत अधिक व्यापक — जैसे सैनिकों, फ़ौजी अफ़सरों और सम्पदा-प्रबंधकों में।

5.3 सांस्कृतिक विविधता (पृ. 45–46)

  • साम्राज्य में सांस्कृतिक विविधता कई रूपों एवं स्तरों पर: धार्मिक सम्प्रदायों तथा स्थानीय देवी-देवताओं की भरपूर विविधता; बोलचाल की अनेक भाषाएँ; वेशभूषा की विविध शैलियाँ; तरह-तरह के भोजन; सामाजिक संगठनों के रूप (जनजातीय और अन्य); बस्तियों के अनेक रूप।
  • भाषा-भूगोल:
    • अरामाइक — निकटवर्ती पूर्व (कम से कम फ़रात के पश्चिम में) का प्रमुख भाषा-समूह;
    • कॉप्टिक — मिस्र में;
    • प्यूनिक तथा बरबर (Berber) — उत्तरी अफ़्रीका में;
    • कैल्टिक — स्पेन तथा उत्तर-पश्चिम में।
  • परन्तु इनमें से बहुत-सी भाषाई संस्कृतियाँ पूर्णतः मौखिक थीं — कम से कम तब तक, जब तक उनके लिए लिपि का आविष्कार नहीं हुआ:
    • अर्मिनियाई भाषा का लिखना पाँचवीं शताब्दी में ही शुरू हुआ;
    • जबकि बाइबिल का कॉप्टिक अनुवाद तीसरी शताब्दी के मध्य तक हो चुका था।
  • कई स्थानों पर लातिनी के प्रसार ने उन भाषाओं के लिखित रूप का स्थान ग्रहण कर लिया जिनका पहले से व्यापक प्रसार था — विशेष रूप से कैल्टिक के साथ, जिसका लिखा जाना प्रथम शताब्दी के पश्चात् बंद हो गया।
  • (चित्र, पृ. 45: एडेसा में पच्चीकारी (दूसरी शती ई.) — सीरिया के इस अभिलेख के लोग राजा अबगर की पत्नी तथा परिवार के सदस्य; पोम्पेई — एक मदिरा व्यापारी का भोजन कक्ष, दीवारों पर मिथक पशु।)
  • क्रियाकलाप 2: रोमन साम्राज्य में स्त्रियाँ कहाँ तक आत्मनिर्भर थीं? रोमन-परिवार की स्थिति की तुलना आज के भारतीय-परिवार की स्थिति से करो।

6. आर्थिक विस्तार (पृ. 46–48)

  • साम्राज्य का आर्थिक आधारभूत ढाँचा काफ़ी मज़बूत: बंदरगाह, खानें, खदानें, ईंट-भट्टे, जैतून के तेल की फैक्टरियाँ आदि बड़ी संख्या में।
  • मुख्य व्यापारिक मदें: गेहूँ, अंगूरी शराब तथा जैतून का तेल — भारी मात्रा में उपभोग; मुख्य स्रोत: स्पेन, गैलिक प्रांत, उत्तरी अफ़्रीका, मिस्र और कम मात्रा में इटली — जहाँ इन फसलों के लिए सर्वोत्तम स्थितियाँ।
  • एम्फ़ोरा (Amphora): शराब, जैतून का तेल व अन्य तरल पदार्थों की ढुलाई मटकों/कंटेनरों में — इन्हें एम्फ़ोरा कहते थे; इनके टूटे हुए टुकड़े बहुत बड़ी संख्या में मौजूद।
  • मॉंटी टेस्टैकियो (Monte Testaccio): रोम में इस स्थल पर ऐसे 5 करोड़ से अधिक मटकों के अवशेष पाए गए हैं — (संभवतः विश्व का सबसे बड़ा ‘ठीकरों का पहाड़’)।
  • पुरातत्त्व से आर्थिक इतिहास: पुरातत्त्वविद इन टुकड़ों को ठीक से जोड़कर कंटेनरों को फिर सही रूप देने और यह पता लगाने में सफल हुए हैं कि उनमें क्या-क्या ले जाया जाता था; प्राप्त वस्तुओं की मिट्टी का भूमध्यसागरीय क्षेत्रों की चिकनी मिट्टी के नमूनों से मिलान करके निर्माण स्थल की जानकारी भी।
  • स्पेन का जैतून तेल: यह उद्यम 140–160 ईस्वी के वर्षों में चरमोत्कर्ष पर; उन दिनों स्पेन का जैतून तेल मुख्यतः ‘ड्रेसल-20’ (Dressel 20) नामक कंटेनरों में ले जाया जाता था (नाम पुरातत्त्वविद हेनरिक ड्रेसल पर — जिसने इस किस्म के कंटेनरों का रूप सुनिश्चित किया); ड्रेसल-20 के अवशेष भूमध्यसागरीय क्षेत्र के अनेक उत्खनन-स्थलों पर मिले → स्पेन के जैतून तेल का व्यापक प्रसार सिद्ध।
  • प्रतिस्पर्धा का प्रमाण: ऐसे साक्ष्यों के बल पर पुरातत्त्वविद बता सके कि स्पेन के जैतून तेल के उत्पादक अपने इतालवी प्रतिद्वंद्वियों से तेल का बाज़ार छीनने में सफल हुए — ऐसा तभी संभव हुआ होगा जब स्पेन के उत्पादकों ने अपेक्षाकृत कम कीमतों पर बेहतर गुणवत्ता वाला तेल बेचा होगा; अर्थात् भिन्न-भिन्न प्रदेशों के ज़मींदार एवं उत्पादक वस्तुओं का बाज़ार हथियाने के लिए आपस में प्रतिस्पर्धा करते रहते थे।
  • बाज़ार का बदलता नेतृत्व: बाद में उत्तरी अफ़्रीका के उत्पादकों ने स्पेन जैसा स्थान प्राप्त कर लिया — तीसरी और चौथी शताब्दियों के अधिकांश भाग में उनका बोलबाला; 425 ईस्वी के बाद उत्तरी अफ़्रीका का प्रभुत्व टूटा — परवर्ती पाँचवीं और छठी शताब्दियों में एगियन (एजियन), दक्षिणी एशिया-माइनर (तुर्की), सीरिया और फ़िलिस्तीनी व्यापारी अंगूरी शराब तथा जैतून-तेल के प्रमुख निर्यातक बन गए; भूमध्यसागर के बाज़ारों में अफ़्रीका से आने वाले कंटेनरों का आना अचानक कम हो गया।
  • सिद्धांत-सूत्र (NCERT): अलग-अलग प्रदेशों की समृद्धि उनकी वस्तुओं की गुणवत्ता तथा उनके उत्पादन और परिवहन की क्षमता के अनुसार घटती-बढ़ती रहती थी।
  • असाधारण उर्वरता वाले प्रदेश: इटली में कैम्पैनिया, सिसिली, मिस्र में फ़य्यूम, गैलिली, बाइज़ैकियम (ट्यूनीसिया), दक्षिणी गॉल (गैलिया नार्बोनेंसिस), तथा बाएटिका (दक्षिणी स्पेन) — स्ट्रैबो तथा प्लिनी जैसे लेखकों के अनुसार ये सभी प्रदेश साम्राज्य के घनी आबादी वाले और सबसे धनी भागों में से।
    • सबसे बढ़िया किस्म की अंगूरी शराब — कैम्पैनिया से;
    • रोम को गेहूँ — बड़ी मात्रा में सिसिली और बाइज़ैकियम से;
    • गैलिली में गहन खेती — (इतिहासकार जोसिफ़स ने लिखा: “प्रदेशवासियों ने ज़मीन के एक-एक इंच टुकड़े पर खेती कर रखी है”);
    • स्पेन का जैतून तेल — दक्षिण में गुआडलक्विविर नदी के किनारों के साथ-साथ बसी अनेक ज़मींदारियों (फंडी/Fundi) से।
  • कम उन्नत क्षेत्र: साम्राज्य में ऐसे भी बड़े-बड़े हिस्से जो बहुत कम उन्नत अवस्था में —
    • नुमीडिया (आधुनिक अल्जीरिया) के देहाती क्षेत्रों में ऋतु-प्रवास (Transhumance) व्यापक (पाद-टिप्पणी: ऊँचे पहाड़ी क्षेत्रों और नीचे के मैदानी इलाकों में भेड़-बकरियों तथा अन्य जानवरों को चराने के लिए चरागाहों की खोज में ग्वालों तथा चरवाहों का मौसम के अनुसार वार्षिक आवागमन); चरवाहे तथा अर्ध-यायावर अपने साथ अवन (Oven) आकार की झोंपड़ियाँ (मैपालिया/Mapalia) उठाए इधर-उधर घूमते-फिरते रहते थे; जब उत्तरी-अफ़्रीका में रोमन जागीरों का विस्तार हुआ तो चरागाहों की संख्या में भारी कमी आई और खानाबदोश चरवाहों की आवाजाही पहले से अधिक नियंत्रित।
    • स्पेन के उत्तर में — अधिकतर कैल्टिक-भाषी किसानों की आबादी, जो पहाड़ियों की चोटियों पर बसे गाँवों — कैस्टेला (Castella) — में रहते थे।
  • ! रोम साम्राज्य के बारे में सोचते-समझते समय इन (क्षेत्रीय) असमानताओं को कभी नहीं भूलना चाहिए।
  • ‘प्राचीन = पिछड़ा’ नहीं: यह न मान बैठें कि चूँकि यह ‘प्राचीन’ दुनिया थी, इसलिए उस समय का सांस्कृतिक-आर्थिक जीवन आदिम या पिछड़ा हुआ था; स्थिति इसके कुछ विपरीत थी —
    • भूमध्यसागर के आसपास पानी की शक्ति (Water power) का तरह-तरह से इस्तेमाल;
    • इस काल में जल-शक्ति से मिलें चलाने की प्रौद्योगिकी में ख़ासी प्रगति;
    • स्पेन की सोने और चाँदी की खानों में जल-शक्ति से खुदाई;
    • पहली तथा दूसरी शताब्दियों में बड़े भारी औद्योगिक पैमाने पर इन खानों से खनिज निकाले जाते थे;
    • उत्पादकता का स्तर इतना ऊँचा कि उन्नीसवीं शताब्दी तक — यानी लगभग 1700 वर्ष बाद तक — ऐसे उत्पादन के स्तर देखने को नहीं मिलते।
    • सुगठित वाणिज्यिक और बैंकिंग-व्यवस्था मौजूद; धन (मुद्रा) का व्यापक प्रयोग।
  • इन बातों से संकेत: हममें रोम की समुन्नत अर्थव्यवस्था को कम आँकने की प्रवृत्ति कितनी अधिक है।
  • क्रियाकलाप 3: मिट्टी के बर्तनों के अवशेषों पर काम करने वाले पुरातत्त्वविद बहुत-कुछ जासूसों की तरह होते हैं — क्यों? स्पष्ट करो। एम्फ़ोरा हमें रोम काल के भूमध्यसागरीय क्षेत्र के आर्थिक जनजीवन के बारे में क्या बताते हैं?

7. श्रमिकों पर नियंत्रण (पृ. 48–50)

7.1 दासता की स्थिति

  • दासता की जड़ें भूमध्यसागर और निकटवर्ती पूर्व (पश्चिमी एशिया) — दोनों क्षेत्रों में बहुत गहरी; चौथी शताब्दी में ईसाई धर्म के राज्य-धर्म बनने के बाद भी इस प्रथा को कोई गंभीर चुनौती नहीं दी गई।
  • पर सावधानी: इसका अर्थ यह नहीं कि रोम की अर्थव्यवस्था में अधिकांश श्रम दासों द्वारा किया जाता था; यह बात गणतंत्रीय काल में इटली के मामले में सही हो सकती है — जहाँ ऑगस्टस के शासनकाल में इटली की कुल 75 लाख की आबादी में 30 लाख दास थे — किन्तु समग्र साम्राज्य में ऐसी स्थिति नहीं थी।
  • दास = पूँजी-निवेश: उन दिनों दासों को पूँजी-निवेश की दृष्टि से देखा जाता था; कम से कम रोम के एक लेखक ने ज़मींदारों को सलाह दी कि कृषि में गुलामों का इस्तेमाल न करें — जहाँ फ़सल कटाई के लिए बहुत बड़ी संख्या में (मौसमी) श्रमिक चाहिए, अथवा जहाँ स्वास्थ्य को मलेरिया जैसी बीमारियों से नुकसान पहुँच सकता हो (वहाँ दास मरे तो निवेश डूबता है); ऐसे विचार दासों के प्रति सहानुभूति पर नहीं बल्कि हिसाब-किताब पर आधारित थे।
  • व्यवहार: उच्च वर्ग प्रायः दासों के प्रति क्रूरतापूर्ण; साधारण लोग उनके प्रति अधिक सहानुभूति रख सकते थे। नीरो के शासन काल की प्रसिद्ध घटना — टैसिटस-बॉक्स में (नीचे)।
  • आपूर्ति में कमी और विकल्प: पहली शताब्दी में शांति स्थापित होने से लड़ाई-झगड़े कम → दासों की आपूर्ति में कमी (युद्धबंदी मुख्य स्रोत था) → दास-श्रम प्रयोग करने वालों को दास प्रजनन (Slave breeding) (पाद-टिप्पणी: दासियों और उनके साथ मर्दों को अधिकाधिक बच्चे पैदा करने हेतु प्रोत्साहित करने की प्रथा — उनके बच्चे भी आगे चलकर दास बनते थे) अथवा वेतनभोगी मज़दूरों जैसे सस्ते विकल्पों का सहारा लेना पड़ा।
  • तुलना-तर्क: वेतनभोगी मज़दूर सस्ते पड़ते थे — उन्हें आसानी से छोड़ा और रखा जा सकता था; गुलाम श्रमिकों को वर्ष भर खिलाना पड़ता था और अन्य खर्चे भी → लागत बढ़ती; इसीलिए संभवतः बाद की अवधि में कृषि-क्षेत्र में अधिक संख्या में गुलाम मज़दूर नहीं रहे — कम-से-कम पूर्वी प्रदेशों में तो ऐसा ही हुआ; रोम में सरकारी निर्माण-कार्यों पर स्पष्ट रूप से मुक्त श्रमिकों का व्यापक प्रयोग — क्योंकि दास-श्रम की बहुतायत बहुत महँगी पड़ती।
  • दास/मुक्त-दास प्रबंधक: इन दासों और मुक्त व्यक्तियों (ऐसे दास जिन्हें मालिकों ने मुक्त कर दिया — Freedmen) को व्यापार-प्रबंधकों के रूप में व्यापक रूप से नियुक्त किया जाने लगा — यहाँ उनकी अधिक संख्या में आवश्यकता नहीं थी; मालिक अक्सर अपने गुलामों/मुक्त गुलामों को अपनी ओर से व्यापार चलाने हेतु पूँजी, यहाँ तक कि पूरा का पूरा कारोबार सौंप देते थे।

7.2 श्रम-प्रबंधन और निरीक्षण

  • रोमन कृषि-विषयक लेखकों ने श्रम-प्रबंधन पर बहुत ध्यान दिया।
  • कोलूमेल्ला (Columella) — दक्षिणी स्पेन से आए पहली शताब्दी के लेखक — की सिफ़ारिशें:
    • ज़मींदार अपनी ज़रूरत से दुगुनी संख्या में उपकरणों तथा औज़ारों का सुरक्षित भंडार रखें ताकि उत्पादन लगातार होता रहे — “क्योंकि दास संबंधी श्रम-समय की हानि ऐसी मदों की लागत से अधिक बैठती है”;
    • नियोक्ताओं की आम धारणा: निरीक्षण (Supervision) के बिना कोई काम ठीक से नहीं करवाया जा सकता — मुक्त तथा दास दोनों प्रकार के श्रमिकों के लिए निरीक्षण सबसे महत्त्वपूर्ण पहलू;
    • निरीक्षण सरल बनाने के लिए कामगारों को कभी-कभी छोटे दलों में बाँट दिया जाता था — कोलूमेल्ला ने दस-दस श्रमिकों के समूह बनाने की सिफ़ारिश की — छोटे समूहों में यह बताना आसान कि कौन काम कर रहा है, कौन कामचोरी।
  • प्लिनी वरिष्ठ (Pliny the Elder) — प्रसिद्ध प्रकृति विज्ञान के लेखक — ने दास समूहों के प्रयोग की निंदा की: यह उत्पादन आयोजित करने का सबसे खराब तरीका — क्योंकि अलग-अलग समूह में काम करने वाले दासों को आमतौर पर पैरों में जंजीर डालकर एक-साथ रखा जाता था।
  • आधुनिक अनुगूँज (NCERT): ऐसे तरीके कठोर और क्रूर प्रतीत होते हैं, पर याद रखें — आज विश्व की अधिकांश फैक्ट्रियाँ श्रम-नियंत्रण के कुछ ऐसे ही सिद्धांत लागू करती हैं; रोमन साम्राज्य के कुछ औद्योगिक प्रतिष्ठानों ने तो इससे भी अधिक कड़े नियंत्रण लागू कर रखे थे।
  • फ्रैंकिन्सेंस फैक्टरी (प्लिनी वरिष्ठ का वर्णन): सिकंदरिया की फ्रैंकिन्सेंस (सुगंधित राल/Resin — यूरोपीय नाम; प्रयोग धूप-अगरबत्ती और इत्र बनाने में; बोसवेलिया के पेड़ से; पेड़ के तने में बड़ा छेद कर रस बहने दिया जाता; सूखने पर राल प्राप्त; सबसे उत्कृष्ट किस्म अरब प्रायद्वीप से) फैक्टरियों के हालात — “कितना ही कड़ा निरीक्षण रखो, पर्याप्त प्रतीत नहीं होता: कामगारों के ऐप्रनों पर एक सील लगा दी जाती है, उन्हें अपने सिर पर एक गहरी जाली वाला मास्क या नेट पहनना पड़ता है, और फैक्ट्री से बाहर जाने के लिए अपने सभी कपड़े उतारने पड़ते हैं।”
  • ग्रामीण श्रमिकों का पलायन: कृषि श्रमिक ऐसे नियंत्रणों से थके-थके रहते होंगे; तीसरी शताब्दी के एक राज्यादेश में मिस्र के किसानों द्वारा अपने गाँव छोड़कर जाने का उल्लेख — वे इसलिए गाँव छोड़ रहे थे ताकि उन्हें खेती के काम में न लगना पड़े; संभवतः यही बात अधिकांश फैक्ट्रियों और कारखानों पर भी लागू।
  • कठोर नियंत्रण-तंत्र:
    • 398 ईस्वी के एक कानून में कहा गया कि कामगारों को दागा जाता था (शरीर पर दाग/निशान) ताकि यदि वे भागें और छिपने का प्रयत्न करें तो पहचाने जा सकें;
    • कई निजी मालिक कामगारों के साथ ऋण-संविदा (Debt contracts) के रूप में करार कर लेते थे ताकि वे यह दावा कर सकें कि उनके कर्मचारी उनके कर्ज़दार हैं — और इस प्रकार उन पर कड़ा नियंत्रण;
    • दूसरी शताब्दी की प्रारंभिक अवधि का एक लेखक बताता है: “हज़ारों (श्रमिक) गुलामी में किए जाने वाले काम के लिए इसलिए आत्मसमर्पण करते हैं, हालाँकि वे मुक्त हैं” — अर्थात् बहुत-से गरीब परिवारों ने जीवित रहने के लिए ही ऋणबद्धता (Debt bondage) स्वीकार कर ली थी;
    • हाल में खोजे गए ऑगस्टीन के पत्रों में से एक से जानकारी: कभी-कभी माता-पिता अपने बच्चों को 25 वर्ष के लिए बेचकर बंधुआ मज़दूर बना देते थे।
    • ऑगस्टीन ने एक बार अपने वकील मित्र से पूछा कि पिता की मृत्यु हो जाने पर क्या इन बच्चों को आज़ाद किया जा सकता था। (पृ. 50)
  • ग्रामीण ऋण-ग्रस्तता और भी अधिक व्यापक: 66 ईस्वी के ज़बरदस्त यहूदी विद्रोह (साइड-टिप्पणी: यह विद्रोह जूडेया में रोम शासन के विरुद्ध हुआ था जिसे रोमवासियों ने ‘यहूदी-युद्ध’ कही जाने वाली लड़ाई में क्रूरतापूर्वक दबा दिया) के समय क्रांतिकारियों ने जनता का समर्थन पाने के लिए साहूकारों के ऋणपत्र (बांड) नष्ट कर डाले।
  • ! संतुलन (NCERT): सही स्थिति समझने के लिए पर्याप्त सावधानी — सीधे इस निष्कर्ष पर न पहुँचें कि अधिकतर श्रमिकों पर इन तरीकों से दबाव डाला जाता था; पाँचवीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में सम्राट ऐनेस्टैसियस (Anastasius) ने ऊँची मज़दूरियाँ देकर समूचे पूर्वी सीमा क्षेत्र से श्रमिकों को आकर्षित करके कम समय में ही पूर्वी सीमा पर दारा (Dara) शहर का निर्माण किया था; कुछ दस्तावेज़ों (‘पैपाइरी’ — पैपाइरस का बहुवचन) से अनुमान: छठी शताब्दी तक भूमध्यसागरीय क्षेत्र में, विशेषकर पूर्वी भाग में, वेतनभोगी श्रमिक कितने अधिक फैल गए थे।

बॉक्स (पृ. 48): दासों के प्रति व्यवहार — टैसिटस की घटना

कुछ ही समय बाद शहर के शासक (प्रीफ़ेक्ट) ल्यूसियस पेडेनियस सेकंडस का उसके एक दास ने कत्ल कर दिया। कत्ल के पश्चात्, पुराने रिवाज के अनुसार यह आवश्यक था कि एक ही छत के नीचे रहने वाले प्रत्येक दास को फाँसी दे दी जाए। परन्तु बहुत से निर्दोष लोगों को बचाने के लिए भीड़ एकत्र हो गई और दंगे शुरू हो गए। सैनेट भवन को घेर लिया गया; भवन में (भी) अत्यधिक कठोरता का विरोध किया जा रहा था; परंतु अधिकांश सदस्यों ने परिवर्तन किए जाने का विरोध किया। जो सैनेटर फाँसी दिए जाने के पक्ष में थे, उनकी बात मान ली गई। परन्तु पत्थर और जलती हुई मशालें लिए भारी भीड़ ने इस आदेश को कार्यान्वित किए जाने से रोका। नीरो (Nero) ने अभिलेख द्वारा इन लोगों को फटकार लगाई; उन सारे मार्गों पर सेना लगा दी गई जहाँ सैनिकों के साथ दोषियों को फाँसी पर चढ़ाने के लिए ले जाया जा रहा था। — टैसिटस (Tacitus, 55–117), आरंभिक साम्राज्य का इतिहासकार। (संकेत: सभी — लगभग 400 — दासों को फाँसी दी गई।)

  • क्रियाकलाप 4: इस अध्याय में तीन ऐसे लेखकों का उल्लेख हुआ है जिनकी रचनाओं का प्रयोग यह बताने के लिए किया गया कि रोम के लोग अपने कामगारों के साथ कैसा बर्ताव करते थे — क्या आप उनके नाम बता सकते हैं? (उत्तर-संकेत: कोलूमेल्ला, प्लिनी वरिष्ठ, टैसिटस/ऑगस्टीन) उन दो तरीकों का वर्णन कीजिए जिनकी सहायता से रोम के लोग अपने श्रमिकों पर नियंत्रण रखते थे।

8. सामाजिक श्रेणियाँ (पृ. 50–51)

8.1 टैसिटस के अनुसार प्रारंभिक साम्राज्य के प्रमुख सामाजिक समूह

  1. सैनेटर (लातिनी: पैट्रेस — शाब्दिक अर्थ ‘पिता’);
  2. अश्वारोही वर्ग (Equites/Knights) के प्रमुख सदस्य (साइड-बॉक्स: अश्वारोही/नाइट वर्ग — परंपरागत रूप से दूसरा सबसे अधिक शक्तिशाली और धनवान समूह; मूल रूप से ऐसे परिवार जिनकी संपत्ति उन्हें घुड़सेना में भर्ती की औपचारिक योग्यता देती थी — इसीलिए ‘इक्वाइट्स’; सैनेटरों की तरह अधिकतर नाइट ज़मींदार, पर सैनेटरों के विपरीत उनमें से कई जहाज़ों के मालिक, व्यापारी और साहूकार (बैंकर) — यानी वे व्यापारिक क्रियाकलापों में संलग्न रहते थे);
  3. जनता का सम्माननीय वर्ग (Respectable middle class) — जिनका संबंध महान घरानों से था;
  4. फूहड़ निम्नतर वर्ग — कमीनकारू (प्लेब्स सोर्डिडा / Plebs sordida) — जो, टैसिटस के अनुसार, सर्कस और थिएटर तमाशे देखने के आदी थे;
  5. और अंततः — दास।
  • सैनेट का स्वरूप: तीसरी शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों में सैनेट की सदस्य संख्या लगभग 1,000; कुल सैनेटरों में लगभग आधे सैनेटर अभी भी इतालवी परिवारों के थे।

8.2 परवर्ती साम्राज्य की सामाजिक संरचना

  • परवर्ती काल में — चौथी शताब्दी के प्रारंभिक भाग में कॉन्स्टैनटाइन प्रथम के शासन काल से — टैसिटस द्वारा उल्लिखित पहले दो समूह (सैनेटर और नाइट/अश्वारोही) एकीकृत होकर एक विस्तृत अभिजात वर्ग (Aristocracy) बन चुके थे; इनके कुल परिवारों में कम से कम आधे परिवार अफ़्रीकी अथवा पूर्वी मूल के थे।
  • यह ‘परवर्ती रोमन’ अभिजात वर्ग अत्यधिक धनवान, किन्तु कई तरीकों से विशुद्ध सैनिक संभ्रांत वर्ग से कम शक्तिशाली — जिनकी पृष्ठभूमि अधिकतर अभिजात वर्गीय नहीं थी (सेना से उठे गैर-कुलीन लोग सत्ता में)।
  • ‘मध्यम’ वर्ग: अब इसमें नौकरशाही और सेना की सेवा से जुड़े आम लोग, अपेक्षाकृत समृद्ध सौदागर और किसान — जिनमें बहुत-से पूर्वी प्रांतों के निवासी; टैसिटस ने इस सम्माननीय मध्यम वर्ग का वर्णन महान सैनेट-गृहों के आश्रितों (Clients) के रूप में किया है; मुख्यतः सरकारी सेवा और राज्य पर निर्भरता ही इन मध्यम वर्गीय परिवारों का भरण-पोषण करती थी।
  • निम्नतर वर्ग — ह्यूमिलिओरिस (Humiliores, शाब्दिक: ‘निम्नतर’): इनसे नीचे भारी संख्या में निम्नतर वर्गों का एक विशाल दुर्बल समूह, सामूहिक रूप से ह्यूमिलिओरिस कहा गया। इनमें शामिल —
    • ग्रामीण श्रमिक — जिनमें बहुत-से स्थायी रूप से बड़ी जागीरों में नियोजित;
    • औद्योगिक और खनन प्रतिष्ठानों के कामगार;
    • प्रवासी कामगार — जो अनाज तथा जैतून की फ़सल कटाई और निर्माण उद्योग के लिए अधिकांश श्रम की पूर्ति करते थे;
    • स्व-नियोजित शिल्पकार — जो, ऐसा बताया जाता था, मज़दूरी पाने वाले श्रमिकों की तुलना में बेहतर खाते-पीते थे;
    • बहुत बड़ी संख्या में कभी-कभी काम करने वाले श्रमिक (Casual labourers) — विशेषकर बड़े शहरों में;
    • और वस्तुतः हज़ारों गुलाम — जो विशेष रूप से पूरे पश्चिमी साम्राज्य में पाए जाते थे।
  • आय-असमानता का चरम: पाँचवीं शताब्दी के प्रारंभिक काल के इतिहासकार ओलिंपियोडोरस (Olympiodorus) — जो एक राजदूत भी था — ने लिखा: रोम नगर के कुलीन परिवारों को अपनी संपदाओं से वार्षिक आय 4,000 पाउंड सोने के बराबर होती थी — इसमें वह उपज शामिल नहीं थी जिसका उपभोग वे सीधे कर लेते थे!

बॉक्स (पृ. 51): रोमन अभिजात वर्ग की आमदनियाँ — पाँचवीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में

“रोम के ऊँचे घरानों में से प्रत्येक के पास अपने आप में वह सब कुछ मौजूद था जो एक मध्यम आकार के शहर में हो सकता है — एक घुड़दौड़ का मैदान (हिप्पोड्रोम), अनेक मंच-मंदिर, फव्वारे और विभिन्न प्रकार के स्नानागार… बहुत से रोमन परिवारों को अपनी संपत्ति से प्रतिवर्ष 4,000 पाउंड सोने की आय प्राप्त होती थी, जिसमें अनाज, शराब और अन्य उपज शामिल नहीं थी; इन उपजों को बेचने पर सोने में प्राप्त आय के एक-तिहाई के बराबर आमदनी हो सकती थी। रोम में द्वितीय श्रेणी के परिवारों की आय 1,000 अथवा 1,500 पाउंड सोना थी।” — थेब्स का ओलिंपियोडोरस

8.3 मुद्रा-प्रणाली और नौकरशाही (पृ. 51)

  • मौद्रिक परिवर्तन: परवर्ती साम्राज्य में प्रथम तीन शताब्दियों की प्रचलित चाँदी-आधारित मौद्रिक प्रणाली समाप्त — क्योंकि स्पेन की खानों से चाँदी मिलनी बंद हो गई और सरकार के पास चाँदी की मुद्रा के प्रचलन हेतु पर्याप्त चाँदी नहीं रही; कॉन्स्टैनटाइन ने सोने पर आधारित नयी मौद्रिक-प्रणाली स्थापित की; परवर्ती समूचे पुराकाल में इन (सोने की) मुद्राओं का भारी मात्रा में प्रचलन।
  • नौकरशाही की समृद्धि: परवर्ती रोम की उच्च तथा मध्य-वर्गीय नौकरशाही अपेक्षाकृत बहुत धनी — वेतन सोने के रूप में; आमदनी का बड़ा हिस्सा ज़मीन जैसी परिसंपत्तियाँ खरीदने में लगाते थे।
  • भ्रष्टाचार: साम्राज्य में भ्रष्टाचार बहुत फैला हुआ — विशेष रूप से न्याय-प्रणाली और सैन्य आपूर्तियों के प्रशासन में; उच्च अधिकारी और गवर्नर प्रायः लूट-खसोट और लालच के लिए कुख्यात।
  • नियंत्रण-तंत्र: सरकार ने भ्रष्टाचार रोकने के लिए बारम्बार हस्तक्षेप किया — अनेक कानून बनाए गए; इतिहासविदों तथा अन्य बुद्धिजीवियों ने भ्रष्ट कारनामों की खुलकर निंदा की — आलोचना का यह तत्त्व अभिजात्य एवं श्रेय जगत की एक उल्लेखनीय विशेषता।
  • तानाशाही बनाम कानून: रोमन राज्य तानाशाही पर आधारित — असहमति/आलोचना कभी-कभार ही बर्दाश्त; सरकार विरोध का उत्तर प्रायः हिंसात्मक कार्रवाई से देती थी (विशेषकर पूर्वी शहरों में, जहाँ लोग निडर होकर सम्राटों का मज़ाक उड़ाया करते थे); तथापि चौथी शताब्दी तक आते-आते रोमन कानून की एक प्रबल परंपरा का उद्भव हो चुका था — इसने सर्वाधिक भयंकर सम्राटों पर भी अंकुश लगाने का काम किया; सम्राट मनमानी नहीं कर सकते थे; नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए कानून का सक्रिय प्रयोग होता था।
  • इसीलिए चौथी शताब्दी के अंतिम दशकों में एम्ब्रोस (Ambrose) जैसे शक्तिशाली बिशपों के लिए यह संभव हुआ कि जब सम्राट आम जनता के प्रति अत्यधिक कठोर या दमनकारी हो जाएँ तो वे उनका मुकाबला करें।

9. परवर्ती पुराकाल (Late Antiquity) (पृ. 51–54)

  • परिभाषा: ‘परवर्ती पुराकाल’ = रोम साम्राज्य के उद्भव, विकास और पतन के इतिहास की अंतिम दिलचस्प अवधि — मोटे तौर पर चौथी से सातवीं शताब्दी तक; चौथी शताब्दी स्वयं सांस्कृतिक-आर्थिक हलचलों से परिपूर्ण।
  • धार्मिक परिवर्तन: सम्राट कॉन्स्टैनटाइन का ईसाई धर्म को राजधर्म बनाने का निर्णय; सातवीं शताब्दी में इस्लाम का उदय — दोनों इसी अवधि में।
  • राज्य-ढाँचे में परिवर्तन — डायोक्लीशियन (Diocletian, 284–305):
    • अति-विस्तार देखकर साम्राज्य को छोटा बनाया — सामरिक/आर्थिक दृष्टि से महत्त्वहीन प्रदेशों को छोड़ा;
    • सीमाओं पर किले बनवाए;
    • प्रांतों का पुनर्गठन (कालरेखा: 297 — 100 प्रांतों में पुनर्गठन);
    • असैनिक कार्यों को सैनिक कार्यों से अलग किया;
    • सेनापतियों (Duces) को अधिक स्वायत्तता — ये सैन्य अधिकारी अधिक शक्तिशाली समूह बनकर उभरे।
  • कॉन्स्टैनटाइन (Constantine) के नवाचार:
    • मौद्रिक: सॉलिडस (Solidus) — 4.5 ग्राम शुद्ध सोने का नया सिक्का; रोम साम्राज्य समाप्त होने के बाद भी चलता रहा; बहुत बड़े पैमाने पर ढाले जाते; लाखों-करोड़ों की संख्या में चलन।
    • दूसरी राजधानी — कुंस्तुनतुनिया (Constantinople): (पहले बाइज़ेंटाइन; अब तुर्की में इस्तांबुल); तीन ओर समुद्र से घिरी; नयी राजधानी के लिए नयी सैनेट की ज़रूरत → चौथी शताब्दी शासक वर्गों के बड़ी तेज़ी से विस्तार का काल।
  • आर्थिक तेज़ी: मौद्रिक स्थायित्व और बढ़ती जनसंख्या से आर्थिक विकास में तेज़ी; पुरातत्त्वीय अभिलेखों से — औद्योगिक प्रतिष्ठानों सहित ग्रामीण उद्योग-धंधों में व्यापार-विकास हेतु पर्याप्त पूँजी-निवेश; नयी प्रौद्योगिकियाँ: तेल की मिलें और शीशे के कारखाने, पेंच की प्रेसें (Screw presses), तरह-तरह की पानी की मिलें; पूर्व के देशों के साथ लम्बी दूरी के व्यापार में धन का अच्छा-ख़ासा निवेश → व्यापार का पुनरुत्थान।
  • शहरी संपदा-समृद्धि में वृद्धि → स्थापत्य कला के नए-नए रूप; भोग-विलास के साधनों में तेज़ी; शासक कुलीन पहले से कहीं अधिक धन-सम्पन्न और शक्तिशाली।
  • मिस्र के साक्ष्य: परवर्ती शताब्दियों के पैपाइरस-पत्तों पर लिखे सैकड़ों दस्तावेज़ — तत्कालीन समाज अपेक्षाकृत अधिक खुशहाल; मुद्रा का व्यापक प्रयोग; ग्रामीण संपदाएँ भारी मात्रा में सोने के रूप में लाभ कमाती थीं; उदाहरण — छठी शताब्दी में जस्टीनियन के शासनकाल में अकेला मिस्र प्रतिवर्ष 25 लाख सॉलिडस (लगभग 35,000 पाउंड सोना) अधिक धनराशि करों के रूप में देता था।
  • निष्कर्ष: पश्चिम एशिया के बड़े-बड़े ग्रामीण इलाके पाँचवीं-छठी शताब्दियों में (आज बीसवीं शताब्दी की तुलना में भी) अधिक विकसित और घने बसे हुए थे! इसी सामाजिक पृष्ठभूमि पर आगे अनेक सांस्कृतिक परिवर्तन हुए।

9.1 धार्मिक जीवन और ईसाईकरण (पृ. 52–53)

  • बहुदेववाद (Polytheism): यूनान और रोमवासियों की पारंपरिक धार्मिक संस्कृति बहुदेववादी — अनेक पंथों-उपासना पद्धतियों में विश्वास; जूपिटर, जूनो, मिनर्वा और मार्स जैसे अनेक रोमन-इतालवी देवों और यूनानी तथा पूर्वी देवी-देवताओं की पूजा; साम्राज्य भर में हज़ारों मंदिर, मठ और देवालय; बहुदेववादी स्वयं को किसी एक नाम से नहीं पुकारते थे।
  • यहूदी धर्म (Judaism) — साम्राज्य का दूसरा बड़ा धर्म; पर यहूदी धर्म भी ‘एकाश्म’ (Monolith) नहीं — परवर्ती पुराकाल के यहूदी धर्म में अनेक विविधताएँ मौजूद। (पाद-टिप्पणी: एकाश्म — एक बड़ी चट्टान का टुकड़ा; यहाँ मानव इकाइयों के लिए प्रयुक्त — समाज/संस्कृति एकाश्म है तो उसमें विविधता की कमी और आंतरिक एकरूपता होती है।)
  • ईसाईकरण एक क्रमिक एवं जटिल प्रक्रिया: चौथी-पाँचवीं शताब्दियों में साम्राज्य का ‘ईसाईकरण’ (पाद-टिप्पणी: वह प्रक्रिया जिसके द्वारा ईसाई धर्म भिन्न-भिन्न जन-समूहों में फैलाया गया और वहाँ का प्रमुख धर्म बना दिया गया) हुआ; बहुदेववाद विशेष रूप से पश्चिमी प्रांतों में आसानी से तुरंत गायब नहीं हुआ — हालाँकि ईसाई धर्मप्रचारक बहुदेववादी मत-मतांतरों तथा धार्मिक रीति-रिवाजों का लगातार विरोध करते और बहुदेववाद की निंदा करते रहे।
  • चौथी शताब्दी में भिन्न-भिन्न धार्मिक समुदायों के बीच की सीमाएँ इतनी कठोर एवं गहरी नहीं थीं जितनी कि आगे चलकर हो गईं — ऐसा शक्तिशाली बिशपों की कोशिशों के कारण हुआ, जिन्होंने अपने अनुयायियों को कड़ाई से धार्मिक विश्वासों तथा रीति-रिवाज़ों के पालन का पाठ पढ़ाया।

9.2 पूर्व की समृद्धि, पश्चिम का विखंडन (पृ. 53–54)

  • जनता में आम खुशहाली — ख़ासतौर पर पूर्वी भागों में; आबादी छठी सदी के मुख्य भाग तक बढ़ती रही — हालाँकि प्लेग की महामारी का प्रकोप हो चुका था जिसके कारण 540 के दशक में लगभग संपूर्ण भूमध्यसागरीय प्रदेश प्रभावित। (कालरेखा: 541–70 — ब्यूबोनिक प्लेग का प्रकोप।)
  • पश्चिम में: साम्राज्य राजनीतिक दृष्टि से विखंडित — उत्तर से आने वाले जर्मन मूल के समूहों (गोथ, वैंडल, लोंबार्ड आदि) ने सभी बड़े प्रांतों पर कब्ज़ा कर अपने-अपने राज्य स्थापित किए — इन्हें ‘रोमोत्तर’ (Post-Roman) राज्य कहा जाता है।
  • सबसे महत्त्वपूर्ण रोमोत्तर राज्य:
    1. स्पेन में विसिगोथों का राज्य — जिसे अरबों ने 711 से 720 के बीच नष्ट किया;
    2. गॉल में फ्रैंकों का राज्य (लगभग 511–687);
    3. इटली में लोंबार्डों का राज्य (568–774)।
  • ये राज्य एक भिन्न किस्म की दुनिया — जिसे आमतौर पर मध्यकालीन (Medieval) कहा जाता है — की शुरुआत के पूर्व-संकेत थे।
  • पूर्वी भाग: साम्राज्य संयुक्त बना रहा; जस्टीनियन (Justinian) का शासनकाल समृद्धि और शाही महत्त्वाकांक्षा के उच्च स्तर का द्योतक; जस्टीनियन ने 533 में अफ़्रीका को वैंडलों के कब्ज़े से छुड़ा लिया और इटली को ऑस्ट्रोगोथों से वापस अधिकार में लिया — लेकिन इससे (इटली) देश तहस-नहस हो गया और लोंबार्ड आक्रमण के लिए रास्ता तैयार हो गया।
  • रोम-ईरान का अंतिम महासंघर्ष: सातवीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों तक आते-आते रोम और ईरान के बीच लड़ाई फिर छिड़ गई; ससानी शासकों (तीसरी शताब्दी से ईरान पर शासनरत) ने 614–19 में मिस्र सहित सभी विशाल पूर्वी प्रांतों पर बड़े पैमाने पर आक्रमण कर दिया (कालरेखा: खुसरो द्वितीय); बाइज़ेंटियम (अब रोम साम्राज्य को ज़्यादातर इसी नाम से जाना जाता था) ने 620 के दशक में इन प्रांतों पर फिर से कब्ज़ा कर लिया — लेकिन कुछ ही वर्ष बाद उसे दक्षिण-पूर्व की ओर से एक बहुत ज़ोरदार अंतिम धक्का लगा जिसे वह सहन नहीं कर सका।

9.3 इस्लाम का विस्तार (पृ. 54)

  • अरब प्रदेश से शुरू होने वाले इस्लाम के विस्तार को ‘प्राचीन विश्व इतिहास की सबसे बड़ी राजनीतिक क्रांति’ कहा जाता है।
  • 642 ईस्वी तक — पैगम्बर मुहम्मद की मृत्यु को मुश्किल से 10 साल हुए थे — पूर्वी रोमन और ससानी दोनों राज्यों के बड़े-बड़े भाग भीषण युद्ध के बाद अरबों के कब्ज़े में आ गए।
  • उभरते हुए इस्लामी राज्य की ये जीतें एक शताब्दी बाद अंततः स्पेन, सिंध और मध्य एशिया तक फैल गईं; अरब जनजातियों को ही पराजित करने से शुरू हुईं। (वाक्य-भाव: विजयें अरब से शुरू होकर सीरियाई रेगिस्तान तथा इराक की सरहदों तक पहुँचीं, फिर मुस्लिम सेनाएँ और दूर-दूर तक गईं।)
  • आगे का सूत्र: जैसा हम विषय 4 (वर्तमान पुस्तक-क्रम में विषय 3 के बाद) में देखेंगे — अरब प्रायद्वीप और वहाँ की अनेक जनजातियों के एकीकरण के कारण ही इस्लाम धर्म का क्षेत्रीय विस्तार हुआ।
  • मानचित्र 2 (पृ. 54): पश्चिम एशिया — कुंस्तुनतुनिया, काला सागर, आर्मीनिया, कैस्पियन सागर, बुखारा, समरकंद, अफ़गानिस्तान, फ़ारस (ईरान), टेसीफ़ोन-बगदाद (दजला), फ़रात, सीरिया (दमिश्क, ऐंडेसा, ऐंटीओक), फिलिस्तीन, जूडेया, मदीना, मक्का, अरब, फ़ारस की खाड़ी, लाल सागर, नील, सहारा मरुस्थल, सिन्धु नदी, अरब सागर।

10. शासक और घटनाएँ (पृ. 55)★

प्रमुख शासक (साइड-कॉलम)

कालशासक
27 ई.पू.–14 ईसवीऑगस्टस — प्रथम रोम सम्राट
14–37टिबेरियस
98–117ट्राजान
117–38हैड्रियन
193–211सेप्टिमियस सेवेरस
241–72ईरान में शापुर प्रथम का शासन
253–68गैलीनस
284–305टेट्रार्की (चतुस्तंत्र); डायोक्लीशियन मुख्य शासक
312–37कॉन्स्टैनटाइन; 309–79 ईरान में शापुर द्वितीय
408–50थियोडोसियस द्वितीय (प्रसिद्ध ‘थियोडोसियस कोड’ का संकलनकर्ता)
490–518अनैस्टैसियस
527–65जस्टीनियन; 531–79 ईरान में खुसरो प्रथम
610–41हेराक्लियस

प्रमुख घटनाएँ

वर्षघटना
27 ई.पू.ऑक्टेवियन द्वारा स्थापित ‘प्रिंसिपेट’; वह स्वयं को ऑगस्टस कहने लगा
लगभग 24–79वरिष्ठ प्लिनी का जीवन; विसूवियस ज्वालामुखी के फटने से उसकी मृत्यु; विसूवियस ने पोम्पेई नगर को लावे में दफ़न कर दिया
66–70विशाल यहूदी विद्रोह और रोमन सेनाओं का जेरूसलम पर कब्ज़ा
लगभग 115ट्राजान की पूर्व में विजयों के बाद साम्राज्य का अधिकतम विस्तार
212साम्राज्य के सभी मुक्त निवासियों को रोमन नागरिक का दर्जा
224ईरान में नया वंश — ‘ससानी’
250 का दशकफ़ारसवासियों का फ़रात के पश्चिम रोमन प्रदेशों पर आक्रमण
258कार्थेज के साइप्रसवासी बिशप (सिप्रियन) को मृत्युदंड
260 का दशकगैलीनस ने फिर से सेना संगठित की
273पामाएरा (Palmyra) का कारवाँ नगर रोमवासियों द्वारा नष्ट
297डायोक्लीशियन ने 100 प्रांतों में साम्राज्य का पुनर्गठन किया
लगभग 310कॉन्स्टैनटाइन ने सोने का नया सिक्का (सॉलिडस) चलाया
312कॉन्स्टैनटाइन ने ईसाई धर्म स्वीकार किया
324कॉन्स्टैनटाइन एकमात्र शासक; कुंस्तुनतुनिया की स्थापना
354–430हिप्पो के बिशप ऑगस्टीन का जीवन-काल
378गोथ लोगों ने ऐड्रियैनोपोल में रोमन सेनाओं को करारी मात दी
391सिकंदरिया में सेरापियम (सेरापिस का मंदिर) नष्ट
410विसिगोथों ने रोम का विध्वंस किया
428वैंडल लोगों ने अफ़्रीका के प्रदेश पर कब्ज़ा किया
434–53अट्टिला नामक हूण का साम्राज्य
493ऑस्ट्रोगोथों ने इटली में राज्य स्थापित किया
533–50जस्टीनियन द्वारा अफ़्रीका (533) और इटली को मुक्त करा लेना
541–70ब्यूबोनिक प्लेग का प्रकोप
568लोंबार्ड लोगों ने इटली पर आक्रमण किया
लगभग 570पैगम्बर मुहम्मद का जन्म
614–19फ़ारस के शासक खुसरो द्वितीय का पूर्वी रोम प्रदेशों पर कब्ज़ा
622पैगम्बर मुहम्मद और साथियों का मक्का छोड़कर मदीना प्रस्थान (हिजरत)
633–42अरब विजयों का पहला और महत्त्वपूर्ण चरण — मुस्लिम सेनाओं ने सीरिया, फिलिस्तीन, मिस्र, इराक और ईरान के कुछ हिस्सों पर कब्ज़ा किया
661–750सीरिया में उमय्या वंश
698अरबों ने कार्थेज को जीत लिया
711स्पेन पर अरबों का आक्रमण

NCERT अभ्यास प्रश्न (पृ. 56–57)

संक्षेप में उत्तर दीजिए —

  1. यदि आप रोम साम्राज्य में रहे होते तो कहाँ रहना पसंद करते — नगरों में या ग्रामीण क्षेत्र में? कारण बताइए।
  2. इस अध्याय में उल्लिखित कुछ छोटे शहरों, बड़े नगरों, समुद्रों और प्रांतों की सूची बनाइए और उन्हें नक्शों पर खोजने की कोशिश कीजिए; सूची के किन्हीं तीन विषयों पर कुछ कहिए।
  3. कल्पना कीजिए कि आप रोम की एक गृहिणी हैं जो घर की ज़रूरत की वस्तुओं की खरीदारी की सूची बना रही हैं — आप सूची में कौन-सी वस्तुएँ शामिल करेंगी?
  4. आपको क्या लगता है कि रोमन सरकार ने चाँदी में मुद्रा ढालना क्यों बंद किया होगा और सिक्कों के उत्पादन के लिए कौन-सी धातु का उपयोग करने लगे? (उत्तर-दिशा: स्पेन की खानों की चाँदी समाप्त; सोना — सॉलिडस।)

संक्षेप में निबंध लिखिए — 5. अगर सम्राट ट्राजान भारत पर विजय प्राप्त करने में वास्तव में सफल रहे होते और रोमवासियों का इस देश पर अनेक सदियों तक कब्ज़ा रहा होता, तो आप क्या सोचते हैं कि भारत वर्तमान समय के देश से किस प्रकार भिन्न होता? 6. अध्याय को ध्यानपूर्वक पढ़कर उसमें से रोमन समाज और अर्थव्यवस्था को आपकी दृष्टि में आधुनिक दर्शाने वाले आधारभूत अभिलक्षण चुनिए। (उत्तर-दिशा: एकल परिवार; स्त्रियों के संपत्ति-अधिकार व तलाक; व्यावसायिक वेतनभोगी सेना; नगर-प्रशासन; मुद्रा-बैंकिंग; जल-शक्ति व औद्योगिक उत्पादन; कानून की परंपरा; फैक्ट्री-जैसा श्रम-नियंत्रण।)

शिक्षक-संदर्भ: क्रियाकलाप-सूची

#पृष्ठक्रियाकलाप
—37महाद्वीपों के आर-पार आवागमन वाली पाँच घटनाएँ/प्रक्रियाएँ
143तीन मुख्य ‘खिलाड़ी’; सम्राट का शासन-तंत्र; किसका सहयोग
246स्त्रियों की आत्मनिर्भरता; रोमन बनाम भारतीय परिवार
347पुरातत्त्वविद = जासूस; एम्फ़ोरा के निष्कर्ष
450कामगार-बर्ताव बताने वाले तीन लेखक; नियंत्रण के दो तरीके

अतिरिक्त पठन (पुस्तक-संदर्भ)

  • स्रोत-उद्धरण: फरगस मिल्लर — दि रोमन नीयर ईस्ट; गैलेन — ऑन गुड एण्ड बैड डाइट; टैसिटस; ओलिंपियोडोरस।
  • विषय 1 से जोड़: दक्षिणी मेसोपोटामिया की कृषि-तुलना (रोम-सन्दर्भ); विषय 3/4 (खिलाफ़त — पूर्वी रोम की समृद्धि की नींव पर); विषय 5 (यायावर साम्राज्य — मंगोल)।