Chapter 3जाति, धर्म और लैंगिक मसले

Revision notes19 min

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परीक्षा से एक रात पहले यही पढ़िए।


1. पूरे अध्याय का ढाँचा — एक तालिका में★★

विभाजनकिताब का फ़ैसलामुख्य वाक्य
लिंग★सकारात्मक — इसे राजनीतिक बनाना ज़रूरी था“जब सामाजिक विभाजन एक राजनीतिक मुद्दा बन जाता है तो वंचित समूहों को लाभ होता है”
धर्म! नकारात्मक — जब धर्म राष्ट्र का आधार बना दिया जाए“यह भारत की बुनियादी अवधारणा के लिए एक चुनौती है, एक खतरा है”
जाति★! दोनोंआवाज़ भी दी, पर “सिर्फ़ जातिगत पहचान पर आधारित राजनीति लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं होती”

★अध्याय की शुरुआत — “सामाजिक विविधता लोकतंत्र के लिए कोई खतरा नहीं होती… कई बार तो यह अभिव्यक्ति लोकतंत्र के लिए लाभकर भी होती है।” ★★और अध्याय की आत्मा — “हर व्यक्ति कई तरह की भूमिका निभाता है। उसकी हैसियत और पहचान अलग-अलग होती है।” यानी — “पहचान एक नहीं होती। और जो किसी को सिर्फ़ एक पहचान में क़ैद कर दे — वही सांप्रदायिकता है, वही जातिवाद है।”

भाग 1 — लैंगिक मसले

2. श्रम का लैंगिक विभाजन★

परिभाषा — “काम के बँटवारे का वह तरीका जिसमें घर के अंदर के सारे काम परिवार की औरतें करती हैं या अपनी देखरेख में घरेलू नौकरों/नौकरानियों से कराती हैं।”

  • “औरतों की मुख्य ज़िम्मेवारी गृहस्थी चलाने और बच्चों का पालन-पोषण करने की है” — यह मान्यता बचपन से बैठा दी जाती है
  • ★“ऐसा नहीं है कि मर्द ये सारे काम नहीं कर सकते… पर जब… इन्हीं सारे कामों के लिए पैसे मिलते हैं तो मर्द ख़ुशी-ख़ुशी यही काम घर के बाहर करते हैं। अधिकांश दर्जी या होटल के रसोइए पुरुष होते हैं।”
  • “अधिकतर महिलाएँ… आमदनी के लिए कुछ न कुछ काम करती हैं लेकिन उनके काम को ज़्यादा मूल्यवान नहीं माना जाता और उन्हें दिन रात काम करके भी उसका श्रेय नहीं मिलता।”
  • नतीजा — “औरत तो घर की चारदीवारी में सिमट के रह गई है और बाहर का सार्वजनिक जीवन पुरुषों के कब्ज़े में आ गया है। मनुष्य जाति की आबादी में औरतों का हिस्सा आधा है पर… राजनीति में उनकी भूमिका नगण्य ही है।”

3. समय का उपयोग सर्वेक्षण(छह राज्य, 1998–99)★

औरत रोज़ाना साढ़े सात घंटे से ज़्यादा; मर्द औसतन साढ़े छह घंटे

गतिविधिपुरुषमहिला
आमदनी वाले काम6:002:40
★घर के काम0:305:00
सोना, साफ़-सफ़ाई, पढ़ना12:2511:10

★निष्कर्ष — “पुरुषों द्वारा किया गया काम ही ज़्यादा दीख पड़ता है क्योंकि उससे आमदनी होती है… इसके लिए उन्हें पैसे नहीं मिलते इसलिए औरतों का काम दिखाई नहीं देता।”

4. असमानता का असली आधार — यह वाक्य याद रखिए★★

“लैंगिक असमानता का आधार स्त्री और पुरुष की जैविक बनावट नहीं बल्कि इन दोनों के बारे में प्रचलित रूढ़ छवियाँ और तयशुदा सामाजिक भूमिकाएँ हैं।” एक वाक्य में — “फ़र्क़ शरीर का नहीं, समाज के बनाए नियमों का है।” ★यही अभ्यास प्रश्न 7 का सीधा उत्तर है।

5. नारीवादी आंदोलन

नारीवादी — “औरत और मर्द के समान अधिकारों और अवसरों में विश्वास करने वाली महिला या पुरुष।” ★(ध्यान दीजिए — “या पुरुष” भी।)

  • पहले “सिर्फ़ पुरुषों को ही सार्वजनिक मामलों में भागीदारी, वोट देने या… चुनाव लड़ने की अनुमति थी”
  • आंदोलनों ने माँगा — वोट का अधिकार · राजनीतिक और वैधानिक दर्जा · शिक्षा और रोज़गार के अवसर; और मूलगामी आंदोलनों ने “व्यक्तिगत और पारिवारिक जीवन में भी बराबरी”
  • नतीजा — “आज हम वैज्ञानिक, डॉक्टर, इंजीनियर, प्रबंधक, कॉलेज और विश्वविद्यालयी शिक्षक जैसे पेशों में बहुत-सी औरतों को पाते हैं”
  • ★सबसे आगे — स्वीडन, नॉर्वे और फिनलैंड जैसे स्कैंडिनेवियाई देश

6. भारत में भेदभाव के पाँच रूप★★

पितृ-प्रधान — “महिलाओं की तुलना में पुरुषों को ज़्यादा महत्व, ज़्यादा शक्ति देने वाली व्यवस्था”

#रूपआँकड़ा/वाक्य
★1साक्षरतामहिलाएँ 54% · पुरुष 76%
2उच्च शिक्षा“कई जगह लड़कियों ने बाजी मार ली है… लेकिन आगे की पढ़ाई के दरवाज़े उनके लिए बंद हो जाते हैं क्योंकि माँ बाप… लड़कों पर ज़्यादा खर्च करना पसंद करते हैं।”
3काम और मज़दूरीस्त्री रोज़ाना एक घंटा ज़्यादा काम करती है; समान मज़दूरी अधिनियम के बावजूद “खेल-कूद से लेकर खेत-खलिहान तक… कम मज़दूरी मिलती है, भले ही दोनों ने समान काम किया हो”
! 4लिंग अनुपात919 (प्रति हज़ार लड़कों पर लड़कियाँ); कई जगह 850, कहीं-कहीं 800 से भी नीचे
! 5हिंसा“शहरी इलाके तो महिलाओं के लिए खास तौर से असुरक्षित हैं। वे अपने घरों में भी सुरक्षित नहीं हैं”

7. महिलाओं का राजनीतिक प्रतिनिधित्व★★

कहाँकितना
लोकसभा14.36% — “पहली बार 2019 में ही”
! विधान सभाएँ5 फ़ीसदी से भी कम
विश्व में“अफ्रीका और लातिन अमरीका के कई विकासशील देशों से भी पीछे”
मंत्रिमंडल“मंत्रिमंडलों में पुरुषों का ही वर्चस्व रहा है”
★स्थानीय निकायएक तिहाई पद आरक्षित; 10 लाख से ज़्यादा निर्वाचित महिलाएँ

संसदों में महिलाएँ (अक्टूबर 2018) — नॉर्डिक देश 42.3 · अमरीका 29.5 · यूरोप 26.4 · ★विश्व औसत 24 · एशिया 19.8 · अरब मुल्क 15.6 · ! भारत 11.8

★★नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023 — “जिससे लोकसभा, विधानसभा और दिल्ली विधानसभा में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटों का आरक्षण दिया जायेगा।” (यह विधेयक कई दशकों से लंबित था।) ! पर अभ्यास प्रश्न 8 का उत्तर “पंचायती राज की संस्थाएँ” ही है — क्योंकि लागू आरक्षण वहीं है।

★इस भाग का निष्कर्ष — “लैंगिक विभाजन इस बात की एक मिसाल है कि कुछ खास किस्म के सामाजिक विभाजनों को राजनीतिक रूप देने की ज़रूरत है।”

भाग 2 — धर्म और सांप्रदायिकता

8. पहले वह जो ग़लत नहीं है★

#बात
★1गांधी जी — “धर्म को कभी भी राजनीति से अलग नहीं किया जा सकता।” ! पर साथ में यह भी — “धर्म से उनका मतलब हिंदू या इस्लाम जैसे धर्म से न होकर नैतिक मूल्यों से था जो सभी धर्मों से जुड़े हैं।”
2मानवाधिकार समूह — “सांप्रदायिक दंगों को रोकने और धार्मिक अल्पसंख्यकों की रक्षा के लिए विशेष कदम”
3महिला-आंदोलन — “सभी धर्मों में वर्णित पारिवारिक कानून महिलाओं से भेदभाव करते हैं”; इन्हें समतामूलक बनाया जाए

पारिवारिक कानून — “विवाह, तलाक, गोद लेना और उत्तराधिकार जैसे परिवार से जुड़े मसलों से संबंधित कानून”; भारत में सभी धर्मों के लिए अलग-अलग। ★★कसौटी — “अगर शासन सभी धर्मों के साथ समान बरताव करता है तो उसके ऐसे कामों में कोई बुराई नहीं है।”

9. सांप्रदायिकता — परिभाषा★★

• “समस्या तब शुरू होती है जब धर्म को राष्ट्र का आधार मान लिया जाता है।” • ”…जब एक धर्म के विचारों को दूसरे से श्रेष्ठ माना जाने लगता है” • ”…जब राज्य अपनी सत्ता का इस्तेमाल किसी एक धर्म के पक्ष में करने लगता है” ★★• “राजनीति में धर्म को इस तरह जोड़ना ही सांप्रदायिकता है।”

सांप्रदायिक सोच की मान्यताएँ

एक धर्म = एक समुदाय · उनके हित एक जैसे · आपसी मतभेद बेमानी · दूसरे धर्म वाले अलग समुदाय · हितों में टकराव ज़रूरी · और अंतत: “एक ही राष्ट्र में समान नागरिक के तौर पर नहीं रह सकते।”

और किताब का खंडन★★

“यह मान्यता बुनियादी रूप से गलत है… हर व्यक्ति कई तरह की भूमिका निभाता है। उसकी हैसियत और पहचान अलग-अलग होती है। हर समुदाय में तरह-तरह के विचार के लोग होते हैं।… एक धर्म से जुड़े सभी लोगों को… एक करके देखना उस समुदाय की विभिन्न आवाज़ों को दबाना है।”

10. सांप्रदायिकता के चार रूप★

सूत्र — “रोज़ · प्रभुत्व · गोलबंदी · हिंसा”

#रूपब्योरा
★1दैनंदिन जीवनधार्मिक पूर्वाग्रह · बनी बनाई धारणाएँ · एक धर्म को श्रेष्ठ मानना; ! “ये चीज़ें इतनी आम हैं कि अक्सर हम उन पर ध्यान तक नहीं देते जबकि ये हमारे अंदर ही बैठी होती हैं”
2राजनीतिक प्रभुत्वबहुसंख्यक में बहुसंख्यकवाद; अल्पसंख्यक में अलग राजनीतिक इकाई बनाने की इच्छा
3सांप्रदायिक गोलबंदीधर्म के पवित्र प्रतीक · धर्मगुरु · भावनात्मक अपील · अपने ही लोगों के मन में डर बैठाना
! 4हिंसा, दंगा, नरसंहार“विभाजन के समय… भयावह सांप्रदायिक दंगे हुए थे। आज़ादी के बाद भी बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक हिंसा हुई है।”

11. धर्मनिरपेक्ष शासन — चार प्रावधान★★

सूत्र — “कोई राजकीय धर्म नहीं · आज़ादी · भेदभाव अवैध · दख़ल का अधिकार”

#प्रावधान
★1“भारतीय राज्य ने किसी भी धर्म को राजकीय धर्म के रूप में अंगीकार नहीं किया है।” — (तुलना: श्रीलंका में बौद्ध धर्म, पाकिस्तान में इस्लाम, इंग्लैंड में ईसाई धर्म)
2“संविधान सभी नागरिकों और समुदायों को किसी भी धर्म का पालन करने और प्रचार करने की आज़ादी देता है।”
3“संविधान धर्म के आधार पर किए जाने वाले किसी तरह के भेदभाव को अवैधानिक घोषित करता है।”
★4“संविधान… शासन को धार्मिक मामलों में दखल देने का अधिकार देता है। जैसे, यह छुआछूत की इजाज़त नहीं देता।”

★★दो बड़ी पंक्तियाँ — “धर्मनिरपेक्षता कुछ पार्टियों या व्यक्तियों की एक विचारधारा भर नहीं है। यह विचार हमारे संविधान की बुनियाद है।” “हमारी तरह का धर्मनिरपेक्ष संविधान ज़रूरी चीज़ है पर अकेले इसी के बूते सांप्रदायिकता का मुकाबला नहीं किया जा सकता।”

12. धार्मिक विविधता के आँकड़े(2011)

हिंदू 79.8 · मुसलमान 14.2 · ईसाई 2.3 · सिख 1.7 · अन्य 2 (बौद्ध 0.7 · जैन 0.4 · अन्य धर्म 0.7 · कोई धर्म नहीं 0.2)

★★अफ़वाह का तथ्य से खंडन — “एक आम लेकिन भ्रांत धारणा यह है कि… मुसलमानों का प्रतिशत इतना बढ़ जाएगा कि दूसरे धार्मिक समुदाय उससे पीछे हो जाएँगे।” पर सच्चर समिति के आकलन से स्पष्ट है कि “अगले पचास सालों में भी यह बढ़कर 3–4 प्रतिशत तक ही रहेगी… विभिन्न धार्मिक समुदायों के अनुपात में कोई बड़ा उलट-फेर नहीं होने वाला।”

भाग 3 — जाति

13. जाति व्यवस्था★

★★“लिंग और धर्म पर आधारित विभाजन तो दुनिया भर में हैं पर जाति पर आधारित विभाजन सिर्फ़ भारतीय समाज में ही देखने को मिलता है।” (= अभ्यास प्रश्न 11)

  • “अधिकतर समाजों में पेशा परिवार की एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में जाता है। लेकिन जाति व्यवस्था इसका एक अतिवादी और स्थायी रूप है।”
  • “इसमें पेशे के वंशानुगत विभाजन को रीति-रिवाजों की मान्यता प्राप्त है”; और “आपस में ही बेटी-रोटी अर्थात शादी और खानपान का संबंध” रहता है
  • वर्ण-व्यवस्था — “जाति समूहों का पदानुक्रम जिसमें एक जाति के लोग हर हाल में सामाजिक पायदान में सबसे ऊपर रहेंगे”; इसमें “‘अंत्यज’ जातियों के साथ छुआछूत का व्यवहार किया जाता था।”
  • ★चार सुधारक — ज्योतिबा फुले · महात्मा गांधी · डॉ. आंबेडकर · पेरियार रामास्वामी नायकर

14. क्या बदला और क्या नहीं★★

★बदला! नहीं बदला
आर्थिक विकास · शहरीकरण · साक्षरता और शिक्षा · पेशा चुनने की आज़ादी · ज़मींदारी का कमज़ोर पड़ना“अभी भी ज़्यादातर लोग अपनी जाति या कबीले में ही शादी करते हैं”
“शहरी इलाकों में… कोई हिसाब नहीं रखा जाता कि ट्रेन या बस में आपके साथ कौन बैठा है”! “स्पष्ट संवैधानिक प्रावधान के बावजूद छुआछूत की प्रथा अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है”
“संविधान में किसी भी तरह के जातिगत भेदभाव का निषेध किया गया है”★“जिन जातियों को पहले शिक्षा से वंचित रखा जाता था उनके सदस्य अभी भी… पिछड़े हुए हैं”
—“जाति और आर्थिक हैसियत में काफ़ी निकट का संबंध है।”

शहरीकरण — “ग्रामीण इलाकों से निकलकर लोगों का शहरों में बसना।”

15. जातिगत असमानता — तीन निष्कर्ष(तालिका नहीं, ये तीन याद रखिए)

  1. औसत आर्थिक हैसियत “अभी भी वर्णव्यवस्था के साथ गहरा संबंध दर्शाती है” — “‘ऊँची’ जाति के लोगों की आर्थिक स्थिति सबसे अच्छी है। दलित तथा आदिवासियों की सबसे खराब, पिछड़ी जातियाँ बीच में।”
  2. “हर जाति में गरीब लोग हैं”, पर भारी दरिद्रता में “ज़्यादा बड़ी संख्या सबसे निचली जातियों के लोगों की”।
  3. “आज सभी जातियों में अमीर लोग हैं पर… ऊँची जाति वालों का अनुपात बहुत ज़्यादा और निचली जातियों का बहुत कम।”

आबादी के आँकड़े — अनुसूचित जातियाँ 16.6% · अनुसूचित जनजातियाँ 8.6% (2011) · अन्य पिछड़ी जातियाँ करीब 41% (NSS 2004-05 का अनुमान)

16. राजनीति में जाति★★

जातिवाद — “सांप्रदायिकता की तरह जातिवाद भी इस मान्यता पर आधारित है कि जाति ही सामाजिक समुदाय के गठन का एकमात्र आधार है।” ★खंडन — “जाति हमारे जीवन का एक पहलू ज़रूर है लेकिन यही एकमात्र या सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण पहलू नहीं है।”

तीन रूप —

  1. उम्मीदवार तय करते समय मतदाताओं की जातियों का हिसाब; सरकार बनाते समय सबको उचित जगह
  2. पार्टियाँ जातिगत भावनाओं को उकसाती हैं
  3. ★सार्वभौम वयस्क मताधिकार और एक व्यक्ति-एक वोट से “उन जातियों के लोगों में नयी चेतना पैदा हुई जिन्हें अभी तक छोटा और नीच माना जाता था।”

17. “चुनाव जातियों का खेल है” — यह सच नहीं★★

#कारण
★1“किसी भी एक संसदीय चुनाव क्षेत्र में किसी एक जाति के लोगों का बहुमत नहीं है” — इसलिए एक से ज़्यादा जातियों का भरोसा चाहिए
2“कोई भी पार्टी किसी एक जाति… के सभी लोगों का वोट हासिल नहीं कर सकती।” वोट बैंक = उस जाति के ज़्यादातर लोग
3एक ही जाति के कई उम्मीदवार हो सकते हैं, और कुछ जातियों का एक भी उम्मीदवार नहीं होता
★★4“सत्तारूढ़ दल, वर्तमान सांसदों और विधायकों को अक्सर हार का सामना करना पड़ता है। अगर जातियों और समुदायों की राजनीतिक पसंद एक ही होती तो ऐसा संभव नहीं हो पाता।”

और — “मतदाता अपनी जातियों से जितना जुड़ाव रखते हैं अक्सर उससे ज़्यादा गहरा जुड़ाव राजनीतिक दलों से रखते हैं”; तथा “सरकार के कामकाज के बारे में लोगों की राय और नेताओं की लोकप्रियता का चुनावों पर अक्सर निर्णायक असर होता है।”

18. जाति के अंदर राजनीति

★“सिर्फ़ राजनीति ही जातिग्रस्त नहीं होती जाति भी राजनीतिग्रस्त हो जाती है।”

  1. हर जाति ख़ुद को बड़ा बनाना चाहती है — पहले बाहर रखी गई उप जातियों को अब साथ लाने की कोशिश
  2. एक जाति अकेले सत्ता नहीं पा सकती, इसलिए दूसरी जातियों से संवाद और मोल-तोल
  3. नई गोलबंदी — ‘अगड़ा’ और ‘पिछड़ा’

19. अंतिम फ़ैसला — दोनों पक्ष★★

★लाभ! हानि
“जातिगत राजनीति ने दलित और पिछड़ी जातियों के लोगों के लिए सत्ता तक पहुँचने तथा निर्णय प्रक्रिया को बेहतर ढंग से प्रभावित करने की स्थिति भी पैदा की है”“सिर्फ़ जातिगत पहचान पर आधारित राजनीति लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं होती”
पार्टियों और संगठनों ने भेदभाव समाप्त करने, सम्मानजनक व्यवहार, ज़मीन-जायदाद और अवसर की माँग को लेकर आंदोलन किए“इससे अक्सर गरीबी, विकास, भ्रष्टाचार जैसे ज़्यादा बड़े मुद्दों से लोगों का ध्यान भी भटकता है”
—“कई बार जातिवाद तनाव, टकराव और हिंसा को भी बढ़ावा देता है”

20. अनिवार्य आँकड़े — एक ही जगह

आँकड़ाकिसका
54% / 76%महिला / पुरुष साक्षरता
★919लिंग अनुपात (कहीं 850, कहीं 800 से नीचे)
7:30 / 6:30 · 5:00 / 0:30कुल काम / घर के काम — महिला बनाम पुरुष
14.36% (2019)लोकसभा में महिलाएँ
5% से कमविधान सभाओं में महिलाएँ
11.8 / 24 / 42.3भारत / विश्व औसत / नॉर्डिक देश
★एक तिहाई · 10 लाखस्थानीय निकायों में आरक्षण / निर्वाचित महिलाएँ
★★2023 · 33%नारी शक्ति वंदन अधिनियम
79.8 · 14.2 · 2.3 · 1.7हिंदू · मुसलमान · ईसाई · सिख
16.6 · 8.6 · ~41अ.जा. · अ.ज.जा. · अन्य पिछड़ी जातियाँ
3–4 प्रतिशतसच्चर समिति — अगले पचास साल में मुस्लिम आबादी में संभावित वृद्धि

21. परीक्षा में जहाँ बच्चे मार खाते हैंध्यान

ग़लतीसही बात
लैंगिक विभाजन = जैविक अंतरग़लत — “रूढ़ छवियाँ और तयशुदा सामाजिक भूमिकाएँ” (प्रश्न 7)
आरक्षण = लोकसभाअभ्यास का उत्तर पंचायती राज की संस्थाएँ (प्रश्न 8)
गांधी जी वाला वाक्य आधा याद रखनासाथ में यह भी — “धर्म से उनका मतलब… नैतिक मूल्यों से था”
“धर्म की बात करना ही सांप्रदायिकता है”ग़लत — कसौटी है “सभी धर्मों के साथ समान बरताव”
सांप्रदायिकता = सिर्फ़ दंगाइसका सबसे आम रूप दैनंदिन जीवन में है
“संविधान एक धर्म को राजकीय धर्म बताता है”ग़लत — यही प्रश्न 10 का उत्तर है
जाति-राजनीति में केवल एक पक्षदोनों पक्ष अनिवार्य
“चुनाव तो जाति से ही होते हैं”चार कारण याद रखिए — ख़ासकर “मौजूदा सांसद-विधायक हारते हैं”

अंतिम पंक्ति — यही मत भूलिए

★★“हर व्यक्ति कई तरह की भूमिका निभाता है। उसकी हैसियत और पहचान अलग-अलग होती है।”

यही एक वाक्य सांप्रदायिकता और जातिवाद — दोनों का उत्तर है: “पहचान एक नहीं होती। और जो किसी को सिर्फ़ एक पहचान में क़ैद कर दे — वही सांप्रदायिकता है, वही जातिवाद है।”