अध्याय 6विनिर्माण उद्योग

शिक्षण नोट्स39 मिनट

पाठ्यपुस्तक — समकालीन भारत–2, कक्षा 10 भूगोल · NCERT · पृष्ठ 58 से 71 (14 पृष्ठ)


शून्य — पढ़ाने से पहले यह समझ लीजिए

यह अध्याय दो भागों में बँटा है, और दोनों एक-दूसरे के विरोध में खड़े हैं।

भागपृष्ठक्या कहता है
पहला58 से 67उद्योग देश की रीढ़ हैं — इनसे रोज़गार, निर्यात, विदेशी मुद्रा और विकास आता है
दूसरा66 से 69उद्योग हवा, पानी, मिट्टी और कानों को बर्बाद कर रहे हैं

★यही इस अध्याय की आत्मा है। पाठ्यपुस्तक पहले उद्योगों की प्रशंसा करती है और फिर उन्हीं पर आरोप लगाती है। अंत में वह कोई एक पक्ष नहीं चुनती — वह कहती है: “सतत् पोषणीय विकास की चुनौतियों के लिए पर्यावरणीय संचेतना से युक्त आर्थिक विकास की ज़रूरत है।”

इसलिए हर बड़े उत्तर में दोनों पक्ष आने चाहिए। यह वही ढाँचा है जो अध्याय 3 (जल संसाधन) में था — पहले बाँधों की तारीफ़, फिर उनकी आलोचना।

अध्याय की मुख्य पंक्ति (बोर्ड पर लिखिए और पूरे अध्याय भर रहने दीजिए):

“उद्योग देश को अमीर बनाते हैं — पर उसी हवा, पानी और मिट्टी को ग़रीब कर देते हैं जिस पर देश खड़ा है।”

1 — शुरुआत: हरीश की दीवाली (पृष्ठ 58)

पाठ्यपुस्तक की शुरुआत एक बच्चे से होती है —

“दीवाली के अवसर पर हरीश अपने माता-पिता के साथ बाज़ार गया। उन्होंने उसके लिए कपड़े तथा जूते ख़रीदे। उसकी माँ ने बर्तन, चीनी, चाय व मृदा के दीप ख़रीदे। हरीश ने देखा कि दुकानें अत्यधिक सामान से भरी थीं। चीज़ों को इतनी अधिक मात्रा में देखकर वह हैरान था। उसके पिता ने समझाया कि जूते, कपड़े, चीनी आदि बड़े उद्योगों में मशीनों द्वारा बनाए जाते हैं; छोटे उद्योगों में बर्तन बनाए जाते हैं तथा दीप जैसी चीज़ें व्यक्तिगत तौर पर कारीगरों द्वारा घरेलू उद्योगों में बनाई जाती हैं।”

यह पैराग्राफ़ पूरे अध्याय का नक्शा है। एक ही बाज़ार में तीन तरह के उद्योग दिख गए — बड़े, छोटे और घरेलू। इसे कक्षा में ज़ोर से पढ़िए, फिर बच्चों से पूछिए: “तुम्हारे घर में दीवाली पर क्या-क्या आया? बताओ कौन-सी चीज़ किस उद्योग में बनी होगी?”

2 — विनिर्माण क्या है (पृष्ठ 58)

“कच्चे पदार्थ को मूल्यवान उत्पाद में परिवर्तित कर अधिक मात्रा में वस्तुओं के उत्पादन को विनिर्माण या वस्तु निर्माण कहा जाता है।”

चार उदाहरण जो पाठ्यपुस्तक ख़ुद देती है —

कच्चा मालतैयार माल
लकड़ीकाग़ज़
गन्नाचीनी
लौह-अयस्कलोहा-इस्पात
बॉक्साइटएल्यूमिनियम
  • “कई किस्म के कपड़े ऐसे रेशों से बनते हैं जो रेशा उद्योग में बनते हैं।”
  • “द्वितीयक कार्यों में लगे व्यक्ति कच्चे माल को परिष्कृत वस्तुओं में परिवर्तित करते हैं।”
  • स्टील, कार, कपड़ा उद्योग, बेकरी तथा पेय पदार्थों संबंधी उद्योगों में लगे श्रमिक इसी वर्ग के अंतर्गत आते हैं।
  • “किसी देश की आर्थिक उन्नति विनिर्माण उद्योगों के विकास से मापी जाती है।”

★यह आख़िरी वाक्य रेखांकित करवाइए — यह हर साल किसी न किसी रूप में पूछा जाता है।

3 — विनिर्माण का महत्त्व (पृष्ठ 58) — पाँच कारण

“विनिर्माण उद्योग सामान्यत: विकास की तथा विशेषत: आर्थिक विकास की रीढ़ समझे जाते हैं, क्योंकि —”

#कारण
1“विनिर्माण उद्योग न केवल कृषि के आधुनिकीकरण में सहायक हैं वरन् द्वितीयक व तृतीयक सेवाओं में रोज़गार उपलब्ध कराकर कृषि पर हमारी निर्भरता को कम करते हैं।”
2“देश में औद्योगिक विकास बेरोज़गारी तथा ग़रीबी उन्मूलन की एक आवश्यक शर्त है।” सार्वजनिक तथा संयुक्त क्षेत्र के उद्योग इसी विचार पर आधारित थे; जनजातीय तथा पिछड़े क्षेत्रों में उद्योगों की स्थापना का उद्देश्य क्षेत्रीय असमानताओं को कम करना था।
3“निर्मित वस्तुओं का निर्यात वाणिज्य व्यापार को बढ़ाता है जिससे अपेक्षित विदेशी मुद्रा की प्राप्ति होती है।”
4“वे देश ही विकसित हैं जो कच्चे माल को विभिन्न तथा अधिक मूल्यवान तैयार माल में विनिर्मित करते हैं। भारत का विकास विविध व शीघ्र औद्योगिक विकास में निहित है।”
5“कृषि तथा उद्योग एक दूसरे से पृथक नहीं हैं ये एक दूसरे के पूरक हैं।”

पाँचवें बिंदु को खोलकर समझाइए —

  • कृषि आधारित उद्योगों ने कृषि पैदावार बढ़ोतरी को प्रोत्साहित किया है
  • ये उद्योग कच्चे माल के लिए कृषि पर निर्भर हैं
  • और इनके द्वारा निर्मित उत्पाद — सिंचाई के लिए पंप, उर्वरक, कीटनाशक दवाएँ, प्लास्टिक पाइप, मशीनें व कृषि औज़ार — पर किसान निर्भर है
  • “इसलिए विनिर्माण उद्योग के विकास तथा स्पर्धा से न केवल कृषि उत्पादन को बढ़ावा मिला है, अपितु उत्पादन प्रक्रिया भी सक्षम हुई है।”

और अंत में वैश्वीकरण की चेतावनी —

“आज वैश्वीकरण के युग में हमारे उद्योगों को अधिक प्रतिस्पर्धी तथा सक्षम होने की आवश्यकता है। केवल आत्मनिर्भरता ही काफ़ी नहीं है। हमारी वस्तुएँ गुणवत्ता में अंतर्राष्ट्रीय स्तर की हों तभी हम अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में प्रतिस्पर्धा कर पाएँगे।”

4 — उद्योगों का वर्गीकरण (पृष्ठ 59) — पाँच आधार

यह अध्याय की सबसे ज़्यादा पूछी जाने वाली तालिका है। इसे बोर्ड पर बनवाइए और कॉपी में उतरवाइए।

आधार 1 — प्रयुक्त कच्चे माल के स्रोत के आधार पर

वर्गउदाहरण
कृषि आधारितसूती वस्त्र, ऊनी वस्त्र, पटसन, रेशम वस्त्र, रबर, चीनी, चाय, कॉफी तथा वनस्पति तेल उद्योग
खनिज आधारितलोहा तथा इस्पात, सीमेंट, एल्यूमिनियम, मशीन, औज़ार तथा पेट्रोरसायन उद्योग

आधार 2 — प्रमुख भूमिका के आधार पर

वर्गपरिभाषाउदाहरण
आधारभूत उद्योग“जिनके उत्पाद या कच्चे माल पर दूसरे उद्योग निर्भर हैं”लोहा इस्पात, ताँबा प्रगलन व एल्यूमिनियम प्रगलन उद्योग
उपभोक्ता उद्योग“जो उत्पादन उपभोक्ताओं के सीधे उपयोग हेतु करते हैं”चीनी, दंतमंजन, काग़ज़, पंखे, सिलाई मशीन आदि

आधार 3 — पूँजी निवेश के आधार पर

  • “एक लघु उद्योग को परिसंपत्ति की एक इकाई पर अधिकतम निवेश मूल्य के परिप्रेक्ष्य में परिभाषित किया जाता है।”
  • “यह निवेश सीमा, समय के साथ परिवर्तित होती रहती है।”
  • “अधिकतम स्वीकार्य निवेश स्वामी के आधार पर की जाती है।”
  • “वर्तमान में अधिकतम निवेश एक करोड़ रुपये तक स्वीकार्य है।”

आधार 4 — स्वामित्व के आधार पर

वर्गपरिभाषाउदाहरण
सार्वजनिक क्षेत्र“सरकारी एजेंसियों द्वारा प्रबंधित तथा सरकार द्वारा संचालित”भारत हैवी इलैक्ट्रिकल लिमिटेड (BHEL) तथा स्टील अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया लिमिटेड (SAIL)
निजी क्षेत्र“जिनका एक व्यक्ति के स्वामित्व में और उसके द्वारा संचालित अथवा लोगों के स्वामित्व में”टिस्को, बजाज ऑटो लिमिटेड, डाबर उद्योग
संयुक्त उद्योग“जो राज्य सरकार और निजी क्षेत्र के संयुक्त प्रयास से चलाये जाते हैं”ऑयल इंडिया लिमिटेड (OIL)
सहकारी उद्योग“जिनका स्वामित्व कच्चे माल की पूर्ति करने वाले उत्पादकों, श्रमिकों या दोनों के हाथों में होता है; संसाधनों का कोष संयुक्त होता है तथा लाभ-हानि का विभाजन भी अनुपातिक”महाराष्ट्र के चीनी उद्योग, केरल के नारियल पर आधारित उद्योग

आधार 5 — कच्चे तथा तैयार माल की मात्रा व भार के आधार पर

वर्गउदाहरण
भारी उद्योगलोहा तथा इस्पात
हल्के उद्योग“जो कम भार वाले कच्चे माल का प्रयोग कर हल्के तैयार माल का उत्पादन करते हैं” — जैसे विद्युतीय उद्योग

पृष्ठ 59 की क्रियाकलाप का हल — कच्चे और तैयार माल के भार के आधार पर दो वर्गों में बाँटिए: भारी — पोत निर्माण · मोटरगाड़ी · तेल · पीतल के बर्तन हल्के — बुनने की सलाई · फ्यूज़ तार · घड़ियाँ · सिलाई मशीन · विद्युत बल्ब · पेंट के ब्रश

5 — कृषि आधारित उद्योग

5.1 वस्त्र उद्योग — भारत का इकलौता पूर्ण उद्योग (पृष्ठ 59)

“भारतीय अर्थव्यवस्था में वस्त्र उद्योग का अपना अलग महत्त्व है क्योंकि इसका औद्योगिक उत्पादन में महत्त्वपूर्ण योगदान है। देश का यह अकेला उद्योग है जो कच्चे माल से उच्चतम अतिरिक्त मूल्य उत्पाद तक की श्रृंखला में परिपूर्ण तथा आत्मनिर्भर है।”

चित्र 6.1 — वस्त्र उद्योग में अतिरिक्त मूल्य उत्पाद (यह श्रृंखला याद करवाइए)

चरणक्या बनता है
रेशा उत्पादनकच्चा रेशा
धुनाई कताईसूत
बुनाईकपड़ा
रंगाई व परिष्करण↓
वस्त्र विनिर्माणवस्त्र (गारमेंट)

इसे एक पंक्ति में बोलिए — “रेशा → सूत → कपड़ा → वस्त्र। हर चरण पर चीज़ महँगी होती जाती है — इसी को ‘अतिरिक्त मूल्य’ कहते हैं।”

5.2 सूती वस्त्र उद्योग (पृष्ठ 59–60)

इतिहास —

  • “प्राचीन भारत में सूती वस्त्र हाथ से कताई और हथकरघा बुनाई तकनीकों से बनाये जाते थे।”
  • “अठारहवीं शताब्दी के बाद विद्युतीय करघों का उपयोग होने लगा।”
  • “औपनिवेशिक काल के दौरान हमारे परंपरागत उद्योगों को बहुत हानि हुई क्योंकि हमारे उद्योग इंग्लैंड के मशीन निर्मित वस्त्रों से स्पर्धा नहीं कर पाये।”
  • ★“पहला सफल सूती वस्त्र उद्योग 1854 में मुंबई में लगाया गया।”
  • “यूरोप दो विश्व-युद्धों से जूझ रहा था तथा भारत इंग्लैंड के अधीन था। ऐसे में इंग्लैंड में कपड़े की माँग आपूर्ति हेतु भारतीय सूती वस्त्र उद्योग को प्रोत्साहन मिला।”

स्थानीयकरण के कारक —

  • “आरंभिक वर्षों में सूती वस्त्र उद्योग महाराष्ट्र तथा गुजरात के कपास उत्पादन क्षेत्रों तक ही सीमित थे।”
  • कारक — कपास की उपलब्धता, बाज़ार, परिवहन, पत्तनों की समीपता, श्रम, नमीयुक्त जलवायु

कृषि से संबंध —

“इस उद्योग का कृषि से निकट का संबंध है और कृषकों, कपास चुनने वालों, गाँठ बनाने वालों, कताई करने वालों, रंगाई करने वालों, डिज़ाइन बनाने वालों, पैकेट बनाने वालों और सिलाई करने वालों को यह जीविका प्रदान करता है।” आठ तरह के लोग — यह गिनती परीक्षा में काम आती है।

आगे और पीछे दोनों तरफ़ माँग —

  • “इस उद्योग के कारण रसायन रंजक, मिल-स्टोर तथा पैकेजिंग सामग्री और इंजीनियरिंग उद्योग की माँग बढ़ती है फलस्वरूप इन उद्योगों का विकास होता है।”

! भारत की कमज़ोरी — यह पंक्ति ध्यान से पढ़ाइए

“यद्यपि कताई कार्य महाराष्ट्र, गुजरात तथा तमिलनाडु में केंद्रित है लेकिन बुनाई अत्यधिक विकेंद्रीकृत है… भारत में कताई उत्पादन विश्व स्तर का है लेकिन बुना वस्त्र कम गुणवत्ता वाला है क्योंकि यह देश में उत्पादित उच्च स्तरीय धागे का अधिक प्रयोग नहीं कर पाता।” बुनाई का कार्य — हथकरघों, विद्युतकरघों व मिलों में होता है। “हाथ से बुनी खादी कुटीर उद्योग के रूप में बुनकरों को उनके घरों में बड़े पैमाने पर रोज़गार प्रदान कराता है।”

पृष्ठ 60 का प्रश्न — “महात्मा गांधी ने सूत कातने तथा खादी बुनने पर क्यों बल दिया?” उत्तर की दिशा — क्योंकि खादी गाँव में ही, बिना बड़ी पूँजी के, हर घर में रोज़गार देती थी; और क्योंकि विदेशी मिल-कपड़ा ख़रीदना अंग्रेज़ी उद्योग को मज़बूत करना था। खादी आत्मनिर्भरता का प्रतीक बन गई।

पृष्ठ 60 का दूसरा प्रश्न — “कारख़ानों द्वारा निर्मित लूमेज (Loomage) को कम रखना क्यों महत्त्वपूर्ण है?” उत्तर की दिशा — ताकि हथकरघा और विद्युतकरघा चलाने वाले लाखों बुनकरों का रोज़गार बचा रहे; मिलें कम लोगों से ज़्यादा कपड़ा बना देती हैं, जिससे बुनकर बेरोज़गार हो जाते हैं।

5.3 पटसन उद्योग (पृष्ठ 60)

बातविवरण
विश्व में स्थानपटसन व पटसन निर्मित सामान का सबसे बड़ा उत्पादक; और बांग्लादेश के पश्चात् दूसरा बड़ा निर्यातक
कितने उद्योगवर्ष 2010-11 में लगभग 80 पटसन उद्योग
कहाँअधिकांश पश्चिम बंगाल में हुगली नदी तट पर — 98 किमी. लंबी तथा 3 किमी. चौड़ी एक सँकरी मेखला में
पहला उद्योग1855 में कोलकाता के निकट रिशरा में
विभाजन का असर“1947 में देश के विभाजन के पश्चात् पटसन मिलें तो भारत में रह गईं लेकिन तीन-चौथाई जूट उत्पादक क्षेत्र पूर्वी पाकिस्तान अर्थात् बांग्लादेश में चले गए।”

हुगली तट पर स्थित होने के छह कारण —

  1. पटसन उत्पादक क्षेत्रों की निकटता
  2. सस्ता जल परिवहन
  3. सड़क, रेल व जल परिवहन का जाल — कच्चे माल को मिलों तक ले जाने में सहायक
  4. कच्चे पटसन को संसाधित करने में प्रचुर जल
  5. सस्ता श्रमिक — पश्चिम बंगाल तथा समीपवर्ती राज्य ओडिशा, बिहार व उत्तर प्रदेश से
  6. कोलकाता का एक बड़े नगरीय केंद्र के रूप में बैंकिंग, बीमा और जूट के सामान के निर्यात के लिए पत्तन की सुविधाएँ

★यह छह-बिंदु वाला उत्तर लगभग हर वर्ष आता है। याद रखने का सूत्र — “कच्चा माल · पानी · परिवहन · पानी · मज़दूर · कोलकाता”

5.4 चीनी उद्योग (पृष्ठ 60–61)

बातविवरण
विश्व में स्थानचीनी उत्पादन में दूसरा; लेकिन गुड़ व खांडसारी के उत्पादन में प्रथम
कच्चे माल की समस्या“इस उद्योग में प्रयुक्त कच्चा माल भारी होता है तथा ढुलाई में इसके सूक्रोस की मात्रा घट जाती है।”
राज्यउत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, गुजरात, पंजाब, हरियाणा तथा मध्य प्रदेश
केंद्रण“चीनी मिलों का 60 प्रतिशत उत्तर प्रदेश तथा बिहार में है।”
स्वभाव“यह उद्योग मौसमी है, अत: सहकारी क्षेत्र के लिए उपयुक्त है।”

दक्षिण की ओर खिसकाव — तीन कारण

“पिछले कुछ वर्षों से इन मिलों की संख्या दक्षिणी और पश्चिमी राज्यों विशेषकर महाराष्ट्र में बढ़ी है।”

  1. “यहाँ के गन्ने में अधिक सूक्रोस की मात्रा है”
  2. “अपेक्षाकृत ठंडी जलवायु भी गुणकारी है”
  3. “इन राज्यों में सहकारी समितियाँ भी सफल रही हैं”

पृष्ठ 61 का प्रश्न — “यह उद्योग मौसमी है, अत: सहकारी क्षेत्र के लिए उपयुक्त है — ऐसा क्यों?” उत्तर की दिशा — क्योंकि गन्ना साल में कुछ ही महीने आता है, इसलिए मिल पूरे साल नहीं चलती; ऐसे उद्योग में निजी मालिक को लाभ कम दिखता है, पर किसान ख़ुद मिलकर मिल चलाएँ तो उन्हें अपनी फसल का दाम भी मिलता है और लाभ भी बँटता है।

6 — खनिज आधारित उद्योग

परिभाषा (पृष्ठ 62): “वे उद्योग जो खनिज व धातुओं को कच्चे माल के रूप में प्रयोग करते हैं, खनिज आधारित उद्योग कहलाते हैं।”

6.1 लोहा तथा इस्पात उद्योग (पृष्ठ 62)

  • “लोहा तथा इस्पात उद्योग एक आधारभूत (basic) उद्योग है क्योंकि अन्य सभी भारी, हल्के और मध्यम उद्योग इनसे बनी मशीनरी पर निर्भर हैं।”
  • उपयोग — इंजीनियरिंग सामान, निर्माण सामग्री, रक्षा, चिकित्सा, टेलीफ़ोन, वैज्ञानिक उपकरण और विभिन्न उपभोक्ता वस्तुएँ
  • “इस्पात के उत्पादन तथा खपत को प्राय: एक देश के विकास का पैमाना माना जाता है।”
  • “लोहा तथा इस्पात एक भारी उद्योग है क्योंकि इसमें प्रयुक्त कच्चा तथा तैयार माल दोनों ही भारी और स्थूल होते हैं और इसके लिए अधिक परिवहन लागत की आवश्यकता होती है।”

★चार अनुपात याद कीजिए —

“इस उद्योग के लिए लौह-अयस्क, कोकिंग कोल तथा चूना पत्थर का अनुपात लगभग 4:2:1 का है। इस्पात को कठोर बनाने के लिए इसमें मैंगनीज़ की कुछ मात्रा की भी आवश्यकता होती है।”

कहाँ केंद्रित है और क्यों —

“भारत में छोटानागपुर के पठारी क्षेत्र में अधिकांश लोहा तथा इस्पात उद्योग संकेंद्रित हैं।” कारण —

  • लौह अयस्क की कम लागत
  • उच्च कोटि के कच्चे माल की निकटता
  • सस्ते श्रमिक
  • स्थानीय बाज़ार में इनकी माँग की विशाल संभाव्यता

चित्र 6.2 — इस्पात निर्माण प्रक्रिया (पाँच चरण)

चरणक्या होता है
1. कच्चे माल का कारख़ानों तक परिवहन—
2. झोंकदार भट्ठी“लौह-अयस्क का गलाया जाना। चूना पत्थर एक सहायक खनिज है जो इसमें मिलाया जाता है। धातु का मैल हटाया जाता है। अयस्क को गर्म करने के लिए कोक का ईंधन के रूप में इस्तेमाल”
3. ढलवाँ लोहा“तरल पदार्थ को साँचों में डाला जाता है जिससे ढलवाँ लोहा तैयार होता है”
4. इस्पात बनाना“ढलवाँ लोहे को पुन: गलाकर ऑक्सीकरण द्वारा अशुद्धता हटाकर तथा मैंगनीज़, निकल, क्रोमियम मिलाकर शुद्ध किया जाता है”
5. धातु को आकार देना“रोलिंग, प्रेसिंग, ढलाई और गढ़ाई”

★मानचित्र (पृष्ठ 63) — भारत के लोहा और इस्पात संयंत्र (दस)

बोकारो · बर्नपुर · दुर्गापुर · जमशेदपुर · राउरकेला · भिलाई · विशाखापट्टनम · विजयनगर · भद्रावती · सेलम ध्यान दीजिए — इनमें से सात पूर्वी-मध्य भारत में हैं और केवल तीन दक्षिण में। यही ‘छोटानागपुर में संकेंद्रण’ का मानचित्रीय प्रमाण है।

6.2 एल्यूमिनियम प्रगलन (Smelting) — पृष्ठ 64

  • “भारत में एल्यूमिनियम प्रगलन दूसरा सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण धातु शोधन उद्योग है।”
  • गुण — हल्का, जंग अवरोधी, ऊष्मा का सुचालक, लचीला तथा अन्य धातुओं के मिश्रण से अधिक कठोर बनाया जा सकता है
  • उपयोग — हवाई जहाज़ बनाने में, बर्तन तथा तार बनाने में
  • “कई उद्योगों में इसका महत्त्व इस्पात, ताँबा, जस्ता व सीसे के विकल्प के रूप में प्रयुक्त होने से बढ़ा है।”
  • कच्चा माल — बॉक्साइट, “जो भारी, गहरे लाल रंग की चट्टान जैसा होता है”
  • संयंत्र किन राज्यों में — ओडिशा, पश्चिम बंगाल, केरल, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र व तमिलनाडु

★चित्र 6.4 — यह अनुपात ज़रूर याद कीजिए

4 से 6 टन बॉक्साइट → 2 टन एल्यूमिना → 1 टन एल्यूमिनियम यानी एक टन एल्यूमिनियम के लिए छह टन तक चट्टान खोदनी पड़ती है।

दो महत्त्वपूर्ण आवश्यकताएँ —

  1. नियमित ऊर्जा की पूर्ति — विद्युत 18,600 कि.वाट प्रति टन अयस्क
  2. कम क़ीमत पर कच्चे माल की सुनिश्चित उपलब्धता

चित्र 6.5 में तीन और आवश्यकताएँ दी हैं — प्रगालक स्थल तक भारी अयस्क का पहुँचना · शोधशाला से कैल्सियम युक्त पेट्रोलियम कोक · कोयला खान से पिच; और क्रायोलाइट एक पिघली धातु है जो इलैक्ट्रोलाइट का काम करती है।

6.3 रसायन उद्योग (पृष्ठ 65)

बातविवरण
GDP में हिस्सा“सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 3 प्रतिशत”
स्थानएशिया का तीसरा बड़ा तथा विश्व में आकार की दृष्टि से 12वें स्थान पर
आकार“इसमें लघु तथा बृहत् दोनों प्रकार की विनिर्माण इकाइयाँ सम्मिलित हैं”

दो वर्ग —

वर्गक्या-क्याकिस काम आते हैं
अकार्बनिक रसायनसलफ्यूरिक अम्ल · नाइट्रिक अम्ल · क्षार · सोडा ऐश · कास्टिक सोडासलफ्यूरिक अम्ल — उर्वरक, कृत्रिम वस्त्र, प्लास्टिक, गोंद, रंग-रोगन, डाई में; सोडा ऐश — काँच, साबुन, शोधक या अपमार्जक, काग़ज़ में
कार्बनिक रसायनपेट्रोरसायनकृत्रिम वस्त्र, कृत्रिम रबर, प्लास्टिक, रंजक पदार्थ, दवाइयाँ, औषध रसायन
  • “कार्बनिक रसायन उद्योग तेल शोधन शालाओं या पेट्रोरसायन संयंत्रों के समीप स्थापित हैं।”
  • ★“रसायन उद्योग अपने आप में एक बड़ा उपभोक्ता भी है। आधारभूत रसायन एक प्रक्रिया द्वारा अन्य रसायन उत्पन्न करते हैं।”

पृष्ठ 65 का प्रश्न — “इन उद्योगों का देश में विस्तृत फैलाव है, क्या आप बता सकते हैं ऐसा क्यों?” उत्तर की दिशा — क्योंकि इनका कच्चा माल हर जगह मिल जाता है, इनका बाज़ार पूरे देश में है (हर उद्योग को रसायन चाहिए), और कच्चा माल भारी नहीं होता, इसलिए इन्हें किसी एक जगह बँधे रहने की मजबूरी नहीं।

6.4 उर्वरक उद्योग (पृष्ठ 65)

तीन प्रकार —

  1. नाइट्रोजनी उर्वरक (मुख्यत: यूरिया)
  2. फ़ास्फ़ेटिक उर्वरक (D.A.P.) तथा अमोनियम फ़ास्फ़ेट
  3. मिश्रित उर्वरक — जिसमें तीन मुख्य पोषक उर्वरक नाइट्रोजन, फ़ास्फ़ेट व पोटाश शामिल हैं

★“तीसरा अर्थात् पोटाश पूर्णत: आयात किया जाता है क्योंकि हमारे देश में वाणिज्यिक रूप से या किसी भी रूप में प्रयुक्त होने वाला पोटाश या पोटाशियम यौगिकों के भंडार नहीं हैं।” यह वाक्य रेखांकित कीजिए — यह अध्याय 5 (खनिज) से जुड़ता है और परीक्षा में पूछा जाता है।

कहाँ —

  • “हरित क्रांति के पश्चात् यह उद्योग देश के अन्य अनेक भागों में भी फैल गया।”
  • “गुजरात, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, पंजाब और केरल राज्य कुल उर्वरक उत्पादन का लगभग 50 प्रतिशत उत्पादन करते हैं।”
  • ★“अन्य महत्त्वपूर्ण उत्पादक राज्य आंध्र प्रदेश, ओडिशा, राजस्थान, बिहार, महाराष्ट्र, असम, पश्चिम बंगाल, गोआ, दिल्ली, मध्य प्रदेश तथा कर्नाटक हैं।”

6.5 सीमेंट उद्योग (पृष्ठ 65)

  • आवश्यक — घर, कारख़ाने, पुल, सड़कें, हवाई अड्डा, बाँध तथा अन्य व्यापारिक प्रतिष्ठानों के निर्माण में
  • कच्चा माल (भारी व स्थूल) — चूना पत्थर, सिलिका और जिप्सम
  • “रेल परिवहन के अतिरिक्त इसमें कोयला तथा विद्युत ऊर्जा भी आवश्यक है।”
  • पहला सीमेंट उद्योग सन् 1904 में चेन्नई में लगाया गया था; स्वतंत्रता के पश्चात इस उद्योग का प्रसार हुआ
  • “इस उद्योग की इकाइयाँ गुजरात में लगाई गई हैं, क्योंकि यहाँ से इसे खाड़ी के देशों के बाज़ार की उपलब्धता है।”

पृष्ठ 65 की क्रियाकलाप — “सीमेंट विनिर्माण इकाइयों की स्थापना कहाँ पर आर्थिक रूप से व्यावहारिक होगी?” उत्तर — वहाँ जहाँ चूना पत्थर, कोयला और विद्युत तीनों पास-पास हों और रेल परिवहन उपलब्ध हो; क्योंकि तीनों ही भारी और स्थूल हैं। ★“भारत में यह उद्योग अन्य किन राज्यों में स्थित है?” — यहाँ राजस्थान का नाम ज़रूर लिखवाइए, क्योंकि पिछले अध्याय में पढ़ा था कि चूना पत्थर उत्पादन में राजस्थान भारत में प्रथम (22%) है।

6.6 मोटरगाड़ी उद्योग (पृष्ठ 65)

  • “मोटरगाड़ी यात्रियों तथा सामान के तीव्र परिवहन के साधन हैं।”
  • क्या बनता है — ट्रक, बसें, कारें, मोटर साइकिल, स्कूटर, तिपहिया तथा बहुउपयोगी वाहन
  • “उदारीकरण के पश्चात्, नए और आधुनिक मॉडल के वाहनों का बाज़ार तथा वाहनों की माँग बढ़ी, जिससे इस उद्योग में विशेषकर कार, दोपहिया तथा तिपहिया वाहनों में अपार वृद्धि हुई है।”
  • कहाँ — दिल्ली, गुड़गाँव, मुंबई, पुणे, चेन्नई, कोलकाता, लखनऊ, इंदौर, हैदराबाद, जमशेदपुर तथा बेंगलूरु के आस पास

6.7 सूचना प्रौद्योगिकी तथा इलैक्ट्रोनिक उद्योग (पृष्ठ 66)

  • उत्पाद — ट्रांजिस्टर से लेकर टेलीविज़न, टेलीफ़ोन, सेल्यूलर टेलीकॉम, टेलीफ़ोन एक्सचेंज, राडार, कंप्यूटर तथा दूरसंचार उद्योग के अनेक उपकरण
  • ★“बेंगलुरु भारत की इलैक्ट्रॉनिक राजधानी के रूप में उभरा है।”
  • अन्य केंद्र — मुंबई, दिल्ली, हैदराबाद, पुणे, चेन्नई, कोलकाता तथा लखनऊ
  • “इस उद्योग का सर्वाधिक संकेंद्रण बेंगलुरु, नोएडा, मुम्बई, चेन्नई, हैदराबाद और पुणे में है।”
  • “यह भी अत्यन्त रोचक है कि भारत में सूचना प्रौद्योगिकी उद्योग के सफल होने का कारण हार्डवेयर व सॉफ्टवेयर का निरंतर विकास है।”

★मानचित्र (पृष्ठ 67) — कुछ सॉफ़्टवेयर टेक्नोलॉजी पार्क्स

श्रीनगर · मोहाली · नोएडा · जयपुर · गाँधीनगर · इंदौर · मुंबई · पुणे · हैदराबाद · बेंगलूरु · मैसूरु · चेन्नई · थिरुवनंथपुरम · विशाखापट्टनम · भुवनेश्वर · कोलकाता · गुवाहाटी ★इस सूची में जयपुर है — राजस्थान का नाम इस अध्याय में यहाँ भी आता है।

7 — औद्योगिक प्रदूषण तथा पर्यावरण निम्नीकरण (पृष्ठ 66)

यहाँ से अध्याय पलट जाता है। अब तक जो उद्योग नायक थे, अब वे आरोपी हैं।

“यद्यपि उद्योगों की भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि व विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका है, तथापि इनके द्वारा बढ़ते भूमि, वायु, जल तथा पर्यावरण प्रदूषण को भी नकारा नहीं जा सकता।”

“उद्योग चार प्रकार के प्रदूषण के लिए उत्तरदायी हैं — (क) वायु (ख) जल (ग) भूमि (घ) ध्वनि।” — “प्रदूषण करने वाले उद्योगों में ताप विद्युतगृह भी सम्मिलित हैं।”

7.1 वायु प्रदूषण

  • कारण — “अधिक अनुपात में अनचाही गैसों की उपस्थिति जैसे सल्फर डाइऑक्साइड तथा कार्बन मोनोऑक्साइड”
  • “वायु में निलंबित कणनुमा पदार्थों में ठोस व द्रवीय दोनों ही प्रकार के कण होते हैं जैसे — धूलि, स्प्रे, कुहासा तथा धुआँ।”
  • किनसे — रसायन व काग़ज़ उद्योग, ईंटों के भट्टे, तेल शोधनशालाएँ, प्रगलन उद्योग, जीवाश्म ईंधन दहन तथा छोटे-बड़े कारख़ाने
  • ★“ज़हरीली गैसों का रिसाव बहुत भयानक तथा दूरगामी प्रभावों वाला हो सकता है। क्या आप भोपाल गैस त्रासदी के विषय में जानते हैं?”
  • असर — मानव स्वास्थ्य, पशुओं, पौधों, इमारतों तथा पूरे पर्यावरण पर दुष्प्रभाव

7.2 जल प्रदूषण

  • कारण — “उद्योगों द्वारा कार्बनिक तथा अकार्बनिक अपशिष्ट पदार्थों के नदी में छोड़ने से”
  • प्रमुख कारक उद्योग — काग़ज़, लुगदी, रसायन, वस्त्र तथा रंगाई उद्योग, तेल शोधन शालाएँ, चमड़ा उद्योग तथा इलैक्ट्रोप्लेटिंग उद्योग
  • वे क्या बहाते हैं — रंग, अपमार्जक, अम्ल, लवण तथा भारी धातुएँ जैसे सीसा, पारा, कीटनाशक, उर्वरक, कार्बन, प्लास्टिक और रबर सहित कृत्रिम रसायन
  • ★“भारत के मुख्य अपशिष्ट पदार्थों में फ्लाई एश, फ़ोस्फ़ो-जिप्सम तथा लोहा-इस्पात की अशुद्धियाँ (slag) हैं।”

7.3 तापीय प्रदूषण

“जब कारख़ानों तथा तापघरों से गर्म जल को बिना ठंडा किए ही नदियों तथा तालाबों में छोड़ दिया जाता है, तो जल में तापीय प्रदूषण होता है।” कक्षा में पूछिए — “जलीय जीवन पर इसका क्या प्रभाव होगा?” (मछलियाँ मर जाती हैं; पानी में घुली ऑक्सीजन घट जाती है)

7.4 परमाणु अपशिष्ट

“परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के अपशिष्ट व परमाणु शस्त्र उत्पादक कारख़ानों से कैंसर, जन्मजात विकार तथा अकाल प्रसव जैसी बीमारियाँ होती हैं।”

7.5 भूमि/मृदा प्रदूषण

  • “मृदा व जल प्रदूषण आपस में संबंधित हैं।”
  • “मलबे का ढेर विशेषकर काँच, हानिकारक रसायन, औद्योगिक बहाव, पैकिंग, लवण तथा कूड़ा-कर्कट मृदा को अनुपजाऊ बनाता है।”
  • “वर्षा जल के साथ ये प्रदूषक ज़मीन से रिसते हुए भूमिगत जल तक पहुँच कर उसे भी प्रदूषित कर देते हैं।”

7.6 ध्वनि प्रदूषण

  • “ध्वनि प्रदूषण से खिन्नता तथा उत्तेजना ही नहीं वरन् श्रवण असक्षमता, हृदय गति, रक्त चाप तथा अन्य कायिक व्यथाएँ भी बढ़ती हैं।”
  • “अनचाही ध्वनि, उत्तेजना व मानसिक चिंता का स्रोत है।”
  • किनसे — औद्योगिक तथा निर्माण कार्य, कारख़ानों के उपकरण, जेनरेटर, लकड़ी चीरने के कारख़ाने, गैस यांत्रिकी तथा विद्युत ड्रिल

8 — पर्यावरणीय निम्नीकरण की रोकथाम (पृष्ठ 68)

★“कारख़ानों द्वारा निष्कासित एक लिटर अपशिष्ट से लगभग आठ गुना स्वच्छ जल दूषित होता है।” यह आँकड़ा बच्चों को ज़ोर से बोलकर सुनाइए — यह अध्याय का सबसे चौंकाने वाला वाक्य है।

जल के लिए तीन सुझाव

क्रमसुझाव
(क)“विभिन्न प्रक्रियाओं में जल का न्यूनतम उपयोग तथा जल का दो या अधिक उत्तरोत्तर अवस्थाओं में पुनर्चक्रण द्वारा पुन: उपयोग”
(ख)“जल की आवश्यकता पूर्ति हेतु वर्षा जल संग्रहण”
(ग)“नदियों व तालाबों में गर्म जल तथा अपशिष्ट पदार्थों को प्रवाहित करने से पहले उनका शोधन”

औद्योगिक अपशिष्ट का शोधन — तीन चरण

चरणक्या होता है
(अ) प्राथमिक शोधनयांत्रिक साधनों द्वारा — “अपशिष्ट पदार्थों की छँटाई, उनके छोटे-छोटे टुकड़े करना, ढकना तथा तलछट जमाव”
(ब) द्वितीयक शोधनजैविक प्रक्रियाओं द्वारा
(स) तृतीयक शोधनजैविक, रासायनिक तथा भौतिक प्रक्रियाओं द्वारा — “इसमें अपशिष्ट जल को पुनर्चक्रण द्वारा पुन: प्रयोग योग्य बनाया जाता है”
  • “जहाँ भूमिगत जल का स्तर कम है, वहाँ उद्योगों द्वारा इसके अधिक निष्कासन पर क़ानूनी प्रतिबंध होना चाहिये।”

वायु के लिए

  • ऊँची चिमनियाँ
  • चिमनियों में एलेक्ट्रोस्टैटिक अवक्षेपण (electrostatic precipitators)
  • स्क्रबर उपकरण
  • गैसीय प्रदूषक पदार्थों को जड़त्वीय रूप से पृथक करने के लिए उपकरण
  • “कारख़ानों में कोयले की अपेक्षा तेल व गैस के प्रयोग से धुएँ के निष्कासन में कमी लायी जा सकती है।”

ध्वनि के लिए

  • मशीनों व उपकरणों का कम उपयोग
  • जेनरेटरों में साइलेंसर (silencers)
  • ऐसी मशीनरी जो ऊर्जा सक्षम हों तथा कम ध्वनि प्रदूषण करें
  • ध्वनि अवशोषित करने वाले उपकरण, और कारीगरों को कानों पर शोर नियंत्रण उपकरण पहनने चाहिये

और अध्याय का अंतिम वाक्य

“सतत् पोषणीय विकास की चुनौतियों के लिए पर्यावरणीय संचेतना से युक्त आर्थिक विकास की ज़रूरत है।”

9 — राष्ट्रीय ताप विद्युतगृह (NTPC) द्वारा दिखाया गया मार्ग (पृष्ठ 68–69)

“भारत में राष्ट्रीय ताप विद्युतगृह कारपोरेशन विद्युत प्रदान करने वाली मुख्य निगम है। इसके पास पर्यावरण प्रबंधतंत्र (EMS) 14001 के लिए आई.एस.ओ. (ISO) प्रमाण पत्र है।”

पाँच उपाय —

क्रमउपाय
(अ)“आधुनिकतम तकनीकों पर आधारित उपकरणों का सही उपयोग करके तथा विद्यमान उपकरणों में सुधार”
(ब)“अधिकतम राख का इस्तेमाल कर अपशिष्ट पदार्थों का न्यून उत्पादन”
(स)“पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखने के लिए हरित क्षेत्र की सुरक्षा तथा वृक्षारोपण के लिए प्रेरित करना”
(द)“तरल अपशिष्ट प्रबंधन, राख युक्त जलीय पुनर्चक्रण तथा राख-संग्रह (Ash pond) प्रबंधन द्वारा पर्यावरण प्रदूषण को कम करना”
(ध)“सभी ऊर्जा संयंत्रों का पारिस्थितिकीय रूप से मॉनीटर तथा समीक्षा करना एवं ऑनलाइन आँकड़ों का प्रबंधन”

चित्र 6.7 — फ़रीदाबाद में यमुना एक्शन प्लान के अंतर्गत वाहित मल उपचार संयंत्र; चित्र 6.8 — रामागुंडम संयंत्र।

10 — NCERT अभ्यास के पूरे उत्तर (पृष्ठ 69–70)

प्रश्न 1 — बहुवैकल्पिक

प्रश्नउत्तर
(i) कौन-सा उद्योग चूना पत्थर को कच्चे माल के रूप में प्रयुक्त करता है?(ग) सीमेंट
(ii) कौन-सा उद्योग बॉक्साइट को कच्चे माल के रूप में प्रयोग करता है?(क) एल्यूमिनियम प्रगलन
(iii) कौन-सा उद्योग दूरभाष, कंप्यूटर आदि संयंत्र निर्मित करते हैं?(ग) इलैक्ट्रानिक

प्रश्न 2 (लगभग 30 शब्द)

(i) विनिर्माण क्या है?

कच्चे पदार्थ को मूल्यवान उत्पाद में परिवर्तित कर अधिक मात्रा में वस्तुओं के उत्पादन को विनिर्माण या वस्तु निर्माण कहा जाता है। जैसे — लकड़ी से काग़ज़, गन्ने से चीनी, लौह-अयस्क से लोहा-इस्पात और बॉक्साइट से एल्यूमिनियम बनाया जाता है। यह एक द्वितीयक क्रिया है।

(ii) आधारभूत उद्योग क्या है? उदाहरण देकर बताएँ।

आधारभूत उद्योग वे उद्योग हैं जिनके उत्पाद या कच्चे माल पर दूसरे उद्योग निर्भर हैं। इनके उदाहरण लोहा इस्पात, ताँबा प्रगलन व एल्यूमिनियम प्रगलन उद्योग हैं। लोहा तथा इस्पात उद्योग इसीलिए आधारभूत है क्योंकि अन्य सभी भारी, हल्के और मध्यम उद्योग इससे बनी मशीनरी पर निर्भर हैं।

प्रश्न 3 (लगभग 120 शब्द)

(i) उद्योग पर्यावरण को कैसे प्रदूषित करते हैं?

उद्योग चार प्रकार के प्रदूषण के लिए उत्तरदायी हैं — वायु प्रदूषण — अधिक अनुपात में अनचाही गैसों जैसे सल्फर डाइऑक्साइड तथा कार्बन मोनोऑक्साइड की उपस्थिति से, तथा धूलि, स्प्रे, कुहासा व धुएँ जैसे निलंबित कणनुमा पदार्थों से। रसायन व काग़ज़ उद्योग, ईंटों के भट्टे, तेल शोधनशालाएँ और प्रगलन उद्योग प्रदूषण के नियमों का उल्लंघन करते हुए धुआँ निष्कासित करते हैं। भोपाल गैस त्रासदी इसी का भयानक उदाहरण है। जल प्रदूषण — उद्योगों द्वारा कार्बनिक तथा अकार्बनिक अपशिष्ट पदार्थों के नदी में छोड़ने से। काग़ज़, लुगदी, रसायन, वस्त्र, रंगाई, तेल शोधन, चमड़ा तथा इलैक्ट्रोप्लेटिंग उद्योग रंग, अपमार्जक, अम्ल, लवण तथा सीसा-पारा जैसी भारी धातुएँ जल में बहाते हैं। मुख्य अपशिष्ट फ्लाई एश, फ़ोस्फ़ो-जिप्सम तथा लोहा-इस्पात की अशुद्धियाँ (slag) हैं। जब गर्म जल बिना ठंडा किए नदियों में छोड़ा जाता है तो तापीय प्रदूषण होता है। भूमि प्रदूषण — काँच, हानिकारक रसायन, औद्योगिक बहाव, पैकिंग, लवण तथा कूड़ा-कर्कट मृदा को अनुपजाऊ बनाते हैं, और वर्षा जल के साथ रिसकर भूमिगत जल तक पहुँच जाते हैं। ध्वनि प्रदूषण — औद्योगिक व निर्माण कार्य, कारख़ानों के उपकरण, जेनरेटर, लकड़ी चीरने के कारख़ाने और विद्युत ड्रिल से; इससे श्रवण असक्षमता, हृदय गति व रक्त चाप की व्यथाएँ बढ़ती हैं।

(ii) उद्योगों द्वारा पर्यावरण निम्नीकरण को कम करने के लिए उठाए गए विभिन्न उपायों की चर्चा करें।

जल के लिए — विभिन्न प्रक्रियाओं में जल का न्यूनतम उपयोग तथा दो या अधिक उत्तरोत्तर अवस्थाओं में पुनर्चक्रण द्वारा पुन: उपयोग; जल की आवश्यकता पूर्ति हेतु वर्षा जल संग्रहण; और नदियों व तालाबों में गर्म जल तथा अपशिष्ट पदार्थों को प्रवाहित करने से पहले उनका शोधन। शोधन तीन चरणों में होता है — यांत्रिक साधनों द्वारा प्राथमिक शोधन (छँटाई, टुकड़े करना, ढकना, तलछट जमाव), जैविक प्रक्रियाओं द्वारा द्वितीयक शोधन, तथा जैविक-रासायनिक-भौतिक प्रक्रियाओं द्वारा तृतीयक शोधन, जिसमें अपशिष्ट जल पुन: प्रयोग योग्य बनाया जाता है। जहाँ भूमिगत जल का स्तर कम है, वहाँ अधिक निष्कासन पर क़ानूनी प्रतिबंध होना चाहिए। वायु के लिए — ऊँची चिमनियाँ, चिमनियों में एलेक्ट्रोस्टैटिक अवक्षेपण, स्क्रबर उपकरण तथा गैसीय प्रदूषकों को जड़त्वीय रूप से पृथक करने के उपकरण; और कोयले की अपेक्षा तेल व गैस के प्रयोग से धुएँ में कमी। ध्वनि के लिए — मशीनों व उपकरणों का कम उपयोग, जेनरेटरों में साइलेंसर, ऊर्जा सक्षम व कम शोर वाली मशीनरी, ध्वनि अवशोषित उपकरण तथा कारीगरों के लिए कानों पर शोर नियंत्रण उपकरण। अंतत: सतत् पोषणीय विकास की चुनौतियों के लिए पर्यावरणीय संचेतना से युक्त आर्थिक विकास की ज़रूरत है।

क्रियाकलाप (पृष्ठ 70) — एक शब्द वाले उत्तर

संकेतअक्षरउत्तर
मशीनरी चलाने में प्रयुक्त(5)POWER
कारख़ानों में काम करने वाले व्यक्ति(6)WORKER
उत्पाद को जहाँ बेचा जाता है(6)MARKET
वह व्यक्ति जो सामान बेचता है(8)RETAILER
वस्तु उत्पादन(7)PRODUCE
निर्माण या उत्पादन(11)MANUFACTURE
भूमि, जल तथा वायु अवनयन(9)POLLUTION

वर्ग पहेली (पृष्ठ 71) — पूरा हल

संकेतउत्तर
वस्त्र, चीनी, वनस्पति तेल तथा रोपण उद्योग जो कृषि से कच्चा माल प्राप्त करते हैंAGRO BASED
चीनी उद्योग में प्रयुक्त होने वाला कच्चा पदार्थSUGARCANE
इस रेशे को गोल्डन फ़ाइबर (Golden Fibre) भी कहते हैंJUTE
लौह-अयस्क, कोकिंग कोयला तथा चूना पत्थर इस उद्योग के प्रमुख कच्चे माल हैंIRON STEEL
छत्तीसगढ़ में स्थित सार्वजनिक क्षेत्र का लोहा-इस्पात उद्योगBHILAI
उत्तर प्रदेश में इस स्थान पर डीज़ल रेलवे इंजन बनाए जाते हैंVARANASI

11 — राजस्थान इस अध्याय में कहाँ आता है★

#कहाँक्या
1मानचित्र पृष्ठ 61बीकानेर और जयपुर — ऊनी वस्त्र उद्योग
2उर्वरक उद्योग (पृष्ठ 65)राजस्थान अन्य महत्त्वपूर्ण उर्वरक उत्पादक राज्यों की सूची में
3मानचित्र पृष्ठ 67जयपुर — सॉफ़्टवेयर टेक्नोलॉजी पार्क
4सीमेंट उद्योग (जोड़कर)सीमेंट का मुख्य कच्चा माल चूना पत्थर है, और पिछले अध्याय के अनुसार चूना पत्थर उत्पादन में राजस्थान भारत में प्रथम (22%) है — इसीलिए राजस्थान में सीमेंट उद्योग बहुत विकसित है

★चौथा बिंदु पाठ्यपुस्तक में सीधे नहीं लिखा है — यह अध्याय 5 और अध्याय 6 को जोड़कर निकलता है। RBSE में ऐसा जोड़ा हुआ उत्तर अलग से अंक दिलाता है। इसे बच्चों को ख़ुद निकालने दीजिए: “सीमेंट किससे बनता है? चूना पत्थर से। चूना पत्थर में कौन-सा राज्य पहला है? राजस्थान। तो सीमेंट के कारख़ाने कहाँ ज़्यादा होंगे?”

12 — इस अध्याय के अनिवार्य आँकड़े

आँकड़ाकिसका
1854पहला सफल सूती वस्त्र उद्योग — मुंबई
1855पहला पटसन उद्योग — रिशरा (कोलकाता के निकट)
1904पहला सीमेंट उद्योग — चेन्नई
98 किमी. × 3 किमी.हुगली तट की पटसन मेखला
लगभग 80पटसन उद्योग (2010-11)
तीन-चौथाईजूट उत्पादक क्षेत्र जो 1947 में बांग्लादेश चले गए
60 प्रतिशतचीनी मिलें — उत्तर प्रदेश तथा बिहार में
4 : 2 : 1लौह-अयस्क : कोकिंग कोल : चूना पत्थर
4–6 टन → 2 टन → 1 टनबॉक्साइट → एल्यूमिना → एल्यूमिनियम
18,600 कि.वाट प्रति टनएल्यूमिनियम प्रगलन के लिए विद्युत
लगभग 3 प्रतिशतGDP में रसायन उद्योग का हिस्सा
तीसरा / 12वाँरसायन उद्योग — एशिया में तीसरा, विश्व में 12वाँ
लगभग 50 प्रतिशतउर्वरक — गुजरात, तमिलनाडु, उ.प्र., पंजाब, केरल
एक करोड़ रुपयेलघु उद्योग की अधिकतम निवेश सीमा
आठ गुनाएक लिटर औद्योगिक अपशिष्ट कितना स्वच्छ जल दूषित करता है
ISO 14001NTPC का पर्यावरण प्रबंधतंत्र प्रमाण पत्र

13 — शब्दावली

शब्दअर्थ
विनिर्माणकच्चे पदार्थ को मूल्यवान उत्पाद में बदलकर अधिक मात्रा में वस्तुएँ बनाना।
द्वितीयक क्रियावह कार्य जिसमें कच्चे माल को परिष्कृत वस्तु में बदला जाता है।
आधारभूत उद्योगजिसके उत्पाद या कच्चे माल पर दूसरे उद्योग निर्भर हों।
उपभोक्ता उद्योगजो सीधे उपभोक्ता के उपयोग के लिए उत्पादन करे।
लघु उद्योगजिसमें अधिकतम निवेश एक करोड़ रुपये तक हो।
सहकारी उद्योगजिसका स्वामित्व कच्चा माल देने वाले उत्पादकों/श्रमिकों के हाथ में हो और लाभ-हानि अनुपातिक बँटे।
संयुक्त उद्योगराज्य सरकार और निजी क्षेत्र के संयुक्त प्रयास से चलने वाला उद्योग।
अतिरिक्त मूल्य (Value addition)हर चरण पर वस्तु के मूल्य में होने वाली वृद्धि — रेशा से वस्त्र तक।
लूमेज (Loomage)करघों द्वारा निर्मित कपड़े की मात्रा।
प्रगलन (Smelting)अयस्क को गलाकर उसमें से शुद्ध धातु निकालना।
झोंकदार भट्ठी (Blast furnace)वह भट्ठी जिसमें लौह-अयस्क को कोक व चूना पत्थर के साथ गलाया जाता है।
ढलवाँ लोहा (Pig iron)भट्ठी से निकला तरल लोहा जो साँचों में जमाया जाता है।
क्रायोलाइटपिघली धातु जो एल्यूमिनियम प्रगलन में इलैक्ट्रोलाइट का काम करती है।
सूक्रोसगन्ने में पाई जाने वाली मीठी शर्करा, जो ढुलाई में घट जाती है।
फ्लाई एशकोयला जलने से बची महीन राख — मुख्य औद्योगिक अपशिष्ट।
स्लैग (Slag)लोहा-इस्पात बनाते समय निकलने वाला मैल/अशुद्धि।
एलेक्ट्रोस्टैटिक अवक्षेपणचिमनी में लगा वह उपकरण जो विद्युत आवेश से धूल-कण रोक लेता है।
स्क्रबरधुएँ को पानी या रसायन से धोकर साफ़ करने वाला उपकरण।
तापीय प्रदूषणगर्म जल बिना ठंडा किए नदी-तालाब में छोड़ने से होने वाला प्रदूषण।
सतत् पोषणीय विकासऐसा विकास जो पर्यावरण को नुक़सान पहुँचाए बिना हो।

14 — एक वाक्य में पूरा अध्याय

विनिर्माण कच्चे माल को मूल्यवान उत्पाद में बदलने की द्वितीयक क्रिया है, जिससे देश की आर्थिक उन्नति मापी जाती है; उद्योगों को कच्चे माल, भूमिका, पूँजी, स्वामित्व और भार के आधार पर बाँटा जाता है; कृषि आधारित उद्योगों में वस्त्र, पटसन और चीनी तथा खनिज आधारित उद्योगों में लोहा-इस्पात, एल्यूमिनियम, रसायन, उर्वरक, सीमेंट, मोटरगाड़ी और इलैक्ट्रोनिक प्रमुख हैं; परंतु यही उद्योग वायु, जल, भूमि और ध्वनि — चारों का प्रदूषण करते हैं, इसलिए सतत् पोषणीय विकास की चुनौतियों के लिए पर्यावरणीय संचेतना से युक्त आर्थिक विकास की ज़रूरत है।