यह प्रश्न रटने से हल नहीं होते — इनमें बच्चे को पहचानना, आँकड़ा पढ़ना, तर्क देना और संतुलित राय बनाना पड़ता है। NCF-2023 और PARAKH के प्रारूप पर आधारित।
! शिक्षक के लिए — इनमें से कोई भी प्रश्न कक्षा में कराते समय किसी बच्चे से उसके अपने घर, जाति या धर्म के बारे में मत पूछिए। सारे केस काल्पनिक हैं और उन्हें काल्पनिक ही रहने दीजिए।
भाग क — केस-आधारित प्रश्न
केस 1 — दो भाई-बहन
एक ही घर में रीना और राजू हैं। दोनों ने दसवीं में लगभग बराबर अंक पाए हैं — रीना के थोड़े ज़्यादा। पर आगे की पढ़ाई के लिए घर में तय हुआ कि राजू शहर जाकर पढ़ेगा और रीना पास के स्कूल में ही रहेगी, क्योंकि “पैसा दोनों पर बराबर नहीं लग सकता।” रीना स्कूल के बाद घर के काम भी करती है; राजू नहीं करता।
1यह स्थिति किताब की किस बात से मेल खाती है? 2 अंक
उत्तर देखिए
किताब की दो बातों से —
“कई जगह लड़कियों ने बाजी मार ली है… लेकिन आगे की पढ़ाई के दरवाज़े उनके लिए बंद हो जाते हैं क्योंकि माँ बाप अपने संसाधनों को लड़के-लड़की दोनों पर बराबर खर्च करने की जगह लड़कों पर ज़्यादा खर्च करना पसंद करते हैं।”
श्रम का लैंगिक विभाजन — “घर के अंदर के सारे काम परिवार की औरतें करती हैं।”
2क्या यह भेदभाव जैविक है? कारण सहित उत्तर दीजिए। 2 अंक
उत्तर देखिए
नहीं। किताब साफ़ कहती है — “लैंगिक असमानता का आधार स्त्री और पुरुष की जैविक बनावट नहीं बल्कि इन दोनों के बारे में प्रचलित रूढ़ छवियाँ और तयशुदा सामाजिक भूमिकाएँ हैं।”
रीना ने अंक ज़्यादा पाए हैं — यानी क्षमता का सवाल ही नहीं है। फ़ैसला क्षमता से नहीं, बनी-बनाई भूमिका से हुआ है।
3★बीस साल बाद रीना और राजू की स्थिति में क्या फ़र्क़ होने की संभावना है, और क्यों? 3 अंक
उत्तर देखिए
शिक्षा — राजू की उच्च शिक्षा होगी, रीना की नहीं; किताब कहती है कि “स्कूल पास करने वाली लड़कियों की एक सीमित संख्या ही उच्च शिक्षा की ओर कदम बढ़ा पाती है।”
काम और कमाई — रीना संभवत: “अपने घरेलू काम के अतिरिक्त अपनी आमदनी के लिए कुछ न कुछ काम” करेगी, “लेकिन उनके काम को ज़्यादा मूल्यवान नहीं माना जाता।”
ऊँचे पद — “इस स्थिति के चलते अब भी ऊँची तनख्वाह वाले और ऊँचे पदों पर पहुँचने वाली महिलाओं की संख्या बहुत ही कम है।”
निष्कर्ष ★“आज का एक फ़ैसला बीस साल की दूरी बना देता है — और यह दूरी योग्यता की नहीं, अवसर की है।”
केस 2 — तालिका पढ़िए
एक गाँव में किए गए समय के उपयोग के सर्वेक्षण के आँकड़े (घंटे : मिनट) —
| गतिविधि | पुरुष | महिला |
|---|---|---|
| आमदनी वाले काम | 6:00 | 2:40 |
| घर के काम | 0:30 | 5:00 |
| फ़ुरसत और गपशप | 5:05 | 5:10 |
| सोना और शरीर की देखभाल | 12:25 | 11:10 |
1दोनों का कुल काम (आमदनी वाला + घर का) कितना है? 2 अंक
उत्तर देखिए
पुरुष — 6:00 + 0:30 = 6 घंटे 30 मिनट
महिला — 2:40 + 5:00 = 7 घंटे 40 मिनट
★यानी महिला लगभग एक घंटा ज़्यादा काम करती है — ठीक वही जो किताब कहती है: “भारत में औसतन एक स्त्री एक पुरुष की तुलना में रोजाना एक घंटा ज़्यादा काम करती है।”
2फिर भी कहा जाता है कि “वह तो काम नहीं करती।” — ऐसा क्यों? 2 अंक
उत्तर देखिए
क्योंकि “पुरुषों द्वारा किया गया काम ही ज़्यादा दीख पड़ता है क्योंकि उससे आमदनी होती है… औरतों का ज़्यादातर काम घर की चारदीवारी के अंदर होता है। इसके लिए उन्हें पैसे नहीं मिलते इसलिए औरतों का काम दिखाई नहीं देता।”
★किताब की बच्ची का सवाल भी यही है — “अगर वह जो करती है उसे काम नहीं कहते तो फिर काम किसे कहते हैं?”
3★इस तालिका में कौन-सा एक आँकड़ा बदल दिया जाए तो सबसे बड़ा फ़र्क़ पड़ेगा? कारण सहित। 3 अंक
उत्तर देखिए
“घर के काम” वाली पंक्ति — 0:30 बनाम 5:00।
कारण — (1) यही सबसे बड़ा असंतुलन है — साढ़े चार घंटे का अंतर; (2) अगर घर का काम बराबर बँट जाए तो महिला के पास आमदनी वाले काम, पढ़ाई या आराम के लिए समय बचेगा; और (3) तब उसका काम दिखाई भी देने लगेगा, क्योंकि उसका कुछ हिस्सा घर के बाहर होगा।
★और किताब पहले ही बता चुकी है कि यह असंभव नहीं है — “ऐसा नहीं है कि मर्द ये सारे काम नहीं कर सकते… अधिकांश दर्जी या होटल के रसोइए पुरुष होते हैं।”
केस 3 — चार बातें, कौन-सी सांप्रदायिक?
(अ) एक नेता कहता है — “राजनीति में ईमानदारी और सेवा जैसे मूल्य होने चाहिए, जो हर धर्म सिखाता है।” (ब) एक संगठन माँग करता है कि “दंगों को रोकने और अल्पसंख्यकों की रक्षा के लिए सरकार विशेष कदम उठाए।” (स) एक भाषण में कहा जाता है — “हमारा धर्म बाक़ी सबसे ऊँचा है, इसलिए देश पर हमारा पहला हक़ है।” (द) चुनाव प्रचार में धर्मगुरुओं की अपील और “तुम ख़तरे में हो” जैसी बातें कही जाती हैं।
1हर बात को छाँटिए — सांप्रदायिक या नहीं — और कारण दीजिए। 4 अंक
| बात | फ़ैसला | कारण |
|---|---|---|
| (अ) | ||
| (ब) | ||
| ! (स) | ||
| ! (द) |
उत्तर देखिए
| बात | फ़ैसला | कारण |
|---|---|---|
| (अ) | सांप्रदायिक नहीं | यह गांधी जी वाली बात है — “धर्म से उनका मतलब… नैतिक मूल्यों से था जो सभी धर्मों से जुड़े हैं” |
| (ब) | सांप्रदायिक नहीं | यह मानवाधिकार समूहों की जायज़ माँग है — “सांप्रदायिक दंगों को रोकने और धार्मिक अल्पसंख्यकों की रक्षा” |
| ! (स) | सांप्रदायिक | “जब एक धर्म के विचारों को दूसरे से श्रेष्ठ माना जाने लगता है” और धर्म को राष्ट्र का आधार मान लिया जाता है |
| ! (द) | सांप्रदायिक (गोलबंदी वाला रूप) | “धर्मगुरुओं, भावनात्मक अपील और अपने ही लोगों के मन में डर बैठाने जैसे तरीकों का उपयोग” |
2★(अ)/(ब) और (स)/(द) में मूल फ़र्क़ एक वाक्य में बताइए। 3 अंक
उत्तर देखिए
फ़र्क़ यह है कि धर्म की बात हो रही है या धर्म को दूसरों के ख़िलाफ़ खड़ा किया जा रहा है।
किताब की कसौटी — “लोगों को अपने धार्मिक समुदाय के तौर पर अपनी ज़रूरतों, हितों और माँगों को राजनीति में उठाने का अधिकार होना चाहिए… ★अगर शासन सभी धर्मों के साथ समान बरताव करता है तो उसके ऐसे कामों में कोई बुराई नहीं है।”
★यानी — कसौटी चुप्पी नहीं, समान बरताव है।
केस 4 — एक चुनाव क्षेत्र
किसी चुनाव क्षेत्र में कुल मतदाता 3 लाख हैं। सबसे बड़े समुदाय के मतदाता 90 हज़ार हैं, बाक़ी कई अलग-अलग समूहों में बँटे हैं। वहाँ तीन पार्टियों ने उसी सबसे बड़े समुदाय के उम्मीदवार खड़े किए हैं। और पिछली बार का जीता हुआ विधायक इस बार हार गया।
1क्या इस क्षेत्र में कोई उम्मीदवार सिर्फ़ अपने समुदाय के वोट से जीत सकता है? 2 अंक
उत्तर देखिए
नहीं। 3 लाख में से सबसे बड़े समुदाय के केवल 90 हज़ार मतदाता हैं — यानी बहुमत नहीं। किताब कहती है — “देश के किसी भी एक संसदीय चुनाव क्षेत्र में किसी एक जाति के लोगों का बहुमत नहीं है इसलिए हर पार्टी और उम्मीदवार को चुनाव जीतने के लिए एक जाति और एक समुदाय से ज़्यादा लोगों का भरोसा हासिल करना पड़ता है।”
2तीनों पार्टियों ने एक ही समुदाय के उम्मीदवार खड़े किए — इससे क्या सिद्ध होता है? 2 अंक
उत्तर देखिए
यह किताब की तीसरी बात है — “अगर किसी चुनाव क्षेत्र में एक जाति के लोगों का प्रभुत्व माना जा रहा हो तो अनेक पार्टियों को उसी जाति का उम्मीदवार खड़ा करने से कोई रोक नहीं सकता।”
★नतीजा — उस समुदाय के मतदाताओं के सामने अपनी ही जाति के कई उम्मीदवार हैं, इसलिए उनका वोट बँट जाएगा — और तब जीत जाति से नहीं, किसी और कारण से तय होगी।
3★★पिछला विधायक हार गया — यह तथ्य सबसे बड़ी बात क्यों है? 3 अंक
उत्तर देखिए
क्योंकि यह किताब का सबसे मज़बूत तर्क है — “हमारे देश में सत्तारूढ़ दल, वर्तमान सांसदों और विधायकों को अक्सर हार का सामना करना पड़ता है। अगर जातियों और समुदायों की राजनीतिक पसंद एक ही होती तो ऐसा संभव नहीं हो पाता।”
यानी अगर वोट सिर्फ़ जाति से पड़ते तो समुदाय की संख्या बदलती नहीं, इसलिए नतीजा भी कभी नहीं बदलता — पर नतीजे बदलते हैं।
★किताब का निष्कर्ष — “चुनाव में जाति की भूमिका महत्वपूर्ण होती है किंतु दूसरे कारक भी इतने ही असरदार होते हैं”, और “सरकार के कामकाज के बारे में लोगों की राय और नेताओं की लोकप्रियता का चुनावों पर अक्सर निर्णायक असर होता है।”
केस 5 — क़ानून बना, पर…
एक देश में महिलाओं के लिए विधायिका में आरक्षण का क़ानून बन गया। पर क़ानून में शर्त थी कि यह तभी लागू होगा जब जनगणना और सीटों का पुनर्निर्धारण पूरा हो जाए। दस साल बाद भी वह प्रक्रिया पूरी नहीं हुई है।
1यह स्थिति किताब की किस बात से मेल खाती है? 2 अंक
उत्तर देखिए
किताब बताती है कि यह माँग “संसद में… एक विधेयक पेश भी किया गया था, पर कई दशकों से वह लंबित था” — यानी क़ानून बनने में ही दशकों लगे। और बनने के बाद भी लागू होना एक अलग सवाल है।
★यह ठीक वही बात है जो अर्थशास्त्र के अध्याय 5 में थी — “अधिकार क़ानून की किताब में लिखा होना काफ़ी नहीं है।”
2★इस बीच महिलाओं को प्रतिनिधित्व कहाँ मिल रहा है, और उससे क्या सबक़ मिलता है? 3 अंक
उत्तर देखिए
स्थानीय शासन में। भारत में “स्थानीय सरकारों यानी पंचायतों और नगरपालिकाओं में एक तिहाई पद महिलाओं के लिए आरक्षित कर दिए गए हैं”, और “आज भारत के ग्रामीण और शहरी स्थानीय निकायों में निर्वाचित महिलाओं की संख्या 10 लाख से ज़्यादा है।”
सबक़ जहाँ आरक्षण लागू हुआ वहाँ प्रतिनिधित्व एक तिहाई है; जहाँ नहीं हुआ वहाँ लोकसभा में 14.36% और विधान सभाओं में 5% से भी कम।
निष्कर्ष ★“अंतर महिलाओं की क्षमता का नहीं, व्यवस्था का है।” — और यही किताब कहती है: “जब सामाजिक विभाजन एक राजनीतिक मुद्दा बन जाता है तो वंचित समूहों को किस तरह लाभ होता है।”
भाग ख — तर्क और मूल्यांकन
1“अब तो सब बराबर हो गया है, भेदभाव ख़त्म हो चुका है।” — क्या आप सहमत हैं? 3 अंक
उत्तर देखिए
आंशिक रूप से। किताब मानती है कि “आज़ादी के बाद से महिलाओं की स्थिति में कुछ सुधार हुआ है” और जाति के मामले में भी “आधुनिक भारत में… भारी बदलाव आया है।”
! पर बराबरी नहीं आई — प्रमाण:
साक्षरता 54% बनाम 76%;
लिंग अनुपात 919, कहीं-कहीं 800 से भी नीचे;
विधान सभाओं में महिलाएँ 5 फ़ीसदी से भी कम;
“स्पष्ट संवैधानिक प्रावधान के बावजूद छुआछूत की प्रथा अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है”;
“जाति और आर्थिक हैसियत में काफ़ी निकट का संबंध है।”
सही निष्कर्ष ★“बदलाव आया है, बराबरी नहीं आई। और आँकड़े राय से ज़्यादा भरोसेमंद होते हैं।”
2“धर्म की बात राजनीति में आनी ही नहीं चाहिए।” — इस कथन की जाँच कीजिए। 3 अंक
उत्तर देखिए
यह कथन किताब के अनुसार पूरी तरह सही नहीं है।
क्यों नहीं किताब तीन ऐसी बातें गिनाती है जो धर्म और राजनीति से जुड़ी हैं पर “बहुत गलत या खतरनाक भी नहीं लगतीं” — गांधी जी का नैतिक मूल्यों वाला विचार, मानवाधिकार समूहों की अल्पसंख्यकों की रक्षा की माँग, और महिला-आंदोलन की पारिवारिक कानूनों को समतामूलक बनाने की माँग। साथ ही “लोगों को अपने धार्मिक समुदाय के तौर पर अपनी ज़रूरतों, हितों और माँगों को राजनीति में उठाने का अधिकार होना चाहिए।”
! पर सीमा भी साफ़ है — समस्या तब है “जब धर्म को राष्ट्र का आधार मान लिया जाता है”, जब “एक धर्म के विचारों को दूसरे से श्रेष्ठ माना जाने लगता है”, और जब “राज्य अपनी सत्ता का इस्तेमाल किसी एक धर्म के पक्ष में करने लगता है।”
★इसलिए सही कथन यह है — “कसौटी चुप्पी नहीं है; कसौटी यह है कि सभी धर्मों के साथ समान बरताव हुआ या नहीं।”
3“जाति की राजनीति लोकतंत्र के लिए अच्छी है।” — पक्ष और विपक्ष में दो-दो तर्क दीजिए और निष्कर्ष लिखिए। 4 अंक
उत्तर देखिए
पक्ष में
★“जातिगत राजनीति ने दलित और पिछड़ी जातियों के लोगों के लिए सत्ता तक पहुँचने तथा निर्णय प्रक्रिया को बेहतर ढंग से प्रभावित करने की स्थिति भी पैदा की है।”
सार्वभौम वयस्क मताधिकार ने “उन जातियों के लोगों में नयी चेतना पैदा” की “जिन्हें अभी तक छोटा और नीच माना जाता था”; और कई संगठनों ने भेदभाव समाप्त करने, सम्मानजनक व्यवहार तथा ज़मीन-जायदाद और अवसर की माँग को लेकर आंदोलन किए।
विपक्ष में
“सिर्फ़ जातिगत पहचान पर आधारित राजनीति लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं होती। इससे अक्सर गरीबी, विकास, भ्रष्टाचार जैसे ज़्यादा बड़े मुद्दों से लोगों का ध्यान भी भटकता है।”
“कई बार जातिवाद तनाव, टकराव और हिंसा को भी बढ़ावा देता है।”
निष्कर्ष ★★ समस्या जाति की चर्चा में नहीं, बल्कि जाति को “एकमात्र आधार” मान लेने में है — ठीक वैसे ही जैसे धर्म के मामले में। किताब का वाक्य — “जाति हमारे जीवन का एक पहलू ज़रूर है लेकिन यही एकमात्र या सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण पहलू नहीं है।”
4★★“सांप्रदायिकता और जातिवाद — दोनों में क्या साझा है?” 3 अंक
उत्तर देखिए
दोनों एक ही ग़लती के दो नाम हैं।
सांप्रदायिकता मानती है कि “धर्म ही सामाजिक समुदाय का निर्माण करता है”;
जातिवाद मानती है कि “जाति ही सामाजिक समुदाय के गठन का एकमात्र आधार है”;
और दोनों का खंडन भी किताब एक ही तरह करती है — सांप्रदायिकता के लिए: “हर व्यक्ति कई तरह की भूमिका निभाता है। उसकी हैसियत और पहचान अलग-अलग होती है।”; और जातिवाद के लिए: “जाति हमारे जीवन का एक पहलू ज़रूर है लेकिन यही एकमात्र… पहलू नहीं है।”
एक वाक्य में ★★“दोनों किसी इंसान को उसकी सिर्फ़ एक पहचान में क़ैद कर देते हैं — और वही ग़लत है।”
भाग ग — आँकड़ा पढ़ना
1नीचे दिए आँकड़े देखिए और प्रश्नों के उत्तर दीजिए 3 अंक
उत्तर देखिए
| कहाँ | महिलाओं का प्रतिशत |
|---|---|
| नॉर्डिक देश | 42.3 |
| विश्व औसत | 24 |
| एशिया | 19.8 |
| भारत | 11.8 |
(अ) भारत विश्व औसत से कितना पीछे है?
24 − 11.8 = 12.2 प्रतिशत अंक — यानी भारत का प्रतिशत विश्व औसत का लगभग आधा है।
(ब) भारत और नॉर्डिक देशों में कितना अंतर है?
42.3 − 11.8 = 30.5 प्रतिशत अंक — नॉर्डिक देशों का आँकड़ा भारत से लगभग साढ़े तीन गुना है।
(स) ★इस अंतर का कारण किताब क्या बताती है?
किताब कहती है कि स्वीडन, नॉर्वे और फिनलैंड जैसे स्कैंडिनेवियाई देशों में “सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की भागीदारी का स्तर काफ़ी ऊँचा है”, और वहाँ महिला आंदोलनों ने “औरतों के व्यक्तिगत और पारिवारिक जीवन में भी बराबरी की माँग” उठाई थी। ★यानी अंतर प्रकृति का नहीं, इतिहास और नीति का है।
2गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों के आँकड़े (ग्रामीण) — अनुसूचित जनजातियाँ 45.8 · अनुसूचित जातियाँ 35.9 · अन्य पिछड़ी जातियाँ 27.0 · हिंदू अगड़ी जातियाँ 11.7 · सभी समूह 27.0
इनसे तीन निष्कर्ष निकालिए। 3 अंक
उत्तर देखिए
★औसत आर्थिक हैसियत “अभी भी वर्णव्यवस्था के साथ गहरा संबंध दर्शाती है” — सबसे ऊपर वाले समूह में गरीबी 11.7%, सबसे नीचे वाले में 45.8% — यानी लगभग चार गुना।
“हर जाति में गरीब लोग हैं” — अगड़ी जातियों में भी 11.7% लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं।
पर “भारी दरिद्रता में… जीवन बसर करने वालों में ज़्यादा बड़ी संख्या सबसे निचली जातियों के लोगों की है।”
सार ★“जाति अब भी आर्थिक हैसियत तय करती है, पर अब वह अकेली नहीं करती।”
3★इस अध्याय के अधिकांश आँकड़े 2011 या उससे पुराने हैं। इससे क्या समस्या हो सकती है? 2 अंक
उत्तर देखिए
कि नीतियाँ पुराने आँकड़ों पर बनेंगी और हो सकता है कि आज की सच्चाई कुछ और हो — कोई समस्या घट गई हो या और बढ़ गई हो।
★इसीलिए हर आँकड़े के साथ यह पूछना चाहिए — “यह किसका है, किस साल का है, और किसने बनाया है?” (यही आदत अर्थशास्त्र में भी सिखाई गई थी।)
भाग घ — पहचान और वर्गीकरण
1नीचे दिए व्यक्तियों को सही नाम दीजिए 4 अंक
उत्तर देखिए
| कौन | नाम |
|---|---|
| अधिकारों और अवसरों में स्त्री-पुरुष की बराबरी मानने वाला | नारीवादी |
| धर्म को समुदाय का मुख्य आधार मानने वाला | सांप्रदायिक |
| जाति को समुदाय का मुख्य आधार मानने वाला | जातिवादी |
| धार्मिक आस्था के आधार पर भेदभाव न करने वाला | धर्मनिरपेक्ष |
2नीचे की बातों को सांप्रदायिकता के सही रूप में रखिए 3 अंक
| बात | कौन-सा रूप |
|---|---|
| किसी समुदाय के बारे में बनी-बनाई धारणा रखना | |
| बहुसंख्यक होने के नाते शासन पर पहला हक़ मानना | |
| चुनाव में धर्मगुरुओं की अपील का इस्तेमाल | |
| दंगे और हिंसा |
उत्तर देखिए
| बात | कौन-सा रूप |
|---|---|
| किसी समुदाय के बारे में बनी-बनाई धारणा रखना | दैनंदिन जीवन |
| बहुसंख्यक होने के नाते शासन पर पहला हक़ मानना | राजनीतिक प्रभुत्व (बहुसंख्यकवाद) |
| चुनाव में धर्मगुरुओं की अपील का इस्तेमाल | सांप्रदायिक गोलबंदी |
| दंगे और हिंसा | सबसे गंदा रूप |
★सूत्र — “रोज़ · प्रभुत्व · गोलबंदी · हिंसा”
3★इन चारों में से सबसे आम कौन-सा है और किताब उसके बारे में क्या चेतावनी देती है? 2 अंक
उत्तर देखिए
सबसे आम है दैनंदिन जीवन वाला रूप। किताब कहती है — “सांप्रदायिकता की सबसे आम अभिव्यक्ति दैनंदिन जीवन में ही दिखती है… ! ये चीज़ें इतनी आम हैं कि अक्सर हम उन पर ध्यान तक नहीं देते जबकि ये हमारे अंदर ही बैठी होती हैं।”
भाग ङ — परियोजना और गतिविधि
1★★“समय का उपयोग” सर्वेक्षण (किताब की अपनी, पृष्ठ 32 — अनिवार्य)
अपने परिवार के सभी वयस्कों के काम पर एक हफ़्ते नज़र रखिए और चार श्रेणियों में बाँटिए — आमदनी वाले काम · घरेलू काम · पढ़ना-मनोरंजन-गपशप · शरीर की देखभाल और सोना। हफ़्ते भर का हिसाब सात से भाग देकर रोज़ का औसत निकालिए।
! नियम — किसी का नाम मत लिखिए; सिर्फ़ “एक पुरुष” और “एक महिला”।
★और अंत में किताब का सवाल लिखिए — “क्या आपके परिवार में भी महिलाएँ पुरुषों से ज़्यादा काम करती हैं?”
2★“मेरी दस पहचानें”
हर विद्यार्थी अपनी दस पहचानें लिखे (जैसे — विद्यार्थी, भाई/बहन, दोस्त, क्रिकेट खेलने वाला, राजस्थानी, भारतीय…)। फिर नीचे एक पंक्ति लिखे — “अगर इनमें से सिर्फ़ एक ही रह जाए तो क्या मैं पूरा रहूँगा?”
★यह अध्याय की सबसे गहरी और सबसे सुरक्षित गतिविधि है — इसमें कोई विवाद नहीं होता और मूल बात सीधे उतर जाती है।
3नक्शा-कार्य
पृष्ठ 33 के नक्शे से — अपने राज्य का बाल लिंग-अनुपात पता कीजिए; तीन राज्य 900 से कम और तीन 951 से अधिक छाँटिए; और लिखिए कि क्या कोई भौगोलिक पैटर्न दिखता है।
4★पोस्टर — “आदर्श स्त्री” का जवाब
किताब के पृष्ठ 31 के पोस्टर को देखकर अपना पोस्टर बनाइए — “मेरी नज़र में आदर्श स्त्री।” ★लड़कों से भी ज़रूर बनवाइए।
5ग्राफ़ बनाना
पृष्ठ 34 के आँकड़ों से बार चार्ट बनाइए और नीचे एक पंक्ति में निष्कर्ष लिखिए।
6★स्थानीय महिला प्रतिनिधि से बातचीत
अगर आपके गाँव या वार्ड में कोई महिला सरपंच, पंच या पार्षद हैं, तो पाँच सवाल पूछिए — (1) आपको यह पद कैसे मिला? (2) क्या फ़ैसले आप ख़ुद लेती हैं? (3) सबसे बड़ी अड़चन क्या है? (4) क्या आरक्षण से फ़र्क़ पड़ा? (5) आगे क्या करना चाहती हैं?
★यह अध्याय 2 के आरक्षण वाले हिस्से से भी जुड़ जाता है।
मूल्यांकन रूब्रिक (शिक्षक के लिए)
| स्तर | पहचान |
|---|---|
| उत्कृष्ट | सही पहचान करता है, किताब से उद्धरण देता है, आँकड़ा जोड़ता है, और दोनों पक्ष रखकर अपना संतुलित निष्कर्ष लिखता है |
| अच्छा | पहचान और उदाहरण सही हैं, पर आँकड़ा या दूसरा पक्ष छूट जाता है |
| सुधार चाहिए | परिभाषाएँ रट ली हैं, पर नई स्थिति में लागू नहीं कर पाता |
| ! बहुत कमज़ोर | मान लेता है कि “चुनाव तो जाति से ही होते हैं” या “धर्म की बात करना ही सांप्रदायिकता है” — ये दोनों इस अध्याय की सबसे बड़ी चूकें हैं |
★★और सबसे असली मूल्यांकन कोई प्रश्नपत्र नहीं है — अध्याय के कुछ हफ़्ते बाद जब कक्षा में कोई बच्चा किसी को उसकी एक ही पहचान से पूरा बता दे, और कोई दूसरा बच्चा रुककर पूछे — “और बाक़ी?” उस दिन यह अध्याय सफल हुआ।