पुस्तक: विश्व इतिहास के कुछ विषय (कक्षा XI, NCERT) · खंड चार — आधुनिकीकरण की ओर · विषय 7 पाठ्यपुस्तक पृष्ठ: अध्याय 153–181 · पुस्तक का निष्कर्ष 182–184 यह पुस्तक का अंतिम अध्याय है।
0. इस अध्याय की केंद्रीय धुरी
यह अध्याय एक ही सवाल के चार उत्तर है।
सवाल है — पश्चिमी साम्राज्यवाद के दबदबे वाली दुनिया में एक गैर-पश्चिमी देश आधुनिक कैसे बने? चार उत्तर हैं — जापान, चीन, ताइवान और कोरिया। और अध्याय का निष्कर्ष यह है कि कोई एक ‘सही’ उत्तर नहीं था:
“औद्योगिक समाजों ने एक-दूसरे के जैसे बनने की बजाए आधुनिकता के अपने-अपने मार्ग बनाए।” (पृ. 179)
पर अध्याय यहीं नहीं रुकता। वह हर रास्ते की कीमत भी गिनाता है —
| देश | जो पाया | जो कीमत चुकाई |
|---|---|---|
| जापान | आज़ादी बचाई; परंपरा को नए ढंग से इस्तेमाल किया; तेज़ औद्योगीकरण | कुलीन-नेतृत्व वाले आधुनिकीकरण ने उग्र राष्ट्रवाद को जन्म दिया; लोकतंत्र की माँग का गला घोंटा; औपनिवेशिक साम्राज्य बनाया |
| चीन | शताब्दियों पुरानी असमानताएँ हटीं; शिक्षा फैली; जागरूकता आई | दमनकारी राजनीतिक व्यवस्था; मुक्ति के आदर्श “ऐसी नारेबाज़ी में बदल” गए जो लोगों को काबू में लाने के काम आती थी |
| ताइवान | भूमि सुधार; तेज़ आर्थिक वृद्धि; अमीर-गरीब का अंतर घटा | दमनकारी सरकार; 1947 में नेताओं की पूरी पीढ़ी की हत्या; लोकतंत्र 1987 के बाद |
| कोरिया | 1960 के दशक से अभूतपूर्व वृद्धि; उच्च साक्षरता; परिपक्व लोकतंत्र | तीन सैन्य तख्तापलट; यूसिन संविधान में “लोकतंत्र अस्थायी रूप से निलंबित”; ग्वांगजू का दमन |
एक वाक्य में अध्याय: आधुनिक बनने के कई रास्ते थे — और हर रास्ते पर लोकतंत्र और विकास के बीच एक सौदेबाज़ी हुई, जिसका हिसाब आज तक चुकाया जा रहा है।
पढ़ाने का सबसे बड़ा बिंदु: अध्याय 6 पूछता था ‘असभ्य’ किसे कहा गया और क्यों? — यह अध्याय पूछता है ‘आधुनिक’ किसे कहा गया और किसने तय किया? दोनों एक ही प्रश्न के दो चेहरे हैं। इसीलिए इस अध्याय का सबसे मूल्यवान क्षण वह है जब निशितानी केजी (1943) ‘आधुनिक’ को तीन पश्चिमी धाराओं से परिभाषित करते हैं — और NCERT विद्यार्थी से पूछती है, “क्या आप उससे सहमत हैं?” (क्रियाकलाप 2)।
1. अध्याय का प्रवेश-द्वार — दो देश, उलटी क़िस्मत (पृ. 153)
पाठ्यपुस्तक अध्याय की शुरुआत एक तुलनात्मक विरोधाभास से करती है:
उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में चीन का पूर्वी एशिया पर प्रभुत्व था। लंबी परंपरा के वारिस छींग राजवंश की सत्ता अक्षुण्ण जान पड़ती थी, जबकि नन्हा-सा द्वीप-देश जापान अलग-थलग पड़ा हुआ प्रतीत होता था।
इसके बावजूद, कुछ ही दशकों के भीतर तस्वीर पूरी तरह पलट गई:
| चीन | जापान |
|---|---|
| अशांति की गिरफ़्त में आ गया | आधुनिक राष्ट्र-राज्य का निर्माण किया |
| औपनिवेशिक चुनौती का सामना नहीं कर पाया | औद्योगिक अर्थतंत्र की रचना की |
| छींग राजवंश के हाथ से राजनीतिक नियंत्रण जाता रहा | ताइवान (1895) तथा कोरिया (1910) को मिलाते हुए औपनिवेशिक साम्राज्य कायम किया |
| कारगर सुधार करने में असफल | अपनी संस्कृति और आदर्शों की स्रोत-भूमि चीन को 1894 में हराया |
| देश गृहयुद्ध की लपटों में आ गया | 1905 में रूस जैसी यूरोपीय शक्ति को पराजित करने में कामयाब रहा |
कक्षा में यह विरोधाभास बोर्ड पर लिखकर छोड़ दें और पूरा अध्याय उसका उत्तर खोजने में बिताएँ। 1894 वाली बात पर विशेष ज़ोर दें — जापान ने उसी देश को हराया जिससे उसने अपनी लिपि, अपना बौद्ध धर्म और अपनी राजनीतिक शब्दावली ली थी। शिष्य ने गुरु को हराया। यह अध्याय 6 के डेनियल पॉल वाले उलटाव से जोड़ा जा सकता है।
1.1 चीन की धीमी प्रतिक्रिया
- चीनियों की प्रतिक्रिया धीमी रही और उनके सामने कई कठिनाइयाँ आईं
- आधुनिक दुनिया का सामना करने के लिए उन्होंने अपनी परंपराओं को पुनः परिभाषित करने का प्रयास किया
- साथ ही अपनी राष्ट्र-शक्ति के पुनर्निर्माण और पश्चिमी व जापानी नियंत्रण से मुक्त होने की कोशिश की
- उन्होंने पाया कि असमानताओं को हटाने और अपने देश के पुनर्निर्माण के दुहरे मक़सद को वे क्रांति के ज़रिये ही हासिल कर सकते हैं
- 1949 में चीनी साम्यवादी पार्टी ने गृहयुद्ध में जीत हासिल की
- लेकिन 1970 के दशक के आखिर तक चीनी नेताओं को लगने लगा कि देश की विचारधारात्मक व्यवस्था उसकी आर्थिक वृद्धि और विकास में बाधा डाल रही है
- इस वजह से अर्थव्यवस्था में व्यापक सुधार किए गए
- यद्यपि इससे पूँजीवाद और मुक्त बाज़ार की वापसी हुई, तथापि साम्यवादी दल का राजनीतिक नियंत्रण अब भी बरकरार रहा
1.2 जापान का चक्र
- जापान उन्नत औद्योगिक राष्ट्र बन गया, लेकिन साम्राज्य की लालसा ने उसे युद्ध में झोंक दिया
- 1945 में आंग्ल-अमरीकी सैन्यशक्ति के सामने उसे हार माननी पड़ी
- अमरीकी आधिपत्य के साथ अधिक लोकतांत्रिक व्यवस्था की शुरुआत हुई
- 1970 के दशक तक जापान अपनी अर्थव्यवस्था का पुनर्निर्माण करके एक प्रमुख आर्थिक शक्ति बनकर उभरा
1.3 जापान की सफलता का NCERT का आकलन (यह वाक्य याद रखने योग्य है)
- जापान का आधुनिकीकरण का सफ़र पूँजीवाद के सिद्धांतों पर आधारित था
- यह सफ़र उसने ऐसी दुनिया में तय किया, जहाँ पश्चिमी उपनिवेशवाद का प्रभुत्व था
- दूसरे देशों में जापान के विस्तार को “पश्चिमी प्रभुत्व का विरोध करने और एशिया को आज़ाद कराने की माँग के आधार पर उचित ठहराया गया”
- जापान में जिस तेज़ी से विकास हुआ वह जापानी संस्थाओं और समाज में परंपरा की सुदृढ़ता, उनकी सीखने की शक्ति और राष्ट्रवाद की ताकत को दर्शाता है
इस तीसरे बिंदु पर विशेष ध्यान दें — यह मुक्तिदाता का मुखौटा पहने साम्राज्यवाद का सटीक वर्णन है। इसे अध्याय 6 के उस वाक्य से जोड़ें जहाँ कुक की हत्या (हवाई में) को ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासियों के खिलाफ़ हिंसा का औचित्य बनाया गया था। दोनों जगह एक सच्ची-सी लगने वाली बात को झूठे काम का बहाना बनाया गया।
2. चीन और जापान में इतिहास-लेखन (पृ. 153–154)
यह हिस्सा नीले अक्षरों में है और अक्सर छोड़ दिया जाता है — इसे मत छोड़िए। यह इस अध्याय का इतिहास-लेखन (historiography) वाला भाग है।
2.1 इतिहास क्यों लिखा गया
- चीन और जापान में इतिहास लेखन की लंबी परंपरा रही है
- कारण: इन देशों में यह माना जाता है कि इतिहास शासकों के लिए महत्त्वपूर्ण मार्गदर्शक का काम करता है
- ऐसा समझा जाता है कि अतीत वे मानक पेश करता है, जिनके आधार पर शासकों का आकलन किया जा सकता है
- इसीलिए शासकों ने अभिलेखों की देखरेख और राजवंशों का इतिहास लिखने के लिए सरकारी विभागों की स्थापना की
| व्यक्ति/संस्था | योगदान |
|---|---|
| सिमा छियन (Sima Qian, 145–90 ई.पू.) | प्राचीन चीन का महानतम इतिहासकार माना जाता है |
| मेजी सरकार, 1869 | शुरुआती अधिनियमों में से एक — एक ब्यूरो की स्थापना, जिसका काम था अभिलेखों को इकट्ठा करना; एक अन्य उद्देश्य था मेजी पुनःस्थापना के बारे में मेजी विजेताओं के नज़रिये से लेखन |
1869 वाली बात कक्षा में ज़रूर उठाएँ। नयी सरकार बनते ही जो पहले काम हुए उनमें एक था अपना इतिहास लिखवाना। यानी विजेता अपनी विजय की कहानी लिखवाता है — और वह कहानी बाद में ‘इतिहास’ कहलाती है। यह अध्याय 6 के ‘महान ऑस्ट्रेलियाई चुप्पी’ का दूसरा पहलू है: वहाँ चुप्पी थी, यहाँ सुनियोजित कथन।
2.2 स्रोतों की विविधता
- लिखित शब्द का बहुत सम्मान था और साहित्यिक कौशल को बहुमूल्य समझा जाता था
- नतीजा — भाँति-भाँति के लिखित स्रोत उपलब्ध हैं: सरकारी इतिहास, विद्वत्तापूर्ण लेखन, लोकप्रिय साहित्य और धार्मिक परचे
- मुद्रांकन और प्रकाशन पूर्व-आधुनिक काल में महत्वपूर्ण उद्योग थे, और यह संभव है कि 18वीं शताब्दी के चीन और जापान की किसी किताब के वितरण का पता लगाया जा सके
2.3 आधुनिक विद्वानों की परंपरा
| विद्वान | काल/देश | योगदान |
|---|---|---|
| लियांग छिचाओ (Lian Qichao) | चीन | आधुनिक चीनी बौद्धिक परंपरा |
| कुमे कुनीताके (Kume Kunitake, 1839–1931) | जापान | जापान में आधुनिक इतिहास के पथप्रदर्शकों में से एक |
| मार्को पोलो (1254–1324) | इटली | चीन में 1274 से 1290 तक |
| मैत्थियो रिक्की (Mateo Ricci, 1552–1610) | चीन | जैसुट पादरी |
| लुई फ़्रॉय (Luis Frois, 1532–1597) | जापान | बुद्धिजीवी |
| जोज़फ नीडहम (Joseph Needham) | ब्रिटेन | चीनी सभ्यता में विज्ञान के इतिहास पर अत्यंत महत्त्वपूर्ण कार्य |
| जॉर्ज सैन्सम | ब्रिटेन | जापानी इतिहास और संस्कृति पर कार्य |
- 19वीं सदी के ईसाई मिशनरियों के लेखन से भी फ़ायदे हुए
- हाल के वर्षों में चीनी और जापानी विद्वानों की लिखी चीज़ें अंग्रेज़ी में अनूदित हुई हैं
- 1980 से कई चीनी विद्वान जापान में ही काम करते और जापानी में लिखते आए हैं
2.4 नाइतो कोनान (Naito Konan) 1866–1934 (पृ. 154 का बॉक्स)
- चीन पर काम करने वाले प्रमुख जापानी विद्वान, जिनके लेखन ने अन्य जापानी लेखकों को प्रभावित किया
- जापान में चीन का अध्ययन करने की लंबी परंपरा रही है
- उन्होंने अपने काम में पश्चिमी इतिहास-लेखन की नयी तकनीकों तथा अपने पत्रकारिता के अनुभवों का इस्तेमाल किया
- 1907 में क्योतो विश्वविद्यालय में प्राच्य अध्ययन का विभाग बनाने में मदद की
- शिनारॉन (Shinaron) — ‘चीन पर’, 1914 में उन्होंने तर्क दिया कि गणतांत्रिक सरकार के ज़रिये चीनी सुंग राजवंश (960–1279) के काल से चले आ रहे अभिजात वर्ग के नियंत्रण और केंद्रीय सत्ता को खत्म कर सकते हैं
- उनका मानना था कि स्थानीय समाज को पुनर्जीवित करने का यही रास्ता है और सुधार वहीं से शुरू होने चाहिए
- उन्हें चीनी इतिहास में ऐसी क्षमताएँ नज़र आईं जो चीन को आधुनिक और लोकतांत्रिक बना सकती थीं
- उनके मुताबिक जापान चीन में एक अहम भूमिका निभा सकता था — लेकिन वे चीनी राष्ट्रवाद की शक्ति का सही आकलन नहीं कर पाए
*जापान में कुलनाम व्यक्तिगत नाम के पहले लिखा जाता है।*
अंतिम वाक्य सबसे महत्त्वपूर्ण है। नाइतो चीन के प्रति सहानुभूति रखते थे और उसे आधुनिक होते देखना चाहते थे — पर उसमें जापान की ‘अहम भूमिका’ भी देखते थे। यही वह बौद्धिक ढाँचा है जिससे ‘एशिया को आज़ाद कराने’ वाला साम्राज्यवाद निकला। सद्भावना और वर्चस्व एक ही वाक्य में रह सकते हैं — यह विद्यार्थियों को दिखाने का बेहतरीन उदाहरण है।
3. परिचय — दो भूगोल (पृ. 155–156)
“चीन और जापान के भौतिक भूगोल में काफ़ी अंतर है।” यह वाक्य पूरे अध्याय की व्याख्या की कुंजी है।
3.1 चीन
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| स्वरूप | विशालकाय महाद्वीपीय देश, कई तरह की जलवायु वाले क्षेत्र |
| तीन प्रमुख नदियाँ | पीली नदी (हुआंग हे) · यांग्त्सी नदी (छांग जिआंग — दुनिया की तीसरी सबसे लंबी नदी) · पर्ल नदी |
| भू-आकृति | देश का बहुत सा हिस्सा पहाड़ी है |
| प्रमुख जातीय समूह | हान |
| प्रमुख भाषा | चीनी (पुतोंगहुआ) |
| अन्य राष्ट्रीयताएँ | उइघुर, हुई, मांचू और तिब्बती |
| बोलियाँ | कैंटनीज़ — कैंटन (गुआंगज़ाओ) की बोली-उए; शंघाईनीज़ — शंघाई की बोली-वू; तथा कई अल्पसंख्यक भाषाएँ |
चीनी खानों में क्षेत्रीय विविधता — कम से कम चार प्रमुख तरह के खाने:
| पाकप्रणाली | विशेषता |
|---|---|
| दक्षिणी या केंटोनी (सबसे प्रसिद्ध) | विदेशों में रहनेवाले ज़्यादातर चीनी कैंटन प्रांत से आते हैं; जाना-माना डिम सम (शाब्दिक अर्थ ‘दिल को छूना’) — गुंथे हुए आटे को सब्ज़ी आदि भरकर उबाल कर बनाया व्यंजन |
| उत्तरी | गेहूँ मुख्य आहार |
| शेचुआँ (Szechuan) | प्राचीन काल में बौद्ध भिक्षुओं द्वारा लाए गए मसाले और रेशम मार्ग के ज़रिये पंद्रहवीं सदी में पुर्तगाली व्यापारियों द्वारा लाई गई मिर्च के चलते ख़ासा झालदार और तीखा खाना |
| पूर्वी | चावल और गेहूँ, दोनों खाए जाते हैं |
शेचुआँ वाली प्रविष्टि सोने की खान है। एक ही व्यंजन-परंपरा में भारत से आया बौद्ध धर्म और अमरीका से पुर्तगालियों द्वारा लाई गई मिर्च दोनों मौजूद हैं। यानी ‘परंपरागत’ खाना भी विश्व-इतिहास का उत्पाद है। कक्षा में पूछें: राजस्थानी खाने की ‘लाल मिर्च’ कहाँ से आई? — उत्तर वही है, और अध्याय 6 का ‘कोलंबियन विनिमय’ यहाँ थाली में आ जाता है।
3.2 जापान
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| स्वरूप | एक द्वीप शृंखला |
| चार सबसे बड़े द्वीप | हॉंशू (Honshu), क्यूशू (Kyushu), शिकोकू (Shikoku) और होकाइदो (Hokkaido) |
| ओकिनावा (Okinawan) | द्वीपों की शृंखला सबसे दक्षिण में, लगभग बहामास वाले ही अक्षांश पर |
| भू-आकृति | मुख्य द्वीपों की 50 प्रतिशत से अधिक ज़मीन पहाड़ी; बहुत ही सक्रिय भूकंप क्षेत्र |
| प्रभाव | “इन भौगोलिक परिस्थितियों ने वहाँ की वास्तुकला को प्रभावित किया है।” |
| जनसंख्या | अधिकतर जापानी; कुछ आयनू (Ainu) अल्पसंख्यक; और कुछ कोरिया के लोग जिन्हें श्रमिक मज़दूर के रूप में उस समय जापान लाया गया था जब कोरिया जापान का उपनिवेश था |
| भोजन | पशुपालन की परंपरा नहीं; चावल बुनियादी फसल; मछली प्रोटीन का मुख्य स्रोत; कच्ची मछली साशिमी या सूशी अब दुनिया भर में लोकप्रिय क्योंकि सेहतमंद मानी जाती है |
भूगोल को नियति मत बनाइए, पर अनदेखा भी मत कीजिए। चीन विशाल और महाद्वीपीय — इसीलिए उसकी समस्या हमेशा एकता और नियंत्रण की रही। जापान छोटा और समुद्र से घिरा — इसीलिए उसकी समस्या हमेशा संसाधन और सुरक्षा की रही। दोनों की आधुनिकता उन्हीं समस्याओं का उत्तर थी।
कोरियाई मज़दूरों वाली पंक्ति को रेखांकित कराएँ — जापान का ‘सजातीय समाज’ होना भी आंशिक रूप से एक ऐतिहासिक निर्माण है, और उसमें उपनिवेशवाद का हाथ है।
4. जापान — तोकुगावा काल की राजनीतिक व्यवस्था (पृ. 156)
4.1 सत्ता का ढाँचा
- जापान पर क्योतो में रहनेवाले सम्राट का शासन हुआ करता था
- लेकिन बारहवीं सदी आते-आते असली सत्ता शोगुनों के हाथ में आ गई, जो सैद्धांतिक रूप से राजा के नाम पर शासन करते थे
- 1603 से 1867 तक तोकुगावा परिवार के लोग शोगुनपद पर कायम थे
| पद | भूमिका |
|---|---|
| सम्राट | क्योतो में; प्रतीकात्मक |
| शोगुन | असली शासक; एदो में |
| दैम्यो | 250 भागों का शासन चलाते थे |
| सामुराई (योद्धा वर्ग) | शासन करनेवाले कुलीन; शोगुन तथा दैम्यो की सेवा में |
शोगुन का नियंत्रण कैसे बना रहता था:
- शोगुन दैम्यो पर नियंत्रण रखते थे
- शोगुन दैम्यो को लंबे अरसे के लिए राजधानी एदो (आधुनिक तोक्यो) में रहने का आदेश देते थे — ताकि उनकी तरफ़ से कोई खतरा न रहे
- शोगुन प्रमुख शहरों और खदानों पर भी नियंत्रण रखते थे
4.2 16वीं शताब्दी के अंतिम भाग के तीन परिवर्तन
“16वीं शताब्दी के अंतिम भाग में तीन परिवर्तनों ने आगे के विकास की तैयारी की।”
| क्रम | परिवर्तन | परिणाम |
|---|---|---|
| पहला | किसानों से हथियार ले लिए गए, और अब केवल सामुराई तलवार रख सकते थे | शान्ति और व्यवस्था बनी रही, जबकि पिछली शताब्दी में इस वजह से अक्सर लड़ाइयाँ होती रहती थीं |
| दूसरा | दैम्यो को अपने क्षेत्रों की राजधानियों में रहने के आदेश दिए गए | उन्हें काफ़ी हद तक स्वायत्तता प्रदान की गई |
| तीसरा | मालिकों और करदाताओं का निर्धारण करने के लिए ज़मीन का सर्वेक्षण तथा उत्पादकता के आधार पर भूमि का वर्गीकरण | “इन सबका मिलाजुला मकसद राजस्व के लिए स्थायी आधार बनाना था।” |
तीनों परिवर्तनों का साझा तर्क पहचानिए — तीनों ने राज्य की जानकारी और पहुँच बढ़ाई। हथियार किसके पास हैं, दैम्यो कहाँ हैं, ज़मीन किसकी है और कितनी उपजाऊ है — यह सब राज्य को मालूम हो गया। आधुनिक राज्य की पहली शर्त हिंसा नहीं, सूचना है। यही बात 1870 के दशक की मेजी प्रशासनिक इकाइयों में लौटती है, जहाँ राजस्व, स्कूल, स्वास्थ्य और सैन्य भर्ती एक ही इकाई से जुड़ जाते हैं।
4.3 तोकुगावा जापान की शहरी क्रांति (यह हिस्सा परीक्षा में बहुत काम आता है)
- दैम्यो की राजधानियाँ बड़ी हुईं, जिसके चलते 17वीं शताब्दी के मध्य तक जापान में एदो दुनिया का सबसे अधिक जनसंख्या वाला शहर बन गया
- इसके अलावा ओसाका और क्योतो अन्य बड़े शहरों के रूप में उभरे
- कम से कम छह ऐसे गढ़ वाले शहर उभरे जहाँ जनसंख्या 50,000 से अधिक थी
- तुलना: उस समय के ज़्यादातर यूरोपीय देशों में केवल एक बड़ा शहर था
इसके परिणाम:
- वाणिज्यिक अर्थव्यवस्था का विकास हुआ और वित्त और ऋण की प्रणालियाँ स्थापित हुईं
- “व्यक्ति के गुण उसके पद से अधिक मूल्यवान समझे जाने लगे”
- शहरों में जीवंत संस्कृति खिलने लगी; तेज़ी से बढ़ते व्यापारी वर्ग ने नाटक और कलाओं को प्रोत्साहन दिया
- लोगों को पढ़ने का शौक था; होनहार लेखकों के लिए यह संभव हो सका कि वे केवल लेखन से अपनी जीविका चला लें
- एदो में लोग नूडल की कटोरी की कीमत पर किताब किराये पर ले सकते थे
*छपाई लकड़ी के ब्लॉकों से की जाती थी। जापानी लोग यूरोपीय छपाई को पसंद नहीं करते थे।*
“नूडल की कटोरी की कीमत पर किताब” — यह इस अध्याय का सबसे अच्छा एक-पंक्ति प्रमाण है। यह बताता है कि मेजी सुधारों से पहले ही जापान में एक पढ़ने वाला समाज मौजूद था। इसीलिए 1870 के दशक में जब अनिवार्य शिक्षा आई तो वह शून्य से शुरू नहीं हुई — वह पहले से मौजूद साक्षरता पर खड़ी हुई।
यही बात NCERT बाद में दोहराती है: युद्धोत्तर ‘चमत्कार’ “चमत्कार से कहीं अधिक था और इसकी जड़ें जापान के लंबे इतिहास में निहित थीं।” कक्षा में यह सूत्र दें: जापान का चमत्कार 1945 में नहीं, 1600 के दशक में शुरू हुआ था।
4.4 अर्थव्यवस्था — रेशम, चाँदी और चावल का बाज़ार (पृ. 157)
- जापान अमीर देश समझा जाता था, क्योंकि वह चीन से रेशम और भारत से कपड़ा जैसी विलासी वस्तुएँ आयात करता था
- इन आयातों के लिए चाँदी और सोने में कीमत अदा करने से अर्थव्यवस्था पर भार पड़ा
- इसलिए तोकुगावा ने कीमती धातुओं के निर्यात पर रोक लगा दी
- उन्होंने क्योतो के निशिजिन में रेशम उद्योग के विकास के लिए भी कदम उठाये जिससे रेशम का आयात कम किया जा सके
- निशिजिन का रेशम दुनिया भर में बेहतरीन रेशम माना जाने लगा
- मुद्रा का बढ़ता इस्तेमाल और चावल के शेयर बाज़ार का निर्माण दिखाते हैं कि अर्थतंत्र नयी दिशाओं में विकसित हो रहा था
निशिजिन का ब्यौरा (पृ. 157 का किनारा):
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| स्थान | क्योतो की एक बस्ती |
| 16वीं शताब्दी | वहाँ 31 परिवारों का बुनकर संघ था |
| 17वीं शताब्दी के आख़िर | इस समुदाय में 70,000 लोग |
| 1713 | केवल देशी धागा इस्तेमाल करने के आदेश जारी किए गए, जिससे रेशम उत्पादन को और प्रोत्साहन मिला |
| उत्पाद | निशिजिन में केवल विशिष्ट प्रकार के महँगे उत्पाद बनाए जाते थे |
| परिणाम | ऐसे क्षेत्रीय उद्यमी वर्ग का विस्तार हुआ जिन्होंने आगे चलकर तोकुगावा व्यवस्था को चुनौती दी |
| 1859 | विदेशी व्यापार की शुरुआत हुई; जापान से रेशम का निर्यात अर्थव्यवस्था के लिए मुनाफ़े का प्रमुख स्रोत बन गया — एक ऐसे समय में जबकि जापानी अर्थव्यवस्था पश्चिमी वस्तुओं से मुकाबला करने की कोशिश कर रही थी |
इस किनारे-बॉक्स को ज़रूर पढ़ाएँ। 31 परिवारों से 70,000 लोगों तक की यात्रा और फिर “जिन्होंने आगे चलकर तोकुगावा व्यवस्था को चुनौती दी” — यह वाक्य समझाता है कि मेजी पुनर्स्थापना बाहर से नहीं आई थी। पेरी के जहाज़ों ने सिर्फ़ धक्का दिया; विस्फोटक सामग्री जापान के भीतर पहले से तैयार थी — वह था नया व्यापारी-उद्यमी वर्ग जो पुरानी सामंती व्यवस्था में फ़िट नहीं बैठता था।
4.5 सामाजिक और बौद्धिक बदलाव
- प्राचीन जापानी साहित्य के अध्ययन ने लोगों को यह सवाल उठाने पर मजबूर किया कि जापान पर चीन का प्रभाव किस हद तक है
- यह तर्क पेश किया गया कि जापानी होने का सार चीन के संपर्क में आने से बहुत पहले का है
- यह सार उच्च प्राचीन साहित्य में और जापान की उत्पत्ति की पौराणिक कथाओं में देखा जा सकता है
- ये मिथकीय कहानियाँ बताती हैं कि इन द्वीपों को भगवान ने बनाया था और सम्राट सूर्य देवी के उत्तराधिकारी थे
4.6 गेंजी की कथा (पृ. 157 का बॉक्स)
- मुरासाकी शिकिबु (Murasaki Shikibu) द्वारा लिखी गई हेआन (Heian) राजदरबार की यह काल्पनिक डायरी दि टेल ऑफ़ दि गेंजी जापानी साहित्य में प्रमुख कथाकृति बन गई
- इस काल में मुरासाकी जैसी अनेक लेखिकाएँ उभरीं जिन्होंने जापानी लिपि का इस्तेमाल किया, जबकि पुरुषों ने चीनी लिपि का
- चीनी लिपि का इस्तेमाल शिक्षा और सरकार में होता था
- इस उपन्यास में कुमार गेंजी की रोमांचक ज़िंदगी दर्शायी गई और हेआन राजदरबार के अभिजात वातावरण की जीती जागती तस्वीर पेश की गई
- इसमें यह भी दिखाया गया है कि औरतों को अपने पति चुनने और अपनी ज़िंदगी जीने की कितनी आज़ादी थी
यह बॉक्स लिपि और लिंग का रिश्ता खोलता है, और यही इस अध्याय का सबसे सूक्ष्म बिंदु है। पुरुष = चीनी लिपि = शिक्षा और सरकार = सत्ता की भाषा। स्त्री = जापानी लिपि = साहित्य = ‘कम महत्त्वपूर्ण’ मानी गई भाषा। और फिर विडंबना यह हुई कि जापानी साहित्य की सबसे बड़ी कृति उसी ‘कम महत्त्वपूर्ण’ लिपि में लिखी गई। पृ. 159 के लिपि-बॉक्स से जोड़ें, जहाँ हीरागाना को “नारी सुलभ” बताया गया है — और यह भी कि उसी ध्वन्यात्मक अक्षरमाला के चलते “ज्ञान कुलीन वर्गों से व्यापक समाज में काफ़ी तेज़ी से फैल सका।”
यानी जिस लिपि को हाशिये पर रखा गया, उसी ने जापान का लोकतंत्रीकरण किया।
5. मेजी पुनर्स्थापना (पृ. 157–159)
5.1 पृष्ठभूमि और पेरी का आगमन
- 1867–68 में मेजी वंश के नेतृत्व में तोकुगावा वंश का शासन समाप्त किया गया
- कारण:
- देश में तरह-तरह का असंतोष था
- अंतर्राष्ट्रीय व्यापार व कूटनीतिक संबंधों की भी माँग की जा रही थी
पेरी का मिशन:
- 1853 में अमरीका ने कॉमोडोर मैथ्यू पेरी (1794–1858) को जापानी सरकार से एक ऐसे समझौते पर हस्ताक्षर करने की मांग के साथ भेजा जिसमें जापान ने अमरीका के साथ राजनयिक और व्यापारिक संबंध बनाए
- जापान ने अगले साल ऐसे समझौते पर हस्ताक्षर किए (1854)
अमरीका को जापान क्यों चाहिए था — तीन कारण:
- जापान चीन के रास्ते में था और अमरीका चीन में एक बड़ा बाज़ार देखता था
- अमरीका को प्रशांत महासागर में अपने बेड़ों के लिए ईंधन लेने की जगह चाहिए थी
- उस समय केवल एक ही पश्चिमी देश जापान के साथ व्यापार करता था — हॉलैंड
परिणाम:
- पेरी के आगमन ने जापानी राजनीति पर महत्त्वपूर्ण असर डाला
- सम्राट की अचानक अहमियत बढ़ गई, जिसे तब तक बहुत कम राजनैतिक सत्ता मिली हुई थी
- 1868 में एक आंदोलन द्वारा शोगुन को ज़बरदस्ती सत्ता से हटा दिया गया और सम्राट मेजी को एदो ले आया गया
- एदो को राजधानी बना दिया गया और इसका नया नामकरण हुआ, तोक्यो, जिसका मतलब है, ‘पूर्वी राजधानी’
5.2 ‘काले जहाज़’ और एक महत्त्वपूर्ण संशोधन (पृ. 158 का किनारा)
- जापानी पेरी के जहाज़ों को ‘काले जहाज़’ कहते थे (उनकी लकड़ी के जोड़ों को कोलतार से सीलबंद किया जाता था)
- उन्हें ऐसे चित्रों और कार्टूनों में दिखाया गया है जिनमें ‘अजीबोगरीब’ विदेशियों और उनकी आदतों को दर्शाया गया है
- ये चित्र जापान के ‘खुलने’ के शक्तिशाली प्रतीक बन गए
NCERT का अपना संशोधन (कोष्ठक में): “आज विद्वान यह तर्क देते हैं कि जापान कभी ‘बंद’ ही नहीं था चूँकि उसकी पूर्वी एशिया के व्यापार में भूमिका थी और उसके लोग हालैंड और चीन निवासियों के ज़रिये बाहरी दुनिया के बारे में जानते थे।”
यह वाक्य कक्षा में ज़रूर पढ़ाएँ। पाठ्यपुस्तक स्वयं उस प्रचलित कहानी को तोड़ रही है जिसे वह अभी-अभी सुना रही थी। ‘बंद जापान को अमरीका ने खोला’ — यह अमरीकी दृष्टिकोण से लिखा गया इतिहास है। सच यह है कि जापान चुनिंदा रूप से खुला था (हॉलैंड, चीन, कोरिया, रयूक्यू के साथ व्यापार)। यह अध्याय 6 की ‘खोज’ शब्द वाली आलोचना का बिलकुल समांतर उदाहरण है — वहाँ ‘खोज’, यहाँ ‘खुलना’।
5.3 डर, बहस और नयी नीति (पृ. 158)
अधिकारीगण और लोग यह जानते थे कि कुछ यूरोपीय देश भारत व अन्य जगहों पर औपनिवेशिक साम्राज्य बना रहे हैं। ब्रितानियों के हाथों चीन की हार की खबरें फैल रही थीं और इन्हें लोकप्रिय नाटकों में दर्शाया जा रहा था। इस सबके चलते लोगों में एक असली डर बन रहा था कि जापान भी उपनिवेश बनाया जा सकता है।
बहस के तीन पक्ष:
| पक्ष | स्थिति |
|---|---|
| पहला | बहुत से विद्वान और नेता यूरोप के नए विचारों से सीखना चाहते थे बजाए उनकी उपेक्षा करने के, जैसा कि चीन ने किया था |
| दूसरा | कुछ लोग यूरोपीय लोगों को ग़ैर मानते हुए अपने से दूर रखना चाहते थे — हालाँकि वे उनकी नयी तकनीकों को अपनाने के लिए तैयार थे |
| तीसरा | कुछ ने देश को बाहरी दुनिया के लिए धीरे-धीरे और सीमित तरह से खोलने के तर्क दिए |
सरकार का नारा: फ़ुकोकु क्योहे (समृद्ध देश, मज़बूत सेना)
- उन्होंने यह समझ लिया कि उन्हें अपनी अर्थव्यवस्था का विकास और मज़बूत सेना का निर्माण करने की ज़रूरत है
- “अन्यथा उन्हें भी भारत की तरह पराधीनता का सामना करना पड़ सकता है।”
- इस कार्य के लिए उन्हें जनता के बीच राष्ट्र की भावना का निर्माण करने और प्रजा को नागरिक की श्रेणी में बदलने की ज़रूरत महसूस हुई
“प्रजा को नागरिक की श्रेणी में बदलने” — यह ठीक वही वाक्यांश है जो खंड चार के परिचय (अध्याय 6, पृ. 124) में आधुनिकीकरण की परिभाषा के रूप में आया था। पूरा खंड इसी सूत्र से बँधा है — इसे कक्षा में जोड़कर दिखाएँ।
और यह भी ध्यान दिलाएँ कि जापान के लिए भारत एक चेतावनी था — “अन्यथा उन्हें भी भारत की तरह पराधीनता का सामना करना पड़ सकता है।” आगे चलकर लियांग किचाउ भी चीन में यही तर्क देंगे (पृ. 166)। यानी भारत का उपनिवेश बनना पूर्वी एशिया की राजनीति का एक निर्णायक तर्क बन गया। यह भारतीय विद्यार्थी के लिए चौंकाने वाला और यादगार तथ्य है।
5.4 ‘सम्राट-व्यवस्था’ का पुनर्निर्माण
- नयी सरकार ने ‘सम्राट-व्यवस्था’ के पुनर्निर्माण का काम शुरू किया
- (सम्राट व्यवस्था से जापानी विद्वानों का अभिप्राय एक ऐसी व्यवस्था से है जिसमें सम्राट, नौकरशाही और सेना इकट्ठे सत्ता चलाते थे और नौकरशाही व सेना सम्राट के प्रति उत्तरदायी होते थे।)
- राजतांत्रिक व्यवस्था के नमूनों को समझने के लिए कुछ अधिकारियों को यूरोप भेजा गया
- सम्राट को सीधे-सीधे सूर्य देवी का वंशज माना गया, लेकिन साथ ही उसे पश्चिमीकरण का नेता भी बनाया गया
- सम्राट का जन्मदिन राष्ट्रीय छुट्टी का दिन बन गया
- वह पश्चिमी अंदाज़ के सैनिक कपड़े पहनने लगा
- उसके नाम से आधुनिक संस्थाएँ स्थापित करने के अधिनियम जारी किए जाने लगे
- 1890 की शिक्षासंबंधी राजाज्ञा ने लोगों को पढ़ने, जनता के सार्वजनिक एवं साझे हितों को बढ़ावा देने के लिए प्रेरित किया
यह अध्याय का सबसे सुंदर विरोधाभास है और परीक्षा में बहुत काम आता है: सम्राट एक साथ सूर्य देवी का वंशज (परम परंपरा) और पश्चिमीकरण का नेता (परम आधुनिकता) है।
यह विरोधाभास नहीं, रणनीति है। परंपरा की वैधता का इस्तेमाल आधुनिक परिवर्तन को स्वीकार्य बनाने के लिए किया गया। NCERT बाद में इसी को सूत्रबद्ध करती है (पृ. 180): “केवल परंपराओं को पुनर्जीवित करने या ज़बरदस्ती उन्हें पकड़े रखने का सवाल नहीं था, बल्कि उन्हें नए और अलग रचनात्मक तरीके से इस्तेमाल करने की बात थी।”
कक्षा-प्रश्न: क्या भारत में भी ऐसा हुआ? राजा राममोहन राय ने सती-विरोध के लिए वेदों का सहारा क्यों लिया? — उत्तर वही तर्क है।
6. मेजी सुधार — शिक्षा, प्रशासन, सेना (पृ. 159)
6.1 शिक्षा
| वर्ष | बदलाव |
|---|---|
| 1870 के दशक से | नयी विद्यालय-व्यवस्था का निर्माण शुरू; लड़के और लड़कियों के लिए स्कूल जाना अनिवार्य |
| 1910 तक | तकरीबन ऐसी स्थिति आ गई कि स्कूल जाने से कोई वंचित नहीं रहा; पढ़ाई की फ़ीस बहुत कम थी |
| शुरू में | पाठ्यचर्या पश्चिमी नमूनों पर आधारित थी |
| 1870 के दशक के आते-आते | आधुनिक विचारों पर ज़ोर के साथ-साथ राज्य के प्रति निष्ठा और जापानी इतिहास के अध्ययन पर बल दिया जाने लगा |
- शिक्षा मंत्रालय पाठ्यचर्या पर, किताबों के चयन और शिक्षकों के प्रशिक्षण पर नियंत्रण रखता था
- जिसे नैतिक संस्कृति का विषय कहा गया उसे पढ़ना ज़रूरी था
- किताबों में माता-पिता के प्रति आदर, राष्ट्र के प्रति वफ़ादारी और अच्छे नागरिक बनने की प्रेरणा दी जाती थी
यहाँ एक तीखा प्रश्न कक्षा में रखें: अनिवार्य और लगभग निःशुल्क शिक्षा — यह मुक्ति है या नियंत्रण? उत्तर दोनों है। वही व्यवस्था जिसने 1910 तक हर बच्चे को स्कूल पहुँचाया, उसी ने पाठ्यक्रम, किताबें और शिक्षक-प्रशिक्षण तीनों पर नियंत्रण रखा और ‘नैतिक संस्कृति’ अनिवार्य की। आधुनिक राज्य नागरिक बनाता है — और नागरिक को अपने अनुसार भी ढालता है।
6.2 तीन लिपियों की कहानी (पृ. 159 का बॉक्स)
- जापानी भाषा एक साथ तीन लिपियों का प्रयोग करती है
- इनमें से एक कांजी, जापानियों ने चीनियों से छठी शताब्दी में ली
- चूँकि उनकी भाषा चीनी भाषा से बहुत अलग है, उन्होंने दो ध्वन्यात्मक वर्णमालाओं का विकास भी किया — हीरागाना और कताकाना
- हीरागाना नारी सुलभ समझी जाती है क्योंकि हेआन काल में बहुत सी लेखिकाएँ इसका इस्तेमाल करती थीं — जैसे कि मुरासाकी
- यह चीनी चित्रात्मक चिह्नों और ध्वन्यात्मक अक्षरों (हीरागाना अथवा कताकाना) को मिलाकर लिखी जाती है
- शब्द का प्रमुख भाग कांजी के चिह्न से लिखा जाता है और बाकी का हीरागाना में
- “ध्वन्यात्मक अक्षरमाला की मौजूदगी के चलते ज्ञान कुलीन वर्गों से व्यापक समाज में काफ़ी तेज़ी से फैल सका।”
- 1880 के दशक में यह सुझाव दिया गया कि जापानी या तो पूरी तरह से ध्वन्यात्मक लिपि का विकास करें या कोई यूरोपीय भाषा अपना लें। दोनों में से कुछ भी नहीं किया गया।
(जापानी लेख: कांजी — लाल; कताकाना — नीला; हीरागाना — हरा)
अंतिम पंक्ति सबसे शिक्षाप्रद है — “दोनों में से कुछ भी नहीं किया गया।” यह दिखाता है कि आधुनिकीकरण में हर पश्चिमी सुझाव मान नहीं लिया गया। जापान ने चुना कि क्या लेना है और क्या नहीं। यही ‘चयनात्मक आधुनिकीकरण’ (selective modernisation) है और यही जापान और चीन के अनुभवों का सबसे बड़ा फ़र्क़ है।
भारत-सेतु: भारत में भी 1830 के दशक में यही बहस हुई थी — मैकॉले का मिनट (1835) और अंग्रेज़ी बनाम देशी भाषाओं का प्रश्न। अंतर यह था कि जापान में यह निर्णय जापानी कर रहे थे; भारत में यह निर्णय अंग्रेज़ कर रहे थे। यही उपनिवेश और स्वतंत्र राष्ट्र का फ़र्क़ है, और इसे कक्षा में स्पष्ट करना चाहिए।
6.3 प्रशासन और सेना
- राष्ट्र के एकीकरण के लिए मेजी सरकार ने पुराने गाँवों और क्षेत्रीय सीमाओं को बदल कर नया प्रशासनिक ढाँचा तैयार किया
- प्रशासनिक इकाई में पर्याप्त राजस्व ज़रूरी था जिससे —
- स्थानीय स्कूल और स्वास्थ्य सुविधाएँ जारी रखी जा सकें
- साथ ही ये इकाइयाँ सेना के लिए भर्ती केंद्रों के काम आ सकें
- 20 साल से अधिक उम्र के नौजवानों के लिए कुछ अरसे के लिए सेना में काम करना अनिवार्य कर दिया गया
- एक आधुनिक सैन्य बल तैयार किया गया
- एक कानून व्यवस्था बनाई गई जो —
- राजनीतिक गुटों के गठन को देख सके
- बैठकें बुलाने पर नियंत्रण रख सके
- सख़्त सेंसर व्यवस्था बना सके
- इन तमाम उपायों में सरकार को विरोध का सामना करना पड़ा
6.4 मेजी व्यवस्था का सबसे बड़ा दोष
“सेना और नौकरशाही को सीधा सम्राट के निर्देश में रखा गया। यानि कि संविधान बनने के बावजूद यह दो गुट सरकारी नियंत्रण के बाहर रहे।”
“लोकतांत्रिक संविधान और आधुनिक सेना — इन दो अलग आदर्शों को महत्व देने के दूरगामी नतीजे हुए।”
नतीजे:
- सेना ने और इलाके जीतने के मकसद से मज़बूत विदेश नीति के लिए दबाव डाला
- इस वजह से चीन और रूस के साथ जंग हुई, दोनों में ही जापान विजयी रहा
- अधिक जनवाद की लोकप्रिय माँग अक्सर सरकार की इन आक्रामक नीतियों के विरोध में जाती थी
- जापान आर्थिक रूप से विकास करता गया और उसने अपना एक औपनिवेशिक साम्राज्य कायम किया
- अपने देश में उसने लोकतंत्र के प्रसार को कुचला और साथ ही उपनिवेशीकृत लोगों के साथ टकराव का रिश्ता कायम किया
यह अध्याय का सबसे महत्त्वपूर्ण संरचनात्मक बिंदु है और दीर्घ उत्तरीय प्रश्नों की रीढ़ है।
जापान में लोकतंत्र इसलिए नहीं हारा कि जापानी लोकतंत्र नहीं चाहते थे — वे चाहते थे (उएकी एमोरी, जनवादी अधिकार आंदोलन, 1925 का सार्वभौम पुरुष मताधिकार)। लोकतंत्र इसलिए हारा क्योंकि संविधान ने ही सेना को संविधान से बाहर रख दिया था। यानी दोष व्यक्तियों में नहीं, संस्थागत रचना में था।
इसे 1899/1900 के उस नियम से जोड़ें कि केवल सेवारत जनरल और एडमिरल ही (सेना/नौसेना) मंत्री बन सकते हैं — इसका अर्थ था कि सेना जब चाहे मंत्री हटाकर सरकार गिरा सकती थी। यह छोटा-सा नियम बीसवीं सदी के इतिहास में बहुत भारी पड़ा।
7. अर्थव्यवस्था का आधुनिकीकरण (पृ. 160)
7.1 आधार तैयार करना
| कदम | विवरण |
|---|---|
| पूँजी | कृषि पर कर लगाकर धन इकट्ठा किया गया |
| रेल | जापान की पहली रेल लाइन 1870–72 में तोक्यो और योकोहामा बंदरगाह के बीच बिछाई गई |
| मशीनें | वस्त्र उद्योग के लिए मशीनें यूरोप से आयात की गईं |
| कौशल | मज़दूरों के प्रशिक्षण के लिए विदेशी कारीगरों को बुलाया गया; उन्हें जापानी विश्वविद्यालयों और स्कूलों में पढ़ाने के लिए भेजा गया; जापानी विद्यार्थियों को पढ़ने के लिए विदेश भी भेजा गया |
| बैंकिंग | 1872 में आधुनिक बैंकिंग संस्थाओं का प्रारंभ |
| कंपनियाँ | मित्सुबिशी (Mitsubishi) और सुमितोमो (Sumitomo) जैसी कम्पनियों को सब्सिडी और करों में फ़ायदे के ज़रिये प्रमुख जहाज़ निर्माता बनने में मदद मिली → जापानी व्यापार जापानी जहाजों में होने लगा |
| ज़ायबात्सु | ज़ायबात्सु (Zaibatsu) — बड़ी व्यापारिक संस्थाएँ जिन पर विशिष्ट परिवारों का नियंत्रण था; इनका प्रभुत्व दूसरे विश्व युद्ध के बाद तक अर्थव्यवस्था पर बना रहा |
‘ज़ायबात्सु’ शब्द को रेखांकित कराएँ — यह अध्याय में दो बार आता है: यहाँ (निर्माण के समय) और पृ. 164 पर (1945 के बाद अमरीकी कब्ज़े के दौरान उन्हें तोड़ने की कोशिश)। यानी जिस चीज़ ने जापान को आर्थिक शक्ति बनाया, विजेताओं ने उसे ही खतरा माना। आर्थिक शक्ति और सैन्य शक्ति के बीच का रिश्ता इसी शब्द से पढ़ाया जा सकता है।
7.2 जनसंख्या और शहरीकरण
| तथ्य | आँकड़ा |
|---|---|
| जनसंख्या 1872 | 3.5 करोड़ |
| जनसंख्या 1920 | 5.5 करोड़ |
| प्रवास की दिशा | पहले उत्तरी टापू होकाइदो की ओर (काफ़ी हद तक स्वतंत्र इलाका, जहाँ आयनू कहे जानेवाले देसी लोग रहते थे); फिर हवाई और ब्राज़ील और जापान के बढ़ते हुए औपनिवेशिक साम्राज्य की तरफ़ |
| शहरी जनसंख्या 1925 | 21 प्रतिशत |
| शहरी जनसंख्या 1935 | 32 प्रतिशत (2.25 करोड़) |
होकाइदो वाली पंक्ति पर रुकें। “काफ़ी हद तक स्वतंत्र इलाका था और जहाँ आयनू कहे जानेवाले देसी लोग रहते थे” — यह ठीक वही प्रक्रिया है जो अध्याय 6 में अमरीका और ऑस्ट्रेलिया में देखी गई: आंतरिक उपनिवेशीकरण।
दोनों अध्यायों को जोड़ने का यह सबसे अच्छा सूत्र है। आयनू लोगों के साथ जो हुआ, वह अमरीकी मूल निवासियों और ऐबॉरिजिनीज़ के साथ हुए बर्ताव का पूर्वी एशियाई समांतर है — और यह किसी यूरोपीय शक्ति ने नहीं, एक एशियाई राष्ट्र ने किया। इससे यह स्पष्ट होता है कि आबादकार-उपनिवेशवाद यूरोप की विशेषता नहीं, आधुनिक राज्य की एक प्रवृत्ति थी।
7.3 औद्योगिक मज़दूर (पृ. 160–161)
| तथ्य | आँकड़ा |
|---|---|
| औद्योगिक मज़दूरों की संख्या 1870 | 7,00,000 |
| औद्योगिक मज़दूरों की संख्या 1913 | 40 लाख |
| अधिकतर मज़दूर कहाँ | ऐसी इकाइयों में जिनमें 5 से कम लोग थे और जिनमें मशीनों और विद्युत-ऊर्जा का इस्तेमाल नहीं होता था |
| महिलाओं की भागीदारी | आधुनिक कारखानों में काम करने वालों में आधे से ज़्यादा महिलाएँ थीं |
| पहली आधुनिक हड़ताल | 1886 में — और उसका आयोजन महिलाओं ने ही किया |
| पुरुषों की संख्या | 1900 के बाद बढ़ने लगी, लेकिन 1930 के दशक में आकर ही पुरुषों की संख्या महिलाओं से अधिक हुई |
| 100+ मज़दूर वाले कारखाने 1909 | 1000 |
| 1920 तक | 2000 से ज़्यादा |
| 1930 के दशक में | 4000 |
| फिर भी 1940 में | 5,50,000 कारखानों में 5 से कम मज़दूर काम करते थे |
इसका सामाजिक अर्थ (NCERT का अपना विश्लेषण):
“इससे परिवार-केंद्रित विचारधारा बनी रही, उसी तरह जिस तरह राष्ट्रवाद को मज़बूत पैतृक व्यवस्था का सहारा था जहाँ सम्राट परिवार का कुलपति माना जाता था।”
यह वाक्य अत्यंत महत्त्वपूर्ण है — इसे कक्षा में खोलकर समझाएँ। छोटे, परिवार-आधारित कारखाने → परिवार का ढाँचा ही काम का ढाँचा → परिवार में मुखिया की आज्ञा सर्वोपरि → और इसी तर्क को राष्ट्र तक बढ़ा दिया गया, जहाँ सम्राट ‘राष्ट्र-परिवार’ का पिता था।
यानी जापान का आर्थिक ढाँचा उसके राजनीतिक ढाँचे को सहारा दे रहा था। यह सिखाता है कि आर्थिक इतिहास और राजनीतिक इतिहास अलग-अलग विषय नहीं हैं।
महिलाओं वाली पंक्तियों को भी विशेष रूप से रेखांकित करें: आधुनिक कारखानों में आधे से ज़्यादा महिलाएँ, और 1886 की पहली आधुनिक हड़ताल महिलाओं द्वारा। यह अक्सर छूट जाता है, और PARAKH के संवेदनशीलता-वाले प्रश्नों में बहुत उपयोगी है।
7.4 पर्यावरण और तानाका शोज़ो (पृ. 161)
- उद्योग के तेज़ और अनियंत्रित विकास और लकड़ी जैसे प्राकृतिक संसाधनों की माँग से पर्यावरण का विनाश हुआ
- तानाको शोज़ो (Tanaka Shozo), संसद के पहले निम्न सदन के सदस्य, ने 1897 में औद्योगिक प्रदूषण के खिलाफ़ पहला आंदोलन छेड़ा जब 800 गाँववासी जन विरोध में इकट्ठे हुए और उन्होंने सरकार को कार्रवाई करने के लिए मज़बूर किया
तानाका शोज़ो (1841–1913) का ब्यौरा (किनारा):
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| पृष्ठभूमि | एक किसान के बेटे; अपनी पढ़ाई खुद की और एक मुख्य राजनैतिक हस्ती के रूप में उभरे |
| 1880 का दशक | जनवादी हकों के आंदोलन में हिस्सा लिया; इस आंदोलन ने संवैधानिक सरकार की माँग की |
| संसद | पहली संसद-डायट में सदस्य चुने गए |
| सिद्धांत | “औद्योगिक प्रगति के लिए आम लोगों की बलि नहीं दी जानी चाहिए” |
| मामला | आशियो (Ashio) खान से वातारासे (Watarase) नदी में प्रदूषण फैल रहा था |
| नुकसान | 100 वर्ग मील की कृषिभूमि बर्बाद हो रही थी और 1000 परिवार प्रभावित हो रहे थे |
| परिणाम | आंदोलन के चलते कंपनी को प्रदूषण-नियंत्रण के तरीके अपनाने पड़े जिससे 1904 तक फ़सल सामान्य हो गई |
तानाका शोज़ो को इस अध्याय का नैतिक केंद्र मानकर पढ़ाएँ। वे आधुनिकीकरण के विरोधी नहीं थे — वे संविधान, संसद और जनवादी अधिकारों के पक्षधर थे। वे इस बात के विरोधी थे कि प्रगति की कीमत सबसे कमज़ोर लोग चुकाएँ।
भारत-सेतु (बहुत मज़बूत): खंड चार के परिचय में NCERT ने कहा था कि विषय 7 में जापान का प्रदूषण-आंदोलन आएगा। अब उसे भोपाल (1984) से जोड़िए, जो कालक्रम चार (अध्याय 6, पृ. 132) में दर्ज है — “भोपाल यूनियन कार्बाइड के कीटनाशी प्लांट में रिसाव (1984)। यह इतिहास में बहुत ही भयंकर औद्योगिक दुर्घटना थी जिसमें हज़ारों व्यक्तियों की मृत्यु हुई।”
आशियो 1897 और भोपाल 1984 — एक ही प्रश्न, अलग-अलग महाद्वीप और सदी: विकास की कीमत कौन चुकाता है? यह इस अध्याय का सबसे शक्तिशाली कक्षा-क्षण हो सकता है।
8. आक्रामक राष्ट्रवाद (पृ. 161)
- मेजी संविधान सीमित मताधिकार पर आधारित था
- इसने डायट बनाई जिसके अधिकार सीमित थे
- (जापानियों ने संसद के लिए इस जर्मन शब्द का इस्तेमाल किया क्योंकि उनकी कानूनी सोच जर्मनी की सोच से प्रभावित थी।)
- शाही पुनःस्थापना करनेवाले नेता सत्ता में बने रहे और उन्होंने राजनीतिक पार्टियों का गठन किया
- 1918 और 1931 के दरमियान जनमत से चुने गए प्रधानमंत्रियों ने मंत्रिपरिषद बनाए
- इसके बाद उन्होंने पार्टियों का भेद भुला कर बनाई गई राष्ट्रीय एकता मंत्रिपरिषदों के हाथों अपनी सत्ता खो दी
- सम्राट सैन्यबलों का कमांडर था और 1890 से ये माना जाने लगा कि थलसेना और नौसेना का नियंत्रण स्वतंत्र है
- 1899 में प्रधानमंत्री ने आदेश दिए कि केवल सेवारत जनरल और एडमिरल ही मंत्री बन सकते हैं
- सेना को मज़बूत बनाने की मुहिम और जापान के उपनिवेश देशों की वृद्धि — ये इस डर से थे कि जापान पश्चिमी शक्तियों की दया पर निर्भर है
- इस डर को सैन्य-विस्तार के खिलाफ़ और सैन्यबलों को अधिक धन देने के लिए वसूले जानेवाले उच्चतर करों के खिलाफ़ उठनेवाली आवाज़ों को दबाने में इस्तेमाल किया गया
अंतिम वाक्य को बोर्ड पर लिखवाएँ। डर एक शासन-तकनीक है। जो डर असली था (उपनिवेश बनने का), उसे आंतरिक असहमति को दबाने के औज़ार में बदल दिया गया। यह वही तकनीक है जो अध्याय 6 में कुक की हत्या के साथ दिखी थी — एक सच्चे भय या सच्ची घटना का इस्तेमाल किसी और चीज़ के औचित्य के लिए।
डायट (Diet) पर टिप्पणी: यह शब्द जर्मन Reichstag-परंपरा से आया है; जापान ने संविधान भी बड़े पैमाने पर प्रशियाई (जर्मन) नमूने पर बनाया, ब्रिटिश या फ्रांसीसी पर नहीं। कारण: जर्मनी में भी सम्राट मज़बूत था और संसद सीमित — यह जापानी नेताओं को अधिक सुविधाजनक लगा। (यह व्याख्या पाठ्यपुस्तक में नहीं है, पर उसके “कानूनी सोच जर्मनी की सोच से प्रभावित थी” वाक्य से सीधे निकलती है।)
9. ‘पश्चिमीकरण’ और ‘परंपरा’ — तीन पीढ़ियों की बहस (पृ. 162)
“जापान के अन्य देशों के साथ संबंधों पर जापानी बुद्धिजीवियों की आनुक्रमिक पीढ़ियों के विचार अलग-अलग थे।”
पीढ़ी 1 — फ़ुकुज़ावा यूकिची: पूर्ण पश्चिमीकरण
- कुछ के लिए, अमरीका और पश्चिमी यूरोपीय देश सभ्यता की ऊँचाइयों पर थे जहाँ जापान पहुँचने की आकांक्षा रखता था
- फ़ुकुज़ावा यूकिची (Fukuzawa Yukichi) मेजी काल के प्रमुख बुद्धिजीवियों में से थे
- उनका कहना था कि जापान को ‘अपने में से एशिया को निकाल फेंकना’ चाहिए
- यानि जापान को अपने एशियाई लक्षण छोड़ देने चाहिए और पश्चिम का हिस्सा बन जाना चाहिए
फ़ुकुज़ावा यूकिची (1835–1901) का बॉक्स:
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| जन्म | एक गरीब सामुराई परिवार में |
| शिक्षा | नागासाकी और ओसाका में; डच और पश्चिमी विज्ञान पढ़ा और बाद में अंग्रेज़ी भी |
| 1860 | अमरीका में पहले जापानी दूतावास में अनुवादक के रूप में गए — इससे उन्हें पश्चिम पर किताब लिखने के लिए बहुत कुछ मिला |
| शैली | उन्होंने अपने विचार क्लासिकी नहीं बल्कि बोलने-चालने के अंदाज़ में लिखे; यह किताब बहुत ही लोकप्रिय हुई |
| संस्थान | उन्होंने एक शिक्षा संस्थान स्थापित किया जो आज केओ विश्वविद्यालय के नाम से जाना जाता है |
| संस्था | वे मेरोकुशा (Meirokusha) संस्था के मुख्य सदस्यों में से थे — यह संस्था पश्चिमी शिक्षा का प्रचार करती थी |
| पुस्तक | ज्ञान के लिए प्रोत्साहन (गाकुनोन नो सुसुमे, 1872–76) में उन्होंने जापानी ज्ञान की कड़ी आलोचना की |
| प्रसिद्ध वाक्य | “जापान के पास प्राकृतिक दृश्यों के अलावा गर्व करने के लिए कुछ भी नहीं है” |
| तर्क | उन्होंने आधुनिक कारखानों व संस्थानों के अलावा पश्चिम के सांस्कृतिक सारतत्त्व को भी बढ़ावा दिया जो उनके मुताबिक सभ्यता की आत्मा है; उसके ज़रिये एक नया नागरिक बनाया जा सकेगा |
| सिद्धांत | “स्वर्ग ने इंसान को इंसान के ऊपर नहीं बनाया, न ही इंसान को इंसान के नीचे” |
फ़ुकुज़ावा को केवल ‘पश्चिम-भक्त’ कहकर मत छोड़िए — यह गलत होगा। उनका सिद्धांत “स्वर्ग ने इंसान को इंसान के ऊपर नहीं बनाया” समानता का घोषणापत्र है, और यह एक ऐसे समाज में कहा गया जो सामुराई/किसान/व्यापारी के कठोर वर्गों में बँटा था। वे स्वयं गरीब सामुराई परिवार से थे।
कक्षा-तुलना: यह वाक्य ज्योतिबा फुले, नारायण गुरु या आंबेडकर की भाषा से बहुत दूर नहीं है। (यह तुलना सावधानी से करें — संदर्भ बिलकुल अलग हैं; समानता विचार की है, परिस्थिति की नहीं।)
पीढ़ी 2 — मियाके सेत्सुरे: देसी मूल्यों पर राष्ट्रीय गर्व
- अगली पीढ़ी ने पश्चिमी विचारों को पूरी तरह से स्वीकार करने पर सवाल उठाये और कहा कि राष्ट्रीय गर्व देसी मूल्यों पर निर्मित होना चाहिए
- दर्शनशास्त्री मियाके सेत्सुरे (Miyake Setsurei, 1860–1945) ने तर्क पेश किया कि विश्व सभ्यता के हित में हर राष्ट्र को अपने खास हुनर का विकास करना चाहिए
- “अपने को अपने देश के लिए समर्पित करना अपने को विश्व को समर्पित करना है”
पीढ़ी 3 — उएकी एमोरी: लोकतंत्र
- इसकी तुलना में बहुत से बुद्धिजीवी पश्चिमी उदारवाद की तरफ़ आकर्षित थे और वे चाहते थे कि जापान अपना आधार सेना की बजाय लोकतंत्र पर बनाए
- संवैधानिक सरकार की माँग करने वाले जनवादी अधिकारों के आंदोलन के नेता उएकी एमोरी (Ueki Emori, 1857–1892) — फ्रांसीसी क्रांति में मानवों के प्राकृतिक अधिकार और जन प्रभुसत्ता के सिद्धांतों के प्रशंसक
- वे उदारवादी शिक्षा के पक्ष में थे जो प्रत्येक व्यक्ति को विकसित कर सके: ‘व्यवस्था से ज़्यादा कीमती चीज़ है, आज़ादी’
- कुछ दूसरे लोगों ने तो महिलाओं के मताधिकार की भी सिफ़ारिश की
- इस दबाव ने सरकार को संविधान की घोषणा करने पर बाध्य किया
यह अंतिम वाक्य सबसे ज़रूरी है — “इस दबाव ने सरकार को संविधान की घोषणा करने पर बाध्य किया।”
मेजी संविधान (1889) सरकार का उपहार नहीं था, वह आंदोलन का नतीजा था। यह बात अक्सर छूट जाती है क्योंकि मेजी काल को ‘ऊपर से किया गया आधुनिकीकरण’ कहकर पढ़ाया जाता है। NCERT यहाँ स्पष्ट कर रही है कि नीचे से दबाव भी था।
तीनों पीढ़ियों की तालिका बोर्ड पर बनवाएँ — यह अध्याय का सर्वोत्तम कक्षा-कार्य है: फ़ुकुज़ावा (पश्चिम बनो) → मियाके (अपने हुनर से विश्व को दो) → उएकी (आज़ादी सर्वोपरि)। तीनों जापानी थे, तीनों आधुनिकता चाहते थे, तीनों के उत्तर अलग थे। यही “आधुनिकता के अपने-अपने मार्ग” का सूक्ष्म रूप है — सिर्फ़ देशों के बीच नहीं, एक ही देश के भीतर भी।
10. रोज़मर्रा की ज़िंदगी (पृ. 163)
“जापान का एक आधुनिक समाज में रूपांतरण रोज़ाना की ज़िंदगी में आए बदलावों में भी देखा जा सकता है।”
| पहले | बाद में |
|---|---|
| पैतृक परिवार व्यवस्था — कई पीढ़ियाँ परिवार के मुखिया के नियंत्रण में | जैसे-जैसे लोग समृद्ध हुए, परिवार के बारे में नए विचार फैलने लगे |
| — | नया घर (जिसे जापानी अंग्रेज़ी शब्द का इस्तेमाल करते हुए होमु कहते हैं) का संबंध मूल परिवार (nuclear family) से था, जहाँ पति-पत्नी साथ रह कर कमाते और घर बसाते थे |
पारिवारिक जीवन की इस नयी समझ ने पैदा की —
- नए तरह के घरेलू उत्पाद
- नए क़िस्म के पारिवारिक मनोरंजन
- नए प्रकार के घर की माँग
आवास का आँकड़ा (यह याद रखने योग्य है):
1920 के दशक में निर्माण कम्पनियों ने शुरू में 200 येन देने के बाद लगातार 10 साल के लिए 12 येन माहवार की किश्तों पर लोगों को सस्ते मकान मुहैया कराये — यह एक ऐसे समय में जब एक बैंक कर्मचारी (उच्च शिक्षाप्राप्त व्यक्ति) की तनख्वाह 40 येन प्रतिमाह थी।
चित्र: बिजली से चलने वाली नवीन घरेलू वस्तुएँ — चावल पकाने वाला कुकर, अमरीकी भूनक (मांस व मछली भूनने वाला), ब्रेड सेंकने वाला टोस्टर
इस आँकड़े को कक्षा में गणित बनाकर पढ़ाएँ: 12 येन प्रति माह उस व्यक्ति के लिए जिसकी आय 40 येन थी — यानी आय का लगभग 30%। यही आज की EMI का पूर्वज है। यह पंक्ति दिखाती है कि आधुनिकता केवल कारखानों और संविधानों में नहीं आई — वह रसोई, किश्त और मकान में आई। यही ‘सामाजिक इतिहास’ पढ़ाने का सही तरीका है।
10.1 कार क्लब और ‘मोगा’ (पृ. 163 का बॉक्स)
| तत्व | विवरण |
|---|---|
| मोगा | ‘आधुनिक लड़की’ के लिए संक्षिप्त शब्द; यह 20वीं शताब्दी में लिंग बराबरी, विश्वजनीन (कॉस्मोपॉलिटन) संस्कृति और विकसित अर्थव्यवस्था के विचारों के एक साथ आने का सूचक है |
| नया मध्यम वर्ग | आवागमन और मनोरंजन के नए तरीकों का लुत्फ़ उठाया |
| परिवहन | शहरों में बिजली की ट्रामों के साथ परिवहन बेहतर हुआ |
| 1878 से | जनता के लिए बाग़ बनाये गए |
| दुकानें | बड़ी दुकानें डिपार्टमेंट स्टोर बनने लगीं |
| गिन्ज़ा | तोक्यो में गिन्ज़ा गिनबुरा के लिए एक फ़ैशनेबुल इलाक़ा बन गया; गिनबुरा = गिन्ज़ा + बुराबुरा; बुराबुरा का अर्थ है ‘बिना किसी लक्ष्य के घूमना’ |
| 1925 | पहला रेडियो-स्टेशन खुला |
| रंगमंच | अभिनेत्री मात्सुई, सुमाको, इब्सन के नाटक एक गुड़िया का घर (A Doll’s House) में नोरा का बेहतरीन किरदार निभा कर राष्ट्रीय स्तर की तारिका बन गईं |
| 1899 | फ़िल्में बनने लगीं और जल्द ही दर्जन भर कंपनियाँ सैकड़ों की तादाद में फ़िल्में बनाने लगीं |
| निष्कर्ष | “यह दौर ओज से भरा हुआ था और इस दौरान सामाजिक और राजनीतिक व्यवहार के पारंपरिक मानकों पर सवाल उठाये गए।” |
‘गिनबुरा’ शब्द को कक्षा में ज़रूर बोलें और उसका अर्थ बताएँ — ‘बिना किसी लक्ष्य के घूमना’। एक समाज तब आधुनिक होता है जब उसके पास बिना काम के घूमने के लिए जगह, समय और शब्द हो। यह उपभोग, अवकाश और शहरी सार्वजनिक जीवन का जन्म है।
नोरा वाली पंक्ति भी गहरी है। इब्सन का A Doll’s House (1879) उस नाटक के रूप में विश्वप्रसिद्ध है जिसमें नायिका अंत में घर छोड़कर चली जाती है। जापान में उस भूमिका को निभाने वाली अभिनेत्री राष्ट्रीय तारिका बन गई — यानी महिलाओं की स्वायत्तता का प्रश्न मंच से होकर समाज में पहुँचा। इसे ‘गेंजी की कथा’ की उन लेखिकाओं से जोड़ें और आप जापान में स्त्री-अभिव्यक्ति की हज़ार साल लंबी रेखा खींच सकते हैं।
11. आधुनिकता पर विजय (पृ. 164)
11.1 युद्ध की ओर
- सत्ता केंद्रित राष्ट्रवाद को 1930–40 के दौरान बढ़ावा मिला जब जापान ने चीन और एशिया में अपने उपनिवेश बढ़ाने के लिए लड़ाइयाँ छेड़ीं
- ये लड़ाइयाँ दूसरे विश्व युद्ध में जाकर मिल गईं जब जापान ने अमरीका के पर्ल हार्बर पर हमला किया
- इस दौर में सामाजिक नियंत्रण में वृद्धि हुई
- असहमति प्रकट करने वालों पर जुल्म ढाये गए और उन्हें जेल भेजा गया
- देशभक्तों की ऐसी संस्थाएँ बनीं जो युद्ध का समर्थन करती थीं। इनमें महिलाओं के कई संगठन थे।
“इनमें महिलाओं के कई संगठन थे” — यह छोटा-सा वाक्य महत्त्वपूर्ण है। इतिहास में महिलाओं को हमेशा ‘शिकार’ के रूप में देखने की प्रवृत्ति है; NCERT यहाँ याद दिलाती है कि महिलाएँ युद्ध-समर्थक राष्ट्रवाद की सक्रिय भागीदार भी थीं। यह 1886 की महिला-हड़ताल और ‘मोगा’ के साथ रखकर पढ़ाया जाए तो महिलाओं की भूमिका की पूरी जटिलता सामने आती है।
11.2 1943 की संगोष्ठी — ‘आधुनिकता पर विजय’
1943 में एक संगोष्ठी हुई ‘आधुनिकता पर विजय’। इसमें जापान के सामने जो दुविधा थी उस पर चर्चा हुई, यानि आधुनिक रहते हुए पश्चिम पर कैसे विजय पाई जाए।
| वक्ता | तर्क |
|---|---|
| संगीतकार मोरोइ साबुरो | सवाल उठाया कि संगीत को ऐंद्रिक उद्दीपन की कला से वापस निकाल कर आत्मा की कला के रूप में उसका पुनर्वास कैसे कराया जाए। वे पश्चिमी संगीत को नकार नहीं रहे थे — वे ऐसी राह खोज रहे थे जहाँ जापानी संगीत को पश्चिमी बाजों पर बजाए या दुहराए जाने से आगे ले जाया जा सके |
| दर्शनशास्त्री निशितानी केजी | ‘आधुनिक’ को तीन पश्चिमी धाराओं के मिलन और एकता से परिभाषित किया: पुनर्जागरण, प्रोटेस्टेंट सुधार, और प्राकृतिक विज्ञानों का विकास |
निशितानी का आगे का तर्क:
- जापान की ‘नैतिक ऊर्जा’ (यह शब्द जर्मन दर्शनशास्त्री रांके से लिया गया है) ने उसे एक उपनिवेश बनने से बचा लिया
- और जापान का फ़र्ज़ बनता है एक नयी विश्व पद्धति, एक विशाल पूर्वी एशिया के निर्माण का
- इसके लिए एक नयी सोच की ज़रूरत है जो विज्ञान और धर्म को जोड़ सके
क्रियाकलाप 2: निशितानी ने ‘आधुनिक’ को जिस तरह परिभाषित किया, क्या आप उससे सहमत हैं?
यह अध्याय का सबसे तीखा बौद्धिक क्षण है — इसे बिलकुल मत छोड़िए।
निशितानी की परिभाषा में तीनों तत्व यूरोपीय हैं — पुनर्जागरण, प्रोटेस्टेंट सुधार, वैज्ञानिक क्रांति। ये ठीक वही तीन चीज़ें हैं जो आपने अध्याय 5 में पढ़ी थीं! यानी एक जापानी दार्शनिक ‘पश्चिम पर विजय’ की बात कर रहा है, पर ‘आधुनिक’ की उसकी परिभाषा पूरी तरह पश्चिमी है।
कक्षा-प्रश्न (क्रियाकलाप 2 का असली अर्थ): अगर आप ‘आधुनिक’ की परिभाषा में केवल भारतीय तत्व रखें, तो उसमें क्या-क्या होगा? इस प्रश्न का कोई एक उत्तर नहीं है — और यही उसकी कीमत है।
और चेतावनी भी दें: निशितानी की ‘नैतिक ऊर्जा’ और ‘विशाल पूर्वी एशिया’ वाली भाषा उसी दौर में जापानी साम्राज्यवाद के औचित्य के रूप में इस्तेमाल हो रही थी (1943 — युद्ध का चरम)। दर्शन और प्रचार के बीच की रेखा कितनी पतली हो सकती है, यह इसका उदाहरण है। यह भी बताएँ कि रांके वही जर्मन इतिहासकार हैं जिनसे अध्याय 5 का प्रारंभ हुआ था (बर्कहार्ट के गुरु) — विचार सीमाओं के आर-पार यात्रा करते हैं और रास्ते में बदल जाते हैं।
12. हार के बाद — वैश्विक आर्थिक शक्ति के रूप में वापसी (पृ. 164–165)
12.1 हार, कब्ज़ा और नया संविधान
- जापान की औपनिवेशिक साम्राज्य की कोशिशें संयुक्त बलों के हाथों हारकर खत्म हो गईं
- यह तर्क दिया गया है कि युद्ध जल्दी खत्म करने के लिए हिरोशिमा और नागासाकी पर नाभिकीय बम गिराये गये
- लेकिन अन्य लोगों का मानना है कि इतने बड़े पैमाने पर जो विध्वंस और दुख-दर्द का तांडव हुआ, वह पूरी तरह से अनावश्यक था
NCERT यहाँ जानबूझकर दो पक्ष रखती है और फ़ैसला नहीं सुनाती। यह इतिहास-लेखन की परिपक्वता है, और विद्यार्थियों को यही दिखाना चाहिए — कि इतिहास की किताब हमेशा ‘सही उत्तर’ नहीं देती, कभी-कभी वह ‘खुला प्रश्न’ देती है। (कालक्रम चार में इसका आँकड़ा दर्ज है — लगभग 1,20,000 व्यक्तियों की मृत्यु, बाद में बहुत से लोग विकिरण के प्रभाव से मरे।)
अमरीकी नेतृत्व वाले कब्ज़े (1945–47) के दौरान:
| सुधार | विवरण |
|---|---|
| विसैन्यीकरण | जापान का विसैन्यीकरण कर दिया गया और एक नया संविधान लागू हुआ |
| अनुच्छेद 9 | ‘तथाकथित युद्ध न करने के वाक्यांश’ के अनुसार युद्ध का राष्ट्रीय नीति के साधन के रूप में इस्तेमाल वर्जित है |
| कृषि सुधार | लागू किए गए |
| व्यापारिक संगठनों का पुनर्गठन | और ज़ायबात्सु यानी बड़ी एकाधिकार कंपनियों की पकड़ को खत्म करने की भी कोशिश की गई |
| राजनीतिक दल | पुनर्जीवित किए गए; जंग के बाद पहले चुनाव 1946 में हुए |
| महिला मताधिकार | इसमें पहली बार महिलाओं ने मतदान किया |
12.2 ‘चमत्कार’ की सही व्याख्या
“अपनी भयंकर हार के बावजूद जापानी अर्थव्यवस्था का जिस तेज़ी से पुनर्निर्माण हुआ, उसे एक युद्धोत्तर ‘चमत्कार’ कहा गया है। लेकिन यह चमत्कार से कहीं अधिक था और इसकी जड़ें जापान के लंबे इतिहास में निहित थीं।”
- संविधान को औपचारिक स्तर पर गणतांत्रिक रूप इसी समय दिया गया
- लेकिन जापान में जनवादी आंदोलन और राजनीतिक भागीदारी का आधार बढ़ाने में बौद्धिक सक्रियता की ऐतिहासिक परंपरा रही है
- युद्ध से पहले के काल की सामाजिक संबद्धता को गणतांत्रिक रूपरेखा के बीच सुदृढ़ किया गया
- इसके चलते सरकार, नौकरशाही और उद्योग के बीच एक करीबी रिश्ता कायम हुआ
- अमरीकी समर्थन और साथ ही कोरिया और वियतनाम में जंग से जापानी अर्थव्यवस्था को मदद मिली
इस पूरे खंड का सार एक वाक्य में: 1946 का संविधान अमरीका ने लिखवाया, पर उसे चलाने वाला समाज जापान ने खुद बनाया था।
और कोरिया व वियतनाम की जंगों वाली पंक्ति को नज़रअंदाज़ न करें — जापान की समृद्धि का एक हिस्सा पड़ोसियों के युद्धों की आपूर्ति से आया। यह असहज तथ्य है, और NCERT उसे दर्ज करती है। यह ‘चमत्कार’ कहानी का ज़रूरी संतुलन है।
12.3 दोबारा विश्व-शक्ति (पृ. 165)
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1964 | तोक्यो में ओलंपिक खेल — जापानी अर्थव्यवस्था की परिपक्वता के प्रतीक बनकर सामने आये |
| 1964 | शिंकांसेन यानी बुलेट ट्रेन का जाल शुरू — रेलगाड़ियाँ 200 मील प्रति घंटे की रफ़्तार से चलती थीं (अब वे 300 मील प्रति घंटे की रफ़्तार से चलती हैं) |
| — | “यह भी जापानियों की सक्षमता दर्शाती हैं कि वे नयी प्रौद्योगिकी के ज़रिये बेहतर और सस्ते उत्पाद बाज़ार में उतार सकें।” |
1960 के दशक में नागरिक समाज आंदोलन का विकास:
- बढ़ते औद्योगीकरण की वजह से स्वास्थ्य और पर्यावरण पर पड़ रहे दुष्प्रभाव को पूरी तरह से नज़र अंदाज़ करने का विरोध किया गया
- अरगजी (Cadmium) का ज़हर, जिसके चलते बड़ी ही कष्टप्रद बीमारी होती थी, एक आरंभिक सूचक था
- इसके बाद 1960 के दशक में मिनामाता में पारे के ज़हर के फैलने और 1970 के दशक के उत्तरार्ध में हवा में प्रदूषण से भी समस्याएँ जन्मीं
- जमीनी स्तरों पर दबाव बनाने वाले गुटों ने इन समस्याओं को पहचानने और साथ ही हताहतों के लिए मुआवजा देने की मांग की
- सरकारी कार्रवाई और नए कानूनों से स्थिति बेहतर हुई
- 1980 के दशक के मध्य से पर्यावरण संबंधी विषयों में लोगों की दिलचस्पी घटी है क्योंकि 1990 तक आते-आते जापान में विश्व के कुछ कठोरतम पर्यावरण-नियंत्रण अमल में लाए गए
- आज एक विकसित देश के रूप में यह अग्रगामी विश्व-शक्ति की अपनी हैसियत को बनाए रखने के लिए अपनी राजनीतिक और प्रौद्योगिकीय क्षमताओं के इस्तेमाल की चुनौतियों का सामना कर रहा है
खंड चार के परिचय का वादा यहाँ पूरा होता है। वहाँ (अध्याय 6, पृ. 125) कहा गया था: “विषय 7 में आप जापान में कैडमियम और पारे के ज़हर के फैलने से हुए औद्योगिक प्रदूषण के बारे में पढ़ेंगे, जिसने लोगों को अंधाधुंध औद्योगीकरण के खिलाफ़ जन आंदोलन करने के लिए जागृत किया।”
पूरी शृंखला बोर्ड पर लिखें — यह अध्याय का सबसे साफ़ कारण-परिणाम क्रम है: तानाका शोज़ो 1897 (आशियो) → कैडमियम → मिनामाता 1960 का दशक → वायु प्रदूषण 1970 का दशक → 1990 तक विश्व के कुछ कठोरतम पर्यावरण-नियंत्रण।
सबक़: पर्यावरण-कानून सरकारों की उदारता से नहीं, नागरिक आंदोलनों के दबाव से आए। और यह प्रक्रिया लगभग सौ साल लंबी थी। यही धैर्य और निरंतरता का पाठ इस अध्याय का सबसे उपयोगी नागरिक-शास्त्र है।
13. चीन — तीन नज़रिये (पृ. 165)
“चीन का आधुनिक इतिहास संप्रभुता की पुनर्प्राप्ति, विदेशी कब्ज़े के अपमान का अंत और समानता तथा विकास को संभव करने के सवालों के चारों ओर घूमता है।”
चीनी बहसों में तीन समूहों के नज़रिए झलकते हैं:
| समूह | प्रतिनिधि | दृष्टिकोण |
|---|---|---|
| आरंभिक सुधारक | कांग योवेई (1858–1927), लियांग किचाउ (1873–1929) | पश्चिम की चुनौतियों का सामना करने के लिए पारंपरिक विचारों को नये और अलग तरीके से इस्तेमाल करने की कोशिश |
| गणतांत्रिक क्रांतिकारी | सन यात-सेन (गणतंत्र के पहले राष्ट्राध्यक्ष) | जापान और पश्चिम के विचारों से प्रभावित |
| कम्युनिस्ट पार्टी | माओ त्सेतुंग | युगों-युगों की असमानताओं को खत्म करना और विदेशियों को खदेड़ देना |
यह तीन-स्तंभ तालिका पूरे चीनी भाग की रीढ़ है — इसे बोर्ड पर बनवाकर ही आगे बढ़ें। तीनों एक ही समस्या (कमज़ोरी और अपमान) का सामना कर रहे थे, पर तीनों का परंपरा के प्रति रुख अलग था: पहला उसे नए ढंग से इस्तेमाल करना चाहता था, दूसरा उसे बदलना, तीसरा उसे खत्म करना।
और यही जापान से सबसे बड़ा फ़र्क़ है: जापान ने परंपरा को “नए और अलग रचनात्मक तरीके से इस्तेमाल” किया (पृ. 180); चीन में “19वीं और 20वीं शताब्दी में परंपराओं को ठुकराया गया” (पृ. 180)। एक ने पुल बनाया, दूसरे ने पुल तोड़ा।
13.1 पश्चिम से पहला सामना और अफ़ीम युद्ध
- आधुनिक चीन की शुरुआत सोलहवीं और सत्रहवीं सदी में पश्चिम के साथ उसका पहला सामना होने के समय से मानी जा सकती है, जब जेसुइट मिशनरियों ने खगोलविद्या और गणित जैसे पश्चिमी विज्ञानों को वहाँ पहुँचाया
- इसका तात्कालिक असर तो सीमित था, पर इसने उन चीज़ों की शुरुआत कर दी जिन्होंने उन्नीसवीं सदी में जाकर तेज़ गति पकड़ी, जब ब्रिटेन ने अफ़ीम के फ़ायदेमंद व्यापार को बढ़ाने के लिए सैन्य बलों का इस्तेमाल किया
- इसी के चलते पहला अफ़ीम युद्ध (1839–1842) हुआ
- इसने सत्ताधारी क्विंग राजवंश को कमज़ोर किया और सुधार तथा बदलाव की मांगों को मज़बूती दी
13.2 अफ़ीम का व्यापार — त्रिकोणीय व्यापार (पृ. 166 का बॉक्स)
यह बॉक्स भारतीय विद्यार्थी के लिए इस पूरे अध्याय का सबसे महत्त्वपूर्ण हिस्सा है।
चीन → ब्रिटेन : चाय, रेशम, चीनी मिट्टी के बर्तन (भारी माँग)
ब्रिटेन → चीन : कुछ नहीं बिकता (चीन में पश्चिमी उत्पादों का बाज़ार नहीं)
↓
इसलिए ब्रिटेन को भुगतान चाँदी में करना पड़ता था — व्यापार में भारी असंतुलन
↓
ईस्ट इंडिया कंपनी ने विकल्प ढूँढ़ा : अफ़ीम — जो हिंदुस्तान के कई हिस्सों में बहुत आराम से उगती थी
↓
भारत → चीन : अफ़ीम बेचकर चाँदी कमाई
↓
केंटन में उधार पत्रों के बदले कंपनी के प्रतिनिधियों को चाँदी दी जाने लगी
↓
उसी चाँदी से कंपनी ब्रिटेन के लिए चाय, रेशम और चीनी मिट्टी के बर्तन खरीदती थी
यही ब्रिटेन, भारत और चीन के बीच उत्पादों का ‘त्रिकोणीय व्यापार’ था।
क्रियाकलाप 3: क्या यह पेंटिंग अफ़ीम युद्ध की अहमियत का स्पष्ट बोध करा पाती है? (पृ. 166 पर अफ़ीम युद्ध की एक यूरोपीय चित्रकारी दी गई है।)
इस बॉक्स को पढ़ाने का सही तरीक़ा — भारत को कहानी के केंद्र में रखिए।
विद्यार्थी को यह स्पष्ट दिखे कि भारत इस त्रिकोण में सिर्फ़ दर्शक नहीं था, वह इंजन था। भारत में अफ़ीम उगाई गई (बिहार, बनारस, मालवा), भारत से चीन भेजी गई, और उससे मिली चाँदी से ब्रिटेन ने चीनी चाय खरीदी। यानी एक उपनिवेश (भारत) का इस्तेमाल दूसरे देश (चीन) को कमज़ोर करने के लिए किया गया।
और यह चक्र आगे भी घूमता है: पृ. 167 पर लियांग किचाउ लिखते हैं कि चीनी लोग देखते थे कि “ब्रितानिया चीन के साथ युद्ध में भारतीय जवानों का इस्तेमाल करता है।” यानी भारत ने अफ़ीम भी दी और सिपाही भी।
कक्षा-प्रश्न: क्या भारत इस त्रिकोण में शोषित था या शोषक? — सही उत्तर है दोनों की जटिल स्थिति: भारत स्वयं उपनिवेश था, पर औपनिवेशिक तंत्र ने उसके संसाधनों और सैनिकों का इस्तेमाल एक और देश के विरुद्ध किया। यह साम्राज्यवाद की श्रृंखलाबद्ध प्रकृति समझाने का सर्वोत्तम उदाहरण है।
कालक्रम चार से जोड़ें (अध्याय 6, पृ. 131): “1780–90 — अंग्रेज़ों ने भारत से चीन को अफ़ीम का निर्यात किया जिसमें अत्यधिक वृद्धि हुई।”
13.3 सुधारक और उपनिवेशों का सबक़ (पृ. 166–167)
कांग यूवेई और लियांग किचाउ जैसे क्विंग सुधारकों ने —
- व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने की ज़रूरत महसूस की
- एक आधुनिक प्रशासकीय व्यवस्था, नयी सेना और शिक्षा व्यवस्था के निर्माण के लिए नीतियाँ बनाईं
- संवैधानिक सरकार की स्थापना के लिए स्थानीय विधायिकाओं का भी गठन किया
- चीन को उपनिवेशीकरण से बचाने की ज़रूरत भी महसूस की
उपनिवेश बनाए गए देशों के नकारात्मक उदाहरणों ने चीनी विचारकों पर ज़बरदस्त प्रभाव डाला:
| उदाहरण | प्रभाव |
|---|---|
| पोलैंड | 18वीं सदी में पोलैंड का बँटवारा सर्वाधिक बहुचर्चित उदाहरण था। यहाँ तक कि 1890 के दशक में पोलैंड शब्द का इस्तेमाल क्रिया के रूप में किया जाने लगा: बोलान वू का मतलब था, ‘हमें पोलैंड करने के लिए’ |
| भारत | लियांग किचाउ का मानना था कि चीनी लोगों में एक राष्ट्र की जागरूकता लाकर ही चीन पश्चिम का विरोध कर पाएगा। 1903 में उन्होंने लिखा कि भारत एक ऐसा देश है, जो किसी और देश नहीं, बल्कि एक कंपनी के हाथों बर्बाद हो गया — ईस्ट इंडिया कंपनी के। वे ब्रितानिया की ताबेदारी करने और अपने लोगों के साथ क्रूर होने के लिए हिंदुस्तानियों की आलोचना करते थे। उनके तर्कों ने आम आदमी को खासा आकर्षित किया, क्योंकि चीनी देखते थे कि ब्रितानिया चीन के साथ युद्ध में भारतीय जवानों का इस्तेमाल करता है |
‘पोलैंड’ का क्रिया बन जाना — यह भाषा-विज्ञान का शानदार उदाहरण है। जब किसी देश का नाम क्रिया बन जाए, तो उसका अर्थ है कि उसकी नियति एक चेतावनी बन चुकी है। (अध्याय 6 में हमने देखा था कि मूल निवासियों के नाम वस्तुओं को दिए गए — डकोटा, चिरोकी, पोंटिआक। यहाँ एक देश का नाम क्रिया बना। दोनों में नाम का सत्ता-संबंध छिपा है।)
लियांग किचाउ की भारत-संबंधी आलोचना असहज है और इसीलिए पढ़ाने योग्य है। वे भारतीयों की आलोचना करते हैं। यह विद्यार्थी को चौंकाएगा। पर यही इतिहास की परिपक्वता है — दूसरे देश के राष्ट्रवादी हमारे इतिहास को हमारी तरह नहीं देखते। उनके लिए भारत सहानुभूति का पात्र भी था और चेतावनी भी।
कक्षा-प्रश्न: क्या लियांग की आलोचना उचित थी? 1903 में भारत में क्या चल रहा था? — (कांग्रेस 18 वर्ष पुरानी थी; स्वदेशी आंदोलन 1905 में आने वाला था।) यह विद्यार्थी को तुलनात्मक राष्ट्रवाद की ओर ले जाता है।
13.4 कन्फ़्यूशियसवाद और विद्यार्थियों का जापान जाना (पृ. 167)
- कन्फ़्यूशियसवाद चीन में प्रमुख विचारधारा रही है
- यह विचारधारा कन्फ़्यूशियस (551–479 ई.पू.) और उनके अनुयायियों की शिक्षा से विकसित की गई
- इसका दायरा अच्छे व्यवहार, व्यावहारिक समझदारी और उचित सामाजिक संबंधों के सिद्धांतों का था
- इसने चीनियों के जीवन के प्रति रवैये को प्रभावित किया, सामाजिक मानक दिये और चीनी राजनीतिक सोच और संगठनों को आधार दिया
बदलाव के लिए बाहर जाना:
- लोगों को नये विषयों में प्रशिक्षित करने के लिए विद्यार्थियों को जापान, ब्रिटेन और फ्रांस में पढ़ने भेजा गया
- 1890 के दशक में बड़ी तादाद में चीनी विद्यार्थी पढ़ने के लिए जापान गए
- वे न केवल नये विचार वापस लेकर आए बल्कि गणतंत्र की स्थापना करने में उन्होंने अग्रणी भूमिका निभाई
- चूँकि चीनी और जापानी भाषा एक ही चित्रलिपि का इस्तेमाल करती हैं, चीन ने जापान से न्याय, अधिकार और क्रांति के यूरोपीय विचारों के जापानी अनुवाद लिए
- “यह एक तरह से पारंपरिक संबंधों का उलट जाना था।”
यह वाक्य ज़रूर रेखांकित कराएँ — “पारंपरिक संबंधों का उलट जाना।”
छठी शताब्दी में जापान ने चीन से लिपि ली थी (पृ. 159 का लिपि-बॉक्स)। उन्नीसवीं सदी के अंत में चीन ने जापान से शब्द लिए — ‘न्याय’, ‘अधिकार’, ‘क्रांति’ के अनुवाद।
1300 साल बाद ज्ञान की दिशा उलट गई। और यह उलटाव उसी दशक में हुआ जिस दशक में जापान ने चीन को युद्ध में हराया (1894)। ज्ञान की दिशा और शक्ति की दिशा साथ-साथ बदलती हैं — यह इस अध्याय का एक गहरा नियम है।
इसे नाइतो कोनान वाले बॉक्स से भी जोड़ें — वहाँ एक जापानी विद्वान चीन के लिए रास्ता सुझा रहा था। 1300 साल पहले यह अकल्पनीय होता।
13.5 परीक्षा प्रणाली का अंत — 1905
संदर्भ: 1905 में रूसी-जापानी युद्ध (एक ऐसा युद्ध जो चीन की ज़मीन पर और चीनी इलाके पर प्रभुत्व के लिए लड़ा गया था) के बाद सदियों पुरानी चीनी परीक्षा-प्रणाली समाप्त कर दी गई, जो प्रत्याशियों को अभिजात सत्ताधारी वर्ग में दाखिला दिलाने का काम करती थी।
परीक्षा प्रणाली का बॉक्स (पृ. 167) — आँकड़ों सहित:
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| प्रवेश का रास्ता | अभिजात सत्ताधारी वर्ग में प्रवेश (1850 तक लगभग 11 लाख) ज़्यादातर इम्तिहान के ज़रिये ही होता था |
| प्रारूप | इसमें 8 भाग वाला निबंध निर्धारित प्रपत्र में (पा-कू वेन) शास्त्रीय चीनी में लिखना होता था |
| आवृत्ति | परीक्षा विभिन्न स्तरों पर हर 3 साल में 2 बार आयोजित की जाती थी |
| सफलता दर | पहले स्तर की परीक्षा में केवल 1–2 प्रतिशत लोग 24 साल की उम्र तक पास हो पाते थे और वे (सुंदर प्रतिभा) बन जाते थे; इस डिग्री से उन्हें निचले कुलीन वर्ग में प्रवेश मिल जाता था |
| डिग्रीधारक | 1850 से पहले किसी भी समय 526,869 सिविल और 212,330 सैन्य प्रांतीय (शेंग हुआन) डिग्री वाले लोग पूरे देश में मौजूद थे |
| पद | देश में केवल 27,000 राजकीय पद थे, इसलिए कई निचले दर्ज़ों के डिग्रीधारकों के पास नौकरी नहीं होती थी |
| आलोचना | यह इम्तहान विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विकास में बाधक का काम करता था, क्योंकि इसमें सिर्फ़ साहित्यिक कौशल की माँग होती थी |
| अंत | चूँकि यह क्लासिक चीनी सीखने के हुनर पर ही आधारित था, जिसकी आधुनिक विश्व में कोई प्रासंगिकता नज़र नहीं आती थी, इसलिए 1905 में इस प्रणाली को खत्म कर दिया गया |
यह बॉक्स दो कारणों से बेहद कीमती है।
पहला — आँकड़ों की कहानी: लगभग 7.4 लाख डिग्रीधारक और केवल 27,000 पद। यानी शिक्षित बेरोज़गारों की एक विशाल फ़ौज। ये वही लोग थे जो 1911 की क्रांति और 4 मई के आंदोलन में सबसे आगे थे। एक व्यवस्था जो योग्यता पैदा करती है पर अवसर नहीं, वह अपने ही विरोधी तैयार करती है। यह आज के भारत में भी उतना ही जीवित प्रश्न है — और कक्षा में इसे पूछना चाहिए।
दूसरा — यह प्रणाली अपने ज़माने में क्रांतिकारी थी। यूरोप में जब पद जन्म से मिलते थे, तब चीन में वे परीक्षा से मिलते थे। (आधुनिक सिविल सेवा परीक्षा का विचार आंशिक रूप से चीनी मॉडल से प्रेरित माना जाता है — विस्तार 07 फ़ाइल में।) पर वही प्रणाली 1905 तक बाधा बन गई थी, क्योंकि उसने पाठ्यक्रम नहीं बदला। सबक़: कोई भी व्यवस्था तब तक ही प्रगतिशील रहती है जब तक वह अपने को बदलती रहे।
तुलना: 1905 में चीन ने अपनी परीक्षा प्रणाली खत्म की — उसी वर्ष जापान ने रूस को हराया। दोनों घटनाएँ अध्याय में जुड़ी हुई हैं और यह जुड़ाव संयोग नहीं है।
14. गणतंत्र की स्थापना (पृ. 167–169)
14.1 सन यात-सेन और तीन सिद्धांत
- 1911 में मांचू साम्राज्य समाप्त कर दिया गया और सन यात-सेन (1866–1925) के नेतृत्व में गणतंत्र की स्थापना की गई
- वे निर्विवाद रूप से आधुनिक चीन के संस्थापक माने जाते हैं
- वे एक गरीब परिवार से थे और उन्होंने मिशन स्कूलों में शिक्षा ग्रहण की जहाँ उनका परिचय लोकतंत्र और ईसाई धर्म से हुआ
- उन्होंने डाक्टरी की पढ़ाई की लेकिन वे चीन के भविष्य को लेकर चिंतित थे
उनका कार्यक्रम — तीन सिद्धांत (सन मिन चुई):
| सिद्धांत | अर्थ |
|---|---|
| 1. राष्ट्रवाद | इसका अर्थ था मांचू वंश — जिसे विदेशी राजवंश के रूप में देखा जाता था — को सत्ता से हटाना, साथ ही अन्य साम्राज्यवादियों को हटाना |
| 2. गणतंत्र | गणतांत्रिक सरकार की स्थापना करना |
| 3. समाजवाद | जो पूँजी का नियमन करे और भूस्वामित्व में बराबरी लाए |
परीक्षा में सीधा प्रश्न (NCERT अभ्यास प्रश्न 4)। तीनों को सन मिन चुई के साथ याद कराएँ। और यह भी दर्ज कराएँ कि तीसरा सिद्धांत कभी लागू नहीं हुआ (पृ. 169) — यही कुओमीनतांग की असफलता का कारण बना।
14.2 4 मई 1919 का आंदोलन
- 4 मई 1919 में बीजिंग में युद्धोत्तर शांति सम्मेलन के निर्णय के विरोध में एक धुआँधार प्रदर्शन हुआ
- हालाँकि चीन ब्रितानिया के नेतृत्व में हुई जीत में विजयी देशों का सहयोगी था, पर उससे हथिया लिए गए उसके इलाके वापस नहीं मिले
- यह विरोध आंदोलन में तब्दील हो गया
आंदोलन ने क्या किया:
- एक पूरी पीढ़ी को परंपरा पर हमला करने के लिए प्रेरित किया
- चीन को आधुनिक विज्ञान, लोकतंत्र और राष्ट्रवाद के ज़रिये बचाने की माँग की गई
- क्रांतिकारियों ने नारा दिया — देश के संसाधनों पर कब्ज़ा जमाए विदेशियों को भगाने, असमानताएँ हटाने और गरीबी कम करने का
सुधारों की वकालत:
- लेखन में आम की ही भाषा का इस्तेमाल
- पैरों को बाँधने की प्रथा का खात्मा
- औरतों की अधीनस्थता का खात्मा
- शादी में बराबरी
- गरीबी खत्म करने के लिए आर्थिक विकास
4 मई का आंदोलन इस अध्याय की सबसे बार-बार लौटने वाली तारीख़ है — इसे रेखांकित कराएँ। यह अध्याय में तीन बार आता है:
- 1919 — मूल आंदोलन
- 1978 — “जैसे कि 60 साल पहले 4 मई के आंदोलन के समय था, नये विचारों का रोमांचकारी भंडार फूट पड़ा”
- 1989 — “4 मई के आंदोलन की 70वीं सालगिरह पर बहुत से बुद्धिजीवियों ने ज़्यादा खुलेपन की माँग की” → तियानममेन
यानी 1919 का आंदोलन चीन में बौद्धिक स्वतंत्रता का स्थायी प्रतीक बन गया — और तीनों बार सत्ता से उसका टकराव हुआ। यह एक ही अध्याय में तीन बार लौटने वाला सूत्र है और दीर्घ उत्तरीय प्रश्न के लिए आदर्श।
‘आम की भाषा’ वाली बात भी बड़ी है — शास्त्रीय चीनी छोड़कर बोलचाल की भाषा (बाइहुआ) में लिखना। यह ठीक वही काम है जो फ़ुकुज़ावा ने जापान में किया था (“क्लासिकी नहीं बल्कि बोलने-चालने के अंदाज़ में लिखे”) और जो भारत में भारतेंदु हरिश्चंद्र और महावीर प्रसाद द्विवेदी ने हिंदी में किया। भाषा का लोकतंत्रीकरण आधुनिकता की साझी पहचान है।
14.3 कुओमीनतांग और चियांग काइशेक
- गणतांत्रिक क्रांति के बाद देश में उथल-पुथल का एक दौर शुरू हुआ
- कुओमीनतांग (नेशनल पीपुल्स पार्टी) और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी मुल्क को एकताबद्ध करने और स्थिरता लाने के लिए संघर्षरत दो महत्त्वपूर्ण ताक़तों के रूप में उभरीं
- सन यात-सेन के विचार कुओमीनतांग के राजनीतिक दर्शन का आधार बने
- उन्होंने कपड़ा, खाना, घर और परिवहन — इन ‘चार बड़ी ज़रूरतों’ को रेखांकित किया
सन यात-सेन की मृत्यु के बाद — चियांग काइशेक (Chiang Kaishek, 1887–1975):
- कुओमीनतांग के नेता बनकर उभरे
- सैन्य अभियान के ज़रिये वारलॉर्ड्स (स्थानीय नेता जिन्होंने सत्ता छीन ली थी) को अपने नियंत्रण में किया और साम्यवादियों को खत्म कर डाला
- उन्होंने सेक्युलर और विवेकपूर्ण ‘इहलौकिक’ कन्फ़्यूशियसवाद की हिमायत की, लेकिन साथ ही राष्ट्र का सैन्यकरण करने की भी कोशिश की
- उन्होंने कहा कि लोगों को ‘एकताबद्ध व्यवहार की प्रवृत्ति और आदत’ का विकास करना चाहिए
- उन्होंने महिलाओं को चार सद्गुण पैदा करने के लिए प्रोत्साहित किया: सतीत्व, रूप-रंग, वाणी और काम; और उनकी भूमिका को घरेलू स्तर पर ही देखने पर ज़ोर दिया
- यहाँ तक कि उनके कपड़ों की किनारियों की लंबाई भी प्रस्तावित की
यह विरोधाभास कक्षा में स्पष्ट कीजिए। 4 मई के आंदोलन ने “औरतों की अधीनस्थता के खात्मे” की माँग की थी; उसके ठीक बाद कुओमीनतांग ने महिलाओं के लिए ‘चार सद्गुण’ और कपड़ों की किनारियों की लंबाई तय की।
यानी क्रांति के बाद प्रतिक्रिया भी आती है। और यह भी कि ‘आधुनिकीकरण’ महिलाओं के लिए अपने आप मुक्ति नहीं लाता — वह इस पर निर्भर करता है कि आधुनिकीकरण का नेतृत्व कौन कर रहा है। यही तुलना जापान में भी लागू होती है (‘मोगा’ बनाम युद्ध-समर्थक महिला संगठन)।
14.4 कुओमीनतांग का सामाजिक आधार और असफलता (पृ. 168–169)
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| सामाजिक आधार | शहरी इलाकों में |
| औद्योगिक विकास | धीमा और गिने चुने क्षेत्रों में |
| शंघाई 1919 | औद्योगिक मज़दूर वर्ग उभर रहा था और इनकी संख्या 500,000 थी |
| पर | इनमें से केवल कुछ प्रतिशत मज़दूर ही जहाज़ निर्माण जैसे आधुनिक उद्योगों में काम कर रहे थे |
| ज़्यादातर लोग | ‘नगण्य शहरी’ (शियाओ शिमिन), व्यापारी और दुकानदार |
| मज़दूरों की हालत | शहरी मज़दूरों, खासतौर से महिलाओं, को बहुत कम वेतन मिलता था। काम करने के घंटे बहुत लंबे थे और काम करने की परिस्थितियाँ बहुत खराब |
| सांस्कृतिक बदलाव | जैसे-जैसे व्यक्तिवाद बढ़ा, महिलाओं के अधिकार, परिवार बनाने के तरीके और प्यार-मुहब्बत की चर्चा — इन सब विषयों को लेकर सरोकार बढ़ते गए |
| शिक्षा | पीकिंग विश्वविद्यालय की स्थापना 1902 में |
| पत्रकारिता | शाओ तोआफ़ेन (Zao Taofen, 1895–1944) द्वारा संपादित लोकप्रिय लाइफ़ वीकली इस नयी विचारधारा की प्रतिनिधि थी |
| इसने क्या किया | पाठकों को नए विचारों से, साथ ही गांधी और तुर्की के आधुनिकतापसंद नेता कमाल अतातुर्क (Kemal Ataturk) जैसे नेताओं से अवगत करवाया |
| वितरण | 1926 में केवल 2000 प्रतियों से बढ़कर 1933 में 200,000 |
‘लाइफ़ वीकली’ का आँकड़ा (2000 → 2,00,000 सात वर्षों में, यानी सौ गुना) कक्षा में ज़रूर बताएँ। और यह भी कि उसमें गांधी छपते थे। 1930 के दशक के चीनी पाठक गांधी को पढ़ रहे थे — यह भारतीय विद्यार्थी के लिए गर्व और जिज्ञासा दोनों जगाता है, और एशियाई राष्ट्रवादों के आपसी संवाद को दिखाता है।
असफलता का NCERT का निदान:
“देश को एकीकृत करने की अपनी कोशिशों के बावजूद कुओमीनतांग अपने संकीर्ण सामाजिक आधार और सीमित राजनीतिक दृष्टि के चलते असफल हो गया। सन यात-सेन के कार्यक्रम का बहुत अहम हिस्सा — पूँजी का नियमन और भूमि-अधिकारों में बराबरी लाना — कभी अमल में नहीं आया, क्योंकि पार्टी ने किसानों और बढ़ती सामाजिक असमानता की अनदेखी की। इसने लोगों की समस्याओं पर ध्यान देने की बजाय फ़ौजी व्यवस्था थोपने का प्रयास किया।”
यह पैराग्राफ़ याद कराने योग्य है — यह “माओ क्यों जीते” का पूरा उत्तर है। कुओमीनतांग शहरों में थी, किसान गाँवों में थे; माओ ने गाँवों को चुना। यही अंतर 1949 का फ़ैसला कर गया।
14.5 1935 का शंघाई — बक क्लेटन (पृ. 169 का बॉक्स)
- शंघाई में एक काला अमरीकन तुरहीवादक, बक क्लेटन (Buck Clayton), अपने जैज़ और कैस्ट्रा के साथ विशेषाधिकारप्राप्त प्रवासी की ज़िंदगी जी रहे थे
- लेकिन वह काला था और एक बार कुछ गोरे अमरीकियों ने उसे तथा उसके वाद्यमंडली के सदस्यों के साथ मारपीट करके उन्हें उनके गायन-वादन वाले होटल से बाहर निकाल दिया
- सो, अमरीकी होने के बावजूद खुद नस्ली भेदभाव का शिकार होने के कारण चीनियों के दुख-दर्द के साथ उनकी बहुत सहानुभूति थी
गोरे अमरीकियों के साथ हुई अपनी लड़ाई, जिसमें वे जीत गए, के बारे में:
“चीनी तमाशबीनों ने हमारे साथ ऐसा बरताव किया जैसे हमने उनका अभीष्ट काम संपन्न किया हो और घर पहुँचने तक रास्ते भर वे किसी विजेता फुटबॉल टीम की तरह हमारा अभिनंदन करते रहे।”
चीनियों की ग़रीबी और कठोर जीवनचर्या के बारे में:
“मैं कभी-कभी देखता कि बीस या तीस कुली मिल कर किसी बड़े भारी ठेले को खींच रहे हैं, जो कि अमरीका में किसी ट्रक द्वारा या घोड़ों द्वारा खींचा जाता। ये लोग इनसानी घोड़ों से अलग कुछ नहीं लगते थे और पूरा काम करने के बाद उन्हें इतना ही मिलता था कि किसी तरह पेट भर चावल और सोने की एक जगह हासिल कर लें। मेरी समझ में नहीं आता, वे कैसे अपना काम चलाते थे।”
चित्र: ‘रिक्शा खींचने वाला’ — लान जिया द्वारा बनाया गया काष्ठ चित्र; लाओ शे (1936) द्वारा रचित उपन्यास ‘रिक्शा’ एक गौरव ग्रंथ बन गया
क्रियाकलाप 4: भेदभाव का अहसास लोगों को कैसे एकताबद्ध करता है?
यह बॉक्स इस अध्याय का सबसे मानवीय क्षण है — इसे धीरे-धीरे पढ़वाइए।
क्लेटन एक साथ विशेषाधिकारप्राप्त और भेदभाव-पीड़ित थे: शंघाई में वे विदेशी थे (इसलिए विशेषाधिकार), अमरीकियों के बीच वे काले थे (इसलिए भेदभाव)। और इसी दोहरी स्थिति ने उन्हें चीनी मज़दूरों को देखने की आँख दी।
क्रियाकलाप 4 का उत्तर इसी में है: भेदभाव का अनुभव साझी पहचान बनाता है, भले ही राष्ट्रीयता और भाषा अलग हो। चीनी तमाशबीनों ने एक अमरीकी की जीत को अपनी जीत माना — क्योंकि वह गोरों पर जीत थी।
इसे अध्याय 6 से जोड़ें — वहाँ भी अमरीका में अफ़्रीकी दासों, मूल निवासियों और भारतीयों के लिए अलग-अलग तर्क दिए गए थे, पर संरचना एक थी (पृ. 148 की तालिका)। यहाँ 1935 के शंघाई में वही संरचना दिखाई देती है — और उसके विरुद्ध एक साझी भावना भी।
चित्र (पृ. 169): बढ़ती हुई कीमतों की कहानी — 1937 में बैल, 1939 में सुअर, 1941 में आटे की बोरी, 1943 में मुर्गी, 1945 में अंडे, 1947 में कोयले का टुकड़ा, 1949 में पन्ना।
इस चित्र को समझाना ज़रूरी है, वरना यह छूट जाता है। यह दिखाता है कि एक ही रकम से 1937 में बैल खरीदा जा सकता था और 1949 में सिर्फ़ एक पन्ना (कागज़ का)। यह अति-मुद्रास्फीति (hyperinflation) का चित्रात्मक इतिहास है, और यह पृ. 171 के आँकड़े से मेल खाता है: “1945 और 1949 के दरमियान कीमतें 30 प्रतिशत प्रति महीने की रफ़्तार से बढ़ीं।”
कुओमीनतांग क्यों हारी — इसका सबसे संक्षिप्त उत्तर यही चित्र है।
15. समय-रेखा (पृ. 170)
| वर्ष | जापान | वर्ष | चीन |
|---|---|---|---|
| 1603 | तोकुगावा लियासु (Tokugawa Ieyasu) द्वारा ईडो शोगुनेट की स्थापना | 1644–1911 | छींग राजवंश |
| 1630 | डचों के साथ अपने सीमित व्यापार को छोड़ कर अन्य पश्चिमी शक्तियों के लिए जापान के दरवाज़े बंद | 1839–60 | दो अफ़ीम युद्ध |
| 1854 | जापान और संयुक्त राज्य अमरीका द्वारा शांति-समझौते को अंतिम रूप देना, जापान के अलगाव का अंत | — | — |
| 1868 | मेज़ी पुनर्स्थापना | — | — |
| 1872 | अनिवार्य शिक्षा व्यवस्था; तोक्यो और योकोहामा के बीच पहली रेलवे लाइन | — | — |
| 1889 | मेज़ी संविधान अमल में आया | — | — |
| 1894–95 | चीन और जापान के बीच युद्ध | — | — |
| 1904–05 | जापान और रूस के बीच युद्ध | — | — |
| 1910 | कोरिया का समामेलन, 1945 तक उपनिवेश | 1912 | सन यात-सेन द्वारा कुओमीनतांग की स्थापना |
| 1914–18 | पहला विश्वयुद्ध | 1919 | चार मई का आंदोलन |
| 1925 | सभी पुरुषों को मताधिकार | 1921 | चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना |
| 1931 | चीन पर जापान का हमला | 1926–49 | चीन में गृहयुद्ध |
| 1941–45 | प्रशांत युद्ध | 1934 | लॉन्ग मार्च |
| 1945 | हिरोशिमा और नागासाकी पर अणुबम विस्फोट | 1945 | — |
| 1946–52 | अमरीका के नेतृत्व में जापान पर कब्ज़ा, जापान का लोकतंत्रीकरण और असैन्यीकरण करने के लिए सुधार | 1949 | चीन का जनवादी गणतंत्र; चियांग काई-शेक ने ताइवान में चीनी गणतंत्र की स्थापना की |
| 1956 | जापान संयुक्त राष्ट्र का सदस्य बना | 1962 | सीमा-विवाद को लेकर भारत पर चीन का आक्रमण |
| 1964 | एशिया में पहली बार तोक्यो में ओलंपिक खेल | 1966 | सांस्कृतिक क्रांति |
| — | — | 1976 | माओ त्सेतुंग और चाउ एनलाई का निधन |
| — | — | 1997 | ब्रिटेन द्वारा चीन को हांगकांग की वापसी |
इस समय-रेखा में दो प्रविष्टियाँ ऐसी हैं जिन पर भारतीय कक्षा में रुकना चाहिए: (क) 1962 — “सीमा-विवाद को लेकर भारत पर चीन का आक्रमण” — यह अध्याय के मूल पाठ में कहीं नहीं है, केवल समय-रेखा में है। विद्यार्थी ज़रूर पूछेंगे। संक्षेप में बताएँ और कक्षा XII के लिए छोड़ दें। संवेदनशील विषय है — तथ्य बताएँ, भावना नहीं। (ख) 1997 — हांगकांग की वापसी — यह अफ़ीम युद्धों का अंतिम अध्याय है। हांगकांग 1842 की नानकिंग संधि से ब्रिटेन को मिला था। यानी जो सिलसिला 1839 में शुरू हुआ, वह 1997 में जाकर बंद हुआ — 158 साल बाद। समय-रेखा के पहले और आख़िरी बिंदु को जोड़कर दिखाना इस अध्याय का सबसे अच्छा समापन-दृश्य है।
16. चीनी साम्यवादी दल का उदय (पृ. 171–172)
16.1 संकट की पृष्ठभूमि
- 1937 में जब जापानियों ने चीन पर हमला किया तो कुओमीनतांग पीछे हट गया
- इस लंबे और थकाने वाले युद्ध ने चीन को कमज़ोर कर दिया
- 1945 और 1949 के दरमियान कीमतें 30 प्रतिशत प्रति महीने की रफ़्तार से बढ़ीं। इससे आम आदमी की ज़िंदगी तबाह हो गई
ग्रामीण चीन में दो संकट थे:
| संकट | विवरण |
|---|---|
| एक — पर्यावरण संबंधी | जिसमें बंजर ज़मीन, वनों का नाश और बाढ़ शामिल थे |
| दूसरा — सामाजिक-आर्थिक | जो विनाशकारी ज़मीन-प्रथा, ऋण, आदिम प्रौद्योगिकी और निम्न स्तरीय संचार के कारण था |
16.2 पार्टी की स्थापना और कोमिंटर्न
- चीन की साम्यवादी पार्टी की स्थापना 1921 में, रूसी क्रांति के कुछ समय बाद हुई थी
- रूसी सफलता ने पूरी दुनिया पर ज़बरदस्त प्रभाव डाला
- लेनिन और ट्रॉट्स्की जैसे नेताओं ने मार्च 1918 में कोमिंटर्न या तृतीय अंतर्राष्ट्रीय (Third International) का गठन किया जिससे विश्व स्तरीय सरकार बनाई जाए जो शोषण को खत्म कर सके
- कोमिंटर्न और सोवियत संघ ने दुनिया भर में साम्यवादी पार्टियों का समर्थन किया
- उनकी परंपरागत मार्क्सवादी समझ थी कि क्रांति शहरी इलाकों में मज़दूर वर्गों के ज़रिये आयेगी
- शुरू में विभिन्न देशों के लोग इससे बहुत आकर्षित हुए लेकिन जल्द ही यह सोवियत यूनियन के स्वार्थों का हथियार बन गया और 1943 में इसे खत्म कर दिया गया
16.3 माओ का अलग रास्ता
- माओ त्सेतुंग (1893–1976) ने, जो सी.सी.पी. के प्रमुख नेता के रूप में उभरे, क्रांति के कार्यक्रम को किसानों पर आधारित करते हुए एक अलग रास्ता चुना
- उनकी सफलता से चीनी साम्यवादी पार्टी एक शक्तिशाली राजनीतिक ताकत बनी जिसने अंततः कुओमीनतांग पर जीत हासिल की
जियांग्सी का प्रयोग (1928–1934):
- यहाँ पहाड़ों में उन्होंने कुओमीनतांग के हमलों से सुरक्षित शिविर लगाए
- मज़बूत किसान परिषद (सोवियत) का गठन, ज़मीन पर कब्ज़ा और पुनर्वितरण के साथ एकीकरण हुआ
- दूसरे नेताओं से हटकर, माओ ने आज़ाद सरकार और सेना पर ज़ोर दिया
- वे महिलाओं की समस्याओं से अवगत थे और उन्होंने ग्रामीण महिला संघों को उभरने में प्रोत्साहन दिया
- उन्होंने शादी के नए कानून बनाए जिसमें आयोजित शादियों और शादी के समझौते खरीदने और बेचने पर रोक लगाई और तलाक को आसान बनाया
16.4 जुनवू सर्वेक्षण, 1930 (पृ. 171 का बॉक्स)
- 1930 में जुनवू (Xunwu) में किए गए एक सर्वेक्षण में माओ त्सेतुंग ने नमक और सोयाबीन जैसी रोज़मर्रा की वस्तुओं, स्थानीय संगठनों की तुलनात्मक मज़बूतियों, छोटे व्यापारियों और दस्तकारों, लोहारों और वेश्याओं, धार्मिक संगठनों की मज़बूतियों — इन सबका परीक्षण किया ताकि शोषण के अलग-अलग स्तरों को समझा जा सके
- उन्होंने ऐसे आँकड़े इकट्ठे किये कि कितने किसानों ने अपने बच्चों को बेचा है और इसके लिए उन्हें कितने पैसे मिले
- लड़के 100–200 यूआन पर बिकते थे लेकिन लड़कियों की बिक्री के कोई उदाहरण नहीं मिले क्योंकि ज़रूरत मज़दूरों की थी लैंगिक शोषण की नहीं
- इस अध्ययन के आधार पर उन्होंने सामाजिक समस्याओं को सुलझाने के तरीक़े पेश किए
यह बॉक्स ‘माओ क्यों जीते’ का दूसरा हिस्सा है — और इसे राजनीतिक बहस से अलग, पद्धति के रूप में पढ़ाइए।
माओ ने सर्वेक्षण किया — नमक की कीमत, लोहारों की संख्या, बच्चों की बिक्री के दाम तक। यह क्रांतिकारी नारे नहीं, ज़मीनी आँकड़े हैं। कुओमीनतांग शहरों में योजनाएँ बना रही थी; माओ गाँव-गाँव जानकारी जुटा रहे थे।
सबक़ (राजनीति से परे): जो समाज को जानता है, वही उसे बदल सकता है। यही बात एक इतिहासकार पर भी लागू होती है — और यही इस पूरी पुस्तक का पद्धतिगत सूत्र है (निष्कर्ष, पृ. 183 — ‘प्राथमिक स्रोत’)।
सावधानी: लड़के-लड़कियों की बिक्री वाला आँकड़ा कक्षा में तथ्य के रूप में रखें, सनसनी के रूप में नहीं। इसका ऐतिहासिक अर्थ यह है कि शोषण का स्वरूप श्रम-आधारित था, और यही उस समाज की भयावह आर्थिक स्थिति का प्रमाण है।
16.5 लाँग मार्च (1934–35)
- कम्युनिस्टों की सोवियत की कुओ मीन तांग द्वारा नाकेबंदी ने पार्टी को दूसरा आधार ढूँढ़ने पर मजबूर किया
- इसके चलते उन्हें लाँग मार्च (1934–35) पर जाना पड़ा, जो कि शांसी तक 6000 मील का मुश्किल सफ़र था
- नये अड्डे येनान में उन्होंने आगे बढ़ाया —
- युद्ध सामंतवाद (Warlordism) को खत्म करने
- भूमि सुधार लागू करने
- विदेशी साम्राज्यवाद से लड़ने का कार्यक्रम
- इससे उन्हें मज़बूत सामाजिक आधार मिला
- युद्ध के मुश्किल सालों में साम्यवादियों और कुओमीनतांग ने मिलकर काम किया लेकिन युद्ध खत्म होने के बाद साम्यवादी सत्ता में आ गए और कुओमीनतांग की हार हो गई
चित्र (पृ. 172): कैमरा चित्र — 1941 में लाँग मार्च पर सैनिकों द्वारा बंजर भूमि को कृषियोग्य बनाते हुए · मानचित्र 2: लाँग मार्च
लाँग मार्च को केवल ‘बचकर भागना’ कहकर मत छोड़िए। NCERT का वाक्य है — “इससे उन्हें मज़बूत सामाजिक आधार मिला।” यानी हार से शुरू हुई यात्रा ने जीत की नींव रखी। 6000 मील की यात्रा में पार्टी ने उन इलाकों को देखा और जाना जहाँ वह पहले कभी नहीं गई थी।
1941 की तस्वीर का कैप्शन भी पढ़ाएँ — सैनिक बंजर भूमि को कृषियोग्य बना रहे हैं। यह सेना और किसान के बीच की दूरी मिटाने का प्रतीक है, और यही माओवादी रणनीति का सार था।
17. नए जनवाद की स्थापना: 1949–65 (पृ. 172–173)
- पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना की सरकार 1949 में कायम हुई
- यह ‘नए लोकतंत्र’ के सिद्धांतों पर आधारित थी
- *‘सर्वहारा की तानाशाही’*, जिसे कायम करने का दावा सोवियत संघ का था, से भिन्न नया लोकतंत्र सभी सामाजिक वर्गों का गठबंधन था
*यह शब्द कार्ल मार्क्स द्वारा प्रयोग किया गया था जिसमें यह बल दिया गया था कि अमीर वर्ग की दमनकारी सरकार को श्रमिक वर्ग की क्रांतिकारी सरकार प्रतिस्थापित कर देगी और यह मौजूदा अर्थ में अधिनायक तंत्र नहीं होगा।*
कार्यक्रम:
- अर्थव्यवस्था के मुख्य क्षेत्र सरकार के नियंत्रण में रखे गए
- निजी कारखानों और भूस्वामित्व को धीरे-धीरे खत्म किया गया
- यह कार्यक्रम 1953 तक चला जब सरकार ने समाजवादी बदलाव का कार्यक्रम शुरू करने की घोषणा की
17.1 लंबी छलाँग (Great Leap Forward), 1958
| कदम | विवरण |
|---|---|
| लक्ष्य | देश का तेज़ी से औद्योगीकरण |
| इस्पात | लोगों को अपने घर के पिछवाड़े में इस्पात की भट्टियाँ लगाने के लिए प्रोत्साहित किया गया |
| पीपुल्स कम्यून्स | ग्रामीण इलाकों में शुरू किये गए — जहाँ लोग इकट्ठे ज़मीन के मालिक थे और मिलजुलकर फसल उगाते थे |
| पैमाना | 1958 तक 26,000 ऐसे समुदाय थे जो कि कृषक आबादी का 98 प्रतिशत था |
17.2 ‘समाजवादी व्यक्ति’ और जन संस्थाएँ
- माओ पार्टी द्वारा निर्धारित लक्ष्यों को पाने के लिए जनसमुदाय को प्रेरित करने में सफल रहे
- उनकी चिंता ‘समाजवादी व्यक्ति’ बनाने की थी जिसकी पाँच चीज़ें प्रिय होंगी: पितृभूमि, जनता, काम, विज्ञान और जन सम्पत्ति
- किसानों, महिलाओं, छात्रों और अन्य गुटों के लिए जन संस्थाएँ बनाई गईं:
| संस्था | सदस्य |
|---|---|
| ऑल चाइना डेमोक्रेटिक वीमेंस फ़ेडरेशन | 760 लाख |
| ऑल चाइना स्टूडेंट्स फ़ेडरेशन | 32 लाख 90 हज़ार |
17.3 भीतरी असहमति
- लेकिन ये लक्ष्य और तरीके पार्टी में सभी लोगों को पसंद नहीं थे
- 1953–54 में कुछ लोग औद्योगिक संगठनों और आर्थिक विकास की तरफ ज़्यादा ध्यान देने के लिए कह रहे थे
- लीऊ शाओछी (Liu Shaochi, 1896–1969) और तंग शीयाओफींग (Deng Xiaoping, 1904–97) ने कम्यून प्रथा को बदलने की कोशिश की क्योंकि यह बहुत कुशलता से काम नहीं कर रही थी
- घरों के पिछवाड़ों में बनाई गई स्टील औद्योगिक लिहाज़ से अनुपयोगी था
‘घर के पिछवाड़े की इस्पात भट्टियाँ’ — इस एक ब्योरे में पूरी नीति की समीक्षा छिपी है। उत्साह असली था, संगठन विशाल था, भागीदारी अभूतपूर्व थी (98% कृषक आबादी) — पर उत्पाद उपयोग के लायक नहीं था।
कक्षा-सूत्र: जनभागीदारी और तकनीकी व्यवहार्यता दो अलग चीज़ें हैं; विकास के लिए दोनों चाहिए। यह वाक्य किसी भी विकास-नीति पर लागू होता है और परीक्षा में विश्लेषणात्मक उत्तर के लिए बहुत उपयोगी है।
यह भी ध्यान दिलाएँ कि तंग शीयाओफींग वही व्यक्ति हैं जो 1978 के सुधारों के नेता बनेंगे। यानी 1953–54 की उनकी आपत्ति और 1978 का उनका कार्यक्रम एक ही सोच के दो पड़ाव हैं — बीच में सांस्कृतिक क्रांति ने उन्हें हटा दिया था।
18. दर्शनों का टकराव: 1965–78 (पृ. 173)
- ‘समाजवादी व्यक्ति’ की रचना के इच्छुक माओवादियों और दक्षता की बजाय विचारधारा पर माओ के बल देने की आलोचना करनेवालों के बीच संघर्ष चला
- माओ द्वारा 1965 में छेड़ी गई महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रांति इसी संघर्ष का नतीजा था, जो उन्होंने अपने आलोचकों का सामना करने के लिए शुरू की
सांस्कृतिक क्रांति के तत्व:
| तत्व | विवरण |
|---|---|
| रेड गार्ड्स | पुरानी संस्कृति, पुराने रिवाज़ों, और पुरानी आदतों के खिलाफ़ अभियान छेड़ने के लिए रेड गार्ड्स — मुख्यतः छात्रों और सेना — का इस्तेमाल किया गया |
| ग्रामीण भेजना | छात्रों और पेशेवर लोगों को जनता से ज्ञान हासिल करने के लिए ग्रामीण इलाकों में भेजा गया |
| विचारधारा बनाम ज्ञान | विचारधारा (साम्यवादी होना) पेशेवर ज्ञान से ज़्यादा महत्त्वपूर्ण थी |
| बहस का अंत | दोषारोपण और नारेबाज़ी ने तर्कसंगत बहस की जगह ले ली |
परिणाम:
- सांस्कृतिक क्रांति से खलबली का दौर शुरू हो गया, पार्टी कमज़ोर हो गई और अर्थव्यवस्था और शिक्षा व्यवस्था में भारी रुकावट आई
- 1960 के उत्तरार्ध से प्रवाह बदलने लगा
- 1975 में एक बार फिर पार्टी ने अधिक सामाजिक अनुशासन और औद्योगिक अर्थव्यवस्था का निर्माण करने पर ज़ोर दिया ताकि चीन शताब्दी के खत्म होने से पहले एक शक्तिशाली देश बन सके
“दोषारोपण और नारेबाज़ी ने तर्कसंगत बहस की जगह ले ली” — यह वाक्य इस अध्याय की सबसे बड़ी चेतावनी है, और यह किसी एक विचारधारा तक सीमित नहीं है।
इसे 1943 की जापानी संगोष्ठी से जोड़िए, जहाँ “असहमति प्रकट करने वालों पर जुल्म ढाये गए और उन्हें जेल भेजा गया”। दोनों देशों में, दो अलग विचारधाराओं के तहत, एक ही चीज़ हुई — बहस की जगह नारे ने ले ली।
यही इस अध्याय का सबसे मूल्यवान नागरिक-शास्त्रीय पाठ है, और इसे विचारधारा-निरपेक्ष ढंग से पढ़ाना चाहिए।
19. 1978 से शुरू होने वाले सुधार (पृ. 173–174)
- सांस्कृतिक क्रांति के बाद राजनीतिक दाव-पेचों की प्रक्रिया शुरू हुई
- तंग शीयाओफींग ने पार्टी पर नियंत्रण मज़बूत बनाए रखा और साथ ही देश में समाजवादी बाज़ार अर्थव्यवस्था की शुरुआत की
- 1978 में पार्टी ने आधुनिकीकरण के अपने चार सूत्री लक्ष्य की घोषणा की। यह था — विज्ञान, उद्योग, कृषि और रक्षा का विकास
- पार्टी से सवाल-जवाब न करने की हद तक बहस की इजाज़त थी
19.1 ‘पाँचवीं आधुनिकता’
- इस नए और आज़ाद वातावरण में, जैसे कि 60 साल पहले 4 मई के आंदोलन के समय था, नये विचारों का रोमांचकारी भंडार फूट पड़ा
- 5 दिसंबर 1978 को दीवार पर लगे एक पोस्टर ने ‘पाँचवीं आधुनिकता’ का दावा किया कि लोकतंत्र के बिना अन्य आधुनिकताएँ कुछ भी नहीं बन पाएँगी
- उसने गरीबी न हटाने और लैंगिक शोषण खत्म न कर पाने के लिए सी.सी.पी. की आलोचना की; इसके लिए उसने पार्टी के अंदर से ही ऐसे दुर्व्यवहारों के उदाहरण पेश किए
‘पाँचवीं आधुनिकता’ का तर्क बोर्ड पर लिखवाएँ — यह अध्याय का सबसे तीखा राजनीतिक वाक्य है: पार्टी ने चार आधुनिकताएँ गिनाईं — विज्ञान, उद्योग, कृषि, रक्षा। पोस्टर ने पाँचवीं जोड़ी — लोकतंत्र — और कहा कि उसके बिना बाकी चारों अधूरी हैं।
यह पूरे खंड चार का प्रश्न है। याद कीजिए खंड-परिचय (अध्याय 6, पृ. 124): आधुनिकीकरण के दो स्रोत थे — औद्योगिक क्रांति और राजनीतिक क्रांतियाँ। पोस्टर यही कह रहा था — आपने पहला ले लिया, दूसरा कहाँ है?
कक्षा-प्रश्न: क्या विकास और लोकतंत्र में से एक को चुनना पड़ता है? — इस प्रश्न के तीन उत्तर इसी अध्याय में हैं: चीन (विकास पहले), कोरिया (पहले विकास, फिर लोकतंत्र), जापान (दोनों साथ, पर सेना संविधान से बाहर)। तीनों की तुलना कराइए — यह सर्वोत्तम निबंध-प्रश्न है।
19.2 1989 और उसके बाद
- इन मांगों को दबाया गया लेकिन 1989 में, 4 मई के आंदोलन की 70वीं सालगिरह पर बहुत से बुद्धिजीवियों ने ज़्यादा खुलेपन के और कड़े सिद्धांतों (शू-शाओझी) को खत्म करने की माँग की
- बीजिंग के तियानममेन चौक पर छात्रों के प्रदर्शन को क्रूरतापूर्वक दबाया गया। दुनिया भर में इसकी कड़ी आलोचना हुई
सुधार के बाद की बहस:
- पार्टी द्वारा समर्थित प्रधान मत मज़बूत राजनीतिक नियंत्रण, आर्थिक खुलेपन और विश्व बाज़ार से जुड़ाव पर आधारित है
- आलोचकों का कहना है कि सामाजिक गुटों, क्षेत्रों, पुरुषों और महिलाओं के बीच बढ़ती हुई असमानताओं से सामाजिक तनाव बढ़ रहा है और बाज़ार पर जो भारी महत्व दिया जा रहा है उस पर सवाल खड़े कर रहा है
- अंत में, पहले के पारंपरिक विचार पुनर्जीवित हो रहे हैं — जैसे कि कंफ़्यूशियसवाद और यह तर्क कि पश्चिम की नकल करने के बजाए चीन अपनी परंपरा पर चलते हुए एक आधुनिक समाज बना सकता है
चित्र (पृ. 174): 1978 के सुधारों के बाद चीनी लोग स्वच्छंद रूप से उपभोक्ता सामग्री खरीदने में समर्थ होने लगे।
अंतिम बिंदु में एक पूरा चक्र बंद होता है — इसे कक्षा में ज़रूर दिखाएँ। 1919 में 4 मई का आंदोलन परंपरा पर हमला करता है और कन्फ़्यूशियसवाद को पिछड़ेपन का कारण बताता है। 1965–78 की सांस्कृतिक क्रांति “पुरानी संस्कृति, पुराने रिवाज़ों और पुरानी आदतों” के विरुद्ध अभियान चलाती है। और आज “पहले के पारंपरिक विचार पुनर्जीवित हो रहे हैं — जैसे कि कंफ़्यूशियसवाद।”
सौ साल में परंपरा को ठुकराया गया, मिटाने की कोशिश हुई, और फिर वापस बुलाया गया। यह इस अध्याय का सबसे गहरा ऐतिहासिक विडंबना-चक्र है और निबंधात्मक प्रश्नों में सोने जैसा है।
20. ताइवान का किस्सा (पृ. 174–175)
20.1 पृष्ठभूमि
- चीनी साम्यवादी दल द्वारा पराजित होने के बाद चियांग काई-शेक 30 करोड़ से अधिक अमरीकी डॉलर और बेशकीमती कलाकृतियाँ लेकर 1949 में ताइवान भाग निकले
- वहाँ उन्होंने चीनी गणतंत्र की स्थापना की
- 1894–95 में जापान के साथ हुई लड़ाई में यह जगह चीन को जापान के हाथ में सौंपनी पड़ी थी और तब से वह जापानी उपनिवेश बनी हुई थी
- कायरो घोषणापत्र (1943) और पोट्सडैम उद्घोषणा (1949) के द्वारा चीन को संप्रभुता वापस मिली
20.2 दमन और विकास साथ-साथ
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| 1947 का दमन | फरवरी 1947 में हुए ज़बर्दस्त प्रदर्शनों के बाद कुओमीनतांग ने नेताओं की एक पूरी पीढ़ी की निर्ममतापूर्वक हत्या करवा दी |
| दमनकारी सरकार | चियांग काई-शेक के नेतृत्व में कुओमीनतांग ने एक दमनकारी सरकार की स्थापना की, बोलने की और राजनीतिक विरोध करने की आज़ादी छीन ली और सत्ता की जगहों से स्थानीय आबादी को पूरी तरह बाहर कर दिया |
| फिर भी | उन्होंने भूमि सुधार लागू किया, जिसके चलते खेती की उत्पादकता बढ़ी |
| आर्थिक स्थान | उन्होंने अर्थव्यवस्था का भी आधुनिकीकरण किया, जिसके चलते 1973 में कुल राष्ट्रीय उत्पाद के मामले में ताइवान पूरे एशिया में जापान के बाद दूसरे स्थान पर रहा |
| समानता | अर्थव्यवस्था, जो मुख्यतः व्यापार पर आधारित थी, लगातार वृद्धि करती गई। लेकिन अहम बात यह है कि अमीर और गरीब के बीच का भी अंतराल लगातार घटता गया है |
“अमीर और गरीब के बीच का अंतराल लगातार घटता गया है” — यह वाक्य विशेष ध्यान माँगता है।
तुलना कीजिए: चीन में सुधारों के बाद “बढ़ती हुई असमानताओं से सामाजिक तनाव बढ़ रहा है” (पृ. 174); ताइवान में असमानता घटी। दोनों चीनी समाज हैं, दोनों तेज़ी से बढ़े — पर वितरण अलग रहा। और इसका कारण NCERT ने ही बताया है: भूमि सुधार (जो कुओमीनतांग मुख्य भूमि पर कभी लागू नहीं कर पाई थी, पृ. 169)।
यानी जो सुधार चीन में न कर पाने के कारण कुओमीनतांग हारी, वही सुधार उसने ताइवान में जाकर किया — और सफल हुई। यह अध्याय की सबसे नाटकीय विडंबना है और परीक्षा में उत्कृष्ट विश्लेषण-बिंदु।
20.3 लोकतंत्र में रूपांतरण
- ताइवान का एक लोकतंत्र में रूपांतरण और भी नाटकीय रहा है
- यह 1975 में चियांग की मौत के बाद धीरे-धीरे शुरू हुआ और जब फ़ौजी कानून हटा लिया गया तथा विरोधी दलों को कानूनी इजाज़त मिल गई, तब इस प्रक्रिया ने गति पकड़ी
- (पाठ्यपुस्तक में यहाँ ‘1887’ छपा है — यह मुद्रण-त्रुटि है; सही वर्ष 1987 है। विवरण 09 फ़ाइल में।)
- पहले स्वतंत्र मतदान ने स्थानीय ताइवानियों को सत्ता में लाने की प्रक्रिया शुरू कर दी
20.4 अंतरराष्ट्रीय स्थिति
- राजनयिक स्तर पर अधिकांश देशों के व्यापार मिशन केवल ताइवान में ही हैं
- उनके द्वारा ताइवान में पूर्ण राजनयिक संबंध और दूतावास रखना संभव नहीं, क्योंकि ताइवान को चीन का ही एक हिस्सा माना जाता है
- मुख्य भूमि के साथ पुनःएकीकरण का प्रश्न अभी भी विवादास्पद मुद्दा होकर रहा है
- यद्यपि ‘खाड़ी-पार’ के संबंध (चीन और ताइवान के मध्य) सुधर रहे हैं, ताइवानी व्यापार और निवेश मुख्य भूमि में बड़े पैमाने पर हो रहा है और आवागमन कहीं अधिक सहज हो गया है
- संभवतः चीन ताइवान को एक अर्धस्वायत्त क्षेत्र के रूप में स्वीकार कर लेने में सहमत हो जाएगा अगर ताइवान पूर्ण स्वतंत्रता के लिए कोई कदम उठाने से परहेज़ करता है
यह अंतिम वाक्य NCERT का ‘अनुमान’ है, तथ्य नहीं — और विद्यार्थियों को यह अंतर बताना चाहिए। पाठ्यपुस्तकें भी वर्तमान के बारे में संभावना व्यक्त करती हैं, और वह समय के साथ बदल सकती है। यह इतिहास और समसामयिक राजनीति के बीच की सीमा दिखाने का अच्छा अवसर है।
21. कोरिया की कहानी (पृ. 175–179)
यह हिस्सा तर्कसंगत बनाई गई पुस्तक में जोड़ा गया नया खंड है और सबसे विस्तृत है। इसमें तीन सैन्य तख्तापलट, चार जनांदोलन और एक आर्थिक चमत्कार एक साथ हैं। इसे तीन चरणों में पढ़ाना सबसे आसान है — उपनिवेश → विभाजन और सैन्य शासन → लोकतंत्र।
21.1 चरण एक — आधुनिकीकरण की शुरुआत और उपनिवेश (पृ. 175)
- उन्नीसवीं सदी के अंत में, कोरिया के जोसोन वंश (1392–1910) ने आंतरिक और सामाजिक संघर्ष का सामना किया और साथ ही उसे चीन, जापान और पश्चिमी देशों का विदेशी दबाव भी सहना पड़ा
- इन सबके बीच कोरिया ने अपनी सरकारी संरचनाओं, राजनयिक संबंधों, बुनियादी ढाँचे एवं समाज के आधुनिकीकरण के लिए सुधार नीतियाँ लागू कीं
- दशकों के राजनीतिक हस्तक्षेप के बाद, साम्राज्यवादी जापान ने 1910 में अपनी कॉलोनी के रूप में कोरिया पर जबरन कब्ज़ा कर लिया, जिससे 500 वर्ष से अधिक समय से चले आ रहे जोसोन राजवंश का अंत हो गया
- किंतु कोरियाई लोग जापानियों द्वारा किए जा रहे कोरियाई संस्कृति एवं नैतिक मूल्यों के दमन से काफ़ी नाराज़ थे
प्रतिरोध:
- आज़ादी के इच्छुक कोरियाई लोगों ने जापानी औपनिवेशिक शासन के खिलाफ़ प्रदर्शन किया
- उन्होंने एक अस्थायी सरकार की स्थापना की
- और कैरो, याल्टा और पॉट्सडैम सम्मेलनों जैसी अंतर्राष्ट्रीय बैठकों में विदेशी नेताओं से अपील करने के लिए प्रतिनिधि मंडल भेजे
मुक्ति और विभाजन:
- जापानी औपनिवेशिक शासन 35 साल के बाद अगस्त 1945 में द्वितीय विश्व युद्ध में जापान की हार के साथ समाप्त हुआ
- हालाँकि यह कोरिया के भीतरी और बाहरी स्वतंत्रता कार्यकर्ताओं का लगातार प्रयास था, जो जापान की हार के बाद कोरिया की स्वतंत्रता सुनिश्चित कर पाया
- मुक्ति के बाद कोरियाई उपद्वीप को अस्थायी रूप से 38वीं समानांतर रेखा से दो हिस्सों में विभाजित कर दिया गया
- जिसमें उत्तरी क्षेत्र में सोवियत संघ और दक्षिण क्षेत्र में यू.एन. द्वारा संचालन किया गया
- (यहाँ एक सरलीकरण है — दक्षिण का प्रशासन वास्तव में संयुक्त राज्य अमरीका ने चलाया था। विवरण 09 फ़ाइल में।)
- किंतु दोनों ही क्षेत्र जापानी सेना को भंग करने के लिए परिश्रम करते रहे
- हालाँकि 1948 में उत्तर और दक्षिण में अलग-अलग सरकारें स्थापित होने के साथ, यह विभाजन स्थायी रूप से स्थापित हो गया
भारतीय विद्यार्थी के लिए यह हिस्सा बहुत निकट है — और तुलना ज़रूर कराएँ, पर सावधानी से। 1945–48 में दो एशियाई देशों का विभाजन हुआ — भारत और कोरिया। दोनों में विभाजन बाहरी शक्तियों के निर्णय से जुड़ा था; दोनों में वह ‘अस्थायी’ कहा गया पर स्थायी हो गया; दोनों के बाद युद्ध हुए। अंतर: भारत का विभाजन धार्मिक-सामुदायिक आधार पर हुआ; कोरिया का शीत युद्ध की महाशक्तियों के आधार पर — वहाँ भाषा, जाति, धर्म सब एक ही थे। यानी विभाजन के कारण अलग-अलग हो सकते हैं, पीड़ा एक जैसी होती है।
21.2 चरण दो — कोरियाई युद्ध और सैन्य शासन (पृ. 175–177)
कोरियाई युद्ध:
- जून 1950 में कोरियाई युद्ध शुरू हुआ
- दक्षिण कोरिया में अमेरिकी अगुवाई वाली संयुक्त राष्ट्र सेना और उत्तर कोरिया में कम्युनिस्ट चीन सेना के समर्थन से शीत युद्ध काल का एक छद्म युद्ध शुरू हुआ
- जुलाई 1953 में तीन साल बाद, यह युद्ध युद्धविराम समझौते से समाप्त हुआ। कोरिया हमेशा के लिए विभाजित हो गया था
युद्ध के परिणाम:
- न केवल बड़े पैमाने पर जीवन और संपत्ति का नुकसान हुआ
- बल्कि मुक्त बाज़ार आर्थिक विकास और लोकतंत्रीकरण भी धीमी गति से हुआ
- युद्ध के दौरान जारी की गई मुद्रा एवं राष्ट्रीय खर्च के कारण मुद्रास्फीति से कीमतें अचानक बढ़ गईं
- औपनिवेशिक काल के दौरान निर्मित औद्योगिक सुविधाओं को पूरी तरह से नष्ट कर दिया गया
- नतीजन, दक्षिण कोरिया को अमेरिका की आर्थिक सहायता लेने के लिए मजबूर होना पड़ा
सिन्गमैन री और ‘अप्रैल क्रांति’:
- दक्षिण कोरिया के पहले राष्ट्रपति सिन्गमैन री (Syngman Rhee) 1948 में लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के माध्यम से चुने गए थे
- लेकिन उन्होंने अवैध संवैधानिक संशोधन के माध्यम से दो बार अपना प्रशासन काल बढ़ाया
- अप्रैल 1960 में नागरिकों ने इस तरह की धाँधली से होने वाले चुनावों के खिलाफ विरोध किया और री को इस्तीफ़ा देने के लिए मजबूर होना पड़ा, जिसको कोरिया में ‘अप्रैल क्रांति’ के नाम से भी जाना जाता है
अस्थिरता और तख्तापलट:
- री के इस्तीफ़े के बाद स्थापित हुई लोकतांत्रिक पार्टी की सत्ता, आंतरिक विभाजन और संघर्ष के चलते नागरिकों की माँगों का उचित उत्तर नहीं दे पाई
- बल्कि सुधारवादी राजनीतिक शक्तियाँ उभरीं और छात्र आंदोलनों ने एकीकरण आंदोलनों का रूप ले लिया
- सेना के अधिकारियों द्वारा इसको समर्थन नहीं मिला
- मई 1961 में जनरल ‘पार्क चुंग-ही’ और अन्य सैन्य अधिकारियों के सैन्य तख्तापलट द्वारा लोकतांत्रिक पार्टी की सरकार को उखाड़ फेंका गया
21.3 पार्क चुंग-ही — तीव्र औद्योगिकीकरण (पृ. 176–177)
- अक्तूबर 1963 के चुनाव में सैन्य नेता ‘पार्क चुंग-ही’ राष्ट्रपति बने
- पार्क-प्रशासन ने देश में आर्थिक विकास के लिए एक राज्य-आधारित, निर्यात-उन्मुख नीति अपनाई
- सरकार की पाँच वर्षीय आर्थिक योजनाओं ने बड़े कॉरपोरेट फर्मों का समर्थन किया, रोज़गार के विस्तार पर भारी ज़ोर दिया और कोरिया की प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ावा दिया
नीति का क्रम (यह तालिका परीक्षा के लिए महत्त्वपूर्ण है):
| चरण | नीति |
|---|---|
| 1960 के दशक से | राज्य नीति आयात प्रतिस्थापन औद्योगिकी (आई.एस.आई.) से निर्यात पर केंद्रित हो गई |
| निर्यात-उन्मुख चरण | सरकार ने श्रम घनिष्ठ हलके औद्योगिक उत्पादों, जैसे वस्त्रों पर ध्यान केंद्रित किया, जिसमें कोरिया का तुलनात्मक लाभ था |
| 1960 और 1970 के दशक | पुनः लघु उद्योगों से उच्च मूल्यवर्धित भारी और रासायनिक उद्योगों पर ध्यान केंद्रित किया गया |
| चुने गए उद्योग | इस्पात, अलौह धातु, मशीनरी, जहाज़ निर्माण, इलैक्ट्रॉनिक्स और रासायनिक उत्पादन |
नया गाँव (सैमौल) आंदोलन, 1970:
- 1970 में ग्रामीण जनसंख्या को प्रोत्साहन और कृषि क्षेत्र के आधुनिकीकरण के लिए नया गाँव (सैमौल) आंदोलन की शुरुआत हुई
- इस अभियान का उद्देश्य लोगों को निष्क्रिय और निराशावान जीवन से सक्रिय और आशावान बनाना था
- इस अभियान द्वारा ग्रामीण लोगों को अपने गाँवों के विकास और समुदाय की जीवन शैली को सुधारने के लिए सशक्त किया गया
- आगे जाकर इस अभियान का औद्योगिक संयंत्रों और शहरी क्षेत्रों के आस-पास के इलाकों के विकास के लिए विस्तार किया गया
- आज कोरिया अन्य विकासशील देशों के साथ जो अपने विकास प्रयासों में सैमौल आंदोलन के सिद्धांतों को अपनाना चाहते हैं, इस आंदोलन से प्राप्त ज्ञान और अनुभव बाँट रहा है
सफलता के कारण (NCERT का अपना विश्लेषण — यह सीधे परीक्षा में आता है):
| कारण | विवरण |
|---|---|
| नेतृत्व और श्रम | मज़बूत नेताओं, प्रशिक्षित अफ़सरों, आक्रामक उद्योगपतियों और सक्षम श्रम बल का संयोजन |
| महत्वाकांक्षा | महत्वाकांक्षी उद्यमी, सरकारी प्रोत्साहनों से निर्यात को बढ़ाने और नए उद्योगों के विकास में सक्षम रहे |
| शिक्षा | उच्च स्तर की शिक्षा ने भी योगदान दिया — औद्योगिकीकरण की शुरुआत से ही, लगभग सभी कोरियाई श्रमिक दल पहले से ही साक्षर थे और प्रगति के नए कौशल प्राप्त करने के लिए तैयार थे |
| खुली नीति | कोरिया ने अपनी खुली आर्थिक नीति के द्वारा अन्य देशों के अधिक उन्नत संस्थानों और तकनीकों को अपने देश में लाना शुरू कर दिया था |
| पूँजी | विदेशी निवेश और कोरिया की उच्च घरेलू बचत दर ने औद्योगिक क्षेत्रों को विकसित करने में मदद की |
| प्रेषण | विदेशों में दक्षिण कोरियाई श्रमिकों के प्रेषण ने भी समग्र आर्थिक विकास में योगदान दिया |
‘साक्षरता पहले से थी’ वाला बिंदु सबसे महत्त्वपूर्ण है — और यह जापान वाले सूत्र को दोहराता है। जापान में ‘नूडल की कटोरी की कीमत पर किताब’ (17वीं सदी) → 1870 के दशक की अनिवार्य शिक्षा → आर्थिक चमत्कार। कोरिया में “लगभग सभी कोरियाई श्रमिक दल पहले से ही साक्षर थे” → 1960 के दशक का चमत्कार।
दोनों जगह आर्थिक चमत्कार से पहले शैक्षिक आधार तैयार था। यह इस पूरे अध्याय का सबसे व्यावहारिक निष्कर्ष है और भारत के संदर्भ में सबसे प्रासंगिक भी। कक्षा में यह प्रश्न रखें: क्या शिक्षा विकास का परिणाम है या पूर्व-शर्त?
21.4 यूसिन संविधान — लोकतंत्र का ‘निलंबन’
- पार्क प्रशासन की दीर्घकालिक शक्ति का आधार कोरिया का आर्थिक विकास था
- पार्क के द्वारा किए गए संविधान संशोधन से वह तीसरे कार्यकाल के लिए चुनाव में खड़े हुए और 1971 में उन्हें पुनः चुना गया
- अक्तूबर 1972 में, पार्क ने यूसिन संविधान घोषित करके कार्यान्वित किया, जिसने स्थायी अध्यक्षता को संभव बनाया
- यूसिन संविधान के तहत, राष्ट्रपति को कानून के क्षेत्राधिकार और प्रशासन पर पूर्ण अधिकार था और किसी भी कानून को “आपातकालीन नियम” के रूप में निरस्त करने का भी एक संवैधानिक अधिकार था
- राष्ट्रपति को पूर्ण अधिकार प्रणाली के साथ, देश के आर्थिक विकास में प्रगति के लिए लोकतंत्र एक तरह से अस्थायी रूप में निलंबित हो गया
अंत:
- 1979 में दूसरे तेल संकट से देश की आर्थिक नीतियों — जोकि भारी रासायनिक उद्योग में मुख्य निवेश रखती थीं — में काफ़ी बाधाएँ आईं
- छात्रों, विद्वानों और विपक्ष ने लगातार यूसिन संविधान के खिलाफ़ प्रदर्शन किया, क्योंकि पार्क प्रशासन ने आपातकालीन उपायों का आह्वान और राजनैतिक अस्थिरता का दमन कर दिया था
- इस आर्थिक संकट और राजनीतिक अस्थिरता के बीच पार्क का प्रशासन अक्तूबर 1979 में ‘पार्क चुंग-ही’ की हत्या के साथ खत्म हो गया
“लोकतंत्र एक तरह से अस्थायी रूप में निलंबित हो गया” — इस वाक्य पर रुकिए। यह अध्याय का सबसे सीधा वाक्य है जो विकास और लोकतंत्र के सौदे को नाम देता है। और यह भी ध्यान दिलाइए कि ‘अस्थायी’ निलंबन 1972 से 1987 तक चला — पंद्रह साल।
कक्षा-प्रश्न: क्या पार्क के बिना कोरिया का आर्थिक चमत्कार होता? इसका कोई निश्चित उत्तर नहीं है — पर NCERT का अपना निष्कर्ष (पृ. 179) साफ़ है: “कोरियाई लोकतंत्र आर्थिक विकास का कर्ज़दार है, लेकिन यह देश के गणतंत्रवाद को प्रोत्साहित करने वाले कोरियाई नागरिकों की राजनीतिक जागरूकता ही है, जिसने आज इस देश को आगे बढ़ाने में प्रमुख भूमिका निभाई है।” यानी दोनों को श्रेय, पर अंतिम श्रेय नागरिकों को।
21.5 चरण तीन — लोकतंत्रीकरण (पृ. 177–178)
चुन डू-ह्वान और ग्वांगजू:
- लोकतंत्रीकरण की इच्छा ‘पार्क चुंग-ही’ की मृत्यु के साथ बढ़ी, लेकिन दिसंबर 1979 में फिर एक बार, एक सैन्य नेता ‘चुन डू-ह्वान’ की अगुवाई में सैन्य तख्तापलट का मंच तैयार हुआ
- मई 1980 में, चुन के सैन्य गुट के विरुद्ध लोकतंत्र की माँग करने वाले छात्रों और नागरिकों द्वारा राष्ट्र के प्रमुख शहरों में विभिन्न विरोध प्रदर्शन हुए
- सैन्य दल ने पूरे देश में मार्शल कानून को लागू करके लोकतंत्र आंदोलन को दबा दिया
- किंतु ग्वांगजू शहर में, विशेष रूप से, छात्र और नागरिक लगातार मार्शल कानून को समाप्त करने की माँग करते रहे
- हालाँकि, चुन के सैन्य दल ने लोकतंत्रीकरण के लिए विरोध प्रदर्शन कर रहे लोगों की आवाज़ को दबा दिया
- उसी वर्ष के अंत में, चुन यूसुइन संविधान के तहत एक अप्रत्यक्ष चुनाव के माध्यम से राष्ट्रपति बने
आर्थिक सफलता और राजनीतिक जागरूकता:
- चुन प्रशासन ने अपनी सरकार को स्थिर बनाने के लिए, लोकतांत्रिक प्रभाव का मज़बूती से दमन किया
- हालाँकि, चुन प्रशासन ने अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक दृष्टिकोण से, कोरिया के आर्थिक विकास को 1980 के 1.7 प्रतिशत से बढ़ाकर 1983 तक 13.2 प्रतिशत कर दिया और मुद्रास्फीति को भी कम कर दिया
- आर्थिक विकास ने शहरीकरण, शिक्षा के स्तर में सुधार और मीडिया की प्रगति को जन्म दिया
- इसके फलस्वरूप नागरिकों में अपने राजनीतिक अधिकारों की आत्म-जागरूकता बढ़ी, जिससे राष्ट्रपति के प्रत्यक्ष चुनाव के लिए संवैधानिक संशोधन की माँग की गई
1987 की जीत:
- मई 1987 में, एक विश्वविद्यालय के छात्र की अत्याचारों से हुई मौत की घटना के बाद नागरिकों ने लोकतंत्रीकरण के लिए बड़े पैमाने पर प्रदर्शन किए, जिसको चुन प्रशासन ने दबाने की कोशिश की
- इसके बाद चुन सरकार के खिलाफ लोकतंत्रीय आंदोलन में न केवल छात्रों, बल्कि मध्यवर्ग के नागरिकों ने भी भाग लिया
- इन प्रयासों के चलते, चुन प्रशासन को संविधान में संशोधन करने के लिए मजबूर होना पड़ा और नागरिकों को सीधे चुनाव का अधिकार मिला
- कोरियाई लोकतंत्र का एक नया अध्याय इस प्रकार से शुरू हुआ
यह पैराग्राफ़ इस अध्याय का सबसे महत्त्वपूर्ण कारण-चक्र है — इसे बोर्ड पर आरेख की तरह लिखवाएँ:
आर्थिक विकास → शहरीकरण + शिक्षा + मीडिया → नागरिकों में राजनीतिक अधिकारों की आत्म-जागरूकता → प्रत्यक्ष चुनाव की माँग → संविधान संशोधन (1987)
यही NCERT अभ्यास प्रश्न 8 का उत्तर है — “क्या साउथ कोरिया की आर्थिक वृद्धि ने इसके लोकतंत्रीकरण में योगदान दिया?” उत्तर: हाँ, पर सीधे नहीं। आर्थिक वृद्धि ने लोकतंत्र नहीं दिया — उसने मध्यवर्ग, शिक्षा और मीडिया दिए, और उन्होंने लोकतंत्र माँगा। और यह ध्यान रहे कि 1987 में जीत छात्रों को तब मिली जब मध्यवर्ग उनके साथ आया।
21.6 आई.एम.एफ. संकट और परिपक्व लोकतंत्र (पृ. 178–179)
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| दिसंबर 1987 | नए संविधान के अनुसार 1971 के बाद से पहला प्रत्यक्ष चुनाव; विपक्षी पार्टियों की एकजुटता में विफलता के कारण चुन के साथी सैन्य नेता ‘रोह ताए-वू’ का चुनाव हुआ — हालाँकि, कोरिया में लोकतंत्र जारी रहा |
| 1990 | लंबे समय से विपक्षी नेता रह चुके ‘किम यंग-सैम’ ने एक बड़ी सत्तारूढ़ पार्टी बनाने के लिए रोह की पार्टी से समझौता किया |
| दिसंबर 1992 | दशकों से चल रहे सैन्य शासन के बाद, एक नागरिक नेता, किम को राष्ट्रपति पद के लिए चुना गया |
| 1990 की शुरुआत तक | नए प्रशासन की निर्यात नीति के तहत सैमसंग, हुंडई और एलजी सहित कुछ कंपनियाँ वैश्विक प्रमुखता के स्तर तक पहुँच चुकी थीं |
| — | सरकारी समर्थन के साथ, कोरियाई कंपनियों ने पूंजी प्रधान व्यवसाय और रासायनिक उद्योगों के साथ-साथ इलेक्ट्रॉनिक उद्योगों में भी निवेश करना शुरू किया; सरकार ने औद्योगिक और सामाजिक बुनियादी ढाँचे के निर्माण पर ध्यान देना जारी रखा |
| 1996 | नव-उदारवादी दबाव में किम प्रशासन ने आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (ओ.ई.सी.डी.) में शामिल होने का निर्णय लिया |
| 1997 | व्यापार घाटे में बढ़ोतरी, वित्तीय संस्थानों द्वारा खराब प्रबंधन, संगठनों द्वारा बेईमान व्यापारिक संचालन के कारण कोरिया को विदेशी मुद्रा संकट का सामना करना पड़ा |
| — | इस संकट को अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आई.एम.एफ.) द्वारा आपात वित्तीय सहायता के ज़रिए संभालने की कोशिश की गई |
| जन-भागीदारी | नागरिकों ने गोल्ड कलेक्शन मूवमेंट के माध्यम से विदेशी ऋण भुगतान के लिए सक्रिय रूप से योगदान दिया |
सत्ता के शांतिपूर्ण हस्तांतरण:
| तिथि | घटना |
|---|---|
| दिसंबर 1997 | एक लंबे समय के बाद कोरिया में पहली बार शांतिपूर्ण हस्तांतरण के द्वारा विपक्षी पार्टी के नेता किम डे-जुंग सत्ता में आए |
| 2008 | सत्ता में दूसरा शांतिपूर्ण हस्तांतरण — रूढ़िवादी पार्टी के नेता ली माइंग-बाक, प्रगतिशील पार्टी रोह मु-ह्यून प्रशासन के बाद अध्यक्ष चुने गए |
| 2012 | रूढ़िवादी पार्टी की नेता पार्क खन-हे पहली महिला राष्ट्रपति के रूप में चुनी गईं; उनके पिता, पार्क चुंग-ही की राजनीतिक विरासत के कारण उन्हें अपने कार्यकाल की शुरुआत में बहुत समर्थन प्राप्त हुआ |
| अक्तूबर 2016 – मार्च 2017 | जब यह बात उठी कि उनके स्थान पर उनके एक नज़दीकी मित्र गुप्त रूप से सरकारी मामलों का प्रबंधन करते थे, तब राष्ट्रव्यापी विरोध एवं प्रदर्शनों के फलस्वरूप, मार्च 2017 में उन पर महाभियोग चला और उन्हें कार्यालय से हटा दिया गया |
| मई 2017 | तीसरी बार शांतिपूर्ण हस्तांतरण के द्वारा, मून जे-इन ने राष्ट्रपति पद संभाला |
NCERT का निष्कर्ष:
“2016 में नागरिकों के नेतृत्व में किए गए, कैंडललाइट विरोध में देश के लोकतांत्रिक कानून और प्रणालियों की सीमाओं के भीतर राष्ट्रपति के इस्तीफ़े की माँग कर रहे नागरिकों का शांतिपूर्वक प्रदर्शन, कोरियाई लोकतंत्र की परिपक्वता को दर्शाता है। कोरियाई लोकतंत्र आर्थिक विकास का कर्ज़दार है, लेकिन यह देश के गणतंत्रवाद को प्रोत्साहित करने वाले कोरियाई नागरिकों की राजनीतिक जागरूकता ही है, जिसने आज इस देश को आगे बढ़ाने में प्रमुख भूमिका निभाई है।”
कोरियाई कहानी की पूरी चाप एक पंक्ति में दिखाइए:
1961 तख्तापलट → 1979 तख्तापलट → 1980 ग्वांगजू का दमन → 1987 प्रत्यक्ष चुनाव → 2016 कैंडललाइट
1980 में सेना ने भीड़ पर गोली चलाई; 2016 में भीड़ ने मोमबत्तियाँ जलाईं और राष्ट्रपति को हटा दिया — कानून के भीतर रहकर। 36 साल में यही बदला।
‘गोल्ड कलेक्शन मूवमेंट’ को भी ज़रूर बताएँ — 1997–98 में आम कोरियाई नागरिकों ने अपने सोने के गहने, अंगूठियाँ और पदक राष्ट्रीय ऋण चुकाने के लिए दे दिए। यह वही भाव है जो भारतीय विद्यार्थी अपने स्वतंत्रता-संग्राम की कहानियों में पहचानेंगे, और यह कक्षा में गहरा प्रभाव छोड़ता है।
22. आधुनिकता के दो मार्ग — अध्याय का निष्कर्ष (पृ. 179–180)
“औद्योगिक समाजों ने एक-दूसरे के जैसे बनने की बजाए आधुनिकता के अपने-अपने मार्ग बनाए। ताइवान का किस्सा और कोरिया की कहानी के साथ-साथ चीन और जापान का इतिहास दिखाता है कि किस तरह अलग-अलग ऐतिहासिक परिस्थितियों ने आज़ाद और आधुनिक देश बनाने की बिलकुल अलग राहें तैयार कीं।”
22.1 जापान का मार्ग — संतुलित मूल्यांकन
| उपलब्धि | कीमत |
|---|---|
| जापान अपनी आज़ादी बनाए रखने में सफल रहा | कुलीन वर्ग के नेतृत्व में हुए आधुनिकीकरण ने एक उग्र राष्ट्रवाद को जन्म दिया |
| पारंपरिक हुनर और प्रथाओं को नए तरीके से इस्तेमाल कर पाया | एक शोषणकारी सत्ता को बरकरार रखा जिसने विरोध और लोकतंत्र की माँग का गला घोंट दिया |
| — | उसने एक औपनिवेशिक साम्राज्य की स्थापना की जिससे उस क्षेत्र में बैर की भावना बनी रही और अंदरूनी विकास भी प्रभावित हुआ |
जापानी राष्ट्रवाद की दुविधा:
- जापान का आधुनिकीकरण ऐसे वातावरण में हुआ जहाँ पश्चिमी साम्राज्यवादी ताक़तों का प्रभुत्व था
- हालांकि जापान ने उनकी नकल की, पर साथ ही अपने हल ढूँढ़ने की कोशिश भी की
- “जापानी राष्ट्रवाद पर इन मजबूरियों का प्रभाव है — एक ओर जहाँ जापानी एशिया को पश्चिमी आधिपत्य से मुक्त रखने की उम्मीद करते थे, दूसरे लोगों के लिए यही विचार साम्राज्य का निर्माण करने के लिए महत्त्वपूर्ण कारक सिद्ध हुए।”
परंपरा का सही इस्तेमाल — NCERT का सूत्र-वाक्य:
“यहाँ यह उल्लेख करना ज़रूरी है कि सामाजिक और राजनीतिक संस्थानों के सुधार और रोज़मर्रा की ज़िंदगी को बदलने के लिए केवल परंपराओं को पुनर्जीवित करने या ज़बरदस्ती उन्हें पकड़े रखने या सँभालने का सवाल नहीं था बल्कि उन्हें नए और अलग रचनात्मक तरीके से इस्तेमाल करने की बात थी।”
उदाहरण:
- मेजी स्कूली पद्धति ने यूरोपीय और अमरीकी प्रथाओं के अनुरूप नये विषयों की शुरुआत की
- किंतु पाठ्यचर्या का मुख्य उद्देश्य निष्ठावान नागरिक बनाना था
- नैतिकशास्त्र का विषय पढ़ना अनिवार्य था जिसमें सम्राट के प्रति वफ़ादारी पर ज़ोर दिया जाता था
- इसी तरह परिवार में और रोज़मर्रा की ज़िंदगी में आए बदलाव विदेशी और देशी विचारों को मिला कर कुछ नया बनाने की कोशिश को दर्शाते हैं
22.2 चीन का मार्ग
“चीन का आधुनिकीकरण का सफ़र बहुत अलग था।”
- पश्चिमी और जापानी, दोनों ही किस्म के विदेशी साम्राज्यवाद ने सारे नियंत्रण को कमज़ोर बनाया और राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था तोड़ने के लिए माहौल बना दिया
- इसके चलते ज़्यादातर लोगों को बहुत से दुख-दर्द सहने पड़े
- युद्ध सामंतवाद, लूटमार और गृह-युद्ध ने बहुत से लोगों की जान ले ली
- जापानी हमले की बर्बरता से भी भारी तादाद में लोगों की जानें गईं
- प्राकृतिक त्रासदियों ने बोझों को और बढ़ा दिया
परंपरा के प्रति रुख:
- 19वीं और 20वीं शताब्दी में परंपराओं को ठुकराया गया और राष्ट्रीय एकता तथा सुदृढ़ता निर्मित करने के रास्तों की तलाश की गई
- चीन के साम्यवादी दल और उसके समर्थकों ने परंपरा को खत्म करने की लड़ाई लड़ी
- उन्हें लगा कि परंपरा जनसमुदाय को गरीबी में जकड़े हुए है, महिलाओं को अधीन बनाती है और देश को अविकसित रखती है
संतुलित मूल्यांकन (यह पैराग्राफ़ पूरा याद रखने योग्य है):
“साम्यवादी दल ने लोगों को अधिकार एवं सत्ता देने की बात की परन्तु वास्तव में उसने बहुत ही केंद्रीकृत राज्य की स्थापना की। साम्यवादी कार्यक्रम की सफलता ने उम्मीद का वादा किया लेकिन दमनकारी राजनीतिक व्यवस्था ने मुक्ति और समानता के आदर्शों को ऐसी नारेबाज़ी में बदल दिया, जो लोगों को चालाकी से प्रभावित कर अपने काबू में लाने में काम आती थी। तथापि इससे शताब्दियों पुरानी असमानताएँ हट गईं, शिक्षा का विस्तार हुआ और जनता के बीच एक जागरूकता पैदा हुई।”
वर्तमान:
- पार्टी ने अब बाज़ार संबंधी सुधार किए और चीन को आर्थिक दृष्टि से ताकतवर बनाने में कामयाब हुई, जबकि राजनीतिक व्यवस्था अब भी कड़े नियंत्रण में है
- अब समाज बढ़ती असमानताओं का सामना कर रहा है और सदियों से दबी परंपराएँ पुनर्जीवित होने लगी हैं
- “यह नयी स्थिति एक बार फिर यह सवाल खड़ा करती है कि चीन किस तरह अपनी धरोहर को बरकरार रखते हुए अपना विकास कर सकता है।”
इस अंतिम खंड को पढ़ाने का सबसे अच्छा तरीक़ा — ‘तथापि’ शब्द पर ज़ोर देना।
NCERT न तो चीन की प्रशंसा करती है, न निंदा। वह कहती है: दमन हुआ “तथापि इससे शताब्दियों पुरानी असमानताएँ हट गईं, शिक्षा का विस्तार हुआ…”
यह संतुलित ऐतिहासिक निर्णय का उदाहरण है, और यही विद्यार्थियों को सिखाना है — इतिहास में ‘अच्छा’ और ‘बुरा’ एक ही घटना में साथ रह सकते हैं। यह अध्याय 6 के उस वाक्य जैसा है — “ऐसा नहीं है कि अपनी ज़मीनें उन्होंने बिना लड़े छोड़ दी हों… लेकिन इन लड़ाइयों के बाद उन्होंने हार मान ली।” दोनों बातें एक साथ।
22.3 चार मार्गों की तुलनात्मक तालिका (कक्षा में बनवाएँ)
| कसौटी | जापान | चीन | ताइवान | कोरिया |
|---|---|---|---|---|
| उपनिवेश बना? | नहीं | अर्ध-उपनिवेश | जापानी उपनिवेश 1895–1945 | जापानी उपनिवेश 1910–1945 |
| परंपरा के प्रति रुख | नए ढंग से इस्तेमाल | ठुकराया, फिर पुनर्जीवित | कन्फ़्यूशियसवाद जारी | — |
| आधुनिकीकरण का नेतृत्व | कुलीन वर्ग + सम्राट-व्यवस्था | साम्यवादी दल | कुओमीनतांग | सैन्य नेतृत्व (पार्क) |
| भूमि सुधार | 1945 के बाद (अमरीकी कब्ज़े में) | 1949 के बाद | लागू — उत्पादकता बढ़ी | — |
| लोकतंत्र का रास्ता | 1889 संविधान (सीमित) → 1946 | अभी भी कड़ा नियंत्रण | 1987 के बाद | 1987 के बाद |
| असमानता | — | बढ़ रही है | घटती गई | — |
23. अभ्यास प्रश्न (पृ. 180–181) — पाठ्यपुस्तक के अपने प्रश्न
संक्षेप में उत्तर दीजिए:
- मेजी पुनर्स्थापना से पहले की वे अहम घटनाएँ क्या थीं, जिन्होंने जापान के तीव्र आधुनिकीकरण को संभव किया?
- जापान के विकास के साथ-साथ वहाँ की रोज़मर्रा की ज़िंदगी में किस तरह बदलाव आए? चर्चा कीजिए।
- पश्चिमी ताकतों द्वारा पेश की गई चुनौतियों का सामना छींग राजवंश ने कैसे किया?
- सन यात-सेन के तीन सिद्धांत क्या थे?
- कोरिया ने 1997 में विदेशी मुद्रा संकट का सामना किस प्रकार किया?
संक्षेप में निबंध लिखिए: 6. क्या पड़ोसियों के साथ जापान के युद्ध और उसके पर्यावरण का विनाश तीव्र औद्योगीकरण की जापानी नीति के चलते हुआ? 7. क्या आप मानते हैं कि माओ त्सेतुंग और चीन के साम्यवादी दल ने चीन को मुक्ति दिलाने और इसकी मौजूदा कामयाबी की बुनियाद डालने में सफलता प्राप्त की? 8. क्या साउथ कोरिया की आर्थिक वृद्धि ने इसके लोकतंत्रीकरण में योगदान दिया?
प्रश्न 1 पर विशेष ध्यान दें — यह सबसे अधिक पूछा जाने वाला प्रश्न है और विद्यार्थी अक्सर मेजी के बाद की बातें लिख देते हैं। प्रश्न “मेजी पुनर्स्थापना से पहले” की घटनाएँ माँगता है, यानी तोकुगावा काल की: (i) 16वीं सदी के तीन परिवर्तन; (ii) एदो का दुनिया का सबसे बड़ा शहर बनना और छह शहरों का 50,000+ होना; (iii) वाणिज्यिक अर्थव्यवस्था, वित्त और ऋण; (iv) “व्यक्ति के गुण उसके पद से अधिक मूल्यवान”; (v) पढ़ने की संस्कृति और छपाई; (vi) निशिजिन का रेशम और नया उद्यमी वर्ग; (vii) प्राचीन जापानी साहित्य का अध्ययन और राष्ट्रीय पहचान की खोज; (viii) 1853–54 पेरी का आगमन।
प्रश्न 6, 7 और 8 तीनों ‘क्या…?’ से शुरू होते हैं — यानी दोनों पक्ष चाहिए। विद्यार्थियों को सिखाएँ कि ऐसे प्रश्नों में एकतरफ़ा उत्तर पूरे अंक नहीं देता; NCERT स्वयं दोनों पक्ष रखती है (देखें पृ. 164 का हिरोशिमा-वाला अंश और पृ. 180 का ‘तथापि’ वाला पैराग्राफ़)।
24. पुस्तक का निष्कर्ष (पृ. 182–184)
यह अध्याय का हिस्सा नहीं, पूरी पुस्तक का समापन है — और इसे अंतिम कालांश में अलग से पढ़ाना चाहिए।
24.1 पुस्तक की संरचना
पुस्तक ने एक लंबी कालावधि से परिचय कराया जिसे प्राचीन, मध्य व आधुनिक युगों में बाँटा जा सकता है। अलग-अलग अनुभागों में क्रमशः लघुतर कालखंडों की चर्चा की गई:
| अनुभाग | कालखंड |
|---|---|
| i. | 60 लाख वर्ष पूर्व से 400 ई.पू. |
| ii. | 400 ई.पू. – 1300 ई. |
| iii. | 800 – 1700 ई. |
| iv. | 1700 – 2000 ई. |
यह तालिका कक्षा में बनवाएँ और पूछें — खंड छोटे क्यों होते जाते हैं? उत्तर: जैसे-जैसे हम वर्तमान के पास आते हैं, स्रोत बढ़ते हैं और परिवर्तन की गति तेज़ होती है। यही बात अध्याय 6 के कालक्रम-क्रियाकलाप में भी थी। यह पूरी पुस्तक का एक अदृश्य सूत्र है।
24.2 इतिहासकार का शिल्प
- इतिहासकार प्रायः प्राचीन, मध्यकालीन या आधुनिक युग के विशेषज्ञ होते हैं, किंतु सर्वत्र इतिहासकार के शिल्प की कुछ सामान्य विशेषताएँ और समस्याएँ होती हैं
- “हमने प्राचीन, मध्य और आधुनिक युगों के बीच के अंतरों को मद्धम करने का प्रयत्न किया है, ताकि इतिहास कैसे लिखा जाता है और उसकी विवेचना कैसे की जाती है, इसका एक समग्र बोध प्राप्त हो।”
- उद्देश्य: पूरे मानव इतिहास की सामान्य समझ देना — वह इतिहास, जो हमारी आधुनिक जड़ों के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा गहरे जाता है
- पुस्तक ने अफ़्रीका, पश्चिम तथा मध्य एशिया, पूर्वी एशिया, ऑस्ट्रेलिया, उत्तर तथा दक्षिण अमरीका तथा युनाइटेड किंगडम सहित यूरोप के इतिहास की झलक दी
- इसने ‘केस स्टडी’ पद्धति से परिचय कराया — “इन स्थानों के विस्तृत इतिहास के वर्णन का बोझ आप पर लादने की बजाय कुछ परिघटनाओं के मुख्य उदाहरणों का अध्ययन हमें बेहतर लगा”
24.3 विश्व इतिहास लिखने के तीन तरीके (यह अत्यंत महत्त्वपूर्ण है)
| तरीका | विवरण |
|---|---|
| पहला (शायद सबसे पुराना) | लोगों के बीच संपर्क पर ध्यान केंद्रित करना, ताकि संस्कृतियों तथा सभ्यताओं के परस्पर संबंधों पर बल दिया जा सके और विश्व ऐतिहासिक परिवर्तन के बहुआयामी पक्षों का अन्वेषण किया जा सके |
| दूसरा | सापेक्षतः स्वावलंबी किंतु विस्तृत होते आर्थिक विनिमय के क्षेत्रों की पहचान करना, जो संस्कृति और सत्ता के कुछ रूपों को बनाए रखते हैं |
| तीसरा | ऐतिहासिक अनुभवों में अंतर स्पष्ट कर उनकी विशिष्टताओं को उभारना |
“आपको इन तीनों विधियों के संकेत इस पुस्तक में मिले होंगे।”
यह तीन-विधि वाली तालिका पूरी पुस्तक की समीक्षा का सर्वोत्तम ढाँचा है — इसे अंतिम कालांश में ज़रूर करवाएँ। विद्यार्थियों से हर विधि के लिए पुस्तक से एक-एक अध्याय ढुँढ़वाएँ:
- संपर्क → अध्याय 2 (तीन महाद्वीपों में फैला साम्राज्य), अध्याय 5 (पुनर्जागरण में अरबों का योगदान)
- आर्थिक विनिमय के क्षेत्र → अध्याय 3 (मंगोल), अध्याय 7 (त्रिकोणीय व्यापार)
- अंतर और विशिष्टता → अध्याय 6 (मूल निवासी), अध्याय 7 (आधुनिकता के अपने-अपने मार्ग)
यह अभ्यास पूरे साल की पढ़ाई को एक सूत्र में बाँध देता है।
24.4 पुस्तक की कहानी एक पैराग्राफ़ में
- विश्व इतिहास अफ़्रीका, एशिया तथा यूरोप में बिखरी बस्तियों से शुरू होता है
- वहाँ से हम मेसोपोटामिया के शहरी जीवन की ओर बढ़े
- आरंभिक साम्राज्य मेसोपोटामिया, मिस्र, चीन, फ़ारस तथा भारत में शहरों के ही इर्द-गिर्द बने
- इसके बाद इनसे अधिक विस्तृत यूनानी (मकदूनियाई), रोमन, अरब तथा (1200 से) मंगोल साम्राज्य बने
- इन साम्राज्यों में व्यापार-प्रणालियाँ, प्रौद्योगिकी तथा शासन अक्सर अत्यधिक जटिल होते थे। ज़्यादातर वे एक लिखित भाषा के प्रभावी प्रयोग पर निर्भर थे
- दूसरे सहस्राब्दि के मध्य में (1400 ई. से) पश्चिमी यूरोप में प्रौद्योगिकीय और संगठनात्मक बदलावों के कारण मानव इतिहास में एक नए युग का सूत्रपात हुआ
- ये सभ्यता के ‘पुनर्जागरण’ या ‘पुनर्जन्म’ से जुड़े थे; इनका शुरुआती असर उत्तरी इटली में हुआ, लेकिन जल्दी ही यह पूरे यूरोप में फैल गया
- यह पुनर्जागरण उस क्षेत्र के नगरीय जीवन और भूमध्यसागर की मुस्लिम दुनिया तथा बाइजेंटाइन के साथ आदान-प्रदान का नतीजा था
- समय के साथ सोलहवीं सदी में विचार तथा खोज अन्वेषकों तथा विजेताओं के साथ अमरीका (उत्तर और दक्षिण) पहुँच गए। इनमें से कुछ विचार बाद में जापान, भारत और दूसरी जगहों तक भी पहुँचे
- विश्व-व्यापार, राजनीति तथा संस्कृति में यूरोप का वर्चस्व अभी क़ायम नहीं हुआ था। यह अठारहवीं तथा उन्नीसवीं सदी की विशेषता बनी, जब ब्रिटेन में औद्योगिक क्रांति हुई और शेष यूरोप में फैल गई
- ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी ने अफ़्रीका तथा एशिया के कुछ हिस्सों में औपनिवेशिक सत्ता हासिल कर ली जो पुराने साम्राज्यों से अधिक शक्तिशाली थी
- बीसवीं सदी के मध्य तक जिस प्रौद्योगिकी, आर्थिक जीवन और संस्कृति ने कभी यूरोपीय राष्ट्रों को शक्ति प्रदान की थी, वे अलग-अलग रूपों में शेष विश्व में फैल चुके थे और इन्होंने आधुनिक जीवन की नींव रखी
इस पूरे पैराग्राफ़ को कक्षा में एक साथ पढ़वाइए — यह पूरी पुस्तक की एक-पृष्ठीय पुनरावृत्ति है। और एक वाक्य को रेखांकित कराइए: “विश्व-व्यापार, राजनीति तथा संस्कृति में यूरोप का वर्चस्व अभी क़ायम नहीं हुआ था।” — यानी यूरोपीय वर्चस्व शाश्वत नहीं था, वह अठारहवीं सदी से शुरू हुआ। यह पूरे ‘पश्चिमी श्रेष्ठता’ के आख्यान का सबसे संक्षिप्त खंडन है।
24.5 प्राथमिक स्रोत और इतिहासकार का तर्क
- “आपने विभिन्न अध्यायों में उद्धृत अंशों को देखा होगा। इनमें कई ऐसे स्रोतों से लिए गए हैं, जिन्हें इतिहासकार ‘प्राथमिक स्रोत’ कहते हैं।”
- विद्वान ऐसी ही सामग्रियों से अपने ‘तथ्य’ हासिल कर इतिहास रचते हैं
- वे इनका आलोचनात्मक अध्ययन करते हैं और इन स्रोतों की अस्पष्टता पर विशेष ध्यान देते हैं
- “एक ही स्रोत का प्रयोग करनेवाले इतिहासकार भिन्न बल्कि विपरीत राय पेश कर सकते हैं।”
- “दूसरे मानव विज्ञानों की भाँति इतिहास से भी अलग-अलग तरह की बातें कहलवाई जा सकती हैं। यह ऐतिहासिक तथ्यों और इतिहासकार के तर्कों के बीच जटिल संबंध की वजह से है।”
“एक ही स्रोत का प्रयोग करनेवाले इतिहासकार भिन्न बल्कि विपरीत राय पेश कर सकते हैं” — यह पूरी पुस्तक का सबसे महत्त्वपूर्ण वाक्य है।
इसे साबित करने के लिए पूरे साल के उदाहरण याद दिलाइए: बर्कहार्ट बनाम पीटर बर्क (अध्याय 5); रूसो बनाम वड्सवर्थ बनाम इरविंग (अध्याय 6); हिरोशिमा पर दो मत (अध्याय 7); सिएटल का पत्र और उसकी तीन परतें (अध्याय 6)।
कक्षा में यह बोर्ड पर लिखकर छोड़ दीजिए। यह पूरे वर्ष की पढ़ाई का निचोड़ है।
24.6 आगे की राह और मार्क ब्लॉक का प्रश्न
- विद्यालय के अंतिम वर्ष में आप भारतीय (या दक्षिण एशियाई) इतिहास में हड़प्पा युग से आधुनिक भारत के संविधान बनने तक के इतिहास के कुछ पहलुओं का अध्ययन करेंगे
- एक बार फिर राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक इतिहास के विवेकपूर्ण मिश्रण पर बल होगा जो आपको केस-स्टडी पद्धति से कुछ चुने हुए विषयों का अध्ययन करने के लिए आमंत्रित करेगा
- “हमें उम्मीद है कि ये पुस्तकें आपको कई प्रश्नों के उत्तर ढूँढ़ने में मदद करेंगी। इनमें से प्रमुख है, ‘इतिहास पढ़ने की ज़रूरत क्या है?’”
और पुस्तक का अंतिम वाक्य:
“क्या आपको पता है कि प्रतिभाशाली मध्ययुग विशेषज्ञ मार्क ब्लॉक ने दूसरे विश्वयुद्ध में खाई में रहते हुए लिखी गई अपनी पुस्तक द हिस्टोरियन्स क्राफ्ट की शुरुआत एक छोटे बच्चे के प्रश्न से की थी — ‘डैडी, मुझे बताइए, इतिहास का फ़ायदा क्या है?’”
इस वाक्य के साथ ही वर्ष का अंतिम कालांश समाप्त कीजिए — और इससे बेहतर समापन संभव नहीं है।
मार्क ब्लॉक के बारे में विद्यार्थियों को इतना ज़रूर बताइए (यह पाठ्यपुस्तक में नहीं है, पर वाक्य को अर्थ देता है): वे फ्रांसीसी इतिहासकार थे, अनाल स्कूल के संस्थापकों में से एक। उन्होंने यह पुस्तक द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान लिखी और वे उसे पूरा नहीं कर पाए — 1944 में फ्रांसीसी प्रतिरोध में भाग लेने के कारण उन्हें मार दिया गया। पुस्तक अधूरी छपी।
यानी ‘इतिहास का फ़ायदा क्या है?’ — यह प्रश्न एक ऐसे व्यक्ति ने उठाया जो इतिहास बनाते हुए मारा गया।
कक्षा को यही प्रश्न देकर छोड़िए — उत्तर के लिए नहीं, सोचने के लिए।
25. महत्त्वपूर्ण तिथियाँ — एक नज़र में
जापान
| तिथि | घटना |
|---|---|
| 1603–1867 | तोकुगावा शोगुनेट |
| 17वीं सदी का मध्य | एदो दुनिया का सबसे अधिक जनसंख्या वाला शहर |
| 1713 | निशिजिन में केवल देशी धागे का आदेश |
| 1853–54 | कॉमोडोर मैथ्यू पेरी का आगमन और समझौता |
| 1859 | विदेशी व्यापार की शुरुआत |
| 1867–68 | मेजी पुनर्स्थापना; एदो → तोक्यो |
| 1869 | अभिलेख इकट्ठा करने के लिए ब्यूरो |
| 1870–72 | पहली रेल लाइन — तोक्यो से योकोहामा |
| 1872 | आधुनिक बैंकिंग; अनिवार्य शिक्षा व्यवस्था; जनसंख्या 3.5 करोड़ |
| 1878 | जनता के लिए बाग़ |
| 1886 | पहली आधुनिक हड़ताल — महिलाओं द्वारा |
| 1889 | मेजी संविधान अमल में आया |
| 1890 | शिक्षासंबंधी राजाज्ञा; थलसेना-नौसेना का स्वतंत्र नियंत्रण |
| 1894–95 | चीन के साथ युद्ध — ताइवान जापान को मिला |
| 1897 | तानाका शोज़ो का प्रदूषण-विरोधी आंदोलन (800 गाँववासी) |
| 1899 | फ़िल्में बनने लगीं; केवल सेवारत जनरल/एडमिरल मंत्री |
| 1904–05 | रूस के साथ युद्ध — जापान की विजय |
| 1910 | कोरिया का समामेलन; स्कूल जाने से कोई वंचित नहीं |
| 1913 | औद्योगिक मज़दूर 40 लाख |
| 1918–1931 | जनमत से चुने गए प्रधानमंत्रियों की मंत्रिपरिषदें |
| 1920 | जनसंख्या 5.5 करोड़ |
| 1925 | सभी पुरुषों को मताधिकार; पहला रेडियो-स्टेशन |
| 1931 | चीन पर जापान का हमला |
| 1941–45 | प्रशांत युद्ध; पर्ल हार्बर पर हमला |
| 1943 | ‘आधुनिकता पर विजय’ संगोष्ठी |
| 1945 | हिरोशिमा और नागासाकी; हार |
| 1946 | पहला चुनाव — महिलाओं ने पहली बार मतदान किया |
| 1946–52 | अमरीकी कब्ज़ा; विसैन्यीकरण; अनुच्छेद 9 |
| 1956 | जापान संयुक्त राष्ट्र का सदस्य |
| 1964 | तोक्यो ओलंपिक और शिंकांसेन (बुलेट ट्रेन) |
| 1960 का दशक | मिनामाता — पारे का ज़हर |
| 1990 तक | विश्व के कुछ कठोरतम पर्यावरण-नियंत्रण |
चीन
| तिथि | घटना |
|---|---|
| 551–479 ई.पू. | कन्फ़्यूशियस |
| 145–90 ई.पू. | सिमा छियन |
| 1644–1911 | छींग (क्विंग) राजवंश |
| 1839–42 | पहला अफ़ीम युद्ध (1839–60 — दो अफ़ीम युद्ध) |
| 1890 का दशक | बड़ी तादाद में चीनी विद्यार्थी जापान गए |
| 1902 | पीकिंग विश्वविद्यालय की स्थापना |
| 1905 | परीक्षा प्रणाली खत्म |
| 1911 | मांचू साम्राज्य समाप्त; गणतंत्र की स्थापना |
| 1912 | सन यात-सेन द्वारा कुओमीनतांग की स्थापना |
| 4 मई 1919 | चार मई का आंदोलन |
| 1921 | चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना |
| 1926–49 | चीन में गृहयुद्ध |
| 1928–34 | जियांग्सी में माओ के शिविर |
| 1930 | जुनवू सर्वेक्षण |
| 1934–35 | लाँग मार्च — 6000 मील, शांसी तक |
| 1937 | जापानी हमला; कुओमीनतांग पीछे हटी |
| 1945–49 | कीमतें 30% प्रति माह की रफ़्तार से बढ़ीं |
| 1949 | पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना |
| 1953 | समाजवादी बदलाव के कार्यक्रम की घोषणा |
| 1958 | लंबी छलाँग; 26,000 कम्यून — कृषक आबादी का 98% |
| 1965–78 | सांस्कृतिक क्रांति (1966 समय-रेखा में) |
| 1975 | सामाजिक अनुशासन और औद्योगिक निर्माण पर ज़ोर |
| 1976 | माओ त्सेतुंग और चाउ एनलाई का निधन |
| 1978 | चार सूत्री आधुनिकीकरण; 5 दिसंबर — ‘पाँचवीं आधुनिकता’ का पोस्टर |
| 1989 | तियानममेन चौक (4 मई आंदोलन की 70वीं सालगिरह) |
| 1997 | ब्रिटेन द्वारा चीन को हांगकांग की वापसी |
ताइवान और कोरिया
| तिथि | घटना |
|---|---|
| 1392–1910 | कोरिया का जोसोन वंश |
| 1895 | ताइवान जापान को सौंपा गया |
| 1910–1945 | कोरिया जापानी उपनिवेश (35 वर्ष) |
| 1943 | कायरो घोषणापत्र |
| 1945 | कोरिया की मुक्ति; 38वीं समानांतर रेखा से विभाजन |
| फरवरी 1947 | ताइवान — कुओमीनतांग द्वारा नेताओं की पीढ़ी की हत्या |
| 1948 | उत्तर और दक्षिण कोरिया में अलग सरकारें; सिन्गमैन री राष्ट्रपति |
| 1949 | चियांग काई-शेक ताइवान भागे |
| जून 1950 – जुलाई 1953 | कोरियाई युद्ध — युद्धविराम समझौते से समाप्त |
| अप्रैल 1960 | ‘अप्रैल क्रांति’ — री का इस्तीफ़ा |
| मई 1961 | पार्क चुंग-ही का सैन्य तख्तापलट |
| अक्तूबर 1963 | पार्क राष्ट्रपति बने |
| 1970 | नया गाँव (सैमौल) आंदोलन |
| 1971 | पार्क पुनः निर्वाचित |
| अक्तूबर 1972 | यूसिन संविधान |
| 1973 | ताइवान — कुल राष्ट्रीय उत्पाद में एशिया में जापान के बाद दूसरा स्थान |
| 1975 | चियांग काई-शेक की मृत्यु |
| 1979 | दूसरा तेल संकट; अक्तूबर — पार्क की हत्या; दिसंबर — चुन डू-ह्वान का तख्तापलट |
| मई 1980 | ग्वांगजू — लोकतंत्र आंदोलन का दमन |
| 1980–83 | कोरिया की आर्थिक वृद्धि 1.7% → 13.2% |
| 1987 | ताइवान में फ़ौजी कानून हटा; कोरिया में प्रत्यक्ष चुनाव का अधिकार; दिसंबर — रोह ताए-वू |
| दिसंबर 1992 | किम यंग-सैम — नागरिक राष्ट्रपति |
| 1996 | कोरिया ओ.ई.सी.डी. में शामिल |
| 1997 | विदेशी मुद्रा संकट; आई.एम.एफ.; गोल्ड कलेक्शन मूवमेंट; दिसंबर — किम डे-जुंग |
| 2008 / 2012 / 2016–17 / मई 2017 | ली माइंग-बाक / पार्क खन-हे (पहली महिला राष्ट्रपति) / कैंडललाइट विरोध और महाभियोग / मून जे-इन |
26. शब्दावली (Glossary)
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| शोगुन | जापान का वास्तविक शासक, जो सैद्धांतिक रूप से सम्राट के नाम पर शासन करता था |
| दैम्यो | जापान के 250 भागों के शासक |
| सामुराई | योद्धा वर्ग; शासन करने वाले कुलीन |
| फ़ुकोकु क्योहे | ‘समृद्ध देश, मज़बूत सेना’ — मेजी सरकार का नारा |
| डायट | जापानी संसद (जर्मन शब्द से) |
| ज़ायबात्सु | बड़ी व्यापारिक संस्थाएँ जिन पर विशिष्ट परिवारों का नियंत्रण था |
| कांजी / हीरागाना / कताकाना | जापानी की तीन लिपियाँ — चीनी चित्रात्मक चिह्न / दो ध्वन्यात्मक वर्णमालाएँ |
| होमु | मूल परिवार वाला ‘नया घर’ (जापानी अंग्रेज़ी शब्द) |
| मोगा | ‘आधुनिक लड़की’ के लिए संक्षिप्त शब्द |
| गिनबुरा | गिन्ज़ा + बुराबुरा; ‘बिना किसी लक्ष्य के घूमना’ |
| शिंकांसेन | बुलेट ट्रेन (1964) |
| अनुच्छेद 9 | जापानी संविधान की वह धारा जो युद्ध को राष्ट्रीय नीति के साधन के रूप में वर्जित करती है |
| कन्फ़्यूशियसवाद | कन्फ़्यूशियस (551–479 ई.पू.) की शिक्षाओं से विकसित प्रमुख चीनी विचारधारा |
| पा-कू वेन | चीनी परीक्षा का 8 भाग वाला निबंध-प्रपत्र |
| सन मिन चुई | सन यात-सेन के तीन सिद्धांत — राष्ट्रवाद, गणतंत्र, समाजवाद |
| कुओमीनतांग | नेशनल पीपुल्स पार्टी |
| बोलान वू | ‘हमें पोलैंड करने के लिए’ — उपनिवेश बन जाने के लिए प्रयुक्त क्रिया |
| शियाओ शिमिन | ‘नगण्य शहरी’ — व्यापारी और दुकानदार |
| कोमिंटर्न | तृतीय अंतर्राष्ट्रीय (मार्च 1918); 1943 में समाप्त |
| लाँग मार्च | 1934–35 का 6000 मील का सफ़र, शांसी तक |
| नया लोकतंत्र | 1949 का सिद्धांत — सभी सामाजिक वर्गों का गठबंधन |
| सर्वहारा की तानाशाही | मार्क्स का शब्द — श्रमिक वर्ग की क्रांतिकारी सरकार |
| लंबी छलाँग | 1958 का तीव्र औद्योगीकरण अभियान |
| पीपुल्स कम्यून्स | सामूहिक भूस्वामित्व और खेती वाले ग्रामीण समुदाय |
| रेड गार्ड्स | सांस्कृतिक क्रांति में प्रयुक्त छात्र और सैनिक दल |
| चार सूत्री लक्ष्य | 1978 — विज्ञान, उद्योग, कृषि, रक्षा |
| पाँचवीं आधुनिकता | लोकतंत्र — 1978 के पोस्टर का दावा |
| शू-शाओझी | कड़े सिद्धांत, जिन्हें खत्म करने की माँग 1989 में हुई |
| यूसिन संविधान | कोरिया, अक्तूबर 1972 — स्थायी अध्यक्षता को संभव बनाने वाला संविधान |
| सैमौल आंदोलन | ‘नया गाँव’ आंदोलन (1970), ग्रामीण आधुनिकीकरण के लिए |
| आई.एस.आई. | आयात प्रतिस्थापन औद्योगिकी |
| गोल्ड कलेक्शन मूवमेंट | 1997 के संकट में नागरिकों द्वारा सोना देकर विदेशी ऋण चुकाने का अभियान |
| कैंडललाइट विरोध | 2016 का शांतिपूर्ण नागरिक प्रदर्शन |