अध्याय 7 — आधुनिकीकरण के रास्ते · विश्व इतिहास के कुछ विषय · कक्षा XI
कक्षा — 11 · विषय — इतिहास (विश्व इतिहास के कुछ विषय) · पृष्ठ — 153 से 184
एक ही सवाल, चार उत्तर
पश्चिमी साम्राज्यवाद के दबदबे वाली दुनिया में एक गैर-पश्चिमी देश आधुनिक कैसे बने?
उन्नीसवीं सदी की शुरुआत — और सौ साल बाद
पृ. 153 — अध्याय का प्रवेश-द्वार
| चीन | जापान |
|---|---|
| पूर्वी एशिया पर प्रभुत्व; छींग राजवंश की सत्ता अक्षुण्ण | नन्हा-सा द्वीप-देश, अलग-थलग |
| अशांति की गिरफ़्त; औपनिवेशिक चुनौती का सामना नहीं कर पाया | आधुनिक राष्ट्र-राज्य + औद्योगिक अर्थतंत्र |
| सुधार में असफल; गृहयुद्ध | ताइवान 1895, कोरिया 1910 — औपनिवेशिक साम्राज्य |
| — | चीन को 1894 में, रूस को 1905 में हराया |
जापान ने उसी देश को हराया जिससे उसने अपनी लिपि और संस्कृति ली थी
1 | इतिहास कौन लिखता है | शासकों का मार्गदर्शक; 1869 का ब्यूरो; बाहरी और भीतरी दृष्टि
चीन और जापान में इतिहास-लेखन
पृ. 153–154
- इतिहास शासकों के लिए महत्त्वपूर्ण मार्गदर्शक माना जाता था
- अतीत वे मानक पेश करता है, जिनके आधार पर शासकों का आकलन किया जा सकता है
- इसीलिए अभिलेखों की देखरेख के लिए सरकारी विभाग बनाए गए
- सिमा छियन (145–90 ई.पू.) — प्राचीन चीन का महानतम इतिहासकार
- 1869 — मेजी सरकार के शुरुआती अधिनियमों में एक ब्यूरो की स्थापना
- उद्देश्य — “मेजी विजेताओं के नज़रिये से लेखन”
नयी सरकार बनते ही पहले कामों में एक था — अपना इतिहास लिखवाना
एक विद्वान की सद्भावना और उसकी सीमा
उन्हें चीनी इतिहास में ऐसी क्षमताएँ नज़र आईं जो चीन को आधुनिक और लोकतांत्रिक बना सकती थीं। उनके मुताबिक जापान चीन में एक अहम भूमिका निभा सकता था — लेकिन वे चीनी राष्ट्रवाद की शक्ति का सही आकलन नहीं कर पाए।
नाइतो कोनान (1866–1934) के बारे में — पृ. 154
सद्भावना और वर्चस्व एक ही वाक्य में रह सकते हैं
2 | दो भूगोल, दो नियति | महाद्वीप बनाम द्वीप; नदियाँ, पहाड़, भोजन
चीन और जापान — भौतिक भूगोल
पृ. 155–156
चीन
- विशालकाय महाद्वीपीय देश
- पीली नदी · यांग्त्सी (दुनिया की तीसरी सबसे लंबी) · पर्ल
- हान प्रमुख समूह; भाषा पुतोंगहुआ
- चार पाकप्रणालियाँ — डिम सम = ‘दिल को छूना’
जापान
- द्वीप शृंखला — हॉंशू, क्यूशू, शिकोकू, होकाइदो
- 50% से अधिक ज़मीन पहाड़ी; सक्रिय भूकंप क्षेत्र
- आयनू अल्पसंख्यक; कोरियाई श्रमिक (उपनिवेश-काल में लाए गए)
- पशुपालन की परंपरा नहीं; चावल और मछली
शेचुआँ का तीखा खाना — बौद्ध भिक्षुओं के मसाले + पुर्तगालियों की मिर्च
3 | तोकुगावा जापान | शोगुन और दैम्यो; तीन परिवर्तन; शहरी क्रांति
तोकुगावा व्यवस्था (1603–1867)
पृ. 156
- सम्राट क्योतो में — प्रतीकात्मक; बारहवीं सदी से असली सत्ता शोगुनों के हाथ में
- देश 250 भागों में; शासन दैम्यो चलाते थे
- शोगुन दैम्यो को एदो में रहने का आदेश देते थे — ताकि कोई खतरा न रहे
- सामुराई (योद्धा वर्ग) — शासन करने वाले कुलीन
- 16वीं सदी के तीन परिवर्तन: किसानों से हथियार लिए गए · दैम्यो राजधानियों में · ज़मीन का सर्वेक्षण
तीनों का मिलाजुला मकसद — राजस्व के लिए स्थायी आधार बनाना
तोकुगावा जापान की शहरी क्रांति
पृ. 156–157 — यही मेजी की असली नींव है
- 17वीं शताब्दी के मध्य तक एदो दुनिया का सबसे अधिक जनसंख्या वाला शहर
- कम से कम छह गढ़-शहर जहाँ जनसंख्या 50,000 से अधिक — जबकि यूरोप में प्रायः केवल एक बड़ा शहर
- वाणिज्यिक अर्थव्यवस्था; वित्त और ऋण की प्रणालियाँ
- “व्यक्ति के गुण उसके पद से अधिक मूल्यवान समझे जाने लगे”
- होनहार लेखक केवल लेखन से जीविका चला सकते थे
- “एदो में लोग नूडल की कटोरी की कीमत पर किताब किराये पर ले सकते थे”
जापान का चमत्कार 1945 में नहीं, 1600 के दशक में शुरू हुआ था
निशिजिन — एक बस्ती से एक वर्ग तक
क्योतो का रेशम, पृ. 157
- 16वीं सदीवहाँ31 परिवारों का बुनकर संघ था
- 17वीं सदीआखिर तक इस समुदाय में70,000 लोग
- 1713केवल देशी धागा इस्तेमाल करने के आदेश — उत्पादन को और प्रोत्साहन
- —क्षेत्रीय उद्यमी वर्ग का विस्तार
- —जिन्होंने आगे चलकर तोकुगावा व्यवस्था को चुनौती दी
- 1859विदेशी व्यापार शुरू;रेशम मुनाफ़े का प्रमुख स्रोत
मेजी पुनर्स्थापना बाहर से नहीं आई — विस्फोटक सामग्री भीतर तैयार थी
4 | मेजी पुनर्स्थापना | पेरी के जहाज़; डर और बहस; सम्राट-व्यवस्था
पेरी का आगमन और मेजी पुनर्स्थापना
पृ. 157–158
- 1853 — अमरीका ने कॉमोडोर मैथ्यू पेरी (1794–1858) को भेजा; 1854 में समझौता
- अमरीका के तीन कारण — जापान चीन के रास्ते में; प्रशांत में ईंधन; तब केवल हॉलैंड व्यापार करता था
- 1867–68 — तोकुगावा शासन समाप्त; शोगुन को ज़बरदस्ती हटाया गया
- सम्राट मेजी एदो लाए गए; एदो → तोक्यो = ‘पूर्वी राजधानी’
NCERT का अपना संशोधन: “आज विद्वान यह तर्क देते हैं कि जापान कभी ‘बंद’ ही नहीं था”
डर, बहस और नयी नीति
पृ. 158
- ब्रितानियों के हाथों चीन की हार की खबरें फैल रही थीं और नाटकों में दिखाई जा रही थीं
- असली डर — जापान भी उपनिवेश बनाया जा सकता है
- बहस के तीन पक्ष — सीखो (जैसा चीन ने नहीं किया) · दूर रखो पर तकनीक लो · धीरे-धीरे खोलो
- नारा — फ़ुकोकु क्योहे: ‘समृद्ध देश, मज़बूत सेना’
- “अन्यथा उन्हें भी भारत की तरह पराधीनता का सामना करना पड़ सकता है”
- ज़रूरत — “प्रजा को नागरिक की श्रेणी में बदलने” की
भारत का उपनिवेश बनना पूर्वी एशिया की राजनीति का निर्णायक तर्क बन गया
एक ही व्यक्ति, दो विपरीत भूमिकाएँ
सूर्य देवी का वंशज — और साथ ही पश्चिमीकरण का नेता; जन्मदिन राष्ट्रीय छुट्टी; पश्चिमी अंदाज़ के सैनिक कपड़े
यह विरोधाभास नहीं, रणनीति है — परंपरा की वैधता से आधुनिक परिवर्तन को स्वीकार्य बनाना
5 | मेजी सुधार | शिक्षा; लिपि; प्रशासन; और एक बड़ा दोष
शिक्षा — मुक्ति और नियंत्रण, दोनों
पृ. 159
- 1870 के दशक से नयी विद्यालय-व्यवस्था; लड़के और लड़कियों दोनों के लिए अनिवार्य
- 1910 तक तकरीबन ऐसी स्थिति कि स्कूल जाने से कोई वंचित नहीं रहा; फ़ीस बहुत कम
- पर शिक्षा मंत्रालय का पाठ्यचर्या, किताबों के चयन और शिक्षकों के प्रशिक्षण पर नियंत्रण
- ‘नैतिक संस्कृति’ का विषय अनिवार्य — माता-पिता के प्रति आदर, राष्ट्र के प्रति वफ़ादारी
- 1890 की शिक्षासंबंधी राजाज्ञा
आधुनिक राज्य नागरिक बनाता है — और नागरिक को अपने अनुसार भी ढालता है
तीन लिपियों की कहानी
पृ. 159
- कांजी — चीनियों से छठी शताब्दी में ली गई
- हीरागाना और कताकाना — दो ध्वन्यात्मक वर्णमालाएँ
- हीरागाना ‘नारी सुलभ’ मानी जाती है — हेआन काल की लेखिकाएँ इसे इस्तेमाल करती थीं
- “ध्वन्यात्मक अक्षरमाला की मौजूदगी के चलते ज्ञान कुलीन वर्गों से व्यापक समाज में काफ़ी तेज़ी से फैल सका”
- 1880 के दशक का सुझाव — पूरी ध्वन्यात्मक लिपि या कोई यूरोपीय भाषा अपना लें
- “दोनों में से कुछ भी नहीं किया गया”
हर पश्चिमी सुझाव मान नहीं लिया गया — यही चयनात्मक आधुनिकीकरण है
मेजी व्यवस्था का सबसे बड़ा दोष
सेना और नौकरशाही को सीधा सम्राट के निर्देश में रखा गया। यानि कि संविधान बनने के बावजूद यह दो गुट सरकारी नियंत्रण के बाहर रहे।
पृ. 159 — और 1899 में आदेश कि केवल सेवारत जनरल और एडमिरल ही मंत्री बन सकते हैं
जापान में लोकतंत्र इसलिए नहीं हारा कि लोग उसे नहीं चाहते थे — संविधान ने ही सेना को संविधान से बाहर रख दिया था
6 | अर्थव्यवस्था और मज़दूर | रेल, बैंक, ज़ायबात्सु; महिलाएँ; प्रदूषण
अर्थव्यवस्था का आधुनिकीकरण
पृ. 160
- 1870–72पहली रेल लाइन —तोक्यो और योकोहामा के बीच
- 1872आधुनिक बैंकिंग संस्थाओं का प्रारंभ; जनसंख्या 3.5 करोड़
- —मित्सुबिशी और सुमितोमो को सब्सिडी → जापानी व्यापार जापानी जहाज़ों में
- —ज़ायबात्सु — विशिष्ट परिवारों के नियंत्रण वाली बड़ी संस्थाएँ
- 1920जनसंख्या5.5 करोड़
- 1935शहरी जनसंख्या32 प्रतिशत (2.25 करोड़)
पूँजी कहाँ से आई? — कृषि पर कर लगाकर
औद्योगिक मज़दूर — और आधी से ज़्यादा महिलाएँ
पृ. 160–161
- औद्योगिक मज़दूर 1870 में 7,00,000 → 1913 में 40 लाख
- आधुनिक कारखानों में काम करने वालों में आधे से ज़्यादा महिलाएँ थीं
- 1886 में पहली आधुनिक हड़ताल का आयोजन महिलाओं ने ही किया
- 1930 के दशक में आकर ही पुरुषों की संख्या महिलाओं से अधिक हुई
- फिर भी 1940 में 5,50,000 कारखानों में 5 से कम मज़दूर
- इससे परिवार-केंद्रित विचारधारा बनी रही
जैसे राष्ट्रवाद को पैतृक व्यवस्था का सहारा था, जहाँ सम्राट परिवार का कुलपति माना जाता था
पहला औद्योगिक प्रदूषण-विरोधी आंदोलन
तानाका शोज़ो के नेतृत्व में 800 गाँववासी इकट्ठे हुए; आशियो खान से वातारासे नदी में प्रदूषण; 100 वर्ग मील कृषिभूमि बर्बाद, 1000 परिवार प्रभावित; 1904 तक फ़सल सामान्य
“औद्योगिक प्रगति के लिए आम लोगों की बलि नहीं दी जानी चाहिए”
7 | पश्चिमीकरण और परंपरा | तीन पीढ़ियों की बहस; रोज़मर्रा की ज़िंदगी
एक ही देश, तीन उत्तर
पृ. 162
| विचारक | तर्क |
|---|---|
| फ़ुकुज़ावा यूकिची (1835–1901) | जापान को ‘अपने में से एशिया को निकाल फेंकना’ चाहिए |
| मियाके सेत्सुरे (1860–1945) | हर राष्ट्र को अपने खास हुनर का विकास करना चाहिए |
| उएकी एमोरी (1857–1892) | ‘व्यवस्था से ज़्यादा कीमती चीज़ है, आज़ादी’ |
“इस दबाव ने सरकार को संविधान की घोषणा करने पर बाध्य किया” — मेजी संविधान उपहार नहीं, आंदोलन का नतीजा था
एक गरीब सामुराई परिवार के बेटे का सिद्धांत
स्वर्ग ने इंसान को इंसान के ऊपर नहीं बनाया, न ही इंसान को इंसान के नीचे।
फ़ुकुज़ावा यूकिची — जिन्होंने वह संस्थान बनाया जो आज केओ विश्वविद्यालय है
उनकी दूसरी प्रसिद्ध पंक्ति थी — “जापान के पास प्राकृतिक दृश्यों के अलावा गर्व करने के लिए कुछ भी नहीं है”
रोज़मर्रा की ज़िंदगी बदलती है
पृ. 163
- पैतृक परिवार की जगह मूल परिवार वाला ‘होमु’ — पति-पत्नी साथ रहकर कमाते और घर बसाते
- नए घरेलू उत्पाद — चावल पकाने वाला कुकर, भूनक, टोस्टर
- 1920 के दशक में 200 येन + 10 साल तक 12 येन माहवार की किश्तों पर सस्ते मकान — जबकि बैंक कर्मचारी की तनख्वाह 40 येन प्रतिमाह
- मोगा = ‘आधुनिक लड़की’; गिनबुरा = ‘बिना किसी लक्ष्य के घूमना’
- 1878 जनता के लिए बाग़ · 1899 फ़िल्में · 1925 पहला रेडियो-स्टेशन
- मात्सुई सुमाको — एक गुड़िया का घर में नोरा का किरदार → राष्ट्रीय तारिका
एक समाज तब आधुनिक होता है जब उसके पास बिना काम के घूमने के लिए शब्द भी हो
‘आधुनिक’ किसे कहते हैं — और यह किसने तय किया?
1943 की संगोष्ठी ‘आधुनिकता पर विजय’ में निशितानी केजी ने ‘आधुनिक’ को तीन पश्चिमी धाराओं से परिभाषित किया — पुनर्जागरण, प्रोटेस्टेंट सुधार, और प्राकृतिक विज्ञानों का विकास
आधुनिकता पर विजय — 1943
पृ. 164 · क्रियाकलाप 2
- 1930–40 में जापान ने चीन और एशिया में उपनिवेश बढ़ाने के लिए लड़ाइयाँ छेड़ीं → पर्ल हार्बर
- असहमति प्रकट करने वालों पर जुल्म ढाये गए और उन्हें जेल भेजा गया
- देशभक्तों की संस्थाएँ बनीं — “इनमें महिलाओं के कई संगठन थे”
- निशितानी केजी — जापान की ‘नैतिक ऊर्जा’ (शब्द रांके से) ने उसे उपनिवेश बनने से बचाया
- और जापान का फ़र्ज़ है “एक विशाल पूर्वी एशिया” का निर्माण
पश्चिम पर ‘विजय’ की बात — पर ‘आधुनिक’ की परिभाषा पूरी तरह पश्चिमी
8 | हार के बाद वापसी | 1945; अनुच्छेद 9; 1964; पर्यावरण
जापान — हार से विश्व-शक्ति तक
पृ. 164–165
- 1945हिरोशिमा और नागासाकी; हार —NCERT दोनों मत रखती है
- 1945–47अमरीकी कब्ज़ा;विसैन्यीकरण; अनुच्छेद 9 — युद्ध राष्ट्रीय नीति के साधन के रूप में वर्जित
- 1946जंग के बाद पहले चुनाव —पहली बार महिलाओं ने मतदान किया
- 1956जापान संयुक्त राष्ट्र का सदस्य बना
- 1964तोक्यो ओलंपिक और शिंकांसेन — 200 मील/घंटा (अब 300)
- 1960 का दशककैडमियम औरमिनामाता में पारे का ज़हर → नागरिक समाज आंदोलन
- 1990 तकविश्व के कुछ कठोरतम पर्यावरण-नियंत्रण
“यह चमत्कार से कहीं अधिक था और इसकी जड़ें जापान के लंबे इतिहास में निहित थीं”
सौ साल की एक लड़ाई
तानाका शोज़ो के आशियो आंदोलन से लेकर विश्व के कुछ कठोरतम पर्यावरण-कानूनों तक — लगभग सौ वर्ष
पर्यावरण-कानून सरकारों की उदारता से नहीं, नागरिक आंदोलनों के दबाव से आए
9 | चीन | तीन नज़रिये; अफ़ीम और त्रिकोणीय व्यापार; परीक्षा प्रणाली
चीनी बहसों के तीन समूह
पृ. 165
| समूह | प्रतिनिधि | परंपरा के प्रति रुख |
|---|---|---|
| आरंभिक सुधारक | कांग योवेई, लियांग किचाउ | पारंपरिक विचारों का नये तरीके से इस्तेमाल |
| गणतांत्रिक क्रांतिकारी | सन यात-सेन | जापान और पश्चिम के विचारों से प्रभावित |
| कम्युनिस्ट पार्टी | माओ त्सेतुंग | असमानताओं को खत्म करना; विदेशियों को खदेड़ना |
जापान ने परंपरा का पुल बनाया; चीन ने पुल तोड़ा
त्रिकोणीय व्यापार — और भारत की जगह
पृ. 166 · क्रियाकलाप 3
- चीनी उत्पादों — चाय, रेशम, चीनी मिट्टी के बर्तन — की माँग से व्यापार में भारी असंतुलन
- पश्चिमी उत्पादों को चीन में बाज़ार नहीं मिला → भुगतान चाँदी में
- ईस्ट इंडिया कंपनी ने विकल्प ढूँढ़ा — अफ़ीम
- “यह हिंदुस्तान के कई हिस्सों में बहुत आराम से उगती थी”
- अफ़ीम → चाँदी → केंटन में उधार पत्रों के बदले कंपनी को → उसी चाँदी से चाय-रेशम की खरीद
- पहला अफ़ीम युद्ध 1839–1842 → क्विंग राजवंश कमज़ोर; सुधार की माँगें मज़बूत
अफ़ीम युद्ध चीन में लड़ा गया — पर उसकी फ़सल किसने उगाई?
एक चीनी विचारक की भारत पर टिप्पणी, 1903
भारत एक ऐसा देश है, जो किसी और देश नहीं, बल्कि एक कंपनी के हाथों बर्बाद हो गया — ईस्ट इंडिया कंपनी के।
लियांग किचाउ (1873–1929) — पृ. 167
और चीनी यह भी देखते थे कि ब्रितानिया चीन के साथ युद्ध में भारतीय जवानों का इस्तेमाल करता है
परीक्षा प्रणाली — योग्यता का पहला तंत्र, और उसका अंत
पृ. 167
| तथ्य | आँकड़ा |
|---|---|
| अभिजात वर्ग में प्रवेश (1850 तक) | लगभग 11 लाख |
| पहले स्तर पर सफलता | केवल 1–2 प्रतिशत, 24 साल की उम्र तक |
| डिग्रीधारक | 526,869 सिविल + 212,330 सैन्य |
| देश में राजकीय पद | केवल 27,000 |
एक व्यवस्था जो योग्यता पैदा करती है पर अवसर नहीं, वह अपने ही विरोधी तैयार करती है — 1905 में यह प्रणाली खत्म कर दी गई
10 | गणतंत्र से 1949 तक | सन यात-सेन; 4 मई; कुओमीनतांग; माओ
सन यात-सेन और तीन सिद्धांत
पृ. 167–168
- 1911 में मांचू साम्राज्य समाप्त; सन यात-सेन (1866–1925) के नेतृत्व में गणतंत्र
- वे निर्विवाद रूप से आधुनिक चीन के संस्थापक माने जाते हैं
- तीन सिद्धांत (सन मिन चुई):
- राष्ट्रवाद — मांचू वंश और अन्य साम्राज्यवादियों को हटाना
- गणतंत्र — गणतांत्रिक सरकार की स्थापना
- समाजवाद — पूँजी का नियमन और भूस्वामित्व में बराबरी
- ‘चार बड़ी ज़रूरतें’ — कपड़ा, खाना, घर और परिवहन
तीसरा सिद्धांत कभी लागू नहीं हुआ — और यही कुओमीनतांग की हार का कारण बना
4 मई का आंदोलन — तीन बार लौटा
पृ. 168, 173, 174
- 1919शांति सम्मेलन के विरोध में प्रदर्शन —इलाके वापस नहीं मिले
- —परंपरा पर हमला; विज्ञान, लोकतंत्र और राष्ट्रवाद से चीन को बचाने की माँग
- —सुधार —आम की भाषा, पैर बाँधने की प्रथा का अंत, शादी में बराबरी
- 1978“जैसे कि 60 साल पहले 4 मई के आंदोलन के समय था” —‘पाँचवीं आधुनिकता’ का पोस्टर
- 1989आंदोलन की70वीं सालगिरह; तियानममेन चौक का दमन
1919 का आंदोलन चीन में बौद्धिक स्वतंत्रता का स्थायी प्रतीक बन गया
कुओमीनतांग क्यों हारी
पृ. 168–169
- सामाजिक आधार शहरी इलाकों में; औद्योगिक विकास धीमा
- शंघाई में 1919 में मज़दूर 500,000 — पर अधिकतर लोग ‘नगण्य शहरी’ (शियाओ शिमिन)
- “पूँजी का नियमन और भूमि-अधिकारों में बराबरी लाना कभी अमल में नहीं आया”
- “पार्टी ने किसानों और बढ़ती सामाजिक असमानता की अनदेखी की”
- “लोगों की समस्याओं पर ध्यान देने की बजाय फ़ौजी व्यवस्था थोपने का प्रयास किया”
- 1945–49 में कीमतें 30 प्रतिशत प्रति महीने की रफ़्तार से बढ़ीं
कुओमीनतांग शहरों में थी, किसान गाँवों में थे — और माओ ने गाँव चुने
शंघाई, 1935 — एक अमरीकी संगीतकार की डायरी
चीनी तमाशबीनों ने हमारे साथ ऐसा बरताव किया जैसे हमने उनका अभीष्ट काम संपन्न किया हो और घर पहुँचने तक रास्ते भर वे किसी विजेता फुटबॉल टीम की तरह हमारा अभिनंदन करते रहे।
बक क्लेटन — एक काले अमरीकन तुरहीवादक, जिन्हें गोरे अमरीकियों ने होटल से निकाला था
क्रियाकलाप 4: भेदभाव का अहसास लोगों को कैसे एकताबद्ध करता है?
माओ का अलग रास्ता
पृ. 171–172
- कोमिंटर्न की परंपरागत समझ — क्रांति शहरी मज़दूर वर्गों के ज़रिये आयेगी
- माओ त्सेतुंग (1893–1976) ने किसानों पर आधारित अलग रास्ता चुना
- जियांग्सी 1928–34 — किसान परिषद; ज़मीन पर कब्ज़ा और पुनर्वितरण
- आज़ाद सरकार और सेना पर ज़ोर; ग्रामीण महिला संघों को प्रोत्साहन
- शादी के नए कानून — आयोजित शादियों पर रोक; तलाक आसान
- जुनवू सर्वेक्षण 1930 — नमक से लेकर लोहारों तक, शोषण के स्तरों का ज़मीनी अध्ययन
- लाँग मार्च 1934–35 — शांसी तक 6000 मील; नया अड्डा येनान
“इससे उन्हें मज़बूत सामाजिक आधार मिला” — हार से शुरू हुई यात्रा ने जीत की नींव रखी
11 | 1949 से आज तक | नया जनवाद; लंबी छलाँग; सांस्कृतिक क्रांति; सुधार
नया जनवाद और लंबी छलाँग
पृ. 172–173
- 1949 — पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना; ‘नया लोकतंत्र’ = सभी सामाजिक वर्गों का गठबंधन
- 1958 — लंबी छलाँग: घर के पिछवाड़े में इस्पात की भट्टियाँ
- पीपुल्स कम्यून्स — 1958 तक 26,000 समुदाय, कृषक आबादी का 98 प्रतिशत
- ‘समाजवादी व्यक्ति’ की पाँच प्रिय चीज़ें — पितृभूमि, जनता, काम, विज्ञान और जन सम्पत्ति
- महिला फ़ेडरेशन 760 लाख सदस्य; छात्र फ़ेडरेशन 32.9 लाख
- पर: “घरों के पिछवाड़ों में बनाई गई स्टील औद्योगिक लिहाज़ से अनुपयोगी था”
जनभागीदारी और तकनीकी व्यवहार्यता दो अलग चीज़ें हैं — विकास के लिए दोनों चाहिए
सांस्कृतिक क्रांति का सबसे बड़ा नुकसान
दोषारोपण और नारेबाज़ी ने तर्कसंगत बहस की जगह ले ली।
पृ. 173 — सांस्कृतिक क्रांति (1965–78) के बारे में
यही बात 1930–40 के जापान में भी हुई थी — दो अलग विचारधाराएँ, एक ही परिणाम
चार आधुनिकताएँ — और एक पाँचवीं
पार्टी ने 1978 में चार सूत्री लक्ष्य घोषित किए — विज्ञान, उद्योग, कृषि, रक्षा। 5 दिसंबर 1978 को दीवार पर लगे एक पोस्टर ने पाँचवीं आधुनिकता — लोकतंत्र का दावा किया
“लोकतंत्र के बिना अन्य आधुनिकताएँ कुछ भी नहीं बन पाएँगी”
चीन आज
पृ. 174
- तंग शीयाओफींग ने पार्टी पर नियंत्रण रखते हुए समाजवादी बाज़ार अर्थव्यवस्था शुरू की
- 1989 — 4 मई की 70वीं सालगिरह पर खुलेपन की माँग; तियानममेन का क्रूर दमन
- आज का प्रधान मत — मज़बूत राजनीतिक नियंत्रण, आर्थिक खुलापन, विश्व बाज़ार से जुड़ाव
- आलोचक — बढ़ती असमानताओं से सामाजिक तनाव
- और कन्फ़्यूशियसवाद जैसे पारंपरिक विचार पुनर्जीवित हो रहे हैं
1919 में ठुकराई गई परंपरा सौ साल बाद वापस बुलाई जा रही है
12 | ताइवान और कोरिया | दमन और विकास; और 1987 का मोड़
ताइवान — दमन और भूमि सुधार साथ-साथ
पृ. 174–175
- 1949 — चियांग काई-शेक 30 करोड़ से अधिक अमरीकी डॉलर और कलाकृतियाँ लेकर ताइवान पहुँचे
- फरवरी 1947 — प्रदर्शनों के बाद नेताओं की एक पूरी पीढ़ी की निर्ममतापूर्वक हत्या
- दमनकारी सरकार — बोलने और राजनीतिक विरोध की आज़ादी छीनी
- फिर भी भूमि सुधार लागू किया — खेती की उत्पादकता बढ़ी
- 1973 — कुल राष्ट्रीय उत्पाद में एशिया में जापान के बाद दूसरा स्थान
- “अमीर और गरीब के बीच का भी अंतराल लगातार घटता गया है”
जो भूमि सुधार चीन में न कर पाने से कुओमीनतांग हारी, वही उसने ताइवान में करके सफलता पाई
कोरिया — 1910 से 2017 तक
पृ. 175–179
- 1910जापान का जबरन कब्ज़ा;500+ वर्ष पुराने जोसोन वंश का अंत
- 194535 वर्ष बाद मुक्ति;38वीं समानांतर रेखा से विभाजन
- 1950–53कोरियाई युद्ध — शीत युद्ध का छद्म युद्ध; युद्धविराम समझौता
- 1960‘अप्रैल क्रांति’ — सिन्गमैन री का इस्तीफ़ा
- 1961पार्क चुंग-ही का सैन्य तख्तापलट
- 1970नया गाँव (सैमौल) आंदोलन
- 1972यूसिन संविधान — “लोकतंत्र अस्थायी रूप में निलंबित”
- 1980ग्वांगजू — मार्शल कानून और दमन
- 1987छात्र की मौत →छात्र + मध्यवर्ग → प्रत्यक्ष चुनाव का अधिकार
- 2016कैंडललाइट विरोध — शांतिपूर्ण प्रदर्शन और महाभियोग
कोरिया का कारण-चक्र
पृ. 178 — यही अभ्यास प्रश्न 8 का उत्तर है
- आर्थिक विकास — चुन प्रशासन में 1980 के 1.7% से 1983 तक 13.2%
- इसने जन्म दिया — शहरीकरण + शिक्षा के स्तर में सुधार + मीडिया की प्रगति
- इससे बढ़ी — नागरिकों में अपने राजनीतिक अधिकारों की आत्म-जागरूकता
- और उठी माँग — राष्ट्रपति के प्रत्यक्ष चुनाव के लिए संवैधानिक संशोधन
- 1997 — विदेशी मुद्रा संकट; नागरिकों का गोल्ड कलेक्शन मूवमेंट
“औद्योगिकीकरण की शुरुआत से ही लगभग सभी कोरियाई श्रमिक दल पहले से ही साक्षर थे”
कोरिया का निष्कर्ष — और इस अध्याय का भी
कोरियाई लोकतंत्र आर्थिक विकास का कर्ज़दार है, लेकिन यह देश के गणतंत्रवाद को प्रोत्साहित करने वाले कोरियाई नागरिकों की राजनीतिक जागरूकता ही है, जिसने आज इस देश को आगे बढ़ाने में प्रमुख भूमिका निभाई है।
पृ. 179
वृद्धि ने परिस्थितियाँ दीं — पर लोकतंत्र नागरिकों ने लिया
13 | आधुनिकता के दो मार्ग | और पुस्तक का समापन
चार देश, चार रास्ते
पृ. 179–180
| कसौटी | जापान | चीन | ताइवान | कोरिया |
|---|---|---|---|---|
| परंपरा | नए ढंग से इस्तेमाल | ठुकराई, फिर वापसी | कन्फ़्यूशियसवाद जारी | — |
| नेतृत्व | कुलीन + सम्राट-व्यवस्था | साम्यवादी दल | कुओमीनतांग | सैन्य (पार्क) |
| भूमि सुधार | 1945 के बाद | 1949 के बाद | लागू — उत्पादकता बढ़ी | — |
| लोकतंत्र | 1889 → 1946 | कड़ा नियंत्रण | 1987 के बाद | 1987 के बाद |
| असमानता | — | बढ़ रही है | घटती गई | — |
जापान — उपलब्धि और कीमत
पृ. 179
जो पाया
- आज़ादी बनाए रखी
- पारंपरिक हुनर को नए तरीके से इस्तेमाल किया
- तेज़ औद्योगीकरण और शिक्षा
जो कीमत चुकाई
- उग्र राष्ट्रवाद
- लोकतंत्र की माँग का गला घोंटा
- औपनिवेशिक साम्राज्य → क्षेत्र में बैर
“केवल परंपराओं को पुनर्जीवित करने का सवाल नहीं था बल्कि उन्हें नए और अलग रचनात्मक तरीके से इस्तेमाल करने की बात थी”
चीन का संतुलित मूल्यांकन — ‘तथापि’ शब्द पर ध्यान दीजिए
दमनकारी राजनीतिक व्यवस्था ने मुक्ति और समानता के आदर्शों को ऐसी नारेबाज़ी में बदल दिया, जो लोगों को चालाकी से प्रभावित कर अपने काबू में लाने में काम आती थी। तथापि इससे शताब्दियों पुरानी असमानताएँ हट गईं, शिक्षा का विस्तार हुआ और जनता के बीच एक जागरूकता पैदा हुई।
पृ. 180
इतिहास में ‘अच्छा’ और ‘बुरा’ एक ही घटना में साथ रह सकते हैं
पुस्तक का निष्कर्ष — विश्व इतिहास लिखने के तीन तरीके
पृ. 182–183
- पहला — लोगों के बीच संपर्क पर ध्यान; संस्कृतियों और सभ्यताओं के परस्पर संबंध
- दूसरा — आर्थिक विनिमय के क्षेत्रों की पहचान, जो संस्कृति और सत्ता के रूपों को बनाए रखते हैं
- तीसरा — ऐतिहासिक अनुभवों में अंतर स्पष्ट कर उनकी विशिष्टताओं को उभारना
- “आपको इन तीनों विधियों के संकेत इस पुस्तक में मिले होंगे”
- और एक चेतावनी — “विश्व-व्यापार, राजनीति तथा संस्कृति में यूरोप का वर्चस्व अभी क़ायम नहीं हुआ था”
यूरोपीय वर्चस्व शाश्वत नहीं, केवल दो-ढाई सौ साल पुराना है
पूरे वर्ष का सबसे महत्त्वपूर्ण वाक्य
एक ही स्रोत का प्रयोग करनेवाले इतिहासकार भिन्न बल्कि विपरीत राय पेश कर सकते हैं।
पुस्तक का निष्कर्ष, पृ. 183
यही बर्कहार्ट बनाम पीटर बर्क था · यही रूसो बनाम इरविंग था · यही हिरोशिमा पर दो मत हैं
और अंत में — पुस्तक का अंतिम प्रश्न
मार्क ब्लॉक ने दूसरे विश्वयुद्ध में खाई में रहते हुए लिखी अपनी पुस्तक द हिस्टोरियन्स क्राफ्ट की शुरुआत एक छोटे बच्चे के प्रश्न से की थी — ‘डैडी, मुझे बताइए, इतिहास का फ़ायदा क्या है?’
वे यह पुस्तक पूरी नहीं कर पाए — 1944 में प्रतिरोध में भाग लेने के कारण मारे गए। पुस्तक अधूरी ही छपी।