अध्याय 8 — किसान, ज़मींदार और राज्य | कक्षा XII इतिहास | भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग-2
कक्षा — 12 · विषय — इतिहास (भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग-2)
सबसे पहला तथ्य
सोलहवीं-सत्रहवीं सदी के हिंदुस्तान में करीब-करीब 85 फ़ीसदी लोग गाँवों में रहते थे। मुग़ल साम्राज्य की असली कहानी तख़्त की नहीं — खेत की है।
जो लिखते नहीं, उनका इतिहास कैसे लिखा जाए?
- “चूँकि किसान अपने बारे में खुद नहीं लिखा करते थे…”
- जानकारी उनसे नहीं मिलती जो खेतों में काम करते थे
- मुख्य स्रोत — मुग़ल दरबार की निगरानी में लिखे ग्रंथ
- यही इस अध्याय की केंद्रीय समस्या है
प्रस्तावना — तीन कोनों का रिश्ता
पृ. 196
- छोटे खेतिहर और भूमिहर संभ्रांत — दोनों फ़सल के हिस्सों के दावेदार
- रिश्ते — सहयोग, प्रतियोगिता और संघर्ष तीनों
- मुग़ल राज्य — आमदनी का बड़ा हिस्सा कृषि से उगाही; नुमाइंदे — निर्धारक, वसूली करने वाले, हिसाब रखने वाले
- व्यापार, मुद्रा और बाज़ार गाँवों में घुस आए — गाँव शहर से जुड़े
गाँव बंद टापू नहीं था — यह वाक्य पूरे अध्याय में गूँजेगा
1 | स्रोत और किसान | आइन; खुद-पाहि काश्त; ज़मीन
आइन-ए-अकबरी — मुख्य स्रोत
§1.1
- लेखक — अकबर का दरबारी इतिहासकार अबुल फ़ज़्ल
- उद्देश्य — ऐसा खाका जहाँ मज़बूत सत्ताधारी वर्ग सामाजिक मेल-जोल बनाकर रखता था
- लेखक के मुताबिक — राज्य के ख़िलाफ़ “बगावत का असफल होना पहले ही तय”
- पूरक स्रोत — 17वीं-18वीं सदी के गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान के दस्तावेज़ + ईस्ट इंडिया कंपनी के रिकॉर्ड
अध्याय का सबसे महत्त्वपूर्ण वाक्य
§1.1, पृ. 197
दूसरे शब्दों में, किसानों के बारे में जो कुछ हमें आइन से पता चलता है वह सत्ता के ऊँचे गलियारों का नज़रिया है।
इसीलिए दूर के इलाकों के दस्तावेज़ों से मिलान ज़रूरी है — और अध्याय का अंत आइन की समीक्षा पर होगा।
किसान और उसकी ज़मीन
§1.2 — रैयत (रिआया), मुज़रियान, आसामी
- खुद-काश्त — अपने ही गाँव में ज़मीन वाले
- पाहि-काश्त — दूसरे गाँवों से ठेके पर; मर्ज़ी से (बेहतर कर-शर्तें) या मजबूरन (अकाल)
- औसत किसान — जोड़ी बैल, दो हल से ज़्यादा शायद ही
- गुजरात: 6 एकड़ = समृद्ध | बंगाल: 5 एकड़ औसत-सीमा; 10 एकड़ = अमीर आसामी
- ★खेती व्यक्तिगत मिल्कियत पर — ज़मीन खरीदी-बेची जाती थी
हदों पर मिट्टी-ईंट-काँटों के निशान — “ज़मीन के हज़ारों टुकड़े किसी भी गाँव में”
बाबर का अचरज
स्रोत 1 — बाबरनामा
हिंदुस्तान में बस्तियाँ और गाँव, दरअसल शहर के शहर, एक लमहे में ही वीरान भी हो जाते हैं और बस भी जाते हैं… झोंपड़ियाँ बनाई जाती हैं, और यकायक एक गाँव या शहर खड़ा हो जाता है!
कारण — बारिश की फ़सलें, ख़स-घास और अपार जंगल, बेशुमार आबादी। यही किसान-गतिशीलता आगे ‘भागने का हथियार’ बनेगी।
2 | खेती की दुनिया | सिंचाई-तकनीक; फ़सलों की भरमार
पानी और तकनीक
§1.3 — “मानसून भारतीय कृषि की रीढ़ था, जैसा कि आज भी है”
- 40 इंच+ बारिश → चावल; कम → गेहूँ; कमतर → ज्वार-बाजरा
- राज्य की मदद — नयी नहरें, मरम्मत; शाह नहर (पंजाब, शाहजहाँ)
- रहट (लाहौर-दीपालपुर) व बालटी-विधि (आगरा-चाँदवार-बयाना) — बाबरनामा
- लकड़ी का हलका हल + लोहे का फाल — गहरा नहीं खोदता → गर्मी में नमी बची रहती
- बैल-चालित बरमा; पर हाथ से छिड़ककर बोना ज़्यादा प्रचलित
फ़सलों की भरमार
| तथ्य | आँकड़ा |
|---|---|
| फ़सल-चक्र | खरीफ़ (पतझड़) + रबी (वसंत); 2–3 फ़सलें |
| आगरा | 39 किस्म की फ़सलें |
| दिल्ली | 43 फ़सलें |
| बंगाल | सिर्फ़ चावल की 50 किस्में |
| आबादी (1600→1700) | +5 करोड़ (~33%) |
“मौसम के दो चक्रों” वाली यह विविधता ही आबादी-वृद्धि का आधार बनी
गुज़ारा बनाम बाज़ार
§1.4 — जिन्स-ए-कामिल (सर्वोत्तम फ़सलें)
पेट भरने की खेती
- चावल, गेहूँ, ज्वार — रोज़मर्रा का खाना
- प्राथमिक उद्देश्य — लोगों का पेट भरना
बाज़ार की खेती
- कपास — मध्य भारत, दक्कनी पठार
- गन्ना — बंगाल की मशहूर चीनी
- तिलहन-दलहन भी नकदी फ़सलें
- राज्य बढ़ावा देता — ज़्यादा कर मिलता था
NCERT: दोनों उत्पादन “एक दूसरे से जुड़े हुए थे” — यह द्वैत झूठा है
नयी दुनिया से आए मेहमान
सत्रहवीं सदी
- मक्का — अफ्रीका और स्पेन के रास्ते; पश्चिम भारत की मुख्य फ़सल बना
- टमाटर, आलू, मिर्च — नयी दुनिया की सब्ज़ियाँ
- अनानास, पपीता — नयी दुनिया के फल
- तम्बाकू — दक्कन से उत्तर भारत (17वीं सदी के आरंभ); अकबर ने 1604 में पहली बार देखा; जहाँगीर की पाबंदी बेअसर
आज की ‘भारतीय रसोई’ की आधी चीज़ें इसी सदी में आईं
3 | ग्रामीण समुदाय | जाति; पंचायत; दस्तकार; “छोटा गणराज्य?”
जाति और ग्रामीण माहौल
§2.1
- ★“खेती लायक ज़मीन की कमी नहीं थी, फिर भी कुछ जातियों को सिर्फ़ नीच समझे जाने वाले काम — इस तरह वे ग़रीब रहने के लिए मजबूर थे”
- हलालख़ोरान — गाँव की हदों के बाहर; मल्लाहज़ादे (बिहार) — दासों-सी तुलना
- निचले तबकों में जाति-गरीबी-हैसियत का सीधा रिश्ता — बीच के समूहों में नहीं
- गतिशीलता — मारवाड़ की किताब में राजपूत किसान; जाट नीचे; गौरव का राजपूत-दावा; अहीर-गुज्जर-माली ऊपर उठे
पंचायत — बुज़ुर्गों का अल्पतंत्र
§2.2
- पुश्तैनी संपत्ति-अधिकार वाले महत्त्वपूर्ण लोगों का जमावड़ा; बहुजातीय
- पर “नीच” काम करने वाले मज़दूरों के लिए जगह की संभावना कम
- फ़ैसला गाँव में सबको मानना पड़ता था
- मुखिया (मुक़द्दम/मंडल) — बुज़ुर्गों की सहमति + ज़मींदार की मंज़ूरी; भरोसा टूटे तो बर्खास्त
- हिसाब-किताब मुखिया की निगरानी में — पटवारी की मदद से
- ख़ज़ाना — कर-अधिकारियों की ख़ातिरदारी; बाढ़; बाँध-नहर
पंचायत का सामाजिक शिकंजा
जाति की हदें
- बड़ा काम — लोग “अपनी जाति की हदों के अंदर रहें”
- पूर्वी भारत — शादियाँ मंडल की मौजूदगी में
- दंड — जुर्माना और समुदाय से निष्कासन (सीमित समय; जाति-पेशे से हाथ धोना)
- जाति पंचायतें — राजस्थान में दीवानी झगड़े, ज़मीन-दावे, विवाह-मानदंड, तरजीह-क्रम
- ★“फ़ौजदारी न्याय को छोड़ दें तो ज़्यादातर मामलों में राज्य जाति पंचायत के फ़ैसलों को मानता था”
कमज़ोर की दो ताक़तें
§2.2 — दरख़्वास्तें (राजस्थान-महाराष्ट्र के दस्तावेज़)
उनकी नज़रों में ज़िंदा रहने के लिए न्यूनतम बुनियादी साधन उनका परंपरागत रिवाजी हक़ था।
पहली ताक़त — पंचायत में सामूहिक दरख़्वास्त (आवाज़)। दूसरी — समझौता न हो तो “गाँव छोड़कर भाग जाना… एक बड़ा प्रभावी हथियार” (निकास) — क्योंकि ज़मीन सुलभ थी, श्रम दुर्लभ।
ग्रामीण दस्तकार
§2.3 — कहीं-कहीं 25% घर दस्तकारों के
- किसान-दस्तकार भेद मुश्किल — खेतिहर परिवार फ़ुरसत के महीनों में रँगरेज़ी, छपाई, बर्तन, औज़ार
- अदायगी — फ़सल का हिस्सा या ज़मीन का टुकड़ा; महाराष्ट्र में मीरास/वतन (पुश्तैनी)
- जजमानी — 18वीं सदी के बंगाल में लोहार-बढ़ई-सुनार को “रोज़ का भत्ता और खाने के लिए नकदी”
- ! यह शब्द 16वीं-17वीं सदी में बहुत इस्तेमाल नहीं होता था
फेर-बदल के रिश्ते पेचीदा थे — नकद बिलकुल नदारद नहीं था
“छोटा गणराज्य”? — 19वीं सदी की छवि बनाम यथार्थ
§2.4
अंग्रेज़ अफ़सरों की छवि
- गाँव = “छोटा गणराज्य”
- सामूहिक भाईचारा
- संसाधनों-श्रम का साझा बँटवारा
- आत्मनिर्भर, बंद इकाई
NCERT का खंडन
- संपत्ति की व्यक्तिगत मिल्कियत
- जाति और जेंडर की गहरी विषमताएँ
- ताकतवरों के फ़ैसले, कमज़ोरों का शोषण — न्याय-अधिकार भी उन्हीं का
- नकद के रिश्ते — कर, मज़दूरी, सराफ़
तैवर्नियर: वे गाँव छोटे कहे जाएँगे जिनमें सराफ़ (मुद्रा-परिवर्तक) न हों
4 | महिलाएँ और जंगल | श्रम-नियंत्रण; कबीले-घुसपैठ
कृषि समाज में महिलाएँ — श्रम
§3 — “कंधे से कंधा मिलाकर खेतों में”
- मर्द — जुताई, हल; महिलाएँ — बुआई, निराई, कटाई, दाना निकालना
- घर (महिला)/बाहर (मर्द) का फ़र्क मुमकिन नहीं था
- पर पूर्वाग्रह — राजस्वला स्त्री हल-चाक नहीं छू सकती (पश्चिम); पान-बगान वर्जित (बंगाल)
- सूत, मिट्टी-सफ़ाई, कढ़ाई — महिला-श्रम पर निर्भर
- ★“जितना वाणिज्यीकरण, उतनी महिलाओं के श्रम की माँग” — खेत, नियोक्ता-घर, बाज़ार
महिला — ‘संसाधन’ और नियंत्रण
§3 — दोनों पक्ष
- बच्चे पैदा करने की क़ाबिलियत → “महत्त्वपूर्ण संसाधन”; शादीशुदा महिलाओं की कमी (कुपोषण, प्रसव-मृत्यु)
- इसलिए — “दुल्हन की क़ीमत” (दहेज नहीं); तलाकशुदा-विधवा विवाह वैध
- पर — घर का मुखिया मर्द; बेवफ़ाई के शक पर भयानक दंड
- दरख़्वास्तों में महिला का नाम दर्ज नहीं — “मर्द की माँ, बहन या पत्नी”
- दूसरा पक्ष — पंजाब में विधवाएँ भी ज़मीन-बाज़ार में विक्रेता; ज़मींदारी-उत्तराधिकार; ★बंगाल की राजशाही ज़मींदारी की कर्ता-धर्ता एक स्त्री
जंगल — 40 फ़ीसदी हिंदुस्तान
§4.1 — खरबंदी
- फैलाव — झारखंड-पूर्वी भारत, मध्य भारत, तराई, पश्चिमी घाट, दक्कन; औसत ~40%
- ★‘जंगली’ = जंगल-उत्पाद, शिकार, स्थानांतरीय खेती से गुज़ारा — “सभ्यता का न होना बिलकुल नहीं”
- भील ऋतु-चक्र: बसंत — उत्पाद; गर्मी — मछली; मानसून — खेती; शरद-जाड़ा — शिकार
- राज्य की नज़र — जंगल = मवास (बदमाशों का अड्डा)
बाबर: जंगल “रक्षाकवच” — पीछे के लोग “कड़े विद्रोही… कर अदा करने से मुकर जाते थे”
जंगल में घुसपैठ
§4.2 — राज्य, बाज़ार, धर्म
- हाथी — पेशकश में; शिकार अभियान = सद्भावनापूर्ण शासन का प्रतीक (कोने-कोने का दौरा)
- वाणिज्य — शहद, मधुमोम, लाक (★लाक = 17वीं सदी का प्रमुख निर्यात); लोहानी कबीला — भारत-अफ़ग़ानिस्तान व्यापार
- सरदार → ज़मींदार, कुछ राजा; खानदानी सेनाएँ; सिंध — 6000 घुड़सवार, 7000 पैदल
- अहोम पायक — ज़मीन बदले सैनिक सेवा; जंगली हाथी पर एकाधिकार; कोच राजा — कबीलों पर कब्ज़ा
- सूफ़ी पीर — खेतिहर समुदायों के इस्लाम अपनाने में बड़ी भूमिका
जंगल कटता है, राज्य बनता है
स्रोत 3 — चंडीमंगल (मुकुंदराम चक्रवर्ती, 16वीं सदी)
पश्चिम से आया ज़फ़र मियाँ, साथ में बाईस हज़ार लोग… जंगलों को हटाने के बाद उन्होंने बसाए बाज़ार… कुल्हाड़ियों की आवाज़ सुनकर शेर डर गए और दहाड़ते हुए भाग निकले।
कालकेतु की कविता में जंगल-सफ़ाया, प्रवासी श्रम, बाज़ार-निर्माण और इस्लाम का प्रसार — सब एक साथ दर्ज है।
5 | ज़मींदार और राज्य | पिरामिड; भू-राजस्व; चाँदी
ज़मींदार — पिरामिड का संकरा शीर्ष
§5 — जाति + ख़िदमत से ऊँची हैसियत
- खेती से कमाई, पर उत्पादन में सीधी हिस्सेदारी नहीं
- ताक़त के तीन आधार — मिल्कियत (बेच-नाम-गिरवी) • राज्य की ओर से कर-वसूली • किले + सैनिक टुकड़ियाँ
- अबुल फ़ज़्ल — “ऊँची जाति” के ब्राह्मण-राजपूत गठबंधन का ठोस नियंत्रण; मुसलमान ज़मींदार भी
- विस्तार के तरीक़े — जंगल-बारी, हस्तांतरण, राज्यादेश (सनद), ख़रीद → “निचली” जातियाँ भी दाख़िल
एक समांतर सैनिक बल
आइन के अनुसार ज़मींदारों की मिली-जुली पैदल सेना — साथ में 3,84,558 घुड़सवार, 1863 हाथी, 4260 तोपें, 4500 नावें। यह बादशाह की नहीं — ज़मींदारों की ताक़त थी।
शोषक या संरक्षक?
§5 — NCERT का संतुलित निष्कर्ष
- शोषण में “कोई शक नहीं” — पर रिश्तों में पारस्परिकता, पैतृकवाद, संरक्षण का पुट
- प्रमाण 1 — भक्ति संतों ने ज़मींदारों को शोषक नहीं दिखाया; निशाना — राज्य का राजस्व अधिकारी
- प्रमाण 2 — 17वीं सदी के कृषि विद्रोहों में ज़मींदारों को किसानों का समर्थन
- विकास-भूमिका — बसावट की अगुआई, उधार, हाट स्थापित करना, मौद्रीकरण
प्रश्न: सबसे बड़ा शोषक होता तो विद्रोही किसान उसके झंडे तले क्यों लड़ते?
भू-राजस्व — साम्राज्य की आर्थिक बुनियाद
§6 — दीवान का दफ़्तर
- दो चरण — जमा (निर्धारण) बनाम हासिल (वास्तविक वसूली)
- अमील-गुज़ार — नक़द की कोशिश, फ़सल का विकल्प खुला
- राज्य हिस्सा “ज़्यादा से ज़्यादा” रखने की कोशिश — पर वसूली हमेशा संभव नहीं
- नपाई — जुती + जोतने लायक; 1665 औरंगज़ेब — हर गाँव, हर किसान (आसामीवार) का सालाना हिसाब
- ! जंगलों से घिरे इलाकों की नपाई नहीं हो पाई
अकबर के शासन में भूमि का वर्गीकरण
| वर्ग | परिभाषा |
|---|---|
| पोलज | हर साल खेती; कभी खाली नहीं |
| परौती | कुछ दिनों खेती बंद — ताकत की वापसी |
| चचर | 3–4 वर्ष खाली |
| बंजर | 5+ वर्ष से खेती नहीं |
पहले दो की तीन किस्में (अच्छी-मध्यम-खराब) → औसत = मध्यम उत्पाद → उसका एक-तिहाई = शाही शुल्क
नक़द या जीन्स? — वसूली के चार तरीक़े
स्रोत 6 — आइन
- कणकुत — कण (अनाज) + कुत (अंदाज़ा); शक हो तो तीन पुलिंदे
- बटाई/भाओली — कटाई बाद सबकी मौजूदगी-रज़ामंदी में बँटवारा; “समझदार निरीक्षक” ज़रूरी
- खेत बटाई — बुवाई के बाद ही खेत बँट जाते
- लाँग बटाई — कटाई बाद ढेर बनाकर बँटवारा
हर विधि में राज्य को धोखे की आशंका भी दर्ज है — “दुष्ट-बुद्धि और मक्कार…”
चाँदी का बहाव
मुग़ल-मिंग-सफ़ावी-ऑटोमन की स्थिरता ने चीन से भूमध्यसागर तक व्यापार-जाल रचा। भारत के निर्यात का भुगतान चाँदी में हुआ — और भारत में चाँदी के प्राकृतिक स्रोत नहीं थे। नतीजा: रुपये की स्थिरता, ढलाई का विस्तार, नकदी कर।
सारी दुनिया की चाँदी यहीं क्यों?
स्रोत 8 — जोवान्नी कारेरी (इटली, ~1690)
दुनिया भर में विचरने वाला सारा सोना-चाँदी आख़िरकार यहीं पहुँच जाता है… यूरोप को जाने वाली सारी वस्तुएँ, चाहे वो फ्रांस जाएँ या इंग्लैंड या पुर्तगाल, सभी नकद में खरीदी जाती हैं, जो वहीं रह जाता है।
मार्ग — अमेरिका → यूरोप → मोचा-बसरा → हिंदुस्तान; जापान की खानें → डच जहाज़ → हिंदुस्तान।
6 | आइन की शल्य-परीक्षा | पाँच दफ़्तर; विधि; सीमाएँ
आइन — रचना और ढाँचा
§8 — अकबरनामा की तीसरी जिल्द; राजपत्र-स्वरूप
- 1598 ई. — अकबर के 42वें शासन-वर्ष में, पाँच संशोधनों के बाद पूर्ण
- मंज़िल-आबादी — शाही घर-परिवार
- सिपह-आबादी — प्रशासन-सेना; मनसबदारों-विद्वानों-कवियों की जीवनियाँ
- मुल्क-आबादी — वित्त-राजस्व + “बारह प्रांतों का बयान”; सरकार-तालिकाओं के आठ खाने (ज़मींदारों की जातियाँ व फ़ौज तक)
- चौथी-पाँचवीं — रीति-रिवाज + अकबर के “शुभ वचन”
अबुल फ़ज़्ल की अपनी विधि
स्रोत 9 — “खुशकिस्मती के गुलाब बाग की सिंचाई”
मैंने सच बोलने वाले समझदार बुज़ुर्गों और फुर्तीले दिमाग वाले, सत्यकर्मी जवानों दोनों को परखा, और उनके बयानों को लिखित रूप से दर्ज किया।
दस्तावेज़-संग्रह, जवाब-तलबी, परखे गए बयान, सूबों से संस्मरण, हुक्मों की मूल प्रतियाँ — मौखिक + लिखित, दोनों; सत्यापन की चेतना के साथ।
आइन — खूबियाँ और सीमाएँ
§8 — संतुलित मूल्यांकन
- खूबियाँ — पाँच संशोधन; मौखिक की पुष्टि; आँकड़े अंकों + शब्दों दोनों में
- सीमा 1 — जोड़ की ग़लतियाँ (मामूली)
- सीमा 2 — आँकड़ों की विषमता: बंगाल-उड़ीसा की ज़मींदार-जाति सूचनाएँ नहीं
- सीमा 3 — कीमतें-मज़दूरी अच्छे से दर्ज नहीं
- सीमा 4 — ★सूचियाँ आगरा-केंद्रित — “देश के बाकी हिस्सों के लिए प्रासंगिकता सीमित”
फिर भी — “अपने समय के लिए एक असामान्य व अनोखा दस्तावेज़” — राजनीतिक वारदातों से आगे बढ़कर लोगों-पेशों-उत्पादों का लेखा
मुग़ल साम्राज्य — मुख्य पड़ाव
- 1526पानीपत-1 — बाबर पहला मुग़ल बादशाह
- 1556-1605अकबर (1598 — आइन पूर्ण)
- 1605-27जहाँगीर (तम्बाकू-पाबंदी)
- 1628-58शाहजहाँ (शाह नहर)
- 1658-1707औरंगज़ेब (1665 — सर्वेक्षण-हुक्म)
- 1739नादिरशाह की दिल्ली-लूट
- 1765बंगाल की दीवानी ईस्ट इंडिया कंपनी को
- 1857बहादुर शाह ज़फ़र — रंगून निर्वासन
परीक्षा-दृष्टि — अंतिम पुनरावृत्ति
याद रखने योग्य
- 85% गाँव • आइन 1598/5 संशोधन • “ऊँचे गलियारों का नज़रिया”
- खुद/पाहि • 6-5-10 एकड़ • 39-43-50 • जिन्स-ए-कामिल
- मुक़द्दम-मंडल • फ़ौजदारी छोड़ जाति-पंचायत मान्य • भागना = हथियार
- दुल्हन की क़ीमत • नाम-विहीन दरख़्वास्तें • राजशाही की स्त्री
- जंगल 40% • मवास • अहोम पायक • लाक-निर्यात
- जमा-हासिल • पोलज→बंजर • कणकुत-बटाई • 1665
- चार साम्राज्य • कारेरी ~1690 • ब्लॉकमेन-जैरेट
NCERT के द्वैत याद रखिए — गुज़ारा/बाज़ार, शोषक/संरक्षक, गणराज्य/विषमता — उत्तर में दोनों पक्ष लिखिए