अध्याय 2 — संघवाद · लोकतांत्रिक राजनीति · कक्षा 10
कक्षा — 10 · विषय — राजनीति विज्ञान (लोकतांत्रिक राजनीति) · पृष्ठ — 13 से 28
तुम्हारे घर में यह कौन तय करता है कि आज क्या सब्ज़ी बनेगी? और यह कौन कि तुम कौन-सी कमीज़ पहनोगे?
यह अध्याय पिछले अध्याय का दूसरा भाग है
पिछले अध्याय के चार रूप — अंग · स्तर · समूह · दल
★“पिछले अध्याय में हमने गौर किया था कि शासन के विभिन्न स्तरों के बीच सत्ता का उर्ध्वाधर बँटवारा… इसे आमतौर पर संघवाद कहा जाता है।” — पूरा अध्याय सिर्फ़ ‘स्तर’ शब्द पर है।
संघवाद — परिभाषा★★
“संघीय शासन व्यवस्था में सर्वोच्च सत्ता केंद्रीय प्राधिकार और उसकी विभिन्न आनुषंगिक इकाइयों के बीच बँट जाती है।”
दो स्तर — एक पूरे देश के लिए (राष्ट्रीय महत्व के विषय) और राज्य/प्रांत स्तर पर (दैनंदिन कामकाज); ★“दोनों अपने-अपने स्तर पर स्वतंत्र होकर अपना काम करती हैं।”
एकात्मक बनाम संघीय★
एकात्मक व्यवस्था
- “शासन का एक ही स्तर होता है और बाकी इकाइयाँ उसके अधीन होकर काम करती हैं”
- “केंद्रीय सरकार प्रांतीय या स्थानीय सरकारों को आदेश दे सकती है”
- नीचे की सरकारें ऊपर वाली को जवाबदेह
- उदाहरण — श्रीलंका
संघीय व्यवस्था
- दो या अधिक स्तर, दोनों अपने-अपने स्तर पर स्वतंत्र
- “केंद्रीय सरकार राज्य सरकार को कुछ खास करने का आदेश नहीं दे सकती”
- ★“दोनों ही सरकारें अपने-अपने स्तर पर लोगों को जवाबदेह होती हैं”
- उदाहरण — भारत · बेल्जियम (1993 से)
एक वाक्य में पूरा फ़र्क़
“एकात्मक में नीचे वाली सरकार ऊपर वाली को जवाब देती है। संघीय में दोनों सीधे जनता को जवाब देती हैं।”
इसीलिए बेल्जियम 1993 में एकात्मक से संघीय बना; और श्रीलंका में “व्यावहारिक रूप से अभी भी एकात्मक शासन व्यवस्था” है
1 | सात विशेषताएँ
संघीय व्यवस्था की सात विशेषताएँ★★
पृष्ठ 15 — यह सबसे ज़्यादा पूछा जाने वाला हिस्सा है
| # | विशेषता |
|---|---|
| 1 | सरकार दो या अधिक स्तरों वाली होती है |
| 2 | एक ही नागरिक समूह पर शासन, पर कानून बनाने, कर वसूलने और प्रशासन का अपना-अपना अधिकार-क्षेत्र |
| 3 | अधिकार-क्षेत्र संविधान में स्पष्ट वर्णित; संविधान हर स्तर के अस्तित्व और प्राधिकार की गारंटी देता है |
| 4 | मौलिक प्रावधानों को कोई एक स्तर अकेले नहीं बदल सकता — दोनों की सहमति चाहिए |
| 5 | अदालतों को व्याख्या का अधिकार; विवाद में सर्वोच्च न्यायालय निर्णायक |
| 6 | वित्तीय स्वायत्तता — राजस्व के अलग-अलग स्रोत |
| ★7 | दोहरे उद्देश्य — “देश की एकता की सुरक्षा… तथा क्षेत्रीय विविधताओं का पूरा सम्मान” |
और दो चीज़ें जो लिखी नहीं जा सकतीं★
“आदर्श संघीय व्यवस्था में ये दोनों पक्ष होते हैं: आपसी भरोसा और साथ रहने पर सहमति।”
सोचिए — भरोसा संविधान में कैसे लिखोगे? — लिख नहीं सकते। इसीलिए संघवाद संविधान से नहीं, राजनीति से चलता है।
संघ बनने के दो तरीक़े★
“साथ आकर संघ बनाना”
- “दो या अधिक स्वतंत्र राष्ट्रों को साथ लाकर एक बड़ी इकाई”
- वे “अपनी संप्रभुता को साथ करते हैं, अपनी अलग-अलग पहचान भी बनाए रखते हैं”
- उदाहरण — अमरीका · स्विट्ज़रलैंड · ऑस्ट्रेलिया
- ★“प्रांत… केंद्र के बरक्स ज़्यादा ताकतवर होते हैं”
“बड़े देश द्वारा राज्यों का गठन”
- बड़ा देश “अपनी आंतरिक विविधता को ध्यान में रखते हुए” राज्य बनाता है
- उदाहरण — भारत · बेल्जियम · स्पेन
- ★“राज्यों के बरक्स केंद्र सरकार ज़्यादा ताकतवर हुआ करती है”
- “विशेष स्थिति में किसी-किसी प्रांत को विशेष अधिकार भी दिए जाते हैं”
याद रखने का सूत्र
“साथ आकर = नीचे से ऊपर” (राज्य ताक़तवर) “साथ लेकर = ऊपर से नीचे” (केंद्र ताक़तवर)
आँकड़ा — “193 देशों में से केवल 25 में संघीय शासन व्यवस्था है लेकिन इन देशों में दुनिया की 40 प्रतिशत जनसंख्या रहती है।”
2 | भारत में संघीय व्यवस्था
संविधान ने क्या कहा
“एक बहुत ही दुखद और रक्तरंजित विभाजन के बाद भारत आज़ाद हुआ… भारतीय संविधान ने भारत को राज्यों का संघ घोषित किया। इसमें संघ शब्द नहीं आया पर भारतीय संघ का गठन संघीय शासन व्यवस्था के सिद्धांत पर हुआ है।”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 16
तीन सूचियाँ — यह तालिका रट लीजिए★★
पृष्ठ 16-17
| सूची | विषय | क़ानून कौन बनाएगा |
|---|---|---|
| संघ सूची | प्रतिरक्षा · विदेशी मामले · बैंकिंग · संचार · मुद्रा | सिर्फ़ केंद्र |
| राज्य सूची | पुलिस · व्यापार · वाणिज्य · कृषि · सिंचाई | सिर्फ़ राज्य |
| समवर्ती सूची | शिक्षा · वन · मज़दूर-संघ · विवाह · गोद लेना · उत्तराधिकार | दोनों — ! टकराव पर केंद्र का क़ानून मान्य |
| अवशिष्ट विषय | जो किसी सूची में नहीं (जैसे कंप्यूटर सॉफ़्टवेयर) | ★केंद्र सरकार |
तीनों के सूत्र★
संघ — “प्र-वि-बैं-सं-मु” राज्य — “पु-व्या-वा-कृ-सिं” समवर्ती — “शि-व-म-वि-गो-उ”
और संघ सूची का तर्क — “पूरे देश के लिए इन मामलों में एक तरह की नीतियों की ज़रूरत है।”
और सारे राज्यों को बराबर अधिकार नहींध्यान
पृष्ठ 17
| क्या | विवरण |
|---|---|
| विशेष शक्तियाँ | असम · नागालैंड · अरुणाचल प्रदेश · मिज़ोरम — अनुच्छेद 371 के तहत |
| किसलिए | “उनकी संस्कृति और सरकारी सेवाओं में अधिमान्य रोज़गार के भूमि अधिकारों के संरक्षण” के लिए |
| ! केंद्र शासित प्रदेश | चंडीगढ़ · लक्षद्वीप · दिल्ली — “इन क्षेत्रों को राज्यों वाले अधिकार नहीं हैं” |
| संविधान संशोधन | दोनों सदनों में दो-तिहाई + कम से कम आधे राज्यों की विधान सभाओं की मंज़ूरी |
3 | संघीय व्यवस्था कैसे चलती है
अध्याय का असली दावा★★
“संघीय व्यवस्था के कारगर कामकाज के लिए संवैधानिक प्रावधान ज़रूरी हैं पर इतना ही पर्याप्त नहीं है… भारत में संघीय व्यवस्था की सफलता का मुख्य श्रेय यहाँ की लोकतांत्रिक राजनीति के चरित्र को देना होगा।”
★यानी — “संघवाद सिर्फ़ संविधान में लिखी व्यवस्था नहीं है — वह रोज़ चलाई जाने वाली आदत है।”
परीक्षा 1 — भाषायी राज्य
- 1947भारत ने लोकतंत्र की राह पर जीवन-यात्रा शुरू की
- डर“कई राष्ट्रीय नेताओं को डर था कि इससे देश टूट जाएगा” — पुनर्गठन कुछ समय टाला गया
- 1950 का दशकसीमाएँ बदलीं ताकि “एक भाषा बोलने वाले लोग एक राज्य में आ जाएँ”
- 1 नवंबर 1956राज्य पुनर्गठन आयोग की रिपोर्ट लागू हुई
- बाद मेंसंस्कृति, भूगोल और जातीयता के आधार पर भी — नगालैंड, उत्तराखंड, झारखंड
- नतीजा★“भाषावार राज्य बनाने से देश ज़्यादा एकीकृत और मज़बूत हुआ”
रामचंद्र गुहा — टाइम्स ऑफ़ इंडिया, 1 नवंबर 2006★
“भारत की एकता को कमज़ोर करने की जगह भाषा के आधार पर गठित राज्यों ने इसकी एकता को मज़बूत करने में मदद की है। एक व्यक्ति कन्नड़ और भारतीय या बंगाली और भारतीय अथवा तमिल और भारतीय… जैसी दो-दो पहचानों के साथ आसानी से जीता है।”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 23
★और चेतावनी — “भाषावार राज्यों के गठन ने भारत को एक भयावह स्थिति से बचा लिया… यहाँ की स्थिति कुछ इस प्रकार की होती: एक भाषा : 14–15 राष्ट्र।”
तुम राजस्थानी भी हो और भारतीय भी। क्या इन दोनों में कोई टकराव है?
परीक्षा 2 — और यहाँ सबसे बड़ी ग़लतफ़हमी टूटती है★★
क्या हिंदी भारत की राष्ट्रभाषा है?
“हमारे संविधान में किसी एक भाषा को राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं दिया गया। हिंदी को राजभाषा माना गया।”
और हिंदी भी सिर्फ़ 40 फ़ीसदी (लगभग) भारतीयों की मातृभाषा है — इसीलिए “अन्य भाषाओं के संरक्षण के अनेक दूसरे उपाय” किए गए
भाषा-नीति की चार बातें
पृष्ठ 20
- 22 भाषाओं को अनुसूचित भाषा का दर्जा (आठवीं अनुसूची)
- केंद्र सरकार के किसी पद का उम्मीदवार इनमें से किसी भी भाषा में परीक्षा दे सकता है
- “राज्यों की भी अपनी राजभाषाएँ हैं। राज्यों का अपना अधिकांश काम अपनी राजभाषा में ही होता है”
- ★अंग्रेज़ी का प्रयोग 1965 में बंद होना था — पर ग़ैर-हिंदी भाषी प्रदेशों ने माँग की; “तमिलनाडु में तो इस माँग ने उग्र रूप भी ले लिया था।”
एक ही सवाल, दो जवाब, दो नतीजे★★
श्रीलंका — 1956
- तमिल को दरकिनार करके सिंहली एकमात्र राजभाषा
- नौकरियों और विश्वविद्यालयों में प्राथमिकता
- तमिलों की माँगें लगातार नकारी गईं
- ! नतीजा — गृहयुद्ध
भारत — 1965
- हिंदी के साथ-साथ अंग्रेज़ी भी जारी रखी
- “केंद्र सरकार ने… इस विवाद को सुलझाया”
- “बढ़ावा देने का मतलब यह नहीं कि केंद्र सरकार उन राज्यों पर भी हिंदी को थोप सकती है”
- ★नतीजा — “हम श्रीलंका जैसी स्थिति में पहुँचने से बच गए”
भारत की भाषायी विविधता
पृष्ठ 22 — ! किताब कहती है “इसे याद करने की ज़रूरत नहीं है”
| आँकड़ा | विवरण |
|---|---|
| 1300 से ज़्यादा | 2011 की जनगणना में दर्ज मातृभाषाएँ |
| 121 | समूहबद्ध करने के बाद प्रमुख भाषाएँ |
| 22 | आठवीं अनुसूची की अनुसूचित भाषाएँ |
| ★43.63% (≈44%) | हिंदी को मातृभाषा बताने वाले |
| 0.02% | अंग्रेज़ी को मातृभाषा बताने वाले (दूसरी-तीसरी भाषा के रूप में 11%) |
| निष्कर्ष | “भाषा के हिसाब से भारत दुनिया का संभवत: सबसे ज़्यादा विविधता वाला देश है” |
परीक्षा 3 — केंद्र-राज्य संबंध★
- पहलेएक ही पार्टी का केंद्र और अधिकांश राज्यों में शासन
- नतीजा“राज्य सरकारों ने स्वायत्त संघीय इकाई के रूप में अपने अधिकारों का प्रयोग नहीं किया”
- !औरअलग दल होने पर केंद्र “संवैधानिक प्रावधानों का दुरुपयोग करके… राज्य सरकारों को भंग कर देती थी”
- 1990 के बादअनेक राज्यों में क्षेत्रीय दलों का उदय
- साथ हीकेंद्र में गठबंधन सरकार का दौर शुरू हुआ
- औरसुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से राज्य सरकार को मनमाने ढंग से भंग करना मुश्किल हो गया
- ★नतीजा“सत्ता में साझेदारी और राज्य सरकारों की स्वायत्तता का आदर करने की नई संस्कृति पनपी”
इस पूरे हिस्से का सार★★
“संविधान 1950 में ही संघीय था। पर संघवाद असल में 1990 के बाद शुरू हुआ — और उसे लाने वाला कोई संशोधन नहीं, चुनावी नतीजे थे।”
यानी — “नियम वही थे। खिलाड़ी बदल गए।”
4 | भारत में विकेंद्रीकरण
दो स्तर काफ़ी क्यों नहीं★
“भारत के प्रांत यूरोप के स्वतंत्र देशों से भी बड़े हैं। जनसंख्या के हिसाब से उत्तर प्रदेश रूस से भी बड़ा है और महाराष्ट्र लगभग जर्मनी के बराबर है।”
इसीलिए — “भारत जैसे विशाल देश में सिर्फ़ दो स्तर की शासन व्यवस्था से ही बढ़िया शासन नहीं चल सकता।”
विकेंद्रीकरण — परिभाषा और तर्क
पृष्ठ 24
- “जब केंद्र और राज्य सरकार से शक्तियां लेकर स्थानीय सरकारों को दी जाती हैं तो इसे सत्ता का विकेंद्रीकरण कहते हैं”
- “अनेक मुद्दों और समस्याओं का निपटारा स्थानीय स्तर पर ही बढ़िया ढंग से हो सकता है”
- “लोगों को अपने इलाक़े की समस्याओं की बेहतर समझ होती है” और यह भी कि “पैसा कहाँ खर्च किया जाए”
- ★“स्थानीय सरकारों की स्थापना स्व-शासन के लोकतांत्रिक सिद्धांत को वास्तविक बनाने का सबसे अच्छा तरीक़ा है”
1992 — पहले और बाद★★
! 1992 से पहले
- “राज्य सरकारों के सीधे नियंत्रण में रखा गया था”
- “नियमित ढंग से चुनाव भी नहीं कराए जाते थे”
- “इनके पास न तो अपना कोई अधिकार था न संसाधन”
- ! “विकेंद्रीकरण नाम मात्र का हुआ था”
★1992 के बाद
- चुनाव नियमित रूप से कराना संवैधानिक बाध्यता
- अनुसूचित जातियों, जनजातियों और पिछड़ी जातियों के लिए सीटें आरक्षित
- ★कम से कम एक तिहाई पद महिलाओं के लिए आरक्षित
- हर राज्य में राज्य चुनाव आयोग
- राज्यों को राजस्व और अधिकारों का कुछ हिस्सा देना पड़ता है
याद रखने का सूत्र
“चुनाव · आरक्षण · महिला · आयोग · पैसा”
और एक ज़रूरी सुधार — पंचायतें 1992 में बनीं नहीं; वे पहले भी थीं। 1992 में उन्हें ताक़त मिली।
पंचायती राज का ढाँचा★
- ग्राम सभागाँव के सभी मतदाता; बजट पास करना और कामकाज की समीक्षा; साल में कम से कम दो-तीन बैठकें
- ग्राम पंचायतसदस्य = पंच (वार्डों से चुने); अध्यक्ष = प्रधान या सरपंच
- पंचायत समितिकई ग्राम पंचायतों को मिलाकर; मंडल या प्रखंड स्तरीय पंचायत
- ज़िला परिषदज़िले की सभी पंचायत समितियों को मिलाकर; सांसद-विधायक भी सदस्य; प्रमुख = राजनीतिक प्रधान
- शहरों मेंनगरपालिका (नगरपालिका प्रमुख); बड़े शहरों में नगरनिगम (मेयर)
उपलब्धि और कमी — दोनों ज़रूरी★★
पृष्ठ 26
| ✓ उपलब्धि | ! कमी |
|---|---|
| “स्थानीय सरकारों की यह नयी व्यवस्था दुनिया में लोकतंत्र का अब तक का सबसे बड़ा प्रयोग है” | “ग्राम सभाओं की बैठकें नियमित रूप से नहीं होतीं” |
| 36 लाख लोगों का चुनाव — “यह संख्या ही… दुनिया के कई देशों की कुल आबादी से ज़्यादा है” | ★“अधिकांश राज्य सरकारों ने स्थानीय सरकारों को पर्याप्त अधिकार नहीं दिए हैं” |
| “लोकतंत्र की जड़ें और मज़बूत हुई हैं” | “हम स्वशासन की आदर्श स्थिति से काफ़ी दूर हैं” |
| ★“महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाने के साथ ही… उनकी आवाज़ को मज़बूत किया” | — |
ब्राज़ील का प्रयोग — पोर्तो एलेग्रे★
“शहर के करीब 13 लाख लोग अपने शहर का बजट तैयार करने में भागीदारी करते हैं… हर साल इस प्रक्रिया में करीब 20,000 लोग हिस्सा लेते हैं।”
★नतीजा — “बजट को सिर्फ़ अमीर लोगों की बस्तियों में ही खर्च नहीं किया जाएगा। अब सभी गरीब बस्तियों तक बसें जाती हैं और पुनर्वास का इंतज़ाम किए बगैर भवन-निर्माता झुग्गी वालों को उजाड़ नहीं सकते।” — भारत में केरल के कुछ इलाक़ों में ऐसे प्रयोग हुए हैं
अगर तुम्हारे वार्ड का बजट तुम्हारे मोहल्ले के लोग मिलकर बनाएँ, तो पहला ख़र्च क्या होगा?
5 | दोहराइए
चार सूत्र — पूरी परीक्षा बच जाएगी★
यही रट लीजिए
| सूत्र | किसके लिए |
|---|---|
| “प्र-वि-बैं-सं-मु” · “पु-व्या-वा-कृ-सिं” · “शि-व-म-वि-गो-उ” | तीन सूचियाँ |
| “साथ आकर = नीचे से ऊपर · साथ लेकर = ऊपर से नीचे” | दो तरह के संघ |
| “आड़ी = अंग, खड़ी = स्तर” | क्षैतिज बनाम उर्ध्वाधर |
| “चुनाव · आरक्षण · महिला · आयोग · पैसा” | 1992 के पाँच बदलाव |
रटने के लिए केवल यह
परीक्षा से पहले
| क्या | कितना |
|---|---|
| संघीय देश | 193 में 25 — पर 40% आबादी |
| बेल्जियम संघीय बना | 1993 |
| विशेष शक्तियाँ | अनुच्छेद 371 — असम, नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश, मिज़ोरम |
| संविधान संशोधन | दो-तिहाई + आधे राज्य |
| राज्य पुनर्गठन | 1 नवंबर 1956 |
| अंग्रेज़ी | 1965 में बंद होनी थी — जारी रही |
| भाषाएँ | 22 अनुसूचित · 121 प्रमुख · 1300+ मातृभाषाएँ |
| विकेंद्रीकरण | 1992 · महिलाओं के लिए एक तिहाई · 36 लाख प्रतिनिधि |
जहाँ बच्चे मार खाते हैंध्यान
इन्हें पहले से ठीक कर लीजिए
| ग़लती | सही बात |
|---|---|
| “अवशिष्ट अधिकार स्थानीय सरकार के पास” | ग़लत — केंद्र सरकार के पास |
| “हिंदी राष्ट्रभाषा है” | ग़लत — हिंदी राजभाषा है |
| “श्रीलंका संघीय है” | ग़लत — वहाँ “व्यावहारिक रूप से अभी भी एकात्मक” |
| “शिक्षा राज्य सूची में” | ग़लत — समवर्ती सूची में |
| “1992 में पंचायतें बनीं” | पंचायतें पहले भी थीं — 1992 में ताक़त मिली |
| विकेंद्रीकरण में केवल उपलब्धियाँ | दोनों कॉलम चाहिए |
और अंत में यही एक बात★★
“संघीय व्यवस्था की सफलता का मुख्य श्रेय यहाँ की लोकतांत्रिक राजनीति के चरित्र को देना होगा।”
★यानी — “संघवाद सिर्फ़ संविधान में लिखी व्यवस्था नहीं है — वह रोज़ चलाई जाने वाली आदत है।”
अध्याय की आख़िरी सीख
सत्ता ऊपर से नीचे आती है तो देश जुड़ता है। और जब वह सबसे नीचे तक पहुँच जाए, तभी लोकतंत्र पूरा होता है।
और इसकी सबसे आसान परीक्षा — “तुम्हारे सरपंच या पार्षद का नाम क्या है?”