कक्षा XI • इतिहास • विषय 5 — बदलती हुई सांस्कृतिक परंपराएँ
कक्षा — 11 · विषय — इतिहास (विश्व इतिहास के कुछ विषय)
‘पुनर्जागरण’ यानी पुनर्जन्म — पर किसका पुनर्जन्म, और यह नाम किसने दिया?
1 | नयी संस्कृति, नया इतिहास | नगर, स्रोत और इतिहासकार
एक नयी ‘नगरीय-संस्कृति’
चौदहवीं से सत्रहवीं शताब्दी के अंत तक
- यूरोप के अनेक देशों में नगरों की संख्या बढ़ रही थी
- नगर के लोग सोचने लगे कि वे गाँव के लोगों से अधिक ‘सभ्य’ हैं
- फ़्लोरेंस, वेनिस और रोम — कला और विद्या के केंद्र बन गए
- नगरों को राजाओं और चर्च से थोड़ी बहुत स्वायत्तता मिली थी
- अमीर और अभिजात वर्ग के लोग कलाकारों और लेखकों के आश्रयदाता थे
इसी समय मुद्रण के आविष्कार से दूर-दराज़ के लोगों को भी छपी पुस्तकें उपलब्ध होने लगीं
पुरानी धारणाएँ टूटने लगीं
- यूरोप में इतिहास की समझ विकसित होने लगी
- लोग अपने ‘आधुनिक विश्व’ की तुलना यूनान व रोम की ‘प्राचीन दुनिया’ से करने लगे
- अब यह माना जाने लगा कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी इच्छानुसार अपना धर्म चुन सकता है
- चर्च के पृथ्वी के केंद्र संबंधी विश्वासों को वैज्ञानिकों ने गलत सिद्ध कर दिया
- नवीन भौगोलिक ज्ञान ने यह विचार भी उलट दिया कि भूमध्यसागर विश्व का केंद्र है
इस विचार के पीछे यह मान्यता रही थी कि यूरोप विश्व का केंद्र है
दो इतिहासकार, दो दृष्टियाँ
लियोपोल्ड वॉन रांके (1795–1886)
- जर्मन इतिहासकार, बर्कहार्ट के गुरु
- इतिहासकार का पहला उद्देश्य —
- राज्यों और राजनीति के बारे में लिखना
- स्रोत: सरकारी कागज़ात और फाइलें
जैकब बर्कहार्ट (1818–97)
- स्विट्ज़रलैंड का ब्रेसले विश्वविद्यालय
- गुरु के सीमित लक्ष्यों से असंतुष्ट
- “इतिहास-लेखन में राजनीति ही सब कुछ नहीं”
- “इतिहास का सरोकार उतना ही संस्कृति से है”
बर्कहार्ट की 1860 की पुस्तक
‘दि सिविलाईज़ेशन ऑफ़ दि रेनेसाँ इन इटली’ — इसमें उन्होंने बताया कि चौदहवीं से सत्रहवीं शताब्दी तक इटली के नगरों में एक ‘मानवतावादी’ संस्कृति पनप रही थी, जो इस विश्वास पर आधारित थी कि व्यक्ति अपने बारे में खुद निर्णय लेने और अपनी दक्षता को आगे बढ़ाने में समर्थ है।
ऐसा व्यक्ति ‘आधुनिक’ था — जबकि ‘मध्यकालीन मानव’ पर चर्च का नियंत्रण था
स्रोतों का खज़ाना
- चौदहवीं शताब्दी से यूरोपीय इतिहास की बहुत अधिक सामग्री मिलती है
- दस्तावेज़, मुद्रित पुस्तकें, चित्र, मूर्तियाँ
- भवन तथा वस्त्र
- ये सब यूरोप और अमरीका के अभिलेखागारों में सुरक्षित हैं
- साथ ही कला-चित्रशालाओं और संग्रहालयों में
‘रेनेसाँ’ शब्द उन्नीसवीं शताब्दी के इतिहासकारों का दिया हुआ है — शाब्दिक अर्थ पुनर्जन्म
2 | इटली के नगर | कमज़ोरी जो ताकत बन गई
एक बँटा हुआ देश
पश्चिम रोम साम्राज्य के पतन के बाद
- इटली के राजनैतिक और सांस्कृतिक केन्द्रों का विनाश हो गया
- कोई भी एकीकृत सरकार नहीं थी
- रोम का पोप अपने राज्य में सार्वभौम था, पर यूरोपीय राजनीति में इतना मज़बूत नहीं
- पश्चिमी यूरोप का एकीकरण लातिनी चर्च के नेतृत्व में हो रहा था
- पूर्वी यूरोप बाइज़ेंटाइन साम्राज्य में बदल रहा था; पश्चिम में इस्लाम एक साझी सभ्यता बना रहा था
इटली एक कमज़ोर देश था और अनेक टुकड़ों में बँटा हुआ था — परंतु इन्हीं परिवर्तनों ने उसके पुनरुत्थान में सहायता दी
व्यापार लौटा, नगर जागे
- बाइज़ेंटाइन साम्राज्य और इस्लामी देशों के बीच व्यापार बढ़ा
- इससे इटली के तटवर्ती बंदरगाह पुनर्जीवित हो गए
- बारहवीं शताब्दी से मंगोलों ने चीन के साथ ‘रेशम-मार्ग’ से व्यापार आरंभ किया
- इससे पश्चिमी यूरोपीय देशों के व्यापार को बढ़ावा मिला
- इसमें इटली के नगरों ने मुख्य भूमिका निभाई
अब वे स्वयं को साम्राज्य का अंग नहीं, स्वतंत्र नगर-राज्यों का एक समूह मानते थे
नागरिकता की भावना
फ़्लोरेंस और वेनिस — गणराज्य
- कई अन्य दरबारी-नगर थे जिनका शासन राजकुमार चलाते थे
- सर्वाधिक जीवंत शहरों में पहला वेनिस और दूसरा जिनेवा
- ये यूरोप के अन्य क्षेत्रों से इस दृष्टि में अलग थे —
- कि यहाँ धर्माधिकारी और सामंत वर्ग राजनैतिक दृष्टि से शक्तिशाली नहीं थे
- नगर के धनी व्यापारी और महाजन शासन में सक्रिय रूप से भाग लेते थे
यहाँ तक कि सैनिक तानाशाही में भी लोग अपने को नागरिक कहने में गर्व का अनुभव करते थे
कार्डिनल कोन्तारिनी — वेनिस की सरकार (1534)
“नगर का संपूर्ण प्राधिकार एक ऐसी परिषद् के हाथों में है जिसमें 25 वर्ष से अधिक आयु वाले [संभ्रांत वर्ग के] सभी पुरुषों को सदस्यता मिल जाती है… गरीब लोगों को छोड़कर सभी नागरिकों का प्रतिनिधित्व सत्ता में होना चाहिए।”
‘दि कॉमनवेल्थ एण्ड गवर्नमेंट ऑफ़ वेनिस’ — इसे ‘लोकतांत्रिक सरकार’ कहा गया
चौदहवीं और पंद्रहवीं शताब्दियाँ
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1300 | पादुआ विश्वविद्यालय में मानवतावाद पढ़ाया जाने लगा |
| 1341 | पेट्रार्क को रोम में ‘राजकवि’ की उपाधि |
| 1349 | फ़्लोरेंस में विश्वविद्यालय की स्थापना |
| 1436 | ब्रुनेलेशी ने फ़्लोरेंस में ड्यूमो का परिरूप तैयार किया |
| 1453 | ऑटोमन तुर्कों ने कुंस्तुनतुनिया के शासक को पराजित किया |
| 1454 | गुटेनबर्ग ने विभाज्य टाइप से बाईबल का प्रकाशन किया |
| 1492 | कोलम्बस अमरीका पहुँचे |
| 1512 | माइकल एन्जिलो ने सिस्टीन चैपल की छत पर चित्र बनाए |
3 | मानवतावाद | एक नयी शिक्षा-दृष्टि
व्यापार से विश्वविद्यालय तक
यूरोप के सबसे पहले विश्वविद्यालय इटली में
- ग्यारहवीं शताब्दी से पादुआ और बोलोनिया — विधिशास्त्र के अध्ययन केंद्र
- कारण: इन नगरों के प्रमुख क्रियाकलाप व्यापार और वाणिज्य थे
- इसलिए वकीलों और नोटरी की बहुत आवश्यकता थी
- वे नियमों को लिखते, उनकी व्याख्या करते और समझौते तैयार करते थे
- इनके बिना बड़े पैमाने पर व्यापार करना संभव नहीं था
और फिर एक बदलाव आया — कानून को रोमन संस्कृति के संदर्भ में पढ़ा जाने लगा
पेट्रार्क का आग्रह
फ़्रांचेस्को पेट्रार्क (1304–1378)
- उनके लिए पुराकाल एक विशिष्ट सभ्यता थी
- जिसे प्राचीन यूनानियों और रोमनों के वास्तविक शब्दों से ही अच्छी तरह समझा जा सकता है
- अत: उन्होंने ज़ोर दिया कि इन प्राचीन लेखकों की रचनाओं का गहन अध्ययन हो
- इस शिक्षा-कार्यक्रम में एक बात अंतर्निहित थी —
- कि बहुत कुछ जानना बाकी है
“और यह सब हम केवल धार्मिक शिक्षण से नहीं सीखते”
एक नयी संस्कृति का नाम
उन्नीसवीं शताब्दी के इतिहासकारों ने इसे यह नाम दिया; पंद्रहवीं शताब्दी में ‘मानवतावादी’ वे अध्यापक थे जो व्याकरण, अलंकारशास्त्र, कविता, इतिहास और नीतिदर्शन पढ़ाते थे
एक शब्द की यात्रा
- लातिनी शब्द ‘ह्यूमेनिटास’ से ‘ह्यूमेनिटिज़’ बना
- इसे कई शताब्दियों पहले रोम के वकील व निबंधकार सिसरो (106–43 ई.पू.) ने प्रयोग किया
- वे जूलियस सीज़र के समकालीन थे और उन्होंने इसे ‘संस्कृति’ के अर्थ में लिया
- ये विषय धार्मिक नहीं थे
- वरन् उस कौशल पर बल देते थे जो व्यक्ति चर्चा और वाद-विवाद से विकसित करता है
पिको देल्ला मिरांदोला — वाद-विवाद का महत्त्व
“जहाँ तक हो सके विचारगोष्ठियों में जाना चाहिए और वाद-विवाद करना चाहिए। यह उसी तरह है जैसे शरीर को मज़बूत बनाने के लिए कसरत ज़रूरी है, दिमाग की ताकत को बढ़ाने के लिए शब्दों के दंगल में उतरना ज़रूरी है।”
‘ऑन दि डिगनिटी ऑफ़ मैन’ (1486), फ़्लोरेंस
फ़्लोरेंस — जो अचानक बदल गया
- शताब्दी के अंत तक फ़्लोरेंस ने कोई विशेष तरक्की नहीं की थी
- पर पंद्रहवीं शताब्दी में सब कुछ पूरी तरह बदल गया
- किसी भी नगर की पहचान उसके महान नागरिकों और उसकी संपन्नता से बनती है
- दाँते अलिगहियरी (1265–1321) — किसी संप्रदाय-विशेष से नहीं, पर कलम धार्मिक विषयों पर
- कलाकार जोटो (1267–1337) — जिन्होंने जीते-जागते रूपचित्र बनाए
उनके बनाए रूपचित्र पहले के कलाकारों की तरह बेजान नहीं थे
एक नयी तरह का मनुष्य
वह मनुष्य जिसकी अनेक रुचियाँ हों और अनेक हुनर में उसे महारत प्राप्त हो — उदाहरण के लिए, एक ही व्यक्ति विद्वान, कूटनीतिज्ञ, धर्मशास्त्रज्ञ और कलाकार हो सकता था
4 | इतिहास और ज्ञान | कालविभाजन और अरबों का ऋण
‘अंधकार युग’ किसने कहा?
- मानवतावादी समझते थे कि वे अंधकार की कई शताब्दियों बाद सभ्यता को पुन: स्थापित कर रहे हैं
- मान्यता यह थी कि रोमन साम्राज्य के टूटने के बाद ‘अंधकारयुग’ शुरू हुआ
- ‘मध्यकाल’ जैसी संज्ञा रोम-पतन के बाद के एक हज़ार वर्ष के लिए प्रयुक्त हुई
- उनका तर्क: “‘मध्ययुग’ में चर्च ने लोगों की सोच को इस तरह जकड़ रखा था
- कि यूनान और रोमवासियों का समस्त ज्ञान उनके दिमाग से निकल चुका था”
- ‘आधुनिक’ शब्द उन्होंने पंद्रहवीं शताब्दी से शुरू होने वाले काल के लिए प्रयोग किया
मानवतावादियों का कालविभाजन
| शताब्दी | नाम |
|---|---|
| 5–14 शताब्दी | मध्य युग |
| 5–9 शताब्दी | अंधकार युग |
| 9–11 शताब्दी | आरंभिक मध्य युग |
| 11–14 शताब्दी | उत्तर मध्य युग |
| 15 शताब्दी से | आधुनिक युग |
एक विभाजन जिस पर सवाल उठे
- हाल में अनेक इतिहासकारों ने इस काल विभाजन पर सवाल उठाया है
- इस काल के यूरोप के बारे में जैसे-जैसे खोजें और शोध बढ़ते गए —
- वैसे-वैसे विद्वानों ने तीक्ष्ण विभाजन करने में अपनी दुविधा जताई
- शताब्दियों की सांस्कृतिक समृद्धि अथवा असमृद्धि को आधार मानना कठिन लगा
किसी भी काल को ‘अंधकार युग’ की संज्ञा देना उन्हें अनुचित लगा
एक ऋण जो बहुत देर से स्वीकारा गया
विज्ञान और दर्शन — अरबीयों का योगदान
- मध्यकाल में चर्च-मठों के विद्वान यूनानी-रोमन कृतियों से परिचित थे
- पर इन लोगों ने इन रचनाओं का प्रचार-प्रसार नहीं किया
- चौदहवीं शताब्दी में विद्वानों ने प्लेटो और अरस्तू के अनुवाद पढ़ने शुरू किए
- इसके लिए वे अपने विद्वानों के ऋणी नहीं, बल्कि वे अरब के अनुवादकों के ऋणी थे
- जिन्होंने अतीत की पांडुलिपियों का संरक्षण और अनुवाद सावधानीपूर्वक किया था
अरबी में प्लेटो ‘अफ़लातून’ और अरस्तू ‘एरिस्टोटिल’ नाम से जाने जाते हैं
भाषा में छिपा हुआ प्रमाण
- यूनानी विद्वान अरबी और फ़ारसी कृतियों का यूरोप के लिए अनुवाद कर रहे थे
- ये ग्रंथ प्राकृतिक विज्ञान, गणित, खगोल विज्ञान, औषध विज्ञान और रसायन से संबंधित थे
- टॉलेमी का ‘अलमजेस्ट’ — खगोल शास्त्र का ग्रंथ, 140 ई. के पूर्व यूनानी में लिखा
- बाद में इसका अरबी में अनुवाद भी हुआ
- इसके नाम में अरबी उपपद ‘अल’ है
यह यूनानी और अरबी भाषा के बीच रहे संबंधों को दर्शाता है
तीन विद्वान जिन्हें इटली ज्ञानी मानता था
| नाम | परिचय |
|---|---|
| इब्न-सिना (एविसिना, 980–1037) | मध्य एशिया के बुखारा के दार्शनिक; अरब के हकीम |
| अल-राज़ी (रेजेस) | आयुर्विज्ञान विश्वकोश के लेखक |
| इब्न रूश्द (अवेरोज़, 1126–98) | स्पेन के दार्शनिक; दार्शनिक ज्ञान और धार्मिक विश्वासों के तनाव सुलझाने की चेष्टा |
नामों में खोया इतिहास
इन व्यक्तियों के नामों की यूरोपीय वर्तनी ने बाद की पीढ़ियों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि वे यूरोपीय थे — इब्न-सिना ‘एविसिना’ बन गए, इब्न रूश्द ‘अवेरोज़’
5 | कला और वास्तुकला | जब विज्ञान चित्रकारी में उतरा
अल्ब्रेट ड्यूरर (1471–1528)
“कला प्रकृति में रची-बसी होती है। जो इसके सार को पकड़ सकता है वही इसे प्राप्त कर सकता है… इसके अतिरिक्त आप अपनी कला को गणित द्वारा दिखा सकते हैं। ज़िंदगी की अपनी आकृति से आपकी कृति जितनी जुड़ी होगी, उतना ही सुंदर आपका चित्र होगा।”
उनका रेखाचित्र ‘प्रार्थना रत हस्त’ (1508)
धार्मिक — और फिर भी आत्मविश्वासी
- ड्यूरर का यह चित्र सोलहवीं शताब्दी की इतालवी संस्कृति का आभास कराता है
- जब यहाँ के लोग गहन रूप से धार्मिक थे
- परंतु उन्हें मनुष्य की योग्यता पर भरोसा था
- कि वह निकट पूर्णता को प्राप्त कर सकता है
- और दुनिया तथा ब्रह्मांड के रहस्यों को सुलझा सकता है
यही इस पूरे युग का मूल स्वर है — आस्था और आत्मविश्वास साथ-साथ
प्राचीन खंडहरों से नयी प्रेरणा
- रोमन संस्कृति के भौतिक अवशेषों की उतनी ही उत्सुकता से खोज हुई जितनी प्राचीन ग्रंथों की
- रोम साम्राज्य के पतन के एक हज़ार साल बाद भी खंडहरों में कलात्मक वस्तुएँ मिलीं
- अनेक शताब्दियों पहले बनी आदमी-औरतों की ‘संतुलित’ मूर्तियों के प्रति आदर जागा
- इसने उस परंपरा को कायम रखने के लिए इतालवी वास्तुविदों को प्रोत्साहित किया
- 1416 में दोनातल्लो (1386–1466) ने सजीव मूर्तियाँ बनाकर नयी परंपरा कायम की
कला के लिए विज्ञान
कलाकार नर-कंकालों के अध्ययन के लिए आयुर्विज्ञान कॉलेजों की प्रयोगशालाओं में गए; पादुआ विश्वविद्यालय के आन्द्रीयास वेसेलियस (1514–64) पहले व्यक्ति थे जिन्होंने सूक्ष्म परीक्षण के लिए मनुष्य के शरीर की चीर-फाड़ की — इसी से आधुनिक शरीर-क्रिया विज्ञान का प्रारंभ हुआ
लियोनार्डो दा विन्ची (1452–1519)
उनकी अभिरुचि वनस्पति विज्ञान और शरीर रचना विज्ञान से लेकर गणित शास्त्र और कला तक विस्तृत थी। उनका स्वप्न था कि वे आकाश में उड़ सकें — वे वर्षों तक पक्षियों के उड़ने का परीक्षण करते रहे और उन्होंने एक उड़न-मशीन का प्रतिरूप बनाया।
उन्होंने अपना नाम रखा — ‘लियोनार्डो दा विन्ची, परीक्षण का अनुयायी’
यथार्थवाद कैसे बना
चार वैज्ञानिक आधार
- रेखागणित के ज्ञान से चित्रकार अपने परिदृश्य (Perspective) को ठीक समझ सका
- प्रकाश के बदलते गुणों के अध्ययन से चित्रों में त्रि-आयामी रूप आया
- तेल के माध्यम के प्रयोग ने चित्रों को अधिक रंगीन और चटख बनाया
- वस्त्रों के डिज़ाइन और रंग-संयोजन में चीनी और फ़ारसी चित्रकला का प्रभाव
- यह प्रभाव उन्हें मंगोलों से मिला था
शरीर विज्ञान, रेखागणित, भौतिकी और सौंदर्य ने मिलकर जो शैली दी, उसे ‘यथार्थवाद’ कहा गया
वास्तुकला — रोम फिर जागा
- पंद्रहवीं शताब्दी में रोम नगर भव्य रूप से पुनर्जीवित हो उठा
- 1417 से पोप राजनैतिक दृष्टि से शक्तिशाली बने — दो प्रतिस्पर्धी पोप वाली दुर्बलता समाप्त हुई
- पुरातत्त्वविदों द्वारा रोम के अवशेषों का सावधानी से उत्खनन किया गया
- इसने वास्तुकला की एक ‘नयी शैली’ को प्रोत्साहित किया
- जो वास्तव में रोम साम्राज्य कालीन शैली का पुनरुद्धार थी — अब ‘शास्त्रीय’ शैली
चित्रकारों और शिल्पकारों ने भवनों को लेपचित्रों, मूर्तियों और उभरे चित्रों से सुसज्जित किया
एक ही व्यक्ति — चित्रकार, मूर्तिकार, वास्तुकार
- माईकल ऐंजेलो बुआनारोत्ती (1475–1564) — इसका सबसे श्रेष्ठ उदाहरण
- उन्होंने पोप के सिस्टीन चैपल की भीतरी छत में लेपचित्र बनाए
- ‘दि पाइटा’ नामक प्रतिमा बनाई
- और सेंट पीटर गिरजे के गुम्बद का डिज़ाइन बनाया — ये सारी कलाकृतियाँ रोम में ही हैं
- फिलिप्पो ब्रूनेलेशी (1337–1446) ने फ़्लोरेंस के भव्य गुम्बद (ड्यूमो) का परिरूप दिया
- उन्होंने अपना पेशा एक मूर्तिकार के रूप में शुरू किया था
इस काल में एक और अनोखा बदलाव आया — अब कलाकार की पहचान उसके नाम से होने लगी, न कि उसके संघ या श्रेणी (गिल्ड) के नाम से
6 | मुद्रण | जब विचार सस्ते हो गए
एक तुलना जो सब कह देती है
सन् 1455 में जोहानेस गूटेनबर्ग की कार्यशाला में बाईबल की 150 प्रतियाँ छपीं — इससे पहले इतने ही समय में एक धर्मभिक्षु बाईबल की केवल एक ही प्रति लिख पाता था
तकनीक कहाँ से आई?
- दूसरे देशों के लोग महान कलाकृतियाँ देखना चाहते तो उन्हें इटली की यात्रा करनी पड़ती
- किंतु जो कुछ भी इटली में लिखा गया, वह विदेशों तक पहुँचा
- ये सब क्रांतिकारी मुद्रण प्रौद्योगिकी की वजह से हुआ
- इसके लिए यूरोपीय लोग चीनियों के तथा मंगोल शासकों के ऋणी रहे
- क्योंकि यूरोप के व्यापारी और राजनयिक मंगोल राज-दरबार की यात्राओं में इससे परिचित हुए
ऐसा ही तीन अन्य नवीकरणों — आग्नेयास्त्र, कम्पास और फलक (Abacus) — के विषय में भी हुआ
पढ़ने की आदत का जन्म
- पंद्रहवीं शताब्दी तक अनेक क्लासिकी ग्रंथों का मुद्रण इटली में हो चुका था
- अब छात्रों को केवल अध्यापकों के व्याख्यानों से बने नोट पर निर्भर नहीं रहना पड़ा
- विचार, मत और जानकारी पहले की अपेक्षा तेज़ी से प्रसारित हुए
- एक मुद्रित पुस्तक कई सौ पाठकों के पास बहुत जल्दी पहुँच सकती थी
- अब पाठक एकांत में बैठकर पुस्तकों को पढ़ सकता था क्योंकि वह उन्हें खरीद सकता था
इससे लोगों में पढ़ने की आदत का विकास हुआ
आल्प्स के पार
- पंद्रहवीं शताब्दी के अंत से इटली की मानवतावादी संस्कृति तेज़ी से फैली
- आल्प्स पर्वत के पार — यूरोप के अन्य देशों तक
- इसका मुख्य कारण था वहाँ छपी हुई पुस्तकों का वितरण
- इससे स्पष्ट है कि पहले के बौद्धिक आंदोलन खास क्षेत्रों तक ही सीमित क्यों रहते थे
7 | मनुष्य और महिलाएँ | नयी संकल्पना, पुरानी सीमाएँ
धर्म का नियंत्रण कमज़ोर हुआ — पर आस्था नहीं
- इटली के निवासी भौतिक संपत्ति, शक्ति और गौरव से बहुत आकृष्ट थे
- परंतु ये ज़रूरी नहीं कि वे अधार्मिक थे
- फ्रेन्चेस्को बरबारो (1390–1454) ने संपत्ति अधिग्रहण को एक विशेष गुण कहकर तरफ़दारी की
- लोरेन्ज़ो वल्ला (1406–1457) मानते थे कि इतिहास का अध्ययन मनुष्य को पूर्णतया जीवन जीने की प्रेरणा देता है
- उन्होंने अपनी पुस्तक ‘ऑनप्लेज़र’ में भोग-विलास पर लगी ईसाई निषेधाज्ञा की आलोचना की
मानवतावाद का मतलब यह भी था कि व्यक्ति सत्ता और दौलत की होड़ छोड़कर अन्य माध्यमों से अपने जीवन को रूप दे सकता था
एक विश्वास जिसने पुरानी व्यवस्था तोड़ी
यह आदर्श इस विश्वास से जुड़ा था कि मनुष्य का स्वभाव बहुमुखी है — और यह उन तीन भिन्न-भिन्न वर्गों की मान्यता के विरुद्ध गया जिनमें सामंती समाज विश्वास करता था
निकोलो मैक्यिावेली — ‘दि प्रिंस’ (1513)
“काल्पनिक बातों को यदि अलग कर दें और केवल उन्हीं विषयों के बारे में सोचें जो वास्तव में हैं…” — मैक्यिावेली मानते थे कि ‘सभी मनुष्य बुरे हैं और वह अपने दुष्ट स्वभाव को प्रदर्शित करने में सदैव तत्पर रहते हैं’।
प्रमुख कारण — मनुष्य अपने समस्त कार्यों में अपना स्वार्थ देखता है
महिलाओं को दूर रखा गया
वैयक्तिकता और नागरिकता के नए विचारों से
- सार्वजनिक जीवन में अभिजात व संपन्न परिवार के पुरुषों का प्रभुत्व था
- घर-परिवार के मामले में भी वे ही निर्णय लेते थे
- लोग अपने लड़कों को ही शिक्षा देते थे
- विवाह में प्राप्त दहेज़ वे अपने पारिवारिक कारोबारों में लगा देते थे —
- तथापि महिलाओं को यह अधिकार नहीं था कि वे पति को कारोबार के बारे में कोई राय दें
अगर पर्याप्त दहेज़ का प्रबंध न हो पाता तो लड़कियों को मठों में भिक्षुणी (Nun) का जीवन बिताने भेज दिया जाता
व्यापारी परिवारों में कुछ अलग
- दुकानदारों की स्त्रियाँ दुकानों को चलाने में प्राय: सहायता करती थीं
- व्यापारी और साहूकार परिवारों की पत्नियाँ कारोबार तब सँभालती थीं
- जब उनके पति लंबे समय के लिए दूर-दराज़ व्यापार को चले जाते थे
- अभिजात्य संपन्न परिवारों के विपरीत —
- व्यापारी की कम आयु में मृत्यु होने पर उसकी पत्नी
- सार्वजनिक जीवन में बड़ी भूमिका निभाने के लिए बाध्य होती थी
कसान्द्रा फेदेले (1465–1558), वेनिस
“यद्यपि महिलाओं को शिक्षा न तो पुरस्कार देती है न किसी सम्मान का आश्वासन, तथापि प्रत्येक महिला को सभी प्रकार की शिक्षा को प्राप्त करने की इच्छा रखनी चाहिए और उसे ग्रहण करना चाहिए।”
उन्होंने इस विचारधारा को चुनौती दी कि मानवतावादी विद्वान के गुण एक महिला के पास नहीं हो सकते
दो आवाज़ें, दो दुनियाएँ
- फेदेले यूनानी और लातिनी भाषा की विद्वान के रूप में विख्यात थीं
- उन्हें पादुआ विश्वविद्यालय में भाषण देने के लिए आमंत्रित किया गया था
- उन्होंने गणतंत्र की आलोचना की — कि उसने “स्वतंत्रता की एक बहुत सीमित परिभाषा” दी
- “जो महिलाओं की अपेक्षा पुरुषों की इच्छा का ज्यादा समर्थन करती थी”
- ईसाबेला दि इस्ते (1474–1539) ने पति की अनुपस्थिति में मंतुआ पर शासन किया
पर उसी काल में कास्तिल्योनी ने ‘दि कोर्टियर’ (1528) में लिखा — “एक महिला पुरुष के सदृश नहीं होनी चाहिए”
8 | धर्म-सुधार | जब बाईबल मातृभाषा में आई
उत्तरी यूरोप का अलग मानवतावाद
- पंद्रहवीं और आरंभिक सोलहवीं शताब्दियों में उत्तरी यूरोप के विद्वान आकर्षित हुए
- पर इटली के विपरीत — जहाँ पेशेवर विद्वान आंदोलन पर हावी रहे —
- उत्तरी यूरोप में मानवतावाद ने ईसाई चर्च के अनेक सदस्यों को आकर्षित किया
- उन्होंने पुराने धर्मग्रंथों में बताए तरीकों से धर्म-पालन का आह्वान किया
- और अनावश्यक कर्मकांडों को त्यागने की बात की
उनका मानव-दृष्टिकोण नया था — वे उसे एक मुक्त विवेकपूर्ण कर्ता समझते थे
चर्च पर उठते सवाल
टॉमस मोर (1478–1535) और इरेस्मस (1466–1536)
- उनका मानना था कि चर्च एक लालची और लूट-खसोट करने वाली संस्था बन गई
- पादरियों का धन ठगने का सबसे सरल तरीका था — ‘पाप-स्वीकारोक्ति’ (Indulgences)
- यह वह दस्तावेज़ था जो व्यक्ति को उसके सारे किए गए पापों से छुटकारा दिला सकता था
- बाईबल के स्थानीय भाषाओं में छपे अनुवाद से लोगों को पता चला कि धर्म ऐसी आज्ञा नहीं देता
- किसानों ने चर्च के करों का विरोध किया; राजा भी राज-काज में दखलअंदाज़ी से चिढ़ते थे
मानवतावादियों ने सिद्ध किया कि ‘कॉन्स्टैनटाइन का अनुदान’ असली नहीं, जालसाजी से तैयार दस्तावेज़ था
1517 — एक भिक्षु का अभियान
उन्होंने दलील पेश की कि मनुष्य को ईश्वर से संपर्क साधने के लिए पादरी की आवश्यकता नहीं है; उन्होंने आदेश दिया कि अनुयायी ईश्वर में पूर्ण विश्वास रखें — क्योंकि केवल उनका विश्वास ही उन्हें स्वर्ग में प्रवेश दिला सकता है
सुधार फैलता है
- इस आंदोलन को प्रोटैस्टेंट सुधारवाद नाम दिया गया
- जर्मनी और स्विटज़रलैंड के चर्च ने पोप तथा कैथलिक चर्च से संबंध समाप्त कर दिए
- स्विट्ज़रलैंड में उलरिक ज्विंगली (1484–1531) और फिर जौं कैल्विन (1509–64) ने इसे लोकप्रिय बनाया
- व्यापारियों से समर्थन मिलने के कारण सुधारकों की लोकप्रियता शहरों में अधिक थी
- जबकि ग्रामीण इलाकों में कैथलिक चर्च का प्रभाव बरकरार रहा
एनाबेपटिस्ट सम्प्रदाय और भी उग्र था — उसने मोक्ष को हर तरह के सामाजिक-उत्पीड़न के अंत से जोड़ दिया
विलियम टिंडेल (1494–1536)
“वे आपको धर्मग्रंथ के ज्ञान से दूर रखने के लिए यह चाहते थे कि धर्मग्रंथ के अनुवाद आपकी मातृभाषा में उपलब्ध न हो सकें… सामान्य लोगों को किसी भी सच्चाई की तब तक जानकारी नहीं हो सकती जब तक उनके पास अपने धर्मग्रंथ के मातृभाषा में अनुवाद उपलब्ध न हों।”
1506 में अंग्रेज़ी में बाईबल का अनुवाद करने वाले लूथरवादी अंग्रेज़
सुधारक की सीमा
- लूथर ने आमूल परिवर्तनवाद (Radicalism) का समर्थन नहीं किया
- उन्होंने आह्वान किया कि जर्मन शासक समकालीन किसान विद्रोह का दमन करें
- ऐसा इन शासकों ने 1525 में किया
- पर इसके बावजूद आमूल परिवर्तनवाद बना रहा
- फ्रांस के प्रोटैस्टेंट दावा करने लगे कि जनता को अत्याचारी शासक को अपदस्थ करने का अधिकार है
इंग्लैंड के शासकों ने पोप से संबंध तोड़ दिए — इसके बाद राजा/रानी इंग्लैंड के चर्च के प्रमुख बन गए
प्रति-सुधार
- कैथलिक चर्च स्वयं भी इन विचारधाराओं के प्रभाव से अछूता नहीं रह सका
- उसने अनेक आंतरिक सुधार करने प्रारंभ कर दिए
- स्पेन और इटली में पादरियों ने सादा जीवन और निर्धनों की सेवा पर ज़ोर दिया
- स्पेन में इग्नेशियस लोयोला ने 1540 में ‘सोसाइटी ऑफ़ जीसस’ की स्थापना की
- उनके अनुयायी जेसुइट कहलाते थे
उनका ध्येय था — निर्धनों की सेवा और दूसरी संस्कृतियों के बारे में अपने ज्ञान को व्यापक बनाना
9 | वैज्ञानिक क्रांति | पृथ्वी केंद्र से हट गई
पुरानी तस्वीर
- ईसाइयों की धारणा थी कि मनुष्य पापी है
- और यह भी कि पृथ्वी पापों से भरी हुई है
- पापों की अधिकता के कारण वह स्थिर है
- पृथ्वी, ब्रह्मांड के बीच में स्थिर है
- जिसके चारों ओर खगोलीय ग्रह घूम रहे हैं
इस पर वैज्ञानिकों ने पूर्णतया अलग दृष्टिकोण से आपत्ति की
एक खोज जो जीवन-भर छिपी रही
कोपरनिकस (1473–1543) एक निष्ठावान ईसाई थे और इस बात से भयभीत थे कि उनकी नयी खोज से परंपरावादी ईसाई धर्माधिकारियों में घोर-प्रतिक्रिया उत्पन्न हो सकती है। जब वह अपनी मृत्यु-शैया पर पड़े थे, तब उन्होंने यह पाण्डुलिपि अपने अनुयायी जोशिम रिटिकस को सौंप दी।
पाण्डुलिपि — ‘दि रिवल्यूशनिबस’ (परिभ्रमण); घोषणा — पृथ्वी समेत सारे ग्रह सूर्य के चारों ओर परिक्रमा करते हैं
स्वर्ग और पृथ्वी का अंतर मिटा
- इन विचारों को ग्रहण करने में लोगों को आधी शताब्दी से अधिक समय लगा
- जोहानेस कैप्लर (1571–1630) ने ग्रंथ ‘कॉस्मोग्राफ़िकल मिस्ट्री’ में
- कोपरनिकस के सूर्य-केंद्रित सिद्धांत को लोकप्रिय बनाया
- और सिद्ध किया कि ग्रह वृत्ताकार नहीं, दीर्घ वृत्ताकार (Ellipses) मार्ग पर चलते हैं
- गैलीलियो गैलिली (1564–1642) ने अपने ग्रंथ ‘दि मोशन’ में गतिशील विश्व के सिद्धांतों की पुष्टि की
इस क्रांति ने न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत के साथ अपनी पराकाष्ठा की ऊँचाई को छू लिया
ज्ञान का नया आधार
गैलीलियो ने टिप्पणी की कि बाईबल जिस स्वर्ग का मार्ग आलोकित करता है, वह स्वर्ग किस प्रकार चलता है — उसके बारे में कुछ नहीं बताता; इन विचारकों ने बताया कि ज्ञान विश्वास से हटकर अवलोकन एवं प्रयोगों पर आधारित है
विज्ञान सार्वजनिक हुआ
- भौतिकी, रसायन शास्त्र और जीव विज्ञान में प्रयोग और अन्वेषण तेज़ी से पनपे
- इतिहासकारों ने इस नए दृष्टिकोण को ‘वैज्ञानिक क्रांति’ का नाम दिया
- संदेहवादियों के मन में प्रकृति ने ईश्वर का स्थान लेना शुरू किया
- जिन्होंने विश्वास बरकरार रखा, वे भी एक दूरस्थ ईश्वर की बात करने लगे
- 1662 की रॉयल सोसाइटी और पेरिस अकादमी ने व्याख्यान आयोजित किए
और सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए प्रयोग करवाए — विज्ञान अब जनता के सामने था
सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दियाँ
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1516 | टॉमस मोर की ‘यूटोपिया’ का प्रकाशन |
| 1517 | मॉर्टिन लूथर द्वारा ‘नाइन्टी फ़ाईव थिसेज़’ |
| 1522 | लूथर द्वारा बाईबल का जर्मन में अनुवाद |
| 1525 | जर्मनी में किसान विद्रोह |
| 1543 | वेसेलियस द्वारा ‘ऑन ऐनाटॉमी’ |
| 1569 | मरकेटर ने पृथ्वी का पहला बेलनाकार मानचित्र बनाया |
| 1582 | पोप ग्रैगरी XIII द्वारा ग्रैगोरियन कैलेंडर |
| 1628 | विलियम हार्वे ने हृदय को रुधिर-परिसंचरण से जोड़ा |
| 1687 | न्यूटन के ‘प्रिन्सिपिया मैथेमेटिका’ का प्रकाशन |
10 | पुनर्विचार | क्या सचमुच ‘पुनर्जागरण’ हुआ था?
एक शब्द पर सवाल
इंग्लैंड के पीटर बर्क का सुझाव
- बर्कहार्ट के ये विचार अतिशयोक्तिपूर्ण हैं
- वे इस काल और इससे पहले के कालों के फ़र्कों को बढ़ा-चढ़ा कर पेश कर रहे थे
- ‘पुनर्जागरण’ शब्द में दो बातें अंतर्निहित हैं —
- कि यूनानी-रोमन सभ्यताओं का चौदहवीं शताब्दी में पुनर्जन्म हुआ
- और कि विद्वानों ने ईसाई विश्वदृष्टि की जगह पूर्व-ईसाई विश्वदृष्टि का प्रचार किया
दोनों ही तर्क अतिशयोक्तिपूर्ण थे — पिछली शताब्दियों के विद्वान भी यूनानी-रोमन संस्कृतियों से परिचित थे, और लोगों के जीवन में धर्म का महत्त्वपूर्ण स्थान था
‘अंधकारमय मध्यकाल’ — एक सरलीकरण
- यह कहना कि पुनर्जागरण गतिशीलता और सृजनशीलता का काल था
- और इसके विपरीत मध्यकाल अंधकारमय था जिसमें कोई विकास नहीं हुआ
- यह ज़रूरत से ज्यादा सरलीकरण है
- इटली में पुनर्जागरण से जुड़े अनेक तत्व बारहवीं और तेरहवीं शताब्दी में पाए जाते हैं
- कुछ इतिहासकारों के अनुसार नौवीं शताब्दी में फ्रांस में भी ऐसे विचार पनपे
केवल यूरोप का हाथ नहीं
यूरोपियों ने न केवल यूनानियों और रोमवासियों से सीखा — बहुत लंबे समय तक इन ऋणों को स्वीकार नहीं किया गया, क्योंकि जब इस काल का इतिहास लिखा जाने लगा तो इतिहासकारों ने इसके यूरोप-केंद्रित दृष्टिकोण को सामने रखा
एशिया से आया ज्ञान
- एशिया में प्रौद्योगिकी और कार्य-कुशलता यूनानी और रोमन लोगों से काफी विकसित थी
- विश्व का बहुत बड़ा क्षेत्र आपस में सम्बद्ध हो चुका था
- नौसंचालन (Navigation) की नयी तकनीकों ने दूरदराज़ की जलयात्रा संभव बनाई
- इस्लाम के विस्तार और मंगोलों की विजयों ने एशिया व उत्तरी अफ़्रीका को यूरोप से जोड़ा
- यह जुड़ाव राजनीतिक ही नहीं — व्यापार और कार्य-कुशलता के ज्ञान के लिए भी था
दो परिवर्तन जो स्थायी रहे
इस काल की सबसे बड़ी देन
- ‘निजी’ और ‘सार्वजनिक’ दो अलग-अलग क्षेत्र बनने लगे
- सार्वजनिक = सरकार का कार्यक्षेत्र और औपचारिक धर्म; निजी = परिवार और व्यक्ति का निजी धर्म
- व्यक्ति अब तीन वर्गों में से किसी एक का सदस्य मात्र नहीं था —
- बल्कि अपने आप में एक स्वतंत्र व्यक्ति था
- एक कलाकार गिल्ड का सदस्य मात्र नहीं, अपने हुनर के लिए भी जाना जाता था
अठारहवीं शताब्दी में इस पहचान को राजनीतिक रूप में अभिव्यक्त किया गया — इस विश्वास के साथ कि प्रत्येक व्यक्ति के एकसमान राजनीतिक अधिकार हैं
भाषा से बनी नयी पहचान
- इस काल की एक अन्य महत्त्वपूर्ण विशेषता —
- भाषा के आधार पर यूरोप के विभिन्न क्षेत्रों ने अपनी पहचान बनानी शुरू की
- पहले, आंशिक रूप से रोमन साम्राज्य द्वारा
- और बाद में लातिनी भाषा और ईसाई धर्म द्वारा जुड़ा यूरोप
- अब अलग-अलग राज्यों में बँटने लगा
- इन राज्यों के आंतरिक जुड़ाव का कारण समान भाषा का होना था
जिन ऋणों को इतिहास ने लंबे समय तक नहीं गिना — उन्हें आज हम कैसे गिनें?
सार-संक्षेप
- ‘पुनर्जागरण’ किसी युग का नाम नहीं — एक दावे का नाम है
- नगर-राज्यों की स्वायत्तता और व्यापार ने मानवतावाद को जन्म दिया
- रेखागणित, शरीर-रचना और प्रकाश ने कला को यथार्थवाद दिया
- मुद्रण ने विचारों को सस्ता किया — और उसी ने धर्म-सुधार को जन-आंदोलन बनाया
- कोपरनिकस से न्यूटन तक ज्ञान का आधार विश्वास से हटकर अवलोकन-प्रयोग पर आ गया
- पर इस पूरी कहानी में महिलाएँ, निरक्षर और एशियाई ऋण लंबे समय तक अनदेखे रहे
यही इस अध्याय की असली सीख है — हर बड़े दावे के बाद एक ‘हाँ, पर…’ ज़रूर लगाइए