अध्याय 1संसाधन एवं विकास

शिक्षण नोट्स61 मिनट

पुस्तक: समकालीन भारत–2 (कक्षा 10, NCERT — भूगोल) पाठ्यपुस्तक पृष्ठ: 1 से 12 तक


इस फ़ाइल को कैसे पढ़ें

यह फ़ाइल पूरे अध्याय की पूरी और आसान व्याख्या है। इसमें हर बात पूरे वाक्यों में लिखी गई है, ताकि आप इसे पढ़कर समझ भी सकें और वैसे ही उत्तर-पुस्तिका में लिख भी सकें।

कठिन शब्दों के अर्थ भाग 11 में, सभी आँकड़े भाग 12 में, और मानचित्र-कार्य की पूरी सूची फ़ाइल 05 (प्रश्न बैंक) के भाग च में दी गई है।

भूगोल इतिहास से अलग है — यह बात पहले ही समझ लीजिए। इतिहास में आपको कब और क्यों बताना होता है। भूगोल में आपको कहाँ, कितना और क्यों बताना होता है। इसलिए इस विषय में तीन चीज़ें सबसे ज़्यादा अंक दिलाती हैं — (1) राज्यों के नाम, (2) प्रतिशत के आँकड़े, और (3) मानचित्र पर जगह दिखाना। हर उत्तर में इनमें से कम से कम एक ज़रूर होना चाहिए।

0. सबसे पहले यह समझ लीजिए — यह अध्याय है किस बारे में?

अध्याय की शुरुआत एक बहुत साधारण सवाल से होती है —

“क्या आप उन वस्तुओं का नाम बता सकते हैं जो गाँवों और शहरों में हमारे जीवन को आराम पहुँचाते हैं?”

और फिर पाठ्यपुस्तक ‘संसाधन’ की परिभाषा देती है। यह परिभाषा शब्दश: याद कीजिए —

“हमारे पर्यावरण में उपलब्ध प्रत्येक वस्तु जो हमारी आवश्यकताओं को पूरा करने में प्रयुक्त की जा सकती है और जिसको बनाने के लिए प्रौद्योगिकी उपलब्ध है, जो आर्थिक रूप से संभाव्य और सांस्कृतिक रूप से मान्य है, एक ‘संसाधन’ है।”

इस परिभाषा में चार शर्तें छिपी हैं। इन्हें अलग-अलग लिखिए —

शर्तअर्थ
1. आवश्यकता पूरी करेवह चीज़ हमारे किसी काम आती हो।
2. प्रौद्योगिकी उपलब्ध होउसे निकालने या इस्तेमाल करने की तकनीक हमारे पास हो।
3. आर्थिक रूप से संभाव्य होउसे निकालने में जितना ख़र्च हो, उससे ज़्यादा फ़ायदा मिलता हो।
4. सांस्कृतिक रूप से मान्य होसमाज उसका इस्तेमाल स्वीकार करता हो।

एक उदाहरण से समझिए — समुद्र के पानी में सोना घुला हुआ है। पर उसे निकालने में जितना ख़र्च आएगा, उससे मिलने वाला सोना कम क़ीमत का होगा। इसलिए वह आर्थिक रूप से संभाव्य नहीं है — यानी वह अभी संसाधन नहीं है। यह उदाहरण कक्षा में परिभाषा को जीवित कर देता है।

0.1 इस अध्याय की सबसे बड़ी बात (इसे कभी मत भूलिए)

पाठ्यपुस्तक का यह वाक्य पूरे अध्याय का दिल है —

“क्या आप भी अन्य बहुत से लोगों की तरह संसाधनों को प्राकृतिक उपहार समझते हैं? ऐसा नहीं है। संसाधन मानवीय क्रियाओं का परिणाम हैं।”

यानी —

कोई चीज़ अपने आप ‘संसाधन’ नहीं होती। वह तभी संसाधन बनती है जब मनुष्य उसे उपयोगी बना ले।

इसीलिए पाठ्यपुस्तक कहती है — “मानव स्वयं संसाधनों का महत्त्वपूर्ण हिस्सा हैं। वे पर्यावरण में पाए जाने वाले पदार्थों को संसाधनों में परिवर्तित करते हैं तथा उन्हें प्रयोग करते हैं।”

यह विचार पूरे अध्याय में लौट-लौटकर आएगा। राजस्थान में पवन और सौर ऊर्जा हमेशा से थी — पर वह तभी ‘संसाधन’ बनी जब हमारे पास पवनचक्की और सोलर पैनल की तकनीक आई।

0.2 चित्र 1.1 — प्रकृति, प्रौद्योगिकी और संस्थाओं का त्रिकोण (पृष्ठ 1)

पाठ्यपुस्तक का यह वाक्य ध्यान से पढ़िए —

“हमारे पर्यावरण में उपलब्ध वस्तुओं की रूपांतरण प्रक्रिया प्रकृति, प्रौद्योगिकी और संस्थाओं के पारस्परिक क्रियात्मक संबंध में निहित है।”

चित्र 1.1 में एक त्रिकोण है जिसके बीच में ‘मानव’ है और तीन कोनों पर ये तीन चीज़ें हैं —

कोनाक्या हैउदाहरण
भौतिक पर्यावरण (प्रकृति)जो प्रकृति ने दियाकोयला, पानी, मिट्टी, धूप
प्रौद्योगिकीजिससे हम उसे इस्तेमाल करते हैंखदान की मशीन, बाँध, सोलर पैनल
संस्थाएँजो नियम और व्यवस्था बनाती हैंसरकार, पंचायत, क़ानून, योजना आयोग
  • “मानव प्रौद्योगिकी द्वारा प्रकृति के साथ क्रिया करते हैं और अपने आर्थिक विकास की गति को तेज़ करने के लिए संस्थाओं का निर्माण करते हैं।”

इसे कक्षा में ऐसे समझाइए — नदी प्रकृति है, बाँध प्रौद्योगिकी है, और बाँध का पानी किस गाँव को कितना मिलेगा — यह तय करने वाली सरकार संस्था है। तीनों मिलकर ही नदी को ‘जल संसाधन’ बनाते हैं।

1. संसाधनों का वर्गीकरण (पृष्ठ 1–2)

पाठ्यपुस्तक कहती है — “इन संसाधनों का वर्गीकरण निम्न प्रकार से किया जा सकता है।” यह चार आधारों पर होता है, और यह परीक्षा का सबसे पक्का प्रश्न है।

1.1 चार आधार — यह तालिका पूरी याद कीजिए

आधारप्रकार
(क) उत्पत्ति के आधार परजैव और अजैव
(ख) समाप्यता के आधार परनवीकरण योग्य और अनवीकरण योग्य
(ग) स्वामित्व के आधार परव्यक्तिगत, सामुदायिक, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय
(घ) विकास के स्तर के आधार परसंभावी, विकसित भंडार और संचित कोष

याद रखने का आसान तरीक़ा — “उ-स-स्वा-वि” → उत्पत्ति · समाप्यता · स्वामित्व · विकास का स्तर।

1.2 चित्र 1.2 — संसाधनों का वर्गीकरण (पृष्ठ 1)

पाठ्यपुस्तक ने यह वर्गीकरण एक प्रवाह-चित्र में दिया है। उसे तालिका के रूप में इस तरह समझिए —

मुख्य वर्गउपवर्गआगे का उपवर्गउदाहरण
प्राकृतिकनवीकरण योग्यसतत् अथवा प्रवाहपवन, जल
प्राकृतिकनवीकरण योग्यजैवप्राकृतिक वनस्पति (वन), वन्य जीव
प्राकृतिकअनवीकरण योग्यपुन: चक्रीयधातु
प्राकृतिकअनवीकरण योग्यअचक्रीयजीवाश्म ईंधन
मानवीयसंरचनाएँ एवं संस्थाएँ—शिक्षा-व्यवस्था, सरकार
मानवीयमात्रा एवं गुणवत्ता—जनसंख्या, कौशल

! यह सबसे ज़्यादा पूछा जाने वाला चित्र है। ‘पुन: चक्रीय’ और ‘अचक्रीय’ का फ़र्क़ ज़रूर याद रखिए — धातु को गलाकर दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है, पर पेट्रोल एक बार जल गया तो ख़त्म।

1.3 हर आधार को अलग-अलग समझिए

(क) उत्पत्ति के आधार पर —

प्रकारअर्थउदाहरण
जैवजिनकी उत्पत्ति जीवमंडल से होती है, यानी जिनमें जीवन है।मनुष्य, वनस्पति जगत, प्राणी जगत, मत्स्य जीवन, पशुधन
अजैववे सभी वस्तुएँ जो निर्जीव पदार्थों से बनी हैं।चट्टानें और धातुएँ

(ख) समाप्यता के आधार पर —

प्रकारअर्थउदाहरण
नवीकरण योग्यजिन्हें भौतिक, रासायनिक या यांत्रिक प्रक्रियाओं द्वारा दोबारा उत्पन्न किया जा सकता है।सौर और पवन ऊर्जा, जल, वन और वन्य जीवन
अनवीकरण योग्यजिनका विकास एक लंबे भूगर्भीय अंतराल में होता है, इसलिए वे एक बार समाप्त होने पर दोबारा नहीं बनते।खनिज और जीवाश्म ईंधन

नवीकरण योग्य संसाधनों को दो भागों में बाँटा जाता है — सतत् अथवा प्रवाह (जैसे पवन और जल, जो लगातार बहते रहते हैं) और जैव (जैसे वन और वन्य जीव, जो ख़ुद को दोबारा पैदा करते हैं)।

(ग) स्वामित्व के आधार पर —

प्रकारअर्थ
व्यक्तिगत संसाधनवे संसाधन जिन पर व्यक्तिगत रूप से किसी एक व्यक्ति का अधिकार होता है — जैसे किसी किसान का अपना खेत, अपना कुआँ या अपना घर।
सामुदायिक संसाधनवे संसाधन जो समुदाय के सभी सदस्यों के लिए उपलब्ध होते हैं — जैसे गाँव की चरागाह, तालाब, और शहरों के सार्वजनिक पार्क, पिकनिक स्थल तथा खेल के मैदान।
राष्ट्रीय संसाधनवे सभी संसाधन जो देश की सीमा के भीतर हैं और जिन पर देश का अधिकार है — इसमें तट रेखा से 12 समुद्री मील तक का महासागरीय क्षेत्र भी शामिल है।
अंतर्राष्ट्रीय संसाधनवे संसाधन जिनका नियमन कुछ अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएँ करती हैं — जैसे तट रेखा से 200 समुद्री मील की दूरी से परे खुले महासागरीय संसाधन, जिन्हें किसी देश की अनुमति के बिना कोई नहीं उपयोग कर सकता।

(घ) विकास के स्तर के आधार पर —

प्रकारअर्थउदाहरण
संभावी संसाधनवे संसाधन जो किसी प्रदेश में मौजूद हैं, पर उनका उपयोग अभी नहीं हुआ है।राजस्थान और गुजरात में पवन तथा सौर ऊर्जा की अपार संभावनाएँ हैं, पर उनका पूरा विकास अभी नहीं हुआ है।
विकसित संसाधनवे संसाधन जिनका सर्वेक्षण हो चुका है, जिनकी मात्रा और गुणवत्ता निर्धारित हो चुकी है, और जिनका उपयोग शुरू हो चुका है।कोयले और लोहे की चालू खदानें।
भंडारपर्यावरण में उपलब्ध वे पदार्थ जो मानव आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकते हैं, पर उपयुक्त प्रौद्योगिकी न होने के कारण अभी उपयोग में नहीं हैं।पानी में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन है; हाइड्रोजन ऊर्जा का समृद्ध स्रोत है, पर उसके उपयोग की तकनीक अभी विकसित नहीं है।
संचित कोषभंडार का वह हिस्सा जिसे उपलब्ध तकनीकी ज्ञान से इस्तेमाल किया जा सकता है, पर अभी उसका उपयोग शुरू नहीं हुआ।नदियों के जल से विद्युत बनाई जा सकती है, और बाँधों में जमा जल का उपयोग भविष्य में किया जा सकता है।

‘भंडार’ और ‘संचित कोष’ का फ़र्क़ बच्चों को सबसे ज़्यादा उलझाता है। आसान तरीक़ा — भंडार में तकनीक नहीं है; संचित कोष में तकनीक है, पर अभी इस्तेमाल नहीं किया। यह एक वाक्य पूरा फ़र्क़ साफ़ कर देता है।

2. संसाधनों का विकास (पृष्ठ 2)

2.1 अंधाधुंध उपयोग से पैदा हुई तीन समस्याएँ

पाठ्यपुस्तक कहती है — “ऐसा विश्वास किया जाता था कि संसाधन प्रकृति की देन है। परिणामस्वरूप, मानव ने इनका अंधाधुंध उपयोग किया है, जिससे निम्नलिखित मुख्य समस्याएँ पैदा हो गई हैं।”

क्रमसमस्या
1कुछ व्यक्तियों के लालचवश संसाधनों का ह्रास हुआ है।
2संसाधन समाज के कुछ ही लोगों के हाथ में आ गए हैं, जिससे समाज दो हिस्सों — संसाधन संपन्न एवं संसाधनहीन, अर्थात् अमीर और गरीब — में बँट गया।
3संसाधनों के अंधाधुंध शोषण से वैश्विक पारिस्थितिकी संकट पैदा हो गया है — जैसे भूमंडलीय तापन, ओज़ोन परत अवक्षय, पर्यावरण प्रदूषण और भूमि निम्नीकरण।

इन तीनों को तीन शब्दों में याद कीजिए — ह्रास · बँटवारा · पारिस्थितिकी संकट।

और इसका हल क्या है? पाठ्यपुस्तक ख़ुद बताती है —

  • “मानव जीवन की गुणवत्ता और विश्व शांति बनाए रखने के लिए संसाधनों का समाज में न्यायसंगत बँटवारा आवश्यक हो गया है।”
  • “यदि कुछ ही व्यक्तियों तथा देशों द्वारा संसाधनों का वर्तमान दोहन जारी रहता है, तो हमारी पृथ्वी का भविष्य ख़तरे में पड़ सकता है।”
  • “इसलिए, हर तरह के जीवन का अस्तित्व बनाए रखने के लिए संसाधनों के उपयोग की योजना बनाना अति आवश्यक है।”

इस भाग का सबसे महत्त्वपूर्ण वाक्य — “सतत् अस्तित्व सही अर्थ में सतत् पोषणीय विकास का ही एक हिस्सा है।”

2.2 सतत् पोषणीय विकास — यह परिभाषा शब्दश: याद कीजिए (बॉक्स, पृष्ठ 2)

“सतत् पोषणीय आर्थिक विकास का अर्थ है कि विकास पर्यावरण को बिना नुकसान पहुँचाए हो और वर्तमान विकास की प्रक्रिया भविष्य की पीढ़ियों की आवश्यकता की अवहेलना न करे।”

इस परिभाषा के दो हिस्से हैं —

हिस्साअर्थ
1विकास से पर्यावरण को नुक़सान न पहुँचे।
2आज का विकास आने वाली पीढ़ियों की ज़रूरतों को नज़रअंदाज़ न करे।

कक्षा में इसे ऐसे समझाइए — “अगर आज हम सारा पानी ख़त्म कर देंगे, तो तुम्हारे बच्चों के लिए क्या बचेगा?” यही सतत् पोषणीय विकास का पूरा अर्थ है।

2.3 रियो डी जेनेरो पृथ्वी सम्मेलन, 1992 (बॉक्स, पृष्ठ 2)

यह बॉक्स परीक्षा में सीधे पूछा जाता है। पूरा याद कीजिए —

बिंदुविवरण
कब और कहाँजून 1992 में ब्राज़ील के शहर रियो डी जेनेरो में।
कौन आए100 से भी अधिक राष्ट्राध्यक्ष।
यह कौन-सा सम्मेलन थाप्रथम अंतर्राष्ट्रीय पृथ्वी सम्मेलन।
क्यों बुलाया गयाविश्व स्तर पर उभरते पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक-आर्थिक विकास की समस्याओं का हल ढूँढ़ने के लिए।
किस पर हस्ताक्षर हुएभूमंडलीय जलवायु परिवर्तन और जैविक विविधता पर एक घोषणा पत्र पर।
और क्या हुआभूमंडलीय वन सिद्धांतों (Forest Principles) पर सहमति जताई गई।
सबसे बड़ा परिणाम21वीं शताब्दी में सतत् पोषणीय विकास के लिए एजेंडा 21 को स्वीकृति प्रदान की।

2.4 एजेंडा 21 (बॉक्स, पृष्ठ 2)

बिंदुविवरण
यह क्या हैएक घोषणा, जिसे 1992 में रियो डी जेनेरो में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण और विकास सम्मेलन (UNCED) के तत्वाधान में राष्ट्राध्यक्षों द्वारा स्वीकार किया गया था।
उद्देश्यभूमंडलीय सतत् पोषणीय विकास हासिल करना।
यह क्या है (दूसरे शब्दों में)यह एक कार्यसूची है, जिसका उद्देश्य समान हितों, पारस्परिक आवश्यकताओं एवं सम्मिलित ज़िम्मेदारियों के अनुसार विश्व सहयोग के द्वारा पर्यावरणीय क्षति, ग़रीबी और रोगों से निपटना है।
मुख्य उद्देश्ययह कि प्रत्येक स्थानीय निकाय अपना स्थानीय एजेंडा 21 तैयार करे।

यह आख़िरी पंक्ति ज़रूर रेखांकित कीजिए। एजेंडा 21 की सबसे बड़ी बात यही है कि उसने ज़िम्मेदारी सिर्फ़ सरकारों पर नहीं, बल्कि हर नगरपालिका और हर पंचायत पर डाली। यानी आपके अपने गाँव या वार्ड का भी अपना एजेंडा 21 होना चाहिए।

2.5 क्रियाकलाप (पृष्ठ 2)

  1. “कल्पना करें कि तेल संसाधन ख़त्म होने पर इनका हमारी जीवन शैली पर क्या प्रभाव होगा?”
  2. “घरेलू और कृषि संबंधित अपशिष्ट को पुन: चक्रण करने के बारे में लोगों के विचार जानने के लिए अपने मोहल्ले अथवा गाँव में एक सर्वेक्षण करें।”
    • (अ) उनके द्वारा उपयोग में लाए जाने वाले संसाधनों के बारे में वे क्या सोचते हैं?
    • (ब) अपशिष्ट और उसके उपयोग के बारे में उनका क्या विचार है?
    • (स) अपने परिणामों का समुचित चित्र (collage) तैयार करें।

3. संसाधन नियोजन (पृष्ठ 2–3)

3.1 भारत में संसाधन नियोजन क्यों ज़रूरी है

पाठ्यपुस्तक का तर्क क्रम से समझिए —

  • “संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग के लिए नियोजन एक सर्वमान्य रणनीति है।”
  • “इसलिए भारत जैसे देश में जहाँ संसाधनों की उपलब्धता में बहुत अधिक विविधता है, यह और भी महत्त्वपूर्ण है।”
  • “यहाँ ऐसे प्रदेश भी हैं जहाँ एक तरह के संसाधनों की प्रचुरता है, परंतु दूसरी तरह के संसाधनों की कमी है।”
  • “कुछ ऐसे प्रदेश भी हैं जो संसाधनों की उपलब्धता के संदर्भ में आत्मनिर्भर हैं और कुछ ऐसे भी प्रदेश हैं जहाँ महत्त्वपूर्ण संसाधनों की अत्यधिक कमी है।”

3.2 चार उदाहरण — यह तालिका परीक्षा में सीधे आती है

पाठ्यपुस्तक ने चार ठोस उदाहरण दिए हैं। इन्हें ज्यों-का-त्यों याद कीजिए —

प्रदेशकिसकी प्रचुरताकिसकी कमी
झारखंड, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़खनिजों और कोयले के प्रचुर भंडार हैं।—
अरुणाचल प्रदेशजल संसाधन प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं।परंतु मूल विकास की कमी है।
राजस्थानपवन और सौर ऊर्जा संसाधनों की बहुतायत है।लेकिन जल संसाधनों की कमी है।
लद्दाखयह प्रदेश सांस्कृतिक विरासत का धनी है।परंतु यहाँ जल, आधारभूत अवसंरचना तथा कुछ महत्त्वपूर्ण खनिजों की कमी है। यह शीत मरुस्थल देश के अन्य भागों से अलग-थलग पड़ता है।

राजस्थान वाली पंक्ति पर विशेष ध्यान दीजिए — यह आपके अपने राज्य की है और RBSE की परीक्षा में लगभग हर साल आती है। “राजस्थान में पवन और सौर ऊर्जा संसाधनों की बहुतायत है, लेकिन जल संसाधनों की कमी है।”

इसीलिए पाठ्यपुस्तक निष्कर्ष देती है —

“इसलिए राष्ट्रीय, प्रांतीय, प्रादेशिक और स्थानीय स्तर पर संतुलित संसाधन नियोजन की आवश्यकता है।”

3.3 भारत में संसाधन नियोजन के तीन सोपान — यह सबसे पक्का प्रश्न है

“संसाधन नियोजन एक जटिल प्रक्रिया है, जिसमें निम्नलिखित सोपान हैं —”

सोपानक्या करना होता है
(क)देश के विभिन्न प्रदेशों में संसाधनों की पहचान कर उनकी तालिका बनाना। इस कार्य में क्षेत्रीय सर्वेक्षण, मानचित्र बनाना और संसाधनों का गुणात्मक एवं मात्रात्मक अनुमान लगाना व मापन करना शामिल है।
(ख)संसाधन विकास योजनाएँ लागू करने के लिए उपयुक्त प्रौद्योगिकी, कौशल और संस्थागत नियोजन ढाँचा तैयार करना।
(ग)संसाधन विकास योजनाओं और राष्ट्रीय विकास योजना में समन्वय स्थापित करना।
  • “स्वाधीनता के बाद भारत में संसाधन नियोजन के उद्देश्य की पूर्ति के लिए प्रथम पंचवर्षीय योजना से ही प्रयास किए गए।”

तीनों सोपानों को तीन शब्दों में याद कीजिए — पहचान · प्रौद्योगिकी · समन्वय।

3.4 सिर्फ़ संसाधन होने से विकास नहीं होता — यह तर्क बहुत महत्त्वपूर्ण है

यह भाग 4-अंक के प्रश्न में आता है। पूरा तर्क क्रम से लिखिए —

  • “किसी क्षेत्र के विकास के लिए संसाधनों की उपलब्धता एक आवश्यक शर्त है।”
  • “परंतु प्रौद्योगिकी और संस्थाओं में तदनुरूपी परिवर्तनों के अभाव में मात्र संसाधनों की उपलब्धता से ही विकास संभव नहीं है।”
  • “देश में बहुत से क्षेत्र हैं जो संसाधन समृद्ध होते हुए भी आर्थिक रूप से पिछड़े प्रदेशों की गिनती में आते हैं।”
  • “इसके विपरीत कुछ ऐसे प्रदेश भी हैं जो संसाधनों की कमी होते हुए भी आर्थिक रूप से विकसित हैं।”

और इसका ऐतिहासिक कारण भी पाठ्यपुस्तक ख़ुद देती है —

  • “उपनिवेशन का इतिहास हमें बताता है कि उपनिवेशों में संसाधन संपन्न प्रदेश, विदेशी आक्रमणकारियों के लिए मुख्य आकर्षण रहे हैं।”
  • “उपनिवेशकारी देशों ने बेहतर प्रौद्योगिकी के सहारे उपनिवेशों के संसाधनों का शोषण किया तथा उन पर अपना आधिपत्य स्थापित किया।”

निष्कर्ष —

“अत: संसाधन किसी प्रदेश के विकास में तभी योगदान दे सकते हैं, जब वहाँ उपयुक्त प्रौद्योगिकी विकास और संस्थागत परिवर्तन किए जाएँ।” “भारत में विकास सामान्यत: तथा संसाधन विकास लोगों के मुख्यत: संसाधनों की उपलब्धता पर ही आधारित नहीं था, बल्कि इसमें प्रौद्योगिकी, मानव संसाधन की गुणवत्ता और ऐतिहासिक अनुभव का भी योगदान रहा है।”

🧭 यहाँ इतिहास से जोड़िए। कक्षा 10 के इतिहास में आपने पढ़ा था कि अंग्रेज़ भारत से कच्चा माल ले जाते थे और तैयार माल बेचते थे। यह अनुच्छेद ठीक उसी बात का भूगोल वाला पक्ष है। यह जोड़ बच्चों को बहुत पसंद आता है।

3.5 दो क्रियाकलाप और ‘ज्ञात करो’ (पृष्ठ 3)

प्रकारप्रश्न
क्रियाकलाप“अपने राज्य में पाए जाने वाले संसाधनों की सूची तैयार करें और जिन महत्त्वपूर्ण संसाधनों की आपके राज्य में कमी है, उनकी पहचान करें।”
पाठ्य-प्रश्न“क्या आप संसाधन संपन्न परंतु आर्थिक रूप से पिछड़े और संसाधन विहीन परंतु आर्थिक रूप से विकसित प्रदेशों के नाम बता सकते हैं? ऐसी परिस्थिति होने के कारण बताएँ।”
ज्ञात करो“समुदाय भागीदारी की सहायता से समुदाय / ग्राम पंचायत / वार्ड स्तरीय समुदायों द्वारा आपके आसपास के क्षेत्र में कौन से संसाधन विकसित किए जा रहे हैं?”

4. संसाधनों का संरक्षण (पृष्ठ 3–4)

4.1 संरक्षण क्यों ज़रूरी है

  • “संसाधन किसी भी तरह के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।”
  • “परंतु संसाधनों का विवेकहीन उपभोग और अति उपयोग के कारण कई सामाजिक-आर्थिक और पर्यावरणीय समस्याएँ पैदा हो सकती हैं।”
  • “इन समस्याओं से बचाव के लिए विभिन्न स्तरों पर संसाधनों का संरक्षण आवश्यक है।”

4.2 गांधी जी का कथन — यह उद्धरण ज़रूर याद कीजिए

“भूतकाल से ही संसाधनों का संरक्षण बहुत से नेताओं और चिंतकों के लिए चिंता का विषय रहा है। उदाहरणार्थ, गांधी जी ने संसाधनों के संरक्षण पर अपनी चिंता इन शब्दों में व्यक्त की है —”

“हमारे पास हर व्यक्ति की आवश्यकता पूर्ति के लिए बहुत कुछ है, लेकिन किसी के लालच की संतुष्टि के लिए नहीं।”

और पाठ्यपुस्तक ने इसका सरल रूप भी दिया है —

“अर्थात् हमारे पास पेट भरने के लिए बहुत है लेकिन पेटी भरने के लिए नहीं।”

गांधी जी किसे ज़िम्मेदार मानते थे —

  • “उनके अनुसार विश्व स्तर पर संसाधन ह्रास के लिए लालची और स्वार्थी व्यक्ति तथा आधुनिक प्रौद्योगिकी की शोषणात्मक प्रवृत्ति ज़िम्मेदार है।”
  • “वे अत्यधिक उत्पादन के विरुद्ध थे और इसके स्थान पर अधिक बड़े जनसमुदाय द्वारा उत्पादन के पक्षधर थे।”

यह आख़िरी वाक्य बहुत गहरा है और अकसर छूट जाता है। गांधी जी ‘mass production’ (बड़े पैमाने पर उत्पादन) के विरोधी थे और ‘production by the masses’ (जनसमुदाय द्वारा उत्पादन) के पक्षधर थे। यानी कुछ बड़े कारख़ानों की जगह बहुत सारे लोगों के हाथ में काम।

4.3 संरक्षण की अंतर्राष्ट्रीय कालरेखा (बॉक्स, पृष्ठ 4)

इस कालरेखा को तालिका में याद कीजिए — यह हर साल पूछी जाती है —

वर्षघटना
1968अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर व्यवस्थित तरीक़े से संसाधन संरक्षण की वकालत क्लब ऑफ़ रोम ने की।
1974तत्पश्चात् शुमेसर ने अपनी पुस्तक स्माल इज़ ब्यूटीफुल में इस विषय पर गांधी जी के दर्शन की एक बार फिर से पुनरावृत्ति की।
1987ब्रुन्ड्टलैंड आयोग रिपोर्ट द्वारा वैश्विक स्तर पर संसाधन संरक्षण में मूलाधार योगदान किया गया। इस रिपोर्ट ने सतत् पोषणीय विकास (Sustainable Development) की संकल्पना प्रस्तुत की और संसाधन संरक्षण की वकालत की। यह रिपोर्ट बाद में हमारा साझा भविष्य (Our Common Future) शीर्षक से पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुई।
1992इस संदर्भ में एक और महत्त्वपूर्ण योगदान रियो डी जेनेरो, ब्राज़ील में आयोजित पृथ्वी सम्मेलन द्वारा किया गया।

इन चार तिथियों को इस तरह याद कीजिए — 68 रोम · 74 शुमेसर · 87 ब्रुन्ड्टलैंड · 92 रियो। और यह भी याद रखिए कि ‘सतत् पोषणीय विकास’ शब्द 1987 की ब्रुन्ड्टलैंड रिपोर्ट से आया, 1992 के रियो सम्मेलन से नहीं। यह अंतर परीक्षा में अकसर उलझाता है।

5. भू-संसाधन (पृष्ठ 4)

5.1 भूमि क्यों सबसे महत्त्वपूर्ण संसाधन है

  • “हम भूमि पर रहते हैं, इसी पर अनेकों आर्थिक क्रियाकलाप करते हैं और विभिन्न रूपों में इसका उपयोग करते हैं। अत: भूमि एक बहुत महत्त्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन है।”
  • “प्राकृतिक वनस्पति, वन्य जीवन, मानव जीवन, आर्थिक क्रियाएँ, परिवहन तथा संचार व्यवस्थाएँ भूमि पर ही आधारित हैं।”
  • “परंतु भूमि एक सीमित संसाधन है, इसलिए उपलब्ध भूमि का विभिन्न उद्देश्यों के लिए उपयोग सावधानी और योजनाबद्ध तरीक़े से होना चाहिए।”

5.2 भारत की भू-आकृतियाँ — चित्र 1.3 के आँकड़े (यह सबसे पक्का 1-अंक का प्रश्न है)

भू-आकृतिप्रतिशतविशेषता
मैदानलगभग 43 प्रतिशतकृषि और उद्योग के विकास के लिए सुविधाजनक।
पर्वत30 प्रतिशतकुछ बारहमासी नदियों के प्रवाह को सुनिश्चित करते हैं, पर्यटन विकास के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ प्रदान करते हैं और पारिस्थितिकी के लिए महत्त्वपूर्ण हैं।
पठारलगभग 27 प्रतिशतइस क्षेत्र में खनिजों, जीवाश्म ईंधन और वनों का अपार संचय कोष है।

43 – 30 – 27 — यह तीन संख्याओं की जोड़ी है जो जोड़ने पर 100 बनती है। इसे इसी तरह याद कीजिए। ध्यान दीजिए — पाठ्यपुस्तक ने भारत की मुख्य भू-आकृतियों में द्वीपों का भी ज़िक्र किया है (“पर्वत, पठार, मैदान और द्वीप”), पर वृत्त-चित्र में केवल तीन दिए गए हैं।

5.3 भू-उपयोग की पाँच श्रेणियाँ — पूरी सूची याद कीजिए

“भू-संसाधनों का उपयोग निम्नलिखित उद्देश्यों से किया जाता है —”

क्रमश्रेणीउपश्रेणियाँ
1वन—
2कृषि के लिए अनुपलब्ध भूमि(अ) बंजर तथा कृषि अयोग्य भूमि · (ब) गैर-कृषि प्रयोजनों में लगाई गई भूमि — जैसे इमारतें, सड़क, उद्योग इत्यादि
3परती भूमि के अतिरिक्त अन्य कृषि अयोग्य भूमि(अ) स्थायी चरागाहें तथा अन्य गोचर भूमि · (ब) विविध वृक्षों, वृक्ष फसलों तथा उपवनों के अधीन भूमि (जो शुद्ध बोए गए क्षेत्र में शामिल नहीं है) · (स) कृषि योग्य बंजर भूमि, जहाँ पाँच से अधिक वर्षों से खेती न की गई हो
4परती भूमि(अ) वर्तमान परती — जहाँ एक कृषि वर्ष या उससे कम समय से खेती न की गई हो · (ब) वर्तमान परती भूमि के अतिरिक्त अन्य परती भूमि या पुरातन परती — जहाँ 1 से 5 कृषि वर्ष से खेती न की गई हो
5शुद्ध (निवल) बोया गया क्षेत्रवह भूमि जिस पर फ़सलें उगाई व काटी जाती हैं।

और एक बहुत ज़रूरी परिभाषा —

“एक कृषि वर्ष में एक बार से अधिक बोए गए क्षेत्र को शुद्ध (निवल) बोए गए क्षेत्र में जोड़ दिया जाए तो वह सकल कृषित क्षेत्र कहलाता है।”

‘वर्तमान परती’ और ‘पुरातन परती’ का फ़र्क़ ज़रूर याद कीजिए — वर्तमान परती = एक साल या उससे कम से खेती नहीं। पुरातन परती = 1 से 5 साल से खेती नहीं। कृषि योग्य बंजर = 5 साल से भी ज़्यादा से खेती नहीं।

6. भारत में भू-उपयोग प्रारूप (पृष्ठ 5)

6.1 भू-उपयोग को कौन-से तत्त्व तय करते हैं

“भू-उपयोग को निर्धारित करने वाले तत्त्वों में निम्नलिखित शामिल हैं —”

प्रकारतत्त्व
भौतिक कारकभू-आकृति, जलवायु और मृदा के प्रकार
मानवीय कारकजनसंख्या घनत्व, प्रौद्योगिक क्षमता, संस्कृति और परंपराएँ इत्यादि

6.2 भारत का क्षेत्रफल और आँकड़ों की सीमा — यह हिस्सा बहुत पूछा जाता है

तथ्यविवरण
कुल भौगोलिक क्षेत्रफल32.8 लाख वर्ग किमी.
आँकड़े कितने भाग के उपलब्ध हैंकेवल 93 प्रतिशत भाग के।
पहला कारणपूर्वोत्तर प्रांतों में असम को छोड़कर अन्य प्रांतों के सूचित क्षेत्र के बारे में जानकारी उपलब्ध नहीं है।
दूसरा कारणजम्मू और कश्मीर में पाकिस्तान और चीन अधिकृत क्षेत्रों के भूमि उपयोग का सर्वेक्षण भी नहीं हुआ है।

यह दोनों कारण ज़रूर लिखिए — 2-अंक के प्रश्न में यही पूछा जाता है।

6.3 चित्र 1.4 — दो वृत्त चित्रों की तुलना (1960–61 और 2014–15)

स्रोत: डायरेक्टरेट ऑफ़ इकोनोमिक्स एंड स्टैटिस्टिक्स, मिनिस्ट्री ऑफ़ एग्रीकल्चर, 2017

भू-उपयोग संवर्ग1960–612014–15
वन18.11%23.3%
बंजर तथा कृषि अयोग्य भूमि12.01%5.5%
गैर-कृषि प्रयोजनों के अंतर्गत क्षेत्र4.95%8.7%
स्थायी चारागाहें तथा अन्य गोचर भूमि4.71%3.3%
विविध वृक्षों, वृक्ष फ़सलों तथा उपवनों के अंतर्गत क्षेत्र1.50%1%
कृषि योग्य बंजर भूमि6.23%4.0%
परती भूमि के अतिरिक्त अन्य पुरातन परती3.50%3.6%
वर्तमान परती3.73%4.9%
शुद्ध (निवल) बोया गया क्षेत्र45.26%45.5%

! इस तालिका से दो बहुत महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष निकलते हैं, और यही अभ्यास प्रश्न 3(i) है — 1. शुद्ध बोया गया क्षेत्र लगभग वही रहा (45.26% से 45.5%) — यानी खेती का क्षेत्र नहीं बढ़ा। 2. वन क्षेत्र बढ़ा तो, पर बहुत धीरे (18.11% से 23.3%) — जबकि राष्ट्रीय वन नीति 33% चाहती है।

पाठ्यपुस्तक का क्रियाकलाप भी यही पूछता है —

“भू-उपयोग के दो वृत्त चित्रों 1.4 की तुलना करके पता लगाएँ कि 1960–61 और 2014–15 के बीच शुद्ध (निवल) बोये गये क्षेत्र और वनों के अंतर्गत भूमि में बहुत सीमित परिवर्तन ही क्यों आया है?”

6.4 शुद्ध बोए गए क्षेत्र के बारे में तीन ज़रूरी तथ्य

  • “स्थायी चारागाहों के अंतर्गत भी भूमि कम हुई है। पशुधन की इतनी बड़ी संख्या के लिए चारा उपलब्ध कराने में कैसे समर्थ होंगे? और इसके क्या परिणाम होंगे?”
  • “वर्तमान परती भूमि के अतिरिक्त अन्य परती भूमि अनुपजाऊ हैं और इन पर फ़सलें उगाने के लिए कृषि लागत बहुत ज़्यादा है। अत: इस भूमि में दो या तीन वर्षों में इनको एक या दो बार बोया जाता है।”
  • “और यदि इसे शुद्ध (निवल) बोये गए क्षेत्र में शामिल कर लिया जाता है तब भी भारत के कुल सूचित क्षेत्र के लगभग 54 प्रतिशत हिस्से पर ही खेती हो सकती है।”

राज्यवार अंतर — यह तुलना ज़रूर याद कीजिए —

राज्य / क्षेत्रशुद्ध बोया गया क्षेत्र
पंजाब और हरियाणा80 प्रतिशत भूमि पर खेती होती है।
अरुणाचल प्रदेश, मिज़ोरम, मणिपुर और अंडमान निकोबार द्वीप समूह10 प्रतिशत से भी कम क्षेत्र बोया जाता है।

पाठ्य-प्रश्न (पृष्ठ 5): “इन राज्यों में शुद्ध (निवल) बोये गए क्षेत्र के कम अनुपात के लिए उत्तरदायी कारणों को ज्ञात कीजिए।” उत्तर का संकेत — इन राज्यों में पहाड़ी और वनाच्छादित क्षेत्र अधिक है, ढाल तीव्र है, और मिट्टी की परत पतली है, इसलिए खेती के लिए समतल भूमि बहुत कम मिलती है।

6.5 राष्ट्रीय वन नीति (1952) — यह आँकड़ा अनिवार्य है

  • “हमारे देश में राष्ट्रीय वन नीति (1952) द्वारा निर्धारित वनों के अंतर्गत 33 प्रतिशत भौगोलिक क्षेत्र वांछित हैं।”
  • “जिसकी तुलना में वन के अंतर्गत क्षेत्र काफ़ी कम है।”
  • “वन नीति द्वारा निर्धारित यह सीमा पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखने के लिए आवश्यक है।”
  • “वन क्षेत्रों के आस पास रहने वाले लाखों लोगों की आजीविका इस पर निर्भर करती है।”

6.6 बंजर भूमि और गैर-कृषि भूमि में क्या-क्या आता है

श्रेणीइसमें क्या शामिल है
बंजर भूमिपहाड़ी चट्टानें, सूखी और मरुस्थलीय भूमि।
गैर-कृषि प्रयोजनों में लगाई गई भूमिबस्तियाँ, सड़कें, रेल लाइन, उद्योग इत्यादि।

“लंबे समय तक लगातार भूमि संरक्षण और प्रबंधन की अवहेलना करने एवं लगातार भू-उपयोग के कारण भू-संसाधनों का निम्नीकरण हो रहा है। इसके कारण समाज और पर्यावरण पर गंभीर आपदा आ सकती है।”

7. भूमि निम्नीकरण और संरक्षण उपाय (पृष्ठ 6)

7.1 भूमि निम्नीकरण के आँकड़े — यह पूरी तरह याद कीजिए

  • “भूमि एक ऐसा संसाधन है जिसका उपयोग हमारे पूर्वज करते आए हैं तथा भावी पीढ़ी भी इसी भूमि का उपयोग करेगी।”
  • “हम भोजन, मकान और कपड़े की अपनी मूल आवश्यकताओं का 95 प्रतिशत भाग भूमि से प्राप्त करते हैं।”
तथ्यआँकड़ा
भारत में निम्नीकृत भूमिलगभग 13 करोड़ हेक्टेयर
इसमें से वनों के अंतर्गत अपरदितलगभग 28 प्रतिशत
जल अपरदित क्षेत्र56 प्रतिशत
शेष क्षेत्रलवणीय और क्षारीय

7.2 भूमि निम्नीकरण के कारण — राज्यवार तालिका (यह बहुत पूछी जाती है)

“कुछ मानव क्रियाओं जैसे वनोन्मूलन, अति पशुचारण, खनन ने भी भूमि के निम्नीकरण में मुख्य भूमिका निभाई है।”

कारणकौन-से राज्यकैसे होता है
खननझारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और उड़ीसाखनन के उपरांत खदानों वाले स्थानों को गहरी खाइयों और मलबे के साथ खुला छोड़ दिया जाता है; खनन के कारण वनोन्मूलन भी होता है।
अति पशुचारणगुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्रज़रूरत से ज़्यादा पशु चराने से घास और वनस्पति ख़त्म हो जाती है और मिट्टी नंगी हो जाती है।
अधिक सिंचाईपंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेशअति सिंचन से जलाक्रांतता पैदा होती है, जिससे मृदा में लवणीयता और क्षारीयता बढ़ जाती है।
खनिज प्रक्रियाएँ—सीमेंट उद्योग में चूना पत्थर पीसना, और मृदा बर्तन उद्योग में चूने (खड़िया मृदा) तथा सेलखड़ी के प्रयोग से बहुत अधिक मात्रा में वायुमंडल में धूल विसर्जित होती है। जब इसकी परत भूमि पर जम जाती है तो मृदा की जल सोखने की प्रक्रिया अवरुद्ध हो जाती है।
औद्योगिक जल निकास—पिछले कुछ वर्षों से देश के विभिन्न भागों में औद्योगिक जल निकास से बाहर आने वाला अपशिष्ट पदार्थ भूमि और जल प्रदूषण का मुख्य स्रोत है।

राज्यों के इन तीन समूहों को इस तरह याद कीजिए — खनन = झा-छ-म-उ (झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, उड़ीसा) अति पशुचारण = गु-रा-म-म (गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र) अधिक सिंचाई = पं-ह-प.उ.प्र. (पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश) ! ध्यान दीजिए — मध्य प्रदेश दो सूचियों में आता है, और राजस्थान अति पशुचारण वाली सूची में है। RBSE की परीक्षा में यही पूछा जाता है।

7.3 भूमि निम्नीकरण को सुलझाने के उपाय — यह पूरा उत्तर है

“भूमि निम्नीकरण की समस्याओं को सुलझाने के कई तरीक़े हैं।”

क्रमउपाय
1वनारोपण और चरागाहों का उचित प्रबंधन इसमें कुछ हद तक मदद कर सकते हैं।
2पेड़ों की रक्षक मेखला (shelter belt) लगाना।
3पशुचारण नियंत्रण।
4रेतीले टीलों को काँटेदार झाड़ियाँ लगाकर स्थिर बनाने की प्रक्रिया से भी भूमि कटाव की रोकथाम शुष्क क्षेत्रों में की जा सकती है।
5बंजर भूमि के उचित प्रबंधन।
6खनन नियंत्रण।
7औद्योगिक जल को परिष्करण के पश्चात् विसर्जित करके जल और भूमि प्रदूषण को कम किया जा सकता है।

8. मृदा संसाधन (पृष्ठ 6–7)

8.1 मृदा क्या है — परिभाषा शब्दश: याद कीजिए

“मिट्टी अथवा मृदा सबसे महत्त्वपूर्ण नवीकरण योग्य प्राकृतिक संसाधन है। यह पौधों के विकास का माध्यम है जो पृथ्वी पर विभिन्न प्रकार के जीवों का पोषण करती है।”

  • “मृदा एक जीवंत तंत्र है।”
  • “कुछ सेंटीमीटर गहरी मृदा बनने में लाखों वर्ष लग जाते हैं।”

8.2 मृदा बनने के कारक — यह सूची पूरी लिखिए

“मृदा बनने की प्रक्रिया में ये मुख्य कारक हैं —”

क्रमकारक
1उच्चावच
2जनक शैल अथवा संस्तर शैल
3जलवायु
4वनस्पति और अन्य जैव पदार्थ
5समय

और प्रकृति के ये तत्त्व भी योगदान देते हैं —

  • तापमान परिवर्तन

  • बहते जल की क्रिया

  • पवन

  • हिमनदी

  • अपघटन क्रियाएँ

  • “मृदा में होने वाले रासायनिक और जैविक परिवर्तन भी महत्त्वपूर्ण हैं।”

  • “मृदा जैव (ह्यूमस) और अजैव दोनों प्रकार के पदार्थों से बनती है।”

और मृदा को पहचानने के तत्त्व —

“मृदा बनने की प्रक्रिया को निर्धारित करने वाले तत्त्वों, उनके रंग, गहराई, गठन, आयु, व रासायनिक और भौतिक गुणों के आधार पर भारत की मृदाओं के प्रकार हैं।”

8.3 चित्र 1.5 — मृदा परिच्छेदिका की चार परतें (ऊपर से नीचे)

क्रमपरत
1 (सबसे ऊपर)ऊपरी संस्तर की मृदा
2उप-मृदा — अपक्षयित चट्टानें: बालू, गाद (सिल्ट) व मृत्तिका
3अध:स्तरीय अपक्षयित आधारी चट्टानें
4 (सबसे नीचे)अपक्षय रहित आधारी चट्टानें

इसे ‘मिट्टी का ठूँठ’ समझिए — ऊपर से नीचे जाते-जाते मिट्टी कम और चट्टान ज़्यादा होती जाती है।

9. मृदाओं का वर्गीकरण (पृष्ठ 7–10)

“भारत में अनेक प्रकार के उच्चावच, भू-आकृतियाँ, जलवायु और वनस्पतियाँ पाई जाती हैं। इस कारण अनेक प्रकार की मृदाएँ विकसित हुई हैं।”

कुल छह प्रकार की मृदाएँ पढ़नी हैं। इन्हें इसी क्रम में याद कीजिए —

जलोढ़ · काली · लाल और पीली · लेटराइट · मरुस्थली · वन

9.1 जलोढ़ मृदा — सबसे महत्त्वपूर्ण मृदा

बिंदुविवरण
महत्त्व“यह मृदा विस्तृत रूप से फैली हुई है और यह देश की महत्त्वपूर्ण मृदा है।”
कहाँ पाई जाती हैसंपूर्ण उत्तरी मैदान जलोढ़ मृदा से बना है।
किन नदियों से बनीहिमालय की तीन महत्त्वपूर्ण नदी तंत्रों — सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र — नदियों द्वारा लाए गए निक्षेपों से।
और कहाँ फैलीएक सँकरे गलियारे के द्वारा ये मृदाएँ राजस्थान और गुजरात तक फैली हैं।
पूर्वी तट परपूर्वी तटीय मैदान, विशेषकर महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी नदियों के डेल्टे भी जलोढ़ मृदा से बने हैं।
किन कणों से बनीइसमें रेत, सिल्ट और मृत्तिका के विभिन्न अनुपात पाए जाते हैं।

कणों का आकार कैसे बदलता है — यह बहुत महत्त्वपूर्ण तर्क है —

  • “जैसे हम नदी के मुहाने से घाटी में ऊपर की ओर जाते हैं मृदा के कणों का आकार बढ़ता चला जाता है।”
  • “नदी घाटी के ऊपरी भाग में, जैसे ढाल भंग के समीप मोटे कण वाली मृदाएँ पाई जाती हैं।”
  • “ऐसी मृदाएँ पर्वतों की तलहटी पर बने मैदानों जैसे द्वार, ‘चो’ क्षेत्र और तराई में आमतौर पर पाई जाती हैं।”

आयु के आधार पर दो प्रकार — यह तुलना अनिवार्य है —

प्रकारअर्थविशेषता
बांगरपुराना जलोढ़बांगर मृदा में ‘कंकर’ ग्रंथियों की मात्रा ज़्यादा होती है।
खादरनया जलोढ़खादर मृदा में बांगर मृदा की तुलना में ज़्यादा महीन कण पाए जाते हैं।

उर्वरता और फ़सलें —

  • “जलोढ़ मृदाएँ बहुत उपजाऊ होती हैं।”
  • “अधिकतर जलोढ़ मृदाएँ पोटाश, फास्फोरस और चूनायुक्त होती हैं।”
  • “जो इनको गन्ने, चावल, गेहूँ और अन्य अनाजों और दलहन फ़सलों की खेती के लिए उपयुक्त बनाती हैं।”
  • “अधिक उपजाऊपन के कारण जलोढ़ मृदा वाले क्षेत्रों में गहन कृषि की जाती है और यहाँ जनसंख्या घनत्व भी अधिक है।”
  • “सूखे क्षेत्रों की मृदाएँ अधिक क्षारीय होती हैं। इन मृदाओं का सही उपचार और सिंचाई करके इनकी पैदावार बढ़ाई जा सकती है।”

9.2 काली मृदा — यह अभ्यास प्रश्न 2(i) है

बिंदुविवरण
दूसरा नामइन्हें ‘रेगर’ मृदाएँ भी कहा जाता है। कपास की खेती के लिए उचित समझी जाती है, इसलिए काली कपास मृदा के नाम से भी जाना जाता है।
कैसे बनी“यह माना जाता है कि जलवायु और जनक शैलों ने काली मृदा के बनने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है।” ये लावा जनक शैलों से बनी हैं।
कहाँ पाई जाती हैदक्कन पठार (बेसाल्ट) क्षेत्र के उत्तर पश्चिमी भागों में।
कौन-से राज्यमहाराष्ट्र, सौराष्ट्र, मालवा, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के पठार पर; और दक्षिण पूर्वी दिशा में गोदावरी और कृष्णा नदियों की घाटियों तक फैली हैं।
किससे बनीबहुत महीन कणों अर्थात् मृत्तिका से।
सबसे बड़ा गुणइसकी नमी धारण करने की क्षमता बहुत अधिक होती है।

पोषक तत्त्व — यह ध्यान से याद कीजिए —

किससे परिपूर्णकिसकी कमी
कैल्शियम कार्बोनेट, मैग्नीशियम, पोटाश और चूनाफास्फोरस की मात्रा कम होती है

काली मृदा की एक अनोखी विशेषता — यह ज़रूर लिखिए —

  • “गर्म और शुष्क मौसम में इन मृदाओं में गहरी दरारें पड़ जाती हैं, जिससे इनमें अच्छी तरह वायु मिश्रण हो जाता है।”
  • “गीली होने पर ये मृदाएँ चिपचिपी हो जाती हैं और इनको जोतना मुश्किल होता है।”
  • “इसलिए, इसकी जुताई मानसून प्रारंभ होने की पहली बौछार से ही शुरू कर दी जाती है।”

यह आख़िरी तथ्य 3-अंक के प्रश्न में बहुत अच्छा लगता है। काली मिट्टी को गीली होने से पहले जोतना पड़ता है — यही उसकी सबसे बड़ी व्यावहारिक ख़ासियत है।

9.3 लाल और पीली मृदा

बिंदुविवरण
कहाँ विकसित हुईदक्कन पठार के पूर्वी और दक्षिणी हिस्सों में रवेदार आग्नेय चट्टानों पर कम वर्षा वाले भागों में।
कौन-से राज्यओडिशा, छत्तीसगढ़, मध्य गंगा मैदान के दक्षिणी छोर पर और पश्चिमी घाट में पहाड़ी पद पर।
लाल रंग क्योंइन मृदाओं का लाल रंग रवेदार आग्नेय और रूपांतरित चट्टानों में लौह धातु के प्रसार के कारण होता है।
पीला रंग क्योंइनका पीला रंग इनमें जलयोजन के कारण होता है।

“लाल क्यों? — लोहा। पीली क्यों? — पानी (जलयोजन।)” यह दो शब्दों में याद हो जाता है।

9.4 लेटराइट मृदा

बिंदुविवरण
नाम कहाँ से आयालेटराइट शब्द ग्रीक भाषा के शब्द लेटर (Later) से लिया गया है, जिसका अर्थ है ईंट।
कैसे बनती हैउष्णकटिबंधीय तथा उपोषण कटिबंधीय जलवायु क्षेत्रों में आर्द्र तथा शुष्क ऋतुओं के एक के बाद एक आने के कारण।
किसका परिणामयह भारी वर्षा से अत्यधिक निक्षालन (leaching) का परिणाम है।
गहराई और अम्लतालेटराइट मृदा अधिकतर गहरी तथा अम्लीय (pH<6.0) होती है।
कमीइसमें सामान्यत: पौधों के पोषक तत्त्वों की कमी होती है।
कहाँ पाई जाती हैअधिकतर दक्षिणी राज्यों, महाराष्ट्र के पश्चिमी घाट क्षेत्रों, ओडिशा, पश्चिम बंगाल के कुछ भागों तथा उत्तर-पूर्वी प्रदेशों में।

ह्यूमस का अंतर — यह सूक्ष्म पर महत्त्वपूर्ण बात है —

कहाँह्यूमस की मात्रा
जहाँ पर्णपाती और सदाबहार वन मिलते हैंह्यूमस पर्याप्त रूप में पाया जाता है।
विरल वनस्पति और अर्ध शुष्क पर्यावरण मेंह्यूमस की मात्रा कम पाई जाती है।

फ़सलें —

  • “स्थलरूपों पर उनकी स्थिति के अनुसार उनमें अपरदन तथा भूमि-निम्नीकरण की संभावना होती है।”
  • “मृदा संरक्षण की उचित तकनीक अपना कर इन मृदाओं पर कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु में चाय और कॉफ़ी उगाई जाती हैं।”
  • “तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और केरल की लाल लेटराइट मृदाएँ काजू की फ़सल के लिए अधिक उपयुक्त हैं।”

9.5 मरुस्थली मृदा

बिंदुविवरण
रंगलाल और भूरा।
गुणआम तौर पर रेतीली और लवणीय।
नमककुछ क्षेत्रों में नमक की मात्रा इतनी अधिक है कि झीलों से जल वाष्पीकृत करके खाने का नमक भी बनाया जाता है।
क्यों ऐसी हैशुष्क जलवायु और उच्च तापमान के कारण वाष्पीकरण दर अधिक है और मृदाओं में ह्यूमस और नमी की मात्रा कम होती है।
नीचे क्या हैमृदा की सतह के नीचे कैल्शियम की मात्रा बढ़ती चली जाती है और नीचे की परतों में चूने के कंकर की सतह पाई जाती है।
समस्याइसके कारण मृदा में जल अंत:स्यंदन (infiltration) अवरुद्ध हो जाता है।
हल“इस मृदा को सही तरीक़े से सिंचित करके कृषि योग्य बनाया जा सकता है, जैसा कि पश्चिमी राजस्थान में हो रहा है।”

यह आख़िरी वाक्य आपके राज्य का है — RBSE की परीक्षा में इसे ज़रूर लिखिए। पश्चिमी राजस्थान में इंदिरा गांधी नहर के ज़रिए यही काम हो रहा है।

9.6 वन मृदा

बिंदुविवरण
कहाँआमतौर पर पहाड़ी और पर्वतीय क्षेत्रों में, जहाँ पर्याप्त वर्षा-वन उपलब्ध हैं।
गठन में बदलावइन मृदाओं के गठन में पर्वतीय पर्यावरण के अनुसार बदलाव आता है।
नदी घाटियों मेंये मृदाएँ दोमट और सिल्टदार होती हैं।
ऊपरी ढालों परइनका गठन मोटे कणों का होता है।
हिमालय के हिमाच्छादित क्षेत्रों मेंइन मृदाओं का बहुत अपरदन होता है और ये अधिसिलिक (acidic) तथा ह्यूमस रहित होती हैं।
कहाँ उपजाऊ हैंनदी घाटियों के निचले क्षेत्रों, विशेषकर नदी सोपानों और जलोढ़ पंखों में ये मृदाएँ उपजाऊ होती हैं।

9.7 सभी छह मृदाओं की एक तुलना-तालिका (रिवीज़न के लिए)

मृदाकहाँ मिलती हैमुख्य फ़सल / विशेषता
जलोढ़संपूर्ण उत्तरी मैदान; राजस्थान-गुजरात तक; पूर्वी तटीय डेल्टेगन्ना, चावल, गेहूँ, दलहन; सबसे उपजाऊ
कालीदक्कन पठार का उत्तर-पश्चिमी भाग; महाराष्ट्र, सौराष्ट्र, मालवा, म.प्र., छत्तीसगढ़कपास; नमी धारण क्षमता सबसे अधिक
लाल और पीलीदक्कन पठार का पूर्वी-दक्षिणी हिस्सा; ओडिशा, छत्तीसगढ़, प. घाट का पहाड़ी पदलौह धातु से लाल, जलयोजन से पीली
लेटराइटदक्षिणी राज्य, प. घाट (महाराष्ट्र), ओडिशा, प. बंगाल, उत्तर-पूर्वी प्रदेशचाय, कॉफ़ी, काजू; निक्षालन से बनी
मरुस्थलीपश्चिमी राजस्थानरेतीली-लवणीय; सिंचाई से उपजाऊ
वनपहाड़ी और पर्वतीय क्षेत्र, हिमालयनदी घाटी में दोमट; ऊपरी ढाल पर मोटे कण

चित्र (पृष्ठ 8) — ‘भारत: मृदा के मुख्य प्रकार’ मानचित्र में छह वर्ग दिए गए हैं — पर्वत और वन · जलोढ़ · लाल और पीली · काली · लेटराइट · शुष्क। यह मानचित्र-कार्य के लिए अनिवार्य है।

10. मृदा अपरदन और संरक्षण (पृष्ठ 10–11)

10.1 मृदा अपरदन क्या है

“मृदा के कटाव और उसके बहाव की प्रक्रिया को मृदा अपरदन कहा जाता है।”

  • “मृदा के बनने और अपरदन की क्रियाएँ आमतौर पर साथ-साथ चलती हैं और दोनों में संतुलन होता है।”
  • “परंतु मानवीय क्रियाओं जैसे वनोन्मूलन, अति पशुचारण, निर्माण और खनन इत्यादि से कई बार यह संतुलन भंग हो जाता है।”
  • “तथा प्राकृतिक तत्त्व जैसे पवन, हिमनदी और जल मृदा अपरदन करते हैं।”

10.2 अपरदन के प्रकार — यह तालिका पूरी याद कीजिए

प्रकारकैसे होता हैकहाँ का उदाहरण
अवनलिका अपरदनबहता जल मृत्तिकायुक्त मृदाओं को काटते हुए गहरी वाहिकाएँ बनाता है, जिन्हें अवनलिकाएँ कहते हैं।चंबल बेसिन में ऐसी भूमि को खड्ड (ravine) भूमि कहा जाता है।
उत्खात भूमिऐसी भूमि जोतने योग्य नहीं रहती, इसे उत्खात भूमि (bad land) कहते हैं।चंबल बेसिन।
चादर अपरदनकई बार जल विस्तृत क्षेत्र को ढके हुए ढाल के साथ नीचे की ओर बहता है; ऐसी स्थिति में इस क्षेत्र की ऊपरी मृदा घुलकर जल के साथ बह जाती है। इसे चादर अपरदन (Sheet erosion) कहा जाता है।—
पवन अपरदनपवन द्वारा मैदान अथवा ढालू क्षेत्र से मृदा को उड़ा ले जाने की प्रक्रिया।—
कृषि के ग़लत तरीक़ों सेग़लत ढंग से हल चलाने जैसे ढाल पर ऊपर से नीचे की ओर हल चलाने से वाहिकाएँ बन जाती हैं, जिसके अंदर से बहता पानी आसानी से मृदा का कटाव करता है।—

‘खड्ड (ravine)’ और ‘उत्खात भूमि (bad land)’ — दोनों चंबल बेसिन के लिए इस्तेमाल होते हैं। यह अनिवार्य तथ्य है।

10.3 मृदा संरक्षण के चार तरीक़े — यह अभ्यास प्रश्न 2(iii) का उत्तर है

तरीक़ाकैसे काम करता हैकहाँ इस्तेमाल होता है
समोच्च जुताई (contour ploughing)“ढाल वाली भूमि पर समोच्च रेखाओं के समानांतर हल चलाने से ढाल के साथ जल बहाव की गति घटती है।”ढाल वाली भूमि पर।
सोपान कृषि (terrace farming)“ढाल वाली भूमि पर सोपान बनाए जा सकते हैं। सोपान कृषि अपरदन को नियंत्रित करती है।”“पश्चिमी और मध्य हिमालय में सोपान अथवा सीढ़ीदार कृषि काफ़ी विकसित है।”
पट्टी कृषि (strip farming)“बड़े खेतों को पट्टियों में बाँटा जाता है। फ़सलों के बीच में घास की पट्टियाँ उगाई जाती हैं। ये पवनों द्वारा जनित बल को कमज़ोर करती हैं।”—
रक्षक मेखला (shelter belt)“पेड़ों को कतारों में लगाकर रक्षक मेखला बनाना भी पवनों की गति कम करता है।”“इन रक्षक पट्टियों का पश्चिम भारत में रेत के टीलों के स्थायीकरण में महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है।”

आख़िरी पंक्ति फिर आपके राज्य की है — पश्चिमी राजस्थान में रेत के टीलों को रोकने के लिए रक्षक मेखला लगाई गई है। RBSE में इसे ज़रूर लिखिए।

11. कठिन शब्द और उनके अर्थ (शब्दावली)

शब्दअर्थ
संसाधनपर्यावरण में उपलब्ध प्रत्येक वह वस्तु जो हमारी आवश्यकताओं को पूरा कर सके, जिसे बनाने की प्रौद्योगिकी उपलब्ध हो, जो आर्थिक रूप से संभाव्य और सांस्कृतिक रूप से मान्य हो।
जैव संसाधनवे संसाधन जिनकी उत्पत्ति जीवमंडल से होती है — जैसे मनुष्य, वनस्पति, प्राणी, मत्स्य जीवन और पशुधन।
अजैव संसाधनवे सभी वस्तुएँ जो निर्जीव पदार्थों से बनी हैं — जैसे चट्टानें और धातुएँ।
नवीकरण योग्य संसाधनजिन्हें भौतिक, रासायनिक या यांत्रिक प्रक्रियाओं से दोबारा उत्पन्न किया जा सकता है — जैसे सौर और पवन ऊर्जा, जल, वन।
अनवीकरण योग्य संसाधनजिनका विकास लंबे भूगर्भीय अंतराल में होता है और जो एक बार समाप्त होने पर दोबारा नहीं बनते — जैसे खनिज और जीवाश्म ईंधन।
संभावी संसाधनवे संसाधन जो किसी प्रदेश में मौजूद हैं पर जिनका उपयोग अभी नहीं हुआ।
भंडारवे पदार्थ जो आवश्यकता पूरी कर सकते हैं, पर उपयुक्त प्रौद्योगिकी न होने से उपयोग में नहीं हैं।
संचित कोषभंडार का वह हिस्सा जिसे उपलब्ध तकनीक से इस्तेमाल किया जा सकता है, पर अभी उपयोग शुरू नहीं हुआ।
सतत् पोषणीय विकासऐसा विकास जो पर्यावरण को नुक़सान पहुँचाए बिना हो और भविष्य की पीढ़ियों की आवश्यकता की अवहेलना न करे।
एजेंडा 211992 के रियो सम्मेलन में स्वीकृत वह कार्यसूची जिसका उद्देश्य विश्व सहयोग से पर्यावरणीय क्षति, ग़रीबी और रोगों से निपटना है।
परती भूमिवह कृषि भूमि जिस पर कुछ समय से खेती न की गई हो।
वर्तमान परतीवह भूमि जहाँ एक कृषि वर्ष या उससे कम समय से खेती न की गई हो।
पुरातन परतीवह भूमि जहाँ 1 से 5 कृषि वर्ष से खेती न की गई हो।
शुद्ध (निवल) बोया गया क्षेत्रवह भूमि जिस पर फ़सलें उगाई व काटी जाती हैं।
सकल कृषित क्षेत्रशुद्ध बोया गया क्षेत्र + एक कृषि वर्ष में एक बार से अधिक बोया गया क्षेत्र।
उच्चावचधरातल का ऊँचा-नीचा होना।
जनक शैल / संस्तर शैलवह मूल चट्टान जिससे टूट-फूटकर मृदा बनती है।
ह्यूमसमृदा में मिला हुआ सड़ा-गला जैविक पदार्थ, जो उसे उपजाऊ बनाता है।
बांगरपुराना जलोढ़, जिसमें ‘कंकर’ ग्रंथियों की मात्रा ज़्यादा होती है।
खादरनया जलोढ़, जिसमें बांगर की तुलना में ज़्यादा महीन कण होते हैं।
रेगरकाली मृदा का दूसरा नाम।
निक्षालन (Leaching)भारी वर्षा से मृदा के पोषक तत्त्वों का घुलकर नीचे बह जाना; लेटराइट मृदा इसी का परिणाम है।
अंत:स्यंदन (Infiltration)जल का मृदा में रिसकर नीचे जाना।
जलाक्रांतताअति सिंचाई से खेत में पानी भर जाने की स्थिति, जिससे लवणीयता और क्षारीयता बढ़ती है।
अवनलिकाबहते जल से मृदा में कटकर बनी गहरी वाहिका।
उत्खात भूमि (Bad land)अवनलिकाओं से कटी वह भूमि जो जोतने योग्य नहीं रहती।
खड्ड (Ravine)चंबल बेसिन की उत्खात भूमि को दिया गया नाम।
चादर अपरदन (Sheet erosion)ढाल के साथ बहते जल द्वारा ऊपरी मृदा का घुलकर बह जाना।
समोच्च जुताई (Contour ploughing)ढाल वाली भूमि पर समोच्च रेखाओं के समानांतर हल चलाना।
सोपान कृषि (Terrace farming)ढाल पर सीढ़ीनुमा खेत बनाकर की जाने वाली खेती।
पट्टी कृषि (Strip farming)बड़े खेतों को पट्टियों में बाँटकर फ़सलों के बीच घास की पट्टियाँ उगाना।
रक्षक मेखला (Shelter belt)पवन की गति कम करने के लिए कतारों में लगाए गए पेड़।

12. महत्त्वपूर्ण आँकड़े — एक नज़र में

आँकड़ाकिससे जुड़ा
43 प्रतिशतभारत का मैदानी क्षेत्र
30 प्रतिशतभारत का पर्वतीय क्षेत्र
27 प्रतिशतभारत का पठारी क्षेत्र
32.8 लाख वर्ग किमी.भारत का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल
93 प्रतिशतकुल क्षेत्रफल का वह भाग जिसके भू-उपयोग आँकड़े उपलब्ध हैं
54 प्रतिशतकुल सूचित क्षेत्र का वह हिस्सा जिस पर अधिकतम खेती हो सकती है
80 प्रतिशतपंजाब और हरियाणा में शुद्ध बोया गया क्षेत्र
10 प्रतिशत से कमअरुणाचल प्रदेश, मिज़ोरम, मणिपुर और अंडमान निकोबार में बोया गया क्षेत्र
33 प्रतिशतराष्ट्रीय वन नीति (1952) द्वारा वांछित वन क्षेत्र
95 प्रतिशतभोजन, मकान और कपड़े की मूल आवश्यकताओं का वह भाग जो भूमि से मिलता है
13 करोड़ हेक्टेयरभारत में निम्नीकृत भूमि
28 प्रतिशतनिम्नीकृत भूमि में वनों के अंतर्गत अपरदित भाग
56 प्रतिशतनिम्नीकृत भूमि में जल अपरदित भाग
12 समुद्री मीलराष्ट्रीय संसाधनों में शामिल महासागरीय क्षेत्र
200 समुद्री मीलइससे परे खुले महासागरीय संसाधन अंतर्राष्ट्रीय होते हैं
pH < 6.0लेटराइट मृदा की अम्लीयता
लाखों वर्षकुछ सेंटीमीटर गहरी मृदा बनने में लगने वाला समय
45.26% → 45.5%शुद्ध बोया गया क्षेत्र, 1960–61 से 2014–15
18.11% → 23.3%वन क्षेत्र, 1960–61 से 2014–15

12.1 महत्त्वपूर्ण वर्ष

वर्षघटना
1952राष्ट्रीय वन नीति — 33 प्रतिशत वन क्षेत्र वांछित
1968क्लब ऑफ़ रोम ने संसाधन संरक्षण की वकालत की
1974शुमेसर की पुस्तक स्माल इज़ ब्यूटीफुल
1987ब्रुन्ड्टलैंड आयोग रिपोर्ट → सतत् पोषणीय विकास की संकल्पना → हमारा साझा भविष्य
जून 1992रियो डी जेनेरो पृथ्वी सम्मेलन (UNCED) → एजेंडा 21

13. NCERT अभ्यास प्रश्न (पाठ्यपुस्तक पृष्ठ 11)

1. बहुवैकल्पिक प्रश्न

प्रश्नविकल्पउत्तर
(i) पंजाब में भूमि निम्नीकरण का निम्नलिखित में से मुख्य कारण क्या है?(क) गहन खेती (ख) अधिक सिंचाई (ग) वनोन्मूलन (घ) अति पशुचारण(ख) अधिक सिंचाई
(ii) निम्नलिखित में से किस प्रांत में सीढ़ीदार (सोपानी) खेती की जाती है?(क) पंजाब (ख) उत्तर प्रदेश के मैदान (ग) हरियाणा (घ) उत्तराखण्ड(घ) उत्तराखण्ड
(iii) इनमें से किस राज्य में काली मृदा मुख्य रूप से पाई जाती है?(क) जम्मू और कश्मीर (ख) राजस्थान (ग) महाराष्ट्र (घ) झारखंड(ग) महाराष्ट्र

2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

प्रश्नउत्तर की कुंजी
(i) तीन राज्यों के नाम बताएँ जहाँ काली मृदा पाई जाती है। इस पर मुख्य रूप से कौन सी फ़सल उगाई जाती है?महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ (गुजरात/सौराष्ट्र भी लिख सकते हैं)। इस पर मुख्य रूप से कपास उगाई जाती है, इसीलिए इसे ‘काली कपास मृदा’ भी कहते हैं।
(ii) पूर्वी तट के नदी डेल्टाओं पर किस प्रकार की मृदा पाई जाती है? इस प्रकार की मृदा की तीन मुख्य विशेषताएँ क्या हैं?जलोढ़ मृदा। तीन विशेषताएँ — (1) इसमें रेत, सिल्ट और मृत्तिका के विभिन्न अनुपात पाए जाते हैं; (2) यह पोटाश, फास्फोरस और चूनायुक्त होती है; (3) यह बहुत उपजाऊ है और गन्ना, चावल, गेहूँ तथा दलहन के लिए उपयुक्त है।
(iii) पहाड़ी क्षेत्रों में मृदा अपरदन की रोकथाम के लिए क्या कदम उठाने चाहिए?समोच्च जुताई (contour ploughing), सोपान कृषि (terrace farming), पट्टी कृषि (strip farming) और वनारोपण। पश्चिमी और मध्य हिमालय में सोपान कृषि काफ़ी विकसित है।

3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 120 शब्दों में दीजिए

(i) भारत में भूमि उपयोग प्रारूप का वर्णन करें। वर्ष 1960–61 से वन के अंतर्गत क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण वृद्धि नहीं हुई, इसका क्या कारण है?

उत्तर के मुख्य बिंदु —

  • भू-उपयोग को भौतिक कारक (भू-आकृति, जलवायु, मृदा) और मानवीय कारक (जनसंख्या घनत्व, प्रौद्योगिक क्षमता, संस्कृति और परंपराएँ) निर्धारित करते हैं।
  • भारत का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 32.8 लाख वर्ग किमी. है, पर आँकड़े केवल 93 प्रतिशत भाग के उपलब्ध हैं — क्योंकि असम को छोड़कर पूर्वोत्तर प्रांतों के सूचित क्षेत्र की जानकारी नहीं है, और जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान तथा चीन अधिकृत क्षेत्रों का सर्वेक्षण नहीं हुआ।
  • पाँच श्रेणियाँ बताइए — वन; कृषि के लिए अनुपलब्ध भूमि; परती के अतिरिक्त अन्य कृषि अयोग्य भूमि; परती भूमि; और शुद्ध बोया गया क्षेत्र।
  • कुल सूचित क्षेत्र के लगभग 54 प्रतिशत हिस्से पर ही खेती हो सकती है; पंजाब-हरियाणा में 80 प्रतिशत, जबकि अरुणाचल, मिज़ोरम, मणिपुर और अंडमान निकोबार में 10 प्रतिशत से भी कम।
  • वन क्षेत्र 1960–61 में 18.11% था और 2014–15 में 23.3% हुआ, जो राष्ट्रीय वन नीति (1952) के 33 प्रतिशत लक्ष्य से काफ़ी कम है।
  • कारण — बढ़ती जनसंख्या के लिए कृषि भूमि, बस्तियों, सड़कों, रेल लाइनों और उद्योगों की माँग बढ़ी; इसी कारण गैर-कृषि प्रयोजनों की भूमि 4.95% से बढ़कर 8.7% हो गई। साथ ही वनोन्मूलन, खनन और अति पशुचारण ने भी वन क्षेत्र नहीं बढ़ने दिया।

(ii) प्रौद्योगिक और आर्थिक विकास के कारण संसाधनों का अधिक उपभोग कैसे हुआ है?

उत्तर के मुख्य बिंदु —

  • संसाधन प्रकृति की देन समझे जाने के कारण मानव ने इनका अंधाधुंध उपयोग किया।
  • बेहतर प्रौद्योगिकी से खनन, वनोन्मूलन और सिंचाई तेज़ हुई, जिससे संसाधनों का दोहन बढ़ा।
  • तीन समस्याएँ पैदा हुईं — (1) कुछ व्यक्तियों के लालचवश संसाधनों का ह्रास; (2) संसाधन कुछ ही लोगों के हाथ में आ गए, जिससे समाज संसाधन संपन्न और संसाधनहीन में बँट गया; (3) वैश्विक पारिस्थितिकी संकट — भूमंडलीय तापन, ओज़ोन परत अवक्षय, पर्यावरण प्रदूषण और भूमि निम्नीकरण।
  • उपनिवेशवाद का उदाहरण दीजिए — उपनिवेशकारी देशों ने बेहतर प्रौद्योगिकी के सहारे उपनिवेशों के संसाधनों का शोषण किया और उन पर आधिपत्य स्थापित किया।
  • गांधी जी का कथन लिखिए — “हमारे पास हर व्यक्ति की आवश्यकता पूर्ति के लिए बहुत कुछ है, लेकिन किसी के लालच की संतुष्टि के लिए नहीं।” उनके अनुसार लालची व स्वार्थी व्यक्ति तथा आधुनिक प्रौद्योगिकी की शोषणात्मक प्रवृत्ति इसके लिए ज़िम्मेदार है।
  • निष्कर्ष — इसीलिए 1968 के क्लब ऑफ़ रोम से लेकर 1992 के रियो सम्मेलन तक संसाधन संरक्षण और सतत् पोषणीय विकास की ज़रूरत बार-बार उठाई गई।

4. परियोजना/क्रियाकलाप (पृष्ठ 12)

  1. “अपने आस पास के क्षेत्रों में संसाधनों के उपभोग और संरक्षण को दर्शाते हुए एक परियोजना तैयार करें।”
  2. “आपके विद्यालय में उपयोग किए जा रहे संसाधनों के संरक्षण विषय पर अपनी कक्षा में एक चर्चा आयोजित करें।”

5. वर्ग पहेली (पृष्ठ 12) — उत्तर अंग्रेज़ी के शब्दों में हैं

संकेतउत्तर
(i) भूमि, जल, वनस्पति और खनिजों के रूप में प्राकृतिक सम्पदाRESOURCES
(ii) अनवीकरण योग्य संसाधन का एक प्रकारMINERALS
(iii) उच्च नमी रखाव क्षमता वाली मृदाBLACK (काली मृदा — नमी धारण क्षमता सबसे अधिक)
(iv) मानसून जलवायु में अत्यधिक निक्षालित मृदाएँLATERITE
(v) मृदा अपरदन की रोकथाम के लिए बृहत् स्तर पर पेड़ लगानाAFFORESTATION
(vi) भारत के विशाल मैदान इन मृदाओं से बने हैंALLUVIAL

पहेली की तालिका में ये शब्द ऊर्ध्वाधर और क्षैतिज दोनों दिशाओं में छिपे हैं — FORESTATION, MINERALS, LATERITE और ALLUVIAL साफ़ दिखाई देते हैं।

14. पूरे अध्याय की एक तालिका (आख़िरी दिन के लिए)

भागमुख्य बात एक वाक्य में
संसाधन की परिभाषासंसाधन प्रकृति का उपहार नहीं, मानवीय क्रियाओं का परिणाम है।
वर्गीकरणचार आधार — उत्पत्ति, समाप्यता, स्वामित्व और विकास का स्तर।
संसाधन विकासअंधाधुंध उपयोग से तीन समस्याएँ — ह्रास, बँटवारा और पारिस्थितिकी संकट।
सतत् पोषणीय विकासविकास ऐसा हो जो पर्यावरण को नुक़सान न पहुँचाए और भविष्य की पीढ़ियों का हक़ न छीने।
संसाधन नियोजनतीन सोपान — पहचान, प्रौद्योगिकी और समन्वय; भारत में विविधता के कारण यह ज़रूरी है।
संरक्षणगांधी जी से लेकर 1992 के रियो सम्मेलन तक की चिंता।
भू-संसाधनमैदान 43%, पर्वत 30%, पठार 27%; भू-उपयोग की पाँच श्रेणियाँ।
भू-उपयोग प्रारूप32.8 लाख वर्ग किमी. में से 93% के आँकड़े; 54% पर ही खेती संभव; वन 33% चाहिए पर 23.3% है।
भूमि निम्नीकरण13 करोड़ हेक्टेयर; कारण — खनन, अति पशुचारण, अधिक सिंचाई।
मृदा के छह प्रकारजलोढ़, काली, लाल-पीली, लेटराइट, मरुस्थली और वन मृदा।
मृदा अपरदनअवनलिका, चादर और पवन अपरदन; बचाव — समोच्च जुताई, सोपान, पट्टी कृषि और रक्षक मेखला।

अंतिम बात। इस अध्याय को रटिए मत — इसे नक़्शे पर देखिए। जब आप कहते हैं “काली मृदा महाराष्ट्र में है”, तो एक बार भारत के नक़्शे पर महाराष्ट्र की जगह उँगली रखिए। भूगोल तभी याद रहता है जब वह जगह बन जाए, सिर्फ़ नाम न रहे। और अपने राज्य को कभी मत छोड़िए — राजस्थान इस अध्याय में चार बार आया है: पवन-सौर ऊर्जा की बहुतायत, जल की कमी, अति पशुचारण से भूमि निम्नीकरण, और मरुस्थली मृदा में सिंचाई से खेती। ये चारों RBSE की परीक्षा में पूछे जाते हैं।